Friday, 10 July 2026

प्लेटो के विचारों के बारे में -- पत्र - 58 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


आज मुझे हमारी भाषा की अत्यन्त दरिद्रता बल्कि उसकी लगभग निर्धनता का अनुभव पहले से कहीं अधिक तीव्रता से हुआ। संयोगवश हम प्लेटो के विषय में चर्चा कर रहे थे। ऐसी असंख्य बातें सामने आईं जिनके लिए हमें शब्दों की आवश्यकता थी पर वे हमें मिल नहीं सके। वास्तव में, उनमें से कुछ बातों के लिए कभी शब्द विद्यमान थे। किन्तु हमारी आज की अत्यधिक परिष्कार-प्रियता और भाषाई नखरों के कारण वे प्रचलन से लुप्त हो गए हैं।



    निर्धन और फिर भी नखरेबाज़! यह तो असह्य बात है। यूनानी लोग जिस डंक मारने वाली मक्खी को ओएस्ट्रुस कहते हैं, जो पशुओं के झुंड को आतंकित करके उन्हें तितर-बितर कर देती है और पहाड़ों की ढलानों पर इधर-उधर भगा देती है, उसे हमारी भाषा में पहले असिलुस कहा जाता था। इसके प्रमाण के लिए तुम वर्जिल का कथन देख सकते हो—

“अल्बुर्नुस के प्रदेश में और सिलारिस के निकट हरे-भरे बलूत के वनों में एक मक्खी बहुतायत से पाई जाती है। रोमवासी उसे ‘असिलुस’ कहते हैं जबकि यूनानी उसे ‘ओएस्ट्रुस’ कहते हैं। वह अत्यन्त उग्र होती है। उसकी तीखी भनभनाहट से भयभीत पशुओं के झुंड पूरे जंगल में तितर-बितर हो जाते हैं।”

    मेरा विचार है कि इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह पुराना शब्द अब प्रचलन में नहीं रहा। पर इस विषय को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ। कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके आगे आज उपसर्ग (प्रिफिक्स) लगाया जाता है। जबकि पहले वे बिना उपसर्ग के ही प्रयुक्त होते थे। उदाहरण के लिए, लोग पहले 'तलवार से निर्णय करना' कहते थे न कि 'तलवार से निर्णीत करना' (अर्थात् उपसर्ग सहित रूप का प्रयोग नहीं करते थे)। इस बात का प्रमाण भी वर्जिल से मिलता है—

“धरती के विभिन्न प्रदेशों में जन्मे विशालकाय योद्धा
आपस में आमने-सामने आए
और तलवार के बल पर अपना निर्णय किया।”

    आज उस शब्द का बिना उपसर्ग वाला प्रयोग पूरी तरह लुप्त हो गया है। इसी प्रकार प्राचीन लोग 'यदि मैं आदेश दूँ' के स्थान पर ऐसा रूप प्रयोग करते थे जिसका अर्थ था 'यदि मैं आदेश करूँ'; बाद के समय में उसके स्थान पर उपसर्गयुक्त रूप प्रचलित हो गया। इस बात के लिए तुम्हें मेरे कथन पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। वर्जिल पर विश्वास करो—

“दूसरी सेना मेरे साथ चल पड़े,
जहाँ कहीं भी मैं आदेश दूँ।”

    मैंने यह सारा भाषाशास्त्रीय विवेचन इसलिए नहीं किया कि यह दिखा सकूँ कि मैंने व्याकरणाचार्यों और साहित्य-विदों के बीच कितना समय नष्ट किया है बल्कि इसलिए कि तुम्हें यह स्पष्ट कर सकूँ कि एनियस और अकियस की शब्दावली का कितना बड़ा भाग अब प्रचलन से बाहर हो चुका है। यहाँ तक कि वर्जिल जैसे कवि की रचनाओं में भी जिन्हें लोग आज भी प्रतिदिन बड़े ध्यान से पढ़ते हैं। ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जो अब हमारी भाषा से लुप्त हो चुके हैं।

    तुम पूछोगे, “इन सब प्रारम्भिक बातों का उद्देश्य क्या है? तुम आखिर किस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते हो?” मैं यह बात तुमसे नहीं छिपाऊँगा। यदि संभव हो तो मैं तुम्हारे कानों को ‘एसेन्शिया’ (essentia) शब्द को स्वीकार करने के लिए तैयार करना चाहता हूँ। यदि यह शब्द तुम्हारे कानों को अप्रिय भी लगे, तब भी मैं इसका प्रयोग करूँगा। इस शब्द के समर्थन में मेरे पास सिसेरो का प्रमाण है। निश्चय ही उनकी भाषिक संपदा पर किसी को संदेह नहीं हो सकता। यदि तुम किसी अधिक निकटवर्ती लेखक का प्रमाण चाहते हो तो मैं फैबियानस का नाम ले सकता हूँ। ऐसे लेखक का जिसकी अभिव्यक्ति अत्यन्त सहज, प्रभावशाली और सुरुचिपूर्ण थी और जिसकी भाषा इतनी शुद्ध थी कि वह हमारे वर्तमान युग के कठोर भाषाई मानकों पर भी खरी उतरती है।

    प्रिय लूसीलियस, मैं और क्या कर सकता हूँ? यूनानी शब्द ओउसिया (ousia) का अनुवाद मैं कैसे करूँ? क्योंकि यह एक ऐसा अनिवार्य दार्शनिक पद है, जिसका अर्थ है— वह सत्ता या तत्त्व जो समस्त वस्तुओं का मूल आधार है। इसीलिए मैं तुमसे इस शब्द का प्रयोग करने की अनुमति माँगता हूँ। फिर भी, तुमने जो यह छूट मुझे दी है, उसका उपयोग मैं यथासंभव संयम से करूँगा। संभव है कि मुझे केवल यह संतोष ही पर्याप्त लगे कि आवश्यकता पड़ने पर मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ।

    तुमने मुझे यह छूट तो दे दी, पर उससे क्या लाभ? जिस विचार को व्यक्त करने के लिए मैंने अपनी भाषा की अपर्याप्तता की शिकायत की है, उसे मैं लैटिन में किसी भी प्रकार पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। जब तुम्हें यह पता चलेगा कि जिस शब्द का मैं अनुवाद नहीं कर पा रहा हूँ, वह केवल एक ही अक्षरांश (सिलेबल) का है, तब तुम हमारी रोमन भाषा की सीमाओं पर मुझसे भी अधिक खेद व्यक्त करोगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि वह शब्द कौन-सा है? वह है— तो ऑन (to on)। तुम शायद यह सोच रहे हो कि मैं कुछ अधिक ही कठिनाई पैदा कर रहा हूँ। जबकि उसका अनुवाद तो सामने ही है—क्वोद एस्ट (quod est), अर्थात् 'जो है'। किन्तु मेरी दृष्टि में 'जो है' (quod est) और तो ऑन (to on) में पर्याप्त अंतर है। मुझे एक संज्ञा के स्थान पर क्रिया का प्रयोग करने के लिए विवश होना पड़ता है। फिर भी, यदि कोई दूसरा उपाय नहीं है, तो मैं 'जो है' (that which is) ही लिखूँगा।

    हमारे एक मित्र, जो अत्यन्त विद्वान हैं, आज कह रहे थे कि प्लेटो तो ऑन (to on) शब्द का छह भिन्न अर्थों में प्रयोग करते हैं। मैं उन सभी का वर्णन करूँगा। पर उससे पहले मुझे यह बताना होगा कि जीनस (genus) और प्रजाति (species) जैसी भी चीज़ें होती हैं। इस समय हम उस मूल जीनस की खोज कर रहे हैं जिस पर अन्य सभी प्रजातियाँ निर्भर करती हैं, जिससे सभी विभाजन उत्पन्न होते हैं और जिसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। यदि हम वस्तुओं को एक-एक करके देखें और पीछे की ओर चलते जाएँ तो अंततः हम उसी मूल तत्त्व तक पहुँच जाएँगे। अरस्तू के अनुसार 'मनुष्य' एक प्रजाति (species) है। 'घोड़ा' एक प्रजाति है। 'कुत्ता' भी एक प्रजाति है। इसलिए हमें उस समान विशेषता की खोज करनी चाहिए जो इन सबको एक सूत्र में बाँधती है। ऐसी किसी व्यापक सत्ता की जो इन सबको अपने भीतर समेटे हुए हो और जिसके अधीन ये सभी आते हों। वह क्या है? वह है, 'प्राणी' (animate creature)। इस प्रकार 'मनुष्य', 'घोड़ा' और 'कुत्ता'— इन सभी के ऊपर एक सामान्य जीनस स्थापित होती है। वह है—'प्राणी'।

    किन्तु कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जिनमें जीवन तो होता है पर वे प्राणी (animate creatures) नहीं होतीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि अनिमा अर्थात जीवनदायी तत्त्व, वृक्षों और झाड़ियों में भी विद्यमान होता है। इसी कारण हम कहते हैं कि वे भी जीवित रहते हैं और मरते हैं। अतः 'जीवित वस्तुएँ' (living things) इससे भी उच्चतर श्रेणी में आएँगी क्योंकि इस वर्ग के अंतर्गत प्राणी भी आते हैं और वनस्पतियाँ भी।

    लेकिन कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जो जीवित नहीं होतीं, जैसे—पत्थर। इसलिए 'जीवित वस्तुओं' से भी पहले एक और व्यापक श्रेणी होगी और वह है— 'शरीर' (body)। मैं इस जीनस (genus) का विभाजन इस प्रकार करूँगा। सभी शरीर दो प्रकार के होते हैं या तो वे जीवित होते हैं या फिर निर्जीव।

    किन्तु 'शरीर' (body) से भी ऊपर एक और व्यापक श्रेणी है। क्योंकि हम कहते हैं कि कुछ वस्तुएँ साकार (corporeal) हैं और कुछ निराकार (incorporeal)। इसलिए वह कौन-सी जीनस होगी जिसके अंतर्गत ये दोनों आती हैं? वह वही होगी जिसे हमने, यद्यपि यह नाम पूरी तरह उपयुक्त नहीं है, 'जो है' (that which is) कहा है। इस जीनस का विभाजन इस प्रकार होगा, 'जो है' (that which is) या तो साकार है या निराकार। यही, यदि मुझे ऐसा कहने की अनुमति हो, प्रथम और प्राथमिक जीनस (primary genus) है। वह सार्वभौमिक जाति जिसके ऊपर कोई दूसरी जाति नहीं है। अन्य सभी जातियाँ वास्तव में जातियाँ तो हैं पर साथ ही वे किसी और व्यापक जाति की प्रजातियाँ (species) भी हैं। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य एक जीनस (genus) है क्योंकि उसके भीतर अनेक प्रजातियाँ या उपवर्ग समाहित हैं जैसे, विभिन्न राष्ट्र (यूनानी, रोमी, पार्थियन) या विभिन्न वर्ण (श्वेत, श्याम, पीत)। इसके अतिरिक्त उसके अंतर्गत अनेक व्यक्ति भी आते हैं जैसे, कैटो, सिसेरो और लुक्रेतियस। इस प्रकार 'मनुष्य' उस दृष्टि से जाति है कि उसके अंतर्गत अनेक इकाइयाँ आती हैं। किन्तु वह प्रजाति भी है क्योंकि वह स्वयं किसी अधिक व्यापक श्रेणी के अधीन है। परन्तु 'जो है' (that which is) यह सार्वभौमिक और मूल जाति, अपने ऊपर किसी अन्य जाति को नहीं रखती। वही समस्त वस्तुओं का प्रारम्भिक आधार है। अन्य सभी श्रेणियाँ उसी के अधीन आती हैं।

    स्टोइक दार्शनिक इसके भी ऊपर एक और इससे भी अधिक मूलभूत जीनस (genus) स्थापित करना चाहते हैं। उसके विषय में मैं अभी थोड़ी देर में कहूँगा। पर पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जिस जाति का मैंने अभी वर्णन किया है, उसे सर्वोच्च स्थान देना उचित है क्योंकि उसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। मैं 'जो है' (that which is) का विभाजन इस प्रकार करता हूँ। या तो वह साकार (corporeal) है या निराकार (incorporeal)। इसके अतिरिक्त कोई तीसरी प्रजाति (species) नहीं है। अब मैं 'शरीर' (body) का विभाजन कैसे करूँ? इस प्रकार कि सभी शरीर या तो सजीव हैं या निर्जीव। फिर 'सजीव वस्तुओं' (living things) का विभाजन कैसे करूँ? एक प्रकार से इस प्रकार, कुछ में मन (mind) होता है और कुछ में केवल जीवन (life)। या दूसरे प्रकार से इस प्रकार, कुछ में प्रेरणा या स्वाभाविक गति (impulse) की क्षमता होती है। वे चलते-फिरते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं जबकि कुछ पृथ्वी में जड़ें जमाए रहते हैं, अपनी जड़ों के माध्यम से पोषण ग्रहण करते हैं और बढ़ते हैं। अब 'प्राणियों' (animate creatures) का विभाजन किन प्रजातियों में किया जाए? वे या तो नश्वर (mortal) होते हैं या अमर (immortal)।

