प्रिय लूसीलियस
तुम तो यह कसम खा चुके हो कि यदि मैं तुम्हें अपने दिनभर की प्रत्येक गतिविधि की सूचना न दूँ तो तुम मेरे शत्रु बन जाओगे। देखो, मैं तुम्हारे साथ अपने जीवन के विषय में कितना स्पष्ट और निष्कपट हूँ। मैं यह बात भी तुमसे साझा करता हूँ, मैं दर्शनशास्त्र का अध्ययन कर रहा हूँ! आज लगातार पाँचवाँ दिन है जब मैं दोपहर के दो बजे से दार्शनिक का व्याख्यान सुनने के लिए विद्यालय गया हूँ।
"क्या? इस उम्र में?" तुम पूछोगे। क्यों नहीं? इससे अधिक मूर्खता और क्या हो सकती है कि कोई व्यक्ति केवल इसलिए किसी बात को सीखने से वंचित रह जाए क्योंकि उसने उसे पहले नहीं सीखा था?
“तो क्या मुझे उन युवा शिष्यों का ही अनुसरण करना चाहिए?” यदि अपनी बढ़ती हुई आयु में मैं इससे अधिक कोई लज्जाजनक कार्य नहीं कर रहा तो मैं अपने को भाग्यशाली ही मानूँगा। यह ऐसा विद्यालय है जहाँ हर आयु के लोगों का स्वागत है।
“क्या बुढ़ापा इसी के लिए है कि व्यक्ति युवाओं के पीछे-पीछे विद्यालय जाए?” तो क्या बुढ़ापे में मुझे रंगमंच जाना चाहिए? क्या मुझे अपनी पालकी में बैठकर सर्कस (रथ-दौड़ के मैदान) जाना चाहिए, हर ग्लैडिएटर के युद्ध में उपस्थित होना चाहिए और फिर भी किसी दार्शनिक के पास जाने में लज्जा करनी चाहिए? जब तक तुम्हारे भीतर ज्ञान का अभाव है, तब तक तुम्हें सीखते रहना चाहिए अथवा, यदि उस कहावत पर विश्वास करें तो जब तक जीवित हो, तब तक सीखते रहना चाहिए। यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, जब तक जीवन है, तब तक यह सीखते रहना कि जीवन कैसे जीना चाहिए। इस विषय में मेरे पास भी सिखाने के लिए एक बात है। “वह क्या?” तुम पूछते हो। वह यह है कि वृद्ध व्यक्ति के पास भी सीखने के लिए कुछ न कुछ अवश्य होता है।
परन्तु जब-जब मैं उस विद्यालय में प्रवेश करता हूँ, तब-तब मुझे समूची मानव जाति पर लज्जा आती है। जैसा कि तुम जानते हो, मेट्रोनैक्स के घर पहुँचने के लिए मुझे नेपल्स के रंगमंच के सामने से होकर जाना पड़ता है। वहाँ का रंगमंच लोगों से खचाखच भरा रहता है। उत्साह से भरी भीड़ यह निर्णय करती है कि सबसे अच्छा बाँसुरी-वादक कौन है। तुरही-वादक के भी अपने प्रशंसक हैं और उद्घोषक के भी। किन्तु जहाँ यह प्रश्न उठता है कि वास्तव में अच्छा मनुष्य कौन है और जहाँ यह सिखाया जाता है कि अच्छा मनुष्य कैसे बना जाए, वहाँ की आसन-पंक्तियाँ लगभग खाली पड़ी रहती हैं। सामान्य लोगों की धारणा यह होती है कि वहाँ बैठने वालों के पास करने के लिए कोई और काम नहीं है। वे उन्हें निकम्मे और निष्क्रिय लोग कहकर उपहास करते हैं। किन्तु मुझे ऐसे उपहास की कोई परवाह नहीं। अज्ञानी लोगों की आलोचना ऐसी वस्तु नहीं है जिससे व्याकुल हुआ जाए। जिसका लक्ष्य श्रेष्ठ और सम्माननीय हो, उसे उनके उपहास का भी तिरस्कार कर देना चाहिए।
इसलिए, लूसीलियस, शीघ्रता करो। जल्दी आगे बढ़ो, कहीं ऐसा न हो कि जो मेरे साथ हुआ, वही तुम्हारे साथ भी हो और तुम्हें वृद्धावस्था में आकर विद्यार्थी बनना पड़े। पर वास्तव में तुम्हें शीघ्रता इसलिए करनी चाहिए कि जिस विद्या का तुमने अध्ययन आरम्भ किया है, वह ऐसी है जिसे यदि तुम वृद्धावस्था में भी सीखना शुरू करो, तब भी उसे पूरी तरह आत्मसात कर पाना अत्यन्त कठिन है।
