Saturday, 18 July 2026

जीवन एवं आचरण के संदर्भ में - पत्र - 73 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


प्रिय लूसीलियस, तुम्हारा पत्र मुझे अत्यन्त प्रसन्नता देने वाला था। उसने मुझे फिर से उत्साहित कर दिया क्योंकि मैं कुछ शिथिल पड़ता जा रहा था। उसने मेरी स्मृति को भी जागृत किया, जो अब कुछ मन्द और दुर्बल होती जा रही है।तुम्हारा यह विश्वास है और ऐसा क्यों न हो! सुख प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन यही दृढ़ धारणा है कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) आचरण ही वास्तविक कल्याण है क्योंकि जो व्यक्ति अन्य वस्तुओं को भी कल्याण मानता है, वह भाग्य के अधीन हो जाता है और दूसरों की इच्छा पर निर्भर रहता है। किन्तु जो व्यक्ति कल्याण को केवल सम्माननीय आचरण तक सीमित रखता है, वह अपने ही भीतर सुखी रहता है।


By Paul Klee 

    एक व्यक्ति अपने बच्चों की मृत्यु पर शोक करता है। उनके बीमार पड़ जाने पर चिंता से व्याकुल हो उठता है। दूसरा इस कारण दुःखी रहता है कि उसके बच्चे दुश्चरित्र हैं और उनकी बदनामी फैल रही है। कोई दूसरे की पत्नी के प्रेम में व्याकुल है तो कोई अपनी ही पत्नी के प्रति आसक्ति से पीड़ित है। एक व्यक्ति चुनाव में पराजित होने से दुःखी है जबकि दूसरे के लिए पद पर निर्वाचित हो जाना ही नई चिंताओं और कष्टों का कारण बन जाता है। किन्तु समस्त मानवजाति के दुःखों में सबसे बड़ा दुःख उन लोगों का है, जो मृत्यु के विचार से निरन्तर भयभीत रहते हैं। यह विचार उन्हें हर ओर से घेरता रहता है क्योंकि मृत्यु किसी भी दिशा से आ सकती है। जैसे शत्रु-प्रदेश से होकर गुजरने वाली सेना हर समय चारों ओर सतर्क दृष्टि रखती है और प्रत्येक आहट पर पीछे मुड़कर देखती है, उसी प्रकार वे भी निरन्तर भय में जीते हैं। जब तक यह भय मन से दूर नहीं होता, तब तक हमारा जीवन निरन्तर काँपते हुए हृदय के साथ ही बीतता है।

    तुम्हें ऐसे लोग मिलेंगे जिन्होंने निर्वासन और संपत्ति की जब्ती का दुख सहा है। कुछ ऐसे भी मिलेंगे जो निर्धनता के सबसे भीषण रूप को झेल रहे हैं क्योंकि वे अपार धन-संपत्ति के बीच रहते हुए भी दिवालिया हो चुके हैं। तुम्हें ऐसे नाविक भी मिलेंगे जिनका जहाज़ डूब गया। ऐसे लोग भी जिनका जीवन किसी दूसरे प्रकार के जहाज़-डूबने का शिकार हुआ है। जब जनता का क्रोध या ईर्ष्या, जो उच्च पद पर बैठे लोगों के लिए सबसे घातक प्रहार है, उन पर अचानक और बिना किसी चेतावनी के टूट पड़ती है। उन्हें उसी प्रकार धराशायी कर देती है, जैसे निर्मल आकाश में अचानक उठने वाला तूफ़ान या बिजली का वह प्रहार जो अपने आसपास की सारी धरती को हिला देता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति पर बिजली गिरने पर केवल वही नहीं बल्कि उसके आसपास खड़े लोग भी स्तब्ध रह जाते हैं, उसी प्रकार इन आकस्मिक विपत्तियों में एक व्यक्ति पर तो आपदा आती है। किन्तु दूसरे लोग भी भय से काँप उठते हैं। वे केवल इस संभावना से ही उतने ही आतंकित हो जाते हैं कि ऐसा उनके साथ भी हो सकता है, जितना स्वयं वह व्यक्ति जो वास्तव में उस विपत्ति का शिकार हुआ है। दूसरों पर अचानक आई हुई विपत्तियाँ सबके मन में भय उत्पन्न कर देती हैं। जैसे गोफन के घूमने की आवाज़ सुनकर पक्षी उड़ जाते हैं, चाहे उसमें पत्थर हो या न हो, उसी प्रकार हम केवल प्रहार से ही नहीं बल्कि उसके आभास मात्र से भी भयभीत हो उठते हैं।

    इसलिए जो व्यक्ति ऐसे विश्वास के सहारे जीता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। क्योंकि शान्ति के बिना सुख का अस्तित्व नहीं है और जो जीवन निरन्तर चिंता और आशंका में बीतता है, वह दुःखमय जीवन ही है। जो व्यक्ति भाग्य से मिलने वाले लाभों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहता है, वह स्वयं को अनिवार्य रूप से गहरे मानसिक अशान्ति और भावनात्मक उथल-पुथल के हवाले कर देता है। सुरक्षा का केवल एक ही मार्ग है। बाहरी वस्तुओं से ऊपर उठो और केवल उसी में संतोष प्राप्त करो जो नैतिक रूप से श्रेष्ठ है। क्योंकि जो व्यक्ति यह मानता है कि सद्गुण से बढ़कर भी कोई वस्तु है या सद्गुण के अतिरिक्त भी कोई वस्तु वास्तविक कल्याण है, वह अपने वक्ष को भाग्य के हर प्रहार के लिए खुला छोड़ देता है और व्याकुल होकर उसके अगले आघात की प्रतीक्षा करता रहता है।

    अपने मन के सामने यह दृश्य उपस्थित करो। मानो भाग्य ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया हो। राजपद, धन तथा लोकप्रियता वे उपहार हों जिन्हें वह इस नश्वर मानव-समुदाय के बीच बिखेर रहा हो। उन उपहारों में से कुछ पर अनेक लालची हाथ एक साथ टूट पड़ते हैं और उन्हें खींचतान में टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। कुछ छलपूर्ण लेन-देन में बाँट दिए जाते हैं। कुछ ऐसे लोगों के हाथ लगते हैं जिनके लिए वे अंततः हानिकारक सिद्ध होते हैं। कुछ उपहार असावधान लोगों के सामने ही गिर जाते हैं। कुछ उन लोगों के हाथ से भी छूट जाते हैं जो उन्हें अत्यधिक उतावलेपन से पकड़ना चाहते हैं। किन्तु जब कोई व्यक्ति भाग्यवश उन्हें प्राप्त भी कर लेता है, तब भी वे उसे ऐसा आनंद नहीं दे पाते जो अगले दिन तक भी बना रहे। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति जैसे ही इन उपहारों को बाँटा जाता हुआ देखता है, उसी समय उस रंगमंच को छोड़कर चला जाता है क्योंकि वह जानता है कि तुच्छ-से-तुच्छ उपकार भी कभी-कभी बहुत भारी मूल्य चुकाकर प्राप्त होते हैं।

    जब बुद्धिमान व्यक्ति वहाँ से उठकर जाने लगता है तो कोई उससे उलझता नहीं, न ही द्वार की ओर बढ़ते समय कोई उस पर प्रहार करता है क्योंकि सारी छीना-झपटी तो उन उपहारों को लेकर होती है। भाग्य द्वारा हम पर बरसाए जाने वाले उपहारों के साथ भी यही होता है। हम अभागे मनुष्य निरन्तर व्याकुल और बेचैन रहते हैं। हमारी इच्छा होती है कि काश हमारे पास और भी अधिक हाथ होते। हम कभी इधर देखते हैं, कभी उधर। जिन वस्तुओं की लालसा हमें पागल बना देती है, उनके आने में हमें देर प्रतीत होती है। वे कुछ ही लोगों को प्राप्त होती हैं जबकि उनकी आशा सभी करते हैं। हम वहीं पहुँचना चाहते हैं जहाँ वे उपहार गिर रहे हैं। यदि दूसरों के हाथ खाली रह जाएँ और हमें उनमें से कुछ मिल जाए तो हम प्रसन्न हो उठते हैं। किन्तु इन तुच्छ वस्तुओं के लिए या तो हमें भारी मानसिक चिंता का मूल्य चुकाना पड़ता है या फिर वे हमें मिलती ही नहीं और हम निराश रह जाते हैं। इसलिए आओ, हम इस तमाशे से हट जाएँ और अपनी जगह उन लोगों के लिए छोड़ दें जो अभी भी उन पुरस्कारों को लपकने में लगे हुए हैं। वे ही उन वस्तुओं को आकाश में लटकता हुआ देखते रहें और उन्हीं के साथ-साथ उनकी बेचैनी और प्रतीक्षा भी बढ़ती रहे।

    जो व्यक्ति वास्तव में सुखी होना चाहता है, उसे अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि केवल नैतिक रूप से श्रेष्ठ आचरण ही वास्तविक कल्याण है। क्योंकि यदि वह यह मान ले कि इसके अतिरिक्त भी कोई और कल्याण है तो सबसे पहले वह ईश्वरीय व्यवस्था पर ही संदेह करने लगेगा। वह सोचेगा कि न्यायप्रिय लोगों के साथ इतनी प्रतिकूल घटनाएँ क्यों घटती हैं, और हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह इस विशाल ब्रह्माण्ड की आयु की तुलना में कितना अल्पकालिक और तुच्छ है। इसी प्रकार की शिकायतों के कारण हम ईश्वर के उपकारों का मूल्य समझने में कृतघ्न सिद्ध होते हैं। हम शिकायत करते हैं कि हमें मिले हुए वरदान स्थायी नहीं हैं। वे थोड़े हैं, अनिश्चित हैं और क्षणभंगुर हैं। परिणाम यह होता है कि न तो हम जीना चाहते हैं और न ही मरना। हम जीवन से ऊब जाते हैं, फिर भी मृत्यु से भय खाते हैं। हमारी प्रत्येक योजना अस्थिर बनी रहती है और कोई भी सौभाग्य हमें संतुष्ट नहीं कर पाता।

    किन्तु इसका कारण यह है कि हमने अभी तक उस असीम और अजेय कल्याण को प्राप्त नहीं किया है, जहाँ पहुँचकर सभी इच्छाओं का अंत हो जाता है। क्योंकि शिखर के ऊपर जाने के लिए कोई और स्थान नहीं होता। क्या तुम पूछते हो कि सद्गुण को किसी वस्तु की आवश्यकता क्यों नहीं होती? इसका कारण यह है कि सद्गुण वर्तमान में उपलब्ध कल्याण में ही आनंदित रहता है। जो उपस्थित नहीं है, उसकी उसे कोई लालसा नहीं होती। जो कुछ उसके पास है, उसे वह कभी अपर्याप्त नहीं मानता क्योंकि वही उसके लिए पर्याप्त होता है। यदि तुम इस दृष्टिकोण को छोड़ दोगे तो निष्ठा नष्ट हो जाएगी और सत्यनिष्ठा भी समाप्त हो जाएगी। क्योंकि इन गुणों को सुरक्षित रखने के लिए मनुष्य को बहुत-सी ऐसी बातों को सहना पड़ता है जिन्हें संसार बुरा मानता है और बहुत-से ऐसे सुखों का त्याग करना पड़ता है जिन्हें संसार अच्छा समझता है। तब साहस भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि साहस अपने आपको जोखिम में डालने की माँग करता है। महान आत्मा भी नष्ट हो जाएगी, क्योंकि वह तब तक अपने परिवेश से ऊपर नहीं उठ सकती जब तक वह उन वस्तुओं को तुच्छ न समझे जिन्हें सामान्य लोग सबसे अधिक मूल्यवान मानते हैं। कृतज्ञता भी समाप्त हो जाएगी, और उपकार का प्रतिदान करने की तत्परता भी, यदि हम कठिन परिश्रम से डरने लगें, यदि हम निष्ठा से अधिक किसी अन्य वस्तु को महत्त्व देने लगें, और यदि हमारी दृष्टि सर्वोत्तम लक्ष्य पर स्थिर न रहे।

    इसके अतिरिक्त या तो ये तथाकथित कल्याण वास्तव में कल्याण नहीं हैं अथवा फिर मनुष्य ईश्वर से भी अधिक भाग्यशाली है। क्योंकि ईश्वर उन वस्तुओं का कोई उपयोग नहीं करता जिन्हें हम अत्यन्त प्रिय और मूल्यवान समझते हैं। वासना का उसके लिए कोई अर्थ नहीं है। न ही स्वादिष्ट भोजन, न धन-संपत्ति और न ही वे अन्य तुच्छ भोग-विलास, जो मनुष्यों को इतने आकर्षक लगते हैं। अतः हमें या तो यह मानना पड़ेगा कि कुछ ऐसे कल्याण हैं जो ईश्वर के पास नहीं हैं या फिर यह स्वीकार करना होगा कि ईश्वर का उनके बिना होना ही इस बात का प्रमाण है कि वे वास्तव में कल्याण नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, जिन वस्तुओं को लोग कल्याण मानते हैं, उनमें से बहुत-सी वस्तुएँ तो पशुओं को मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में प्राप्त हैं। पशु भोजन का अधिक उत्साह से आनंद लेते हैं। वे मैथुन के बाद मनुष्यों की तरह शीघ्र थकते नहीं। उनकी शारीरिक शक्ति अधिक होती है और अधिक स्थिर भी रहती है। यदि इन्हीं बातों को वास्तविक कल्याण माना जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि पशु मनुष्यों से अधिक सुखी हैं। क्योंकि वे न तो दुष्टता जानते हैं, न छल-कपट। वे सुखों का अनुभव अधिक सहजता और अधिक पूर्णता से करते हैं। उन सुखों का उपभोग करते समय उन्हें न तो लज्जा का भय होता है और न ही बाद में किसी प्रकार का पश्चात्ताप।

    इसलिए विचार करो कि क्या उस वस्तु को वास्तव में कल्याण कहा जा सकता है, जिसमें मनुष्य ईश्वर से भी आगे निकल जाता है। हमें परम कल्याण को मन के भीतर ही स्थापित करना चाहिए। यदि वह मनुष्य के सर्वोत्तम भाग अर्थात बुद्धि से हटकर उसके निम्नतम भाग, अर्थात इन्द्रियों में चला जाए और उन इन्द्रियों में भी, जो मूक पशुओं में मनुष्यों की अपेक्षा अधिक तीव्र होती हैं, तो वह अपने वास्तविक अर्थ को खो देता है। हमारे सर्वोच्च सुख का आधार शरीर नहीं होना चाहिए। जो कल्याण विवेक प्रदान करता है, वही वास्तविक कल्याण है। वह दृढ़, स्थायी और शाश्वत होता है। वह नष्ट नहीं हो सकता न ही घटाया या कम किया जा सकता है। इसके विपरीत, अन्य जिन वस्तुओं को लोग कल्याण कहते हैं, वे केवल लोकमत के आधार पर कल्याण कहलाती हैं। उनका नाम तो वास्तविक कल्याण जैसा है। किन्तु उनमें कल्याण का वास्तविक स्वरूप नहीं होता। इसी कारण उन्हें ‘सुविधाएँ’ कहना अधिक उचित है अथवा हमारे स्टोइक मत की भाषा में उन्हें ‘वरणीय वस्तुएँ’ (preferred things) कहा जाना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि वे केवल हमारी संपत्ति हैं, हमारे व्यक्तित्व का अंग नहीं। वे हमारे पास रहें, परन्तु केवल इस चेतना के साथ कि वे बाहरी वस्तुएँ हैं, हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं। यदि वे हमारे पास हों भी तो उन्हें ऐसे साधारण सेवकों के समान समझना चाहिए जिन पर किसी को गर्व करने का कोई कारण नहीं होता। इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति उस वस्तु पर अभिमान करे, जिसे उसने स्वयं अपने पुरुषार्थ से प्राप्त या निर्मित नहीं किया?