    कुछ स्टोइक दार्शनिकों का मत है कि सबसे मूलभूत जीनस (primary genus) 'कुछ' (something) है। वे ऐसा क्यों मानते हैं। इसका कारण भी मैं यहाँ बताता हूँ। वे कहते हैं, 'विश्व-प्रकृति में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जो वास्तव में अस्तित्व रखती हैं। कुछ ऐसी हैं जो अस्तित्व नहीं रखतीं। फिर भी, जो वस्तुएँ वास्तव में नहीं हैं, वे भी किसी न किसी रूप में विश्व के दायरे में आती हैं अर्थात वे जो केवल मन में उत्पन्न होती हैं, जैसे सेंटौर (आधा मनुष्य, आधा घोड़ा), दैत्य, और वे सभी रूप जिनकी रचना कल्पनाशक्ति करती है। वे मन में एक प्रकार की छवि तो बना लेते हैं। यद्यपि उनका वास्तविक अस्तित्व या पदार्थ (substance) नहीं होता।”

    अब मैं उस विषय पर लौटता हूँ जिसका उल्लेख करने का मैंने तुमसे वचन दिया था कि प्लेटो 'जो है' (that which is) का छह प्रकार से विभाजन कैसे करते हैं। पहला 'जो है' ऐसा है जिसे न आँखों से देखा जा सकता है न स्पर्श किया जा सकता है और न ही किसी अन्य इन्द्रिय से ग्रहण किया जा सकता है। उसे केवल बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य' अपनी सामान्य या जातिगत (generic) अवस्था में आँखों के सामने उपस्थित नहीं होता। आँखों से तो केवल उसका विशिष्ट रूप (specific) दिखाई देता है जैसे, सिसेरो या कैटो। इसी प्रकार 'प्राणी' (animate creature) दिखाई नहीं देता। वह केवल विचार का विषय है। जो दिखाई देते हैं, वे उसकी प्रजातियाँ हैं जैसे, घोड़ा और कुत्ता।

    प्लेटो जिन वस्तुओं को 'जो है' (that which is) कहते हैं, उनमें दूसरी वह है जो अन्य सभी वस्तुओं से श्रेष्ठ और उनसे ऊपर है। उनके अनुसार यही 'सर्वोच्च सत्ता' (preeminent being) है। जिस प्रकार 'कवि' शब्द सामान्यतः उन सभी व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है जो कविता रचते हैं, परन्तु यूनानियों में समय के साथ यह शब्द केवल एक ही व्यक्ति का बोध कराने लगा है। इसलिए जब तुम 'कवि' शब्द सुनते हो तो तुम्हारे मन में केवल 'होमर' का ही विचार आता है। तो यह 'सर्वोच्च सत्ता' क्या है? निस्संदेह वह ईश्वर है क्योंकि वही समस्त वस्तुओं से महान और अधिक सामर्थ्यवान है।

    तीसरा प्रकार उन वस्तुओं का है जिन्हें वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' कहा जाता है। उनकी संख्या असंख्य है, पर वे हमारी दृष्टि की पहुँच से परे हैं। क्या तुम पूछते हो कि वे क्या हैं? वे प्लेटो के दर्शन की विशिष्ट अवधारणाएँ हैं, जिन्हें वे आइडियाज़ (Ideas) कहते हैं। इन्हीं से वे सभी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं जिन्हें हम देखते हैं। प्रत्येक वस्तु का रूप इन्हीं के अनुरूप निर्मित होता है। ये आइडियाज़ अमर हैं, अपरिवर्तनशील हैं और अविनाशी हैं। अब आइडिया क्या है या अधिक ठीक कहें, प्लेटो के अनुसार आइडिया क्या है— इसे सुनो। 'आइडिया उन वस्तुओं का शाश्वत प्रतिरूप (eternal model) है जो प्रकृति के अनुसार अस्तित्व में आती हैं।' इस परिभाषा को तुम्हारे लिए और स्पष्ट करने के उद्देश्य से मैं इसमें थोड़ा स्पष्टीकरण जोड़ता हूँ। मान लो कि मैं तुम्हारा चित्र बनाना चाहता हूँ। उस चित्र के लिए तुम मेरे सामने एक प्रतिरूप (model) के रूप में उपस्थित हो। तुम्हें देखकर मेरा मन तुम्हारे रूप की एक विशेष छवि ग्रहण करता है और उसी के अनुसार अपने कार्य को आकार देता है। इसलिए तुम्हारा वह रूप, जो मुझे मार्गदर्शन देता है और मेरे चित्र को स्वरूप प्रदान करता है तथा जिससे उसकी प्रतिकृति बनाई जाती है, वही आइडिया है। इसी प्रकार प्रकृति में ऐसे असंख्य शाश्वत प्रतिरूप विद्यमान हैं। मनुष्यों के, विभिन्न प्रकार की मछलियों के, वृक्षों के और अन्य सभी वस्तुओं के। प्रकृति जिन-जिन वस्तुओं को उत्पन्न करती है, वे सभी इन्हीं शाश्वत प्रतिरूपों के अनुसार आकार ग्रहण करती हैं।

    चौथा स्थान एइदोस (eidos) अर्थात रूप (form) का है। अब यह एइदोस क्या है? इसे समझने के लिए तुम्हें ध्यानपूर्वक सुनना होगा। यदि विषय कठिन लगे तो उसका दोष मुझे नहीं प्लेटो को देना क्योंकि इस प्रकार के सूक्ष्म भेद बिना कठिनाई के समझे नहीं जा सकते। अभी कुछ देर पहले मैंने एक चित्रकार का उदाहरण दिया था। जब वह चित्रकार रंगों से वर्जिल का चित्र बनाना चाहता था तो वह स्वयं वर्जिल को देखता था। वर्जिल का वास्तविक रूप जो बनने वाले चित्र का आदर्श प्रतिरूप (model) था, वही आइडिया (Idea) था। उस प्रतिरूप को देखकर कलाकार ने जो रूप अपने मन में ग्रहण किया और जिसे उसने अपनी कृति में उतार दिया, वही एइदोस (eidos) है। अब तुम पूछोगे कि दोनों में अंतर क्या है? एक आदर्श प्रतिरूप (model) है। दूसरा उस प्रतिरूप से ग्रहण किया गया रूप (form) जिसे कलाकार अपनी रचना में मूर्त रूप देता है। कलाकार पहले का अनुकरण करता है और दूसरे का निर्माण करता है। उदाहरण के लिए, किसी मूर्ति का एक रूप होता है। वही उसका एइदोस है। पर जिस मूल प्रतिरूप को देखकर मूर्तिकार ने वह मूर्ति बनाई, उसका भी एक रूप होता है वही आइडिया है। यदि तुम्हें यह भेद और स्पष्ट चाहिए तो इसे इस प्रकार भी समझ सकते हो। एइदोस कृति (work) के भीतर विद्यमान होता है जबकि आइडिया कृति के बाहर होता है। केवल बाहर ही नहीं बल्कि कृति के अस्तित्व में आने से पहले से ही विद्यमान रहता है।

    पाँचवाँ प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व सामान्य अर्थ में माना जाता है। यही वे वस्तुएँ हैं जिनसे हमारा प्रत्यक्ष संबंध होता है। जैसे, 'समस्त वस्तुएँ', 'मनुष्य', 'पालतू पशु' और 'वस्तुएँ'। छठा प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व केवल एक प्रकार से या मानो अस्तित्व जैसा है जैसे, शून्य (void) और समय (time)।

    प्लेटो उन सभी वस्तुओं को, जिन्हें हम देख सकते हैं या स्पर्श कर सकते हैं, उन वस्तुओं की श्रेणी से बाहर रखते हैं जो उनके मत में वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' हैं। क्योंकि वे निरंतर परिवर्तनशील हैं। वे लगातार घटती और बढ़ती रहती हैं। हममें से कोई भी व्यक्ति वृद्धावस्था में वैसा नहीं रहता जैसा वह युवावस्था में था। हममें से कोई भी आज प्रातः वैसा नहीं है जैसा वह कल था। हमारे शरीर तीव्र गति से बहती हुई नदियों की तरह निरंतर बहते चले जा रहे हैं। तुम जो कुछ भी देखते हो, वह समय के साथ-साथ निरंतर बीतता और बदलता रहता है। हमारी दृष्टि के सामने उपस्थित कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रहती। मैं स्वयं भी, जबकि मैं तुम्हें इन परिवर्तनों का वर्णन कर रहा हूँ, उसी दौरान बदल चुका हूँ।

    इसी का आशय हेराक्लाइटस के उस कथन से है, “हम एक ही नदी में दो बार उतरते भी हैं और नहीं भी उतरते।” नदी का नाम तो वही रहता है, पर उसका जल आगे बढ़ चुका होता है। यह बात नदी के संबंध में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, पर ठीक यही स्थिति मनुष्य की भी है। हमें भी समय की धारा निरंतर बहाए लिए जा रही है। उसका प्रवाह किसी नदी से कम तीव्र नहीं है। इसी कारण मुझे आश्चर्य होता है कि हम कितने विवेकहीन हैं, जो इस शरीर जैसी क्षणभंगुर वस्तु से इतना प्रेम करते हैं। मृत्यु से इतने भयभीत रहते हैं जबकि प्रत्येक क्षण हमारी पूर्व अवस्था की मृत्यु ही तो है। जब वही घटना प्रतिदिन घट रही है तो उसके केवल एक बार घटने से भयभीत होने का क्या कारण है?

    मैं यह बता चुका हूँ कि मनुष्य एक ऐसा पदार्थ है जो निरंतर परिवर्तनशील है, नश्वर है और हर प्रकार के प्रभाव के अधीन है। समस्त ब्रह्मांड भी। यद्यपि वह चिरस्थायी और अजेय है। फिर भी निरंतर परिवर्तित होता रहता है और कभी भी एक-सा नहीं रहता। क्योंकि उसके भीतर जो कुछ पहले था, वह सब तो बना रहता है। परंतु वह उन्हें पहले की अपेक्षा भिन्न रूप में धारण करता है। वह केवल उनके विन्यास और व्यवस्था को बदल देता है।

    तुम कहोगे, “तुम्हारे इन सूक्ष्म भेदों से मुझे क्या लाभ होने वाला है?” यदि मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा, प्रत्यक्ष रूप से कोई विशेष लाभ नहीं। किन्तु जैसे कोई नक्काशी करने वाला कारीगर, लंबे समय तक अत्यन्त सूक्ष्म काम करते-करते थक जाने पर, अपनी आँखों को विश्राम देने और, जैसा हम कहते हैं, उन्हें फिर से तरोताज़ा करने के लिए कुछ देर अपना ध्यान हटा लेता है उसी प्रकार हमें भी कभी-कभी अपने मन को विश्राम देना चाहिए और किसी हल्के-फुल्के बौद्धिक मनोरंजन से उसे ताज़गी प्रदान करनी चाहिए। फिर भी, हमारा मनोरंजन भी सार्थक होना चाहिए। यदि तुम उसमें मन लगाकर भाग लोगे तो उससे भी तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा अवश्य प्राप्त होगा जो भविष्य में तुम्हारे लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

    प्रिय लूसीलियस, मेरी तो यही आदत है कि मैं प्रत्येक विचार से, चाहे वह दर्शन से कितना ही दूर क्यों न हो— कुछ-न-कुछ उपयोगी बात निकालने का प्रयास करता हूँ और उसे किसी अच्छे उद्देश्य के लिए काम में लाता हूँ। अभी जिन विषयों की मैंने चर्चा की, उनसे चरित्र-सुधार का भला क्या संबंध हो सकता है? प्लेटो के आइडियाज़ मुझे एक बेहतर मनुष्य कैसे बना सकते हैं? उनसे मुझे ऐसा क्या मिलेगा जो मेरी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में सहायता करे? शायद केवल यही शिक्षा कि वे सभी वस्तुएँ, जो हमारी इन्द्रियों को लुभाती हैं, हमें आकर्षित करती हैं और हमारी वासनाओं को उत्तेजित करती हैं, प्लेटो के अनुसार वास्तविक अर्थ में अस्तित्ववान नहीं हैं। इस प्रकार वे केवल आभास हैं। क्षणिक प्रतीतियाँ जो थोड़े समय के लिए दिखाई देती हैं। उनमें से कोई भी स्थायी या दृढ़ नहीं है। फिर भी हम उन्हें इस प्रकार चाहते हैं, मानो वे सदा बनी रहेंगी या मानो वे सदा के लिए हमारी ही बनी रहेंगी।

