Sunday, 21 June 2026

स्वयं के संदर्भ में -- (पत्र - 10)

प्रिय लूसीलियस 

हाँ, मैं अपने कथन को नहीं बदलता। भीड़ से दूर रहो। थोड़े लोगों की संगति से भी दूर रहो। यहाँ तक कि एक अकेले साथी से भी बचो। ऐसा कोई नहीं है जिसके साथ मैं तुम्हें साझा करना चाहूँ। और देखो, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है, मैं तुम्हें स्वयं तुम्हारे ही भरोसे छोड़ने का साहस करता हूँ। कहा जाता है कि क्रेटीस, जो उस स्टिल्पो का शिष्य था जिसका मैंने अपने पिछले पत्र में उल्लेख किया था, ने एक बार एक युवक को अकेले टहलते हुए देखा और उससे पूछा कि वह अकेले क्या कर रहा है। युवक ने उत्तर दिया, "मैं अपने आप से बात कर रहा हूँ।' क्रेटीस ने कहा, 'सावधान रहो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, ध्यान से देखो कि तुम क्या कर रहे हो क्योंकि तुम एक बुरे व्यक्ति से बात कर रहे हो।

    जब लोग अवसादग्रस्त या चिंतित होते हैं तो हम उन पर नज़र रखते हैं ताकि वे अपने एकांत समय का किसी दुर्भाग्यपूर्ण कार्य में उपयोग न कर बैठें। मूर्ख लोगों में से ऐसा एक भी नहीं है जिसे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए।इसी समय वे बुरी योजनाएँ बनाना शुरू करते हैं। इसी समय वे दूसरों या स्वयं अपने लिए भविष्य के संकटों की साज़िश रचते हैं। इसी समय वे अपनी निर्लज्ज इच्छाओं को व्यवस्थित करते हैं। इसी समय मन उन बातों को बाहर लाता है जिन्हें उसने भय या लज्जा के कारण छिपाकर रखा था। इसी समय वह अपने साहस को बढ़ाता है, अपनी वासनाओं को उकसाता है और अपने क्रोध को भड़काता है। एकांत का एकमात्र लाभ यह है कि व्यक्ति किसी के सामने अपने रहस्य नहीं खोलता और उसे किसी मुखबिर का भय नहीं रहता। लेकिन मूर्ख व्यक्ति इस लाभ को भी खो देता है क्योंकि वह स्वयं ही अपना भेद खोल देता है।



    अब देखो कि तुम्हारे बारे में मेरी कैसी आशा है या यूँ कहूँ कि मैं अपने आप से क्या वचन लेता हूँ क्योंकि 'आशा' उस भलाई का नाम है जिसके बारे में निश्चितता नहीं होती। मैं तो यह अधिक पसंद करूँगा कि तुम अकेले रहो, बजाय इसके कि तुम उन लोगों में से किसी के साथ रहो जिनके बारे में मैं सोच सकता हूँ। मुझे याद है कि तुमने एक अवसर पर कितने साहस के साथ एक घोषणा की थी और तुम्हारे शब्दों में कितनी शक्ति थी। उस समय मैंने स्वयं को बधाई दी और कहा, "ये बातें यूँ ही अचानक मन में आकर नहीं कही गई हैं। इनके पीछे कोई ठोस आधार है। यह व्यक्ति साधारण लोगों जैसा नहीं है। यह तो अपने वास्तविक उपचार और सुधार की ओर देख रहा है।" तुम्हें इसी प्रकार बोलना चाहिए और इसी प्रकार जीवन जीना चाहिए। ध्यान रखना कि कोई भी बात तुम्हें निराश या हताश न कर दे। जैसे तुम अपनी पूर्व प्रार्थनाओं को स्वीकार करने के लिए देवताओं का धन्यवाद करते हो, वैसे ही नई और भिन्न प्रार्थनाएँ भी करो। मन की उत्कृष्टता और मानसिक शांति की याचना करो और उसके बाद शारीरिक स्वास्थ्य की। क्या कोई कारण है कि तुम ऐसी प्रार्थनाएँ बार-बार न करो? ईश्वर से माँगने में साहसी बनो क्योंकि तुम उससे ऐसी किसी वस्तु की याचना नहीं कर रहे हो जो वास्तव में तुम्हारी न हो।

    लेकिन मैं अपनी परंपरा का पालन करूँगा और इस पत्र के साथ एक छोटी-सी भेंट भी भेजूँगा। मुझे एथेनोडोरस के लेखों में एक ऐसी बात मिली है जो बिल्कुल सत्य प्रतीत होती है, "तुम यह तभी जान सकते हो कि तुम सभी इच्छाओं से मुक्त हो चुके हो, जब तुम उस अवस्था तक पहुँच जाओ कि ईश्वर से ऐसी किसी वस्तु की याचना न करो जिसे तुम खुले रूप से लोगों के सामने भी न माँग सको।"

    वास्तव में लोग कितने पागल होते हैं! जब उनकी प्रार्थनाएँ अत्यन्त लज्जाजनक होती हैं तो वे उन्हें देवताओं के कानों में फुसफुसाकर कहते हैं। लेकिन यदि कोई मनुष्य सुन रहा हो तो वे तुरंत चुप हो जाते हैं। जिस बात को वे मनुष्यों के सुनने योग्य नहीं समझते, वही बात वे ईश्वर से कहते हैं! विचार करो कि क्या यह एक लाभकारी उपदेश नहीं हो सकता। मनुष्यों के बीच ऐसे जियो मानो ईश्वर तुम्हें देख रहा हो और ईश्वर से ऐसे बात करो मानो मनुष्य तुम्हारी बात सुन रहे हों।

अभी के लिए विदा 

मैत्री और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में -- (पत्र - 9)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम यह जानने के इच्छुक हो कि क्या एपिक्यूरस ने अपने एक पत्र में उन लोगों की आलोचना करके उचित किया था, जो कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है और इसलिए उसे मित्र की आवश्यकता नहीं होती। यह आरोप उसने स्टिलपो (Stilpo) और उन अन्य दार्शनिकों पर लगाया था जो मानते थे कि सर्वोच्च कल्याण एक ऐसी मानसिक अवस्था है जो किसी भी भावनात्मक आघात से अछूती रहती है। (यदि हम ग्रीक शब्द अपैथिया (apatheia-इसका अर्थ स्टोइक दर्शन के अनुसार मन की ऐसी स्थिति है जहाँ मन, इच्छाओं और जीवन के सुख-दुख के बीच शांत व स्थिर रहता है ) को केवल एक ही शब्द में व्यक्त करना चाहें और उसके लिए इम्पैशन्सिया (impatientia) शब्द का प्रयोग करें,तो उससे अर्थ की अस्पष्टता उत्पन्न हो सकती है। कारण यह है कि इम्पैशन्सिया (impatientia) का अर्थ उस अर्थ के बिल्कुल उल्टा भी समझा जा सकता है जिसे हम व्यक्त करना चाहते हैं। हमारा आशय ऐसे व्यक्ति से है जो किसी भी दुर्भाग्य या विपत्ति को अपने मन पर प्रभाव नहीं डालने देता। पर इसे ऐसे व्यक्ति के रूप में समझ लिया जाएगा जो किसी भी विपत्ति को सहन ही नहीं कर सकता। इसलिए विचार कीजिए कि क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि हम इसे अजेय  मन या ऐसा मन जो समस्त दुःखों से परे स्थापित हो, कहें।) हमारा मत उनसे भिन्न है। हमारा बुद्धिमान व्यक्ति विपत्तियों पर विजय प्राप्त करता है पर उन्हें अनुभव भी करता है जबकि उनका बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें महसूस ही नहीं करता। फिर भी एक बात दोनों में समान है—बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। यद्यपि वह स्वयं में संतुष्ट रहता है, फिर भी वह मित्र, पड़ोसी और साथी रखना चाहता है।