    ये सभी वस्तुएँ हमें प्राप्त हों, परन्तु वे हमसे इस प्रकार न चिपक जाएँ कि यदि कभी हमसे छिन जाएँ तो उनका जाना हमारे हृदय को विदीर्ण कर दे। उनका उपयोग करें, उन पर गर्व न करें। उनका उपयोग भी संयम के साथ करें, मानो वे उधार की वस्तुएँ हों जिन्हें एक दिन लौटाना ही पड़ेगा। जो व्यक्ति उन्हें विवेकहीन ढंग से अपना मानकर रखता है, वह उन्हें अधिक समय तक नहीं रख पाता क्योंकि संयम के अभाव में उसकी प्रचुर संपत्ति ही उसके लिए बोझ बन जाती है। यदि वह इन क्षणभंगुर लाभों पर भरोसा करता है तो वे शीघ्र ही उसका साथ छोड़ देते हैं। यदि वे साथ न भी छोड़ें, तब भी वे उसके लिए कष्ट का कारण बने रहते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जो विपुल वैभव का त्याग गरिमा और सहजता के साथ कर सके हों। अधिकांश लोग तो उसी समृद्धि के साथ पतन को प्राप्त होते हैं जिसने उन्हें ऊँचाई तक पहुँचाया था। जिस वस्तु ने उन्हें ऊपर उठाया था, अंततः वही उनके ऊपर भार बनकर उन्हें नीचे गिरा देती है।


                                                                    By Paul Klee 

    अतः बुद्धि हमारी सहायता करे, वही हमारी इच्छाओं पर सीमा लगाए और हमारे जीवन का विवेकपूर्ण संचालन करे। क्योंकि अपव्यय अपने ही साधनों को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति असंयमी है, वह तब तक टिक नहीं सकता जब तक विवेक उसे संयमित और नियंत्रित न करे। तुम अनेक नगरों का इतिहास देख सकते हो। वे अपनी शक्ति और समृद्धि के चरम पर पहुँचकर भी विलासिता और आत्म-भोग में डूबे हुए शासन के कारण नष्ट हो गए। वीरता ने जो कुछ अर्जित किया था, उसे असंयम ने नष्ट कर दिया। हमें ऐसे विनाश से स्वयं को बचाना चाहिए। किन्तु ऐसा कोई दुर्ग नहीं है जिसे भाग्य भेद न सके। इसलिए हमारी सुरक्षा बाहरी नहीं, भीतर होनी चाहिए। यदि मन का वह भीतरी गढ़ सुरक्षित है तो मनुष्य पर आक्रमण तो किया जा सकता है, पर उसे कभी पराजित या बंदी नहीं बनाया जा सकता। क्या तुम जानना चाहते हो कि यह भीतरी सुरक्षा क्या है? यह है, जो कुछ भी घटित हो, उससे रुष्ट न होना। यह समझना कि जो बातें तुम्हें हानि पहुँचाती हुई प्रतीत होती हैं, वे भी इस समस्त विश्व की व्यवस्था और उसके संरक्षण का ही एक अंग हैं तथा सृष्टि के नियत क्रम और उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। जो कुछ ईश्वर को स्वीकार है, उसमें प्रसन्न रहना और केवल इसी कारण अपने तथा अपनी सामर्थ्य पर गर्व करना कि तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकता कि तुम अपने दुःखों से भी ऊपर उठ जाते हो। यह कि विवेक, जो सबसे महान शक्ति है, के बल पर तुम हर दुर्भाग्य, हर पीड़ा और हर आघात पर विजय प्राप्त कर लेते हो।

    विवेक से प्रेम करो! वही प्रेम तुम्हें सबसे कठिन परीक्षाओं का सामना करने के लिए सुसज्जित कर देगा। अपने शावकों के प्रति प्रेम ही सिंहनी को भाले की नोक पर झपट पड़ने के लिए प्रेरित करता है। उसका उग्र स्वभाव और सहज आवेग उसे अजेय बना देते हैं। यश की लालसा अनेक युवकों को अग्नि और तलवार, दोनों का तिरस्कार करने के लिए प्रेरित करती है। साहस की केवल छाया और आभास ही कुछ लोगों को स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करने के लिए पर्याप्त होता है। जब इन सबमें इतनी शक्ति हो सकती है तो विवेक, जो इन सबसे अधिक साहसी और अटल है, भय और संकट के प्रत्येक अवसर पर उससे भी अधिक दृढ़ता और वीरता के साथ आगे बढ़ता है।

    कोई कह सकता है, “यह कहना व्यर्थ है कि सम्माननीय (सद्गुणपूर्ण) के अतिरिक्त कोई और वस्तु अच्छी नहीं है। ऐसा सिद्धांत तुम्हें भाग्य के प्रहारों से सुरक्षित और अभेद्य नहीं बना सकता। क्योंकि तुम्हारा दर्शन आज्ञाकारी संतान, अपने देश की उत्तम परम्पराएँ और सद्गुणी माता-पिता, इन सबको भी अच्छी वस्तुओं में गिनता है। जब ये संकट में पड़ेंगे, तब तुम बिना चिंता के उन्हें नहीं देख सकोगे। अपने देश पर आक्रमण होने से, अपनी संतान की मृत्यु से और अपने माता-पिता के दास बना लिए जाने से तुम अवश्य ही व्याकुल हो जाओगे।” 

    इसके उत्तर में मैं पहले उन तर्कों को प्रस्तुत करूँगा जो सामान्यतः हमारे दर्शन-मत की ओर से दिए जाते हैं। फिर उसके बाद मैं एक अतिरिक्त उत्तर दूँगा, जो मेरे विचार में इस विषय पर दिया जाना चाहिए।

    उन वस्तुओं की स्थिति भिन्न है, जिनके नष्ट हो जाने पर उनके स्थान पर कोई कष्ट आ जाता है। उदाहरण के लिए, जब अच्छा स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है तो उसके स्थान पर रोग आ जाता है। जब तीक्ष्ण दृष्टि चली जाती है तो हम अंधत्व से पीड़ित हो जाते हैं। जब घुटने की नसें कट जाती हैं तो हम केवल तेज़ दौड़ने की क्षमता ही नहीं खोते बल्कि लंगड़े भी हो जाते हैं। किन्तु जिन वस्तुओं का मैंने अभी उल्लेख किया है, उनके साथ ऐसा नहीं होता। यह कैसे? यदि मैंने एक अच्छे मित्र को खो दिया तो उसके स्थान पर मुझे अनिवार्य रूप से किसी विश्वासघाती मित्र का सामना नहीं करना पड़ता। यदि मेरी सद्गुणी संतान का निधन हो गया तो उसके स्थान पर उपेक्षापूर्ण या दुष्चरित्र संतान नहीं आ जाती।

    इसके अतिरिक्त, एक और बात यह है कि इन परिस्थितियों में वास्तव में मित्र या संतान नष्ट नहीं होते बल्कि केवल उनके शरीर नष्ट होते हैं। अच्छाई (सद्गुण) केवल एक ही प्रकार से नष्ट हो सकती है, जब वह बुराई में परिवर्तित हो जाए। किन्तु प्रकृति इसकी अनुमति नहीं देती। इसलिए प्रत्येक सद्गुण और सद्गुण से प्रेरित प्रत्येक कर्म अक्षुण्ण और अविनाशी रहता है। फिर भी, यदि वास्तव में तुम्हारे मित्र और वे सद्गुणी बच्चे, जो एक माता-पिता की सभी आकांक्षाओं की पूर्ति थे, इस संसार से चले भी गए हों, तब भी उस रिक्तता को भरने वाली एक वस्तु हमारे पास रहती है। तुम पूछोगे, “वह क्या है?” वही वस्तु जिसने उन्हें श्रेष्ठ बनाया था, सद्गुण। सद्गुण कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ता। वह सम्पूर्ण मन को अपने अधिकार में ले लेता है और हर प्रकार की हानि के अनुभव को समाप्त कर देता है। सद्गुण अपने आप में ही पर्याप्त है क्योंकि उसी में सभी शुभ वस्तुओं का बल और स्रोत निहित है। यदि बहता हुआ जल कहीं रोक दिया जाए या उसका मार्ग बदल दिया जाए तो इससे क्या अंतर पड़ता है, जब उसका स्रोत अभी भी अक्षुण्ण और अविरल बना हुआ है? तुम यह नहीं कहोगे कि किसी व्यक्ति का जीवन उसके बच्चों के जीवित रहने पर अधिक न्यायपूर्ण, अधिक संयमी, अधिक बुद्धिमान या अधिक सम्माननीय हो जाता है। उनके न रहने पर इन गुणों से वंचित हो जाता है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि उसका जीवन पहले से अधिक अच्छा था। मित्रों के बढ़ जाने से कोई व्यक्ति अधिक बुद्धिमान नहीं हो जाता और उनके चले जाने से वह अधिक मूर्ख भी नहीं हो जाता। अतः न मित्र किसी को वास्तव में अधिक सुखी बनाते हैं और न उनके अभाव से कोई वास्तव में अधिक दुःखी हो जाता है। जब तक सद्गुण पूर्ण, सुरक्षित और अक्षुण्ण है, तब तक तुम किसी भी हानि का वास्तविक अनुभव नहीं करोगे।

    “तुम क्या कह रहे हो? कोई व्यक्ति अपने मित्रों और संतानों से घिरा होने पर अधिक सुखी कैसे नहीं हो सकता?” ऐसा क्यों होना चाहिए? परम शुभ न तो घटता है और न ही बढ़ता है। वह सदैव अपनी पूर्णता में स्थित रहता है, चाहे भाग्य का व्यवहार जैसा भी हो। कोई व्यक्ति दीर्घायु होकर वृद्धावस्था तक पहुँचे या वृद्ध होने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए। परम शुभ का परिमाण दोनों ही स्थितियों में समान रहता है, यद्यपि उसके जीवन की अवधि भिन्न हो सकती है। जैसे तुम एक बड़ा वृत्त बनाओ या छोटा, उससे केवल उसके आकार का अंतर पड़ता है, उसके वृत्त होने का नहीं। एक वृत्त बहुत समय तक बना रह सकता है जबकि दूसरे को तुम तुरंत मिटाकर उसी धूल में मिला सकते हो, जिसमें वह बनाया गया था। फिर भी दोनों अपने स्वरूप की दृष्टि से समान हैं। सीधापन (सरलता) न तो आकार पर निर्भर करता है, न संख्या पर और न ही अवधि पर। उसे न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी सम्मानपूर्ण और सद्गुणमय जीवन को, चाहे वह सौ वर्षों तक चला हो, तुम जितनी भी अवधि तक सीमित कर दो, यहाँ तक कि केवल एक दिन का ही क्यों न कर दो, उसका सम्मान और सद्गुण समान ही बना रहता है।

    कभी-कभी सद्गुण अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करता है। वह राज्यों, नगरों और प्रान्तों का शासन करता है। मित्रताओं का निर्वाह करता है। पड़ोसियों और संतानों के प्रति विविध उत्तरदायित्वों का पालन करता है। कभी ऐसा भी होता है कि वही सद्गुण निर्धनता, निर्वासन या प्रियजनों के वियोग जैसी परिस्थितियों की संकीर्ण सीमाओं में सिमट जाता है। किन्तु जब वह राजसत्ता के उच्च शिखर से उतरकर एक सामान्य नागरिक के जीवन में आ जाता है या व्यापक अधिकार-क्षेत्र से सिमटकर केवल एक परिवार अथवा घर के किसी छोटे-से कोने तक सीमित रह जाता है, तब भी उसका महत्व या महानता तनिक भी कम नहीं होती। वह तब भी उतना ही महान रहता है, चाहे वह स्वयं में ही सिमट गया हो और चारों ओर से सीमित क्यों न हो। क्योंकि उसका साहस उतना ही महान, उसका चरित्र उतना ही सीधा, उसकी बुद्धि उतनी ही स्पष्ट और उसकी न्यायप्रियता उतनी ही अडिग बनी रहती है। इसी कारण वह समान रूप से सुखी भी रहता है। वास्तविक सुख केवल एक ही स्थान में निवास करता है— मन के भीतर। उस सच्चे सुख की स्थिरता, उसकी महानता तथा उसकी शान्ति दिव्य और मानवीय दोनों प्रकार की वस्तुओं के यथार्थ ज्ञान के बिना प्राप्त नहीं हो सकती।

    अब मैं वह उत्तर प्रस्तुत करता हूँ, जिसे मैंने कहा था कि मैं अपनी ओर से दूँगा। बुद्धिमान व्यक्ति संतान या मित्रों के वियोग से व्यथित नहीं होता क्योंकि वह उनकी मृत्यु को उसी भाव से स्वीकार करता है, जिस भाव से अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करता है। वह अपनी मृत्यु से जितना नहीं डरता, उतना ही वह उनकी मृत्यु पर शोक भी नहीं करता। क्योंकि सद्गुण का आधार आन्तरिक एकरूपता और सामंजस्य है। उसके सभी कर्म परस्पर मेल खाते हैं और एक-दूसरे के अनुरूप होते हैं। यदि वह मन, जिसे स्वभावतः ऊँचा और उदात्त होना चाहिए, इच्छा या शोक के कारण नीचे गिर जाए तो यह सामंजस्य नष्ट हो जाता है। हर प्रकार की चिंता, व्याकुलता और कर्तव्य के प्रति अनिच्छा सम्माननीय नहीं है। इसके विपरीत, सम्माननीय आचरण सदैव निश्चिन्त, निर्बाध, निर्भय और प्रत्येक अवसर पर तत्पर रहता है।

    “तुम क्या कहना चाहते हो? क्या बुद्धिमान व्यक्ति किसी प्रकार का भावावेग भी अनुभव नहीं करता? क्या उसका रंग नहीं उड़ता, उसके चेहरे पर भय के चिह्न नहीं उभरते, उसके अंग शीतल नहीं पड़ते और क्या उसके साथ वे सब शारीरिक प्रतिक्रियाएँ नहीं होतीं जो मन की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति की अनैच्छिक प्रेरणा से उत्पन्न होती हैं?” मैं स्वीकार करता हूँ कि ऐसा होता है। किन्तु उसकी यह दृढ़ धारणा कभी नहीं बदलती कि इनमें से कोई भी घटना वास्तव में बुरी नहीं है और न ही ऐसी है जिससे एक स्वस्थ और स्थिर मन को भयभीत होना चाहिए। जो कुछ करना आवश्यक होगा, वह उसे तुरंत और साहसपूर्वक करेगा। क्योंकि यह कहा गया है कि मूर्खता का लक्षण यह है कि उसके सभी कार्य आलस्य, अनिच्छा और आन्तरिक विरोध के साथ किए जाते हैं। उसका शरीर एक दिशा में बढ़ता है और उसका मन दूसरी दिशा में भटकता है। परस्पर विरोधी इच्छाएँ उसे भीतर ही भीतर विभाजित कर देती हैं। जिन वस्तुओं पर वह घमण्ड और मिथ्या अभिमान करता है, वही अन्ततः उसे तुच्छ बना देती हैं और जिन कार्यों पर वह गर्व करता है, उन्हें भी वह वास्तव में अपनी स्वेच्छा से नहीं करता।