    हम स्वयं भी दुर्बल और परिवर्तनशील हैं। भ्रमों के बीच खड़े हैं। इसलिए हमें अपने मन को उन वस्तुओं की ओर लगाना चाहिए जो शाश्वत हैं। हमें ऊपर उठना चाहिए और आश्चर्य के साथ समस्त वस्तुओं के शाश्वत प्रतिरूपों का तथा उनके बीच निवास करने वाले ईश्वर का दर्शन करना चाहिए। चूँकि ईश्वर अपनी सृष्टि की वस्तुओं को अमर नहीं बना सकता था क्योंकि पदार्थ की प्रकृति इसमें बाधक थी इसलिए अपनी दिव्य व्यवस्था में उसने हमें मृत्यु के विरुद्ध यह उपाय प्रदान किया कि हम विवेक के द्वारा शरीर की सीमाओं और दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करें। वास्तव में सभी वस्तुएँ इसलिए बनी नहीं रहतीं कि वे स्वभाव से अमर हैं बल्कि इसलिए कि उनका शासक उनकी रक्षा करता है। यदि वे स्वयं अमर होतीं तो उन्हें किसी संरक्षक की आवश्यकता ही न होती। सृष्टिकर्ता अपनी शक्ति से पदार्थ की दुर्बलता पर विजय पाकर उन्हें सुरक्षित रखता है। अतः हमें उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करना चाहिए जो इतनी तुच्छ हैं कि यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि उनका वास्तविक अस्तित्व है भी या नहीं।

    साथ ही हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि यदि दैवी व्यवस्था (प्रोविडेन्स) इस समस्त ब्रह्मांड की रक्षा करती है जो हमारी ही भाँति नश्वर है तो हमारी अपनी विवेकपूर्ण व्यवस्था भी इस तुच्छ शरीर के जीवन को कुछ समय तक और बढ़ा सकती है, बशर्ते हम उन इच्छाओं पर शासन और नियंत्रण रखना सीख लें जो प्रायः मृत्यु का कारण बनती हैं। प्लेटो ने अपने जीवन का सावधानीपूर्वक संचालन करके वृद्धावस्था तक जीवन प्राप्त किया। यह सत्य है कि उनका शरीर स्वभावतः सुदृढ़ था और वे सौभाग्यशाली भी थे। उनके चौड़े वक्षस्थल के कारण ही उन्हें 'प्लेटो' नाम मिला था। पर समुद्री यात्राओं के कष्टों ने उनके स्वास्थ्य को बहुत क्षीण कर दिया था। फिर भी, संयमित जीवन, अपने स्वास्थ्य की सतर्क देखभाल और इन्द्रिय-वासना को भड़काने वाली वस्तुओं पर नियंत्रण के कारण, उन्होंने अनेक बाधाओं के बावजूद दीर्घायु प्राप्त की। मेरा विश्वास है कि तुम जानते होगे कि अपनी इस सावधानीपूर्ण जीवन-पद्धति के कारण प्लेटो ने पूरे इक्यासी वर्ष का जीवन पूरा किया और अपने जन्मदिन के ही दिन, एक भी दिन कम हुए बिना, उनका देहावसान हुआ।

    इसी कारण एथेंस में उपस्थित कुछ फ़ारसी ज्योतिषियों ने उनकी मृत्यु के बाद उनके सम्मान में अग्नि-बलि अर्पित की। उनका विश्वास था कि चूँकि प्लेटो ने नौ गुणा नौ अर्थात इक्यासी जो उनके अनुसार सर्वाधिक पूर्ण संख्या थी, को पूरा करके जीवन समाप्त किया था। इसलिए उनका भाग्य साधारण मनुष्यों से कहीं अधिक महान था। किन्तु मेरा विचार है कि यदि तुम्हें उतने वर्षों के बदले कुछ दिन कम स्वीकार करने पड़ें और उस प्रकार के सम्मान का त्याग भी करना पड़े तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। फिर भी, संयमपूर्ण जीवन वृद्धावस्था को कुछ और लंबा अवश्य कर सकता है। यद्यपि मैं यह नहीं मानता कि वृद्धावस्था ऐसी वस्तु है जिसकी लालसा करनी चाहिए, फिर भी उसे ठुकराना भी उचित नहीं है। जहाँ तक संभव हो, अपने ही साथ बने रहना सुखद है, बशर्ते कि तुमने स्वयं को ऐसा बना लिया हो कि तुम्हारा अपना साथ तुम्हें अच्छा लगे।

    अब मैं उस प्रश्न पर अपना मत व्यक्त करता हूँ जो तुमने उठाया है। क्या अत्यन्त जर्जर वृद्धावस्था का तिरस्कार करना उचित है? अर्थात क्या मनुष्य को मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहने के बजाय स्वयं अपने जीवन का अंत कर देना चाहिए? मेरा विचार है कि केवल निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा करना कायरता के बहुत निकट है। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति मदिरा के प्रति इतना आसक्त हो कि वह पात्र की अंतिम बूँद तक ही नहीं बल्कि तलछट तक भी पी जाए। किन्तु मेरा प्रश्न यह है, क्या जीवन का अंतिम भाग वास्तव में उसी तलछट के समान है या फिर वही उसका सबसे निर्मल और श्रेष्ठ अंश है? बशर्ते कि मन विकृत न हुआ हो, इन्द्रियाँ सुरक्षित हों और मन की सेवा करने में समर्थ हों तथा शरीर समय से पहले इतना जर्जर और निष्प्राण न हो गया हो कि वह अपने स्वाभाविक कार्य भी न कर सके। क्योंकि इसमें बहुत बड़ा अंतर है कि कोई व्यक्ति जीवन को लंबा कर रहा है या केवल मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींच रहा है। पर यदि शरीर अब किसी प्रकार की सेवा करने में समर्थ नहीं रहा तो फिर उस पीड़ित मन को मुक्त कर देना अनुचित क्यों माना जाए?

    संभव है कि आवश्यकता पड़ने से कुछ पहले ही निर्णय लेना अधिक उचित हो ताकि जब वह समय वास्तव में आ पहुँचे, तब ऐसा न हो कि तुम निर्णय लेने में ही असमर्थ हो जाओ। दुःख और असहायता से भरा जीवन जीने का जोखिम, शीघ्र मृत्यु के जोखिम से कहीं अधिक बड़ा है। यदि ऐसा है तो थोड़े-से समय का त्याग करके इतने बड़े जोखिम से बच निकलने का अवसर न लेना मूर्खता ही होगी। बहुत कम लोगों को ऐसा सौभाग्य मिलता है कि दीर्घ वृद्धावस्था उन्हें बिना किसी शारीरिक या मानसिक क्षति के मृत्यु तक पहुँचा दे। इसके विपरीत, अधिकांश लोग अपने अंगों के उपयोग से वंचित होकर बिस्तर तक सीमित हो जाते हैं। क्या तुम्हें सचमुच यह अधिक क्रूर प्रतीत होता है कि मनुष्य अपने जीवन का कुछ अंश छोड़ दे बजाय इसके कि वह अपने जीवन का अंत स्वयं करने का अधिकार ही खो बैठे?

    यह मत सोचकर मेरी बात सुनने से इनकार मत करो कि यह विचार सीधे तुम्हारे ही विषय में है। मैं जो कह रहा हूँ, उसका मूल्यांकन उसके अपने गुण-दोषों के आधार पर करो। मैं वृद्धावस्था का त्याग तब तक नहीं करूँगा, जब तक वह मुझे मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ रहने दे अर्थात मेरे उस श्रेष्ठ भाग, मेरे विवेक और मेरे मन को अक्षुण्ण रखे। पर यदि वह मेरे मन पर आघात करने लगे, उसे धीरे-धीरे नष्ट करने लगे और मुझे केवल जीवित रखे, जीवन जीने योग्य न छोड़े, तब मैं उस जर्जर और ढहते हुए भवन से स्वयं बाहर निकल जाऊँगा। मैं केवल रोग से बचने के लिए मृत्यु का वरण नहीं करूँगा, यदि वह रोग उपचार योग्य हो और मेरे मन के लिए बाधक न हो। केवल पीड़ा के कारण भी मैं अपने ऊपर हाथ नहीं उठाऊँगा क्योंकि ऐसी मृत्यु पराजय होगी। किन्तु यदि मुझे यह निश्चित रूप से ज्ञात हो जाए कि मुझे निरंतर बिना किसी विराम के, पीड़ा सहनी पड़ेगी तो मैं वहाँ से विदा हो जाऊँगा। पीड़ा के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि वह मुझे उन सभी बातों से वंचित कर देगी जो जीवन को जीने योग्य बनाती हैं। जो व्यक्ति केवल पीड़ा के कारण मर जाता है, वह दुर्बल और आलसी है। जो व्यक्ति केवल पीड़ा सहने के लिए ही जीवित रहता है, वह मूर्ख है।

    पर मैं बहुत अधिक विस्तार में चला गया हूँ। इस विषय के अतिरिक्त भी इतनी सामग्री शेष है कि उस पर पूरे दिन चर्चा की जा सकती है। किन्तु जो व्यक्ति एक पत्र तक समाप्त नहीं कर पा रहा, वह अपने जीवन का अंत कैसे करेगा? अतः अब विदा... यह विदा का शब्द तुम निश्चय ही मृत्यु पर मेरे इस निरंतर चले आ रहे विचार-विमर्श से अधिक प्रसन्नता के साथ पढ़ोगे।

सेनेका 

मन की सूक्ष्मता के संदर्भ में -- पत्र - 57 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


जब मुझे बाइए छोड़कर नेपल्स लौटना पड़ा तो मैंने फिर से नाव से जाने का साहस नहीं किया। लोगों ने कहा कि समुद्र में तूफ़ान है और मुझे इस बात पर सहज ही विश्वास हो गया। लेकिन पूरे मार्ग में इतना कीचड़ था कि कोई यह समझ सकता था कि मैं नाव से ही वहाँ पहुँचा हूँ। उस दिन मुझे मानो पूरे एथलीटों वाले कठोर अभ्यास का अनुभव करना पड़ा क्योंकि कीचड़ से निकलते ही हम सीधे नेपल्स की सुरंग की धूल में जा पहुँचे। उस कालकोठरी से अधिक लंबी और उससे अधिक अँधेरी कोई जगह नहीं हो सकती। वहाँ जलती हुई मशालें भी केवल इतना ही कर पाती थीं कि हमें अँधेरा दिखाई दे। वे उसके पार देखने में हमारी कोई सहायता नहीं करती थीं। यदि वहाँ कहीं कुछ प्रकाश होता भी तो धूल उसे ढँक देती। खुली जगह में भी धूल बहुत कष्टदायक होती है। फिर सोचो, उस स्थान में उसका क्या हाल रहा होगा, जहाँ वह बंद वातावरण में, बिना किसी वायु-आवागमन के, बार-बार ऊपर उठती, फिर उसी स्थान पर लौटकर उन लोगों पर गिर पड़ती थी, जो उसे उड़ा रहे थे। इस प्रकार हमें एक ही समय में दो परस्पर विपरीत कष्ट सहने पड़े। उसी एक मार्ग पर, उसी एक दिन, हम कीचड़ और धूल, दोनों से एक साथ जूझते रहे।


