प्रिय लूसीलियस
प्रिय लूसीलियस, तुम्हारा पत्र मुझे अत्यन्त प्रसन्नता देने वाला था। उसने मुझे फिर से उत्साहित कर दिया क्योंकि मैं कुछ शिथिल पड़ता जा रहा था। उसने मेरी स्मृति को भी जागृत किया, जो अब कुछ मन्द और दुर्बल होती जा रही है।तुम्हारा यह विश्वास है और ऐसा क्यों न हो! सुख प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन यही दृढ़ धारणा है कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) आचरण ही वास्तविक कल्याण है क्योंकि जो व्यक्ति अन्य वस्तुओं को भी कल्याण मानता है, वह भाग्य के अधीन हो जाता है और दूसरों की इच्छा पर निर्भर रहता है। किन्तु जो व्यक्ति कल्याण को केवल सम्माननीय आचरण तक सीमित रखता है, वह अपने ही भीतर सुखी रहता है।
एक व्यक्ति अपने बच्चों की मृत्यु पर शोक करता है। उनके बीमार पड़ जाने पर चिंता से व्याकुल हो उठता है। दूसरा इस कारण दुःखी रहता है कि उसके बच्चे दुश्चरित्र हैं और उनकी बदनामी फैल रही है। कोई दूसरे की पत्नी के प्रेम में व्याकुल है तो कोई अपनी ही पत्नी के प्रति आसक्ति से पीड़ित है। एक व्यक्ति चुनाव में पराजित होने से दुःखी है जबकि दूसरे के लिए पद पर निर्वाचित हो जाना ही नई चिंताओं और कष्टों का कारण बन जाता है। किन्तु समस्त मानवजाति के दुःखों में सबसे बड़ा दुःख उन लोगों का है, जो मृत्यु के विचार से निरन्तर भयभीत रहते हैं। यह विचार उन्हें हर ओर से घेरता रहता है क्योंकि मृत्यु किसी भी दिशा से आ सकती है। जैसे शत्रु-प्रदेश से होकर गुजरने वाली सेना हर समय चारों ओर सतर्क दृष्टि रखती है और प्रत्येक आहट पर पीछे मुड़कर देखती है, उसी प्रकार वे भी निरन्तर भय में जीते हैं। जब तक यह भय मन से दूर नहीं होता, तब तक हमारा जीवन निरन्तर काँपते हुए हृदय के साथ ही बीतता है।
तुम्हें ऐसे लोग मिलेंगे जिन्होंने निर्वासन और संपत्ति की जब्ती का दुख सहा है। कुछ ऐसे भी मिलेंगे जो निर्धनता के सबसे भीषण रूप को झेल रहे हैं क्योंकि वे अपार धन-संपत्ति के बीच रहते हुए भी दिवालिया हो चुके हैं। तुम्हें ऐसे नाविक भी मिलेंगे जिनका जहाज़ डूब गया। ऐसे लोग भी जिनका जीवन किसी दूसरे प्रकार के जहाज़-डूबने का शिकार हुआ है। जब जनता का क्रोध या ईर्ष्या, जो उच्च पद पर बैठे लोगों के लिए सबसे घातक प्रहार है, उन पर अचानक और बिना किसी चेतावनी के टूट पड़ती है। उन्हें उसी प्रकार धराशायी कर देती है, जैसे निर्मल आकाश में अचानक उठने वाला तूफ़ान या बिजली का वह प्रहार जो अपने आसपास की सारी धरती को हिला देता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति पर बिजली गिरने पर केवल वही नहीं बल्कि उसके आसपास खड़े लोग भी स्तब्ध रह जाते हैं, उसी प्रकार इन आकस्मिक विपत्तियों में एक व्यक्ति पर तो आपदा आती है। किन्तु दूसरे लोग भी भय से काँप उठते हैं। वे केवल इस संभावना से ही उतने ही आतंकित हो जाते हैं कि ऐसा उनके साथ भी हो सकता है, जितना स्वयं वह व्यक्ति जो वास्तव में उस विपत्ति का शिकार हुआ है। दूसरों पर अचानक आई हुई विपत्तियाँ सबके मन में भय उत्पन्न कर देती हैं। जैसे गोफन के घूमने की आवाज़ सुनकर पक्षी उड़ जाते हैं, चाहे उसमें पत्थर हो या न हो, उसी प्रकार हम केवल प्रहार से ही नहीं बल्कि उसके आभास मात्र से भी भयभीत हो उठते हैं।
