Friday, 24 July 2026

भावनात्मक आवेग के बारे में -- पत्र - 83

 प्रिय लूसीलियस 


मैंने सोचा था कि शेष जटिल तर्कों को छोड़कर तुम्हें कुछ राहत दूँ। मेरा विचार था कि केवल इतना ही बता दूँ कि हमारा दर्शन किस प्रकार यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (Virtue) अपने आप में ही मनुष्य के जीवन को पूर्णतः सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन तुम चाहते हो कि मैं सब कुछ लिखूँ। हमारे अपने तर्क भी और वे तर्क भी, जिन्हें विशेष रूप से हमारा उपहास उड़ाने के लिए गढ़ा गया है। यदि मैं ऐसा करने बैठूँ तो यह पत्र नहीं रहेगा। यह एक पुस्तक बन जाएगा! 



    मैं तुम्हें बार-बार विश्वास दिलाता हूँ कि इस प्रकार के तर्कों में मुझे कोई आनंद नहीं मिलता। मुझे तो लज्जा आती है कि देवताओं और मनुष्यों जैसे महान विषयों के लिए हमें केवल एक सुई की नोक जितने सूक्ष्म और तुच्छ तर्कों से युद्ध करना पड़े। 

जो व्यक्ति बुद्धिमान है, वह आत्मसंयमी भी होता है। 

जो आत्मसंयमी है, वह स्थिरचित्त भी होता है।

जो स्थिरचित्त है, वह व्याकुल नहीं होता।

जो व्याकुल नहीं होता, वह शोक से मुक्त रहता है।

जो शोक से मुक्त है, वही सुखी है।

अतः बुद्धिमान व्यक्ति सुखी होता है और बुद्धिमत्ता ही सुख प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

    इस न्याय-तर्क (सिलोजिज़्म) का उत्तर देते हुए कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति को 'अविचल', 'स्थिरचित्त' या 'शोकरहित' कहा जाता है तो उसका अर्थ यह नहीं होता कि वह कभी भी विचलित या दुःखी नहीं होता। उनका अभिप्राय केवल इतना होता है कि वह बहुत कम और सीमित मात्रा में ही विचलित होता है। इसी प्रकार, वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति को 'शोकरहित' तब कहा जाता है जब वह स्वभाव से शोकग्रस्त रहने वाला न हो और उसमें यह दोष न तो बार-बार प्रकट होता हो और न ही अत्यधिक मात्रा में। वे आगे कहते हैं कि मानव-स्वभाव ऐसा नहीं है कि किसी का मन पूरी तरह शोक से अछूता रह सके। उनके अनुसार, ज्ञानी व्यक्ति शोक से पराजित नहीं होता। परंतु वह उससे पूरी तरह अछूता भी नहीं रहता। शोक उसे स्पर्श अवश्य करता है। इसी प्रकार की अन्य बातें भी वे कहते हैं, जो उनके दर्शन के अनुरूप हैं। अर्थात वे मनोवेगों (भावनाओं) का पूर्ण उन्मूलन नहीं करते बल्कि उन्हें केवल सीमित और नियंत्रित करना चाहते हैं।

    यदि ज्ञानी पुरुष की प्रशंसा केवल इस आधार पर की जाए कि वह दुर्बलों से कुछ अधिक दृढ़ है, अत्यंत निराश लोगों से कुछ अधिक सुखी है, असंयमी लोगों से कुछ अधिक संयमी है और निकृष्टतम लोगों से कुछ अधिक श्रेष्ठ है तो हम उसके गुणों का कितना तुच्छ मूल्यांकन कर रहे होंगे! कल्पना करो कि प्रसिद्ध धावक लाडास इस बात पर गर्व करे कि वह कितना तेज़ दौड़ता है जबकि उसके पीछे केवल लँगड़े और अपंग लोग ही दौड़ रहे हों!

“वह बढ़ती हुई फसल की पत्तियों के सिरों को छूती हुई इस प्रकार निकल जाती कि कोमल तिनके भी न झुकें। 
वह उफनते समुद्र की लहरों के ऊपर से इस प्रकार दौड़ जाती कि उसके तीव्र चरण जल की एक बूँद से भी न भीगें।”

यह गति उस व्यक्ति की है जिसकी माप स्वयं उसकी अपनी उत्कृष्टता से की जाती है न कि इसलिए कि वह सबसे धीमे धावकों से तेज़ है। इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए स्वस्थ कह दिया जाए कि उसे हल्का-सा बुखार है तो क्या यह उचित होगा? रोग थोड़ा हो जाने से स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो जाता। हल्की बीमारी भी बीमारी ही है, स्वास्थ्य नहीं।

    “ज्ञानी पुरुष को ‘अविचल’ उसी अर्थ में कहा जाता है, जिस अर्थ में कुछ फलों को ‘बीजरहित’ कहा जाता है अर्थात उनमें कठोर बीज बहुत कम या लगभग दिखाई नहीं देते, यद्यपि वे पूरी तरह अनुपस्थित नहीं होते।” यह बात सही नहीं है। मेरे विचार में, एक सद्गुणी व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जाना चाहिए कि उसके दोष केवल कम हो गए हैं बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि उनमें कोई दोष है ही नहीं। दोष बिल्कुल नहीं होने चाहिए। चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों। क्योंकि यदि वे मौजूद हैं तो समय के साथ बढ़ेंगे और अंततः गंभीर समस्या बन जाएँगे। जैसे आँख का तीव्र और गंभीर संक्रमण अंततः अंधापन ला सकता है, वैसे ही हल्का संक्रमण भी कष्टदायक होता है। 

    यदि तुम ज्ञानी पुरुष में किसी भी प्रकार के मनोवेग (भावनात्मक आवेग) को स्वीकार कर लेते हो तो अंततः विवेक उनके सामने टिक नहीं पाएगा। वह प्रबल बाढ़ की धारा में बह जाने वाली वस्तु की तरह उनके प्रवाह में बह जाएगा। यह संकट इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि तुम उसमें केवल एक ही मनोवेग नहीं बल्कि सभी मनोवेगों को स्थान देते हो। अनेक मनोवेगों का समूह, चाहे वे प्रत्येक सीमित ही क्यों न हों, किसी एक अकेले मनोवेग से अधिक शक्तिशाली होता है, भले ही वह अकेला मनोवेग अपनी पूरी तीव्रता पर हो। मान लो कि ज्ञानी पुरुष में धन की इच्छा है पर केवल थोड़ी-सी। उसमें महत्त्वाकांक्षा है पर अत्यधिक नहीं। उसमें क्रोध है पर असीम नहीं। उसमें चंचलता है पर बहुत अधिक बेचैन करने वाली नहीं। उसमें कामवासना है पर उन्मत्त नहीं।फिर भी ऐसी स्थिति उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक कठिन होगी, जिसमें केवल एक ही दोष हो, चाहे वह दोष अत्यंत प्रबल ही क्यों न हो। क्योंकि जिस व्यक्ति में सभी दोष थोड़ी-थोड़ी मात्रा में उपस्थित हैं, उससे निपटना उस व्यक्ति से अधिक कठिन है, जिसमें केवल एक ही दोष पूर्ण रूप से विद्यमान हो।

    इसके अतिरिक्त, मनोवेग (भावनात्मक आवेग) की मात्रा से कोई अंतर नहीं पड़ता। वह चाहे कम हो या अधिक, उसका स्वभाव एक-सा ही रहता है। वह न तो आज्ञा मानना जानता है और न ही किसी उचित सलाह पर ध्यान देता है। जैसे कोई भी पशु, चाहे वह जंगली हो या पालतू और देखने में कितना ही शांत क्यों न लगे, तर्कपूर्ण समझाने से संचालित नहीं होता क्योंकि उसका स्वभाव समझाने-बुझाने के प्रति बहरा होता है। उसी प्रकार मनोवेग भी, चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों, हमारी बात नहीं मानते और न ही हमारी सुनते हैं। सिंह और बाघ अपनी हिंसक प्रकृति को कभी पूरी तरह नहीं छोड़ते। कभी-कभी वे शांत और वश में प्रतीत होते हैं लेकिन जब इसकी सबसे कम अपेक्षा होती है, तभी उनकी भीतर छिपी हुई उग्रता फिर से भड़क उठती है। इसी प्रकार, हमें कभी यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि हमारे दोष पूरी तरह वश में आ गए हैं। वे अवसर मिलते ही फिर से सिर उठा सकते हैं।


डेनी फॉक्स द्वारा 

    इसके अतिरिक्त, यदि विवेक (तर्कबुद्धि) का वास्तव में कोई उपयोग है तो मनोवेगों को प्रारम्भ ही नहीं होना चाहिए। यदि वे विवेक की स्वीकृति के बिना ही उत्पन्न हो जाते हैं तो वे उसके बिना ही आगे बढ़ते रहेंगे। इसलिए उन्हें आरम्भ होने से पहले ही रोक देना, उनके उत्पन्न हो जाने के बाद उनके वेग को नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है। इसी कारण 'संयमित मनोवेग' या 'भावनाओं में मध्यमता' की धारणा मिथ्या और निरर्थक है। उसका व्यवहार भी हमें उसी प्रकार करना चाहिए जैसे, कोई यह कहे कि मनुष्य को संयमित रूप से पागल होना चाहिए या संयमित रूप से बीमार होना चाहिए

    केवल सद्गुण (Virtue) ही वास्तविक आत्मसंयम का परिचय देता है। मन की दुर्बलताएँ संयम को स्वीकार नहीं करतीं। उन्हें नियंत्रित करने की अपेक्षा उनका पूर्ण उन्मूलन कर देना अधिक सरल है। निस्संदेह यह बात विवाद से परे है कि मनुष्य के मन में जड़ जमा चुके और गहरे पैठे हुए दोष जैसे, लोभ, क्रूरता और असंयम,संयम के अधीन नहीं किए जा सकते। इसलिए मनोवेग भी संयम के अधीन नहीं हो सकते क्योंकि यही मनोवेग आगे चलकर उन दोषों को जन्म देते हैं।

    इसके अतिरिक्त, यदि तुम शोक, भय, इच्छा और अन्य सभी दूषित मनोवेगों को थोड़ी-सी भी छूट दे देते हो तो वे फिर हमारे वश में नहीं रहेंगे। क्यों? क्योंकि उन्हें उत्पन्न करने वाले कारण हमारे भीतर नहीं बल्कि हमारे बाहर होते हैं। इसलिए वे बाहरी परिस्थितियों के अनुसार बढ़ते या घटते रहते हैं। यदि भय उत्पन्न करने वाली वस्तु अधिक भयानक हो जाए या और निकट आ जाए तो भय भी बढ़ जाएगा। इसी प्रकार, जितनी बड़ी वस्तु प्राप्त करने की आशा होगी, इच्छा भी उतनी ही प्रबल होती जाएगी। यदि यह हमारे अधिकार में ही नहीं है कि मनोवेग उत्पन्न हों या न हों तो फिर यह भी हमारे अधिकार में नहीं होगा कि वे कितने बड़े या छोटे हों। एक बार तुम उन्हें आरम्भ होने की अनुमति दे दो तो वे अपने कारणों के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं भी बढ़ते जाएँगे और उनकी तीव्रता उतनी ही हो जाएगी जितनी परिस्थितियाँ उसे बना देंगी। इसके अतिरिक्त, सबसे छोटे मनोवेग भी कभी-कभी नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। जो वस्तु विनाशकारी होती है, वह कभी किसी सीमा का पालन नहीं करती। रोगों की शुरुआत भले ही बहुत मामूली हो परन्तु वे धीरे-धीरे फैलते जाते हैं। जब शरीर रोगग्रस्त हो जाता है, तब कभी-कभी रोग में हुई सबसे छोटी-सी वृद्धि भी उसे पूरी तरह पराजित कर देने के लिए पर्याप्त होती है। 

    लेकिन यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि यह तो माना जाए कि मनोवेगों की शुरुआत हमारे वश में नहीं होती और फिर यह विश्वास किया जाए कि उनके अंत को हम अपने वश में रख सकते हैं! जिस चीज़ को उत्पन्न होने से रोकने की शक्ति ही मेरे पास नहीं थी, उसे एक बार उत्पन्न हो जाने के बाद सीमित करने की शक्ति मेरे पास कैसे हो सकती है? क्या किसी वस्तु को भीतर प्रवेश करने ही न देना, उसे भीतर आने देने के बाद नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल नहीं है?

    कुछ लोग निम्नलिखित भेद करते हैं—

“बुद्धिमान और आत्मसंयमी व्यक्ति अपने मन के स्वभाव और चरित्र की दृष्टि से शांत रहता है परंतु घटनाओं के स्तर पर नहीं। अर्थात उसके मन का स्वभाव अविचल होता है। वह न शोक करता है और न भय का अनुभव करता है। फिर भी बाहरी परिस्थितियाँ उस पर प्रभाव डालती हैं और कभी-कभी उसके मन में हलचल उत्पन्न कर देती हैं।” उनका आशय यह है कि ज्ञानी व्यक्ति स्वभाव से क्रोधी नहीं होता फिर भी कभी-कभी क्रोधित हो जाता है। वह भयभीत रहने वाला नहीं होता फिर भी कभी-कभी भय का अनुभव करता है। अर्थात उसमें भयभीत होने का दोष तो नहीं होता लेकिन भय का मनोवेग अवश्य होता है। यदि हम यह मान लें तो बार-बार भय का अनुभव करते-करते वह अंततः भयभीत स्वभाव का दोष बन जाएगा। उसी प्रकार, यदि क्रोध को एक बार मन में प्रवेश करने दिया जाए तो वह धीरे-धीरे उस चरित्र की पूरी संरचना को नष्ट कर देगा, जो पहले क्रोध से मुक्त था। फिर मान लो कि ज्ञानी पुरुष बाहरी परिस्थितियों से ऊपर नहीं उठ पाता और उसके पास भी ऐसी कोई वस्तु है जिससे वह डरता है। तब जब देश, कानून और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उसे युद्ध और अग्नि का सामना करना पड़ेगा, तो वह अनिच्छा से आगे बढ़ेगा क्योंकि उसका मन भय से काँप उठेगा। किन्तु इस प्रकार का मानसिक विरोधाभास और असंगति किसी भी सच्चे ज्ञानी पुरुष में नहीं पाई जाती।

    एक और बात है, जिसका उल्लेख मैं आवश्यक समझता हूँ ताकि हम उन दो प्रमाणों को आपस में न मिला दें जिन्हें अलग-अलग ही रखना चाहिए। एक प्रकार का तर्क यह सिद्ध करता है कि केवल वही वस्तु शुभ है जो नैतिक रूप से सम्माननीय (honorable) है। दूसरा, इससे भिन्न तर्क यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (virtue) ही मनुष्य को सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। सभी लोग यह स्वीकार करते हैं कि यदि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है, तो सद्गुण सुख के लिए पर्याप्त है। लेकिन वे इसका उल्टा निष्कर्ष स्वीकार नहीं करते अर्थात यदि केवल सद्गुण ही मनुष्य को सुखी बना देता है तो इससे यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है। ज़ेनोक्रेटीस और स्प्यूसिपस का मत है कि यद्यपि केवल सद्गुण के द्वारा मनुष्य सुखी हो सकता है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ हो।एपिक्यूरस का भी यही विश्वास है कि सद्गुण से युक्त व्यक्ति सुखी होता है। किंतु उसका मत यह है कि सद्गुण अपने आप में सुख के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार, मनुष्य को सुखी सद्गुण स्वयं नहीं बनाता बल्कि सद्गुण से उत्पन्न होने वाला आनंद उसे सुखी बनाता है। किन्तु यह भेद वास्तव में निरर्थक है क्योंकि एपिक्यूरस स्वयं यह भी कहता है कि सद्गुण कभी आनंद से अलग नहीं होता। यदि एक वस्तु सदैव दूसरी के साथ जुड़ी रहती है और उससे कभी अलग नहीं हो सकती तो सद्गुण अपने आप में भी सुख के लिए पर्याप्त है। क्योंकि जब वह अकेला भी प्रतीत होता है, तब भी वह आनंद से कभी रहित नहीं होता।

    लेकिन पहला मत यह कि मनुष्य केवल सद्गुण के कारण तो सुखी हो सकता है पर पूरी तरह सुखी नहीं, सर्वथा असंगत है। यह कैसे संभव हो सकता है, मेरी समझ से परे है। सुखी जीवन में एक ऐसा परम कल्याण निहित होता है जो पूर्ण भी है और अजेय भी। यदि ऐसा है तो वह जीवन पूर्णतः सुखी ही होगा। यदि देवताओं के जीवन में इससे बढ़कर या इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यदि सुखी जीवन दैवीय स्वरूप का है तो फिर ऐसा कोई आधार नहीं बचता जिसके द्वारा उसे और भी ऊँचे स्तर पर पहुँचाया जा सके। इसके अतिरिक्त, यदि सुखी जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं है तो प्रत्येक सुखी जीवन पूर्ण है। और वही जीवन केवल सुखी ही नहीं बल्कि जितना संभव है उतना अधिक सुखी भी है। निश्चय ही तुम यह स्वीकार करोगे कि सुखी जीवन ही परम शुभ है। यदि उसमें परम शुभ विद्यमान है तो वह परम सुखी भी होना चाहिए। परम शुभ में किसी प्रकार की वृद्धि संभव नहीं है क्योंकि परम से आगे और क्या हो सकता है? ठीक यही बात सुखी जीवन पर भी लागू होती है क्योंकि सुखी जीवन का अर्थ ही परम शुभ की प्राप्ति है। फिर यदि तुम यह मानते हो कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे से अधिक सुखी हो सकता है तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि कोई उससे भी अधिक सुखी हो सकता है। इस प्रकार तुम परम शुभ के अनगिनत स्तर बना दोगे। किन्तु मेरी समझ में परम शुभ वही है, जिसके आगे श्रेष्ठता की कोई और अवस्था संभव नहीं होती।

    यदि एक सुखी व्यक्ति दूसरे सुखी व्यक्ति की अपेक्षा कम सुखी है तो इसका अर्थ यह होगा कि वह अपने जीवन की अपेक्षा उस अधिक सुखी व्यक्ति के जीवन की अधिक इच्छा करेगा। किन्तु वास्तव में सुखी व्यक्ति अपने जीवन को किसी भी दूसरे जीवन से अधिक प्रिय मानता है। इन दोनों बातों में से कोई भी स्वीकार नहीं की जा सकती न यह कि कोई ऐसी अवस्था है जिसे सुखी व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन से अधिक वांछनीय समझे और न यह कि वह अपने पास जो है, उससे बेहतर वस्तु को भी प्राप्त करना न चाहे। निस्संदेह, मनुष्य जितना अधिक बुद्धिमान होता है, उतना ही वह सर्वोत्तम वस्तु की ओर अग्रसर होता है और उसे हर संभव उपाय से प्राप्त करना चाहता है। फिर यदि कोई ऐसी वस्तु या अवस्था अभी भी शेष है, जिसकी इच्छा वह कर सकता है और वास्तव में करनी भी चाहिए तो उसे सुखी कैसे कहा जा सकता है?