By Kimura Buzan 

    फिर भी, उस अँधेरे ने मुझे सोचने के लिए कुछ दिया। क्योंकि मैंने अनुभव किया कि उसका मेरे मन पर एक प्रकार का प्रभाव पड़ा। भय तो नहीं था पर उस अपरिचित परिस्थिति की नवीनता और अप्रियता के कारण मेरे भीतर एक परिवर्तन अवश्य उत्पन्न हुआ। अब मैं अपने विषय में नहीं कह रहा हूँ क्योंकि मैं तो एक सहनीय मनुष्य होने से भी बहुत दूर हूँ, पूर्ण मनुष्य होने की तो बात ही अलग है बल्कि उस व्यक्ति के विषय में कह रहा हूँ, जिस पर भाग्य का अब कोई वश नहीं रह गया है। उसका मन भी ऐसे अवसरों पर प्रभावित होगा। उसके चेहरे का रंग भी बदल जाएगा। प्रिय लूसीलियस, कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे कोई भी सद्गुण मनुष्य को पूरी तरह नहीं बचा सकता। प्रकृति स्वयं सद्गुणी व्यक्ति को यह स्मरण कराती रहती है कि वह भी नश्वर है। इसलिए दुःखद घटनाओं पर उसके चेहरे के भाव बदल जाएँगे। आकस्मिक घटनाओं से वह चौंक उठेगा और बहुत अधिक ऊँचाई से नीचे देखने पर उसे चक्कर भी आ सकता है। यह भय नहीं है बल्कि प्रकृति की ऐसी सहज प्रतिक्रिया है जिस पर तर्क का कोई अधिकार नहीं चलता।

    इसी प्रकार कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अत्यन्त साहसी होते हैं और अपना रक्त बहाने के लिए भी तत्पर रहते हैं पर दूसरों का रक्त नहीं देख सकते। कुछ लोग ताज़े घाव को छूते या देखते ही मूर्छित हो जाते हैं जबकि कुछ पुराने और सड़े हुए घाव को देखकर बेहोश हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो तलवार का वार सह लेना, तलवार को अपनी आँखों के सामने देखने की अपेक्षा अधिक सहज समझते हैं। इसलिए जैसा कि मैंने कहा, मैंने जो अनुभव किया वह कोई भावावेश नहीं था बल्कि केवल एक परिवर्तन था। जैसे ही मैं फिर दिन के प्रकाश में लौटा, मेरी प्रसन्नता बिना किसी प्रयास और बिना किसी सचेत इच्छा के स्वयं लौट आई।

    तब मैंने अपने आप से वही पुरानी बातचीत आरम्भ की कि हम कितने मूर्ख हैं जो कुछ बातों से अधिक और कुछ से कम डरते हैं। जबकि उन सबका अंत एक ही होता है। इससे क्या अंतर पड़ता है कि कोई व्यक्ति गिरती हुई बालकनी के नीचे दबकर मरे या चट्टानों के धँसकने से? वास्तव में कोई अंतर नहीं है। फिर भी कुछ लोग चट्टानों के धँसकने से अधिक भयभीत होते हैं। जबकि दोनों ही समान रूप से प्राणघातक हैं क्योंकि भय परिणाम की अपेक्षा उसके कारण को अधिक महत्त्व देता है।

    तुम यह मत समझो कि मैं उन स्टोइक दार्शनिकों की बात कर रहा हूँ जो यह मानते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी अत्यन्त भारी वस्तु के नीचे दबकर मर जाए तो उसकी आत्मा उस घटना से बच नहीं सकती क्योंकि उसे तुरंत बाहर निकलने का मार्ग नहीं मिलता। वह उसी क्षण तितर-बितर हो जाती है। पर मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ। वास्तव में, मेरा विचार है कि ऐसा कहने वाले लोग भूल करते हैं। जिस प्रकार अग्नि को दबाकर नष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि जो भी वस्तु उसे दबाती है, उसके चारों ओर से वह निकल जाती है। जिस प्रकार वायु न तो मुट्ठी के प्रहार से क्षतिग्रस्त होती है, न चाबुक की चोट से बल्कि केवल उस वस्तु के चारों ओर घूम जाती है जो उसे विचलित करती है। उसी प्रकार मन भी, जो अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व से बना है, शरीर के भीतर न तो पकड़ा जा सकता है और न ही टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है। अपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण वह उन सभी वस्तुओं के आर-पार निकल जाता है जो उस पर दबाव डालती हैं। जैसे बिजली दूर-दूर तक चमकती और फैलती है, फिर भी एक बहुत छोटे-से छिद्र से अपना मार्ग बना लेती है, उसी प्रकार मन, जो अग्नि से भी अधिक सूक्ष्म है, प्रत्येक प्रकार के शरीर के आर-पार निकल जाने में समर्थ है।

    अतः हमें इस बात की जाँच करनी चाहिए कि क्या मन अमर हो सकता है। पर कम-से-कम इस बात के प्रति तुम निश्चिंत रह सकते हो कि यदि वह शरीर के नष्ट होने के बाद भी जीवित रहता है तो किसी भी प्रकार उससे कुचला या नष्ट नहीं किया जा सकता। क्योंकि अमरता ऐसी नहीं होती जिसमें कोई अपवाद संभव हो और जो वस्तु शाश्वत है, उसे कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता।


अभी के लिए विदा 

Thursday, 9 July 2026

कोलाहल के बीच मन की स्थिरता के संदर्भ में -- पत्र - 56 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


मैं इसकी शपथ लेकर कहता हूँ, विद्वत्तापूर्ण एकांतवास के लिए उतनी निस्तब्धता आवश्यक नहीं है जितनी तुम शायद समझते हो। मेरे चारों ओर हर समय कोलाहल गूँजता रहता है क्योंकि मैं स्नानागार के ठीक ऊपर रहता हूँ।

    अपने मन में हर प्रकार के उस भयानक शोर की कल्पना करो जो कानों को चुभता है। जब बलवान पुरुष अपने व्यायाम करते हैं, हाथों में भारी वज़न झुलाते हैं और पूरी शक्ति लगाते हुए (या उसका दिखावा करते हुए) जोर लगाते हैं, तब हर बार साँस छोड़ते समय उनकी घुरघुराहट, हाँफने और भारी साँसों की आवाज़ मेरे कानों में पड़ती है। जब कोई आलसी व्यक्ति आ जाता है, जो साधारण-सी मालिश से ही संतुष्ट है, तब मैं उसके कंधों पर पड़ती हथेलियों की थपथपाहट सुनता हूँ और यह भी सुनता हूँ कि जब मालिश करने वाला हथेली को कप-जैसा बनाकर प्रहार करता है तो आवाज़ अलग होती है और जब सीधी हथेली से मारता है तो अलग। फिर यदि कोई गेंद खेलने वाला आ जाए और यह गिनना शुरू कर दे कि उसने कितनी गेंदें पकड़ीं तो समझो मेरा तो काम ही तमाम हो जाता है!


बाटिक चित्रकला 

    अब इसमें उस झगड़ालू आदमी को भी जोड़ लो। उस व्यक्ति को भी, जो चोरी करते हुए पकड़ा गया है। उस आदमी को भी, जिसे स्नानागार में अपनी ही गायकी सुनना अच्छा लगता है। उन लोगों को भी, जो बड़े धमाके के साथ पानी के कुंड में छलाँग लगा देते हैं। इन सबके अतिरिक्त, जो कम-से-कम अपनी स्वाभाविक आवाज़ में बोलते हैं, उस चिमटी से बाल उखाड़ने वाले व्यक्ति की भी कल्पना करो, जो केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनी तीखी, पतली आवाज़ में बार-बार चीखता रहता है। वह तब तक चुप नहीं होता, जब तक किसी की बगल के बाल उखाड़ते हुए उसे दर्द से चीखने पर मजबूर न कर दे। और फिर इसमें शराब बेचने वाले, सॉसेज बेचने वाले, रोटी बेचने वाले तथा तरह-तरह के पके हुए भोजन बेचने वाले फेरीवालों की पुकारें भी जोड़ लो, जो अपनी-अपनी विशिष्ट लय और स्वर में अपनी वस्तुओं का प्रचार करते रहते हैं।

    तुम कहोगे, “तुम्हारा मन तो अवश्य ही इस्पात का बना होगा या फिर तुम बहरे होगे, जो इतने तरह-तरह के और बेसुरे शोर-गुल के बीच भी अपना ध्यान बनाए रख पाते हो! हमारे अपने क्रिस्पस तो केवल निरंतर आने-जाने वाले आगंतुकों की भीड़ से ही लगभग मृत्यु के कगार पर पहुँच गए थे!” पर सच कहूँ तो मेरे लिए यह शोर-शराबा समुद्र की लहरों या गिरते हुए जल की ध्वनि से अधिक महत्त्व नहीं रखता। मैंने तो यहाँ तक सुना है कि एक जाति ने केवल इसलिए अपना पूरा नगर ही कहीं और बसाया क्योंकि वे नील नदी के एक जलप्रपात के निरंतर गर्जन को सहन नहीं कर पाते थे।

    मेरे विचार से, किसी भी प्रकार के कोलाहल की अपेक्षा मनुष्य की आवाज़ अधिक विचलित करने वाली होती है; क्योंकि आवाज़ हमारे मन को अपनी ओर खींच लेती है जबकि अन्य शोर केवल कानों में गूँजते भर हैं। मेरे चारों ओर जो ध्वनियाँ उठती रहती हैं पर मुझे विचलित नहीं करतीं, उनमें सड़क से गुजरती गाड़ियाँ, भवन में कहीं काम करता बढ़ई, पास ही आरी की धार तेज़ करने वाला कारीगर और वह व्यक्ति भी शामिल है जो मेटा सुदांस के पास बाँसुरी और तुरही का प्रदर्शन करता है। हालाँकि वह उन्हें बजाता कम है, गरजता अधिक है। फिर भी, आज भी मुझे वे आवाज़ें, जो बीच-बीच में रुक-रुककर सुनाई देती हैं, लगातार गूँजते रहने वाले एकरस शोर की अपेक्षा अधिक परेशान करती हैं। लेकिन मैंने अपने आपको इन सब ध्वनियों का इस सीमा तक अभ्यस्त बना लिया है कि अब मैं उस नाव के संचालक की अत्यन्त तीखी पुकार भी सह सकता हूँ जिससे वह चप्पू चलाने वालों को ताल देता है। देखो, मैं अपने मन को विवश करता हूँ कि वह अपना ध्यान स्वयं पर ही केंद्रित रखे और किसी भी बाहरी वस्तु से विचलित न हो। बाहर चाहे जितना भी शोर क्यों न हो, उससे कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि भीतर कोई अशांति न हो, यदि इच्छा और भय के बीच संघर्ष न चल रहा हो, यदि लोभ और भोग-विलास परस्पर एक-दूसरे के विरोध में खड़े न हों और एक-दूसरे को दोष न दे रहे हों।

आख़िर पड़ोस में पूर्ण निस्तब्धता होने से क्या लाभ, यदि मनुष्य के अपने ही मन में भावनाओं का तूफ़ान मचा हुआ हो?

    “रात्रि की विश्रामदायिनी शांति में सब कुछ शांत हो गया था।”

    यह असत्य है। वास्तविक शांति केवल वही है, जो विवेक द्वारा स्थापित की जाती है। रात्रि हमारी चिंताओं को दूर नहीं करती बल्कि उन्हें और स्पष्ट कर देती है, केवल एक चिंता के स्थान पर दूसरी चिंता ला खड़ी करती है। क्योंकि जब हम सो रहे होते हैं, तब भी हमारे स्वप्न जागृत जीवन जितने ही अशांत हो सकते हैं। सच्ची शांति हमें तभी प्राप्त होती है, जब हमारा मन उत्कृष्टता और सद्गुण की अवस्था तक विकसित हो जाता है।

    उस व्यक्ति को देखो, जो एक ऐसे घर की पूर्ण निस्तब्धता में, जहाँ सब लोग सो चुके हैं, नींद की आकांक्षा करता है। उसके कानों तक एक भी आवाज़ नहीं पहुँचती। उसके दासों का पूरा समूह मौन है। वे उसके कक्ष के सामने से भी पंजों के बल दबे पाँव निकलते हैं। फिर भी वह बार-बार करवटें बदलता रहता है, अपने दुःखों के बीच अधसोया-सा पड़ा रहता है। उन आवाज़ों की शिकायत करता है जिन्हें उसने वास्तव में सुना ही नहीं। तुम्हें क्या लगता है, इसका कारण क्या है? उसका मन ही शोर से भरा हुआ है। उसी को शांत करना चाहिए। उसी के विद्रोह को दबाना चाहिए। केवल इसलिए यह मत समझो कि शरीर स्थिर पड़ा है तो मन भी शांत है। कभी-कभी बाहरी शांति भी अपने भीतर अशांति को समेटे रहती है। इसलिए, जब हम निष्क्रियता के बोझ से दब जाएँ तो हमें स्वयं को किसी कार्य में लगा देना चाहिए या साहित्य, विद्या और कला जैसे सांस्कृतिक उपक्रमों में व्यस्त हो जाना चाहिए। क्योंकि निष्क्रियता स्वयं अपने को भी सहन नहीं कर पाती। महान सेनापति, जब देखते हैं कि उनकी सेना बेचैन होने लगी है तो वे उसे कोई-न-कोई काम सौंप देते हैं और उसके समय को लगातार मार्च तथा अभ्यासों में लगा देते हैं। जब लोग कार्य में व्यस्त रहते हैं, तब उन्हें अनुशासनहीन होने का अवसर नहीं मिलता। इससे अधिक निश्चित बात कोई नहीं कि निष्क्रियता के दोष केवल सक्रियता से ही दूर किए जा सकते हैं।

