Wednesday, 5 August 2026

वस्तुओं के बारे में -- पत्र - 116

 प्रिय लूसीलियस 


तुम मुझ पर यह आग्रह कर रहे हो कि मैं तुम्हें अधिक बार पत्र लिखूँ। अच्छा तो आओ हिसाब-किताब कर लें। तब तुम्हें यह नहीं लगेगा कि तुम्हारा घाटा हुआ है। हमारे बीच यह तय हुआ था कि पहले तुम पत्र लिखोगे और उसके उत्तर में मैं लिखूँगा। फिर भी, मैं तुम्हारे प्रति अधिक कठोर नहीं बनूँगा। मैं जानता हूँ कि तुम विश्वसनीय हो। इसलिए मैं तुम्हें उधार पर भी कुछ दे सकता हूँ। किन्तु मैं वैसा नहीं करूँगा जैसा भाषा के महान आचार्य सिसरो ने अपने मित्र एटिकस को करने की सलाह दी थी कि यदि कहने के लिए कुछ न भी हो, तब भी मन में जो आए, वही लिख भेजो। मेरे पास लिखने के लिए विषयों की कभी कमी नहीं हो सकती, चाहे मैं सिसरो के पत्रों में भरी उन बातों को पूरी तरह छोड़ भी दूँ, जैसे कि कौन-सा उम्मीदवार कठिनाई में है। कौन उधार के धन के सहारे चुनाव लड़ रहा है और कौन अपनी ही संपत्ति के बल पर; किसे कौंसल-पद के लिए सीज़र का समर्थन प्राप्त है, किसे पोम्पेय का और किसे केवल अपनी धन-थैली का या यह कि कैसिलियस कितना कठोर साहूकार है, जो अपने संबंधियों को भी प्रति माह एक प्रतिशत से कम ब्याज पर ऋण नहीं देता। दूसरों के झंझटों में उलझने से कहीं अधिक अच्छा है कि मनुष्य अपनी ही समस्याओं पर ध्यान दे। स्वयं का परीक्षण करे, यह देखे कि वह किन-किन वस्तुओं का अभिलाषी (उम्मीदवार) बना हुआ है और फिर उन सबके लिए प्रयास करना ही छोड़ दे।


By Nurudeen Popoola

    प्रिय लूसीलियस, सबसे उत्तम मार्ग और साथ ही सुरक्षा तथा स्वतंत्रता का मार्ग यह है कि किसी भी पद की आकांक्षा ही न रखी जाए बल्कि भाग्य द्वारा आयोजित सभी चुनावों को ही छोड़ दिया जाए। जब मतदाता एकत्र होते हैं और उम्मीदवार अपने-अपने मंचों पर व्याकुल होकर परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं। कोई रिश्वत देकर समर्थन खरीद रहा होता है, कोई अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से सौदेबाज़ी कर रहा होता है तो कोई उन लोगों के हाथ चूम रहा होता है जिन्हें चुने जाने के बाद वह छूना भी पसंद नहीं करेगा। इस बीच सबकी दृष्टि उद्घोषक की उस घोषणा पर लगी रहती है जो विजेता का नाम बताएगी, तब सोचो, उस पूरे बाज़ार को केवल एक दर्शक की तरह खड़े होकर देखना कितना सुखद होगा। जबकि तुम्हारे पास न बेचने के लिए कुछ हो और न खरीदने के लिए। किन्तु इससे भी कहीं अधिक महान आनंद तब प्राप्त होता है, जब मनुष्य न केवल प्रेटर या कौंसल के चुनावों को बल्कि उन सब प्रयत्नों को भी निस्पृह होकर देखता है जो लोग प्रतिवर्ष नवीनीकृत होने वाले पदों के लिए, स्थायी सत्ता प्राप्त करने के लिए, युद्ध में विजय और विजय-उत्सव के लिए, धन-संपत्ति के लिए, विवाह और संतान के लिए अथवा अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए करते रहते हैं। मन की कितनी महान उपलब्धि है यह कि मनुष्य ऐसा बन जाए जो किसी वस्तु की कामना ही न करे, किसी से कोई अनुग्रह न माँगे और भाग्य से कह सके, “हे भाग्य! मेरा और तुम्हारा अब कोई संबंध नहीं है। मैं तुम्हें अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं देता। मैं जानता हूँ कि तुम कैटो जैसे पुरुषों को अस्वीकार कर देती हो। जबकि वेटिनियस जैसे लोगों को ऊँचे पदों पर पहुँचा देती हो। इसलिए मैं तुमसे कुछ भी नहीं माँगता।” यही वह मार्ग है जिससे भाग्य को उसके पद से हटाया जा सकता है। 

    इसलिए हमें एक-दूसरे को इन्हीं विषयों पर पत्र लिखने चाहिए और ऐसे विचारों का आदान-प्रदान करना चाहिए जिनकी कभी कमी न हो। क्योंकि हमारे सामने ऐसे असंख्य व्याकुल मनुष्य हैं, जो किसी विनाशकारी वस्तु की प्राप्ति के लिए निरंतर एक बुराई से दूसरी और उससे भी बड़ी बुराई की ओर बढ़ते जाते हैं। वे जिन वस्तुओं के पीछे भाग रहे हैं, शीघ्र ही उन्हीं से उन्हें या तो बचना पड़ेगा या उन्हें तुच्छ समझना पड़ेगा। आख़िर ऐसा कौन है जो उस वस्तु को प्राप्त कर लेने के बाद भी संतुष्ट हो गया हो, जिसे पहले वह अपनी पहुँच से बाहर समझता था? लोग समझते हैं कि समृद्धि कोई महान पुरस्कार है, जिसके लिए लालच करना उचित है। परन्तु वास्तव में वह अत्यन्त तुच्छ वस्तु है। इसी कारण वह किसी को भी संतुष्ट नहीं कर पाती। तुम्हें अपनी इच्छाएँ बहुत ऊँची प्रतीत होती हैं क्योंकि तुम अभी उनसे दूर हो। किन्तु जो व्यक्ति उन्हें प्राप्त कर लेता है, उसे वे नगण्य लगने लगती हैं। यदि मैं भूल नहीं कर रहा तो वह उसी क्षण किसी और ऊँचाई पर चढ़ने की इच्छा करने लगता है। जिसे तुम अपनी यात्रा का शिखर समझते हो, वही उसके लिए केवल अगली सीढ़ी बन जाता है। इस प्रकार सभी लोग सत्य के अज्ञान के कारण दुख उठाते हैं। दूसरों की बातों से भ्रमित होकर वे उन वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैं जिन्हें वे शुभ समझते हैं। पर जब अत्यधिक परिश्रम और कष्ट सहकर उन्हें प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि वे या तो बुरी हैं या तुच्छ हैं अथवा उनकी अपेक्षा से कहीं कम मूल्यवान हैं। अधिकांश लोग उन वस्तुओं से प्रभावित हो जाते हैं जो दूर से आकर्षक दिखाई देती हैं। सामान्यतः लोग ‘बड़ा’ और ‘अच्छा’, इन दोनों को एक ही समझ बैठते हैं। 

    ऐसा हमारे साथ भी न हो इसलिए हमें यह जाँच करनी चाहिए कि वास्तव में ‘शुभ’ (Good) क्या है। इस विषय में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ और परिभाषाएँ दी गई हैं। एक परिभाषा यह है, “शुभ वह है जो मन को अपनी ओर आकर्षित करे और उसे अपनी ओर खींच ले।” किन्तु इसका तुरंत उत्तर दिया जा सकता है। यदि कोई वस्तु हमें अपनी ओर आकर्षित तो करे। पर हमारे लिए हानिकारक सिद्ध हो, तब क्या होगा? तुम जानते ही हो कि कितनी बुरी वस्तुएँ भी अत्यन्त आकर्षक होती हैं। जो वास्तव में सत्य है और जो केवल सत्य प्रतीत होता है, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसी कारण ‘शुभ’ का संबंध ‘सत्य’ से होना चाहिए क्योंकि जो वास्तव में शुभ नहीं है, उसे शुभ नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो वस्तु हमें अपनी ओर खींचती और लुभाती है, वह केवल शुभ प्रतीत होती है। वह धीरे-धीरे हमारे मन में प्रवेश करती है, हमें आकर्षित करती है और अंततः हमें मोहित कर लेती है। दूसरी परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो अपने प्रति इच्छा उत्पन्न करे अथवा जो मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाए।” किन्तु इस पर भी वही आपत्ति लागू होती है। बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ हैं जो मनुष्य को अपनी ओर प्रेरित करती हैं। जबकि उनका पीछा करने वालों के लिए वे अंततः हानिकारक सिद्ध होती हैं। एक और अधिक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न करे और जिसकी खोज तभी की जानी चाहिए जब वह वास्तव में वरणीय (चुनने योग्य) सिद्ध हो जाए।” ऐसी वस्तु उसी समय ‘सम्माननीय’ (Honorable) भी होती है अर्थात वह ऐसी होती है जो हर प्रकार से अपनाए जाने और प्राप्त किए जाने के योग्य हो। 

    यह विषय मुझे ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ के बीच का अंतर स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करता है। इन दोनों में एक ऐसा संबंध है जो अभिन्न और अविभाज्य है। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती जब तक उसमें कुछ सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह निश्चय ही शुभ भी है। तो फिर इन दोनों में अंतर क्या है? सम्माननीय वह है जो पूर्णतः शुभ हो अर्थात वही जिसके द्वारा सुखमय जीवन अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है और जिसके साथ संबंध स्थापित होने पर अन्य वस्तुएँ भी शुभ बन जाती हैं। मेरा अभिप्राय यह है, कुछ वस्तुएँ अपने-आप में न तो शुभ होती हैं और न अशुभ जैसे, सैनिक सेवा, राजनयिक सेवा या न्यायिक पद। जब इन कार्यों का निर्वाह सम्मानपूर्वक और सदाचार के साथ किया जाता है, तभी वे शुभ बन जाते हैं और अपनी पहले की उदासीन (न शुभ, न अशुभ) स्थिति से निकलकर शुभ की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसी वस्तुएँ सम्माननीयता के संसर्ग से शुभ बनती हैं; परन्तु सम्माननीयता स्वयं अपने-आप में शुभ है। शुभता का मूल्य सम्माननीयता से प्राप्त होता है। जबकि सम्माननीयता किसी अन्य वस्तु पर निर्भर नहीं करती। उसका आधार वह स्वयं है। जो वस्तु शुभ है, वह किसी परिस्थिति में अशुभ भी हो सकती थी। किन्तु जो वास्तव में सम्माननीय है, वह शुभ के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकती। 

    एक परिभाषा इस प्रकार भी दी जाती है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप हो।” अब मेरी बात ध्यान से सुनो। जो वास्तव में शुभ है, वह निश्चय ही प्रकृति के अनुरूप होता है; किन्तु जो कुछ भी प्रकृति के अनुरूप है, वह तत्काल शुभ नहीं हो जाता। वास्तव में अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो प्रकृति के अनुरूप तो हैं। पर इतनी तुच्छ हैं कि उन्हें ‘शुभ’ कहना उचित नहीं होगा। वे नगण्य और महत्वहीन हैं। कोई भी शुभ वस्तु तुच्छ या महत्वहीन नहीं हो सकती। जब तक कोई वस्तु नगण्य है, तब तक वह शुभ नहीं है। जब वह वास्तव में शुभ बन जाती है, तब वह नगण्य नहीं रहती। तो किसी वस्तु को शुभ कैसे पहचाना जाए? जब वह पूर्णतः प्रकृति के अनुरूप हो, तभी उसे वास्तव में शुभ कहा जा सकता है।

    तुम कहते हो, “तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि जो शुभ है, वह प्रकृति के अनुरूप होता है। यही उसका विशिष्ट लक्षण है। तुम यह भी स्वीकार करते हो कि कुछ ऐसी वस्तुएँ भी हैं जो शुभ तो नहीं हैं, फिर भी प्रकृति के अनुरूप हैं। तब ऐसा कैसे हो सकता है कि पहली वस्तुएँ शुभ कहलाएँ और दूसरी नहीं? जब दोनों में प्रकृति के अनुरूप होने का एक ही विशेष गुण है तो फिर उनके विशिष्ट स्वरूप में यह अंतर कैसे उत्पन्न होता है?” मेरा उत्तर है, उनकी परिपूर्णता और विकास के कारण। इसमें कोई नई या आश्चर्यजनक बात नहीं है कि कुछ वस्तुएँ अपने विकास के साथ अपना स्वरूप भी बदल लेती हैं। उदाहरण के लिए, एक बालक बड़ा होकर युवक बन जाता है। उसके साथ उसका विशिष्ट गुण भी बदल जाता है। बालक में तर्क-बुद्धि का पूर्ण विकास नहीं होता, जबकि युवक तर्क करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। कुछ वस्तुएँ जब विकसित होती हैं तो वे केवल आकार में ही बड़ी नहीं होतीं बल्कि अपने स्वरूप और गुण में भी भिन्न हो जाती हैं। 

    कोई यह कह सकता है, “केवल आकार में बड़ा हो जाना किसी वस्तु का भिन्न स्वरूप धारण कर लेना नहीं है। चाहे तुम एक छोटी सुराही में शराब भरो या एक बड़े पात्र में, शराब का गुण दोनों में समान रहता है। उसी प्रकार, थोड़ी-सी मधु और बहुत-सी मधु, दोनों के स्वाद में कोई अंतर नहीं होता।” किन्तु तुम्हारे ये उदाहरण भिन्न प्रकार के हैं। इनमें वस्तु चाहे जितनी बढ़ जाए, उसका मूल गुण अपरिवर्तित रहता है। निस्संदेह, कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो आकार में बड़ी होने पर भी अपनी जाति और अपने विशिष्ट गुण को बनाए रखती हैं।परन्तु कुछ दूसरी वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें आकार की अनेक क्रमिक वृद्धियों के बाद अन्तिम वृद्धि एक निर्णायक परिवर्तन ला देती है। वह उन्हें एक ऐसी नई अवस्था प्रदान करती है जो पहले की अवस्था से भिन्न होती है। एक-एक पत्थर जोड़ने से मेहराब नहीं बनती। उसे पूर्ण करने वाला वह अंतिम शिलाखंड होता है, शीर्ष-पत्थर (की-स्टोन), जो दोनों ओर झुके हुए पत्थरों के बीच जड़ दिया जाता है और अपने स्थान पर आकर पूरी मेहराब को एक साथ बाँध देता है। वह अंतिम पत्थर स्वयं आकार में छोटा होते हुए भी इतना महत्त्वपूर्ण कार्य क्यों कर देता है? 

