Wednesday, 22 July 2026

उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना चाहिए या अपने स्वयं के प्रयासों का। किन्तु यदि तुम इस अनुभव के कारण दूसरों पर उपकार करना छोड़ देना चाहते हो तो तुम्हारा यह प्रयास तुम्हें केवल कठोर और अनुदार ही बनाएगा। क्योंकि यदि तुम वर्तमान परिस्थिति का जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगे तो तुम किसी पर भी उपकार नहीं कर पाओगे। तब परिणाम यह होगा कि उपकार केवल कृतघ्न व्यक्ति के साथ ही नष्ट नहीं होगा बल्कि तुम्हारे साथ भी समाप्त हो जाएगा। इससे तो यह कहीं बेहतर है कि कुछ उपकारों का प्रत्युत्तर न मिले, बजाय इसके कि उपकार करना ही छोड़ दिया जाए। खराब फसल होने के बाद भी किसान बीज बोना नहीं छोड़ता। अनेक वर्षों तक बंजर भूमि में जो हानि होती रही हो, वह कभी-कभी केवल एक ही वर्ष में उपजाऊ भूमि के कारण पूरी हो जाती है। इसी प्रकार, एक कृतज्ञ व्यक्ति को पाने के लिए कुछ कृतघ्न लोगों का सामना करना भी सार्थक है। कोई भी इतना अचूक नहीं होता कि उपकार करते समय कभी भूल न करे। कुछ उपकार व्यर्थ चले जाएँ ताकि कुछ अपने सही लक्ष्य तक पहुँच सकें। जहाज़ डूब जाने के बाद भी लोग फिर समुद्र की यात्रा पर निकलते हैं। एक बुरे ऋण के कारण साहूकार बाज़ार में धन उधार देना बंद नहीं कर देता। यदि हर उस कार्य को छोड़ दिया जाए जिसमें बाधाएँ आती हैं तो जीवन का सारा प्रवाह ही रुक जाएगा। इसलिए तुम्हारे साथ जो हुआ है, वह तुम्हें और भी अधिक उदार बनाए। क्योंकि जिन कार्यों का परिणाम निश्चित नहीं होता, उन्हें बार-बार करना चाहिए ताकि कभी-न-कभी सफलता अवश्य प्राप्त हो सके।



    लेकिन इस विषय पर मैं अपनी कार्य (संभवतः पुस्तक) उपकार (De Beneficiis) में पर्याप्त चर्चा कर चुका हूँ।इस समय मेरे विचार में एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अब तक संतोषजनक ढंग से विचार नहीं किया गया है। मान लो, किसी व्यक्ति ने पहले हमारा कोई उपकार किया, किन्तु बाद में उसी ने हमारा अहित भी किया। तो क्या यह माना जाए कि उसने अपने पहले किए गए उपकार और बाद में पहुँचाई गई हानि को बराबर कर दिया। इस प्रकार हमारे ऊपर उसका जो कृतज्ञता का ऋण था, वह समाप्त हो गया? यदि चाहो तो इस प्रश्न को और भी कठिन बना सकते हो। मान लो कि बाद में उसने जो हानि पहुँचाई, वह पहले किए गए उपकार से कहीं अधिक बड़ी थी। तब क्या हमें उसके पहले किए गए उपकार को स्मरण रखना चाहिए या उसकी बाद की हानि को अधिक महत्त्व देना चाहिए?

    यदि तुम उस कठोर और अडिग न्यायाधीश का मत पूछो, जो लोकोक्ति के अनुसार अत्यंत सख्त निर्णय देता है तो वह कहेगा कि एक कर्म दूसरे को निरस्त कर देता है। वह कहेगा, “यद्यपि हानि का पलड़ा भारी है, फिर भी जो अंतर बचता है, उसे उपकार के पक्ष में मान लो।” बाद में हुई हानि अधिक बड़ी थी, किन्तु उपकार पहले किया गया था। इसलिए निर्णय करते समय समय के क्रम का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त कुछ और बातें भी विचारणीय हैं, जो इतनी स्पष्ट हैं कि उन्हें अलग से याद दिलाने की आवश्यकता नहीं। जैसे—उपकार करते समय उसकी इच्छा कितनी सच्ची थी और हानि पहुँचाते समय उसकी अनिच्छा कितनी थी। क्योंकि उपकार और अपकार, दोनों का वास्तविक मूल्य मनुष्य की भावना और उद्देश्य पर निर्भर करता है।कोई कह सकता है, “मैं उपकार करना नहीं चाहता था। मुझे लज्जा के कारण ऐसा करना पड़ा या लोगों के बार-बार आग्रह ने मुझे विवश कर दिया अथवा मैंने यह सोचकर उपकार किया कि इससे मुझे कोई लाभ होगा।” किसी उपकार के प्रति कृतज्ञता भी उतनी ही होनी चाहिए जितनी सच्ची भावना से वह उपकार किया गया था। इसलिए हम केवल उपकार के आकार या मात्रा को नहीं तौलते बल्कि उसे देने वाले की सद्भावना और इच्छा को भी तौलते हैं। अब यदि सभी अनुमान और संदेहों को एक ओर रख दें और यह मान लें कि पहला कार्य वास्तव में उपकार था तथा बाद का कार्य वास्तव में उससे अधिक बड़ा अपकार था, तब भी एक सज्जन मनुष्य अपना हिसाब इस प्रकार करेगा कि उसका झुकाव अपने ही विरुद्ध होगा। वह उपकार के मूल्य को बढ़ाकर आँकेगा और अपकार के मूल्य को घटाकर देखेगा।

    दूसरा न्यायाधीश, जो अधिक उदार है और जिसकी राय को मैं स्वयं अधिक पसंद करता हूँ, तुमसे कहेगा कि अपकार को भूल जाओ किन्तु उपकार को स्मरण रखो। तुम कह सकते हो, “न्याय तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित प्रतिफल दिया जाए, उपकार के बदले कृतज्ञता और अपकार के बदले प्रतिशोध या कम-से-कम मन में रोष।” यह बात तब तक सही है, जब उपकार करने वाला और अपकार करने वाला दो अलग-अलग व्यक्ति हों। किन्तु यदि उपकार और अपकार, दोनों एक ही व्यक्ति ने किए हों तो उसके पहले किए गए उपकार का प्रभाव उसके बाद के अपकार को बहुत सीमा तक निष्प्रभावी कर देता है। यदि कोई व्यक्ति बिना पहले कोई उपकार किए भी क्षमा का पात्र हो सकता है तो जिसने पहले हमारे साथ भलाई की हो और बाद में कोई गलती कर बैठे, वह तो केवल क्षमा ही नहीं, उससे भी अधिक उदार व्यवहार का अधिकारी है। मैं उपकार और अपकार इन दोनों का मूल्य समान नहीं मानता। मेरे विचार में, एक उपकार का मूल्य एक अपकार से कहीं अधिक होता है।

    हर व्यक्ति यह नहीं जानता कि कृतज्ञ कैसे होना चाहिए। कोई विचारहीन, अशिक्षित या सामान्य जन भी यह समझ सकता है कि उस पर किसी का उपकार है, विशेषकर तब जब उसे वह उपकार हाल ही में प्राप्त हुआ हो। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उस उपकार का वास्तविक मूल्य कितना है और उसके प्रति उसका दायित्व किस सीमा तक है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही जानता है कि प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक उपकार का उचित मूल्य क्या है। जिस व्यक्ति का मैंने अभी उल्लेख किया जो सद्भावना रखने पर भी विवेकहीन है, वह उपकार का प्रतिदान या तो जितना करना चाहिए उससे कम करता है या फिर अनुचित समय पर, अनुचित स्थान पर अथवा अनुचित ढंग से करता है। इस प्रकार, जो प्रतिदान उचित रीति से किया जाना चाहिए था, वह व्यर्थ चला जाता है और मानो यूँ ही नष्ट हो जाता है।

    यह आश्चर्य की बात है कि कुछ अवसरों पर हमारी भाषा कितनी उपयुक्त सिद्ध होती है। हमारी प्राचीन भाषिक परंपरा ने कुछ बातों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो न केवल अत्यंत सटीक हैं बल्कि हमारे कर्तव्य का भी संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, हम सामान्यतः कहते हैं, “इस व्यक्ति ने उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की” (gratiam rettulit)। यहाँ 'व्यक्त की' या 'लौटाई' का अर्थ है जो तुम्हारा ऋण है, उसे अपनी स्वेच्छा से उसके वास्तविक अधिकारी के पास पहुँचा देना। हम यह नहीं कहते कि 'उसने कृतज्ञता वापस दे दी' (gratiam reddidit)। कोई वस्तु तो मनुष्य अनिच्छा से भी लौटा सकता है, अनुचित समय पर भी लौटा सकता है या किसी दूसरे के माध्यम से भी लौटा सकता है। इसी प्रकार हम यह भी नहीं कहते कि 'उसने उपकार का भुगतान कर दिया' (reposuit beneficium) या 'उसने उसका ऋण चुका दिया' (resolvit)। ये शब्द धन या ऋण चुकाने के लिए तो उपयुक्त हो सकते हैं किन्तु उपकार के प्रतिदान के लिए हमें उचित नहीं लगते। 'लौटाना' (render) का वास्तविक अर्थ है जिससे कोई वस्तु प्राप्त हुई हो, उसे स्वेच्छा से उसी के पास वापस पहुँचाना। इस शब्द में यह भाव निहित है कि कार्य किसी बाहरी दबाव से नहीं बल्कि अपनी ही प्रेरणा से किया गया है।

    बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह विचार करता है कि उसने कितना उपकार प्राप्त किया है, किससे प्राप्त किया है, कब, कहाँ, किस कारण और किस प्रकार प्राप्त किया है। इसीलिए हम कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही सही अर्थों में कृतज्ञता प्रकट करना जानता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल वही वास्तविक अर्थों में उपकार करना भी जानता है। स्वाभाविक ही है कि वही बुद्धिमान व्यक्ति उपकार करने में उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक आनंद अनुभव करता है, जितना अन्य लोग उपकार प्राप्त करने में करते हैं।

    कुछ लोग इसे हमारे दर्शनशास्त्र के उन कथनों में से एक मानते हैं जो सामान्य लोगों की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं। यूनानी ऐसे कथनों को पैराडॉक्सा (paradoxa) कहते हैं। वे कहते हैं, “क्या केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है? क्या कोई और व्यक्ति यह नहीं जानता कि लेनदार का ऋण कैसे चुकाया जाता है या किसी वस्तु का मूल्य कैसे अदा किया जाता है?” यदि हमारे दर्शन के प्रति इस कारण किसी के मन में रोष उत्पन्न हो तो यह जान लेना चाहिए कि एपिक्यूरस भी यही मत रखता है। कम-से-कम मेट्रोडोरस तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है। फिर यही मेट्रोडोरस आश्चर्य व्यक्त करते हैं जब हम कहते हैं, “केवल ज्ञानी ही प्रेम करना जानता है। केवल ज्ञानी ही सच्चा मित्र होता है।” किन्तु कृतज्ञता तो प्रेम और मित्रता, दोनों का ही एक अंग है। वास्तव में, कृतज्ञता का व्यवहार सच्ची मित्रता की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है और अधिक लोगों पर लागू होता है। फिर वही मेट्रोडोरस इस बात पर भी आश्चर्य करते हैं कि हम कहते हैं,“सच्ची निष्ठा केवल ज्ञानी में ही होती है।” मानो वे स्वयं ऐसा नहीं कहते हों! क्या तुम सचमुच यह मानते हो कि जो व्यक्ति कृतज्ञ होना ही नहीं जानता, वह निष्ठावान हो सकता है? अतः लोगों को यह आरोप लगाना छोड़ देना चाहिए कि हम ऐसी बातें कहते हैं जिन पर कोई विश्वास नहीं कर सकता।

    उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज्ञानी के भीतर जो दिखाई देता है, वह स्वयं सदाचार होता है जबकि सामान्य मनुष्य में केवल सदाचार की छाया या उसका आभास दिखाई देता है। ज्ञानी के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक अर्थ में कृतज्ञ होना नहीं जानता। यह अवश्य है कि मूर्ख व्यक्ति भी अपनी समझ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार कृतज्ञता प्रकट करता है। उसमें कमी उसकी सद्भावना की नहीं बल्कि उसके ज्ञान की होती है क्योंकि सद्भावना ऐसी वस्तु नहीं है जिसे सिखाया जाना पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति के सभी पक्षों का परस्पर संबंध देखकर उनका मूल्यांकन करता है। क्योंकि एक ही कार्य का महत्व समय, स्थान और उसके पीछे के उद्देश्य के अनुसार बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है। उचित समय पर दिए गए एक हजार डेनारियस किसी परिवार के लिए कभी-कभी उससे कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, जितना कि अनुचित समय पर उस पर पूरा धन-भंडार लुटा देना। इससे भी बहुत अंतर पड़ता है कि तुम केवल कोई उपहार दे रहे हो या वास्तव में किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता कर रहे हो। तुम्हारी उदारता किसी को विनाश से बचा रही है या केवल उसके लिए कोई उपयोगी वस्तु उपलब्ध करा रही है। अनेक बार उपहार आकार में छोटा होता है किन्तु उसके परिणाम अत्यंत महान होते हैं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इसमें भी बहुत बड़ा अंतर है कि दिया गया उपहार तुम्हारी अपनी कमाई और संपत्ति से दिया गया है या वह केवल किसी और से प्राप्त उपकार को आगे बढ़ाकर दिया गया है?