    मैं तुम्हें बताता हूँ कि इस भ्रम का कारण क्या है। वे यह नहीं समझते कि सुखी जीवन वास्तव में एक ही प्रकार का जीवन होता है। उसकी श्रेष्ठता का आधार उसकी मात्रा नहीं बल्कि उसका गुण है। इसलिए वह चाहे लंबा हो या छोटा, व्यापक हो या सीमित, अनेक स्थानों और परिस्थितियों में व्यतीत हुआ हो या एक ही स्थान पर केंद्रित रहा हो, उसकी उत्कृष्टता समान रहती है। जो व्यक्ति सुखी जीवन का मूल्य उसकी अवधि, उसके विस्तार या उसकी परिस्थितियों के आधार पर आँकता है, वह उसके सबसे बड़े गुण को ही उससे छीन लेता है। सुखी जीवन का सबसे बड़ा गुण क्या है? उसकी पूर्णता। मेरा विचार है कि खाने और पीने का उद्देश्य तृप्ति है। कोई अधिक खाता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों तृप्त हो चुके हैं तो दोनों ने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार कोई अधिक पीता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों की प्यास बुझ चुकी है तो दोनों समान रूप से संतुष्ट हैं। ठीक इसी तरह, कोई अधिक वर्षों तक जीवित रहता है और कोई कम वर्षों तक। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि अधिक वर्षों ने और कम वर्षों ने, दोनों को समान रूप से सुखी बना दिया हो। जिसे तुम 'कम सुखी' कहते हो, वह वास्तव में सुखी है ही नहीं क्योंकि 'सुखी' ऐसा गुण नहीं है, जिसे कम या अधिक की श्रेणियों में बाँटा जा सके। या तो मनुष्य सुखी होता है या नहीं होता। 'कम सुखी' जैसी कोई अवस्था नहीं होती।

जो व्यक्ति साहसी है, वह निर्भय होता है।

जो निर्भय है, वह शोक से मुक्त होता है।

जो शोक से मुक्त है, वही सुखी होता है।

यह तर्क हमारी (स्टोइक) परंपरा का है।

जो लोग इसका खंडन करने का प्रयास करते हैं, वे कहते हैं कि जिस आधार-वाक्य को हम स्वतःसिद्ध मान लेते हैं कि 'जो साहसी है, वह निर्भय है।' वह वास्तव में न तो निर्विवाद है और न ही सर्वमान्य। वे कहते हैं, “कैसे? क्या साहसी व्यक्ति सामने उपस्थित संकट से बिल्कुल भी नहीं डरेगा? तब तो तुम किसी साहसी मनुष्य की नहीं बल्कि ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे हो जो पागल है और वास्तविकता से कटा हुआ है। निस्संदेह, साहसी व्यक्ति भय का अनुभव करता है किंतु बहुत ही सीमित मात्रा में; वह भय से पूरी तरह परे नहीं होता। जो लोग ऐसा कहते हैं, वे अंततः फिर उसी पुराने मत पर पहुँच जाते हैं, जिसमें वे छोटे-छोटे दोषों को मानो सद्गुण समझने लगते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति कम बार और कम मात्रा में भयभीत होता है, वह दोष से रहित नहीं है। वह केवल अपेक्षाकृत कम गंभीर दोष से ग्रस्त है।

    “लेकिन मेरा तो यह मानना है कि सामने आने वाले संकटों से बिल्कुल न डरना पागलपन है।” तुम्हारी बात सही होती, यदि वे घटनाएँ वास्तव में हानिकारक होतीं। लेकिन यदि कोई यह जानता है कि वे वास्तव में बुराइयाँ नहीं हैं और यह मानता है कि केवल लज्जाजनक या अनैतिक आचरण ही वास्तविक बुराई है तो उसे बाहरी संकटों का सामना बिना किसी चिंता के करना चाहिए। उसे उन बातों से ऊपर उठ जाना चाहिए जिन्हें सामान्य लोग भयावह समझते हैं। अन्यथा, यदि हानि से न डरना ही मूर्खता और अविवेक का लक्षण है तो फिर जितना अधिक बुद्धिमान कोई व्यक्ति होगा, उतना ही अधिक भयभीत भी होगा।

    “तुम्हारी बात मानें, तो साहसी व्यक्ति स्वयं ही अपने को संकट में डाल देगा।” नहीं, ऐसा नहीं है। वह संकटों से भयभीत नहीं होगा परंतु उनसे यथासंभव बचेगा। उसके लिए सावधानी बरतना उचित है, किंतु भयभीत होना नहीं। 

    “तुम्हारा क्या अर्थ है? क्या वह मृत्यु, कारावास, अग्नि और भाग्य द्वारा फेंके जाने वाले अन्य सभी प्रहारों से नहीं डरेगा?” नहीं। क्योंकि वह जानता है कि ये वस्तुएँ वास्तव में बुरी नहीं हैं। वे केवल बुरी प्रतीत होती हैं। उसके लिए वे मानव जीवन के केवल काल्पनिक भय हैं। उससे कैद, कोड़े, बेड़ियाँ, भूख, रोग और चोट की यातनाओं या किसी भी अन्य कष्ट की बात करो। उसकी दृष्टि में ये सब केवल ज्वरग्रस्त मन के भ्रम हैं। इन्हें डरने के लिए कायरों के लिए छोड़ दो। या क्या तुम यह मानते हो कि ऐसी चीज़ें वास्तव में बुरी हो सकती हैं जबकि अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब हमें स्वयं अपनी इच्छा से उनका सामना करना पड़ता है? क्या तुम जानना चाहते हो कि वास्तव में बुराई क्या है? वास्तविक बुराई है, जिन वस्तुओं को हम बुराई समझते हैं, उनके सामने आत्मसमर्पण कर देना। अपनी स्वतंत्रता उन्हें सौंप देना। जबकि उसी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हमें हर प्रकार का कष्ट सहने को तैयार रहना चाहिए। यदि हम उन सभी चीज़ों से ऊपर नहीं उठते जो हमारी गर्दन पर जुआ रखना चाहती हैं, तो हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं।

    यदि वे जानते कि साहस वास्तव में क्या है तो वे यह प्रश्न ही न करते कि साहसी व्यक्ति के लिए क्या उचित है।साहस न तो उतावला दुस्साहस है, न रोमांच की खोज और न ही संकटों से प्रेम। बल्कि साहस वह ज्ञान है, जिसके द्वारा मनुष्य यह पहचान सकता है कि वास्तव में क्या बुरा है और क्या बुरा नहीं है। साहस अपनी सुरक्षा के प्रति अत्यंत सावधान रहता है, किंतु साथ ही वह उन कष्टों को भी सहने में पूर्णतः समर्थ होता है, जो केवल देखने में बुरे प्रतीत होते हैं जबकि वास्तव में बुरे नहीं होते। “कैसे?” यदि किसी साहसी व्यक्ति के गले पर छुरा रख दिया जाए, यदि उसके शरीर को थोड़ा-थोड़ा करके गहरे तक चीरा जाए, यदि वह अपनी आँतों को अपनी गोद में गिरते हुए देखे, यदि उसके कष्टों को बीच-बीच में रोककर फिर दोबारा आरम्भ किया जाए ताकि वे और भी अधिक पीड़ादायक बन जाएँ, और यदि अभी-अभी भरे हुए घाव फिर से फटकर ताज़ा रक्त बहाने लगें तो क्या वह नहीं डरेगा? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि उसे पीड़ा का अनुभव भी नहीं होगा?” निस्संदेह, उसे पीड़ा का अनुभव होगा। क्योंकि सद्गुण मनुष्य की स्वाभाविक संवेदनाओं को कभी समाप्त नहीं करता। किन्तु वह भयभीत नहीं होगा। वह अपराजित रहेगा और अपनी पीड़ा को अपने से ऊपर नहीं बल्कि अपने नीचे समझकर उसका सामना करेगा। तुम पूछते हो, उस समय उसके मन की अवस्था कैसी होगी? वह वैसी ही होगी जैसी किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो बीमारी के समय अपने मित्र का साहस बढ़ाता है।

जो कुछ बुरा होता है, वह किसी-न-किसी प्रकार की हानि पहुँचाता है।

जो किसी मनुष्य को हानि पहुँचाता है, वह उसे पहले से अधिक बुरा बना देता है।

किन्तु न पीड़ा और न ही दरिद्रता मनुष्य को नैतिक दृष्टि से बुरा बनाती है।

अतः न पीड़ा बुराई है और न ही दरिद्रता।

    कोई यह आपत्ति कर सकता है—

“तुम्हारा प्रस्तुत किया हुआ आधार-वाक्य ही असत्य है। यह आवश्यक नहीं कि जो भी किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाए, वह उसे नैतिक रूप से भी बुरा बना दे। जैसे तेज़ हवा और तूफ़ान नाविक को हानि पहुँचाते हैं, पर वे उसे कम कुशल नाविक नहीं बना देते।”

इस आपत्ति का उत्तर कुछ स्टोइक इस प्रकार देते हैं। तेज़ हवा और तूफ़ान वास्तव में नाविक को एक अर्थ में हानि पहुँचाते हैं क्योंकि वे उसे उस कार्य में सफल नहीं होने देते, जिसके लिए उसने यात्रा आरम्भ की थी अर्थात जहाज़ को उसके निर्धारित मार्ग पर बनाए रखना। वे उसकी कला या कौशल को नष्ट नहीं करते किंतु उसके कार्य-निष्पादन में बाधा अवश्य डालते हैं। 

    इस पर पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उत्तर देते हैं, “यदि तुम्हारा यही तर्क है, तो उसी तर्क के अनुसार ज्ञानी पुरुष भी दरिद्रता, पीड़ा और ऐसी अन्य परिस्थितियों से किसी न किसी अर्थ में बुरा हो जाएगा। क्योंकि ये भी उसकी गतिविधियों और कर्मों में बाधा उत्पन्न करती हैं, यद्यपि वे उसके सद्गुण को नष्ट नहीं करतीं।”

    यदि नाविक और ज्ञानी पुरुष की स्थिति में अंतर न होता तो यह आपत्ति उचित होती। लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। ज्ञानी पुरुष का जीवन-लक्ष्य केवल किसी विशेष कार्य को पूरा करना नहीं है बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उचित और सदाचारी आचरण करना है। इसके विपरीत, नाविक का उद्देश्य केवल जहाज़ को सुरक्षित बंदरगाह तक पहुँचा देना है। विभिन्न कलाएँ और कौशल अधीनस्थ होते हैं। उन्हें वही कार्य पूरा करना होता है जिसका उन्होंने वचन दिया है। लेकिन प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) सर्वोच्च शासक और मार्गदर्शक है। कलाएँ जीवन की सेवा करती हैं जबकि प्रज्ञा जीवन पर शासन करती है। 

    किन्तु मेरे विचार में इस आपत्ति का उत्तर एक भिन्न प्रकार से दिया जाना चाहिए। मेरे मत में, कोई भी तूफ़ान न तो नाविक की कला को कमतर बनाता है और न ही उस कला के अभ्यास को। नाविक ने तुमसे कभी यह वचन नहीं दिया कि वह हर स्थिति में अनुकूल परिणाम अवश्य प्राप्त करेगा। उसने केवल यह वचन दिया है कि वह अपनी पूरी क्षमता से उपयोगी बनने का प्रयास करेगा और जहाज़ चलाने की कला का पूरा ज्ञान रखेगा। जब भाग्य का कोई प्रचंड झोंका उसके मार्ग में बाधा डालता है, तब उसका कौशल और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जो नाविक यह कह सकता है, “हे नेप्च्यून! चाहे कुछ भी हो, यह जहाज़ कभी उलटकर नहीं डूबेगा। यदि डूबेगा भी तो सीधा खड़ा रहकर।” उसने अपनी कला की अपेक्षाओं को पूरा कर दिया है। तूफ़ान नाविक की दक्षता या उसके कर्म को बाधित नहीं करता। वह केवल उसके प्रयास के अंतिम परिणाम में बाधा डालता है।

    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या वह प्रचंड तूफ़ान नाविक को हानि नहीं पहुँचाता, जो उसे बंदरगाह तक पहुँचने से रोक देता है, उसके सारे प्रयासों को निष्फल कर देता है और या तो उसे फिर से खुले समुद्र में धकेल देता है या जहाज़ के मस्तूल को गिराकर उसकी यात्रा रोक देता है?” नाविक को हानि पहुँचती है लेकिन एक नाविक के रूप में नहीं। केवल समुद्री यात्री के रूप में। क्योंकि यदि उसका कौशल ही ऐसी परिस्थितियों से नष्ट हो जाए तो फिर वह नाविक कहलाने योग्य ही नहीं रहेगा। वास्तव में, ऐसी परिस्थितियाँ उसके कौशल में बाधा नहीं डालतीं; बल्कि उसी समय उसका कौशल सबसे अधिक प्रकट होता है। जैसा कि कहा जाता है, “अनुकूल मौसम में तो कोई भी नाविक बन सकता है।” जिन परिस्थितियों का तुम उल्लेख कर रहे हो, वे यात्रा के लिए हानिकारक हैं, नाविक के कौशल के लिए नहीं। नाविक की दो भूमिकाएँ होती हैं। एक भूमिका वह है जो उस जहाज़ पर सवार सभी लोगों के साथ समान रूप से साझा करता है, वह स्वयं भी एक यात्री है। दूसरी उसकी अपनी विशिष्ट भूमिका है, वह जहाज़ का नाविक है। तूफ़ान उसे उसकी यात्री वाली भूमिका में हानि पहुँचाता है, नाविक वाली भूमिका में नहीं। 

    इसके अतिरिक्त, नाविक का कौशल किसी दूसरे के हित के लिए होता है; वह उसके यात्रियों से संबंधित है, जैसे चिकित्सक का कौशल उसके रोगियों के हित के लिए होता है। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष की प्रज्ञा एक साझा कल्याण है। उसका लाभ उन लोगों को भी मिलता है जिनके साथ वह रहता है और स्वयं उसे भी। अतः यदि यह मान भी लिया जाए कि जब तूफ़ान उसके द्वारा दूसरों के लिए किए जाने वाले कार्य में बाधा डालता है, तब नाविक को किसी अर्थ में हानि पहुँचती है, तब भी ज्ञानी पुरुष को जीवन के तूफ़ानों जैसे, दरिद्रता, पीड़ा और अन्य विपत्तियों से कोई हानि नहीं पहुँचती। क्योंकि उसकी सभी गतिविधियाँ बाधित नहीं होतीं। केवल वे कार्य प्रभावित होते हैं जो दूसरों से संबंधित हैं। जहाँ तक उसका अपना प्रश्न है, वह हर परिस्थिति में अपने कर्मों में अडिग रहता है। जब भाग्य उसका विरोध करता है, तब वह और भी महान बनकर कार्य करता है। क्योंकि ठीक उसी समय वह प्रज्ञा के वास्तविक कार्य का निर्वाह करता है और जैसा कि हमने अभी कहा, प्रज्ञा उसका अपना भी कल्याण है और दूसरों का भी।