    क्योंकि वह केवल एक और पत्थर जोड़ता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संरचना को पूर्णता भी प्रदान करता है। इसी प्रकार कुछ वस्तुएँ अपने विकास के क्रम में अपना पूर्व स्वरूप छोड़ देती हैं और एक नए स्वरूप को धारण कर लेती हैं। जब मन किसी वस्तु के विस्तार का बहुत देर तक विचार करता रहता है और उसकी विशालता का अनुमान लगाते-लगाते थक जाता है, तब वह उसे ‘अनन्त’ कहने लगता है। उस समय वह वस्तु पहले जैसी नहीं रह जाती। वह उस अवस्था से भिन्न हो जाती है जब वह केवल बड़ी किन्तु सीमित प्रतीत होती थी। उसी प्रकार, हम पहले किसी वस्तु को केवल कठिनाई से विभाजित होने योग्य समझते थे; परन्तु जब वह कठिनाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तब हमने उसे ‘अविभाज्य’ मान लिया। इसी प्रकार, जो वस्तु पहले केवल बड़ी कठिनाई से या लगभग न चलने योग्य थी, वही अंततः ‘अचल’ कही जाने लगी। ठीक इसी तर्क के अनुसार, कोई वस्तु पहले केवल प्रकृति के अनुरूप होती है; किन्तु जब उसका विकास अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तब वह एक नए विशिष्ट स्वरूप में प्रवेश करती है और वास्तव में ‘शुभ’ बन जाती है।


अभी के लिए विदा 

स्टोइक दर्शन के बारे में -- पत्र - 115

 प्रिय लूसीलियस 


इस प्रकार के तुच्छ प्रश्न पूछकर तुम मुझे बहुत व्यस्त बनाए रखोगे और बिना जाने ही मुझे अनेक तर्क-वितर्कों और कठिनाइयों में उलझा दोगे। इन विषयों पर मैं पूरी निष्ठा के साथ अपने स्टोइक सम्प्रदाय का खंडन भी नहीं कर सकता और न ही पूर्णतः संतुष्ट होकर उससे सहमत हो सकता हूँ। तुम स्टोइक सिद्धांत के उस कथन के बारे में पूछ रहे हो कि 'बुद्धि (Wisdom) एक शुभ (Good) है, परन्तु बुद्धिमान होना (Being wise) शुभ नहीं है।' पहले मैं स्टोइकों का अभिप्राय स्पष्ट करूँगा, उसके बाद अपना मत प्रस्तुत करूँगा। 

By Blanca Dsouza 

    हमारे सम्प्रदाय का मत है कि जो कुछ शुभ है, वह शरीर (भौतिक सत्ता) है क्योंकि शुभ वस्तु क्रिया करती है और जो भी क्रिया करता है, वह शरीर होता है। शुभ वस्तु लाभ पहुँचाती है। परन्तु किसी वस्तु के लिए लाभ पहुँचाना तभी संभव है जब वह क्रिया करे। और यदि वह क्रिया करती है, तो वह शरीर है। स्टोइक यह भी कहते हैं कि बुद्धि एक शुभ है। इसलिए उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि बुद्धि भौतिक सत्ता (शरीर) है। किन्तु वे यह नहीं मानते कि 'बुद्धिमान होना' (Being wise) भी उसी प्रकार का अस्तित्व रखता है। उनके अनुसार बुद्धिमान होना एक अभौतिक (अशरीरी) अवस्था है, जो किसी अन्य वस्तु अर्थात बुद्धि पर आश्रित होकर उत्पन्न होती है। इसी कारण वह स्वयं न तो कोई क्रिया करती है और न ही किसी को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाती है। “तो क्या बात है? क्या हम यह नहीं कहते कि बुद्धिमान होना भी एक शुभ है?” हाँ, हम ऐसा कहते हैं। परन्तु यह कथन स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि उस वस्तु के संदर्भ में है जिस पर वह निर्भर करता है अर्थात स्वयं बुद्धि के संदर्भ में।

    इन बातों के विपरीत, अब पहले यह सुनो कि दूसरे दार्शनिक क्या उत्तर देते हैं। उसके बाद मैं अपना स्वतंत्र मत प्रस्तुत करूँगा और एक भिन्न दृष्टिकोण का समर्थन करूँगा। वे कहते हैं, “यदि तुम्हारी यह दलील मान ली जाए तो ‘सुखी जीवन’ भी शुभ नहीं होगा। तब चाहे तुम्हें अच्छा लगे या न लगे, तुम्हारे सम्प्रदाय को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ‘सुखी जीवन’ तो शुभ है, पर ‘सुखपूर्वक जीना’ शुभ नहीं है।” वे एक और आपत्ति भी उठाते हैं, “तुम बुद्धिमान बनना चाहते हो। इसलिए ‘बुद्धिमान होना’ एक वरणीय (जिसे चुनना उचित हो) वस्तु है। यदि वह वरणीय है तो वह अवश्य ही शुभ भी होगी।” इस आपत्ति का उत्तर देने के लिए हमारे स्टोइक सम्प्रदाय को शब्दों का ऐसा अर्थ-भेद करना पड़ता है, जो हमारी भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के अनुकूल नहीं है। यदि तुम मुझे इसकी अनुमति दो तो मैं उस भेद को स्पष्ट करूँ। स्टोइकों का कहना है, “जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह ‘वरणीय’ (choice worthy) है। परन्तु जो अवस्था उस शुभ वस्तु को प्राप्त हो जाने के बाद हमारे भीतर उत्पन्न होती है, वह केवल ‘चयनयोग्य’ (choose able) है।” अर्थात उस दूसरी अवस्था की कामना स्वयं उसके लिए नहीं की जाती, मानो वह स्वतंत्र रूप से कोई शुभ वस्तु हो बल्कि वह उस शुभ वस्तु की प्राप्ति के परिणामस्वरूप मिलने वाली एक अतिरिक्त उपलब्धि मात्र है, जिसकी पहले से ही कामना की गई थी।

    मैं स्वयं इस मत से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार में हमारे स्टोइक सम्प्रदाय के दार्शनिक इस कठिनाई में इसलिए फँस जाते हैं कि वे पहले से स्वीकार किए हुए एक सिद्धांत की पहली कड़ी से बँधे हुए हैं और उसे बदलने की स्वतंत्रता अपने लिए नहीं रखते। हम लोगों की एक सामान्य प्रवृत्ति यह है कि हम समस्त मनुष्यों की स्वाभाविक धारणाओं (पूर्वधारणाओं) को बहुत महत्त्व देते हैं और यदि किसी बात पर सबकी सहमति हो, तो उसे उसके सत्य होने का प्रमाण मान लेते हैं। उदाहरण के लिए, हम देवताओं के अस्तित्व का एक प्रमाण यह भी मानते हैं कि लगभग सभी मनुष्यों के मन में देवताओं के अस्तित्व का विश्वास स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। संसार में कोई भी ऐसा राष्ट्र, चाहे वह कानूनों और सभ्यता से कितना ही दूर क्यों न हो, ऐसा नहीं मिलता जो किसी-न-किसी देवता के अस्तित्व में विश्वास न रखता हो। इसी प्रकार, जब हम आत्मा की अमरता पर विचार करते हैं, तब भी इस बात का हमारे लिए विशेष महत्त्व होता है कि अधिकांश लोग आत्मा के मृत्यु के बाद भी अस्तित्व में रहने को स्वीकार करते हैं और अधोलोक की आत्माओं से या तो भय करते हैं या उनका सम्मान करते हैं। मैं भी इसी सार्वभौमिक मान्यता का सहारा लेता हूँ। तुम ऐसा कोई व्यक्ति नहीं पाओगे जो यह न मानता हो कि बुद्धि भी शुभ है और बुद्धिमान होना (Being wise) भी शुभ है।

    मैं उन पराजित ग्लैडिएटरों की तरह नहीं करूँगा जो जनता से दया की अपील करते हैं। आओ, हम अपने ही तर्कों और अपने ही शस्त्रों से इस विषय पर विचार करें। जो वस्तु किसी अन्य वस्तु पर अध्यारोपित (अधिष्ठित) होती है, वह या तो उसके भीतर होती है या उसके बाहर। यदि वह उसके भीतर है तो वह भी उसी वस्तु की भाँति भौतिक सत्ता (शरीर) होगी। क्योंकि कोई भी वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर उसके स्पर्श के बिना अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो स्पर्श करती है, वह शरीर होती है। इसी प्रकार, कोई भी वस्तु क्रिया किए बिना किसी दूसरी वस्तु पर अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो क्रिया करती है, वह भी शरीर होती है। यदि वह उस वस्तु के बाहर है तो अध्यारोपित होने के बाद उसे उससे अलग हो जाना चाहिए। यदि वह अलग हो सकती है तो उसमें गति करने की क्षमता होगी और जिसमें गति करने की क्षमता है, वह शरीर है। 

    अब तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि मैं यह स्वीकार करूँ कि ‘दौड़’ और ‘दौड़ना’, ‘ऊष्मा’ और ‘गरम करना’, ‘प्रकाश’ और ‘प्रकाश देना’...  ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इनमें भेद है। परन्तु मैं यह नहीं मानता कि उनका अस्तित्वगत स्वरूप (status) भिन्न है। यदि स्वास्थ्य एक उदासीन (न अच्छा, न बुरा) वस्तु है तो स्वस्थ होना भी उदासीन ही होगा। यदि सौन्दर्य उदासीन है तो सुन्दर होना भी उदासीन होगा। यदि न्याय एक शुभ है तो न्यायी होना भी शुभ है। यदि लज्जाजनक आचरण बुरा है तो लज्जाजनक व्यवहार करना भी बुरा है। ठीक उसी प्रकार जैसे यदि नेत्र-रोग बुरा है तो नेत्र-पीड़ा से ग्रस्त होना भी बुरा है। इसका प्रमाण भी स्पष्ट है। इनमें से कोई भी अपने समकक्ष के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। जिसके पास बुद्धि है, वही बुद्धिमान है। जो बुद्धिमान है, उसी के पास बुद्धि है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों एक-दूसरे के इतने निकट हैं कि अनेक लोग उन्हें वस्तुतः एक ही मानते हैं।

    लेकिन मैं उनसे यह पूछना चाहता हूँ। चूँकि सभी वस्तुएँ या तो शुभ होती हैं या अशुभ अथवा उदासीन तो ‘बुद्धिमान होना’ इनमें से किस श्रेणी में रखा जाएगा? उनके मत के अनुसार वह शुभ नहीं है। निश्चय ही अशुभ भी नहीं है। तब यह निष्कर्ष निकलता है कि वह मध्यवर्ती श्रेणी में आता है। परन्तु इसी मध्यवर्ती श्रेणी को हम ‘उदासीन’ कहते हैं, जैसे धन, सौन्दर्य और उच्च पद, जो अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोगों को समान रूप से प्राप्त हो सकते हैं। किन्तु ‘बुद्धिमान होना’ ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी दुष्ट व्यक्ति को प्राप्त हो सके। इसलिए वह उदासीन नहीं हो सकता। वह अशुभ भी नहीं है क्योंकि वह किसी बुरे व्यक्ति में पाया ही नहीं जा सकता। अतः वह शुभ ही होना चाहिए। जो वस्तु केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है, वह शुभ होती है। बुद्धिमान होना केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए बुद्धिमान होना भी शुभ है। 

    कोई यह कह सकता है, “बुद्धिमान होना तो केवल बुद्धि पर अधिष्ठित होने वाली एक अवस्था है।” तब मैं उससे पूछूँगा, जिसे तुम ‘बुद्धिमान होना’ कहते हो, क्या वह बुद्धि को सक्रिय करता है अथवा स्वयं बुद्धि द्वारा सक्रिय होता है? दोनों ही स्थितियों में, चाहे वह क्रिया करे या उस पर क्रिया की जाए, उसे भौतिक सत्ता (शरीर) मानना पड़ेगा। क्योंकि जो भी वस्तु क्रिया करती है या जिस पर क्रिया की जाती है, वह शरीर होती है।यदि वह शरीर है, तो वह शुभ भी है क्योंकि उसे शुभ न मानने का एकमात्र कारण यह बताया गया था कि वह अभौतिक है।

    पेरिपैटेटिक दार्शनिकों का मत है कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को अनिवार्य रूप से सूचित करते हैं। क्या तुम वास्तव में यह मान सकते हो कि कोई व्यक्ति बुद्धि के बिना बुद्धिमान हो सकता है या जो बुद्धिमान है उसके पास बुद्धि न हो? किन्तु प्राचीन तर्कशास्त्रियों ने इन दोनों में भेद किया था और उन्हीं से यह भेद स्टोइक दार्शनिकों तक पहुँचा है। मैं इसे स्पष्ट करता हूँ। क्या ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व होना’ एक ही बात है? नहीं। क्योंकि ‘खेत का स्वामित्व होना’ उस व्यक्ति से संबंधित है जो खेत का स्वामी है, न कि स्वयं खेत से। उसी प्रकार ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में भी भेद है। मेरा विश्वास है कि तुम यह स्वीकार करोगे कि यहाँ दो भिन्न वस्तुएँ हैं। एक वह जो धारण की जाती है और दूसरी वह जो उसे धारण करती है। बुद्धि वह है जिसे धारण किया जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति उसका धारक होता है। बुद्धि एक परिपूर्ण मन है अथवा ऐसा मन जो अपनी सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कर चुका हो। दूसरे शब्दों में, बुद्धि जीवन जीने की कला है। तो फिर ‘बुद्धिमान होना’ क्या है? मैं उसे परिपूर्ण मन नहीं कहूँगा बल्कि उस अवस्था का नाम दूँगा जो उस व्यक्ति में विद्यमान होती है जिसके पास परिपूर्ण मन है। इस प्रकार, एक ओर ‘उत्तम मन’ है। दूसरी ओर उस उत्तम मन का धारक होना, ये दोनों एक-दूसरे से संबंधित होने पर भी भिन्न हैं। 

    मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “शरीरों के भी अनेक प्रकार होते हैं। उदाहरण के लिए, यह एक मनुष्य है और वह एक घोड़ा। इनके साथ विचार की ऐसी प्रक्रियाएँ भी जुड़ी होती हैं जो इन शरीरों के बारे में कथन करती हैं। इन विचार-प्रक्रियाओं का अपना एक विशिष्ट स्वरूप होता है, जो स्वयं शरीरों से भिन्न है। उदाहरण के लिए, मैं देखता हूँ कि ‘केटो चल रहा है।’ यह बात मुझे इन्द्रियों के द्वारा ज्ञात हुई और मेरे मन ने उसे सत्य मान लिया। जो वस्तु मैं देख रहा हूँ, वह एक शरीर है। उसी शरीर पर मेरी दृष्टि तथा मेरा मन केन्द्रित हैं। फिर मैं कहता हूँ, ‘केटो चल रहा है।’ अब जो मैं कह रहा हूँ, वह स्वयं कोई शरीर नहीं है बल्कि शरीर के विषय में किया गया एक कथन है। इसे कुछ लोग ‘प्रस्ताव’ (proposition) कहते हैं। कुछ ‘विधेय’ (predication) और कुछ ‘कथ्य’ (what is said) कहते हैं। इसी प्रकार, जब हम ‘बुद्धि’ कहते हैं, तब हमारा अभिप्राय एक भौतिक सत्ता (शरीर) से होता है। जब हम कहते हैं ‘बुद्धिमान है’ (is wise), तब हम किसी शरीर के विषय में एक कथन कर रहे होते हैं। किसी वस्तु का केवल उल्लेख करना और उसके विषय में कुछ कहना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।” 

    अभी के लिए मान लेते हैं कि यहाँ वास्तव में दो भिन्न बातें हैं। (मैं अभी अपना मत प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ।) किन्तु यदि वे भिन्न हैं तो ऐसा क्या है जो उनमें से किसी एक को शुभ होने से रोकता हो? अभी थोड़ी देर पहले मैंने ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व’ होने के बीच भेद किया था। स्पष्ट है कि स्वामी का स्वरूप उस वस्तु से भिन्न होता है जिसका वह स्वामी है। एक ओर भूमि है और दूसरी ओर मनुष्य। परन्तु जिस विषय पर यहाँ चर्चा हो रही है, उसमें स्थिति भिन्न है। यहाँ बुद्धि का धारक और स्वयं बुद्धि, दोनों का स्वरूप एक ही प्रकृति का है। इसके अतिरिक्त, खेत और उसके स्वामी के उदाहरण में स्वामी और स्वामित्व की वस्तु वास्तव में अलग-अलग हैं। पर यहाँ बुद्धि और उसका धारक एक ही व्यक्ति में अंतर्निहित हैं। भूमि का स्वामित्व विधि (कानून) के आधार पर होता है। जबकि बुद्धि का स्वामित्व स्वभावतः होता है। भूमि को बेचा जा सकता है और किसी दूसरे को सौंपा जा सकता है। पर बुद्धि अपने स्वामी को छोड़कर किसी और के पास नहीं जा सकती। इसलिए तुम्हें उन वस्तुओं की तुलना नहीं करनी चाहिए जिनका स्वभाव मूलतः एक-दूसरे से भिन्न है। 

    मैं यह कहने लगा था कि जिन बातों पर हम विचार कर रहे हैं, वे संख्या की दृष्टि से दो हो सकती हैं। फिर भी दोनों ही शुभ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ दो अलग बातें हैं। फिर भी तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि दोनों ही शुभ हैं। जिस प्रकार यह मानने में कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और उसका धारक, दोनों शुभ हैं, उसी प्रकार यह मानने में भी कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और बुद्धि का धारण करना अर्थात बुद्धिमान होना, दोनों ही शुभ हैं। मैं बुद्धिमान व्यक्ति इसलिए बनना चाहता हूँ कि मैं बुद्धिमान हो सकूँ। यदि ऐसा है तो क्या ‘बुद्धिमान होना’ भी शुभ नहीं होना चाहिए? क्योंकि उसके बिना ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ होना भी कोई शुभ नहीं रह जाता। आखिर तुम्हारा अपना सिद्धांत भी तो यही है कि यदि बुद्धि का उपयोग न किया जाए तो उसे स्वीकार ही नहीं करना चाहिए। तो बुद्धि का उपयोग क्या है? बुद्धिमान होना। यही वह बात है जो बुद्धि को सर्वोच्च मूल्य प्रदान करती है। यदि उसके उपयोग को हटा दिया जाए, तो बुद्धि निरर्थक हो जाएगी। यदि यातनाएँ बुरी हैं तो यातना सहना भी बुरा है। वास्तव में, यदि परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली अवस्था को ही हटा दिया जाए, तो यातनाएँ भी बुरी नहीं कहलाएँगी। बुद्धि परिपूर्ण मन की अवस्था (स्थिति) है। बुद्धिमान होना उस परिपूर्ण मन का प्रयोग है। यदि किसी वस्तु का उपयोग ही शुभ न हो तो वह वस्तु स्वयं अपने उपयोग के बिना शुभ कैसे हो सकती है?

    मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या बुद्धि वरणीय है? तुम उत्तर देते हो, हाँ। फिर मैं पूछता हूँ, क्या बुद्धि का उपयोग भी वरणीय है? तुम फिर उत्तर देते हो, हाँ। इतना ही नहीं, तुम यह भी कहते हो कि यदि तुम्हें उसका उपयोग करने से रोक दिया जाए तो तुम उसे स्वीकार ही नहीं करोगे। जो वस्तु वरणीय है, वह शुभ है। बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रभावशाली ढंग से बोलना वाक्पटुता का उपयोग है और देखना नेत्रों का उपयोग है। अतः बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है। यदि बुद्धि का उपयोग वरणीय है तो बुद्धिमान होना भी वरणीय है। यदि वह वरणीय है तो वह शुभ भी है। 

    इतनी देर से मैं स्वयं को ही धिक्कार रहा हूँ कि जिन लोगों की मैं आलोचना करता हूँ, उन्हीं की भाँति मैं भी एक स्पष्ट और सरल विषय पर शब्दों का अनावश्यक व्यय कर रहा हूँ। क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि यदि ऊष्मा बुरी है, तो गर्म होना भी बुरा होगा? यदि शीत बुरा है, तो ठंड से ग्रस्त होना भी बुरा होगा? और यदि जीवन शुभ है, तो जीना भी शुभ होगा? यद्यपि ये सभी बातें बुद्धि के विषय से संबंधित हैं। फिर भी वे बुद्धि के अंतरतम स्वरूप का स्पर्श नहीं करतीं। हमें अपना समय बुद्धि के वास्तविक स्वरूप के भीतर प्रवेश करके उसका विचार करने में लगाना चाहिए। 

    यदि हम चर्चा को किसी दूसरी दिशा में ले जाना चाहें तो दर्शन हमें विचार के लिए असीम विषय प्रदान करता है। आओ, हम देवताओं के स्वरूप का अन्वेषण करें अथवा तारों के पोषण, उनकी विविध गतियों और परिक्रमाओं का अध्ययन करें या यह विचार करें कि क्या मानवीय जीवन की घटनाएँ तारों की गतियों के अनुरूप विकसित होती हैं अथवा क्या वही पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं और मनुष्यों के मन में गति के मूल कारण हैं या फिर यह कि जिन्हें हम संयोगवश घटित होने वाली घटनाएँ कहते हैं, क्या वे भी किसी निश्चित नियम से बँधी हुई हैं और क्या इस विश्व-व्यवस्था के बाहर या उसके क्रम से अलग वास्तव में कुछ भी नहीं घटित होता। ये विषय प्रत्यक्ष रूप से नैतिक शिक्षा से संबंधित नहीं हैं।। किन्तु वे मन को ऊँचा उठाते हैं और उसे अपने महान विषयों के अनुरूप विशाल बना देते हैं। इसके विपरीत, जिन बातों की मैं अभी कुछ देर पहले चर्चा कर रहा था, वे हमारे मन को ऊँचा उठाने के स्थान पर उसे छोटा और संकीर्ण बना देती हैं। वे मन को तीक्ष्ण नहीं करतीं, जैसा कि तुम लोग समझते हो। वे केवल उसे सीमित कर देती हैं। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या हम अपनी शक्ति ऐसे विषय पर व्यर्थ करेंगे जो संभवतः असत्य हो सकता है और निश्चित रूप से किसी व्यावहारिक उपयोग का भी नहीं है? हमें अपनी बुद्धि और परिश्रम को ऐसे कार्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। हम उसे अधिक महान और अधिक श्रेष्ठ विषयों के ऋणी हैं। आख़िर मुझे इससे क्या लाभ होगा कि मैं यह जान लूँ कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ अलग-अलग हैं अथवा यह कि पहली शुभ है और दूसरी नहीं? मैं इस विवाद में जोखिम उठाने को तैयार हूँ। आओ, पासा फेंकते हैं, तुम्हें ‘बुद्धि’ मिल जाए और मुझे ‘बुद्धिमान होना’। परिणाम दोनों के लिए समान ही रहेगा।

    मैं तो यह अधिक चाहता हूँ कि तुम मुझे इन बातों को प्राप्त करने का मार्ग दिखाओ। मुझे बताओ कि मुझे किन बातों से बचना चाहिए और किन बातों को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। कौन-से अभ्यास मेरे दुर्बल पड़ते हुए मन को दृढ़ बना सकते हैं? मैं उन परिस्थितियों से अपनी रक्षा कैसे करूँ जो अचानक आकर मुझे विचलित कर देती हैं? मैं असंख्य विपत्तियों का सामना करने में समर्थ कैसे बनूँ? जो दुःख भाग्य ने मुझ पर डाले हैं और जो मैंने स्वयं अपने ऊपर लाद लिए हैं, उनसे मैं कैसे मुक्त हो सकता हूँ? मुझे यह सिखाओ कि मैं शोक को बिना विलाप किए कैसे सहन करूँ। सफलता को इस प्रकार कैसे धारण करूँ कि उसके कारण दूसरों को पीड़ा न पहुँचे। यह भी सिखाओ कि मैं मृत्यु के उस अंतिम और अनिवार्य क्षण की निष्क्रिय प्रतीक्षा न करूँ बल्कि जब उचित समझूँ, तब स्वयं अपने प्रस्थान का निर्णय कर सकूँ। मेरे विचार में मृत्यु के लिए प्रार्थना करने से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं है। यदि तुम जीना चाहते हो, तो फिर मरने की प्रार्थना क्यों करते हो? और यदि जीना ही नहीं चाहते तो जन्म के समय देवताओं ने तुम्हें जो जीवन दिया था, उसी को वापस माँगने के लिए उनसे प्रार्थना क्यों करते हो? जिस प्रकार यह निश्चित है कि तुम्हें किसी-न-किसी समय मृत्यु अवश्य प्राप्त होगी, चाहे तुम चाहो या न चाहो, उसी प्रकार यह भी तुम्हारे अधिकार में है कि जब तुम उचित समझो, तब स्वयं मृत्यु का वरण कर लो। पहली बात तुम्हारे लिए अनिवार्य है। दूसरी तुम्हारी अपनी इच्छा और निर्णय पर निर्भर करती है। 

    मैंने अभी-अभी एक ऐसे वक्ता के भाषण की शुरुआत पढ़ी, जिसे लोग बड़ा प्रतिष्ठित वाक्पटु मानते हैं। उसने कहा था, “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” कैसा पागलपन है! तुम उस वस्तु की प्रार्थना कर रहे हो जो पहले से ही तुम्हारे अधिकार में है। “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” क्या यह कहते-कहते तुम इतने वृद्ध हो गए कि अब प्रतीक्षा करना आवश्यक हो? यदि नहीं तो फिर विलंब किस बात का है? तुम्हें कौन रोक रहा है? जिस प्रकार चाहो, जीवन का त्याग कर सकते हो। प्रकृति के किसी भी तत्त्व की ओर देखो और उसी से अपने प्रस्थान का मार्ग चुन लो। जल, पृथ्वी और वायु, इन तत्त्वों पर विचार करो जिनके द्वारा यह संसार संचालित होता है। ये केवल जीवन के कारण ही नहीं हैं। ये मृत्यु के भी उतने ही साधन हैं। “काश, मैं शीघ्र मर जाऊँ!” 'शीघ्र' से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? तुम समय क्यों निश्चित करना चाहते हो? मृत्यु तो तुम्हारी इस प्रार्थना से भी अधिक शीघ्र आ सकती है। ऐसे शब्द एक दुर्बल मन के होते हैं, जो इस प्रकार के शाप का प्रयोग केवल दूसरों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए करता है। जो व्यक्ति सचमुच मृत्यु की प्रार्थना करता है, वह वास्तव में मरना नहीं चाहता। देवताओं से जीवन और स्वास्थ्य की प्रार्थना करो। किन्तु यदि तुम्हारी वास्तविक इच्छा मरने की ही है, तो मृत्यु का एक लाभ यह है कि उसके लिए तुम्हें किसी से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं रहती। 

    प्रिय लूसीलियस, हमें इन्हीं बातों पर मनन करना चाहिए। इन्हीं के द्वारा अपने मन का निर्माण करना चाहिए। यही बुद्धि है और यही बुद्धिमानी, न कि व्यर्थ की बहसों में उलझना और अत्यन्त तुच्छ तकनीकी सूक्ष्मताओं पर विवाद करते रहना। जब भाग्य ने तुम्हारे सामने इतनी समस्याएँ खड़ी कर दी हैं, जिनका समाधान तुम अभी तक नहीं कर पाए हो, तब भी क्या तुम शब्दों के सूक्ष्म अर्थों पर विवाद करने में लगे रहोगे? युद्ध का संकेत मिल जाने के बाद भी अभ्यास के हथियार लहराते रहना कितनी मूर्खता है! इन अभ्यास वाले हथियारों को एक ओर रख दो। अब तुम्हें वास्तविक शस्त्रों की आवश्यकता है। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मेरा मन किसी भी प्रकार के विषाद या भय से विचलित न हो। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मैं अपनी उन इच्छाओं के बोझ को उतार फेंकूँ जिन्हें मैंने स्वयं भी कभी स्वीकार नहीं किया। कुछ सार्थक करो! 

    “बुद्धि तो शुभ है, परन्तु बुद्धिमान होना शुभ नहीं है।” यदि हमें यही सिखाया जाएगा तो इसका परिणाम यही होगा कि लोग हमें अबुद्धिमान कहेंगे और हमारे पूरे दर्शन का उपहास करेंगे कि वह समय की निरर्थक बर्बादी है। मान लो कि मैं तुमसे कहूँ कि इस बात पर भी विवाद है कि भविष्य में प्राप्त होने वाली बुद्धि शुभ है या नहीं। बताओ, क्या यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा? क्या अन्न-भंडार भविष्य की फसल का अनुभव पहले से ही कर लेते हैं? क्या बच्चों में भविष्य की युवावस्था का बल और दृढ़ता पहले से विद्यमान होती है? जिस प्रकार रोगी को भविष्य में मिलने वाला स्वास्थ्य वर्तमान में कोई लाभ नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धावक या पहलवान भी कई महीनों बाद मिलने वाले विश्राम से अभी ताज़गी का अनुभव नहीं करता। यह बात तो सभी जानते हैं कि जो वस्तु अभी भविष्य में है, वह इस समय शुभ नहीं हो सकती क्योंकि वह अभी भविष्य में ही है। जो वास्तव में शुभ है, वह अनिवार्य रूप से लाभ पहुँचाता है। लाभ केवल वर्तमान में विद्यमान वस्तुएँ ही पहुँचा सकती हैं। जो वस्तु अभी लाभ नहीं पहुँचा सकती, वह शुभ नहीं है। यदि वह लाभ पहुँचा रही है तो इसका अर्थ है कि वह भविष्य की नहीं, वर्तमान की वस्तु है। मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। जब मैं वास्तव में बुद्धिमान हो जाऊँगा, तभी वह मेरे लिए शुभ होगा; अभी वह शुभ नहीं है। किसी वस्तु में कोई गुण तभी आ सकता है, जब वह वस्तु पहले अस्तित्व में हो। 

    मैं तुमसे पूछता हूँ, जो वस्तु अभी अस्तित्व में ही नहीं है, वह पहले से शुभ कैसे हो सकती है? यदि मैं किसी वस्तु के विषय में कहूँ, 'वह भविष्य में होगी,' तो क्या यही सबसे बड़ा प्रमाण नहीं है कि वह अभी अस्तित्व में नहीं है? जो अभी आने वाली है, वह स्पष्टतः अभी आई नहीं है। मैं कहता हूँ, 'वसंत आएगा।' इसका अर्थ है कि इस समय शीत ऋतु है। मैं कहता हूँ, 'ग्रीष्म आएगा।' इसका अर्थ है कि अभी ग्रीष्म नहीं है। किसी वस्तु के वर्तमान में न होने का सबसे प्रबल प्रमाण यही है कि वह अभी भविष्य की वस्तु है। मुझे आशा है कि मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। किन्तु इस समय मैं बुद्धिमान नहीं हूँ। यदि वह शुभ मेरे पास अभी होता, तो मैं अपनी वर्तमान बुरी अवस्था से पहले ही मुक्त हो चुका होता। मेरा बुद्धिमान होना अभी भविष्य की बात है। इससे तुम समझ सकते हो कि मैं अभी बुद्धिमान नहीं हूँ। मैं एक ही समय में उस शुभ अवस्था में भी नहीं हो सकता और इस अशुभ अवस्था में भी। शुभ और अशुभ एक ही व्यक्ति में एक साथ विद्यमान नहीं रह सकते।  

    आओ, इन जटिल और तुच्छ विवादों को शीघ्रता से पीछे छोड़ दें और उन बातों की ओर बढ़ें जो वास्तव में हमारी सहायता करने वाली हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रसव-वेदना से पीड़ित पुत्री के लिए व्याकुल होकर दाई को बुलाता है, तब वह खेलों की घोषणा और कार्यक्रम पढ़ने नहीं बैठ जाता। उसी प्रकार, जिसके घर में आग लगी हो और जो उसे बुझाने के लिए दौड़ रहा हो, वह शतरंज की बिसात पर यह विचार नहीं करता कि फँसा हुआ मोहरा किस प्रकार निकल सकता है। किन्तु, देवताओं की शपथ, चारों ओर से ऐसी ही विपत्तियों के समाचार तुम्हारी ओर आ रहे हैं, तुम्हारा घर जल रहा है, तुम्हारे बच्चे संकट में हैं, तुम्हारा देश शत्रुओं से घिरा हुआ है, तुम्हारी संपत्ति लूटी जा रही है।

   प्रकृति ने हमें इतना समय न तो इतनी कृपा से दिया है और न इतनी उदारता से कि हम उसका कोई अंश भी व्यर्थ गँवा सकें। ज़रा देखो कि सबसे अधिक सावधान रहने वाले लोग भी कितना समय खो देते हैं। किसी का कुछ समय अपनी बीमारी में व्यतीत हो जाता है, तो किसी का अपने परिवार के किसी सदस्य की बीमारी में। कुछ समय जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में चला जाता है, कुछ सार्वजनिक कर्तव्यों में और हमारी आयु का एक बड़ा भाग तो निद्रा ही ले लेती है। जब हमारा समय इतना सीमित, इतना शीघ्र बीतने वाला और इतना व्यस्त है, तब उसका अधिकांश भाग तुच्छ बातों में नष्ट करने से क्या लाभ? यह भी विचार करो कि मन अपने स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की अपेक्षा अपना मनोरंजन करना अधिक पसंद करता है। इस प्रकार वह दर्शन को, जो वास्तव में एक उपचार है, केवल मनोरंजन का साधन बना देता है। मुझे यह नहीं मालूम कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में क्या अंतर है। पर मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि इस अंतर को जानने या न जानने से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। मुझे बताओ, यदि मैं यह भेद जान भी लूँ, तो क्या उसी क्षण मैं बुद्धिमान बन जाऊँगा?फिर तुम मुझे बुद्धि से संबंधित शब्दावली में क्यों उलझाए रखते हो, बुद्धिमत्ता के वास्तविक आचरण का अभ्यास क्यों नहीं कराते? मुझे अधिक साहसी बनाओ। मुझे अधिक आत्मविश्वासी बनाओ। मुझे ऐसा बना दो कि मैं भाग्य के समकक्ष खड़ा हो सकूँ, बल्कि उससे भी श्रेष्ठ बन सकूँ। मैं उससे श्रेष्ठ बन सकता हूँ, यदि मैं जो कुछ भी सीखूँ, उसे इसी एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा दूँ।


अभी के लिए विदा 

नियंत्रित स्वभाव के बारे में -- पत्र - 114

 प्रिय लूसीलियस 


यह प्रश्न बार-बार उठाया गया है कि मनुष्य के लिए संयमित (moderate) भावनाएँ रखना अधिक अच्छा है या फिर किसी भी प्रकार की भावनाएँ न रखना। हमारे दर्शन-सम्प्रदाय (स्टोइक) के दार्शनिक भावनात्मक विकारों का पूर्णतः निषेध करते हैं। जबकि पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उन्हें केवल संयमित रखने की बात करते हैं। परंतु मुझे यह समझ में नहीं आता कि किसी रोग की थोड़ी-सी मात्रा भी कैसे स्वास्थ्यकर या उपयोगी हो सकती है। 



    डरो मत। मैं तुमसे ऐसी कोई वस्तु छीनने नहीं जा रहा जिसे तुम छोड़ना न चाहते हो। मैं तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के प्रति उदार और सहमत रहूँगा। जीवन की जिन वस्तुओं को तुम आवश्यक, उपयोगी और सुखद मानते हो, उन्हें भी मैं नहीं छीनूँगा। मैं केवल उनमें जो दोषपूर्ण है, उसी को दूर करूँगा।जब मैं कामना (तृष्णा) का निषेध करूँगा, तब भी मैं तुम्हें उचित इच्छा रखने की अनुमति दूँगा ताकि तुम वही कार्य चिंता से मुक्त होकर, अधिक दृढ़ निश्चय के साथ कर सको और अपने सुखों का भी अधिक गहराई से अनुभव कर सको। यदि तुम सुखों के स्वामी रहोगे, उनके दास नहीं तो वे तुम्हें और भी सहजता से क्यों नहीं प्राप्त होंगे? 

