Friday, 3 July 2026

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26

 प्रिय लूसीलियस 

कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका हूँ। अब मेरी आयु और निश्चित रूप से मेरा शरीर, किसी दूसरे नाम के योग्य हैं। क्योंकि 'वृद्ध' शब्द उस आयु के लिए है जो बहुत आगे बढ़ चुकी हो न कि उस अवस्था के लिए जिसमें शरीर टूटने-बिखरने लगे। इसलिए मुझे उन जर्जर लोगों में गिनो जो जीवन के अंतिम छोर के बहुत निकट पहुँच चुके हैं।

जैक्स लुईस डेविड द्वारा 

    फिर भी, मैं तुम्हारी उपस्थिति में स्वयं को धन्यवाद देता हूँ कि जहाँ मुझे अपने शरीर में दुर्बलता का अनुभव होता है वहीं अपने मन में मुझे किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता। केवल मेरे दोष ही बूढ़े हुए हैं। मेरे वे हिस्से जो उन दोषों की सेवा करते हैं। मेरा मन अब भी स्फूर्तिवान है और इस बात से प्रसन्न है कि उसे मेरे शरीर के साथ बहुत कम काम करना पड़ता है। उसने अपने बोझ का बड़ा भाग उतार फेंका है। वह मानो उछल-कूद कर रहा है और बुढ़ापे के विषय में मुझसे वाद-विवाद करता है। उसका कहना है कि यही उसका उत्कर्षकाल है। आओ, उसकी बात पर विश्वास करें और उसे उसके स्वाभाविक एवं उचित लाभों का पूरा उपयोग करने दें।

    मेरा मन मुझसे कहता है कि मैं इस विषय पर विचार करूँ और यह समझूँ कि मेरी शांति तथा संयमित जीवन-शैली में कितना योगदान बुद्धि का है और कितना मेरी आयु का। साथ ही, मुझे सावधानी से यह भेद करना चाहिए कि कौन-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं कर नहीं सकता और कौन-सी ऐसी हैं जिन्हें मैं करना ही नहीं चाहता। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ऐसी बात हो जिसे न कर पाने पर मुझे प्रसन्नता होती है तो मैं उसे ऐसी चीज़ मानूँ जिसे मैं करना ही नहीं चाहता। शिकायत करने की आखिर क्या बात है? यदि वह सब, जिसका समाप्त होना आवश्यक था, वास्तव में समाप्त हो गया है तो इसमें समस्या ही क्या है?

    “यह तो बहुत बड़ी समस्या है,” तुम कहते हो, “कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे मुरझाए और नष्ट हो जाए और यदि ठीक-ठीक कहूँ तो पिघलता चला जाए। क्योंकि हम एक ही झटके में धराशायी नहीं होते; बल्कि हम थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हैं, क्योंकि हर दिन हमारी शक्ति का कुछ अंश छीन लेता है।” तो यदि हमारा स्वभाव इसी प्रकार धीरे-धीरे अपने अंत की ओर ढल रहा है तो क्या इससे बेहतर कोई मार्ग हो सकता है? ऐसा नहीं कि अचानक आघात से या जीवन से तत्काल विदा हो जाना कोई बुरी बात है किन्तु यह तो सबसे सहज मार्ग है, बस चुपचाप फिसलते हुए चले जाना।

    जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं स्वयं को ऐसे परखता हूँ मानो परीक्षा की घड़ी निकट आ रही हो, मानो वह दिन सामने खड़ा हो जो मेरे समस्त वर्षों का निर्णय करने वाला है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “अब तक मेरे शब्द और कर्म कुछ भी सिद्ध नहीं करते। वे तो साहस के केवल छोटे और भ्रामक प्रमाण हैं, जो बहुत-सी डींगों और खोखली बातों में लिपटे हुए हैं। मृत्यु ही मुझे बताएगी कि मैंने वास्तव में कितनी प्रगति की है।” इसीलिए मैं निडर होकर उस दिन की तैयारी करता हूँ जब सारे छल और सारे मुखौटे उतर जाएँगे और मैं स्वयं अपना न्याय करूँगा। क्या यह केवल साहसपूर्ण बातें हैं या मैं वास्तव में वही कहता हूँ जो सोचता हूँ? भाग्य के विरुद्ध जो चुनौतीपूर्ण शब्द मैंने कहे थे, क्या वे सचमुच वास्तविक थे या वे केवल रंगमंच का अभिनय थे—सिर्फ़ एक भूमिका निभाना?

    “दूसरों के आकलनों को दूर फेंक दो। वे हमेशा अविश्वसनीय और परस्पर विरोधी होते हैं। जीवनभर चलने वाले अध्ययन-कार्यक्रमों को भी छोड़ दो क्योंकि शीघ्र ही, अब किसी भी क्षण, मृत्यु तुम्हारा निर्णय करने वाली है। मेरा आशय यही है। व्याख्यान, विद्वत्-गोष्ठियाँ, दार्शनिकों की शिक्षाओं से चुने गए कथन और शिक्षित लोगों की बातचीत—ये सब मन की वास्तविक शक्ति को प्रकट नहीं करते। क्योंकि वाणी तो वहाँ भी निर्भीक होती है जहाँ बोलने वाला व्यक्ति अत्यन्त भयभीत होता है। तुमने वास्तव में क्या प्राप्त किया है, यह तभी प्रकट होगा जब तुम अपनी अंतिम साँस लोगे। मैं इस निर्णय को स्वीकार करता हूँ, उसके न्याय से मैं तनिक भी नहीं डरता।”

    ये बातें मैं अपने आप से कहता हूँ लेकिन मान लो कि मैंने इन्हें तुमसे भी कही हैं। तुम मुझसे युवा हो पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है? वर्षों का वितरण किसी निश्चित हिस्से या कोटे के अनुसार नहीं किया जाता। यह जानने का कोई उपाय नहीं कि मृत्यु किस मोड़ पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए तुम्हें हर मोड़ पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

    अच्छा, मैं यहीं रुकना चाहता था। मेरा हाथ पत्र समाप्त करने के लिए हस्ताक्षर करने ही वाला था। लेकिन मुझे हिसाब चुकता करना है और इस पत्र को उसकी यात्रा-व्यय राशि भी देनी है। मान लो कि मैं यह न बताऊँ कि मैं अपना ऋण कहाँ से ले रहा हूँ। तुम जानते ही हो कि मैं किसकी धन-पेटी का उपयोग करता हूँ। मुझे थोड़ा समय दो। भुगतान घर से आ जाएगा तब तक के लिए यह उधार एपिक्यूरियस देगा। वह कहता है, “मृत्यु का अभ्यास करो।” यदि इस विचार को अधिक पूर्ण रूप में बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए, “मृत्यु को भली-भाँति समझना और सीख लेना एक उत्कृष्ट बात है।”

    शायद तुम सोचते हो कि ऐसी चीज़ सीखना समय की बर्बादी है जिसका उपयोग तुम्हें केवल एक ही बार करना होगा। लेकिन यही तो कारण है कि हमें उसका अभ्यास करना चाहिए। यदि हम यह परख ही नहीं सकते कि हमने उसे सीखा है या नहीं, तो हमें उसे निरंतर सीखते रहना चाहिए। “मृत्यु का अभ्यास करो”, जो यह कहता है, वह वास्तव में हमें स्वतंत्रता का अभ्यास करने को कहता है। जिसने मृत्यु को सीख लिया, उसने दासता को भुला दिया। क्योंकि मृत्यु सभी शक्तियों से ऊपर है और निस्संदेह उन सबकी पहुँच से बाहर है। मृत्यु को कारागार, बेड़ियों या कैदखाने से क्या लेना-देना? उसका द्वार तो सदा खुला रहता है। केवल एक ही जंजीर है जो हमें बाँधे रखती है—जीवन के प्रति हमारा मोह। यह सच है कि हम उसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते। फिर भी हमें उसे कम अवश्य करना चाहिए ताकि जब परिस्थितियाँ हमसे कुछ माँगें तो कोई चीज़ हमें रोक न सके और न ही हमें उस कार्य को तुरंत करने के लिए तैयार होने से वंचित करे जिसे किसी न किसी दिन करना ही है।

हर कार्य इस प्रकार करो मानो एपिक्यूरस तुम्हें देख रहा हो-- पत्र - 25 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

जहाँ तक हमारे उन दो मित्रों का संबंध है, हमें प्रत्येक के साथ अलग ढंग से व्यवहार करना चाहिए। एक के दोषों को दूर करने की आवश्यकता है जबकि दूसरे के दोषों को तोड़कर समाप्त करने की। मैं पूरी स्पष्टवादिता का प्रयोग करूँगा, यदि मैं उसे अप्रसन्न नहीं करता तो मैं उससे प्रेम नहीं करता।

मॉर्गन श्वेतज़र द्वारा 

    “क्या?” तुम कहते हो। “क्या तुम चालीस वर्ष के एक शिष्य को अपने संरक्षण में लेने का इरादा रखते हो? उसकी आयु का विचार करो जो अब कठोर हो चुकी है और जिसे संभालना कठिन है। उसे फिर से नहीं ढाला जा सकता। वस्तुओं को तभी आकार दिया जाता है जब वे नरम हों।” मुझे नहीं पता कि मैं सफल होऊँगा या नहीं लेकिन मैं उसके प्रति अपने कर्तव्य में असफल होने की अपेक्षा अपने प्रयास में असफल होना अधिक पसंद करूँगा। तुम्हें भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। यदि तुम असंयम के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े हो जाओ और उन्हें बार-बार उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने तथा कुछ सहने के लिए बाध्य करो तो लंबे समय से बीमार लोग भी स्वस्थ किए जा सकते हैं।

    मुझे दूसरे व्यक्ति के बारे में भी बहुत अधिक विश्वास नहीं है सिवाय इस बात के कि वह अभी भी अपने दुष्कर्मों पर लज्जित हो जाता है। हमें उस लज्जा-बोध का पोषण करना चाहिए। एक बार वह उसके मन में दृढ़ हो जाए तो आशा के लिए कुछ स्थान रहेगा। चूँकि वह इस मामले में पुराना अभ्यस्त है, मुझे लगता है कि हमें उसके साथ पहले वाले की अपेक्षा अधिक कोमलता से व्यवहार करना चाहिए ताकि वह स्वयं से ही निराश न हो जाए। उसके पास जाने का इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा, जितना अभी है, जब वह एक शांत अवधि में है, जब उसमें एक सुधरे हुए चरित्र की झलक दिखाई देती है। उसकी यह शांति दूसरों को धोखा दे चुकी है पर मुझे नहीं। मैं अपेक्षा करता हूँ कि उसके दोष फिर लौटेंगे और पहले से अधिक प्रबल रूप में लौटेंगे क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे समाप्त नहीं हुए हैं बल्कि केवल कुछ समय के लिए दबे हुए हैं। मैं इस विषय पर कुछ दिन लगाऊँगा और पता करूँगा कि कुछ किया जा सकता है या नहीं।

    जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, अपना साहस दिखाओ। जैसा कि तुम दिखाते भी हो और अपना बोझ हल्का करो। जिन वस्तुओं के हम स्वामी हैं उनमें से एक भी आवश्यक नहीं है। हमें केवल प्रकृति के नियम की ओर लौटना है और तब संपदा हमारे लिए तैयार और उपलब्ध मिलेगी। जिसकी हमें आवश्यकता है, वह या तो निःशुल्क है या बहुत सस्ता। रोटी और पानी ही वे चीज़ें हैं जिनकी माँग प्रकृति करती है। इनके लिए कोई भी इतना गरीब नहीं होता। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को इन्हीं तक सीमित कर लेता है, वह सुख-समृद्धि में जुपिटर के साथ भी प्रतिस्पर्धा कर सकता है, जैसा कि एपिक्यूरस कहता है। और एपिक्यूरस की बात चली है तो मैं इस पत्र में उसका एक सूत्र-वाक्य भी संलग्न कर रहा हूँ। वह कहता है, “हर कार्य इस प्रकार करो मानो एपिक्यूरस तुम्हें देख रहा हो।”

    निस्संदेह, अपने ऊपर निगरानी रखना और किसी ऐसे व्यक्ति को आदर्श बनाना लाभदायक है जिसकी उपस्थिति तुम्हारे आचरण और योजनाओं में अंतर ला सकती हो। और निश्चय ही यह कहीं अधिक महान है कि तुम इस प्रकार जीवन बिताओ मानो कोई श्रेष्ठ पुरुष सदा तुम्हारे सामने उपस्थित हो और तुम्हें देख रहा हो। लेकिन मैं इससे भी कम पर संतुष्ट हूँ। तुम्हारा प्रत्येक कार्य इस प्रकार हो मानो कोई उसे देख रहा हो। एकांत हमारे भीतर हर प्रकार के दोष को प्रोत्साहित करता है। जब तुम इतनी प्रगति कर लो कि स्वयं अपने प्रति भी श्रद्धा रखने लगो, तब तुम अपने मार्गदर्शक को विदा कर सकते हो लेकिन तब तक अपने आपको किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के संरक्षण में रखो। वह कैटो हो या स्किपियो या लेलियस या कोई और ऐसा व्यक्ति, जिसकी उपस्थिति में अत्यन्त दुष्ट स्वभाव के लोग भी अपने दोषों को दबा लें। इसी बीच, स्वयं को ऐसा व्यक्ति बनाने का प्रयास करो जिसकी संगति में तुम स्वयं भी कोई गलत काम करने का साहस न कर सको।

    जब तुम ऐसा कर लोगे और अपनी ही दृष्टि में कुछ सम्मान प्राप्त करने लगोगे तब मैं तुम्हें वह करने की अनुमति देना शुरू करूँगा जिसकी सलाह एपिक्यूरस भी देता है, “विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ, जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो।”

    तुम्हें स्वयं को बहुत से लोगों से अलग रखना चाहिए, जब तक कि तुम उस स्थिति में न पहुँच जाओ जहाँ अकेले रहना तुम्हारे लिए सुरक्षित हो। उनमें से प्रत्येक को अलग-अलग देखकर विचार करो। ऐसा एक भी नहीं है जो किसी और की संगति की अपेक्षा अपनी ही संगति में अधिक अच्छा हो। विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो। बशर्ते कि तुम एक अच्छे, शांत और संयमी व्यक्ति हो। अन्यथा तुम्हें अपने आप से दूर होकर भीड़ में चले जाना चाहिए। जहाँ तुम अभी हो, वहाँ तुम एक बुरे आदमी के बहुत निकट हो।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 24 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम लिखते हो कि तुम्हें उस मुकदमे के परिणाम की चिंता है जिसे तुम्हारे किसी शत्रु के क्रोध ने तुम्हारे विरुद्ध खड़ा कर दिया है। तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम अपना ध्यान सबसे अच्छे संभावित परिणाम पर केंद्रित करो और आशावादी अपेक्षाओं से अपने मन को शांत करो। आख़िर भविष्य की परेशानियों को पहले ही क्यों झेलना? भविष्य के भय से वर्तमान को नष्ट करने का क्या लाभ? जब कष्ट वास्तव में आएँगे, तब उन्हें सहने का समय होगा। निश्चय ही यह मूर्खता है कि कोई व्यक्ति अभी से दुखी हो जाए केवल इसलिए कि वह बाद में दुखी हो सकता है।


By Suza 

    लेकिन मैं तुम्हें मन की शांति की ओर एक अलग मार्ग से ले जाऊँगा। यदि तुम चिंता से मुक्त होना चाहते हो तो जिस बात के होने से तुम डरते हो, उसे अपने मन में निश्चित रूप से होने वाली घटना मान लो। जो भी वह संभावित बुरी घटना हो, उसका मन ही मन आकलन करो और इस प्रकार अपने भय का सही मूल्यांकन करो। तब तुम्हें शीघ्र ही यह समझ में आ जाएगा कि जिससे तुम डरते हो, वह या तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है या फिर उसका प्रभाव अधिक समय तक रहने वाला नहीं है।

    और तुम्हें साहस देने के लिए मुझे उदाहरण खोजने में भी अधिक समय नहीं लगाना पड़ेगा। हर युग ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। तुम अपनी स्मृति को चाहे सार्वजनिक जीवन की घटनाओं की ओर मोड़ो या निजी जीवन की ओर। तुम्हें ऐसे लोग याद आ जाएँगे जो या तो उच्च चरित्र वाले थे या असाधारण साहस से संपन्न थे। मान लो कि तुम्हें दोषी ठहरा दिया जाए, तब तुम्हारे साथ इससे अधिक बुरा क्या हो सकता है कि तुम्हें निर्वासित कर दिया जाए या जेल में डाल दिया जाए? और क्या इससे भी अधिक भयावह कुछ है कि तुम्हें जला दिया जाए या मृत्यु दे दी जाए? इनमें से प्रत्येक परिस्थिति पर अलग-अलग विचार करो और उन लोगों को याद करो जिन्होंने इन बातों को बहुत महत्व नहीं दिया। तुम्हें उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी बल्कि तुम्हारे पास चुनने के लिए अनेक उदाहरण होंगे। रुटिलियस ने अपने दोषसिद्ध होने को इस प्रकार सहन किया मानो उसे केवल इस बात का दुख हो कि उसका गलत मूल्यांकन किया गया था। मेटेलस ने निर्वासन को साहसपूर्वक सहा और रुटिलियस ने तो उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। जहाँ मेटेलस ने अपने देश के हित में वापस लौटना सुनिश्चित किया, वहीं रुटिलियस ने लौटने से इनकार कर दिया ताकि वह सुला का विरोध न करे क्योंकि उस समय सुला का कोई विरोध नहीं कर रहा था। सुकरात ने जेल में रहते हुए भी लोगों को शिक्षा देना जारी रखा। और यद्यपि वहाँ ऐसे लोग मौजूद थे जो उसके भागने की व्यवस्था कर सकते थे, उसने जेल छोड़ने से इनकार कर दिया। वह वहीं रुका रहा क्योंकि उसका उद्देश्य मानव जाति के दो सबसे बड़े भय— मृत्यु और कारावास, को समाप्त कर देना था।

    म्यूशियस ने अपना हाथ स्वयं अग्नि की लपटों में रख दिया। जलना अपने आप में ही एक कठिन बात है लेकिन जब कोई स्वयं ही अपने को जलाने का कारण बने, तब वह और भी अधिक कठिन हो जाता है। देखो, एक ऐसा व्यक्ति, जिसने कोई विशेष शिक्षा नहीं पाई थी, जिसे मृत्यु या पीड़ा के विषय में कोई दार्शनिक उपदेश नहीं मिला था और जो केवल एक सैनिक की कठोरता से सुसज्जित था, अपने असफल प्रयास के लिए स्वयं को दंड दे रहा था। वह अपनी दाहिनी हथेली को शत्रु की अंगीठी पर जलते हुए देखता रहा। उसका मांस हड्डियों से अलग होता जा रहा था। फिर भी उसने अपना हाथ नहीं हटाया, जब तक कि शत्रु ने स्वयं उसके नीचे की आग बुझा नहीं दी। उस शिविर में वह और भी कई ऐसे कार्य कर सकता था जो अधिक सुखद होते लेकिन उससे अधिक साहसपूर्ण कोई कार्य नहीं हो सकता था। देखो, संकटों का सामना करने में सद्गुण (वीरता) कितनी अधिक प्रबल होती है जबकि उन्हें दूसरों पर थोपने में क्रूरता उतनी प्रबल नहीं होती। पोर्सेन्ना के लिए म्यूशियस को उसकी हत्या का प्रयास करने के अपराध के लिए क्षमा कर देना उतना कठिन नहीं था, जितना म्यूशियस के लिए अपने असफल हो जाने पर स्वयं को क्षमा करना कठिन था।

    “तुम कहोगे, ‘ये कथाएँ तो सभी दार्शनिक विद्यालयों में बार-बार सुनाई जाती हैं। जैसे ही तुम मृत्यु को तुच्छ बताने लगोगे, तुम मुझे कैटो की कहानी सुनाने लगोगे।’” और मैं कैटो की बात क्यों न करूँ? उसकी अंतिम रात की बात, जब वह अपने सिरहाने रखी तलवार के पास बैठकर प्लेटो की पुस्तक पढ़ रहा था। अपने अंतिम क्षण के लिए उसने दो ही वस्तुएँ चुनी थीं—एक, ताकि वह मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार हो सके और दूसरी, ताकि यदि आवश्यक हो तो वह उसे प्राप्त भी कर सके। जब उसने अपने सभी कार्यों को, जितना कि उस टूटी-बिखरी और निराशाजनक परिस्थिति में संभव था, व्यवस्थित कर लिया, तब उसने निश्चय किया कि वह ऐसा कदम उठाएगा जिससे किसी व्यक्ति को न तो कैटो की हत्या करने का अवसर मिले और न ही उसे बचाने का। उसने अपनी तलवार निकाली, जिसे उसने उस दिन तक किसी भी हिंसक कार्य से कलंकित नहीं होने दिया था और कहा, “हे भाग्य! मेरे सभी प्रयासों का विरोध करके भी तुमने वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। अब तक मैं अपनी स्वतंत्रता के लिए नहीं बल्कि अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ता रहा हूँ। मेरा उद्देश्य स्वतंत्र होकर जीना नहीं था बल्कि स्वतंत्र लोगों के बीच जीना था। अब जबकि मानवता के लिए वह आशा नष्ट हो चुकी है तो कैटो को सुरक्षित स्थान पर जाने दो।” यह कहकर उसने अपनी देह पर वह प्रहार किया जो उसके लिए मृत्यु का कारण बना। जब चिकित्सकों ने उसके घाव पर पट्टी बाँध दी, तब उसके शरीर में रक्त भी बहुत कम बचा था और शक्ति भी परन्तु उसका साहस और आत्मबल पहले जितना ही अडिग था। अब वह केवल सीज़र के प्रति ही नहीं बल्कि स्वयं अपने प्रति भी कठोर था। उसने अपने नंगे हाथ घाव के भीतर डाल दिए और उस महान आत्मा को, जो किसी भी प्रकार के प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, मुक्त कर दिया; उसने उसे केवल जाने नहीं दिया बल्कि मानो बलपूर्वक अपने शरीर से बाहर निकाल दिया।