    उसकी आत्मनिर्भरता को इस प्रकार समझो। काभी-काभी वह अपने एक हिस्से से संतुष्ट होता है। यदि युद्ध में उसका हाथ कट जाए या किसी दुर्घटना में उसकी एक या दोनों आँखें चली जाएँ, तब भी जो कुछ उसके पास बचा रहेगा, वह उसके लिए पर्याप्त होगा। वह अपने शरीर के कुछ हिस्से खो जाने पर भी उतना ही प्रसन्न रहेगा जितना पूर्ण शरीर के साथ था। फिर भी वह यह नहीं चाहेगा कि उसके अंग नष्ट हों। वह मित्र के बिना रह सकता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह मित्र-विहीन रहना चाहता है। यदि वह किसी मित्र को खो देता है तो वह उस क्षति को धैर्यपूर्वक सहन करता है। वास्तव में वह कभी मित्रों से वंचित नहीं रहता क्योंकि नए मित्र बनाना उसके अपने हाथ में है। जैसे महान मूर्तिकार फीडियस (Phidias) अपनी किसी मूर्ति के नष्ट हो जाने पर दूसरी बना सकता था, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति खोए हुए मित्र के स्थान पर दूसरा मित्र बना लेता है।

    तुम पूछते हो कि वह इतनी शीघ्रता से मित्र कैसे बना लेता है? मैं बताता हूँ। दार्शनिक हेकाटो कहता है, “मैं तुम्हें बिना औषधि, बिना जड़ी-बूटी और बिना किसी जादुई मंत्र के प्रेम प्राप्त करने का उपाय बताऊँगा, यदि तुम प्रेम पाना चाहते हो... तो स्वयं प्रेम करो।”

    पुरानी और स्थापित मित्रता का आनंद तो होता ही है पर नई दोस्ती की शुरुआत और उसे अर्जित करने में भी आनंद सुख है। मित्र बनाने और मित्र होने का अंतर वैसा ही है जैसा बीज बोने और फसल काटने का। दार्शनिक अटालुस (Attalus) कहा करते थे कि मित्र बनाना, मित्र होने से अधिक आनंददायक है, जैसे किसी कलाकार के लिए चित्र बनाना, चित्र बनाकर रख लेने से अधिक सुखद होता है। अपने कार्य में पूरी तरह एकाग्र होकर लगे रहना अपने-आप में अत्यंत आनंददायक होता है। कार्य पूरा हो जाने के बाद उसके परिणाम से जो सुख मिलता है, वह उस सुख के बराबर नहीं होता जो कार्य करते समय मिलता है। कलाकार अपनी कला की पूर्ण कृति का आनंद अवश्य लेता है लेकिन जब वह चित्र बना रहा होता है, तब वह स्वयं कला-सृजन की प्रक्रिया का आनंद ले रहा होता है। बच्चे बड़े होकर अधिक उपयोगी और संतोष देने वाले हो सकते हैं, पर वे शैशव अवस्था में वे अधिक मधुर और प्रिय लगते हैं।

    अब आइए, अपने मूल विषय पर लौटें। यदि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर भी हो, तब भी वह मित्र चाहता है। यदि और किसी कारण से नहीं, तो कम-से-कम इसलिए कि इतना महान सद्गुण (मित्रता करने और प्रेम करने की क्षमता) निष्क्रिय न पड़ा रहे। उसका उद्देश्य वह नहीं होता जो एपिक्यूरस इसी पत्र में कहता है, "उसके पास ऐसा कोई हो जो बीमारी में उसके पास बैठ सके या कारावास अथवा आवश्यकता के समय उसकी सहायता कर सके।" इसके विपरीत, उसका उद्देश्य यह होता है कि उसके पास ऐसा कोई हो जिसके पास वह स्वयं बीमारी में बैठ सके जिसे वह स्वयं शत्रु की कैद से मुक्त करा सके। जो व्यक्ति केवल अपने लाभ की दृष्टि से मित्रता करता है और इसी कारण मित्र बनाता है, वह गलत सोचता है। जैसे उसने मित्रता की शुरुआत की थी, वैसा ही उसका अंत भी होगा। उसने मित्र इसलिए बनाया कि यदि वह कभी कैद में पड़े तो मित्र उसकी सहायता करे। लेकिन ज्यों ही बेड़ियों की पहली झनकार सुनाई देगी, वह स्वयं भाग खड़ा होगा। इन्हें ही सामान्यतः अच्छे मौसम की मित्रताएँ कहा जाता है। जो मित्र केवल उपयोगिता के कारण बनाया जाता है, वह तब तक ही प्रिय रहता है जब तक वह उपयोगी बना रहता है। इसी कारण समृद्धि और सफलता के समय लोगों के आस-पास मित्रों की भीड़ लगी रहती है जबकि जिन लोगों का पतन हो जाता है, वे अकेले छोड़ दिए जाते हैं। मित्र उसी समय भाग खड़े होते हैं, जब उनके पास अपनी मित्रता को सिद्ध करने का अवसर होता है। यही कारण है कि हमें ऐसी अनेक दुखद कहानियाँ सुनने को मिलती हैं जिनमें लोग भय के कारण अपने मित्रों का साथ छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि उनके साथ विश्वासघात भी कर बैठते हैं।

    आरंभ और अंत में सामंजस्य होना चाहिए। जो व्यक्ति सुविधा या स्वार्थ के लिए मित्र बनता है, वह सुविधा या स्वार्थ के लिए ही मित्रता समाप्त भी कर देगा। यदि मित्रता को उसके अपने लिए नहीं बल्कि किसी अन्य लाभ के लिए मूल्यवान समझा जाता है तो धन की कोई न कोई राशि उस मित्रता पर भारी पड़ जाएगी। "मित्र क्यों बनाया जाए?" इसलिए कि मेरे पास ऐसा कोई हो जिसके लिए मैं प्राण तक दे सकूँ। ऐसा कोई हो जिसके साथ मैं निर्वासन में जा सकूँ। ऐसा कोई हो जिसका जीवन बचाने के लिए मैं अपना जीवन भी दाँव पर लगा सकूँ। लेकिन तुम जो मित्रता का वर्णन कर रहे हो, वह मित्रता नहीं बल्कि एक व्यापारिक सौदा है क्योंकि वह अपने ही लाभ को देखती है और हर बात को परिणाम तथा फायदे की दृष्टि से तौलती है।

    इसमें किसी को संदेह नहीं कि प्रेमियों की भावनाएँ मित्रता से कुछ समानता रखती हैं। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम, मित्रता का पागलपन की सीमा तक पहुँचा हुआ रूप है। तो क्या कोई व्यक्ति प्रेम इसलिए करता है कि उसे उससे कोई लाभ मिले? या महत्वाकांक्षा की पूर्ति हो... या यश और प्रसिद्धि प्राप्त हो? प्रेम अपने आप में ही, किसी अन्य उद्देश्य की परवाह किए बिना, मन को दूसरे व्यक्ति के सौन्दर्य और आकर्षण की ओर आकृष्ट कर देता है और यह आशा करता है कि उसका स्नेह भी प्रत्युत्तर में प्राप्त होगा। तो फिर हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? क्या कोई निम्न या तुच्छ भावना किसी अधिक सम्माननीय और श्रेष्ठ स्रोत से उत्पन्न हो सकती है?