    किन्तु जब मूर्ख व्यक्ति किसी आशंका से ग्रस्त होता है तो वह उसकी कल्पना मात्र से ही उतना ही व्याकुल हो उठता है, मानो वह अनिष्ट पहले ही घटित हो चुका हो। जिस दुःख को सहने से वह डरता है, उसे वह अपने भय के कारण पहले ही सहने लगता है। जिस प्रकार शारीरिक रोग के प्रकट होने से पहले उसके कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं जैसे, शरीर में जड़ता, बिना कारण थकान, बार-बार जंभाई आना और अंगों में झुनझुनी दौड़ना। उसी प्रकार अस्वस्थ मन भी विपत्ति के वास्तव में आने से बहुत पहले ही उससे विचलित हो उठता है। वह भविष्य के कष्टों की पहले ही कल्पना कर लेता है और समय आने से पूर्व ही उनसे पीड़ित होने लगता है। किन्तु इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और क्या हो सकता है कि जो घटना अभी घटी ही नहीं है, उसके कारण पहले से ही दुःख भोगा जाए? भविष्य के कष्टों की प्रतीक्षा करने के स्थान पर तुम उन्हें स्वयं अपने पास बुला लेते हो। यदि उन्हें पूरी तरह दूर नहीं कर सकते तो कम-से-कम उन्हें समय से पहले मत बुलाओ। उन्हें यथासंभव विलंब से आने दो।

    तुम पूछते हो, "मनुष्य भविष्य की घटनाओं से व्याकुल क्यों न हो?" मान लो किसी व्यक्ति को यह बताया जाए कि आज से पचास वर्ष बाद उसे यातना दी जाएगी। वह तभी भयभीत होगा, जब वह उन बीच के पचास वर्षों को मानो लाँघकर सीधे उस भविष्य की चिंता में पहुँच जाए, जो अभी बहुत दूर है। ठीक यही स्थिति उन लोगों की भी होती है, जो बीते हुए घटनाक्रमों पर शोक करके स्वयं अपने मन को बीमार बना लेते हैं। वे स्वयं ही अपने दुःख के कारण खोजते फिरते हैं। अतीत और भविष्य, दोनों ही इस समय हमारे सामने उपस्थित नहीं हैं। हम न तो अतीत का अनुभव कर सकते हैं और न भविष्य का। और जहाँ प्रत्यक्ष अनुभव ही नहीं है, वहाँ पीड़ा का वास्तविक आधार भी नहीं होता।

    

 अभी के लिए विदा 

मितव्ययिता, आत्मसंयम और साहस के मार्ग के बारे में -- पत्र - 72 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मेरे विचार में लोग यह मानने में भूल करते हैं कि जो लोग दर्शन के प्रति पूर्णतः समर्पित होते हैं, वे हठी, असहयोगी और शासकों, राजाओं अथवा राज्य का संचालन करने वाले किसी भी व्यक्ति का बहुत कम सम्मान करते हैं। वस्तुतः स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। उनसे अधिक कृतज्ञ कोई नहीं होता और इसका उचित कारण भी है क्योंकि शांतिपूर्ण अवकाश में जीवन बिताने का जो अवसर उन्हें राज्य-व्यवस्था से प्राप्त होता है, उसका लाभ उनसे अधिक किसी को नहीं मिलता।


By Paul Klee 

    इसलिए जिन लोगों के उत्तम जीवन जीने का उद्देश्य राज्य की सुरक्षा और स्थिरता से अत्यधिक सुदृढ़ हुआ है, वे इस महान उपकार के लिए उत्तरदायी शासक का सम्मान माता-पिता के समान करते हैं। वे उन चंचल स्वभाव के लोगों से कहीं अधिक कृतज्ञ होते हैं, जो व्यापार, राजनीति और सार्वजनिक कार्यों में निरन्तर लगे रहते हैं। यद्यपि ऐसे लोग भी अपने शासकों के बहुत ऋणी होते हैं, फिर भी उनकी अपेक्षाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। उन पर कितनी ही उदारता क्यों न की जाए, उनकी इच्छाएँ तृप्त नहीं होतीं। उन्हें जितना अधिक मिलता है, वे उतना ही अधिक चाहते हैं। जिसका मन केवल और अधिक पाने में लगा रहता है, वह यह भूल जाता है कि उसे पहले से कितना कुछ मिल चुका है। लोभ के सभी दोषों में सबसे बड़ा दोष कृतघ्नता है। इसके अतिरिक्त, जो लोग सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय रहते हैं, वे कभी यह नहीं सोचते कि उन्होंने कितने लोगों को पीछे छोड़ दिया है। उनका ध्यान केवल उन लोगों पर रहता है जो अभी भी उनसे आगे हैं। अपने पीछे छूटे हुए अनेक लोगों को देखकर उन्हें जितना आनंद नहीं मिलता, उससे कहीं अधिक पीड़ा उन्हें इस बात से होती है कि कोई एक व्यक्ति भी उनसे आगे है। यही सभी प्रकार की महत्त्वाकांक्षा का दोष है। वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखती। केवल महत्त्वाकांक्षा ही नहीं, प्रत्येक प्रकार की इच्छा का यही स्वभाव है कि वह कभी विश्राम नहीं करती क्योंकि इच्छा की पूर्ति होते ही वह किसी नई इच्छा का आरम्भ कर देती है।

    किन्तु जो मनुष्य निष्कलंक और निर्मल चरित्र वाला है, जिसने सीनेट और न्यायालय के कार्यों को छोड़कर जीवन के व्यापक और उच्चतर उद्देश्यों को अपनाया है, वह उन लोगों के प्रति प्रेम और कृतज्ञता रखता है जिनके प्रयासों के कारण वह सुरक्षित वातावरण में ऐसा जीवन जी सकता है। वही एक ऐसा व्यक्ति है जो बिना किसी स्वार्थ के उनका समर्थन करता है क्योंकि वह उनके प्रति एक महान ऋण अनुभव करता है, यद्यपि वे स्वयं इस बात से अनभिज्ञ रहते हैं। जिस प्रकार वह अपने उन आचार्यों का सम्मान और आदर करता है, जिनके मार्गदर्शन ने उसे भटकाव और अज्ञान के निर्जन मार्ग से बाहर निकाला, उसी प्रकार वह उन शासकों और संरक्षकों का भी आदर करता है, जिनकी सुरक्षा और संरक्षण में रहकर वह ज्ञान, संस्कृति और दर्शन के अध्ययन तथा साधना में अपना जीवन समर्पित कर पाता है।

    "किन्तु राजा तो अपनी शक्ति से अन्य लोगों की भी रक्षा करता है।" इस बात से कौन इनकार करता है? किन्तु जैसे अनुकूल मौसम का लाभ समुद्र में यात्रा करने वाले सभी लोगों को मिलता है, फिर भी जिसका जहाज़ अधिक मूल्यवान और अधिक बहुमूल्य माल से भरा होता है, वह समुद्र-देवता नेप्च्यून के प्रति अधिक कृतज्ञता अनुभव करता है। व्यापारी अपनी मनौती साधारण माल ढोने वाले जहाज़ के स्वामी की अपेक्षा अधिक श्रद्धा से पूरी करता है। व्यापारियों में भी जो व्यक्ति सोना देकर खरीदे जाने वाले मसाले और विलासिता की बहुमूल्य वस्तुएँ लेकर जा रहा होता है, वह उस व्यापारी की अपेक्षा कहीं अधिक कृतज्ञ होता है, जिसका जहाज़ केवल सस्ते सामान से भरा होता है, जिसे मुख्यतः जहाज़ का संतुलन बनाए रखने के लिए रखा गया हो। ठीक इसी प्रकार, जिस शान्ति का लाभ हम सबको समान रूप से मिलता है, उसका वास्तविक मूल्य वे लोग अधिक गहराई से अनुभव करते हैं, जो उसका सदुपयोग करते हैं। आज के समय में भी अनेक ऐसे लोग हैं जो शान्तिकाल में युद्धकाल की अपेक्षा अधिक अनुचित कार्यों में लगे रहते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि जो लोग शान्ति को मद्यपान, वासना और अन्य दुर्व्यसनों में नष्ट कर देते हैं? ऐसे दुर्व्यसन जिन्हें रोकने के लिए यदि युद्ध भी करना पड़े तो वह उचित हो, वे भी शान्ति के प्रति उतनी ही कृतज्ञता अनुभव करते हैं, जितनी वे लोग जो उसका श्रेष्ठ उपयोग करते हैं?

    निश्चय ही तुम यह नहीं सोचते कि बुद्धिमान व्यक्ति इतना अन्यायी होगा कि उन उपकारों के लिए स्वयं को कृतज्ञ न माने, जिनका लाभ सबको समान रूप से प्राप्त होता है। मैं सूर्य और चन्द्रमा का बहुत ऋणी हूँ, यद्यपि वे केवल मेरे लिए उदित नहीं होते। मैं ऋतुओं का भी अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऋणी हूँ और उस ईश्वर का भी, जो उनका संचालन करता है, यद्यपि इन सबकी व्यवस्था केवल मेरे सम्मान के लिए नहीं की गई है। मनुष्यों का मूर्खतापूर्ण लोभ ही स्वामित्व और अधिकार के बीच भेद करता है। वह यह मानता है कि जो वस्तु सबकी है, वह किसी एक व्यक्ति की अपनी नहीं हो सकती। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति यह समझता है कि उससे अधिक उसकी अपनी कोई वस्तु नहीं है, जो केवल उसी को नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति को समान रूप से प्राप्त हुई है। क्योंकि यदि कोई वस्तु सबकी साझी है, तो उसका एक अंश प्रत्येक व्यक्ति का भी है। इस प्रकार वह उन सभी वस्तुओं में अपना अधिकार अनुभव करता है, जो सामान्य रूप से सबकी साझा संपत्ति हैं, चाहे उसका हिस्सा कितना ही छोटा क्यों न हो।

    इसके अतिरिक्त, जो वस्तुएँ वास्तव में महान कल्याण हैं, वे इस अर्थ में साझा नहीं होतीं कि उनका थोड़ा-थोड़ा भाग प्रत्येक व्यक्ति को बाँट दिया जाए बल्कि वे प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त होती हैं। धन के वितरण में प्रत्येक व्यक्ति केवल उतनी ही राशि प्राप्त करता है, जितनी उसके लिए निर्धारित होती है। अन्न, मांस और अन्य भौतिक दान भी बाँटकर प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से के रूप में घर ले जाता है। किन्तु शान्ति और स्वतंत्रता जैसे अविभाज्य कल्याण ऐसे नहीं हैं। वे सभी को भी पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति को भी पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं।

    इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति यह विचार करता है कि वह कौन है, जिसके कारण उसे इन सब वस्तुओं का उपयोग और उनका आनंद लेने का अवसर प्राप्त होता है? कौन है जो उसे सार्वजनिक आवश्यकताओं के कारण युद्ध में बुलाए जाने, पहरेदारी करने, नगर की प्राचीरों की रक्षा करने और युद्ध से जुड़ी अनेक अन्य जिम्मेदारियों से मुक्त रखता है? इस उपकार के लिए वह अपने शासक के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। दर्शन का सबसे महत्त्वपूर्ण उपदेश यही है कि उपकार का ऋण किस प्रकार स्वीकार किया जाए और उसे किस प्रकार चुकाया जाए। किन्तु कई बार केवल कृतज्ञतापूर्वक उस ऋण को स्वीकार कर लेना ही उसका पर्याप्त प्रतिदान होता है। इस प्रकार वह स्वीकार करेगा कि वह उस शासक का बहुत बड़ा ऋणी है, जिसकी बुद्धिमत्तापूर्ण शासन-व्यवस्था ने उसे अवकाश के फलदायी क्षण, अपने समय पर अधिकार और सार्वजनिक दायित्वों से मुक्त शांत जीवन का वरदान दिया है।

"हे मेलिबोयस, हमारे लिए इस शान्ति की व्यवस्था किसी देवता ने की है। 
मेरे लिए तो वह पुरुष सदैव देवता के समान रहेगा।"

शासक का उपकार केवल शान्तिकाल के लिए ही नहीं बल्कि उस शान्ति के उन अमूल्य उपहारों के लिए भी है, जिनका वर्णन इन पंक्तियों में किया गया है—

"उसी ने मेरी गायों को आज की भाँति निश्चिन्त होकर चरने दिया
और उसी ने मुझे यह स्वतंत्रता दी कि मैं अपनी ग्रामीण बाँसुरी पर अपनी इच्छानुसार धुनें बजा सकूँ।"

तो फिर उस शान्ति का मूल्य हम कितना आँक सकते हैं, जो हमें देवताओं के समान शांत जीवन जीने का अवसर देती है और जो एक अर्थ में हमें स्वयं भी देवतुल्य बना देती है?

    हाँ, लूसीलियस, देवताओं तक! मैं तुम्हें स्वर्ग की ओर और वह भी सबसे सीधे मार्ग से बुला रहा हूँ। सेक्स्टियस कहा करते थे कि एक सद्गुणी मनुष्य की शक्ति जुपिटर के समान होती है। निस्संदेह, जुपिटर मनुष्यों को देने के लिए अधिक सामर्थ्य रखता है। किन्तु जब दो व्यक्ति समान रूप से बुद्धिमान हों, तब उनमें से एक के अधिक धनी होने से वह दूसरे से श्रेष्ठ नहीं हो जाता। ठीक वैसे ही जैसे तुम किसी कुशल नाविक को केवल इसलिए दूसरे से अधिक योग्य नहीं मानोगे कि उसका जहाज़ अधिक बड़ा और अधिक भव्य है। तो फिर जुपिटर किस अर्थ में सद्गुणी मनुष्य से श्रेष्ठ है? केवल इस अर्थ में कि उसका अस्तित्व अधिक समय तक बना रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को इसलिए कम मूल्यवान नहीं मानता कि उसके सद्गुणों का अभ्यास सीमित समय तक ही रहता है।जिस प्रकार दो बुद्धिमान व्यक्तियों में से वह अधिक धन्य नहीं कहा जा सकता जो अधिक आयु तक जीवित रहा और न ही वह कम धन्य है जिसकी सद्गुणपूर्ण जीवन-यात्रा अपेक्षाकृत कम वर्षों तक चली। उसी प्रकार ईश्वर भी केवल अपने अधिक काल तक बने रहने के कारण बुद्धिमान मनुष्य से अधिक धन्य नहीं हो जाता। सद्गुण की महानता उसकी अवधि से नहीं मापी जाती। वह अधिक समय तक टिकने मात्र से अधिक महान नहीं हो जाता।

    जुपिटर के पास सब कुछ है, फिर भी वह उन सब वस्तुओं को दूसरों के उपयोग के लिए प्रदान करता है। उन वस्तुओं पर उसका अधिकार केवल इस अर्थ में है कि वही दूसरों को उनका उपयोग करने का अवसर देता है।बुद्धिमान व्यक्ति भी दूसरों की संपत्तियों को उसी शान्त भाव से देखता है और उनसे अनासक्त रहता है, जैसे जुपिटर रहता है। बल्कि वह स्वयं को जुपिटर से भी अधिक सम्मान के योग्य समझता है क्योंकि जुपिटर उन वस्तुओं का उपयोग नहीं कर सकता, जबकि बुद्धिमान मनुष्य उनका उपयोग करना ही नहीं चाहता। 

