Saturday, 4 July 2026

आत्मावलोकन के संदर्भ में -- पत्र 29 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

"तुम हमारे मित्र मार्सेलिनस के बारे में पूछते हो और जानना चाहते हो कि वह कैसा है। वह अब कम ही मिलने आता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उसे सत्य सुनने का भय है। लेकिन इस समय उसे उससे कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सत्य केवल उसी व्यक्ति से कहना चाहिए जो उसे सुनने के लिए तैयार हो।"


Rembrandt van Rjin

    इसी कारण लोग अक्सर डायोजनीज़ और अन्य सिनिक दार्शनिकों के बारे में संदेह व्यक्त करते हैं, जो वाणी की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग करते थे। वे जिस किसी से भी मिलते, उसे उपदेश देते थे। क्या वे ऐसा करने में सही थे? यदि वे लोग, जिन्हें डाँटा-फटकारा जा रहा था, बहरे और गूँगे होते—चाहे जन्म से या किसी रोग के कारण—तो क्या होता? तुम कहते हो, “शब्दों में कंजूसी क्यों की जाए? उनका कोई मूल्य तो नहीं है। मैं यह नहीं जान सकता कि जिसे मैं समझा रहा हूँ, उसकी सहायता कर पाऊँगा या नहीं। लेकिन यदि मैं बहुतों को समझाऊँ तो निश्चित ही किसी-न-किसी की सहायता कर दूँगा। मुझे तो बीज को व्यापक रूप से बिखेर देना चाहिए। यदि बहुत-से प्रयास किए जाएँ तो उनमें से कुछ न कुछ अवश्य सफल होंगे।” लेकिन, प्रिय ल्यूसीलियस, मुझे नहीं लगता कि किसी महान व्यक्ति को ऐसा करना चाहिए। इससे उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव कम हो जाता है। यदि वह अपने शब्दों को बहुत अधिक सामान्य बना दे तो उन्हीं लोगों के बीच उनका पर्याप्त महत्व नहीं रह जाता जिन्हें वह वास्तव में सुधार सकता था। एक धनुर्धर को कभी लक्ष्य भेदना और कभी चूकना नहीं चाहिए। जो कुछ संयोगवश परिणाम देता है, वह कोई कला नहीं है। बुद्धिमत्ता एक कला है। उसे निश्चित सफलता की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो उससे लाभ उठा सकें और उन लोगों से दूर रहना चाहिए जिनके लिए अब कोई आशा नहीं बची है। फिर भी, उन्हें बहुत जल्दी नहीं छोड़ देना चाहिए। निराशाजनक परिस्थितियाँ असाधारण उपायों की माँग करती हैं।

    लेकिन मैं अभी तक अपने मार्सेलिनस के विषय में निराश नहीं हुआ हूँ। उसे अभी भी बचाया जा सकता है, परंतु केवल तभी जब तुरंत उसकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाया जाए। वास्तव में यह भी खतरा है कि वह अपने उद्धारक को ही अपने साथ नीचे खींच ले क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत प्रबल है। पर इस समय उसका झुकाव बुराई की ओर है। फिर भी, मैं इस जोखिम का सामना करने जाऊँगा। मैं उसे उसकी त्रुटियाँ दिखाने का साहस करूँगा। वह वही करेगा जो वह प्रायः करता है। वह हर बात को ऐसे मज़ाक में उड़ा देगा कि शोकग्रस्त व्यक्ति भी हँस पड़े। पहले वह स्वयं का उपहास करेगा और फिर मेरा। मैं जो कुछ कहने वाला हूँ, वह उसकी हर बात को टालने का प्रयत्न करेगा। वह हमारे दर्शन-सम्प्रदाय की छानबीन करेगा और हमारे दार्शनिकों पर आरोप लगाने के लिए आपत्तियाँ खोज निकालेगा—कहीं धन-लाभ, कहीं प्रेमिकाएँ, कहीं पेटूपन। वह मुझे एक दार्शनिक दिखाएगा जो व्यभिचार में पकड़ा गया हो, दूसरे को किसी भोजनालय में और तीसरे को राजमहल में।

    वह मुझे मार्कस लेपिडस के दार्शनिक सलाहकार एरिस्टो का उदाहरण देगा, जो अपनी पालकी में यात्रा करते हुए ही व्याख्यान दिया करते थे, क्योंकि वे उस समय का उपयोग अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए तैयार करने में करते थे। जब किसी ने पूछा कि वह किस दार्शनिक विद्यालय से संबंधित हैं तो स्कौरस ने मज़ाक में कहा, “निश्चित रूप से वह पेरिपैटेटिक नहीं हैं!” जब उस प्रतिष्ठित पुरुष जूलियस ग्रेकिनुस से उनके बारे में राय पूछी गई तो उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता। मुझे तो यह भी नहीं पता कि वह पैदल चलकर क्या करते हैं।” मानो उनसे किसी रथ-चालक के बारे में पूछा गया हो!

    वे सभी ढोंगी लोग, जो दर्शन का व्यापार करते हैं और जिनके लिए दर्शन को हाथ न लगाना ही अधिक सम्मानजनक होता, मार्सेलिनस मेरे विरुद्ध उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगा। लेकिन मैंने उसके उपहास को सहने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे मुझे हँसी में उड़ाने का प्रयास करे। संभव है कि मैं उसे रुला दूँ। और यदि वह हँसता ही रहे तो भी मैं अपने दुःखों के बीच यह सोचकर प्रसन्न होऊँगा कि उस पर पागलपन का कम-से-कम एक प्रसन्नचित्त रूप तो आया है। किन्तु ऐसी प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं टिकती। ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो लोग अभी उन्मत्त होकर हँस रहे होते हैं, थोड़ी ही देर बाद वही लोग उन्मत्त होकर विलाप भी कर रहे होते हैं।

    मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं उसके पास जाऊँगा और उसे दिखाऊँगा कि जब बहुत-से लोग उसे कम मूल्य का समझते थे, तब भी वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान था। भले ही मैं उसके दोषों को पूरी तरह काट न सकूँ, कम-से-कम उनके बढ़ने को रोक दूँगा। वे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, लेकिन कुछ समय के लिए शांत अवश्य हो जाएँगे। और संभव है कि वे सचमुच समाप्त ही हो जाएँ, यदि यह विराम एक आदत बन जाए। इसे तुच्छ नहीं समझना चाहिए। वास्तव में, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो तो रोग का अच्छा विराम भी स्वास्थ्य के समान ही माना जाता है।

    जब तक मैं उसके लिए तैयारी कर रहा हूँ, तब तक तुम्हारे लिए ये मेरे निर्देश हैं। तुममें क्षमता है। तुम समझते हो कि तुम कहाँ रहे हो और अब कहाँ हो और इससे यह भी अनुमान लगा सकते हो कि तुम किस दिशा में जा रहे हो। अपने आचरण को व्यवस्थित करो। अपने मनोबल को ऊँचा उठाओ। भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु के सामने दृढ़ता से खड़े रहो। उन लोगों की परवाह मत करो जो तुम्हें डराने का प्रयास करते हैं। यदि कोई व्यक्ति उस स्थान पर भीड़ से डरता हो जहाँ एक समय में केवल एक ही व्यक्ति निकल सकता है तो वह कितना मूर्ख दिखाई देगा, है न? तुम्हारी मृत्यु के विषय में भी यही बात लागू होती है। यद्यपि बहुत-से लोग तुम्हें मृत्यु की धमकी दे सकते हैं पर वे सब एक साथ तुम्हारे पास नहीं पहुँच सकते। प्रकृति ने इस व्यवस्था को इसी प्रकार बनाया है। एक ही व्यक्ति तुमसे प्राण छीन लेगा, ठीक वैसे ही जैसे एक ही व्यक्ति ने तुम्हें प्राण दिए थे।

    यदि तुममें कुछ भी लज्जा होती तो तुम मुझे इस अंतिम भुगतान से मुक्त कर देते। लेकिन चूँकि मेरा ऋण अब लगभग समाप्त होने को है, इसलिए मैं कंजूसी नहीं करूँगा—नहीं, मैं भी नहीं! जो कुछ तुम पर मेरा बकाया है, उसे चुका दूँगा। मैंने कभी भी जनसाधारण को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं की क्योंकि वे मेरे ज्ञान को स्वीकार नहीं करते और मुझे उस बात का कोई ज्ञान नहीं है जिसे वे स्वीकार करते हैं।

    “यह किसने कहा?” तुम पूछते हो, मानो तुम्हें यह न मालूम हो कि मैं अपनी पूँजी कहाँ से लाता हूँ। यह एपिक्यूरस ने कहा था। लेकिन पेरिपैटेटिक, अकादमिक, स्टोइक और सिनिक—सभी दार्शनिक सम्प्रदायों के लोग एक स्वर में तुम्हें यही बात कहेंगे। आख़िर ऐसा कौन-सा व्यक्ति है जो सद्गुण को प्रिय मानता हो और साथ ही जनसाधारण का प्रिय भी हो? लोक-प्रशंसा तो दुष्कर्मों में निपुणता के द्वारा प्राप्त की जाती है। तुम्हें स्वयं को उनके जैसा बनाना पड़ता है। जब तक वे तुम्हें अपने जैसा न पहचान लें, वे तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे। किन्तु महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम दूसरों को कैसे दिखाई देते हो बल्कि यह है कि तुम स्वयं को कैसे देखते हो। जब लोग निकृष्ट हों, तब उनकी प्रेम-प्राप्ति किसी ऐसे उपाय से नहीं की जा सकती जो स्वयं निकृष्ट न हो।