    किन्तु जिन बातों पर हम पहले ही पर्याप्त चर्चा कर चुके हैं, उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। जब उपकार और अपकार की तुलना की जाएगी, तब सज्जन व्यक्ति निश्चय ही यह विचार करेगा कि सबसे न्यायसंगत उत्तर क्या होना चाहिए। फिर भी उसका झुकाव उपकार की ओर ही रहेगा; वह उसी पक्ष को अधिक महत्व देगा। ऐसे मामलों में सामाजिक संबंधों और भूमिकाओं का भी बहुत महत्व होता है। कोई कह सकता है, “तुमने मेरे दास पर उपकार किया किन्तु मेरे पिता का अहित किया। तुमने मेरे पुत्र का जीवन बचाया पर मेरे पिता को मुझसे छीन लिया।” ऐसी प्रत्येक तुलना में इन और इसी प्रकार की अन्य परिस्थितियों का भी विचार किया जाएगा। यदि उपकार और अपकार के बीच का अंतर बहुत कम हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे अनदेखा कर देगा। बल्कि यदि अंतर काफी बड़ा भी हो किन्तु उसे स्वीकार करने से निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को कोई हानि न पहुँचती हो अर्थात यदि वह अपकार केवल उसी के व्यक्तिगत हित से संबंधित हो तो भी वह उसे क्षमा कर देगा। संक्षेप में, वह ऐसा व्यक्ति होगा जिससे समझौता करना सरल होगा। वह अपने ऊपर हुए उपकार को स्वीकार करने में उदार होगा और किसी अपकार के कारण पहले किए गए उपकार को निरर्थक मान लेने में अत्यन्त अनिच्छुक होगा। उसकी समस्त प्रवृत्ति और उसकी सभी इच्छाएँ कृतज्ञता और आभार की ओर ही उन्मुख रहेंगी।

    उपकार लौटाने की अपेक्षा उसे प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होना एक भूल है। जिस प्रकार ऋण चुकाने वाला व्यक्ति ऋण लेने वाले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होता है, उसी प्रकार हमें भी प्राप्त उपकार के महान ऋण से स्वयं को मुक्त करते समय उससे कहीं अधिक आनंद अनुभव करना चाहिए जितना उपकार प्राप्त करते समय हुआ था। कृतघ्न लोग इस विषय में भी भूल करते हैं। वे अपने धन के लेनदारों का ऋण तो ब्याज सहित चुका देते हैं किन्तु यह समझते हैं कि उपकारों को बिना किसी प्रतिदान के सदा अपने ऊपर रखा जा सकता है।वास्तव में, उपकार का ऋण भी समय बीतने के साथ बढ़ता जाता है। जितनी अधिक देर प्रतिदान करने में होती है, उतना ही अधिक लौटाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना किसी 'ब्याज' के उपकार का प्रतिदान करता है, वह कृतघ्न है। अर्थात उसे केवल उपकार के बराबर ही नहीं बल्कि उससे अधिक उत्साह, सम्मान और सद्भावना के साथ उसका प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए जब हम अपने प्राप्त उपकारों और उनके प्रतिदान का हिसाब लगाएँ, तब इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

    हमें यथासंभव अपनी पूरी कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इसका सबसे बड़ा लाभ अंततः हमारा अपना ही होता है। आखिर कृतज्ञता केवल न्याय नहीं है, जैसा कि सामान्यतः लोग समझते हैं। न्याय का संबंध मुख्यतः दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य से होता है जबकि कृतज्ञता का अधिकांश कल्याण स्वयं हमारे ही भीतर लौटकर आता है। जो व्यक्ति किसी दूसरे का उपकार करता है, वह वास्तव में अपना ही उपकार करता है। मेरा यह अर्थ नहीं है कि जिसे सहायता मिली है, वह आगे किसी और की सहायता करेगा या जिसकी रक्षा की गई है, वह दूसरों की रक्षा करेगा। न ही मेरा आशय यह है कि एक अच्छा कार्य केवल उदाहरण बनकर फिर उसी व्यक्ति के पास लौट आता है। बुरे उदाहरण भी अपने कर्ता के पास लौटते हैं। जिसने दूसरों को अन्याय करना सिखाया हो, जब वही अन्याय उसके साथ होता है तो उसे किसी की सहानुभूति नहीं मिलती। मेरा आशय यह है कि प्रत्येक सद्गुण स्वयं अपना पुरस्कार है। मनुष्य सद्गुणों का पालन किसी पुरस्कार को पाने के लिए नहीं करता। सही कर्म का सबसे बड़ा प्रतिफल यही है कि उसने सही कर्म किया। मैं कृतज्ञता इसलिए नहीं प्रकट करता कि मेरे उदाहरण से कोई दूसरा भी मेरे प्रति अधिक कृतज्ञ हो जाए। मैं कृतज्ञता इसलिए प्रकट करता हूँ क्योंकि ऐसा करना अपने-आप में अत्यंत सुखद और सुंदर कर्म है। मैं कृतज्ञ इसलिए नहीं होता कि यह लाभदायक है बल्कि इसलिए कि यह मेरे लिए प्रिय और आनंददायक है। यदि इसे सिद्ध करने के लिए ऐसी स्थिति आ जाए कि मैं केवल कृतघ्न दिखाई देकर ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकता हूँ, यदि किसी उपकार का प्रतिदान करने का एकमात्र उपाय यह हो कि लोग मुझे किसी का अहित करने वाला समझें तो भी मैं निःसंकोच बदनामी के बीच अपने सम्मानपूर्ण उद्देश्य को पूरा करूँगा। मेरे विचार में, सद्गुण का मूल्य उससे अधिक कोई नहीं समझता और उसके प्रति उससे अधिक निष्ठावान कोई नहीं होता, जिसने अपनी अंतरात्मा को निर्मल बनाए रखने के लिए अपनी अच्छी प्रतिष्ठा तक का बलिदान दे दिया हो।

    इसलिए, जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारी कृतज्ञता दूसरे व्यक्ति के हित से अधिक तुम्हारे अपने हित के लिए होती है। दूसरे व्यक्ति को तो केवल एक साधारण-सी वस्तु प्राप्त होती है, उसे वही वापस मिल जाता है जो उसने पहले दिया था। परन्तु तुम्हें उससे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तु प्राप्त होती है। ऐसी वस्तु, जो मन की सर्वोत्तम अवस्था से उत्पन्न होती है: कृतज्ञता। यदि दुर्गुण मनुष्य को दुःखी बनाता है और सद्गुण उसे सुखी करता है तथा यदि कृतज्ञता एक सद्गुण है तो तुमने भले ही साधारण-सी वस्तु लौटाई हो। किन्तु बदले में तुमने वह अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली है जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, एक कृतज्ञ हृदय। ऐसा हृदय केवल दिव्य और धन्य आत्मा ही प्राप्त कर सकती है। 

    इसके विपरीत अवस्था में रहने वाला व्यक्ति भीतर से गहरे असंतोष का अनुभव करता है। जो दूसरों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, वह कभी अपने ही मन की दृष्टि में सम्मानित नहीं हो सकता। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह कह रहा हूँ कि कृतघ्न व्यक्ति भविष्य में कभी दुखी होगा? नहीं, मैं उसे इतना भी समय नहीं देता। वह तो इसी क्षण दुखी है। इसलिए हमें कृतघ्नता से दूसरों के हित के लिए नहीं बल्कि अपने ही हित के लिए बचना चाहिए। मनुष्य की दुष्टता का केवल सबसे छोटा और हल्का भाग ही दूसरों तक पहुँचता है। उसका सबसे घना और सबसे विषैला भाग तो उसी के भीतर रह जाता है और उसी का जीवन दूषित करता रहता है। जैसा कि हमारे मित्र अटालुस कहा करते थे—

“दुर्गुण अपना अधिकांश विष स्वयं ही पी जाता है।”

यह विष उस विष के समान नहीं है जिसे साँप दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए बनाते हैं जबकि स्वयं उससे अप्रभावित रहते हैं। यह तो ऐसा विष है जो सबसे अधिक उसी व्यक्ति को नष्ट करता है जिसके भीतर वह रहता है। कृतघ्न व्यक्ति स्वयं अपने को यातना देता है, स्वयं अपने लिए कष्ट का कारण बनता है। वह अपने ऊपर किए गए उपकारों से घृणा करने लगता है क्योंकि उन्हें लौटाने का दायित्व उसे बोझ प्रतीत होता है। इसलिए वह उन उपकारों के महत्व को कम करके आँकता है, जबकि अपने साथ हुए अपकारों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है।इससे अधिक दुखद स्थिति और क्या हो सकती है कि मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सभी उपकारों को भुला दे जबकि केवल अपने साथ हुए अपकारों को ही स्मरण रखे?

    इसके विपरीत, बुद्धिमत्ता प्रत्येक उपकार के मूल्य को और अधिक बढ़ा देती है। वह उन्हें अपने मन में आदरपूर्वक संजोकर रखती है और उनके निरंतर स्मरण में आनंद का अनुभव करती है। दुष्ट व्यक्ति को उपकार से केवल एक ही सुख मिलता है, और वह भी थोड़े समय के लिए जब वह उपकार प्राप्त कर रहा होता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद स्थायी और चिरस्थायी होता है। उसका सुख उपकार प्राप्त करने में नहीं बल्कि इस बात में होता है कि उसे कभी उपकार प्राप्त हुआ था। यही स्मृति उसके लिए सदा बनी रहती है और कभी नष्ट नहीं होती। वह अपने साथ हुए अपकारों को महत्व नहीं देता। वह उन्हें लापरवाही के कारण नहीं बल्कि अपनी इच्छा से भुला देता है। वह हर बात का सबसे बुरा अर्थ नहीं निकालता और न ही अपने दुर्भाग्य के लिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की तलाश करता है। बल्कि दूसरों के अनुचित व्यवहार का कारण भी वह प्रायः भाग्य को ही मान लेता है। वह लोगों के शब्दों या उनके चेहरे के भावों में दोष नहीं खोजता। जो कुछ भी घटित होता है, उसकी वह यथासंभव सद्भावनापूर्ण व्याख्या करता है, और इसी कारण जीवन की कठिनाइयाँ उसके लिए अधिक सहनीय हो जाती हैं। वह उपकारों की अपेक्षा अपकारों को अधिक याद रखने वाला व्यक्ति नहीं होता। जहाँ तक संभव हो, वह लोगों के साथ जुड़े पुराने और अच्छे प्रसंगों को ही स्मरण करता है। जो लोग कभी उसके प्रति उपकारी रहे हों, उनके प्रति वह अपना दृष्टिकोण तब तक नहीं बदलता, जब तक कि उनके अपराध इतने अधिक और इतने स्पष्ट न हो जाएँ कि उन्हें अनदेखा करना असंभव हो। तब भी वह केवल उतना ही बदलता है जितना उस व्यक्ति के पहले उपकार से पूर्व उसका संबंध था। क्योंकि जब अपकार का परिमाण उपकार के बराबर भी हो जाए, तब भी उसके मन में कुछ सद्भावना शेष रहती है। जिस प्रकार किसी न्यायालय में मत बराबर हो जाने पर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया जाता है। प्रत्येक संदिग्ध मामले में उदारता बेहतर पक्ष का समर्थन करती है, उसी प्रकार जब किसी व्यक्ति के अच्छे और बुरे कार्य समान हो जाते हैं, तब बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह मानना छोड़ देता है कि वह उसका ऋणी है। किन्तु वह कृतज्ञ बने रहने की इच्छा नहीं छोड़ता। वह उन लोगों के समान होता है जो ऋण माफ़ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से अपना ऋण चुका देते हैं।

    कोई भी व्यक्ति तब तक सच्चे अर्थों में कृतज्ञ नहीं हो सकता, जब तक वह उन वस्तुओं को अधिक महत्व देना न छोड़ दे जिनके पीछे सामान्य लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। यदि तुम किसी उपकार का वास्तविक प्रतिदान करना चाहते हो तो तुम्हें आवश्यकता पड़ने पर निर्वासन सहने के लिए तैयार रहना होगा। अपना रक्त बहाने के लिए भी तैयार रहना होगा। निर्धनता का सामना करना होगा और कई बार तो अपनी प्रतिष्ठा तक को दाँव पर लगाना होगा तथा ऐसे अपवादों और बदनामी को भी सहना होगा जिसके तुम अधिकारी नहीं हो। कृतज्ञता का मूल्य बहुत बड़ा होता है। वह बिना किसी त्याग के प्राप्त नहीं होती। जब तक हम किसी उपकार की आशा करते रहते हैं, तब तक हमें उससे बढ़कर कोई वस्तु मूल्यवान नहीं लगती। किन्तु जैसे ही वह उपकार हमें प्राप्त हो जाता है, हम उसी का सबसे कम मूल्य आँकने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हम प्राप्त उपकारों को भूल जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमें और अधिक पाने की लालसा लगी रहती है। हमारा ध्यान इस बात पर नहीं रहता कि हमें अब तक क्या-क्या मिल चुका है। हम केवल अगली माँग और अगली प्राप्ति के बारे में सोचते रहते हैं। धन, सम्मान, सत्ता और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ जो हमारी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उनका मूल्य बहुत कम है। हमें सत्य और सदाचार के मार्ग से भटका देती हैं। हम वस्तुओं का वास्तविक मूल्यांकन करना ही नहीं जानते। इसलिए हमें अपने निर्णयों का आधार लोकमत को नहीं बनाना चाहिए। हमें वस्तुओं के वास्तविक स्वभाव को देखना चाहिए। इन बाहरी वस्तुओं में अपने-आप में ऐसा कुछ भी अद्भुत नहीं है जो हमारे मन को आकर्षित करे। उन्हें आकर्षक बनाने वाली केवल हमारी वह आदत है जिसके कारण हम उनका आदर और प्रशंसा करते आए हैं। वे इसलिए मूल्यवान नहीं मानी जातीं कि वे वास्तव में वांछनीय हैं; बल्कि वे इसलिए वांछनीय प्रतीत होती हैं क्योंकि लोग उन्हें मूल्यवान मानते हैं। इस प्रकार, पहले व्यक्तियों की भूल से समाज में एक भ्रम उत्पन्न होता है, और फिर वही सामाजिक भ्रम आगे चलकर प्रत्येक व्यक्ति को फिर से भ्रमित करता रहता है।

    किन्तु चूँकि हम सामान्यतः लोकमत पर विश्वास करते हैं तो इस विषय में भी हमें उसी पर विश्वास करना चाहिए कि कृतज्ञता से बढ़कर कोई सद्गुण और कोई सम्माननीय गुण नहीं है। सभी राष्ट्र, यहाँ तक कि सबसे असभ्य माने जाने वाले लोग भी इस बात पर एकमत हैं। इस विषय में सज्जन और दुष्ट, दोनों समान रूप से सहमत हैं। कुछ लोग सुख को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं जबकि कुछ कठिन परिश्रम और तपस्या को श्रेष्ठ समझते हैं। कुछ कहते हैं कि दुख सबसे बड़ी बुराई है, तो कुछ का मत है कि दुख बुराई ही नहीं है। कोई धन को सबसे बड़ा शुभ मानता है तो कोई कहता है कि धन मानव जीवन के लिए अभिशाप है। सबसे बड़ा धन वही है जहाँ भाग्य के पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी शेष न हो। इन सब मतभेदों के बावजूद एक बात ऐसी है, जिस पर सभी एक स्वर से सहमत हैं, जब किसी ने हमारा उपकार किया हो तो हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इतने विविध विचारों वाले लोग भी इस एक विषय पर एकमत हैं। फिर भी विडंबना यह है कि अनेक बार हम उपकार के बदले अपकार कर बैठते हैं। लोगों के कृतघ्न होने का पहला कारण यह है कि वे उतने कृतज्ञ हो ही नहीं पाते, जितना उन्हें होना चाहिए।

