Thursday, 16 July 2026

सद्गुणों की वांछनीयता एवं साहस के संदर्भ में -- पत्र - 67 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


सामान्य बातों से आरंभ करूँ। वसंत ने अपने रूप को फैलाना शुरू कर दिया है किंतु यद्यपि वह अब ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है और गर्मी पड़ जानी चाहिए थी। फिर भी मौसम कुछ ठंडा बना हुआ है और अभी भी उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अक्सर ऐसा होता है कि वह फिर से शीत ऋतु की ओर लौट जाता है। क्या तुम जानना चाहते हो कि मौसम अभी भी कितना अनिश्चित है? मैं अभी तक पूरी तरह ठंडे पानी से स्नान करने का साहस नहीं करता। उसकी ठंडक को थोड़ा कम कर ही स्नान करता हूँ। तुम कहोगे, “इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम न गर्मी सह सकते हो, न ठंड।” बिल्कुल ठीक कहते हो, प्रिय लूसीलियस। मेरी आयु अब अपनी ही स्वाभाविक ठंडक से संतुष्ट है। ग्रीष्म ऋतु के मध्य में भी मुझे शायद ही कभी पूरी तरह गर्मी महसूस होती है और बहुत कम ऐसा होता है कि मैं अपने शरीर से कोई वस्त्र उतारूँ।


Virtue of Justice

    मैं वृद्धावस्था का इस बात के लिए आभारी हूँ कि उसने मुझे बिस्तर तक सीमित कर दिया है। इसके लिए आभारी क्यों न रहूँ? जिन कामों को करने की इच्छा मुझे नहीं करनी चाहिए थी, अब उन्हें करना मेरे लिए संभव ही नहीं रहा। अब मेरा सबसे अधिक संवाद पुस्तकों से होता है। जब भी तुम्हारा कोई पत्र आता है, मुझे ऐसा लगता है मानो मैं तुम्हारे साथ ही बैठा हूँ। ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं तुम्हें केवल उत्तर लिख नहीं रहा बल्कि सचमुच तुम्हारे प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर दे रहा हूँ। इसलिए आओ, जिस विषय के बारे में तुमने पूछा है, उसी पर विचार करें और उसकी प्रकृति की उसी प्रकार सावधानी से जाँच करें, जैसे हम आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे हों।

    तुम पूछते हो कि क्या प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय होती है। तुम कहते हो, “यदि यातनाएँ सहते हुए साहसपूर्वक व्यवहार करना, आग में जलते हुए भी वीरतापूर्वक अडिग रहना और रोगग्रस्त होने पर धैर्य बनाए रखना, ये सब शुभ हैं तो फिर यह मानना पड़ेगा कि ये सब वांछनीय भी हैं। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि इनमें से कौन-सी ऐसी चीज़ है जिसकी कोई कामना करे। निश्चय ही मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसकी इच्छा इस रूप में पूरी हुई हो कि उसे कोड़ों से पीटा गया हो, गठिया की पीड़ा ने उसके शरीर को मरोड़ दिया हो या उसे यातना-यंत्र पर खींचकर कष्ट दिया गया हो।”

    प्रिय लूसीलियस, इन बातों में भेद करके देखो, तब तुम्हें समझ में आएगा कि इनमें भी कुछ ऐसा है जिसे चुनना उचित है। मैं यह पसंद करूँगा कि मुझे कभी यातनाएँ न सहनी पड़ें। लेकिन यदि कभी उन्हें सहना ही पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि उस परिस्थिति में मैं साहस, सम्मान और निर्भीकता के साथ अपना आचरण करूँ। मैं यही चाहूँगा और इसमें आश्चर्य ही क्या है कि मेरे जीवन में कभी युद्ध न आए। लेकिन यदि युद्ध आ ही जाए तो मेरी इच्छा होगी कि उसके साथ आने वाले घावों, भूख और अन्य सभी अनिवार्य कष्टों को मैं गरिमा और धैर्य के साथ सहन करूँ। मैं बीमार पड़ना नहीं चाहता। मैं इतना भी मूर्ख नहीं हूँ! किंतु यदि कभी रोगग्रस्त होना पड़े तो मेरी इच्छा होगी कि मेरा आचरण न तो असंयमपूर्ण हो और न ही कायरतापूर्ण। इसलिए वांछनीय स्वयं वे कष्ट नहीं हैं बल्कि वह सद्गुण है जिसके सहारे मनुष्य उन कष्टों को धैर्य, साहस और गरिमा के साथ सहन करता है।

    हमारे मत के कुछ अनुयायियों का कहना है कि ऐसे सभी कष्टों को साहसपूर्वक सहन करना, यद्यपि उनसे पूरी तरह बचना आवश्यक नहीं है। फिर भी वे स्वयं वांछनीय नहीं हैं। उनका तर्क है कि इच्छा और आकांक्षा का लक्ष्य केवल वही होना चाहिए जो पूर्णतः शुभ, शांत और हर प्रकार की व्याकुलता से परे हो। मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। क्यों? पहला कारण यह है कि कोई भी वस्तु शुभ हो और साथ ही वांछनीय न हो, यह संभव नहीं है। दूसरा, यदि सद्गुण वांछनीय है और सद्गुण के बिना कोई भी वस्तु शुभ नहीं है तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक शुभ वस्तु वांछनीय है। तीसरा, भले ही यातना स्वयं वांछनीय न हो परंतु यातना को साहसपूर्वक सहन करना निश्चय ही वांछनीय है।

    मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या साहस स्वयं वांछनीय नहीं है? किंतु साहस तो संकटों की परवाह नहीं करता बल्कि वह उनका सामना करने की चुनौती स्वीकार करता है। साहस का सबसे सुंदर और प्रशंसनीय रूप यही है कि वह अग्नि के सामने झुकने से इंकार करता है, घावों का सामना करने के लिए स्वयं आगे बढ़ता है और कभी-कभी तो तीरों से बचने का प्रयत्न भी नहीं करता बल्कि उन्हें अपनी छाती पर सह लेता है। यदि साहस वांछनीय है तो यातना को धैर्यपूर्वक सहन करना भी वांछनीय है क्योंकि वह साहस का ही एक अविभाज्य अंग है।

    जैसा कि मैंने कहा, यदि तुम इस भेद को समझ लोगे तो कोई भी बात तुम्हें भ्रमित नहीं करेगी। क्योंकि वांछनीय यातना भोगना नहीं है बल्कि उसे साहसपूर्वक सहन करना वांछनीय है। मेरी इच्छा तो यही है कि मैं हर परिस्थिति में साहस के साथ आचरण करूँ और यही सद्गुण है। 

    “लेकिन ऐसा कौन है जिसने अपने लिए कभी ऐसी इच्छा की हो?” कुछ इच्छाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त की जाती हैं क्योंकि वे किसी विशेष वस्तु या घटना से संबंधित होती हैं जबकि कुछ इच्छाएँ अप्रकट रहती हैं क्योंकि एक ही इच्छा के भीतर अनेक बातें समाहित होती हैं। उदाहरण के लिए, मैं अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना करता हूँ। किंतु सम्मानपूर्ण जीवन अनेक सम्मानजनक कर्मों से मिलकर बनता है। इस एक इच्छा के भीतर ही रेगुलस (Regulas) का यातना-पीड़ित बंदी जीवन, कैटो का अपने ही हाथों से अपने घाव को फिर से खोल देना, रुटिलियस का निर्वासन और वह विष का प्याला भी शामिल है जिसने सुकरात को कारागार से उठाकर अमर गौरव की ओर पहुँचा दिया। इस प्रकार, जब मैंने अपने लिए एक सम्मानपूर्ण जीवन की कामना की तो उसके साथ उन सभी परिस्थितियों को भी स्वीकार किया जिनके बिना कभी-कभी जीवन सम्मानपूर्ण नहीं बन सकता।

“वे तीन बार, चार बार धन्य हैं,
जिनके भाग्य में ट्रॉय की ऊँची प्राचीरों के नीचे,
अपने पिताओं की आँखों के सामने, वीरगति प्राप्त करना लिखा था।”

    क्या किसी व्यक्ति के लिए ऐसी मृत्यु की कामना करना और यह स्वीकार करना कि ऐसी मृत्यु वांछनीय है, इन दोनों में वास्तव में कोई अंतर है?

    डेसियस ने अपने देश के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। वह मृत्यु की खोज में अपने घोड़े को पूरी गति से शत्रु-सेना के बीच ले गया। उसके बाद एक अन्य डेसियस ने भी अपने पिता के सद्गुण का अनुसरण करते हुए वही पवित्र और अब प्रसिद्ध हो चुकी प्रतिज्ञा ली और युद्ध के सबसे भीषण संघर्ष में कूद पड़ा। उसकी एकमात्र चिंता यह थी कि उसका आत्मबलिदान शुभ और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो क्योंकि वह मानता था कि ऐसी श्रेष्ठ मृत्यु, जो सद्गुण के कार्य के साथ प्राप्त हो, मनुष्य की कामना के योग्य होती है। तो क्या अब भी तुम्हें संदेह है कि सद्गुण का कोई महान कार्य करते हुए ऐसी मृत्यु प्राप्त करना जो सदा स्मरणीय बनी रहे, मनुष्य के लिए सर्वोत्तम और वांछनीय है? 

    जब कोई व्यक्ति यातना को साहसपूर्वक सहन करता है, तब वह अपने भीतर के सभी सद्गुणों का प्रयोग करता है। संभव है कि उनमें से कोई एक सद्गुण सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई दे जैसे, धैर्य। फिर भी वहाँ साहस भी उपस्थित होता है क्योंकि धैर्य, दृढ़ता और सहनशीलता का आधार वही है। वहाँ बुद्धि भी होती है क्योंकि उसके बिना कोई भी कार्य सोच-समझकर नहीं किया जा सकता। वही बुद्धि मनुष्य को प्रेरित करती है कि जब किसी परिस्थिति से बच निकलना संभव न हो, तब उसे यथासंभव साहस और गरिमा के साथ सहन करे। वहाँ अडिगता भी होती है जो अपने स्थान से कभी नहीं हटती और जिस पर चाहे जितना भी दबाव डाला जाए, वह अपने संकल्प को नहीं छोड़ती। वास्तव में, उस समय सभी सद्गुणों का अविभाज्य समूह उपस्थित होता है। प्रत्येक सम्मानजनक कर्म भले ही किसी एक विशेष सद्गुण द्वारा किया हुआ प्रतीत हो किंतु वह वास्तव में सभी सद्गुणों के सामूहिक विवेक और परामर्श के अनुरूप संपन्न होता है। इसलिए जिस कर्म को सभी सद्गुण मिलकर स्वीकार और अनुमोदित करते हैं, वह चाहे देखने में किसी एक सद्गुण का कार्य ही क्यों न लगे, वह निस्संदेह वांछनीय है।

    तो फिर क्या? क्या तुम यह समझते हो कि केवल वही वस्तुएँ वांछनीय हैं जो सुख, आराम और ऐश्वर्य के साथ प्राप्त होती हैं जो भव्य भवनों के भीतर विलासपूर्ण जीवन के बीच मिलती हैं? नहीं, कुछ शुभ वस्तुओं का स्वरूप कठोर होता है। कुछ ऐसी भी कामनाएँ होती हैं जिनकी पूर्ति पर लोग बधाइयाँ नहीं देते बल्कि विस्मय, श्रद्धा और आदर के साथ उन्हें नमन करते हैं। क्या तुम्हें सचमुच लगता है कि रेगुलस ने कार्थेज लौटने का मार्ग अपनी इच्छा से नहीं चुना था? कुछ क्षणों के लिए अपने मन को एक महान व्यक्ति के मन के समान बना लो। सामान्य लोगों की धारणाओं से स्वयं को अलग कर लो। सद्गुण की ऐसी कल्पना करो जो उसके वास्तविक गौरव के अनुरूप हो, उस सद्गुण की जो अपने सर्वोच्च और सबसे भव्य रूप में प्रकट होता है। ऐसे सद्गुण की जिसकी पूजा धूप और पुष्पमालाओं से नहीं बल्कि पसीने और रक्त से की जानी चाहिए। मार्कस कैटो को देखो। वह अपने निष्कलंक हाथों को अपने ही पवित्र वक्ष पर उठाता है और उस घाव को जो पर्याप्त गहरा नहीं था, स्वयं और अधिक गहरा कर देता है। मुझे बताओ, क्या तुम उससे कहोगे, “हाय, कितना दुखद!” या “मुझे तुम्हारे लिए बहुत खेद है”? या फिर तुम यह कहोगे, “मैं तुम्हारे इस महान कर्म की प्रशंसा करता हूँ।”

    इस प्रसंग पर मुझे हमारे दार्शनिक दिमीत्रियस की बात याद आती है। वे उस जीवन को जो हर प्रकार की चिंता से मुक्त हो और जिस पर भाग्य का कोई आघात न हो, 'मृत सागर' कहा करते थे। पूर्ण निश्चिंतता में पड़े रहना, जहाँ न कोई चुनौती हो, न कोई लक्ष्य जिसकी ओर बढ़ना हो, न कोई बुराई जिसका विरोध करना हो, न कोई संघर्ष जिसमें अपने मन की दृढ़ता की परीक्षा हो, यह वास्तविक शांति नहीं है। यह तो मनुष्य की शक्ति का क्षीण हो जाना है। स्टोइक दार्शनिक अतालस कहा करते थे, “मैं यह अधिक पसंद करूँगा कि भाग्य मुझे अपने युद्ध-शिविर में रखे, न कि विलासिता के बीच। यदि मुझ पर यातनाएँ आएँ तो मैं उन्हें साहसपूर्वक सहूँ, यही उचित है। यदि मुझे मृत्यु मिले तो भी मैं उसका सामना साहस के साथ करूँ, यही उचित है।” एपिक्यूरस भी कहेगा, “यह सुखद है।” किंतु मैं ऐसे कठोर और गौरवपूर्ण कर्म को इतने कोमल शब्द ‘सुखद’ से कभी संबोधित नहीं करूँगा। यदि मैं अग्नि में जल रहा हूँ किंतु पराजित नहीं हुआ हूँ तो यह वांछनीय क्यों न हो? इसलिए नहीं कि अग्नि मुझे जलाती है बल्कि इसलिए कि वह मुझे परास्त नहीं कर पाती।