    अनेक बार राजकीय कार्यों से उत्पन्न हुई थकान और ऐसे श्रम के प्रति पुनर्विचार जिसमें न तो कोई प्रतिफल मिलता है और न ही कृतज्ञता, हमें एकांत में चले जाने के लिए प्रेरित करते हैं। कम-से-कम हमें ऐसा ही प्रतीत होता है। परंतु उस आश्रय में, जहाँ थकावट और भय हमें ले आए हैं, वहीं भीतर-ही-भीतर महत्त्वाकांक्षा फिर से पनपने लगती है। उसका उन्मूलन नहीं हुआ होता। उसने हमें सताना भी बंद नहीं किया होता। वह केवल थक गई थी या यूँ कहो कि इस बात से क्षुब्ध थी कि परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं रहीं। भोग-विलास के विषय में भी मैं यही कहता हूँ। कभी-कभी ऐसा लगता है कि उसका प्रभाव समाप्त हो गया है। लेकिन जैसे ही हम सादगीपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लेते हैं, वह फिर हमें सताने लगती है। हमारे मितव्ययी जीवन के बीच भी वह उन सुखों के पीछे दौड़ती है जिन्हें हमने वास्तव में त्यागा नहीं था बल्कि केवल उनसे दूर हो गए थे। जितना अधिक उन्हें छिपाकर रखा जाता है, उतनी ही अधिक तीव्रता से वह उनका पीछा करती है। वास्तव में, हमारे सभी दोष खुले रूप में अपेक्षाकृत कम हानिकारक होते हैं। रोग भी तभी स्वस्थ होने की दिशा में बढ़ते हैं, जब वे छिपे रहने के बजाय प्रकट हो जाते हैं और अपनी पूरी शक्ति दिखा देते हैं। इसी प्रकार जब लोभ, महत्त्वाकांक्षा और मनुष्य के मन के अन्य विकार ऊपर से शांत और स्वस्थ दिखाई देने लगें, तभी समझ लेना चाहिए कि वे अपनी सबसे अधिक घातक अवस्था में हैं।

    हम अपने आपको अवकाश में समझते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं होता। क्योंकि यदि सचमुच हमने अवकाश ग्रहण किया है, यदि वास्तव में हमने पीछे हटने का निर्णय कर लिया है, यदि हमने उन वस्तुओं से मुँह मोड़ लिया है जो केवल चमकती हैं, पर वास्तविक मूल्य नहीं रखतीं, तो फिर, जैसा कि मैं कह रहा था, कोई भी वस्तु हमें विचलित नहीं कर सकती। न मनुष्यों की बातचीत, न पक्षियों का कलरव, कुछ भी हमारे विचारों में बाधा नहीं डाल सकता। ऐसे विचारों में, जो अब उत्कृष्ट, दृढ़ और स्थिर हो चुके हैं। जो मन हल्का, चंचल और अभी तक आत्मनिरीक्षण का अभ्यस्त नहीं हुआ है, वही किसी आवाज़ या आकस्मिक घटना से विचलित हो उठता है। उसके भीतर कोई न कोई चिंता, कोई भय का अंश छिपा रहता है, जो उसे अस्थिर बनाए रखता है। हमारे कवि वर्जिल कहते हैं, 

“मैं, जो अब तक उड़ते हुए बाणों को बिना विचलित हुए सहता आया था,
और यूनानियों की धमकी देती हुई सुसज्जित सेनाओं के सामने भी अडिग रहा था,
अब हवा की सरसराहट से भी डरने लगा हूँ, अब हर आहट पर चौंक उठता हूँ,
अपने साथी और अपने बोझ—दोनों के लिए समान रूप से काँपता हुआ।”

    पहली अवस्था उस बुद्धिमान व्यक्ति की है, जो उड़ते हुए बाणों, सघन पंक्तियों में खड़ी सशस्त्र सेना या घेराबंदी के अधीन किसी नगर के कोलाहल से भी भयभीत नहीं होता। दूसरी अवस्था उस अनुभवहीन व्यक्ति की है, जो अपने ही काम-धंधों की चिंता में हर आहट पर काँप उठता है। उसे हर आवाज़ किसी आसन्न संकट की गर्जना प्रतीत होती है और ज़रा-सी हलचल भी उसे आतंकित कर देती है। उसका अपना बोझ ही उसके भय का कारण बन जाता है। उन समृद्ध लोगों में से किसी एक को चुन लो, जिनके पास ढोने के लिए बहुत-सा सामान है और जिनके पीछे बड़ी संख्या में अनुचर चलते हैं, तुम उसे भी “अपने साथी और अपने बोझ—दोनों के लिए समान रूप से काँपते हुए” देखोगे।

    इसलिए तुम निश्चिंत होकर समझ सकते हो कि तुम्हारा मन तभी वास्तव में स्थिर है, जब कोई भी शोर तुम्हारे भीतर तक नहीं पहुँचता। जब कोई भी आवाज़, चाहे वह मधुर प्रलोभन के रूप में हो, चाहे धमकी के रूप में या केवल निरर्थक कोलाहल के रूप में, तुम्हें स्वयं से विचलित नहीं कर पाती।

    “तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि कभी-कभी शोर-शराबे से दूर रहना अधिक आसान नहीं होता?”

    हाँ, मैं इसे स्वीकार करता हूँ। और इसी कारण मैं इस स्थान को छोड़ने वाला हूँ। मैं तो केवल अपनी परीक्षा लेना चाहता था, स्वयं को अभ्यास में डालना चाहता था। लेकिन जब उद्देश्य पूरा हो चुका है तो फिर मैं अनावश्यक रूप से अपने आपको क्यों कष्ट दूँ? आखिर जब यूलिसीस ने अपने साथियों के लिए इतना सरल उपाय खोज लिया था तो मैं क्यों न अपनाऊँ? वह उपाय तो सायरनों के मोहक गीतों के विरुद्ध भी सफल सिद्ध हुआ था!


अभी के लिए विराम 

Wednesday, 8 July 2026

मन की शांति के संदर्भ में -- पत्र - 55 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


अभी-अभी मैं पालकी की सवारी करके लौटा हूँ। मैं उतना ही थक गया हूँ, मानो जितनी देर मैं बैठा रहा, उतनी ही देर पैदल चला होता। लंबे समय तक दूसरों के द्वारा ढोया जाना भी एक प्रकार का श्रम है। शायद उससे भी अधिक कठिन क्योंकि यह प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति ने हमें पैर इसलिए दिए हैं कि हम स्वयं चल सकें और आँखें इसलिए दी हैं कि हम स्वयं देख सकें। विलासपूर्ण और अत्यधिक आराम का जीवन अंततः हमें दुर्बल बना देता है। जब हम किसी कार्य को लंबे समय तक करना छोड़ देते हैं तो धीरे-धीरे उसे करने की हमारी क्षमता ही समाप्त हो जाती है।



    लेकिन वास्तव में मेरे लिए इस शरीर को अच्छी तरह झकझोरना आवश्यक था ताकि यदि मेरी श्वासनली में कोई द्रव जमा हो गया हो तो वह ढीला पड़ जाए या यदि किसी कारण से मेरी साँस की नलियाँ संकुचित हो गई हों तो यह झटके उन्हें खोल दें। अनुभव से मैंने जान लिया है कि इससे मुझे कुछ लाभ अवश्य होता है। इसी कारण मैं अपेक्षा से अधिक देर तक उसी सवारी में बना रहा। समुद्रतट का वह मार्ग मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, जो क्यूमे और सर्विलियस वातिया के भवन के बीच से होकर जाता है। उसके एक ओर समुद्र है और दूसरी ओर झील। वह किसी सँकरे मार्ग के समान प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, हाल ही में आए तूफ़ान के कारण वह मार्ग काफ़ी सख्त और मजबूत हो गया था। जैसा कि तुम जानते हो, जब लहरें लगातार और तीव्र गति से आती हैं तो वे रेत को दबाकर उसे ठोस बना देती हैं जबकि लंबे समय तक शांत मौसम रहने पर, रेत को बाँधे रखने वाली नमी सूख जाती है और वह फिर ढीली पड़ जाती है।

    अपनी आदत के अनुसार मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ानी शुरू की, यह देखने के लिए कि वहाँ ऐसी कौन-सी बात है जिससे मुझे कोई लाभदायक शिक्षा मिल सके।

मेरी दृष्टि उस भवन पर जाकर ठहर गई जो कभी वातिया का था। वहीं वह धनी भूतपूर्व प्रेटर अपने बुढ़ापे तक रहा। विश्राम और एकांत के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से वह प्रसिद्ध नहीं था। केवल इसी कारण लोग उसे भाग्यशाली समझते थे। जब भी कोई व्यक्ति ऐसीनियस गेलस (Asinius Gallus) से मित्रता के कारण या सेजानस (Sejanus) की शत्रुता के कारण और बाद में उसके प्रेम या मित्रता के कारण भी क्योंकि सेजानुस का मित्र होना उतना ही खतरनाक हो गया था जितना उसका शत्रु होना, विनष्ट हो जाता था, तब लोग कहा करते थे, “हे वातिया! केवल तुम ही जानते हो कि जीवन कैसे जिया जाता है!” किन्तु वास्तव में वह जीना नहीं बल्कि स्वयं को छिपाकर रखना जानता था। आराम और अवकाश का जीवन जीने तथा भय के कारण संसार से छिप जाने में बहुत बड़ा अंतर होता है। वातिया के जीवनकाल में मैं जब भी उस भवन के पास से गुज़रता था, तो यही कहा करता था, “यहाँ वातिया दफ़न है।”

    फिर भी, प्रिय लूसीलियस, दर्शन इतना पवित्र और इतना सम्मान के योग्य है कि जो वस्तु केवल उसका आभास भी देती है, वह भी कुछ संतोष प्रदान करती है, चाहे वह केवल उसका बाहरी दिखावा ही क्यों न हो। जब कोई व्यक्ति एकांत और अवकाश का जीवन बिताता है तो सामान्य लोग प्रायः यह समझ लेते हैं कि वह आत्मचिंतन में लीन है, शांत है, आत्मनिर्भर है और अपने लिए जी रहा है। जबकि वास्तव में ये गुण केवल बुद्धिमान व्यक्ति में ही होते हैं। वास्तव में केवल वही व्यक्ति अपने लिए जीना जानता है क्योंकि वही जीना जानता है। यही सबसे पहली आवश्यकता है। परन्तु जो व्यक्ति संसार और लोगों से भाग जाता है, जिसकी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए वह स्वयं निर्वासन में चला गया, जो दूसरों को अपने से अधिक समृद्ध देखकर सहन नहीं कर सका या जो किसी आलसी और भयभीत पशु की तरह डरकर अपने बिल में छिप गया, वह अपने लिए नहीं जी रहा होता। वह तो, और इससे अधिक लज्जाजनक क्या होगा, केवल अपने पेट के लिए, अपनी नींद के लिए और अपनी वासनाओं के लिए जी रहा होता है। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी और के लिए नहीं जी रहा, यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने लिए जी रहा है। फिर भी, उद्देश्य की दृढ़ता और अपने संकल्प पर अटल बने रहने का गुण इतना महान है कि यदि कोई व्यक्ति अपने चुने हुए एकांत और निष्क्रियता पर भी निरंतर स्थिर बना रहे तो उसका वह निष्क्रिय जीवन भी लोगों के सम्मान का पात्र बन जाता है।