    यह पागलपन अब इतनी चरम सीमा तक पहुँच गया है कि किसी पर बहुत बड़ा उपकार करना भी अत्यंत जोखिम भरा हो गया है। क्योंकि जिसे उपकार प्राप्त होता है, वह उसका प्रतिदान न कर पाने की लज्जा से इतना व्याकुल हो उठता है कि वह यही चाहता है कि वह व्यक्ति ही न रहे, जिसके प्रति उसे अपना ऋण चुकाना है।जो कुछ तुम्हें दिया गया है, उसे अपने पास ही रहने दो। मैं उसे वापस नहीं माँगता। न मैं उस पर कोई आग्रह करता हूँ। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी सहायता बिना किसी भय और दंड के कर सकूँ। उस घृणा से अधिक घातक कोई घृणा नहीं होती, जो इस लज्जा से उत्पन्न होती है कि मनुष्य किसी के उपकार का उचित प्रतिदान नहीं कर सका और इस प्रकार उस उपकार को व्यर्थ जाने दिया।


अभी के लिए विदा 

स्वयं को जानने के बारे में -- पत्र - 78

 प्रिय लूसीलियस 


आज मुझे कुछ अवकाश मिला है। यह मेरे अपने प्रयास से नहीं बल्कि उन खेलों के कारण है जिन्होंने सभी परेशान करने वाले लोगों को मुक्केबाज़ी देखने के लिए बुला लिया है। अब कोई अचानक भीतर नहीं आएगा। कोई मेरे विचारों की श्रृंखला को बीच में नहीं तोड़ेगा। इस निश्चिंतता के कारण मेरे विचार और भी अधिक निर्भीकता से आगे बढ़ रहे हैं। द्वार का बार-बार चरमराना बंद हो गया है। कोई परदा हटाकर भीतर नहीं झाँकेगा। अब मुझे निश्चिंत होकर आगे बढ़ने की स्वतंत्रता है, जैसी उस व्यक्ति को चाहिए जो अपना मार्ग स्वयं बना रहा हो और अपने बल पर आगे बढ़ रहा हो। क्या इसका अर्थ यह है कि मैं अपने पूर्ववर्ती विचारकों का अनुसरण नहीं करता? नहीं, मैं उनका अनुसरण करता हूँ। परन्तु मैं स्वयं भी नए विचार खोजने, कुछ बातों में परिवर्तन करने और कुछ पुराने मतों को छोड़ देने का अधिकार अपने पास रखता हूँ। मैं उनसे सहमत हो सकता हूँ, पर उनका दास नहीं बन सकता। 


By Paul Klee 

    किन्तु मैंने समय से पहले ही यह सोच लिया था कि मुझे पूर्ण शांति और निर्बाध एकांत मिलेगा। देखो, अब तो रंगशाला (स्टेडियम) से एक बड़ा कोलाहल सुनाई दे रहा है। यद्यपि वह मेरे संकल्प को विचलित नहीं करता, फिर भी वह मेरा ध्यान इस विषय पर विचार करने के लिए अवश्य आकर्षित करता है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “कितने लोग अपने शरीर का अभ्यास करते हैं और कितने कम लोग अपने मन का! केवल मनोरंजन के लिए इस चंचल तमाशे को देखने कितनी बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है, जबकि ज्ञान और संस्कृति के साधकों के साथ कितना गहरा एकांत जुड़ा रहता है! जिन लोगों की शक्तिशाली भुजाओं और चौड़े कंधों की हम प्रशंसा करते हैं, वे मन से कितने दुर्बल होते हैं!”

    सबसे अधिक मैं इसी बात पर विचार करता हूँ। यदि शरीर अभ्यास के द्वारा इतनी सहनशक्ति प्राप्त कर सकता है कि वह एक से अधिक प्रतिद्वंद्वियों के घूँसों और लातों को सह सके, प्रचंड धूप और धूल की झुलसा देने वाली गर्मी को झेल सके और अपने ही रक्त से लथपथ होकर भी पूरे दिन डटा रहे तो निश्चय ही मन को इससे कहीं अधिक आसानी से इतना दृढ़ बनाया जा सकता है कि वह भाग्य के आघातों को सहन कर सके, गिराए जाने और पैरों तले रौंदे जाने पर भी फिर उठ खड़ा हो सके। शरीर को विकसित होने के लिए अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है परन्तु मन स्वयं ही विकसित होता है, स्वयं ही अपना पोषण करता है और स्वयं ही अपना अभ्यास करता है। पहलवानों को बहुत अधिक भोजन और पेय, पर्याप्त तेल-मालिश तथा लंबे समय तक कठिन अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है किन्तु सद्गुण तुम्हें बिना किसी सामग्री और बिना किसी खर्च के प्राप्त हो सकता है। जो कुछ भी तुम्हें एक अच्छा मनुष्य बना सकता है, वह पहले से ही तुम्हारे भीतर विद्यमान है।

    अच्छा बनने के लिए तुम्हें किस चीज़ की आवश्यकता है? केवल इच्छा-शक्ति की। तुम्हारी इच्छा का इससे श्रेष्ठ लक्ष्य क्या हो सकता है कि तुम अपने आपको उस दासता से मुक्त कर लो, जो लगभग सभी मनुष्यों को जकड़े हुए है? यह वही दासता है जिससे मिट्टी में जन्मे सबसे साधारण दास भी अपनी सामर्थ्य भर हर उपाय करके छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं। वे भूख सहते हैं, केवल इसलिए कि अपनी स्वतंत्रता खरीदने के लिए थोड़ा-थोड़ा धन बचा सकें। तुम, जो अपने आपको जन्म से स्वतंत्र मानते हो, क्या अपनी वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए आवश्यक कोई भी मूल्य चुकाने की इच्छा नहीं रखोगे? तुम बार-बार अपनी धन-पेटी की ओर क्यों देखते हो? स्वतंत्रता खरीदी नहीं जा सकती। इसलिए अपनी हिसाब-किताब की पुस्तक में 'स्वतंत्रता' नाम से कोई प्रविष्टि लिखना व्यर्थ है। स्वतंत्रता उन लोगों की संपत्ति नहीं है जो उसे खरीदते या बेचते हैं। यह ऐसा वरदान है जिसे तुम्हें स्वयं अपने भीतर खोजना होगा और स्वयं अपने आपको देना होगा।

    सबसे पहले अपने आपको मृत्यु के भय से मुक्त करो। उस भय से, जो हमारे गले में जुए की तरह पड़ा हुआ है। उसके बाद निर्धनता के भय से भी स्वयं को मुक्त करो। यदि तुम जानना चाहते हो कि निर्धनता वास्तव में कितनी कम हानि पहुँचाती है तो गरीबों के चेहरों की तुलना धनवानों के चेहरों से करके देखो। गरीब व्यक्ति अक्सर खुलकर और हृदय से हँसता है। उसकी चिंताएँ उसके मन की गहराइयों तक नहीं पहुँचतीं। यदि कोई चिंता आ भी जाती है तो वह बादल के एक हल्के टुकड़े की तरह शीघ्र ही गुजर जाती है। किन्तु जिन्हें संसार सम्पन्न और सुखी मानता है, उनके चेहरे पर जो प्रसन्नता दिखाई देती है, वह प्रायः बनावटी होती है। उसके नीचे गहरे तक फैला हुआ दुःख छिपा रहता है, जो भीतर ही भीतर उनके जीवन को खोखला करता रहता है। उनका दुख इसलिए और भी गहरा हो जाता है कि वे सामान्यतः दूसरों के सामने अपने दुखी होने का प्रदर्शन नहीं कर सकते। उनके हृदय को पीड़ा भीतर-ही-भीतर कुतरती रहती है, फिर भी उन्हें बाहर से प्रसन्न, सफल और सुखी होने का अभिनय करना पड़ता है।

    मैं तुम्हें एक उपमा देता हूँ और मुझे इसका प्रयोग अधिक बार करना चाहिए क्योंकि यह मेरे विचार को व्यक्त करने का सबसे उपयुक्त माध्यम है। मानव जीवन एक नाटक के समान है, जिसमें हमें ऐसी भूमिकाएँ निभानी पड़ती हैं जिन्हें हम प्रायः पूरी तरह निभाने में भी समर्थ नहीं होते। वह व्यक्ति जो रंगमंच पर लंबे और भव्य वस्त्र पहनकर आता है, गर्व से सिर उठाकर कहता है—

“देखो, मैं पेलोप्स का उत्तराधिकारी होकर यूनानियों पर शासन करता हूँ। मेरा राज्य आयोनियन सागर और हेल्सपॉन्ट से लेकर कोरिन्थ के स्थलडमरूमध्य तक फैला हुआ है।”

वास्तव में वह एक दास है। उस अभिनय के बदले उसे केवल पाँच नाप अनाज और पाँच डेनारियस का पारिश्रमिक मिलता है। वही अभिमानी और कठोर स्वभाव का पात्र, जो अपनी शक्ति के गर्व से फूलकर कहता है—

“मेनिलाउस, चुप रहो, नहीं तो मेरे हाथों मारे जाओगे।”

वह भी प्रतिदिन मजदूरी पाता है और रात को फटे-पुराने टुकड़ों को जोड़कर बने कंबल पर सोता है। ऐसा ही उन सभी लोगों के बारे में भी कहा जा सकता है जिन्हें भीड़ के सिरों के ऊपर पालकियों में बैठाकर ले जाया जाता है और जिन्हें लोग बड़ा प्रतिष्ठित समझते हैं। उनका सुख भी केवल एक अभिनय है। यदि तुम उनके भव्य वस्त्र और बाहरी आडंबर उतार दो तो तुम उन्हें तुच्छ समझोगे।

    जब तुम कोई घोड़ा खरीदने जाते हो तो सबसे पहले उसकी जीन उतरवाते हो। बिक्री के लिए लाए गए घोड़े से उसके सभी साज-सामान हटवा देते हो ताकि उसके शरीर का कोई दोष तुम्हारी नज़र से छिप न जाए। तो फिर क्या तुम किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसके ऊपर लिपटे हुए वस्त्रों के आधार पर करोगे? दासों के व्यापारी अपने व्यापार की युक्तियों से उनके उन दोषों को छिपा देते हैं जो खरीदार को अप्रिय लग सकते हैं। इसी कारण समझदार खरीदार हर प्रकार के बाहरी आडंबर पर संदेह करता है। यदि तुम किसी का हाथ या पैर किसी पट्टी में बँधा हुआ देखो तो तुम अवश्य कहोगे कि उसे खोलकर वास्तविक अंग दिखाया जाए। क्या तुम उस स्किथिया या सार्मातिया के राजा को देखते हो, जिसके सिर पर अत्यंत भव्य मुकुट सुशोभित है? यदि तुम उसका वास्तविक मूल्य और उसके चरित्र का सच्चा स्वरूप जानना चाहते हो तो पहले उसका मुकुट उतार दो। उसके नीचे बहुत-सी बुराइयाँ छिपी हो सकती हैं।

    पर मैं दूसरों की ही बात क्यों करूँ? यदि तुम स्वयं अपना सही मूल्यांकन करना चाहते हो तो अपने धन, अपने घर, अपने पद और प्रतिष्ठा, इन सबको एक ओर रख दो और अपने भीतर झाँको। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे, तब तक तुम अपने बारे में वही जानते रहोगे जो दूसरे लोग तुम्हें बताते हैं, न कि जो तुम वास्तव में हो।


अभी के लिए विदा 

अंतरात्मा के संदर्भ में -- पत्र - 77

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हारे उस पत्र की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा हूँ जिसमें तुम सिसिली की अपनी समुद्री यात्रा के दौरान प्राप्त नई जानकारियों का वर्णन करोगे, विशेष रूप से स्वयं कैरीब्डिस (Charybdis) के बारे में कुछ निश्चित तथ्य बताओगे। मुझे अच्छी तरह ज्ञात है कि स्किल्ला (Scylla) वास्तव में केवल एक अंतरीप (समुद्र में निकली हुई चट्टानी भूमि) है और नौकायन के लिए विशेष रूप से खतरनाक नहीं है। परन्तु कैरीब्डिस के विषय में मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे विस्तार से लिखो। क्या वह वास्तव में वैसी ही है जैसी उसकी पौराणिक कथा में वर्णित है? यदि संयोग से तुमने उसका प्रत्यक्ष अवलोकन किया हो और ऐसा करना सचमुच सार्थक है तो मुझे उसके बारे में अवश्य बताना। क्या केवल एक विशेष प्रकार की हवा ही उसमें प्रचंड भँवर उत्पन्न करती है या फिर हर तेज़ झोंका समुद्र को उसी प्रकार आंदोलित कर देता है? क्या यह बात सच है कि जलडमरूमध्य में जो भी वस्तु उस भँवर में खिंच जाती है, वह कई मील तक समुद्र के भीतर बहती रहती है और फिर अंततः ताओरमिना (Taormina) के तट के निकट जाकर पुनः जल की सतह पर दिखाई देती है?