    मैं इन उदाहरणों को केवल साहित्यिक प्रदर्शन के लिए नहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ बल्कि तुम्हें उन बातों से न डरने के लिए प्रेरित कर रहा हूँ जो सबसे अधिक भयावह प्रतीत होती हैं। और यह मेरे लिए अधिक सरल होगा यदि मैं तुम्हें यह दिखा सकूँ कि केवल महान और शक्तिशाली पुरुषों ने ही उस क्षण को तुच्छ नहीं समझा, जब आत्मा शरीर को छोड़ती है बल्कि ऐसे लोग भी, जो अन्य बातों में साधारण या कमजोर थे, इस विषय में सबसे वीर पुरुषों के समान साहस दिखा चुके हैं। उदाहरण के लिए, ग्नियस पोम्पेई के श्वसुर स्किपियो को लो। प्रतिकूल हवा के कारण उन्हें अफ्रीका की ओर लौटना पड़ा और जब उन्होंने देखा कि उनका जहाज़ शत्रुओं के हाथ में पड़ चुका है तो उन्होंने अपनी तलवार अपने शरीर में भोंक ली। जब लोगों ने पूछा कि सेनापति कहाँ हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, “सेनापति कुशल हैं।” इस एक वाक्य ने उन्हें उनके पूर्वजों के समकक्ष ला खड़ा किया और अफ्रीका में स्किपियो वंश के लिए नियत गौरवशाली प्रतिष्ठा को बनाए रखा। कार्थेज को जीतना एक महान उपलब्धि थी लेकिन मृत्यु पर विजय प्राप्त करना उससे भी बड़ी उपलब्धि थी। “सेनापति कुशल हैं।” एक सेनापति को और कैसे मरना चाहिए था? और कैटो के सेनापति को भला और कैसे मरना चाहिए था?

    मैं तुम्हें इतिहास की पुस्तकों की ओर वापस नहीं भेज रहा हूँ। न ही मैं हर युग से उन लोगों के उदाहरण एकत्र करने जा रहा हूँ जिन्होंने मृत्यु को तुच्छ समझा था, यद्यपि ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। अपने ही समय की ओर देखो। उस समय की ओर जिसे हम अत्यन्त आलसी और विलासप्रिय कहा करते हैं। वह भी हमें हर पद, हर वर्ग और हर आयु के ऐसे लोग दिखा देगा जिन्होंने मृत्यु को अपनाकर अपनी विपत्तियों का अंत कर लिया। मुझ पर विश्वास करो, लूसीलियस! मृत्यु में इतना कम भय है कि उसकी कृपा से अन्य कोई भी वस्तु भयावह नहीं रह जाती। इसलिए अपने शत्रु के अभियोग को बिना विचलित हुए सुनो। तुम्हारा निर्मल अंतःकरण तुम्हें आत्मविश्वास रखने का पर्याप्त कारण देता है। फिर भी, क्योंकि परिणाम पर अनेक बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है इसलिए सर्वोत्तम की आशा रखो, किन्तु स्वयं को सबसे बुरे के लिए भी तैयार रखो।

    सबसे बढ़कर यह याद रखो कि अपने मन की घबराहट और हलचल को दूर करो। प्रत्येक वस्तु के भीतर झाँककर देखो, तब तुम समझ जाओगे कि तुम्हारे मामलों में भय करने योग्य कोई चीज़ नहीं है, सिवाय स्वयं भय के। तुम देखते हो कि बच्चे उन लोगों से, जिन्हें वे प्यार करते हैं, जानते हैं और जिनके साथ खेलते हैं, बहुत डर जाते हैं यदि वे उन्हें मुखौटा पहने हुए देखें। ठीक यही बात हमारे साथ भी होती है, हम केवल थोड़ा बड़े बच्चे हैं। लेकिन हमारे मामले में केवल लोगों के चेहरे से ही नहीं बल्कि घटनाओं से भी मुखौटा हटाने की आवश्यकता है ताकि उनका वास्तविक स्वरूप हमारे सामने प्रकट हो सके।

    “तुम मुझे तलवारों, मशालों और अपने पीछे चलने वाले जल्लादों का यह प्रदर्शन क्यों दिखा रहे हो? इस दिखावे को दूर हटाओ। जिसे तुम मूर्खों को डराने के लिए अपने सामने खड़ा करते हो। तुम तो केवल मृत्यु हो, जिसे हाल ही में मेरे दास और यहाँ तक कि मेरी दासी भी तुच्छ समझ चुके हैं। तुम फिर से मेरी आँखों के सामने कोड़ों और यातना-यंत्रों का यह विशाल प्रदर्शन क्यों कर रहे हो? शरीर के प्रत्येक जोड़ को पीड़ा देने के लिए विशेष रूप से बनाए गए इन उपकरणों का क्या प्रयोजन है? मनुष्य को टुकड़ा-टुकड़ा करके तोड़ने वाली इन असंख्य युक्तियों का क्या अर्थ है? अपने इन भयावह उपकरणों को एक ओर रख दो। इन कराहों को, इन चीखों को और कोड़ों से निकलवाई गई इन तीखी पुकारों को शांत होने दो। तुम तो केवल पीड़ा हो जिसे वहाँ वह गठिया से पीड़ित व्यक्ति तुच्छ समझता है, जिसे अपच का रोगी अपने विलासपूर्ण भोजनों के बीच सह लेता है और जिसे एक साधारण युवती प्रसव के समय सहन कर लेती है। यदि मैं तुम्हें सह सकता हूँ तो तुम तुच्छ हो। यदि मैं तुम्हें सह नहीं सकता तो तुम अल्पकालिक हो।”

    इन शब्दों पर अपने मन में गहराई से विचार करो। तुम इन्हें अनेक बार सुन चुके हो और स्वयं भी कह चुके हो। लेकिन जो कुछ तुमने सुना और कहा है, वह वास्तव में सत्य है या नहीं, यह तुम्हें अपने आचरण और परिणामों से सिद्ध करना होगा। क्योंकि हमारे विरुद्ध सबसे लज्जाजनक आरोप यही है कि हम दर्शन की बातें तो करते हैं पर उसके अनुसार आचरण नहीं करते। तो फिर! मृत्यु, निर्वासन और पीड़ा तुम्हारे सामने खड़े हैं। क्या तुम्हें पहली बार इसका पता चला है? तुम तो इन्हीं बातों का सामना करने के लिए जन्मे हो। जो कुछ भी घटित हो सकता है उसके बारे में ऐसे विचार करो मानो वह निश्चित रूप से घटित होने वाला है।

    मुझे पता है कि जिन बातों की मैं तुम्हें सलाह दे रहा हूँ उन्हें तुम पहले ही कर चुके होगे। अब मेरी आगे की सलाह यह है कि इस मामले की चिंता को अपने मन पर इतना हावी मत होने दो कि वह तुम्हारी बुद्धि और शक्ति को कुंठित कर दे। यदि तुम ऐसा करोगे तो जब स्वयं को संभालने और सक्रिय करने का समय आएगा, तब तुम्हारे पास कम ऊर्जा होगी। अपने विचारों को अपनी व्यक्तिगत परिस्थिति से हटाकर समस्त मानव जाति की स्थिति की ओर मोड़ो। अपने आप से कहो कि यह तुच्छ शरीर नश्वर है और दुर्बल भी। इसे केवल अन्यायपूर्ण आक्रमणों या अधिक शक्तिशाली शत्रुओं से ही पीड़ा का भय नहीं है। इसके अपने सुख भी अंततः कष्ट में बदल जाते हैं। भोज इसे अपच का शिकार बना देते हैं। मद्यपान की महफ़िलें शरीर में कंपन और नसों की शिथिलता उत्पन्न कर देती हैं। वासनाएँ हाथों-पैरों तथा शरीर के सभी जोड़ों में विकृतियाँ और रोग पैदा कर देती हैं।
   
     “मैं निर्धन हो जाऊँगा।” तो मैं अनेक लोगों में से एक हो जाऊँगा। “मुझे निर्वासित कर दिया जाएगा।” तो मैं अपने निर्वासन के स्थान को ही अपना जन्मस्थान मान लूँगा। “मुझे बेड़ियों में जकड़ दिया जाएगा।” तो क्या हुआ? क्या मैं अभी वास्तव में बंधनों से मुक्त हूँ? प्रकृति ने तो पहले ही मुझे मेरे इस भारी शरीर के बंधन में जकड़ रखा है। “मैं मर जाऊँगा।” तुम वास्तव में यह कह रहे हो कि मैं अब बीमारी, कारावास और मृत्यु के भय के अधीन नहीं रहूँगा।
    
    मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि यहाँ तुम्हें एपिक्यूरस का वह गीत सुनाने लगूँ कि नरक का भय निरर्थक है,  कि इक्सियोन किसी चक्र पर नहीं घूम रहा, न ही सिसिफस किसी चट्टान को पहाड़ी पर चढ़ाने के लिए निरंतर धकेल रहा है और न ही किसी मनुष्य की अंतड़ियाँ प्रतिदिन खाई जाती हैं और फिर से उत्पन्न हो जाती हैं। कोई भी इतना बच्चा नहीं है कि सेर्बेरस, अंधकार या भूत-प्रेत जैसी कंकालाकार आकृतियों से डर जाए। मृत्यु या तो हमें पूरी तरह समाप्त कर देती है या हमें मुक्त कर देती है। यदि वह हमें मुक्त करती है तो इस शरीर के बोझ से छुटकारा पाने के बाद हमारे लिए बेहतर चीज़ें प्रतीक्षारत हैं। और यदि वह हमें समाप्त कर देती है तो फिर हमारे लिए कुछ भी शेष नहीं रहता तब न अच्छाइयाँ बचती हैं और न बुराइयाँ।
    