    जहाँ तक उस भवन का प्रश्न है, उसके बारे में मैं तुम्हें निश्चित रूप से कुछ नहीं लिख सकता। मैं केवल उतना ही जानता हूँ जितना बाहर से दिखाई देता है। उसका अग्रभाग और वे अन्य हिस्से जो राहगीरों की दृष्टि में आते हैं। उसमें दो कृत्रिम गुफाएँ हैं, जिन्हें अत्यन्त परिश्रम से बनाया गया है। वे किसी भी विशाल प्रांगण जितनी बड़ी हैं। उनमें से एक में सूर्य का प्रकाश बिल्कुल प्रवेश नहीं करता जबकि दूसरी में सूर्यास्त तक प्रकाश बना रहता है। वहाँ चनार (प्लेन) के वृक्षों का एक उपवन भी है जिसके बीच से एक नहर बहती है। वह नहर अकेरोन झील और समुद्र को उसी प्रकार जोड़ती है जैसे यूरिपुस जलडमरूमध्य। यदि नियमित रूप से भी वहाँ से मछलियाँ पकड़ी जाएँ तो भी वह नहर निरंतर मछलियों की आपूर्ति कर सकती है। किन्तु जब तक समुद्र में मछली पकड़ना संभव रहता है, तब तक उसका उपयोग नहीं किया जाता। केवल जब तूफ़ान के कारण समुद्र मछुआरों के लिए अनुपयोगी हो जाता है, तब वह नहर तुरंत उपयोग के लिए उपलब्ध हो जाती है।

    किन्तु उस भवन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसके बिल्कुल निकट बाइए का प्रसिद्ध विश्राम-स्थल स्थित है। इस प्रकार वह बाइए की असुविधाओं से तो मुक्त रहता है पर उसके सुख-सुविधाओं का आनंद भी प्राप्त कर लेता है। मैं भी स्वीकार करता हूँ कि ये उसके वास्तविक गुण हैं। मुझे यह भी लगता है कि वह भवन पूरे वर्ष रहने के लिए उपयुक्त है, क्योंकि वहाँ पश्चिमी हवा अच्छी तरह पहुँचती है। बल्कि वह स्वयं ऐसी स्थिति में है कि बाइए तक उस हवा के पहुँचने में भी कुछ रुकावट उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार, अपने एकांत और विश्राम के जीवन के लिए इस स्थान का चुनाव करने में वातिया कोई मूर्ख नहीं था।

    वास्तव में, किसी स्थान का मन की शांति में बहुत अधिक योगदान नहीं होता। सबसे महत्त्वपूर्ण बात वह मन है, जो प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुकूल बना लेना जानता है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सुखद, सुंदर और आनंददायक भवनों में रहते हुए भी उदास और व्यथित रहते हैं। ऐसे लोगों को भी देखा है जो पूर्ण एकांत में रहकर भी इतने व्यस्त और सक्रिय दिखाई देते हैं मानो उनके पास अनगिनत कार्य हों। इसलिए केवल इस कारण अपने आपको कम भाग्यशाली मत समझो कि तुम कैंपानिया में नहीं रहते। फिर भी, क्यों न विचारों के माध्यम से यहीं आ जाओ? अपने मन को सदा इसी दिशा में ले आया करो। मित्रों से उनकी अनुपस्थिति में भी बातचीत की जा सकती है। वास्तव में, तुम ऐसा जितनी बार चाहो और जितनी देर चाहो, उतनी देर तक कर सकते हो। यह आनंद, निस्संदेह बहुत बड़ा आनंद है। हम वास्तव में तब अधिक अनुभव करते हैं जब हम एक-दूसरे से दूर होते हैं। क्योंकि निरंतर साथ रहने से हम एक-दूसरे के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि साथ बैठने, साथ चलने और साथ बातचीत करने के बाद, जब अलग होते हैं तो उन्हीं लोगों के बारे में भी सोचना छोड़ देते हैं जिन्हें हम अभी कुछ ही समय पहले देखकर आए होते हैं।

    और एक कारण यह भी है कि हमें अपने बिछोह को शांत मन से स्वीकार करना चाहिए। वह यह कि जो लोग हमारे बिल्कुल निकट रहते हैं, उनसे भी हम अधिकांश समय अलग ही रहते हैं। ज़रा सोचो, सबसे पहले तो रात हमें एक-दूसरे से अलग कर देती है। फिर प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहता है। उसके बाद एकांत में अध्ययन करने का समय होता है और आस-पास के स्थानों की यात्राएँ भी होती हैं। यदि इन सबको जोड़कर देखो तो समझ में आएगा कि दूर की दूरी वास्तव में हमसे बहुत थोड़ा ही छीन पाती है। मित्र को अपने मन में सदा सँजोए रखना चाहिए क्योंकि मन कभी अनुपस्थित नहीं होता। वह प्रतिदिन जिस किसी से मिलना चाहे, उससे मिल सकता है। इसलिए मेरे साथ अध्ययन करो! मेरे साथ भोजन करो! मेरे साथ सैर करो! हमारे विचारों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। यदि ऐसा संभव होता तो हमारा जीवन सचमुच किसी मठ या कारागार में बंद जीवन के समान हो जाता। प्रिय लूसीलियस, मैं तुम्हें देखता हूँ। मैं तुम्हें सुनता हूँ— उतनी ही स्पष्टता से, जितनी पहले। मैं अपने आपको तुम्हारे इतना निकट अनुभव करता हूँ कि मुझे तो ऐसा लगता है, मानो तुम्हें पत्रों के स्थान पर प्रतिज्ञा-पत्र (हस्तलिखित दस्तावेज़) भेजने ही वाला हूँ।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के दर्शन के संदर्भ में -- पत्र - 54 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


अस्वस्थता ने मुझे लंबे समय तक कुछ राहत दी थी। परन्तु अचानक उसने फिर मुझ पर आक्रमण कर दिया। तुम पूछोगे, “इस बार क्या तकलीफ़ थी?” और तुम्हारा यह प्रश्न उचित भी है क्योंकि ऐसा कोई रोग नहीं है जिससे मेरा कभी परिचय न हुआ हो। किन्तु एक रोग ऐसा है जिसने मानो मुझे पूरी तरह अपने अधिकार में ले रखा है। भला मैं उसका यूनानी नाम क्यों लूँ? मैं उसे सरल शब्दों में 'साँस फूलना' या 'घरघराहट' ही कह सकता हूँ। यही नाम उसके लिए पर्याप्त और उपयुक्त है।


इथोपिया कलाचित्र 

    इसका दौरा बहुत थोड़े समय के लिए आता है बिल्कुल किसी अचानक उठने वाले तूफ़ानी झोंके की तरह। प्रायः वह एक घंटे के भीतर ही समाप्त हो जाता है। आखिर कोई व्यक्ति बहुत देर तक अंतिम साँस की अवस्था में तो नहीं रह सकता! शरीर की लगभग हर प्रकार की पीड़ा और हर संकट से मैं गुज़र चुका हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि इससे अधिक कष्टदायक कुछ नहीं है। और ऐसा क्यों न हो? अन्य सभी रोगों में मनुष्य केवल बीमार होता है। पर इस रोग में ऐसा लगता है मानो उसके प्राण ही शरीर से बाहर निकल रहे हों। इसी कारण चिकित्सक इसे 'मृत्यु का पूर्वाभ्यास' कहते हैं क्योंकि यह साँस का अवरोध कई बार वही करने का प्रयास करता है, जिसे एक दिन मृत्यु वास्तव में पूरा कर देती है। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह सब तुम्हें बड़े आनंद से लिख रहा हूँ, केवल इसलिए कि मैं इस बार बच निकला? यदि मैं इस थोड़ी-सी राहत पर ऐसे प्रसन्न होऊँ मानो मैं पूर्णतः स्वस्थ हो गया हूँ तो मैं उतना ही हास्यास्पद होऊँगा, जितना वह व्यक्ति जो केवल इसलिए यह समझ बैठे कि उसने अपना मुक़दमा जीत लिया है क्योंकि उसकी सुनवाई कुछ समय के लिए टल गई है।

    फिर भी, जब मेरा दम घुट रहा था, तब भी मैं प्रसन्न और साहसपूर्ण विचारों के सहारे अपनी मानसिक शांति बनाए रखने में सफल रहा। मैंने अपने आप से कहा, “यह क्या है? क्या मृत्यु बार-बार मेरी परीक्षा ले रही है? तो लेने दो। मैं भी बहुत पहले उसकी परीक्षा ले चुका हूँ।” तुम पूछोगे, “कब?” जन्म लेने से पहले। मृत्यु तो केवल अस्तित्व का अभाव है। यह कैसी अवस्था होती है, मैं पहले से ही जानता हूँ। मेरे बाद जो स्थिति होगी, वही तो मेरे जन्म से पहले भी थी। यदि इस अवस्था में कोई यातना होती तो हमारे इस संसार का प्रकाश देखने से पहले भी अवश्य ही वह यातना रही होती। पर उस समय तो हमें किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं हुआ था।

    मैं तुमसे पूछता हूँ। क्या तुम उस व्यक्ति को अत्यन्त मूर्ख नहीं कहोगे, जो यह समझे कि एक दीपक बुझ जाने के बाद, जलाए जाने से पहले की अपेक्षा अधिक बुरी अवस्था में होता है? हम भी उसी दीपक के समान हैं। हम प्रज्वलित होते हैं और फिर बुझ जाते हैं। इन दोनों अवस्थाओं के बीच ही कुछ समय ऐसा होता है, जब हमें अनुभव और चेतना होती है। परन्तु दोनों ओर केवल पूर्ण अनस्तित्व और किसी भी प्रकार की अनुभूति का अभाव है। प्रिय लूसीलियस, यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम समझते हैं कि मृत्यु केवल जीवन के बाद आती है। वास्तव में, मृत्यु जीवन से पहले भी होती है और उसके बाद भी। जो कुछ हमारे जन्म से पहले था, वही तो मृत्यु थी। फिर अंत हो जाने और कभी आरम्भ ही न होने में क्या अंतर है? दोनों का परिणाम एक ही है—अनस्तित्व।

    इन उत्साहवर्धक विचारों से और इसी प्रकार के अनेक अन्य विचारों से, मैं निरंतर अपने आपको धैर्य और साहस देता रहा। स्वाभाविक ही है कि मैं उन्हें बोलकर नहीं कह सकता था क्योंकि मेरे पास बोलने के लिए साँस ही नहीं बची थी। फिर धीरे-धीरे मेरी घरघराहट, जो पहले ही हाँफने में बदल चुकी थी, अधिक लंबे अंतराल पर आने लगी। उसके बाद उसकी तीव्रता कम होती गई और अंततः मेरी साँस कुछ स्थिर हो गई। फिर भी, अब जबकि वह दौरा समाप्त हो चुका है, मेरी साँस अभी तक पूरी तरह स्वाभाविक नहीं हुई है। अब भी उसमें एक प्रकार का रुकाव, अटकाव और झिझक-सी बनी रहती है।

    तो ऐसा ही सही, जब तक कि मैं जान-बूझकर आहें नहीं भर रहा हूँ! मैं तुम्हें यह वचन देता हूँ। अपने जीवन के अंत के समय मैं भय से नहीं काँपूँगा। मैं पहले से ही उसके लिए तैयार हूँ। मैं अपने जीवन की कुल अवधि के बारे में तनिक भी चिंता नहीं करता। प्रशंसा और अनुकरण उसी व्यक्ति का करना चाहिए जो जीवन का आनंद तो लेता है, परन्तु मृत्यु आने पर उससे विमुख या अनिच्छुक नहीं होता। आखिर उस व्यक्ति में क्या विशेष गुण है, जो केवल तब जीवन छोड़ता है जब उसे उससे बलपूर्वक अलग कर दिया जाता है? फिर भी, इसमें भी एक सद्गुण है। यद्यपि मुझे सचमुच जीवन से बाहर किया जा रहा है फिर भी मैं इस प्रकार विदा हो रहा हूँ मानो यह मेरा अपना स्वेच्छापूर्ण प्रस्थान हो।

    इसी कारण बुद्धिमान व्यक्ति को वास्तव में कभी भी जीवन से बलपूर्वक बाहर नहीं किया जाता। क्योंकि बलपूर्वक निकाला जाना उसी को कहा जाता है जिसे उस स्थान से हटाया जाए, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता। परन्तु ज्ञानी पुरुष ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिसे वह अनिच्छा से करे। वह अनिवार्यता पर इस प्रकार विजय प्राप्त कर लेता है कि जो कार्य परिस्थितियों की अनिवार्यता उससे किसी भी स्थिति में करवाने वाली है, उसे वह अपनी इच्छा से ही करने लगता है।


अभी के लिए विदा 

दर्शन की शक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 53 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