By Paul Klee

    यदि तुम इन बातों के बारे में मुझे लिखोगे तो मेरी अगली प्रार्थना कुछ साहसपूर्ण होगी। मेरे सम्मान में एटना (Etna) पर्वत पर भी चढ़ जाना। कुछ लोगों का कहना है कि उस पर्वत की चोटी भीतर-ही-भीतर क्षीण होती जा रही है और उसकी ऊँचाई धीरे-धीरे कम हो रही है। वे यह निष्कर्ष इस आधार पर निकालते हैं कि पहले वह समुद्र में बहुत अधिक दूरी से दिखाई देती थी। किन्तु इसका कारण यह भी हो सकता है कि उसकी ऊँचाई कम नहीं हुई है बल्कि उसकी अग्नि पहले की अपेक्षा मंद पड़ गई है। अब वह उतनी प्रचंडता और उतनी मात्रा में लावा तथा धुआँ नहीं उगलती जितना पहले उगलती थी। इन दोनों में से कोई भी व्याख्या असंगत नहीं है। यह संभव है कि पर्वत वास्तव में प्रतिदिन भीतर-ही-भीतर जलकर धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा हो। परन्तु यह भी उतना ही संभव है कि उसका आकार वैसा ही बना हुआ हो, क्योंकि अग्नि स्वयं पर्वत को नहीं जलाती बल्कि पृथ्वी की गहराइयों में स्थित किसी गुहा से ऊपर उठती है। उस स्थिति में पर्वत की चोटी अग्नि का स्रोत नहीं बल्कि केवल उसके बाहर निकलने का मार्ग है। लिसिया (Lycia) में एक प्रसिद्ध स्थान है, जिसे वहाँ के निवासी हेफैस्टियन (Hephaestion) कहते हैं। वहाँ भूमि में अनेक छिद्र हैं, जिनके चारों ओर ऐसी ज्वालाएँ जलती रहती हैं जो बिल्कुल हानिरहित हैं और आस-पास की वनस्पति को कोई क्षति नहीं पहुँचातीं। वह क्षेत्र घास से आच्छादित और अत्यन्त उपजाऊ है क्योंकि वे ज्वालाएँ किसी वस्तु को जलाती नहीं हैं। वे केवल एक ही स्थान पर शांत भाव से टिमटिमाती रहती हैं। किन्तु इन प्रश्नों पर विचार हम तब करेंगे, जब तुम पहले उन अन्य बातों के विषय में मुझे लिख चुके हो। यह भी बताना कि ज्वालामुखी के मुख (क्रेटर) से हिमाच्छादित क्षेत्रों की दूरी कितनी है। वे हिमखंड गर्मी से भली-भाँति सुरक्षित रहते हैं, यहाँ तक कि ग्रीष्म ऋतु में भी वे नहीं पिघलते।

    नहीं, इस परिश्रम का श्रेय मेरे आग्रह को मत दो। तुम्हारी जो उत्सुक अवस्था है, उसमें तुम यह कार्य वैसे भी करते, चाहे किसी ने तुमसे इसका अनुरोध किया होता या नहीं। मुझे कितना मूल्य चुकाना पड़े कि तुम अपनी कविता में एटना पर्वत का उल्लेख न करो, उस एटना का, जो प्रत्येक कवि के लिए एक पवित्र और प्रिय विषय रहा है! क्या ओविड ने केवल इसलिए उसके बारे में लिखना छोड़ दिया था कि वर्जिल पहले ही उस पर लिख चुका था या कॉर्नेलियस सेवेरुस उन दोनों के कारण उससे विमुख हो गया था? वास्तव में, यह ऐसा विषय है जो सभी के लिए समान रूप से उपजाऊ है। मेरा विचार है कि पहले के लेखकों ने इसकी संभावनाओं को समाप्त नहीं किया है बल्कि उन्होंने तो केवल आगे आने वालों के लिए मार्ग खोल दिया है। किसी ऐसे विषय को अपनाने में, जो पूरी तरह समाप्त हो चुका हो। ऐसे विषय को अपनाने में, जिस पर पहले भी लिखा जा चुका हो, बहुत अंतर है। एक विषय समय के साथ और अधिक समृद्ध होता जाता है। किसी की मौलिक कल्पना इस कारण समाप्त नहीं हो जाती कि उस विषय पर पहले भी किसी ने लिखा है। फिर, जो सबसे बाद में आता है, उसे एक विशेष लाभ भी प्राप्त होता है। शब्द तो उसके सामने पहले से ही उपस्थित रहते हैं, किन्तु उनका नया विन्यास उन्हें एक नया रूप और ताज़गी प्रदान कर देता है। ऐसा भी नहीं कि वह किसी और की संपत्ति का उपयोग कर रहा हो, भाषा तो सबकी साझा धरोहर है। यदि मैं तुम्हें ठीक से जानता हूँ तो तुम इस समय एटना के विषय में लिखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो और ऐसी कोई महान रचना करना चाहते हो जो तुम्हारे पूर्ववर्ती कवियों की कृतियों के समकक्ष हो। तुम्हारी विनम्रता तुम्हें यह आशा करने की अनुमति नहीं देती कि तुम उनसे आगे निकल जाओगे। तुम्हारे मन में अपने पूर्वजों के प्रति इतना सम्मान है कि यदि उन्हें पराजित करने का अवसर भी तुम्हारे सामने आए तो मेरा विश्वास है कि तुम अपनी प्रतिभा को ही संयमित कर लोगे।

    बुद्धिमत्ता का एक गुण यह है कि उसके मार्ग पर चढ़ते समय ही कोई व्यक्ति दूसरे से पीछे या आगे हो सकता है। परन्तु जब कोई उस शिखर तक पहुँच जाता है, तब सब एक ही स्तर पर होते हैं। वहाँ आगे बढ़ने के लिए कोई स्थान नहीं रहता। वही अंतिम सीमा है। क्या सूर्य अपने निश्चित आकार से अधिक बड़ा हो जाता है? क्या चन्द्रमा पूर्णिमा के बाद उससे भी अधिक बढ़ता है? क्या समुद्र का जल अपने निर्धारित स्तर से ऊपर उठ जाता है? नहीं, संसार अपनी निश्चित आकृति और व्यवस्था को बनाए रखता है। इसी प्रकार, जो वस्तु अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुकी है, वह स्वयं से अधिक नहीं हो सकती। इसलिए जो भी व्यक्ति बुद्धिमान बन जाता है, वह अन्य सभी बुद्धिमानों के समान स्तर पर होता है। हाँ, प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने विशिष्ट गुण हो सकते हैं। कोई अधिक सौम्य स्वभाव का होगा, कोई अधिक तीव्र बुद्धि का, कोई भाषण देने में अधिक प्रभावशाली होगा तो कोई अभिव्यक्ति में अधिक सुरुचिपूर्ण। किन्तु जहाँ तक उनके सुख के मूल स्रोत का प्रश्न है, वह सबमें समान होता है। एटना पर्वत कभी अपने ही भीतर ध्वस्त हो जाएगा या नहीं अथवा उसकी वह ऊँची चोटी, जो समुद्र में बहुत दूर से दिखाई देती है, अपनी निरंतर जलती हुई अग्नि के कारण धीरे-धीरे छोटी होती जा रही है या नहीं—यह मैं नहीं जानता। किन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि कोई भी अग्नि और कोई भी विनाश सद्गुण की महान और उदात्त प्रकृति को कभी नष्ट नहीं कर सकता। यही एक ऐसी महानता है, जिसमें कभी कोई कमी नहीं आती। उसे न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। उसकी महत्ता सदा स्थिर रहती है, ठीक उसी प्रकार जैसे आकाशीय पिंडों का निश्चित आकार और स्थान स्थिर रहता है।

    आओ, हम भी उस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करें। हमारा बहुत-सा कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। पर यदि सच कहा जाए तो वास्तव में इतना भी नहीं। केवल सबसे बुरे लोगों से बेहतर होना, अच्छा होना नहीं है।क्या कोई मनुष्य केवल इसलिए अपनी दृष्टि पर गर्व करता है कि वह इतना देख सकता है कि अभी दिन है? जब तेज़ सूर्य का प्रकाश उसकी धुँधली दृष्टि को चीरकर भीतर पहुँचता है तो उसे कुछ समय के लिए अंधकार से मुक्ति मिलने का संतोष अवश्य होता है किन्तु वह अभी भी उस प्रकाश का वास्तविक लाभ नहीं उठा रहा होता।हमें भी अपने ऊपर प्रसन्न होने का कोई कारण तब तक नहीं है, जब तक हम अज्ञान और अंधकार में भटकते रहना पूरी तरह छोड़ न दें। हमारा मन ऐसी अवस्था तक न पहुँच जाए जहाँ वह प्रकाश की ओर आँखें मिचमिचाकर न देखे बल्कि दिन के उजाले को पूर्ण रूप से निहार सके। जहाँ वह उस स्वर्गलोक में लौट सके, जहाँ से उसका उद्भव हुआ था और उस स्थान को पुनः प्राप्त कर सके, जो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।उसकी उत्पत्ति ही उसे ऊपर की ओर बुलाती है। यह शरीर रूपी कारागार से पूर्णतः मुक्त होने से पहले भी वहाँ पहुँच सकता है। जैसे ही वह अपने सभी दोषों को त्याग देता है और शुद्ध तथा हल्का होकर दैवी सत्य के चिंतन की ओर ऊपर उठ जाता है।

    प्रिय लूसीलियस, मुझे यह देखकर कितना आनंद हो रहा है कि हम यह साधना कर रहे हैं कि हम अपनी पूरी शक्ति के साथ इसी मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, चाहे बहुत कम लोग इसके बारे में जानें या फिर कोई भी न जाने।यश तो सद्गुण की छाया है। वह सद्गुण के साथ-साथ चलता है, तब भी जब उसे चाहा न गया हो। किन्तु जैसे छाया कभी आगे चलती है और कभी पीछे, वैसे ही यश का भी स्वभाव है। कभी वह पहले ही प्रकट होकर सबकी दृष्टि में आ जाता है। कभी बाद में आता है। पर तब, जब ईर्ष्या समाप्त हो चुकी होती है, उसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। डेमॉक्रिटस को कितने लंबे समय तक लोग पागल समझते रहे! सुकरात कितनी कठिनाई से विस्मृति में खो जाने से बच सके! कैटो कितने वर्षों तक अपने ही देशवासियों के लिए अपरिचित बने रहे! उनके देश ने उन्हें अस्वीकार कर दिया और उन्हें तब तक नहीं समझा, जब तक उन्हें खो नहीं दिया।रूटिलियस की निष्कलंकता और साहस भी कभी प्रकट न हो पाते, यदि उनके साथ अन्याय न हुआ होता। उसी अन्याय ने उन्हें एक प्रकाशस्तंभ बना दिया। निश्चय ही उन्हें इस बात के लिए भाग्य का आभारी होना चाहिए था कि उन्हें निर्वासन में भी अपने जीवन को गरिमा के साथ अपनाने का अवसर मिला।

    मैं अब तक उन लोगों की चर्चा कर रहा था, जिन्हें विपत्ति ने प्रसिद्धि प्रदान की। किन्तु अनेक ऐसे भी हुए हैं, जिनकी नैतिक उन्नति और महानता का मूल्यांकन लोगों ने उनके निधन के बाद ही किया। कितने ही ऐसे हैं, जिन्हें यश ने प्रसिद्ध नहीं किया बल्कि मानो उनकी मृत्यु के बाद उन्हें विस्मृति से निकालकर संसार के सामने प्रस्तुत किया। एपिक्यूरस को ही देखो। आज केवल विद्वान ही नहीं बल्कि सामान्य और अशिक्षित लोग भी उनका आदर करते हैं। किन्तु जब वे जीवित थे, तब एथेंस के निकट रहकर एकांत जीवन बिताने के कारण स्वयं एथेंस में भी लोग उन्हें लगभग नहीं जानते थे। इसी कारण अपने एक पत्र में, जिसमें उन्होंने कई वर्ष पहले दिवंगत हो चुके अपने मित्र मेट्रोडोरस के साथ की मित्रता को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण किया है, अंत में वे लिखते हैं कि इतने महान सौभाग्य के बीच भी उन्हें और मेट्रोडोरस को इस बात से कभी कोई हानि नहीं हुई कि प्रसिद्ध यूनान ने न केवल उन्हें पहचानने की उपेक्षा की बल्कि शायद ही कभी उनके बारे में सुना भी था। निश्चय ही, उनकी वास्तविक पहचान उनके निधन के बाद ही हुई और तभी उनकी कीर्ति वास्तव में उज्ज्वल और व्यापक बनी। मेट्रोडोरस भी अपने एक पत्र में स्वीकार करते हैं कि वे स्वयं और एपिक्यूरस अपने समय में बहुत अधिक प्रसिद्ध नहीं थे। फिर भी वे कहते हैं कि जो लोग उनके पदचिह्नों पर चलने के इच्छुक होंगे, उनके लिए महान यश पहले से ही सुरक्षित रहेगा।

    सद्गुण का कोई भी उदाहरण सदा के लिए छिपा नहीं रह सकता। यदि वह कुछ समय तक लोगों की दृष्टि से ओझल भी रहे तो उससे उसकी महत्ता में कोई कमी नहीं आती। चाहे वह कुछ समय के लिए विस्मृति में दबा रहे या अपने ही युग के लोगों की ईर्ष्या और द्वेष के कारण उपेक्षित कर दिया जाए, फिर भी एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब वही उसे प्रसिद्धि प्रदान करेगा। जो मनुष्य केवल अपने समकालीन लोगों की स्वीकृति की चिंता करता है, वह मानो केवल कुछ ही वर्षों के लिए जन्मा है। अभी आने वाले समय में हजारों वर्ष हैं और असंख्य पीढ़ियाँ आएँगी। इसलिए अपनी दृष्टि उनकी ओर भी रखो। यदि तुम्हारे समय के सभी लोग ईर्ष्या के कारण मौन रहें तो भी आगे चलकर ऐसे लोग अवश्य आएँगे जो बिना किसी द्वेष और बिना किसी पक्षपात के तुम्हारे गुणों का न्याय करेंगे। यदि यश सद्गुण का कोई प्रतिफल है तो वह प्रतिफल कभी नष्ट नहीं होता। यह सत्य है कि आने वाली पीढ़ियों की प्रशंसा हमारे कानों तक नहीं पहुँचेगी। फिर भी वह प्रशंसा, हमारी जानकारी के बिना ही, हमारी महानता के साथ जुड़ी रहेगी।

    जीवन में हो या मृत्यु के बाद, सद्गुण का सच्चे मन से किया गया अनुसरण कभी निष्फल नहीं जाता। परन्तु यह अनुसरण केवल बाहरी दिखावे का नहीं होना चाहिए न केश-सज्जा और आडंबर का बल्कि ऐसे चरित्र का होना चाहिए जो अचानक आने वाले व्यक्ति के सामने भी वैसा ही रहे जैसा किसी पूर्व-निश्चित अवसर पर होता है। दिखावा किसी काम नहीं आता। केवल ऊपर से रंगे-पुते चेहरे से बहुत कम लोग लंबे समय तक धोखा खाते हैं। मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी अंतरात्मा की गहराइयों तक पहुँचता है और अंततः प्रकट हो ही जाता है। छल-कपट में कोई स्थायित्व नहीं होता। झूठ अत्यंत कमजोर और नाजुक चीज़ है। उसे यदि ध्यान से परखा जाए, तो वह आर-पार दिखाई देने लगता है।

बीमारी के बारे में -- पत्र - 76

 प्रिय लूसीलियस 


तुम बार-बार होने वाले साइनस संक्रमण और उनके साथ आने वाले उन ज्वरों से पीड़ित हो जो बीमारी के पुरानी और लंबे समय तक बने रहने पर आते हैं। यह सुनकर मुझे दुःख हुआ, विशेषकर इसलिए कि मैं स्वयं भी इस प्रकार की बीमारी का अनुभव कर चुका हूँ। शुरू में मैंने इसकी अधिक परवाह नहीं की। उस समय मैं युवा था और कठिनाइयों को सहने में सक्षम था। बीमारी के सामने भी मैं अडिग रहता था। लेकिन अंततः मुझे उसके आगे झुकना पड़ा। मैं इतना दुर्बल और क्षीण हो गया कि ऐसा प्रतीत होता था मानो मेरा पूरा शरीर मेरे साइनसों के रास्ते धीरे-धीरे बहकर निकल रहा हो। एक से अधिक बार मेरे मन में अपने जीवन का अंत कर लेने का विचार आया। किन्तु मेरे पिता वृद्ध थे। यही बात मुझे रोक लेती थी। क्योंकि यद्यपि मुझे विश्वास था कि मैं साहसपूर्वक मृत्यु का सामना कर सकता हूँ, फिर भी मैं यह भी जानता था कि मेरे प्रति इतना स्नेह रखने वाले मेरे पिता मेरे वियोग को उसी साहस के साथ सहन नहीं कर पाएँगे। इसलिए मैंने स्वयं को जीवित रहने का आदेश दिया क्योंकि कभी-कभी केवल जीवित बने रहना भी साहस का कार्य होता है।