    मुझे इस अवसर पर तुम्हारी अपनी कविता की याद दिलाने दो और सबसे पहले तुम्हें यह सलाह देने दो कि यह मानो कि तुमने उसे केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए भी लिखा था। एक बात कहना और दूसरी बात सोचना लज्जाजनक है लेकिन एक बात लिखना और दूसरी बात सोचना उससे भी अधिक लज्जाजनक है। मुझे याद है कि एक बार तुमने इस विचार का विस्तार किया था, “हम मृत्यु से एक ही बार में नहीं मिलते। हम उसकी ओर थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते हैं।” हम प्रतिदिन मरते हैं क्योंकि हर दिन हमारे जीवन का कोई न कोई भाग हमसे छिन जाता है। यहाँ तक कि जब हम बढ़ रहे होते हैं तब भी हमारा जीवन घट रहा होता है। हमने अपना शैशव खो दिया, फिर बचपन, फिर युवावस्था। कल तक का सारा समय बीतने के साथ ही हमसे छिन गया और आज का दिन भी बीतते-बीतते मृत्यु के हिस्से में चला जाता है। जैसे जलघड़ी केवल अपनी अंतिम बूँद से ही खाली नहीं होती बल्कि उन सभी बूँदों से भी जो उससे पहले टपक चुकी होती हैं उसी प्रकार हमारे जीवन का अंतिम क्षण ही वह समय नहीं है जब हम मरते हैं। वह तो केवल वह क्षण है जब हमारा मरना पूरा होता है। उस समय हम मृत्यु तक पहुँचते हैं लेकिन वहाँ पहुँचने की यात्रा हम बहुत पहले से करते आ रहे होते हैं। जब तुमने अपनी स्वाभाविक प्रभावशाली शैली में इन सब बातों को समझाया था। तुम सदैव ही एक उत्कृष्ट वक्ता रहे हो किन्तु सत्य को व्यक्त करते समय सबसे अधिक प्रभावशाली होते हो—तब तुमने कहा था, "मृत्यु कोई एक घटना नहीं है। जो मृत्यु हमें अपने साथ ले जाती है वह केवल हमारी अंतिम मृत्यु होती है।

    मैं चाहूँगा कि तुम मेरा पत्र पढ़ने के बजाय स्वयं को पढ़ो। तब तुम्हारे लिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस मृत्यु से हम डरते हैं वह हमारी अंतिम मृत्यु तो है किन्तु हमारी एकमात्र मृत्यु नहीं है।

    मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी नज़र कहाँ है! तुम यह जानने की कोशिश कर रहे हो कि मैंने इस पत्र में क्या छिपाकर रखा है। किसी लेखक का कौन-सा प्रेरणादायक कथन या कौन-सा उपयोगी उपदेश। मैं तुम्हें उसी विषय से एक बात भेजता हूँ जो अभी मेरे हाथ में है। एपिक्यूरस उन लोगों की निंदा करता है जो मृत्यु से डरते हैं और उन लोगों की भी जो मृत्यु की इच्छा करते हैं। वह कहता है,  “जीवन से ऊबकर मृत्यु के पीछे भागना उतना ही मूर्खतापूर्ण है क्योंकि तुम्हारे जीने के ढंग ने ही मृत्यु को ऐसी चीज़ बना दिया है जिसके पीछे भागने की इच्छा होती है।”

    इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर वह कहता है, “उस व्यक्ति से अधिक मूर्खतापूर्ण और क्या हो सकता है जो मृत्यु की खोज करता है जबकि उसके जीवन को अशांत बनाने वाली वस्तु स्वयं मृत्यु का भय ही है?”

    इसी विचार को व्यक्त करने वाला उसका एक और कथन भी जोड़ा जा सकता है, “मनुष्यों की मूर्खता नहीं, उनका पागलपन— इतना महान है कि कुछ लोग मृत्यु के भय के कारण ही अपनी मृत्यु की ओर धकेल दिए जाते हैं।”

    इनमें से किसी भी विचार पर मनन करने से तुम अपने मन को मृत्यु और जीवन, दोनों को सहन करने के लिए दृढ़ बना सकोगे। क्योंकि हमें जीवन के प्रति अत्यधिक मोह के विरुद्ध भी चेतावनी और दृढ़ता की आवश्यकता है।  जीवन के प्रति अत्यधिक घृणा के विरुद्ध भी। यहाँ तक कि जब विवेक किसी व्यक्ति को अपने जीवन का अंत कर देने की सलाह दे तब भी उसे यह कार्य लापरवाही या उतावलेपन में नहीं करना चाहिए। साहसी और बुद्धिमान व्यक्ति जीवन से भागता नहीं है। वह केवल उचित समय आने पर उससे विदा लेता है।

    इसके अतिरिक्त और विशेष रूप से, हमें उस अवस्था से बचना चाहिए जो बहुत से लोगों पर छा जाती है—मृत्यु की लालसा। क्योंकि, प्रिय लूसीलियस, जैसे अन्य वस्तुओं के प्रति अनुचित आकर्षण होता है, वैसे ही मृत्यु के प्रति भी एक अविवेकी लालसा होती है। यह अक्सर उदात्त और साहसी स्वभाव वाले लोगों को भी अपने वश में कर लेती है और उतनी ही बार डरपोक तथा निष्क्रिय लोगों को भी। पहले प्रकार के लोग जीवन को तुच्छ समझते हैं। दूसरे प्रकार के लोग उससे दबे और थके हुए होते हैं। कुछ अन्य लोग एक ही प्रकार की चीज़ों को बार-बार देखते और करते-करते इतने ऊब जाते हैं कि वे जीवन से घृणा नहीं करते बल्कि उससे विरक्ति और अरुचि अनुभव करने लगते हैं। कभी-कभी हम दर्शन के प्रभाव में भी इस मनःस्थिति में फिसल जाते हैं, जब हम कहते हैं, “आख़िर कब तक वही बातें चलती रहेंगी? मैं कब तक जागूँगा और सोऊँगा, खाऊँगा और फिर भूखा हो जाऊँगा, ठंड महसूस करूँगा और फिर गर्मी?" किसी चीज़ का कोई अंतिम अंत नहीं है; सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। वस्तुएँ एक-दूसरे का पीछा करती रहती हैं। दिन के पीछे रात आती है और रात के पीछे दिन। ग्रीष्म ऋतु शरद को स्थान देती है। शरद के बाद शीत ऋतु आती है और फिर वसंत उसका स्थान ले लेता है। सब कुछ केवल इसलिए बीतता है कि फिर लौट सके। मैं कुछ नया नहीं करता, कुछ नया नहीं देखता।” कभी-कभी यही विचार भी मन में ऊब और वितृष्णा उत्पन्न कर देते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो यह नहीं मानते कि जीवन कठिन है। वे यह महसूस करते हैं कि जीवन निरर्थक है।

अभी के लिए विदा 

जीवन में सच्चे आनंद के संदर्भ में -- पत्र - 23 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें यह लिखूँगा कि इस वर्ष शीत ऋतु ने हमारे साथ कितनी उदारता बरती है (और वह भी कितनी छोटी तथा सौम्य रही) या यह कि वसंत कितना कठोर और असमय ठंडा निकला है और वे सारी दूसरी निरर्थक बातें जिनके बारे में लोग तब लिखते हैं जब उनके पास कहने के लिए कुछ सार्थक नहीं होता? नहीं, मैं तुम्हें ऐसी बात लिखूँगा जो तुम्हारे और मेरे, दोनों के लिए लाभकारी हो। और वह क्या होगी? और क्या सिवाय इसके कि मैं तुम्हें मन की उत्कृष्टता (श्रेष्ठता) की ओर प्रेरित करूँ? क्या तुम जानना चाहते हो कि ऐसी उत्कृष्टता की नींव किस पर टिकी होती है? यह है—व्यर्थ और खोखली चीज़ों में आनंद मत खोजो, उनसे प्रसन्न मत हो।


By Suza 

    क्या मैंने कहा था कि यह उसकी नींव है? नहीं, यह तो उसका शिखर है। उस ऊँचाई तक पहुँचने का अर्थ है यह जानना कि किस बात में प्रसन्न होना चाहिए— अपनी समृद्धि उसी में खोजना जिसे कोई दूसरा नियंत्रित नहीं कर सकता। जो व्यक्ति आशा के आकर्षण में पड़ जाता है, वह चिंतित और अपने ही बारे में अनिश्चित बना रहता है। चाहे उसकी आशा किसी ऐसी वस्तु के लिए ही क्यों न हो जो हाथ के पास हो या जिसे पाना कठिन न हो और चाहे जिन वस्तुओं की उसने आशा की हो वे कभी निराशाजनक सिद्ध न होती हों।

    सबसे बढ़कर यह करो, प्रिय लूसीलियस! आनंद का अनुभव करना सीखो। क्या अब तुम्हें यह लगता है कि क्योंकि मैं तुमसे भाग्य की देनों को दूर कर रहा हूँ और यह मानता हूँ कि तुम्हें आशाओं से उन सबसे मधुर छलनाओं से बचना चाहिए, इसलिए मैं तुमसे अनेक सुख भी छीन रहा हूँ? कदापि नहीं। मैं तो यह चाहता हूँ कि प्रसन्नता कभी भी तुमसे अनुपस्थित न हो। मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारे अपने घर में जन्म ले और ऐसा ही होगा, यदि वह तुम्हारे भीतर उत्पन्न हो। अन्य सुख हृदय को नहीं भरते। वे तो केवल तुच्छ भावनाएँ हैं जो क्षणभर के लिए माथे की शिकन को समतल कर देती हैं। निश्चय ही तुम यह नहीं सोचते कि जो भी मुस्कुराता है, वह वास्तव में आनंदित होता है! मन में उत्साह और आत्मविश्वास होना चाहिए। उसे सीधा, अडिग और हर परीक्षा से ऊपर होना चाहिए।

    मेरा विश्वास करो, सच्चा आनंद एक गंभीर विषय है। क्या तुम्हें लगता है कि मृत्यु का तिरस्कार करना, निर्धनता के लिए अपने घर के द्वार खोल देना, सुख-भोग पर लगाम कसना और पीड़ा सहने का अभ्यास करना, ये सब कोई ढीले-ढाले भाव से या जैसा कि विलासी लोग कहते हैं, (मुस्कान के साथ) करता है? जो व्यक्ति ऐसी बातों पर मनन करता है, वह महान आनंद का अनुभव कर रहा होता है, पर वह आनंद कोमल या मोहक नहीं होता। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे पास भी यही आनंद हो। एक बार जब तुम जान जाओगे कि उसे कहाँ पाया जा सकता है, तब वह कभी समाप्त नहीं होगा। ऊपरी खदानें बहुत थोड़ा देती हैं। सबसे मूल्यवान धातु-भंडार धरती की गहराइयों में छिपे होते हैं और वही ऐसे होते हैं जो खोदने के परिश्रम का प्रतिफल लगातार बढ़ती हुई प्रचुरता के रूप में देते हैं। जनसाधारण के मनोरंजनों में जो सुख मिलता है, वह क्षीण और सतही होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।