    तो फिर दर्शन से तुम्हें क्या लाभ मिलेगा जबकि उसका इतना सम्मान किया जाता है और वह सभी कलाओं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों से कहीं श्रेष्ठ है? बस यही कि तुम लोगों को प्रसन्न करने की अपेक्षा स्वयं को प्रसन्न करना अधिक पसंद करोगे, कि तुम अपने बारे में किए जाने वाले निर्णयों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता की चिंता करोगे, कि तुम देवताओं और मनुष्यों—दोनों के भय से मुक्त होकर जीवन बिताओगे और यह कि तुम या तो अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करोगे अथवा उनका अंत कर दोगे। इसके विपरीत, यदि मैं तुम्हें सामान्य भीड़ द्वारा अत्यधिक सराहा जाता देखूँ, यदि तुम्हारे आने पर वैसे ही शोर और तालियाँ गूँजें जैसी मूकाभिनय के प्रदर्शनों में गूँजती हैं, यदि नगर भर में स्त्रियाँ और बालक तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते फिरें तो मुझे तुम पर दया आएगी। और क्यों न आए? क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए तुमने कौन-सा मार्ग अपनाया है।

अभी के लिए विदा 

अपने दोषों को पहचानकर उपचार करने के संदर्भ में -- पत्र - 28 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा केवल तुम्हारे साथ ही हुआ है? क्या तुम्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि इतने व्यापक भ्रमण के बाद, इतने विविध स्थानों पर जाने के बाद भी, तुम अपने मन की उदासी और बोझिलता को दूर नहीं कर पाए? मानो यह कोई नई बात हो! तुम्हें स्थान नहीं, अपने मन को बदलना चाहिए। चाहे तुम समुद्र पार कर लो, चाहे — जैसा हमारे कवि वर्जिल ने कहा है, “भूमियाँ और नगर पीछे छूटते चले जाएँ”, फिर भी तुम्हारे दोष और कमज़ोरियाँ तुम्हारे साथ-साथ चलती रहेंगी, जहाँ कहीं भी तुम जाओगे।


By Adolph Tidemand 

    तुम्हारी ही तरह शिकायत करने वाले एक व्यक्ति से सुकरात (Socrates) ने कहा था, “तुम्हें यह देखकर आश्चर्य क्यों होता है कि यात्रा से तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ जबकि तुम स्वयं अपनी ही संगति में यात्रा कर रहे हो? जो चीज़ तुम्हारे मन पर बोझ बनी हुई है, वही तुम्हें घर से बाहर भी ले गई थी।” नए देशों से तुम्हें क्या लाभ होगा? नगरों और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किस काम आएगा? अंततः तुम्हारी यह सारी भागदौड़ व्यर्थ सिद्ध होगी। क्या तुम पूछते हो कि तुम्हारा यह पलायन क्यों निष्फल है? इसका कारण यह है कि तुम स्वयं को अपने साथ लिए फिरते हो।

    तुम्हें अपने मन पर पड़े हुए बोझ को उतार फेंकना होगा। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे तब तक कोई भी स्थान तुम्हें सुखद नहीं लगेगा। समझो कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति वैसी ही है जैसी वर्जिल (Virgil) ने सिबिल (भविष्यवक्ता स्त्री) के बारे में वर्णित की है। उस समय जब वह व्याकुल और उन्मत्त हो उठती है क्योंकि उसके भीतर एक विशाल शक्ति निवास कर रही होती है जो उसकी अपनी नहीं है, “वह भविष्यवक्ता उछलती है, तड़पती है और अपने हृदय से उस देवता को बाहर झटक देने का प्रयास करती है।” तुम भी उसी प्रकार भीतर से अशांत हो। तुम्हारा मन अनेक चिंताओं, इच्छाओं और व्याकुलताओं से भरा हुआ है। उनसे मुक्त हुए बिना न तो तुम्हें शांति मिलेगी न किसी स्थान में संतोष।

    तुम इधर-उधर भटकते फिरते हो, अपने ऊपर पड़े बोझ को झटककर उतार फेंकने की कोशिश में। परंतु जितना अधिक तुम भागते-दौड़ते हो, वह बोझ उतना ही अधिक भारी और कष्टदायक हो जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी जहाज़ का माल। यदि वह ठीक प्रकार से रखा गया हो तो जहाज़ पर उसका बहुत कम प्रभाव पड़ता है। लेकिन यदि वह इधर-उधर खिसकने लगे तो शीघ्र ही जहाज़ का एक भाग नीचे झुकने लगता है और वह संकट में पड़ जाता है। इसी प्रकार, तुम जो कुछ भी करते हो, वह अंततः तुम्हारे ही विरुद्ध काम करता है। तुम्हारी हर गतिविधि तुम्हें ही हानि पहुँचाती है क्योंकि तुम एक ऐसे व्यक्ति को झकझोर रहे हो जो पहले से ही बीमार है।

    लेकिन जब तुम्हारे भीतर जो कुछ विकृत और अशांत है, वह दूर हो जाएगा, तब हर स्थान-परिवर्तन तुम्हें सुखद लगने लगेगा। यदि तुम्हें पृथ्वी के सबसे दूरस्थ कोनों में भी निर्वासित कर दिया जाए तब भी तुम जिस किसी बर्बर या अपरिचित प्रदेश में पहुँचोगे, उसे अपने लिए एक आतिथ्यपूर्ण आश्रय के रूप में पाओगे। तुम कहाँ जाते हो, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि जाते समय तुम स्वयं कैसे व्यक्ति हो। इसी कारण हमें अपने मन को किसी एक स्थान से बाँधकर नहीं रखना चाहिए। हमें इस विश्वास के साथ जीना चाहिए, “मेरा जन्म केवल किसी एक स्थान के लिए नहीं हुआ है। यह समस्त संसार ही मेरी मातृभूमि है।” यदि यह बात तुम्हारे लिए स्पष्ट होती तो तुम्हें यह देखकर आश्चर्य न होता कि हर बार किसी स्थान से ऊब जाने पर दूसरे प्रदेश में जाने से भी तुम्हें कोई लाभ नहीं मिलता। यदि तुम सचमुच यह मानते कि प्रत्येक प्रदेश तुम्हारा अपना है तो जिस पहले स्थान पर तुम थे, उसी में संतुष्ट हो गए होते।

    वास्तव में, तुम यात्रा कम और भटकाव अधिक कर रहे हो। तुम एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जा रहे हो। फिर उसे छोड़कर किसी और स्थान पर पहुँच जाते हो। लेकिन जिस वस्तु की तुम खोज कर रहे हो अर्थात् अच्छा जीवन जीने की कला, वह तो हर स्थान पर प्राप्त की जा सकती है। क्या किसी नगर का बाज़ार (फोरम) जितना शोरगुल वाला कोई और स्थान हो सकता है? फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वहाँ भी शांतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है। फिर भी, यदि मुझे अपनी इच्छा से रहने का स्थान चुनने की स्वतंत्रता हो तो मैं उस मोहल्ले से भी दूर रहना पसंद करूँगा जहाँ से बाज़ार दिखाई देता हो। क्योंकि जिस प्रकार कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो सबसे सुदृढ़ और स्वस्थ शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, उसी प्रकार कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जो उस मन के लिए अनुकूल नहीं होते जो अच्छा तो है पर अभी शक्ति प्राप्त कर रहा है और पूर्णता तक नहीं पहुँचा है। अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि अच्छा जीवन केवल स्थान बदलने से नहीं मिलता। फिर भी वह ऐसे वातावरण का चयन करता है जो उसके चरित्र, आत्मसंयम और आंतरिक विकास के लिए सहायक हो। जो मन अभी साधना के मार्ग पर है, उसे अनावश्यक विकर्षणों और प्रलोभनों से बचाना भी आवश्यक है।

    मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो स्वयं को लहरों के बीच झोंक देते हैं, जो कोलाहल और हलचल भरे जीवन को उचित मानते हैं और प्रतिदिन कठिन परिस्थितियों से जूझने को ही आदर्श समझते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों को सहन तो कर लेगा पर उन्हें स्वयं नहीं चुनेगा। वह संघर्ष और युद्ध जैसी जीवन-स्थिति के बजाय शांत और स्थिर जीवन को प्राथमिकता देगा। यदि तुमने अपने स्वयं के दोषों से छुटकारा पा लिया है तो फिर दूसरों के दोषों से लगातार लड़ते रहने में बहुत लाभ नहीं है। कोई कह सकता है, “तीस अत्याचारियों ने सुकरात (Socrates) को गिरफ्तार कर लिया था। फिर भी वे उसके मनोबल को तोड़ नहीं सके।” तो इससे क्या अंतर पड़ता है कि मालिक या उत्पीड़क कितने हैं? दासता तो अंततः एक ही चीज़ है। जो व्यक्ति उस एक चीज़, दासता को तुच्छ समझना सीख लेता है, वह स्वतंत्र है, चाहे उसके चारों ओर अत्याचार करने वालों की कितनी ही बड़ी भीड़ क्यों न खड़ी हो।

    अब विदा लेने का समय आ गया है। लेकिन पहले मुझे अपना बंदरगाह-कर चुका देना चाहिए, “अपने दोषों की पहचान ही उपचार का प्रारंभ है।” मुझे लगता है कि यहाँ एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही है। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह गलत कर रहा है, वह स्वयं को सुधारने की इच्छा भी नहीं रखता। अपने को सुधारने से पहले तुम्हें अपनी गलती का एहसास होना चाहिए। कुछ लोग तो अपने दोषों पर गर्व करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोगों के मन में उपचार का कोई विचार होगा? निश्चय ही नहीं क्योंकि वे अपनी बुरी आदतों को ही गुण समझते हैं।

    अपने विरुद्ध यथासंभव कठोर आरोप लगाओ। फिर जाँच-पड़ताल करो। पहले अभियोग लगाने वाले की भूमिका निभाओ, फिर न्यायाधीश की, और अंत में पक्ष-वकील की। कभी-कभी स्वयं को दोषी ठहराओ!