    तुम कहते हो, “हमारा प्रश्न यह नहीं है कि मित्रता अपने-आप में वरणीय (चयन करने योग्य) है या नहीं।” इसके विपरीत, यही वह बात है जिसे सबसे पहले और सबसे दृढ़ता से स्थापित किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि मित्रता अपने-आप में ही वरणीय है, तो आत्मनिर्भर व्यक्ति भी उसका अनुसरण कर सकता है। “तो फिर वह उसे किस प्रकार अपनाता है?” उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति किसी अत्यंत सुंदर वस्तु को अपनाता है— न लाभ के आकर्षण से खिंचकर और न ही भाग्य के उतार-चढ़ाव से भयभीत होकर। जब कोई व्यक्ति केवल अपनी स्थिति सुधारने, लाभ प्राप्त करने या जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए मित्र बनाता है, तब वह मित्रता की महानता को छोटा कर देता है।

   “बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है।” प्रिय लूसीलियस, बहुत-से लोग इस कथन का गलत अर्थ निकालते हैं। वे बुद्धिमान व्यक्ति को हर ओर से घेरकर मानो उसकी अपनी ही त्वचा के भीतर कैद कर देते हैं। वास्तविकता यह है कि इस कथन का अर्थ क्या है और इसकी सीमा कहाँ तक है, इसका भेद समझना आवश्यक है। बुद्धिमान व्यक्ति अच्छा जीवन जीने के संदर्भ में आत्मनिर्भर होता है, लेकिन सामान्य रूप से जीवन जीने के संदर्भ में नहीं। क्योंकि सामान्य जीवन के लिए उसे अनेक वस्तुओं और साधनों की आवश्यकता होती है। किन्तु अच्छा और श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए उसे केवल एक स्वस्थ, सच्चरित्र और सीधा मन चाहिए जो भाग्य के उतार-चढ़ाव से ऊपर उठ चुका हो।

    मैं तुम्हें क्रिसिप्पुस (Chrysippus) का यह भेद भी बताता हूँ। वह कहता है कि यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति को किसी चीज़ की कमी नहीं होती फिर भी उसे अनेक वस्तुओं का उपयोग होता है। इसके विपरीत, मूर्ख व्यक्ति के लिए कोई भी वस्तु वास्तव में उपयोगी नहीं होती,क्योंकि वह चीज़ों का सही उपयोग करना नहीं जानता; फिर भी उसे हर चीज़ की कमी रहती है। बुद्धिमान व्यक्ति को हाथों, आँखों और ऐसी अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है जो दैनिक जीवन के लिए आवश्यक हैं फिर भी उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं होती। क्योंकि "कमी" का अर्थ है "ज़रूरतमंद होना", और बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी वस्तु का मोहताज नहीं होता।

    इसलिए यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, फिर भी उसे मित्रों का उपयोग होता है और वह यथासंभव अधिक मित्र रखना चाहता है। लेकिन वह मित्रों को इसलिए नहीं चाहता कि उनके बिना वह अच्छा जीवन नहीं जी सकता। अच्छा जीवन तो वह मित्रों के बिना भी जी सकता है, क्योंकि परम शुभ अपने बाहर किसी साधन की खोज नहीं करता। वह मनुष्य के अपने ही भीतर जन्म लेता है और अपने आप में पूर्ण होता है। यदि तुम उसके किसी भी अंश को बाहर की वस्तुओं पर निर्भर कर दोगे, तो वह भाग्य के अधीन होने लगेगा।

    “लेकिन यदि बुद्धिमान व्यक्ति मित्रों से वंचित हो जाए, जैसे कि वह कैद में हो, किसी विदेशी देश में अकेला फँस गया हो, किसी लंबी समुद्री यात्रा में विलंबित हो गया हो, या किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दिया गया हो तो वह किस प्रकार का जीवन जिएगा?” वह उसी प्रकार का जीवन जिएगा जैसा जुपिटर उस समय जीता है जब संसार विलीन हो जाता है, जब सभी देवता एक में समा जाते हैं, जब प्रकृति कुछ समय के लिए अपनी गतिविधियाँ रोक देती है और वह स्वयं अपने विचारों में लीन होकर अपने भीतर विश्राम करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही करता है। वह अपने भीतर लौट जाता है, स्वयं में आश्रय लेता है और स्वयं ही अपनी संगति बन जाता है।

    फिर भी, जब तक बुद्धिमान व्यक्ति को अपने जीवन की व्यवस्था अपनी इच्छा के अनुसार करने का अवसर प्राप्त है, तब तक वह आत्मनिर्भर होते हुए भी विवाह करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी बच्चों का पालन-पोषण करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी ऐसा जीवन नहीं जीना चाहेगा जिसमें अन्य मनुष्यों का साथ बिल्कुल न हो। उसे मित्रता की ओर ले जाने वाली शक्ति उसका स्वार्थ या लाभ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। जिस प्रकार कुछ अन्य वस्तुएँ हमें स्वभावतः आकर्षित करती हैं, उसी प्रकार मित्रता भी हमें आकर्षित करती है। जैसे एकांत से बचना और संगति की तलाश करना हमारे स्वभाव में निहित है, जैसे प्रकृति ने मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ रखा है उसी प्रकार मित्रता स्थापित करने की एक सहज और जन्मजात प्रेरणा भी हमारे भीतर विद्यमान है।

    यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति अपने मित्रों से अत्यन्त गहरा प्रेम करता है, उन्हें अपने समान, और कई बार स्वयं से भी अधिक महत्व देता है। तथापि वह यह मानता है कि सभी वास्तविक अच्छाइयाँ उसके अपने भीतर ही सीमित हैं। इस विषय में वह वही मत रखेगा जो स्टिल्पो (Stilpo) ने व्यक्त किया था। फिर भी एपिक्यूरस के पत्र में उसकी आलोचना की गई है। स्टिल्पो का नगर शत्रुओं द्वारा जीत लिया गया था; उसके बच्चे नष्ट हो गए, उसकी पत्नी भी उससे छिन गई और अपने पूरे राष्ट्र के विनाश में वह अकेला जीवित बचा। फिर भी वह प्रसन्नचित्त होकर उस आपदा से बाहर निकला। जब दिमेत्रियस जिसे "पोलियोरकेटेस" अर्थात् "नगर-विजेता" कहा जाता था, ने उससे पूछा, "क्या तुमने कुछ खोया है?" तो उसने उत्तर दिया,  "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास ही है।" 

यह सचमुच एक साहसी और दृढ़ व्यक्ति था; उसने अपने शत्रु की विजय पर भी विजय प्राप्त कर ली। उसने कहा, "मैंने कुछ भी नहीं खोया है," और इस प्रकार उसने विजेता को ही यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या वास्तव में उसने कोई विजय प्राप्त की भी है। "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास है"अर्थात् मेरा न्याय, मेरा साहस, मेरी विवेकशीलता (प्रज्ञा) और सबसे बढ़कर यह क्षमता कि मैं समझता हूँ कि कोई भी ऐसी वस्तु वास्तव में अच्छी नहीं है जिसे मुझसे छीना जा सके। हम आश्चर्य करते हैं कि कुछ जीव-जन्तु बिना किसी शारीरिक क्षति के अग्नि में से निकल जाते हैं। किन्तु यह व्यक्ति उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है, जो आग, तलवार और विनाश के बीच से न केवल बिना किसी चोट के निकल आया, बल्कि बिना किसी हानि के भी। अब तुम देख सकते हो कि किसी पूरे राष्ट्र को पराजित करना एक अकेले मनुष्य को पराजित करने की अपेक्षा कितना आसान है। स्टिल्पो का यह कथन स्टोइकों का भी कथन है। स्टोइक दार्शनिक भी नगरों के विनाश के बीच से अपनी सम्पत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए निकल जाता है, क्योंकि वह आत्मनिर्भर है। यही वह सीमा है जिसके द्वारा वह अपनी समृद्धि और सुख का निर्धारण करता है।

    लेकिन यह मत समझो कि केवल हम स्टोइक ही ऐसी उदात्त बातें कहते हैं। स्टिल्पो की आलोचना करने वाले एपिक्यूरस ने भी स्वयं एक ऐसा कथन कहा है जो उसके विचार से बहुत मिलता-जुलता है। इसे आज के लिए मेरी ओर से एक उपहार समझो, यद्यपि आज का अपना ऋण मैं पहले ही चुका चुका हूँ। एपिक्यूरस कहते हैं,  "जो व्यक्ति यह नहीं मानता कि उसके पास जो कुछ है वह पर्याप्त है, वह दुखी है, चाहे वह पूरे संसार का शासक ही क्यों न हो।" या यदि तुम्हें इसे इस प्रकार कहना अधिक उपयुक्त लगे (क्योंकि हमें शब्दों की नहीं, विचारों की सेवा करनी चाहिए): "वह व्यक्ति दयनीय है जो स्वयं को पूर्णतः सुखी नहीं मानता, भले ही वह समस्त संसार पर शासन करता हो।"

    लेकिन तुम्हें यह दिखाने के लिए कि ये विचार केवल दार्शनिकों तक सीमित नहीं हैं बल्कि व्यापक रूप से स्वीकार किए गए हैं और निस्संदेह प्रकृति द्वारा ही प्रेरित हैं, एक हास्य-कवि यह पंक्ति प्रस्तुत करता है, "कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, यदि वह स्वयं को सुखी नहीं मानता।" यदि तुम अपनी परिस्थितियों को बुरा समझते हो, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे वास्तव में कैसी हैं?