    केवल एक ही मार्ग है जो तुम्हें सुखी बना सकता है। अतिप्रिय लूसीलियस, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि उसे अपनाओ। उन सभी वस्तुओं को त्याग दो जो बाहर से चमकती हैं। उन सबको जो तुम्हें किसी दूसरे द्वारा या किसी दूसरे स्रोत से मिलने का वादा किया जाता है और उन्हें अपने पैरों तले रौंद दो। अपने वास्तविक कल्याण की ओर दृष्टि करो और उसी में आनंदित हो जो वास्तव में तुम्हारा है। और तुम्हारा क्या है? तुम स्वयं... तुम्हारा श्रेष्ठतम भाग। जहाँ तक तुम्हारे इस तुच्छ शरीर का प्रश्न है, यह सत्य है कि इसके बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता पर इसे किसी महान वस्तु के रूप में नहीं बल्कि एक आवश्यक साधन के रूप में समझो। जो सुख यह एकत्र करता है, वे खोखले, क्षणभंगुर और अंततः पछतावे का कारण बनने वाले होते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि उन्हें पर्याप्त आत्म-संयम द्वारा नियंत्रित न किया जाए तो वे शीघ्र ही सुख के विपरीत रूप में बदल जाते हैं। हाँ, सुख एक खड़ी चट्टान के किनारे खड़ा रहता है और यदि वह अपनी सीमाओं के भीतर न रहे तो पीड़ा की ओर झुक जाता है। परंतु किसी वस्तु को अच्छा मान लेने के बाद उसके संबंध में सीमा के भीतर बने रहना कठिन होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता, यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।

    जो वास्तव में अच्छा है, उसके प्रति लालसा तृप्ति प्राप्त करने में कभी असफल नहीं होती। वह क्या है?” तुम पूछते हो, “वह कहाँ से आती है?” मैं तुम्हें बताऊँगा, वह एक शुद्ध अंतरात्मा से आती है, सम्मानपूर्ण विचारों से, सही कर्मों से, भाग्य की वस्तुओं को तुच्छ समझने से और जीवन की उस शांत तथा स्थिर शैली से जो एक ही मार्ग पर चलती है। क्योंकि जो लोग स्वयं ही एक योजना से दूसरी योजना पर कूदते रहते हैं, वे किसी निश्चित या भरोसेमंद वस्तु को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? और यदि वे ऐसा भी नहीं करते बल्कि केवल संयोग की हर हवा से इधर-उधर उड़ाए जाते रहते हैं, जीवन भर मंडराते और भटकते रहते हैं तो वे किसी बात पर कैसे निर्भर कर सकते हैं? बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अपने लिए और अपनी संपत्ति के लिए सोच-समझकर व्यवस्था करते हैं। बाकी लोग नदी में बहती वस्तुओं के समान हैं। वे आगे नहीं बढ़ रहे होते बल्कि केवल धारा के साथ बह रहे होते हैं। कोई लहर अपेक्षाकृत शांत होती है और उन्हें सहजता से आगे ले जाती है। दूसरी उन्हें अधिक कठोरता से बहा ले जाती है। कोई धीमी गति से बहती है और उन्हें किनारे के पास छोड़ देती है जबकि दूसरी प्रचंड बाढ़ बनकर उन्हें खुले समुद्र में फेंक देती है। अतः हमें यह निश्चित कर लेना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं और फिर उसी पर दृढ़तापूर्वक बने रहना चाहिए।

    अब वह अवसर आ गया है जब मुझे अपना ऋण चुकाना चाहिए। इस पत्र के बदले में मैं तुम्हें तुम्हारे प्रिय एपिक्यूरस का एक कथन दे सकता हूँ—

“अपने जीवन की शुरुआत बार-बार करते रहना थकाने वाला होता है।” 

यदि इस विचार को और बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए—

“वे लोग बुरा जीवन जीते हैं जो सदा जीवन जीना शुरू ही करते रहते हैं।”

    “क्यों?” तुम पूछते हो। इस कथन को स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

क्योंकि ऐसे लोगों के लिए जीवन सदैव अधूरा रहता है। जो व्यक्ति अभी-अभी जीना शुरू कर रहा है, वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं हो सकता। हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम जीवन को पर्याप्त रूप से जी लें। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता जब वह अभी केवल अपने जीवन की योजना ही बना रहा हो।

    और तुम्हारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि ऐसे लोग बहुत कम होते हैं; वास्तव में लगभग सभी लोग ऐसे ही हैं। बल्कि कुछ लोग तो ठीक उसी समय जीवन शुरू कर रहे होते हैं जब उसे समाप्त करने का समय आ चुका होता है। यदि तुम्हें यह आश्चर्यजनक लगता है तो मैं इससे भी अधिक विस्मयकारी बात जोड़ूँगा, कुछ लोग जीना शुरू करने से पहले ही जीना छोड़ देते हैं।

अभी के लिए विदा 

Thursday, 2 July 2026

जीवन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 22 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

अब तुम समझते हो कि तुम्हें उन दिखने में महत्वपूर्ण पर वास्तव में तुम्हारे लिए हानिकारक कार्यों से दूर हो जाना चाहिए। लेकिन तुम पूछते हो कि यह कैसे किया जाए। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल आमने-सामने ही समझाया जा सकता है। कोई चिकित्सक केवल पत्र लिखकर यह निर्धारित नहीं कर सकता कि भोजन करने या स्नान करने का उचित समय क्या है। उसे स्वयं रोगी की नाड़ी देखनी पड़ती है। जैसा कि पुरानी कहावत है, “ग्लैडिएटर अखाड़े में ही सलाह लेता है।” वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के चेहरे के भाव, हाथों की गति, यहाँ तक कि उसके शरीर के संतुलन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन को देखकर अपनी रणनीति तय करता है। जो कार्य सामान्यतः किए जाते हैं और जिन्हें कर्तव्य की माँग कहा जा सकता है, उनके बारे में सामान्य सलाह दी जा सकती है और उन्हें लिखकर भी बताया जा सकता है। ऐसी सलाह केवल दूर रहने वालों के लिए ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ी जा सकती है। किन्तु जब प्रश्न यह हो कि किसी कार्य को कब और किस प्रकार करना चाहिए तब कोई भी व्यक्ति दूर बैठकर सलाह नहीं दे सकता। उसका निर्णय परिस्थितियों को देखकर ही करना पड़ता है। तेजी से बीतते अवसर को पहचानने के लिए केवल वहाँ उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें सतर्क भी रहना होगा। इसलिए अवसर पर लगातार नज़र रखो। जब वह दिखाई दे तो उसे तुरंत पकड़ लो और पूरे दृढ़ निश्चय तथा अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उन जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त कर लो जो तुम्हें बाँधे हुए हैं।

By Suza 

    वास्तव में, यही वह सलाह है जो मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हें बाहर निकलना ही होगा या तो उस जीवन-स्थिति से बाहर निकलो या फिर स्वयं जीवन से। फिर भी मेरा विचार है कि तुम्हें यह काम धीरे-धीरे और सावधानी से करना चाहिए। जिस भयानक गाँठ को तुमने बाँध रखा है उसे रस्सी तोड़कर नहीं बल्कि ढीला करके खोलने का प्रयास करो। लेकिन यदि कोई दूसरा उपाय सफल न हो तो रस्सी तोड़ने में भी संकोच मत करो।तुम चाहे जितने भी भयभीत क्यों न हो निश्चित ही तुम यह नहीं चाहोगे कि जीवन भर किसी खाई के किनारे लटके रहो। उससे तो यह कहीं बेहतर है कि एक ही बार में गिर पड़ो।

    इस बीच, सबसे पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि अपने ऊपर और अधिक बोझ न लादो। जिन कार्यों का दायित्व तुम पहले ही ले चुके हो, उन्हीं तक स्वयं को सीमित रखो या यदि तुम ऐसा कहना चाहो तो उन्हीं कार्यों तक जो तुम्हारे हिस्से में आ गए हैं। नए दायित्वों को खोज-खोजकर अपने ऊपर मत लो क्योंकि तब तुम्हारा बहाना भी नहीं चलेगा। यह स्पष्ट हो जाएगा कि वे कार्य अपने-आप तुम्हारे पास नहीं आए थे बल्कि तुमने स्वयं उन्हें अपनाया था। लोग जो बातें अक्सर कहा करते हैं, वे वास्तव में सत्य नहीं हैं। “मैं इससे बच नहीं सकता था। मैं यह नहीं करना चाहता था लेकिन क्या कर सकता था?”

    “मुझे यह करना ही पड़ा।” समृद्धि और सफलता के पीछे भागने के लिए किसी को विवश नहीं किया जाता। रुक जाने में भी एक प्रकार की बुद्धिमत्ता है। यदि तुम भाग्य और परिस्थितियों का सक्रिय रूप से विरोध नहीं भी कर रहे हो तब भी तुम्हें उस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है जिस ओर भाग्य तुम्हें बहाए लिए जा रहा है।

    क्या तुम्हें बुरा लगेगा यदि मैं अपनी सलाह के साथ कुछ महान आचार्यों की राय भी जोड़ दूँ? वे मुझसे कहीं बेहतर मार्गदर्शक हैं। वास्तव में जब मुझे किसी कार्य के बारे में निर्णय लेना होता है तो मैं स्वयं भी उनसे परामर्श करता हूँ। इस विषय पर एपिक्यूरस का वह पत्र पढ़ो जो उसने इडोमिनिअस को लिखा था। उसमें वह उसे सलाह देता है कि जहाँ तक संभव हो, वह अपने को उन बंधनों से मुक्त करे और शीघ्रता करे इससे पहले कि कोई अधिक शक्तिशाली परिस्थिति हस्तक्षेप कर दे और उसके पास निवृत्त होने की स्वतंत्रता ही न बचे। वह यह भी जोड़ता है कि उचित समय आने से पहले किसी कार्य का प्रयास नहीं करना चाहिए। लेकिन जब वह लंबे समय से प्रतीक्षित अवसर वास्तव में आ जाए तब तुरंत उठ खड़ा होना चाहिए और बिना विलंब के कार्य करना चाहिए। वह कहता है, “यदि तुम मुक्त होने की योजना बना रहे हो तो कभी सुस्त मत पड़ो।” और यह भी, “परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, मुझे विश्वास है कि निवृत्ति लाभदायक सिद्ध होगी बशर्ते हम न तो समय से पहले उसकी ओर दौड़ें और न ही समय आने पर उससे पीछे हटें।”