    इसके अतिरिक्त, यदि परिस्थितियाँ उसे किसी कार्य में बाँध भी दें, तब भी वह दूसरों की सहायता करने से वंचित नहीं होता। यदि दरिद्रता के कारण वह लोगों को यह नहीं सिखा सकता कि राज्य के कार्यों का संचालन कैसे किया जाना चाहिए, तो भी वह उन्हें यह अवश्य सिखा सकता है कि दरिद्रता का सामना कैसे किया जाना चाहिए। उसका कार्य उसके संपूर्ण जीवन में फैला हुआ है। इसलिए कोई भी आकस्मिक घटना ज्ञानी पुरुष की सक्रियता को समाप्त नहीं कर सकती। क्योंकि जो परिस्थिति उसे किसी एक कार्य से रोकती है, वही उसके लिए एक नए कार्य का विषय बन जाती है। वह हर प्रकार की परिस्थिति के लिए समान रूप से तैयार रहता है। समृद्धि पर वह शासन करता है और विपत्ति पर विजय प्राप्त करता है। मैं फिर कहता हूँ, उसका प्रयत्न यह होता है कि वह अपनी सद्गुणशीलता को समृद्धि और विपत्ति, दोनों ही परिस्थितियों में प्रकट करे। उसकी दृष्टि सदैव स्वयं सद्गुण पर रहती है, न कि उन बाहरी परिस्थितियों पर जिनमें सद्गुण का अभ्यास किया जाता है। इसी कारण दरिद्रता, पीड़ा या ऐसी कोई भी परिस्थिति, जिनसे अप्रशिक्षित और अविवेकी लोग घबराकर पीछे हट जाते हैं, ज्ञानी पुरुष को उसके मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। 

    क्या तुम समझते हो कि ज्ञानी पुरुष दुर्भाग्य के कारण विवश हो जाता है? नहीं, वह तो उसी का उपयोग कर लेता है। जैसे फिडियास केवल हाथीदाँत से ही मूर्तियाँ बनाना नहीं जानता था। वह काँसे से भी उत्कृष्ट मूर्तियाँ बना सकता था। यदि उसे संगमरमर या कोई और कम मूल्यवान सामग्री दी जाती तो भी वह उसी से अपनी सर्वोत्तम कला का प्रदर्शन करता। ठीक उसी प्रकार, यदि अवसर मिले तो ज्ञानी पुरुष धन-संपत्ति के बीच रहकर अपने सद्गुण का परिचय देगा और यदि ऐसा अवसर न मिले, तो दरिद्रता के बीच भी वही सद्गुण प्रकट करेगा। यदि संभव हो तो वह अपने देश में रहकर सद्गुण का पालन करेगा  और यदि नहीं तो निर्वासन में भी। यदि अवसर मिले तो सेनापति के रूप में; और यदि नहीं, तो एक साधारण सैनिक के रूप में। यदि स्वस्थ हो तो स्वास्थ्य में और यदि रोग या दुर्बलता आए तो उसी अवस्था में भी। भाग्य उसे जैसी भी परिस्थिति प्रदान करे, वह उससे कुछ ऐसा कर दिखाएगा जो स्मरणीय होगा। 

    कुछ ऐसे दक्ष पशु-प्रशिक्षक होते हैं जो सबसे अधिक हिंसक और भयावह पशुओं को न केवल उनकी उग्रता छोड़ने और मनुष्यों का स्पर्श सहने का अभ्यास करा देते हैं बल्कि उन्हें इतना विनीत भी बना देते हैं कि वे मनुष्य के साथी जैसे हो जाते हैं। सिंह का प्रशिक्षक अपना हाथ उसके खुले जबड़ों के बीच डाल देता है। बाघ का प्रशिक्षक उसे चूमता है और छोटा-सा इथियोपियाई महावत विशाल हाथी को घुटने टेकने और रस्सी पर चलने तक का अभ्यास करा देता है। ज्ञानी पुरुष भी ऐसा ही होता है। वह विपत्तियों का कुशल प्रशिक्षक होता है। पीड़ा, अभाव, अपमान, कारावास और निर्वासन, जिनसे सामान्य लोग भयभीत रहते हैं, जब उसके पास आते हैं तो वे उसके सामने मानो वश में किए हुए पशुओं की तरह शांत हो जाते हैं।


अभी के लिए विदा 

मानवीय जीवन के बारे में -- पत्र - 82

 प्रिय लूसीलियस 


वे यात्राएँ मेरी आलस्य-प्रवृत्ति को झकझोरकर दूर कर रही हैं। मेरा विश्वास है कि वे मेरे स्वास्थ्य और मेरे अध्ययन, दोनों के लिए लाभदायक रही हैं। मेरे स्वास्थ्य के लिए वे क्यों उपयोगी हैं। यह तुम्हें स्पष्ट ही है क्योंकि साहित्य के प्रति मेरा प्रेम मुझे आलसी बना देता है और मैं अपने शरीर की उपेक्षा करने लगता हूँ। इसलिए दूसरों के श्रम के सहारे मुझे भी कुछ शारीरिक व्यायाम मिल जाता है। अब यह बताता हूँ कि वे मेरे अध्ययन के लिए कैसे सहायक हैं। मैंने नियमित पठन से कुछ समय के लिए विराम लिया है। निस्संदेह, पढ़ना आवश्यक है। पहला ताकि मैं केवल अपने ही विचारों में सीमित न रह जाऊँ और दूसरा ताकि दूसरों के अनुसंधानों को जानने के बाद मैं उनके निष्कर्षों का मूल्यांकन कर सकूँ और यह विचार कर सकूँ कि अभी क्या-क्या खोजा जाना शेष है। पठन मनुष्य की प्रतिभा का पोषण करता है और अध्ययन से थक जाने पर उसे फिर से ताज़गी प्रदान करता है। यद्यपि पढ़ना स्वयं भी अध्ययन की ही माँग करता है। हमें न तो केवल लिखना चाहिए और न ही केवल पढ़ना चाहिए। पहला, अर्थात केवल लेखन हमारी शक्ति को क्षीण और थका देगा। दूसरा, अर्थात केवल पठन, उसे निर्बल और शिथिल बना देगा। दोनों का बारी-बारी से अभ्यास करना चाहिए। एक को दूसरे के साथ संतुलित रखते हुए ताकि पढ़ने से जो कुछ प्राप्त हो, वह लिखने के माध्यम से हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाए।

By Stephanie Weaver

    जैसा कि कहा जाता है, हमें मधुमक्खियों के समान होना चाहिए। वे पहले इधर-उधर उड़कर उन फूलों का चयन करती हैं जो मधु बनाने के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं। फिर जो कुछ वे एकत्र करती हैं, उसे पूरे छत्ते में बाँट देती हैं। जैसा कि हमारे कवि वर्जिल ने कहा है—

“वे मधुर रस से फूली हुई कोशिकाओं को भर देती हैं,
और उनमें निर्मल, चमकता हुआ मधु प्रवाहित होने लगता है।”

    मधुमक्खियों के विषय में मतभेद है। क्या वे केवल फूलों से रस निकालती हैं, जो तुरंत ही मधु बन जाता है या फिर वे अपने भीतर की किसी विशिष्ट शक्ति के मिश्रण से उस एकत्र किए हुए रस को मधु में परिवर्तित करती हैं? कुछ लोगों का मत है कि उनकी कुशलता मधु बनाने में नहीं बल्कि केवल उसे एकत्र करने में है। वे कहते हैं कि भारत के एक प्रदेश में एक विशेष प्रकार के सरकंडे की पत्तियों पर ऐसा मधु पाया जाता है, जो या तो वहाँ के वातावरण की ओस से बनता है, या स्वयं उस सरकंडे के अत्यंत गाढ़े और मीठे रस से उत्पन्न होता है। उनका विचार है कि ऐसी ही क्षमता हमारे यहाँ के पौधों में भी होती है, यद्यपि वह उतनी स्पष्ट नहीं होती। उस प्राकृतिक मधुर रस को वही जीव खोजकर एकत्र करता है, जो इसी कार्य के लिए प्रकृति द्वारा उत्पन्न किया गया है। दूसरे लोगों का मानना है कि मधुमक्खियाँ फूलों और कोमल घासों से जो रस एकत्र करती हैं, वह छत्ते में सुरक्षित रखे जाने पर अपना स्वरूप बदल लेता है। यदि मैं ऐसा कहूँ तो एक प्रकार की किण्वन (फर्मेंटेशन) की प्रक्रिया के द्वारा उसमें परिवर्तन होता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रस और स्वाद आपस में मिलकर एक ही स्वाद और एक ही मधु का रूप धारण कर लेते हैं।

    लेकिन मैं अपने मूल विषय से भटक रहा हूँ। हमें भी इन मधुमक्खियों का अनुकरण करना चाहिए। अपने विविध पठन से जो कुछ हमने एकत्र किया है, उसे पहले अलग-अलग रखना चाहिए क्योंकि वस्तुएँ अलग रहने पर अधिक अच्छी तरह सुरक्षित रहती हैं। फिर अपनी प्रतिभा की सावधानी और क्षमता का उपयोग करते हुए उन विभिन्न अंशों को इस प्रकार एक ही स्वाद में मिला देना चाहिए कि भले ही यह पहचाना जा सके कि कोई विचार कहाँ से लिया गया है, फिर भी वह अपने मूल रूप से भिन्न और नया प्रतीत हो। हमारे शरीर में भी प्रकृति बिना किसी सचेत प्रयास के यही कार्य करती है। जो भोजन हम ग्रहण करते हैं, वह तब तक शरीर पर बोझ बना रहता है, जब तक वह अपने मूल स्वरूप में पेट में ठोस पदार्थ के रूप में बना रहता है। लेकिन जब उसका रूपांतरण हो जाता है, तभी वह हमारी शक्ति का भाग बनता है और रक्त में मिल जाता है। प्रतिभा का पोषण करने वाली बातों के साथ भी हमें यही करना चाहिए। जिन विचारों को हमने ग्रहण किया है, उन्हें वैसा का वैसा बने रहने नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेना चाहिए। उन्हें आत्मसात करना चाहिए। अन्यथा वे केवल स्मृति में रह जाएँगे, प्रतिभा का हिस्सा नहीं बनेंगे। हमें अपने विचारों को पूर्ववर्ती विचारकों के विचारों के साथ ईमानदारी से सामंजस्य में लाकर उन्हें अपना बना लेना चाहिए ताकि अनेक स्रोतों से अंततः एक समन्वित एकता उत्पन्न हो सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे अंकगणित के किसी एक प्रश्न में कई छोटे-छोटे योग सम्मिलित होते हैं। अनेक अलग-अलग संख्याएँ मिलकर अंततः एक ही कुल योग बन जाती हैं। हमारे मन को भी यही करना चाहिए जो कुछ उसके निर्माण में सहायक रहा है, उसे भीतर छिपाए रखे और केवल उसका परिपक्व परिणाम ही सामने लाए। यदि तुम्हारे लेखन या विचारों में किसी ऐसे महान लेखक की झलक दिखाई दे, जिसने तुम पर गहरा प्रभाव डाला है तो मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी समानता उससे वैसी हो जैसी पुत्र की अपने पिता से होती है, न कि किसी मूर्ति की अपने आदर्श से। क्योंकि मूर्ति तो एक निर्जीव वस्तु होती है।

    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या पाठक यह नहीं पहचानेंगे कि तुम किसकी शैली, किसके तर्क-वितर्क और किसकी सुंदर अभिव्यक्तियों का अनुकरण कर रहे हो?” मेरा विचार है कि आवश्यक नहीं कि वे ऐसा पहचान ही लें। यदि कोई अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने चुने हुए आदर्श से ग्रहण किए गए सभी तत्वों पर अपनी मौलिक प्रतिभा की ऐसी छाप अंकित कर दे कि वे सब मिलकर एक सुसंगत और एकीकृत रूप धारण कर लें तो वे उसके अपने ही सृजन के रूप में दिखाई देंगे।

    क्या तुम नहीं देखते कि एक गायक-वृंद (कोरस) में कितनी अलग-अलग आवाज़ें मिलकर गाती हैं? फिर भी उनसे जो ध्वनि उत्पन्न होती है, उसमें एकता होती है। किसी की आवाज़ ऊँची होती है, किसी की नीची और किसी की मध्यम। स्त्रियाँ भी पुरुषों के साथ गाती हैं। बाँसुरियाँ उनका साथ देती हैं। फिर भी अलग-अलग गायकों की आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं; केवल उन सबकी संयुक्त ध्वनि ही सुनाई देती है। मैं जिस कोरस की बात कर रहा हूँ, वह प्राचीन दार्शनिकों के समय का कोरस है। आजकल के रंगमंचीय प्रदर्शनों में तो गाने वालों की संख्या कभी-कभी उतनी होती है, जितने पहले दर्शक हुआ करते थे। जब गायकों की पंक्तियाँ गलियारों तक भर जाती हैं, बैठने के स्थानों के चारों ओर तुरही-वादक खड़े रहते हैं और मंच से हर प्रकार की बाँसुरी तथा जल-वाद्य (हाइड्रॉलिक ऑर्गन) एक साथ बजते हैं, तब उन सबकी भिन्न-भिन्न ध्वनियों से एक ही सामंजस्यपूर्ण स्वर उत्पन्न होता है। मैं चाहता हूँ कि हमारा मन भी ऐसा ही हो। उसमें अनेक विद्याएँ हों, अनेक शिक्षाएँ हों, अनेक युगों के उदाहरण हों परंतु वे सब मिलकर एक ही सुसंगत सामंजस्य में बँध जाएँ। 

    “यह कैसे होगा?” तुम पूछते हो। लगातार एकाग्र अभ्यास से। यदि हम केवल विवेक (तर्कसंगत बुद्धि) की प्रेरणा से ही कार्य करें और केवल उसी की प्रेरणा से किसी बात से बचें तो यह संभव है। यदि तुम विवेक की बात सुनो, तो वह तुमसे कहेगा—

“उन वस्तुओं का त्याग कर दो जिनके पीछे सारी दुनिया भागती रहती है। धन का त्याग करो जिनके पास वह होता है, उनके लिए वह या तो संकट बन जाता है या बोझ। शारीरिक सुखों का त्याग करो और मानसिक विलासों का भी क्योंकि वे मनुष्य को कोमल, निर्बल और आलसी बना देते हैं। महत्त्वाकांक्षा का भी त्याग करो। वह घमंड से भरी हुई, खोखली और फूली हुई वस्तु है। उसका कोई अंत नहीं होता। उसे केवल इतना ही दिखाई देता है कि वह दूसरों से आगे निकल जाए और किसी को अपने बराबर न आने दे। वह ईर्ष्या से ग्रस्त रहती है और वह भी दोनों ओर से। वह स्वयं दूसरों से ईर्ष्या करती है और दूसरे उससे ईर्ष्या करते हैं। तुम देख ही रहे हो कि ईर्ष्या का पात्र होना और ईर्ष्या करना, दोनों ही मनुष्य को कितना दुःखी बना देते हैं। अपने सामने उन शक्तिशाली लोगों के घरों को देखो, जिनके द्वार शुभचिंतकों की भीड़ से भरे रहते हैं; सब एक-दूसरे को धक्का देकर भीतर जाने की कोशिश करते हैं। वहाँ प्रवेश पाने के लिए तुम्हें कितने अपमान सहने पड़ते हैं और भीतर पहुँच जाने के बाद उससे भी अधिक। इसलिए उन धनवानों की सीढ़ियों और उन विशाल प्रांगणों को छोड़ दो, जो हमारे सिरों के ऊपर तक ऊँचे उठे हुए हैं। वहाँ खड़े होना केवल किसी ऊँचे स्थान पर खड़े होना नहीं है बल्कि एक फिसलन भरे किनारे पर खड़े होने जैसा है। इसके बजाय अपने कदम प्रज्ञा की ओर मोड़ो। उस उदार संपदा की खोज करो जो प्रज्ञा प्रदान करती है— गहरी शांति और साथ ही सच्ची समृद्धि।”

    मानवीय जीवन में जो वस्तुएँ सबसे महान और ऊँची दिखाई देती हैं, वे वास्तव में बहुत तुच्छ होती हैं। वे केवल इसलिए ऊँची प्रतीत होती हैं क्योंकि उनकी तुलना उससे भी अधिक निम्न वस्तुओं से की जाती है। फिर भी उन तक पहुँचने का मार्ग अत्यंत खड़ा और कठिन होता है। प्रतिष्ठा के शिखर तक जाने वाली राह ऊबड़-खाबड़ और श्रमसाध्य है। किन्तु यदि तुम उस पर्वत पर चढ़ने का निश्चय करो जो भाग्य (सौभाग्य और बाहरी परिस्थितियों) की सभी वस्तुओं से ऊपर उठता है तो वहाँ पहुँचकर तुम उन सब चीज़ों को, जिन्हें अधिकांश लोग जीवन की सबसे बड़ी ऊँचाइयाँ समझते हैं, अपने पैरों के नीचे फैला हुआ देखोगे। आश्चर्य की बात यह है कि इस सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने का मार्ग कठिन और दुर्गम नहीं बल्कि समतल और सरल भूमि से होकर जाता है।


अभी के लिए विराम 

Thursday, 23 July 2026

मद्यपान के बारे में -- पत्र - 81

 प्रिय लूसीलियस 


तुम मुझसे कहते हो कि मैं अपने प्रत्येक दिन का आरंभ से अंत तक का पूरा विवरण तुम्हें दूँ। निश्चय ही तुम मेरे बारे में बहुत अच्छा सोचते हो, यदि तुम्हें यह विश्वास है कि मेरे जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं तुमसे छिपाना चाहूँ। वास्तव में हमारा जीवन ऐसा ही होना चाहिए, मानो हम सदैव दूसरों की दृष्टि के सामने जी रहे हों। यहाँ तक कि हमारे विचार भी ऐसे होने चाहिएँ, जैसे कोई हमारे हृदय के सबसे गुप्त कोनों में झाँक सकता हो। वास्तव में ऐसा एक है, जो ऐसा कर सकता है। मनुष्यों से कोई बात छिपाने का क्या लाभ? ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है। ईश्वर हमारे मन में निवास करते हैं। वे हमारे प्रत्येक विचार के मध्य उपस्थित रहते हैं। मैं कहता हूँ कि वे प्रवेश करते हैं, मानो वे कभी वहाँ से गए ही हों!