    “लेकिन देखो,” तुम कहते हो, “फलाँ व्यक्ति का क्या, जिसकी संपत्ति भ्रष्ट तरीकों से अर्जित की गई है? या उस दूसरे व्यक्ति का क्या, जो बहुतों का स्वामी है और उससे भी अधिक लोगों का दास? यदि उनमें से कोई यह दावा करे कि उसका जीवन अच्छा है, तो क्या मात्र उसकी राय से यह सच हो जाएगा?” यहाँ महत्व इस बात का नहीं है कि वह क्या कहता है, बल्कि इस बात का है कि वह वास्तव में क्या सोचता है। और वह भी किसी एक दिन की क्षणिक भावना नहीं बल्कि लंबे समय तक उसके मन की स्थायी धारणा क्या है। फिर भी तुम्हें इस बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं कि इतना महान पुरस्कार किसी अयोग्य व्यक्ति को मिल जाएगा। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही अपने पास जो कुछ है उससे संतुष्ट रहता है; सभी मूर्ख लोग स्वयं से असंतुष्ट रहते हैं और उसी कारण दुःख भोगते हैं।

अभी के लिए विदा 


Friday, 19 June 2026

एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- (पत्र - 8)

प्रिय लूसीलियस 

"तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फिर तुम्हारे दर्शनशास्त्र की वह शिक्षा कहाँ गई जो हमें कर्म करते हुए मरने का उपदेश देती है?"

    क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें निष्क्रिय रहने की सलाह दे रहा हूँ? मैंने स्वयं को लोगों की भीड़ से अलग किया है और अपने द्वार बंद कर लिए हैं, लेकिन इसका कारण यह है कि मैं अधिक से अधिक लोगों का हित कर सकूँ। मेरा एक भी दिन आलस्य में नहीं बीतता। मैं रात का भी एक हिस्सा अध्ययन के लिए सुरक्षित रखता हूँ। नींद के लिए मेरे पास समय नहीं होता जब तक वह मुझे परास्त न कर दे, मैं काम करता रहता हूँ। मेरी आँखें देर रात तक जागने से थक जाती हैं और झुकने लगती हैं... फिर भी मैं उन्हें कार्य में लगाए रखता हूँ।

    मैंने केवल समाज से ही नहीं बल्कि व्यवसायों से भी और विशेष रूप से अपने निजी कामों से भी स्वयं को अलग कर लिया है। जो कार्य मैं कर रहा हूँ, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए है। वे ही मेरे लेखन से लाभान्वित हो सकेंगी। मैं अपने अनुभव से प्राप्त स्वास्थ्यवर्धक उपदेशों को लिख रहा हूँ, जैसे कोई उपयोगी मरहम के नुस्खे लिखता है। मैंने इन्हें अपने घावों पर आज़माया है। वे अभी पूरी तरह भले न भरे हों, पर उनका फैलना रुक गया है। जीवन का जो सही मार्ग मुझे बहुत भटकने और थक जाने के बाद मिला, वही अब मैं दूसरों को दिखा रहा हूँ।

    मेरा संदेश यह है, "उन वस्तुओं से दूर रहो जो बहुसंख्यक लोगों को प्रिय लगती हैं और उन उपहारों से भी जो भाग्य प्रदान करता है। उनसे सावधान रहो, उनसे डरो और संयोग से प्राप्त होने वाली हर अच्छी वस्तु का प्रतिरोध करो। जैसे मछली आशा के प्रलोभन से फँसती है और शिकार चारे से पकड़ा जाता है, वैसे ही मनुष्य भी फँस जाता है। क्या तुम इन्हें भाग्य का वरदान समझते हो? नहीं, ये जाल हैं। जो व्यक्ति सुरक्षित जीवन जीना चाहता है, उसे इन लुभावने उपकारों से यथासंभव दूर रहना चाहिए। हम अभागे लोग यह समझते हैं कि हमने इन्हें पकड़ रखा है जबकि वास्तव में इन्होंने हमें पकड़ रखा होता है।"

                                         

    तुम्हारा यह जीवन-पथ एक खाई की ओर जाता है। ऐसी ऊँची स्थिति से नीचे उतरने का अर्थ है गिरना। और जब समृद्धि हमें धक्का देने लगती है, तब हम उसका विरोध भी नहीं कर सकते। हम चाहें कि केवल एक बार गिरें या कम-से-कम सीधे खड़े हुए गिरें, पर हमें इसकी भी अनुमति नहीं मिलती। भाग्य केवल हमें गिराता ही नहीं बल्कि उलट देता है और फिर कुचल भी देता है।

    इसलिए जीवन के इस स्वस्थ और कल्याणकारी नियम को अपनाओ। "शरीर को उतना ही सुख दो जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो। उसके साथ कठोरता बरतो ताकि वह मन का आज्ञापालन करना सीखे। भोजन केवल भूख मिटाने के लिए हो, पेय केवल प्यास बुझाने के लिए। वस्त्र ठंड से रक्षा के लिए हों और घर केवल मौसम की कठोरताओं से बचने के लिए। यह कोई महत्व नहीं रखता कि वह घर मिट्टी का बना है या विदेशी संगमरमर से सुसज्जित। विश्वास करो, मनुष्य फूस की छत के नीचे भी उतना ही सुरक्षित रह सकता है जितना सोने के महल में। उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करो जिन्हें अनावश्यक परिश्रम केवल दिखावे और सजावट के लिए खड़ा करता है। याद रखो कि केवल मन ही वास्तव में अद्भुत है और महान मन के लिए उसके अतिरिक्त कुछ भी महान नहीं है।"



    यदि मैं ये बातें स्वयं से और आने वाली पीढ़ियों से कह रहा हूँ तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं तब से अधिक उपयोगी कार्य कर रहा हूँ जब मैं वकील के रूप में किसी की ज़मानत कराता था, किसी वसीयत पर मुहर लगाता था या किसी सीनेटर पद के उम्मीदवार की सहायता में अपना प्रभाव और वाणी लगाता था? विश्वास करो, जो लोग देखने में कुछ नहीं करते प्रतीत होते हैं, वे अक्सर सबसे बड़े कार्य कर रहे होते हैं क्योंकि वे मानव और दैवीय दोनों विषयों पर विचार कर रहे होते हैं।

    अब मुझे इस पत्र को समाप्त करना चाहिए और जैसा कि मेरी आदत बन गई है, मुझे इस पत्र का मूल्य भी चुकाना होगा। लेकिन यह भुगतान मेरी अपनी पूँजी से नहीं होगा। मैं अभी भी एपिक्यूरस के खजाने से उधार ले रहा हूँ। आज मुझे उसके लेखन में यह वचन मिला:

"दर्शन का दास बनो ताकि तुम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सको।"

    जो लोग स्वयं को दर्शन की आज्ञाकारिता में समर्पित कर देते हैं, उनकी स्वतंत्रता किसी भविष्य की तिथि तक नहीं टाली जाती। उन्हें उसी क्षण स्वतंत्रता मिल जाती है। क्योंकि दर्शन की यह दासता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

    शायद तुम पूछो कि मैं एपिक्यूरस के इतने सुंदर वचनों का उल्लेख क्यों करता हूँ, अपने स्टोइक विद्यालय के नहीं। लेकिन क्या कोई कारण है कि इन्हें केवल एपिक्यूरस की संपत्ति माना जाए, न कि समस्त मानवता की?कितने ही कवि ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें दार्शनिकों ने कहा है या कहना चाहिए था। मुझे न तो त्रासदीकारों का उल्लेख करने की आवश्यकता है और न ही उन नाटककारों का जो हास्य और त्रासदी के बीच की शैली में लिखते हैं। यहाँ तक कि साधारण मूक-अभिनय (माइम) में भी अनेक अत्यंत गहन पंक्तियाँ मिलती हैं।