इसलिए जो व्यक्ति ऐसे विश्वास के सहारे जीता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। क्योंकि शान्ति के बिना सुख का अस्तित्व नहीं है और जो जीवन निरन्तर चिंता और आशंका में बीतता है, वह दुःखमय जीवन ही है। जो व्यक्ति भाग्य से मिलने वाले लाभों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहता है, वह स्वयं को अनिवार्य रूप से गहरे मानसिक अशान्ति और भावनात्मक उथल-पुथल के हवाले कर देता है। सुरक्षा का केवल एक ही मार्ग है। बाहरी वस्तुओं से ऊपर उठो और केवल उसी में संतोष प्राप्त करो जो नैतिक रूप से श्रेष्ठ है। क्योंकि जो व्यक्ति यह मानता है कि सद्गुण से बढ़कर भी कोई वस्तु है या सद्गुण के अतिरिक्त भी कोई वस्तु वास्तविक कल्याण है, वह अपने वक्ष को भाग्य के हर प्रहार के लिए खुला छोड़ देता है और व्याकुल होकर उसके अगले आघात की प्रतीक्षा करता रहता है।
अपने मन के सामने यह दृश्य उपस्थित करो। मानो भाग्य ने एक विशाल उत्सव का आयोजन किया हो। राजपद, धन तथा लोकप्रियता वे उपहार हों जिन्हें वह इस नश्वर मानव-समुदाय के बीच बिखेर रहा हो। उन उपहारों में से कुछ पर अनेक लालची हाथ एक साथ टूट पड़ते हैं और उन्हें खींचतान में टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। कुछ छलपूर्ण लेन-देन में बाँट दिए जाते हैं। कुछ ऐसे लोगों के हाथ लगते हैं जिनके लिए वे अंततः हानिकारक सिद्ध होते हैं। कुछ उपहार असावधान लोगों के सामने ही गिर जाते हैं। कुछ उन लोगों के हाथ से भी छूट जाते हैं जो उन्हें अत्यधिक उतावलेपन से पकड़ना चाहते हैं। किन्तु जब कोई व्यक्ति भाग्यवश उन्हें प्राप्त भी कर लेता है, तब भी वे उसे ऐसा आनंद नहीं दे पाते जो अगले दिन तक भी बना रहे। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति जैसे ही इन उपहारों को बाँटा जाता हुआ देखता है, उसी समय उस रंगमंच को छोड़कर चला जाता है क्योंकि वह जानता है कि तुच्छ-से-तुच्छ उपकार भी कभी-कभी बहुत भारी मूल्य चुकाकर प्राप्त होते हैं।
जब बुद्धिमान व्यक्ति वहाँ से उठकर जाने लगता है तो कोई उससे उलझता नहीं, न ही द्वार की ओर बढ़ते समय कोई उस पर प्रहार करता है क्योंकि सारी छीना-झपटी तो उन उपहारों को लेकर होती है। भाग्य द्वारा हम पर बरसाए जाने वाले उपहारों के साथ भी यही होता है। हम अभागे मनुष्य निरन्तर व्याकुल और बेचैन रहते हैं। हमारी इच्छा होती है कि काश हमारे पास और भी अधिक हाथ होते। हम कभी इधर देखते हैं, कभी उधर। जिन वस्तुओं की लालसा हमें पागल बना देती है, उनके आने में हमें देर प्रतीत होती है। वे कुछ ही लोगों को प्राप्त होती हैं जबकि उनकी आशा सभी करते हैं। हम वहीं पहुँचना चाहते हैं जहाँ वे उपहार गिर रहे हैं। यदि दूसरों के हाथ खाली रह जाएँ और हमें उनमें से कुछ मिल जाए तो हम प्रसन्न