Friday, 7 August 2026

यह अनुवाद - माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि

 


लूसियस अनेयस सेनेका, जिन्हें सामान्यतः सेनेका कहा जाता है, प्राचीन रोम के महान दार्शनिक, लेखक, नाटककार और स्टोइक विचारक थे। उनका जीवन पहली शताब्दी ईस्वी के उस रोमन संसार में बीता, जहाँ सत्ता, वैभव, महत्वाकांक्षा और नैतिक संकट एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। वे केवल दर्शन के सिद्धांतकार नहीं थे। उन्होंने मनुष्य के दैनिक जीवन, उसकी इच्छाओं, भय, क्रोध, सुख, धन, मृत्यु और आत्मसंयम जैसे प्रश्नों पर अत्यंत व्यावहारिक ढंग से विचार किया। 



    उनकी प्रसिद्ध कृति लेटर्स टू लूसीलियस (Letters to Lucilius),  मॉरल लेटर्स टू लूसीलियस (Moral Letters to Lucilius) अथवा सेनेका द्वारा लूसीलियस को नीतिशास्त्र पर पत्र (Letters on Ethics) वास्तव में ऐसे दार्शनिक पत्र हैं जिनमें सेनेका अपने मित्र लूसिलियस से संवाद करते हुए जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला पर विचार करते हैं। इन पत्रों की विशेषता यह है कि दर्शन यहाँ किसी दूर की, अमूर्त वस्तु के रूप में नहीं आता. वह हमारे भोजन, धन, मित्रता, समय, इच्छाओं, आदतों और मृत्यु-बोध तक पहुँचता है। कोशिश की है कि अनुवाद में यह सब अच्छी तरह से स्पष्ट हो।

     ये पत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने होते हुए भी मनुष्य की उन समस्याओं को संबोधित करते हैं जो आज भी हमारे भीतर उपस्थित हैं। हम क्या चाहें? कितना धन पर्याप्त है? दूसरों की स्वीकृति की हमें कितनी आवश्यकता है? सुख और शुभ में क्या अंतर है? मृत्यु से क्यों डरें? अपने मन को परिस्थितियों का दास बनने से कैसे बचाएँ? सेनेका इन प्रश्नों के आसान उत्तर नहीं देते बल्कि हमें अपने जीवन की ओर नए ढंग से देखने के लिए बाध्य करते हैं।

    इन पत्रों को पढ़ते हुए हम केवल स्टोइक दर्शन नहीं सीखते। हम अपने भीतर की बेचैनी, लालसा, भय और असंतोष को पहचानना सीखते हैं। सेनेका का आग्रह है कि मनुष्य बाहरी परिस्थितियों पर अपना जीवन निर्भर न करे बल्कि अपने विवेक और चरित्र को इतना दृढ़ बनाए कि वह परिस्थितियों के बीच भी अपने भीतर स्वतंत्र रह सके। इसी कारण उनके पत्र आज भी दर्शन की पुस्तकों से अधिक एक आत्म-संवाद जैसे प्रतीत होते हैं।

    इस अनुवाद में प्राचीन चित्रों का भी प्रयोग किया है। चित्र और उनकी शैली पत्रों के समान ही है। इन चित्रों में एक विशेष प्रकार का संवाद देखने वालों के लिए प्रतीक्षारत है। अलग-अलग देशों के चित्रों का प्रयोग करते हुए संस्कृति को प्रस्तुत करने का प्रयास है। 

    अपने गहरे दुख भरे अंतराल में मेरी ओर से यह अनुवाद, मेरी दिवंगत माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि! 


(सेनेका के) अन्य पत्र का अंश

 प्रिय लूसीलियस 


एनियस के कुछ विचार इतने उत्कृष्ट हैं कि यद्यपि वे मैले-कुचैले लोगों के बीच लिखे गए थे, फिर भी वे इत्र लगाए हुए लोगों के बीच भी निश्चय ही सुखद लग सकते हैं। लेकिन उसकी कविताएँ कभी-कभी बहुत हास्यास्पद भी होती हैं। उदाहरण के लिए, कैथेगस के बारे में ये पंक्तियाँ— “उसके बारे में उन आम लोगों ने, जो उन दिनों जीवित थे और अपना जीवन बिताते थे, कहा कि वह जनता का सबसे श्रेष्ठ पुष्प और वाक्पटुता का सार था।” तुम निश्चिंत रहो कि जिस प्रकार की पंक्तियाँ पसंद करने वाले लोग हैं, वे सोटेरिकस के सोफों की भी प्रशंसा करेंगे।



    मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग स्वयं अत्यंत वाक्पटु हैं और एनियस के प्रति बहुत अनुरक्त हैं, उन्होंने उसकी श्रेष्ठ पंक्तियों के बजाय उसकी हास्यास्पद पंक्तियों की प्रशंसा की। उदाहरण के लिए, सिसरो ने एनियस की जिन उत्कृष्ट पंक्तियों को उद्धृत किया है, उनमें इन पंक्तियों को भी शामिल किया है। मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि कोई व्यक्ति इन पंक्तियों को लिख सकता था क्योंकि जब इनकी प्रशंसा करने वाला कोई व्यक्ति मौजूद था तो इन्हें लिखने वाला भी मिल ही सकता था। या फिर ऐसा तो नहीं कि महान वक्ता सिसरो वास्तव में अपना ही पक्ष प्रस्तुत कर रहे थे। अर्थात वे अपनी कविता को तुलना में अच्छा दिखाना चाहते थे! स्वयं सिसरो की रचनाओं में, यहाँ तक कि उनके गद्य में भी, ऐसे अंश मिलते हैं जिनसे तुम अनुमान लगा सकते हो कि एनियस को पढ़ने से उन्हें कुछ लाभ मिला था। उदाहरण के लिए, अपनी पुस्तक ‘राज्य के विषय में’ में वे लिखते हैं, “क्योंकि स्पार्टा के मेनेलाउस में एक प्रकार की मधुर-वाणी वाली विनम्रता थी,” और एक अन्य स्थान पर, “वह अपने वक्तृत्व में संक्षिप्त-वाणी का अभ्यास करता है।” 

    दोष सिसरो का नहीं बल्कि उस समय का था। जब पढ़ने के लिए ऐसी ही सामग्री उपलब्ध हो, तब उसी ढंग से बोलने से बच पाना संभव नहीं होता। लेकिन सिसरो के पास अपने लेखन में एनियस की कुछ पंक्तियों को सम्मिलित करने का एक कारण भी था। ऐसा करके वे अपनी शैली को अत्यधिक अलंकृत और परिष्कृत कहे जाने वाली आलोचना से बच जाते थे। हमारे कवि वर्जिल ने भी अपनी रचनाओं में कुछ अटपटी और भद्दी पंक्तियाँ तथा कुछ ऐसी पंक्तियाँ सम्मिलित कीं जो छंद की सामान्य सीमा से अधिक लंबी थीं ताकि एनियस के अनुयायी और उसके साहित्यिक परंपरा से जुड़े लोग नई कविता में भी प्राचीनता की एक झलक पहचान सकें।


विदा 

शुभ की प्राप्ति का मार्ग -- पत्र - 122

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें प्राचीन लोगों की बुद्धिमत्ता से अवगत करा सकता हूँ, यदि तुम इसका विरोध न करो। यदि तुम्हें उनकी सूक्ष्म विचारधारा को समझना कठिन न लगे।

    लेकिन तुम इसका विरोध नहीं करते। किसी भी पारिभाषिक जटिलता से तुम विचलित नहीं होते। तुम्हारा मन उच्च कोटि का है और केवल बड़े-बड़े विषयों से ही सरोकार नहीं रखता। फिर भी मैं इस बात की भी प्रशंसा करता हूँ कि तुम हर बात को आत्म-सुधार से जोड़कर देखते हो। तुम्हें केवल तभी अधीरता होती है, जब अत्यधिक पारिभाषिक सूक्ष्मता का कोई उपयोगी परिणाम नहीं निकलता। मैं अब यह सुनिश्चित करने का प्रयास करूँगा कि ऐसा न हो। यहाँ प्रश्न यह है कि ‘शुभ’ का बोध इंद्रिय-बोध के माध्यम से होता है या बुद्धि के माध्यम से। 



    यह प्रश्न उस मत से भी संबंधित है कि जिन प्राणियों में वाणी नहीं है और शिशुओं में ‘शुभ’ विद्यमान नहीं होता। जो लोग सुख को सर्वोच्च स्थान देते हैं, वे सभी शुभ को इंद्रियों द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु मानते हैं। इसके विपरीत, हम, जो शुभ को मन के अधीन मानते हैं, उसे बोध और बुद्धि द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु मानते हैं।

    यदि इंद्रियाँ ही शुभ का निर्धारण करतीं तो हम किसी भी सुख को अस्वीकार नहीं करते क्योंकि ऐसा कोई सुख नहीं है जो हमें आकर्षित और प्रसन्न न करता हो। इसके विपरीत, हम स्वेच्छा से कभी भी किसी पीड़ा को सहन नहीं करते, क्योंकि ऐसी कोई पीड़ा नहीं है जिसकी अनुभूति हमें अप्रिय न लगती हो। इसके अतिरिक्त, जो लोग सुख के अत्यधिक प्रेमी हैं और पीड़ा से बहुत अधिक भयभीत रहते हैं, वे आलोचना के पात्र भी नहीं होने चाहिए। फिर भी हम पेटू लोगों और कामवासना के आदी लोगों को बुरा मानते हैं और उन लोगों को तुच्छ समझते हैं जो पीड़ा के भय से हर पुरुषोचित कार्य से पीछे हट जाते हैं। यदि इंद्रियाँ ही शुभ और अशुभ का मापदंड होतीं तो ये लोग अपनी इंद्रियों की आज्ञा मानकर गलत कैसे कर सकते थे? क्योंकि तुमने तो इंद्रियों को ही यह अधिकार दे दिया है कि वे तय करें कि किस वस्तु की इच्छा करनी चाहिए और किससे बचना चाहिए। 

    लेकिन स्पष्ट रूप से यह अधिकार बुद्धि के पास है। बुद्धि ही सुखी जीवन, सद्गुण और सम्माननीयता के विषय में निर्णय करती है और इसी प्रकार शुभ और अशुभ के विषय में भी निर्णय करती है। जब हमारे विरोधी इंद्रियों को शुभ के विषय में निर्णय देने देते हैं, तो वे सबसे कम मूल्यवान अंग को श्रेष्ठ के विषय में निर्णय करने का अधिकार दे देते हैं क्योंकि इंद्रिय-बोध मंद और अस्पष्ट होता है और मनुष्यों में यह अन्य प्राणियों की तुलना में भी कम तीक्ष्ण होता है। मान लो कोई व्यक्ति बहुत छोटी-छोटी वस्तुओं में अंतर करने के लिए दृष्टि के बजाय स्पर्श का सहारा लेना चाहे! हमारे पास दृष्टि से अधिक सटीक और केंद्रित कोई दूसरी इंद्रिय नहीं है, जो हमें शुभ और अशुभ में अंतर करने में सक्षम बना सके। इसलिए तुम देख सकते हो कि जो व्यक्ति स्पर्श को परम शुभ और अशुभ का मापदंड मानता है, वह अज्ञान की गहराइयों में पड़ा हुआ है और उसने उदात्त तथा दिव्य वस्तु को नीचे धरातल पर गिरा दिया है।

    विरोधी कहता है, “ज्ञान की प्रत्येक शाखा और प्रत्येक कौशल का कोई न कोई आधार ऐसी वस्तुओं में होना चाहिए जो प्रत्यक्ष हों और इंद्रियों के लिए उपलब्ध हों। वहीं से उसका विकास और विस्तार होना चाहिए। इसी प्रकार, सुखी जीवन की भी नींव और आरंभ-बिंदु ऐसी वस्तुओं में होना चाहिए जो प्रत्यक्ष हों और इंद्रियों के लिए उपलब्ध हों। निश्चय ही तुम्हारा भी यही मत है कि सुखी जीवन का आरंभ प्रत्यक्ष वस्तुओं से ही होता है।”

    हमारा मत यह है कि सुखी होना प्रकृति के अनुरूप होना है और कोई वस्तु प्रकृति के अनुरूप है या नहीं, यह उतना ही स्पष्ट और प्रत्यक्ष है, जितना यह जानना कि कोई वस्तु साबुत और पूर्ण है या नहीं। नवजात शिशु में भी प्रकृति के अनुरूप होने का कुछ अंश होता है। लेकिन मैं इसे ‘शुभ’ नहीं बल्कि केवल ‘शुभ का आरंभ’ कहता हूँ।तुम परम शुभ, सुख... को शैशवावस्था में ही स्थापित कर देते हो। इसका परिणाम यह होता है कि जो व्यक्ति अभी-अभी जन्मा है, वह वहीं से शुरुआत करता है जहाँ पूर्णता को प्राप्त व्यक्ति अंततः पहुँचता है। तुम वृक्ष की चोटी को उसकी जड़ की जगह रख रहे हो! 