अभी के लिए विदा 

Friday, 3 July 2026

मन की उत्कृष्टता के संदर्भ में -- पत्र - 27 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

“तुम कहते हो, ‘तुम मुझे उपदेश कैसे दे सकते हो? क्या तुमने पहले स्वयं को उपदेश दे लिया है? क्या तुमने अपने जीवन को पूरी तरह व्यवस्थित कर लिया है? क्या इसी कारण तुम्हारे पास दूसरों को सुधारने का समय है?’ मैं इतना पाखंडी नहीं हूँ कि स्वयं बीमार रहते हुए दूसरों को उपचार बताऊँ। नहीं, मैं भी मानो उसी रोगियों के वार्ड में पड़ा हूँ, जहाँ तुम हो। मैं तुमसे हमारी साझा बीमारी के बारे में बात कर रहा हूँ और उन उपायों को बाँट रहा हूँ जो हम दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए मेरी बात ऐसे सुनो जैसे मैं स्वयं से बात कर रहा हूँ। मैं तुम्हें अपने निजी कक्ष में आने दे रहा हूँ और तुम्हारे सामने खड़े रहते हुए स्वयं को ही निर्देश दे रहा हूँ।”


Art by Suza 

    मैं स्वयं से स्पष्ट और ऊँचे स्वर में कहता हूँ, “अपने बीते वर्षों की गिनती करो और तब तुम्हें लज्जा होगी कि आज भी तुम्हारी इच्छाएँ और संकल्प वही हैं जो बचपन में थे। अपने जीवन के अंतिम दिन के निकट आते समय स्वयं को यह उपहार दो कि तुम्हारे दोष तुमसे पहले ही मर जाएँ। उन उथल-पुथल मचाने वाली इच्छाओं को त्याग दो, जिन्होंने तुम्हें इतनी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया है। वे न केवल पहले से हानि पहुँचाती हैं बल्कि बाद में भी कष्ट देती हैं। जिस प्रकार अपराध किए जाने के बाद, भले ही वे पकड़े न जाएँ, उनका भय और चिंता मन से नहीं जाती, उसी प्रकार अनुचित इच्छाओं के समाप्त हो जाने पर भी उनका पश्चाताप बना रहता है। वे न तो स्थायी हैं, न विश्वसनीय। यदि वे कोई प्रत्यक्ष हानि न भी पहुँचाएँ तब भी वे क्षणभंगुर हैं।

    इसके बजाय चारों ओर देखो और ऐसे कल्याण की खोज करो जो बना रहे। ऐसा कोई कल्याण नहीं है, सिवाय उसके जिसे मन स्वयं अपने भीतर से खोज निकालता है। केवल सद्गुण ही स्थायी और निर्विघ्न आनंद प्रदान करता है। यदि कभी उस आनंद के मार्ग में कोई बाधा आ भी जाए तो वह केवल उतनी ही देर के लिए होती है जितनी देर बादल दिन के प्रकाश को ढँकते हैं, वे उसके नीचे से गुजर जाते हैं पर कभी उसे पराजित नहीं कर पाते।” तुम्हें वह आनंद कब प्राप्त होगा? अब तक तुम निष्क्रिय नहीं रहे हो पर अब अपनी गति बढ़ाओ। अभी बहुत काम शेष है। यदि तुम परिणाम चाहते हो तो आवश्यक ध्यान और परिश्रम तुम्हें स्वयं ही करना होगा। यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे किसी दूसरे को सौंपा जा सके।

    साहित्यिक कार्य का एक ऐसा प्रकार भी है जिसमें दूसरों की सहायता ली जा सकती है। मेरी स्मृति में एक व्यक्ति था जिसका नाम कैल्विसियस सबिनुस था। वह अत्यंत धनवान था पर उसका स्वभाव किसी मुक्तदास (पूर्व दास) जैसा था। मैंने कभी इतना अशिष्ट और भद्दे आचरण वाला व्यक्ति इतनी बड़ी संपत्ति का स्वामी नहीं देखा।

    उसकी स्मरणशक्ति इतनी कमजोर थी कि कभी वह यूलिसीस का नाम भूल जाता, कभी अकिलीस का तो कभी प्रियम का। इन व्यक्तियों को वह उतना ही जानता था जितना हम अपने बचपन से साथ रहे सेवकों को जानते हैं। वृद्ध नाम-घोषक (नॉमेनक्लेटर) जब किसी का नाम याद नहीं रख पाता तो वह कोई नाम गढ़ लेता है। पर जितने गलत नामों से कैल्विसियस ट्रोजनों और आखैयनों को पुकारता था, उतनी गलतियाँ शायद ही किसी ने की हों। फिर भी वह विद्वान दिखाई देना चाहता था। इसलिए उसने एक उपाय निकाला। उसने बहुत धन खर्च करके दास खरीद लिए। उनमें से एक को होमर का संपूर्ण काव्य कंठस्थ था, दूसरे को हेसियड का और नौ अन्य दासों को अलग-अलग गीतिकवियों की रचनाएँ याद कराई गई थीं। इस पर भारी खर्च होना स्वाभाविक था क्योंकि जो दास इस योग्य नहीं मिलते थे, उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित करवाया जाता था।

    जब उसने यह पूरा दल एकत्र कर लिया तो वह अपने भोज-मेहमानों को परेशान करने लगा। वे दास उसके पैरों के पास खड़े रहते थे। वह उनसे उद्धृत करने के लिए पंक्तियाँ पूछता रहता था। फिर भी, जबकि वे हर समय उसकी सहायता के लिए मौजूद रहते थे, वह अक्सर किसी वाक्य के बीच में ही रुक जाता और आगे नहीं बढ़ पाता।

    सैटेलियस क्वाड्राटुस नाम का एक व्यक्ति था। वह धनी और मूर्ख लोगों का लाभ उठाया करता था। वह उनकी खुशामद भी करता था। जैसा कि अक्सर ऐसे लोगों के साथ होता है, उनका उपहास भी उड़ाता था। उसी ने सबिनुस को यह विश्वास दिला दिया कि उसके भोजन परोसने वाले सेवक भी साहित्य के विद्वान होने चाहिए। जब सबिनुस ने कहा कि ऐसे दासों पर उसे प्रति व्यक्ति एक लाख सेस्टर्सेस खर्च करने पड़े हैं तो सैटेलियस ने उत्तर दिया, “इतने धन में तो तुम कई पुस्तकालय खरीद सकते थे।” लेकिन सबिनुस का मानना था कि उसके घर के किसी भी सदस्य के पास जो ज्ञान है, वह मानो उसका अपना ही ज्ञान है। फिर उसी सैटेलियस ने उसे कुश्ती सीखने के लिए भी प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जबकि सबिनुस शारीरिक रूप से दुर्बल, पीला और रोगग्रस्त था। जब सबिनुस ने कहा, “मैं यह कैसे कर सकता हूँ? मैं तो मुश्किल से जीवित हूँ।” सैटेलियस ने उत्तर दिया, “अरे, ऐसी बात मत कहो! क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि तुम्हारे पास कितने स्वस्थ और बलवान दास हैं?” मन की उत्कृष्टता न तो उधार ली जा सकती है और न खरीदी जा सकती है। मुझे तो लगता है कि यदि वह बिक्री के लिए उपलब्ध भी होती तब भी उसका कोई खरीदार न मिलता। लेकिन दुष्टता ऐसी चीज़ है जिसे लोग प्रतिदिन खरीदते रहते हैं।

    लेकिन पहले वह देन ले लो जो मैं तुम्हारा ऋणी हूँ और फिर विदा लो, “जो निर्धनता प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं के अनुसार स्वयं को ढाल लेती है, वही वास्तविक संपत्ति है।” एपिक्यूरस इस बात को अपने अनेक स्थानों पर बार-बार कहता है। परंतु किसी बात को तब तक बार-बार कहना अधिक नहीं कहलाता, जब तक वह भली-भाँति सीखी और आत्मसात न कर ली जाए। कुछ लोगों को केवल उपचार दिखा देना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके लिए उन उपचारों को बार-बार और दृढ़ता से मन में बैठाना पड़ता है।

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26

 प्रिय लूसीलियस 

कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका हूँ। अब मेरी आयु और निश्चित रूप से मेरा शरीर, किसी दूसरे नाम के योग्य हैं। क्योंकि 'वृद्ध' शब्द उस आयु के लिए है जो बहुत आगे बढ़ चुकी हो न कि उस अवस्था के लिए जिसमें शरीर टूटने-बिखरने लगे। इसलिए मुझे उन जर्जर लोगों में गिनो जो जीवन के अंतिम छोर के बहुत निकट पहुँच चुके हैं।