By Paul Klee 

    मैं तुम्हें बताऊँगा कि उस समय मुझे किस बात से सांत्वना मिली। पर उससे पहले मैं यह कहना चाहता हूँ कि जिन विचारों ने मुझे सांत्वना दी, उनमें औषधि के समान उपचार करने की शक्ति थी। श्रेष्ठ सांत्वनाएँ रोग का उपचार करती हैं। जो मन को ऊपर उठाती हैं, वही शरीर को भी लाभ पहुँचाती हैं। मेरे अध्ययन ने मुझे बचाया। दर्शन ही वह शक्ति था जिसके कारण मैं बिस्तर से उठ सका और जिसने मुझे पुनः बल प्रदान किया। मैं अपने जीवन का ऋणी उसी का हूँ और जीवन तो उस पर मेरे ऋण का सबसे छोटा भाग है। मेरे स्वस्थ होने में मेरे मित्रों का भी बहुत बड़ा योगदान था। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाया, मेरे साथ रात-रात भर जागे, मुझसे बातें कीं और इस प्रकार मुझे सांत्वना दी। प्रिय लुसिलियस, किसी रोगी को अपने स्नेही मित्रों से बढ़कर कोई शक्ति नहीं देती। कोई भी चीज़ उसके मन से मृत्यु के विचारों और मृत्यु के भय को उतना दूर नहीं करती। मुझे ऐसा अनुभव होता था कि जब तक वे जीवित हैं, तब तक मैं वास्तव में मर नहीं रहा हूँ। मेरा आशय यह है कि मुझे लगता था कि मैं उनके बीच रहकर नहीं बल्कि उनके माध्यम से जीवित रहूँगा। ऐसा प्रतीत होता था कि मैं अपने प्राण त्याग नहीं रहा बल्कि उन्हें आगे सौंप रहा हूँ।

    इन्हीं बातों ने मुझे अपने उपचार का प्रयास करने और हर प्रकार की पीड़ा सहने की इच्छा दी। इनके बिना मनुष्य की अवस्था अत्यंत दयनीय हो जाती है। वह मरने का इरादा तो छोड़ देता है पर जीने की इच्छा भी उसके भीतर नहीं रहती। इसलिए तुम भी इन उपायों को अपनाओ। चिकित्सक तुम्हें बताएगा कि कितनी दूर तक टहलना है, कितना व्यायाम करना है। वह तुम्हें आलस्य में पड़े रहने से रोकेगा क्योंकि दुर्बलता आने पर मनुष्य का स्वभाव निष्क्रिय हो जाने का होता है। वह तुम्हें ऊँचे स्वर में पढ़ने के लिए कहेगा ताकि तुम्हारी श्वास का मार्ग और उसका आधार, जो इस रोग से प्रभावित है, अभ्यास प्राप्त करे। वह तुम्हें नाव में घूमने की सलाह देगा, जिससे उसकी हल्की-हल्की डोल तुम्हारे पाचन-तंत्र को सक्रिय करे। वह यह भी बताएगा कि कौन-सा भोजन करना चाहिए, कब शक्ति बढ़ाने के लिए थोड़ी-सी मदिरा लेनी चाहिए, कब मदिरा से परहेज़ करना चाहिए, ताकि वह तुम्हारी खाँसी को न भड़काए और उसे अधिक गंभीर न बना दे। किन्तु जो सलाह मैं तुम्हें देता हूँ, वह केवल इस बीमारी का ही नहीं बल्कि तुम्हारे समूचे जीवन का उपचार है। वह यह है, मृत्यु का तिरस्कार करो। एक बार जब हम मृत्यु के भय से मुक्त हो जाते हैं, तब कोई भी बात हमें दुःखद नहीं लगती।

    हर बीमारी अपने साथ तीन प्रकार की पीड़ाएँ लेकर आती है— मृत्यु का भय, शरीर की वेदना और जीवन के सुखों में व्यवधान। मृत्यु के विषय में मैं पर्याप्त कह चुका हूँ। केवल एक बात और जोड़नी है। मृत्यु किसी बीमारी का नहीं बल्कि हमारे स्वभावगत जीवन का अंतिम पड़ाव है। अनेक बार बीमारी मृत्यु को टाल देती है और कई लोगों का मृत्यु के लिए तैयार हो जाना ही उनके जीवन को बचा चुका है। तुम इसलिए नहीं मरोगे कि तुम बीमार हो। तुम इसलिए मरोगे क्योंकि तुम जीवित हो। यह सत्य तुम्हारे स्वस्थ हो जाने के बाद भी बना रहेगा। स्वस्थ होना बीमारी से छुटकारा पाना है, मृत्यु से नहीं।

    अब उस पीड़ा की ओर आएँ जो विशेष रूप से बीमारी की पहचान है। बीमारी में तीव्र शारीरिक वेदना के दौर आते हैं, किन्तु उनके बीच-बीच में विश्राम भी मिलता रहता है। यही उन्हें सहने योग्य बनाता है। क्योंकि जब पीड़ा अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तब उसका अंत निकट होता है। कोई भी व्यक्ति अत्यंत तीव्र पीड़ा को बहुत लंबे समय तक नहीं झेल सकता। प्रकृति ने हमारे प्रति अपने महान स्नेह के कारण हमारी रचना इस प्रकार की है कि पीड़ा या तो सहने योग्य होती है या फिर अल्पकालिक। सबसे तीव्र पीड़ाएँ शरीर के सबसे छोटे और पतले अंगों में होती हैं जैसे, नसों, उँगलियों के जोड़ और अन्य संकीर्ण भागों में। जब रोग किसी छोटे-से स्थान में सिमट जाता है तो वहीं सबसे अधिक वेदना होती है। किन्तु ये अंग शीघ्र ही सुन्न भी हो जाते हैं क्योंकि पीड़ा स्वयं ही उनकी पीड़ा का अनुभव करने की शक्ति को नष्ट कर देती है। संभव है कि ऐसा इसलिए होता हो कि शरीर की स्वाभाविक प्राणवायु का प्रवाह रुक जाता है और वह अपनी शक्ति तथा चेतना प्रदान करने की क्षमता खो बैठती है। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि दूषित द्रव, जिसके बाहर निकलने का मार्ग बंद हो गया हो, अपने ही दबाव से इकट्ठा होकर उन स्थानों की संवेदना नष्ट कर देता हो जहाँ वह जमा होता है। इसी कारण गठिया, संधिवात तथा नसों और रीढ़ की अन्य पीड़ादायक बीमारियों में दर्द रुक-रुक कर होता है क्योंकि जहाँ पीड़ा होती है, वहाँ की संवेदना कुछ समय के लिए क्षीण पड़ जाती है। इन सभी रोगों में प्रारम्भिक आक्रमण अत्यंत कष्टदायक होता है, किन्तु समय बीतने के साथ उसका तीखापन कम हो जाता है और अंततः सुन्नता पीड़ा का अंत कर देती है। दाँत, आँख और कान का दर्द भी अत्यंत तीव्र होता है क्योंकि वे शरीर के बहुत छोटे भागों में उत्पन्न होते हैं। यही बात सिरदर्द पर भी लागू होती है। लेकिन जब वे अत्यधिक बढ़ जाते हैं तो मनुष्य पहले अचेत-सा हो जाता है और फिर नींद में चला जाता है। अतः जब पीड़ा असहनीय प्रतीत हो तो यह विचार हमारे लिए सांत्वना का कारण होना चाहिए कि यदि उसका अनुभव अत्यधिक तीव्र है, तो वह अंततः संवेदना के लुप्त हो जाने के साथ समाप्त भी हो जाएगा।

    जो लोग अभ्यासहीन होते हैं, वे शारीरिक कष्टों से इसलिए इतना अधिक व्याकुल हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने मन में संतोष प्राप्त करना कभी सीखा ही नहीं होता। उनका अधिकांश ध्यान और लगाव केवल शरीर तक ही सीमित रहता है। इसलिए महान और बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन को शरीर से अलग रखता है। वह अपने श्रेष्ठ और दिव्य स्वरूप अर्थात अपने मन से अधिक संबंध रखता है। इस दुर्बल तथा निरंतर शिकायत करने वाले शरीर पर केवल उतना ही ध्यान देता है जितना आवश्यक हो।

    “लेकिन जिन सुखों का हमें अभ्यास हो चुका है, उनसे वंचित होना कष्टदायक है, भोजन छोड़ना, प्यास और भूख सहना।” निस्संदेह, जब कोई पहली बार इन चीज़ों का त्याग करता है, तब उन्हें सहना कठिन लगता है। परंतु बाद में उनकी लालसा स्वयं ही कम होने लगती है क्योंकि हमारी इच्छाओं के स्रोत धीरे-धीरे मंद पड़ जाते हैं और अंततः क्षीण हो जाते हैं। तब भूख भी केवल चिड़चिड़ापन भर रह जाती है और जिन खाद्य पदार्थों की पहले तीव्र इच्छा होती थी, वे भी अरुचिकर लगने लगते हैं। जिस वस्तु की इच्छा ही समाप्त हो जाए, उससे वंचित होने में कोई कड़वाहट नहीं रहती।

    इसके अतिरिक्त, ऐसी कोई पीड़ा नहीं होती जो समय-समय पर समाप्त न होती हो या कम से कम कुछ घट न जाती हो। इतना ही नहीं, उचित औषधियों के द्वारा उसके आने से पहले ही सावधानी बरती जा सकती है और उसे रोका भी जा सकता है। हर प्रकार की पीड़ा, विशेषकर जो बार-बार आती है, अपने आने का कुछ-न-कुछ संकेत पहले ही दे देती है। यदि तुम बीमारी की सबसे भयानक धमकियों को तुच्छ समझो, तो बीमारी को सहना कठिन नहीं रहता।

    अपनी शिकायतों के बोझ से अपने कष्टों को और अधिक कठिन मत बनाओ। जब तक हम अपनी धारणाओं से उसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखते, तब तक पीड़ा बहुत छोटी बात होती है। यदि तुम स्वयं को यह कहते हुए उत्साहित करना शुरू करो, “यह कुछ भी नहीं है या कम-से-कम बहुत अधिक नहीं है। जब तक यह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक इसे धैर्यपूर्वक सह लेते हैं”, तो जब तक तुम उसे तुच्छ समझोगे, वह वास्तव में तुम्हारे लिए तुच्छ ही बनी रहेगी। सब कुछ हमारी धारणा पर निर्भर करता है। केवल महत्त्वाकांक्षा, भोग-विलास और लोभ ही हमारी धारणाओं से संचालित नहीं होते; हम पीड़ा का अनुभव भी उसी के अनुसार करते हैं। मनुष्य उतना ही दुःखी होता है, जितना वह स्वयं को दुःखी मानता है।

    मेरा विचार है कि हमें बीती हुई पीड़ाओं की शिकायतें भी छोड़ देनी चाहिए और इस प्रकार की बातें भी नहीं करनी चाहिए—“इतना कष्ट किसी ने कभी नहीं सहा! कैसी भयानक यातना थी! किसी को विश्वास नहीं था कि मैं बच जाऊँगा। मेरा परिवार मेरे लिए निराश हो चुका था। चिकित्सकों ने भी आशा छोड़ दी थी। यातना-यंत्र पर तोड़े जाने वाले लोग भी उतना कष्ट नहीं सहते होंगे जितना मैंने सहा!” यदि ये सब बातें सत्य भी हों तो भी वे अब बीत चुकी हैं। बीते हुए कष्टों को बार-बार याद करके क्या लाभ? जो दुःख तब था, उसके कारण आज फिर से दुःखी होने का क्या अर्थ है? फिर, मनुष्य अपनी विपत्तियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का आदी होता है। वह दूसरों को ही नहीं, स्वयं को भी धोखा देता है। और सच तो यह है कि जिस पीड़ा को सहना उस समय कड़वा लगता है, वही उसके बीत जाने पर स्मरण में सुखद प्रतीत होती है। समाप्त हो चुके कष्टों पर प्रसन्न होना मनुष्य का स्वाभाविक स्वभाव है। 

    इसलिए दो बातों को हमें अपने मन से निकाल देना चाहिए— भविष्य के कष्टों का भय और बीते हुए कष्टों की स्मृति। पहला अभी मेरे सामने नहीं है और दूसरा अब मेरा नहीं रहा। जब कोई मनुष्य कठिनाइयों के बीच हो तो उसे अपने आप से कहना चाहिए— “संभव है कि एक दिन इन्हीं बातों को याद करके मुझे आनंद प्राप्त हो।” 

    फिर उसे पूरी शक्ति के साथ उन कठिनाइयों का सामना करना चाहिए। यदि वह उनके आगे झुक जाएगा तो पराजित हो जाएगा। लेकिन यदि वह अपनी पीड़ा का दृढ़तापूर्वक सामना करेगा तो उसी पर विजय प्राप्त करेगा। अधिकांश लोग वही करते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए। जिस भवन को उन्हें सहारा देकर गिरने से बचाना चाहिए, उसी को वे अपने ऊपर गिरा लेते हैं। जब कोई भारी वस्तु तुम्हारे ऊपर झुकी हुई हो, तुम्हें दबा रही हो और अपने भार से कुचल रही हो, तो यदि तुम पीछे हटने लगो, वह और अधिक वेग से तुम्हारे ऊपर गिर पड़ेगी। लेकिन यदि तुम दृढ़ता से डटे रहो तो तुम उसे पीछे धकेल सकोगे।

    मुक्केबाज़ अपने चेहरे और पूरे शरीर पर अनेक प्रहार सहते हैं। फिर भी यश की इच्छा से वे उस पीड़ा को सहन करते हैं। केवल प्रतियोगिता के समय ही नहीं बल्कि प्रतियोगिता की तैयारी करते हुए अभ्यास के दौरान भी। उनका प्रशिक्षण भी उन्हें कष्ट देता है। आओ, हम भी प्रत्येक संघर्ष में विजय को अपना लक्ष्य बनाएँ। हमारे लिए भी एक पुरस्कार है— न पुष्पमाला, न विजय की ताड़-पत्ती, न कोई तुरही जो हमारे नाम की घोषणा करे बल्कि उत्कृष्ट चरित्र, मन की अडिग दृढ़ता, और वह शांति जो किसी भी संघर्ष में भाग्य पर विजय प्राप्त करने के बाद सदा के लिए प्राप्त होती है।

    “मुझे बहुत पीड़ा हो रही है।” तो क्या हुआ? यदि तुम उसे एक दुर्बल व्यक्ति की तरह सहोगे तो क्या वह तुम्हें कम पीड़ा देगी? जिस प्रकार युद्ध में भागते हुए सैनिकों पर शत्रु अधिक विनाशकारी प्रहार करते हैं, उसी प्रकार दुर्भाग्य का प्रत्येक आघात उन लोगों पर अधिक भारी पड़ता है जो उसके सामने हार मान लेते हैं और उससे मुँह मोड़ लेते हैं। “लेकिन यह बोझ बहुत भारी है।” तो क्या हुआ? क्या हमारी शक्ति केवल हल्के बोझ उठाने के लिए ही है?