    यह कहना स्पष्ट रूप से गलत होगा कि गर्भस्थ शिशु, जो दुर्बल, अपूर्ण और अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ है और जिसका लिंग तक निर्धारित नहीं हुआ है... पहले से ही शुभ की अवस्था में है। लेकिन वास्तव में एक नवजात शिशु और माँ के गर्भ में छिपे हुए, अभी भारी-भरकम भ्रूण में कितना अंतर है? शुभ और अशुभ को समझने की दृष्टि से दोनों समान रूप से अपरिपक्व हैं। एक शिशु अभी शुभ को समझने में सक्षम नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे कोई वृक्ष या कोई अवाक् प्राणी उसे समझने में सक्षम नहीं है। फिर वृक्ष या किसी प्राणी में शुभ क्यों नहीं होता? क्योंकि वहाँ बुद्धि भी नहीं होती। इसी प्रकार शिशु में भी शुभ विद्यमान नहीं होता क्योंकि उसमें भी बुद्धि का अभाव होता है। जब उसमें बुद्धि विकसित होगी, तभी वह शुभ तक पहुँच सकेगा।

    कुछ प्राणी बुद्धि से रहित होते हैं, कुछ अभी बुद्धिसंपन्न नहीं हुए होते। कुछ बुद्धिसंपन्न तो होते हैं लेकिन उनकी बुद्धि अभी अपूर्ण होती है। इनमें से किसी में भी ‘शुभ’ विद्यमान नहीं होता। शुभ का आगमन तभी होता है जब बुद्धि का विकास होता है। तो फिर, जिन प्राणियों का मैंने अभी उल्लेख किया है, उनमें क्या अंतर है? जो प्राणी बुद्धि से रहित है, उसमें शुभ कभी भी विद्यमान नहीं होगा। जो अभी बुद्धिसंपन्न नहीं हुआ है, उसमें इस समय शुभ का होना संभव नहीं है। जो बुद्धिसंपन्न तो है। लेकिन उसकी बुद्धि अभी अपूर्ण है, उसमें शुभ का होना संभव तो है। लेकिन वास्तव में अभी शुभ उसमें विद्यमान नहीं है। लूसीलियस, मेरा आशय यह है कि ‘शुभ’ किसी भी शरीर में या जीवन की किसी भी अवस्था में नहीं पाया जाता। वह शैशवावस्था से उतना ही दूर है, जितना अंतिम अवस्था आरंभ से या पूर्ण वस्तु अपने आरंभिक रूप से दूर होती है। इसलिए किसी छोटे, कोमल और अभी विकसित होना शुरू ही हुए शरीर में शुभ नहीं होता। बिल्कुल नहीं। ठीक उसी तरह जैसे किसी बीज में शुभ नहीं होता।

    तुम इस बात को इस प्रकार भी समझ सकते हो। हम वृक्षों और पौधों के लिए भी एक प्रकार के ‘शुभ’ को स्वीकार करते हैं। यह उस समय उपस्थित नहीं होता जब उनकी पहली कोपलें धरती को चीरकर बाहर निकलती हैं। गेहूँ के लिए भी एक प्रकार का ‘शुभ’ होता है। वह न तो कोमल तने में होता है और न उस समय जब नरम बालियाँ भूसी से अलग होना शुरू करती हैं बल्कि तब होता है जब गेहूँ गर्मियों की धूप और उचित परिपक्वता से पूरी तरह पक जाता है। प्रकृति की कोई भी रचना अपने ‘शुभ’ को तब तक प्रकट नहीं करती, जब तक वह पूर्णता को प्राप्त न कर ले। इसलिए मनुष्य का ‘शुभ’ केवल उसी व्यक्ति में पाया जा सकता है, जिसमें बुद्धि पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी हो। यह ‘शुभ’ क्या है? मैं तुम्हें बताता हूँ: यह ऐसा मन है जो स्वतंत्र और सत्यनिष्ठ है, जो अन्य सभी वस्तुओं को अपने से नीचे रखता है। लेकिन स्वयं को किसी के नीचे नहीं रखता। यह ‘शुभ’ शैशवावस्था की समझ से इतना परे है कि इसकी अपेक्षा किसी बच्चे से नहीं की जा सकती। न ही उचित रूप से किसी युवा वयस्क से। वृद्धावस्था तक पहुँचकर भी यदि कोई व्यक्ति लंबे और एकाग्र अध्ययन के बाद इसे प्राप्त कर ले तो यह उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी। यदि यही ‘शुभ’ है तो यह बुद्धि द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु भी है।

    “तुमने कहा है कि वृक्षों और पौधों के लिए भी एक प्रकार का शुभ होता है तो फिर शिशुओं में भी शुभ हो सकता है।” वास्तविक शुभ वृक्षों या अवाक् प्राणियों में विद्यमान नहीं होता। इन प्राणियों में जो कुछ अच्छा होता है, उसे उदार अर्थ में ‘शुभ’ कहा जाता है। “तो फिर वह क्या है?” तुम पूछते हो। वह वही है जो प्रत्येक वस्तु की प्रकृति के अनुरूप हो। निस्संदेह, शुभ किसी अवाक् प्राणी को प्राप्त हो ही नहीं सकता बल्कि वह अधिक सौभाग्यशाली और श्रेष्ठ प्रकृति का गुण है। जहाँ बुद्धि के लिए कोई स्थान ही नहीं है, वहाँ शुभ भी नहीं हो सकता। यहाँ चार प्रकार की प्रकृतियों पर विचार करना चाहिए— वृक्षों की, प्राणियों की, मनुष्यों की और देवताओं की। इनमें अंतिम दो की प्रकृति इस अर्थ में समान है कि दोनों बुद्धिसंपन्न हैं। लेकिन उनमें यह अंतर भी है कि एक नश्वर है और दूसरा अमर। 

    इनमें से एक का अर्थात देवता का शुभ केवल प्रकृति के कारण ही पूर्ण होता है। जबकि दूसरे का अर्थात मनुष्य का, शुभ प्रयास के द्वारा पूर्ण होता है। शेष प्राणी, जिनमें बुद्धि का अभाव है केवल अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्ण होते हैं, वास्तव में पूर्ण नहीं। ऐसा इसलिए है कि निरपेक्ष पूर्णता का अर्थ सार्वभौमिक प्रकृति के अनुरूप पूर्णता है और सार्वभौमिक प्रकृति बुद्धिसंपन्न है। अन्य वस्तुएँ अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्ण हो सकती हैं। जिस प्राणी में सुखी होने की क्षमता ही नहीं है, उसमें सुख उत्पन्न करने वाली वस्तु की क्षमता भी नहीं हो सकती; और जो वस्तुएँ सुख उत्पन्न करती हैं, वे ही शुभ हैं। किसी अवाक् प्राणी में न तो सुखी होने की क्षमता होती है और न ही उस वस्तु की क्षमता जो सुख उत्पन्न करती है। इसलिए किसी अवाक् प्राणी में शुभ भी नहीं होता।

    एक प्राणी इंद्रिय-बोध के माध्यम से वर्तमान को ग्रहण करता है। वह अतीत को तभी याद करता है, जब कोई घटना उसके इस इंद्रिय-बोध को जागृत करती है। उदाहरण के लिए, जब घोड़े को उस स्थान पर ले जाया जाता है जहाँ से कोई रास्ता शुरू होता है तो उसे वह रास्ता याद आ जाता है। लेकिन अस्तबल में रहते हुए उसे उस रास्ते की कोई स्मृति नहीं होती, चाहे वह उस रास्ते से कितनी ही बार गुज़र चुका हो। समय का तीसरा भाग भविष्य, प्राणियों के लिए कोई महत्व नहीं रखता। फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि उन प्राणियों में पूर्ण प्रकृति संभव है, जिनका समय का अनुभव ही अपूर्ण है? 

समय के तीन भाग हैं— अतीत, वर्तमान और भविष्य। प्राणियों को इनमें से केवल वही भाग प्राप्त है जो सबसे क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है— वर्तमान। अतीत की उनकी स्मृति भी केवल कभी-कभार ही जागृत होती है और तब तक वापस नहीं आती, जब तक वर्तमान में किसी वस्तु के संपर्क से वह स्मृति जागृत न हो जाए। इसलिए पूर्ण प्रकृति का शुभ किसी अपूर्ण प्रकृति में विद्यमान नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता, तो पौधों में भी शुभ होता। मैं यह नहीं कह रहा कि अवाक् प्राणियों में उन वस्तुओं को पाने की अत्यंत प्रबल प्रवृत्तियाँ नहीं होतीं, जो उन्हें अपनी प्रकृति के अनुरूप दिखाई देती हैं। लेकिन उनकी ये प्रवृत्तियाँ अव्यवस्थित और छिटपुट होती हैं। इसके विपरीत, शुभ कभी भी अव्यवस्थित और छिटपुट नहीं होता।

    “यह कैसे?” तुम पूछते हो। “क्या प्राणी अनियमित और अव्यवस्थित ढंग से चलते-फिरते हैं?” यदि उनकी प्रकृति में व्यवस्था के अनुसार चलने की क्षमता होती तो मैं उनकी गतिविधियों को इस प्रकार वर्णित करता। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे अपनी प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं। कोई वस्तु तभी अव्यवस्थित कही जा सकती है, जब उसमें व्यवस्थित होने की क्षमता हो। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति तभी चिंतित कहा जा सकता है, जब उसमें चिंता से मुक्त होने की संभावना हो। जिस व्यक्ति में सद्गुण की संभावना ही नहीं है, उसमें दुर्गुण भी नहीं हो सकता। प्राणियों की गतिविधियाँ उनकी प्रकृति से उत्पन्न होती हैं। इस बात को अधिक लंबा न खींचते हुए कहूँ तो किसी प्राणी में एक प्रकार का शुभ, एक प्रकार का सद्गुण और एक प्रकार की पूर्णता अवश्य होगी। लेकिन वह निरपेक्ष अर्थ में शुभ, सद्गुण या पूर्णता नहीं होगी। ये सभी केवल उन बुद्धिसंपन्न प्राणियों में पाए जाते हैं, जिन्हें कारण, सीमा और प्रक्रिया को समझने का विशेषाधिकार प्राप्त है। 

    क्या तुम सोच रहे हो कि यह चर्चा किस दिशा में जा रही है और इससे तुम्हारे मन को क्या लाभ होगा? मैं इसका उत्तर देता हूँ। इससे मन को प्रशिक्षित और तीक्ष्ण किया जाता है तथा उसकी भावी सभी गतिविधियों में उसे सही मार्ग पर बनाए रखा जाता है। इसका एक लाभ यह भी है कि यह हमें किसी दुर्गुणपूर्ण मार्ग की ओर भागने से रोकती है। मैं तुमसे यह भी कहना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे लिए इससे बड़ा कोई लाभ नहीं कर सकता कि तुम्हें तुम्हारा अपना शुभ दिखाऊँ। तुम्हें अवाक् प्राणियों से अलग करूँ और तुम्हें दैवी प्रकृति के निकट स्थापित करूँ।

    मैं यह क्यों न कहूँ कि तुम अपने शरीर की शक्ति को क्यों सँवारते और प्रशिक्षित करते हो? प्रकृति ने पालतू और जंगली पशुओं को तुमसे अधिक शक्ति प्रदान की है। तुम अपने रूप-सौंदर्य को क्यों सँवारते हो? तुम अपनी ओर से सब कुछ कर लेने के बाद भी पशुओं जितने सुंदर नहीं हो पाओगे। तुम अपने बालों पर इतना अधिक परिश्रम क्यों करते हो? चाहे तुम उन्हें पार्थियनों की तरह खुला छोड़ो, जर्मनों की तरह बाँध लो या स्किथियनों की तरह उन्हें बिखरा हुआ रहने दो। कोई भी घोड़ा अपनी अयाल को उछालते हुए तुमसे अधिक घनी अयाल रखेगा। किसी भी सिंह की गर्दन पर खड़ी हुई अयाल अधिक सुंदर होगी। गति के लिए कितना ही अभ्यास कर लो फिर भी तुम खरगोश की बराबरी नहीं कर पाओगे। तो फिर उन सभी बातों को छोड़ क्यों नहीं देते, जिनमें तुमसे बेहतर होना निश्चित है। उन चीज़ों के पीछे भागना क्यों बंद नहीं करते जो तुम्हारी प्रकृति से बाहर हैं। उस शुभ की ओर क्यों नहीं लौटते जो वास्तव में तुम्हारा अपना है? 