“तुम पूछते हो, ‘मैं कितनी प्रगति कर सकता हूँ?’ जितना प्रयास करोगे, उतनी ही प्रगति करोगे। तुम किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हो? केवल संयोगवश किसी को भी बुद्धिमत्ता प्राप्त नहीं होती। धन अपने आप आ सकता है। सार्वजनिक पद तुम्हें प्रदान किया जा सकता है। लोकप्रियता और प्रभाव भी संभव है कि बिना किसी विशेष प्रयास के तुम्हें मिल जाएँ। परन्तु सद्गुण (Virtue) अपने आप कभी प्राप्त नहीं होता। उसे पहचानने और प्राप्त करने के लिए जो परिश्रम करना पड़ता है, वह न तो सरल है और न ही अल्पकालिक। फिर भी वह प्रयास करने योग्य है क्योंकि उसी के द्वारा मनुष्य एक ही साथ सभी वास्तविक शुभों का अधिकारी बन जाता है। वास्तव में शुभ केवल एक ही है। वह है सम्माननीय और नैतिक रूप से श्रेष्ठ आचरण। जिन वस्तुओं की संसार प्रतिष्ठा करता है और जिन्हें लोग बाहरी सफलता का प्रतीक मानते हैं, उनमें तुम्हें न तो कोई वास्तविक मूल्य मिलेगा और न ही कोई स्थायी या निश्चित आधार।
अब मैं यह स्पष्ट करूँगा कि केवल सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) ही वास्तविक शुभ क्यों है क्योंकि तुम्हारा विचार है कि अपने पिछले पत्र में मैं इस निष्कर्ष को सिद्ध करने के बजाय केवल उसकी प्रशंसा ही कर सका था। इसलिए अब मैं इस विषय पर कही गई बातों का संक्षिप्त प्रतिपादन करता हूँ।
प्रत्येक वस्तु की अपनी एक विशिष्ट उत्कृष्टता होती है। उर्वरता बेल (अंगूर की लता) का गुण है। उत्तम स्वाद अंगूरी मदिरा का गुण है; तीव्र गति हिरण का गुण है। यदि किसी खच्चर की बात हो तो तुम यह पूछते हो कि उसकी पीठ कितनी मजबूत है क्योंकि उसका मुख्य कार्य बोझ ढोना है। कुत्ते में, यदि उसका काम शिकार का पता लगाना है तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी तीव्र घ्राण-शक्ति होती है। यदि उसका काम शिकार का पीछा करना है तो उसकी तेज़ दौड़ने की क्षमता। यदि उसे शिकार पर झपटना और उसे दबोचना है तो उसका साहस उसकी सर्वोत्तम विशेषता है। प्रत्येक प्राणी में वही गुण सबसे श्रेष्ठ माना जाना चाहिए, जिसके लिए वह स्वभावतः उत्पन्न हुआ है और जिसके आधार पर उसका मूल्यांकन किया जाता है।तो फिर मनुष्य का विशिष्ट गुण क्या है? वह है—विवेक (Reason)। विवेक के कारण ही मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और देवताओं के बाद उसका स्थान आता है। इसलिए पूर्ण विकसित और परिष्कृत विवेक ही मनुष्य की विशिष्ट उत्कृष्टता है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह पशुओं और वनस्पतियों के साथ समान रूप से साझा किया जाता है।