    तुम कहोगे, “किसी मित्र के निधन पर शोक करना तो स्वाभाविक है। मेरे उचित आँसुओं को बहने का अधिकार तो रहने दो। लोगों की राय से प्रभावित होना और उनके नकारात्मक विचारों से दुखी होना भी स्वाभाविक है। यदि लोग मेरे बारे में बुरा सोचें, तो उससे भय होना भी तो सम्मानजनक है। तुम मुझे ऐसा उचित भय रखने की अनुमति क्यों नहीं देते?” किन्तु ऐसा कोई भी दोष नहीं है जिसके पक्ष में कोई न कोई तर्क देने वाला न मिल जाए। प्रारम्भ में सभी दोष संकोची और वश में प्रतीत होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे वे बढ़ते जाते हैं और अंततः मनुष्य पर अधिकार जमा लेते हैं। यदि तुम उन्हें प्रवेश करने दोगे तो बाद में उन्हें रोक नहीं सकोगे। प्रत्येक भावनात्मक विकार आरम्भ में दुर्बल होता है। फिर वह स्वयं को उकसाता है, आगे बढ़ते-बढ़ते शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसलिए उन्हें बाहर निकालने की अपेक्षा प्रारम्भ में ही भीतर प्रवेश न करने देना कहीं अधिक सरल है। 

    कोई भी यह नहीं कहता कि सभी भावनात्मक विकारों का उद्गम किसी न किसी अर्थ में प्रकृति से नहीं होता। प्रकृति ने हमें अपने प्रति चिंता और आत्म-सुरक्षा की भावना प्रदान की है। परंतु जब हम उसी भावना को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देते हैं, तब वही दोष बन जाती है। प्रकृति ने जीवन की आवश्यक वस्तुओं के साथ सुख का अनुभव इसलिए जोड़ा है कि हम केवल सुख के पीछे न भागें बल्कि वह अतिरिक्त सुख जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को हमारे लिए अधिक प्रिय और सहज बना दे। किन्तु यदि सुख को उसके अपने लिए ही लक्ष्य बनाकर उसका पीछा किया जाए तो वही आत्म-भोग (विलासिता) बन जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि जैसे ही भावनात्मक विकार प्रवेश करना प्रारम्भ करें, हम उसी समय उनका प्रतिरोध करें। क्योंकि जैसा कि मैंने कहा है, उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोकना, उन्हें भीतर से निकालने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है।

    मैं सुन रहा हूँ कि तुम कह रहे हो, “मुझे कुछ सीमा तक शोक करने दो और कुछ सीमा तक भय या चिंता का अनुभव करने दो।” लेकिन तुम्हारी यह 'कुछ सीमा' निरंतर बढ़ती ही चली जाती है और जब तुम उसे रोकना चाहते हो, तब वह रुकने से इनकार कर देती है। बुद्धिमान व्यक्ति बिना विचलित हुए स्वयं पर नियंत्रण रख सकता है। वह जब चाहे अपने आँसुओं को रोक सकता है और अपने सुखों पर भी विराम लगा सकता है। परंतु हम जैसे लोगों के लिए पीछे हटना ही कठिन होता है। इसलिए हमारे लिए यही अधिक अच्छा है कि हम आरम्भ ही न करें। 

    मुझे लगता है कि पनैटियस (प्राचीन यूनान के एक प्रसिद्ध स्टोइक दार्शनिक थे) ने उस युवक को बहुत उपयुक्त उत्तर दिया था जिसने उनसे पूछा था कि क्या बुद्धिमान व्यक्ति प्रेम में पड़ता है।उन्होंने कहा, “जहाँ तक बुद्धिमान व्यक्ति का प्रश्न है, उस पर हम बाद में विचार करेंगे। परन्तु तुम और मैं, जो अभी बुद्धिमत्ता से बहुत दूर हैं, हमारे लिए तो प्रेम में पड़ने से बचना ही उचित है। क्योंकि प्रेम ऐसी अवस्था है जिसमें मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, अपने ऊपर से नियंत्रण खो बैठता है, दूसरे का दास बन जाता है और अपने आत्मसम्मान तक को भूल जाता है। यदि हमारा प्रेम स्वीकार कर लिया जाता है तो हम दूसरे के अनुग्रह से उन्मत्त हो उठते हैं। और यदि अस्वीकार कर दिया जाता है, तो उसके तिरस्कार की अग्नि में जलने लगते हैं। सहज और सफल प्रेम भी उतना ही हानिकारक है जितना कठिन और असफल प्रेम। सफलता हमें अपने आकर्षण में बाँध लेती है और असफलता हमें संघर्ष और व्याकुलता में डाल देती है। अतः अपनी दुर्बलता को पहचानते हुए हमारे लिए यही श्रेयस्कर है कि हम मन की शांति बनाए रखें। हमें अपने दुर्बल स्वभाव को न शराब के हवाले करना चाहिए, न रूप-सौंदर्य के, न चापलूसी के और न ही किसी अन्य प्रकार के प्रलोभन के।”

    मेरा कहना यह है कि प्रेम के विषय में पनैटियस ने जो उत्तर दिया था, वही सभी भावनात्मक विकारों पर समान रूप से लागू होता है। जहाँ तक संभव हो, हमें फिसलन भरी भूमि से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि हमारे लिए तो सूखी भूमि पर भी दृढ़ता से खड़े रहना कठिन है। तुम इस विषय में स्टोइकों पर प्रायः लगाया जाने वाला वही पुराना आक्षेप करोगे, “तुम लोगों के वचन बहुत बड़े हैं और तुम्हारी अपेक्षाएँ अत्यधिक कठोर हैं। हम तो साधारण मनुष्य हैं। हम अपने आप को हर बात से पूरी तरह वंचित नहीं कर सकते। हम शोक करेंगे, पर थोड़ा-सा। हम इच्छाएँ रखेंगे, पर संयम के साथ। हम क्रोधित भी होंगे, पर इतना नहीं कि क्षमा करना ही भूल जाएँ।” क्या तुम जानते हो कि हम ऐसा क्यों नहीं कर पाते? क्योंकि हमें स्वयं इस बात पर विश्वास ही नहीं है कि हम ऐसा कर सकते हैं। 

    वास्तव में, इसके पीछे एक और कारण भी है। हमें अपने दोषों से प्रेम होता है। हम उनका त्याग करने के बजाय उनका बचाव करते हैं और उन्हें छोड़ने के स्थान पर उनके पक्ष में बहाने ढूँढ़ते हैं। मानव-स्वभाव को प्रकृति ने पर्याप्त शक्ति प्रदान की है, यदि हम उसका उपयोग करना चाहें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी समस्त शक्तियों को एकत्रित करें और उन्हें अपने पक्ष में कार्य करने दें, अपने विरुद्ध नहीं।असमर्थता तो केवल एक बहाना है; वास्तविक कारण हमारी अनिच्छा है।

लोभ के बारे में -- पत्र - 113

 अभिवादन 


प्रिय लूसीलियस, मैं चाहता हूँ कि तुम शब्दों और वाक्य-रचना को लेकर अत्यधिक चिंतित न रहो। तुम्हारे लिए चिंता करने योग्य इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बातें हैं। अपने आप से यह पूछो कि तुम क्या लिख रहे हो, यह नहीं कि कैसे लिख रहे हो। जहाँ तक विषय-वस्तु का संबंध है, तुम्हारा उद्देश्य केवल उसे लिख देना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे अपने अंतर्मन में अनुभव करना चाहिए, उन विचारों को आत्मसात करना चाहिए। उन्हें अपनी आत्मा पर इस प्रकार अंकित कर लेना चाहिए जैसे कोई मुहर मोम पर अपनी छाप छोड़ देती है।



    जब किसी व्यक्ति की वाक्-शैली में अत्यधिक सावधानी, परिष्कार और बनावट दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि उसका मन भी छोटी बातों में ही उलझा हुआ है। महान व्यक्ति की वाणी इतनी बनावटी नहीं होती। उसके शब्द दिल से निकलते हैं, न कि कृत्रिम रूप से सजाए-सँवारे जाते हैं। तुम उन सजे-धजे युवकों को जानते हो जिनके केश-विन्यास और दाढ़ी की शैली अभी-अभी प्रसाधन-गृह से सँवारकर निकली हुई प्रतीत होती है। उनसे तुम किसी साहसपूर्ण या दृढ़ चरित्र वाले आचरण की अपेक्षा नहीं करते। उसी प्रकार वाणी भी मन का वस्त्र और उसका श्रृंगार है। यदि हमारी भाषा अत्यधिक कतर-ब्योंत की हुई, सजी-सँवरी और बनावटी हो तो वह इस बात का संकेत है कि मन भी निष्कपट नहीं है। उसके भीतर कहीं न कहीं कुछ विकृति या असंतुलन अवश्य है। अत्यधिक मधुर और ललित वाणी पुरुषार्थ का आभूषण नहीं है।

    यदि हमें किसी सज्जन पुरुष के मन का दर्शन करने का अवसर मिले तो हम कितना सुंदर और कितना पवित्र दृश्य देखेंगे! उसमें कैसी महानता और कैसी शांति प्रकाशित होगी! वहाँ सद्गुणों के नक्षत्र किस प्रकार आलोक बिखेरते हुए दिखाई देंगे। एक ओर न्याय, दूसरी ओर साहस। कहीं संयम और विवेक। इनके साथ-साथ मितव्ययिता, आत्मसंयम, धैर्य, उदारता और प्रसन्नचित्तता भी अपना प्रकाश फैलाएँगे। मानव-प्रेम भी, जो विश्वास करना कठिन है, पर वास्तव में मनुष्यों के बीच अत्यंत दुर्लभ है। दूरदर्शिता, सुसंस्कृतता और इन सबमें सबसे बढ़कर महान आत्मा का वैभव, ये सब मिलकर उस मन को कैसी शोभा और देवताओं की शपथ, कैसी गरिमा प्रदान करेंगे! उसका प्रभाव कितना महान होगा और वह कितना आदरणीय होगा! लोग उससे प्रेम भी करेंगे और साथ ही उसका सम्मान और श्रद्धा भी करेंगे। 

    यदि कोई उस मुखमंडल का दर्शन कर सके, जो सामान्य मानवीय जीवन में दिखाई देने वाली हर वस्तु से अधिक उदात्त और अधिक तेजस्वी हो तो क्या वह किसी देवता के प्रकट होने के समान विस्मय से ठिठक न जाएगा? क्या वह उस दिव्य दर्शन के लिए मौन प्रार्थना करते हुए, उस मुखमंडल की कृपा से प्रेरित होकर श्रद्धापूर्वक उसके समीप न बढ़ेगा और उसकी आराधना न करेगा? फिर जब वह उस स्वरूप को लंबे समय तक निहार चुका होगा, जो हमारे समस्त अनुभवों से कहीं अधिक ऊँचा और उत्कृष्ट है। उन नेत्रों को देखेगा जो कोमल प्रकाश के साथ-साथ सजीव अग्नि की ज्योति से भी दमक रहे हैं, तब अंततः भय और विस्मय से भरकर वह हमारे कवि वर्जिल के शब्दों में कह उठेगा—

हे देवी, मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ?
क्योंकि तुम्हारा मुख किसी नश्वर का नहीं है,
और तुम्हारी वाणी भी मानवीय नहीं लगती।
अतः मुझ पर कृपा करो
और मेरे समस्त श्रमों का भार हल्का कर दो।

    यह दिव्य सत्ता हमारे सामने प्रकट होगी। यदि हम उसकी उपासना करना चुनें तो वही हमारे श्रमों को हल्का कर देगी। परंतु उसकी उपासना का अर्थ मोटे-ताज़े बैलों की बलि चढ़ाना, स्वर्ण और रजत की भेंट अर्पित करना अथवा किसी कोषागार में धन का अंबार लगाना नहीं है। उसकी सच्ची आराधना केवल निर्मल और धर्मनिष्ठ संकल्प से होती है। मैं फिर कहता हूँ, यदि हम उस दिव्य स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर पाते तो हममें ऐसा कोई भी न होता जो उसके प्रति प्रेम से अभिभूत न हो जाता। किंतु अभी अनेक बाधाएँ हैं जो या तो अपनी अत्यधिक चकाचौंध से हमारी दृष्टि को भ्रमित कर देती हैं अथवा हमें अज्ञान के अंधकार में डुबो देती हैं। जैसे औषधियाँ हमारी आँखों को स्वच्छ कर उनकी दृष्टि को तीक्ष्ण बना देती हैं, वैसे ही यदि हम सचमुच इच्छुक हों तो अपने मन को भी उन सभी अवरोधों से मुक्त कर सकते हैं जो सत्य को देखने से उसे रोकते हैं। तब सद्गुण हमें स्पष्ट दिखाई देगा, चाहे वह शरीर के भीतर ही क्यों न हो, चाहे उसके मार्ग में निर्धनता खड़ी हो, चाहे निम्न सामाजिक स्थिति और अपकीर्ति उसे चारों ओर से घेरे हुए हों। मैं फिर कहता हूँ, हम उस सुंदर स्वरूप का दर्शन कर सकेंगे, भले ही वह धूल और मलिनता से ढका हुआ प्रतीत हो। उसी प्रकार हम उस मन की कुरूपता और मलिनता को भी पहचान लेंगे जो क्लेशों और विकारों से भरा हुआ है, चाहे उसके चारों ओर धन-वैभव की चमक बिखरी हो, चाहे ऊँची प्रतिष्ठा और महान सत्ता का मिथ्या तेज हर ओर से हमारी आँखों को चकाचौंध कर रहा हो। 

    तभी हम यह समझने की स्थिति में होंगे कि जिन वस्तुओं की हम प्रशंसा करते हैं, वे वास्तव में कितनी तुच्छ हैं। हमारी दशा उन बच्चों के समान है, जो अपने खिलौनों को अत्यधिक महत्त्व देते हैं और किसी सस्ते-से चमकीले खिलौने को अपने भाई-बहन या यहाँ तक कि माता-पिता से भी अधिक प्रिय समझते हैं। जैसा कि अरिस्टो कहते हैं, उनमें और हममें अंतर ही क्या है? केवल इतना कि हमारी मूर्खता अधिक महँगे रूप में प्रकट होती है। वे समुद्र-तट पर मिले रंग-बिरंगे चिकने कंकड़ों से प्रसन्न होते हैं। हम मिस्र के मरुस्थलों या अफ्रीका के निर्जन प्रदेशों से मँगाए गए रंगीन संगमरमर तथा उन विशाल स्तंभों से मोहित होते हैं जो ऐसे सभागारों या भोज-कक्षों को सहारा देते हैं जिनमें मानो पूरा का पूरा नगर समा जाए। 