    सद्गुण से बढ़कर कोई वस्तु उत्कृष्ट नहीं है और उससे अधिक सुंदर भी कुछ नहीं। इसलिए जो कुछ भी सद्गुण की आज्ञा के अनुसार किया जाता है, वह केवल शुभ ही नहीं बल्कि वांछनीय भी होता है।

सद्गगुणों के संदर्भ में - पत्र - 66 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कई वर्षों के अंतराल के बाद आज मेरी मुलाकात क्लैरानस (Claranus) से हुई। वह मेरा सहपाठी रहा है। जैसा कि तुमने अब तक समझ ही लिया होगा, अब वह वृद्ध हो चुका है। लेकिन उसकी आत्मा आज भी युवा और उत्साह से भरी हुई है जबकि वह अपने दुर्बल और तुच्छ शरीर के साथ निरंतर संघर्ष कर रहा है। प्रकृति ने उसके जैसे महान मन को इतना कमजोर शरीर देकर मानो उसके साथ न्याय नहीं किया। या शायद प्रकृति का उद्देश्य ही यह दिखाना था कि बाहरी रूप चाहे जैसा भी हो, उसके भीतर अत्यंत साहसी और श्रेष्ठ आत्मा निवास कर सकती है। फिर भी उसने हर बाधा पर विजय प्राप्त कर ली है। अपने शरीर की चिंता न करके उसने यह सीख लिया है कि दूसरों की राय या उनके निर्णयों की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। मुझे लगता है कि कवि ने यह कहकर भूल की थी, 'सुंदर शरीर में होने पर सद्गुण और भी अधिक प्रशंसनीय हो जाता है।' वास्तव में सद्गुण को महान बनाने के लिए किसी बाहरी शोभा की आवश्यकता नहीं होती। वही स्वयं अपना सबसे बड़ा आभूषण है और जिस शरीर में वह निवास करता है, उसे भी पवित्र बना देता है।


Faith

    निश्चय ही अब मैं अपने मित्र क्लैरानस को एक नई दृष्टि से देखने लगा हूँ। वह मुझे अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है। उसकी आत्मा जितनी सीधी, दृढ़ और उदात्त है, उसका व्यक्तित्व भी उतना ही ऊँचा और गौरवपूर्ण लगता है। जैसे किसी साधारण झोंपड़ी से कोई महान व्यक्ति निकल सकता है, वैसे ही किसी साधारण और विकृत शरीर में भी एक महान और सुंदर मन निवास कर सकता है। मुझे लगता है कि प्रकृति ने कुछ लोगों को जान-बूझकर ऐसा बनाया है ताकि यह सिद्ध हो सके कि सद्गुण का जन्म किसी भी स्थान पर हो सकता है। यदि वह बिना शरीर के ही मन की रचना कर सकती तो शायद ऐसा ही करती। लेकिन उसने इससे भी श्रेष्ठ कार्य किया है। वह ऐसे लोगों को जन्म देती है जिनका शरीर उनकी राह में बाधा बनता है। फिर भी वे उन सभी बाधाओं को पार कर जाते हैं। मेरे विचार से क्लैरानस का जन्म ही इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हुआ था कि विकृत शरीर मन को कुरूप नहीं बना सकता बल्कि सुंदर मन ही शरीर को शोभायमान बना देता है। खैर, यद्यपि हम दोनों ने साथ बहुत कम दिन बिताए। फिर भी हमारे बीच अनेक वार्तालाप हुए। अब मैं उन्हें लिखकर तुम्हें भेजूँगा।

    पहले दिन हमारी चर्चा का विषय यह था कि यदि सभी अच्छे गुण या शुभ वस्तुएँ तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित हैं तो वे एक-दूसरे के समान कैसे हो सकती हैं? हमारे दर्शन का मत है कि कुछ शुभ वस्तुएँ सर्वोच्च श्रेणी की होती हैं जैसे, आनंद, मन की शांति और अपने देश की सुरक्षा। कुछ दूसरी श्रेणी की होती हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होती हैं जैसे, यातना सहते हुए धैर्य बनाए रखना या गंभीर बीमारी में आत्मसंयम रखना। पहली श्रेणी की वस्तुओं को हम बिना किसी शर्त के अपनाना चाहते हैं जबकि दूसरी श्रेणी की वस्तुओं को तभी स्वीकार करते हैं जब परिस्थितियाँ उन्हें आवश्यक बना दें। इसके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी भी है, जिसमें संयमित चाल, शांत और गरिमापूर्ण मुखमुद्रा तथा बुद्धिमान व्यक्ति के अनुरूप आचरण और हाव-भाव आते हैं। फिर प्रश्न यह उठता है कि जब इनमें से कुछ वस्तुएँ स्वाभाविक रूप से अपनाने योग्य हैं और कुछ ऐसी हैं जिनसे सामान्यतः बचना चाहिए तो वे सभी एक-दूसरे के समान कैसे कही जा सकती हैं?

Charity

    यदि हम इस प्रश्न का समाधान करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले परम शुभ की ओर लौटना चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।

वह मन, जो सत्य का दर्शन करता है, जो यह जानता है कि किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, जो वस्तुओं का मूल्य लोकमत के आधार पर नहीं बल्कि प्रकृति के अनुरूप निर्धारित करता है, जो स्वयं को समस्त ब्रह्मांड का अंग मानकर उसके प्रत्येक कार्य-व्यापार का चिंतन करता है, जो विचार और कर्म— दोनों पर समान रूप से ध्यान देता है, जो महान और शक्तिशाली है, जो न विपत्तियों से पराजित होता है और न ही समृद्धि के प्रलोभनों से मोहित, जो स्वयं को न किसी सुख के हवाले करता है और न किसी दुःख के बल्कि प्रत्येक संयोग और दुर्घटना से ऊपर उठ जाता है, जो सौंदर्य और शक्ति— दोनों से पूर्ण है, जो स्वस्थ, संयमी, शांत और निर्भय है, जिसे न कोई शक्ति वश में कर सकती है और न कोई आकस्मिक घटना उसे कभी ऊँचा उठा सकती है या गिरा सकती है, ऐसा ही मन सद्गुण है। जब सद्गुण एक साथ अपने संपूर्ण स्वरूप में प्रकट होता है, तब उसका रूप यही होता है। किंतु उसके अनेक रूप दिखाई देते हैं क्योंकि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति और प्रत्येक कर्म में वह अलग-अलग प्रकार से व्यक्त होता है। फिर भी स्वयं सद्गुण न कभी घटता है और न बढ़ता है। वह सदा अपने पूर्ण रूप में ही बना रहता है।

    परम शुभ न तो कभी घट सकता है और न ही सद्गुण अपने स्थान से पीछे हट सकता है। वह केवल परिस्थितियों के अनुसार अपना रूप बदलता है और जिस कार्य को करने जा रहा होता है, उसके अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है।जिस किसी वस्तु को वह स्पर्श करता है, उसे अपने ही स्वरूप और रंग में रंग देता है। वह कर्मों को, मित्रताओं को, और कभी-कभी पूरे परिवार को जिसमें वह प्रवेश कर उसे सुव्यवस्थित कर देता है, शोभायमान बना देता है। वह जिस किसी का भी स्पर्श करता है, उसे प्रिय, विशिष्ट और प्रशंसनीय बना देता है। उसकी शक्ति और उसकी महानता में अब कोई वृद्धि नहीं हो सकती क्योंकि जो सबसे महान है, उससे आगे कुछ नहीं बढ़ सकता। जैसे जो वस्तु सही है, उससे अधिक सही कुछ नहीं हो सकता। जो सत्य है, उससे अधिक सत्य कुछ नहीं हो सकता। जो संयमित है, उससे अधिक संयमित भी कुछ नहीं हो सकता। प्रत्येक सद्गुण अपनी पूर्ण सीमा पर स्थित होता है। प्रत्येक सीमा का एक निश्चित माप होता है। जैसे स्थिरता, आत्मविश्वास, सत्यनिष्ठा और निष्ठा अपनी पूर्णता से आगे नहीं बढ़ सकते, वैसे ही सद्गुण भी अपनी पूर्णता से आगे नहीं जा सकता। यदि कोई वस्तु पूर्ण है तो उसमें और क्या जोड़ा जा सकता है? कुछ भी नहीं। यदि उसमें कुछ जोड़ा जा सकता है तो इसका अर्थ है कि वह पहले पूर्ण नहीं थी। इसलिए सद्गुण में भी कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। यदि उसमें वृद्धि संभव हो तो इसका अर्थ होगा कि उसमें पहले कोई कमी थी।

    प्रत्येक शुभ वस्तु इन्हीं सिद्धांतों के अधीन होती है। व्यक्तिगत हित, सार्वजनिक हित से जुड़ा हुआ है। ठीक उसी प्रकार जैसे जो प्रशंसनीय है, उसे उस वस्तु से अलग नहीं किया जा सकता जिसका अनुसरण करना हमारा कर्तव्य है। इसी कारण सभी सद्गुण एक-दूसरे के समान हैं। इसी प्रकार सद्गुणपूर्ण कर्म और वे सभी व्यक्ति भी समान हैं जिनमें सद्गुण विद्यमान है। किन्तु पौधों और पशुओं के विषय में ऐसा नहीं है। चूँकि वे स्वयं नश्वर हैं इसलिए उनके गुण भी नष्ट हो जाने वाले, क्षणभंगुर और अनिश्चित होते हैं। वे कभी बढ़ते हैं, कभी घटते हैं इसलिए उनका मूल्य समान नहीं माना जाता। मानव के सद्गुण एक ही नियम के अधीन होते हैं क्योंकि सम्यक् विवेक स्वयं एक समान होता है। दिव्य से अधिक दिव्य कुछ नहीं होता और आकाशीय से अधिक आकाशीय भी कुछ नहीं होता।

    नश्वर वस्तुएँ कभी ऊपर उठती हैं और कभी नीचे गिरती हैं। कभी घटती हैं और कभी बढ़ती हैं। कभी रिक्त होती हैं और कभी भर जाती हैं। इसी कारण वे उतनी ही असमान होती हैं जितना कि उनका भाग्य अस्थिर होता है। किन्तु जो वस्तुएँ दिव्य हैं, उनका स्वभाव केवल एक ही होता है। सम्यक् बुद्धि तो दिव्य सत्ता का ही एक अंश है, जो मानव शरीर में समाहित है। यदि विवेक दिव्य है और विवेक के बिना कोई शुभ नहीं हो सकता तो प्रत्येक शुभ भी दिव्य है। फिर, जब दिव्य वस्तुओं में कोई भेद नहीं है तो शुभ वस्तुओं में भी कोई भेद नहीं हो सकता। इसलिए एक ओर आनंद और दूसरी ओर यातना को दृढ़तापूर्वक सहने की क्षमता— दोनों समान हैं क्योंकि दोनों में आत्मा की महानता समान रूप से विद्यमान है। अंतर केवल इतना है कि पहले में वह शांत और प्रसन्न होकर प्रकट होती है जबकि दूसरे में वह संकेंद्रित और संघर्षशील रूप में दिखाई देती है। ऐसा क्यों न माना जाए? क्या तुम्हें लगता है कि जो व्यक्ति शत्रु के दुर्ग पर साहसपूर्वक आक्रमण करता है, उसका साहस उस व्यक्ति के साहस के बराबर नहीं है, जो उसी आक्रमण को अद्भुत धैर्य के साथ सहता है? क्या तुम्हें लगता है कि स्किपियो की महानता जिसने नुमांशिया का घेराव किया और उन अजेय हाथों को स्वयं अपना विनाश करने के लिए विवश कर दिया। उन घिरे हुए लोगों की महानता के बराबर नहीं थी जो यह जानते थे कि जब तक मृत्यु का मार्ग खुला है, तब तक कोई वास्तव में घिरा हुआ नहीं होता क्योंकि वह स्वतंत्रता की गोद में प्राण त्याग सकता है?