मैं तुम्हें पब्लिलियस की एक पंक्ति सुनाता हूँ, जो अभी जिस विषय पर मैं चर्चा कर रहा था, उसी से संबंधित है:

"जो वस्तु केवल इच्छा करने से मिल जाए, वह वास्तव में तुम्हारी संपत्ति नहीं है।"

मुझे याद है कि तुमने स्वयं यही विचार और भी बेहतर तथा संक्षिप्त रूप में व्यक्त किया था, "जिसे भाग्य तुम्हारा बनाता है, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं होता।" और मैं तुम्हारी एक और इससे भी श्रेष्ठ उक्ति का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता, "जो भलाई दी जा सकती है, वह वापस भी ली जा सकती है।"

इन बातों का मूल्य मैं तुम्हारे खाते में नहीं लिख रहा.ये तो तुम्हारी अपनी ही संपत्ति हैं।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 18 June 2026

भीड़ के संदर्भ में -- (पत्र - 7)

प्रिय लुसीलियस

तुम पूछते हो कि सबसे अधिक किस चीज़ से बचना चाहिए? मैं कहूँगा, भीड़ से। अभी तुम इतने सुरक्षित नहीं हुए हो कि अपने आपको भीड़ में शामिल कर सको। 

    मैं इस संदर्भ में अपनी कमजोरी खुले रूप से स्वीकार करता हूँ। जब भी मैं बाहर जाता हूँ, कभी भी उसी चरित्र के साथ वापस नहीं लौटता जिसके साथ गया था। हमेशा ऐसा कुछ फिर से उद्वेलित हो जाता है जिसे मैं पहले शांत कर चुका था, कुछ ऐसा भी जिससे छुटकारा पा लिया था, पर वह फिर से लौट आती है। जैसे लंबे समय तक बीमारी से उबर रहे रोगी को बाहर ले जाने पर उसकी हालत बिगड़ सकती है, वैसा ही हमारे साथ भी होता है। हमारा मन एक लंबी बीमारी से स्वस्थ हो रहा है, ऐसे में लोगों की भीड़ का (से) संपर्क हमारे लिए हानिकारक है। हर व्यक्ति किसी न किसी दोष को हमारे भीतर बढ़ावा देता है, हमें कोई अवगुण सिखा देता है या बिना हमारे जाने हमें उससे संक्रमित कर देता है।

 

    निस्संदेह, जितनी बड़ी भीड़ के साथ हम रहते हैं, उतना ही बड़ा खतरा होता है। अच्छे चरित्र के लिए सार्वजनिक मनोरंजन और तमाशों में बैठना सबसे अधिक विनाशकारी है क्योंकि वहाँ दृश्य का आनंद, अवगुणों को अधिक आसानी से हमारे भीतर प्रवेश करा देता है। तुम सोचोगे कि मेरा क्या मतलब है? क्या मैं वहाँ से लौटकर अधिक लालची, अधिक सत्ता-लोभी या अधिक भोग-विलासी बन जाता हूँ? इससे भी बुरा! मैं अधिक क्रूर और अमानवीय बन जाता हूँ, केवल इसलिए कि मैं इंसानों के बीच रहा हूँ।

    संयोग से मैं एक दिन दोपहर के प्रदर्शन में पहुँच गया। मुझे आशा थी कि वहाँ कुछ मनोरंजन, बुद्धिमत्ता या विश्राम मिलेगा जिससे लोगों की आँखों को रक्तपात देखने से थोड़ी राहत मिले। पर हुआ इसका बिल्कुल उलटा। पहले जो युद्ध हुए थे, वे तो तुलना में दयालु प्रतीत हुए। अब खेल-तमाशा समाप्त हो चुका था और केवल निर्मम हत्या शेष थी। लड़ने वालों को कोई सुरक्षा-कवच नहीं दिया जाता था। उनका शरीर पूरी तरह खुला रहता था इसलिए कोई भी वार व्यर्थ नहीं जाता था। लोगों को यह कार्यक्रम साधारण ग्लैडिएटर युद्धों से अधिक पसंद था। और क्यों न हो? न कोई हेलमेट, न कोई ढाल जो तलवार को रोक सके। रक्षा की क्या आवश्यकता? युद्ध-कौशल की क्या आवश्यकता? ये सब तो केवल मृत्यु को देर से आने देते हैं। सुबह मनुष्यों को शेरों और भालुओं के सामने फेंका जाता है...।  दोपहर में उन्हें दर्शकों के सामने फेंका जाता है। जो मारते हैं, उन्हें स्वयं दूसरे हत्यारों के सामने मरने के लिए भेज दिया जाता है। विजेता को भी अगली हत्या के लिए रोक लिया जाता है। अखाड़े से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है — मृत्यु। तलवार और अग्नि ही उस समय का व्यवसाय बन जाते हैं। और यह सब तब भी चलता रहता है जब अखाड़ा लगभग खाली होता है।

    (कोई कह प्रश्न करता है) "लेकिन उसने डकैती की थी! उसने किसी की हत्या की थी!" तो क्या? यदि वह हत्यारा था तो शायद वह इस दंड का पात्र था। लेकिन तुमने क्या अपराध किया है कि तुम्हें यह सब देखने का दंड मिले?

    (लोग चिल्लाते हैं) "उसे मारो! उसे कोड़े लगाओ! उसे जला दो! वह तलवार पर झपटने में इतना डर क्यों रहा है? वह साहसपूर्वक मर क्यों नहीं जाता? उसे कोड़ों से युद्ध में धकेलो! उन्हें खुली छाती के साथ एक-दूसरे के प्रहार सहने दो!" और जब प्रदर्शन में थोड़ी देर का विराम होता है तो घोषणा होती है, "तब तक कुछ लोगों के गले काट दिए जाएँ ताकि मनोरंजन चलता रहे!" क्या तुम यह भी नहीं समझते कि बुरे उदाहरण केवल देखने वालों को ही नहीं, उन्हें प्रस्तुत करने वालों को भी भ्रष्ट करते हैं? देवताओं का धन्यवाद करो कि जिसे तुम क्रूरता सिखा रहे हो, वह उसे सीखने में सक्षम नहीं है!

    युवा मन, जो अभी सत्य और सदाचार पर दृढ़ नहीं हुआ है, उसे भीड़ से दूर रखना चाहिए। बहुमत का अनुसरण करना बहुत आसान है। यहाँ तक कि सुकरात (Socrates), केटो (Cato) और लैलियस (Laelius) जैसे महान व्यक्तियों का चरित्र भी ऐसी भीड़ के प्रभाव से डगमगा सकता था जो उनसे बिल्कुल भिन्न थी। तो फिर हम जो अभी अपने भीतर सामंजस्य स्थापित करना ही शुरू कर रहे हैं, उन दोषों के आक्रमण का सामना कैसे कर सकते हैं जो इतनी बड़ी सेना लेकर आते हैं? विलासिता या लालच का केवल एक उदाहरण भी बहुत हानि पहुँचाता है। एक विलासी साथी धीरे-धीरे हमारे साहस और दृढ़ता को कम कर देता है। एक धनी पड़ोसी हमारी इच्छाओं को भड़का देता है। एक द्वेषपूर्ण मित्र सबसे सरल और निष्कपट स्वभाव को भी अपने विष से दूषित कर देता है। तो सोचो, जब पूरी जनता ही किसी व्यक्ति के चरित्र पर आक्रमण करे, तब क्या होगा? तुम्हें या तो उनका अनुकरण करना पड़ेगा या उनसे घृणा करनी पड़ेगी।

    दोनों ही मार्गों से बचना चाहिए। बुरों की नकल मत करो क्योंकि वे बहुत हैं और लोगों से घृणा भी मत करो क्योंकि वे तुमसे भिन्न हैं। जितना संभव हो, अपने भीतर लौट जाओ। उन लोगों के साथ समय बिताओ जो तुम्हें बेहतर बनाएँ। और उनका स्वागत करो जिन्हें तुम बेहतर बना सकते हो। यह प्रभाव पारस्परिक होता है क्योंकि लोग सिखाते हुए भी सीखते हैं।

    अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की अहंकारी इच्छा तुम्हें भीड़ के बीच भाषण देने या वाद-विवाद करने के लिए आकर्षित न करे। यदि तुम्हारे पास ऐसा ज्ञान होता जो इस भीड़ के लिए उपयुक्त होता तो मैं तुम्हें ऐसा करने को कहता। परंतु वास्तविकता यह है कि वहाँ कोई भी तुम्हें समझने योग्य नहीं है। शायद कोई एक व्यक्ति मिल जाए और उसे भी पहले शिक्षित करना पड़ेगा ताकि वह तुम्हें समझ सके।

    (तुम पूछ सकते हो) "फिर मैंने यह सब किसके लिए सीखा?" चिंता मत करो। यदि तुमने यह सब अपने लिए सीखा है तो तुम्हारा समय व्यर्थ नहीं गया। और ताकि आज का मेरा अध्ययन केवल मेरे लिए न रहे, मैं तुम्हारे साथ तीन उत्कृष्ट कथन साझा करता हूँ।

    डेमोक्रिटस (Democritus) कहता है, "मेरे लिए एक व्यक्ति एक राष्ट्र के समान है और एक राष्ट्र एक व्यक्ति के समान।"

    जब एक अज्ञात लेखक से पूछा गया कि कला के ऐसे काम में आपने इतनी मेहनत या प्रयास क्यों किया है जिसे बहुत काम लोग देख पाएँगे तब उन्होंने बढ़िया बात कही, "कुछ लोग पर्याप्त हैं, एक व्यक्ति पर्याप्त है और कभी-कभी कोई भी न हो... तो भी पर्याप्त है।"

    तीसरा कथन विशेष रूप से सुंदर है। एपीक्यूरस (Epicurus) ने अपने एक दार्शनिक मित्र को लिखा, "मैं यह बहुतों के लिए नहीं, तुम्हारे लिए लिखता हूँ क्योंकि तुम और मैं एक-दूसरे के लिए पर्याप्त श्रोता हैं।"

    प्रिय लुसीलियस, इन वचनों को अपने मन में रखो ताकि तुम बहुसंख्यकों की प्रशंसा से मिलने वाले सुख को तुच्छ समझो। बहुत-से लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं पर क्या इससे तुम्हें स्वयं पर संतोष करने का कारण मिल जाता है, यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे बहुत-से लोग आसानी से समझ सकते हैं? अपने श्रेष्ठ गुणों को बाहर नहीं, भीतर की ओर निर्देशित करो।

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सेनेका 

Monday, 15 June 2026

ज्ञान साझा करने के संदर्भ में -- (पत्र - 6)

 

प्रिय लुसीलियस,

मुझे ऐसा लगता है कि मैं केवल सुधर ही नहीं रहा हूँ बल्कि रूपांतरित भी हो रहा हूँ। फिर भी मैं यह दावा नहीं करता, न ही ऐसी आशा करता हूँ कि अब मुझमें ऐसा कुछ भी शेष नहीं है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। निस्संदेह मेरे भीतर बहुत-सी बातें हैं जिन्हें और सुदृढ़ बनाना चाहिए, कुछ को हल्का करना चाहिए, और कुछ को अधिक स्पष्ट रूप से उभारना चाहिए। वास्तव में, यही तथ्य इस बात का प्रमाण है कि मेरी आत्मा पहले से बेहतर हो गई है। अब वह अपनी उन त्रुटियों को पहचान सकती है जिनसे वह पहले अनभिज्ञ थी। जैसे कुछ रोगियों को इस बात पर बधाई दी जाती है कि उन्हें स्वयं अपनी बीमारी का बोध हो गया है, वैसे ही मुझे भी अपने दोषों का ज्ञान होना प्रगति का संकेत लगता है।

    इसलिए मैं अपने भीतर आए इस अचानक परिवर्तन को तुम्हारे साथ साझा करना चाहता हूँ। ऐसा करने से मुझे हमारी मित्रता पर और भी दृढ़ विश्वास होगा...  उस सच्ची मित्रता पर जिसे न आशा तोड़ सकती है, न भय, और न ही स्वार्थ। ऐसी मित्रता, जिसके लिए और जिसमें मनुष्य मृत्यु तक का सामना कर सकता है।

    मैं तुम्हें ऐसे अनेक लोगों के उदाहरण दिखा सकता हूँ जिनके पास मित्र तो थे परंतु मित्रता नहीं थी। किंतु यह स्थिति वहाँ कभी उत्पन्न नहीं हो सकती जहाँ दो आत्माएँ समान प्रवृत्तियों और सम्माननीय इच्छाओं के आधार पर एक हो जाती हैं। ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि ऐसे लोगों को ज्ञात होता है कि उनकी सभी वस्तुएँ साझी हैं —विशेषकर उनके दुःख। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि मैं प्रतिदिन अपने भीतर कितनी स्पष्ट प्रगति अनुभव करता हूँ।



    और जब तुम कहते हो, “जो लाभ तुम्हें इतने उपयोगी लगे हैं, उनमें मुझे भी भागीदार बनाओ” तो मैं उत्तर देता हूँ कि मैं इन सभी उपहारों को तुम्हारे ऊपर उँडेल देना चाहता हूँ। मैं इसलिए सीखने में आनंद पाता हूँ कि जो सीखा है उसे दूसरों को सिखा सकूँ। कोई भी वस्तु, चाहे वह कितनी ही उत्कृष्ट और लाभदायक क्यों न हो, मुझे तब तक सुखद नहीं लग सकती जब तक मैं उसका ज्ञान केवल अपने तक सीमित रखूँ। यदि मुझे यह शर्त रखकर बुद्धि दी जाए कि उसे छिपाकर रखना होगा और किसी से कहना नहीं होगा तो मैं ऐसी बुद्धि को स्वीकार ही नहीं करूँगा। किसी भी उत्तम वस्तु का स्वामित्व सुखद नहीं होता यदि उसे साझा करने के लिए मित्र न हों।

    अतः मैं तुम्हें वे पुस्तकें भेजूँगा। ताकि तुम उपयोगी विषयों की खोज में समय नष्ट न करो, मैं उनमें कुछ विशेष अंशों को चिह्नित कर दूँगा जिससे तुम सीधे उन्हीं स्थानों पर पहुँच सको जिन्हें मैं सराहता और प्रशंसनीय मानता हूँ। फिर भी, जीवित वाणी और साथ-साथ बिताया गया जीवन तुम्हारी अधिक सहायता करेंगे, लिखित शब्दों की अपेक्षा। तुम्हें स्वयं कर्मक्षेत्र में आना चाहिए। पहला कारण यह है कि लोग अपनी आँखों पर अपने कानों से अधिक विश्वास करते हैं। दूसरा कारण यह है कि यदि कोई केवल उपदेशों का अनुसरण करता है तो मार्ग लंबा होता है परंतु यदि वह उदाहरणों का अनुसरण करता है तो मार्ग छोटा और अधिक सहायक होता है।

    यदि क्लेन्थीस ने केवल ज़ेनो के व्याख्यान सुने होते तो वह कभी उसका सच्चा प्रतिबिंब नहीं बन सकता था। उसने उसके साथ जीवन बिताया, उसके गुप्त उद्देश्यों को समझा, और यह देखा कि क्या वह स्वयं अपने नियमों के अनुसार जीवन जीता है। प्लेटो, अरस्तू और उन सभी महान दार्शनिकों ने, जो आगे चलकर अपने-अपने मार्ग पर चले, सुकरात के शब्दों से कम और उसके चरित्र से अधिक लाभ प्राप्त किया। मेट्रोडोरस, हर्मार्कस और पॉलीएनस जैसे महान पुरुष एपिक्यूरस की कक्षा में बैठकर नहीं बल्कि उसके साथ एक ही छत के नीचे रहकर महान बने। इसलिए मैं तुम्हें केवल इसलिए नहीं बुला रहा कि तुम लाभ प्राप्त करो बल्कि इसलिए भी कि तुम लाभ पहुँचाओ। हम दोनों एक-दूसरे की बहुत सहायता कर सकते हैं।