    इसलिए आओ, हम सेक्स्टियस की बात पर विश्वास करें, जब वह हमें यह अत्यन्त सुंदर मार्ग दिखाते हुए पुकारते हैं, "यही वह मार्ग है जिससे मनुष्य तारों तक पहुँचता है। मितव्ययिता का मार्ग, आत्मसंयम का मार्ग और साहस का मार्ग।" देवता घमंडी नहीं होते और न ही वे अपने समान किसी अन्य के होने से ईर्ष्या करते हैं। वे स्वागत करते हैं और उन लोगों की सहायता करते हैं जो ऊपर चढ़ने का प्रयास करते हैं। क्या तुम्हें यह आश्चर्य होता है कि कोई मनुष्य देवताओं तक पहुँच सकता है? वास्तव में ईश्वर स्वयं मनुष्यों के पास आता है। बल्कि इससे भी अधिक निकटता की बात यह है कि ईश्वर मनुष्य के भीतर निवास करता है। क्योंकि मन की उत्कृष्टता कभी भी ईश्वर से रहित नहीं होती। मनुष्य के भीतर दिव्यता के बीज बिखरे हुए हैं। यदि किसी कुशल माली की तरह उनका उचित पालन-पोषण किया जाए, तो वे उसी स्रोत के समान विकसित होते हैं जिससे वे उत्पन्न हुए हैं और अंततः अपने मूल के तुल्य बन जाते हैं। किन्तु यदि उनका पालन-पोषण ठीक प्रकार से न हो, जैसे बंजर या दलदली भूमि में बोया गया बीज नष्ट हो जाता है तो वहाँ उत्तम पौधों के स्थान पर केवल खरपतवार ही उगती है।


अभी के लिए विदा 

वास्तविक स्वास्थ्य के बारे में -- पत्र - 71 (Seneca's letters to Lucilius)

 प्रिय लूसीलियस 


जिस विषय के बारे में तुम पूछ रहे हो, वह कभी मेरे लिए दिन के उजाले की तरह बिल्कुल स्पष्ट था। मैं उसे इतनी अच्छी तरह जानता था। किन्तु उसे परखे हुए बहुत समय बीत गया है। इसलिए अब उसे सहजता से स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। तुम जानते हो कि जब पेपिरस के पत्रों की बनी हुई पांडुलिपियाँ लंबे समय तक उपयोग में नहीं आतीं तो उनके पन्ने आपस में चिपक जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे मन की भी वही अवस्था हो गई है। समय-समय पर उसे खोलना आवश्यक है ताकि उसमें सुरक्षित बातें फिर से प्रकाश में आ जाएँ और आवश्यकता पड़ने पर तुरंत उपलब्ध हो सकें। इसलिए अभी के लिए तुम्हारे प्रश्न को स्थगित रहने दें। वह ऐसा विषय है, जिस पर गंभीर परिश्रम और एकाग्र ध्यान की आवश्यकता है। जैसे ही मुझे किसी एक स्थान पर कुछ अधिक समय तक ठहरने का अवसर मिलेगा, मैं उस पर पूरी सावधानी से काम करूँगा। कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर यात्रा के दौरान रथ में बैठे-बैठे भी लिखा जा सकता है। किन्तु कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जिनके लिए आरामदायक आसन, पर्याप्त अवकाश और हर प्रकार के व्यवधान से मुक्त वातावरण आवश्यक होता है।


By Paul Klee 

    फिर भी, इन अत्यन्त व्यस्त दिनों में भी मेरे पास कोई न कोई ऐसा कार्य अवश्य होना चाहिए, जिस पर मैं मन लगाकर काम कर सकूँ। क्योंकि एक काम समाप्त होते ही उसकी जगह दूसरा काम आ जाता है। हम स्वयं ही कार्यों को बीजों की तरह बोते जाते हैं और प्रत्येक कार्य से अनेक नए कार्य उत्पन्न हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, हम अपने आपको निरन्तर टालते भी रहते हैं। हम कहते हैं, "यह काम पूरा हो जाए, फिर मैं पूरे मन से इस विषय में लगूँगा," या "जैसे ही इस कठिन कार्य से छुटकारा मिल जाएगा, मैं स्वयं को अध्ययन के लिए समर्पित कर दूँगा।" किन्तु दर्शन का अभ्यास करने के लिए हमें खाली समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत, हमें अन्य कार्यों की उपेक्षा करके स्वयं को इसी एक कार्य में लगाना चाहिए क्योंकि इसके लिए तो इतना समय भी पर्याप्त नहीं होगा, जितना मनुष्य के जीवन की सबसे लम्बी सम्भावित आयु में उपलब्ध हो सकता है। यदि तुम दर्शन का अभ्यास बीच-बीच में, कभी-कभार ही करने वाले हो तो उसके अभ्यास का कोई विशेष लाभ नहीं होगा। क्योंकि दर्शन किसी व्यवधान के बीच अपनी स्थिति बनाए नहीं रखता। वह उस वस्तु के समान है जिसे दबाने पर वह सिकुड़ जाती है और दबाव हटते ही फिर अपने पुराने रूप में लौट आती है। यदि अभ्यास में ढील दी जाए तो मन भी अपनी पुरानी अवस्था में लौट जाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने विविध कार्यों का दृढ़ता से सामना करें। केवल अपने बोझ को थोड़ा कम कर देना पर्याप्त नहीं है। जहाँ तक सम्भव हो, उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। ऐसा कोई समय नहीं होता जो इस आत्मिक उपचाररूपी अध्ययन के लिए अनुपयुक्त हो। फिर भी विडम्बना यह है कि अनेक लोग उन्हीं समस्याओं में इतने उलझे रहते हैं, जिनके कारण उन्हें दर्शन का अध्ययन करना सबसे अधिक आवश्यक होता है।

    "कोई आकस्मिक घटना मुझे बाधित कर देगी।" किन्तु उस व्यक्ति को कोई भी बाधा रोक नहीं सकती, जिसका मन प्रत्येक कार्य में प्रसन्न और उत्साहपूर्ण रहता है। जो अभी पूर्ण नहीं हुआ है, उसकी प्रसन्नता बीच-बीच में भंग हो जाती है। परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद अखण्ड होता है। किसी भी कारण या आकस्मिक घटना से उसमें व्यवधान नहीं आता। बुद्धिमान व्यक्ति हर समय और हर स्थान पर शांत रहता है क्योंकि वह किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर नहीं होता। वह न तो भाग्य की कृपा की प्रतीक्षा करता है और न किसी अन्य मनुष्य की। उसका सुख उसके अपने भीतर निवास करता है। यदि वह बाहर से उसके मन में आया होता तो बाहर ही चला भी जाता। किन्तु वह तो उसके अपने अंतःकरण में जन्म लेता है। हाँ, कभी-कभी बाहरी परिस्थितियाँ उसे उसकी नश्वरता का स्मरण अवश्य करा देती हैं, पर वह स्मरण इतना हल्का होता है कि केवल सतह को ही स्पर्श कर पाता है। निश्चय ही वह विपत्ति की प्रतिकूल हवाओं को अनुभव करता है। किन्तु उसका सर्वोच्च कल्याण दृढ़तापूर्वक अपनी जगह पर स्थिर रहता है। अर्थात कुछ बाहरी असुविधाएँ उसे अवश्य प्रभावित कर सकती हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक स्वस्थ और सबल शरीर पर कभी खरोंच या छोटी-सी फुंसी हो सकती है, जबकि भीतर कोई गम्भीर रोग न हो।

    मेरा आशय यह है कि पूर्ण बुद्धिमान व्यक्ति और उस व्यक्ति के बीच, जो अभी प्रज्ञा की ओर अग्रसर है, वही अंतर है जो एक पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति और उस व्यक्ति के बीच होता है, जो किसी लम्बी और गंभीर बीमारी से धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा हो। ऐसे रोगमुक्त हो रहे व्यक्ति के लिए तो रोग का केवल हल्का पड़ जाना ही स्वास्थ्य का लक्षण माना जाता है। किन्तु यदि वह सावधान न रहे तो उसकी प्रगति बार-बार रुक जाती है और वह फिर पीछे लौटने लगता है। इसके विपरीत, बुद्धिमान व्यक्ति को न तो पुनः उसी रोग का आक्रमण सहना पड़ता है और न ही किसी प्रकार की गिरावट का सामना करना पड़ता है। शरीर का स्वास्थ्य तो एक अस्थायी अवस्था है। कोई भी वैद्य उसे स्थायी रूप से प्रदान नहीं कर सकता। वह केवल उसे पुनः स्थापित कर सकता है। इसलिए वही रोगी बार-बार चिकित्सक को बुलाता है और चिकित्सक को अनेक बार उसी की सेवा के लिए जाना पड़ता है। किन्तु जब मन वास्तव में स्वस्थ हो जाता है, तब उसका उपचार एक बार के लिए और सदा के लिए पूर्ण हो जाता है।

    मैं तुम्हें बताता हूँ कि मन के वास्तव में स्वस्थ हो जाने का क्या अर्थ है। ऐसा मन अपने आप में ही संतुष्ट रहता है और स्वयं पर पूर्ण विश्वास रखता है। वह यह समझ चुका होता है कि जिन वस्तुओं की हम नश्वर मनुष्य कामना करते हैं और जिन उपकारों का हम आदान-प्रदान करते हैं, उनका वास्तविक सुख से कोई संबंध नहीं है। जिस वस्तु में कुछ और जोड़ा जा सकता हो, वह अभी पूर्ण नहीं है। जिसे घटाया जा सकता हो, वह शाश्वत नहीं है। यदि प्रसन्नता को स्थायी बनाए रखना है तो मनुष्य को अपने ही आंतरिक साधनों और अपने ही सद्गुणों में आनंद प्राप्त करना चाहिए। जिन वस्तुओं की सामान्य लोग इच्छा करते हैं, वे सब निरन्तर परिवर्तनशील हैं; वे कभी इधर जाती हैं, कभी उधर। भाग्य के उपहार हमारे स्थायी अधिकार में नहीं होते।

    किन्तु भाग्य से जो कुछ हमें प्राप्त होता है, वह भी तभी वास्तविक संतोष देता है, जब विवेक उसे उचित मर्यादा और संतुलन के साथ ग्रहण करता है। बाहरी वस्तुओं का मूल्य भी हमारे लिए विवेक ही निर्धारित करता है। यदि हम उनके प्रति लोभ से भर जाएँ तो उनसे हमें कभी वास्तविक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। अटालस प्रायः यह उपमा दिया करते थे—

"क्या तुमने कभी किसी कुत्ते को देखा है, जो अपने स्वामी द्वारा फेंके गए रोटी या मांस के टुकड़ों को लपकता है? जैसे ही वह एक टुकड़ा पकड़ता है, उसे बिना चबाए तुरंत निगल जाता है। उसका मुँह फिर अगले टुकड़े की प्रतीक्षा में खुला रहता है। हमारी दशा भी कुछ ऐसी ही है। भाग्य हमारी ओर जो कुछ भी फेंकता है, हम उसे तुरंत हड़प लेते हैं। किन्तु हमारा मन उसी क्षण फिर किसी और अधिक आकर्षक वस्तु की आशा में आगे देखने लगता है, जो अभी हमारी पहुँच से बाहर है।"

बुद्धिमान व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। वह अपने भीतर से ही पूर्ण होता है। यदि भाग्य से उसे कुछ प्राप्त हो भी जाए तो वह उसे बिना किसी विशेष आसक्ति के ग्रहण करता है और उसी सहजता से छोड़ भी देता है। उसका आनंद प्रचुर, स्थिर और उसका अपना होता है।

    जिस व्यक्ति के इरादे अच्छे हैं और जो प्रगति के मार्ग पर चल रहा है। किन्तु अभी पूर्णता के शिखर से बहुत दूर है, उसकी अवस्था बदलती रहती है। कभी वह ऊपर उठता है, मानो आकाश तक पहुँच गया हो और कभी फिर नीचे धरती पर लौट आता है। जो नवशिक्षु हैं और जिनके पास अभी अभ्यास तथा आत्मसंयम का प्रशिक्षण नहीं है, वे निरन्तर नीचे गिरते रहते हैं। वे एपिक्यूरस द्वारा वर्णित उस असीम शून्य के समान भ्रम और अस्थिरता में जा गिरते हैं, जहाँ कोई स्थिर आधार नहीं होता। इसके अतिरिक्त एक तीसरा वर्ग भी है। वे लोग जो प्रज्ञा के अत्यन्त निकट पहुँच चुके हैं। यद्यपि उन्होंने अभी उसे पूरी तरह प्राप्त नहीं किया है, फिर भी वह उनकी दृष्टि में है, मानो वे उससे केवल एक कदम की दूरी पर हों। अब वे जीवन की लहरों से इधर-उधर नहीं उछाले जाते और न ही उन्हें भीतर की कोई धारा पीछे खींचती है। यद्यपि वे अभी किनारे पर नहीं पहुँचे हैं, फिर भी वे पहले ही सुरक्षित बंदरगाह की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं।

    अतः जब प्रगति के सर्वोच्च और निम्नतम स्तरों के बीच इतना अधिक अंतर है और मध्यवर्ती अवस्था भी अनेक उतार-चढ़ावों के अधीन है। जबकि सबसे निम्न अवस्था में पुनः पतन का बड़ा जोखिम बना रहता है, तब हमें अपने आपको विविध सांसारिक व्यस्तताओं का दास नहीं बनने देना चाहिए। इन व्यस्तताओं को आरम्भ में ही अपने जीवन से दूर रखना चाहिए। क्योंकि यदि वे एक बार भीतर प्रवेश कर गईं तो अपने साथ और भी अनेक व्यस्तताओं को ले आएँगी। इसलिए हमें प्रारम्भ से ही उनका दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करना चाहिए क्योंकि यदि आरम्भ पर हमारा अधिकार नहीं रहा तो अंत कभी भी आरम्भ से बेहतर नहीं होगा।

   

अभी के लिए विदा 

वास्तविक विजय के बारे में -- पत्र - 70 (Hindi Translation of Seneca's Letters)

 प्रिय लूसीलियस 


बार-बार तुम मुझसे विशेष विषयों पर परामर्श माँगते हो, यह भूलकर कि तुम्हारे और मेरे बीच एक विशाल और निर्जन समुद्र फैला हुआ है। चूँकि अधिकांश सलाह परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए कुछ विषयों पर मेरा उत्तर तुम्हारे पास ऐसे समय पहुँच सकता है, जब उसके ठीक विपरीत सलाह तुम्हारे लिए अधिक लाभकारी होती। क्योंकि सलाह का स्वरूप घटनाओं के अनुसार निर्धारित होता है और घटनाएँ निरन्तर बदलती रहती हैं बल्कि तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं। इसलिए सलाह उसी दिन दी जानी चाहिए, जिस दिन उसकी आवश्यकता हो। वह भी पर्याप्त शीघ्र नहीं है। जैसा कि कहा जाता है, 'सलाह तो 'उसी क्षण, उसी स्थान पर' दी जानी चाहिए।


By Paul Klee 

    तो फिर सलाह कैसे प्राप्त की जाए? मैं तुम्हें बताता हूँ। जब भी तुम्हें यह जानना हो कि किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, तब अपने सर्वोच्च कल्याण (परम हित) की ओर देखो। उस लक्ष्य की ओर, जो तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन का उद्देश्य है। हमारे प्रत्येक कर्म का उसी लक्ष्य के अनुरूप होना चाहिए। केवल वही व्यक्ति जीवन के छोटे-छोटे कार्यों को सही ढंग से व्यवस्थित कर सकता है, जिसकी दृष्टि अपने पूरे जीवन पर होती है।चित्रकार के पास यदि सभी रंग तैयार भी हों तो भी वह तब तक किसी का चित्र नहीं बना सकता, जब तक यह न तय कर ले कि उसे क्या चित्रित करना है। हमारी भूल भी यही है। हर व्यक्ति जीवन के अलग-अलग पक्षों पर विचार करता है पर सम्पूर्ण जीवन के बारे में नहीं। यदि तुम तीर चलाना चाहते हो तो पहले यह जानना आवश्यक है कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है। तभी तुम तीर की नोक को सही दिशा दे सकते हो और उसे स्थिरता से छोड़ सकते हो। हमारी सारी सलाहें इसलिए भटक जाती हैं क्योंकि उनके सामने कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसे किस बन्दरगाह तक पहुँचना है, उसके लिए कोई भी हवा अनुकूल सिद्ध नहीं हो सकती।