जैक्स लुईस डेविड द्वारा 

    फिर भी, मैं तुम्हारी उपस्थिति में स्वयं को धन्यवाद देता हूँ कि जहाँ मुझे अपने शरीर में दुर्बलता का अनुभव होता है वहीं अपने मन में मुझे किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता। केवल मेरे दोष ही बूढ़े हुए हैं। मेरे वे हिस्से जो उन दोषों की सेवा करते हैं। मेरा मन अब भी स्फूर्तिवान है और इस बात से प्रसन्न है कि उसे मेरे शरीर के साथ बहुत कम काम करना पड़ता है। उसने अपने बोझ का बड़ा भाग उतार फेंका है। वह मानो उछल-कूद कर रहा है और बुढ़ापे के विषय में मुझसे वाद-विवाद करता है। उसका कहना है कि यही उसका उत्कर्षकाल है। आओ, उसकी बात पर विश्वास करें और उसे उसके स्वाभाविक एवं उचित लाभों का पूरा उपयोग करने दें।

    मेरा मन मुझसे कहता है कि मैं इस विषय पर विचार करूँ और यह समझूँ कि मेरी शांति तथा संयमित जीवन-शैली में कितना योगदान बुद्धि का है और कितना मेरी आयु का। साथ ही, मुझे सावधानी से यह भेद करना चाहिए कि कौन-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं कर नहीं सकता और कौन-सी ऐसी हैं जिन्हें मैं करना ही नहीं चाहता। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ऐसी बात हो जिसे न कर पाने पर मुझे प्रसन्नता होती है तो मैं उसे ऐसी चीज़ मानूँ जिसे मैं करना ही नहीं चाहता। शिकायत करने की आखिर क्या बात है? यदि वह सब, जिसका समाप्त होना आवश्यक था, वास्तव में समाप्त हो गया है तो इसमें समस्या ही क्या है?

    “यह तो बहुत बड़ी समस्या है,” तुम कहते हो, “कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे मुरझाए और नष्ट हो जाए और यदि ठीक-ठीक कहूँ तो पिघलता चला जाए। क्योंकि हम एक ही झटके में धराशायी नहीं होते; बल्कि हम थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हैं, क्योंकि हर दिन हमारी शक्ति का कुछ अंश छीन लेता है।” तो यदि हमारा स्वभाव इसी प्रकार धीरे-धीरे अपने अंत की ओर ढल रहा है तो क्या इससे बेहतर कोई मार्ग हो सकता है? ऐसा नहीं कि अचानक आघात से या जीवन से तत्काल विदा हो जाना कोई बुरी बात है किन्तु यह तो सबसे सहज मार्ग है, बस चुपचाप फिसलते हुए चले जाना।

    जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं स्वयं को ऐसे परखता हूँ मानो परीक्षा की घड़ी निकट आ रही हो, मानो वह दिन सामने खड़ा हो जो मेरे समस्त वर्षों का निर्णय करने वाला है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “अब तक मेरे शब्द और कर्म कुछ भी सिद्ध नहीं करते। वे तो साहस के केवल छोटे और भ्रामक प्रमाण हैं, जो बहुत-सी डींगों और खोखली बातों में लिपटे हुए हैं। मृत्यु ही मुझे बताएगी कि मैंने वास्तव में कितनी प्रगति की है।” इसीलिए मैं निडर होकर उस दिन की तैयारी करता हूँ जब सारे छल और सारे मुखौटे उतर जाएँगे और मैं स्वयं अपना न्याय करूँगा। क्या यह केवल साहसपूर्ण बातें हैं या मैं वास्तव में वही कहता हूँ जो सोचता हूँ? भाग्य के विरुद्ध जो चुनौतीपूर्ण शब्द मैंने कहे थे, क्या वे सचमुच वास्तविक थे या वे केवल रंगमंच का अभिनय थे—सिर्फ़ एक भूमिका निभाना?

    “दूसरों के आकलनों को दूर फेंक दो। वे हमेशा अविश्वसनीय और परस्पर विरोधी होते हैं। जीवनभर चलने वाले अध्ययन-कार्यक्रमों को भी छोड़ दो क्योंकि शीघ्र ही, अब किसी भी क्षण, मृत्यु तुम्हारा निर्णय करने वाली है। मेरा आशय यही है। व्याख्यान, विद्वत्-गोष्ठियाँ, दार्शनिकों की शिक्षाओं से चुने गए कथन और शिक्षित लोगों की बातचीत—ये सब मन की वास्तविक शक्ति को प्रकट नहीं करते। क्योंकि वाणी तो वहाँ भी निर्भीक होती है जहाँ बोलने वाला व्यक्ति अत्यन्त भयभीत होता है। तुमने वास्तव में क्या प्राप्त किया है, यह तभी प्रकट होगा जब तुम अपनी अंतिम साँस लोगे। मैं इस निर्णय को स्वीकार करता हूँ, उसके न्याय से मैं तनिक भी नहीं डरता।”

    ये बातें मैं अपने आप से कहता हूँ लेकिन मान लो कि मैंने इन्हें तुमसे भी कही हैं। तुम मुझसे युवा हो पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है? वर्षों का वितरण किसी निश्चित हिस्से या कोटे के अनुसार नहीं किया जाता। यह जानने का कोई उपाय नहीं कि मृत्यु किस मोड़ पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए तुम्हें हर मोड़ पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

    अच्छा, मैं यहीं रुकना चाहता था। मेरा हाथ पत्र समाप्त करने के लिए हस्ताक्षर करने ही वाला था। लेकिन मुझे हिसाब चुकता करना है और इस पत्र को उसकी यात्रा-व्यय राशि भी देनी है। मान लो कि मैं यह न बताऊँ कि मैं अपना ऋण कहाँ से ले रहा हूँ। तुम जानते ही हो कि मैं किसकी धन-पेटी का उपयोग करता हूँ। मुझे थोड़ा समय दो। भुगतान घर से आ जाएगा तब तक के लिए यह उधार एपिक्यूरियस देगा। वह कहता है, “मृत्यु का अभ्यास करो।” यदि इस विचार को अधिक पूर्ण रूप में बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए, “मृत्यु को भली-भाँति समझना और सीख लेना एक उत्कृष्ट बात है।”

    शायद तुम सोचते हो कि ऐसी चीज़ सीखना समय की बर्बादी है जिसका उपयोग तुम्हें केवल एक ही बार करना होगा। लेकिन यही तो कारण है कि हमें उसका अभ्यास करना चाहिए। यदि हम यह परख ही नहीं सकते कि हमने उसे सीखा है या नहीं, तो हमें उसे निरंतर सीखते रहना चाहिए। “मृत्यु का अभ्यास करो”, जो यह कहता है, वह वास्तव में हमें स्वतंत्रता का अभ्यास करने को कहता है। जिसने मृत्यु को सीख लिया, उसने दासता को भुला दिया। क्योंकि मृत्यु सभी शक्तियों से ऊपर है और निस्संदेह उन सबकी पहुँच से बाहर है। मृत्यु को कारागार, बेड़ियों या कैदखाने से क्या लेना-देना? उसका द्वार तो सदा खुला रहता है। केवल एक ही जंजीर है जो हमें बाँधे रखती है—जीवन के प्रति हमारा मोह। यह सच है कि हम उसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते। फिर भी हमें उसे कम अवश्य करना चाहिए ताकि जब परिस्थितियाँ हमसे कुछ माँगें तो कोई चीज़ हमें रोक न सके और न ही हमें उस कार्य को तुरंत करने के लिए तैयार होने से वंचित करे जिसे किसी न किसी दिन करना ही है।

हर कार्य इस प्रकार करो मानो एपिक्यूरस तुम्हें देख रहा हो-- पत्र - 25 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

जहाँ तक हमारे उन दो मित्रों का संबंध है, हमें प्रत्येक के साथ अलग ढंग से व्यवहार करना चाहिए। एक के दोषों को दूर करने की आवश्यकता है जबकि दूसरे के दोषों को तोड़कर समाप्त करने की। मैं पूरी स्पष्टवादिता का प्रयोग करूँगा, यदि मैं उसे अप्रसन्न नहीं करता तो मैं उससे प्रेम नहीं करता।

मॉर्गन श्वेतज़र द्वारा 

    “क्या?” तुम कहते हो। “क्या तुम चालीस वर्ष के एक शिष्य को अपने संरक्षण में लेने का इरादा रखते हो? उसकी आयु का विचार करो जो अब कठोर हो चुकी है और जिसे संभालना कठिन है। उसे फिर से नहीं ढाला जा सकता। वस्तुओं को तभी आकार दिया जाता है जब वे नरम हों।” मुझे नहीं पता कि मैं सफल होऊँगा या नहीं लेकिन मैं उसके प्रति अपने कर्तव्य में असफल होने की अपेक्षा अपने प्रयास में असफल होना अधिक पसंद करूँगा। तुम्हें भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। यदि तुम असंयम के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े हो जाओ और उन्हें बार-बार उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने तथा कुछ सहने के लिए बाध्य करो तो लंबे समय से बीमार लोग भी स्वस्थ किए जा सकते हैं।

    मुझे दूसरे व्यक्ति के बारे में भी बहुत अधिक विश्वास नहीं है सिवाय इस बात के कि वह अभी भी अपने दुष्कर्मों पर लज्जित हो जाता है। हमें उस लज्जा-बोध का पोषण करना चाहिए। एक बार वह उसके मन में दृढ़ हो जाए तो आशा के लिए कुछ स्थान रहेगा। चूँकि वह इस मामले में पुराना अभ्यस्त है, मुझे लगता है कि हमें उसके साथ पहले वाले की अपेक्षा अधिक कोमलता से व्यवहार करना चाहिए ताकि वह स्वयं से ही निराश न हो जाए। उसके पास जाने का इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा, जितना अभी है, जब वह एक शांत अवधि में है, जब उसमें एक सुधरे हुए चरित्र की झलक दिखाई देती है। उसकी यह शांति दूसरों को धोखा दे चुकी है पर मुझे नहीं। मैं अपेक्षा करता हूँ कि उसके दोष फिर लौटेंगे और पहले से अधिक प्रबल रूप में लौटेंगे क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे समाप्त नहीं हुए हैं बल्कि केवल कुछ समय के लिए दबे हुए हैं। मैं इस विषय पर कुछ दिन लगाऊँगा और पता करूँगा कि कुछ किया जा सकता है या नहीं।

    जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, अपना साहस दिखाओ। जैसा कि तुम दिखाते भी हो और अपना बोझ हल्का करो। जिन वस्तुओं के हम स्वामी हैं उनमें से एक भी आवश्यक नहीं है। हमें केवल प्रकृति के नियम की ओर लौटना है और तब संपदा हमारे लिए तैयार और उपलब्ध मिलेगी। जिसकी हमें आवश्यकता है, वह या तो निःशुल्क है या बहुत सस्ता। रोटी और पानी ही वे चीज़ें हैं जिनकी माँग प्रकृति करती है। इनके लिए कोई भी इतना गरीब नहीं होता। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को इन्हीं तक सीमित कर लेता है, वह सुख-समृद्धि में जुपिटर के साथ भी प्रतिस्पर्धा कर सकता है, जैसा कि एपिक्यूरस कहता है। और एपिक्यूरस की बात चली है तो मैं इस पत्र में उसका एक सूत्र-वाक्य भी संलग्न कर रहा हूँ। वह कहता है, “हर कार्य इस प्रकार करो मानो एपिक्यूरस तुम्हें देख रहा हो।”

    निस्संदेह, अपने ऊपर निगरानी रखना और किसी ऐसे व्यक्ति को आदर्श बनाना लाभदायक है जिसकी उपस्थिति तुम्हारे आचरण और योजनाओं में अंतर ला सकती हो। और निश्चय ही यह कहीं अधिक महान है कि तुम इस प्रकार जीवन बिताओ मानो कोई श्रेष्ठ पुरुष सदा तुम्हारे सामने उपस्थित हो और तुम्हें देख रहा हो। लेकिन मैं इससे भी कम पर संतुष्ट हूँ। तुम्हारा प्रत्येक कार्य इस प्रकार हो मानो कोई उसे देख रहा हो। एकांत हमारे भीतर हर प्रकार के दोष को प्रोत्साहित करता है। जब तुम इतनी प्रगति कर लो कि स्वयं अपने प्रति भी श्रद्धा रखने लगो, तब तुम अपने मार्गदर्शक को विदा कर सकते हो लेकिन तब तक अपने आपको किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के संरक्षण में रखो। वह कैटो हो या स्किपियो या लेलियस या कोई और ऐसा व्यक्ति, जिसकी उपस्थिति में अत्यन्त दुष्ट स्वभाव के लोग भी अपने दोषों को दबा लें। इसी बीच, स्वयं को ऐसा व्यक्ति बनाने का प्रयास करो जिसकी संगति में तुम स्वयं भी कोई गलत काम करने का साहस न कर सको।

    जब तुम ऐसा कर लोगे और अपनी ही दृष्टि में कुछ सम्मान प्राप्त करने लगोगे तब मैं तुम्हें वह करने की अनुमति देना शुरू करूँगा जिसकी सलाह एपिक्यूरस भी देता है, “विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ, जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो।”

    तुम्हें स्वयं को बहुत से लोगों से अलग रखना चाहिए, जब तक कि तुम उस स्थिति में न पहुँच जाओ जहाँ अकेले रहना तुम्हारे लिए सुरक्षित हो। उनमें से प्रत्येक को अलग-अलग देखकर विचार करो। ऐसा एक भी नहीं है जो किसी और की संगति की अपेक्षा अपनी ही संगति में अधिक अच्छा हो। विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो। बशर्ते कि तुम एक अच्छे, शांत और संयमी व्यक्ति हो। अन्यथा तुम्हें अपने आप से दूर होकर भीड़ में चले जाना चाहिए। जहाँ तुम अभी हो, वहाँ तुम एक बुरे आदमी के बहुत निकट हो।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 24 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम लिखते हो कि तुम्हें उस मुकदमे के परिणाम की चिंता है जिसे तुम्हारे किसी शत्रु के क्रोध ने तुम्हारे विरुद्ध खड़ा कर दिया है। तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम अपना ध्यान सबसे अच्छे संभावित परिणाम पर केंद्रित करो और आशावादी अपेक्षाओं से अपने मन को शांत करो। आख़िर भविष्य की परेशानियों को पहले ही क्यों झेलना? भविष्य के भय से वर्तमान को नष्ट करने का क्या लाभ? जब कष्ट वास्तव में आएँगे, तब उन्हें सहने का समय होगा। निश्चय ही यह मूर्खता है कि कोई व्यक्ति अभी से दुखी हो जाए केवल इसलिए कि वह बाद में दुखी हो सकता है।


By Suza 

    लेकिन मैं तुम्हें मन की शांति की ओर एक अलग मार्ग से ले जाऊँगा। यदि तुम चिंता से मुक्त होना चाहते हो तो जिस बात के होने से तुम डरते हो, उसे अपने मन में निश्चित रूप से होने वाली घटना मान लो। जो भी वह संभावित बुरी घटना हो, उसका मन ही मन आकलन करो और इस प्रकार अपने भय का सही मूल्यांकन करो। तब तुम्हें शीघ्र ही यह समझ में आ जाएगा कि जिससे तुम डरते हो, वह या तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है या फिर उसका प्रभाव अधिक समय तक रहने वाला नहीं है।

    और तुम्हें साहस देने के लिए मुझे उदाहरण खोजने में भी अधिक समय नहीं लगाना पड़ेगा। हर युग ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। तुम अपनी स्मृति को चाहे सार्वजनिक जीवन की घटनाओं की ओर मोड़ो या निजी जीवन की ओर। तुम्हें ऐसे लोग याद आ जाएँगे जो या तो उच्च चरित्र वाले थे या असाधारण साहस से संपन्न थे। मान लो कि तुम्हें दोषी ठहरा दिया जाए, तब तुम्हारे साथ इससे अधिक बुरा क्या हो सकता है कि तुम्हें निर्वासित कर दिया जाए या जेल में डाल दिया जाए? और क्या इससे भी अधिक भयावह कुछ है कि तुम्हें जला दिया जाए या मृत्यु दे दी जाए? इनमें से प्रत्येक परिस्थिति पर अलग-अलग विचार करो और उन लोगों को याद करो जिन्होंने इन बातों को बहुत महत्व नहीं दिया। तुम्हें उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी बल्कि तुम्हारे पास चुनने के लिए अनेक उदाहरण होंगे। रुटिलियस ने अपने दोषसिद्ध होने को इस प्रकार सहन किया मानो उसे केवल इस बात का दुख हो कि उसका गलत मूल्यांकन किया गया था। मेटेलस ने निर्वासन को साहसपूर्वक सहा और रुटिलियस ने तो उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। जहाँ मेटेलस ने अपने देश के हित में वापस लौटना सुनिश्चित किया, वहीं रुटिलियस ने लौटने से इनकार कर दिया ताकि वह सुला का विरोध न करे क्योंकि उस समय सुला का कोई विरोध नहीं कर रहा था। सुकरात ने जेल में रहते हुए भी लोगों को शिक्षा देना जारी रखा। और यद्यपि वहाँ ऐसे लोग मौजूद थे जो उसके भागने की व्यवस्था कर सकते थे, उसने जेल छोड़ने से इनकार कर दिया। वह वहीं रुका रहा क्योंकि उसका उद्देश्य मानव जाति के दो सबसे बड़े भय— मृत्यु और कारावास, को समाप्त कर देना था।

    म्यूशियस ने अपना हाथ स्वयं अग्नि की लपटों में रख दिया। जलना अपने आप में ही एक कठिन बात है लेकिन जब कोई स्वयं ही अपने को जलाने का कारण बने, तब वह और भी अधिक कठिन हो जाता है। देखो, एक ऐसा व्यक्ति, जिसने कोई विशेष शिक्षा नहीं पाई थी, जिसे मृत्यु या पीड़ा के विषय में कोई दार्शनिक उपदेश नहीं मिला था और जो केवल एक सैनिक की कठोरता से सुसज्जित था, अपने असफल प्रयास के लिए स्वयं को दंड दे रहा था। वह अपनी दाहिनी हथेली को शत्रु की अंगीठी पर जलते हुए देखता रहा। उसका मांस हड्डियों से अलग होता जा रहा था। फिर भी उसने अपना हाथ नहीं हटाया, जब तक कि शत्रु ने स्वयं उसके नीचे की आग बुझा नहीं दी। उस शिविर में वह और भी कई ऐसे कार्य कर सकता था जो अधिक सुखद होते लेकिन उससे अधिक साहसपूर्ण कोई कार्य नहीं हो सकता था। देखो, संकटों का सामना करने में सद्गुण (वीरता) कितनी अधिक प्रबल होती है जबकि उन्हें दूसरों पर थोपने में क्रूरता उतनी प्रबल नहीं होती। पोर्सेन्ना के लिए म्यूशियस को उसकी हत्या का प्रयास करने के अपराध के लिए क्षमा कर देना उतना कठिन नहीं था, जितना म्यूशियस के लिए अपने असफल हो जाने पर स्वयं को क्षमा करना कठिन था।