    क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारी बीमारी लंबी चले या थोड़े समय की हो लेकिन अत्यंत तीव्र? यदि वह लंबी चले तो उसके बीच-बीच में कुछ विश्राम भी मिलेगा, कुछ राहत के क्षण भी मिलेंगे। वह तुम्हें सँभलने का अवसर देगी, क्योंकि जहाँ रोग का प्रकोप होता है, वहाँ उसके शांत होने का समय भी अवश्य आता है। यदि बीमारी अल्पकालिक लेकिन अत्यंत तीव्र हो, तो उसके केवल दो ही परिणाम हो सकते हैं या तो बीमारी समाप्त हो जाएगी या फिर वही तुम्हारे जीवन का अंत कर देगी। इससे क्या अंतर पड़ता है कि बीमारी समाप्त हो जाए या मैं ही समाप्त हो जाऊँ? दोनों ही स्थितियों में पीड़ा का अंत हो जाता है।

    यह भी लाभदायक होगा कि तुम अपने मन को पीड़ा से हटाकर दूसरे विचारों की ओर ले जाओ। उन सम्माननीय और साहसपूर्ण कार्यों का स्मरण करो जो तुमने किए हैं। अपने चरित्र के श्रेष्ठ गुणों पर विचार करो। अपनी स्मृति को उन सभी बातों में विचरण करने दो जिन्हें तुमने जीवन में सबसे अधिक प्रशंसनीय माना है। फिर उन महान व्यक्तियों को याद करो जिन्होंने पीड़ा पर विजय प्राप्त की। उस व्यक्ति को स्मरण करो जो अपनी नसों के ऑपरेशन के दौरान भी पुस्तक पढ़ता रहा। और उस व्यक्ति को भी, जिसने यातना देने वालों के उसके साहस से क्रुद्ध होकर अपनी क्रूरता के सभी साधन आज़माने पर भी हँसना नहीं छोड़ा। यदि हँसी पीड़ा को पराजित कर सकती है तो क्या विवेक उसे पराजित नहीं कर सकता? तुम चाहे जिस पीड़ा का नाम ले लो—साइनस का संक्रमण, लगातार उठने वाली इतनी तीव्र खाँसी कि उससे शरीर के भीतर का अंश बाहर आने लगे। भीतर तक जलाने वाला ज्वर। असहनीय प्यास; या जोड़ों के विकार से टेढ़े-मेढ़े हो चुके अंग— इनमें से कोई भी उस अग्नि, उस यातना-यंत्र, उस दागने वाले तप्त लोहे या पहले से घायल घावों को और गहरा तथा अधिक पीड़ादायक बनाने के लिए किए गए अत्याचारों जितना भयंकर नहीं है। फिर भी उन यातनाओं को सहने वालों में एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने कराह तक नहीं की। इतना ही नहीं, उसने दया की भीख भी नहीं माँगी। इतना ही नहीं, उसने कोई उत्तर भी नहीं दिया। इतना ही नहीं, वह हँसा और वह हँसी बनावटी नहीं, सच्ची थी। तो फिर, क्या तुम भी अपनी इस पीड़ा पर हँसकर विजय प्राप्त नहीं कर सकते?

    “लेकिन बीमारी मुझे कोई भी काम करने नहीं देती। वह मुझे मेरे कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है।” बीमारी तुम्हारे शरीर को बाधित करती है, तुम्हारे मन को नहीं। वह धावक के पैरों को धीमा कर सकती है। बढ़ई या दर्जी के हाथों को बोझिल बना सकती है। लेकिन यदि तुम्हारा वास्तविक कार्य मन से संबंधित है तो तुम शिक्षा देना, उपदेश करना, सुनना, सीखना, प्रश्न करना और चिंतन करना कभी नहीं छोड़ोगे।

    “और इससे भी बढ़कर? क्या तुम यह समझते हो कि बीमारी की अवस्था में आत्मसंयम का पालन करना कोई कार्य नहीं है? तुम सबको यह दिखा सकते हो कि बीमारी पर विजय प्राप्त की जा सकती है या कम-से-कम उसे धैर्यपूर्वक सहा जा सकता है। मुझ पर विश्वास करो, रोग-शय्या पर भी साहस के लिए स्थान होता है। केवल शस्त्र उठाकर युद्ध करना ही निर्भीक और अजेय आत्मा का प्रमाण नहीं है; एक साहसी मनुष्य अपने गुणों का परिचय बिस्तर पर पड़े-पड़े भी देता है। तुम्हारा भी एक कर्तव्य है— बीमारी के साथ साहसपूर्वक संघर्ष करना। यदि वह न तो तुम्हें विवश कर सके और न ही तुम्हारे मन को अपनी ओर झुका सके, तो तुम दूसरों के सामने एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करोगे। काश, लोग बीमारी की अवस्था में भी हमें ध्यान से देखते! तब गौरव प्राप्त करने के कितने अवसर उपलब्ध होते। इसलिए स्वयं ही अपने साक्षी बनो और स्वयं ही अपनी प्रशंसा के योग्य बनो।

    इसके अतिरिक्त, सुख भी दो प्रकार के होते हैं। बीमारी शारीरिक सुखों में बाधा तो डालती है पर उन्हें पूरी तरह समाप्त नहीं करती। बल्कि यदि ठीक से विचार किया जाए तो वह उन्हें और अधिक तीव्र बना देती है। प्यासे व्यक्ति को पानी अधिक आनंद देता है। भूखे व्यक्ति को भोजन अधिक स्वादिष्ट लगता है और जिस वस्तु से कुछ समय तक वंचित रहना पड़ा हो, उसके मिलने पर उससे अधिक प्रसन्नता प्राप्त होती है। जहाँ तक मानसिक सुखों का प्रश्न है, किसी भी चिकित्सक ने कभी अपने रोगी को उनसे दूर रहने की सलाह नहीं दी। ये सुख शारीरिक सुखों से कहीं अधिक श्रेष्ठ और स्थायी होते हैं। जो व्यक्ति समझदारी के साथ इन्हीं में अपना मन लगाता है, वह इंद्रियों को गुदगुदाने वाले क्षणिक सुखों की परवाह करना छोड़ देता है। “बेचारा रोगी!” क्यों? इसलिए कि वह अपनी मदिरा को बर्फ़ में ठंडा करके नहीं पी सकता? इसलिए कि वह अपने बड़े प्याले में बर्फ़ के टुकड़े डालकर उसे और शीतल नहीं कर सकता? इसलिए कि उसके सामने भोजन की मेज़ पर ही कैम्पानिया के सीप नहीं खोले जाते? इसलिए कि उसके भोजन के समय रसोइए अंगीठियाँ खींचते हुए, उन पर अभी भी भुनते हुए मांस लेकर इधर-उधर नहीं दौड़ते? भोग-विलास ने तो अब यह नया तरीका भी निकाल लिया है कि पूरा रसोईघर ही भोजन के साथ बाहर आ जाता है ताकि पकवान केवल गरम ही न रहें बल्कि इतने गरम हों कि सबसे कठोर स्वाद-इंद्रिय को भी झुलसा दें।

    “बेचारा रोगी!” वह उतना ही खाएगा जितना उसका शरीर पचा सके। उसकी मेज़ के एक ओर जंगली सूअर का मांस इस प्रकार नहीं पड़ा रहेगा मानो वह कोई साधारण और तुच्छ भोजन हो जिसे मेज़ से हटा दिया गया हो। उसकी थाली पर जंगली पक्षियों के वक्षस्थल का ढेर नहीं लगाया जाएगा क्योंकि वह पूरे पक्षी को परोसा हुआ देखना सहन नहीं कर सकता। आख़िर तुम्हारे साथ ऐसा कौन-सा दुर्भाग्य घट गया है? तुम रोगी की तरह भोजन करोगे अर्थात स्वस्थ और विवेकपूर्ण मनुष्य की तरह।

    जहाँ तक तरल आहार, गुनगुने पानी और उन सभी बातों का प्रश्न है जो विलासी लोगों को असहनीय प्रतीत होती हैं। वे लोग जो वास्तव में शरीर से नहीं बल्कि मन से बीमार होते हैं, उन्हें सहने में हमें कोई कठिनाई नहीं होगी, यदि हम मृत्यु से भयभीत होना छोड़ दें। हम मृत्यु से तभी निर्भय होंगे, जब हम यह जान लेंगे कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। तब न तो जीवन हमें बोझिल लगेगा और न ही मृत्यु भयावह प्रतीत होगी। जब मनुष्य अपने मन को इतने विविध, महान और दिव्य विषयों के चिंतन में लगाता है, तब जीवन से ऊब उसे कभी नहीं घेर सकती। आत्म-वितृष्णा तभी उत्पन्न होती है, जब मनुष्य अपना अवकाश निष्क्रियता में बिताता है। जो मन समस्त ब्रह्मांड में विचरण करता है और सत्य की खोज में लगा रहता है, वह कभी सत्य से नहीं ऊबता। ऊब केवल असत्य से होती है।

    और यदि ऐसी अवस्था में मृत्यु उसके पास आ जाए और उसे अपने साथ चलने के लिए बुलाए चाहे वह उसकी अपेक्षित आयु से बहुत पहले ही क्यों न आए तो भी वह मनुष्य पहले ही एक परिपूर्ण दीर्घ जीवन का समस्त लाभ प्राप्त कर चुका होता है। उसने संसार में जानने योग्य बहुत-सी बातें जान ली होती हैं। वह यह समझ चुका होता है कि किसी कर्म की श्रेष्ठता केवल उसके लंबे समय तक किए जाने से नहीं बढ़ती। किन्तु जो लोग जीवन को केवल उन भोग-विलासों के आधार पर मापते हैं जो निरर्थक हैं और इसी कारण कभी समाप्त नहीं होते, उन्हें हर जीवन छोटा ही दिखाई देता है।

    इन विचारों के द्वारा अपने आपको नया रूप दो। साथ ही, मेरे पत्रों के लिए भी समय निकालते रहो। एक दिन ऐसा आएगा जब हम दोनों फिर से मिलेंगे बल्कि एक-दूसरे के साथ रहेंगे। वह समय चाहे छोटा ही क्यों न हो, हम उसका सदुपयोग करके उसे लंबा बना देंगे। जैसा कि पोसिडोनियस ने कहा है—

“एक शिक्षित व्यक्ति के लिए एक दिन भी उतना समय देता है, जितना एक अशिक्षित व्यक्ति को उसका पूरा लंबा जीवन भी नहीं दे पाता।”

तब तक इस शिक्षा को दृढ़तापूर्वक थामे रहो। इसे कभी मत छोड़ो। विपत्ति के सामने मत झुको, समृद्धि पर भरोसा मत करो और भाग्य के स्वभाव को सदा ध्यान में रखो। यह समझकर चलो कि जो कुछ तुम्हारे साथ घट सकता है, वह एक दिन अवश्य घटेगा। जिस घटना की पहले से अपेक्षा कर ली जाती है, उसके आने पर उसे सहना कहीं अधिक सरल होता है।


अभी के लिए विदा 

Monday, 20 July 2026

विवेक के संदर्भ में -- पत्र - 75 (एक स्टोइक के पत्र- सेनेका)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम तो यह कसम खा चुके हो कि यदि मैं तुम्हें अपने दिनभर की प्रत्येक गतिविधि की सूचना न दूँ तो तुम मेरे शत्रु बन जाओगे। देखो, मैं तुम्हारे साथ अपने जीवन के विषय में कितना स्पष्ट और निष्कपट हूँ। मैं यह बात भी तुमसे साझा करता हूँ, मैं दर्शनशास्त्र का अध्ययन कर रहा हूँ! आज लगातार पाँचवाँ दिन है जब मैं दोपहर के दो बजे से दार्शनिक का व्याख्यान सुनने के लिए विद्यालय गया हूँ।

    "क्या? इस उम्र में?" तुम पूछोगे। क्यों नहीं? इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति केवल इसलिए किसी बात को सीखने से वंचित रह जाए क्योंकि उसने उसे पहले नहीं सीखा था?

    “तो क्या मुझे उन युवा शिष्यों का ही अनुसरण करना चाहिए?” यदि अपनी बढ़ती हुई आयु में मैं इससे अधिक कोई लज्जाजनक कार्य नहीं कर रहा तो मैं अपने को भाग्यशाली ही मानूँगा। यह ऐसा विद्यालय है जहाँ हर आयु के लोगों का स्वागत है।

By Paul Klee 

    “क्या बुढ़ापा इसी के लिए है कि व्यक्ति युवाओं के पीछे-पीछे विद्यालय जाए?” तो क्या बुढ़ापे में मुझे रंगमंच जाना चाहिए? क्या मुझे अपनी पालकी में बैठकर सर्कस (रथ-दौड़ के मैदान) जाना चाहिए, हर ग्लैडिएटर के युद्ध में उपस्थित होना चाहिए और फिर भी किसी दार्शनिक के पास जाने में लज्जा करनी चाहिए? जब तक तुम्हारे भीतर ज्ञान का अभाव है, तब तक तुम्हें सीखते रहना चाहिए अथवा, यदि उस कहावत पर विश्वास करें तो जब तक जीवित हो, तब तक सीखते रहना चाहिए। यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, जब तक जीवन है, तब तक यह सीखते रहना कि जीवन कैसे जीना चाहिए। इस विषय में मेरे पास भी सिखाने के लिए एक बात है। “वह क्या?” तुम पूछते हो। वह यह है कि वृद्ध व्यक्ति के पास भी सीखने के लिए कुछ न कुछ अवश्य होता है।

    परन्तु जब-जब मैं उस विद्यालय में प्रवेश करता हूँ, तब-तब मुझे समूची मानव जाति पर लज्जा आती है। जैसा कि तुम जानते हो, मेट्रोनैक्स के घर पहुँचने के लिए मुझे नेपल्स के रंगमंच के सामने से होकर जाना पड़ता है। वहाँ का रंगमंच लोगों से खचाखच भरा रहता है। उत्साह से भरी भीड़ यह निर्णय करती है कि सबसे अच्छा बाँसुरी-वादक कौन है। तुरही-वादक के भी अपने प्रशंसक हैं और उद्घोषक के भी। किन्तु जहाँ यह प्रश्न उठता है कि वास्तव में अच्छा मनुष्य कौन है और जहाँ यह सिखाया जाता है कि अच्छा मनुष्य कैसे बना जाए, वहाँ की आसन-पंक्तियाँ लगभग खाली पड़ी रहती हैं। सामान्य लोगों की धारणा यह होती है कि वहाँ बैठने वालों के पास करने के लिए कोई और काम नहीं है। वे उन्हें निकम्मे और निष्क्रिय लोग कहकर उपहास करते हैं। किन्तु मुझे ऐसे उपहास की कोई परवाह नहीं। अज्ञानी लोगों की आलोचना ऐसी वस्तु नहीं है जिससे व्याकुल हुआ जाए। जिसका लक्ष्य श्रेष्ठ और सम्माननीय हो, उसे उनके उपहास का भी तिरस्कार कर देना चाहिए।