    हम संगमरमर से मढ़ी हुई दीवारों वाले कक्षों पर आश्चर्य करते हैं। जबकि हम जानते हैं कि वह केवल ऊपर चढ़ाई गई एक पतली परत है। जब हम किसी छत पर सोने का पानी चढ़ाते हैं तो क्या हम स्वयं को धोखा नहीं दे रहे होते? क्योंकि हम जानते हैं कि उस स्वर्णिम परत के नीचे साधारण और आकर्षणहीन लकड़ी छिपी हुई है। और यह दिखावटी सजावट केवल दीवारों और छतों तक ही सीमित नहीं है। उन लोगों को देखो जो ऊँचे पदों पर इतराते हुए चलते हैं। उनका वैभव भी केवल सोने की परत के समान है। यदि तुम उसे ध्यान से परखो तो उस प्रतिष्ठा की पतली परत के नीचे कितनी सड़न और भ्रष्टता छिपी हुई है, यह स्पष्ट दिखाई देगा। एक ही वस्तु है जो प्रत्येक उच्च पद, प्रत्येक न्यायाधीश का आसन और प्रत्येक अधिकार का निर्धारण करती है— धन। जिस क्षण से धन को सम्मान मिलने लगा, उसी क्षण से सच्चा सम्मान तिरस्कृत होने लगा। हम सब व्यापारी बन गए हैं और हर वस्तु भी व्यापार की वस्तु बन गई है। हम यह नहीं पूछते कि कोई वस्तु वास्तव में क्या है। हम केवल यह पूछते हैं कि उसकी कीमत कितनी है। हम मूल्य लेकर निष्ठावान बनते हैं और मूल्य लेकर विश्वासघात भी करते हैं। जब तक हमें सदाचार से कोई लाभ मिलने की आशा रहती है, तब तक हम ईमानदारी का आचरण करते हैं। पर यदि अपराध हमें उससे अधिक लाभ देने लगे तो हम उसी का मार्ग अपना लेते हैं।

    हमने अपने माता-पिता से ही स्वर्ण और रजत को विस्मय और श्रद्धा की दृष्टि से देखना सीखा। बचपन में ही लोभ का बीज हमारे भीतर बो दिया गया। वह हमारे मन में गहराई तक जड़ें जमाकर हमारे साथ-साथ बढ़ता गया। फिर समाज का प्रभाव आता है। अन्य सभी बातों में लोग चाहे एक-दूसरे से असहमत हों। पर इस विषय में सबकी एक ही राय होती है। वे इसी की प्रशंसा करते हैं, इसी की कामना अपने लिए और अपने परिवार के लिए करते हैं। जब वे देवताओं के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहते हैं, तब भी इसी धन को अर्पित करते हैं, मानो यही मनुष्य का सबसे महान और सर्वोच्च धन हो। फलस्वरूप हमारा चरित्र इतना पतित हो जाता है कि निर्धनता को अभिशाप समझा जाने लगता है। धनी लोग उसका तिरस्कार करते हैं और निर्धन स्वयं भी उससे घृणा करने लगते हैं। फिर कवियों की रचनाएँ भी हमारे मोह को और भड़काती हैं। वे धन की ऐसी प्रशंसा करते हैं, मानो वही जीवन की एकमात्र शोभा और गौरव हो। उनके वर्णनों में तो ऐसा प्रतीत होता है कि अमर देवताओं के पास भी धन-संपदा से बढ़कर न तो कोई वरदान है और न ही कोई ऐसी वस्तु जिसे वे स्वयं अपने लिए रखना चाहें।

सूर्य का महल ऊँचे-ऊँचे स्तंभों पर खड़ा था,
दमकते हुए स्वर्ण की आभा से आलोकित और भव्य।

और उसके रथ का वर्णन देखिए—

उसका धुरा स्वर्ण का था, उसका दंड भी स्वर्ण का,
उसके घूमते हुए पहियों के घेरे स्वर्ण से मढ़े थे,
और उनसे निकलने वाली तीलियाँ रजत की बनी थीं।

इसी प्रकार वे 'स्वर्णयुग' का भी वर्णन करते हैं और उसे मानव इतिहास का सर्वोत्तम युग सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार काव्य भी हमारे मन में यह धारणा दृढ़ करता है कि स्वर्ण और वैभव ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हैं। यूनानी त्रासदियों में भी ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ लोग धन के लिए अपनी निष्कपटता, अपना स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी कीर्ति तक का त्याग करने को तैयार हो जाते हैं।

लोग मुझे दुष्ट कहें, पर धनी दुष्ट कहें।
हर कोई यह पूछता है कि वह धनी है या नहीं,
यह नहीं कि वह सज्जन है या नहीं।
यह कोई नहीं पूछता कि धन तुम्हें कैसे मिला
या किस मार्ग से प्राप्त हुआ,
वे केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम्हारे पास कितना धन है।
आज संसार में मनुष्य का मूल्य उसकी संपत्ति से आँका जाता है।
लज्जा की बात क्या है? — निर्धन होना।
या तो मैं धनवान होकर जीऊँ,
या निर्धन होकर मर जाऊँ।
धन कमाते-कमाते मर जाना भी सौभाग्य माना जाता है।
धन ही मानव जाति का सर्वोच्च कल्याण है।
वह माँ के प्रेम से भी अधिक प्रिय है,
शिशु के स्नेहिल स्पर्श से भी अधिक मधुर है,
और पिता के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए, उससे भी अधिक मूल्यवान समझा जाता है।
यदि स्वयं वीनस (प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और उर्वरता की देवी) का मुख भी इस स्वर्ण की आभा की बराबरी कर सके,
तो वह सचमुच देवताओं और मनुष्यों, दोनों के प्रेम की अधिकारी है।

जब यूरिपिदेस (Euripides- यूनानी सर्वश्रेष्ठ नाटककारों में से एक) की एक त्रासदी में यह अंतिम संवाद बोला गया तो समस्त दर्शक-समूह एक साथ खड़ा हो गया। उनका उद्देश्य अभिनेता और नाटक, दोनों को रंगमंच से बाहर निकाल देना था। तब स्वयं यूरिपिदेस मंच पर आए और दर्शकों से विनती की कि वे अंत तक प्रतीक्षा करें और देखें कि स्वर्ण-लोभ का वह उपासक अंततः किस परिणाम को प्राप्त होता है। उस कथा में बेलेरोफोन (Bellerophon-प्राचीन यूनानी पौराणिक कथाओं का एक प्रसिद्ध वीर नायक)  को उसके कर्मों का उचित दंड मिलता है। वास्तविक जीवन में भी प्रत्येक लोभी व्यक्ति का अंततः यही भाग्य होता है। लोभ कभी दंड से बच नहीं पाता बल्कि सत्य तो यह है कि लोभ स्वयं ही अपना सबसे बड़ा दंड है। वह मनुष्य से कितने आँसू बहवाता है, कितना दुःख सहने पर विवश करता है! जो वस्तु उसके पास नहीं है, उसके लिए वह व्याकुल रहता है। जो कुछ उसने प्राप्त कर लिया है, उसके कारण भी उसे चैन नहीं मिलता। फिर प्रतिदिन की चिंताएँ अलग हैं। मनुष्य के पास जितना अधिक धन होता है, उतनी ही अधिक उसकी चिंता बढ़ती जाती है। वास्तव में, धन उन लोगों को उससे कहीं अधिक कष्ट देता है जिनके पास वह है, बनिस्बत उनके जो उसे प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।



जब उन्हें थोड़ी-सी भी हानि होती है तो वे विलाप करने लगते हैं। वे बड़ी-बड़ी धनराशियाँ खोते हैं और उन्हें उनकी वास्तविक मात्रा से भी अधिक बड़ी हानि प्रतीत होती है। यहाँ तक कि यदि भाग्य उनसे कुछ भी न छीने तो जो धन वे प्राप्त नहीं कर सके, उसी को वे अपनी हानि मानकर दुखी होते रहते हैं। 

    “लेकिन लोग तो उसे भाग्यशाली और धनी कहते हैं तथा स्वयं भी उसकी जितनी संपत्ति है, उतनी पाने की कामना करते हैं।” मैं यह मान लेता हूँ। पर उससे क्या सिद्ध होता है? इसके साथ वे दुख भी पाते हैं और ईर्ष्या का लक्ष्य भी बनते हैं। क्या तुम इससे अधिक दयनीय अवस्था की कल्पना कर सकते हो? काश, जो लोग दूसरों की संपत्ति पाने की इच्छा करते हैं, वे पहले उन्हीं धनी लोगों से पूछ लेते! जो लोग उच्च पद प्राप्त करने की दौड़ में लगे रहते हैं, वे पहले उन लोगों से परामर्श कर लेते जो राज्य के सबसे प्रतिष्ठित पदों पर पहुँच चुके हैं! तब वे शीघ्र ही अपनी इच्छाएँ बदल देते। किन्तु स्थिति यह है कि जो लोग अपनी ही सफलता की शिकायत करते हैं, वे भी और अधिक सफलता पाने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं। मनुष्य अपनी समृद्धि से कभी संतुष्ट नहीं होता, चाहे वह उसे एक साथ ही क्यों न प्राप्त हो जाए। वह अपनी ही योजनाओं और अपनी ही उन्नति पर असंतोष व्यक्त करता है और सदैव यही कहता रहता है कि जो कुछ वह पीछे छोड़ आया, वही अधिक अच्छा था।

    यही वह कार्य है जो दर्शन तुम्हारे लिए करेगा और मेरे विचार में यही उसका सबसे महान उपहार है तुम अपने किसी भी कर्म पर कभी पछतावा नहीं करोगे। यही सुख का वह दृढ़ आधार है जिसे कोई भी तूफ़ान डिगा नहीं सकता। किन्तु तुम इस अवस्था तक वाक्पटुता के सहारे या शब्दों के सहज प्रवाह के बल पर नहीं पहुँच सकते। उन्हें अपने मार्ग पर चलने दो। पर तुम्हारा मन स्वयं में स्थिर, संतुलित और सुसंगत होना चाहिए। तुम्हारा मन महान हो, अपने सिद्धांतों में अडिग और आत्मविश्वासी हो तथा जहाँ दूसरे लोग असंतोष से भरे रहते हैं, वहाँ वह संतोष का अनुभव करे। वह अपनी प्रगति का आकलन अपने जीवन-आचरण से करे और यह समझे कि उसके पास उतना ही सच्चा ज्ञान है, जितना वह इच्छाओं और भय से मुक्त हो चुका है।


अभी के लिए विदा 

Tuesday, 4 August 2026

भाषा के बारे में -- पत्र - 112

 प्रिय लूसीलियस 


“आप पूछते हैं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ युगों में भाषण कौशल की शैली पतित हो जाती है? क्यों किसी समय लेखकों में एक प्रकार का दोष प्रचलित हो जाता है। कभी सब कुछ अत्यधिक शब्दाडंबरपूर्ण और लंबा-चौड़ा हो जाता है तो कभी कोमल, बनावटी और गान जैसी कृत्रिम शैली का बोलबाला होता है? कभी ऐसी प्रबल अभिव्यक्तियाँ फैशन बन जाती हैं जो अपने विषय की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र होती हैं। कभी अधूरे वाक्यों तथा संकेतों की, जिनमें कही हुई बात से अधिक अनकहा निहित रहता है। कभी किसी युग में रूपकों का प्रयोग बिना किसी संकोच के अत्यधिक किया जाता है। इसका कारण वही है जिसे यूनानियों में एक प्रसिद्ध कहावत के रूप में कहा जाता है, ‘जैसा हमारा जीवन होता है, वैसी ही हमारी वाणी होती है।’ 

    जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके बोलने के ढंग से मेल खाते हैं, उसी प्रकार किसी युग की वाणी की शैली भी उसके नागरिकों के आचरण के अनुरूप होती है। जब अनुशासन शिथिल पड़ जाता है और उसके स्थान पर विलासिता आ जाती है। यदि भाषा का पतन केवल एक-दो व्यक्तियों तक सीमित न रहकर सामान्य स्वीकृति प्राप्त कर ले तो वह व्यापक आत्म-विलास का निश्चित संकेत होता है। 

    प्रतिभा की अवस्था मन की अवस्था से भिन्न नहीं हो सकती। यदि मन स्वस्थ, संतुलित, गंभीर और संयमी है तो प्रतिभा भी पूर्णतः संयत रहती है। यदि मन दोषपूर्ण है तो प्रतिभा भी उसी प्रकार उग्र और असंयमित हो जाती है। क्या आप नहीं देखते कि जब मन अपनी शक्ति खो देता है तो अंग शिथिल पड़ जाते हैं और पैर घसीटकर चलते हैं? यदि मन कोमल और दुर्बल हो जाए तो उसकी मृदुता चाल में भी दिखाई देती है। यदि वह ऊर्जावान और प्रचंड हो तो कदम तेज़ पड़ते हैं। यदि वह विक्षिप्त हो या क्रोध से उन्मत्त (जो विक्षिप्तता के समान ही अवस्था है) तो शरीर की गति भी अस्त-व्यस्त हो जाती है और वह चलने के बजाय मानो दौड़ता हुआ आगे बढ़ता है। जब यह बात शरीर के संबंध में सत्य है तो प्रतिभा के संबंध में तो और भी अधिक सत्य होगी क्योंकि प्रतिभा पूरी तरह मन से मिली हुई है और उसी से अपना स्वरूप, अपनी दिशा और अपना मूल सिद्धांत प्राप्त करती है।

    मेसेनास (Maecenas, रोम के बड़े राजनेता एवं कूटनीतिज्ञ) के जीवन-व्यवहार के विषय में इतनी प्रसिद्ध बातें हैं कि मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह कैसे चलता था, कितना विलासी था, लोगों की दृष्टि अपनी ओर आकर्षित करना उसे कितना प्रिय था। वह अपने दोषों को छिपाने का कोई प्रयास नहीं करता था। फिर हम क्या कहें? क्या उसकी गद्य-शैली भी उसके ढीले-ढाले, बिना कसे हुए वस्त्र की तरह शिथिल नहीं है? क्या उसकी भाषा भी उसके वस्त्रों, उसके सेवकों, उसके भवन और उसकी पत्नी की भाँति उतनी ही आडंबरपूर्ण नहीं है? यदि वह सीधे मार्ग पर बना रहता, यदि समझे जाने से बचने का जान-बूझकर प्रयास न करता। यदि अपनी भाषा में भी उच्छृंखल न होता तो वह अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति सिद्ध हो सकता था। उसके लेखन में आपको यही दिखाई देगा, एक शराबी व्यक्ति की शैली, उलझी हुई, भटकती हुई और स्वच्छंदताओं से परिपूर्ण।



“छोटी जलधारा के किनारे, तट पर, पत्तों से आच्छादित वन।”

यह भी देखिए—

“वे अपनी छोटी नौकाओं से गहरे जल को चीरते हैं और पीछे लहरों की घुमावदार रेखा में मानो उद्यान छोड़ जाते हैं।”

और यह फिर क्या है? अथवा ये पंक्तियाँ—

“वह अपनी प्रेयसी के केशों को घुँघराला करता है और अपने होंठों से कबूतरों-सा स्पर्श करता हुआ आह भरते हुए बोलना आरंभ करता है, उन वन-स्वामियों की भाँति जो झुकी हुई गर्दनों के साथ स्वयं को मुकुट धारण कराते हैं।”

“वे सुधरने से रहित लोग हैं। वे दावतों में मनुष्यों की परीक्षा लेते हैं। मदिरा-पात्र के सहारे घरों को जोत डालते हैं और मृत्यु की ओर प्रलोभन बिछाते हैं।”

“ऐसी प्रतिभा, जो अपने ही उत्सव-दिवस की भी शायद ही साक्षी देती है।”

“पीली मोमबत्ती के रेशे और शोर मचाती चक्की।”