हो उठते हैं। किन्तु इन तुच्छ वस्तुओं के लिए या तो हमें भारी मानसिक चिंता का मूल्य चुकाना पड़ता है या फिर वे हमें मिलती ही नहीं और हम निराश रह जाते हैं। इसलिए आओ, हम इस तमाशे से हट जाएँ और अपनी जगह उन लोगों के लिए छोड़ दें जो अभी भी उन पुरस्कारों को लपकने में लगे हुए हैं। वे ही उन वस्तुओं को आकाश में लटकता हुआ देखते रहें और उन्हीं के साथ-साथ उनकी बेचैनी और प्रतीक्षा भी बढ़ती रहे।
जो व्यक्ति वास्तव में सुखी होना चाहता है, उसे अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि केवल नैतिक रूप से श्रेष्ठ आचरण ही वास्तविक कल्याण है। क्योंकि यदि वह यह मान ले कि इसके अतिरिक्त भी कोई और कल्याण है तो सबसे पहले वह ईश्वरीय व्यवस्था पर ही संदेह करने लगेगा। वह सोचेगा कि न्यायप्रिय लोगों के साथ इतनी प्रतिकूल घटनाएँ क्यों घटती हैं, और हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह इस विशाल ब्रह्माण्ड की आयु की तुलना में कितना अल्पकालिक और तुच्छ है। इसी प्रकार की शिकायतों के कारण हम ईश्वर के उपकारों का मूल्य समझने में कृतघ्न सिद्ध होते हैं। हम शिकायत करते हैं कि हमें मिले हुए वरदान स्थायी नहीं हैं। वे थोड़े हैं, अनिश्चित हैं और क्षणभंगुर हैं। परिणाम यह होता है कि न तो हम जीना चाहते हैं और न ही मरना। हम जीवन से ऊब जाते हैं, फिर भी मृत्यु से भय खाते हैं। हमारी प्रत्येक योजना अस्थिर बनी रहती है और कोई भी सौभाग्य हमें संतुष्ट नहीं कर पाता।
किन्तु इसका कारण यह है कि हमने अभी तक उस असीम और अजेय कल्याण को प्राप्त नहीं किया है, जहाँ पहुँचकर सभी इच्छाओं का अंत हो जाता है। क्योंकि शिखर के ऊपर जाने के लिए कोई और स्थान नहीं होता। क्या तुम पूछते हो कि सद्गुण को किसी वस्तु की आवश्यकता क्यों नहीं होती? इसका कारण यह है कि सद्गुण वर्तमान में उपलब्ध कल्याण में ही आनंदित रहता है। जो उपस्थित नहीं है, उसकी उसे कोई लालसा नहीं होती। जो कुछ उसके पास है, उसे वह कभी अपर्याप्त नहीं मानता क्योंकि वही उसके लिए पर्याप्त होता है। यदि तुम इस दृष्टिकोण को छोड़ दोगे तो निष्ठा नष्ट हो जाएगी और सत्यनिष्ठा भी समाप्त हो जाएगी। क्योंकि इन गुणों को सुरक्षित रखने के लिए मनुष्य को बहुत-सी ऐसी बातों को सहना पड़ता है जिन्हें संसार बुरा मानता है और बहुत-से ऐसे सुखों का त्याग करना पड़ता है जिन्हें संसार अच्छा समझता है। तब साहस भी समाप्त हो जाएगा क्योंकि साहस अपने आपको जोखिम में डालने की माँग करता है। महान आत्मा भी नष्ट हो जाएगी, क्योंकि वह तब तक अपने परिवेश से ऊपर नहीं उठ सकती जब तक वह उन वस्तुओं को तुच्छ न समझे जिन्हें सामान्य लोग सबसे अधिक मूल्यवान मानते हैं। कृतज्ञता भी समाप्त हो जाएगी, और उपकार का प्रतिदान करने की तत्परता भी, यदि हम कठिन परिश्रम से डरने लगें, यदि हम निष्ठा से अधिक किसी अन्य वस्तु को महत्त्व देने लगें, और यदि हमारी दृष्टि सर्वोत्तम लक्ष्य पर स्थिर न रहे।