Hope
Artist Italian Umbrian Painter 

    "तुम्हारा क्या अभिप्राय है? क्या आनंद और पीड़ा को अडिग होकर सहने में कोई अंतर नहीं है?" सद्गुणों की दृष्टि से तो कोई अंतर नहीं है। हाँ, उनके प्रकट होने के ढंग में अवश्य बहुत अंतर है। एक स्थिति में मन स्वाभाविक रूप से प्रसन्न, सहज और विस्तृत होता है जबकि दूसरी स्थिति में उसे पीड़ा का सामना करना पड़ता है, जो प्रकृति के प्रतिकूल है। इसी कारण ये परिस्थितियाँ जिनमें इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है, केवल मध्यवर्ती अवस्थाएँ हैं। किंतु उनमें विद्यमान सद्गुण समान रहता है। परिस्थितियाँ सद्गुण को नहीं बदलतीं। कठिन परिस्थितियाँ उसे कमतर नहीं बनातीं और सुखद एवं अनुकूल परिस्थितियाँ उसे अधिक श्रेष्ठ नहीं बनातीं। इसलिए दोनों में विद्यमान सद्गुण अनिवार्य रूप से समान है। क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में जो कुछ किया जाता है, वह समान रूप से उचित, समान रूप से बुद्धिमत्तापूर्ण और समान रूप से सम्माननीय होता है इसलिए उनसे प्राप्त शुभ भी समान हैं। न तो आनंद की स्थिति में कोई व्यक्ति इससे अधिक उत्तम आचरण कर सकता है और न ही यातना की स्थिति में दूसरा व्यक्ति। और जो दो वस्तुएँ किसी भी प्रकार से और अधिक श्रेष्ठ नहीं बनाई जा सकतीं, वे एक-दूसरे के समान ही होती हैं। इसी प्रकार अन्य सभी शुभ गुण भी एक-दूसरे के समान हैं जैसे, मन की शांति, स्पष्टवादिता, उदारता, दृढ़ता, प्रसन्नचित्त शांति और धैर्य। क्योंकि इन सभी का आधार एक ही है— सद्गुण, जो मनुष्य को सीधा, अडिग और अचल मन प्रदान करता है।

    यदि सद्गुण के बाहर की वस्तुएँ उसे घटा या बढ़ा सकती हैं तो सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही एकमात्र शुभ नहीं रह जाता। यदि तुम यह मान लेते हो तो सम्माननीय का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। ऐसा क्यों? मैं बताता हूँ। कोई भी कर्म तब सम्माननीय नहीं हो सकता जब वह अनिच्छा से या किसी दबाव में किया जाए। जो कुछ भी सम्माननीय है, वह स्वेच्छा से किया जाता है। यदि उसमें अनिच्छा, शिकायत, पश्चाताप, संकोच या भय का कोई भी अंश मिला दिया जाए तो वह अपना सबसे बड़ा गुण खो देता है। वह अब स्वयं की स्वतंत्र इच्छा से किया गया कर्म नहीं रह जाता। भय दासता का सूचक है। जो स्वतंत्र नहीं है, वह सम्माननीय भी नहीं हो सकता। जो कुछ भी सम्माननीय है, वह चिंता से मुक्त और शांत होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य से कतराता है, उसकी शिकायत करता है या उसे बुरा समझता है तो उसका मन विचलित हो जाता है और वह गहरे आंतरिक संघर्ष में पड़ जाता है। एक ओर नैतिकता उसे पुकारती है और सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, दूसरी ओर संभावित हानि का भय उसे पीछे हटने के लिए उकसाता है।

    मैं जानता हूँ कि इस पर कोई यह आपत्ति कर सकता है, "क्या तुम हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हो कि आनंद का अनुभव करने और यातना-चक्र पर बँधे रहकर तब तक पीड़ा सहने में, जब तक यातना देने वाला ही थक न जाए, कोई अंतर नहीं है?" 

    इसके उत्तर में मैं यह कह सकता था, एपिक्यूरस भी कहता है कि यदि कोई ज्ञानी फालारिस के पीतल के बैल (प्राचीन यातना देने की प्रथा) में जीवित भून दिया जाए, तब भी वह कहेगा, यह सुखद है। इससे मुझे तनिक भी कष्ट नहीं है। फिर यदि मैं यह कहता हूँ कि भोज पर आराम से बैठे व्यक्ति और यातना सहते हुए अडिग खड़े व्यक्ति— दोनों के शुभ समान हैं तो इसमें तुम्हें आश्चर्य क्यों होता है। जबकि स्वयं एपिक्यूरस तो इससे भी अधिक अविश्वसनीय बात कहता है कि यातना सहना भी सुखद होता है?

    किन्तु मैं इसका उत्तर इस प्रकार देता हूँ। "निस्संदेह आनंद और पीड़ा में बहुत बड़ा अंतर है। यदि मुझे इनमें से किसी एक को चुनना हो तो मैं आनंद को ग्रहण करूँगा और पीड़ा से बचूँगा क्योंकि एक प्रकृति के अनुकूल है और दूसरा उसके प्रतिकूल। जब तक उनका मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है, तब तक दोनों में बहुत अधिक अंतर है। किन्तु जहाँ सद्गुण का प्रश्न है, वहाँ दोनों समान हैं; एक ही सद्गुण अनुकूल परिस्थितियों में प्रकट होता है और वही सद्गुण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना स्वरूप बनाए रखता है। क्लेश, पीड़ा और जो कुछ भी कष्टदायक है, उसका अपने आप में कोई महत्व नहीं है; क्योंकि सद्गुण उन सब पर विजय प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रखर प्रकाश हमारे छोटे-छोटे दीपकों की ज्योति को फीका कर देता है, उसी प्रकार सद्गुण की महानता सभी पीड़ाओं, कष्टों और दुखों को ढँक देती है। जहाँ कहीं भी सद्गुण अपना प्रकाश बिखेरता है, वहाँ उसके अभाव में जो कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता था, वह सब उसके तेज के सामने लुप्त हो जाता है। जब हमारे दुःख, कष्ट और असुविधाएँ सद्गुण के संपर्क में आती हैं तो उनका प्रभाव उतना ही नगण्य रह जाता है, जितना महासागर में गिरने वाली वर्षा की कुछ बूँदों का।

    इसी से तुम जान सकते हो कि यह बात सत्य है। यदि कोई कर्म श्रेष्ठ और सम्माननीय है तो एक सज्जन व्यक्ति उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करेगा। चाहे उसके सामने जल्लाद खड़ा हो, यातना देने वाला हो या अग्नि प्रज्वलित हो, फिर भी वह अपने संकल्प पर अडिग रहेगा। उसकी दृष्टि इस पर नहीं होगी कि उसे क्या सहना पड़ेगा बल्कि इस पर होगी कि उसे क्या करना है। वह उस सम्माननीय कर्म पर उसी प्रकार विश्वास करेगा जैसे किसी श्रेष्ठ व्यक्ति पर करता है। उसे अपने लिए उपयोगी, सुरक्षित तथा लाभकारी समझेगा। जो कर्म सम्माननीय है, चाहे वह कितना ही कठोर और कष्टसाध्य क्यों न हो, उसका स्थान उसकी दृष्टि में वैसा ही होगा जैसा किसी अच्छे मनुष्य का, चाहे वह निर्धन हो, निर्वासित हो, या दुर्बल और पीला दिखाई देता हो। 

    अब मान लो कि एक ओर एक श्रेष्ठ मनुष्य है जिसके पास अपार धन-संपत्ति है, और दूसरी ओर एक ऐसा श्रेष्ठ मनुष्य है जिसके पास स्वयं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है किन्तु अपने भीतर ही वह सब कुछ रखता है। दोनों समान रूप से श्रेष्ठ हैं, यद्यपि भाग्य ने उन्हें बिल्कुल भिन्न परिस्थितियाँ प्रदान की हैं। मैं फिर कहता हूँ, जिस प्रकार हम व्यक्तियों का मूल्यांकन करते हैं, ठीक उसी प्रकार उनकी परिस्थितियों का भी मूल्यांकन करना चाहिए।

    सद्गुण उतना ही प्रशंसनीय होता है जब वह किसी स्वस्थ और स्वतंत्र शरीर में पाया जाता है, जितना कि तब जब वह किसी रोगग्रस्त और बेड़ियों में जकड़े हुए शरीर में विद्यमान हो। इसलिए यदि भाग्य ने तुम्हारे सद्गुण को एक स्वस्थ और पूर्ण शरीर प्रदान किया है तो उसके कारण उसे अधिक मूल्यवान मत समझो, जितना कि तब समझते यदि उसका शरीर किसी प्रकार से विकृत होता। ऐसा करना वैसा ही होगा जैसे किसी स्वामी का मूल्य उसके दासों के वस्त्रों के आधार पर आँकना। क्योंकि ये सभी वस्तुएँ, जो भाग्य के अधीन हैं। धन, शरीर और यश— सिर्फ सेवक हैं। वे दुर्बल, क्षणभंगुर, नश्वर और अस्थिर हैं; उनका स्वामित्व कभी स्थायी नहीं रहता। इसके विपरीत, सद्गुण के कार्य स्वतंत्र और अजेय होते हैं। वे इस कारण अधिक वरणीय नहीं हो जाते कि भाग्य उनके प्रति अनुकूल है। न ही इस कारण कम वरणीय हो जाते हैं कि परिस्थितियाँ उनके प्रतिकूल हैं।

    जीवन की परिस्थितियों में चयन का वही स्थान है, जो मनुष्यों के बीच मित्रता का होता है। यदि तुम्हारा मित्र एक श्रेष्ठ व्यक्ति है तो क्या तुम उसे इस कारण अधिक प्रेम करोगे कि वह निर्धन होने के बजाय धनी है या इसलिए कि उसका शरीर दुर्बल और कृश होने के बजाय बलवान और सुदृढ़ है? निश्चय ही नहीं। ठीक उसी प्रकार, अपनी जीवन-परिस्थितियों में भी तुम किसी अवस्था को केवल इसलिए अधिक नहीं अपनाओगे या उससे अधिक प्रेम नहीं करोगे कि वह सुखद और शांतिपूर्ण है, बजाय उस अवस्था के जो चिंताओं और कठिन परिश्रम से भरी हुई है। यदि तुम ऐसा करते हो तो फिर दो समान रूप से श्रेष्ठ व्यक्तियों में भी तुम उस व्यक्ति को अधिक प्रिय मानोगे जिसने अभी-अभी स्नान किया हो और शरीर पर तेल-मालिश करवाई हो, बजाय उस व्यक्ति के जो धूल से लथपथ हो और जिसे दाढ़ी बनाने की आवश्यकता हो। फिर धीरे-धीरे तुम यहाँ तक पहुँच जाओगे कि जिस व्यक्ति का शरीर पूर्णतः स्वस्थ और अक्षुण्ण हो, उससे उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक स्नेह करोगे जो लँगड़ा हो या जिसकी एक आँख न हो।अंततः तुम्हारी रुचि इतनी नखरे वाली हो जाएगी कि दो समान रूप से सम्माननीय और बुद्धिमान व्यक्तियों में भी तुम उसी को चुनोगे जिसके लंबे और घुँघराले बाल हों! किन्तु जब दोनों में सद्गुण समान है, तब अन्य बातों की असमानता का कोई महत्व नहीं रह जाता। क्योंकि वे अन्य सभी विशेषताएँ उनके वास्तविक व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं हैं बल्कि केवल बाहरी और आकस्मिक जोड़ हैं।

    क्या किसी परिवार में कोई माता या पिता इतना अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है कि वह स्वस्थ संतान को बीमार संतान की अपेक्षा अधिक प्रेम करे या लंबे और सुंदर पुत्र को छोटे या सामान्य कद वाले पुत्र से अधिक स्नेह दे? जंगली पशु भी अपने बच्चों में ऐसा भेद नहीं करते। जब वे उन्हें दूध पिलाने के लिए लेटते हैं तो सभी शावकों को समान रूप से दूध पिलाते हैं। पक्षी भी अपने घोंसले के सभी बच्चों में भोजन समान रूप से बाँटते हैं। जिस प्रकार ओडीसियस अपनी पथरीली और साधारण इथाका लौटने के लिए उतना ही उत्सुक है, जितना अगामेम्नोन अपनी भव्य मायसीनी की विशाल प्राचीरों के पास लौटने के लिए। कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभूमि से इसलिए प्रेम नहीं करता कि वह महान या समृद्ध है। वह उससे केवल इसलिए प्रेम करता है क्योंकि वह उसकी अपनी मातृभूमि है।

    इन उपमाओं का उद्देश्य क्या है? यह दिखाना कि सद्गुण अपनी सभी कृतियों को अपनी ही संतान के समान निष्पक्ष दृष्टि से देखता है और उन सब पर समान रूप से अपना स्नेह रखता है। हाँ, यदि कोई अंतर होता भी है तो वह यह कि जो कर्म अधिक कठिनाइयों और संकटों में पड़े होते हैं, उनकी ओर उसका ध्यान और भी अधिक होता है। जिस प्रकार माता-पिता का स्नेह उस संतान की ओर कुछ अधिक झुक जाता है जो दया और सहारे की अधिक आवश्यकता रखती है, उसी प्रकार सद्गुण भी अपने उन कर्मों से अधिक प्रेम नहीं करता जो संकट या कष्ट में दिखाई देते हैं बल्कि एक अच्छे माता-पिता की तरह उन पर अधिक ध्यान देता है और उनका अधिक पालन-पोषण करता है।

    एक शुभ दूसरे शुभ से बड़ा क्यों नहीं होता? क्योंकि जो वस्तु उचित है, उससे अधिक उचित कुछ नहीं हो सकता। जो समतल है, उससे अधिक समतल भी कुछ नहीं हो सकता। जब दो वस्तुएँ समान हों, तब यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से कोई एक दूसरी से अधिक समान है। इसी प्रकार, जो सम्माननीय है, उससे अधिक सम्माननीय भी कुछ नहीं हो सकता। यदि सभी सद्गुणों का स्वभाव समान है तो शुभ की तीनों श्रेणियाँ भी समान हैं। मेरा आशय यह है कि संयमपूर्वक आनंदित होना और संयमपूर्वक दुःख सहना— दोनों समान हैं। वहाँ का हर्ष यहाँ की उस दृढ़चित्तता से बढ़कर नहीं है, जो यातना देने वाले के सामने भी अपनी पीड़ा की चीखों को रोक लेती है। वे शुभ वरणीय हैं और ये प्रशंसनीय। फिर भी दोनों समान हैं क्योंकि श्रेष्ठ शुभ की शक्ति इतनी पर्याप्त होती है कि वह उससे जुड़ी किसी भी असुविधा का सामना कर सकती है। जो व्यक्ति इन्हें असमान समझता है, वह स्वयं सद्गुणों से अपनी दृष्टि हटाकर बाहरी वस्तुओं की ओर देखने लगता है। वास्तविक शुभों का भार भी समान होता है और उनका महत्व भी समान होता है। झूठे शुभ भीतर से प्रायः खोखले होते हैं। वे देखने में बड़े और आकर्षक प्रतीत होते हैं किन्तु जब उन्हें तराजू पर तौला जाता है, तब उनका छल प्रकट हो जाता है। इसलिए, प्रिय लूसीलियस, जिस वस्तु की प्रशंसा युक्तिसंगत विवेक करता है, वही दृढ़ और स्थायी होती है। वह मन को सुदृढ़ बनाती है और उसे ऊँचाइयों तक उठाती है, जहाँ वह सदा के लिए स्थित रहता है। इसके विपरीत, जिन वस्तुओं की बिना उचित कारण के प्रशंसा की जाती है और जिन्हें केवल जनसामान्य शुभ मानते हैं, वे हमें केवल व्यर्थ के गर्व से भर देती हैं और तुच्छ वस्तुओं में आनंद लेने के लिए प्रेरित करती हैं। इसी प्रकार, जिन वस्तुओं को लोग अनिष्ट समझकर उनसे भयभीत होते हैं, वे भी हमारे मन को उसी प्रकार आतंकित करती हैं, जैसे पशु केवल भयावह दिखाई देकर लोगों को डरा देते हैं। अतः दोनों ही स्थितियों में हमारा मन बिना किसी उचित कारण के प्रभावित होता है। पहली स्थिति में वह व्यर्थ ही फूल जाता है और दूसरी स्थिति में व्यर्थ ही चिंता और भय से ग्रस्त हो जाता है। न पहली प्रकार की वस्तुएँ वास्तव में आनंद के योग्य हैं और न दूसरी प्रकार की भय के।