    वह शुभ क्या है? बस यही... एक दोषरहित मन। ऐसा मन जो दैवी मन की बराबरी करता है, जो स्वयं को मानवीय सीमा से ऊपर उठाता है और अपने से परे किसी वस्तु को श्रेष्ठ नहीं मानता। तुम एक बुद्धिसंपन्न प्राणी हो। तो फिर तुममें शुभ क्या है? पूर्ण बुद्धि। अपनी बुद्धि को जहाँ वह अभी है, वहाँ से उसकी सर्वोच्च उपलब्धि तक ले जाओ। उसे उसकी पूरी संभव सीमा तक विकसित होने दो। जब तक तुम्हारे सभी आनंद स्वयं तुम्हारे भीतर से उत्पन्न न हों, तब तक अपने आपको सुखी मत समझो। जब तुम मनुष्यों की प्रतिस्पर्धा, लालसा और अधिकार-भावना की वस्तुओं को देखकर यह समझ लो कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम दूसरों से अधिक पाने योग्य समझो। मैं यह नहीं कहूँगा कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम पसंद कर सको बल्कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसके लिए तुम्हारा मन लालायित हो। तभी तुम अपने वास्तविक शुभ को प्राप्त करोगे। मैं तुम्हें स्वयं को परखने का एक संक्षिप्त नियम बताता हूँ, जिससे तुम यह जान सको कि तुमने पूर्णता प्राप्त कर ली है या नहीं। तुम्हारा अपना शुभ तब तुम्हारे पास होगा, जब तुम समझ जाओगे कि भाग्यशाली समझे जाने वाले लोग वास्तव में सबसे कम भाग्यशाली होते हैं।

विदा लूसीलियस 

दिखावा करने के बारे में -- पत्र - 121

 प्रिय लूसीलियस 


रात बहुत बीत चुकी है और मैं अपनी अल्बान हवेली पहुँच गया हूँ। यात्रा लंबी नहीं थी। लेकिन असुविधाजनक होने के कारण मैं थक गया हूँ। यहाँ मुझे कोई चीज़ तैयार नहीं मिलती, सिवाय मेरे अपने आप के। इसलिए अब मैंने अपने थके हुए शरीर को अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा लिया है और अपने रसोइए तथा बेकर के देर से आने से मुझे इतना लाभ अवश्य हुआ है कि अब मुझे इस बात पर स्वयं से विचार करने का अवसर मिल गया है कि यदि हम किसी बात को हल्के ढंग से लें तो कोई भी चीज़ गंभीर नहीं होती। यदि हम अपनी झुंझलाहट को उसमें स्वयं न जोड़ें तो कोई भी बात परेशान करने वाली नहीं होती। मेरे बेकर के पास रोटी नहीं है। लेकिन मेरे प्रबंधक के पास कुछ है। मेरे मुख्य दास तथा मेरे किरायेदारों के पास भी है। “रोटी खराब है,” तुम कहते हो। लेकिन ठहरो! वह अच्छी हो जाएगी। भूख जल्द ही उसे उत्तम आटे से बनी मुलायम रोटी में बदल देगी। इसी कारण तब तक भोजन नहीं करना चाहिए, जब तक भूख स्वयं ऐसा करने का संकेत न दे। इसलिए मैं अपना भोजन तब तक टाल दूँगा, जब तक मुझे फिर से अच्छी रोटी नहीं मिल जाती या फिर तब तक, जब तक मुझे खराब रोटी से भी कोई आपत्ति न रह जाए।



    सादा और रूखा भोजन करने का अभ्यास डालना आवश्यक है। समय और स्थान की कठिन परिस्थितियाँ उन लोगों के सामने भी आ खड़ी होती हैं जो धनवान हैं और सुख-सुविधाओं के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। उनकी इच्छाओं में बाधा डाल देती हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी हर इच्छा पूरी नहीं कर सकता। मनुष्य इतना अवश्य कर सकता है कि जो उसके पास नहीं है, उसे पाने की इच्छा छोड़ दे और जो उपलब्ध है, उसका प्रसन्नतापूर्वक उपयोग करे। आत्मनिर्भरता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे संयमित पेट में निहित है, जो कठिन परिस्थितियों को सहन कर सके।यह बताना भी कठिन है कि मुझे इस बात से कितना आनंद मिलता है कि मेरी थकान स्वयं अपने आप में शांत हो गई है। मुझे न मालिश की आवश्यकता है, न स्नान की। मैं केवल समय के उपचारात्मक प्रभावों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। विश्राम श्रम से आई थकान को दूर कर देता है। आने वाला भोजन, चाहे वह जो भी हो, किसी भव्य उद्घाटन-भोज से भी अधिक आनंददायक होगा। संक्षेप में, मैंने तुरंत अपने मन को एक प्रकार की परीक्षा में डाल दिया है। वह भी अत्यंत सीधी तथा सटीक परीक्षा में क्योंकि जब मन स्वयं को तैयार कर लेता है और धैर्य रखने का संकल्प कर लेता है, तब हमें उसके वास्तविक संकल्प की स्पष्ट परीक्षा नहीं मिलती। सबसे विश्वसनीय परीक्षाएँ वे होती हैं जो अचानक सामने आ जाती हैं। जब मन कठिनाइयों को केवल उदासीनता से ही नहीं बल्कि शांत भाव से भी देखता है; जब उसमें न रोष होता है, न शिकायत; जब जो चीज़ उपलब्ध नहीं है, उसकी इच्छा न करके वह उसकी कमी की भरपाई कर लेता है। जब वह यह विचार करता है कि उसकी दिनचर्या में भले ही कोई चीज़ कम हो। लेकिन अपने आप में उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं है।

    बहुत-सी चीज़ों के बारे में हमें उनकी अनावश्यकता का पता तभी चलता है, जब वे कम पड़ने लगती हैं। हम उनका उपयोग इसलिए नहीं कर रहे थे कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता था बल्कि इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे हमारे पास उपलब्ध थीं। हम ऐसी कितनी ही चीज़ें केवल इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि दूसरे लोगों ने उन्हें खरीदा है या वे दूसरे लोगों के घरों में मौजूद हैं! हमारी बहुत-सी समस्याएँ इस तथ्य से उत्पन्न होती हैं कि हम दूसरे लोगों के मानदंडों के अनुसार जीवन जीते हैं और विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाने के बजाय फैशन का अनुसरण करते हैं। यदि केवल कुछ ही लोग कोई काम करते तो हम उनकी नकल करने से इनकार कर देते। लेकिन जैसे ही अधिक लोग वही काम करने लगते हैं, हम भी उसे अपना लेते हैं, मानो केवल अधिक लोगों द्वारा किया जाना ही उसे अधिक सम्माननीय बना देता हो। जब कोई गलत धारणा व्यापक रूप से फैल जाती है, तो हम उसे ही सदाचार का स्थान दे देते हैं। 

    आजकल हर व्यक्ति नुमिडियाई घुड़सवारों के एक दल और आगे-आगे चलने वाले धावकों की एक टुकड़ी के साथ यात्रा करता है। ऐसा दिखाई देना अपमानजनक माना जाता है कि तुम्हारे पास रास्ते में आने वाले यात्रियों को हटाने के लिए कोई सेवक न हो और किसी बड़े अधिकारी के आने की सूचना देने के लिए धूल का कोई विशाल बादल न उठ रहा हो। आजकल हर व्यक्ति के पास खच्चरों का एक काफिला होता है, जो उसके क्रिस्टल और गोमेद के प्यालों तथा बारीकी से बनाए गए चाँदी के पात्रों का संग्रह ढोता है। यह भी अपमानजनक माना जाता है कि ऐसा लगे कि तुम्हारा पूरा सामान ऐसी वस्तुओं का है जिन्हें बिना टूटे आसानी से इधर-उधर ले जाया जा सकता है। हर व्यक्ति के साथ सेवकों का एक दल होता है, जो यात्रा के समय अपने चेहरे पर लोशन मलते रहते हैं ताकि सूर्य या ठंड उनकी कोमल त्वचा को नुकसान न पहुँचा सके। स्वस्थ त्वचा वाले युवा सेवक होना, जिन्हें किसी औषधीय प्रसाधन की आवश्यकता ही न हो। यह भी आजकल अपमानजनक माना जाता है!

    हमें इन सभी लोगों से बातचीत करने से बचना चाहिए। ये ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुण एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं और उन्हें आपस में बाँटते रहते हैं। पहले हम तब इसे भयानक मानते थे, जब लोग शब्दों के माध्यम से अपनी शेखी बघारते थे। लेकिन आज ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुणों का भी प्रदर्शन करते हैं। इन लोगों से बातचीत करना बहुत हानिकारक होता है। भले ही उसका तत्काल कोई प्रभाव दिखाई न दे, फिर भी वह मन में बीज बो देती है। उनके साथ से अलग हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव हमारे भीतर बना रहता है और बाद में फिर उभर आता है। संगीत का कोई कार्यक्रम सुनने के बाद भी लोगों के कानों में उसकी धुन और मधुर गायन गूँजता रहता है, जो उनकी सोचने की क्षमता को सीमित कर देता है और उन्हें गंभीर विषयों पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ बना देता है। उसी प्रकार चापलूसों और दुर्गुणों को बढ़ावा देने वाले लोगों की बातें सुन लेने के बहुत देर बाद तक मन में बनी रहती हैं। मन को किसी मधुर ध्वनि से मुक्त कर पाना आसान नहीं होता। वह बनी रहती है। उसका प्रभाव चलता रहता है। कुछ अंतराल के बाद फिर लौट आती है। इसलिए आरंभ से ही हमें अपने कानों को हानिकारक आवाज़ों के लिए बंद रखना चाहिए। एक बार उन आवाज़ों को प्रवेश मिल जाए और वे अपना प्रभाव डालना शुरू कर दें तो वे और भी अधिक दुस्साहसी हो जाती हैं।

    इसके बाद हम ऐसे लोगों के बीच जा पहुँचते हैं, जो इस तरह की बातें करते हैं “सद्गुण, दर्शन और न्याय, ये सब निरर्थक शब्दों का शोर मात्र हैं! जीवन में सुखपूर्वक रहना ही एकमात्र सुख है। खाना, पीना और अपनी संपत्ति खर्च करना, यही जीवन जीना है। यही इस बात को याद रखना है कि हम नश्वर हैं। दिन बीतते जा रहे हैं। जीवन वापस न लौटने वाले ढंग से आगे बढ़ रहा है। हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं? दर्शन का अभ्यास करने से क्या लाभ है? जब हम बूढ़े हो जाएँगे, तब हम सुख का आनंद नहीं ले सकेंगे तो अभी, जब हम सक्षम हैं और अभी भी इच्छाएँ रखते हैं, अपने जीवन पर संयम क्यों थोपें? इसलिए मृत्यु से पहले ही उससे आगे निकल जाओ और जो कुछ वह तुमसे छीनने वाली है, उसे अभी अपने ऊपर खर्च कर डालो। तुम्हारी कोई प्रेमिका नहीं है। न ही तुम्हारे पास ऐसा कोई पुरुष-प्रेमी है, जिसे देखकर तुम्हारी प्रेमिका ईर्ष्या करे। तुम कभी नशे में धुत्त नहीं होते। तुम्हारे भोजों को देखकर ऐसा लगता है मानो तुम अपने पिता से अपने रोज़मर्रा के खर्च की अनुमति मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हो। यह जीवन जीना नहीं है बल्कि किसी दूसरे के जीवन की देखभाल करना है! अपने आपको हर चीज़ से वंचित रखना और अपना ध्यान ऐसी संपत्ति पर लगाए रखना, जो अंततः तुम्हारे उत्तराधिकारी को ही मिलने वाली है। यह पूरी तरह पागलपन है। इस तरह तुम्हारी संपत्ति का आकार ही तुम्हारे मित्र को तुम्हारा शत्रु बना देगा। जितनी बड़ी उसकी विरासत होगी, तुम्हारी मृत्यु पर वह उतना ही अधिक प्रसन्न होगा। जहाँ तक उन ढोंगी लोगों का सवाल है।दूसरों के जीवन के कठोर आलोचक और अपने ही जीवन के शत्रु, जो जनता को उपदेश देना पसंद करते हैं। उन पर बिल्कुल ध्यान मत दो। अच्छे नाम की अपेक्षा अच्छा जीवन चुनने में तनिक भी संकोच मत करो।”

    ऐसी आवाज़ों से भी उतना ही बचना चाहिए, जितना उन आवाज़ों से जिनके पास से यूलिसीस तब तक आगे नहीं बढ़ना चाहता था, जब तक उसे मस्तूल से बाँध नहीं दिया गया था। इन दोनों में समान शक्ति है। ये तुम्हें तुम्हारे देश, माता-पिता, मित्रों और सद्गुणों से दूर कर देती हैं और तुम्हें लज्जाजनक जीवन की ओर इस प्रकार आकर्षित करती हैं कि ऐसे सुखों का वादा करती हैं, जो तुम्हें दुखी कर देंगे, भले ही उनमें अपने आप में कोई लज्जाजनक बात न हो।कितना बेहतर है कि सीधे मार्ग का अनुसरण किया जाए और अंततः वह तुम्हें उस बिंदु तक पहुँचा दे, जहाँ केवल वही चीज़ें तुम्हें आनंद देती हैं जो सम्माननीय हैं! 

    हम उस बिंदु तक पहुँच सकेंगे, यदि हम यह समझ लें कि ऐसी दो प्रकार की वस्तुएँ हैं जो हमें या तो आकर्षित करती हैं या हममें विरक्ति उत्पन्न करती हैं। आकर्षित करने वाली वस्तुओं में धन, सुख, सौंदर्य, महत्वाकांक्षा और ऐसी ही अन्य सभी मोहक तथा आनंददायक चीज़ें हैं। कठिन शारीरिक श्रम, मृत्यु, पीड़ा, लोगों की निंदा और सादा भोजन हमें अप्रिय लगते हैं। इसलिए हमें स्वयं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि न तो हम बाद वाली चीज़ों से भयभीत हों और न पहली वाली चीज़ों की इच्छा करें। हमें अपनी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, जो चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, उनका प्रतिरोध करते हुए और जो कठिनाइयाँ हम पर आक्रमण करती हैं, उनकी ओर आगे बढ़ते हुए। 

    क्या तुम ध्यान नहीं देते कि जब लोग पहाड़ी पर चढ़ रहे होते हैं और जब नीचे उतर रहे होते हैं, तब उनके शरीर की मुद्रा कितनी अलग होती है? नीचे उतरते समय वे अपने शरीर को पीछे की ओर झुका लेते हैं। जबकि चढ़ते समय आगे की ओर झुकाते हैं। नीचे उतरते समय अपने शरीर का भार आगे की ओर डालना उतना ही जानबूझकर की गई भूल है, जितना ऊपर चढ़ते समय उसे पीछे की ओर डालना। लूसीलियस, हम सुखों की ओर नीचे उतरते हैं। लेकिन कठिनाइयों और कष्टों का सामना करने के लिए हमें ऊपर चढ़ना पड़ता है। बाद वाली स्थिति में हमें अपने शरीर को आगे की ओर धकेलना चाहिए। जबकि पहली स्थिति में हमें उसे पीछे की ओर रोककर रखना चाहिए।

    क्या तुम यह समझते हो कि मैं इस समय केवल यह कहना चाहता हूँ कि हमारे कानों के लिए केवल वही लोग खतरनाक हैं, जो सुख की प्रशंसा करते हैं और पीड़ा के विचार से हमें भयभीत करते हैं। जबकि पीड़ा अपने आप में ही पर्याप्त रूप से भयावह है? नहीं, मेरा मानना है कि हमें उन लोगों से भी नुकसान पहुँचता है, जो स्टोइक मत का आवरण ओढ़कर हमें दुर्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि केवल वही व्यक्ति प्रेमी होता है जो बुद्धिमान और अत्यधिक शिक्षित हो। “इस विषय में केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही विशेषज्ञ होता है। इसी प्रकार, वही व्यक्ति प्रेम-समारोहों और भोजों में भाग लेने की कला में भी सबसे अधिक निपुण होता है। आइए, इस प्रश्न पर विचार करें। युवकों को किस आयु तक प्रेम का विषय बनाया जाना चाहिए?”