इसके अतिरिक्त या तो ये तथाकथित कल्याण वास्तव में कल्याण नहीं हैं अथवा फिर मनुष्य ईश्वर से भी अधिक भाग्यशाली है। क्योंकि ईश्वर उन वस्तुओं का कोई उपयोग नहीं करता जिन्हें हम अत्यन्त प्रिय और मूल्यवान समझते हैं। वासना का उसके लिए कोई अर्थ नहीं है। न ही स्वादिष्ट भोजन, न धन-संपत्ति और न ही वे अन्य तुच्छ भोग-विलास, जो मनुष्यों को इतने आकर्षक लगते हैं। अतः हमें या तो यह मानना पड़ेगा कि कुछ ऐसे कल्याण हैं जो ईश्वर के पास नहीं हैं या फिर यह स्वीकार करना होगा कि ईश्वर का उनके बिना होना ही इस बात का प्रमाण है कि वे वास्तव में कल्याण नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, जिन वस्तुओं को लोग कल्याण मानते हैं, उनमें से बहुत-सी वस्तुएँ तो पशुओं को मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में प्राप्त हैं। पशु भोजन का अधिक उत्साह से आनंद लेते हैं। वे मैथुन के बाद मनुष्यों की तरह शीघ्र थकते नहीं। उनकी शारीरिक शक्ति अधिक होती है और अधिक स्थिर भी रहती है। यदि इन्हीं बातों को वास्तविक कल्याण माना जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि पशु मनुष्यों से अधिक सुखी हैं। क्योंकि वे न तो दुष्टता जानते हैं, न छल-कपट। वे सुखों का अनुभव अधिक सहजता और अधिक पूर्णता से करते हैं। उन सुखों का उपभोग करते समय उन्हें न तो लज्जा का भय होता है और न ही बाद में किसी प्रकार का पश्चात्ताप।
इसलिए विचार करो कि क्या उस वस्तु को वास्तव में कल्याण कहा जा सकता है, जिसमें मनुष्य ईश्वर से भी आगे निकल जाता है। हमें परम कल्याण को मन के भीतर ही स्थापित करना चाहिए। यदि वह मनुष्य के सर्वोत्तम भाग अर्थात बुद्धि से हटकर उसके निम्नतम भाग, अर्थात इन्द्रियों में चला जाए और उन इन्द्रियों में भी, जो मूक पशुओं में मनुष्यों की अपेक्षा अधिक तीव्र होती हैं, तो वह अपने वास्तविक अर्थ को खो देता है। हमारे सर्वोच्च सुख का आधार शरीर नहीं होना चाहिए। जो कल्याण विवेक प्रदान करता है, वही वास्तविक कल्याण है। वह दृढ़, स्थायी और शाश्वत होता है। वह नष्ट नहीं हो सकता न ही घटाया या कम किया जा सकता है। इसके विपरीत, अन्य जिन वस्तुओं को लोग कल्याण कहते हैं, वे केवल लोकमत के आधार पर कल्याण कहलाती हैं। उनका नाम तो वास्तविक कल्याण जैसा है। किन्तु उनमें कल्याण का वास्तविक स्वरूप नहीं होता। इसी कारण उन्हें ‘सुविधाएँ’ कहना अधिक उचित है अथवा हमारे स्टोइक मत की भाषा में उन्हें ‘वरणीय वस्तुएँ’ (preferred things) कहा जाना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि वे केवल हमारी संपत्ति हैं, हमारे व्यक्तित्व का अंग नहीं। वे हमारे पास रहें, परन्तु केवल इस चेतना के साथ कि वे बाहरी वस्तुएँ हैं, हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं। यदि वे हमारे पास हों भी तो उन्हें ऐसे साधारण सेवकों के समान समझना चाहिए जिन पर किसी को गर्व करने का कोई कारण नहीं होता। इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति उस वस्तु पर अभिमान करे, जिसे उसने स्वयं अपने पुरुषार्थ से प्राप्त या निर्मित नहीं किया?