By Marilyn Dunlap

    इसलिए मैं तुम्हारी सलाह का पालन करूँगा और प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें लिखूँगा कि मैं क्या-क्या करता हूँ। वह भी क्रमबद्ध ढंग से। मैं तुरंत स्वयं का निरीक्षण करूँगा और अपने पूरे दिन का परीक्षण करूँगा। यह वास्तव में अत्यंत उपयोगी अभ्यास है। हमारे पतन का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम अपने जीवन पर पीछे मुड़कर कभी दृष्टि नहीं डालते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या करना है (हालाँकि उतना भी नहीं जितना करना चाहिए) परन्तु यह कभी नहीं सोचते कि हमने अब तक क्या किया है। जबकि भविष्य की योजनाएँ तो अतीत के अनुभवों और आत्मचिंतन पर ही आधारित होती हैं।

    आज का पूरा दिन एक ठोस और अविभाजित समय-खंड की तरह बीता। किसी ने मेरा समय मुझसे नहीं छीना। पूरा दिन केवल विश्राम और अध्ययन में बँटा रहा। उसका केवल थोड़ा-सा भाग शारीरिक व्यायाम में लगाया। इसके लिए मैं अपनी वृद्धावस्था का आभारी हूँ क्योंकि अब मुझे बहुत कम परिश्रम करना पड़ता है। जैसे ही मैं शरीर को थोड़ा-सा चलाता हूँ, थक जाता हूँ। पर यही तो व्यायाम का उद्देश्य है, यहाँ तक कि सबसे बलवान व्यक्ति के लिए भी। क्या तुम मेरी दिनचर्या के बारे में जानना चाहोगे? मेरे लिए एक ही प्रशिक्षक पर्याप्त है। उसका नाम फैरीयस है। जैसा कि तुम जानते हो, वह अभी एक छोटा-सा बालक है और अत्यंत प्रिय भी। लेकिन अब मुझे उसे बदलना पड़ेगा। मैं उससे भी छोटे किसी लड़के की तलाश में हूँ। वह मज़ाक में कहता है कि हम दोनों जीवन के एक ही पड़ाव पर हैं। हम दोनों के दाँत गिर रहे हैं! किंतु अब तो दौड़ते समय मैं मुश्किल से उसका साथ दे पाता हूँ और कुछ ही दिनों में बिल्कुल भी नहीं दे सकूँगा। देखो, प्रतिदिन का व्यायाम मेरे साथ क्या कर रहा है! जब दो व्यक्ति विपरीत दिशाओं में चल रहे हों तो उनके बीच की दूरी बहुत तेजी से बढ़ जाती है। वह ऊपर चढ़ रहा है जबकि मैं नीचे उतर रहा हूँ। तुम भली-भाँति जानते हो कि नीचे उतरना कहीं अधिक तेज़ी से होता है। नहीं, मैंने ठीक नहीं कहा। हमारी आयु का यह चरण केवल ढलान नहीं है बल्कि मानो मुक्त पतन (Free Fall) है। 

    लेकिन क्या तुम जानना चाहोगे कि आज हमारी दौड़ का परिणाम क्या रहा? ऐसा हुआ जो दौड़ में बहुत कम होता है। हम दोनों बराबरी पर रहे। इस थोड़ी-सी दौड़-भाग के बाद (जिसे वास्तव में व्यायाम कहना भी कठिन है) मैं ठंडे पानी से स्नान करने गया। हालाँकि यहाँ 'ठंडा' शब्द से मेरा अर्थ उस पानी से है जो बस थोड़ा-सा गुनगुना हो। एक समय था जब मैं सचमुच ठंडे पानी से स्नान करने का बड़ा शौकीन था! वर्ष के पहले दिन अर्थात पहली जनवरी को मैं नहर (Canal) पर जाकर मानो उसे अपना प्रणाम अर्पित करता था। जिस प्रकार उस दिन कुछ पढ़ना, लिखना या कोई सार्थक बात कहना मेरी परंपरा थी उसी प्रकार मेडेन (जलस्रोत) में डुबकी लगाकर नए वर्ष का स्वागत करना भी मेरा एक नियमित अनुष्ठान था। लेकिन बाद में मैंने अपना 'पड़ाव' बदल लिया। पहले टाइबर नदी पर और अब इस स्नान-टब तक। यहाँ भी, जब मैं अपने को सबसे अधिक साहसी महसूस करता हूँ और स्वास्थ्य के सभी संकेत अनुकूल होते हैं, तब भी पानी केवल सूर्य की गर्मी से ही थोड़ा-सा गरम किया जाता है। अब तो मुझसे सचमुच ठंडे पानी से स्नान भी मुश्किल से हो पाता है। 

    इसके बाद मैं सूखी रोटी खाता हूँ। ऐसा भोजन जिसके लिए मेज़ की भी आवश्यकता नहीं पड़ती और जिसके बाद हाथ धोने की भी जरूरत नहीं होती। मैं बहुत कम सोता हूँ। तुम मेरी आदतों से परिचित हो। मैं केवल एक बहुत ही छोटी-सी झपकी लेता हूँ, मानो किसी खच्चरों के जत्थे की राह में मिलने वाले क्षणिक विश्राम की तरह। मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है कि कुछ क्षणों के लिए आँख लग जाए। कभी मुझे निश्चित रूप से पता होता है कि मैं सो गया था और कभी केवल अनुमान ही लगाता हूँ कि शायद थोड़ी देर के लिए नींद आ गई थी।

    सुनो, तुम रथ-दौड़ (रेस) देखने के लिए एकत्र हुई भीड़ का शोर सुन सकते हो। अचानक उठने वाली सामूहिक पुकार हर ओर से मेरे कानों पर आघात करती है, फिर भी मेरे विचार बिना किसी व्यवधान के अपनी गति से चलते रहते हैं। उनका क्रम तनिक भी नहीं टूटता। उस भीड़ का कोलाहल मुझे बिल्कुल विचलित नहीं करता। अनेक लोगों की मिली-जुली आवाज़ें मेरे लिए समुद्र के तट पर उठती लहरों की गूँज, पेड़ों के बीच बहती हवा की सरसराहट या किसी अन्य ऐसे स्वर के समान हैं, जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं होता।

    क्या... फिर, मेरे मन को किस बात ने व्यस्त रखा है? मैं तुम्हें बताता हूँ। कल के चिंतन ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया कि कुछ अत्यंत बुद्धिमान लोगों ने महत्वपूर्ण बातों को सिद्ध करने के लिए इतने तुच्छ और उलझाऊ तर्कों का सहारा क्यों लिया। यदि उनकी बातें सत्य भी हों तो भी उनके तर्क सत्य से अधिक असत्य जैसे प्रतीत होते हैं। ज़ेनो, जो महानतम व्यक्तियों में से एक थे और हमारे अत्यंत साहसी तथा अत्यंत संयमी स्टोइक दर्शन के संस्थापक थे, हमें मद्यपान से दूर रहने की शिक्षा देना चाहते हैं। सुनो, वे यह सिद्ध करने का प्रयास कैसे करते हैं कि एक सद्गुणी व्यक्ति मद्यपान नहीं करेगा—

जो व्यक्ति नशे में होता है, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता।
परंतु एक सद्गुणी व्यक्ति को लोग अपना रहस्य सौंपते हैं।
अतः सद्गुणी व्यक्ति नशे में नहीं होगा।

इस प्रकार के तर्क का मज़ाक उड़ाते हुए कोई ठीक इसी शैली में इसका उलटा निष्कर्ष भी सिद्ध कर सकता है। उदाहरण के लिए—

जो व्यक्ति सो रहा हो, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता।
परंतु एक सद्गुणी व्यक्ति को लोग अपना रहस्य सौंपते हैं।
अतः सद्गुणी व्यक्ति सोता ही नहीं।

पोसिडोनियस हमारे गुरु ज़ेनो के पक्ष का जितना संभव हो सकता है, उतना बचाव करते हैं। यद्यपि तब भी मुझे उनका पक्ष टिकाऊ नहीं लगता। उनका कहना है कि 'मदहोश' (drunk) शब्द के दो अर्थ हैं। पहला, वह व्यक्ति जो शराब से इतना भर गया हो कि अपने ऊपर उसका नियंत्रण न रहे। दूसरा, वह व्यक्ति जिसे बार-बार नशे में धुत होने की आदत हो और जो इस दोष का अभ्यस्त हो। उनके अनुसार ज़ेनो का आशय दूसरे अर्थ से है। उस व्यक्ति से जिसे नशे की आदत है, न कि उस व्यक्ति से जो इस समय नशे में है। यही वह व्यक्ति है जिसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपेगा क्योंकि वह शराब पीते समय उसे उगल सकता है। 

    लेकिन यह बात असत्य है। पहला तर्क उस व्यक्ति की बात करता है जो इस समय नशे में है, न कि उस व्यक्ति की जो भविष्य में कभी नशे में होगा। आप स्वयं मानेंगे कि नशे में होने वाले व्यक्ति और शराबी में बहुत बड़ा अंतर है। कोई व्यक्ति पहली ही बार शराब पीकर नशे में हो सकता है, बिना यह आदत विकसित किए। दूसरी ओर, जिसे शराब पीने की आदत है, वह भी कभी-कभी पूरी तरह होश में हो सकता है। इसलिए मैं इस शब्द का वही सामान्य अर्थ ग्रहण करता हूँ जिसमें इसका प्रचलित प्रयोग होता है, विशेषकर इसलिए कि इसका प्रयोग ऐसा व्यक्ति कर रहा है जो शब्दों के प्रयोग में अत्यंत शुद्धता का दावा करता है और उनके अर्थों की सूक्ष्म जाँच करता है। इसके अतिरिक्त, यदि ज़ेनो स्वयं इस शब्द को एक अर्थ में समझते थे, लेकिन चाहते थे कि हम उसे दूसरे अर्थ में लें तो उन्होंने एक शब्द की द्विअर्थता को छल का साधन बनाया। सत्य की खोज करने वाले को ऐसा नहीं करना चाहिए। लेकिन मान लीजिए कि उनका अभिप्राय वास्तव में यही था। तब भी यह निष्कर्ष असत्य है कि जिस व्यक्ति को शराब पीने की आदत हो, उसे कोई अपना रहस्य नहीं सौंपता। सोचिए, कितने सैनिकों को ऐसी गोपनीय बातें सौंपी जाती हैं जिन्हें उनके सेनापति, ट्रिब्यून और सेंचुरियन गुप्त रखना चाहते हैं। फिर भी सैनिक संयम और मद्यत्याग के आदर्श नहीं माने जाते। सीज़र की हत्या की योजना (मेरा आशय उस सीज़र से है जो पोम्पेई की पराजय के बाद सत्ता में आया था) टिलियस किम्बर और कैसियस, दोनों को बताई गई थी। कैसियस ने जीवन भर केवल पानी पिया जबकि टिलियस किम्बर शराब का ऐसा दीवाना था कि वह अक्सर नशे में डूबा रहता था और उपद्रवी भी था। वह स्वयं इस विषय पर मज़ाक किया करता था। उसने कहा था, "मैं लोगों के प्रति सहनशील कैसे हो सकता हूँ, जब मैं शराब तक के प्रति सहनशील नहीं हूँ?"

    हममें से प्रत्येक ऐसे लोगों के नाम बता सकता है जिन पर शराब के मामले में भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन जिन पर कोई अपना रहस्य निस्संकोच सौंप सकता है। मैं केवल एक उदाहरण सुनाऊँगा, जो इस समय मुझे याद आ रहा है ताकि वह भुलाया न जाए। जीवन में ऐसे उदाहरणों का पर्याप्त संग्रह होना चाहिए ताकि हमें हर बार केवल पुराने उदाहरणों पर ही निर्भर न रहना पड़े। शहर की प्रहरी-सेना (सिटी वॉच) के प्रमुख लूसियस पिसो एक बार इतने नशे में धुत हुए कि उसके बाद यह उनकी लगभग स्थायी अवस्था बन गई। वे अधिकांश रातें दावतों और मद्यपान में बिताते थे, फिर दोपहर तक सोते रहते। उनके लिए तो दोपहर ही दिन का आरंभ थी। फिर भी, वे अपने उन कर्तव्यों का अत्यंत सावधानी से पालन करते थे जिन पर रोम की सुरक्षा निर्भर करती थी। 

    दैवी ऑगस्टस ने जब उन्हें थ्रेस के अभियान का नेतृत्व सौंपा जिसे उन्होंने जीत लिया, तब अपनी गोपनीय योजनाएँ भी उन्हीं के विश्वास पर सौंपीं। बाद में टाइबेरियस ने भी, जब वह कैम्पानिया के लिए रवाना हो रहा था और रोम में अपने पीछे बहुत-सी नाराज़गियाँ तथा संदेह के अनेक कारण छोड़ रहा था, अपनी गुप्त बातें पिसो के भरोसे छोड़ दीं। मेरा विश्वास है कि पिसो की मद्यप्रियता के बावजूद उसके इतने अच्छे परिणाम देखने के कारण ही टाइबेरियस ने बाद में कोसस को नगर-प्रमुख (अर्बन प्रीफेक्ट) नियुक्त किया। कोसस एक गंभीर और अनुशासित व्यक्ति था लेकिन शराब में इतना डूबा रहता था कि एक बार वह सीधे किसी दावत से सीनेट पहुँचा और वहीं सो गया। उसे जगाया नहीं जा सका इसलिए अंततः उसे उठाकर बाहर ले जाना पड़ा। फिर भी, टाइबेरियस ऐसे मामलों में, जिन्हें वह अपने सबसे निकट के सलाहकारों तक पर प्रकट करने का साहस नहीं करता था, स्वयं अपने हाथ से कोसस को पत्र लिखता था। और कोसस ने कभी भी किसी सार्वजनिक या निजी रहस्य को उजागर नहीं किया।

    तो आइए, इन पुराने घिसे-पिटे तर्कों को छोड़ दें। "शराब से बाधित मन अपने नियंत्रण में नहीं रहता। जैसे कच्ची मिट्टी के घड़े, जब उनमें नया अंगूरी रस (मस्ट) भरा होता है, फरमेंटेशन की प्रक्रिया की गर्मी के कारण फटने लगते हैं और उनके भीतर की सारी सामग्री बाहर निकल पड़ती है। उसी प्रकार जब अत्यधिक मात्रा में शराब भीतर प्रवाहित होकर नशा उत्पन्न करती है तो मन में जो कुछ भी छिपा होता है, वह सब खुले रूप में बाहर आ जाता है। जैसे अत्यधिक शराब पी लेने वाले लोग अपना भोजन पेट में नहीं रोक पाते क्योंकि शराब उसे ऊपर उगलवा देती है, वैसे ही वे किसी रहस्य को भी अपने भीतर नहीं रख पाते। वे अपने और दूसरों, दोनों के रहस्य उगल देते हैं।" हाँ, ऐसा अक्सर होता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आवश्यकता पड़ने पर हम ऐसे लोगों से भी सलाह-मशविरा करते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे खुलकर शराब पीते हैं। यही तथ्य ज़ेनो के बचाव में दिए जाने वाले उस घिसे-पिटे तर्क का खंडन कर देता है कि कोई भी व्यक्ति शराब पीने का अभ्यस्त व्यक्ति को अपना रहस्य नहीं सौंपता।

