Tuesday, 25 April 2017

उजला कपड़ा पेनो नक्को

आज सुबह जब मैं अपनी ही बिगड़ी हुई तबीयत से नासाज़ थी तभी गली में एक हल्ला मच गया। माँ इस वक़्त मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही थीं। इस हल्ले से मेरा और माँ का जी मचल गया। माँ जल्दी से उठकर बाहर की तरफ़ लपकी। मैंने आवाज़ों के सहारे परिस्थिति का आकलन करने की अपनी कानाई कोशिशें ज़ारी कर दीं।

माँ अब तक मेरे बिस्तर से उठकर जा चुकी थीं। थोड़ी देर बाद मुझे किसी के दर्द से चिल्लाने की चुभने वाली तेज़ कराहट सुनाई दी। मुझे लगा कोई हादसा हो गया है शायद। मैं बिस्तर से उठकर जाना चाहती थी, पर मैं नाकाम हो गई। लगभग दो घंटे तक मैंने काफ़ी कोशिशें की पर कोई फायदा नहीं हुआ। आसपास कोई बच्चा भी नहीं था कि गली का हाल जान लूँ। घड़ी पर नज़र डाली तो 11 बज रहे थे। बीमारी में वक़्त काफ़ी धीरे चलता है, यह जानकार मैंने लंबी साँसें लीं और आँखें बंद कर लीं।

इसके बाद गली में काफ़ी शांति का माहौल महसूस हुआ और मुझे मुट्ठी भर की नींद आ गई। अपने आप जब आँखें खुलीं तो सामने की दीवार पर नज़रें टिकीं। साढ़े ग्यारह का वक़्त हो चला था। मैं पसीने में भीगी हुई थी। माँ मेरे सिरहाने के पास आकर न जाने कब से बैठी हुई थीं। मैंने बिना देरी किए उनसे पूछा तो पता चला कि मेरे बचपन के दोस्त की मम्मी सीढ़ियों से गिर गई थीं। काफ़ी चोट आई थी। डॉक्टर को बुलाया गया था।

डॉक्टर ने घबराने की कोई बात नहीं वाली बात कही।

वो आराम कर रही थी। इसलिए माँ और गली की औरतें मिलकर उनके घर के काम कर रही थीं। माँ ने खाना बनाया तो साज़िया की अम्मी ने झाड़ू लगा दी और गीता की मम्मी ने कपड़े धोये।
हम, मेरी उम्र से भी कई सालों से बड़े रिश्ते वाले पड़ोसी हैं। कितने बरस हो गए एक साथ रहते। झगड़ा लड़ाई सब कुछ होता है पर जब इस तरह के मामले आते हैं तो गली के बच्चे तक एक नज़र आते हैं। इसके बीच न तो किसी की कंठी आड़े आती है और न ही किसी का ताबीज़। शायद इंसान की मूल भावनाएँ जाग जाती हैं और समाज की सामाजिक परवरिश हार जाती है।

मुझे आजतक सामाजिक और धार्मिक अलगाव वाली परवरिश का फंडा रास नहीं आया। यह इतना हावी है की प्रसादजी और कलामजी को एक साथ रहने के लिए रोकता रहता है। यह उनको भुला देता है कि कोशिका धर्म क्या है या फिर इंसानियत का धर्म क्या है! दुबे जी और महरा जी का अंतर तो बहुत डरावना है। इसमें शोषण की लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया है। 

मुझे आज भी आदि मानव के बारे में जानना और पढ़ना बहुत पसंद है। उसका जीवन अस्थायी और यायावर जरूर था पर वह सहधर्मिता को जानता और मानता, दोनों था। उसके कारवां मुझे बड़े ही हसीन मालूम पड़ते हैं। वो जानता था कि वो धरती पर एक औसत उम्र का मुसाफ़िर है। धर्म के बगैर जीना उसे आता था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई होती थी। शरीर के निचले हिस्से को पत्तों से ढककर रखते थे। सब कुछ सामान्य और अनगढ़ था। जंगल बिना दिवारों वाला घर था तो आसमान सिर के ऊपर का खुला रसीलेदार रोशनदान। जंगल के जानवर उसके पड़ोसी थे। 

                              अल्फ्रेड मरतींज द्वारा निर्मित

मर्द और औरत के रिश्ते भी इतने खुले हुए थे। वे आज़ादी और एक दूसरे के सम्मान की परिभाषा जानते थे। बच्चे मिट्टी में सनकर बड़े हो जाते और संक्रमण का कोई खौफ़ नहीं था। बिना क़लमे और श्लोक वाले लोग। बिना धर्म ग्रन्थों वाली सभ्यता के बाशिंदें। बड़े अस्पताल नहीं थे क्योंकि वह प्रकृति के क़रीब था। प्रकृति सम्माननीय माँ थी। वही उसके दुख में सहारा थी, वही उसकी प्रथम उपचारिणी माता थी। वह उसकी पोषिका थी। आप सोचिए इसके बारे में। एक बार आलोचना वाले दिमाग को ज़रा टेबल पर रखकर सोचिए।

आदि मानव और मानवी सीमा का अर्थ जानता था और थी। उपभोग और संतुलित प्रयोग में उसे अच्छे से अंतर ज्ञात था। वह संयमी था। लालची नहीं था। जल की जरूरत प्यास बुझाने तक थी न कि बिजली के बड़े संयत्र बनाकर खड़े करने की। उसके पास प्रोफ़ेसनल डिग्रियाँ नहीं थी। वह समझदार था अपितु चालाक नहीं, धोखेबाज़ वाला चालाक।

पर समय के साथ विकास नामक तत्व ने जब उसके दिमाग पर दस्तक दी तो पासों के पलटने में देरी नहीं हुई। पासे पलटे तो धारदार और नुकीले औज़ार उपज गए जो बहुत खतरनाक साबित हुए। इन्हीं अंधे औजारों ने कुछ न देखा और न समझा बस अपने काटने के धर्म के अनुयायी बने। सब मेरा है। वे हमारा शब्द भूल गए।

ये औज़ार, अपने साथ एक सामाजिक व्यावहारिक शब्दावली लाये जिसने उसके रहने और उपभोग के तौर तरीकों को बदल दिया। प्रकृति अब सम्मान के बनिस्पत उपभोग के रूप में रह गई। उपभोग क्षय का प्रतीक है और असीम उपभोग महाविनाश का प्रतीक बनने लगा। कमाल का असंतुलित व्यापक तराजू नज़र आता है। वहाँ बीती खुशियाँ हैं जो वर्तमान में कहने और सुनने की बैठक भर के लिए हैं। हमारे यहाँ एक व्यक्ति बहुत अमीर जिसका चार लोगों का आलीशान बंगला है तो कई बच्चों को खाना नहीं मिलता और वे मर रहे हैं। 


हमारा वर्तमान इतना भूखा है कि वह बदहवाशी में किसी अजगर की तरह सबकुछ निगले जा रहा है। नई तकनीकों और ख़्वाहिशों से लैस ये अजगर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। इस अजगर को रोकने के उपाय भी हैं। जाति या वर्ग व्यवस्था पर नज़र दौड़ाई जाये तब बहुत कुछ समझ आ जाता है। कितना शोषण छिपा है इन दोनों टर्मों में। रही सही कसर धर्म और उसके पाखंड ने पूरी कर दी। इसलिए संघर्ष होते रहेंगे। संघर्ष हमारे दौर का अनिवार्य अंग है। 
  

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