    संयोग (भाग्य) का हमारे जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हमारा जीवित होना भी संयोग का ही परिणाम है। किन्तु कभी-कभी मनुष्य किसी बात को जाने बिना भी जानता है। जैसे हम अनेक बार अपने पास ही खड़े व्यक्ति को ढूँढ़ते फिरते हैं, वैसे ही जीवन के लक्ष्य और परम कल्याण (सर्वोच्च हित) को भी प्रायः नहीं पहचान पाते, जबकि वह हमारे सामने ही उपस्थित होता है।

लम्बी-चौड़ी व्याख्याएँ तुम्हें यह नहीं बता सकतीं कि परम कल्याण क्या है; उसे तो मानो उँगली रखकर स्पष्ट दिखा देना चाहिए, ताकि वह इधर-उधर बिखर न जाए। मुझे उसके सभी विवरणों में जाने की क्या आवश्यकता है, जबकि सरलता से यह कहा जा सकता है— "परम कल्याण वही है जो सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) है।" या इससे भी अधिक स्पष्ट रूप में— "एकमात्र वास्तविक कल्याण वही है जो सम्माननीय है। अन्य सभी तथाकथित कल्याण तो केवल जाली सिक्कों के समान हैं।"

    यदि तुम इस सत्य को अपने मन में दृढ़ता से स्थापित कर लो और सद्गुण (Virtue) से गहरा प्रेम करने लगो क्योंकि केवल उसे पसंद करना पर्याप्त नहीं है तो फिर सद्गुण जिस किसी वस्तु या परिस्थिति को स्पर्श करेगा। वह तुम्हारी दृष्टि में अत्यन्त शुभ और प्रशंसनीय होगी, चाहे दूसरों को वह कैसी भी क्यों न दिखाई दे। यदि तुम यातना सहो तो उसे उसी शान्ति और निर्लिप्तता से सहोगे, जितनी स्वयं यातना देने वाले में होती है। यदि रोग आए तो तुम भाग्य को दोष नहीं दोगे और न ही रोग को अपने मन पर विजय पाने दोगे। वास्तव में, जिन बातों को दूसरे लोग बुरा मानते हैं, वे भी तुम्हारे लिए अच्छी सिद्ध होंगी, यदि तुम उनसे ऊपर उठ सको। जब यह बात तुम्हारे लिए पूर्णतः स्पष्ट हो जाएगी कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही वास्तविक कल्याण है, तब जो भी वस्तु या परिस्थिति अपने-आप में कष्टदायक प्रतीत होती है, वह भी सद्गुण के कारण सम्माननीय बनकर तुम्हारी दृष्टि में कल्याण ही मानी जाएगी। बहुत-से लोग सोचते हैं कि हम स्टोइक (Stoics) मनुष्य की सामर्थ्य से कहीं अधिक ऊँची बातें करते हैं। ऐसा सोचने का उनके पास कारण भी है क्योंकि वे केवल मनुष्य के शरीर को देखते हैं। यदि वे एक बार फिर अपने मन की ओर दृष्टि करें तो उन्हें ज्ञात होगा कि मनुष्य की वास्तविक सीमा और मापदण्ड ईश्वर में निहित है।

    प्रिय लूसीलियस, उठो और स्वयं को जागृत करो। उस व्याकरण-विद्यालय और उन पांडित्य-प्रिय दार्शनिकों को पीछे छोड़ दो, जो इस अद्भुत विषय को केवल शब्दों और अक्षरों तक सीमित कर देते हैं। वे सूक्ष्म और तुच्छ बातों की शिक्षा देकर मन की गरिमा को घटा देते हैं और उसकी शक्ति को व्यर्थ नष्ट कर देते हैं। उन लोगों के समान बनो जिन्होंने इन सत्यों की खोज की थी न कि उन लोगों के समान जो दर्शन को महान बनाने के बजाय उसे कठिन प्रतीत कराने के उद्देश्य से पढ़ाते हैं। सुकरात, जिन्होंने दर्शन को पुनः नैतिक जीवन की ओर लौटाया, कहा करते थे कि बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च शिखर यह जानने में है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। वे कहते थे—

"यदि मेरी बात का तुम्हारे लिए कोई महत्व है तो उन सिद्धान्तों का अनुसरण करो जिनसे तुम सुखी बन सको। यदि कोई तुम्हें मूर्ख समझे तो उसे ऐसा समझने दो। जो चाहे तुम्हारा अपमान करे या तुम्हारे साथ अन्याय करे। जब तक सद्गुण तुम्हारे साथ है, तब तक इन बातों से तुम अप्रभावित रहोगे। यदि तुम सचमुच सुखी होना चाहते हो, यदि वास्तव में एक अच्छा मनुष्य बनना चाहते हो तो लोगों की अवमानना सहने के लिए तैयार रहो।"

इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को स्वयं सभी बाहरी वस्तुओं के प्रति उदासीन होना सीखना चाहिए। जिन वस्तुओं को हम अच्छा मानते हैं, उनके बीच किसी प्रकार का भेद नहीं रखना चाहिए क्योंकि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के अतिरिक्त कोई भी वस्तु वास्तव में अच्छी नहीं है और जो सम्माननीय है, वह प्रत्येक परिस्थिति में समान रहता है।

    "तुम्हारा क्या आशय है? क्या इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कैटो प्रेटर निर्वाचित हुआ या पराजित हो गया? क्या इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह फ़ार्सालस के युद्ध में हार गया या अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली? क्या उस सद्गुण का मूल्य, जिसके कारण वह अपनी ओर की हार के बाद भी अजेय बना रहा, वास्तव में उसी सद्गुण के बराबर है जो उसे युद्ध जीतकर, अपने देश लौटकर और शांति स्थापित करके प्राप्त होता?" हाँ, क्यों नहीं? विपत्ति पर विजय प्राप्त करते समय सद्गुण जैसा होता है, वैसा ही वह समृद्धि और सफलता के बीच भी बना रहता है। सद्गुण न तो बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। उसका केवल एक ही स्वरूप और एक ही परिमाण होता है।

    "लेकिन ग्नेयस पोम्पेई अपनी सेना खो देगा। गणराज्य का सबसे उज्ज्वल आभूषण, कुलीन वर्ग और पोम्पेई के पक्ष की प्रथम पंक्ति अर्थात शस्त्रधारी सीनेटर, एक ही युद्ध में नष्ट हो जाएँगे। इतनी महान शक्ति के पतन के बाद उसके अवशेष पूरे संसार में बिखर जाएँगे। एक भाग मिस्र में, दूसरा अफ्रीका में और तीसरा स्पेन में। हमारा अभागा गणराज्य इतना भी सौभाग्यशाली नहीं होगा कि उसका केवल एक ही बार पतन हो।" यह सब हो सकता है। जूबा को अपने देश की भौगोलिक जानकारी का कोई लाभ न मिले। अपने राजा की रक्षा में लड़ने वाले उसके साधारण सैनिकों का अडिग साहस भी निष्फल हो जाए। विपत्तियों से टूटकर यूटिका के लोगों की निष्ठा भी डगमगा जाए और अफ्रीका में सिपियो भी अपने नाम से जुड़ी अब तक की शुभ-प्रतिष्ठा के अनुरूप सफलता प्राप्त न कर सके। किन्तु बहुत पहले ही यह सुनिश्चित हो चुका था कि कैटो को किसी प्रकार की वास्तविक हानि नहीं पहुँच सकती। "लेकिन वह तो पराजित हुआ।" हाँ, यह भी कैटो के लिए केवल एक और असफलता थी। उसने अपनी विजय में आने वाली बाधा को उतनी ही गरिमा से स्वीकार किया, जितनी गरिमा से उसने प्रेटर के चुनाव में मिली असफलता को स्वीकार किया था। जिस दिन वह चुनाव हार गया, उस दिन उसने खेल खेला और जिस रात उसे मृत्यु का वरण करना था, उस रात उसने एक पुस्तक पढ़ी। उसके लिए प्रेटर का पद खोना और अपना जीवन खोना, दोनों समान थे क्योंकि उसने अपने मन को इस सत्य के लिए तैयार कर लिया था कि जो कुछ भी घटे, उसे धैर्यपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।

    और वास्तव में, वह गणराज्य में आए परिवर्तन को साहस और शान्ति के साथ क्यों न सहन करे? परिवर्तन के जोखिम से कौन मुक्त है? न पृथ्वी, न आकाश और न ही स्वयं यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड। यद्यपि इसकी रचना स्वयं ईश्वर ने की है, फिर भी यह सदा अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं रहेगा। एक दिन ऐसा अवश्य आएगा, जो इसकी वर्तमान व्यवस्था को बदल देगा। सभी वस्तुएँ एक निश्चित क्रम के अनुसार चलती हैं। उनका जन्म होना है, उनका विकास होना है और अंततः उनका नाश होना है। जो कुछ तुम अपने ऊपर आकाश में देख रहे हो और जो कुछ तुम्हें अपने पैरों के नीचे इतना स्थिर प्रतीत होता है, वह सब एक दिन विघटित हो जाएगा। प्रत्येक वस्तु की अपनी एक आयु होती है। प्रकृति सबको अलग-अलग समय तक टिकाए रखती है, पर अंततः सबको उसी एक स्थान की ओर लौटा देती है। जो आज विद्यमान है, वह एक दिन नहीं रहेगा।

    यह नहीं कि वह पूर्णतः नष्ट हो जाता है बल्कि उसका विघटन हो जाता है। किन्तु हमें यह विघटन ही विनाश प्रतीत होता है क्योंकि हमारी दृष्टि केवल अपने निकट की वस्तुओं तक सीमित रहती है। हमारी मन्द बुद्धि शरीर के अधीन रहती है और उससे आगे देखने की क्षमता नहीं रखती। यदि हम यह समझ पाते कि जीवन और मृत्यु भी अन्य सभी वस्तुओं की भाँति क्रमशः आते और जाते रहते हैं तो हम अपने स्वयं के अंत और अपने प्रियजनों के वियोग को कहीं अधिक धैर्य और साहस के साथ सह सकते। संयुक्त वस्तुएँ विघटित हो जाती हैं और उनके पृथक् तत्त्व फिर नए रूप में संयोजित हो जाते हैं। इसी प्रकार समस्त सृष्टि का संचालन करने वाले ईश्वर की शाश्वत सृजन-प्रक्रिया निरन्तर कार्य करती रहती है। इसलिए मार्कस कैटो की भाँति हमारे विचार भी समय के पार दृष्टि डालते हुए कहेंगे—

    "समस्त मानवजाति, वर्तमान और भविष्य की मृत्यु के अधीन है। वे सभी नगर, जिन्होंने कभी संसार पर शासन किया और वे सभी नगर, जो किसी अन्य शक्ति की विजय के प्रतीक बने, एक दिन दृष्टि से ओझल हो जाएँगे और विभिन्न प्रकार के विनाश से मिट जाएँगे। कुछ युद्धों द्वारा नष्ट होंगे। कुछ उपेक्षा, शान्ति से उत्पन्न आलस्य और उस वस्तु के कारण, जो महान समृद्धि के लिए सबसे अधिक विनाशकारी है। विलासिता के कारण नष्ट हो जाएँगे। ये सभी उपजाऊ मैदान भी एक दिन समुद्र के किसी आकस्मिक विस्तार से ढँक जाएँगे अथवा पृथ्वी के धँसकर किसी अप्रत्याशित गर्त में समा जाने से विलीन हो जाएँगे। फिर मैं शिकायत क्यों करूँ? मैं इस बात से दुःखी क्यों होऊँ कि मुझे राष्ट्रों और जनसमुदायों के लिए निर्धारित अंतिम समय से केवल कुछ क्षण पहले ही जाना पड़ रहा है? एक महान आत्मा को ईश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए और विश्व-व्यवस्था के नियमों का अनुसरण करने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। या तो वह एक श्रेष्ठ जीवन की ओर भेजी जा रही है, जहाँ वह ईश्वर के लोक में अधिक महान और अधिक शांतिमय प्रकाश के बीच निवास करेगी अथवा कम-से-कम वह सभी कष्टों से मुक्त होकर पुनः प्रकृति में विलीन हो जाएगी और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में लौट जाएगी।"

    इस प्रकार कैटो का सम्माननीय जीवन उसके सम्माननीय मृत्यु से अधिक श्रेष्ठ नहीं है क्योंकि सद्गुण में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं हो सकती। सुकरात कहा करते थे कि सत्य और सद्गुण एक ही हैं। जिस प्रकार सत्य न तो बढ़ता है और न घटता है, उसी प्रकार सद्गुण भी न बढ़ता है और न घटता है। वह अपने पूर्ण स्वरूप में रहता है; उसमें किसी प्रकार की वृद्धि या कमी संभव नहीं है।

    इसलिए तुम्हें यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि सभी वास्तविक कल्याण समान हैं, चाहे वे वे हों जिन्हें हमें सक्रिय रूप से प्राप्त करना चाहिए या वे जिन्हें परिस्थितियों के अनुसार स्वीकार करना पड़ता है। क्योंकि यदि तुम यह मान लो कि उनमें कोई असमानता है और यह समझो कि यातना को साहसपूर्वक सहना अपेक्षाकृत कम महत्त्व का कल्याण है तो तुम अंततः उसे बुराई भी मानने लगोगे। तब तुम्हें कहना पड़ेगा कि कारागार में सुकरात दुर्भाग्यशाली थे कि कैटो दुर्भाग्यशाली थे, जब उन्होंने अपने घावों को पहले से भी अधिक साहस के साथ पुनः खोल दिया कि रेगुलस उन सब से भी अधिक दुःखी था क्योंकि उसने अपने शत्रुओं से किया हुआ वचन निभाया और उसी के कारण कठोर दण्ड सहा। किन्तु सबसे अधिक भयभीत व्यक्ति ने भी ऐसा कहने का साहस नहीं किया। लोग यह तो कहते हैं कि रेगुलस सुखी नहीं था, परन्तु यह भी स्वीकार करते हैं कि वह दुःखी भी नहीं था। प्राचीन अकादमिक दार्शनिक यह मानते थे कि रेगुलस इतनी भीषण यातनाओं के बीच भी सुखी था, किन्तु पूर्ण और परिपूर्ण अर्थ में नहीं। यह मत सर्वथा अस्वीकार्य है। यदि कोई वास्तव में सुखी नहीं है,तो उसने सर्वोच्च कल्याण प्राप्त ही नहीं किया। और यदि सर्वोच्च कल्याण प्राप्त हो गया है तो उसमें किसी और प्रकार की श्रेष्ठता जोड़ी नहीं जा सकती, क्योंकि जहाँ सद्गुण विद्यमान है, वहाँ उससे बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। जब तक विपत्तियाँ सद्गुण को कमज़ोर नहीं करतीं और जब तक शरीर के क्षत-विक्षत हो जाने पर भी सद्गुण अक्षुण्ण बना रहता है, तब तक सर्वोच्च कल्याण भी पूर्ण बना रहता है। और वास्तव में सद्गुण अक्षुण्ण ही रहता है क्योंकि मैं सद्गुण से उस साहसी और उदात्त शक्ति का आशय लेता हूँ, जो अपने विरोध में खड़ी प्रत्येक कठिनाई से ही अपनी शक्ति प्राप्त करती है।