    इन बातों को यूनानियों की परंपरा के हवाले कर देने के बाद, हमें इसके बजाय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

“कोई भी व्यक्ति संयोगवश अच्छा नहीं बनता। सद्गुण को सीखना पड़ता है। सुख एक तुच्छ और दयनीय वस्तु है, जिसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। यहाँ तक कि अवाक् प्राणियों को भी सुख का कुछ अंश प्राप्त होता है। सबसे छोटे और तुच्छ प्राणी भी उसके पीछे दौड़ते हैं। यश एक खोखली वस्तु है, जो हवा से भी अधिक क्षणभंगुर और चंचल है। गरीबी केवल उनके लिए समस्या है जो उसे स्वीकार नहीं करते। मृत्यु कोई बुराई नहीं है। फिर, तुम पूछते हो, वह क्या है? वह वह एक अधिकार है जो समस्त मानवजाति को समान रूप से प्राप्त है। अंधविश्वास एक मूर्खतापूर्ण भूल है। वह उनसे डरता है, जिनसे प्रेम किया जाना चाहिए। जिनकी पूजा करता है, उन्हीं के प्रति अपराध करता है। यदि तुम देवताओं की निंदा ही करने वाले हो तो यह मान लेना भी बेहतर है कि उनका अस्तित्व ही नहीं है।”

    तुम्हें इन्हीं शिक्षाओं को सीखना चाहिए या बल्कि, इन्हें अपने हृदय में उतार लेना चाहिए। दर्शन को दुर्गुणों के लिए बहाने उपलब्ध नहीं कराने चाहिए। जब चिकित्सक रोगी को असंयम बरतने की सलाह देता है, तब रोगी के स्वस्थ होने की कोई आशा नहीं रहती।


अभी के लिए विदा 

प्रकृति के विरुद्ध जीवन-शैली के बारे में -- पत्र - 120

 प्रिय लूसीलियस 


दिन पहले ही ढलने लगा है। उसकी अवधि कुछ कम हो गई है, फिर भी जो लोग मानो सूर्य के साथ ही उठते हैं, उनके लिए अभी भी पर्याप्त समय उपलब्ध है। यदि हम उषा से पहले ही जाग जाएँ और प्रातः का आरंभिक प्रकाश प्राप्त कर लें तो हम अपने सामाजिक कर्तव्यों को निभाने के लिए अधिक सक्षम और अधिक तत्पर होंगे। जब सूर्य आकाश में काफी ऊपर चढ़ चुका हो और हम तब भी आधी नींद में पड़े रहें तो यह लज्जाजनक है कि दिन का आरंभ दोपहर के समय करें। बहुत-से लोगों के लिए तो दोपहर भी उषा से पहले का समय ही है! कुछ लोग दिन और रात के कार्यों को ही उलट देते हैं। उनकी आँखों पर अभी तक पिछली रात की मदिरापान की खुमारी छाई रहती है और वे उन्हें तब तक नहीं खोलते, जब तक संध्या निकट नहीं आ जाती। वे उन लोगों के समान हैं, जिनका वर्णन वर्जिल ने किया है और जिन्हें प्रकृति ने हमारे पैरों के ठीक नीचे छिपा रखा है:

जब उषा, हिनहिनाते घोड़ों के साथ,
हमारे पास आती है,
तब उनके लिए संध्या का तारा,
लालिमा के साथ प्रज्वलित होता है।

इस मामले में, हालाँकि, यह पृथ्वी के गोले का वह भाग नहीं है जो हमारे भाग के विपरीत है बल्कि उनके जीवन जीने का ढंग है।



    इसी नगर में भी ऐसे ‘प्रतिपाद’ लोग हैं, ऐसे लोग, जो मार्कस कैटो के अनुसार, न तो कभी सूर्योदय देखते हैं और न सूर्यास्त। क्या तुम समझते हो कि वे जीवन जीना जानते हैं? वे तो यह भी नहीं जानते कि कब जीना चाहिए! अब जब उन्होंने स्वयं को जीवित ही कब्र में दफना लिया है तो क्या उन्हें मृत्यु से भी भय लगता है? वे रात में विचरण करने वाले पक्षियों की तरह अशुभ और भयावह हैं। यद्यपि वे अपनी अँधेरी रातें शराब और सुगंधित पदार्थों के बीच बिताते हैं, यद्यपि वे अपनी इस उलटी-पुलटी जागृति का पूरा समय अनेक प्रकार के व्यंजनों वाले भोजों की एक के बाद एक श्रृंखला में लगा देते हैं, फिर भी वे उत्सव नहीं मना रहे होते बल्कि अपने ही अंतिम संस्कार का उत्सव मना रहे होते हैं। बस इतना अंतर है कि वास्तविक मृतकों का अंतिम संस्कार दिन के समय होता है! लेकिन सच तो यह है कि सक्रिय व्यक्ति के लिए कोई भी दिन पर्याप्त लंबा नहीं होता। हमें अपने जीवन का विस्तार करना चाहिए। सक्रिय रहना ही जीवन का कार्य है और यही इस बात का प्रमाण भी है कि हम जीवित हैं। रात को छोटा करना चाहिए और उसके कुछ हिस्से को दिन में स्थानांतरित कर देना चाहिए। 

    भोजों के लिए खरीदे गए मुर्गों को अँधेरी जगह में रखा जाता है ताकि वे निष्क्रिय रहें और आसानी से मोटे हो जाएँ। बिना हिले-डुले पड़े रहने से उनके आलसी शरीर फूल जाते हैं। अँधेरे में बंद रहने के कारण उनके शरीर पर अनुपयोगी चर्बी चढ़ जाती है। लेकिन जिन लोगों ने स्वयं को अँधेरे के हवाले कर दिया है, उनके शरीर वास्तव में घृणित दिखाई देते हैं। उनका रंग रोगियों के पीलापन से भी अधिक चिंताजनक है। दुर्बलता और जर्जरता ने उनके चेहरे का रंग सफेद कर दिया है और उनके शरीर का मांस, जीवित रहते हुए भी, सड़ने लगा है। फिर भी मैं इसे उनकी सबसे छोटी समस्या कहूँगा। उनके मन में इससे कहीं अधिक अँधेरा है! भीतर से ऐसे लोग स्तब्ध और पूरी तरह धुंध से घिरे हुए हैं। अंधे लोगों से भी बदतर। आखिर किसे आँखें केवल अँधेरे में देखने के लिए मिली हैं?

    क्या तुम जानना चाहते हो कि दिन से बचने और अपने पूरे जीवन को रात में स्थानांतरित कर देने की इस विचित्र आदत की उत्पत्ति कहाँ से हुई? हमारे सभी दोष प्रकृति के विरुद्ध होते हैं। वे सभी उचित व्यवस्था को छोड़ देते हैं। आत्म-लिप्सा का लक्ष्य केवल विकृत आचरण में आनंद लेना ही नहीं होता बल्कि सीधे मार्ग से हटना और उससे जितना संभव हो उतना दूर चले जाना। अंततः ठीक उसके विपरीत स्थिति अपना लेना होता है। तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि भोजन से पहले शराब पीना प्रकृति के विरुद्ध है। बिना भोजन के शराब को सीधे रक्त में पहुँचाना और भोजन के लिए पहले से ही नशे में पहुँचना। फिर भी यह दोष हमारे युवकों में आम है। वे व्यायाम करने केवल इसलिए जाते हैं कि स्नानागार से बाहर निकलते ही शराब पी सकें। जबकि अभी भी उनके चारों ओर नग्न लोग होते हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि वे स्नान करते समय ही शराब पीते हैं और एक के बाद एक प्याला गरम शराब पीकर अपने शरीर से निकले पसीने को बार-बार धोते रहते हैं। भोजन के बाद या रात के भोजन के बाद शराब पीना, उनके विचार से, असभ्य लोगों का काम है। ऐसे देहाती लोगों का, जो परिष्कृत सुख का कुछ भी ज्ञान नहीं रखते। उनके अनुसार शुद्ध शराब का आनंद तभी मिलता है, जब वह भोजन के साथ न मिले और सीधे मस्तिष्क तक पहुँच जाए। खाली पेट नशे में होना ही सबसे अच्छा है!

    तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि पुरुषों के लिए स्त्रियों के वस्त्र धारण करना प्रकृति के विरुद्ध है। जब लोग अधिक उम्र में भी जवान और सुंदर दिखने का प्रयास करते हैं तो क्या वे प्रकृति के विरुद्ध जीवन नहीं जी रहे होते? इससे अधिक क्रूर या दयनीय और क्या हो सकता है? केवल इसलिए कि वे किसी पुरुष से यौन संबंध प्राप्त करते रहें, स्वयं कभी पुरुष न बनना! यदि उनका पुरुषत्व उन्हें इस दुर्व्यवहार से नहीं बचा सकता तो क्या परिपक्वता भी उन्हें इससे नहीं बचाएगी? तुम निश्चित रूप से सहमत होगे कि सर्दियों में गुलाब पाने की लालसा करना प्रकृति के विरुद्ध है। ठंड के मौसम में गर्म पानी से सींचकर लिली को खिलने के लिए विवश करना और सही समय पर उनके गमलों को इधर-उधर करना भी प्रकृति के विरुद्ध है। फिर उन लोगों का क्या, जो घरों की छतों पर फलदार वृक्ष लगाते हैं? उनकी छतें और कंगूरे पत्तियों से ढँक जाते हैं और उनकी जड़ें उस स्थान से भी ऊँचाई पर होती हैं, जहाँ वास्तव में वृक्षों की चोटियाँ होनी चाहिए। क्या यह प्रकृति के विरुद्ध नहीं है? क्या समुद्र में गर्म स्नानागारों की नींव रखना और यह सोचना कि सुरुचिपूर्ण ढंग से तैरने का आनंद तभी लिया जा सकता है, जब गर्म पानी का कुंड लहरों और तूफानों से घिरा हो, क्या यह भी प्रकृति के विरुद्ध नहीं है? 

    जब लोगों ने हर चीज़ को प्रकृति के विरुद्ध करने को अपना नियम बना लिया तो अंततः वे प्रकृति को पूरी तरह छोड़ देते हैं। “दिन का समय है,” वे कहते हैं, “सोने का समय है। नगर शांत हो चुका है। अब हमें व्यायाम करना चाहिए, सवारी के लिए निकलना चाहिए और दोपहर का भोजन करना चाहिए। लगभग भोर हो गई है। अब रात का भोजन करने का समय है। हमें सामान्य लोगों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। सामान्य और उबाऊ ढंग से जीवन जीना हमारे लिए अपमानजनक है। सार्वजनिक दिन को दूर हटाओ। हमारे लिए एक विशेष सुबह हो, जो केवल हमारी अपनी हो!” जहाँ तक मेरा संबंध है, ऐसे लोग पहले ही मुर्दाघर में पहुँच चुके हैं। वे अंतिम संस्कार से कितनी दूर हैं और वह भी समय से पहले होने वाले अंतिम संस्कार से। जबकि वे पहले से ही मशालों और मोमबत्तियों के प्रकाश में जीवन जी रहे हैं?

    मुझे याद है कि एक समय में बहुत-से लोग इसी तरह जीवन जीते थे, जिनमें एक पूर्व प्रेटर, अकीलियस बुता (उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी और न्यायिक अधिकारी एवं अभिजात्य वर्ग से संबंधित), भी शामिल था। उसने अपनी बहुत बड़ी विरासत पूरी तरह उड़ा दी। जब उसने सम्राट टिबेरियस के सामने अपनी आर्थिक हानि स्वीकार की तो सम्राट ने कहा, “तुम्हें जागने में कुछ देर हो गई।” जूलियस मोंटानस एक ठीक-ठाक कवि था, जो टिबेरियस से अपनी मित्रता और फिर उनके बीच हुए मतभेद, दोनों के लिए जाना जाता था। एक दिन वह अपनी रचना का पाठ कर रहा था। मोंटानस को अपनी कविताओं में सूर्योदय और सूर्यास्त का वर्णन भरना बहुत पसंद था। किसी व्यक्ति को दिन-भर उसका पाठ सुनना खल रहा था। उसने टिप्पणी की कि किसी को भी उसके काव्य-पाठ में शामिल नहीं होना चाहिए। इस पर पिनारियस नाटा ने कहा, “क्या मैं इससे अधिक उदार नहीं हो सकता? मैं तो सूर्योदय से सूर्यास्त तक उसे सुनने के लिए तैयार हूँ।” इसके बाद जब मोंटानस ने ये पंक्तियाँ पढ़ीं—

“फीबस अपनी प्रज्वलित अग्नि फैलाना आरंभ करता है,
गुलाबी आभा से दिन चमक उठता है, शोकाकुल अबाबील
अपने बच्चों को धैर्यपूर्वक भोजन कराना शुरू करती है,
उसकी कोमल चोंच हर चीखती हुई चोंच की ओर ध्यान देती है... ”

तो वारुस चिल्लाकर बोला, “बुता के सोने का समय हो गया है।” (यह वारुस रोमन अश्वारोही वर्ग का व्यक्ति था, मार्कस विनिसियस का मित्र और उच्च वर्ग के भोजों में नियमित रूप से उपस्थित रहने वाला व्यक्ति था। वह ऐसे भोजों का खर्च अपने चुटीले और विनोदी कथनों से चुकाता था।) इसके बाद, जब मोंटानस ने ये पंक्तियाँ पढ़ीं—

“अब चरवाहे अपने झुंडों को बाड़ों के भीतर बंद कर देते हैं,
अब शांतिदायक रात धरती को शांति देने लगती है...”