    इससे कहीं बेहतर है कि मद्यपान की बुराई पर सीधे आक्रमण किया जाए और उसके दोषों को उजागर किया जाए। एक साधारण सज्जन व्यक्ति भी इन दोषों से बचने का प्रयास करेगा। पूर्णतः बुद्धिमान व्यक्ति तो और भी अधिक। बुद्धिमान व्यक्ति की प्यास बुझ जाने पर वह संतुष्ट हो जाता है। यदि कभी दूसरों की प्रसन्नता के लिए वह कुछ अधिक पी भी ले, तो भी वह नशे की अवस्था तक नहीं पहुँचता। यह प्रश्न कि क्या अत्यधिक शराब पी लेने पर बुद्धिमान व्यक्ति का मन प्रभावित होता है और क्या वह तब वैसा ही व्यवहार करता है जैसा सामान्यतः नशे में लोग करते हैं, इस पर हम किसी और समय विचार कर सकते हैं। फिलहाल, यदि तुम यह सिद्ध करना चाहते हो कि एक अच्छा मनुष्य नशे में धुत नहीं होना चाहिए तो फिर तर्कशास्त्रीय न्यायों (सिलोज़िज़्म) का सहारा क्यों लेते हो? सीधे-सीधे यह कहो कि किसी व्यक्ति का अपनी क्षमता से अधिक शराब पीना कितना लज्जाजनक है। इतना कि उसे अपने ही पेट की सीमा का ज्ञान न रहे। यह भी बताओ कि नशे की अवस्था में लोग कितने ऐसे काम कर बैठते हैं जिनके लिए होश में आने पर उन्हें स्वयं लज्जा महसूस होती है। कहो कि मदहोशी वास्तव में स्वेच्छा से अपनाया गया पागलपन है। यदि कल्पना करो कि किसी व्यक्ति की यह नशे की अवस्था कई दिनों तक बनी रहे तो क्या तुम उसे पागल कहने में संकोच करोगे? इसलिए, वर्तमान रूप में भी मदहोशी पागलपन का कोई छोटा रूप नहीं है। अंतर केवल इतना है कि यह कम समय तक रहने वाला पागलपन है।

    मकदूनिया के सिकंदर का उदाहरण याद कीजिए। उसने एक भोज के दौरान अपने सबसे प्रिय और सबसे निष्ठावान मित्र क्लाइटस को भाले से भेद डाला। जब उसे अपने किए का बोध हुआ तो वह मर जाना चाहता था और निस्संदेह, वही उसके योग्य भी था। मदिरापान हर दोष को भड़का देता है और उन्हें उजागर भी कर देता है क्योंकि यह उस लज्जा-बोध को नष्ट कर देता है जो हमारी सबसे बुरी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाए रखता है। वास्तव में, अधिकतर लोग अपने सद्भाव या नैतिक संकल्प के कारण नहीं बल्कि बुरे काम करने पर होने वाली बदनामी के भय से रुकते हैं। जब अत्यधिक शराब मन पर पूरी तरह अधिकार कर लेती है, तब जो भी दोष भीतर छिपे होते हैं, वे बाहर आ जाते हैं। मदिरापान दोषों को उत्पन्न नहीं करता बल्कि पहले से मौजूद दोषों को प्रकट कर देता है। तभी कामुक व्यक्ति शयनकक्ष तक पहुँचने की भी प्रतीक्षा नहीं करता बल्कि अपनी वासनाओं को तत्काल पूरा करने लगता है। तभी निर्लज्ज व्यक्ति अपनी नैतिक दुर्बलता को स्वीकार ही नहीं करता बल्कि उसका घमंड भी करता है। तभी झगड़ालू व्यक्ति न अपनी ज़बान पर नियंत्रण रखता है और न अपने हाथों पर। असभ्य व्यक्ति का अहंकार और अधिक बढ़ जाता है। क्रूर स्वभाव वाले की निर्दयता और भी तीव्र हो जाती है तथा द्वेषपूर्ण व्यक्ति की दुष्टता और अधिक खुलकर सामने आ जाती है। हर दोष को खुली छूट मिल जाती है। हर दोष सबके सामने प्रकट हो जाता है।

    साथ ही आत्म-जागरूकता के लोप का भी उल्लेख करो। लड़खड़ाती और अस्पष्ट वाणी, धुंधली दृष्टि, अस्थिर चाल, चक्कर आना, ऐसा प्रतीत होना मानो पूरी छत घूम रही हो और पूरा घर किसी बवंडर में फँस गया हो तथा पेट की वे पीड़ाएँ, जब शराब भीतर उबलती है और उदर में सूजन तथा भारीपन उत्पन्न करती है। फिर भी, जब तक नशे का प्रभाव बना रहता है, तब तक ये सब किसी तरह सहन किए जा सकते हैं। लेकिन उसके बाद क्या होता है, जब नींद उस शराब को बिगाड़ देती है और नशा अपच में बदल जाता है?

    विचार करो कि मानव इतिहास में मदिरापान ने कितनी भयानक घटनाओं को जन्म दिया है। उसने ऐसे अनेक उग्र योद्धा समुदायों को उनके शत्रुओं के हाथों धोखा दिलवाया है। उसने उन दुर्गों की प्राचीरें भी तुड़वा दी हैं जो लंबे समय तक अभेद्य बनी रहीं। जिन लोगों का स्वतंत्रता-प्रेम इतना प्रबल था कि वे कभी किसी का जुआ स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए, उन्हें भी मदिरापान ने विदेशी शासन के अधीन होने के लिए विवश कर दिया। जो लोग युद्धभूमि में कभी पराजित नहीं हुए, वे शराब के हाथों हार गए। मैं पहले ही सिकंदर का उल्लेख कर चुका हूँ। वह व्यक्ति, जो इतने अभियानों, इतनी लड़ाइयों और इतनी कठोर सर्दियों से सुरक्षित निकल आया था, जिसने जलवायु और दुर्गम भूभाग की हर चुनौती पर विजय प्राप्त की थी, जिसने अज्ञात वन्य प्रदेशों से उतरने वाली असंख्य नदियाँ और दूर-दूर तक फैले समुद्र पार किए थे, वह अंततः संयमहीन मदिरापान से पराजित हुआ। उसका तथाकथित 'हरक्यूलिस का प्याला' उसके लिए मृत्यु का प्याला सिद्ध हुआ।

    शराब अधिक पी लेने की क्षमता पर गर्व करने की आखिर क्या बात है? जब तुम मद्यपान की प्रतियोगिता जीत लेते हो, जब बाकी सब लोग उल्टियाँ कर रहे होते हैं या बेहोश पड़े होते हैं और तुम्हारे साथ जाम टकराने से भी इनकार कर देते हैं, जब उस पूरी दावत में केवल तुम ही अंत तक टिके रहते हो और अपनी अद्भुत क्षमता तथा अनुपम मदिरा-सहनशक्ति से सबको परास्त कर देते हो तब भी अंततः एक साधारण शराब का पीपा तुमसे अधिक सहनशक्ति रखता है और तुम्हें मात दे देता है।

    मार्क एंटनी जैसे उच्च चरित्र और असाधारण प्रतिभा वाले व्यक्ति का पतन किसने किया? क्या वह मदिरापान ही नहीं था जिसने उसे विदेशी रीति-रिवाजों और रोम की परंपराओं के सर्वथा विपरीत दुर्व्यसनों की ओर धकेल दिया? उसके साथ क्लियोपेट्रा के प्रति उसका प्रेम, जिसे शराब ने और भी प्रबल बना दिया। इसी मदिरापान ने उसे राज्य का शत्रु बनाया और उसके विरोधियों से भी अधिक निकृष्ट सिद्ध किया। इसी ने उसे इतना क्रूर बना दिया कि वह भोजन के समय प्रमुख राजनेताओं के कटे हुए सिर अपने सामने मँगवाता था। अपने भव्य भोजों और राजसी वैभव के बीच बैठकर वह उन लोगों के कटे हुए सिरों और चेहरों को निहारता था जिन्हें मृत्युदंड देकर निषिद्ध घोषित किया गया था। शराब से लबालब भरा होने पर भी उसकी रक्त-पिपासा शांत नहीं होती थी; वह और रक्त चाहता था। यदि वह ये अत्याचार होश में रहते हुए करता, तो भी यह अत्यंत निंदनीय होता परंतु यह कि उसने उन्हें पहले से ही नशे में डूबे होने की अवस्था में किया, इससे अधिक असहनीय और क्या हो सकता है?

    सामान्यतः मदिरा के प्रति अत्यधिक आसक्ति अपने साथ क्रूरता भी लेकर आती है क्योंकि इससे मन की स्वस्थता और संतुलन नष्ट हो जाते हैं। जैसे कोई लंबी बीमारी मनुष्य को चिड़चिड़ा, कठिन स्वभाव का और छोटी-सी बात पर भी आहत हो जाने वाला बना देती है, उसी प्रकार लगातार मदिरापान मनुष्य के मन को कठोर और पशुवत् बना देता है। क्योंकि जो लोग बार-बार अपने वास्तविक होश में नहीं रहते, उनमें यह विक्षिप्त अवस्था धीरे-धीरे आदत बन जाती है। परिणामस्वरूप, शराब के प्रभाव में जो दोष उन्होंने अपने भीतर विकसित किए थे, वे बाद में बिना शराब के भी बने रहते हैं और निरंतर बढ़ते रहते हैं।

    अतः अपने भाषण में यह बताओ कि बुद्धिमान व्यक्ति को नशे में क्यों नहीं होना चाहिए। केवल शब्दों से नहीं बल्कि उदाहरणों द्वारा दिखाओ कि मद्यपान कितनी कुरूप और घृणित वस्तु है तथा उसकी माँगें कितनी अविवेकपूर्ण हैं। सबसे सरल उपाय यह सिद्ध करना है कि जब हमारी तथाकथित सुख-भोग की इच्छाएँ अपनी सीमा से बाहर चली जाती हैं, तो वही सुख दंड में बदल जाते हैं। यदि तुम यह सिद्ध करने का प्रयास करोगे कि बुद्धिमान व्यक्ति अत्यधिक मदिरापान से प्रभावित नहीं होता और उसका चरित्र तथा विवेक नशे की अवस्था में भी अडिग बने रहते हैं तो फिर तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि विष पीने से उसकी मृत्यु नहीं होगी, निद्राजनक औषधि उसे सुला नहीं सकेगी, और हेलिबोर (एक तीव्र विरेचक एवं विषैली औषधि) लेने पर उसे न उल्टी होगी और न ही उसके पेट की सामग्री बाहर निकलेगी। लेकिन यदि उसकी चाल लड़खड़ा रही है और उसकी वाणी अस्पष्ट हो गई है तो फिर उसे एक दृष्टि से नशे में और दूसरी दृष्टि से होश में कैसे माना जा सकता है?


 अभी के लिए विदा 

Wednesday, 22 July 2026

भय दूर करने के बारे में -- पत्र - 80

 प्रिय लूसीलियस 


मैंने अब तुम्हारी चिंता करना छोड़ दिया है। तुम पूछते हो, “मेरे पक्ष में किस देवता ने आवाज़ उठाई?” वह एकमात्र देवता जिसने कभी छल नहीं किया। वह है... वह मन जो सत्य, न्याय और सद्गुण से प्रेम करता है। तुम्हारा श्रेष्ठतम अंश सुरक्षित है। भाग्य तुम्हें हानि पहुँचा सकता है पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अब मुझे यह भय नहीं रहा कि तुम स्वयं अपने लिए हानिकारक सिद्ध होगे। जिस मार्ग पर तुम चल पड़े हो, उसी पर बने रहो। अपने शांत स्वभाव को स्थायी प्रवृत्ति बना लो— शांत, परंतु कोमल या दुर्बल नहीं। कोमल जीवन की अपेक्षा कठोर जीवन कहीं बेहतर है! अर्थात यदि 'कठोर जीवन' से लोगों का सामान्य आशय लिया जाए, ऐसा जीवन जो परिश्रम, संघर्ष और कठिनाइयों से भरा हो। हम अक्सर लोगों को किसी के जीवन की प्रशंसा करते सुनते हैं क्योंकि वे उससे ईर्ष्या करते हैं। वे कहते हैं, “उसका जीवन बहुत आरामदायक है,” जबकि उनका वास्तविक आशय यह होता है, “वह व्यक्ति स्वयं ही दुर्बल है।” धीरे-धीरे मन भी विलासी और दुर्बल बन जाता है। जब वह आलस्य और आराम में पड़ा रहता है तो उसकी शक्ति शिथिल पड़ जाती है और वह उसी जीवन के समान बन जाता है जिसे वह जी रहा होता है। तुम स्वयं सोचो। यदि कोई सचमुच पुरुषार्थी है तो क्या उसके लिए दृढ़ रहना बेहतर नहीं है, चाहे वह दृढ़ता मृत्यु की कठोरता जैसी ही क्यों न हो? इसके अतिरिक्त, जो लोग अत्यधिक विलासी और दुर्बल हो जाते हैं, वे अंततः अपने जीवन को उसी वस्तु के समान बना लेते हैं जिससे वे सबसे अधिक भय खाते हैं। वास्तविक अवकाश उस अर्थी से सर्वथा भिन्न है जिस पर मृत शरीर ले जाया जाता है।



    तुम पूछते हो, “तुम क्या कहना चाहते हो? क्या उस प्रकार विश्राम करना भी व्यवसायों और भाग-दौड़ के बवंडर में फँसे रहने से बेहतर नहीं है?” निस्संदेह, अत्यधिक परिश्रम कष्टदायक है पर जड़ता भी उतनी ही घातक है। मेरी दृष्टि में सुगंधित तेलों से अभिषिक्त शव भी उतना ही मृत है जितना वह शव जिसे लोहे के काँटे से घसीटकर ले जाया जाता है। अध्ययन के बिना अवकाश मृत्यु के समान है। वह मानो जीवित ही दफना दिए जाने जैसा है। 

    सब कुछ छोड़कर भाग जाने से क्या लाभ? मानो हमारी चिंताएँ समुद्र पार करके हमारा पीछा न करें! ऐसा कौन-सा आश्रय है जहाँ मृत्यु का भय प्रवेश न कर सके? कौन-सा शांत स्थान, चाहे वह पर्वतों के सबसे दुर्गम किले में ही क्यों न हो, पीड़ा के विचार से भयावह नहीं बन जाता? तुम जहाँ कहीं भी छिपो, मानव जीवन के दुःखों का कोलाहल तुम्हें चारों ओर से घेरे रहेगा।

    हमारे चारों ओर बाहरी चिंताएँ फैली हुई हैं, जो हमें छलने और दबाने के लिए तत्पर रहती हैं। उनसे भी कहीं अधिक चिंताएँ हमारे भीतर से ही उभर पड़ती हैं, यहाँ तक कि एकांत के बीच भी। इसलिए हमें अपने चारों ओर दर्शन का ऐसा दुर्ग खड़ा कर लेना चाहिए, जिस पर कभी आक्रमण न किया जा सके और जिसे भाग्य के किसी भी घेराबंदी-यंत्र से भेदा न जा सके। जो मन बाहरी वस्तुओं का त्याग कर देता है और अपने ही आंतरिक दुर्ग में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करता है, वह ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जिसे कोई जीत नहीं सकता। तब गुलेल के पत्थर और तीर उसके चरणों में आकर निष्फल गिर पड़ते हैं। लोग कहते हैं कि भाग्य का हाथ बहुत लंबा होता है, पर वास्तव में भाग्य का हाथ लंबा नहीं होता। वह केवल उन्हीं को पकड़ पाता है जो स्वयं उससे चिपके रहते हैं।

    अतः जितना संभव हो सके, हमें भाग्य से दूरी बनाए रखनी चाहिए। परंतु ऐसा करने का एकमात्र उपाय है, अपने और प्रकृति के सही ज्ञान के द्वारा। हमें यह जानना चाहिए कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं और कहाँ से आए हैं। हमारे लिए क्या शुभ है और क्या अशुभ, किसका अनुसरण करना चाहिए और किससे बचना चाहिए, विवेक क्या है, जो वरणीय और त्याज्य वस्तुओं में भेद करता है, हमारी इच्छाओं के उन्माद को शांत करता है और हमारे भय की उग्रता को नियंत्रित करता है। कुछ लोग यह समझते हैं कि उन्होंने दर्शन के बिना ही इन शक्तियों पर विजय पा ली है। पर जब किसी विपत्ति के द्वारा उनके धैर्य की परीक्षा होती है, तब अंततः वे स्वयं स्वीकार करने को विवश हो जाते हैं। जब यातना देने वाला कहता है, “अपना हाथ आगे बढ़ाओ!”, और मृत्यु सामने आ खड़ी होती है, तब उनके साहसपूर्ण शब्द उनके होंठों पर ही मर जाते हैं। तब उनसे कहा जा सकता है, “जब तक तुम्हें स्वयं कष्ट का सामना नहीं करना पड़ा था, तब तक उसका उपहास करना तुम्हारे लिए बहुत आसान था। लो, अब यह पीड़ा सामने है जिसे तुम सहने योग्य बताया करते थे। यह मृत्यु भी सामने है, जिसके विरुद्ध तुमने इतने लंबे और प्रभावशाली भाषण दिए थे। अब कोड़े बरस रहे हैं। अब तलवार चमक रही है।

अब, हे एनीयस, अपने साहस का परिचय देने का समय है,
अब अपने दृढ़ हृदय को दिखाने का समय है।”

    तुम्हें वह दृढ़ हृदय निरंतर अभ्यास से प्राप्त होगा। अपने भाषणों का नहीं बल्कि अपने मन का अभ्यास करके और स्वयं को मृत्यु के लिए तैयार करके। जो व्यक्ति केवल तर्कों की चालाकियों के सहारे तुम्हें यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न करता है कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है, उसने न तो तुम्हें प्रोत्साहित किया है और न ही तुम्हारे साहस को जागृत किया है। प्रिय लूसीलियस, यूनानियों की इस कुतर्कप्रिय प्रवृत्ति पर हम हँस ही सकते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि मैं अब तक उनसे पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सका हूँ। हमारे मत के प्रवर्तक ज़ेनो यह तर्क प्रस्तुत करते हैं—

कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु बुरी नहीं है।

अब इससे तो मुझे बड़ा लाभ हुआ! अब तुमने मेरे मन से मृत्यु का भय दूर कर दिया है। अब मैं बिना किसी संकोच के अपनी गर्दन तलवार के आगे बढ़ा दूँगा! क्या तुम गंभीरता से बात नहीं कर सकते? क्या जब मैं मृत्यु का सामना करने जा रहा हूँ, तभी तुम मुझे हँसाना चाहते हो?