मनुष्य बलवान है परन्तु सिंह भी बलवान होते हैं। वह सुंदर है परन्तु मोर भी सुंदर होते हैं। वह तीव्र गति से दौड़ सकता है परन्तु घोड़े भी तेज़ होते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि इन सभी गुणों में मनुष्य अन्य प्राणियों से कमतर है। मेरा प्रश्न यह नहीं है कि मनुष्य का सबसे बड़ा गुण कौन-सा है बल्कि यह है कि ऐसा कौन-सा गुण है जो केवल मनुष्य का अपना विशिष्ट गुण है। मनुष्य के पास शरीर है परन्तु वृक्षों के पास भी शरीर है। उसमें प्रेरणा तथा अपनी इच्छा से चलने-फिरने की क्षमता है परन्तु यह क्षमता पशुओं और यहाँ तक कि कीड़ों में भी होती है। उसके पास वाणी है परन्तु कुत्तों का भौंकना उससे कहीं अधिक ऊँचा होता है, गरुड़ की पुकार उससे कहीं अधिक तीव्र होती है, बैलों की गर्जना उससे कहीं अधिक गंभीर होती है। लार्क (एक मधुर स्वर में गाने वाली चिड़िया) का कलरव उससे कहीं अधिक मधुर और संगीतपूर्ण होता है। तो फिर मनुष्य की विशिष्टता क्या है? वह है— विवेक। जब यह विवेक सही रूप से विकसित होकर पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब वह मनुष्य-स्वभाव की परम और आनंदपूर्ण सिद्धि को प्राप्त करता है।
अतः यदि प्रत्येक वस्तु तब प्रशंसा की अधिकारी होती है, जब वह अपने विशिष्ट गुण को पूर्ण विकसित करके अपने स्वभाव की चरम अवस्था तक पहुँच जाती है। यदि मनुष्य का विशिष्ट गुण विवेक है तो जो व्यक्ति अपने विवेक को पूर्णता तक विकसित कर लेता है, वह प्रशंसा का अधिकारी है और उसने अपने मानवीय स्वभाव की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर ली है। इसी पूर्ण विकसित विवेक को सद्गुण (Virtue) कहा जाता है। यही नैतिक रूप से सम्माननीय (The Honorable) भी है।
अतः जो वस्तु केवल मनुष्य की अपनी है, वही मनुष्य का एकमात्र वास्तविक शुभ है। क्योंकि इस समय हमारा प्रश्न यह नहीं है कि 'शुभ क्या है' बल्कि यह है कि 'मनुष्य का शुभ क्या है।' यदि विवेक के अतिरिक्त कोई भी गुण केवल मनुष्य का अपना नहीं है तो विवेक ही उसका एकमात्र वास्तविक शुभ होगा। किन्तु इस शुभ का मूल्यांकन मनुष्य के अन्य सभी गुणों के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बुरा सिद्ध होता है तो उसकी निंदा की जाती है। यदि वह अच्छा सिद्ध होता है तो उसकी प्रशंसा की जाती है। इसलिए जिस गुण के आधार पर किसी मनुष्य की प्रशंसा या निंदा की जाती है, वही उसका प्रधान और वास्तव में एकमात्र विशिष्ट गुण है।
तुम्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह एक शुभ है। तुम्हारा संदेह केवल इस बात को लेकर है कि क्या यही मनुष्य का एकमात्र शुभ है। मान लो कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके पास अन्य सभी प्रकार के लाभ हों, उत्तम स्वास्थ्य, अपार धन, प्रतिष्ठित कुल-परंपरा और ऐसा विशाल प्रांगण जहाँ आगंतुकों की भीड़ लगी रहती हो। किन्तु यदि यह निश्चित हो कि वह एक बुरा मनुष्य है तो तुम उसकी निंदा ही करोगे। इसके विपरीत, यदि किसी व्यक्ति के पास उन सबमें से कोई भी वस्तु न हो, न धन, न ग्राहकों या अनुयायियों की भीड़, न उच्च कुल में जन्म और न ही गौरवशाली पूर्वजों की लंबी परंपरा। किन्तु यदि यह निश्चित हो कि वह एक अच्छा मनुष्य है तो तुम उसकी प्रशंसा करोगे। इससे स्पष्ट है कि यही वास्तव में मनुष्य का एकमात्र शुभ है। क्योंकि जिसके पास यह है, वह अन्य सभी बाहरी लाभों से वंचित होने पर भी प्रशंसा का अधिकारी होता है। जिसके पास यह नहीं है, वह अन्य सभी प्रकार के बाहरी लाभों से संपन्न होने पर भी निंदनीय और तिरस्कार के योग्य माना जाता है।