    केवल विवेक ही अपने निर्णय में अपरिवर्तनीय और अडिग रहता है क्योंकि वह इंद्रियों का दास नहीं बल्कि उनका स्वामी होता है। जैसे एक सही विवेक दूसरे सही विवेक के समान होता है, वैसे ही एक सही बात दूसरी सही बात के समान होती है। इसलिए सद्गुण भी सद्गुण के समान होता है क्योंकि सद्गुण और कुछ नहीं बल्कि सम्यक् विवेक ही है। सभी सद्गुण विवेक की कार्यप्रणालियाँ हैं। यदि वे सम्यक् हैं तो वे विवेक की कार्यप्रणालियाँ हैं। यदि वे सम्यक् हैं तो वे एक-दूसरे के समान भी हैं। जैसा विवेक होता है, वैसे ही विवेक से उत्पन्न कर्म भी होते हैं इसलिए वे भी सभी समान हैं। क्योंकि वे विवेक के अनुरूप होते हैं इसलिए वे एक-दूसरे के भी अनुरूप और समान होते हैं।

    मेरा कहना यह है कि कर्म एक-दूसरे के समान हैं, जहाँ तक वे सम्माननीय और उचित हैं। फिर भी उनके बीच उनके विषय या परिस्थितियों के कारण बड़े अंतर हो सकते हैं। किसी कर्म का क्षेत्र कभी व्यापक होता है, कभी सीमित, कभी वह उच्च पद या प्रतिष्ठा से संबंधित होता है तो कभी साधारण होता है। कभी उसका संबंध बहुत-से लोगों से होता है, तो कभी केवल कुछ ही लोगों से। फिर भी इन सभी कर्मों में जो सर्वोत्तम तत्व है, वह समान है क्योंकि वे सभी सम्माननीय हैं। ठीक यही बात श्रेष्ठ मनुष्यों पर भी लागू होती है। जहाँ तक उनके श्रेष्ठ होने का प्रश्न है, वे सभी समान हैं। किन्तु उनमें आयु का अंतर हो सकता है। कोई बड़ा है, कोई छोटा। शरीर का अंतर हो सकता है। कोई सुंदर है, कोई कुरूप भाग्य का भी अंतर हो सकता है। कोई धनी है, कोई निर्धन, कोई प्रभावशाली, सामर्थ्यवान और नगरों तथा जनसमुदायों में प्रसिद्ध है जबकि दूसरा सामान्यतः अपरिचित और गुमनाम है। फिर भी जहाँ तक उनकी श्रेष्ठता का संबंध है, वे सभी समान हैं।

    इंद्रियाँ शुभ और अशुभ के विषय में कोई निर्णय नहीं करतीं। वे यह नहीं जानतीं कि क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी। जब तक कोई वस्तु उनके सामने उपस्थित न हो, वे उसके विषय में कोई मत नहीं बना सकतीं। उनमें न भविष्य को पहले से देखने की क्षमता होती है और न अतीत को स्मरण रखने की। वे तर्कसंगत संबंधों को भी नहीं समझतीं। जबकि यही तर्कसंगत संबंध समय की संपूर्ण श्रृंखला को और उस जीवन की एकता को, जिसे सीधे मार्ग पर चलना है, परस्पर जोड़ते हैं। इसलिए शुभ और अशुभ का निर्णय करने वाला विवेक है। विवेक उन सभी वस्तुओं को, जो बाहरी हैं और उसकी अपनी नहीं हैं, तुच्छ समझता है। उसके विचार में जो वस्तुएँ न शुभ हैं और न अशुभ, वे अत्यंत छोटी और नगण्य बाहरी जोड़ मात्र हैं क्योंकि विवेक की दृष्टि में प्रत्येक वास्तविक शुभ मन के भीतर ही स्थित होता है। किन्तु विवेक कुछ शुभों को प्रधान मानता है, जिनकी ओर वह जान-बूझकर अग्रसर होता है जैसे, विजय, योग्य संतान और मातृभूमि का कल्याण। कुछ शुभ द्वितीय श्रेणी के हैं, जो केवल प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होते हैं जैसे, रोग, अग्नि या निर्वासन को समभाव से सहना। कुछ अन्य मध्यवर्ती हैं, जो न प्रकृति के अधिक अनुकूल हैं और न उसके प्रतिकूल जैसे, विवेकपूर्ण ढंग से चलना या शांत भाव से बैठना। क्योंकि बैठना प्रकृति के अधिक अनुकूल नहीं है, जितना कि खड़ा होना या चलना। शुभ की पहली दो श्रेणियाँ एक-दूसरे से भिन्न हैं। पहली श्रेणी के शुभ प्रकृति के अनुकूल होते हैं, जैसे अपनी संतान की भक्ति और स्नेह से आनंदित होना या अपनी मातृभूमि की सुरक्षा से प्रसन्न होना। दूसरी श्रेणी के शुभ प्रकृति के प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रकट होते हैं जैसे, यातना के सामने साहसपूर्वक अडिग रहना और रोग से शरीर के भीतर के अंग सूख जाने पर भी प्यास को धैर्यपूर्वक सहना।

    "यह क्या? क्या प्रकृति के प्रतिकूल कोई वस्तु भी शुभ हो सकती है?" नहीं, किन्तु कभी-कभी वह परिस्थिति जिसमें शुभ प्रकट होता है, प्रकृति के प्रतिकूल होती है। घायल होना, धीमी आग पर जलाया जाना या रोग से पीड़ित होना, ये सभी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। किन्तु ऐसी विपत्तियों के बीच भी अटूट और अडिग मनोबल बनाए रखना प्रकृति के अनुकूल है। संक्षेप में कहें तो, शुभ जिस परिस्थिति में प्रकट होता है, वह कभी-कभी प्रकृति के प्रतिकूल हो सकती है। परन्तु स्वयं शुभ कभी भी प्रकृति के प्रतिकूल नहीं होता क्योंकि विवेक के बिना कोई शुभ नहीं है। विवेक सदैव प्रकृति का अनुसरण करता है।

    तो फिर विवेक क्या है? वह प्रकृति का अनुकरण है। मनुष्य का परम शुभ क्या है? वही आचरण करना जैसा, प्रकृति ने उसके लिए निर्धारित किया है।

    "इसमें कोई संदेह नहीं कि वह शांति, जिसे कभी संघर्ष का सामना ही न करना पड़ा हो, उस शांति की अपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली है जो बहुत अधिक रक्तपात के बाद प्राप्त हुई हो। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि वह स्वास्थ्य, जो कभी बाधित न हुआ हो, उस स्वास्थ्य की अपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली है जो गंभीर और प्राणघातक रोगों से संघर्ष तथा धैर्य के बल पर पुनः प्राप्त किया गया हो। उसी प्रकार, इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आनंद उस मन की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ शुभ है, जो घावों और अग्नि की यातनाओं को सहने के लिए स्वयं को दृढ़ बनाए रखता है।" नहीं। क्योंकि ये सब आकस्मिक परिस्थितियाँ हैं जिनमें बहुत अधिक भिन्नता हो सकती है। उनका मूल्यांकन उन लोगों के लिए उनकी उपयोगिता के आधार पर किया जाता है जो उनका सामना करते हैं। परंतु उन सभी में जो शुभ विद्यमान है, वह प्रकृति के अनुरूप रहने का दृढ़ संकल्प है, और यह सभी में समान होता है। जब हम सीनेट में किसी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह नहीं कहा जा सकता कि एक सीनेटर दूसरे की अपेक्षा अधिक सहमत था। सभी ने समान रूप से समर्थन किया। मैं सद्गुणों के विषय में भी यही कहता हूँ। वे सभी प्रकृति के अनुरूप हैं। और शुभों के विषय में भी यही कहता हूँ। वे सभी प्रकृति के अनुकूल हैं। एक व्यक्ति युवावस्था में मर जाता है, दूसरा वृद्धावस्था में और तीसरा जन्म लेते ही, जीवन की केवल एक झलक देखकर। फिर भी वे सभी समान रूप से नश्वर थे, चाहे मृत्यु ने किसी को अधिक समय तक जीने दिया हो, किसी को युवावस्था में ही रोक दिया हो और किसी के जीवन का आरंभ ही समाप्त कर दिया हो।

    एक व्यक्ति भोजन करते-करते ही गिरकर मर जाता है। दूसरा नींद से फिर कभी नहीं जागता और तीसरे की मृत्यु संभोग के समय हो जाती है। अब इनकी तुलना उन लोगों से करो जो तलवार से मारे जाते हैं, साँप के डसने से प्राण खो देते हैं, भवन के गिरने से दबकर मर जाते हैं या जिनकी नसों को धीरे-धीरे मरोड़कर और कसकर उन्हें यातनापूर्वक मृत्यु के घाट उतार दिया जाता है। इनमें से कुछ की मृत्यु को अपेक्षाकृत बेहतर और कुछ की मृत्यु को अधिक कष्टदायक कहा जा सकता है। किन्तु वास्तव में उनकी मृत्यु समान है। उन्होंने मृत्यु तक पहुँचने का मार्ग भिन्न-भिन्न प्रकार से तय किया, पर जहाँ वे पहुँचे, वह एक ही स्थान था। कोई मृत्यु बड़ी या छोटी नहीं होती क्योंकि हर मृत्यु की एक ही सीमा होती है— जीवन का अंत। मैं शुभों के विषय में भी तुमसे यही कहता हूँ। एक शुभ पूर्णतः सुखद परिस्थितियों के बीच प्राप्त होता है। दूसरा कटु एवं कष्टपूर्ण परीक्षाओं के बीच। एक को भाग्य की उदारता का संयमपूर्वक उपयोग करना पड़ता है जबकि दूसरे को भाग्य की कठोरता पर विजय पानी पड़ती है। फिर भी दोनों समान रूप से शुभ हैं, यद्यपि एक ने समतल और सुगम मार्ग पर यात्रा की है और दूसरे ने पथरीले तथा कठिन मार्ग पर। क्योंकि उन सबका लक्ष्य एक ही है—वे शुभ हैं, प्रशंसनीय हैं और सद्गुण तथा विवेक के सहचर हैं। सद्गुण उन सभी वस्तुओं को जिन्हें वह शुभ के रूप में पहचानता है, समान मानता है।

    तुम्हें हमारे इस सिद्धांत पर आश्चर्य क्यों होना चाहिए? एपिक्यूरस के दर्शन में भी दो शुभ हैं जो उसके अनुसार परम और सर्वाधिक सुखमय जीवन के आधार हैं— एक, शरीर पीड़ा से मुक्त हो। दूसरा, मन अशांति से मुक्त हो। जब ये दोनों पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाते हैं, तब इनमें कोई वृद्धि नहीं हो सकती। जो पहले ही पूर्ण है, उसमें और क्या बढ़ाया जा सकता है? यदि शरीर पीड़ा से मुक्त है तो इस पीड़ारहित अवस्था में और क्या जोड़ा जा सकता है? यदि मन स्वयं से संतुष्ट और शांत है तो उस शांति में और क्या वृद्धि हो सकती है? जिस प्रकार निर्मल और बादलरहित आकाश, जो एक छोर से दूसरे छोर तक स्वच्छ प्रकाश से भरा हो, उससे अधिक निर्मल नहीं हो सकता, उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति अपने शरीर और मन— दोनों की समुचित देखभाल करता है और इन्हीं दोनों के आधार पर अपना कल्याण निर्मित करता है, तब उसकी अवस्था पूर्ण हो जाती है। यदि उसके मन में कोई अशांति नहीं है और उसके शरीर में कोई पीड़ा नहीं है तो उसकी इच्छा पूरी तरह पूर्ण हो चुकी है। इसके बाद यदि उसे और भी सुखद अनुभव प्राप्त हों तो वे उसके परम शुभ में कोई वृद्धि नहीं करते। वे केवल मानो उसमें थोड़ा-सा रस और माधुर्य जोड़ देते हैं।