तो वारुस ने कहा, “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या रात पहले ही हो गई? मैं बुता के यहाँ जाकर सुबह का अभिवादन कर आता हूँ।” इस व्यक्ति की दिनचर्या का इस तरह उलट-पुलट होना जितना प्रसिद्ध था, उतना शायद ही किसी और का रहा हो। हालाँकि, जैसा कि मैंने कहा, उस समय ऐसी जीवन-शैली फैशन में थी।

    कुछ लोग इस तरह जीवन इसलिए नहीं जीते कि उन्हें रात में कोई विशेष आनंद मिलता है बल्कि इसलिए कि उन्हें कोई भी सामान्य चीज़ पसंद नहीं होती। अपराध-बोध से ग्रस्त मन के लिए प्रकाश एक बोझ होता है। जिन लोगों के लिए किसी वस्तु को चाहने या तुच्छ समझने का एकमात्र आधार यह है कि उसकी कीमत कितनी है, उनके लिए जो चीज़ निशुल्क मिलती है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। इसके अतिरिक्त, ऐश्वर्य में डूबे लोग चाहते हैं कि जब तक वे जीवित रहें, उनके जीवन की चर्चा होती रहे क्योंकि जब उनके बारे में बातें होना बंद हो जाती हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी सारी कोशिशें व्यर्थ जा रही हैं। इसलिए वे लगातार कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे लोगों में उनके बारे में चर्चा शुरू हो जाए। बहुत-से लोग अत्यधिक धन खर्च करते हैं और बहुत-से लोग रखैलें रखते हैं। इस वर्ग के लोगों के बीच अपना नाम बनाने के लिए तुम्हें विलासिता के साथ-साथ कुख्याति को भी अपनाना पड़ता है। यह एक व्यस्त नगर है। सामान्य दुर्गुणों पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।

    मैंने एक बार एल्बिनोवानस पेडो को, जो बहुत ही मनोरंजक ढंग से किस्से सुनाने वाला व्यक्ति था, यह बताते हुए सुना था कि वह सेक्स्टस पापिनियस के घर के ऊपर रहता था। सेक्स्टस पापिनियस भी उन लोगों में से था जो दिन के प्रकाश से बचते थे। “रात के लगभग तीसरे पहर,” उसने कहा, “मुझे कोड़ों की आवाज़ सुनाई देती है। मैं पूछता हूँ कि स्वामी क्या कर रहे हैं? उत्तर मिलता है कि वे हिसाब-किताब कर रहे हैं। रात के लगभग छठे पहर मुझे जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई देती है। मैं पूछता हूँ कि क्या हो रहा है? मुझे बताया जाता है कि वे अपनी आवाज़ का अभ्यास कर रहे हैं। रात के लगभग आठवें पहर मैं पूछता हूँ कि पहियों की यह आवाज़ किस बात की है? मुझे बताया जाता है कि वे सवारी के लिए बाहर गए हैं। भोर होते-होते लोग इधर-उधर भाग-दौड़ करने लगते हैं, दासों को बुलाया जा रहा है, प्रबंधक और रसोइए हंगामा मचा रहे हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या बात है? उत्तर मिलता है कि स्नान करके निकलने के बाद उन्होंने मधु-मिश्रित मदिरा और दलिया माँगा है।” किसी ने कहा, “लगता है उनका रात का भोजन पूरे दिन चलता रहा होगा।” “बिल्कुल नहीं,” पेडो ने कहा। “वह बहुत मितव्ययी जीवन जीते थे। रात के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।” इसलिए जब कुछ लोग सेक्स्टस को कंजूस कहते थे तो पेडो ने कहा, “तुम यह भी कह सकते हो कि वह दीपक की रोशनी पर जीवन बिताता है।” 

    तुम्हें दुर्गुणों के इतने अलग-अलग रूप देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। दुर्गुण अनेक प्रकार के होते हैं। उनके रूपों को गिनना या उनके सभी प्रकारों को समझ पाना बहुत कठिन है। उचित और सदाचारी जीवन की केवल एक ही दिशा होती है। लेकिन दुराचार अनेक रूप धारण करता है और हर बार किसी नई दिशा में मुड़ जाता है। चरित्र के साथ भी यही बात है। जब लोग प्रकृति का अनुसरण करते हैं तो वे सरल, सहज और अधिकांशतः एक-दूसरे के समान होते हैं। जो लोग विकृत मार्ग अपना लेते हैं, वे दूसरों से भी बहुत भिन्न हो जाते हैं और स्वयं अपने भीतर भी विरोधाभास से भर जाते हैं। 

    लेकिन मेरी राय में इस बीमारी का मुख्य कारण सामान्य जीवन के प्रति घृणा है। जिस प्रकार ऐसे लोग अपने पहनावे, अपने भोजों की भव्यता और अपनी सजी-धजी गाड़ियों के द्वारा स्वयं को दूसरों से अलग दिखाते हैं, उसी प्रकार वे अपने समय को व्यवस्थित करने के तरीके में भी स्वयं को एक अलग वर्ग का बनाना चाहते हैं। जिन लोगों को अपने गलत कामों का पुरस्कार कुख्याति के रूप में मिलता है, वे सामान्य अपराध करना नहीं चाहते। यही, यदि ऐसा कहा जाए तो उलटे ढंग से जीवन जीने वाले प्रत्येक व्यक्ति का उद्देश्य है। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, हमें उस मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए जिसे प्रकृति ने हमारे लिए निर्धारित किया है और उससे विचलित नहीं होना चाहिए। प्रकृति का अनुसरण करो। सब कुछ सरल तथा सहज हो जाता है। उसके विरुद्ध संघर्ष करो। तुम उस नाविक की तरह जीवन बिताओगे जो धारा के विपरीत नाव खेने का प्रयास करता है।


अभी के लिए विदा 

प्रकृति और शारीरिक संरचना के बोध के बारे में -- पत्र 119

 प्रिय लूसीलियस 


आज की वह छोटी-सी समस्या जब मैं तुम्हारे सामने रखूँगा, जिससे हम पहले से ही काफी समय से जूझते आ रहे हैं तो मुझे पूरा विश्वास है कि तुम मुझ पर मुकदमा कर दोगे। तुम फिर चिल्लाकर कहोगे, “इसका नैतिकता से क्या लेना-देना है?” तुम चिल्लाना शुरू कर दो। लेकिन इस बीच पहले मैं तुम्हारे सामने कुछ और प्रतिवादियों को मुकदमे के लिए प्रस्तुत कर दूँ अर्थात पॉसिडोनियस (एक प्रसिद्ध यूनानी स्टोइक दार्शनिक, विद्वान और वैज्ञानिक) और आर्केडेमस (स्टोइक नैतिक दर्शन और तर्कशास्त्र के विद्वान) को। इन्हीं लोगों को अदालत में खड़ा किया जाना चाहिए। अब मैं यह कहूँ कि नैतिकता से संबंधित प्रत्येक विषय अनिवार्य रूप से नैतिक आचरण को बढ़ावा नहीं देता। 


द विंची द्वारा 

    एक अध्ययन मनुष्य के पोषण से संबंधित है। दूसरे हमारे शारीरिक प्रशिक्षण, वस्त्र, शिक्षा या मनोरंजन से। ये सभी मनुष्य से संबंधित हैं। भले ही इनमें से सभी मनुष्य को बेहतर न बनाते हों। जहाँ तक नैतिकता का प्रश्न है, उसका एक अध्ययन आचरण से एक प्रकार से संबंधित होता है और दूसरा किसी अन्य प्रकार से। कुछ अध्ययन आचरण को सुधारते और नियंत्रित करते हैं। जबकि दूसरे उसके स्वरूप और उत्पत्ति की जाँच करते हैं। जब मैं पूछता हूँ कि प्रकृति ने मनुष्य को क्यों उत्पन्न किया और उसे अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ क्यों बनाया तो क्या तुम यह निष्कर्ष निकालोगे कि मैंने नैतिकता के क्षेत्र को छोड़ दिया है? ऐसा निष्कर्ष गलत होगा। मेरा आशय यह है कि जब तक तुमने यह पता नहीं लगा लिया कि मनुष्य के लिए सर्वोत्तम क्या है और मनुष्य के स्वभाव का अध्ययन नहीं कर लिया, तब तक तुम यह कैसे जान पाएँगे कि मनुष्य को किस प्रकार का आचरण अपनाना चाहिए? जब तक तुमने यह नहीं जान लिया कि अपने स्वभाव के प्रति आपका क्या कर्तव्य है, तब तक तुम यह नहीं समझ पाओगे कि तुमको क्या करना चाहिए और किन बातों से बचना चाहिए।

    “मैं चाहता हूँ,” तुम कहते हो, “कि मैं यह सीखूँ कि अपनी इच्छाओं और भय को कैसे कम करूँ। मुझे अंधविश्वास से झकझोरकर बाहर निकालो। मुझे यह समझाओ कि जिसे तथाकथित सुख कहा जाता है, वह एक छोटी और खोखली चीज़ है, जो बहुत आसानी से एक अतिरिक्त अक्षर ग्रहण करके दुख में बदल जाती है।” मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। मैं तुम्हारे सद्गुणों को प्रोत्साहित करूँगा और दुर्गुणों को कोड़े लगाऊँगा। यदि कोई इस भूमिका में मुझे अत्यधिक कठोर और असंयमी समझे, तब भी मैं दुष्टता का पीछा करना, उग्रतम वासनाओं पर लगाम लगाना, उन सुखों की बढ़त को रोकना जो अंततः पीड़ा में बदल जाते हैं और हमारी प्रार्थनाओं का विरोध करना बंद नहीं करूँगा। मैं सच कह रहा हूँ क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ उन्हीं चीज़ों के लिए होती हैं जो हमारे लिए सबसे अधिक हानिकारक हैं। जब वे इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, तब हमारे पास उन सभी चीज़ों के लिए सांत्वना पाने की आवश्यकता पड़ती है, जिनकी हमने स्वयं कामना की थी।

    इस बीच, मुझे उन विषयों पर विस्तार से चर्चा करने की अनुमति दो जो हमारे वर्तमान विषय से कुछ अधिक दूर प्रतीत होते हैं। हम इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि क्या सभी प्राणियों को अपनी स्वयं की प्रकृति और शारीरिक संरचना का बोध होता है। इसका सबसे प्रमुख प्रमाण यह है कि वे अपने अंगों को कितनी उपयुक्तता और कुशलता से संचालित करते हैं, मानो उन्हें ऐसा करने का प्रशिक्षण दिया गया हो। अपने अंगों का संचालन करने में कोई भी प्राणी असहाय नहीं होता। एक कुशल कारीगर अपने औज़ारों को सहजता से चलाता है। एक नाविक जानता है कि अपने जहाज़ को कैसे चलाना है। एक चित्रकार अपने पास मौजूद अनेक रंगों में से उचित रंग चुनने में अत्यंत तत्पर होता है और अपनी चित्र-पट्टिका तथा चित्र के बीच अपनी आँख और हाथ को बड़ी सहजता से चलाता है। उसी प्रकार कोई प्राणी अपने शरीर और उसके अंगों का जितने भी कार्यों में उपयोग करता है, उन सभी में समान रूप से कुशल होता है। 

    हम अक्सर कुशल मूक-अभिनय नर्तकों को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं क्योंकि उनके हाथ विषय-वस्तु और उसकी भावनाओं के समस्त अर्थ को व्यक्त करने के लिए तत्पर रहते हैं और उनके हाव-भाव बोले गए शब्दों की तीव्र गति के साथ-साथ चलते हैं। जो कला कलाकारों को प्रदान करती है, वही प्रकृति प्राणियों को प्रदान करती है।उनमें से किसी को भी अपने अंगों का संचालन करने में कठिनाई नहीं होती। कोई भी अपने शरीर का उपयोग करने में लड़खड़ाता नहीं है। वे संसार में आते ही ऐसा करने लगते हैं। यह ज्ञान उनके भीतर आरंभ से ही विद्यमान होता है। वे प्रशिक्षित होकर जन्म लेते हैं।