मनुष्य के साथ भी वही स्थिति है जो अन्य वस्तुओं के साथ होती है। हम उस जहाज़ को अच्छा नहीं कहते जो महँगे रंगों से सजाया गया हो या जिसकी नोक सोने-चाँदी से मढ़ी हुई हो या जिसका भीतरी भाग हाथीदाँत से अलंकृत हो अथवा जो राजाओं के खजानों और अनेक राष्ट्रों की संपत्ति से लदा हुआ हो। बल्कि अच्छा जहाज़ वह है जो दृढ़ और संतुलित हो, जिसकी जोड़ियाँ इतनी मजबूत हों कि पानी भीतर न आने पाए, जो समुद्र के हर प्रहार को सह सके और जो तेज़ गति से चलने वाला तथा हवाओं के झोंकों से विचलित न होने वाला हो। इसी प्रकार, हम उस तलवार को अच्छा नहीं कहते जिसकी पेटी सोने से जड़ी हो या जिसकी म्यान रत्नों से अलंकृत हो। अच्छी तलवार वह है जिसकी धार अत्यन्त तेज़ हो और जिसकी नोक किसी भी प्रकार के कवच को भेदने में सक्षम हो। किसी पैमाने (रूलर) के विषय में भी तुम यह नहीं पूछते कि वह कितना सुंदर है बल्कि यह देखते हो कि वह कितना सीधा और सही है। प्रत्येक वस्तु की प्रशंसा उसी गुण के लिए की जाती है जो उसका अपना विशिष्ट गुण है और जिसके कारण उसे बनाया या प्राप्त किया जाता है। इसी प्रकार, किसी मनुष्य का मूल्यांकन करते समय यह नहीं देखा जाना चाहिए कि उसके पास कितनी खेती की भूमि है, निवेश के लिए कितनी पूँजी है, उसके पीछे कितने ग्राहक या अनुयायी चलते हैं, वह कितने महँगे बिस्तर पर सोता है, या उसके पीने का पात्र कितना पारदर्शी और मूल्यवान है। बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि वह कितना अच्छा मनुष्य है। मनुष्य तभी अच्छा कहलाता है जब उसका विवेक पूर्ण रूप से विकसित हो, सीधा और सही हो तथा उसके स्वभाव के उद्देश्य के अनुरूप कार्य करता हो। इसी को सद्गुण (Virtue) कहा जाता है। यही नैतिक रूप से सम्माननीय (The Honorable) है और यही मनुष्य का एकमात्र वास्तविक शुभ है। क्योंकि केवल विवेक ही मनुष्य को पूर्ण बनाता है। केवल वही उसे वास्तविक तथा पूर्ण सुख प्रदान करता है। अतः जो वस्तु अकेले मनुष्य को पूर्णतः सुखी बनाती है, वही उसका एकमात्र वास्तविक शुभ है।
हम यह भी कहते हैं कि जो वस्तुएँ सद्गुण से उत्पन्न होती हैं और उससे अभिन्न रूप से जुड़ी होती हैं अर्थात सद्गुण से प्रेरित सभी कर्म, वे भी शुभ हैं। फिर भी, सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक शुभ है क्योंकि उसके बिना कोई भी वस्तु वास्तव में शुभ नहीं हो सकती। यदि प्रत्येक वास्तविक शुभ मन में ही निहित है तो जो कुछ भी मन को अधिक दृढ़, अधिक ऊँचा और अधिक व्यापक बनाता है, वही शुभ है। यह कार्य केवल सद्गुण ही करता है— वह मन को सुदृढ़, उदात्त और विशाल बनाता है। इसके विपरीत, जिन अन्य वस्तुओं की हम इच्छा करते हैं, वे मन को नीचे गिराती हैं और उसे दुर्बल बनाती हैं। जब वे हमें ऐसा प्रतीत कराती हैं कि मानो वे हमें ऊँचा उठा रही हों, तब भी वे वास्तव में केवल हमारे अहंकार को फुलाती हैं और खोखले भ्रम से हमें धोखा देती हैं। अतः एकमात्र वास्तविक शुभ वही है जिसके द्वारा मन पहले से अधिक श्रेष्ठ और उत्तम बनता है।