    इसलिए, लूसीलियस, शीघ्रता करो। जल्दी आगे बढ़ो, कहीं ऐसा न हो कि जो मेरे साथ हुआ, वही तुम्हारे साथ भी हो और तुम्हें वृद्धावस्था में आकर विद्यार्थी बनना पड़े। पर वास्तव में तुम्हें शीघ्रता इसलिए करनी चाहिए कि जिस विद्या का तुमने अध्ययन आरम्भ किया है, वह ऐसी है जिसे यदि तुम वृद्धावस्था में भी सीखना शुरू करो, तब भी उसे पूरी तरह आत्मसात कर पाना अत्यन्त कठिन है।

    “तुम पूछते हो, ‘मैं कितनी प्रगति कर सकता हूँ?’ जितना प्रयास करोगे, उतनी ही प्रगति करोगे। तुम किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हो? केवल संयोगवश किसी को भी बुद्धिमत्ता प्राप्त नहीं होती। धन अपने आप आ सकता है। सार्वजनिक पद तुम्हें प्रदान किया जा सकता है। लोकप्रियता और प्रभाव भी संभव है कि बिना किसी विशेष प्रयास के तुम्हें मिल जाएँ। परन्तु सद्गुण (Virtue) अपने आप कभी प्राप्त नहीं होता। उसे पहचानने और प्राप्त करने के लिए जो परिश्रम करना पड़ता है, वह न तो सरल है और न ही अल्पकालिक। फिर भी वह प्रयास करने योग्य है क्योंकि उसी के द्वारा मनुष्य एक ही साथ सभी वास्तविक शुभों का अधिकारी बन जाता है। वास्तव में शुभ केवल एक ही है। वह है सम्माननीय और नैतिक रूप से श्रेष्ठ आचरण। जिन वस्तुओं की संसार प्रतिष्ठा करता है और जिन्हें लोग बाहरी सफलता का प्रतीक मानते हैं, उनमें तुम्हें न तो कोई वास्तविक मूल्य मिलेगा और न ही कोई स्थायी या निश्चित आधार।

    अब मैं यह स्पष्ट करूँगा कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही वास्तविक शुभ क्यों है क्योंकि तुम्हारा विचार है कि अपने पिछले पत्र में मैं इस निष्कर्ष को सिद्ध करने के बजाय केवल उसकी प्रशंसा ही कर सका था। इसलिए अब मैं इस विषय पर कही गई बातों का संक्षिप्त प्रतिपादन करता हूँ।

    प्रत्येक वस्तु की अपनी एक विशिष्ट उत्कृष्टता होती है। उर्वरता बेल (अंगूर की लता) का गुण है। उत्तम स्वाद अंगूरी मदिरा का गुण है; तीव्र गति हिरण का गुण है। यदि किसी खच्चर की बात हो तो तुम यह पूछते हो कि उसकी पीठ कितनी मजबूत है क्योंकि उसका मुख्य कार्य बोझ ढोना है। कुत्ते में, यदि उसका काम शिकार का पता लगाना है तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी तीव्र घ्राण-शक्ति होती है। यदि उसका काम शिकार का पीछा करना है तो उसकी तेज़ दौड़ने की क्षमता। यदि उसे शिकार पर झपटना और उसे दबोचना है तो उसका साहस उसकी सर्वोत्तम विशेषता है। प्रत्येक प्राणी में वही गुण सबसे श्रेष्ठ माना जाना चाहिए, जिसके लिए वह स्वभावतः उत्पन्न हुआ है और जिसके आधार पर उसका मूल्यांकन किया जाता है।तो फिर मनुष्य का विशिष्ट गुण क्या है? वह है—विवेक (Reason)। विवेक के कारण ही मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और देवताओं के बाद उसका स्थान आता है। इसलिए पूर्ण विकसित और परिष्कृत विवेक ही मनुष्य की विशिष्ट उत्कृष्टता है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह पशुओं और वनस्पतियों के साथ समान रूप से साझा किया जाता है।

    मनुष्य बलवान है परन्तु सिंह भी बलवान होते हैं। वह सुंदर है परन्तु मोर भी सुंदर होते हैं। वह तीव्र गति से दौड़ सकता है परन्तु घोड़े भी तेज़ होते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि इन सभी गुणों में मनुष्य अन्य प्राणियों से कमतर है। मेरा प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य का सबसे बड़ा गुण कौन-सा है बल्कि यह है कि ऐसा कौन-सा गुण है जो केवल मनुष्य का अपना विशिष्ट गुण है। मनुष्य के पास शरीर है परन्तु वृक्षों के पास भी शरीर है। उसमें प्रेरणा तथा अपनी इच्छा से चलने-फिरने की क्षमता है परन्तु यह क्षमता पशुओं और यहाँ तक कि कीड़ों में भी होती है। उसके पास वाणी है परन्तु कुत्तों का भौंकना उससे कहीं अधिक ऊँचा होता है, गरुड़ की पुकार उससे कहीं अधिक तीव्र होती है, बैलों की गर्जना उससे कहीं अधिक गंभीर होती है। लार्क (एक मधुर स्वर में गाने वाली चिड़िया) का कलरव उससे कहीं अधिक मधुर और संगीतपूर्ण होता है। तो फिर मनुष्य की विशिष्टता क्या है? वह है— विवेक। जब यह विवेक सही रूप से विकसित होकर पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब वह मनुष्य-स्वभाव की परम और आनंदपूर्ण सिद्धि को प्राप्त करता है।

    अतः यदि प्रत्येक वस्तु तब प्रशंसा की अधिकारी होती है, जब वह अपने विशिष्ट गुण को पूर्ण विकसित करके अपने स्वभाव की चरम अवस्था तक पहुँच जाती है। यदि मनुष्य का विशिष्ट गुण विवेक है तो जो व्यक्ति अपने विवेक को पूर्णता तक विकसित कर लेता है, वह प्रशंसा का अधिकारी है और उसने अपने मानवीय स्वभाव की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर ली है। इसी पूर्ण विकसित विवेक को सद्गुण (Virtue) कहा जाता है। यही नैतिक रूप से सम्माननीय (The Honorable) भी है।

    अतः जो वस्तु केवल मनुष्य की अपनी है, वही मनुष्य का एकमात्र वास्तविक शुभ है। क्योंकि इस समय हमारा प्रश्न यह नहीं है कि 'शुभ क्या है' बल्कि यह है कि 'मनुष्य का शुभ क्या है।' यदि विवेक के अतिरिक्त कोई भी गुण केवल मनुष्य का अपना नहीं है तो विवेक ही उसका एकमात्र वास्तविक शुभ होगा। किन्तु इस शुभ का मूल्यांकन मनुष्य के अन्य सभी गुणों के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बुरा सिद्ध होता है तो उसकी निंदा की जाती है। यदि वह अच्छा सिद्ध होता है तो उसकी प्रशंसा की जाती है। इसलिए जिस गुण के आधार पर किसी मनुष्य की प्रशंसा या निंदा की जाती है, वही उसका प्रधान और वास्तव में एकमात्र विशिष्ट गुण है।

    तुम्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह एक शुभ है। तुम्हारा संदेह केवल इस बात को लेकर है कि क्या यही मनुष्य का एकमात्र शुभ है। मान लो कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके पास अन्य सभी प्रकार के लाभ हों, उत्तम स्वास्थ्य, अपार धन, प्रतिष्ठित कुल-परंपरा और ऐसा विशाल प्रांगण जहाँ आगंतुकों की भीड़ लगी रहती हो। किन्तु यदि यह निश्चित हो कि वह एक बुरा मनुष्य है तो तुम उसकी निंदा ही करोगे। इसके विपरीत, यदि किसी व्यक्ति के पास उन सबमें से कोई भी वस्तु न हो, न धन, न ग्राहकों या अनुयायियों की भीड़, न उच्च कुल में जन्म और न ही गौरवशाली पूर्वजों की लंबी परंपरा। किन्तु यदि यह निश्चित हो कि वह एक अच्छा मनुष्य है तो तुम उसकी प्रशंसा करोगे। इससे स्पष्ट है कि यही वास्तव में मनुष्य का एकमात्र शुभ है। क्योंकि जिसके पास यह है, वह अन्य सभी बाहरी लाभों से वंचित होने पर भी प्रशंसा का अधिकारी होता है। जिसके पास यह नहीं है, वह अन्य सभी प्रकार के बाहरी लाभों से संपन्न होने पर भी निंदनीय और तिरस्कार के योग्य माना जाता है।

    मनुष्य के साथ भी वही स्थिति है जो अन्य वस्तुओं के साथ होती है। हम उस जहाज़ को अच्छा नहीं कहते जो महँगे रंगों से सजाया गया हो या जिसकी नोक सोने-चाँदी से मढ़ी हुई हो या जिसका भीतरी भाग हाथीदाँत से अलंकृत हो अथवा जो राजाओं के खजानों और अनेक राष्ट्रों की संपत्ति से लदा हुआ हो। बल्कि अच्छा जहाज़ वह है जो दृढ़ और संतुलित हो, जिसकी जोड़ियाँ इतनी मजबूत हों कि पानी भीतर न आने पाए, जो समुद्र के हर प्रहार को सह सके और जो तेज़ गति से चलने वाला तथा हवाओं के झोंकों से विचलित न होने वाला हो। इसी प्रकार, हम उस तलवार को अच्छा नहीं कहते जिसकी पेटी सोने से जड़ी हो या जिसकी म्यान रत्नों से अलंकृत हो। अच्छी तलवार वह है जिसकी धार अत्यन्त तेज़ हो और जिसकी नोक किसी भी प्रकार के कवच को भेदने में सक्षम हो। किसी पैमाने (रूलर) के विषय में भी तुम यह नहीं पूछते कि वह कितना सुंदर है बल्कि यह देखते हो कि वह कितना सीधा और सही है। प्रत्येक वस्तु की प्रशंसा उसी गुण के लिए की जाती है जो उसका अपना विशिष्ट गुण है और जिसके कारण उसे बनाया या प्राप्त किया जाता है। इसी प्रकार, किसी मनुष्य का मूल्यांकन करते समय यह नहीं देखा जाना चाहिए कि उसके पास कितनी खेती की भूमि है, निवेश के लिए कितनी पूँजी है, उसके पीछे कितने ग्राहक या अनुयायी चलते हैं, वह कितने महँगे बिस्तर पर सोता है, या उसके पीने का पात्र कितना पारदर्शी और मूल्यवान है। बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि वह कितना अच्छा मनुष्य है। मनुष्य तभी अच्छा कहलाता है जब उसका विवेक पूर्ण रूप से विकसित हो, सीधा और सही हो तथा उसके स्वभाव के उद्देश्य के अनुरूप कार्य करता हो। इसी को सद्गुण (Virtue) कहा जाता है। यही नैतिक रूप से सम्माननीय (The Honorable) है और यही मनुष्य का एकमात्र वास्तविक शुभ है। क्योंकि केवल विवेक ही मनुष्य को पूर्ण बनाता है। केवल वही उसे वास्तविक तथा पूर्ण सुख प्रदान करता है। अतः जो वस्तु अकेले मनुष्य को पूर्णतः सुखी बनाती है, वही उसका एकमात्र वास्तविक शुभ है।

    हम यह भी कहते हैं कि जो वस्तुएँ सद्गुण से उत्पन्न होती हैं और उससे अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं अर्थात सद्गुण से प्रेरित सभी कर्म, वे भी शुभ हैं। फिर भी, सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक शुभ है क्योंकि उसके बिना कोई भी वस्तु वास्तव में शुभ नहीं हो सकती। यदि प्रत्येक वास्तविक शुभ मन में ही निहित है तो जो कुछ भी मन को अधिक दृढ़, अधिक ऊँचा और अधिक व्यापक बनाता है, वही शुभ है। यह कार्य केवल सद्गुण ही करता है— वह मन को सुदृढ़, उदात्त और विशाल बनाता है। इसके विपरीत, जिन अन्य वस्तुओं की हम इच्छा करते हैं, वे मन को नीचे गिराती हैं और उसे दुर्बल बनाती हैं। जब वे हमें ऐसा प्रतीत कराती हैं कि मानो वे हमें ऊँचा उठा रही हों, तब भी वे वास्तव में केवल हमारे अहंकार को फुलाती हैं और खोखले भ्रम से हमें धोखा देती हैं। अतः एकमात्र वास्तविक शुभ वही है जिसके द्वारा मन पहले से अधिक श्रेष्ठ और उत्तम बनता है।

    सम्पूर्ण जीवन के सभी कर्म इस विचार से संचालित होते हैं कि क्या सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) है और क्या नीच अथवा लज्जाजनक है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए— इसका निर्णय भी इसी आधार पर किया जाता है। मैं इसका अर्थ स्पष्ट करता हूँ। एक सद्गुणी मनुष्य वही कार्य करेगा जिसे वह सम्माननीय समझता है, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो, चाहे उसमें कितना ही बड़ा संकट क्यों न हो। इसके विपरीत, वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जिसे वह नीच या लज्जाजनक समझता हो, चाहे उससे उसे धन मिले, सुख मिले या सत्ता प्राप्त हो जाए। कोई भी भय उसे सम्माननीय मार्ग से विचलित नहीं कर सकता और कोई भी प्रलोभन उसे नीच कर्म की ओर आकर्षित नहीं कर सकता। इसलिए वह बिना किसी शर्त के सम्माननीय का अनुसरण करेगा और बिना किसी शर्त के गलत कर्म से बचेगा परन्तु ऐसा तभी संभव है जब सद्गुण के अतिरिक्त कोई अन्य शुभ न हो और लज्जाजनक आचरण के अतिरिक्त कोई अन्य बुराई न हो। तब वह जीवन के प्रत्येक कार्य में केवल इन्हीं दो बातों—सम्माननीय और गलत— को अपना मार्गदर्शक बनाएगा।

    यदि केवल सद्गुण ही ऐसा है जो कभी भ्रष्ट नहीं होता और जो सदैव अपने वास्तविक स्वरूप को बनाए रखता है, तो वही एकमात्र ऐसा शुभ है जो कभी भी शुभ के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन सकता। वह परिवर्तन के हर प्रकार के जोखिम से परे है। मूर्खता धीरे-धीरे बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ सकती है परन्तु बुद्धिमत्ता कभी फिर से मूर्खता में नहीं गिरती।