ऐसी कौन-सी बात है जिसके लिए मुझे राज़ी न किया जा सके? इस बार तो मुझे समुद्र-मार्ग से यात्रा करने के लिए भी मना लिया गया! जब मैं रवाना हुआ, तब समुद्र बिल्कुल शांत था। हाँ, आकाश पर चितकबरे बादल अवश्य छाए हुए थे। वैसे बादल जो प्रायः वर्षा या आँधी में बदल जाते हैं। फिर भी मैंने सोचा कि तुम्हारे नगर पार्थेनोपे से पुटेओली तक की दूरी इतनी कम है कि अनिश्चित और भय उत्पन्न करने वाले मौसम में भी यह यात्रा पूरी की जा सकती है। इसलिए मैंने शीघ्र पहुँचने के उद्देश्य से गहरे समुद्र का मार्ग अपनाया और सीधे नेसिस द्वीप की ओर बढ़ चला ताकि सभी खाड़ियों को छोड़कर निकट का रास्ता ले सकूँ।


इथियोपिया - कलाचित्र 

    जैसे ही मैं उस स्थान पर पहुँचा जहाँ आगे बढ़ने और लौट जाने— दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया था। वैसे ही वह शांत समुद्र जिसने मुझे यात्रा के लिए आकर्षित किया था, वैसा नहीं रहा। अभी पूर्ण तूफ़ान तो नहीं आया था पर समुद्र की लहरें तिरछी होकर उठने लगी थीं और वे लगातार अधिक ऊँची तथा अधिक बार आने लगीं। मैंने नाविक से आग्रह किया कि वह मुझे कहीं किनारे उतार दे। पर उसने कहा कि तट पथरीला है, वहाँ कहीं भी जहाज़ ठहराने का सुरक्षित स्थान नहीं है और तूफ़ान के समय उसे समुद्र से अधिक भय भूमि से लगता है। किन्तु मेरी अवस्था इतनी खराब हो चुकी थी कि मुझे किसी भी खतरे की परवाह नहीं रही। मुझे वह लगातार बनी रहने वाली समुद्री बीमारी हो गई थी जो मितली तो उत्पन्न करती है। पर उल्टी होने पर भी राहत नहीं देती। आखिरकार मैंने नाविक पर ज़ोर डाला और उसे विवश कर दिया कि वह चाहे उसकी इच्छा हो या न हो, नाव को किनारे की ओर मोड़ दे।

    जैसे ही हम तट के निकट पहुँचे, मैंने वर्जिल (Virgil) के बताए हुए निर्देशों की प्रतीक्षा नहीं की। न इस बात की कि 'जहाज़ का अग्रभाग समुद्र की ओर मोड़ा जाए' और न ही इस बात की कि 'जहाज़ के अगले भाग से लंगर डाला जाए।' अपनी तैरने की क्षमता को याद करते हुए क्योंकि मैं बहुत पहले से अच्छा तैराक रहा हूँ। मैंने एक शीत-जल स्नान के उत्साही व्यक्ति की भाँति अपना चोगा पहने-पहने ही समुद्र में छलाँग लगा दी। ज़रा कल्पना करो कि टूटती हुई लहरों के बीच रास्ता खोजते हुए, अपना मार्ग बनाते हुए, मैं किस प्रकार लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ा और कितनी कठिनाइयाँ झेलीं। तभी मुझे समझ में आया कि नाविकों को भूमि से भय क्यों लगता है। यह विश्वास करना कठिन है कि मैंने केवल इसलिए इतनी यातना सही क्योंकि मैं अपनी ही अवस्था को और अधिक सहन नहीं कर पा रहा था। मैं तुम्हें बताता हूँ, ओडीसियस (Odysseus) के साथ हर जगह जहाज़-डूबने की घटनाएँ इसलिए नहीं हुईं कि समुद्र उसके प्रति क्रोधित था। बल्कि उसका कारण यह था कि वह स्वयं समुद्री बीमारी का शिकार हो जाता था। यदि मुझे समुद्र-मार्ग से ही यात्रा करनी पड़े तो जहाँ भी जाना होगा वहाँ पहुँचने में मुझे भी बीस वर्ष लग जाएँगे!

    जैसे ही मेरा पेट कुछ संभला क्योंकि तुम जानते ही हो कि समुद्री बीमारी से छुटकारा पाना, समुद्र से बाहर निकल आने की अपेक्षा अधिक समय लेता है। जैसे ही मैंने शरीर को तरोताज़ा करने के लिए उस पर तेल लगाया, मैं यह सोचने लगा कि हम अपनी कमियों को कितनी आसानी से भूल जाते हैं। हम अपने शरीर की उन स्पष्ट कमियों तक को भूल जाते हैं, जो हर समय हमें अपनी उपस्थिति का एहसास कराती रहती हैं। फिर जो दोष बाहर से दिखाई ही नहीं देते, उन्हें तो हम और भी अधिक भूल जाते हैं। और आश्चर्य यह है कि जितने बड़े दोष होते हैं, उन्हें पहचानना उतना ही कठिन होता है। हल्का-सा ज्वर मनुष्य को धोखा दे सकता है। पर जब वह बढ़कर वास्तविक बीमारी का रूप ले लेता है, तब सबसे कठोर और सहनशील व्यक्ति भी यह स्वीकार करने के लिए विवश हो जाता है कि वह बीमार है। यदि पैरों में दर्द हो या जोड़ों में हल्की-सी चुभन महसूस हो तो हम उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम कह देते हैं कि शायद टखना मुड़ गया है या अधिक परिश्रम करने से ऐसा हो गया है। जब तक बीमारी आरम्भिक अवस्था में होती है और उसके विषय में संदेह बना रहता है, तब तक हम उसे कोई-न-कोई सुविधाजनक नाम दे देते हैं। लेकिन जब वही रोग पिंडलियों को जकड़ने लगता है और दोनों पैरों को विकृत कर देता है, तब हमें स्वीकार करना ही पड़ता है कि यह गठिया है। किन्तु मन के रोगों के साथ स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है। वहाँ जितना अधिक मनुष्य रोगग्रस्त होता है, उतना ही कम उसे अपने रोग का बोध होता है।

    इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, प्रिय लूसीलियस। जब मनुष्य केवल हल्की नींद में होता है, तब उसे अपने आस-पास की कुछ बातें अनुभव होती रहती हैं। कभी-कभी उसे यह भी पता होता है कि वह सो रहा है। परन्तु गहरी नींद तो स्वप्नों तक को मिटा देती है। वह मन को इतनी गहराई में डुबो देती है कि उसे अपने अस्तित्व तक का बोध नहीं रहता। लोग अपने दोषों को स्वीकार क्यों नहीं करते? इसलिए कि वे अभी भी उन्हीं दोषों के वश में जी रहे होते हैं। स्वप्न का वर्णन वही कर सकता है जो जाग चुका हो; उसी प्रकार अपने दोषों को स्वीकार कर लेना भी इस बात का संकेत है कि मनुष्य मानसिक रूप से स्वस्थ होने लगा है।

    आओ, हम जाग उठें ताकि अपनी भूलों को पहचान सकें। किन्तु हमें जगा सकने वाली केवल एक ही शक्ति है—दर्शन। वही हमें इस गहरी निद्रा से जगाकर सचेत कर सकता है। अपने आपको पूरी तरह दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। तुम उसके योग्य हो और वह तुम्हारे योग्य है। एक-दूसरे को दृढ़ता से अपना लो। दूसरे सभी दावों को साहस और स्पष्टता के साथ अस्वीकार कर दो। ऐसा कोई कारण नहीं कि तुम दर्शन का अध्ययन केवल अपने अवकाश के समय में ही करो। यदि तुम बीमार होते तो अपने घर-परिवार के दायित्वों से कुछ समय के लिए अलग हो जाते। अपने व्यवसाय और कार्यों की चिंता छोड़ देते। किसी का मुकदमा भी तुम्हारे लिए इतना महत्त्वपूर्ण न होता कि रोग के फिर से उभर आने की आशंका रहते हुए भी तुम न्यायालय पहुँच जाते। तब तुम्हारा पूरा प्रयास केवल एक ही उद्देश्य में लगा रहता— यथाशीघ्र रोगमुक्त होना। तो फिर अब ऐसा क्यों नहीं करते? जो कुछ भी तुम्हारे मार्ग में बाधा बन रहा है, उसे दूर कर दो। अपने मन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए समय निकालो। जो व्यक्ति सांसारिक कार्यों और निरंतर व्यस्तताओं में उलझा रहता है, वह कभी भी आत्मिक उत्कृष्टता और सच्चे ज्ञान की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता।

    दर्शन अपनी सत्ता और अधिकार का दावा करता है। वह हमें समय प्रदान करता है। वह केवल उतने समय से संतुष्ट नहीं होता जितना हम उसे देना चाहें। दर्शन कोई अवकाश के समय का शौक नहीं बल्कि पूर्णकालिक साधना है। वह हमारा मार्गदर्शक और स्वामी है, जो हमें अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश देता है। एक बार सिकंदर महान (Alexander the Great) से एक नगर ने यह वचन दिया कि वह उसे अपनी खेती योग्य भूमि का एक भाग और अपनी समस्त उपज का आधा हिस्सा देगा। इस पर उसने उत्तर दिया, “मैं एशिया इसलिए नहीं आया हूँ कि तुम मुझे जो देना चाहो, वही स्वीकार कर लूँ बल्कि मैं इसलिए आया हूँ कि जो कुछ मैं तुम्हारे लिए छोड़ दूँ, वही तुम्हारे पास रह सके।” दर्शन भी प्रत्येक परिस्थिति में यही बात कहता है,  “मैं तुम्हारे बचे-खुचे समय को स्वीकार करने नहीं आया हूँ बल्कि जो समय मैं अस्वीकार कर दूँगा, केवल वही तुम्हारे लिए बचेगा।”

    अपने संपूर्ण मन को दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। दर्शन के समीप बैठो, उसकी सेवा करो। तब तुम सामान्य मनुष्यों से बहुत ऊपर उठ जाओगे। सभी नश्वर मनुष्य तुमसे बहुत पीछे रह जाएँगे और देवता भी तुमसे बहुत अधिक आगे नहीं होंगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि तब तुम्हारे और देवताओं के बीच क्या अंतर रह जाएगा? केवल इतना कि उनका अस्तित्व तुमसे अधिक समय तक रहता है। किन्तु किसी विशाल और पूर्ण वस्तु को एक लघु कृति में समेट देना ही तो महान कलाकार की वास्तविक पहचान है। उसी प्रकार, बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उसका सीमित जीवन उतना ही व्यापक और पूर्ण होता है, जितना ईश्वर के लिए समस्त काल। बल्कि एक अर्थ में ज्ञानी मनुष्य ईश्वर से भी श्रेष्ठ होता है। ईश्वर तो अपनी प्रकृति के कारण निर्भय है; परन्तु ज्ञानी मनुष्य उसी निर्भयता को अपने स्वयं के प्रयास और साधना से प्राप्त करता है। निस्संदेह, यह अत्यन्त महान उपलब्धि है कि मनुष्य अपनी मानवीय दुर्बलताओं के साथ रहते हुए भी ईश्वर जैसी शांति और समत्व को बनाए रखे।

    यह आश्चर्यजनक है कि भाग्य के सभी आक्रमणों को परास्त कर देने की शक्ति दर्शन में कितनी प्रबल होती है। कोई भी अस्त्र उसके शरीर में धँस नहीं सकता। उसकी रक्षा-व्यवस्था अभेद्य होती है। जब भाग्य के बाण उसकी ओर आते हैं, तब वह या तो झुककर उन्हें अपने ऊपर से निकल जाने देता है अथवा अडिग खड़ा रहता है और उन्हें इस प्रकार लौटा देता है कि वे प्रहार करने वाले की ओर ही पलट जाते हैं।


अभी के लिए विदा 

दर्शन का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित करने के संदर्भ में -- पत्र - 52 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


प्रिय लूसीलियस, वह क्या है जो हमें उस दिशा के विपरीत खींच ले जाता है, जिधर हम जाना चाहते हैं, जो हमें उसी स्थान की ओर वापस धकेल देता है, जहाँ से हम दूर जाना चाहते हैं? वह क्या है जो हमारे मन से संघर्ष करता रहता है और हमें किसी एक बात को एक बार और सदा के लिए पूरे मन से चाहने नहीं देता? हम एक योजना से दूसरी योजना के बीच डगमगाते रहते हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं होती जिसे हम स्वतंत्र रूप से बिना किसी शर्त के और सदा के लिए चाहें। तुम कहोगे, "किसी बात का दृढ़ निश्चय न कर पाना, किसी एक विकल्प पर स्थिर न रह पाना— यही तो मूर्खता है।" किन्तु हम इस मूर्खता से स्वयं को कैसे मुक्त करें और कब? कोई भी व्यक्ति इतना समर्थ नहीं होता कि वह केवल अपने बल पर तैरकर सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाए। किसी को अपना हाथ बढ़ाना पड़ता है। किसी को उसे पकड़कर ऊपर खींचना पड़ता है।