ये सभी वस्तुएँ हमें प्राप्त हों, परन्तु वे हमसे इस प्रकार न चिपक जाएँ कि यदि कभी हमसे छिन जाएँ तो उनका जाना हमारे हृदय को विदीर्ण कर दे। उनका उपयोग करें, उन पर गर्व न करें। उनका उपयोग भी संयम के साथ करें, मानो वे उधार की वस्तुएँ हों जिन्हें एक दिन लौटाना ही पड़ेगा। जो व्यक्ति उन्हें विवेकहीन ढंग से अपना मानकर रखता है, वह उन्हें अधिक समय तक नहीं रख पाता क्योंकि संयम के अभाव में उसकी प्रचुर संपत्ति ही उसके लिए बोझ बन जाती है। यदि वह इन क्षणभंगुर लाभों पर भरोसा करता है तो वे शीघ्र ही उसका साथ छोड़ देते हैं। यदि वे साथ न भी छोड़ें, तब भी वे उसके लिए कष्ट का कारण बने रहते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जो विपुल वैभव का त्याग गरिमा और सहजता के साथ कर सके हों। अधिकांश लोग तो उसी समृद्धि के साथ पतन को प्राप्त होते हैं जिसने उन्हें ऊँचाई तक पहुँचाया था। जिस वस्तु ने उन्हें ऊपर उठाया था, अंततः वही उनके ऊपर भार बनकर उन्हें नीचे गिरा देती है।
By Paul Klee
अतः बुद्धि हमारी सहायता करे, वही हमारी इच्छाओं पर सीमा लगाए और हमारे जीवन का विवेकपूर्ण संचालन करे। क्योंकि अपव्यय अपने ही साधनों को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति असंयमी है, वह तब तक टिक नहीं सकता जब तक विवेक उसे संयमित और नियंत्रित न करे। तुम अनेक नगरों का इतिहास देख सकते हो। वे अपनी शक्ति और समृद्धि के चरम पर पहुँचकर भी विलासिता और आत्म-भोग में डूबे हुए शासन के कारण नष्ट हो गए। वीरता ने जो कुछ अर्जित किया था, उसे असंयम ने नष्ट कर दिया। हमें ऐसे विनाश से स्वयं को बचाना चाहिए। किन्तु ऐसा कोई दुर्ग नहीं है जिसे भाग्य भेद न सके। इसलिए हमारी सुरक्षा बाहरी नहीं, भीतर होनी चाहिए। यदि मन का वह भीतरी गढ़ सुरक्षित है तो मनुष्य पर आक्रमण तो किया जा सकता है, पर उसे कभी पराजित या बंदी नहीं बनाया जा सकता। क्या तुम जानना चाहते हो कि यह भीतरी सुरक्षा क्या है? यह है, जो कुछ भी घटित हो, उससे रुष्ट न होना। यह समझना कि जो बातें तुम्हें हानि पहुँचाती हुई प्रतीत होती हैं, वे भी इस समस्त विश्व की व्यवस्था और उसके संरक्षण का ही एक अंग हैं तथा सृष्टि के नियत क्रम और उद्देश्य की पूर्ति करती हैं। जो कुछ ईश्वर को स्वीकार है, उसमें प्रसन्न रहना और केवल इसी कारण अपने तथा अपनी सामर्थ्य पर गर्व करना कि तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकता कि तुम अपने दुःखों से भी ऊपर उठ जाते हो। यह कि विवेक, जो सबसे महान शक्ति है, के बल पर तुम हर दुर्भाग्य, हर पीड़ा और हर आघात पर विजय प्राप्त कर लेते हो।
विवेक से प्रेम करो! वही प्रेम तुम्हें सबसे कठिन परीक्षाओं का सामना करने के लिए सुसज्जित कर देगा। अपने शावकों के प्रति प्रेम ही सिंहनी को भाले की नोक पर झपट पड़ने के लिए प्रेरित करता है। उसका उग्र स्वभाव और सहज आवेग उसे अजेय बना देते हैं। यश की लालसा अनेक युवकों को अग्नि और तलवार, दोनों का तिरस्कार करने के लिए प्रेरित करती है। साहस की केवल छाया और आभास ही कुछ लोगों को स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करने के लिए पर्याप्त होता है। जब इन सबमें इतनी शक्ति हो सकती है तो विवेक, जो इन सबसे अधिक साहसी और अटल है, भय और संकट के प्रत्येक अवसर पर उससे भी अधिक दृढ़ता और वीरता के साथ आगे बढ़ता है।