    उदात्त स्वभाव वाले युवा, जब किसी सम्माननीय कर्म की महानता और सौन्दर्य से प्रभावित होते हैं तो प्रायः ऐसी मनःस्थिति अपना लेते हैं कि वे बाहरी परिस्थितियों की कोई परवाह नहीं करते। किन्तु प्रज्ञा (विवेकपूर्ण ज्ञान) बिना किसी कठिनाई के मनुष्य में वही दृष्टिकोण उत्पन्न कर देती है। वह हमें इस दृढ़ विश्वास से भर देती है कि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही एकमात्र वास्तविक कल्याण है। उसे न तो घटाया जा सकता है और न बढ़ाया जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे सीधापन मापने वाली पूर्णतः सीधी रेखा को तुम मोड़ नहीं सकते। यदि तुम उसमें कोई परिवर्तन करोगे तो वह सीधी रेखा नहीं रह जाएगी। इसी प्रकार हम सद्गुण के विषय में भी कहते हैं कि वह भी पूर्णतः सीधा और निष्कलंक है; उसमें किसी प्रकार का टेढ़ापन नहीं आ सकता। जो वस्तु पहले से ही पूर्णतः सीधी है, उसमें और क्या वृद्धि की जा सकती है? सद्गुण ही सभी वस्तुओं का मापदण्ड है। सद्गुण का मापदण्ड कोई अन्य वस्तु नहीं हो सकती। यदि स्वयं सद्गुण को अधिक सीधा या अधिक श्रेष्ठ नहीं बनाया जा सकता तो उसके द्वारा किए गए कार्यों में भी कोई एक दूसरे से अधिक श्रेष्ठ नहीं हो सकता क्योंकि वे सभी सद्गुण के एक ही मापदण्ड के अनुरूप होते हैं। इसलिए वे सभी समान हैं।

    "क्या सचमुच?" तुम कहोगे। "क्या भोजन-सभा में आराम से बैठकर भोजन करना और यातना सहना समान हो सकते हैं?" यदि यह बात तुम्हें आश्चर्यचकित करती है तो इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात सुनो। यदि भोजन-सभा में बैठना अनैतिक ढंग से किया जाए, तो वह बुरा है और यदि यातना सम्मानपूर्वक और सद्गुण के साथ सहन की जाए, तो वह अच्छा है। किसी कार्य का अच्छा या बुरा होना उसके बाहरी रूप या परिस्थिति पर निर्भर नहीं करता बल्कि सद्गुण पर निर्भर करता है। जहाँ सद्गुण उपस्थित होता है, वहाँ सब कुछ समान माप और समान मूल्य का हो जाता है।

    इस पर वह व्यक्ति, जो प्रत्येक मनुष्य के चरित्र का आकलन अपने ही मन के अनुसार करता है, मेरे सामने हाथ हिलाकर विरोध करने लगता है क्योंकि मैं यह कहता हूँ कि एक सम्माननीय न्यायाधीश और एक सम्माननीय अभियुक्त का कल्याण समान है। उसी प्रकार विजयी होकर विजय-यात्रा निकालने वाले सेनापति का कल्याण और उस बंदी का कल्याण भी समान है, जो उसके रथ के आगे बाँधकर ले जाया जा रहा है। पर जिसका मन किसी भी प्रकार से पराजित नहीं हुआ है। ऐसे लोग यह मान लेते हैं कि जो कार्य वे स्वयं नहीं कर सकते, वह किसी और के लिए भी असंभव है। वे सद्गुण का मूल्यांकन अपनी ही दुर्बलता के आधार पर करते हैं।

    तुम्हें इसमें आश्चर्य क्यों होता है कि जलाया जाना, घायल होना, प्रहार सहना या बेड़ियों में जकड़ा जाना भी कभी-कभी संतोष का बल्कि आनंद का कारण बन सकता है? जो व्यक्ति विलासिता का आदी होता है, उसके लिए सादगी दंड के समान होती है। जो आलसी होता है, उसके लिए श्रम किसी सज़ा जैसा लगता है। जो व्यक्ति कोमल और आरामप्रिय है, वह परिश्रमी मनुष्य पर दया करता है और निकम्मे व्यक्ति को अध्ययन भी यातना जैसा प्रतीत होता है। ठीक इसी प्रकार, जिन कार्यों को करने के लिए हम स्वयं बहुत दुर्बल होते हैं, उन्हें हम कठोर और असहनीय मान लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्हें मदिरा के बिना रहना या प्रातःकाल जल्दी उठना अत्यंत कठिन लगता है। वास्तव में ये बातें स्वभावतः कठिन नहीं हैं। कठिनाई हमारे अपने आलस्य और दुर्बलता में है। महान चुनौतियों का सही मूल्यांकन करने के लिए महान मन की आवश्यकता होती है। अन्यथा हम दोष अपनी परिस्थितियों में ढूँढ़ते हैं, स्वयं में नहीं। यह उसी प्रकार है जैसे कुछ वस्तुएँ पूरी तरह सीधी होने पर भी पानी में डुबो देने पर टेढ़ी या टूटी हुई दिखाई देती हैं। महत्त्व केवल इस बात का नहीं है कि तुम क्या देखते हो बल्कि इस बात का भी है कि तुम उसे किस प्रकार देखते हो। हमारे मन इतने धुँधले और भ्रमग्रस्त हैं कि वे वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में नहीं देख पाते।

    मुझे ऐसा तीक्ष्ण बुद्धि वाला युवक दो, जिसका चरित्र अभी तक भ्रष्ट न हुआ हो। वह अवश्य कहेगा कि उसके विचार में वास्तव में अधिक सौभाग्यशाली वही व्यक्ति है, जिसके कंधे विपत्तियों का समस्त भार उठाने पर भी नहीं झुकते, जो भाग्य की प्रतिकूलताओं से ऊपर उठकर खड़ा रहता है। शांत और अनुकूल परिस्थितियों में विचलित न होना कोई विशेष बात नहीं है। आश्चर्य तो तब होता है जब सबके निराश हो जाने पर भी कोई दृढ़ता से उठ खड़ा हो। जब सब गिर पड़े हों, तब भी कोई अटल खड़ा रहे।

    यातना या उन अन्य घटनाओं में, जिन्हें हम प्रतिकूल मानते हैं, वास्तव में बुराई क्या है? मेरे विचार में केवल यही कि मनुष्य अपने मन को हीन बना ले, उसे झुका दे और परिस्थितियों के सामने आत्मसमर्पण कर दे। इनमें से कोई भी बात बुद्धिमान व्यक्ति के साथ नहीं हो सकती। वह किसी भी भार के नीचे सीधा और अडिग खड़ा रहता है। कोई भी विपत्ति उसे छोटा नहीं बना सकती और जो कुछ उसे सहना पड़ता है, उससे वह अप्रसन्न नहीं होता। मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घट सकता है, उनमें से किसी भी बात की वह केवल इसलिए शिकायत नहीं करता कि वह उसके साथ घटी है। वह अपनी शक्ति को जानता है। वह जानता है कि उसका जन्म ही भारों को धैर्यपूर्वक वहन करने के लिए हुआ है।

    मैं बुद्धिमान व्यक्ति को शेष मानवजाति से अलग कोई विशेष वर्ग नहीं मानता और न ही उसे ऐसा निर्जीव पत्थर समझता हूँ, जिसे पीड़ा या दुःख का कोई अनुभव ही न हो। मैं यह ध्यान में रखता हूँ कि वह दो भागों से बना है। एक भाग अतार्किक है। वही पीड़ा, जलन और शारीरिक कष्ट का अनुभव करता है। दूसरा भाग तर्कसंगत है। वही दृढ़ और अडिग धारणाओं को धारण करता है तथा निर्भय और अजेय रहता है। मनुष्य का सर्वोच्च कल्याण इसी तर्कसंगत भाग में स्थित है। जब तक यह सर्वोच्च कल्याण पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो जाता, तब तक मन अस्थिर और व्याकुल बना रहता है। परन्तु जब वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब मन स्थिर, शांत और अविचल हो जाता है।इसी कारण जो व्यक्ति सद्गुण के मार्ग पर चलना प्रारम्भ कर चुका है, जो उसके प्रति समर्पित है, किन्तु अभी भी शिखर की ओर बढ़ रहा है, जो पूर्णता के निकट तो पहुँच गया है। पर अभी अंतिम सिद्धि प्राप्त नहीं कर सका, वह कभी-कभी शिथिल पड़ जाता है और उसका ध्यान डगमगा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह अभी अनिश्चितताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। वह अभी भी अस्थिर भूमि पर खड़ा है। किन्तु जो व्यक्ति वास्तव में सुखी है और जिसने सद्गुण की पूर्णता प्राप्त कर ली है, वह स्वयं से सबसे अधिक संतुष्ट तब होता है जब उसने किसी चुनौती का असाधारण साहस के साथ सामना किया हो। जिन परीक्षाओं से अन्य लोग भयभीत होते हैं, उन्हें वह केवल सहन ही नहीं करता बल्कि यदि वे किसी सम्माननीय कर्तव्य का मूल्य हों, तो उनका स्वागत भी करता है। वह 'क्या सौभाग्य है!' सुनने की अपेक्षा 'क्या महान कर्म है!' सुनना कहीं अधिक पसंद करेगा।

    अब मैं उस विषय पर आता हूँ, जिसके बारे में उत्तर देने की तुम्हें प्रतीक्षा थी। ऐसा न लगे कि हमारा यह सद्गुण प्रकृति के नियमों से बाहर चला जाता है। इसलिए मैं स्पष्ट कहता हूँ कि बुद्धिमान व्यक्ति भी काँपेगा, पीड़ा का अनुभव करेगा और उसका चेहरा भी पीला पड़ जाएगा। क्योंकि ये सभी शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ हैं। फिर रोग कहाँ है? वास्तविक हानि किस बात में है? मैं बताता हूँ। वास्तविक हानि तब होती है जब ये प्रतिक्रियाएँ मन को नीचे गिरा दें, जब वे उसे यह स्वीकार करने पर विवश कर दें कि वह परिस्थितियों का दास है और जब वे उसे अपने ही मानवीय स्वभाव पर पश्चात्ताप करने के लिए बाध्य कर दें। बुद्धिमान व्यक्ति साहस के द्वारा दुर्भाग्य पर विजय प्राप्त करता है। किन्तु ऐसे बहुत-से लोग, जो स्वयं को बुद्धिमान कहते हैं, कभी-कभी अत्यन्त तुच्छ भय से भी आतंकित हो जाते हैं। यहाँ दोष हमारा है क्योंकि हम उस व्यक्ति से, जो अभी प्रगति के मार्ग पर है, वही अपेक्षा करते हैं जो एक पूर्णतः सिद्ध बुद्धिमान व्यक्ति से की जानी चाहिए। मैं स्वयं अभी उन सिद्धान्तों को अपने भीतर दृढ़ करने का प्रयत्न कर रहा हूँ, जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ। मुझे अभी उन पर पूर्ण विश्वास भी प्राप्त नहीं हुआ है। यदि हो भी गया हो, तब भी मैंने उनका इतना अभ्यास नहीं किया है कि वे प्रत्येक विपत्ति के समय तत्काल मेरी सहायता के लिए उपस्थित हो जाएँ। जिस प्रकार कुछ रंग ऊन पर तुरंत चढ़ जाते हैं, जबकि कुछ रंगों को अच्छी तरह चढ़ाने के लिए बार-बार भिगोना और उबालना पड़ता है, उसी प्रकार कुछ विद्याएँ ऐसी होती हैं जो उन्हें सीखते ही हमारे मन पर अपना प्रभाव छोड़ देती हैं। परन्तु यह शिक्षा ऐसी नहीं है। इसे हमारे भीतर पूरी तरह समा जाना चाहिए। यह केवल ऊपर-ऊपर रंग न चढ़ाए बल्कि हमारे व्यक्तित्व में गहराई तक उतरकर स्थायी रंग बन जाए। अन्यथा यह अपने किसी भी वचन को पूरा नहीं कर सकेगी।

    इसे कहने के लिए केवल कुछ ही शब्द पर्याप्त हैं। सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक कल्याण है और यह भी निश्चित है कि सद्गुण के बिना कोई भी वस्तु कल्याण नहीं है। साथ ही, सद्गुण हमारे श्रेष्ठतम भाग में स्थित है अर्थात हमारे तर्कसंगत मन में। यह सद्गुण क्या है? यह सत्य तथा अडिग निर्णय-शक्ति है। इसी से मन की सभी प्रेरणाएँ उत्पन्न होती हैं और इसी के द्वारा प्रत्येक वह अनुभूति, जो किसी प्रेरणा को जन्म देती है, पूर्णतः स्पष्ट और सही रूप में समझी जाती है।

    इस निर्णय-शक्ति के अनुरूप यही उचित है कि सद्गुण से सम्बद्ध सभी वस्तुओं को कल्याण माना जाए और उन्हें एक-दूसरे के समान समझा जाए। शरीर से सम्बन्धित वस्तुएँ शरीर के लिए उपयोगी अवश्य हैं किन्तु वे वास्तविक अर्थ में कल्याण नहीं हैं। उनका कुछ मूल्य तो हो सकता है परन्तु उनका कोई सच्चा नैतिक महत्व नहीं होता। इसलिए वे एक-दूसरे से भिन्न होती हैं; कुछ का मूल्य कम होता है और कुछ का अधिक। जो लोग प्रज्ञा की खोज में लगे हैं, उनके बीच भी भिन्नता स्वीकार करनी होगी। किसी व्यक्ति ने इतनी प्रगति कर ली होती है कि वह भाग्य की चुनौतियों का सामना करने का साहस रखता है, किन्तु वह अभी स्थिर नहीं हुआ होता। परिस्थितियों की तीव्रता से चकाचौंध होकर उसका साहस डगमगा जाता है। दूसरा व्यक्ति इतना आगे बढ़ चुका होता है कि वह भाग्य का सीधे सामना कर सकता है। सम्भव है कि वह पूर्णता के शिखर तक भी पहुँच चुका हो और उसका आत्मविश्वास पूर्णतः दृढ़ हो। जो अभी अपूर्ण है, उसका कभी-कभी लड़खड़ा जाना स्वाभाविक है। वह आगे बढ़ता है, फिर कभी पीछे फिसल जाता है या गिर पड़ता है। किन्तु यदि वह अपने संघर्ष और प्रगति में निरन्तर बना नहीं रहता, यदि वह अपने प्रयासों और दृढ़ संकल्प को शिथिल कर देता है तो उसका पीछे हटना निश्चित है। जो व्यक्ति किसी साधना को बीच में छोड़ देता है, वह दोबारा आरम्भ करने पर वहीं से शुरू नहीं कर पाता जहाँ उसने उसे छोड़ा था।

    आओ, हम आगे बढ़ें और निरन्तर प्रयास करते रहें। हमारे सामने जो चुनौतियाँ हैं, वे उन चुनौतियों से भी बड़ी हैं जिन्हें हम पहले ही पार कर चुके हैं। किन्तु प्रगति का सबसे बड़ा भाग तो प्रगति करने की सच्ची इच्छा में ही निहित है। मैं अपने भीतर इस इच्छा को स्पष्ट रूप से अनुभव करता हूँ। मैं पूरे मन से आगे बढ़ना चाहता हूँ। मैं देखता हूँ कि तुम भी उसी प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। तुम उत्साहपूर्वक जीवन के सबसे सुंदर लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हो। आओ, हम दोनों शीघ्रता करें। तभी जीवन वास्तव में जीने योग्य है। अन्यथा हम केवल समय व्यतीत कर रहे हैं और वह भी लज्जाजनक ढंग से, चारों ओर की कुरूपताओं से घिरे हुए। हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि जीवन का प्रत्येक क्षण हमारा अपना हो। किन्तु कोई भी क्षण वास्तव में हमारा नहीं हो सकता, जब तक हम स्वयं अपने स्वामी न बन जाएँ।