    कोई कह सकता है, “प्राणियों द्वारा अपने अंगों को कुशलता से संचालित करने का कारण यह है कि यदि वे उन्हें किसी अन्य प्रकार से संचालित करें तो उन्हें पीड़ा होगी। अतः वे विवश होकर वही करते हैं, जैसा तुम्हारे मत के लोग कहते हैं। जो चीज़ उन्हें सही ढंग से चलने-फिरने के लिए प्रेरित करती है, वह उनकी इच्छा नहीं बल्कि पीड़ा का भय है।” यह गलत है। जिन चीज़ों को आवश्यकता के कारण विवश होकर किया जाता है, वे धीमी होती हैं। जबकि फुर्ती स्वस्फूर्त गति की पहचान है। वास्तव में, वे पीड़ा के भय से गति करने के लिए विवश नहीं होते बल्कि जब पीड़ा उनके स्वाभाविक ढंग से चलने में बाधा डालती है, तब भी वे उसी स्वाभाविक गति को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। 

    एक ऐसे शिशु पर विचार करो जो खड़ा होना चाहता है और अभी अपने शरीर को सहारा देकर खड़ा रहने का अभ्यास ही कर रहा है। जैसे ही वह अपनी शक्ति को आज़माना शुरू करता है, वह गिर पड़ता है। लेकिन वह रोते हुए बार-बार उठता रहता है, जब तक कि पीड़ापूर्वक अभ्यास करते-करते वह वह कार्य करना नहीं सीख लेता जिसकी माँग उसका स्वभाव करता है। कुछ कठोर कवच वाले प्राणियों को जब पीठ के बल उलट दिया जाता है तो वे अपने पैरों से लगातार ऐंठते, ज़मीन कुरेदते और इधर-उधर सरकते रहते हैं, जब तक कि वे अपनी उचित स्थिति में वापस नहीं आ जाते। उलटी हुई कछुए को कोई पीड़ा नहीं होती। लेकिन अपनी स्वाभाविक स्थिति से बाहर होने के कारण वह बेचैन हो जाता है और तब तक अपने शरीर को हिलाता-डुलाता रहता है, जब तक कि वह अपने पैरों पर सीधा खड़ा नहीं हो जाता। इस प्रकार सभी प्राणियों को अपनी स्वयं की प्रकृति और शारीरिक संरचना का बोध होता है, और यही बताता है कि वे अपने अंगों का संचालन करने में इतने कुशल क्यों होते हैं। वास्तव में, यह इस बात का हमारा सबसे अच्छा प्रमाण है कि वे इस बोध के साथ जन्म लेते हैं: कोई भी प्राणी अपने शरीर और उसके अंगों का उपयोग करने में अकुशल नहीं होता।



    “तुम्हारे मत के अनुयायियों के अनुसार,” प्रतिपक्षी कहता है, “स्वभावगत संरचना ‘मन के उस निर्देशन करने वाले अंग की एक विशेष अवस्था है, जो शरीर के साथ एक निश्चित प्रकार के संबंध में स्थित है।’ कोई शिशु इतनी जटिल और सूक्ष्म बात को कैसे समझ सकता है, जिसका वर्णन करने में तुम लोग स्वयं भी मुश्किल से सक्षम हैं? अपनी उस परिभाषा को समझने के लिए तो सभी प्राणियों को जन्म से ही तर्कशास्त्री होना पड़ेगा क्योंकि अधिकांश रोमन लोगों के लिए भी यह परिभाषा अस्पष्ट है।” यह आपत्ति उचित होती, यदि मैं यह कहता कि प्राणी ‘स्वभावगत संरचना’ की परिभाषा को समझते हैं, न कि अपनी स्वभावगत संरचना को स्वयं। प्रकृति को समझना, उसका वर्णन करने की अपेक्षा अधिक सरल है। इसलिए शिशु यह नहीं जानता कि स्वभावगत संरचना क्या है। लेकिन वह अपनी स्वयं की स्वभावगत संरचना को जानता है। वह यह नहीं जानता कि प्राणी क्या होता है। लेकिन वह यह अनुभव करता है कि वह स्वयं एक प्राणी है। 

    इसके अतिरिक्त, अपनी स्वभावगत संरचना के विषय में उसका बोध अस्पष्ट, प्रारंभिक और अनिश्चित होता है। इसी प्रकार हम भी जानते हैं कि हमारे भीतर एक मन है, फिर भी हम यह नहीं जानते कि मन क्या है, वह कहाँ स्थित है, उसका स्वरूप कैसा है या वह कहाँ से आया है। हम अपने मन के अस्तित्व से अवगत हैं, भले ही हम उसके स्वभाव और उसके स्थान को न जानते हों। सभी प्राणियों में अपनी स्वभावगत संरचना के बोध की स्थिति भी ऐसी ही है। प्राणियों को अनिवार्य रूप से उस चीज़ का बोध होता है, जिसके माध्यम से वे दूसरी चीज़ों का बोध करते हैं। उन्हें अनिवार्य रूप से उस चीज़ का भी बोध होता है, जिसकी वे आज्ञा मानते हैं और जिसके द्वारा वे संचालित होते हैं। हममें से प्रत्येक यह समझता है कि कोई ऐसी चीज़ है जो हमारी प्रवृत्तियों को सक्रिय करती है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि वह क्या है। मनुष्य यह जानता है कि उसके भीतर कोई प्रेरक सिद्धांत या प्रेरक शक्ति है। लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह क्या है या कहाँ से आती है। इसी प्रकार, शिशुओं और प्राणियों में भी अपने निर्देशन करने वाले अंग का बोध होता है। लेकिन वह बोध पूरी तरह स्पष्ट और सुस्पष्ट नहीं होता।

    “तुम कहते हो कि प्रत्येक प्राणी आरंभ से ही अपनी स्वभावगत संरचना से जुड़ा होता है, लेकिन तुम यह भी कहते हो कि मनुष्य की स्वभावगत संरचना तर्कशील है। इसलिए मनुष्य स्वयं से केवल एक सजीव प्राणी के रूप में नहीं बल्कि एक तर्कशील प्राणी के रूप में जुड़ा हुआ है क्योंकि मनुष्य को अपने उसी अंग के कारण अपने प्रति लगाव होता है जो उसे मनुष्य बनाता है। फिर, जब कोई शिशु अभी तर्कशील नहीं हुआ है तो वह तर्कशील स्वभावगत संरचना के प्रति कैसे जुड़ाव रख सकता है?”

    जीवन की प्रत्येक अवस्था की अपनी एक स्वभावगत संरचना होती है। शिशु की एक, बालक की दूसरी, युवक की दूसरी और प्रौढ़ व्यक्ति की दूसरी। प्रत्येक व्यक्ति जिस स्वभावगत संरचना में होता है, उसी से जुड़ा रहता है।शिशु के दाँत नहीं होते। वह अपनी इसी वर्तमान स्वभावगत संरचना से जुड़ा रहता है। फिर उसके दाँत निकल आते हैं। अब वह इस नई स्वभावगत संरचना से जुड़ा रहता है। यहाँ तक कि गेहूँ की एक बाल, जो आगे चलकर फसल देने वाली है, अपनी आरंभिक अवस्था में एक प्रकार की स्वभावगत संरचना रखती है, जब वह अभी छोटी होती है और मुश्किल से मेड़ की ऊँचाई तक पहुँचती है। फिर दूसरी, जब उसमें शक्ति आ जाती है और वह ऐसे तने पर खड़ी होती है जो भले ही नरम हो। लेकिन उसका भार सँभाल सकता है और फिर एक और, जब वह सुनहरी हो जाती है और उसकी बालियों में दाने कठोर होने लगते हैं, जो फसल के समय के आने का संकेत देते हैं। पौधा जिस भी स्वभावगत संरचना तक पहुँचता है, उसे बनाए रखता है और उसी के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है। 

    जीवन की अवस्थाएँ अलग-अलग हैं। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था। फिर भी मैं, जो कभी शिशु था, फिर बालक और फिर युवक रहा, वही व्यक्ति बना हुआ हूँ। इसलिए, यद्यपि प्रत्येक वस्तु की स्वभावगत संरचना बदलती रहती है, फिर भी वह उसी प्रकार अपनी वर्तमान स्वभावगत संरचना से जुड़ी रहती है। मेरा स्वाभाविक लगाव उस बालक, युवक या प्रौढ़ व्यक्ति से नहीं है बल्कि स्वयं मुझसे है। इसलिए एक शिशु अपनी उसी स्वभावगत संरचना से जुड़ा होता है, जो उसके शिशु होने के समय होती है, न कि उस स्वभावगत संरचना से जो आगे चलकर युवक बनने पर उसकी होगी। भले ही बाद में वह अधिक विकसित अवस्था में पहुँच जाएगा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि जिस अवस्था में वह जन्म लेता है, वह भी प्रकृति के अनुरूप नहीं है।

    प्राणी सबसे पहले स्वयं से जुड़ा होता है क्योंकि कोई न कोई ऐसी वस्तु होनी ही चाहिए, जिसके साथ अन्य सभी चीज़ों का संबंध स्थापित किया जा सके। मुझे सुख चाहिए। किसके लिए? अपने लिए। इसलिए मैं अपनी देखभाल करता हूँ। मैं पीड़ा से बचने का प्रयास करता हूँ। किसके लिए? अपने लिए। इसलिए मैं अपनी देखभाल करता हूँ। यदि मैं अपनी प्रत्येक गतिविधि अपनी देखभाल के लिए करता हूँ तो अपने प्रति मेरी चिंता हर दूसरी चीज़ से पहले आती है। यह चिंता सभी प्राणियों में होती है; इसे उनमें बाहर से आरोपित नहीं किया गया है बल्कि यह उनके भीतर जन्मजात होती है। प्रकृति अपनी संतानों का पालन-पोषण करती है और उन्हें त्यागती नहीं है क्योंकि सबसे विश्वसनीय रक्षक वही होता है जो सबसे निकट हो। इसलिए प्रत्येक प्राणी को स्वयं अपनी रक्षा का दायित्व सौंपा गया है। इसलिए, जैसा कि मैंने अपने पहले के पत्रों में कहा है, छोटे-से-छोटे नवजात या अंडे से अभी-अभी निकले प्राणी भी अपने आप यह जान लेते हैं कि उनके लिए क्या हानिकारक है और उन चीज़ों से बचते हैं जो उनकी मृत्यु का कारण बन सकती हैं। यहाँ तक कि आकाश में ऊपर से उड़ती हुई किसी वस्तु की छाया मात्र देखकर भी वे भय की प्रतिक्रिया प्रकट करते हैं, जबकि वे स्वयं शिकारी पक्षियों के लिए अत्यंत असुरक्षित होते हैं। कोई भी प्राणी मृत्यु के भय से रहित होकर जीवन में प्रवेश नहीं करता।

    “कोई प्राणी जन्म लेते ही यह कैसे समझ सकता है कि कौन-सी चीज़ उसके जीवन की रक्षा करती है और कौन-सी उसकी मृत्यु का कारण बन सकती है?” सबसे पहले, हमारा प्रश्न यह है कि क्या वह इन बातों को समझ सकता है, यह नहीं कि वह ऐसा कैसे करता है। प्राणियों में यह समझ होती है, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि यदि वे अभी इस समझ को प्राप्त करते तो वे पहले से जो कुछ करते आ रहे हैं, उससे अलग कुछ नहीं करते। ऐसा क्यों है कि मुर्गी मोर या हंस से नहीं बचती। लेकिन बाज़ को देखकर भाग जाती है।जबकि बाज़ उन पक्षियों की तुलना में बहुत छोटा होता है और ऐसा प्राणी भी नहीं है जिससे उसका कोई परिचय रहा हो? चूजे नेवले से क्यों डरते हैं। लेकिन कुत्ते से नहीं? यह स्पष्ट है कि उनके भीतर इस बात का ऐसा ज्ञान मौजूद होता है जो अनुभव से प्राप्त नहीं हुआ है कि कौन-सी चीज़ उन्हें नुकसान पहुँचा सकती है क्योंकि वे किसी ऐसी चीज़ से भी बचते हैं, जिसका उन्हें अभी अनुभव तक नहीं हुआ है। 

    दूसरे, ताकि तुम यह न समझो कि ऐसा संयोगवश होता है, वे उन चीज़ों के अतिरिक्त किसी और चीज़ से नहीं डरते, जिनसे डरना उनके लिए उचित है, और वे इस सावधानी तथा सतर्कता को कभी नहीं भूलते। खतरे से बचने में उनका व्यवहार निरंतर एक जैसा रहता है। इसके अतिरिक्त, अपने जीवन के दौरान वे अधिक भयभीत भी नहीं होते जाते। इससे सिद्ध होता है कि वे इस अवस्था तक अनुभव के कारण नहीं, बल्कि आत्म-संरक्षण की प्राकृतिक प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप पहुँचते हैं। जो कुछ अनुभव सिखाता है, वह देर से आता है और सभी में समान रूप से विकसित नहीं होता। जबकि प्रकृति जो कुछ प्रदान करती है, वह तत्काल और सभी मामलों में एकसमान होता है।

    लेकिन यदि तुम मुझसे इस बात का आग्रह करो कि मैं बताऊँ कि प्रत्येक प्राणी यह समझने से कैसे नहीं बच सकता कि उसके लिए क्या खतरनाक है तो मैं तुम्हें इसका उत्तर दूँगा। उसे यह बोध होता है कि वह मांस से बना है; इसलिए उसे यह भी बोध होता है कि कौन-सी चीज़ मांस को काट सकती है, जला सकती है या कुचल सकती है, और कौन-से प्राणी उसे नुकसान पहुँचाने के साधनों से युक्त हैं। इन चीज़ों की उसके मन में खतरनाक और शत्रुतापूर्ण होने की धारणा बन जाती है। ये प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जिस समय प्रत्येक प्राणी अपनी रक्षा से जुड़ा होता है, उसी समय वह उन चीज़ों की खोज करता है जो उसके लिए लाभकारी हैं और उन चीज़ों से बचता है जो उसके लिए हानिकारक हैं। उपयोगी वस्तुओं की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति प्राकृतिक है और उनके विपरीत वस्तुओं के प्रति विरक्ति भी प्राकृतिक है।