कोई कह सकता है, “यह कहना व्यर्थ है कि सम्माननीय (सद्गुणपूर्ण) के अतिरिक्त कोई और वस्तु अच्छी नहीं है। ऐसा सिद्धांत तुम्हें भाग्य के प्रहारों से सुरक्षित और अभेद्य नहीं बना सकता। क्योंकि तुम्हारा दर्शन आज्ञाकारी संतान, अपने देश की उत्तम परम्पराएँ और सद्गुणी माता-पिता, इन सबको भी अच्छी वस्तुओं में गिनता है। जब ये संकट में पड़ेंगे, तब तुम बिना चिंता के उन्हें नहीं देख सकोगे। अपने देश पर आक्रमण होने से, अपनी संतान की मृत्यु से और अपने माता-पिता के दास बना लिए जाने से तुम अवश्य ही व्याकुल हो जाओगे।”
इसके उत्तर में मैं पहले उन तर्कों को प्रस्तुत करूँगा जो सामान्यतः हमारे दर्शन-मत की ओर से दिए जाते हैं। फिर उसके बाद मैं एक अतिरिक्त उत्तर दूँगा, जो मेरे विचार में इस विषय पर दिया जाना चाहिए।
उन वस्तुओं की स्थिति भिन्न है, जिनके नष्ट हो जाने पर उनके स्थान पर कोई कष्ट आ जाता है। उदाहरण के लिए, जब अच्छा स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है तो उसके स्थान पर रोग आ जाता है। जब तीक्ष्ण दृष्टि चली जाती है तो हम अंधत्व से पीड़ित हो जाते हैं। जब घुटने की नसें कट जाती हैं तो हम केवल तेज़ दौड़ने की क्षमता ही नहीं खोते बल्कि लंगड़े भी हो जाते हैं। किन्तु जिन वस्तुओं का मैंने अभी उल्लेख किया है, उनके साथ ऐसा नहीं होता। यह कैसे? यदि मैंने एक अच्छे मित्र को खो दिया तो उसके स्थान पर मुझे अनिवार्य रूप से किसी विश्वासघाती मित्र का सामना नहीं करना पड़ता। यदि मेरी सद्गुणी संतान का निधन हो गया तो उसके स्थान पर उपेक्षापूर्ण या दुष्चरित्र संतान नहीं आ जाती।
इसके अतिरिक्त, एक और बात यह है कि इन परिस्थितियों में वास्तव में मित्र या संतान नष्ट नहीं होते बल्कि केवल उनके शरीर नष्ट होते हैं। अच्छाई (सद्गुण) केवल एक ही प्रकार से नष्ट हो सकती है, जब वह बुराई में परिवर्तित हो जाए। किन्तु प्रकृति इसकी अनुमति नहीं देती। इसलिए प्रत्येक सद्गुण और सद्गुण से प्रेरित प्रत्येक कर्म अक्षुण्ण और अविनाशी रहता है। फिर भी, यदि वास्तव में तुम्हारे मित्र और वे सद्गुणी बच्चे, जो एक माता-पिता की सभी आकांक्षाओं की पूर्ति थे, इस संसार से चले भी गए हों, तब भी उस रिक्तता को भरने वाली एक वस्तु हमारे पास रहती है। तुम पूछोगे, “वह क्या है?” वही वस्तु जिसने उन्हें श्रेष्ठ बनाया था, सद्गुण। सद्गुण कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ता। वह सम्पूर्ण मन को अपने अधिकार में ले लेता है और हर प्रकार की हानि के अनुभव को समाप्त कर देता है। सद्गुण अपने आप में ही पर्याप्त है क्योंकि उसी में सभी शुभ वस्तुओं का बल और स्रोत निहित है। यदि बहता हुआ जल कहीं रोक दिया जाए या उसका मार्ग बदल दिया जाए तो इससे क्या अंतर पड़ता है, जब उसका स्रोत अभी भी अक्षुण्ण और अविरल बना हुआ है? तुम यह नहीं कहोगे कि किसी व्यक्ति का जीवन उसके बच्चों के जीवित रहने पर अधिक न्यायपूर्ण, अधिक संयमी, अधिक बुद्धिमान या अधिक सम्माननीय हो जाता है। उनके न रहने पर इन गुणों से वंचित हो जाता है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि उसका जीवन पहले से अधिक अच्छा था। मित्रों के बढ़ जाने से कोई व्यक्ति अधिक बुद्धिमान नहीं हो जाता और उनके चले जाने से वह अधिक मूर्ख भी नहीं हो जाता। अतः न मित्र किसी को वास्तव में अधिक सुखी बनाते हैं और न उनके अभाव से कोई वास्तव में अधिक दुःखी हो जाता है। जब तक सद्गुण पूर्ण, सुरक्षित और अक्षुण्ण है, तब तक तुम किसी भी हानि का वास्तविक अनुभव नहीं करोगे।