    मैं तुम्हें एपिक्यूरस के यहाँ शुभों का एक ऐसा विभाजन दिखाऊँगा जो हमारे इस विभाजन से बहुत मिलता-जुलता है। उसकी रचनाओं में कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं जिन्हें वह अपने लिए घटित होते देखना चाहता है जैसे, शरीर को प्रत्येक प्रकार की पीड़ा से मुक्त विश्राम मिलना और मन का अपने ही शुभों का चिंतन करते हुए आनंदपूर्वक शांत रहना। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी अवस्थाएँ भी हैं जिन्हें वह अपने ऊपर आना तो नहीं चाहता किन्तु यदि वे आ जाएँ तो भी उनकी प्रशंसा करता है और उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है। इनमें वही बातें आती हैं जिनका मैंने अभी कुछ पहले उल्लेख किया था— रोग और अत्यंत तीव्र पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहना। ऐसा अनुभव स्वयं एपिक्यूरस ने अपने जीवन के 'अंतिम और परम धन्य दिन' में किया था। उसने लिखा कि मूत्राशय की पीड़ा और पेट के घावों से उसे ऐसी यातनाएँ हो रही थीं जिनमें पीड़ा की और कोई वृद्धि संभव नहीं थी। फिर भी वह दिन उसके लिए 'धन्य' था। किन्तु कोई व्यक्ति उस दिन को धन्य नहीं कह सकता, जब तक कि वह परम शुभ का अधिकारी न हो। इस प्रकार, स्वयं एपिक्यूरस के दर्शन में भी ऐसे शुभ हैं जिन्हें मनुष्य सामान्यतः अपने जीवन में नहीं चाहता। किन्तु यदि वे आ जाएँ तो उन्हें स्वीकार करना चाहिए, उनकी प्रशंसा करनी चाहिए और उन्हें सर्वोत्तम शुभों के समान मानना चाहिए। यह स्वीकार करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा शुभ भी महानतम शुभों के समान था क्योंकि उसी ने एपिक्यूरस के धन्य जीवन का समापन किया और उसी के लिए उसने अपने अंतिम श्वास तक कृतज्ञता व्यक्त की। क्योंकि मनुष्य-स्वभाव का परम शुभ शरीर और मन— दोनों की शांति तक ही सीमित है।

    प्रिय लूसीलियस, मुझे इससे भी अधिक साहसपूर्ण बात कहने की अनुमति दो। यदि वास्तव में कुछ शुभ अन्य शुभों से बड़े हो सकते तो मैं सुखद और विलासपूर्ण शुभों की अपेक्षा उन कठोर और कठिन शुभों को अधिक महत्व देता। क्योंकि कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना, सुख-सुविधाओं पर नियंत्रण रखने से अधिक महान है। निस्संदेह, जिस कारण कोई व्यक्ति समृद्धि का उचित ढंग से उपयोग करता है, उसी कारण वह विपत्ति का भी साहसपूर्वक सामना करता है। जो सैनिक शत्रु के आक्रमण न होने के कारण शिविर के बाहर निश्चिंत होकर विश्राम कर रहा है, वह भी उतना ही साहसी हो सकता है जितना वह सैनिक, जिसकी जाँघ की नसें कट जाने पर भी वह घुटनों के बल सीधा खड़ा रहता है और अपने हथियार हाथ से नहीं गिरने देता। फिर भी 'शाबाश, वीरों!' का जयघोष तो उन्हीं के लिए सुनाई देता है जो युद्धभूमि से रक्तरंजित होकर लौटते हैं। इसलिए यदि मुझे किसी शुभ की विशेष प्रशंसा करनी हो, तो मैं उन्हीं शुभों की प्रशंसा करूँगा, जो साहस से भरे हों, जो कठिन परीक्षाओं में परखे गए हों और जिन्होंने भाग्य की प्रतिकूलताओं से संघर्ष करके विजय प्राप्त की हो।

    क्या मैं म्यूशियस (Mucias) के उस झुलसे हुए और विकलांग हाथ की प्रशंसा किसी दूसरे साहसी व्यक्ति के अक्षत हाथ से अधिक करने में संकोच करूँगा? वह शत्रुओं से घिरा खड़ा था, चारों ओर अग्नि जल रही थी। फिर भी उसने उनकी तनिक भी परवाह नहीं की। वह अपने ही हाथ को शत्रु की अग्नि पर धीरे-धीरे जलते हुए देखता रहा, यहाँ तक कि पोर्सेना (Porsenna) जिसके दंड को वह स्वयं अपनी अडिगता से अर्थहीन बना रहा था, उसकी कीर्ति से ईर्ष्या करने लगा और उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध आग हटाने का आदेश दे दिया। मैं इस घटना को प्रमुख शुभों में क्यों न गिनूँ? मैं इसे उन निश्चिंत और भाग्य की किसी परीक्षा से न गुज़रे शुभों से अधिक महान क्यों न मानूँ? क्योंकि बिना हाथ के शत्रु पर विजय प्राप्त करना, हाथ में तलवार लेकर विजय पाने की अपेक्षा जितना अधिक दुर्लभ है, उतना ही अधिक महान भी है।

    "क्या कहा?" तुम पूछते हो। "क्या तुम स्वयं अपने लिए ऐसे शुभ का चयन करोगे?" क्यों नहीं? यदि ऐसे कर्म का चयन ही नहीं किया जा सकता। हाँ, यदि उसे सचमुच चुनना ही संभव न हो तो फिर उसे किया भी नहीं जा सकता। तो क्या मैं इसके बजाय यह चुनूँ कि अपने हाथ किसी दास-प्रिय (कैटामाइट) से अपनी उँगलियों के जोड़ दबवाने के लिए बढ़ाऊँ या किसी गणिका, अथवा वेश्यावृत्ति करने वाले पुरुष से अपनी उँगलियों का स्पर्श और मालिश करवाऊँ? मैं म्यूशियस को अधिक सौभाग्यशाली क्यों न मानूँ? उसने अपना हाथ अग्नि को छूने के लिए उसी सहजता से आगे बढ़ाया जैसे, कोई व्यक्ति मालिश कराने के लिए अपना हाथ बढ़ाता है। उसने अपनी भूल का प्रायश्चित कर लिया; निःशस्त्र और एक हाथ से विकलांग हो जाने पर भी उसने अपना युद्ध जीत लिया। अपने उसी झुलसे और विकृत हाथ के बल पर उसने दो राजाओं पर विजय प्राप्त की।


अभी के लिए विदा 

Wednesday, 15 July 2026

ईश्वर, तत्व एवं रचना के संदर्भ में -- पत्र - 65 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 


कल मैंने अपना दिन बीमारी के साथ बिताया। उसने सुबह का समय पूरी तरह अपने अधिकार में रखा। लेकिन दोपहर मुझे लौटा दी। सबसे पहले मैंने थोड़ा-सा पढ़कर अपनी श्वास-शक्ति की परीक्षा ली। जब वह उसके योग्य सिद्ध हुई, तब मैंने उससे कुछ अधिक काम लिया या यूँ कहूँ कि उसे थोड़ी अधिक छूट दी। फिर मैंने लिखना शुरू किया। वास्तव में, मैं सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक एकाग्रता और तीव्रता से लिखता रहा क्योंकि विषय कठिन था और मैं उसके सामने पराजित नहीं होना चाहता था। अंत में कुछ मित्र आ गए। वे मुझे बलपूर्वक रोकने के लिए आए थे, जैसे किसी हठी रोगी को रोका जाता है। लेखन का स्थान बातचीत ने ले लिया। उस बातचीत का जो भाग अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है, वही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। इस विवाद के निर्णय के लिए हमने तुम्हें ही न्यायाधीश नियुक्त किया है।


शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार 

    यह मामला जितना तुम समझते हो, उससे कहीं अधिक जटिल है क्योंकि इसमें तीन पक्ष हैं। जैसा कि तुम जानते हो, हमारे स्टोइक मत के अनुसार प्रकृति में दो तत्त्व ऐसे हैं जिनसे समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति होती है— कारण और पदार्थ। पदार्थ स्वयं जड़ और निष्क्रिय होता है। उसमें हर प्रकार की संभावना निहित रहती है परंतु जब तक कोई दूसरा उसे गति नहीं देता, वह निष्क्रिय ही बना रहता है। दूसरी ओर, कारण अर्थात बुद्धि या विवेक, पदार्थ को आकार देता है, उसे अपनी इच्छा के अनुसार विभिन्न दिशाओं में रूपांतरित करता है और उससे अनेक प्रकार की वस्तुओं की रचना करता है। इसलिए प्रत्येक वस्तु के लिए दो बातों का होना आवश्यक है। एक वह जिससे वह बनाई जाती है और दूसरी वह जिसके द्वारा बनाई जाती है। इनमें दूसरा कारण है और पहला पदार्थ।

    प्रत्येक कला प्रकृति का अनुकरण करती है। इसलिए जो बात मैं समस्त वस्तुओं के संबंध में कह रहा था, उसे उन वस्तुओं पर भी लागू करो जिन्हें मनुष्य बनाता है। उदाहरण के लिए, एक मूर्ति के निर्माण में दो बातें आवश्यक होती हैं— एक वह पदार्थ जिस पर शिल्पकार काम करता है और दूसरा स्वयं शिल्पकार, जो उस पदार्थ को एक निश्चित रूप और स्वरूप प्रदान करता है। अतः मूर्ति के संदर्भ में कांसा उसका पदार्थ है और शिल्पकार उसका कारण। यही सिद्धांत सभी निर्मित वस्तुओं पर लागू होता है। वे उस वस्तु से मिलकर बनती हैं जिससे उन्हें बनाया जाता है और उस कर्ता से जो उन्हें बनाता है।

    स्टोइक दार्शनिकों का मत है कि कारण केवल एक ही होता है। वही जो क्रिया करता है। परंतु अरस्तू का विचार है कि 'कारण' शब्द का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है। वह कहता है, "पहला कारण स्वयं पदार्थ है, जिसके बिना किसी वस्तु की रचना नहीं हो सकती। दूसरा कारण शिल्पकार है। तीसरा वह रूप है जो प्रत्येक कृति पर आरोपित किया जाता है, जैसे किसी मूर्ति पर।" इसी रूप को अरस्तू एइदोस (eidos) कहता है। इसके अतिरिक्त, वह एक चौथे कारण का भी उल्लेख करता है, अर्थात संपूर्ण कृति का उद्देश्य।

    मैं इसका अर्थ स्पष्ट करता हूँ। मूर्ति का पहला कारण कांसा है क्योंकि यदि वह पदार्थ ही न होता जिससे उसे ढाला या गढ़ा गया तो मूर्ति का निर्माण कभी नहीं हो सकता था। दूसरा कारण शिल्पकार है क्योंकि यदि उसके कुशल हाथ उस कांसे को आकार न देते तो वह मूर्ति का रूप नहीं ले सकती थी। तीसरा कारण उसका रूप है क्योंकि यदि उस पर कोई विशेष आकृति आरोपित न की जाती तो उसे 'भाला धारण करने वाला' या 'सिर पर बंधी पट्टी बाँधता हुआ युवक' नहीं कहा जा सकता था। चौथा कारण उसका उद्देश्य है क्योंकि यदि उसे बनाने का कोई प्रयोजन ही न होता तो उसका निर्माण भी न किया जाता।

    उद्देश्य क्या है? वही प्रेरणा जिसने शिल्पकार को उसे बनाने के लिए प्रेरित किया। वही जिसे प्राप्त करने की इच्छा से उसने उसे बनाया। यदि उसने उसे बेचने के लिए बनाया तो उसका उद्देश्य धन कमाना था। यदि उसने अपनी ख्याति स्थापित करने के लिए बनाया तो उद्देश्य यश प्राप्त करना था। यदि उसने किसी मंदिर में भेंट चढ़ाने के लिए उसे गढ़ा तो उसका उद्देश्य श्रद्धा अर्पित करना था। इसलिए यह उद्देश्य भी उसके निर्माण का एक कारण है। या क्या तुम यह नहीं मानते कि जिसके बिना कोई वस्तु बन ही नहीं सकती थी, उसे उसके कारणों में गिना जाना चाहिए?

    इन कारणों में प्लेटो पाँचवाँ कारण भी जोड़ता है, जिसे वह आदर्श प्रतिरूप (Idea) कहता है। यही वह प्रतिरूप है जिसे सामने रखकर शिल्पकार उस वस्तु का निर्माण करता है जिसे वह बनाना चाहता है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह प्रतिरूप बाहर उपस्थित हो, जिस पर वह अपनी दृष्टि डाल सके या वह उसके अपने मन में कल्पित और स्थापित हो। ईश्वर समस्त वस्तुओं के ऐसे आदर्श प्रतिरूप अपने भीतर धारण किए हुए है। वह अपने मन में उन सभी वस्तुओं की संख्याओं, अनुपातों और मापों को समेटे रहता है जिन्हें सृजित किया जाना है। उसका मन उन रूपों से परिपूर्ण है जिन्हें प्लेटो आइडिया (Ideas) कहता है, जो अमर हैं, अपरिवर्तनीय हैं और कभी क्षीण नहीं होते। इसी कारण मनुष्य तो नश्वर है और नष्ट हो जाता है किंतु मनुष्यता, जिसके आदर्श के अनुसार प्रत्येक मनुष्य का निर्माण होता है, सदैव बनी रहती है। इसलिए, यद्यपि व्यक्तिगत मनुष्य कष्ट सहते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं, फिर भी मनुष्यता स्वयं इन सबसे अप्रभावित रहती है।