    वास्तव में, मेरे लिए यह कहना कठिन है कि अधिक कुतर्की कौन था। वह जिसने यह विश्वास किया कि इस तर्क से मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा या वह जिसने इस तर्क का खंडन करने का प्रयास किया, मानो उसमें सचमुच कोई सार हो। उसने हमारे इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए, जिसके अनुसार मृत्यु उदासीन वस्तुओं (जिसे यूनानी भाषा में अडियाफोरा कहते हैं) में से एक है, उसके विरोध में यह तर्क प्रस्तुत किया—

कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती।
परंतु मृत्यु गौरवपूर्ण हो सकती है।
अतः मृत्यु उदासीन वस्तु नहीं है।

    तुम स्वयं देख सकते हो कि यह तर्क किस प्रकार भ्रम उत्पन्न करता है। गौरवपूर्ण मृत्यु नहीं होती बल्कि साहसपूर्वक मरना गौरवपूर्ण होता है। जब तुम कहते हो, “कोई भी उदासीन वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती,” तो मैं इस कथन को इस शर्त पर स्वीकार करता हूँ कि कोई भी वस्तु तब तक गौरवपूर्ण नहीं होती जब तक उसमें किसी उदासीन वस्तु का संबंध न हो। उदाहरण के लिए, मैं बीमारी, पीड़ा, निर्धनता, निर्वासन और मृत्यु को उदासीन वस्तुएँ कहता हूँ अर्थात वे अपने आप में न तो अच्छी हैं और न बुरी। इनमें से कोई भी अपने आप में गौरवपूर्ण नहीं है, फिर भी इनके बिना कोई भी गौरवपूर्ण कार्य संभव नहीं है। क्योंकि हम निर्धनता की प्रशंसा नहीं करते बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जो निर्धनता के सामने न तो अपमानित होता है और न ही टूटता है। हम निर्वासन की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिसने निर्वासन को उससे भी अधिक साहस के साथ स्वीकार किया, जितने साहस से वह किसी दूसरे को निर्वासित होने के लिए विदा करता। हम पीड़ा की नहीं बल्कि उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस पर पीड़ा अपना वश नहीं चला सकी। कोई मृत्यु की प्रशंसा नहीं करता। हम उस आत्मा की प्रशंसा करते हैं जिसे मृत्यु अपने साथ तो ले जा सकती है पर पराजित नहीं कर सकती। ये सभी वस्तुएँ अपने आप में न तो सम्माननीय हैं और न ही गौरवपूर्ण। परंतु जब सद्गुण उनका सामना करता है और उन्हें अपने अधीन कर लेता है, तब वही उन्हें सम्माननीय और गौरवपूर्ण बना देता है। अपने स्वभाव से वे मध्यवर्ती अर्थात् उदासीन हैं। अंतर केवल इतना है कि उन पर अधिकार दुर्गुण का होता है या सद्गुण का। वही मृत्यु जो कैटो के मामले में गौरवपूर्ण थी। डेसिमस ब्रूटस के मामले में तुरंत ही नीच और लज्जाजनक बन गई। उसने अपने जल्लादों से कुछ क्षण रुकने की प्रार्थना की और शौच के लिए चला गया। फिर जब उन्होंने उसे वापस बुलाकर गर्दन आगे बढ़ाने का आदेश दिया तो उसने कहा, “यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे, तो मैं ऐसा करूँगा।” कैसी मूर्खता है—जहाँ बच निकलने का कोई उपाय ही नहीं, वहाँ भी भागने का प्रयत्न करना! “मैं ऐसा करूँगा, यदि तुम मुझे जीवित रहने दोगे।” उसे तो यह भी जोड़ देना चाहिए था, “चाहे एंटनी के अधीन ही क्यों न जीना पड़े!” वास्तव में ऐसा व्यक्ति जीवित बचाए जाने के योग्य ही था।

    पर जैसा कि मैं कह रहा था, यह स्पष्ट है कि मृत्यु अपने आप में न तो अच्छी है और न ही बुरी। कैटो ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत सम्माननीय था। ब्रूटस ने उसका जो उपयोग किया, वह अत्यंत लज्जाजनक था। जब सद्गुण किसी वस्तु के साथ जुड़ जाता है तो वह उसे ऐसा गौरव प्रदान कर देता है जो उसका अपना नहीं होता। हम कहते हैं कि कोई कमरा अच्छी तरह प्रकाशित है जबकि वही कमरा रात के समय अंधकारमय रहता है। दिन उसमें प्रकाश भर देता है और रात उससे प्रकाश छीन लेती है। इसी प्रकार जिन वस्तुओं को हमारा दर्शन 'उदासीन' या 'मध्यवर्ती' कहता है जैसे, धन, बल, सौंदर्य, सम्मान और सत्ता। दूसरी ओर मृत्यु, निर्वासन, अस्वस्थता, पीड़ा और वे सभी बातें जिनसे हम कम या अधिक भय करते हैं। उनका अच्छा या बुरा नाम सद्गुण या दुर्गुण ही निर्धारित करता है। लोहे का एक टुकड़ा अपने आप में न तो गरम होता है और न ठंडा। उसे भट्ठी में डाल दो तो वह लाल होकर तपने लगता है। पानी में डुबो दो तो ठंडा हो जाता है। उसी प्रकार मृत्यु भी तभी सम्माननीय बनती है, जब उसमें वास्तव में सम्माननीय वस्तु अर्थात सद्गुण और वह मन जो बाहरी परिस्थितियों की परवाह नहीं करता, समाहित हो।

    परंतु, लूसीलियस, जिन वस्तुओं को हम 'मध्यवर्ती' या 'उदासीन' कहते हैं, उनमें भी एक महत्वपूर्ण भेद है। मृत्यु उसी प्रकार उदासीन नहीं है, जैसे यह बात उदासीन है कि तुम्हारे सिर पर बालों की संख्या सम है या विषम। मृत्यु उन वस्तुओं में से है जो बुरी तो नहीं हैं परंतु उनमें बुराई का आभास अवश्य होता है। हमारे भीतर स्वभावतः अपने प्रति प्रेम होता है। जीवित रहने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने की सहज इच्छा होती है। विघटन या नष्ट हो जाने के प्रति स्वाभाविक भय भी होता है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उससे हम अनेक अच्छे साधनों से वंचित हो जाएँगे और उन परिचित परिस्थितियों से अलग हो जाएँगे जिनके हम अभ्यस्त हैं। मृत्यु हमें इसलिए भी पराई और भयावह लगती है कि इस संसार को तो हम जानते हैं पर जिस संसार की ओर हम जा रहे हैं, वह कैसा है, यह नहीं जानते। अज्ञात के प्रति स्वाभाविक भय होता है। इसके अतिरिक्त, अंधकार का भी हमारे भीतर जन्मजात भय होता है और लोग यह मानते हैं कि मृत्यु हमें अंधकार में ले जाएगी। इसलिए, यद्यपि मृत्यु उदासीन है, फिर भी वह ऐसी वस्तु नहीं है जिसकी उपेक्षा सहजता से की जा सके। मन को निरंतर अभ्यास द्वारा इतना दृढ़ बनाना चाहिए कि वह मृत्यु के दर्शन और उसके निकट आने को सहन कर सके। 

    हमें मृत्यु की उतनी चिंता नहीं करनी चाहिए जितनी हम करते हैं। हमने उसके विषय में अनेक भयानक और झूठी कथाओं पर विश्वास कर लिया है। बहुत-से लोगों ने एक-दूसरे से बढ़कर उसके बारे में और भी डरावनी कल्पनाएँ गढ़ी हैं। वे पृथ्वी के नीचे स्थित किसी कारागार और अनंत अंधकार से भरे प्रदेशों का वर्णन करते हैं, जहाँ—

नरक का विशाल प्रहरी
हड्डियों के बिछौने पर पड़ा रहता है और गुर्राता हुआ
रक्तरंजित गुफा में उन्हें कुतरता रहता है
और अपने भय से रक्तहीन समस्त प्रेतात्माओं को आतंकित कर देता है।

    यदि तुम लोगों को यह भी समझा दो कि ये सब केवल मनगढ़ंत कथाएँ हैं और मरने वालों के लिए अब भयभीत होने जैसा कुछ भी शेष नहीं रहता, तब भी एक दूसरा भय सामने आ खड़ा होता है। हेडीज़(मृतकों का लोक) का जितना भय उन्हें होता है, उतना ही भय उन्हें इस बात का भी होता है कि मृत्यु के बाद वे कहीं भी नहीं रह जाएँगे, उनका कोई अस्तित्व ही शेष नहीं रहेगा।

    फिर साहसपूर्वक मृत्यु का सामना करना गौरवपूर्ण क्यों न माना जाए जबकि उसमें मनुष्य उन भय और चिंताओं से संघर्ष करता है जो लंबे समय से उसके मन में जड़ जमाए हुए हैं? यह मानव-मन की सबसे महान उपलब्धियों में से एक क्यों न हो? यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि मृत्यु एक बुराई है तो वह कभी सद्गुण की ऊँचाइयों तक नहीं पहुँच सकता पर यदि वह उसे उदासीन समझता है, तभी वह वहाँ पहुँच सकता है। प्रकृति किसी भी व्यक्ति को उस वस्तु की ओर साहसपूर्वक बढ़ने की अनुमति नहीं देती जिसे वह बुरा समझता हो। वह उसकी ओर केवल धीमे-धीमे और अनिच्छा से ही बढ़ेगा। पर जो कार्य कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध, कायरतापूर्वक करता है, वह गौरवपूर्ण नहीं हो सकता। सद्गुणपूर्ण कर्म कभी भी दबाव या विवशता में नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त, कोई भी कर्म तब तक सम्माननीय नहीं हो सकता जब तक मन पूर्णतः उसी उद्देश्य के प्रति समर्पित न हो और उसके किसी भी भाग में कोई अनिच्छा न हो। जब कोई व्यक्ति किसी ऐसी वस्तु को अपनाता है जिसे वह बुरा समझता है या तो इसलिए कि वह उससे भी बड़ी किसी बुराई से बचना चाहता है अथवा इसलिए कि उसके सामने कुछ ऐसे लाभ हैं जिनके लिए वह उस एक बुराई को सहने योग्य मानता है, तब उसके निर्णय परस्पर विरोधी हो जाते हैं। एक ओर उसका निर्णय उसे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर वही निर्णय उसे पीछे खींचता है और उस वस्तु से बचने के लिए कहता है जिसे वह हानिकारक समझता है। इस प्रकार वह विपरीत दिशाओं में खिंचने लगता है और ऐसी स्थिति में उसके कर्म का गौरव नष्ट हो जाता है। सद्गुण अपने निर्णयों पर मन की पूर्ण एकता और सामंजस्य के साथ कार्य करता है। वह अपने किए जाने वाले कर्म से भयभीत नहीं होता।

    और जहाँ तक तुम्हारा संबंध है, “विपत्तियों के सामने कभी समर्पण मत करो। अपने भाग्य जितनी कठिनाइयाँ तुम्हारे सामने रखे, उनसे भी अधिक साहस के साथ उनका सामना करो।”

    यदि तुम यह मानते रहोगे कि वे सचमुच बुराइयाँ हैं तो तुम उनका सामना अधिक साहस से नहीं कर सकोगे। इस विश्वास को अपने हृदय से निकाल फेंकना होगा। अन्यथा चिंता तुम्हें कर्म करने में संकोची बना देगी। जहाँ तुम्हें स्वयं आगे बढ़कर आक्रमण करना चाहिए, वहाँ तुम्हें दूसरों के धक्के की आवश्यकता पड़ेगी।

    निस्संदेह, हमारा दर्शन चाहेगा कि ज़ेनो का तर्क सही सिद्ध हो और उसके विरोध में दिया गया तर्क मिथ्या तथा दोषपूर्ण माना जाए। पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं इन विषयों को तर्कशास्त्र के नियमों और पेशेवर तर्कविदों की उन घिसी-पिटी पहेलियों तक सीमित नहीं करता। मेरा मत है कि इस प्रकार की सारी बातों को एक ओर फेंक देना चाहिए। उनका परिणाम केवल इतना होता है कि सामने वाले को यह अनुभव होता है कि उसके साथ चालाकी की गई है। वह मानने के लिए विवश तो हो सकता है पर जो वह स्वीकार करता है, वास्तव में उसके मन का विश्वास वह नहीं होता। सत्य के पक्ष में दिए जाने वाले भाषण अधिक सरल होने चाहिए और भय के विरुद्ध दिए जाने वाले भाषण अधिक साहसपूर्ण।

    मेरी इच्छा तो यह होगी कि उनके इन उलझे हुए तर्कों को सीधा और सरल करके प्रस्तुत करूँ ताकि लोगों को छलकर नहीं बल्कि उन्हें विश्वास दिलाकर समझा सकूँ। जब कोई सेनापति अपनी सेना को युद्ध में ले जाने वाला होता है, जहाँ उन्हें अपनी पत्नियों और बच्चों के लिए अपने प्राण न्योछावर करने हैं, तब वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता है? वह फैबियस कुल का स्मरण कराता है, जिसके एक ही परिवार ने अपने देश के समस्त युद्ध का भार अपने ऊपर उठा लिया था। वह थर्मोपाइली की संकरी घाटी में डटे स्पार्टनों का स्मरण कराता है। वे न विजय की आशा रखते थे, न घर लौटने की। वे जानते थे कि वही स्थान उनकी समाधि बनेगा। ऐसे वीरों को तुम किस प्रकार प्रेरित करोगे कि वे पूरे राष्ट्र के विनाश को रोकने के लिए अपने शरीरों को ढाल बना दें और अपना स्थान छोड़े बिना अपने प्राण दे दें? क्या तुम उनसे यह कहोगे, “कोई भी बुरी वस्तु गौरवपूर्ण नहीं होती। पर मृत्यु गौरवपूर्ण है। इसलिए मृत्यु बुरी नहीं है”? कितना प्रभावशाली भाषण होगा यह! इसे सुनकर भला कौन बिना हिचकिचाए स्वयं को भालों के सामने फेंक देगा और खड़े-खड़े मर जाना स्वीकार कर लेगा? इसके विपरीत, लियोनिदास ने अपने सैनिकों को कितने साहस के साथ संबोधित किया। उसने कहा, “सैनिकों, अपना नाश्ता कर लो। रात का भोजन हेडीज़ में होगा।” यह सुनकर उन्हें भोजन निगलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। न भोजन उनके गले में अटका, न हाथों से गिरा। वे उत्साहपूर्वक अपना नाश्ता करने बैठे और अपने अंतिम भोजन की ओर भी उसी उत्साह से चले। उस रोमन सेनापति का क्या कहना, जिसने अपने सैनिकों को शत्रुओं की विशाल सेना द्वारा संरक्षित एक स्थान पर अधिकार करने के लिए भेजते समय कहा, “सैनिकों, वहाँ जाना आवश्यक है। लौटकर आना आवश्यक नहीं।” देखो, सद्गुण कितना सरल, कितना स्पष्ट और कितना आदेशात्मक होता है।

    पर तुम्हारी इन तर्क-कपटपूर्ण युक्तियों से भला कौन अधिक दृढ़ या अधिक साहसी बन सकता है? वे तो मनोबल को ही कुचल देती हैं। जबकि यदि कोई ऐसा समय है जब मन को संकीर्ण और उलझे हुए तर्कों की काँटेदार गलियों में नहीं ठूँसा जाना चाहिए तो वह वही समय है जब मनुष्य किसी महान कार्य के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो। हमारा कार्य केवल तीन सौ सैनिकों के मन से मृत्यु का भय दूर करना नहीं है बल्कि उन सभी मनुष्यों के मन से उसे दूर करना है जो नश्वर हैं। तुम उन्हें कैसे सिखाओगे कि मृत्यु कोई बुराई नहीं है? बचपन से ही मन में बैठी हुई धारणाओं को तुम कैसे मिटाओगे? मानवीय दुर्बलता के लिए तुम्हारे पास कौन-सी सहायता है? तुम्हारे कौन-से शब्द लोगों के हृदय में ऐसा उत्साह भर देंगे कि वे स्वयं संकट के बीच कूद पड़ें? तुम्हारा कौन-सा भाषण भय के साथ किए गए उस मौन समझौते को तोड़ देगा? तुम्हारी कौन-सी वाणी समस्त मानव जाति के उन विश्वासों को उलट देगी, जो तुम्हारे विरुद्ध खड़े हैं? तुम मुझे इन पहेलीनुमा शब्दों और चालाकी से गढ़े गए छोटे-छोटे प्रश्नों के जाल प्रस्तुत करते हो! इतने बड़े शत्रु के विरुद्ध यही तुम्हारे महान अस्त्र हैं!