“माता या पत्नी द्वारा ढका हुआ अग्निकुंड।”

    जब आप इन उदाहरणों को पढ़ते हैं तो क्या आपके मन में तुरंत यह विचार नहीं आता कि यह उसी व्यक्ति की रचना है जो नगर में सदैव ढीला-ढाला अंगरखा पहनकर घूमता था? क्योंकि जब सीज़र की अनुपस्थिति में उसे शासन का दायित्व सौंपा गया था, तब भी वह सैनिकों को दैनिक संकेत-शब्द (पासवर्ड) देते समय कमरबंद नहीं बाँधता था। यही वह व्यक्ति था जो न्यायासन पर, वक्ताओं के मंच पर और प्रत्येक सार्वजनिक सभा में सिर पर शॉल डाले उपस्थित होता था, जिसके दोनों ओर उसके कान बाहर निकले रहते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी हास्य-नाटक में किसी धनी व्यक्ति के भागे हुए दास का रूप दिखाया जाता है। यही वह व्यक्ति था जो गृहयुद्धों के चरम समय में, जब पूरा नगर शस्त्रों से सुसज्जित और अशांत था, जनता के बीच केवल दो हिजड़ों को साथ लेकर निकलता था, जो उससे भी अधिक पुरुषोचित प्रतीत होते थे। यही वह व्यक्ति था जिसने अपनी एक ही पत्नी से मानो हज़ार बार विवाह किया।

    उसके ये वाक्य इतने स्वच्छंद ढंग से जोड़े गए, इतनी लापरवाही से बिखेरे गए और अपने शब्द-विन्यास में सामान्य प्रयोग से इतने भिन्न, यह स्पष्ट कर देते हैं कि उसका चरित्र भी उतना ही विचित्र, उतना ही भ्रष्ट और उतना ही विकृत था। उसकी दयालुता की बहुत प्रशंसा की जाती है क्योंकि उसने तलवार का कम प्रयोग किया, रक्तपात से परहेज़ किया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन केवल अपने उच्छृंखल आचरण में किया। किन्तु वह अपनी इस प्रशंसा को भी अपनी कृत्रिम और टेढ़ी-मेढ़ी गद्य-शैली से स्वयं नष्ट कर देता है क्योंकि उससे स्पष्ट हो जाता है कि वह उदार या सौम्य नहीं बल्कि केवल कोमल और दुर्बल था। कोई भी व्यक्ति उसके घुमावदार वाक्य-विन्यास, असामान्य शब्द-प्रयोग और विचित्र विचारों से यह बात समझ सकता है। उसके विचार प्रायः महान होते हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति में दृढ़ता का अभाव है। यह उस व्यक्ति का मन है जिसे अत्यधिक समृद्धि ने पथभ्रष्ट कर दिया था।

    कुछ मामलों में दोष व्यक्ति का होता है। कुछ में युग का। जब समृद्धि व्यापक आत्म-विलास को जन्म देती है तो सबसे पहले वस्त्रों और श्रृंगार पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है। उसके बाद गृह-सज्जा को लेकर अत्यधिक चिंता होने लगती है। फिर ध्यान स्वयं भवनों की ओर मुड़ता है। एक नया भाग जोड़कर साधारण घर को विशाल प्रासाद बना दिया जाता है। भीतर की दीवारें विदेशों से लाए गए संगमरमर से चमक उठती हैं। छत की टाइलें स्वर्ण से अलंकृत कर दी जाती हैं और खाँचेदार छतों की छवि चमकदार फर्श की टाइलों में प्रतिबिंबित होने लगती है। इसके बाद वैभव भोजन की मेज़ तक पहुँच जाता है। नवीनता और प्रचलित व्यवस्था में परिवर्तन ही फैशन बन जाते हैं, जो कभी भोजन के अंत में परोसा जाता था, वही अब आरंभ में परोसा जाने लगता है। जो व्यंजन पहले अतिथियों के आगमन पर प्रस्तुत किया जाता था, वही अब उनके विदा होते समय परोसा जाता है। 

    जब मन सामान्य और परंपरागत बातों को अस्वीकार करने तथा स्थापित रीति-रिवाजों को तुच्छ समझने का अभ्यस्त हो जाता है, तब वह भाषा में भी नवीनता खोजने लगता है। कभी वह प्राचीन और अप्रचलित शब्दों को फिर से प्रचलन में लाता है। कभी सामान्य प्रयोग को विकृत कर देता है, यहाँ तक कि ऐसे नए शब्द भी गढ़ लेता है जिन्हें पहले कभी किसी ने नहीं सुना। और कभी, जैसा कि इस समय विशेष रूप से प्रचलित है, चमत्कारपूर्ण रूपकों की भरमार को ही उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श मान लिया जाता है। कुछ वक्ता अपने विचार को जान-बूझकर अधूरा छोड़ देते हैं। उनका विश्वास होता है कि यदि वाक्य केवल संकेत देकर समाप्त कर दिया जाए और उसका आशय श्रोता स्वयं समझ ले तो उनकी अधिक प्रशंसा होगी। कुछ अन्य किसी विचार को छोड़ ही नहीं पाते। वे उसे निरंतर खींचते और विस्तार देते चले जाते हैं। कुछ लोग किसी शैलीगत विशेषता को इतनी दूर तक ले जाते हैं कि वह दोष बन जाती है। यद्यपि किसी महान प्रयत्न में कभी-कभी ऐसा करना उचित हो सकता है, पर वे वहीं नहीं रुकते; बल्कि उस दोष से ही प्रेम करने लगते हैं। 

    अतः जहाँ कहीं भी आप पतित वक्तृत्व-शैली को प्रचलन में आते देखें, वहाँ यह निश्चय समझिए कि आचरण के अन्य रूप भी मार्ग से भटक चुके हैं। जैसे वस्त्रों और भोजों में विलासिता समाज के भीतर व्याप्त रोग का लक्षण होती है, उसी प्रकार जब असंयमित वक्तृत्व सामान्य व्यवहार बन जाता है तो वह इस बात का प्रमाण होता है कि जिन मनों से वे शब्द निकलते हैं, उनका भी पतन हो चुका है। 

    पतित भाषिक प्रयोगों को केवल सामान्य या निम्न स्तर के श्रोता ही नहीं अपनाते बल्कि अधिक शिक्षित लोग भी उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। इस पर आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उनके टोगा (रोमी परिधान) भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी रुचि एक जैसी होती है। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि प्रशंसा केवल दोषयुक्त रचना की ही नहीं होती बल्कि स्वयं उन दोषों की भी की जाती है। ऐसा सदा से होता आया है। कोई भी प्रतिभा कभी लोकप्रिय नहीं हुई जिसके कुछ दोषों को लोगों ने क्षमा न किया हो। आप किसी भी महान व्यक्ति का नाम ले लीजिए। मैं बता सकता हूँ कि उसके समकालीनों ने उसके कौन-से दोषों की उपेक्षा की और किन्हें जान-बूझकर अनदेखा किया। मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों के उदाहरण दे सकता हूँ जिनके दोषों को दोष नहीं माना गया और कुछ ऐसे भी जिनके दोष ही उनके लिए गुण बन गए। इसी प्रकार मैं ऐसे अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्तियों के उदाहरण भी दे सकता हूँ, जिन्हें आदर्श माना जाता है। किन्तु यदि उनके दोषों को सुधार दिया जाए तो उनकी समस्त विशिष्टता ही नष्ट हो जाए क्योंकि उनके दोष उनकी उत्कृष्टताओं के साथ इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं कि एक को हटाने पर दूसरा भी समाप्त हो जाता है। 

    इसके अतिरिक्त, वक्तृत्व-शैली के लिए कोई स्थायी नियम नहीं होता। वह समाज की प्रचलित परंपरा के अनुसार बदलती रहती है और समाज की वह परंपरा भी अधिक समय तक एक-सी नहीं रहती। आज के हमारे अनेक वक्ता प्राचीन काल के शब्दों को खोज-खोजकर अपनाते हैं ताकि उनकी भाषा बारह पट्टिकाओं (प्राचीन रोम की सबसे पहली लिखित विधि-संहिता) के विधि-संग्रह जैसी प्रतीत हो। उनके लिए ग्रैकस, क्रासुस और कुरियो भी अत्यधिक नवीन और परिष्कृत हैं। इसलिए वे अपियस और कोरुंकानियस के युग तक लौट जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग इसके बिल्कुल विपरीत मार्ग अपनाते हैं। वे ऐसा कोई शब्द प्रयोग नहीं करना चाहते जो केवल वर्तमान प्रचलन से बाहर हो। परिणामस्वरूप उनकी भाषा साधारण, फीकी और नीरस हो जाती है। 

    ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ समान रूप से दोषपूर्ण हैं। उसी प्रकार यह भी भूल है कि केवल ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाए जो असाधारण हों या जिनमें काव्यात्मक आभा हो और सामान्य तथा प्रचलित शब्दों से पूरी तरह बचा जाए। मेरी दृष्टि में दोनों समान रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। एक व्यक्ति आवश्यकता से अधिक अपने श्रृंगार में लगा रहता है। जबकि दूसरा आवश्यकता से भी कम। एक अपने पैरों के बाल तक उखाड़ डालता है। दूसरा अपनी बगल के बालों तक की उपेक्षा करता है।

    अब शब्द-विन्यास के प्रश्न पर आइए। वहाँ मैं आपको कितने प्रकार के दोष गिना सकता हूँ! कुछ लोग कठोर और झटकेदार शैली को पसंद करते हैं। यदि कोई वाक्य स्वाभाविक रूप से बहुत सहज और प्रवाहपूर्ण बन जाए तो वे जान-बूझकर उसके शब्दों का क्रम बदल देते हैं क्योंकि उनकी इच्छा होती है कि प्रत्येक शब्द-संयोजन अचानक और असंगत प्रतीत हो। उन्हें लगता है कि जो कुछ कानों को असमतल और खुरदरा लगे, उसी में पुरुषोचित दृढ़ता निहित है। 

दूसरी ओर, कुछ लोग इतनी कोमलता और मधुरता के साथ लिखते हैं कि उनकी रचना वक्तृत्व-कला की अपेक्षा संगीत-रचना जैसी प्रतीत होने लगती है। क्या मुझे उन लोगों का भी उल्लेख करना चाहिए जो कुछ शब्दों को जान-बूझकर बहुत देर तक रोककर रखते हैं और श्रोता को उनकी प्रतीक्षा कराते हुए अंततः उन्हें वाक्य के अंत में लाकर रखते हैं? उस सुगढ़ सिसेरोनियन वाक्य-विन्यास का क्या कहें, जो अपने सुंदर गठन के कारण श्रोता को मधुर प्रतीक्षा में बाँधे रखता है, जब तक कि वह अंत में पूर्ण न हो जाए और जो अपनी निश्चित लय से कभी विचलित नहीं होता? दोष केवल वाक्यों के गठन में ही नहीं होता। दोष तब भी होता है जब विचार निर्बल और बालसुलभ हों या उनमें ऐसा असंयम हो कि वे शालीनता की सीमा से आगे बढ़ जाएँ अथवा वे अत्यधिक अलंकृत और आवश्यकता से अधिक मधुर हों या केवल सुनने में प्रभावशाली लगें, परंतु उनके भीतर कोई वास्तविक सार या अर्थ न हो।

    ऐसे दोषों को प्रायः एक ही ऐसा वक्ता लोकप्रिय बना देता है, जो अपने समय की वक्तृत्व-कला पर प्रभुत्व रखता है। फिर अन्य लोग उसका अनुकरण करते हैं और एक-दूसरे को भी उसी दिशा में प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, जब सालुस्त लिख रहे थे, तब अधूरे विचार, वाक्यांशों का अचानक समाप्त हो जाना और रहस्यपूर्ण संक्षिप्तता को उत्कृष्ट शैली का सर्वोच्च आदर्श माना जाता था। लूशियस अर्रुन्तियस, जो अत्यंत संयमी व्यक्ति था और प्यूनिक युद्ध का इतिहासकार भी, सालुस्त का अनुयायी था और उसी प्रकार की शैली में लिखने में विशेष दक्ष था। सालुस्त ने एक स्थान पर लिखा है, “उसने चाँदी के बल पर एक सेना प्राप्त कर ली”; अर्थात उसने धन देकर सेना खरीद ली। अर्रुन्तियस को यह प्रयोग इतना प्रिय लगा कि उसने लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर उसका उपयोग किया। एक स्थान पर वह लिखता है, “उन्होंने हमारे सैनिकों की पराजय करवा दी।” दूसरे स्थान पर, “सिराक्यूज़ के राजा हीएरो ने युद्ध खड़ा कर दिया।” और एक अन्य स्थान पर, “इस समाचार ने पानहोर्मस को रोमनों के सामने आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया।” 

    ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं। उसका पूरा ग्रंथ ऐसे प्रयोगों से भरा हुआ है। जो अभिव्यक्तियाँ सालुस्त के यहाँ कभी-कभार मिलती हैं, वही अर्रुन्तियस के यहाँ बार-बार बल्कि लगभग हर जगह दिखाई देती हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है। सालुस्त के यहाँ वे स्वाभाविक रूप से आ गई थीं। जबकि अर्रुन्तियस उन्हें जान-बूझकर खोजकर लाता था। तुम देख सकते हो कि जब कोई व्यक्ति किसी दोष को ही अनुकरण का आदर्श बना लेता है, तब क्या होता है। सालुस्त ने एक स्थान पर 'शीतकालीन जल' जैसा प्रयोग किया। अर्रुन्तियस ने प्यूनिक युद्ध के प्रथम ग्रंथ में लिखा, 'ऋतु अचानक शीतकाल बन गई।' दूसरे स्थान पर, यह बताने के लिए कि वर्ष अत्यंत ठंडा था। उसने लिखा, 'पूरा वर्ष शीतकाल बना रहा।' और एक अन्य स्थान पर, 'तब उसने साठ मालवाहक जहाज़ भेजे, जिनमें सैनिकों और आवश्यक नाविकों के अतिरिक्त कोई भार नहीं था क्योंकि उत्तर की हवा शीतकाल की तरह चल रही थी।' वह जहाँ भी अवसर मिलता, उस शब्द को ठूँस देता था। 

    सालुस्त ने एक स्थान पर कहा, 'गृहयुद्ध के बीच भी वह सदाचार और न्यायप्रियता की प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।' अर्रुन्तियस स्वयं को रोक नहीं सका और अपने प्रथम ग्रंथ में तुरंत लिख बैठा कि रेगुलस की 'प्रतिष्ठा' अत्यंत महान थी। इस प्रकार के दोष और ऐसे अन्य दोष जो केवल अनुकरण से प्राप्त होते हैं। आत्म-विलास या पतित मन के लक्षण नहीं हैं। किसी व्यक्ति के स्वभाव का अनुमान केवल उसके अपने दोषों से लगाया जा सकता है। उन दोषों से जो उसके अपने व्यक्तित्व से उत्पन्न होते हैं। जब वह क्रोधित होता है तो उसकी भाषा भी क्रोधपूर्ण हो जाती है। जब वह व्याकुल होता है तो उसकी भाषा भी अत्यधिक उग्र हो जाती है; और जब वह आडंबरप्रिय तथा बनावटी होता है तो उसकी भाषा भी शिथिल, ढीली और निर्बल हो जाती है।