    इस प्रकार प्लेटो के अनुसार पाँच कारण होते हैं। वह जिससे, वह जिसके द्वारा, वह जिसमें, वह जिसके अनुसार, और वह जिसके लिए कोई वस्तु बनाई जाती है। इन सबके बाद छठी चीज़ आती है। वह वस्तु जो इन सभी कारणों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आती है। उदाहरण के लिए, पहले की तरह यदि मूर्ति को लें तो वह जिससे वह बनती है, कांसा है।  वह जिसके द्वारा बनती है, शिल्पकार है। वह जिसमें उसका रूप विद्यमान है, वही आरोपित आकृति है। वह जिसके अनुसार वह बनाई जाती है, वह आदर्श प्रतिरूप है जिसका शिल्पकार अनुकरण करता है। वह जिसके लिए वह बनाई जाती है, शिल्पकार का उद्देश्य है और इन सबका परिणाम स्वयं मूर्ति है। प्लेटो के अनुसार विश्व में भी ये सभी कारण विद्यमान हैं। उसका निर्माता ईश्वर है। वह जिससे विश्व बना है। वह पदार्थ है। उसका रूप वह व्यवस्था और संरचना है जिसे हम इस जगत में देखते हैं। उसका आदर्श प्रतिरूप वह है जिसके अनुसार ईश्वर ने इस विशाल और परम सुंदर सृष्टि का निर्माण किया और उसका उद्देश्य वह है जिसे सामने रखकर उसने इसकी रचना की।  तुम पूछोगे, ईश्वर का उद्देश्य क्या था? भलाई। प्लेटो निश्चित रूप से यही कहता है—“ईश्वर ने संसार की रचना किस कारण की? क्योंकि वह स्वयं भला है। जो वास्तव में भला होता है, वह अपनी भलाई बाँटने में कृपण नहीं होता। इसलिए उसने संसार को जितना श्रेष्ठ बना सकता था, उतना श्रेष्ठ बनाया।”

    अब तुम ही इस विवाद के न्यायाधीश बनो और अपना निर्णय सुनाओ। तुम्हें किसका मत सत्य के अधिक निकट प्रतीत होता है? मैं यह नहीं पूछ रहा कि किसने पूर्ण सत्य कहा है क्योंकि वह तो हमारी पहुँच से उतना ही परे है जितना स्वयं सत्य।

    अरस्तू और प्लेटो द्वारा प्रतिपादित कारणों की यह पूरी सूची या तो आवश्यकता से अधिक बातें समेट लेती है या फिर आवश्यकता से कम। यदि उनका यह मत है कि जिस किसी वस्तु के अभाव में कोई कार्य संपन्न नहीं हो सकता, उसे उस कार्य का कारण माना जाना चाहिए तो उन्होंने कारणों की संख्या बहुत कम बताई है। उन्हें समय को भी कारणों में गिनना चाहिए क्योंकि समय के बिना कोई भी वस्तु निर्मित नहीं हो सकती। उन्हें स्थान को भी कारण मानना चाहिए क्योंकि यदि किसी वस्तु के बनने का कोई स्थान ही न हो तो उसका निर्माण भी नहीं हो सकता। उन्हें गति को भी कारणों में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि गति के बिना न कोई वस्तु उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है। गति के बिना न कोई शिल्पकला संभव है और न ही किसी प्रकार का परिवर्तन।

    लेकिन हम यहाँ उस प्राथमिक और सार्वभौमिक कारण की खोज कर रहे हैं। वह कारण सरल होना चाहिए क्योंकि पदार्थ भी सरल है। क्या हम यह पूछ रहे हैं कि वह कारण क्या है? निस्संदेह, वह सृजनशील बुद्धि है अर्थात ईश्वर। तुमने जिन सभी बातों का उल्लेख किया है, वे अलग-अलग स्वतंत्र कारण नहीं हैं बल्कि वे सब उसी एक कारण पर निर्भर हैं जो सृजन करता है। तुम कहते हो कि रूप कारण है। परंतु रूप तो वह है जिसे शिल्पकार अपनी कृति पर आरोपित करता है। वह कारण का एक अंग है, स्वयं कारण नहीं। इसी प्रकार आदर्श विचार भी कारण नहीं है बल्कि कारण का एक आवश्यक साधन है। शिल्पकार के लिए आदर्श विचार उतना ही आवश्यक है जितनी छेनी और घिसाई का पत्थर। इनके बिना उसका शिल्प आगे नहीं बढ़ सकता किंतु वे न तो शिल्पकला के अंग हैं और न ही उसके कारण। कोई कह सकता है, “शिल्पकार का उद्देश्य जिस प्रयोजन से उसने किसी वस्तु का निर्माण किया, वही उसका कारण है।” मान लो कि उसे कारण स्वीकार भी कर लिया जाए तब भी वह कार्य-कारक कारण नहीं बल्कि केवल सहायक या अनुषंगी कारण है। और ऐसे कारणों की संख्या असंख्य हो सकती है। जबकि हम तो उस सार्वभौमिक कारण की खोज कर रहे हैं। जहाँ तक इस मत का प्रश्न है कि समस्त विश्व अपनी संपूर्णता में स्वयं एक कारण है, वहाँ वे अपनी सामान्य सूक्ष्मता से कम परिष्कृत प्रतीत होते हैं। क्योंकि किसी कृति और उस कृति के कारण के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।

    या तो अपना निर्णय सुना दो अथवा इस प्रकार के मामलों में जो अधिक सरल होता है, वही करो। यह कह दो कि तुम्हें कोई स्पष्ट समाधान नहीं दिखाई देता और हमें अपने-अपने घर लौट जाने के लिए कह दो।

    “तुम्हें इन बातों में अपना समय नष्ट करने से क्या लाभ मिलता है? ये न तो तुम्हारे किसी विकार को दूर करती हैं और न ही किसी इच्छा का उन्मूलन करती हैं।”

वास्तव में, मैं उन अधिक महत्त्वपूर्ण विषयों का भी अनुसरण करता हूँ। मैं उन अध्ययनों में लगा रहता हूँ जिनसे मन को शांति प्राप्त होती है। सबसे पहले मैं अपना परीक्षण करता हूँ, और उसके बाद इस समस्त विश्व का।

    तुम जैसा समझते हो, वैसा नहीं है कि मैं अभी अपना समय व्यर्थ कर रहा हूँ। क्योंकि जब तक ऐसे अध्ययन अत्यधिक तर्क-वितर्क और निरर्थक विद्वत्ता के चक्रव्यूह में फँसकर अपना वास्तविक उद्देश्य नहीं खो देते, तब तक वे मन को ऊँचा उठाते हैं। वे उस बोझ को हल्का करते हैं जिसके नीचे मन दबा हुआ है और जिससे मुक्त होकर अपने मूल स्रोत की ओर लौटने की उसकी आकांक्षा रहती है। यह शरीर मन के लिए एक भार और दंड के समान है। जब तक दर्शन उसकी सहायता के लिए नहीं आता और उसे प्रकृति के स्वरूप का दर्शन करने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक वह इस शरीर में बँधा रहता है। दर्शन उसे संसार की प्रकृति का अवलोकन करने को कहता है, जिससे वह सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर दिव्य लोक की ओर उन्मुख हो सके। यही उसकी स्वतंत्रता है, यही उसका विश्राम। वह कुछ समय के लिए उस कारागार से बाहर निकल आता है जिसमें वह कैद है और आकाश की विशालता में नवीन शक्ति प्राप्त करता है।

    जिस प्रकार कोई शिल्पकार, जब किसी अत्यंत सूक्ष्म कार्य में लंबे समय तक आँखों पर ज़ोर डालता है और मंद तथा अपर्याप्त प्रकाश में काम करता है तो बाहर निकलकर खुले स्थान में जाता है और दिन के मुक्त प्रकाश में अपनी आँखों को विश्राम देता है उसी प्रकार यह मन भी, जो इस अंधकारमय और संकुचित शरीर में सीमित है, जब भी अवसर पाता है, बाहर निकलकर समस्त ब्रह्मांड के चिंतन में विश्राम और आनंद प्राप्त करता है। ज्ञानी मनुष्य, और वह भी जो ज्ञान की खोज में लगा है, शरीर में रहते हुए भी अपने श्रेष्ठ अंश से उससे परे रहता है। उसके विचार सदा ऊर्ध्वलोक की ओर लगे रहते हैं। जैसे कोई सैनिक शपथ लेकर सेवा में नियुक्त होता है, वैसे ही वह केवल जीवित रहने को ही पर्याप्त प्रतिफल मानता है। अपने अभ्यास के कारण वह न तो जीवन से विशेष मोह रखता है और न उससे घृणा करता है। वह इस नश्वर जीवन को धैर्यपूर्वक बिताता है क्योंकि उसे ज्ञात है कि इसके आगे कहीं अधिक महान और समृद्ध जीवन उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।

    क्या तुम मुझे इस ब्रह्मांड का दर्शन करने से रोकते हो? क्या तुम मुझे समग्र से हटाकर केवल उसके एक छोटे-से अंश तक सीमित कर देना चाहते हो? क्या मुझे यह पूछने का अधिकार नहीं कि समस्त वस्तुओं का आदि क्या है? वह कौन है जिसके हाथों ने इस विश्व की रचना की? जब सब कुछ एक ही रूप में निष्क्रिय पदार्थ में मिला हुआ था, तब किसने उन्हें अलग-अलग किया? क्या मुझे यह जानने का अधिकार नहीं कि स्वयं इस विश्व का शिल्पकार कौन है? किस योजना के अनुसार इस असीम विस्तार को व्यवस्थित और नियंत्रित किया गया? किसने बिखरी हुई वस्तुओं को एकत्र किया, मिली-जुली चीज़ों को अलग किया और उस विशाल, निराकार पिंड में निहित प्रत्येक वस्तु को उसका दृश्य रूप प्रदान किया? उस महान प्रकाश का स्रोत क्या है जो हम पर फैलता है? क्या वह केवल अग्नि है या अग्नि से भी अधिक उज्ज्वल कोई सत्ता? क्या मुझे ये प्रश्न नहीं पूछने चाहिए? क्या मुझे यह जानने का अधिकार नहीं कि मैं कहाँ से आया हूँ? क्या मैं इस संसार को केवल एक ही बार देखूँगा या बार-बार जन्म लूँगा? इस जीवन से विदा होने पर मैं कहाँ जाऊँगा? जब मेरी आत्मा मानव जीवन की दासता से मुक्त होगी, तब उसके लिए कौन-से लोक प्रतीक्षा कर रहे होंगे? क्या तुम मुझे स्वर्ग में अपने हिस्से से भी वंचित करना चाहते हो? दूसरे शब्दों में, क्या तुम चाहते हो कि मैं सदा अपनी दृष्टि नीचे झुकाए हुए ही जीवन बिताऊँ?

    मैं अपने शरीर का दास बनने के लिए अत्यंत महान हूँ। जिस उद्देश्य के लिए मेरा जन्म हुआ है, वह इससे कहीं अधिक महान है। मैं इस शरीर को अपनी स्वतंत्रता पर डाली गई एक बेड़ी से अधिक कुछ नहीं मानता। इसलिए मैं इसे भाग्य के आघातों के सामने एक अवरोध के रूप में रख देता हूँ और किसी भी पीड़ा को इसके माध्यम से अपने वास्तविक अस्तित्व तक पहुँचने नहीं देता। मुझमें केवल यही एक वस्तु है जो आहत हो सकती है। मेरा स्वतंत्र मन इसी नश्वर और आघात-सहने वाले आवरण में निवास करता है। यह शरीर मुझे कभी कायर बनने के लिए विवश नहीं कर सकेगा। न ही किसी सज्जन मनुष्य के लिए अनुचित दिखावे करने के लिए। केवल इस तुच्छ शरीर की रक्षा या सम्मान के लिए मैं कभी असत्य नहीं बोलूँगा। जब मुझे उचित लगेगा, तब मैं इससे अपना संबंध तोड़ दूँगा। अभी भी, जबकि हम दोनों साथ हैं, यह संबंध समान स्तर का नहीं है। मन अपने सभी विशेषाधिकार अपने पास ही रखेगा। अपने शरीर के प्रति अनासक्ति ही वास्तविक मुक्ति का निश्चित मार्ग है।

    पर अब मैं अपने मूल उद्देश्य पर लौटता हूँ। जिस स्वतंत्रता की मैं बात कर रहा हूँ, उसे उस चिंतन से बहुत सहायता मिलती है जिसके बारे में अभी हम चर्चा कर रहे थे। बात यह है कि इस ब्रह्मांड की सभी वस्तुएँ दो तत्त्वों से बनी हैं— पदार्थ और ईश्वर। ईश्वर उन सब पर नियंत्रण रखता है। वे उसकी अनुयायी हैं, उसके चारों ओर अपने शासक और मार्गदर्शक के रूप में व्यवस्थित हैं। परंतु जो सृजन करता है अर्थात ईश्वर— वह उस पदार्थ से कहीं अधिक शक्तिशाली और मूल्यवान है, जिस पर वह क्रिया करता है।

    जिस प्रकार विश्व में ईश्वर की भूमिका है, उसी प्रकार मनुष्य में मन की भूमिका है। जिस प्रकार विश्व में पदार्थ है, उसी प्रकार हमारे भीतर शरीर है। इसलिए निम्नतर को श्रेष्ठतर की सेवा करनी चाहिए। हमें भाग्य के आघातों के सामने साहसी बने रहना चाहिए। अपमान, घाव, बंधन या अभाव से भयभीत नहीं होना चाहिए।

    मृत्यु क्या है? या तो वह अंत है या फिर एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा। मुझे अंत से भय नहीं है क्योंकि वह उसी के समान है जैसे कभी आरंभ ही न हुआ हो। न ही मुझे उस पार जाने से भय है क्योंकि जहाँ भी मैं जाऊँगा, वहाँ मैं उतना संकुचित और बँधा हुआ नहीं रहूँगा जितना यहाँ हूँ।