    अफ्रीका का वह भयानक सर्प रोमन सेनाओं के लिए स्वयं युद्ध से भी अधिक भयावह था। उन्होंने उस पर गुलेलों और तीरों की वर्षा की, पर सब व्यर्थ गया। यदि पाइथन का वध करने वाला अपोलो भी वहाँ होता तो शायद वह भी उसे घायल न कर पाता। उसके विशाल शरीर और अभेद्य चमड़े ने लोहे और मनुष्य द्वारा चलाए जा सकने वाले हर अस्त्र का सामना कर लिया। अंततः चक्की के विशाल पाटों ने उसे कुचलकर मार डाला। तो क्या तुम मृत्यु जैसे शत्रु के सामने ऐसे छोटे-छोटे बाण चलाओगे? क्या तुम सिंह का सामना एक पिन से करोगे? तुम्हारे तर्क भले ही बहुत पैने हों पर भूसे का तिनका भी नुकीला होता है। कभी-कभी कोई वस्तु अपनी अत्यधिक बारीकी के कारण ही निष्प्रभावी और निरर्थक हो जाती है।


अभी के लिए विदा 

उपकार और अपकार के बारे में -- पत्र 79

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि तुम्हें एक कृतघ्न व्यक्ति मिला। यदि ऐसा पहली बार हुआ है तो तुम्हें या तो अपने सौभाग्य का आभारी होना चाहिए या अपने स्वयं के प्रयासों का। किन्तु यदि तुम इस अनुभव के कारण दूसरों पर उपकार करना छोड़ देना चाहते हो तो तुम्हारा यह प्रयास तुम्हें केवल कठोर और अनुदार ही बनाएगा। क्योंकि यदि तुम वर्तमान परिस्थिति का जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगे तो तुम किसी पर भी उपकार नहीं कर पाओगे। तब परिणाम यह होगा कि उपकार केवल कृतघ्न व्यक्ति के साथ ही नष्ट नहीं होगा बल्कि तुम्हारे साथ भी समाप्त हो जाएगा। इससे तो यह कहीं बेहतर है कि कुछ उपकारों का प्रत्युत्तर न मिले, बजाय इसके कि उपकार करना ही छोड़ दिया जाए। खराब फसल होने के बाद भी किसान बीज बोना नहीं छोड़ता। अनेक वर्षों तक बंजर भूमि में जो हानि होती रही हो, वह कभी-कभी केवल एक ही वर्ष में उपजाऊ भूमि के कारण पूरी हो जाती है। इसी प्रकार, एक कृतज्ञ व्यक्ति को पाने के लिए कुछ कृतघ्न लोगों का सामना करना भी सार्थक है। कोई भी इतना अचूक नहीं होता कि उपकार करते समय कभी भूल न करे। कुछ उपकार व्यर्थ चले जाएँ ताकि कुछ अपने सही लक्ष्य तक पहुँच सकें। जहाज़ डूब जाने के बाद भी लोग फिर समुद्र की यात्रा पर निकलते हैं। एक बुरे ऋण के कारण साहूकार बाज़ार में धन उधार देना बंद नहीं कर देता। यदि हर उस कार्य को छोड़ दिया जाए जिसमें बाधाएँ आती हैं तो जीवन का सारा प्रवाह ही रुक जाएगा। इसलिए तुम्हारे साथ जो हुआ है, वह तुम्हें और भी अधिक उदार बनाए। क्योंकि जिन कार्यों का परिणाम निश्चित नहीं होता, उन्हें बार-बार करना चाहिए ताकि कभी-न-कभी सफलता अवश्य प्राप्त हो सके।



    लेकिन इस विषय पर मैं अपनी कार्य (संभवतः पुस्तक) उपकार (De Beneficiis) में पर्याप्त चर्चा कर चुका हूँ।इस समय मेरे विचार में एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अब तक संतोषजनक ढंग से विचार नहीं किया गया है। मान लो, किसी व्यक्ति ने पहले हमारा कोई उपकार किया, किन्तु बाद में उसी ने हमारा अहित भी किया। तो क्या यह माना जाए कि उसने अपने पहले किए गए उपकार और बाद में पहुँचाई गई हानि को बराबर कर दिया। इस प्रकार हमारे ऊपर उसका जो कृतज्ञता का ऋण था, वह समाप्त हो गया? यदि चाहो तो इस प्रश्न को और भी कठिन बना सकते हो। मान लो कि बाद में उसने जो हानि पहुँचाई, वह पहले किए गए उपकार से कहीं अधिक बड़ी थी। तब क्या हमें उसके पहले किए गए उपकार को स्मरण रखना चाहिए या उसकी बाद की हानि को अधिक महत्त्व देना चाहिए?

    यदि तुम उस कठोर और अडिग न्यायाधीश का मत पूछो, जो लोकोक्ति के अनुसार अत्यंत सख्त निर्णय देता है तो वह कहेगा कि एक कर्म दूसरे को निरस्त कर देता है। वह कहेगा, “यद्यपि हानि का पलड़ा भारी है, फिर भी जो अंतर बचता है, उसे उपकार के पक्ष में मान लो।” बाद में हुई हानि अधिक बड़ी थी, किन्तु उपकार पहले किया गया था। इसलिए निर्णय करते समय समय के क्रम का भी ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त कुछ और बातें भी विचारणीय हैं, जो इतनी स्पष्ट हैं कि उन्हें अलग से याद दिलाने की आवश्यकता नहीं। जैसे—उपकार करते समय उसकी इच्छा कितनी सच्ची थी और हानि पहुँचाते समय उसकी अनिच्छा कितनी थी। क्योंकि उपकार और अपकार, दोनों का वास्तविक मूल्य मनुष्य की भावना और उद्देश्य पर निर्भर करता है।कोई कह सकता है, “मैं उपकार करना नहीं चाहता था। मुझे लज्जा के कारण ऐसा करना पड़ा या लोगों के बार-बार आग्रह ने मुझे विवश कर दिया अथवा मैंने यह सोचकर उपकार किया कि इससे मुझे कोई लाभ होगा।” किसी उपकार के प्रति कृतज्ञता भी उतनी ही होनी चाहिए जितनी सच्ची भावना से वह उपकार किया गया था। इसलिए हम केवल उपकार के आकार या मात्रा को नहीं तौलते बल्कि उसे देने वाले की सद्भावना और इच्छा को भी तौलते हैं। अब यदि सभी अनुमान और संदेहों को एक ओर रख दें और यह मान लें कि पहला कार्य वास्तव में उपकार था तथा बाद का कार्य वास्तव में उससे अधिक बड़ा अपकार था, तब भी एक सज्जन मनुष्य अपना हिसाब इस प्रकार करेगा कि उसका झुकाव अपने ही विरुद्ध होगा। वह उपकार के मूल्य को बढ़ाकर आँकेगा और अपकार के मूल्य को घटाकर देखेगा।

    दूसरा न्यायाधीश, जो अधिक उदार है और जिसकी राय को मैं स्वयं अधिक पसंद करता हूँ, तुमसे कहेगा कि अपकार को भूल जाओ किन्तु उपकार को स्मरण रखो। तुम कह सकते हो, “न्याय तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित प्रतिफल दिया जाए, उपकार के बदले कृतज्ञता और अपकार के बदले प्रतिशोध या कम-से-कम मन में रोष।” यह बात तब तक सही है, जब उपकार करने वाला और अपकार करने वाला दो अलग-अलग व्यक्ति हों। किन्तु यदि उपकार और अपकार, दोनों एक ही व्यक्ति ने किए हों तो उसके पहले किए गए उपकार का प्रभाव उसके बाद के अपकार को बहुत सीमा तक निष्प्रभावी कर देता है। यदि कोई व्यक्ति बिना पहले कोई उपकार किए भी क्षमा का पात्र हो सकता है तो जिसने पहले हमारे साथ भलाई की हो और बाद में कोई गलती कर बैठे, वह तो केवल क्षमा ही नहीं, उससे भी अधिक उदार व्यवहार का अधिकारी है। मैं उपकार और अपकार इन दोनों का मूल्य समान नहीं मानता। मेरे विचार में, एक उपकार का मूल्य एक अपकार से कहीं अधिक होता है।

    हर व्यक्ति यह नहीं जानता कि कृतज्ञ कैसे होना चाहिए। कोई विचारहीन, अशिक्षित या सामान्य जन भी यह समझ सकता है कि उस पर किसी का उपकार है, विशेषकर तब जब उसे वह उपकार हाल ही में प्राप्त हुआ हो। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उस उपकार का वास्तविक मूल्य कितना है और उसके प्रति उसका दायित्व किस सीमा तक है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही जानता है कि प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक उपकार का उचित मूल्य क्या है। जिस व्यक्ति का मैंने अभी उल्लेख किया जो सद्भावना रखने पर भी विवेकहीन है, वह उपकार का प्रतिदान या तो जितना करना चाहिए उससे कम करता है या फिर अनुचित समय पर, अनुचित स्थान पर अथवा अनुचित ढंग से करता है। इस प्रकार, जो प्रतिदान उचित रीति से किया जाना चाहिए था, वह व्यर्थ चला जाता है और मानो यूँ ही नष्ट हो जाता है।

    यह आश्चर्य की बात है कि कुछ अवसरों पर हमारी भाषा कितनी उपयुक्त सिद्ध होती है। हमारी प्राचीन भाषिक परंपरा ने कुछ बातों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो न केवल अत्यंत सटीक हैं बल्कि हमारे कर्तव्य का भी संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए, हम सामान्यतः कहते हैं, “इस व्यक्ति ने उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की” (gratiam rettulit)। यहाँ 'व्यक्त की' या 'लौटाई' का अर्थ है जो तुम्हारा ऋण है, उसे अपनी स्वेच्छा से उसके वास्तविक अधिकारी के पास पहुँचा देना। हम यह नहीं कहते कि 'उसने कृतज्ञता वापस दे दी' (gratiam reddidit)। कोई वस्तु तो मनुष्य अनिच्छा से भी लौटा सकता है, अनुचित समय पर भी लौटा सकता है या किसी दूसरे के माध्यम से भी लौटा सकता है। इसी प्रकार हम यह भी नहीं कहते कि 'उसने उपकार का भुगतान कर दिया' (reposuit beneficium) या 'उसने उसका ऋण चुका दिया' (resolvit)। ये शब्द धन या ऋण चुकाने के लिए तो उपयुक्त हो सकते हैं किन्तु उपकार के प्रतिदान के लिए हमें उचित नहीं लगते। 'लौटाना' (render) का वास्तविक अर्थ है जिससे कोई वस्तु प्राप्त हुई हो, उसे स्वेच्छा से उसी के पास वापस पहुँचाना। इस शब्द में यह भाव निहित है कि कार्य किसी बाहरी दबाव से नहीं बल्कि अपनी ही प्रेरणा से किया गया है।

    बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह विचार करता है कि उसने कितना उपकार प्राप्त किया है, किससे प्राप्त किया है, कब, कहाँ, किस कारण और किस प्रकार प्राप्त किया है। इसीलिए हम कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही सही अर्थों में कृतज्ञता प्रकट करना जानता है, ठीक वैसे ही जैसे केवल वही वास्तविक अर्थों में उपकार करना भी जानता है। स्वाभाविक ही है कि वही बुद्धिमान व्यक्ति उपकार करने में उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक आनंद अनुभव करता है, जितना अन्य लोग उपकार प्राप्त करने में करते हैं।

    कुछ लोग इसे हमारे दर्शनशास्त्र के उन कथनों में से एक मानते हैं जो सामान्य लोगों की अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत प्रतीत होते हैं। यूनानी ऐसे कथनों को पैराडॉक्सा (paradoxa) कहते हैं। वे कहते हैं, “क्या केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है? क्या कोई और व्यक्ति यह नहीं जानता कि लेनदार का ऋण कैसे चुकाया जाता है या किसी वस्तु का मूल्य कैसे अदा किया जाता है?” यदि हमारे दर्शन के प्रति इस कारण किसी के मन में रोष उत्पन्न हो तो यह जान लेना चाहिए कि एपिक्यूरस भी यही मत रखता है। कम-से-कम मेट्रोडोरस तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि केवल ज्ञानी ही कृतज्ञता प्रकट करना जानता है। फिर यही मेट्रोडोरस आश्चर्य व्यक्त करते हैं जब हम कहते हैं, “केवल ज्ञानी ही प्रेम करना जानता है। केवल ज्ञानी ही सच्चा मित्र होता है।” किन्तु कृतज्ञता तो प्रेम और मित्रता, दोनों का ही एक अंग है। वास्तव में, कृतज्ञता का व्यवहार सच्ची मित्रता की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है और अधिक लोगों पर लागू होता है। फिर वही मेट्रोडोरस इस बात पर भी आश्चर्य करते हैं कि हम कहते हैं,“सच्ची निष्ठा केवल ज्ञानी में ही होती है।” मानो वे स्वयं ऐसा नहीं कहते हों! क्या तुम सचमुच यह मानते हो कि जो व्यक्ति कृतज्ञ होना ही नहीं जानता, वह निष्ठावान हो सकता है? अतः लोगों को यह आरोप लगाना छोड़ देना चाहिए कि हम ऐसी बातें कहते हैं जिन पर कोई विश्वास नहीं कर सकता।

    उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ज्ञानी के भीतर जो दिखाई देता है, वह स्वयं सदाचार होता है जबकि सामान्य मनुष्य में केवल सदाचार की छाया या उसका आभास दिखाई देता है। ज्ञानी के अतिरिक्त कोई भी वास्तविक अर्थ में कृतज्ञ होना नहीं जानता। यह अवश्य है कि मूर्ख व्यक्ति भी अपनी समझ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार कृतज्ञता प्रकट करता है। उसमें कमी उसकी सद्भावना की नहीं बल्कि उसके ज्ञान की होती है क्योंकि सद्भावना ऐसी वस्तु नहीं है जिसे सिखाया जाना पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति के सभी पक्षों का परस्पर संबंध देखकर उनका मूल्यांकन करता है। क्योंकि एक ही कार्य का महत्व समय, स्थान और उसके पीछे के उद्देश्य के अनुसार बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है। उचित समय पर दिए गए एक हजार डेनारियस किसी परिवार के लिए कभी-कभी उससे कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, जितना कि अनुचित समय पर उस पर पूरा धन-भंडार लुटा देना। इससे भी बहुत अंतर पड़ता है कि तुम केवल कोई उपहार दे रहे हो या वास्तव में किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता कर रहे हो। तुम्हारी उदारता किसी को विनाश से बचा रही है या केवल उसके लिए कोई उपयोगी वस्तु उपलब्ध करा रही है। अनेक बार उपहार आकार में छोटा होता है किन्तु उसके परिणाम अत्यंत महान होते हैं। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इसमें भी बहुत बड़ा अंतर है कि दिया गया उपहार तुम्हारी अपनी कमाई और संपत्ति से दिया गया है या वह केवल किसी और से प्राप्त उपकार को आगे बढ़ाकर दिया गया है?