    जैसा कि मैंने पहले भी कहा है (और शायद तुम्हें स्मरण होगा), कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने बिना अधिक विचार किए, केवल आकस्मिक आवेग में, उन वस्तुओं को अपने पैरों तले रौंद दिया है जिन्हें सामान्य लोग या तो पाने की तीव्र इच्छा रखते हैं या जिनसे अत्यधिक भय खाते हैं। ऐसे लोगों के उदाहरण दिए जा सकते हैं। किसी ने अपना समस्त धन त्याग दिया। किसी ने अपना हाथ अग्नि में रख दिया। कोई यातना सहते हुए भी मुस्कुराता रहा। किसी ने अपने बच्चों के अंतिम संस्कार में एक आँसू तक नहीं बहाया और कोई मृत्यु का सामना बिना किसी भय या व्याकुलता के कर गया। किन्तु उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि प्रेम, क्रोध या किसी प्रबल इच्छा ने उन्हें ऐसे संकटों का सामना करने के लिए प्रेरित किया था। यदि मन की क्षणिक दृढ़ता, जो केवल तत्काल उत्पन्न हुए आवेग से आती है, इतना कुछ कर सकती है तो सद्गुण उससे कहीं अधिक सामर्थ्यवान होगा। क्योंकि सद्गुण किसी क्षणिक आवेग पर आधारित नहीं होता। वह हर परिस्थिति में समान रूप से दृढ़ रहता है और उसकी शक्ति स्थिर एवं अटल होती है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन वस्तुओं का तिरस्कार अविवेकी लोग भी कभी-कभी कर देते हैं और जिन्हें बुद्धिमान लोग सदैव तुच्छ समझते हैं, वे न तो वास्तव में शुभ हैं और न ही अशुभ। इसलिए सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक शुभ है। वही सौभाग्य और दुर्भाग्य— इन दोनों विपरीत परिस्थितियों के बीच, सिर ऊँचा करके चलता है और दोनों को समान तिरस्कार की दृष्टि से देखता है।

    यदि तुम यह मान लो कि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के अतिरिक्त भी कोई अन्य वस्तु शुभ है तो प्रत्येक सद्गुण के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखना कठिन हो जाएगा। क्योंकि कोई भी सद्गुण तब तक स्थिर नहीं रह सकता जब तक वह अपने अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की ओर दृष्टि रखता है। यदि ऐसा हो तो यह विवेक (Reason) के विरुद्ध होगा। जबकि सभी सद्गुण विवेक पर ही आधारित हैं। यह सत्य के भी विरुद्ध होगा क्योंकि विवेक के बिना सत्य का अस्तित्व नहीं हो सकता। जो विचार सत्य के विरुद्ध हो, वह असत्य ही होता है।

    तुम यह स्वीकार करते हो कि एक सद्गुणी मनुष्य का देवताओं के प्रति सर्वोच्च श्रद्धा और सम्मान होना अनिवार्य है। इसलिए उसके साथ जो कुछ भी घटित होता है, वह उसे शांत मन से सहन करता है क्योंकि वह जानता है कि वह सब उसी दैवी व्यवस्था के अनुसार हुआ है जिसके द्वारा समस्त घटनाओं का संचालन होता है। यदि यह सत्य है तो उसके लिए सम्माननीय आचरण ही एकमात्र शुभ होगा। क्योंकि उसी में देवताओं की आज्ञा का पालन निहित है— भाग्य के आघातों पर क्रोधित न होना, अपने भाग्य की शिकायत न करना बल्कि धैर्यपूर्वक अपने नियत भाग्य को स्वीकार करना और जैसा आदेश हो वैसा ही आचरण करना। यदि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई और भी शुभ हो तो हमारा मन जीवन और जीवन की बाहरी सुविधाओं के प्रति तृष्णा से भर जाएगा। ऐसी तृष्णा असहनीय, कभी समाप्त न होने वाली और जिसकी कोई निश्चित सीमा न हो, ऐसी होती है। इसीलिए केवल सम्माननीय (नैतिक सद्गुण) ही वास्तविक शुभ है क्योंकि उसी की एक निश्चित सीमा है।

    हमने यह भी कहा था कि यदि धन, सार्वजनिक पद और ऐसी अन्य वस्तुएँ जिनमें देवताओं का कोई भाग नहीं है, वास्तव में शुभ हों तो मनुष्यों का जीवन देवताओं के जीवन से भी अधिक सुखी माना जाएगा। अब इस पर एक और विचार जोड़ो। यदि वास्तव में शरीर से मुक्त होने के बाद हमारी आत्माएँ बनी रहती हैं तो शरीर से मुक्त होने पर उनकी अवस्था शरीर में रहते समय की अपेक्षा अधिक सुखद होगी। परन्तु यदि वे वस्तुएँ, जिनका उपयोग हम केवल शरीर के माध्यम से करते हैं, वास्तव में शुभ हैं तो शरीर छोड़ने के बाद आत्माओं की स्थिति पहले से भी अधिक दयनीय हो जाएगी। यह उस स्वाभाविक धारणा के बिल्कुल विपरीत है कि जो आत्माएँ शरीर के बंधन से मुक्त होकर समस्त ब्रह्माण्ड में विचरण करती हैं, वे उन आत्माओं से अधिक सुखी होती हैं जो शरीर रूपी घेरे में मानो घिरी हुई रहती हैं। मैंने यह भी कहा था कि यदि वे वस्तुएँ शुभ हैं जो मनुष्यों की अपेक्षा वाणीहीन पशुओं से भी समान रूप से संबंधित हैं तो फिर पशुओं को भी सुखी माना जाना चाहिए। परन्तु यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के लिए मनुष्य को हर प्रकार का कष्ट सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। पर यदि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई और भी शुभ होता तो ऐसा कर्तव्य नहीं रह जाता। 

    मैंने इन विषयों पर अपने पिछले पत्र में अधिक विस्तार से चर्चा की थी। यहाँ मैंने उन्हें केवल संक्षेप में प्रस्तुत किया है। किन्तु इस प्रकार का सिद्धांत तुम्हें तब तक सत्य प्रतीत नहीं होगा, जब तक तुम अपने मन को एक उच्चतर स्तर तक नहीं उठाते। अपने आप से यह प्रश्न पूछो। यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए कि तुम्हें अपने देश के लिए प्राण देने पड़ें और अपने जीवन के बदले अपने सभी देशवासियों का जीवन बचाना हो, तो क्या तुम अपना सिर केवल स्वेच्छा से ही नहीं, बल्कि प्रसन्नतापूर्वक भी आगे बढ़ा दोगे? यदि तुम्हारा उत्तर 'हाँ' है तो इसका अर्थ है कि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई अन्य शुभ नहीं है। क्योंकि उस एक श्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त करने के लिए तुम बाकी सब कुछ त्याग देने को तैयार हो।

    देखो, सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) में कितनी महान शक्ति होती है। उसके लिए मनुष्य राज्य के हित में अपने प्राण तक दे देता है, चाहे उसे इस आवश्यकता का बोध अपने बलिदान के ठीक पहले ही क्यों न हुआ हो। कभी-कभी किसी अत्यन्त सुंदर और महान कार्य से मनुष्य को केवल कुछ क्षणों के लिए ही सही, पर गहन आनंद की अनुभूति होती है। यद्यपि उस कार्य का कोई प्रत्यक्ष लाभ उस व्यक्ति को नहीं मिलता, जो मर चुका है और मानव जीवन से विदा हो चुका है, फिर भी उस महान कर्म की कल्पना मात्र से उसे संतोष प्राप्त होता है। एक न्यायप्रिय और साहसी मनुष्य, जब वह अपनी मृत्यु से होने वाले लाभों की कल्पना करता है। अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता, उन सभी लोगों की सुरक्षा जिनके लिए वह अपने प्राण न्योछावर कर रहा है, तब वह अपने जीवन के सर्वोच्च आनंद का अनुभव करता है। अपने ऊपर आए संकट से भी उसका हृदय प्रसन्न रहता है। यदि उसे इस महान और अंतिम कर्म को करने से मिलने वाला यह आनंद भी प्राप्त न हो, तब भी वह मृत्यु की ओर बिना हिचक आगे बढ़ेगा। क्योंकि उसके लिए सही और कर्तव्यनिष्ठ आचरण करना ही अपने आप में संतोष का कारण है। मान लो, कोई उसे रोकने के लिए अनेक तर्क दे और कहे, “तुम्हारा यह कार्य शीघ्र ही भुला दिया जाएगा। जनता से तुम्हें न तो विशेष कृतज्ञता मिलेगी और न ही सम्मान।” तो वह उत्तर देगा, “जो कुछ तुम कह रहे हो, वह सब मेरे कर्तव्य से बाहर की बातें हैं। मेरा ध्यान केवल अपने कर्तव्य पर है। मैं जानता हूँ कि वह कर्तव्य सम्माननीय है। इसलिए वह जहाँ भी मुझे बुलाता है, मैं उसके पीछे चल पड़ता हूँ।”

    अतः यही एकमात्र वास्तविक शुभ है। इसे केवल पूर्णतः विवेकवान व्यक्ति ही नहीं पहचानता बल्कि वह व्यक्ति भी पहचान लेता है जिसका स्वभाव जन्म से ही उदात्त और श्रेष्ठ है। अन्य सभी वस्तुएँ क्षणभंगुर और परिवर्तनशील हैं। उनका स्वामी होना भी चिंता का कारण बन जाता है। भाग्य चाहे कितनी ही उदारता से उन्हें किसी के ऊपर क्यों न उँडेल दे, वे अंततः अपने स्वामी पर बोझ बन जाती हैं। वे सदैव मनुष्य को दबाए रखती हैं और कभी-कभी तो उसका उपहास तक बन जाती हैं। जिन लोगों को तुम बैंगनी राजसी वस्त्र पहने देखते हो, उनमें से कोई भी वास्तव में भाग्यशाली नहीं है; ठीक वैसे ही जैसे रंगमंच पर राजदंड और राजसी वस्त्र धारण करने वाले अभिनेता वास्तव में राजा नहीं होते। वे मंच पर लंबे वस्त्रों और ऊँची एड़ियों वाले जूतों में दर्शकों के सामने चलते हैं, पर नाटक समाप्त होते ही वे वेष उतार देते हैं, जूते निकाल देते हैं और अपने वास्तविक रूप में लौट आते हैं। इसी प्रकार, जिन लोगों को धन और उच्च पद ने ऊँचाई पर पहुँचा दिया है, उनमें से कोई भी वास्तव में महान नहीं हो जाता। वह महान क्यों दिखाई देता है? क्योंकि तुम उसके मूल्यांकन में उसके पद और प्रतिष्ठा को भी जोड़ देते हो। कोई बौना पर्वत की चोटी पर खड़ा हो जाए, तब भी वह लंबा नहीं हो जाता। कोई विशालकाय व्यक्ति गहरे गड्ढे में खड़ा हो, तब भी उसकी ऊँचाई कम नहीं हो जाती। यही हमारी भूल है। इसी प्रकार हम भ्रमित हो जाते हैं। हम मनुष्य का मूल्यांकन उसके वास्तविक स्वरूप से नहीं करते बल्कि उसके पद, प्रतिष्ठा और बाहरी आडंबरों को भी उसके साथ जोड़ देते हैं। किन्तु यदि तुम किसी मनुष्य का सही मूल्यांकन करना चाहते हो और जानना चाहते हो कि वह वास्तव में कैसा है तो पहले उसे इन सब बाहरी आवरणों से मुक्त करके देखो। उससे उसकी पैतृक संपत्ति छीन लो, उसके पद और अधिकार ले लो और भाग्य द्वारा दिए गए सभी झूठे आभूषण हटा दो। यहाँ तक कि उसके शरीर को भी अलग मानकर केवल उसके मन को देखो। तब विचार करो कि उसका मन कैसा है और उसका वास्तविक कद कितना है। क्या वह अपनी आंतरिक शक्ति से महान है या किसी और के सहारे महान दिखाई देता है? यदि चमकती हुई तलवारों को देखकर भी उसकी दृष्टि अटल बनी रहती है। यदि वह जानता है कि उसके लिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि अंतिम श्वास उसके मुँह से निकले या गला चीर दिए जाने पर निकले, तब उसे सचमुच सुखी कहो। यदि कारावास, निर्वासन और मनुष्यों की कल्पना से उत्पन्न अन्य निरर्थक भय की बातें सुनकर भी वह तनिक विचलित न हो बल्कि यह कह सके —

“हे सिबिल, इन कष्टों में मेरे लिए कुछ भी नया या अप्रत्याशित नहीं है।
मैं इन सबको पहले ही समझ चुका हूँ। 
अपने मन में मैं इन सबका पहले ही सामना कर चुका हूँ। 
और इन्हें पहले ही जीत चुका हूँ।”

तब वह कह सकता है, “हे ऐनीयस, तुम ऐसी बातें केवल आज कहते हो। पर मैं तो उन्हें प्रतिदिन स्वयं से कहता हूँ। क्योंकि मैं मनुष्य हूँ। इसलिए मनुष्य के जीवन में आने वाली सभी घटनाओं के लिए पहले से ही अपने आपको तैयार रखता हूँ।”

    यदि मन पहले से ही तैयार हो तो दुर्भाग्य का आघात बहुत हल्का पड़ता है। परन्तु मूर्ख लोग और वे लोग जो अपना भरोसा भाग्य पर रखते हैं, उन्हें जीवन की प्रत्येक घटना नई और अप्रत्याशित प्रतीत होती है। अनुभवहीन मनुष्यों के लिए उनके दुःख का एक बड़ा कारण यह भी होता है कि वे उसे बिल्कुल नया और अनपेक्षित समझते हैं।इसका प्रमाण यह है कि जिन परिस्थितियों को वे पहले अत्यन्त कठोर मानते थे, उन्हीं परिस्थितियों के अभ्यस्त हो जाने पर वे उन्हें अधिक धैर्यपूर्वक सहने लगते हैं। इसी कारण बुद्धिमान व्यक्ति भविष्य में आने वाली विपत्तियों के लिए पहले से ही अपने मन को तैयार करता है। जिन कष्टों को दूसरे लोग लंबे समय तक सहते-सहते हल्का बना लेते हैं, उन्हें वह पहले ही लंबे और गंभीर चिंतन के द्वारा हल्का कर लेता है। हम प्रायः अनुभवहीन लोगों को यह कहते सुनते हैं, “मुझे पता था कि यह मेरे साथ होने वाला है।” किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि हर प्रकार की घटना उसके जीवन में आ सकती है। इसलिए चाहे जो कुछ भी घटे, वह शांत भाव से केवल इतना कहता है, “मैं पहले से ही जानता था कि ऐसा हो सकता है।”


अभी के लिए विदा 

उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79

 प्रिय लूसीलियस  तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना च...