    “तुम कहोगे, ‘ये कथाएँ तो सभी दार्शनिक विद्यालयों में बार-बार सुनाई जाती हैं। जैसे ही तुम मृत्यु को तुच्छ बताने लगोगे, तुम मुझे कैटो की कहानी सुनाने लगोगे।’” और मैं कैटो की बात क्यों न करूँ? उसकी अंतिम रात की बात, जब वह अपने सिरहाने रखी तलवार के पास बैठकर प्लेटो की पुस्तक पढ़ रहा था। अपने अंतिम क्षण के लिए उसने दो ही वस्तुएँ चुनी थीं—एक, ताकि वह मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार हो सके और दूसरी, ताकि यदि आवश्यक हो तो वह उसे प्राप्त भी कर सके। जब उसने अपने सभी कार्यों को, जितना कि उस टूटी-बिखरी और निराशाजनक परिस्थिति में संभव था, व्यवस्थित कर लिया, तब उसने निश्चय किया कि वह ऐसा कदम उठाएगा जिससे किसी व्यक्ति को न तो कैटो की हत्या करने का अवसर मिले और न ही उसे बचाने का। उसने अपनी तलवार निकाली, जिसे उसने उस दिन तक किसी भी हिंसक कार्य से कलंकित नहीं होने दिया था और कहा, “हे भाग्य! मेरे सभी प्रयासों का विरोध करके भी तुमने वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। अब तक मैं अपनी स्वतंत्रता के लिए नहीं बल्कि अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ता रहा हूँ। मेरा उद्देश्य स्वतंत्र होकर जीना नहीं था बल्कि स्वतंत्र लोगों के बीच जीना था। अब जबकि मानवता के लिए वह आशा नष्ट हो चुकी है तो कैटो को सुरक्षित स्थान पर जाने दो।” यह कहकर उसने अपनी देह पर वह प्रहार किया जो उसके लिए मृत्यु का कारण बना। जब चिकित्सकों ने उसके घाव पर पट्टी बाँध दी, तब उसके शरीर में रक्त भी बहुत कम बचा था और शक्ति भी परन्तु उसका साहस और आत्मबल पहले जितना ही अडिग था। अब वह केवल सीज़र के प्रति ही नहीं बल्कि स्वयं अपने प्रति भी कठोर था। उसने अपने नंगे हाथ घाव के भीतर डाल दिए और उस महान आत्मा को, जो किसी भी प्रकार के प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, मुक्त कर दिया; उसने उसे केवल जाने नहीं दिया बल्कि मानो बलपूर्वक अपने शरीर से बाहर निकाल दिया।

    मैं इन उदाहरणों को केवल साहित्यिक प्रदर्शन के लिए नहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ बल्कि तुम्हें उन बातों से न डरने के लिए प्रेरित कर रहा हूँ जो सबसे अधिक भयावह प्रतीत होती हैं। और यह मेरे लिए अधिक सरल होगा यदि मैं तुम्हें यह दिखा सकूँ कि केवल महान और शक्तिशाली पुरुषों ने ही उस क्षण को तुच्छ नहीं समझा, जब आत्मा शरीर को छोड़ती है बल्कि ऐसे लोग भी, जो अन्य बातों में साधारण या कमजोर थे, इस विषय में सबसे वीर पुरुषों के समान साहस दिखा चुके हैं। उदाहरण के लिए, ग्नियस पोम्पेई के श्वसुर स्किपियो को लो। प्रतिकूल हवा के कारण उन्हें अफ्रीका की ओर लौटना पड़ा और जब उन्होंने देखा कि उनका जहाज़ शत्रुओं के हाथ में पड़ चुका है तो उन्होंने अपनी तलवार अपने शरीर में भोंक ली। जब लोगों ने पूछा कि सेनापति कहाँ हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, “सेनापति कुशल हैं।” इस एक वाक्य ने उन्हें उनके पूर्वजों के समकक्ष ला खड़ा किया और अफ्रीका में स्किपियो वंश के लिए नियत गौरवशाली प्रतिष्ठा को बनाए रखा। कार्थेज को जीतना एक महान उपलब्धि थी लेकिन मृत्यु पर विजय प्राप्त करना उससे भी बड़ी उपलब्धि थी। “सेनापति कुशल हैं।” एक सेनापति को और कैसे मरना चाहिए था? और कैटो के सेनापति को भला और कैसे मरना चाहिए था?

    मैं तुम्हें इतिहास की पुस्तकों की ओर वापस नहीं भेज रहा हूँ। न ही मैं हर युग से उन लोगों के उदाहरण एकत्र करने जा रहा हूँ जिन्होंने मृत्यु को तुच्छ समझा था, यद्यपि ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। अपने ही समय की ओर देखो। उस समय की ओर जिसे हम अत्यन्त आलसी और विलासप्रिय कहा करते हैं। वह भी हमें हर पद, हर वर्ग और हर आयु के ऐसे लोग दिखा देगा जिन्होंने मृत्यु को अपनाकर अपनी विपत्तियों का अंत कर लिया। मुझ पर विश्वास करो, लूसीलियस! मृत्यु में इतना कम भय है कि उसकी कृपा से अन्य कोई भी वस्तु भयावह नहीं रह जाती। इसलिए अपने शत्रु के अभियोग को बिना विचलित हुए सुनो। तुम्हारा निर्मल अंतःकरण तुम्हें आत्मविश्वास रखने का पर्याप्त कारण देता है। फिर भी, क्योंकि परिणाम पर अनेक बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है इसलिए सर्वोत्तम की आशा रखो, किन्तु स्वयं को सबसे बुरे के लिए भी तैयार रखो।

    सबसे बढ़कर यह याद रखो कि अपने मन की घबराहट और हलचल को दूर करो। प्रत्येक वस्तु के भीतर झाँककर देखो, तब तुम समझ जाओगे कि तुम्हारे मामलों में भय करने योग्य कोई चीज़ नहीं है, सिवाय स्वयं भय के। तुम देखते हो कि बच्चे उन लोगों से, जिन्हें वे प्यार करते हैं, जानते हैं और जिनके साथ खेलते हैं, बहुत डर जाते हैं यदि वे उन्हें मुखौटा पहने हुए देखें। ठीक यही बात हमारे साथ भी होती है, हम केवल थोड़ा बड़े बच्चे हैं। लेकिन हमारे मामले में केवल लोगों के चेहरे से ही नहीं बल्कि घटनाओं से भी मुखौटा हटाने की आवश्यकता है ताकि उनका वास्तविक स्वरूप हमारे सामने प्रकट हो सके।

    “तुम मुझे तलवारों, मशालों और अपने पीछे चलने वाले जल्लादों का यह प्रदर्शन क्यों दिखा रहे हो? इस दिखावे को दूर हटाओ। जिसे तुम मूर्खों को डराने के लिए अपने सामने खड़ा करते हो। तुम तो केवल मृत्यु हो, जिसे हाल ही में मेरे दास और यहाँ तक कि मेरी दासी भी तुच्छ समझ चुके हैं। तुम फिर से मेरी आँखों के सामने कोड़ों और यातना-यंत्रों का यह विशाल प्रदर्शन क्यों कर रहे हो? शरीर के प्रत्येक जोड़ को पीड़ा देने के लिए विशेष रूप से बनाए गए इन उपकरणों का क्या प्रयोजन है? मनुष्य को टुकड़ा-टुकड़ा करके तोड़ने वाली इन असंख्य युक्तियों का क्या अर्थ है? अपने इन भयावह उपकरणों को एक ओर रख दो। इन कराहों को, इन चीखों को और कोड़ों से निकलवाई गई इन तीखी पुकारों को शांत होने दो। तुम तो केवल पीड़ा हो जिसे वहाँ वह गठिया से पीड़ित व्यक्ति तुच्छ समझता है, जिसे अपच का रोगी अपने विलासपूर्ण भोजनों के बीच सह लेता है और जिसे एक साधारण युवती प्रसव के समय सहन कर लेती है। यदि मैं तुम्हें सह सकता हूँ तो तुम तुच्छ हो। यदि मैं तुम्हें सह नहीं सकता तो तुम अल्पकालिक हो।”

    इन शब्दों पर अपने मन में गहराई से विचार करो। तुम इन्हें अनेक बार सुन चुके हो और स्वयं भी कह चुके हो। लेकिन जो कुछ तुमने सुना और कहा है, वह वास्तव में सत्य है या नहीं, यह तुम्हें अपने आचरण और परिणामों से सिद्ध करना होगा। क्योंकि हमारे विरुद्ध सबसे लज्जाजनक आरोप यही है कि हम दर्शन की बातें तो करते हैं पर उसके अनुसार आचरण नहीं करते। तो फिर! मृत्यु, निर्वासन और पीड़ा तुम्हारे सामने खड़े हैं। क्या तुम्हें पहली बार इसका पता चला है? तुम तो इन्हीं बातों का सामना करने के लिए जन्मे हो। जो कुछ भी घटित हो सकता है उसके बारे में ऐसे विचार करो मानो वह निश्चित रूप से घटित होने वाला है।