    कब वह समय आएगा जब मैं अच्छे और बुरे भाग्य, दोनों को समान भाव से तुच्छ समझ सकूँगा? कब मैं अपनी सभी वासनाओं और भावनाओं को अपने विवेक के अधीन कर सकूँगा और यह कह सकूँगा—'विजय मेरी है!' क्या तुम पूछते हो कि मैंने किस पर विजय प्राप्त की है? न तो फ़ारसियों पर, न दूरवर्ती मेड लोगों पर और न ही पार्थियों की सीमाओं से परे रहने वाली किसी युद्धप्रिय जाति पर। मैंने विजय प्राप्त की है लोभ पर, महत्वाकांक्षा पर और उस शक्ति पर जो राष्ट्रों के विजेताओं को भी पराजित कर देती है, मृत्यु के भय पर।


अभी के लिए विदा 

Friday, 17 July 2026

दर्शन के मार्ग के बारे में -- पत्र - 69 (Hindi Translation of Seneca's Letters)

  प्रिय लूसीलियस


मैं चाहता हूँ कि तुम एक स्थान से दूसरे स्थान यूँ ही भटकते न फिरो। इसके दो कारण हैं। पहला, बार-बार यात्रा करना मन की अशांति का संकेत है। जब तक मन इधर-उधर देखने और भटकने की आदत नहीं छोड़ता, तब तक वह अपने विश्राम में भी दृढ़ता प्राप्त नहीं कर सकता। अपने मन को सीमाओं में रखना चाहते हो तो सबसे पहले अपने शरीर को भागते-फिरते रहने से रोकना होगा। दूसरा, वही उपचार सबसे अधिक लाभ पहुँचाता है जो लंबे समय तक निरंतर चलता है। तुम्हें बिना किसी व्यवधान के एक ही स्थान पर ठहरना चाहिए और अपने पुराने जीवन को भूल जाना चाहिए। तुम्हारी आँखें जो कुछ अब तक देखती रही हैं, उन्हें उसे भूलना सीखना चाहिए। तुम्हारे कानों को अधिक स्वास्थ्यप्रद और हितकारी वचनों का अभ्यस्त होना चाहिए। जैसे ही तुम बाहर निकलते हो, अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही तुम्हारी पुरानी इच्छाएँ फिर से जाग उठती हैं। यह प्रेम के समान है। जब कोई व्यक्ति उस आसक्ति से मुक्त होना चाहता है तो उसे उस व्यक्ति के शरीर की हर याद से बचना पड़ता है जिससे उसका स्नेह जुड़ा रहा हो क्योंकि कोई भी भावना इतनी आसानी से फिर अपनी पूरी शक्ति प्राप्त नहीं कर लेती। यही बात प्रत्येक प्रबल इच्छा पर भी लागू होती है। जिसे पीछे छोड़ आए हो, उससे अपनी आँखें और कान दोनों फेर लेने चाहिए। 

    भावनाएँ बहुत शीघ्र फिर से प्रतिरोध करने लगती हैं। वे जिस ओर भी मुड़ती हैं, वहाँ अपने प्रयत्न का कोई न कोई तात्कालिक लाभ उन्हें दिखाई देता है। प्रत्येक बुराई के पास मनुष्य को लुभाने का कोई न कोई प्रलोभन होता है। लोभ तुम्हें धन का वादा करता है। भोग-विलास अनेक प्रकार के सुखों का आश्वासन देता है। महत्त्वाकांक्षा तुम्हें राजवैभव, भीड़ की जय-जयकार, उनसे प्राप्त होने वाली शक्ति और उस शक्ति से मिलने वाले हर प्रकार के अधिकार का प्रलोभन देती है। तुम्हारे दोष तुम्हें पुरस्कारों का लालच देकर अपने वश में रखते हैं। पर यहाँ अर्थात दर्शन के मार्ग पर, तुम्हें बिना किसी बाहरी पुरस्कार की अपेक्षा के जीवन बिताना होगा।

By Paul Klee

    हमारे दोषों को इतने लंबे समय तक बढ़ने-फलने दिया गया है कि उन्हें वश में करने और अनुशासन के अधीन लाने के लिए पूरा जीवन भी शायद पर्याप्त न हो। यदि हम अपने इस छोटे-से जीवन को बार-बार के व्यवधानों में बाँट दें तो हमारी संभावना और भी कम हो जाती है। निरंतर सावधानी और अविराम प्रयास के बावजूद भी जीवन के किसी एक गुण को पूर्णता तक पहुँचाना कठिन होता है।

    यदि तुम मेरी सलाह मानना चाहते हो तो अपने आपको इस बात का अभ्यास और प्रशिक्षण दो कि मृत्यु का स्वागत कर सको। यदि परिस्थितियाँ ऐसी माँग करें तो उसे स्वयं भी बुला सको। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मृत्यु हमारे पास आए या हम मृत्यु के पास जाएँ। अपने मन को यह विश्वास दिलाओ कि जैसा अज्ञानी लोग अक्सर कहते हैं, “अपने ही स्वाभाविक मृत्यु से मरना कितना सुंदर है”, वैसा कहना अनुचित है। कोई भी व्यक्ति किसी और की मृत्यु नहीं मरता। हर व्यक्ति अपनी ही मृत्यु मरता है। इस बात पर भी विचार करो कि कोई भी व्यक्ति किसी और के दिन नहीं मरता। वह केवल अपने ही मृत्यु-दिवस पर मरता है। तुम अपने निर्धारित समय में से कुछ भी नहीं खो रहे हो क्योंकि जो समय तुम पीछे छोड़ जाते हो, वह वास्तव में तुम्हारा था ही नहीं।

अवकाश के संदर्भ में -- पत्र - 68 (Hindi Translation of Letters from A Stoic)

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हारी इस योजना का समर्थन करता हूँ। अवकाश में एकांतवास करो। लेकिन यह तथ्य भी छिपाए रखो कि तुम अवकाश में हो। यह समझो कि ऐसा करके तुम स्टोइक दार्शनिकों के उदाहरण का अनुसरण करोगे, भले ही उनके शब्दशः उपदेशों का नहीं। बल्कि वास्तव में तुम उनके उपदेशों का भी पालन ही करोगे क्योंकि तुम्हारा यह आचरण तुम्हारी अपनी दृष्टि में भी उचित होगा और वस्तुतः किसी भी विवेकशील व्यक्ति की दृष्टि में भी। जब हम राज्य-सेवा का उपदेश देते हैं तो हमारा आशय किसी भी राज्य से नहीं होता न ही यह कि मनुष्य को हर समय और जीवन भर निरंतर राज्य की सेवा ही करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, हम बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उसके योग्य जिस राज्य की कल्पना करते हैं, वह समस्त विश्व है। इसलिए यदि वह सार्वजनिक जीवन से निवृत्त भी हो जाए, तब भी वह राज्य से बाहर नहीं होता। बल्कि संभव है कि इस छोटे-से कोने को छोड़कर वह एक अधिक विशाल और व्यापक राज्य में प्रवेश कर रहा हो, मानो वह स्वर्ग में अपना स्थान ग्रहण कर रहा हो। अब उसे यह अनुभव हो रहा हो कि न्यायासन पर बैठते समय या उच्च राजकीय पद पर आसीन रहते समय उसका स्थान कितना तुच्छ था। इस बात को अपने मन में दृढ़ता से बसा लो। जब बुद्धिमान मनुष्य के सामने दैवी और मानवीय विषय उपस्थित होते हैं, तब वह कभी भी उससे अधिक सक्रिय नहीं होता।



    अब मैं अपनी पहले की सलाह पर लौटता हूँ कि तुम अपने अवकाश के बारे में किसी को भी पता न चलने दो। 'दर्शन' और 'शांति' की कोई संकेत-पट्टी मत लगाओ। अपनी योजना को कोई और नाम दो। उसे बीमारी, दुर्बलता या आलस्य कह दो। अपने अवकाश का प्रदर्शन करना भी व्यर्थ की महत्वाकांक्षा का ही एक रूप है। कुछ जीव अपने बिलों के आस-पास अपने पदचिह्नों को इस प्रकार छिपा देते हैं कि उनका ठिकाना पता न चले। तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए। अन्यथा ऐसे लोग होंगे जो तुम्हें खोज निकालने का प्रयत्न करेंगे। बहुत-से लोग जो वस्तु सबके सामने पड़ी होती है, उसे अनदेखा कर देते हैं। लेकिन जो चीज़ छिपाकर रखी जाती है, उसी की टोह लेते हैं। किसी प्रवेश-द्वार पर ताला लगा देना मानो चोर को चुनौती देना है। जो वस्तु खुली दृष्टि में रहती है, वह कम मूल्यवान प्रतीत होती है। उसे खुले में छोड़ दो तो चोर उसे छोड़कर आगे बढ़ जाता है। सामान्य लोगों का स्वभाव यही होता है। यह उनका अज्ञान है। जहाँ कोई चीज़ छिपाई जाती है, वहीं घुसने की उनकी इच्छा होती है। इसलिए सबसे अच्छा उपाय यही है कि अपने अवकाश का कभी प्रदर्शन न किया जाए। लेकिन अत्यधिक एकांत में रहना, अपने को पूरी तरह सबकी दृष्टि से ओझल कर लेना, यह भी एक प्रकार का प्रदर्शन ही है। कोई टारेंटम (प्राचीन इटली का एक दूरस्थ एवं शांत शहर) में जाकर छिप जाता है, कोई नेपल्स में स्वयं को दफना लेता है और कोई वर्षों तक अपने घर की चौखट तक नहीं लाँघता। जो व्यक्ति किसी न किसी प्रकार अपने अवकाश को किंवदंती बना देता है, वह वास्तव में उसी के लिए दर्शकों को आमंत्रित कर रहा होता है।

    जब तुम सार्वजनिक जीवन से निवृत्त हो जाओ तो तुम्हारा उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि लोग तुम्हारी चर्चा करें बल्कि यह होना चाहिए कि तुम स्वयं अपने आप से संवाद करो। तुम अपने आप से क्या कहोगे? वही बात, जो लोग दूसरों के बारे में कहने में बहुत तत्पर रहते हैं— कठोर और निष्पक्ष मूल्यांकन। सत्य बोलने और सत्य सुनने का अभ्यास करो। विशेष रूप से उन बातों पर ध्यान केंद्रित करो, जहाँ तुम स्वयं को सबसे अधिक दुर्बल पाते हो।हर व्यक्ति अपने शरीर की कमजोरियों को जानता है। इसलिए कोई अपनी पाचन-शक्ति को वमन करके हल्का करता है, कोई बार-बार थोड़ा-थोड़ा भोजन करके उसे संभालता है और कोई उपवास के माध्यम से अपने शरीर को शुद्ध और हल्का करता है। जो लोग गठिया से पीड़ित होते हैं, वे या तो मदिरा का त्याग कर देते हैं या गरम स्नान से बचते हैं। अन्य बातों में चाहे वे लापरवाह हों, लेकिन अपनी विशेष बीमारी के विषय में वे अत्यंत सावधान रहते हैं। इसी प्रकार हमारे मन में भी कुछ रोगग्रस्त स्थान होते हैं। उपचार तो उन्हीं का करना चाहिए। मैं अपने इस अवकाश में क्या कर रहा हूँ? मैं अपने घाव की देखभाल कर रहा हूँ। यदि मैं तुम्हें अपना सूजा हुआ पैर, बदरंग हाथ या इतनी अकड़ी हुई नसें दिखाता कि मेरे पैर सीधे भी न हो पाते तो तुम निश्चय ही मुझे एक ही स्थान पर पड़े रहने और अपनी बीमारी की देखभाल करने की अनुमति देते। लेकिन मेरा रोग इससे भी अधिक गंभीर है। मैं उसे तुम्हें दिखा भी नहीं सकता क्योंकि उसका संक्रमण, उसका फोड़ा, मेरे हृदय के भीतर है।

    नहीं, मेरी प्रशंसा मत करो। यह मत कहो, "क्या महान व्यक्ति है! इसने सब कुछ तुच्छ समझ लिया है, मानव जीवन की इस पागलपन भरी दौड़ की निंदा कर दी है और उससे निकल भागा है।" मैंने किसी और की नहीं, केवल अपनी ही निंदा की है। यदि तुम यह आशा लेकर मेरे पास आओ कि यहाँ तुम्हें कोई मार्गदर्शन या सहायता मिलेगी तो तुम भूल कर रहे हो। यहाँ कोई वैद्य नहीं बल्कि एक रोगी रहता है। बेहतर होगा कि यहाँ से जाने के बाद तुम यह कहो, "मैं तो समझता था कि यह व्यक्ति बड़ा भाग्यशाली और विद्वान है। मैं उत्सुकता से इसकी बातें सुनने आया था लेकिन मुझे निराशा हुई। मैंने यहाँ ऐसा कुछ न देखा, न सुना, जिसे पाने या फिर से सुनने की इच्छा हो। मेरे लिए दोबारा यहाँ आने का कोई कारण नहीं है।" यदि तुम्हारी यही भावना हो और तुम ऐसा ही कहो तो समझो कि तुम्हें वास्तव में कुछ लाभ हुआ है। मैं चाहता हूँ कि मेरे इस अवकाश के लिए तुम मुझे क्षमा करो, न कि उससे ईर्ष्या करो।

    "तो, सेनेका," तुम कहोगे, "क्या तुम मुझे अवकाश का उपदेश दे रहे हो? क्या तुम स्वयं को एपिक्यूरस के सिद्धांतों तक गिरा रहे हो?" हाँ, मैं सचमुच तुम्हें अवकाश का ही परामर्श दे रहा हूँ। लेकिन ऐसे अवकाश का जो तुम्हें उन कार्यों से भी अधिक महान और श्रेष्ठ कार्य करने का अवसर दे। जिन्हें तुम पीछे छोड़ रहे हो। बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों के द्वारों पर दस्तक देना, उन वृद्ध लोगों की वर्णक्रमानुसार सूचियाँ बनाना जिनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है या न्यायालयों और सार्वजनिक जीवन में प्रभाव और शक्ति का प्रदर्शन करना, ऐसी सारी शक्ति क्षणभंगुर है, ईर्ष्या को जन्म देने वाली है और यदि सच कहा जाए तो अत्यंत निकृष्ट भी है। कोई व्यक्ति राजनीतिक प्रभाव में मुझसे बहुत आगे होगा, कोई सैन्य सेवा और उससे मिलने वाली प्रतिष्ठा में और कोई अपने आश्रितों तथा प्रभाव-क्षेत्र की व्यापकता में। मैं उनकी बराबरी नहीं कर सकता। उनका प्रभाव मुझसे अधिक है। लेकिन मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं कि मैं उन सब से पीछे रहूँ, यदि बदले में मैं भाग्य पर विजय प्राप्त कर सकूँ।

    काश, तुमने बहुत पहले ही यह मार्ग अपना लिया होता! काश, जब मृत्यु अब हमारे सामने दिखाई देने लगी है, तब हमें सुख के स्वरूप पर बहस न करनी पड़ती! फिर भी, चाहे हम देर से ही सही, अब हमें और विलंब नहीं करना चाहिए। पहले हमारे पास केवल तर्क था जो हमें बताता था कि बहुत-सी चीज़ें अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। अब हमारे पास उसका प्रत्यक्ष अनुभव भी है।

    इसलिए आओ, हम उन यात्रियों की तरह बनें जो प्रस्थान करने में देर कर चुके हैं। अब हमें अपनी गति तेज करनी चाहिए और अधिक वेग से चलकर बीते हुए समय की भरपाई करनी चाहिए। जीवन का यह चरण ऐसे अध्ययन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। अब इसकी उफनती हुई झाग बैठ चुकी है और वे दोष जिन्हें युवावस्था का उन्माद वश में नहीं कर सका था, अब थककर झुकने लगे हैं। शीघ्र ही वे पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे। 