    प्रकृति जो कुछ निर्धारित करती है, वह बिना किसी विचार के, उसे प्रेरित करने वाली किसी पूर्वचिंता या योजना के बिना ही घटित होता है। क्या तुम नहीं देखते कि मधुमक्खियाँ अपने छत्ते की कोठरियाँ बनाने में कितनी कुशल होती हैं और अपने-अपने कार्यों को कितनी सामंजस्यपूर्ण ढंग से करती हैं? क्या तुम नहीं देखते कि मकड़ी का जाला मनुष्य की नकल करने की क्षमता से परे होता है? उसके तंतुओं को व्यवस्थित करना कितना कठिन कार्य है। कुछ तंतु सहारे के लिए सीधी रेखाओं में होते हैं और दूसरे बढ़ते हुए अंतराल पर वृत्ताकार रूप में फैले होते हैं ताकि जिन छोटे जीवों को पकड़ने के लिए जाला बनाया गया है, वे उसमें फँस जाएँ और जाल में बँधे रहें। यह कला जन्मजात है, सीखी हुई नहीं। इसी कारण कोई भी प्राणी दूसरे प्राणी की अपेक्षा अधिक सीखने वाला नहीं होता। तुम देखोगे कि सभी मकड़ियों के जाले एक जैसे होते हैं और एक छत्ते में मधुकोष की सभी कोण-संरचनाएँ समान होती हैं। जो कुछ प्रशिक्षण से प्राप्त होता है, उसमें भिन्नता और असमानता होती है। लेकिन जो क्षमताएँ प्रकृति से प्राप्त होती हैं, वे समान रूप से वितरित होती हैं। 

    प्रकृति ने प्राणियों को स्वयं की रक्षा करने की प्रवृत्ति और ऐसा करने की सहज क्षमता के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिया है। इसी कारण प्राणी उसी क्षण से सीखना आरंभ कर देते हैं, जिस क्षण से वे जीवन आरंभ करते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे जन्म से ही ठीक उन्हीं क्षमताओं से युक्त होते हैं, जिनके बिना उनका जन्म व्यर्थ हो जाता। यह उनकी निरंतर जीवित रहने के लिए प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया पहला साधन है— स्वयं से लगाव और स्वयं के प्रति प्रेम। यदि वे जीवित रहने की इच्छा न रखते तो उनके पास जीवित रहने की शक्ति भी न होती। केवल यह इच्छा अपने आप में उनकी सहायता करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। लेकिन इसके बिना कोई दूसरी चीज़ भी उनकी सहायता नहीं कर सकती थी। किसी भी प्राणी में तुम अपने प्रति कम सम्मान या यहाँ तक कि अपनी उपेक्षा भी नहीं पाओगे। मूक प्राणी, जो अन्य मामलों में भले ही मंदबुद्धि हों। लेकिन जीवन जीने के मामले में कुशल होते हैं। तुम देखोगे कि जो प्राणी दूसरों के लिए किसी उपयोग के नहीं हैं, वे भी अपनी स्वयं की आवश्यकताओं के मामले में किसी तरह से अपूर्ण नहीं होते।


अभी के लिए विदा 

Thursday, 6 August 2026

कर्म जो सद्गुण हैं, के बारे में - पत्र - 118

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारे पत्र में अनेक छोटे-छोटे प्रश्न उठाए गए थे पर अंततः वह एक ही प्रश्न पर आकर ठहर गया। तुमने मुझसे पूछा है कि हमारे मन में ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ (honorable) की अवधारणा कैसे उत्पन्न हुई। कुछ दार्शनिकों के अनुसार ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ दो भिन्न वस्तुएँ हैं किन्तु हम स्टोइक इन्हें केवल भेदयुक्त मानते हैं, अलग नहीं। 



    मेरा आशय यह है कि कुछ लोग ‘शुभ’ को केवल वही मानते हैं जो उपयोगी हो। इसलिए वे धन, घोड़े, शराब और जूतों तक को ‘शुभ’ कह देते हैं। उनके लिए ‘शुभ’ का मूल्य इतना गिर जाता है कि वह साधारण उपयोग की वस्तुओं तक सीमित रह जाता है। दूसरी ओर, उनके मत में ‘सम्माननीय’ वह है जो किसी पूर्णतः उचित कर्म के तर्कसंगत स्वरूप के अनुरूप हो जैसे, वृद्ध पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करना, निर्धन मित्र की सहायता करना, साहसपूर्वक युद्ध करना, अथवा विवेकपूर्ण और संतुलित नीति-भाषण देना। हम भी ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ में एक प्रकार का भेद स्वीकार करते हैं, किन्तु उन्हें मूलतः एक ही मानते हैं। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती, जब तक वह सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह अनिवार्य रूप से शुभ भी है। इन दोनों धारणाओं के बीच का अंतर मैं फिर से विस्तार से नहीं बताऊँगा क्योंकि इसका उल्लेख मैं पहले अनेक बार कर चुका हूँ। केवल एक बात कहूँगा, हमारे मत में कोई भी वस्तु शुभ नहीं हो सकती, जिसका दुरुपयोग किया जा सके। तुम स्वयं देख सकते हो कि कितने लोग धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और शारीरिक बल का दुरुपयोग करते हैं।

    अब मैं उस प्रश्न पर लौटता हूँ, जिस पर तुम मुझसे चर्चा करना चाहते हो। हमने सबसे पहले ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ की अवधारणा कैसे प्राप्त की? प्रकृति हमें यह नहीं सिखा सकती थी क्योंकि प्रकृति ने हमें ज्ञान नहीं दिया है बल्कि केवल ज्ञान के बीज दिए हैं। कुछ दार्शनिकों का कहना है कि यह अवधारणा हमें संयोगवश प्राप्त हो गई किन्तु यह विश्वास करना कठिन है कि कोई व्यक्ति केवल संयोग से सद्गुण की धारणा तक पहुँच गया हो। हमारा मत यह है कि ‘सम्माननीय’ और ‘शुभ’ की अवधारणा बार-बार होने वाले कर्मों के निरीक्षण और उनकी तुलना के द्वारा निष्कर्ष रूप में प्राप्त होती है। हमारे मतानुसार इन्हें ‘एनालॉजी’ (analogy- समानता के आधार पर) के आधार पर समझा जाता है।

    चूँकि इस शब्द ‘एनालॉजी’ (analogy) को लैटिन विद्वानों ने अपनी भाषा में अपना लिया है। इसलिए मेरा विचार है कि इसे अस्वीकार करने के बजाय रोमन भाषा-समुदाय में पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए। अतः मैं इसका प्रयोग केवल वैध शब्द के रूप में ही नहीं बल्कि एक पूर्णतः स्थापित शब्द के रूप में भी करूँगा। अब मैं स्पष्ट करता हूँ कि यह ‘एनालॉजी’ क्या है। हम शरीर के स्वास्थ्य से परिचित थे। उसी के आधार पर हमने यह समझा कि मन का भी एक स्वास्थ्य होता है। हम शरीर की शक्ति को जानते थे। उसी से हमने निष्कर्ष निकाला कि मन की भी एक शक्ति होती है। उदारता, मानवता और साहस के कुछ कार्यों ने हमें विस्मित कर दिया। हमने उनकी प्रशंसा ऐसे करनी शुरू की मानो वे पूर्णतः निर्दोष हों। यद्यपि उनमें अनेक दोष भी थे किन्तु किसी एक उत्कृष्ट कर्म की दीप्ति ने उन दोषों को ढँक दिया था और हमने उन्हें अनदेखा कर दिया। प्रकृति हमें यह प्रेरणा देती है कि प्रशंसनीय कर्मों को महान मानें और प्रत्येक व्यक्ति उनकी प्रशंसा करते समय प्रायः वास्तविकता से आगे बढ़ जाता है। इन्हीं कर्मों के आधार पर हमने एक महान शुभ की अवधारणा निर्मित की। 

    फ़ैब्रिसियस (रोमन सेनापति और राजनेता) ने पायरूस (प्राचीन यूनान के एपिरस राज्य के राजा) द्वारा दिया गया स्वर्ण अस्वीकार कर दिया। उसके विचार में किसी राजा के धन का तिरस्कार कर सकना, स्वयं किसी राज्य का स्वामी होने से भी अधिक महान था। बाद में, जब पायरूस के चिकित्सक ने उसे विष देकर मार डालने का प्रस्ताव किया, तब उसी फ़ैब्रिसियस ने राजा को इस षड्यंत्र से सावधान कर दिया। इन दोनों कार्यों में उसके चरित्र की एक ही दृढ़ता प्रकट होती है न तो स्वर्ण से खरीदा जाना और न ही विष देकर विजय प्राप्त करना। हमने ऐसे महान पुरुष की प्रशंसा की, जो न तो राजा के उपहारों से प्रभावित हुआ और न ही राजा के विरुद्ध दिए गए प्रस्तावों से। वह अपने आदर्शों पर अटल रहा और उसने वह कार्य किया, जो सबसे कठिन होता है, युद्ध की स्थिति में भी अपनी नैतिक निष्कलुषता बनाए रखना। उसका विश्वास था कि शत्रु के साथ भी अन्याय नहीं किया जाना चाहिए। अत्यन्त निर्धनता में जीवन बिताते हुए भी, जिसे वह अपने गौरव का विषय मानता था, उसने धन को उसी प्रकार ठुकरा दिया, जैसे उसने विष के प्रयोग को अस्वीकार किया था। उसने कहा, “पायरूस, मेरे कारण जीवित रहो और अब उस बात पर प्रसन्न हो जाओ जो पहले तुम्हें दुःख देती थी कि फ़ैब्रिसियस को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।” 

    होरातियस कोक्लेस (प्राचीन रोम का एक महान वीर और लोकनायक) अकेला ही उस संकरे पुल पर डट गया। उसने अपने साथियों को आदेश दिया कि वे उसके पीछे का पुल काट दें ताकि शत्रु के लिए आगे बढ़ने का मार्ग बंद हो जाए। वह तब तक आक्रमणकारियों को रोके रहा, जब तक कि गिरते हुए पुल की विशाल लकड़ियों के टूटने की प्रचंड ध्वनि उसके कानों में नहीं गूँज उठी। जब उसने पीछे मुड़कर देखा और पाया कि उसके अपने संकट ने उसके देश को संकट से मुक्त कर दिया है, तब उसने पुकारकर कहा, “आओ, यदि कोई उसी मार्ग से मेरा पीछा करना चाहता है, जिस मार्ग से मैं जा रहा हूँ!” इसके बाद वह सीधे नदी में कूद पड़ा। प्रबल वेग से बहती धारा को पार करते समय उसने अपने शस्त्रों की रक्षा उतनी ही सावधानी से की, जितनी अपने प्राणों की। अंततः वह अपने विजयी शस्त्रों का सम्मान अक्षुण्ण रखते हुए उतनी ही सुरक्षित लौट आया, मानो उसने पुल पार करके ही वापसी की हो।  

    ऐसे और इसी प्रकार के कर्मों ने हमें सद्गुण का स्वरूप समझाया। अब मैं एक ऐसी बात जोड़ूँगा जो तुम्हें आश्चर्यजनक लग सकती है। कभी-कभी हमें सम्माननीय के स्वरूप का ज्ञान बुरी बातों से भी प्राप्त हुआ अर्थात उत्कृष्टता अपने विपरीत के माध्यम से भी स्पष्ट हुई। जैसा कि तुम जानते हो, कुछ सद्गुण और दुर्गुण एक-दूसरे के बहुत निकट प्रतीत होते हैं। यहाँ तक कि दुष्ट और अनैतिक व्यक्तियों में भी कभी-कभी सदाचार का आभास दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, अपव्ययी व्यक्ति उदार होने का भ्रम उत्पन्न करता है। जबकि देना जानने और बचाकर रखना न जानने के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लूसीलियस, मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसे बहुत-से लोग हैं जो अपना धन दान नहीं करते बल्कि उसे केवल उड़ा देते हैं। मैं उस व्यक्ति को उदार नहीं कह सकता जिसे धन का कोई मूल्य ही न हो। इसी प्रकार लापरवाही कभी-कभी सरल स्वभाव जैसी लगती है और उतावलापन साहस का आभास देता है। 

    इसी प्रकार की समानता ने हमें विवश किया कि हम विचार करें और उन बातों में भेद स्थापित करें जो देखने में तो एक जैसी लगती हैं किन्तु वास्तव में अत्यन्त भिन्न होती हैं। जब हमने उन लोगों को देखा जो किसी एक महान कार्य के कारण प्रसिद्ध हो गए थे, तब हमने यह भी ध्यान देना आरम्भ किया कि ऐसा व्यक्ति किसी एक अवसर पर तो बड़े उत्साह और गौरव के साथ श्रेष्ठ कार्य कर सकता है, किन्तु केवल उसी एक अवसर पर। हमने किसी व्यक्ति को युद्ध में साहसी देखा किन्तु जनसभा में भयभीत। हमने उसे निर्धनता को धैर्यपूर्वक सहते हुए देखा, किन्तु अपमान का सामना करते समय अत्यन्त हीन और दुर्बल पाया। उसके कार्य की हमने प्रशंसा की, परन्तु उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं किया। इसके विपरीत, हमने एक दूसरे व्यक्ति को देखा जो अपने मित्रों के प्रति दयालु था, अपने शत्रुओं के प्रति सहनशील था तथा सार्वजनिक और निजी, दोनों प्रकार के जीवन में कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानशील था। 