इस बीच, मैं तुम्हें अपना छोटा-सा दैनिक उपहार देना चाहता हूँ। आज हेकाटो के लेखन में जो बात मुझे विशेष रूप से पसंद आई, वह यह है, “तुम पूछते हो कि मैंने क्या प्रगति की है? मैंने स्वयं अपना मित्र बनना सीख लिया है।” यह वास्तव में एक महान उपलब्धि है। ऐसा व्यक्ति कभी अकेला नहीं रह सकता। निश्चिंत रहो, जो व्यक्ति स्वयं का मित्र बन जाता है, वह समस्त मानवजाति का भी मित्र बन जाता है।

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Sunday, 14 June 2026

दार्शनिक के मध्यम मार्ग के संदर्भ में -- (पत्र - 5)


मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूँ कि तुम अपने अध्ययन में दृढ़ बने हुए हो तथा अन्य सभी बातों को एक ओर रखकर प्रतिदिन स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास करते हो। मैं केवल तुम्हें ऐसा करते रहने की सलाह ही नहीं देता बल्कि विनती भी करता हूँ कि ऐसा करते रहो। लेकिन मैं तुम्हें सावधान करता हूँ कि उन लोगों की तरह व्यवहार मत करना जो सुधार की अपेक्षा लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। ऐसे कार्यों से बचो जो तुम्हारे कपड़ों या जीवन-शैली के कारण लोगों में चर्चा का विषय बन जाएँ।

घृणा उत्पन्न करने वाले कपड़े, बिखरे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ, चाँदी के बर्तनों का दिखावटी तिरस्कार, धरती पर सोना, अथवा आत्म-प्रदर्शन के ऐसे अन्य विकृत रूपों से बचना चाहिए। दर्शन का नाम ही, चाहे वह कितनी ही शांति से क्यों न अपनाया जाए, लोगों के उपहास का पर्याप्त कारण बन जाता है। फिर यदि हम स्वयं को समाज की परंपराओं से अलग दिखाने लगें, तो क्या होगा? भीतर से हमें हर दृष्टि से भिन्न होना चाहिए पर बाहरी रूप से हमें समाज के अनुरूप रहना चाहिए।

                                 

                 The Thinker by Auguste Rodin, 1904

न तो बहुत सुंदर कपड़े पहनने चाहिए और न ही अत्यंत मैले। सोने से जड़ी हुई चाँदी की थालियों की आवश्यकता नहीं है पर हमें यह भी नहीं समझना चाहिए कि सोना-चाँदी का अभाव ही सादगी का प्रमाण है। हमें ऐसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए जो सामान्य लोगों से अच्छा हो पर उनसे बिल्कुल विपरीत नहीं। अन्यथा हम उन्हीं लोगों को डरा देंगे और अपने से दूर कर देंगे जिन्हें हम सुधारना चाहते हैं। नतीजा यह होगा कि वे हमारी किसी भी बात का अनुसरण नहीं करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें डर होगा कि कहीं उन्हें हर बात में हमारा अनुकरण न करना पड़े।

दर्शन का पहला काम सभी मनुष्यों में एक-दूसरे के के प्रति भाईचारा उत्पन्न करना है। इसे दूसरे शब्दों में सहानुभूति और सामाजिकता कहा जा सकता है। यदि हम स्वयं को दूसरों से बिल्कुल अलग बना लें तो हम अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिन साधनों से हम प्रशंसा पाना चाहते हैं, वे हास्यास्पद या घृणित न हों। हमारा आदर्श है —"प्रकृति के अनुसार जीवन जीना।" लेकिन शरीर को कष्ट देना, सहज सौन्दर्य से घृणा करना, जान-बूझकर गंदा रहना, या ऐसा भोजन करना जो केवल साधारण ही नहीं बल्कि अरुचिकर और घिनौना भी हो — यह प्रकृति के विपरीत है।

जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की खोज विलासिता का संकेत है वैसे ही सामान्य और सस्ते भोजन से बचना भी मूर्खता है। दर्शन सादगीपूर्ण जीवन की माँग करता है, तपस्या या आत्म-यातना की नहीं। मनुष्य एक साथ सादा और स्वच्छ दोनों हो सकता है। यही वह मध्यम मार्ग (Mean) है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। हमारा जीवन एक ज्ञानी पुरुष के जीवन और सामान्य संसार के जीवन के बीच संतुलित होना चाहिए। लोग उसकी प्रशंसा करें पर उसे समझ भी सकें।

तुम पूछ सकते हो —"तो क्या हम सामान्य लोगों की तरह ही रहें? क्या हमारे और संसार के बीच कोई अंतर न होगा?" हाँ, फर्क अवश्य होगा और बहुत बड़ा होगा। लेकिन वह अंतर तभी दिखाई दे जब लोग हमें ध्यान से देखें। यदि वे हमारे घर आएँ, तो उन्हें हमारे फर्नीचर या सजावट की नहीं बल्कि हमारी प्रशंसा करनी चाहिए। वह व्यक्ति महान है जो मिट्टी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे चाँदी के हों किन्तु उतना ही महान वह भी है जो चाँदी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे मिट्टी के हों। धन को सहन न कर पाना अस्थिर मन का लक्षण है।

अब मैं आज की एक और सीख तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ। मैंने हमारे दार्शनिक हेकाटो की रचनाओं में पाया है कि इच्छाओं को सीमित करना भय को भी समाप्त करने में सहायक होता है। वह कहते हैं, "आशा करना छोड़ दो और तुम भय करना भी छोड़ दोगे।" तुम पूछ सकते हो, "इतनी भिन्न चीज़ें एक साथ कैसे चल सकती हैं?" प्रिय लूसिलियस, वास्तव में वे उतनी भिन्न नहीं हैं जितनी दिखाई देती हैं। जैसे एक ही जंजीर कैदी और उसकी रखवाली करने वाले सैनिक दोनों को बाँधती है वैसे ही आशा और भय भी साथ-साथ चलते हैं। भय, आशा का अनुसरण करता है।

मुझे इसमें आश्चर्य नहीं होता क्योंकि दोनों ही उस मन की उपज हैं जो अनिश्चितता में जीता है और भविष्य की चिंता में व्याकुल रहता है। इन दोनों बुराइयों का मुख्य कारण यह है कि हम वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने के बजाय अपने विचारों को बहुत दूर भविष्य में भेज देते हैं। इस प्रकार दूरदर्शिता, जो मानव जाति का सबसे महान वरदान है, विकृत हो जाती है।

पशु उन खतरों से बचते हैं जिन्हें वे सामने देखते हैं और उनसे बच जाने के बाद निश्चिन्त हो जाते हैं। पर हम मनुष्य भविष्य की संभावनाओं और अतीत की स्मृतियों दोनों से स्वयं को पीड़ित करते रहते हैं। हमारे अनेक वरदान ही हमारे लिए अभिशाप बन जाते हैं। स्मृति, पुराने भय और कष्टों को फिर से जीवित कर देती है और दूरदर्शिता आने वाले कष्टों की कल्पना करके हमें पहले ही दुःखी कर देती है। वास्तव में केवल वर्तमान ही ऐसा है जो किसी मनुष्य को दुःखी नहीं कर सकता।

अभी के लिए विदा

 

Saturday, 13 June 2026

मृत्यु के भय के संदर्भ में -- (पत्र - 4)


प्रिय लूसीलियस,

जिस प्रकार तुमने आरम्भ किया है उसी प्रकार आगे बढ़ते रहो और जितनी शीघ्र हो सके उतनी प्रगति करो ताकि तुम एक ऐसे मन का अधिक समय तक आनंद ले सको जो बेहतर हुआ हो और स्वयं के साथ शांति में हो। निस्संदेह, अपने मन को बेहतर व शांत करते समय भी तुम्हें आनंद मिलेगा पर वह सुख बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो उस समय प्राप्त होता है जब मन हर प्रकार के कलंक से मुक्त होकर चमक उठता है।