“तुम क्या कह रहे हो? कोई व्यक्ति अपने मित्रों और संतानों से घिरा होने पर अधिक सुखी कैसे नहीं हो सकता?” ऐसा क्यों होना चाहिए? परम शुभ न तो घटता है और न ही बढ़ता है। वह सदैव अपनी पूर्णता में स्थित रहता है, चाहे भाग्य का व्यवहार जैसा भी हो। कोई व्यक्ति दीर्घायु होकर वृद्धावस्था तक पहुँचे या वृद्ध होने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए। परम शुभ का परिमाण दोनों ही स्थितियों में समान रहता है, यद्यपि उसके जीवन की अवधि भिन्न हो सकती है। जैसे तुम एक बड़ा वृत्त बनाओ या छोटा, उससे केवल उसके आकार का अंतर पड़ता है, उसके वृत्त होने का नहीं। एक वृत्त बहुत समय तक बना रह सकता है जबकि दूसरे को तुम तुरंत मिटाकर उसी धूल में मिला सकते हो, जिसमें वह बनाया गया था। फिर भी दोनों अपने स्वरूप की दृष्टि से समान हैं। सीधापन (सरलता) न तो आकार पर निर्भर करता है, न संख्या पर और न ही अवधि पर। उसे न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। इसी प्रकार, किसी सम्मानपूर्ण और सद्गुणमय जीवन को, चाहे वह सौ वर्षों तक चला हो, तुम जितनी भी अवधि तक सीमित कर दो, यहाँ तक कि केवल एक दिन का ही क्यों न कर दो, उसका सम्मान और सद्गुण समान ही बना रहता है।
कभी-कभी सद्गुण अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करता है। वह राज्यों, नगरों और प्रान्तों का शासन करता है। मित्रताओं का निर्वाह करता है। पड़ोसियों और संतानों के प्रति विविध उत्तरदायित्वों का पालन करता है। कभी ऐसा भी होता है कि वही सद्गुण निर्धनता, निर्वासन या प्रियजनों के वियोग जैसी परिस्थितियों की संकीर्ण सीमाओं में सिमट जाता है। किन्तु जब वह राजसत्ता के उच्च शिखर से उतरकर एक सामान्य नागरिक के जीवन में आ जाता है या व्यापक अधिकार-क्षेत्र से सिमटकर केवल एक परिवार अथवा घर के किसी छोटे-से कोने तक सीमित रह जाता है, तब भी उसका महत्व या महानता तनिक भी कम नहीं होती। वह तब भी उतना ही महान रहता है, चाहे वह स्वयं में ही सिमट गया हो और चारों ओर से सीमित क्यों न हो। क्योंकि उसका साहस उतना ही महान, उसका चरित्र उतना ही सीधा, उसकी बुद्धि उतनी ही स्पष्ट और उसकी न्यायप्रियता उतनी ही अडिग बनी रहती है। इसी कारण वह समान रूप से सुखी भी रहता है। वास्तविक सुख केवल एक ही स्थान में निवास करता है— मन के भीतर। उस सच्चे सुख की स्थिरता, उसकी महानता तथा उसकी शान्ति दिव्य और मानवीय दोनों प्रकार की वस्तुओं के यथार्थ ज्ञान के बिना प्राप्त नहीं हो सकती।
अब मैं वह उत्तर प्रस्तुत करता हूँ, जिसे मैंने कहा था कि मैं अपनी ओर से दूँगा। बुद्धिमान व्यक्ति संतान या मित्रों के वियोग से व्यथित नहीं होता क्योंकि वह उनकी मृत्यु को उसी भाव से स्वीकार करता है, जिस भाव से अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करता है। वह अपनी मृत्यु से जितना नहीं डरता, उतना ही वह उनकी मृत्यु पर शोक भी नहीं करता। क्योंकि सद्गुण का आधार आन्तरिक एकरूपता और सामंजस्य है। उसके सभी कर्म परस्पर मेल खाते हैं और एक-दूसरे के अनुरूप होते हैं। यदि वह मन, जिसे स्वभावतः ऊँचा और उदात्त होना चाहिए, इच्छा या शोक के कारण नीचे गिर जाए तो यह सामंजस्य नष्ट हो जाता है। हर प्रकार की चिंता, व्याकुलता और कर्तव्य के प्रति अनिच्छा सम्माननीय नहीं है। इसके विपरीत, सम्माननीय आचरण सदैव निश्चिन्त, निर्बाध, निर्भय और प्रत्येक अवसर पर तत्पर रहता है।