    हमने देखा कि वह अपने कष्टों को कितने धैर्य से सहता है और अपने दायित्वों का निर्वाह कितनी दूरदर्शिता से करता है। जब धन देने की आवश्यकता होती तो वह उदारतापूर्वक देता और जब परिश्रम अपेक्षित होता तो वह बिना थके परिश्रम करता तथा अपने चरित्र की दृढ़ता से थकान पर विजय पा लेता। इसके अतिरिक्त, वह प्रत्येक कार्य में सदैव एक-सा रहता था। उसका आचरण परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली नीति पर आधारित नहीं था बल्कि ऐसे दृढ़ संस्कार के मार्गदर्शन में था जिसने उसे केवल उचित कर्म करने में समर्थ ही नहीं बनाया था, बल्कि अनुचित कर्म करना उसके लिए असंभव-सा कर दिया था। ऐसे व्यक्ति में हमने समझा कि सद्गुण अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुका है। 

    इसके बाद हमने इस सद्गुण के विभिन्न अंगों का विभाजन किया। यह उचित था कि इच्छाओं को संयमित किया जाए, भय को नियंत्रण में रखा जाए, प्रत्येक कार्य बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित अधिकार दिया जाए। इस प्रकार हमने संयम, साहस, विवेक और न्याय को समझा तथा प्रत्येक के लिए उसका विशिष्ट कार्य निर्धारित किया। तो फिर हमें सद्गुण की समझ कहाँ से प्राप्त हुई? उस मनुष्य के सुव्यवस्थित जीवन ने हमें उसका परिचय कराया, उसके गरिमापूर्ण आचरण, उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, उसके सभी कर्मों के बीच विद्यमान सामंजस्य और प्रत्येक कठिनाई पर विजय प्राप्त करने वाली उसकी महानता ने हमें सद्गुण का स्वरूप दिखाया। इसी प्रकार हम सुख की उस अवस्था को समझ पाए, ऐसे जीवन को, जो सहज प्रवाह के साथ चलता है और जो पूर्णतः अपने ही नियंत्रण में रहता है।  

    फिर यह बात हमें कैसे स्पष्ट हुई? मैं तुम्हें बताता हूँ। पूर्ण मनुष्य अर्थात वह जो सद्गुण से संपन्न था, कभी अपने भाग्य को कोसता नहीं था और न ही परिस्थितियों का सामना उदास या कटु मुखमुद्रा के साथ करता था।वह स्वयं को समस्त विश्व का नागरिक और सैनिक मानता था। इसलिए वह प्रत्येक श्रम को ऐसे स्वीकार करता था, मानो वह उसे सौंपा गया कोई आदेश हो। उसने किसी भी घटना को कष्टदायक बाधा या दुर्भाग्य नहीं माना बल्कि अपने लिए नियत एक कर्तव्य समझा। वह कहता था, “यह जो कुछ भी है, यही मेरा कार्य है। यदि यह कठिन और दुर्गम है, तो आओ, इसे पूरा करने में लग जाएँ।” इसी कारण उस व्यक्ति की महानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी, जो कभी विपत्तियों पर कराहता नहीं था और न ही अपने भाग्य की शिकायत करता था। उसने बहुत-से लोगों को अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय कराया। वह अंधकार में दीपक की भाँति प्रकाशित होता था और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता था, क्योंकि वह शांत और सौम्य था तथा मानवीय परिस्थितियों और ईश्वर की व्यवस्था, दोनों को समान भाव से स्वीकार करता था। उसका मन पूर्ण था और अपनी सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर चुका था।  

    उससे श्रेष्ठ केवल दैवी बुद्धि हो सकती है, जिसका एक अंश हमारे इस नश्वर हृदय में अवतरित हुआ है। यह हृदय तब सबसे अधिक दिव्य होता है, जब वह अपनी नश्वरता पर विचार करता है। तब वह समझता है कि मनुष्य का जन्म इस शरीर में केवल जीवन की निर्धारित अवधि पूरी करने के लिए हुआ है। यह शरीर उसका स्थायी घर नहीं, बल्कि एक प्रकार का अस्थायी अतिथिगृह है, जिसे उसे तब छोड़ देना चाहिए, जब उसे अनुभव हो कि अब वह अपने मेज़बान पर बोझ बनने लगा है। 

    लुसिलियस, मैं तुम्हें विश्वासपूर्वक कहता हूँ कि जब मन यह पहचान लेता है कि उसका वर्तमान निवास कितना तुच्छ और सीमित है तथा उसे छोड़ने से भयभीत नहीं होता, तब वह इस बात का अत्यन्त प्रबल संकेत देता है कि उसका उद्गम किसी उच्चतर स्रोत से हुआ है। जब हम यह स्मरण रखते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, तभी हम यह भी जान लेते हैं कि हमें कहाँ जाना है। क्या हम नहीं देखते कि हमारा शरीर कितनी असुविधाओं से घिरा रहता है और हम उससे कितने असंतुष्ट रहते हैं? कभी हम अपने सिर की शिकायत करते हैं, कभी पेट की, कभी छाती और गले की। कभी मांसपेशियों में पीड़ा होती है तो कभी पैरों में दर्द। कभी अतिसार होता है तो कभी नाक बहने लगती है। कभी शरीर में रक्त अधिक हो जाता है तो कभी उसकी कमी हो जाती है। हम चारों ओर से रोगों और कष्टों से घिरे रहते हैं और मानो अपने ही घर से निकाल दिए जाते हैं। यही दशा उन लोगों की होती है, जो दूसरे के घर में रहते हैं। फिर भी, जबकि हमें ऐसा क्षयशील शरीर मिला है, हम अनन्त काल तक जीवित रहने की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपनी आशाओं में हम मनुष्य-जीवन की अधिकतम सीमा तक अधिकार करना चाहते हैं। न धन की कोई सीमित मात्रा हमें संतुष्ट करती है और न ही प्रभाव और प्रतिष्ठा की कोई सीमा। 

    इससे अधिक निर्लज्ज और इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? जबकि हमारी मृत्यु निकट है, तब भी हमारे लिए कुछ भी पर्याप्त नहीं होता। वास्तव में, हम अभी से मर रहे हैं। प्रत्येक दिन हमें हमारे अंतिम क्षण के और निकट ले आता है, और प्रत्येक घड़ी हमें उस स्थान की ओर धकेल रही है, जहाँ से अंततः हमें गिरना ही है। देखो, हमारे मन पर कैसी अंधता छाई हुई है! जिसे मैं भविष्य कहता हूँ, वह अभी इसी क्षण घटित हो रहा है और उसका एक बड़ा भाग तो पहले ही बीत चुका है। जितना जीवन हम जी चुके हैं, वह अब उसी स्थान पर पहुँच चुका है जहाँ हमारे जन्म से पहले था। हम अपने अंतिम दिन से व्यर्थ ही भयभीत होते हैं; प्रत्येक दिन हमें मृत्यु की ओर समान रूप से अग्रसर करता है। डगमगाते हुए कदम हमें थकाते नहीं, वे केवल यह बता देते हैं कि हम पहले से ही थक चुके हैं। हमारा अंतिम दिन मृत्यु तक पहुँचा देता है, किन्तु हमारा प्रत्येक दिन उसी की ओर बढ़ता रहता है। मृत्यु हमें एक ही क्षण में नहीं पकड़ लेती। वह तो धीरे-धीरे, प्रतिदिन हमारा कुछ-न-कुछ अंश छीनती चली जाती है। 

    अतः वह महान मस्तिष्क, जो अपने उच्चतर स्वरूप से परिचित है, जिस स्थान पर उसे रखा गया है वहाँ सम्मानपूर्वक और परिश्रमपूर्वक अपना कर्तव्य निभाने का पूरा प्रयास करता है। किन्तु वह अपने चारों ओर की किसी भी वस्तु को अपना नहीं मानता। वह उनका उपयोग केवल उधार में मिली वस्तुओं के समान करता है, जैसे कोई यात्री यात्रा के दौरान अस्थायी रूप से किसी सराय की वस्तुओं का उपयोग करता है और फिर आगे बढ़ जाता है। जब हमने ऐसे दृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति को देखा, तब उसके उत्कृष्ट स्वभाव की कल्पना किए बिना कैसे रह सकते थे? विशेषतः तब, जब उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, जैसा कि मैंने कहा, यह प्रमाणित करती थी कि उसकी महानता वास्तविक है। सत्य स्थिर और सुसंगत होता है। असत्य टिक नहीं सकता। 

    कुछ लोग कभी वातिनियस (पहली शताब्दी ईसा पूर्व के एक रोमन राजनेता) बन जाते हैं तो कभी कैटो। कभी उन्हें लगता है कि क्यूरियस (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रसिद्ध रोमन सेनापति और राजनेता) पर्याप्त कठोर नहीं है, फ़ैब्रिसियस पर्याप्त निर्धन नहीं है और ट्यूबेरो पर्याप्त मितव्ययी तथा सादा जीवन जीने वाला नहीं है। फिर कभी वही लोग धन-संपत्ति में लिसिनस (वे सम्राट औगस्टस के काल के एक मुक्तदास) की बराबरी करना चाहते हैं, स्वादिष्ट भोजन के शौक में अपीसियस (रोम के अत्यंत धनी और विलासप्रिय व्यक्ति) का अनुकरण करते हैं और विलासिता तथा परिष्कृत जीवन में मैकेनास जैसा बनना चाहते हैं। दुष्ट चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उसमें स्थिरता नहीं होती। वह निरंतर बदलता रहता है और कभी सद्गुणों का दिखावा करता है तो कभी दुर्गुणों से प्रेम करने लगता है। कभी उसके पास दो सौ दास होते थे और कभी केवल दस। कभी वह बड़े-बड़े विषयों, राजाओं और राजकुमारों की बातें करता था। कभी कहता था, “मेरे लिए तो बस तीन पैरों वाली एक छोटी-सी मेज़, नमक रखने का एक पात्र और घर में बुना हुआ एक ऊनी चोगा ही पर्याप्त है, जो मुझे ठंड से बचा सके।” किन्तु यदि ऐसे इस अल्प में संतुष्ट रहने का दावा करने वाले व्यक्ति को दस लाख सेस्टर्स (रोमन मुद्रा) दे दिए जाएँ तो वे पाँच ही दिनों में समाप्त हो जाएँगे। 

    ऐसे लोगों की संख्या बहुत है, जिनका वर्णन होरातियस फ्लैकस (होरेस) ने किया है। ऐसे व्यक्ति, जो कभी एक जैसे नहीं रहते बल्कि इतनी भिन्न-भिन्न दिशाओं में भटकते रहते हैं कि अंततः स्वयं अपने ही समान नहीं रह जाते। क्या मैंने कहा, “बहुत-से”? मेरा आशय तो लगभग सभी लोगों से था। लगभग प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन अपनी योजनाएँ और अपनी आकांक्षाएँ बदलता रहता है। आज वह विवाह करना चाहता है, तो अगले ही दिन केवल एक प्रेमिका से संतुष्ट रहना चाहता है। कभी वह लोगों पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा रखता है, तो कभी उसका व्यवहार दास से भी अधिक चापलूसीपूर्ण हो जाता है। कभी वह अपने महत्व का इतना प्रदर्शन करता है कि लोगों की घृणा का पात्र बन जाता है तो कभी स्वयं को इतना तुच्छ दिखाता है कि निम्नतम श्रेणी के लोगों से भी अधिक आत्महीन प्रतीत होता है। कभी वह जनता पर उदारतापूर्वक धन लुटाता है तो कभी वही स्वयं उस धन के लिए झपटने लगता है। 

    यही उस मन का सबसे स्पष्ट लक्षण है, जिसमें सद्बुद्धि का अभाव है। उसका कोई स्थिर स्वरूप नहीं होता और जो मुझे सबसे अधिक अनादरणीय प्रतीत होता है, वह स्वयं अपने ही प्रति एकनिष्ठ नहीं रहता। यह समझो कि जीवनभर एक ही व्यक्ति बने रहना अत्यन्त महान बात है। किन्तु ऐसा केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है। हममें से शेष लोग तो अनेक प्रकार के रूप धारण करते रहते हैं। कभी तुम हमें मितव्ययी और गंभीर पाओगे, तो कभी अपव्ययी और मूर्ख। हम निरंतर अपने मुखौटे बदलते रहते हैं, एक उतारकर उसका ठीक विपरीत दूसरा पहन लेते हैं। इसलिए तुम्हें स्वयं से यही अपेक्षा करनी चाहिए कि जिस भूमिका का निर्वाह तुमने आरम्भ किया है, उसे रंगमंच से विदा होने तक निभाते रहो। यह सुनिश्चित करो कि तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा कर सकें। यदि इतना भी संभव न हो तो कम-से-कम इतना अवश्य हो कि लोग तुम्हें पहचान सकें। जिस व्यक्ति को लोगों ने कल देखा था, उसके बारे में आज यह कहना न पड़े, “यह कौन है?” वह इतना बदल चुका है।


अभी के लिए विदा 

यह अनुवाद - माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि

  लूसियस अनेयस सेनेका, जिन्हें सामान्यतः सेनेका कहा जाता है, प्राचीन रोम के महान दार्शनिक, लेखक, नाटककार और स्टोइक विचारक थे। उनका जीवन पहली...