    तुम्हें याद होगा कि जब तुमने बचपन के कपड़े छोड़कर पुरुषों का कपड़ा पहना था और तुम्हें सम्मानपूर्वक सभा-स्थल तक ले जाया गया था तब तुम्हें कितना आनंद हुआ था। फिर भी उससे कहीं अधिक आनंद की आशा करो जब तुम बालसुलभ मनोवृत्ति का त्याग करोगे और विवेक तुम्हें सच्चे मनुष्यों की श्रेणी में सम्मिलित करेगा।

                                              

                                                          The Misery by Cristobal Rojas Poelo

                                               

हमारे भीतर केवल बचपन ही नहीं रह गया है बल्कि उससे भी बुरी चीज़ — लड़कपन —अब भी बना हुआ है। यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए है कि हमारे पास वृद्धावस्था का सम्मान तो है पर मूर्खताएँ अब भी बच्चों जैसी हैं... बल्कि शिशुओं जैसी भी। लड़के तुच्छ बातों से डरते हैं, बच्चे परछाइयों से डरते हैं, और हम दोनों से डरते हैं।

    तुम्हें केवल आगे बढ़ना है तब तुम समझोगे कि कुछ चीज़ें वास्तव में उतनी भयावह नहीं हैं जितनी वे प्रतीत होती हैं। कोई भी बुराई बड़ी नहीं होती यदि वह अंतिम बुराई हो। मृत्यु आती है। वह भय का विषय तब होती यदि वह हमारे साथ बनी रहती। लेकिन मृत्यु या तो आएगी ही नहीं और यदि आएगी तो गुज़रकर चली जाएगी।

    तुम कह सकते हो, “पर मन को इस स्थिति तक पहुँचाना कठिन है कि वह जीवन का तिरस्कार कर सके।” पर क्या तुम नहीं देखते कि कितने तुच्छ कारणों से लोग जीवन का त्याग कर देते हैं? कोई अपनी प्रेमिका के द्वार पर फाँसी लगा लेता है, कोई घर की छत से कूद पड़ता है ताकि गुस्साए मालिक की डाँट न सहनी पड़े, कोई पकड़े जाने के भय से अपनी छाती में तलवार भोंक लेता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि सद्गुण उतना ही प्रभावशाली हो सकता है जितना अत्यधिक भय? हर पल लंबे जीवन की कामना करने वाला व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता या यह मानता हो कि बहुत वर्षों तक जीवित रहना ही महान सौभाग्य है।                                              

    प्रतिदिन इस विचार का अभ्यास करो कि जब समय आए तो तुम संतोषपूर्वक जीवन से विदा हो सको क्योंकि बहुत से लोग जीवन से उसी प्रकार चिपके रहते हैं जैसे तीव्र धारा में बहते हुए लोग काँटों और नुकीली चट्टानों को पकड़ लेते हैं।

                                                        

                                                                  Picasso -- Blue Period 

    अधिकांश लोग मृत्यु के भय और जीवन की कठिनाइयों के बीच दुखपूर्वक झूलते रहते हैं। वे जीना नहीं चाहते यह भी की मरना कैसे है।

    इसलिए जीवन को अपने लिए उपयुक्त बनाओ और उसके विषय में सारी चिंता दूर कर दो। कोई भी अच्छी वस्तु अपने स्वामी को सुखी नहीं बना सकती यदि उसका मन उसके खो जाने की संभावना को स्वीकार न कर चुका हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका खोना मृत्यु से कम पीड़ादायक हो क्योंकि मृत्यु के बाद उसकी कमी का अनुभव ही नहीं किया जा सकता। इसलिए अपने मन को सुदृढ़ बनाओ और उन विपत्तियों के लिए तैयार करो जो सबसे शक्तिशाली लोगों पर भी आती हैं।

    उदाहरण के लिए, पॉम्पी का भाग्य एक लड़के और एक हिजड़े द्वारा निर्धारित हुआ। क्रैसस का अंत एक क्रूर और उद्दण्ड पार्थियन के हाथों हुआ। गैयस सीज़र ने लेपिडस को आदेश दिया कि वह अपनी गर्दन जल्लाद की कुल्हाड़ी के सामने प्रस्तुत करे और अंततः उसने स्वयं भी अपनी गर्दन चाएरिया के सामने प्रस्तुत की। भाग्य ने किसी को भी इतना ऊँचा नहीं उठाया कि उसे उतना ही बड़ा खतरा न दिखाया हो जितना बड़ा अनुग्रह उसने पहले दिया था। उसकी शांत प्रतीत होने वाली अवस्था पर भरोसा मत करो। एक क्षण में समुद्र की गहराइयाँ उथल-पुथल हो सकती हैं। जिस दिन जहाज़ अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हैं उसी दिन वे समुद्र में डूब भी सकते हैं।

    यह भी सोचो कि कोई डाकू या शत्रु तुम्हारा गला काट सकता है और चाहे वह तुम्हारा स्वामी न हो फिर भी प्रत्येक दास तुम्हारे जीवन और मृत्यु पर शक्ति रखता है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो अपने जीवन की परवाह नहीं करता वही तुम्हारे जीवन का स्वामी बन सकता है। उन लोगों के बारे में सोचो जो अपने ही घरों में षड्यंत्रों का शिकार हुए.. . खुले रूप से या छलपूर्वक मारे गए। तुम पाओगे कि जितने लोग क्रोधित दासों द्वारा मारे गए लगभग उतने ही क्रोधित राजाओं द्वारा भी मारे गए। फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि वह व्यक्ति कितना शक्तिशाली है जिससे तुम डरते हो जब हर व्यक्ति के पास वही शक्ति है जिससे तुम भयभीत हो?

    पर तुम कहोगे, “यदि तुम शत्रु के हाथों पड़ गए तो विजेता तुम्हें मृत्यु के लिए ले जाएगा।” हाँ, पर वह तुम्हें वहीं ले जाएगा जहाँ तुम पहले से ही जा रहे हो। तुम स्वयं को धोखा क्यों देते हो और अब पहली बार यह सुनना क्यों चाहते हो कि तुम्हारा भाग्य क्या है? मेरी बात मानो, जिस दिन तुम जन्मे थे उसी दिन से तुम उसी दिशा में ले जाए जा रहे हो। यदि हम उस अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा करते समय शांत रहना चाहते हैं जिसके भय से हमारे सभी पूर्व क्षण अशांत हो जाते हैं तो हमें इस विचार और ऐसे ही अन्य विचारों पर निरंतर मनन करना चाहिए।

    पर अब मुझे अपना पत्र समाप्त करना चाहिए। आज मुझे जो उक्ति पसंद आई, उसे तुम्हारे साथ साझा करता हूँ। यह भी किसी दूसरे के उपवन से (लेखन) ली गई है — “प्रकृति के नियमों के अनुरूप बनी हुई गरीबी ही महान संपत्ति है।” क्या तुम जानते हो कि प्रकृति का नियम हमारे लिए कौन-सी सीमाएँ निर्धारित करता है? केवल भूख, प्यास और ठंड से बचना। भूख और प्यास मिटाने के लिए धनवानों के द्वार पर चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं है... न कठोर तिरस्कार सहने की... न अपमानजनक कृपा स्वीकार करने की... न समुद्रों की खाक छानने की आवश्यकता है और न युद्ध-अभियानों में भटकने की। प्रकृति की आवश्यकताएँ सरल हैं और सहज उपलब्ध हैं।

मनुष्य जिन वस्तुओं के लिए इतना परिश्रम करता है वे अधिकांशतः अनावश्यक और अतिरिक्त होती हैं। वही अतिरिक्त वस्तुएँ हमारे वस्त्रों को घिस देती हैं, हमें शिविरों में बूढ़ा कर देती हैं और हमें विदेशी तटों पर भटका देती हैं। जो पर्याप्त है, वह तो हमारे हाथों के निकट ही उपलब्ध है। जिसने गरीबी के साथ न्यायपूर्ण समझौता कर लिया है, वही वास्तव में धनी है।

अभी के लिए विदा।


स्वयं के संदर्भ में -- (पत्र - 10)

प्रिय लूसीलियस  हाँ, मैं अपने कथन को नहीं बदलता। भीड़ से दूर रहो। थोड़े लोगों की संगति से भी दूर रहो। यहाँ तक कि एक अकेले साथी से भी बचो। ऐस...