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Tuesday, 14 July 2026

महान दार्शनिकों के सदर्भ में -- पत्र - 64 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कल तुम हमारे साथ थे। अब यदि वास्तव में शिकायत करने का कोई कारण होता तो वह तभी होता जब तुम हमारे साथ केवल कल ही रहे होते। इसलिए मैंने कहा, 'हमारे साथ थे', क्योंकि तुम तो आज भी मेरे साथ हो। कल कुछ मित्र मेरे घर आए थे, इसलिए मेरे घर की रसोई से थोड़ा-सा धुआँ उठ रहा था। वैसा नहीं जैसा अमीरों और फैशनपरस्त लोगों की विशाल रसोइयों से उठता है, जिसे देखकर अग्निशमन दल तक सचेत हो जाए बल्कि केवल इतना-सा धुआँ, जो यह संकेत दे रहा था कि घर में अतिथि आए हुए हैं। भोजन के समय हमारी बातचीत अनेक विषयों पर घूमती रही। जैसा प्रायः भोज-सभा में होता है, हम किसी एक विषय को अंत तक नहीं ले गए बल्कि एक बात से दूसरी बात पर सहज ही चले जाते रहे। फिर एक पुस्तक का पाठ किया गया। वह क्विंटस सेक्स्टियस वरिष्ठ की रचना थी। निश्चय ही वे एक महान व्यक्ति थे और यद्यपि वे स्वयं इससे इनकार करते थे, फिर भी वे वास्तव में एक स्टोइक दार्शनिक थे। ईश्वर की शपथ! उस व्यक्ति में कितना अद्भुत ओज है, कितना प्राणबल है! ऐसा गुण हर दार्शनिक में नहीं मिलता। कुछ दार्शनिक अत्यंत प्रसिद्ध हैं किन्तु उनका लेखन नीरस और निर्जीव है। वे तर्क प्रस्तुत करते हैं, वाद-विवाद करते हैं, आपत्तियाँ उठाते हैं, पर पाठक के भीतर कोई उत्साह नहीं जगा पाते क्योंकि उनके अपने शब्दों में ही जीवन का अभाव होता है। किन्तु जब तुम सेक्स्टियस को पढ़ोगे तो तुम्हारे मुँह से अनायास निकलेगा, “यह व्यक्ति सचमुच जीवित है। यह ऊर्जावान है, स्वतंत्र है। यह सामान्य मनुष्यों से कहीं ऊपर उड़ता है। इसे पढ़कर मैं अपार आत्मविश्वास और महान उत्साह से भर उठता हूँ।”



    मैं तुम्हें बताता हूँ कि उन्हें पढ़ते समय मेरी अपनी मनःस्थिति कैसी हो जाती है। मेरा मन हर प्रकार के दुर्भाग्य को ललकारने के लिए व्याकुल हो उठता है। मैं मानो ऊँचे स्वर में पुकारना चाहता हूँ, “हे भाग्य! क्यों रुक गया है? अपना पूरा प्रहार कर। देख, मैं तैयार हूँ!” उस समय मैं अपने भीतर उसी मनुष्य का साहस अनुभव करता हूँ, जो स्वयं अपने लिए परीक्षा-भूमि खोजता है। ऐसा अवसर, जहाँ वह अपने धैर्य और वीरता का प्रमाण दे सके —

वह विनती करता है कि शांत झुंडों के बीच, उसे किसी झाग उड़ाते हुए जंगली वराह का सामना हो या फिर पर्वत-शिखर से उतरते हुए किसी सुनहरे सिंह का।

मेरा मन ऐसी किसी चुनौती की खोज करता है, जिस पर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ। ऐसी किसी कठिनाई की, जिसे मैं अपने आत्म-प्रशिक्षण का भाग बनाकर धैर्यपूर्वक सह सकूँ। सेक्स्टियस की यही एक और विलक्षण विशेषता है। वे तुम्हें सच्चे सुख की महानता का दर्शन तो कराते हैं पर उसे प्राप्त करने की आशा तुमसे कभी नहीं छीनते। तुम्हें यह अवश्य अनुभव होता है कि वह आदर्श अभी तुमसे बहुत ऊँचा है फिर भी यह विश्वास बना रहता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से चाहे, वह उस ऊँचाई तक पहुँच सकता है।

    यही भावना स्वयं सद्गुण भी उत्पन्न करती है। तुम उसका आदर और प्रशंसा करते हो और साथ ही यह आशा भी रखते हो कि एक दिन तुम स्वयं भी उसे प्राप्त कर सकोगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, प्रज्ञा का चिंतन ही मेरे समय का बहुत बड़ा भाग अपने में समेट लेता है। उसे निहारते हुए मैं उतना ही विस्मित होता हूँ, जितना कभी-कभी आकाश को देखकर होता हूँ। उस आकाश को भी, जिसे मैं अनेक बार ऐसे देखता हूँ मानो पहली बार देख रहा हूँ।

    इसी कारण मैं दर्शन के उन महान आविष्कारों का भी आदर करता हूँ और उन महापुरुषों का भी, जिन्होंने उन्हें खोजा। यह सोचकर मेरा हृदय आनंद से भर उठता है कि मानो मुझे अनेक पूर्वजों की छोड़ी हुई एक महान विरासत प्राप्त हुई है। उन्होंने जो कुछ एकत्र किया, जिस ज्ञान के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया, वह सब मेरे लिए है। पर हमें भी एक योग्य गृहस्वामी की भाँति आचरण करना चाहिए। जैसे वह अपनी पैतृक संपत्ति में वृद्धि करता है, वैसे ही हमें भी इस बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत को समृद्ध करना चाहिए। जब यह धरोहर मुझसे आगे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे तो वह पहले से अधिक समृद्ध हो। अभी भी बहुत-सा कार्य किया जाना शेष है। सदा शेष रहेगा। कोई भी बात उन लोगों को, जो आज से हजारों पीढ़ियों बाद जन्म लेंगे, इस महान कार्य में अपना योगदान देने से नहीं रोक सकती। 

    किन्तु यदि यह मान भी लिया जाए कि प्राचीनों ने सब कुछ खोज लिया था, तब भी एक कार्य ऐसा है जो सदैव नया बना रहेगा। दूसरों द्वारा की गई खोजों को व्यवहार में लाना, उन्हें ठीक प्रकार से समझना और व्यवस्थित रूप देना। मान लो, आँखों के उपचार के लिए आवश्यक सभी औषधियाँ हमें पहले से ही विरासत में मिल गई हों। तब मुझे नई दवाएँ खोजने की आवश्यकता नहीं होगी, परंतु मुझे उनका उपयोग रोग और परिस्थिति के अनुसार करना तो सीखना ही होगा। एक औषधि आँख की सूजन दूर करती है, दूसरी पलक की सूजन कम करती है, तीसरी अचानक होने वाले दर्द और आँसू बहने को रोकती है और चौथी दृष्टि को बेहतर बनाती है। किंतु इन सबका लाभ तभी मिलता है, जब तुम स्वयं भी अपना कर्तव्य निभाओ। औषधि को उचित मात्रा में तैयार करो और रोगी की अवस्था के अनुसार सही समय तथा सही विधि से उसका प्रयोग करो। मन के रोगों की औषधियाँ भी प्राचीन मनीषियों ने खोज ली थीं। पर उन्हें कब, कैसे और किस परिस्थिति में प्रयोग करना है। यह पता लगाना हमारा कार्य है। हमारे पूर्वजों ने निस्संदेह बहुत महान कार्य किए हैं, पर उनका कार्य अभी भी पूर्ण नहीं हुआ है।

    फिर भी हमें उन सबका आदर करना चाहिए बल्कि उनका सम्मान उसी श्रद्धा से करना चाहिए, जैसी हम देवताओं के प्रति रखते हैं। आखिर मैं उन महान पुरुषों की प्रतिमाएँ अपने पास क्यों न रखूँ ताकि वे मेरे मन को सत्कर्म के लिए प्रेरित करती रहें? मैं उनके जन्मदिवस क्यों न मनाऊँ? प्रत्येक अवसर पर सम्मानपूर्वक उनका नाम लेकर उन्हें श्रद्धांजलि क्यों न अर्पित करूँ? जितना सम्मान मैं अपने गुरुओं का करता हूँ, उतना ही सम्मान मुझे समस्त मानवजाति के उन महान आचार्यों का भी करना चाहिए, जिनसे हमें इतना महान कल्याण प्राप्त हुआ है।

    यदि मेरे सामने कोई कौंसुल या प्रेटर आ जाए तो मैं उसके पद का सम्मान करते हुए वही सब करूँगा जो प्रथा के अनुसार उचित है। घोड़े से उतरूँगा, अपना सिर अनावृत करूँगा और उसे मार्ग दूँगा। तो फिर बताओ, क्या मुझे मार्कस कैटो (ज्येष्ठ और कनिष्ठ), बुद्धिमान लेलियस, सुकरात, प्लेटो, ज़ेनो और क्लीन्थीस जैसे महापुरुषों का इससे भी अधिक सम्मानपूर्वक स्वागत नहीं करना चाहिए? निस्संदेह, मैं इन महान व्यक्तियों के प्रति गहरी श्रद्धा रखता हूँ। जब भी उनके महान नामों का उच्चारण होता है, मैं आदरवश खड़ा हो जाता हूँ।


अभी के लिए विदा 

शोक के संदर्भ में -- पत्र - 63 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे इस बात का दुःख है कि तुम्हारे मित्र फ्लैकस का निधन हो गया है। पर मैं चाहता हूँ कि तुम इस शोक में आवश्यकता से अधिक दुःखी न हो।


शगाल द्वारा  

    मैं तुमसे यह तो नहीं कहूँगा कि बिल्कुल भी शोक मत करो। यद्यपि मैं जानता हूँ कि वही सबसे अच्छा होता। पर ऐसी अडिग मानसिक दृढ़ता केवल उसी व्यक्ति में होती है, जो दुर्भाग्य से बहुत ऊपर उठ चुका हो। वह भी ऐसी घटना से क्षणभर के लिए अवश्य व्यथित होगा, पर केवल क्षणभर के लिए। जहाँ तक हमारी बात है, यदि हमारे आँसू अधिक न हों और हम शीघ्र ही स्वयं पर फिर से नियंत्रण पा लें तो हमारे आँसू क्षम्य हैं। मित्र के वियोग में तुम्हारी आँखें बिल्कुल सूखी भी न रहें, पर वे आँसुओं में डूब भी न जाएँ। रोओ, पर विलाप मत करो।

    क्या तुम्हें मेरा यह नियम कठोर प्रतीत होता है? फिर भी यूनान के महानतम कवि ने भी शोक मनाने के लिए केवल एक दिन को ही उचित माना है। वह तो यहाँ तक कहता है कि नायोबी ने भी अंततः भोजन करने का विचार किया।

    क्या तुम पूछते हो कि विलाप कहाँ से उत्पन्न होता है अथवा असीमित रुदन का स्रोत क्या है? अपने आँसुओं के द्वारा हम अपने दुःख को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। हम इसलिए नहीं रोते कि शोक हमें विवश करता है बल्कि इसलिए कि हम दूसरों के सामने अपना शोक प्रदर्शित करना चाहते हैं। लोग केवल अपने लिए दुःखी नहीं होते। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण मूर्खता है! शोक में भी मानो एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा होती है।

    “तो फिर?” तुम पूछते हो, “क्या मैं अपने मित्र को भूल जाऊँ?” यदि तुम्हारी स्मृति केवल उतने समय तक ही बनी रहती है, जितने समय तक तुम्हारा शोक रहता है तो यह स्मरण बहुत अल्पकालिक है। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब कोई आकस्मिक बात तुम्हारे चेहरे पर फिर से मुस्कान ले आएगी। मैं कहता हूँ, बहुत जल्द तुम्हारी पीड़ा, चाहे वह कितनी ही तीव्र क्यों न हो शांत पड़ जाएगी और वियोग की प्रत्येक वेदना कम हो जाएगी। जैसे ही तुम अपने शोक का प्रदर्शन करना छोड़ दोगे, तुम्हारे चेहरे की उदासी भी समाप्त हो जाएगी। अभी तो तुम अपने शोक की मानो रक्षा कर रहे हो, फिर भी वह धीरे-धीरे तुमसे दूर होता जा रहा है। शोक जितना अधिक तीव्र होता है, उतनी ही जल्दी उसका अंत भी हो जाता है।

    आओ, हम यह प्रयास करें कि जो लोग इस संसार से जा चुके हैं, उनकी स्मृति हमारे लिए सुखद बन जाए। यदि उनकी याद केवल पीड़ा ही दे तो कोई भी स्वेच्छा से उसे बार-बार स्मरण नहीं करना चाहेगा। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रियजनों का नाम आते ही हमारे हृदय में एक कसक उठे। किंतु उस कसक में भी अपना एक विशेष आनंद छिपा होता है। हमारे मित्र एटालस कहा करते थ, “दिवंगत मित्रों की स्मृति वैसा ही आनंद देती है, जैसा हल्की खटास और मिठास से भरे सेबों का स्वाद या फिर पुराने मदिरा की मनभावन खटास। समय बीतने पर जो कुछ हमें पीड़ा देता है, वह सब मिट जाता है और केवल आनंद ही शेष रह जाता है।”

    यदि हम उनकी बात मानें तो जीवित और सकुशल मित्रों का स्मरण करना मानो मधुर पकवानों और शहद का स्वाद लेने जैसा है। जबकि जो मित्र इस संसार से चले गए हैं, उनका स्मरण एक ऐसी अनुभूति है जिसमें मिठास और कड़वाहट दोनों साथ-साथ होती हैं। फिर भी कौन इस बात से इनकार करेगा कि कभी-कभी तीखे और कड़वे स्वाद भी हमें प्रिय लगते हैं?