    मुझे लगता है कि अब तुम स्टोइक्स की ओर से भी कोई कथन सुनना चाहते हो। अपने आस-पास किसी को यह मत कहने दो कि वे उतावले या अविवेकी हैं। वास्तव में वे जितने साहसी हैं उससे कहीं अधिक सावधान भी हैं। शायद तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि वे तुमसे कहेंगे, “बोझ के नीचे झुक जाना लज्जाजनक है। जिस जिम्मेदारी को तुमने स्वीकार किया है उसका दृढ़तापूर्वक सामना करो। जो व्यक्ति परिश्रम से भागता है और जिसकी हिम्मत परिस्थिति की कठिनाइयों के साथ बढ़ने के बजाय घट जाती है, वह न तो साहसी है और न ही ऊर्जावान।” वे निश्चय ही ऐसी बातें कहेंगे लेकिन केवल तब तक जब तक उस दृढ़ता और धैर्य से कोई सार्थक लाभ प्राप्त हो रहा हो। जब तक किसी अच्छे एवं चरित्रवान व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य न करना पड़े या ऐसी कोई परिस्थिति न सहनी पड़े जो उसकी गरिमा के विरुद्ध हो। अन्यथा, एक श्रेष्ठ चरित्र वाला व्यक्ति स्वयं को तुच्छ और अपमानजनक कार्यों में खपा नहीं देगा। वह केवल व्यस्त रहने के लिए व्यापार या कामकाज में नहीं उलझेगा। और न ही वह वैसा करेगा जैसा तुम शायद सोचते हो अर्थात् महत्त्वाकांक्षी जीवन-यात्रा में फँसा रहेगा और उसकी कठिनाइयों को लगातार सहता रहेगा। जब उसे लगेगा कि उसका यह जुड़ाव अत्यधिक बोझिल, अनिश्चित या खतरनाक हो गया है तब वह उससे पीछे हट जाएगा। यह नहीं कि वह अचानक मुँह मोड़कर भाग जाएगा बल्कि वह धीरे-धीरे विवेकपूर्वक और सुरक्षित मार्ग की ओर कदम बढ़ाते हुए उससे स्वयं को अलग कर लेगा।

    प्रिय लूसीलियस, यदि तुम्हें अपने पद और उससे मिलने वाले पुरस्कारों की परवाह न हो तो उससे मुक्त होना बहुत आसान है। वास्तव में वही पुरस्कार हमें बाँधकर रखते हैं और आगे बढ़ने नहीं देते। लोग सोचते हैं, “क्या? क्या मैं इतनी बड़ी आशाओं को छोड़ दूँ? क्या मैं तब पीछे हट जाऊँ जब फसल कटने के लिए तैयार है? क्या मैं अपने सम्मान और वैभव से वंचित हो जाऊँ? क्या मेरी पालकी बिना सेवकों के रह जाएगी और मेरा स्वागत-कक्ष सूना पड़ जाएगा?” यही वे बातें हैं जिन्हें लोग छोड़ना नहीं चाहते। वे अपनी दुर्दशा से मिलने वाले लाभों से प्रेम करते हैं जबकि उसी दुर्दशा की शिकायत भी करते रहते हैं। वे अपने व्यवसाय या करियर की शिकायत ठीक उसी प्रकार करते हैं जैसे कोई व्यक्ति अपनी प्रेमिका की शिकायत करता है। अर्थात् यदि तुम उनके वास्तविक भावों को ध्यान से देखो तो पाओगे कि वे उससे घृणा नहीं करते, उनका उससे केवल अस्थायी झगड़ा है। जो लोग लगातार रोते-शिकायत करते हैं और छोड़कर चले जाने की धमकी देते हैं, उन्हें ध्यान से परखो। तुम देखोगे कि उनका वहाँ रुके रहना स्वेच्छा से है। जिन चीज़ों को वे अपनी पीड़ा का कारण बताते हैं, वास्तव में वही चीज़ें वे चाहते थे और उन्हीं के बिना वे रह भी नहीं सकते।

    ऐसा ही है, लूसीलियस! दासता केवल कुछ लोगों को पकड़कर नहीं रखती बल्कि बहुत से लोग स्वयं दासता को पकड़े रहते हैं। लेकिन यदि तुम सचमुच अपनी दासता को त्यागना चाहते हो। यदि तुम्हारी स्वतंत्रता की इच्छा वास्तविक है। यदि प्रोत्साहन माँगने का तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि जो करना आवश्यक है, उसे निरंतर चिंता में पड़े बिना कर सको तो स्टोइक्स का पूरा समुदाय तुम्हारा उत्साहवर्धन करेगा। और वे ऐसा क्यों न करें? सभी ज़ेनो और क्रिसिप्पुस तुम्हें उसी मार्ग को चुनने के लिए प्रेरित करेंगे जो संयमित हो, जो सम्मानजनक हो और जो वास्तव में तुम्हारा अपना हो।

    लेकिन यदि तुम बार-बार पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश कर रहे हो कि अपने साथ कितना कुछ ले जा सकोगे अर्थात् निवृत्ति के बाद तुम्हारी आय कितनी होगी तो तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम अपना सूटकेस पकड़े रहोगे तब तक सुरक्षित तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच सकते। पहले अपना सिर पानी के ऊपर रखो और एक बेहतर जीवन जीना शुरू करो। ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दें पर उस प्रकार नहीं जिस प्रकार वे कुछ लोगों को देते प्रतीत होते हैं— मधुर मुस्कान के साथ उन्हें महान दुख प्रदान करके। क्योंकि ऐसे उपहार, जो अपने प्राप्तकर्ता को जलाते हैं और यातना देते हैं, देने के लिए देवताओं के पास केवल एक ही सफाई होती है। उन्होंने वही दिया था जिसकी उनसे प्रार्थना की गई थी।

    मैं अभी-अभी इस पत्र को सील कर रहा था लेकिन अब मुझे इसे फिर से खोलना पड़ रहा है ताकि यह अपनी छोटी-सी पारंपरिक भेंट के बिना यहाँ से न जाए बल्कि अपने साथ कोई सुंदर और सार्थक सूक्ति भी ले जाए। एक ऐसी सूक्ति अभी मेरे मन में आ रही है। मैं यह भी नहीं कह सकता कि वह अधिक सत्य है या अधिक सुंदर ढंग से कही गई है। “यह किसकी है?” तुम पूछते हो। यह एपिक्यूरस की है क्योंकि मैं अभी भी दूसरों के ख़ज़ानों से उधार ले रहा हूँ।

"हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।"

    जिसे चाहो देख लो— युवा, वृद्ध, या इनके बीच की किसी भी आयु का व्यक्ति, तुम पाओगे कि सभी मृत्यु से समान रूप से भयभीत हैं और जीवन के विषय में समान रूप से अज्ञानी हैं। किसी ने भी वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। जो कुछ हमारा अपना है, उसे हम सब भविष्य के लिए टालते रहते हैं।

    इस कथन में मुझे सबसे अधिक यह बात पसंद है कि यह वृद्ध लोगों को उनकी बालसुलभ अपरिपक्वता के लिए धिक्कारता है। वह कहता है, “हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।” यह सही नहीं है। जब हम मरते हैं तब हम जन्म के समय की अपेक्षा और भी बुरे हो चुके होते हैं। इसका दोष हमारी प्रकृति का नहीं हमारा अपना है। प्रकृति को तो हमारे विरुद्ध शिकायत करनी चाहिए और कहना चाहिए, “यह क्या है? मैंने तुम्हें संसार में बिना इच्छाओं, बिना भय, बिना अंधविश्वासी विश्वास, बिना विश्वासघात और उन सभी अन्य दोषों के भेजा था जो आज तुम्हें सताते हैं। कम-से-कम वैसे ही लौटो जैसे आए थे!” जो व्यक्ति उसी शांति के साथ मरता है जिस शांति के साथ वह जन्मा था, उसने बुद्धिमत्ता प्राप्त कर ली है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जैसे ही कोई संकट निकट आता है, हम काँपने लगते हैं। हमारी साँसें भारी हो जाती हैं, चेहरे का रंग उड़ जाता है, आँसू बहने लगते हैं और वह भी व्यर्थ। जब हम शांति के बिल्कुल द्वार पर खड़े होते हैं तब भी चिंतित रहते हैं। इससे अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है?

   लेकिन इसका कारण यह है कि हम हर प्रकार के वास्तविक कल्याण से रिक्त हैं। इसलिए जीवन का खो जाना हमें कष्टदायक प्रतीत होता है। हममें से किसी के लिए भी जीवन का कोई भाग वास्तव में लाभदायक नहीं बन पाता। हम उसे पूरा का पूरा खर्च कर देते हैं। वह हमारी उँगलियों के बीच से फिसल जाता है। कोई यह नहीं सोचता कि वह कितना अच्छा जीवन जी रहा है। सब केवल यह सोचते हैं कि वह कितने लंबे समय तक जीवित रहेगा। जबकि सच्चाई यह है कि हममें से प्रत्येक के पास अच्छा जीवन जीने का अवसर है लेकिन कोई भी लंबे समय तक जीवित रहने की गारंटी नहीं पा सकता।

अभी के लिए विदा 


प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा काम उन लोगों से है जिनके बारे में तुमने लिखा है? तुम्हारा सबसे बड़ा काम तो स्वयं अपने साथ है। समस्या वास्तव में तुम ही हो। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। तुम सम्मानजनक और सदाचारी आचरण की प्रशंसा तो करते हो पर उसका अनुसरण कम करते हो। तुम यह देख लेते हो कि सुख कहाँ है लेकिन उसे पाने का साहस नहीं जुटा पाते। इसलिए, क्योंकि तुम्हें यह स्पष्ट समझ नहीं है कि तुम्हें आगे बढ़ने से क्या रोक रहा है, मैं तुम्हें बतलाऊँगा।