    किन्तु जिन बातों पर हम पहले ही पर्याप्त चर्चा कर चुके हैं, उन्हें दोहराने की आवश्यकता नहीं है। जब उपकार और अपकार की तुलना की जाएगी, तब सज्जन व्यक्ति निश्चय ही यह विचार करेगा कि सबसे न्यायसंगत उत्तर क्या होना चाहिए। फिर भी उसका झुकाव उपकार की ओर ही रहेगा; वह उसी पक्ष को अधिक महत्व देगा। ऐसे मामलों में सामाजिक संबंधों और भूमिकाओं का भी बहुत महत्व होता है। कोई कह सकता है, “तुमने मेरे दास पर उपकार किया किन्तु मेरे पिता का अहित किया। तुमने मेरे पुत्र का जीवन बचाया पर मेरे पिता को मुझसे छीन लिया।” ऐसी प्रत्येक तुलना में इन और इसी प्रकार की अन्य परिस्थितियों का भी विचार किया जाएगा। यदि उपकार और अपकार के बीच का अंतर बहुत कम हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे अनदेखा कर देगा। बल्कि यदि अंतर काफी बड़ा भी हो किन्तु उसे स्वीकार करने से निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को कोई हानि न पहुँचती हो अर्थात यदि वह अपकार केवल उसी के व्यक्तिगत हित से संबंधित हो तो भी वह उसे क्षमा कर देगा। संक्षेप में, वह ऐसा व्यक्ति होगा जिससे समझौता करना सरल होगा। वह अपने ऊपर हुए उपकार को स्वीकार करने में उदार होगा और किसी अपकार के कारण पहले किए गए उपकार को निरर्थक मान लेने में अत्यन्त अनिच्छुक होगा। उसकी समस्त प्रवृत्ति और उसकी सभी इच्छाएँ कृतज्ञता और आभार की ओर ही उन्मुख रहेंगी।

    उपकार लौटाने की अपेक्षा उसे प्राप्त करने के लिए अधिक उत्सुक होना एक भूल है। जिस प्रकार ऋण चुकाने वाला व्यक्ति ऋण लेने वाले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होता है, उसी प्रकार हमें भी प्राप्त उपकार के महान ऋण से स्वयं को मुक्त करते समय उससे कहीं अधिक आनंद अनुभव करना चाहिए जितना उपकार प्राप्त करते समय हुआ था। कृतघ्न लोग इस विषय में भी भूल करते हैं। वे अपने धन के लेनदारों का ऋण तो ब्याज सहित चुका देते हैं किन्तु यह समझते हैं कि उपकारों को बिना किसी प्रतिदान के सदा अपने ऊपर रखा जा सकता है।वास्तव में, उपकार का ऋण भी समय बीतने के साथ बढ़ता जाता है। जितनी अधिक देर प्रतिदान करने में होती है, उतना ही अधिक लौटाना चाहिए। जो व्यक्ति बिना किसी 'ब्याज' के उपकार का प्रतिदान करता है, वह कृतघ्न है। अर्थात उसे केवल उपकार के बराबर ही नहीं बल्कि उससे अधिक उत्साह, सम्मान और सद्भावना के साथ उसका प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए जब हम अपने प्राप्त उपकारों और उनके प्रतिदान का हिसाब लगाएँ, तब इस बात को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

    हमें यथासंभव अपनी पूरी कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इसका सबसे बड़ा लाभ अंततः हमारा अपना ही होता है। आखिर कृतज्ञता केवल न्याय नहीं है, जैसा कि सामान्यतः लोग समझते हैं। न्याय का संबंध मुख्यतः दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य से होता है जबकि कृतज्ञता का अधिकांश कल्याण स्वयं हमारे ही भीतर लौटकर आता है। जो व्यक्ति किसी दूसरे का उपकार करता है, वह वास्तव में अपना ही उपकार करता है। मेरा यह अर्थ नहीं है कि जिसे सहायता मिली है, वह आगे किसी और की सहायता करेगा या जिसकी रक्षा की गई है, वह दूसरों की रक्षा करेगा। न ही मेरा आशय यह है कि एक अच्छा कार्य केवल उदाहरण बनकर फिर उसी व्यक्ति के पास लौट आता है। बुरे उदाहरण भी अपने कर्ता के पास लौटते हैं। जिसने दूसरों को अन्याय करना सिखाया हो, जब वही अन्याय उसके साथ होता है तो उसे किसी की सहानुभूति नहीं मिलती। मेरा आशय यह है कि प्रत्येक सद्गुण स्वयं अपना पुरस्कार है। मनुष्य सद्गुणों का पालन किसी पुरस्कार को पाने के लिए नहीं करता। सही कर्म का सबसे बड़ा प्रतिफल यही है कि उसने सही कर्म किया। मैं कृतज्ञता इसलिए नहीं प्रकट करता कि मेरे उदाहरण से कोई दूसरा भी मेरे प्रति अधिक कृतज्ञ हो जाए। मैं कृतज्ञता इसलिए प्रकट करता हूँ क्योंकि ऐसा करना अपने-आप में अत्यंत सुखद और सुंदर कर्म है। मैं कृतज्ञ इसलिए नहीं होता कि यह लाभदायक है बल्कि इसलिए कि यह मेरे लिए प्रिय और आनंददायक है। यदि इसे सिद्ध करने के लिए ऐसी स्थिति आ जाए कि मैं केवल कृतघ्न दिखाई देकर ही अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर सकता हूँ, यदि किसी उपकार का प्रतिदान करने का एकमात्र उपाय यह हो कि लोग मुझे किसी का अहित करने वाला समझें तो भी मैं निःसंकोच बदनामी के बीच अपने सम्मानपूर्ण उद्देश्य को पूरा करूँगा। मेरे विचार में, सद्गुण का मूल्य उससे अधिक कोई नहीं समझता और उसके प्रति उससे अधिक निष्ठावान कोई नहीं होता, जिसने अपनी अंतरात्मा को निर्मल बनाए रखने के लिए अपनी अच्छी प्रतिष्ठा तक का बलिदान दे दिया हो।

    इसलिए, जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारी कृतज्ञता दूसरे व्यक्ति के हित से अधिक तुम्हारे अपने हित के लिए होती है। दूसरे व्यक्ति को तो केवल एक साधारण-सी वस्तु प्राप्त होती है, उसे वही वापस मिल जाता है जो उसने पहले दिया था। परन्तु तुम्हें उससे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तु प्राप्त होती है। ऐसी वस्तु, जो मन की सर्वोत्तम अवस्था से उत्पन्न होती है: कृतज्ञता। यदि दुर्गुण मनुष्य को दुःखी बनाता है और सद्गुण उसे सुखी करता है तथा यदि कृतज्ञता एक सद्गुण है तो तुमने भले ही साधारण-सी वस्तु लौटाई हो। किन्तु बदले में तुमने वह अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली है जिसका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता, एक कृतज्ञ हृदय। ऐसा हृदय केवल दिव्य और धन्य आत्मा ही प्राप्त कर सकती है। 

    इसके विपरीत अवस्था में रहने वाला व्यक्ति भीतर से गहरे असंतोष का अनुभव करता है। जो दूसरों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, वह कभी अपने ही मन की दृष्टि में सम्मानित नहीं हो सकता। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह कह रहा हूँ कि कृतघ्न व्यक्ति भविष्य में कभी दुखी होगा? नहीं, मैं उसे इतना भी समय नहीं देता। वह तो इसी क्षण दुखी है। इसलिए हमें कृतघ्नता से दूसरों के हित के लिए नहीं बल्कि अपने ही हित के लिए बचना चाहिए। मनुष्य की दुष्टता का केवल सबसे छोटा और हल्का भाग ही दूसरों तक पहुँचता है। उसका सबसे घना और सबसे विषैला भाग तो उसी के भीतर रह जाता है और उसी का जीवन दूषित करता रहता है। जैसा कि हमारे मित्र अटालुस कहा करते थे—

“दुर्गुण अपना अधिकांश विष स्वयं ही पी जाता है।”

यह विष उस विष के समान नहीं है जिसे साँप दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए बनाते हैं जबकि स्वयं उससे अप्रभावित रहते हैं। यह तो ऐसा विष है जो सबसे अधिक उसी व्यक्ति को नष्ट करता है जिसके भीतर वह रहता है। कृतघ्न व्यक्ति स्वयं अपने को यातना देता है, स्वयं अपने लिए कष्ट का कारण बनता है। वह अपने ऊपर किए गए उपकारों से घृणा करने लगता है क्योंकि उन्हें लौटाने का दायित्व उसे बोझ प्रतीत होता है। इसलिए वह उन उपकारों के महत्व को कम करके आँकता है, जबकि अपने साथ हुए अपकारों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है।इससे अधिक दुखद स्थिति और क्या हो सकती है कि मनुष्य अपने जीवन में प्राप्त सभी उपकारों को भुला दे जबकि केवल अपने साथ हुए अपकारों को ही स्मरण रखे?

    इसके विपरीत, बुद्धिमत्ता प्रत्येक उपकार के मूल्य को और अधिक बढ़ा देती है। वह उन्हें अपने मन में आदरपूर्वक संजोकर रखती है और उनके निरंतर स्मरण में आनंद का अनुभव करती है। दुष्ट व्यक्ति को उपकार से केवल एक ही सुख मिलता है, और वह भी थोड़े समय के लिए जब वह उपकार प्राप्त कर रहा होता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति का आनंद स्थायी और चिरस्थायी होता है। उसका सुख उपकार प्राप्त करने में नहीं बल्कि इस बात में होता है कि उसे कभी उपकार प्राप्त हुआ था। यही स्मृति उसके लिए सदा बनी रहती है और कभी नष्ट नहीं होती। वह अपने साथ हुए अपकारों को महत्व नहीं देता। वह उन्हें लापरवाही के कारण नहीं बल्कि अपनी इच्छा से भुला देता है। वह हर बात का सबसे बुरा अर्थ नहीं निकालता और न ही अपने दुर्भाग्य के लिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की तलाश करता है। बल्कि दूसरों के अनुचित व्यवहार का कारण भी वह प्रायः भाग्य को ही मान लेता है। वह लोगों के शब्दों या उनके चेहरे के भावों में दोष नहीं खोजता। जो कुछ भी घटित होता है, उसकी वह यथासंभव सद्भावनापूर्ण व्याख्या करता है, और इसी कारण जीवन की कठिनाइयाँ उसके लिए अधिक सहनीय हो जाती हैं। वह उपकारों की अपेक्षा अपकारों को अधिक याद रखने वाला व्यक्ति नहीं होता। जहाँ तक संभव हो, वह लोगों के साथ जुड़े पुराने और अच्छे प्रसंगों को ही स्मरण करता है। जो लोग कभी उसके प्रति उपकारी रहे हों, उनके प्रति वह अपना दृष्टिकोण तब तक नहीं बदलता, जब तक कि उनके अपराध इतने अधिक और इतने स्पष्ट न हो जाएँ कि उन्हें अनदेखा करना असंभव हो। तब भी वह केवल उतना ही बदलता है जितना उस व्यक्ति के पहले उपकार से पूर्व उसका संबंध था। क्योंकि जब अपकार का परिमाण उपकार के बराबर भी हो जाए, तब भी उसके मन में कुछ सद्भावना शेष रहती है। जिस प्रकार किसी न्यायालय में मत बराबर हो जाने पर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया जाता है। प्रत्येक संदिग्ध मामले में उदारता बेहतर पक्ष का समर्थन करती है, उसी प्रकार जब किसी व्यक्ति के अच्छे और बुरे कार्य समान हो जाते हैं, तब बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन में यह मानना छोड़ देता है कि वह उसका ऋणी है। किन्तु वह कृतज्ञ बने रहने की इच्छा नहीं छोड़ता। वह उन लोगों के समान होता है जो ऋण माफ़ हो जाने के बाद भी स्वेच्छा से अपना ऋण चुका देते हैं।

    कोई भी व्यक्ति तब तक सच्चे अर्थों में कृतज्ञ नहीं हो सकता, जब तक वह उन वस्तुओं को अधिक महत्व देना न छोड़ दे जिनके पीछे सामान्य लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। यदि तुम किसी उपकार का वास्तविक प्रतिदान करना चाहते हो तो तुम्हें आवश्यकता पड़ने पर निर्वासन सहने के लिए तैयार रहना होगा। अपना रक्त बहाने के लिए भी तैयार रहना होगा। निर्धनता का सामना करना होगा और कई बार तो अपनी प्रतिष्ठा तक को दाँव पर लगाना होगा तथा ऐसे अपवादों और बदनामी को भी सहना होगा जिसके तुम अधिकारी नहीं हो। कृतज्ञता का मूल्य बहुत बड़ा होता है। वह बिना किसी त्याग के प्राप्त नहीं होती। जब तक हम किसी उपकार की आशा करते रहते हैं, तब तक हमें उससे बढ़कर कोई वस्तु मूल्यवान नहीं लगती। किन्तु जैसे ही वह उपकार हमें प्राप्त हो जाता है, हम उसी का सबसे कम मूल्य आँकने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है कि हम प्राप्त उपकारों को भूल जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमें और अधिक पाने की लालसा लगी रहती है। हमारा ध्यान इस बात पर नहीं रहता कि हमें अब तक क्या-क्या मिल चुका है। हम केवल अगली माँग और अगली प्राप्ति के बारे में सोचते रहते हैं। धन, सम्मान, सत्ता और ऐसी ही अन्य वस्तुएँ जो हमारी दृष्टि में अत्यंत मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उनका मूल्य बहुत कम है। हमें सत्य और सदाचार के मार्ग से भटका देती हैं। हम वस्तुओं का वास्तविक मूल्यांकन करना ही नहीं जानते। इसलिए हमें अपने निर्णयों का आधार लोकमत को नहीं बनाना चाहिए। हमें वस्तुओं के वास्तविक स्वभाव को देखना चाहिए। इन बाहरी वस्तुओं में अपने-आप में ऐसा कुछ भी अद्भुत नहीं है जो हमारे मन को आकर्षित करे। उन्हें आकर्षक बनाने वाली केवल हमारी वह आदत है जिसके कारण हम उनका आदर और प्रशंसा करते आए हैं। वे इसलिए मूल्यवान नहीं मानी जातीं कि वे वास्तव में वांछनीय हैं; बल्कि वे इसलिए वांछनीय प्रतीत होती हैं क्योंकि लोग उन्हें मूल्यवान मानते हैं। इस प्रकार, पहले व्यक्तियों की भूल से समाज में एक भ्रम उत्पन्न होता है, और फिर वही सामाजिक भ्रम आगे चलकर प्रत्येक व्यक्ति को फिर से भ्रमित करता रहता है।

    किन्तु चूँकि हम सामान्यतः लोकमत पर विश्वास करते हैं तो इस विषय में भी हमें उसी पर विश्वास करना चाहिए कि कृतज्ञता से बढ़कर कोई सद्गुण और कोई सम्माननीय गुण नहीं है। सभी राष्ट्र, यहाँ तक कि सबसे असभ्य माने जाने वाले लोग भी इस बात पर एकमत हैं। इस विषय में सज्जन और दुष्ट, दोनों समान रूप से सहमत हैं। कुछ लोग सुख को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं जबकि कुछ कठिन परिश्रम और तपस्या को श्रेष्ठ समझते हैं। कुछ कहते हैं कि दुख सबसे बड़ी बुराई है, तो कुछ का मत है कि दुख बुराई ही नहीं है। कोई धन को सबसे बड़ा शुभ मानता है तो कोई कहता है कि धन मानव जीवन के लिए अभिशाप है। सबसे बड़ा धन वही है जहाँ भाग्य के पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी शेष न हो। इन सब मतभेदों के बावजूद एक बात ऐसी है, जिस पर सभी एक स्वर से सहमत हैं, जब किसी ने हमारा उपकार किया हो तो हमें उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इतने विविध विचारों वाले लोग भी इस एक विषय पर एकमत हैं। फिर भी विडंबना यह है कि अनेक बार हम उपकार के बदले अपकार कर बैठते हैं। लोगों के कृतघ्न होने का पहला कारण यह है कि वे उतने कृतज्ञ हो ही नहीं पाते, जितना उन्हें होना चाहिए।

    यह पागलपन अब इतनी चरम सीमा तक पहुँच गया है कि किसी पर बहुत बड़ा उपकार करना भी अत्यंत जोखिम भरा हो गया है। क्योंकि जिसे उपकार प्राप्त होता है, वह उसका प्रतिदान न कर पाने की लज्जा से इतना व्याकुल हो उठता है कि वह यही चाहता है कि वह व्यक्ति ही न रहे, जिसके प्रति उसे अपना ऋण चुकाना है।जो कुछ तुम्हें दिया गया है, उसे अपने पास ही रहने दो। मैं उसे वापस नहीं माँगता। न मैं उस पर कोई आग्रह करता हूँ। मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी सहायता बिना किसी भय और दंड के कर सकूँ। उस घृणा से अधिक घातक कोई घृणा नहीं होती, जो इस लज्जा से उत्पन्न होती है कि मनुष्य किसी के उपकार का उचित प्रतिदान नहीं कर सका और इस प्रकार उस उपकार को व्यर्थ जाने दिया।


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भावनात्मक आवेग के बारे में -- पत्र - 83

 प्रिय लूसीलियस  मैंने सोचा था कि शेष जटिल तर्कों को छोड़कर तुम्हें कुछ राहत दूँ। मेरा विचार था कि केवल इतना ही बता दूँ कि हमारा दर्शन किस प...