    उन लोगों पर ध्यान दीजिए जिन्हें आप देखते हैं। जो अपनी दाढ़ी के सारे या अधिकांश बाल उखाड़ डालते हैं या केवल होंठों के चारों ओर का थोड़ा-सा भाग साफ़ रखते हैं और शेष बाल बढ़ने देते हैं। जो अत्यंत भड़कीले रंगों के चोगे पहनते हैं या बहुत ढीले बुने हुए टोगा धारण करते हैं। वे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते जो लोगों की दृष्टि से ओझल रह जाए। उनकी इच्छा केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करने और सबकी निगाहें अपनी ओर खींचने की होती है। लोग उनकी निंदा करें, इसकी उन्हें परवाह नहीं। उनके लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे चर्चा का विषय बने रहें। मेसेनास और उन सभी लेखकों की गद्य-शैली भी ऐसी ही है, जो भूलवश नहीं बल्कि जान-बूझकर और सोच-समझकर त्रुटियाँ करते हैं। यह किसी गहरे मानसिक दोष का परिणाम है। जिस प्रकार शराब पीने पर वाणी तब तक लड़खड़ाने नहीं लगती जब तक कि उसका भार मन पर हावी होकर उसे डगमगा न दे या परास्त न कर दे, उसी प्रकार उसकी गद्य-शैली का यह उन्माद, इसे और क्या कहा जाए? किसी व्यक्ति को तब तक प्रभावित नहीं करता, जब तक उसका मन पहले ही विचलित न हो चुका हो। इसलिए हमें सबसे अधिक अपने मन की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि अर्थ, वाणी, आचरण, मुखमुद्रा और चाल, सब उसी से उत्पन्न होते हैं। यदि मन स्वस्थ और संतुलित है तो उसकी भाषा भी दृढ़, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण होगी। पर यदि मन ही डगमगा जाए, तो उसके साथ शेष सब कुछ भी बिखर जाता है। जब तक उनके राजा की रक्षा होती है, तब तक सब एकचित्त रहते हैं। परंतु यदि वह नष्ट हो जाए तो वे अपनी निष्ठा भी त्याग देते हैं।

    मन हमारा राजा है। जब तक वह सुरक्षित और अक्षुण्ण रहता है, तब तक हमारे अन्य सभी अंग अपना-अपना कार्य भली-भाँति करते हैं तथा उसके प्रति आज्ञाकारी और अधीन बने रहते हैं। परंतु यदि वही डगमगाने लगे तो वे भी अस्थिर हो जाते हैं। यदि वह सुख-भोग के आगे समर्पण कर दे तो उसकी समस्त योग्यताएँ और क्रियाशीलता मुरझा जाती हैं। उसका प्रत्येक प्रयत्न शिथिलता और आलस्य का परिचायक बन जाता है।

    चूँकि मैंने यह उपमा दी है। इसलिए इसे आगे भी बढ़ाता हूँ। हमारा मन कभी राजा होता है और कभी अत्याचारी। जब वह सम्माननीय और सदाचारी आचरण की ओर उन्मुख रहता है, अपने संरक्षण में दिए गए शरीर के कल्याण की चिंता करता है और किसी भी निकृष्ट या लज्जाजनक कार्य का आदेश नहीं देता, तब वह राजा होता है। परंतु जब वह असंयमी, लोभी और कामुक हो जाता है, तब वह अपने श्रेष्ठ नाम को छोड़कर उस भयानक और घृणित नाम को धारण कर लेता है और अत्याचारी बन जाता है। 

    तब उच्छृंखल भावनाएँ उस पर अधिकार कर लेती हैं और उसे अपने भार से दबा देती हैं। आरंभ में वह निश्चय ही प्रसन्न होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे जनता तब प्रसन्न होती है जब उसे ऐसा दान या अनुग्रह मिलता है जो अंततः उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होता है और वह बिना किसी वास्तविक लाभ के पेट भरकर खाती है, लालच में ऐसी वस्तुओं पर भी टूट पड़ती है जिन्हें वह वास्तव में उपभोग नहीं कर सकती। किन्तु जब इस अत्याचारी की बीमारी धीरे-धीरे उसकी शक्ति को क्षीण कर देती है और भोग-विलास का विष उसकी हड्डियों और स्नायुओं तक पहुँच जाता है, तब वह उन लोगों को देखकर आनंद लेने लगता है जिन्हें उसने अपनी ही असीम लालसा के कारण अपने समान निष्प्रयोज्य बना दिया है। वह स्वयं भोग करने में असमर्थ होकर दूसरों के भोग-विलास को देखकर परोक्ष सुख प्राप्त करता है और उनकी वासनाओं का सहभागी तथा साक्षी बन जाता है, क्योंकि अतिभोग ने उससे स्वयं भोग करने की क्षमता ही छीन ली होती है। 

    यद्यपि उसके सामने सुख-सुविधाओं और भोग की वस्तुओं की कोई कमी नहीं होती, फिर भी उनसे उसे संतोष की अपेक्षा अधिक पीड़ा मिलती है क्योंकि वह उन सबका पूरा उपभोग नहीं कर सकता। वह उन सभी भोग-विलासों को अपने कंठ और उदर से नहीं गुज़ार सकता। न ही वह सुंदर युवकों और स्त्रियों की पूरी भीड़ के साथ अपनी वासनाओं की तृप्ति कर सकता है। वस्तुतः उसे इस बात का दुख होता है कि शरीर की सीमित क्षमता के कारण उसके सुख का बड़ा भाग उसकी पहुँच से बाहर रह जाता है।

    प्रिय लूसीलियस, क्या यह पागलपन नहीं है? हममें से कोई भी स्वयं को नश्वर नहीं समझता। कोई भी स्वयं को दुर्बल नहीं मानता बल्कि हममें से कोई यह भी नहीं सोचता कि वह केवल एक ही व्यक्ति है। हमारे रसोईघरों को देखिए, जहाँ कितने ही चूल्हे जल रहे हैं और रसोइए इधर-उधर दौड़ते हुए भोजन बनाने में लगे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि यह सारा कोलाहल केवल एक ही पेट के लिए भोजन तैयार कर रहा है? हमारे मदिरा-भंडारों को देखिए, जहाँ अनेक पीढ़ियों की पुरानी मदिराओं से भरे हुए भंडारगृह हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि इतने वर्षों और इतने प्रदेशों की मदिराएँ केवल एक ही पेट के उपभोग के लिए संचित की गई हैं? देखिए, कितने विशाल क्षेत्रों में भूमि जोती जा रही है, कितने हजारों किसान हल चला रहे हैं और कुदाल चला रहे हैं। क्या यह विश्वास किया जा सकता है कि सिसिली और उत्तर अफ्रीका, दोनों स्थानों के खेत केवल एक ही पेट के लिए बोए जा रहे हैं? हम पूर्णतः स्वस्थ और संतुलित कब होंगे? हम अपनी इच्छाओं को संयमित कब करेंगे? तब, जब हममें से प्रत्येक स्वयं का सही आकलन करेगा, अपने शरीर की सीमाओं को समझेगा।  यह जान लेगा कि वह वास्तव में कितना कम धारण कर सकता है और कितने थोड़े समय के लिए।किन्तु प्रत्येक प्रकार के आत्मसंयम की दिशा में आपको जितनी सहायता इस विचार से मिलेगी कि जीवन अल्प है और उसका जो थोड़ा-सा भाग हमारे पास है, वह भी अनिश्चित है, उतनी किसी अन्य बात से नहीं मिलेगी।अपने प्रत्येक कर्म में मृत्यु को अपनी दृष्टि के सामने रखिए।


अभी के लिए विदा 

न्याय के बारे में -- पत्र - 111

प्रिय लूसीलियस 


तुम चाहते हो कि मैं उस प्रश्न पर अपना मत तुमको भेजूँ जिस पर हमारे विद्यालय में बहस चलती रही है कि क्या न्याय, साहस, विवेक और अन्य सद्गुण सजीव प्राणी हैं। प्रिय लूसीलियस, इस प्रकार की सूक्ष्म चर्चाओं ने लोगों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि हम अपने मन को तुच्छ विषयों में उलझाते हैं और अपना अवकाश ऐसे वाद-विवादों में नष्ट करते हैं जिनसे कोई लाभ नहीं होता। मैं तुम्हारे अनुरोध का पालन करूँगा और हमारे मत-पंथ का सिद्धांत प्रस्तुत करूँगा। लेकिन पहले ही बता दूँ कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। मेरा विचार है कि कुछ विषय केवल उन्हीं लोगों के लिए उपयुक्त हैं जो यूनानी जूते और चोगे पहनने का शौक रखते हैं। अतः मैं तुमको बताऊँगा कि हमारे पूर्ववर्तियों को किन तर्कों ने प्रेरित किया था या यों कहें कि वे स्वयं कौन-से तर्क प्रस्तुत करते थे। मन एक सजीव सत्ता है। इसमें कोई विवाद नहीं है क्योंकि मन ही हमें सजीव प्राणी बनाता है और 'सजीव प्राणी' (animalia) शब्द भी उसी से व्युत्पन्न है। परन्तु सद्गुण तो केवल एक निश्चित प्रकार से व्यवस्थित मन है। अतः सद्गुण एक सजीव प्राणी है।



    फिर एक और तर्क प्रस्तुत किया जाता है।  सद्गुण कोई कार्य करता है। परन्तु किसी भी कार्य का संपादन प्रेरणा के बिना नहीं हो सकता। अतः, क्योंकि सद्गुण में प्रेरणा है और प्रेरणा केवल किसी सजीव प्राणी में ही होती है। इसलिए सद्गुण एक सजीव प्राणी है। कोई यह आपत्ति कर सकता है, “यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है, तो क्या स्वयं सद्गुण में भी सद्गुण होगा?” क्यों नहीं होगा? जिस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक कार्य सद्गुण के माध्यम से करता है, उसी प्रकार सद्गुण भी अपने कार्य स्वयं अपने ही माध्यम से करता है।

    “यदि ऐसा है, तो सभी कलाएँ भी सजीव प्राणी होंगी। इसी प्रकार वे सभी बातें भी जिन्हें हम अपने मन में विचारते और धारण करते हैं। तब तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि हमारे वक्ष की संकीर्ण सीमा के भीतर हजारों सजीव प्राणी निवास कर रहे हैं और हममें से प्रत्येक व्यक्ति या तो असंख्य सजीव प्राणियों का समूह है अथवा अपने भीतर ऐसे असंख्य सजीव प्राणियों को धारण किए हुए है।” क्या आपको आश्चर्य है कि इस आपत्ति का उत्तर कैसे दिया जाए? यद्यपि इनमें से प्रत्येक एक सजीव प्राणी होगा, फिर भी वे सजीव प्राणियों की बहुलता नहीं होंगे। यह कैसे? यदि तुम पूरे ध्यान और एकाग्रता से सुनोगे तो मैं बताता हूँ। 

    प्रत्येक सजीव प्राणी का अपना पृथक् द्रव्य या अस्तित्व होना चाहिए। परन्तु जिन सजीव प्राणियों की तुम बात कर रहे हो, उनमें प्रत्येक का केवल एक ही मन है। इसलिए उनमें से प्रत्येक केवल एक ही सजीव प्राणी हो सकता है, अनेक सजीव प्राणी नहीं। मैं स्वयं भी एक सजीव प्राणी हूँ और एक मनुष्य भी हूँ। फिर भी तुम यह नहीं कहोगे कि हम दो हैं। ऐसा क्यों नहीं? क्योंकि दो होने के लिए दोनों का एक-दूसरे से पृथक् होना आवश्यक है। मेरा आशय यह है कि एक का दूसरे से अलग अस्तित्व होना चाहिए। तभी वे दो कहलाएँगे। जो कुछ एक ही सत्ता में अनेक रूपों में विद्यमान होता है, वह एक ही प्रकृति के अधीन होता है। इसलिए वह एक ही माना जाता है। मेरा मन एक सजीव प्राणी है और मैं भी एक सजीव प्राणी हूँ। फिर भी हम दो नहीं हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि मेरा मन मेरा ही एक अंग है। कोई वस्तु तभी अपने आप में पृथक् गिनी जाती है जब उसका स्वतंत्र अस्तित्व हो। जब तक वह किसी अन्य वस्तु का एक घटक बनी रहती है, तब तक उसे एक भिन्न वस्तु नहीं माना जा सकता। ऐसा क्यों? क्योंकि जो वस्तु वास्तव में भिन्न है, उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व होना चाहिए। उसका अपना विशिष्ट गुण होना चाहिए। वह अपने आप में पूर्ण होनी चाहिए।

    मैंने पहले ही तुमको सावधान कर दिया था कि इस विषय में मेरा मत भिन्न है। यदि इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो केवल सद्गुण ही नहीं बल्कि उनके विपरीत दोष भी सजीव प्राणी माने जाएँगे। साथ ही क्रोध, भय, शोक तथा अविश्वास जैसे मनोवेग भी। बात यहीं नहीं रुकेगी। प्रत्येक मत और प्रत्येक विचार भी सजीव प्राणी ठहराया जाएगा। यह बात किसी भी प्रकार स्वीकार करने योग्य नहीं है। मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य स्वयं मनुष्य नहीं होता। कोई पूछ सकता है, “न्याय क्या है?” उत्तर है, एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन। “तो यदि मन एक सजीव प्राणी है क्या न्याय भी सजीव प्राणी होगा?” बिल्कुल नहीं। 

    न्याय मन की एक अवस्था है। उसकी एक विशिष्ट क्षमता है। एक ही मन अनेक प्रकार की अवस्थाओं और रूपों को धारण करता है। किन्तु जब-जब वह कोई भिन्न कार्य करता है, तब-तब वह कोई नया सजीव प्राणी नहीं बन जाता। इसी प्रकार, मन द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य भी सजीव प्राणी नहीं होता। यदि न्याय एक सजीव प्राणी है। इसी प्रकार साहस तथा अन्य सभी सद्गुण भी तो क्या वे कभी सजीव प्राणी होना छोड़ देते हैं और फिर से बन जाते हैं अथवा वे सदा ही ऐसे बने रहते हैं? सद्गुणों का तो अंत नहीं हो सकता। यदि ऐसा है तो इस एक ही मन के भीतर अनेक बल्कि असंख्य सजीव प्राणी निरंतर विचरण कर रहे होंगे।

    कोई यह कह सकता है, “वे अनेक नहीं हैं क्योंकि वे एक ही सत्ता से जुड़े हुए हैं। वे उसी एक सत्ता के अंग और उसके घटक हैं।” तो क्या हम अपने मन की कल्पना उसी प्रकार कर रहे हैं जैसी हाइड्रा (बहुत से सिरों वाला यूनानी पौराणिक राक्षस) की होती है जिसके प्रत्येक सिर अपने-आप लड़ता है और अपने-आप ही हानि पहुँचाता है? फिर भी उन सिरों में से कोई भी स्वयं एक सजीव प्राणी नहीं है। वे केवल एक सजीव प्राणी के सिर हैं। जबकि स्वयं हाइड्रा एक ही सजीव प्राणी है। इसी प्रकार, किसी ने भी यह नहीं कहा कि काइमेरा (यूनानी पौराणिक राक्षस जिसके सिर कई पशुओं से मिलकर बने हैं) के भीतर का सिंह या अजगर स्वयं एक-एक सजीव प्राणी हैं। वे तो उसके अंग हैं और अंग स्वयं सजीव प्राणी नहीं होते। 



    फिर आप किस आधार पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि न्याय एक सजीव प्राणी है? “क्योंकि वह कार्य करता है अर्थात वह उपकार करता है। जो कुछ कार्य करता है और उपकार करता है, उसमें प्रेरणा होती है जिसमें प्रेरणा होती है, वह सजीव प्राणी होता है।” यह तर्क तभी सही है जब वह प्रेरणा उसकी अपनी हो। किन्तु न्याय के मामले में प्रेरणा न्याय की अपनी नहीं बल्कि मन की होती है।


    प्रत्येक सजीव प्राणी अपनी मृत्यु तक अपनी मूल पहचान बनाए रखता है। मनुष्य, जब तक वह जीवित रहता है, मनुष्य ही रहता है। घोड़ा घोड़ा ही रहता है और कुत्ता कुत्ता ही रहता है। वे किसी दूसरी वस्तु में परिवर्तित नहीं हो सकते। मान लीजिए कि न्याय अर्थात एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन एक सजीव प्राणी है। यदि हम इसे स्वीकार कर लें तो साहस भी एक सजीव प्राणी होगा क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित मन है।परन्तु यह किसका मन है? क्या वही मन, जो अभी कुछ क्षण पहले न्याय था? यदि ऐसा है तो वह मन तो पहले से ही उस पूर्ववर्ती सजीव प्राणी में स्थित है। वह किसी दूसरे सजीव प्राणी में स्थानांतरित नहीं हो सकता। उसे उसी सजीव प्राणी में बने रहना होगा, जिसमें उसने अपना अस्तित्व प्रारम्भ किया था।

    इसके अतिरिक्त, एक ही मन दो सजीव प्राणियों का नहीं हो सकता, अनेक का तो और भी नहीं। यदि न्याय, साहस, आत्मसंयम और अन्य सभी सद्गुण सजीव प्राणी हैं तो वे एक ही मन के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? उनमें से प्रत्येक का अपना-अपना मन होना चाहिए। अन्यथा वे सजीव प्राणी नहीं होंगे। अनेक सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। इस बात को हमारे प्रतिपक्षी भी स्वीकार करते हैं। न्याय का शरीर क्या है? “मन।” साहस का शरीर क्या है? “वही मन।” किन्तु दो सजीव प्राणियों का एक ही शरीर नहीं हो सकता। वे कहते हैं, “वही एक मन कभी न्याय का रूप धारण करता है, कभी साहस का और कभी आत्मसंयम का।” ऐसा तभी संभव होता, यदि मन न्याय होने के समय साहस न होता। साहस होने के समय आत्मसंयम न होता। किन्तु वास्तव में सभी सद्गुण एक ही समय में विद्यमान रहते हैं। फिर प्रत्येक सद्गुण अलग-अलग सजीव प्राणी कैसे हो सकता है। जबकि मन एक ही है और वह एक से अधिक सजीव प्राणियों की रचना नहीं कर सकता? 