    मुझे पता है कि जिन बातों की मैं तुम्हें सलाह दे रहा हूँ उन्हें तुम पहले ही कर चुके होगे। अब मेरी आगे की सलाह यह है कि इस मामले की चिंता को अपने मन पर इतना हावी मत होने दो कि वह तुम्हारी बुद्धि और शक्ति को कुंठित कर दे। यदि तुम ऐसा करोगे तो जब स्वयं को संभालने और सक्रिय करने का समय आएगा, तब तुम्हारे पास कम ऊर्जा होगी। अपने विचारों को अपनी व्यक्तिगत परिस्थिति से हटाकर समस्त मानव जाति की स्थिति की ओर मोड़ो। अपने आप से कहो कि यह तुच्छ शरीर नश्वर है और दुर्बल भी। इसे केवल अन्यायपूर्ण आक्रमणों या अधिक शक्तिशाली शत्रुओं से ही पीड़ा का भय नहीं है। इसके अपने सुख भी अंततः कष्ट में बदल जाते हैं। भोज इसे अपच का शिकार बना देते हैं। मद्यपान की महफ़िलें शरीर में कंपन और नसों की शिथिलता उत्पन्न कर देती हैं। वासनाएँ हाथों-पैरों तथा शरीर के सभी जोड़ों में विकृतियाँ और रोग पैदा कर देती हैं।
   
     “मैं निर्धन हो जाऊँगा।” तो मैं अनेक लोगों में से एक हो जाऊँगा। “मुझे निर्वासित कर दिया जाएगा।” तो मैं अपने निर्वासन के स्थान को ही अपना जन्मस्थान मान लूँगा। “मुझे बेड़ियों में जकड़ दिया जाएगा।” तो क्या हुआ? क्या मैं अभी वास्तव में बंधनों से मुक्त हूँ? प्रकृति ने तो पहले ही मुझे मेरे इस भारी शरीर के बंधन में जकड़ रखा है। “मैं मर जाऊँगा।” तुम वास्तव में यह कह रहे हो कि मैं अब बीमारी, कारावास और मृत्यु के भय के अधीन नहीं रहूँगा।
    
    मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि यहाँ तुम्हें एपिक्यूरस का वह गीत सुनाने लगूँ कि नरक का भय निरर्थक है,  कि इक्सियोन किसी चक्र पर नहीं घूम रहा, न ही सिसिफस किसी चट्टान को पहाड़ी पर चढ़ाने के लिए निरंतर धकेल रहा है और न ही किसी मनुष्य की अंतड़ियाँ प्रतिदिन खाई जाती हैं और फिर से उत्पन्न हो जाती हैं। कोई भी इतना बच्चा नहीं है कि सेर्बेरस, अंधकार या भूत-प्रेत जैसी कंकालाकार आकृतियों से डर जाए। मृत्यु या तो हमें पूरी तरह समाप्त कर देती है या हमें मुक्त कर देती है। यदि वह हमें मुक्त करती है तो इस शरीर के बोझ से छुटकारा पाने के बाद हमारे लिए बेहतर चीज़ें प्रतीक्षारत हैं। और यदि वह हमें समाप्त कर देती है तो फिर हमारे लिए कुछ भी शेष नहीं रहता तब न अच्छाइयाँ बचती हैं और न बुराइयाँ।
    
    मुझे इस अवसर पर तुम्हारी अपनी कविता की याद दिलाने दो और सबसे पहले तुम्हें यह सलाह देने दो कि यह मानो कि तुमने उसे केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए भी लिखा था। एक बात कहना और दूसरी बात सोचना लज्जाजनक है लेकिन एक बात लिखना और दूसरी बात सोचना उससे भी अधिक लज्जाजनक है। मुझे याद है कि एक बार तुमने इस विचार का विस्तार किया था, “हम मृत्यु से एक ही बार में नहीं मिलते। हम उसकी ओर थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते हैं।” हम प्रतिदिन मरते हैं क्योंकि हर दिन हमारे जीवन का कोई न कोई भाग हमसे छिन जाता है। यहाँ तक कि जब हम बढ़ रहे होते हैं तब भी हमारा जीवन घट रहा होता है। हमने अपना शैशव खो दिया, फिर बचपन, फिर युवावस्था। कल तक का सारा समय बीतने के साथ ही हमसे छिन गया और आज का दिन भी बीतते-बीतते मृत्यु के हिस्से में चला जाता है। जैसे जलघड़ी केवल अपनी अंतिम बूँद से ही खाली नहीं होती बल्कि उन सभी बूँदों से भी जो उससे पहले टपक चुकी होती हैं उसी प्रकार हमारे जीवन का अंतिम क्षण ही वह समय नहीं है जब हम मरते हैं। वह तो केवल वह क्षण है जब हमारा मरना पूरा होता है। उस समय हम मृत्यु तक पहुँचते हैं लेकिन वहाँ पहुँचने की यात्रा हम बहुत पहले से करते आ रहे होते हैं। जब तुमने अपनी स्वाभाविक प्रभावशाली शैली में इन सब बातों को समझाया था। तुम सदैव ही एक उत्कृष्ट वक्ता रहे हो किन्तु सत्य को व्यक्त करते समय सबसे अधिक प्रभावशाली होते हो—तब तुमने कहा था, "मृत्यु कोई एक घटना नहीं है। जो मृत्यु हमें अपने साथ ले जाती है वह केवल हमारी अंतिम मृत्यु होती है।

    मैं चाहूँगा कि तुम मेरा पत्र पढ़ने के बजाय स्वयं को पढ़ो। तब तुम्हारे लिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस मृत्यु से हम डरते हैं वह हमारी अंतिम मृत्यु तो है किन्तु हमारी एकमात्र मृत्यु नहीं है।

    मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी नज़र कहाँ है! तुम यह जानने की कोशिश कर रहे हो कि मैंने इस पत्र में क्या छिपाकर रखा है। किसी लेखक का कौन-सा प्रेरणादायक कथन या कौन-सा उपयोगी उपदेश। मैं तुम्हें उसी विषय से एक बात भेजता हूँ जो अभी मेरे हाथ में है। एपिक्यूरस उन लोगों की निंदा करता है जो मृत्यु से डरते हैं और उन लोगों की भी जो मृत्यु की इच्छा करते हैं। वह कहता है,  “जीवन से ऊबकर मृत्यु के पीछे भागना उतना ही मूर्खतापूर्ण है क्योंकि तुम्हारे जीने के ढंग ने ही मृत्यु को ऐसी चीज़ बना दिया है जिसके पीछे भागने की इच्छा होती है।”

    इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर वह कहता है, “उस व्यक्ति से अधिक मूर्खतापूर्ण और क्या हो सकता है जो मृत्यु की खोज करता है जबकि उसके जीवन को अशांत बनाने वाली वस्तु स्वयं मृत्यु का भय ही है?”

    इसी विचार को व्यक्त करने वाला उसका एक और कथन भी जोड़ा जा सकता है, “मनुष्यों की मूर्खता नहीं, उनका पागलपन— इतना महान है कि कुछ लोग मृत्यु के भय के कारण ही अपनी मृत्यु की ओर धकेल दिए जाते हैं।”

    इनमें से किसी भी विचार पर मनन करने से तुम अपने मन को मृत्यु और जीवन, दोनों को सहन करने के लिए दृढ़ बना सकोगे। क्योंकि हमें जीवन के प्रति अत्यधिक मोह के विरुद्ध भी चेतावनी और दृढ़ता की आवश्यकता है।  जीवन के प्रति अत्यधिक घृणा के विरुद्ध भी। यहाँ तक कि जब विवेक किसी व्यक्ति को अपने जीवन का अंत कर देने की सलाह दे तब भी उसे यह कार्य लापरवाही या उतावलेपन में नहीं करना चाहिए। साहसी और बुद्धिमान व्यक्ति जीवन से भागता नहीं है। वह केवल उचित समय आने पर उससे विदा लेता है।

    इसके अतिरिक्त और विशेष रूप से, हमें उस अवस्था से बचना चाहिए जो बहुत से लोगों पर छा जाती है—मृत्यु की लालसा। क्योंकि, प्रिय लूसीलियस, जैसे अन्य वस्तुओं के प्रति अनुचित आकर्षण होता है, वैसे ही मृत्यु के प्रति भी एक अविवेकी लालसा होती है। यह अक्सर उदात्त और साहसी स्वभाव वाले लोगों को भी अपने वश में कर लेती है और उतनी ही बार डरपोक तथा निष्क्रिय लोगों को भी। पहले प्रकार के लोग जीवन को तुच्छ समझते हैं। दूसरे प्रकार के लोग उससे दबे और थके हुए होते हैं। कुछ अन्य लोग एक ही प्रकार की चीज़ों को बार-बार देखते और करते-करते इतने ऊब जाते हैं कि वे जीवन से घृणा नहीं करते बल्कि उससे विरक्ति और अरुचि अनुभव करने लगते हैं। कभी-कभी हम दर्शन के प्रभाव में भी इस मनःस्थिति में फिसल जाते हैं, जब हम कहते हैं, “आख़िर कब तक वही बातें चलती रहेंगी? मैं कब तक जागूँगा और सोऊँगा, खाऊँगा और फिर भूखा हो जाऊँगा, ठंड महसूस करूँगा और फिर गर्मी?" किसी चीज़ का कोई अंतिम अंत नहीं है; सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। वस्तुएँ एक-दूसरे का पीछा करती रहती हैं। दिन के पीछे रात आती है और रात के पीछे दिन। ग्रीष्म ऋतु शरद को स्थान देती है। शरद के बाद शीत ऋतु आती है और फिर वसंत उसका स्थान ले लेता है। सब कुछ केवल इसलिए बीतता है कि फिर लौट सके। मैं कुछ नया नहीं करता, कुछ नया नहीं देखता।” कभी-कभी यही विचार भी मन में ऊब और वितृष्णा उत्पन्न कर देते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो यह नहीं मानते कि जीवन कठिन है। वे यह महसूस करते हैं कि जीवन निरर्थक है।