“तुम क्या कहना चाहते हो? क्या बुद्धिमान व्यक्ति किसी प्रकार का भावावेग भी अनुभव नहीं करता? क्या उसका रंग नहीं उड़ता, उसके चेहरे पर भय के चिह्न नहीं उभरते, उसके अंग शीतल नहीं पड़ते और क्या उसके साथ वे सब शारीरिक प्रतिक्रियाएँ नहीं होतीं जो मन की इच्छा से नहीं, बल्कि प्रकृति की अनैच्छिक प्रेरणा से उत्पन्न होती हैं?” मैं स्वीकार करता हूँ कि ऐसा होता है। किन्तु उसकी यह दृढ़ धारणा कभी नहीं बदलती कि इनमें से कोई भी घटना वास्तव में बुरी नहीं है और न ही ऐसी है जिससे एक स्वस्थ और स्थिर मन को भयभीत होना चाहिए। जो कुछ करना आवश्यक होगा, वह उसे तुरंत और साहसपूर्वक करेगा। क्योंकि यह कहा गया है कि मूर्खता का लक्षण यह है कि उसके सभी कार्य आलस्य, अनिच्छा और आन्तरिक विरोध के साथ किए जाते हैं। उसका शरीर एक दिशा में बढ़ता है और उसका मन दूसरी दिशा में भटकता है। परस्पर विरोधी इच्छाएँ उसे भीतर ही भीतर विभाजित कर देती हैं। जिन वस्तुओं पर वह घमण्ड और मिथ्या अभिमान करता है, वही अन्ततः उसे तुच्छ बना देती हैं और जिन कार्यों पर वह गर्व करता है, उन्हें भी वह वास्तव में अपनी स्वेच्छा से नहीं करता।
किन्तु जब मूर्ख व्यक्ति किसी आशंका से ग्रस्त होता है तो वह उसकी कल्पना मात्र से ही उतना ही व्याकुल हो उठता है, मानो वह अनिष्ट पहले ही घटित हो चुका हो। जिस दुःख को सहने से वह डरता है, उसे वह अपने भय के कारण पहले ही सहने लगता है। जिस प्रकार शारीरिक रोग के प्रकट होने से पहले उसके कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं जैसे, शरीर में जड़ता, बिना कारण थकान, बार-बार जंभाई आना और अंगों में झुनझुनी दौड़ना। उसी प्रकार अस्वस्थ मन भी विपत्ति के वास्तव में आने से बहुत पहले ही उससे विचलित हो उठता है। वह भविष्य के कष्टों की पहले ही कल्पना कर लेता है और समय आने से पूर्व ही उनसे पीड़ित होने लगता है। किन्तु इससे अधिक मूर्खतापूर्ण और क्या हो सकता है कि जो घटना अभी घटी ही नहीं है, उसके कारण पहले से ही दुःख भोगा जाए? भविष्य के कष्टों की प्रतीक्षा करने के स्थान पर तुम उन्हें स्वयं अपने पास बुला लेते हो। यदि उन्हें पूरी तरह दूर नहीं कर सकते तो कम-से-कम उन्हें समय से पहले मत बुलाओ। उन्हें यथासंभव विलंब से आने दो।
तुम पूछते हो, "मनुष्य भविष्य की घटनाओं से व्याकुल क्यों न हो?" मान लो किसी व्यक्ति को यह बताया जाए कि आज से पचास वर्ष बाद उसे यातना दी जाएगी। वह तभी भयभीत होगा, जब वह उन बीच के पचास वर्षों को मानो लाँघकर सीधे उस भविष्य की चिंता में पहुँच जाए, जो अभी बहुत दूर है। ठीक यही स्थिति उन लोगों की भी होती है, जो बीते हुए घटनाक्रमों पर शोक करके स्वयं अपने मन को बीमार बना लेते हैं। वे स्वयं ही अपने दुःख के कारण खोजते फिरते हैं। अतीत और भविष्य, दोनों ही इस समय हमारे सामने उपस्थित नहीं हैं। हम न तो अतीत का अनुभव कर सकते हैं और न भविष्य का। और जहाँ प्रत्यक्ष अनुभव ही नहीं है, वहाँ पीड़ा का वास्तविक आधार भी नहीं होता।
अभी के लिए विदा