    अंत में, कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरे सजीव प्राणी का अंग नहीं होता। किन्तु न्याय मन का एक अंग है। अतः न्याय सजीव प्राणी नहीं है।

    मुझे लगता है कि मैं ऐसी बात पर परिश्रम व्यर्थ कर रहा हूँ जो स्वयं स्पष्ट है। ऐसी बात जिस पर वाद-विवाद करने के बजाय खीझ प्रकट करनी चाहिए। कोई भी सजीव प्राणी किसी दूसरी वस्तु का अंग नहीं होता। अपने चारों ओर समस्त प्राणियों के शरीरों को देखिए। उनमें से कोई भी अपने विशिष्ट रंग, आकार और परिमाण के बिना नहीं है। दैवी सृष्टिकर्ता की बुद्धि पर आश्चर्य करने के अनेक कारण हैं। उनमें से एक, मेरे विचार से, यह भी है कि इस विशाल सृष्टि में कोई भी वस्तु दूसरी के बिल्कुल समान नहीं बनती। जो वस्तुएँ देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं, वे भी सावधानी से तुलना करने पर भिन्न निकलती हैं। सृष्टिकर्ता ने असंख्य प्रकार की पत्तियाँ बनाई हैं। प्रत्येक की अपनी अलग विशेषता है। उसने असंख्य सजीव प्राणी भी बनाए हैं। किन्तु उनमें से कोई भी दूसरे के ठीक समान आकार का नहीं है। न ही ऐसा है जिसमें कम-से-कम कुछ भिन्नता न हो। सृष्टिकर्ता ने मानो अपने लिए यह नियम निर्धारित किया कि जो वस्तुएँ भिन्न हों, वे रूप और परिमाण में भी एक-दूसरे से भिन्न और असमान हों। परन्तु, जैसा कि तुम स्टोइक कहते हो, सभी सद्गुण समान हैं। अतः वे सजीव प्राणी नहीं हैं। 

    कोई भी सजीव प्राणी ऐसा नहीं होता जो अपने कार्य स्वयं न करता हो। किन्तु सद्गुण अपने-आप कुछ नहीं करता बल्कि वह केवल मनुष्य के साथ मिलकर ही कार्य करता है। सभी सजीव प्राणी या तो विवेकयुक्त होते हैं जैसे, मनुष्य अथवा अविवेकी होते हैं जैसे, जंगली पशु और पालतू मवेशी। सद्गुण निश्चय ही विवेकयुक्त है। किन्तु वह न मनुष्य है और न देवता। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है।

    विवेकयुक्त कोई भी सजीव प्राणी तब तक कोई कार्य नहीं करता, जब तक पहले किसी विशेष वस्तु की छाप उसके मन पर न पड़े; फिर उसके भीतर प्रेरणा उत्पन्न न हो; और अंत में उसकी स्वीकृति उस प्रेरणा की पुष्टि न कर दे।

    मैं आपको बताता हूँ कि स्वीकृति क्या है। “मेरे लिए चलना उचित है।” मैं तभी चलता हूँ जब पहले मैं अपने आप से यह कहता हूँ और इस निर्णय को स्वीकार कर लेता हूँ। “मेरे लिए बैठना उचित है।” तभी मैं बैठता हूँ।किन्तु इस प्रकार की स्वीकृति सद्गुण में नहीं पाई जाती। मान लीजिए कि वह सद्गुण विवेक है। तब विवेक इस निर्णय को कैसे स्वीकार करेगा कि “मेरे लिए चलना उचित है”? यह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। विवेक अपना ध्यान उस वस्तु के हित पर रखता है जिससे वह संबद्ध है, अपने स्वयं के हित पर नहीं क्योंकि वह स्वयं न चल सकता है और न बैठ सकता है। अतः विवेक में स्वीकृति नहीं होती और जिसमें स्वीकृति नहीं होती, वह विवेकयुक्त सजीव प्राणी नहीं हो सकता। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है तो वह विवेकयुक्त सत्ता होगी। किन्तु वह ऐसी विवेकयुक्त सत्ता नहीं है। अतः वह सजीव प्राणी नहीं है। यदि सद्गुण एक सजीव प्राणी है और प्रत्येक शुभ सद्गुण है तो प्रत्येक शुभ भी एक सजीव प्राणी होगा। हमारा मत-पंथ इस बात को स्वीकार करता है। 

    अपने पिता की रक्षा करना एक शुभ कर्म है। सीनेट में विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी एक शुभ कर्म है और न्यायपूर्वक निर्णय देना भी एक शुभ कर्म है। अतः अपने पिता की रक्षा करना भी एक सजीव प्राणी होगा और विवेकपूर्वक अपना मत प्रकट करना भी। यह तर्क इतनी दूर तक पहुँच जाएगा कि आप हँसे बिना नहीं रह सकेंगे। विवेकपूर्वक मौन रहना भी एक शुभ कर्म है और उत्तम प्रकार से भोजन करना भी। अतः मौन रहना और भोजन करना भी सजीव प्राणी ठहरेंगे। निस्संदेह, मैं इन पांडित्यपूर्ण असंगतियों के साथ परिहास करना और उनका उपहास उड़ाना बंद नहीं करूँगा। यदि न्याय और साहस सजीव प्राणी हैं, तो वे निश्चय ही पृथ्वी पर रहने वाले सजीव प्राणी होंगे। प्रत्येक पृथ्वीवासी सजीव प्राणी बीमार पड़ता है, भूखा होता है और प्यासा भी होता है। अतः न्याय भी बीमार पड़ेगा, साहस भी भूखा होगा और दया भी प्यासी होगी।

    मुझे आगे उनसे यह भी पूछना चाहिए कि इन सजीव प्राणियों का आकार कैसा है। क्या उनका रूप मनुष्य जैसा है या घोड़े जैसा अथवा किसी जंगली पशु जैसा? यदि वे उन्हें देवताओं के समान गोलाकार बताएँ तो मैं पूछूँगा कि क्या लोभ, विलासिता और उन्माद भी उसी प्रकार गोलाकार हैं? क्योंकि उनके अनुसार वे भी सजीव प्राणी हैं। यदि वे उन्हें भी गोलाकार मान लें तो मैं यह भी पूछूँगा कि क्या विवेकपूर्वक चलना भी एक सजीव प्राणी है। उन्हें इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। फिर यह भी कहना पड़ेगा कि चलना एक सजीव प्राणी है और वह भी गोलाकार। 

    तुमको यह नहीं समझना चाहिए कि मैं हमारे मत-पंथ का पहला व्यक्ति हूँ जो तत्काल अपने विचार प्रस्तुत कर रहा है और अपना स्वतंत्र मत रखता है। क्लीन्थीस और क्राइसिपस भी इस बात पर सहमत नहीं थे कि ‘चलना’ वास्तव में क्या है। क्लीन्थीस का कहना है कि यह वह प्राणवायु है जो प्रधान नियामक शक्ति (directive faculty) से पैरों तक फैलती है। जबकि क्राइसिपस का मत है कि चलना स्वयं वही प्रधान नियामक शक्ति है। तो फिर, क्राइसिपस के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, प्रत्येक व्यक्ति अपनी विचार-स्वतंत्रता का प्रयोग क्यों न करे और इन सजीव प्राणियों का उपहास क्यों न उड़ाए, जिनकी संख्या इतनी अधिक है कि स्वयं यह संसार भी उन्हें समाहित नहीं कर सकता?

    प्रतिपक्षी कहता है, “सद्गुण अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं हालाँकि वे सजीव प्राणी हैं। जिस प्रकार कोई व्यक्ति एक ही समय में कवि भी हो सकता है और वक्ता भी, फिर भी वह एक ही व्यक्ति रहता है, उसी प्रकार ये सद्गुण सजीव प्राणी तो हैं। परन्तु अनेक सजीव प्राणी नहीं हैं। एक ही मन, प्रत्येक सद्गुण के संबंध में एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित होने के कारण, न्यायशील भी होता है, विवेकशील भी और साहसी भी।” विवाद यहीं समाप्त हो जाता है। अब हम सहमत हैं। क्योंकि मैं भी फिलहाल यह स्वीकार कर लेता हूँ कि मन एक सजीव प्राणी है। इस विषय में अपना अंतिम निर्णय मैं बाद के लिए स्थगित रखता हूँ। किन्तु मैं यह स्वीकार नहीं करता कि मन के कार्य स्वयं सजीव प्राणी हैं। यदि ऐसा मान लिया जाए तो प्रत्येक शब्द भी सजीव प्राणी होगा और कविता की प्रत्येक पंक्ति भी। यदि विवेकपूर्ण वाणी एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो वाणी भी एक सजीव प्राणी होगी। इसी प्रकार, यदि विवेकपूर्ण काव्य-पंक्ति एक शुभ है और प्रत्येक शुभ एक सजीव प्राणी है तो कविता की एक पंक्ति भी सजीव प्राणी होगी। तब तो 'मैं शस्त्रों और उस पुरुष का गान करता हूँ' भी एक सजीव प्राणी ठहरेगा। किन्तु वे उसे गोलाकार सजीव प्राणी नहीं कह सकते क्योंकि उसके छह चरण हैं।

    “भगवान के लिए!” तुम कहोगे, “इस समय मैं कैसी उलझी हुई जाल-बुनाई कर रहा हूँ!” मैं तो यह कल्पना करके ही हँस पड़ता हूँ कि भाषिक अशुद्धियाँ (solecisms), अपभ्रष्ट शब्द (barbarisms) और न्याय-तर्क (syllogisms) भी सजीव प्राणी हैं। किसी चित्रकार की भाँति मैं उन्हें उपयुक्त मुखाकृतियाँ भी दे देता हूँ। क्या वास्तव में हम भौंहें चढ़ाकर और माथे पर बल डालकर इसी प्रकार की बातों पर विचार कर रहे हैं? क्या मैं कैसिलियस के शब्दों में यह नहीं कह सकता, “क्या ही गंभीर मूर्खता है!” यह सब नितांत हास्यास्पद है। अतः आओ, इसके स्थान पर ऐसी बातों की ओर ध्यान दें जो हमारे लिए उपयोगी और कल्याणकारी हों। आओ यह विचार करें कि हम सद्गुणों तक कैसे पहुँच सकते हैं और कौन-सा मार्ग हमें वहाँ ले जाएगा। 

    मुझे यह मत सिखाओ कि साहस एक सजीव प्राणी है या नहीं बल्कि यह सिखाओ कि साहस के बिना कोई भी सजीव प्राणी सुखी नहीं हो सकता। अर्थात जब तक वह आकस्मिक घटनाओं का सामना करने की शक्ति प्राप्त नहीं कर लेता और प्रत्येक संभावित परिस्थिति पर पहले से विचार करके उनके घटित होने से पहले ही उन पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता। साहस क्या है? यह मानव की दुर्बलता का अभेद्य दुर्ग है। जो व्यक्ति अपने को इससे सुरक्षित कर लेता है, वह जीवनरूपी घेराबंदी को शांतचित्त होकर सहन कर सकता है क्योंकि वह अपनी ही शक्ति और अपने ही शस्त्रों का उपयोग करता है। इस प्रसंग में मैं तुमको हमारे स्टोइक दार्शनिक पोसिडोनियस का मत बताना चाहता हूँ—

“यह कभी मत समझो कि भाग्य के दिए हुए शस्त्र तुम्हें सुरक्षित रखेंगे। भाग्य का सामना अपने ही शस्त्रों से करो। भाग्य मनुष्य को भाग्य के विरुद्ध लड़ने के लिए शस्त्र नहीं देता। इसलिए जो लोग शत्रु का सामना करने के लिए सुसज्जित होते हैं, वे प्रायः भाग्य का सामना करने के लिए निःशस्त्र रह जाते हैं।”

    यह सत्य है कि सिकन्दर ने फ़ारसियों, हाइरकेनियों, भारतीयों तथा पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई अनेक जातियों को पराजित कर उनके राज्यों का विनाश कर दिया था। किन्तु स्वयं वह एक मित्र की हत्या करने के बाद और दूसरे मित्र को खो देने के बाद अंधकारमय निराशा में पड़ा रहा, कभी अपने अपराध पर शोक करता और कभी अपने वियोग पर। इतने अधिक राजाओं और राष्ट्रों का विजेता भी क्रोध और विषाद से पराजित हो गया। उसने अपनी वासनाओं को छोड़कर शेष सब पर अधिकार करने का प्रयास किया। 

    जो लोग समुद्रों के पार तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने की लालसा रखते हैं और अपने को तभी अत्यन्त भाग्यशाली समझते हैं जब उनकी सेनाएँ अनेक प्रान्तों पर अधिकार कर लें तथा पुराने राज्यों में नए प्रदेश जोड़ दें, वे कितनी बड़ी भूल करते हैं! वे उस राज्य से अनभिज्ञ रहते हैं जो देवत्व के समान महान है। अपने ऊपर शासन करना और यही सभी प्रकार के शासन में सबसे महान शासन है। मुझे उस न्याय की पवित्रता का उपदेश दो जो दूसरों के हित का ध्यान रखता है और अपने लिए केवल इतना ही चाहता है कि उसे कार्य करने का अवसर मिलता रहे। उसका स्वार्थ और यश-लिप्सा से कोई संबंध न हो। वह अपने-आप में ही संतुष्ट रहे। 

    सबसे बढ़कर, प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन में इस सिद्धांत को दृढ़तापूर्वक स्थापित कर लेना चाहिए। “मुझे किसी पुरस्कार की अपेक्षा किए बिना न्यायशील होना चाहिए।” नहीं, केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसे अपने-आप को इस बात के लिए भी तैयार करना चाहिए कि वह इस परम सुंदर सद्गुण के लिए उदारतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पित करने में आनंद अनुभव करे। उसके सभी विचार यथासंभव व्यक्तिगत लाभ से दूर रहने चाहिए। तुम्हें किसी न्यायपूर्ण कर्म के प्रतिफल की ओर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि न्यायपूर्ण कर्म करने का सबसे बड़ा पुरस्कार स्वयं न्यायपूर्ण कर्म करना ही है।

    मैंने थोड़ी देर पहले जो बात तुम्हें बताई थी, उसी पर निरंतर ध्यान लगाए रखो। तुम्हारी निष्पक्षता और न्यायप्रियता से कितने लोग परिचित हैं, इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग चाहते हैं कि उनके सद्गुणों का प्रचार हो, वे वास्तव में सद्गुण के लिए नहीं बल्कि यश के लिए प्रयत्न करते हैं। क्या तुम बिना प्रसिद्धि पाए भी न्यायशील रहने को तैयार नहीं हो? वास्तव में, अनेक अवसर ऐसे आएँगे जब तुम्हें न्यायशील होने के साथ-साथ अपयश भी सहना पड़ेगा। यदि तुम बुद्धिमान हो तो अपने उत्तम आचरण के कारण प्राप्त हुई उस बदनामी में भी प्रसन्नता का अनुभव करोगे।


अभी के लिए विदा 

वस्तुओं के बारे में -- पत्र - 116

 प्रिय लूसीलियस  तुम मुझ पर यह आग्रह कर रहे हो कि मैं तुम्हें अधिक बार पत्र लिखूँ। अच्छा तो आओ हिसाब-किताब कर लें। तब तुम्हें यह नहीं लगेगा ...