अभी के लिए विदा 

जीवन में सच्चे आनंद के संदर्भ में -- पत्र - 23 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें यह लिखूँगा कि इस वर्ष शीत ऋतु ने हमारे साथ कितनी उदारता बरती है (और वह भी कितनी छोटी तथा सौम्य रही) या यह कि वसंत कितना कठोर और असमय ठंडा निकला है और वे सारी दूसरी निरर्थक बातें जिनके बारे में लोग तब लिखते हैं जब उनके पास कहने के लिए कुछ सार्थक नहीं होता? नहीं, मैं तुम्हें ऐसी बात लिखूँगा जो तुम्हारे और मेरे, दोनों के लिए लाभकारी हो। और वह क्या होगी? और क्या सिवाय इसके कि मैं तुम्हें मन की उत्कृष्टता (श्रेष्ठता) की ओर प्रेरित करूँ? क्या तुम जानना चाहते हो कि ऐसी उत्कृष्टता की नींव किस पर टिकी होती है? यह है—व्यर्थ और खोखली चीज़ों में आनंद मत खोजो, उनसे प्रसन्न मत हो।


By Suza 

    क्या मैंने कहा था कि यह उसकी नींव है? नहीं, यह तो उसका शिखर है। उस ऊँचाई तक पहुँचने का अर्थ है यह जानना कि किस बात में प्रसन्न होना चाहिए— अपनी समृद्धि उसी में खोजना जिसे कोई दूसरा नियंत्रित नहीं कर सकता। जो व्यक्ति आशा के आकर्षण में पड़ जाता है, वह चिंतित और अपने ही बारे में अनिश्चित बना रहता है। चाहे उसकी आशा किसी ऐसी वस्तु के लिए ही क्यों न हो जो हाथ के पास हो या जिसे पाना कठिन न हो और चाहे जिन वस्तुओं की उसने आशा की हो वे कभी निराशाजनक सिद्ध न होती हों।

    सबसे बढ़कर यह करो, प्रिय लूसीलियस! आनंद का अनुभव करना सीखो। क्या अब तुम्हें यह लगता है कि क्योंकि मैं तुमसे भाग्य की देनों को दूर कर रहा हूँ और यह मानता हूँ कि तुम्हें आशाओं से उन सबसे मधुर छलनाओं से बचना चाहिए, इसलिए मैं तुमसे अनेक सुख भी छीन रहा हूँ? कदापि नहीं। मैं तो यह चाहता हूँ कि प्रसन्नता कभी भी तुमसे अनुपस्थित न हो। मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारे अपने घर में जन्म ले और ऐसा ही होगा, यदि वह तुम्हारे भीतर उत्पन्न हो। अन्य सुख हृदय को नहीं भरते। वे तो केवल तुच्छ भावनाएँ हैं जो क्षणभर के लिए माथे की शिकन को समतल कर देती हैं। निश्चय ही तुम यह नहीं सोचते कि जो भी मुस्कुराता है, वह वास्तव में आनंदित होता है! मन में उत्साह और आत्मविश्वास होना चाहिए। उसे सीधा, अडिग और हर परीक्षा से ऊपर होना चाहिए।

    मेरा विश्वास करो, सच्चा आनंद एक गंभीर विषय है। क्या तुम्हें लगता है कि मृत्यु का तिरस्कार करना, निर्धनता के लिए अपने घर के द्वार खोल देना, सुख-भोग पर लगाम कसना और पीड़ा सहने का अभ्यास करना, ये सब कोई ढीले-ढाले भाव से या जैसा कि विलासी लोग कहते हैं, (मुस्कान के साथ) करता है? जो व्यक्ति ऐसी बातों पर मनन करता है, वह महान आनंद का अनुभव कर रहा होता है, पर वह आनंद कोमल या मोहक नहीं होता। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे पास भी यही आनंद हो। एक बार जब तुम जान जाओगे कि उसे कहाँ पाया जा सकता है, तब वह कभी समाप्त नहीं होगा। ऊपरी खदानें बहुत थोड़ा देती हैं। सबसे मूल्यवान धातु-भंडार धरती की गहराइयों में छिपे होते हैं और वही ऐसे होते हैं जो खोदने के परिश्रम का प्रतिफल लगातार बढ़ती हुई प्रचुरता के रूप में देते हैं। जनसाधारण के मनोरंजनों में जो सुख मिलता है, वह क्षीण और सतही होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।

    केवल एक ही मार्ग है जो तुम्हें सुखी बना सकता है। अतिप्रिय लूसीलियस, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि उसे अपनाओ। उन सभी वस्तुओं को त्याग दो जो बाहर से चमकती हैं। उन सबको जो तुम्हें किसी दूसरे द्वारा या किसी दूसरे स्रोत से मिलने का वादा किया जाता है और उन्हें अपने पैरों तले रौंद दो। अपने वास्तविक कल्याण की ओर दृष्टि करो और उसी में आनंदित हो जो वास्तव में तुम्हारा है। और तुम्हारा क्या है? तुम स्वयं... तुम्हारा श्रेष्ठतम भाग। जहाँ तक तुम्हारे इस तुच्छ शरीर का प्रश्न है, यह सत्य है कि इसके बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता पर इसे किसी महान वस्तु के रूप में नहीं बल्कि एक आवश्यक साधन के रूप में समझो। जो सुख यह एकत्र करता है, वे खोखले, क्षणभंगुर और अंततः पछतावे का कारण बनने वाले होते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि उन्हें पर्याप्त आत्म-संयम द्वारा नियंत्रित न किया जाए तो वे शीघ्र ही सुख के विपरीत रूप में बदल जाते हैं। हाँ, सुख एक खड़ी चट्टान के किनारे खड़ा रहता है और यदि वह अपनी सीमाओं के भीतर न रहे तो पीड़ा की ओर झुक जाता है। परंतु किसी वस्तु को अच्छा मान लेने के बाद उसके संबंध में सीमा के भीतर बने रहना कठिन होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता, यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।

    जो वास्तव में अच्छा है, उसके प्रति लालसा तृप्ति प्राप्त करने में कभी असफल नहीं होती। वह क्या है?” तुम पूछते हो, “वह कहाँ से आती है?” मैं तुम्हें बताऊँगा, वह एक शुद्ध अंतरात्मा से आती है, सम्मानपूर्ण विचारों से, सही कर्मों से, भाग्य की वस्तुओं को तुच्छ समझने से और जीवन की उस शांत तथा स्थिर शैली से जो एक ही मार्ग पर चलती है। क्योंकि जो लोग स्वयं ही एक योजना से दूसरी योजना पर कूदते रहते हैं, वे किसी निश्चित या भरोसेमंद वस्तु को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? और यदि वे ऐसा भी नहीं करते बल्कि केवल संयोग की हर हवा से इधर-उधर उड़ाए जाते रहते हैं, जीवन भर मंडराते और भटकते रहते हैं तो वे किसी बात पर कैसे निर्भर कर सकते हैं? बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अपने लिए और अपनी संपत्ति के लिए सोच-समझकर व्यवस्था करते हैं। बाकी लोग नदी में बहती वस्तुओं के समान हैं। वे आगे नहीं बढ़ रहे होते बल्कि केवल धारा के साथ बह रहे होते हैं। कोई लहर अपेक्षाकृत शांत होती है और उन्हें सहजता से आगे ले जाती है। दूसरी उन्हें अधिक कठोरता से बहा ले जाती है। कोई धीमी गति से बहती है और उन्हें किनारे के पास छोड़ देती है जबकि दूसरी प्रचंड बाढ़ बनकर उन्हें खुले समुद्र में फेंक देती है। अतः हमें यह निश्चित कर लेना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं और फिर उसी पर दृढ़तापूर्वक बने रहना चाहिए।

    अब वह अवसर आ गया है जब मुझे अपना ऋण चुकाना चाहिए। इस पत्र के बदले में मैं तुम्हें तुम्हारे प्रिय एपिक्यूरस का एक कथन दे सकता हूँ—

“अपने जीवन की शुरुआत बार-बार करते रहना थकाने वाला होता है।” 

यदि इस विचार को और बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए—

“वे लोग बुरा जीवन जीते हैं जो सदा जीवन जीना शुरू ही करते रहते हैं।”

    “क्यों?” तुम पूछते हो। इस कथन को स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

क्योंकि ऐसे लोगों के लिए जीवन सदैव अधूरा रहता है। जो व्यक्ति अभी-अभी जीना शुरू कर रहा है, वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं हो सकता। हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम जीवन को पर्याप्त रूप से जी लें। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता जब वह अभी केवल अपने जीवन की योजना ही बना रहा हो।

    और तुम्हारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि ऐसे लोग बहुत कम होते हैं; वास्तव में लगभग सभी लोग ऐसे ही हैं। बल्कि कुछ लोग तो ठीक उसी समय जीवन शुरू कर रहे होते हैं जब उसे समाप्त करने का समय आ चुका होता है। यदि तुम्हें यह आश्चर्यजनक लगता है तो मैं इससे भी अधिक विस्मयकारी बात जोड़ूँगा, कुछ लोग जीना शुरू करने से पहले ही जीना छोड़ देते हैं।

अभी के लिए विदा 

आत्मावलोकन के संदर्भ में -- पत्र 29 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  "तुम हमारे मित्र मार्सेलिनस के बारे में पूछते हो और जानना चाहते हो कि वह कैसा है। वह अब कम ही मिलने आता है। इसका एकमात...