By Giulio Vittini 

    तुम यह मानते हो कि जिन चीज़ों को तुम पीछे छोड़ने वाले हो, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। और जब तुम उस शांति की ओर नज़रें टिकाते हो जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। तब भी तुम उस जीवन की चमक पर ठहर जाते हो जिसे तुम पीछे छोड़ रहे हो ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति कीचड़ और अँधेरे में उतरने वाला हो। तुम भूल कर रहे हो, लूसीलियस! इस जीवन से उस जीवन की ओर जाना नीचे उतरना नहीं बल्कि ऊपर उठना है। तुम जानते हो कि आभा (glow) और झलकती चमक (gleam) में क्या अंतर है। एक अपने स्वयं के निश्चित स्रोत से प्रकाश देती है जबकि दूसरी किसी और से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करती है। इसी प्रकार इस जीवन और उस जीवन में भी अंतर है। यह जीवन ऐसी चमक से प्रकाशित है जो इसके बाहर से आती है। इसलिए जो भी उसके और प्रकाश के बीच आ जाए, वह इसे गहरे अँधेरे में डुबो सकता है। परन्तु वह जीवन अपने ही प्रकाश और तेज से आलोकित है। उसकी ज्योति उसकी अपनी है।

    तुम्हारा अध्ययन तुम्हें प्रसिद्ध बनाएगा। इस विषय में मैं एपिक्यूरस का एक उदाहरण प्रस्तुत करूँगा। जब वह इडोमिनीअस (Idomeneus) को पत्र लिख रहा था और उसे बाहरी आडंबर तथा दिखावटी जीवन से हटाकर विश्वसनीय और स्थायी यश की ओर लौटने के लिए बुला रहा था (यद्यपि उस समय इडोमेनेउस एक शक्तिशाली राजा का सहायक था और बड़े-बड़े कार्यों का भार संभाल रहा था), तब उसने कहा,  “यदि यश तुम्हारे लिए महत्त्व रखता है तो मेरे पत्र तुम्हें उन सभी बातों से अधिक प्रसिद्ध बनाएँगे जिनमें तुम इस समय लगे हुए हो और जिनके कारण दूसरे लोग तुम्हारी ओर आकर्षित होते हैं।”

    क्या वह सत्य नहीं कह रहा था? यदि एपिक्यूरस ने इडोमिनीअस को पत्र न लिखे होते तो उसके बारे में कौन जानता? वे सभी शक्तिशाली शासक और क्षत्रप, यहाँ तक कि वह राजा भी जिसने इडोमिनीअस को उसका पद प्रदान किया था, आज गुमनामी की गहराइयों में दफन हो चुके हैं। सिसरो के पत्र ही हैं जो एटिकस के नाम को नष्ट होने से बचाए हुए हैं। उससे उसे कोई लाभ न होता कि एग्रीप्पा ने उसकी पुत्री से विवाह किया था और टाइबेरियस ने उसकी पौत्री से या कि ड्रूसस सीज़र उसका प्रपौत्र था। इतने महान नामों के बीच उसका अपना नाम अब नहीं लिया जाता, यदि सिसरो ने उसे अपने पत्रों का प्राप्तकर्ता न बनाया होता। समय की वह खाई जो हम सबको अपने भीतर समेट लेगी, अत्यन्त गहरी है। कुछ ही प्रतिभाशाली मस्तिष्क उसके ऊपर अपना सिर उठा पाते हैं और यद्यपि अंततः उन्हें भी मौन में विलीन होना पड़ता है। फिर भी वे लंबे समय तक विस्मृति का प्रतिरोध करते हैं और अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करते रहते हैं।

    जो वचन एपिक्यूरस अपने मित्र को दे सका था, वही वचन मैं तुम्हें देता हूँ, लूसीलियस। मैं आने वाली पीढ़ियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करूँगा और अपने साथ दूसरों के नाम भी ले जा सकूँगा ताकि वे भी स्थायी रूप से बने रहें। हमारे कवि वर्जिल ने दो व्यक्तियों को चिरस्थायी स्मरण का वचन दिया था और वास्तव में उन्हें प्रदान भी किया:

“हे सौभाग्यशाली युगल! यदि मेरी कविताओं में कुछ सामर्थ्य है... 
तो कोई भी आने वाला दिन तुम्हें युगों की स्मृति से कभी मिटा नहीं सकेगा। 
जब तक एनीअस की संतति अटल कैपिटोल की चट्टान पर निवास करती रहेगी, 
और जब तक रोमन जाति का अधिपति शासन करता रहेगा,
तब तक तुम्हारा स्मरण भी बना रहेगा।”

    जिन लोगों को भाग्य ने घटनाओं और सत्ता के केंद्र में पहुँचा दिया है, जो दूसरों की शक्ति के सहभागी और भागीदार रहे हैं, उन्हें बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उनके यहाँ आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती है। परन्तु यह सब तब तक ही रहता है जब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। जैसे ही वे चले जाते हैं, उनका स्मरण भी समाप्त हो जाता है। किन्तु प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व का सम्मान समय के साथ बढ़ता जाता है। और यह सम्मान केवल स्वयं उन रचनाकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उन सभी बातों तक फैल जाता है जो उनकी स्मृति से जुड़ी होती हैं।
    
    अब मैं इडोमिनीअस को अपने पत्र में यूँ ही निःशुल्क स्थान नहीं दूँगा! उसे इसका मूल्य स्वयं चुकाना होगा। उसी को एपिक्यूरस ने वह सुंदर वचन लिखकर भेजा था जिसमें उसने उसे पायथोक्लीज़ को एक असाधारण और निस्संदिग्ध ढंग से समृद्ध बनाने की प्रेरणा दी थी। वह कहता है:

“यदि तुम पायथोक्लीज़ को धनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके धन में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए।”

    यह कथन इतना स्पष्ट है कि उसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं और इतना सुंदर ढंग से कहा गया है कि उसमें किसी सुधार की भी आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि इसे केवल धन-संपत्ति के संदर्भ में मत समझो। जहाँ कहीं भी इसे लागू किया जाएगा, इसका अर्थ वही रहेगा। यदि तुम पायथोक्लीज़ को सम्माननीय बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके सम्मान और पुरस्कारों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ निरंतर आनंद का अनुभव करे तो तुम्हें उसके सुखों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ एक लंबा और पूर्ण जीवन जिए तो तुम्हें उसके वर्षों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। तुम्हें इन कथनों को केवल एपिक्यूरस की संपत्ति नहीं समझना चाहिए; ये तो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। मेरा विचार है कि दार्शनिकों को सीनेट की प्रथा अपनानी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा मत प्रस्तुत करता है जिसका कुछ भाग मुझे पसंद आता है तो मैं उससे उसके मत को विभाजित करने के लिए कहता हूँ। फिर मैं उस भाग का अनुसरण करता हूँ जिसे मैं स्वीकार करता हूँ।

    एपिक्यूरस के ये उत्कृष्ट कथन एक और उद्देश्य भी पूरा करते हैं। यही कारण है कि मैं उनका उल्लेख करने के लिए और भी अधिक इच्छुक हूँ। वे उन लोगों को भी प्रमाणित करते हैं, जो निकृष्ट उद्देश्यों से उसकी शरण लेते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ उन्हें अपने दोषों के लिए आड़ मिल जाएगी कि वे जहाँ कहीं भी जाएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक और सदाचारपूर्ण जीवन ही जीना चाहिए। जब तुम एपिक्यूरस के उद्यानों में पहुँचोगे और वहाँ यह लिखित वचन देखोगे:

    “हे अतिथि, यहाँ तुम्हारा उत्तम सत्कार होगा; यहाँ सुख को सर्वोच्च कल्याण माना जाता है।”

    तब उस गृह का संरक्षक तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार मिलेगा। वह आतिथ्य और सद्भाव के साथ तुम्हें दलिये की एक थाली और पानी का एक भरपूर पात्र परोसेगा और कहेगा, “क्या यह उत्तम आतिथ्य नहीं है?” वह कहेगा, “ये उद्यान भूख को भड़काते नहीं बल्कि उसे शांत करते हैं। ये ऐसे पेय नहीं देते जो पीने वाले को और अधिक प्यासा बना दें बल्कि प्यास को उसके स्वाभाविक उपचार से बुझाते हैं, जो बिना किसी मूल्य के उपलब्ध है। यही वह सुख है जिसमें मैंने अपना जीवन बिताया है और इसी में वृद्धावस्था तक पहुँचा हूँ।”

    मैं अभी तुमसे उन इच्छाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें केवल समझाने-बुझाने से शांत नहीं किया जा सकता बल्कि जिन्हें समाप्त करने के लिए कुछ वास्तविक वस्तु देनी पड़ती है। जहाँ तक उन अनावश्यक इच्छाओं का संबंध है जिन्हें टाला जा सकता है, डाँटकर रोका जा सकता है या दबाया जा सकता है। मैं तुम्हें केवल इतना स्मरण दिलाता हूँ कि ऐसा सुख प्राकृतिक तो है पर आवश्यक नहीं। तुम उस पर किसी प्रकार के ऋणी नहीं हो जो कुछ भी तुम उसे देते हो, वह स्वेच्छा से देते हो। पेट उपदेश नहीं सुनता। वह केवल अपनी माँग करता है और आग्रह करता है। फिर भी वह कोई कठिन लेनदार नहीं है। उसे बहुत थोड़े में टाला जा सकता है। यदि तुम उसे उतना ही दो जितना उसका अधिकार है न कि उतना जितना तुम दे सकते हो।

अभी के लिए विदा 




Wednesday, 1 July 2026

दर्शन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 20 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस

यदि तुम अच्छी प्रगति कर रहे हो और स्वयं को इस योग्य समझते हो कि एक दिन अपने ही स्वामी बन सको तो मुझे प्रसन्नता है। क्योंकि यदि मैं तुम्हें उस स्थिति से बाहर निकाल सकूँ, जहाँ तुम इस समय बिना किसी आशा के निकलने का मार्ग खोजते हुए भटक रहे हो तो यह मेरे लिए भी गौरव की बात होगी। लेकिन मैं तुमसे यह चाहता हूँ, प्रिय लूसीलियस... और इसी के लिए तुम्हें प्रेरित करता हूँ। दर्शन को अपने हृदय की गहराइयों तक उतरने दो और अपनी प्रगति की परीक्षा अपने भाषणों या लेखन से नहीं बल्कि अपने मन की दृढ़ता और अपनी इच्छाओं में आई कमी से करो। अपने कर्मों द्वारा अपने शब्दों को सत्य सिद्ध करो।