सम्पूर्ण जीवन के सभी कर्म इस विचार से संचालित होते हैं कि क्या सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) है और क्या नीच अथवा लज्जाजनक है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए— इसका निर्णय भी इसी आधार पर किया जाता है। मैं इसका अर्थ स्पष्ट करता हूँ। एक सद्गुणी मनुष्य वही कार्य करेगा जिसे वह सम्माननीय समझता है, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो, चाहे उसमें कितना ही बड़ा संकट क्यों न हो। इसके विपरीत, वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जिसे वह नीच या लज्जाजनक समझता हो, चाहे उससे उसे धन मिले, सुख मिले या सत्ता प्राप्त हो जाए। कोई भी भय उसे सम्माननीय मार्ग से विचलित नहीं कर सकता और कोई भी प्रलोभन उसे नीच कर्म की ओर आकर्षित नहीं कर सकता। इसलिए वह बिना किसी शर्त के सम्माननीय का अनुसरण करेगा और बिना किसी शर्त के गलत कर्म से बचेगा परन्तु ऐसा तभी संभव है जब सद्गुण के अतिरिक्त कोई अन्य शुभ न हो और लज्जाजनक आचरण के अतिरिक्त कोई अन्य बुराई न हो। तब वह जीवन के प्रत्येक कार्य में केवल इन्हीं दो बातों—सम्माननीय और गलत— को अपना मार्गदर्शक बनाएगा।
यदि केवल सद्गुण ही ऐसा है जो कभी भ्रष्ट नहीं होता और जो सदैव अपने वास्तविक स्वरूप को बनाए रखता है, तो वही एकमात्र ऐसा शुभ है जो कभी भी शुभ के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन सकता। वह परिवर्तन के हर प्रकार के जोखिम से परे है। मूर्खता धीरे-धीरे बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ सकती है परन्तु बुद्धिमत्ता कभी फिर से मूर्खता में नहीं गिरती।
जैसा कि मैंने पहले भी कहा है (और शायद तुम्हें स्मरण होगा), कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने बिना अधिक विचार किए, केवल आकस्मिक आवेग में, उन वस्तुओं को अपने पैरों तले रौंद दिया है जिन्हें सामान्य लोग या तो पाने की तीव्र इच्छा रखते हैं या जिनसे अत्यधिक भय खाते हैं। ऐसे लोगों के उदाहरण दिए जा सकते हैं। किसी ने अपना समस्त धन त्याग दिया। किसी ने अपना हाथ अग्नि में रख दिया। कोई यातना सहते हुए भी मुस्कुराता रहा। किसी ने अपने बच्चों के अंतिम संस्कार में एक आँसू तक नहीं बहाया और कोई मृत्यु का सामना बिना किसी भय या व्याकुलता के कर गया। किन्तु उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि प्रेम, क्रोध या किसी प्रबल इच्छा ने उन्हें ऐसे संकटों का सामना करने के लिए प्रेरित किया था। यदि मन की क्षणिक दृढ़ता, जो केवल तत्काल उत्पन्न हुए आवेग से आती है, इतना कुछ कर सकती है तो सद्गुण उससे कहीं अधिक सामर्थ्यवान होगा। क्योंकि सद्गुण किसी क्षणिक आवेग पर आधारित नहीं होता। वह हर परिस्थिति में समान रूप से दृढ़ रहता है और उसकी शक्ति स्थिर एवं अटल होती है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन वस्तुओं का तिरस्कार अविवेकी लोग भी कभी-कभी कर देते हैं और जिन्हें बुद्धिमान लोग सदैव तुच्छ समझते हैं, वे न तो वास्तव में शुभ हैं और न ही अशुभ। इसलिए सद्गुण ही एकमात्र वास्तविक शुभ है। वही सौभाग्य और दुर्भाग्य— इन दोनों विपरीत परिस्थितियों के बीच, सिर ऊँचा करके चलता है और दोनों को समान तिरस्कार की दृष्टि से देखता है।