    एपिक्यूरस (Epicurus) कहते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी की सहायता के बिना ही सत्य तक पहुँच जाते हैं। वे अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं। वे ऐसे लोगों की सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं जिनकी प्रेरणा और प्रगति उनके अपने भीतर से उत्पन्न होती है। वे यह भी कहते हैं कि कुछ लोगों को किसी दूसरे के सहारे की आवश्यकता होती है। यदि कोई उनसे पहले मार्ग न दिखाए तो वे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। किन्तु वे अच्छे अनुयायी सिद्ध होते हैं। उनके अनुसार मिटरोडोरस (Metrodorus) इसी दूसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। यह भी एक उत्कृष्ट बुद्धि है, यद्यपि प्रथम श्रेणी की नहीं बल्कि दूसरी श्रेणी की। हम भी प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों में नहीं आते। हमारे लिए इतना ही बहुत है कि हमें दूसरी श्रेणी में स्थान मिल जाए। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें उस व्यक्ति को तुच्छ समझना चाहिए जो किसी दूसरे की कृपा और मार्गदर्शन से सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाता है। बचाए जाने की इच्छा और तत्परता भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।

    इन दोनों प्रकार के लोगों के अतिरिक्त तुम्हें एक तीसरी श्रेणी के लोग भी मिलेंगे और उन्हें भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। ये वे लोग हैं जिन्हें सही मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना पड़ता है, यहाँ तक कि कभी-कभी बाध्य भी करना पड़ता है। उन्हें केवल एक मार्गदर्शक ही नहीं बल्कि एक सहायक और मानो किसी प्रशिक्षक की भी आवश्यकता होती है। यह तीसरी श्रेणी है। यदि तुम इसका भी एक उदाहरण चाहते हो तो एपिक्यूरस कहते हैं कि हर्मरकुस (Hermarchus) ऐसे ही व्यक्ति थे। इसी कारण वे एक के लिए अधिक बधाई प्रकट करते हैं। किन्तु दूसरे के प्रति अधिक प्रशंसा व्यक्त करते हैं। क्योंकि यद्यपि दोनों अंततः एक ही लक्ष्य तक पहुँच गए फिर भी अधिक कठिन स्वभाव और सामग्री के साथ उसी परिणाम को प्राप्त करना अधिक प्रशंसनीय होता है।

    मान लो कि दो भवन बनाए गए हैं और दोनों एक समान हैं, ऊँचाई में भी और भव्यता में भी। एक भवन ऐसी भूमि पर बनाया गया जहाँ ज़मीन दृढ़ और ठोस थी। इसलिए उसका निर्माण शीघ्रता से पूरा हो गया। दूसरे भवन की नींव ढीली और खिसकने वाली मिट्टी पर रखी जानी थी। उसे मजबूत और स्थिर बनाने में बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ा, तभी निर्माण आगे बढ़ सका। पहले निर्माणकर्ता का कार्य तो सबकी आँखों के सामने दिखाई देता है पर दूसरे के परिश्रम का सबसे बड़ा और सबसे कठिन भाग दर्शकों की दृष्टि से ओझल रहता है क्योंकि वह नींव को मजबूत करने में लगा होता है। इसी प्रकार कुछ लोगों का स्वभाव सहज और बिना किसी विशेष बाधा के विकसित हो जाता है जबकि कुछ अन्य, जैसा कि कहा जाता है, “हाथों के कठिन परिश्रम का काम” होते हैं। उन्हें सबसे पहले अपने चरित्र की नींव को ही मजबूत बनाने में जुटना पड़ता है। इसलिए मैं कहूँगा कि जिसे अपने ही स्वभाव से संघर्ष नहीं करना पड़ता, वह निश्चय ही अधिक भाग्यशाली है। किन्तु वास्तविक प्रशंसा का अधिक अधिकारी वह है जिसने अपने स्वभाव की कमजोरियों पर विजय प्राप्त की हो, जो केवल बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ा ही नहीं बल्कि अपने आपको खींचते हुए, संघर्ष करते हुए, वहाँ तक पहुँचाया हो।

    जिस बुद्धि और मन पर हमें कार्य करना है, वह कठोर और आसानी से न झुकने वाला है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लेना ही उचित है। हमारे मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। अतः हमें उनका डटकर सामना करना चाहिए और सहायता के लिए अतिरिक्त शक्ति भी बुला लेनी चाहिए।

    तुम पूछते हो, “मैं किसे बुलाऊँ? इस व्यक्ति को या उस व्यक्ति को?” वास्तव में, तुम्हें अपने पूर्वजों और प्राचीन महान व्यक्तियों की ओर भी लौटना चाहिए। वे किसी काम में व्यस्त नहीं हैं। केवल जीवित लोग ही हमारी सहायता नहीं कर सकते। जो इस संसार से जा चुके हैं, वे भी अपने विचारों और शिक्षाओं के माध्यम से हमारी सहायता कर सकते हैं।

    फिर भी, जहाँ तक जीवित लोगों का प्रश्न है, हमें ऐसे लोगों को नहीं चुनना चाहिए जो शब्दों की बाढ़ बहा देते हैं, घिसी-पिटी बातें दोहराते रहते हैं और घर में भी मानो भीड़ को संबोधित कर रहे हों। इसके बजाय, हमें ऐसे लोगों को अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए जो अपने जीवन के आचरण से शिक्षा देते हैं। वे केवल यह नहीं बताते कि क्या करना चाहिए बल्कि स्वयं वैसा करके भी दिखाते हैं। और जिन बातों से बचने की शिक्षा वे देते हैं, बाद में तुम उन्हें स्वयं वही करते हुए नहीं पाओगे। अपने सहायक के रूप में ऐसे व्यक्ति को चुनो, जिसे देखकर तुम उससे उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक प्रभावित और सम्मानित हो जाओ, जितना केवल उसकी बातें सुनकर होते हो।

    इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो सामान्यतः श्रोताओं के सामने व्याख्यान देते हैं। मैं तुम्हें उनकी बातें सुनने से भी नहीं रोकता बशर्ते कि वे लोगों के बीच यश और प्रतिष्ठा पाने की महत्त्वाकांक्षा से न जाएँ बल्कि केवल इस उद्देश्य से जाएँ कि वे अपने श्रोताओं का भी और अपना भी सुधार कर सकें। क्योंकि प्रशंसा की भूखी दर्शन-विद्या से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं हो सकता। क्या कोई रोगी उस चिकित्सक की प्रशंसा करता है जो उसका शल्य-चिकित्सा द्वारा उपचार कर रहा हो?

    इसलिए तुम सब शांत रहो और मौन रहकर अपना उपचार होने दो। यदि तुम पीड़ा में चिल्लाओ भी, तब भी मैं तुम्हारी बात उसी प्रकार सुनूँगा, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की कराह सुनता हूँ जिसके घाव पर हाथ लग गया हो। क्या तुम यह प्रकट करना चाहते हो कि तुम ध्यानपूर्वक सुन रहे हो और विषय की महानता से तुम्हारा हृदय प्रभावित हुआ है? निश्चय ही ऐसा कर सकते हो। मैं इसकी अनुमति क्यों न दूँ, जब तक कि तुम्हारी प्रतिक्रिया अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के विचारों के समर्थन और सम्मान की अभिव्यक्ति हो?

    पायथागोरस (Pythagoras) के शिष्यों को पाँच वर्षों तक मौन रहने का अभ्यास कराया जाता था। इसलिए क्या तुम यह समझते हो कि जब उन्हें बोलने का अधिकार मिला तो उसी क्षण उन्हें प्रशंसा करने का अधिकार भी मिल गया? लेकिन अशिक्षित लोगों की तालियों और जय-जयकार से रोमांचित होकर सभा से बाहर निकलना वास्तव में अत्यन्त मूर्खता है। तुम उन लोगों की प्रशंसा से प्रसन्न क्यों होते हो, जिनकी प्रशंसा तुम स्वयं करने योग्य नहीं समझते? पापिरीअस फैबियानस (Papirius Fabianus) श्रोताओं के सामने व्याख्यान दिया करते थे। किन्तु लोग उन्हें बड़े संयम और गंभीरता के साथ सुनते थे। कभी-कभी उनके मुख से प्रशंसा के उद्गार अवश्य फूट पड़ते थे, परन्तु वे किसी अलंकृत वाक्पटुता या भाषण-कौशल के कारण नहीं, बल्कि विषय की गहनता और महत्ता से उत्पन्न होते थे। नाट्यशाला में बजने वाली तालियों और व्याख्यान-सभा में व्यक्त की जाने वाली प्रशंसा के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। प्रशंसा करने की भी एक मर्यादा, शालीनता और सौंदर्य होता है।

    यदि मनुष्य ध्यानपूर्वक देखे तो प्रत्येक वस्तु किसी न किसी दूसरी वस्तु का संकेत होती है। किसी व्यक्ति के चरित्र का अनुमान उसकी अत्यन्त छोटी-से-छोटी बातों से भी लगाया जा सकता है। चरित्रहीन व्यक्ति अपने चलने के ढंग, अपनी मुद्राओं, कभी-कभी केवल एक उत्तर देने के ढंग, सिर पर उँगली फेरने की आदत या आँखें घुमाने की शैली से ही पहचाना जाता है। दुराचारी व्यक्ति उसकी हँसी से प्रकट हो जाता है। पागल व्यक्ति उसके चेहरे के भाव तथा उसके व्यवहार से पहचाना जाता है। इन सब बातों को उनके संकेतों को पढ़कर जाना जा सकता है। इसी प्रकार, यदि तुम यह देखो कि कोई व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा किस प्रकार करता है और स्वयं किस प्रकार प्रशंसा प्राप्त करता है तो तुम उसके चरित्र का भी अनुमान लगा सकते हो। जब तुम देखते हो कि चारों ओर से श्रोता किसी दार्शनिक की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं और प्रशंसकों की भीड़ उसे चारों ओर से घेरे खड़ी है तो समझ लो कि वहाँ क्या हो रहा है। वह अब वास्तविक प्रशंसा नहीं रह जाती। वह केवल तालियाँ और शोर बनकर रह जाती है। ऐसी धूमधाम और दिखावटी प्रशंसा उन कलाओं के लिए छोड़ देनी चाहिए जिनका उद्देश्य जनता का मनोरंजन करके उन्हें प्रसन्न करना है। दर्शन का स्वागत केवल श्रद्धा और सम्मान के साथ होना चाहिए।

    हमें युवाओं को उनके आवेगपूर्ण मन के अनुसार प्रतिक्रिया करने की कुछ छूट देनी होगी। पर केवल तब, जब वे वास्तव में सहज आवेग से ऐसा कर रहे हों और स्वयं को शांत रहने का आदेश देने में अभी समर्थ न हों। ऐसी प्रशंसा स्वयं श्रोताओं के लिए भी एक प्रकार की प्रेरणा का कार्य करती है। वह युवा मन में उत्साह और प्रोत्साहन उत्पन्न करती है। परन्तु उन्हें विषय की महानता से प्रभावित होना चाहिए न कि कृत्रिम और बनावटी शब्द-सज्जा से। अन्यथा वाक्पटुता उनके लिए हानिकारक सिद्ध होती है क्योंकि तब वे विषय के प्रति नहीं बल्कि केवल भाषण-कला के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। 

    इस विषय पर मैं आगे की चर्चा अभी स्थगित करता हूँ क्योंकि यह अपने आप में विस्तृत विवेचन की माँग करता है कि जनता के सामने किस प्रकार बोलना चाहिए, उनकी उपस्थिति में स्वयं को कितनी स्वतंत्रता देनी चाहिए, और उन्हें कितनी। इसमें कोई संदेह नहीं कि दर्शन ने अपने आपको सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनाकर कुछ न कुछ खो दिया है। फिर भी उसके सबसे अंतरंग और पवित्र रहस्यों को भी लोगों के सामने प्रकट किया जा सकता है। किन्तु इसके लिए उसका प्रतिनिधि कोई व्यापारी या दिखावा करने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि एक पुजारी के समान श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा रखने वाला होना चाहिए।


अभी के लिए विदा 

प्लेटो के विचारों के बारे में -- पत्र - 58 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  आज मुझे हमारी भाषा की अत्यन्त दरिद्रता बल्कि उसकी लगभग निर्धनता का अनुभव पहले से कहीं अधिक तीव्रता से हुआ। संयोगवश हम प्लेट...