    जो लोग श्रोताओं की सहमति प्राप्त करना चाहते हैं, उनका उद्देश्य कुछ और होता है। आज के वे वक्ता जो केवल ऐसे युवकों के मनोरंजन के लिए लंबे और विविध प्रकार के प्रलाप प्रस्तुत करते हैं जिनके पास करने के लिए कोई सार्थक काम नहीं है, उनका उद्देश्य भी कुछ और होता है। दर्शन हमें बोलना नहीं बल्कि कर्म करना सिखाता है। उसकी अपेक्षा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति उसी आदर्श के अनुसार जीवन जिए जिसे उसने स्वयं अपने लिए निर्धारित किया है। उसका जीवन न तो स्वयं अपने भीतर विरोध में हो और न ही उसके कथनों से भिन्न हो। उसके सभी कार्यों में एक ही स्वर और एक ही संगति हो। यही बुद्धिमत्ता का मुख्य कार्य है। यही उसका सर्वोत्तम प्रमाण भी है कि कर्म शब्दों के अनुरूप हों। व्यक्ति हर स्थान पर एक-सा बना रहे। वह स्वयं के अनुरूप हो। "क्या ऐसा कोई व्यक्ति है?" बहुत अधिक नहीं लेकिन कुछ अवश्य हैं। यह वास्तव में कठिन है। मेरा यह आशय भी नहीं है कि बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा एक जैसे कदम उठाता है बल्कि केवल इतना है कि वह एक ही मार्ग पर चलता है।

    इसलिए स्वयं का परीक्षण करो। क्या तुम्हारा पहनावा तुम्हारे घर-परिवार की स्थिति से मेल नहीं खाता? क्या तुम अपने ऊपर तो उदारतापूर्वक खर्च करते हो लेकिन अपने परिवार के प्रति कंजूसी बरतते हो? क्या तुम भोजन में सादगी दिखाते हो लेकिन भवन-निर्माण और निर्माण-कार्य पर अत्यधिक खर्च करते हो? एक बार और हमेशा के लिए जीवन जीने का कोई एक नियम अपनाओ और अपने पूरे जीवन को उसके अनुरूप बना लो। कुछ लोग घर में तो अत्यधिक मितव्ययिता दिखाते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं और ठाठ-बाट से रहते हैं। यह असंगति एक दोष है। यह इस बात का संकेत है कि मन अभी भी डगमगा रहा है और उसने अभी तक अपने वास्तविक स्वभाव को दृढ़ता से नहीं अपनाया है।

    इसके अतिरिक्त, मैं तुम्हें बताऊँगा कि यह असंगति, यह कर्म और अभिप्राय के बीच का अंतर, कहाँ से उत्पन्न होता है। कोई भी व्यक्ति इस बात पर स्थिर होकर विचार नहीं करता कि वह वास्तव में क्या चाहता है. यदि करता भी है तो उस पर दृढ़ नहीं रहता। बल्कि उससे हट जाता है। वह केवल अपने आचरण में परिवर्तन ही नहीं करता बल्कि पीछे की ओर लौट जाता है और फिर वही व्यवहार अपनाने लगता है, जिसे वह त्याग देने की शपथ ले चुका था। इसलिए मैं बुद्धिमत्ता की पुरानी परिभाषाओं को एक ओर रखकर तुम्हें ऐसी परिभाषा दूँगा जो सम्पूर्ण मानवीय जीवन-पद्धति को समेट ले। यह परिभाषा मुझे संतोषजनक लगती है। बुद्धिमत्ता क्या है? सदैव एक ही चीज़ की इच्छा करना और सदैव एक ही चीज़ को अस्वीकार करना। इसमें यह शर्त जोड़ने की भी आवश्यकता नहीं कि जिसकी इच्छा की जाए वह उचित हो क्योंकि केवल उचित और सही वस्तु के प्रति ही मनुष्य की इच्छा निरंतर और एकरूप बनी रह सकती है।

    इसी कारण लोग यह नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, सिवाय उस क्षण के जब उनकी इच्छा जागृत होती है। किसी ने भी अपने जीवन के लिए समग्र रूप से यह निर्णय नहीं किया है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए। उनका निर्णय प्रतिदिन बदलता रहता है और अक्सर अपने ही विपरीत रूप में परिवर्तित हो जाता है। बहुत से लोग जीवन ऐसे जीते हैं मानो वह कोई खेल हो। इसलिए जिस मार्ग पर तुम चलना प्रारम्भ कर चुके हो, उसी पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहो। सम्भव है कि वह तुम्हें शिखर तक पहुँचा दे। यदि वहाँ तक न भी पहुँचा सके तो कम-से-कम तुम्हें ऐसे स्थान तक अवश्य ले जाएगा जहाँ तुम स्वयं जान सकोगे कि यह अभी शिखर नहीं है।

    तुम कहते हो, “यदि परिवार की आय समाप्त हो गई, तो मेरे आश्रितों और अनुयायियों के उस समूह का क्या होगा?” जब तुम उस समूह का पालन-पोषण करना बंद कर दोगे तो वह स्वयं अपना पालन करने लगेगा। और यदि ऐसा न हुआ तो निर्धनता तुम्हें वह बात सिखा देगी जिसे तुम स्वयं को नहीं सिखा पा रहे हो। तुम्हारे सच्चे और वास्तविक मित्र तब भी तुम्हारे साथ बने रहेंगे, जबकि जो लोग तुमसे नहीं बल्कि किसी और लाभ से जुड़े हुए थे, वे तुम्हें छोड़कर चले जाएँगे। यदि किसी और कारण से नहीं तो क्या केवल इसी कारण निर्धनता से प्रेम नहीं किया जाना चाहिए? वह तुम्हें दिखा देगी कि तुम्हारे मित्र वास्तव में कौन हैं। आह! वह दिन कब आएगा जब कोई व्यक्ति तुम्हारे पद, अधिकार या प्रतिष्ठा के कारण तुमसे झूठ नहीं बोलेगा!

    इसलिए अपनी अन्य सभी प्रार्थनाएँ ईश्वर के हाथों में छोड़ दो और अपने विचारों, अपनी चिंताओं तथा अपनी इच्छाओं को केवल इसी एक बात पर केंद्रित करो। अपने आप से संतुष्ट रहने पर और उन शुभ वस्तुओं से संतुष्ट रहने पर जो तुम्हारे अपने भीतर से उत्पन्न होती हैं। इससे अधिक निकट और कौन-सी समृद्धि हो सकती है? स्वयं को उस छोटी-सी संपदा तक सीमित कर लो जिसे भाग्य या संयोग तुमसे छीन नहीं सकता।

    और ताकि तुम्हारे लिए ऐसा करना अधिक सरल हो जाए। इस पत्र के साथ भेजी जाने वाली भेंट भी उसी विषय का उल्लेख करेगी। मैं उसे तुरंत प्रस्तुत करता हूँ। यद्यपि तुम शिकायत कर सकते हो फिर भी मैं अपनी यह देनदारी प्रसन्नतापूर्वक चुकाऊँगा और वह भी एपिक्यूरस के माध्यम से:

“मुझ पर विश्वास करो, तुम्हारी वाणी एक साधारण बिछौने पर और जर्जर वस्त्रों में कहीं अधिक प्रभावशाली होगी। तब तुम केवल बोल ही नहीं रहे होगे। तुम अपने कथनों का प्रमाण भी दे रहे होगे।”

    हमारे मित्र दिमित्रीयस (Demetrius) के शब्दों को मैं निश्चित ही एक भिन्न ढंग से सुनता हूँ, जब मैंने यह देखा कि वह किस प्रकार सोते थे। न केवल गद्दे के बिना बल्कि कंबल के बिना भी। वह केवल सत्य का उपदेश नहीं देते, वे उसके साक्षी भी बनते हैं।

    “यह क्या? क्या कोई व्यक्ति धन को अपनी जेब में रखते हुए भी उसका तिरस्कार नहीं कर सकता?” क्यों नहीं? उस व्यक्ति में भी महान आत्मबल होता है जो अपने चारों ओर धन का अंबार लगा हुआ देखता है और इस आश्चर्य पर खुलकर हँस पड़ता है कि यह सब उसके पास कैसे आ गया। दूसरे लोग उसे बताते हैं कि यह धन उसका है। स्वयं उसे तो मानो इसका पूरा एहसास भी नहीं होता। वैभव के बीच रहते हुए भी उससे भ्रष्ट न होना एक महान बात है। वह व्यक्ति महान है जो अपनी संपत्ति के बीच रहते हुए भी मन से निर्धन बना रहता है।

    तुम कहते हो, “मैं नहीं जानता कि ऐसा व्यक्ति यदि निर्धनता में आ जाए तो उसे किस प्रकार सहन करेगा।” मैं भी नहीं जानता, एपिक्यूरस, कि तुम्हारा वह निर्धनता का गर्व करने वाला व्यक्ति यदि धन-संपत्ति प्राप्त कर ले तो क्या वह तब भी धन का उसी प्रकार उपहास करेगा। इसलिए हमें दोनों के मन का परीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या एक व्यक्ति अपनी निर्धनता में प्रसन्न है। क्या दूसरा अपनी संपन्नता में आसक्त हुए बिना रह सकता है। अन्यथा केवल खाट पर सोना और फटे-पुराने वस्त्र पहनना अच्छे चरित्र का बहुत बड़ा प्रमाण नहीं है। यदि यह स्पष्ट न हो कि व्यक्ति उन्हें विवशता से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से स्वीकार कर रहा है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि कोई व्यक्ति उन साधारण वस्तुओं से ऐसे नहीं भागता मानो उनसे बेहतर कुछ और हो बल्कि स्वयं को पहले से ही उनके लिए तैयार रखता है और उन्हें सहन करना सरल समझता है। वास्तव में, लूसीलियस, यह सरल ही नहीं है जब कोई पहले से इसका अभ्यास कर लेता है तो यह सुखद भी हो जाता है क्योंकि ऐसे जीवन में एक ऐसी वस्तु होती है जिसके बिना कोई भी दूसरी वस्तु आनंददायक नहीं हो सकती और वह है मन की शांति।

    इसलिए मुझे लगता है कि वह करना सचमुच आवश्यक है जिसकी मैंने तुम्हें अपने पत्र में सलाह दी थी और जिसे महान व्यक्तियों ने अनेक बार किया है। कुछ दिन ऐसे निर्धारित करो जिनमें हम जान-बूझकर निर्धनता का अभ्यास करें और स्वयं को वास्तविक विपत्ति के लिए तैयार करें। हमें यह और भी अधिक करना चाहिए क्योंकि हम विलासिताओं में डूबे हुए हैं और हर चीज़ को कठोर तथा कठिन समझने लगे हैं। बेहतर है कि मन को उसकी नींद से जगाया जाए। उसे झकझोरा जाए और उसे याद दिलाया जाए कि हमारी प्रकृति को वास्तव में कितनी कम चीज़ों की आवश्यकता होती है। कोई भी मनुष्य धनी पैदा नहीं होता। जो भी इस संसार में जन्म लेता है, उसे केवल दूध और थोड़े-से वस्त्र में संतुष्ट रहने का आदेश मिलता है। हम ऐसी ही शुरुआत से आते हैं और फिर भी अब हमारे लिए पूरे-के-पूरे राज्य भी पर्याप्त नहीं रह गए हैं!

अभी के लिए विदा 

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26

 प्रिय लूसीलियस  कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका ह...