    मेरा अनुभव इससे भिन्न है। मेरे लिए दिवंगत मित्रों का स्मरण मधुर और सांत्वनादायक होता है। क्योंकि जब वे मेरे साथ थे, तब भी मैं उन्हें इस भावना के साथ चाहता था कि एक दिन उनसे बिछुड़ना पड़ सकता है।  और अब, जब वे इस संसार में नहीं हैं, तब भी मैं उन्हें इस भाव से स्मरण करता हूँ मानो वे आज भी मेरे साथ हों।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, वही करो जो न्याय और विवेक के अनुकूल हो। भाग्य ने तुम्हारे साथ जो किया है, उसका गलत अर्थ लगाना छोड़ दो। भाग्य ने तुमसे एक चीज़ अवश्य छीन ली है, पर यह भी मत भूलो कि वही भाग्य उसे तुम्हें देकर भी गया था।

    चूँकि हमें यह निश्चित रूप से कभी ज्ञात नहीं होता कि हमारे मित्र कितने समय तक हमारे साथ रहेंगे, इसलिए जब तक वे हमारे पास हैं, तब तक हमें उनके सान्निध्य का भरपूर आनंद लेना चाहिए। यह भी सोचो कि कितनी ही बार हम लंबी यात्राओं पर गए और उन्हें पीछे छोड़ आए। कितनी ही बार एक ही नगर में रहते हुए भी उनसे मिल न सके। तब हमें समझ में आएगा कि उनके जीवित रहते हुए ही हमने उनके साथ बिताने योग्य कितना समय खो दिया था। कुछ लोग अपने मित्रों के रहते हुए उनकी उपेक्षा करते हैं। जब वे इस संसार से चले जाते हैं, तब उनके लिए अत्यधिक शोक करते हैं। क्या ऐसी प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है? उन्हें अपने मित्रों से प्रेम तभी होता है, जब वे उन्हें खो चुके होते हैं! उन्हें यह भय सताता है कि कहीं लोगों को उनके प्रेम पर संदेह न हो जाए। इसलिए वे अपने शोक का और भी अधिक प्रदर्शन करते हैं। मानो वे अपने स्नेह का प्रमाण बहुत देर से खोजने का प्रयास कर रहे हों।

    यदि हमारे अन्य मित्र भी हैं तो हम उनके साथ अन्याय करते हैं और उनके सम्मान के योग्य भी नहीं रहते, यदि हम उन्हें उस मित्र के वियोग में कोई मूल्यवान सांत्वना देने योग्य नहीं समझते जो अब इस संसार में नहीं रहा। यदि हमारे पास कोई दूसरा मित्र ही नहीं है तो हम अपने साथ भाग्य से भी अधिक अन्याय कर रहे हैं। भाग्य ने हमसे केवल एक व्यक्ति को छीना है जबकि हम स्वयं उन सभी लोगों को अपने से दूर कर रहे हैं जिन्हें हम अपना मित्र बना सकते थे। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति एक से अधिक लोगों के साथ मित्रता नहीं कर सकता, वह वास्तव में उस एक से भी बहुत गहरा प्रेम नहीं करता। मान लो किसी व्यक्ति का एकमात्र वस्त्र खो जाए और वह दूसरा वस्त्र खोजकर अपने शरीर को ढकने और ठंड से बचने के बजाय केवल रोता-बिलखता रहे तो क्या तुम उसे मूर्ख नहीं कहोगे? जिस व्यक्ति से तुम प्रेम करते थे, वह अब इस संसार में नहीं है। इसलिए किसी और को अपना स्नेह दो। नए मित्र बनाना और प्रेम का संबंध स्थापित करना, शोक में डूबे रहने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

    मैं जानता हूँ कि जो बात मैं अब कहने जा रहा हूँ, वह बहुत पुरानी और बार-बार दोहराई गई उक्ति है। फिर भी केवल इसलिए कि उसे सभी कह चुके हैं, मैं उसे छोड़ने वाला नहीं हूँ।

    समय स्वयं शोक का अंत कर देता है —

भले ही तुम स्वयं उसे समाप्त करने का निर्णय न लो। अंततः मनुष्य शोक करते-करते थक जाता है। किंतु एक विवेकशील व्यक्ति को यह सोचकर लज्जा होनी चाहिए कि उसके शोक का उपचार केवल समय के कारण हुआ। इससे कहीं बेहतर है कि तुम स्वयं अपने शोक का त्याग करो न कि शोक तुम्हारा साथ छोड़ दे। जब यह निश्चित है कि तुम चाहकर भी बहुत लंबे समय तक शोक नहीं कर सकते तो फिर जितनी जल्दी संभव हो, उतनी जल्दी उसे छोड़ देना ही उचित है।

    हमारे पूर्वजों ने स्त्रियों के लिए शोक की अवधि एक वर्ष निर्धारित की थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्हें पूरे एक वर्ष तक शोक करना चाहिए बल्कि यह था कि वे उससे अधिक समय तक शोक न करें। पुरुषों के लिए तो शोक की कोई कानूनी अवधि निर्धारित ही नहीं की गई क्योंकि उनके लिए किसी भी अवधि तक शोक करते रहना सम्मानजनक नहीं माना गया। फिर भी उन स्त्रियों में भी जो मृतक की अर्थी से बड़ी कठिनाई से हटाई जाती हैं, जिन्हें शव से अलग करना पड़ता है, ऐसी एक भी स्त्री दिखाना कठिन है जिसके आँसू पूरे एक महीने तक लगातार बहते रहे हों। शोक से अधिक शीघ्र घृणित कोई और चीज़ नहीं बनती। जब वह नया होता है, तब लोगों की सहानुभूति और सांत्वना प्राप्त करता है। पर जब वह लंबा खिंच जाता है, तब वह केवल उपहास का विषय बन जाता है। यह उचित भी है क्योंकि उस समय तक वह या तो मूर्खता बन चुका होता है या मात्र दिखावा।

    और ये बातें मैं तुम्हें वही व्यक्ति लिख रहा हूँ, जिसने अपने प्रिय अनेयुस सेरेनस के निधन पर इतना असंयमित होकर विलाप किया था कि स्वयं मुझे ही अपनी इच्छा के विरुद्ध शोक से पराजित मनुष्य का उदाहरण बनना पड़ता है। किन्तु आज मैं अपने उस व्यवहार की स्वयं आलोचना करता हूँ। अब मैं समझता हूँ कि मेरे इतने गहरे शोक का मुख्य कारण यह था कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि उसकी मृत्यु मेरी मृत्यु से पहले भी हो सकती है। मेरे मन में केवल यही बात थी कि वह मुझसे छोटा है, बहुत छोटा। मानो जन्म का क्रम ही हमारे भाग्य और मृत्यु का समय निर्धारित करता हो!

    इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी और अपने प्रियजनों, दोनों की मरणशीलता को सदैव स्मरण रखें। उस समय मुझे अपने आप से यह कहना चाहिए था, “मेरा प्रिय सेरेनस मुझसे आयु में छोटा है, पर इससे क्या अंतर पड़ता है? उचित तो यही है कि उसकी मृत्यु मेरे बाद हो किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि वह मुझसे पहले ही मर जाए।” चूँकि मैंने ऐसा नहीं सोचा, इसलिए भाग्य ने मुझे अचानक और पूरी तरह अप्रस्तुत अवस्था में आ घेरा। अब मैं यह बात सदा ध्यान में रखता हूँ कि केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक वस्तु को एक दिन नष्ट होना है बल्कि यह भी कि मृत्यु किसी निश्चित नियम या क्रम का पालन नहीं करती। जो कभी भी हो सकता है, वह आज भी हो सकता है।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम भी शीघ्र ही उसी स्थान पर जाने वाले हैं, जहाँ वह पहुँच चुका है जिसके लिए हम शोक कर रहे हैं। यदि दार्शनिकों की यह बात सत्य हो कि मृत्यु के बाद कोई ऐसा लोक है जो हमें अपने भीतर स्थान देता है तो जिस व्यक्ति को हम खोया हुआ समझते हैं, वह वास्तव में नष्ट नहीं हुआ है वह तो केवल हमसे पहले वहाँ पहुँच गया है।


अभी के लिए विदा 

उचित चुनाव के संदर्भ में - पत्र 62 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


जो लोग यह दिखाना चाहते हैं कि उनके कार्यों का बोझ उन्हें उदार विद्याओं के अध्ययन से वंचित कर देता है, वे असत्य बोलते हैं। यह सब केवल दिखावा है क्योंकि वे स्वयं ही अपने ऊपर नए-नए काम लादते रहते हैं। यदि वे अत्यधिक व्यस्त हैं तो उसका कारण वे स्वयं हैं। लूसीलियस, मेरे पास समय है। हाँ, मेरे पास वास्तव में समय है। मैं जहाँ भी रहता हूँ, अपने ही अधिकार में रहता हूँ। मैं अपने आपको कार्यों के हवाले नहीं कर देता। मैं केवल उन्हें अपने समय का उधार देता हूँ। मैं अपना समय नष्ट करने के बहाने नहीं खोजता। जहाँ कहीं भी मुझे ठहरने का अवसर मिलता है, वहीं मैं अपने विचारों को परखता हूँ और उनमें से कोई-न-कोई कल्याणकारी चिंतन प्राप्त कर लेता हूँ। जब मैं अपने मित्रों के साथ समय बिताता हूँ, तब भी मैं स्वयं से दूर नहीं होता। जिन लोगों के साथ केवल संयोगवश या किसी सार्वजनिक दायित्व के कारण मेरा संपर्क हो जाता है, उनके साथ मैं आवश्यकता से अधिक समय नहीं बिताता। इसके विपरीत, मैं स्वयं अपने लिए सर्वोत्तम संगति का चुनाव करता हूँ। अपना मन उन्हीं को समर्पित करता हूँ, चाहे वे किसी भी स्थान के हों और किसी भी युग में जीवित रहे हों। मैं अपने साथ दिमीत्रियस जैसे श्रेष्ठ पुरुष को लेकर चलता हूँ। मैं टायरियन बैंगनी वस्त्र पहनने वालों को छोड़कर उसी से संवाद करता हूँ और उसी का आदर करता हूँ, जो लगभग वस्त्रहीन है। मैं उसका आदर क्यों न करूँ? मैंने देखा है कि उसे किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है।


By Gogh 

    किसी भी मनुष्य के पास सब कुछ नहीं हो सकता पर ऐसा मनुष्य अवश्य हो सकता है जो सब कुछ तुच्छ समझ सके। धनवान बनने का सबसे शीघ्र मार्ग धन का तिरस्कार करना है। पर हमारा मित्र दिमीत्रियस इस प्रकार जीवन नहीं जीता कि मानो वह केवल सब वस्तुओं का तिरस्कार करता हो बल्कि वह इस प्रकार जीता है मानो उसने उन सब वस्तुओं को दूसरों के उपभोग के लिए छोड़ दिया हो।

इच्छा और मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 61 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


आओ, अब उन वस्तुओं की इच्छा करना छोड़ दें, जिनकी हम पहले किया करते थे। मैं तो वास्तव में यही कर रहा हूँ। अब जब मैं वृद्ध हो गया हूँ तो मैंने उन इच्छाओं का त्याग कर दिया है, जिन्हें मैं बच्चा रहते हुए करता था। मेरा एकमात्र प्रयत्न, मेरा दिन-रात का एकमात्र विचार यही है कि अपने पुराने दोषों और दुर्बलताओं का अंत कर दूँ। मैं प्रयास करता हूँ कि मेरा एक-एक दिन पूरे जीवन के बराबर मूल्यवान बन जाए। ऐसा नहीं है कि मैं प्रत्येक दिन को अपना अंतिम दिन समझकर उससे चिपका रहता हूँ... बिल्कुल नहीं। फिर भी मैं उसे इस प्रकार देखता हूँ, मानो वह वास्तव में मेरा अंतिम दिन हो सकता है। मैं तुम्हें यह पत्र भी उसी भावना से लिख रहा हूँ, मानो लिखते-लिखते ही मृत्यु मुझे बुलाने वाली हो। मैं जाने के लिए तैयार हूँ। जीवन का आनंद मैं इसलिए ले पाता हूँ कि मुझे इस बात की अधिक चिंता नहीं रहती कि यह सब कितने समय तक चलेगा।


By Maria Popova 

    वृद्धावस्था से पहले मेरी चिंता अच्छी तरह जीने की थी। वृद्धावस्था में मेरी चिंता अच्छी तरह मरने की है। अच्छी तरह मरने का अर्थ है— स्वेच्छा से मृत्यु को स्वीकार करना। प्रयास करो कि तुम कभी भी अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य न करो। जिस कार्य को तुम विरोध करने पर करने के लिए विवश हो जाओगे, वही कार्य यदि अपनी इच्छा से करो तो वह विवशता नहीं रह जाती। मेरा आशय यह है कि जो व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक आदेश का पालन करता है, वह दासता के सबसे कटु पक्ष से बच जाता है। अर्थात वह काम करने से, जिसे वह करना नहीं चाहता। मनुष्य को दुःखी आदेश का पालन करना नहीं बनाता बल्कि अपनी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना उसे दुःखी बनाता है।

    इसलिए हमें अपने मन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए कि परिस्थितियाँ हमसे जो कुछ चाहें, वही हमारी भी इच्छा बन जाए। सबसे बढ़कर, हमें अपने अंत के विषय में बिना किसी शोक के विचार करना सीखना चाहिए। हमें जीवन की तैयारी करने से पहले ही मृत्यु की तैयारी कर लेनी चाहिए। जीवन के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं। फिर भी हम जीवन की सुविधाओं के लिए लालची बने रहते हैं। हमें हमेशा लगता है कि हमारे पास कुछ न कुछ कमी है। यह भावना बनी ही रहती है। जीवन से तृप्ति न तो दिनों की संख्या से मिलती है और न वर्षों की लंबाई से। वह केवल मन की अवस्था से प्राप्त होती है। प्रिय लूसीलियस, मैंने अपना जीवन पूरी तरह पर्याप्त जिया है। अब मैं पूर्ण संतोष के साथ अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।


अभी के लिए विदा 

सद्गुणों की वांछनीयता एवं साहस के संदर्भ में -- पत्र - 67 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  सामान्य बातों से आरंभ करूँ। वसंत ने अपने रूप को फैलाना शुरू कर दिया है किंतु यद्यपि वह अब ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है और गर्मी...