"लेकिन जब प्रस्थान का समय आ पहुँचा हो, तब सीखी गई शिक्षाओं से तुम्हें क्या लाभ होगा?" तुम पूछोगे। "और किसलिए?" इसलिए कि मैं इस संसार से एक बेहतर मनुष्य बनकर विदा हो सकूँ। तुम्हें यह मानने की आवश्यकता नहीं कि मन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए वृद्धावस्था से अधिक उपयुक्त जीवन का कोई और समय होता है। जब मनुष्य अनेक परीक्षाओं और लंबे समय तक रहने वाले पश्चात्तापों के द्वारा स्वयं को अनुशासित कर चुका होता है, जब उसने अपनी भावनाओं को वश में कर लिया होता है और अंततः मानसिक स्वास्थ्य एवं संतुलन की अवस्था तक पहुँच जाता है तभी यह सर्वोत्तम साधना संभव होती है। यही वह समय है जब इस श्रेष्ठता को प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति वृद्धावस्था में बुद्धिमत्ता प्राप्त करता है, वह उतने ही अधिक वर्षों का अनुभव लेकर बुद्धिमान बनता है।


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Thursday, 16 July 2026

सद्गुणों की वांछनीयता एवं साहस के संदर्भ में -- पत्र - 67 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


सामान्य बातों से आरंभ करूँ। वसंत ने अपने रूप को फैलाना शुरू कर दिया है किंतु यद्यपि वह अब ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है और गर्मी पड़ जानी चाहिए थी। फिर भी मौसम कुछ ठंडा बना हुआ है और अभी भी उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अक्सर ऐसा होता है कि वह फिर से शीत ऋतु की ओर लौट जाता है। क्या तुम जानना चाहते हो कि मौसम अभी भी कितना अनिश्चित है? मैं अभी तक पूरी तरह ठंडे पानी से स्नान करने का साहस नहीं करता। उसकी ठंडक को थोड़ा कम कर ही स्नान करता हूँ। तुम कहोगे, “इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम न गर्मी सह सकते हो, न ठंड।” बिल्कुल ठीक कहते हो, प्रिय लूसीलियस। मेरी आयु अब अपनी ही स्वाभाविक ठंडक से संतुष्ट है। ग्रीष्म ऋतु के मध्य में भी मुझे शायद ही कभी पूरी तरह गर्मी महसूस होती है और बहुत कम ऐसा होता है कि मैं अपने शरीर से कोई वस्त्र उतारूँ।


Virtue of Justice

    मैं वृद्धावस्था का इस बात के लिए आभारी हूँ कि उसने मुझे बिस्तर तक सीमित कर दिया है। इसके लिए आभारी क्यों न रहूँ? जिन कामों को करने की इच्छा मुझे नहीं करनी चाहिए थी, अब उन्हें करना मेरे लिए संभव ही नहीं रहा। अब मेरा सबसे अधिक संवाद पुस्तकों से होता है। जब भी तुम्हारा कोई पत्र आता है, मुझे ऐसा लगता है मानो मैं तुम्हारे साथ ही बैठा हूँ। ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं तुम्हें केवल उत्तर लिख नहीं रहा बल्कि सचमुच तुम्हारे प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर दे रहा हूँ। इसलिए आओ, जिस विषय के बारे में तुमने पूछा है, उसी पर विचार करें और उसकी प्रकृति की उसी प्रकार सावधानी से जाँच करें, जैसे हम आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे हों।

    तुम पूछते हो कि क्या प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय होती है। तुम कहते हो, “यदि यातनाएँ सहते हुए साहसपूर्वक व्यवहार करना, आग में जलते हुए भी वीरतापूर्वक अडिग रहना और रोगग्रस्त होने पर धैर्य बनाए रखना, ये सब शुभ हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ये सब वांछनीय भी हैं। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि इनमें से कौन-सी ऐसी चीज़ है जिसकी कोई कामना करे। निश्चय ही मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसकी इच्छा इस रूप में पूरी हुई हो कि उसे कोड़ों से पीटा गया हो, गठिया की पीड़ा ने उसके शरीर को मरोड़ दिया हो या उसे यातना-यंत्र पर खींचकर कष्ट दिया गया हो।”

    प्रिय लूसीलियस, इन बातों में भेद करके देखो, तब तुम्हें समझ में आएगा कि इनमें भी कुछ ऐसा है जिसे चुनना उचित है। मैं यह पसंद करूँगा कि मुझे कभी यातनाएँ न सहनी पड़ें। लेकिन यदि कभी उन्हें सहना ही पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि उस परिस्थिति में मैं साहस, सम्मान और निर्भीकता के साथ अपना आचरण करूँ। मैं यही चाहूँगा और इसमें आश्चर्य ही क्या है कि मेरे जीवन में कभी युद्ध न आए। लेकिन यदि युद्ध आ ही जाए तो मेरी इच्छा होगी कि उसके साथ आने वाले घावों, भूख और अन्य सभी अनिवार्य कष्टों को मैं गरिमा और धैर्य के साथ सहन करूँ। मैं बीमार पड़ना नहीं चाहता। मैं इतना भी मूर्ख नहीं हूँ! किंतु यदि कभी रोगग्रस्त होना पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि मेरा आचरण न तो असंयमपूर्ण हो और न ही कायरतापूर्ण। इसलिए वांछनीय स्वयं वे कष्ट नहीं हैं बल्कि वह सद्गुण है जिसके सहारे मनुष्य उन कष्टों को धैर्य, साहस और गरिमा के साथ सहन करता है।

    हमारे मत के कुछ अनुयायियों का कहना है कि ऐसे सभी कष्टों को साहसपूर्वक सहन करना, यद्यपि उनसे पूरी तरह बचना आवश्यक नहीं है। फिर भी वे स्वयं वांछनीय नहीं हैं। उनका तर्क है कि इच्छा और आकांक्षा का लक्ष्य केवल वही होना चाहिए जो पूर्णतः शुभ, शांत और हर प्रकार की व्याकुलता से परे हो। मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। क्यों? पहला कारण यह है कि कोई भी वस्तु शुभ हो और साथ ही वांछनीय न हो, यह संभव नहीं है। दूसरा, यदि सद्गुण वांछनीय है और सद्गुण के बिना कोई भी वस्तु शुभ नहीं है तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय है। तीसरा, भले ही यातना स्वयं वांछनीय न हो परंतु यातना को साहसपूर्वक सहन करना निश्चय ही वांछनीय है।

    मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या साहस स्वयं वांछनीय नहीं है? किंतु साहस तो संकटों की परवाह नहीं करता बल्कि वह उनका सामना करने की चुनौती स्वीकार करता है। साहस का सबसे सुंदर और प्रशंसनीय रूप यही है कि वह अग्नि के सामने झुकने से इंकार करता है, घावों का सामना करने के लिए स्वयं आगे बढ़ता है और कभी-कभी तो तीरों से बचने का प्रयत्न भी नहीं करता बल्कि उन्हें अपनी छाती पर सह लेता है। यदि साहस वांछनीय है तो यातना को धैर्यपूर्वक सहन करना भी वांछनीय है क्योंकि वह साहस का ही एक अविभाज्य अंग है।

    जैसा कि मैंने कहा, यदि तुम इस भेद को समझ लोगे तो कोई भी बात तुम्हें भ्रमित नहीं करेगी। क्योंकि वांछनीय यातना भोगना नहीं है बल्कि उसे साहसपूर्वक सहन करना वांछनीय है। मेरी इच्छा तो यही है कि मैं हर परिस्थिति में साहस के साथ आचरण करूँ और यही सद्गुण है। 

    “लेकिन ऐसा कौन है जिसने अपने लिए कभी ऐसी इच्छा की हो?” कुछ इच्छाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाती हैं क्योंकि वे किसी विशेष वस्तु या घटना से संबंधित होती हैं जबकि कुछ इच्छाएँ अप्रकट रहती हैं क्योंकि एक ही इच्छा के भीतर अनेक बातें समाहित होती हैं। उदाहरण के लिए, मैं अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करता हूँ। किंतु सम्मानपूर्ण जीवन अनेक सम्मानजनक कर्मों से मिलकर बनता है। इस एक इच्छा के भीतर ही रेगुलस (Regulas) का यातना-पीड़ित बंदी जीवन, कैटो का अपने ही हाथों से अपने घाव को फिर से खोल देना, रुटिलियस का निर्वासन और वह विष का प्याला भी शामिल है जिसने सुकरात को कारागार से उठाकर अमर गौरव की ओर पहुँचा दिया। इस प्रकार, जब मैंने अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना की तो उसके साथ उन सभी परिस्थितियों को भी स्वीकार किया जिनके बिना कभी-कभी जीवन सम्मानपूर्ण नहीं बन सकता।

“वे तीन बार, चार बार धन्य हैं,
जिनके भाग्य में ट्रॉय की ऊँची प्राचीरों के नीचे,
अपने पिताओं की आँखों के सामने, वीरगति प्राप्त करना लिखा था।”

    क्या किसी व्यक्ति के लिए ऐसी मृत्यु की कामना करना और यह स्वीकार करना कि ऐसी मृत्यु वांछनीय है, इन दोनों में वास्तव में कोई अंतर है?

    डेसियस ने अपने देश के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। वह मृत्यु की खोज में अपने घोड़े को पूरी गति से शत्रु-सेना के बीच ले गया। उसके बाद एक अन्य डेसियस ने भी अपने पिता के सद्गुण का अनुसरण करते हुए वही पवित्र और अब प्रसिद्ध हो चुकी प्रतिज्ञा ली और युद्ध के सबसे भीषण संघर्ष में कूद पड़ा। उसकी एकमात्र चिंता यह थी कि उसका आत्मबलिदान शुभ और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो क्योंकि वह मानता था कि ऐसी श्रेष्ठ मृत्यु, जो सद्गुण के कार्य के साथ प्राप्त हो, मनुष्य की कामना के योग्य होती है। तो क्या अब भी तुम्हें संदेह है कि सद्गुण का कोई महान कार्य करते हुए ऐसी मृत्यु प्राप्त करना जो सदा स्मरणीय बनी रहे, मनुष्य के लिए सर्वोत्तम और वांछनीय है? 

    जब कोई व्यक्ति यातना को साहसपूर्वक सहन करता है, तब वह अपने भीतर के सभी सद्गुणों का प्रयोग करता है। संभव है कि उनमें से कोई एक सद्गुण सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई दे जैसे, धैर्य। फिर भी वहाँ साहस भी उपस्थित होता है क्योंकि धैर्य, दृढ़ता और सहनशीलता का आधार वही है। वहाँ बुद्धि भी होती है क्योंकि उसके बिना कोई भी कार्य सोच-समझकर नहीं किया जा सकता। वही बुद्धि मनुष्य को प्रेरित करती है कि जब किसी परिस्थिति से बच निकलना संभव न हो, तब उसे यथासंभव साहस और गरिमा के साथ सहन करे। वहाँ अडिगता भी होती है जो अपने स्थान से कभी नहीं हटती और जिस पर चाहे जितना भी दबाव डाला जाए, वह अपने संकल्प को नहीं छोड़ती। वास्तव में, उस समय सभी सद्गुणों का अविभाज्य समूह उपस्थित होता है। प्रत्येक सम्मानजनक कर्म भले ही किसी एक विशेष सद्गुण द्वारा किया हुआ प्रतीत हो किंतु वह वास्तव में सभी सद्गुणों के सामूहिक विवेक और परामर्श के अनुरूप संपन्न होता है। इसलिए जिस कर्म को सभी सद्गुण मिलकर स्वीकार और अनुमोदित करते हैं, वह चाहे देखने में किसी एक सद्गुण का कार्य ही क्यों न लगे, वह निस्संदेह वांछनीय है।

    तो फिर क्या? क्या तुम यह समझते हो कि केवल वही वस्तुएँ वांछनीय हैं जो सुख, आराम और ऐश्वर्य के साथ प्राप्त होती हैं जो भव्य भवनों के भीतर विलासपूर्ण जीवन के बीच मिलती हैं? नहीं, कुछ शुभ वस्तुओं का स्वरूप कठोर होता है। कुछ ऐसी भी कामनाएँ होती हैं जिनकी पूर्ति पर लोग बधाइयाँ नहीं देते बल्कि विस्मय, श्रद्धा और आदर के साथ उन्हें नमन करते हैं। क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि रेगुलस ने कार्थेज लौटने का मार्ग अपनी इच्छा से नहीं चुना था? कुछ क्षणों के लिए अपने मन को एक महान व्यक्ति के मन के समान बना लो। सामान्य लोगों की धारणाओं से स्वयं को अलग कर लो। सद्गुण की ऐसी कल्पना करो जो उसके वास्तविक गौरव के अनुरूप हो, उस सद्गुण की जो अपने सर्वोच्च और सबसे भव्य रूप में प्रकट होता है। ऐसे सद्गुण की जिसकी पूजा धूप और पुष्पमालाओं से नहीं बल्कि पसीने और रक्त से की जानी चाहिए। मार्कस कैटो को देखो। वह अपने निष्कलंक हाथों को अपने ही पवित्र वक्ष पर उठाता है और उस घाव को जो पर्याप्त गहरा नहीं था, स्वयं और अधिक गहरा कर देता है। मुझे बताओ, क्या तुम उससे कहोगे, “हाय, कितना दुखद!” या “मुझे तुम्हारे लिए बहुत खेद है”? या फिर तुम यह कहोगे, “मैं तुम्हारे इस महान कर्म की प्रशंसा करता हूँ।”

    इस प्रसंग पर मुझे हमारे दार्शनिक दिमीत्रियस की बात याद आती है। वे उस जीवन को जो हर प्रकार की चिंता से मुक्त हो और जिस पर भाग्य का कोई आघात न हो, 'मृत सागर' कहा करते थे। पूर्ण निश्चिंतता में पड़े रहना, जहाँ न कोई चुनौती हो, न कोई लक्ष्य जिसकी ओर बढ़ना हो, न कोई बुराई जिसका विरोध करना हो, न कोई संघर्ष जिसमें अपने मन की दृढ़ता की परीक्षा हो, यह वास्तविक शांति नहीं है। यह तो मनुष्य की शक्ति का क्षीण हो जाना है। स्टोइक दार्शनिक अतालस कहा करते थे, “मैं यह अधिक पसंद करूँगा कि भाग्य मुझे अपने युद्ध-शिविर में रखे, न कि विलासिता के बीच। यदि मुझ पर यातनाएँ आएँ तो मैं उन्हें साहसपूर्वक सहूँ, यही उचित है। यदि मुझे मृत्यु मिले तो भी मैं उसका सामना साहस के साथ करूँ, यही उचित है।” एपिक्यूरस भी कहेगा, “यह सुखद है।” किंतु मैं ऐसे कठोर और गौरवपूर्ण कर्म को इतने कोमल शब्द ‘सुखद’ से कभी संबोधित नहीं करूँगा। यदि मैं अग्नि में जल रहा हूँ किंतु पराजित नहीं हुआ हूँ तो यह वांछनीय क्यों न हो? इसलिए नहीं कि अग्नि मुझे जलाती है बल्कि इसलिए कि वह मुझे परास्त नहीं कर पाती।

    सद्गुण से बढ़कर कोई वस्तु उत्कृष्ट नहीं है और उससे अधिक सुंदर भी कुछ नहीं। इसलिए जो कुछ भी सद्गुण की आज्ञा के अनुसार किया जाता है, वह केवल शुभ ही नहीं बल्कि वांछनीय भी होता है।

जीवन एवं आचरण के संदर्भ में - पत्र - 73 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

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