यदि तुम यह मान लो कि सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के अतिरिक्त भी कोई अन्य वस्तु शुभ है तो प्रत्येक सद्गुण के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखना कठिन हो जाएगा। क्योंकि कोई भी सद्गुण तब तक स्थिर नहीं रह सकता जब तक वह अपने अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की ओर दृष्टि रखता है। यदि ऐसा हो तो यह विवेक (Reason) के विरुद्ध होगा। जबकि सभी सद्गुण विवेक पर ही आधारित हैं। यह सत्य के भी विरुद्ध होगा क्योंकि विवेक के बिना सत्य का अस्तित्व नहीं हो सकता। जो विचार सत्य के विरुद्ध हो, वह असत्य ही होता है।
तुम यह स्वीकार करते हो कि एक सद्गुणी मनुष्य का देवताओं के प्रति सर्वोच्च श्रद्धा और सम्मान होना अनिवार्य है। इसलिए उसके साथ जो कुछ भी घटित होता है, वह उसे शांत मन से सहन करता है क्योंकि वह जानता है कि वह सब उसी दैवी व्यवस्था के अनुसार हुआ है जिसके द्वारा समस्त घटनाओं का संचालन होता है। यदि यह सत्य है तो उसके लिए सम्माननीय आचरण ही एकमात्र शुभ होगा। क्योंकि उसी में देवताओं की आज्ञा का पालन निहित है— भाग्य के आघातों पर क्रोधित न होना, अपने भाग्य की शिकायत न करना बल्कि धैर्यपूर्वक अपने नियत भाग्य को स्वीकार करना और जैसा आदेश हो वैसा ही आचरण करना। यदि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई और भी शुभ हो तो हमारा मन जीवन और जीवन की बाहरी सुविधाओं के प्रति तृष्णा से भर जाएगा। ऐसी तृष्णा असहनीय, कभी समाप्त न होने वाली और जिसकी कोई निश्चित सीमा न हो, ऐसी होती है। इसीलिए केवल सम्माननीय (नैतिक सद्गुण) ही वास्तविक शुभ है क्योंकि उसी की एक निश्चित सीमा है।
हमने यह भी कहा था कि यदि धन, सार्वजनिक पद और ऐसी अन्य वस्तुएँ जिनमें देवताओं का कोई भाग नहीं है, वास्तव में शुभ हों तो मनुष्यों का जीवन देवताओं के जीवन से भी अधिक सुखी माना जाएगा। अब इस पर एक और विचार जोड़ो। यदि वास्तव में शरीर से मुक्त होने के बाद हमारी आत्माएँ बनी रहती हैं तो शरीर से मुक्त होने पर उनकी अवस्था शरीर में रहते समय की अपेक्षा अधिक सुखद होगी। परन्तु यदि वे वस्तुएँ, जिनका उपयोग हम केवल शरीर के माध्यम से करते हैं, वास्तव में शुभ हैं तो शरीर छोड़ने के बाद आत्माओं की स्थिति पहले से भी अधिक दयनीय हो जाएगी। यह उस स्वाभाविक धारणा के बिल्कुल विपरीत है कि जो आत्माएँ शरीर के बंधन से मुक्त होकर समस्त ब्रह्माण्ड में विचरण करती हैं, वे उन आत्माओं से अधिक सुखी होती हैं जो शरीर रूपी घेरे में मानो घिरी हुई रहती हैं। मैंने यह भी कहा था कि यदि वे वस्तुएँ शुभ हैं जो मनुष्यों की अपेक्षा वाणीहीन पशुओं से भी समान रूप से संबंधित हैं तो फिर पशुओं को भी सुखी माना जाना चाहिए। परन्तु यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) के लिए मनुष्य को हर प्रकार का कष्ट सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। पर यदि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई और भी शुभ होता तो ऐसा कर्तव्य नहीं रह जाता।
मैंने इन विषयों पर अपने पिछले पत्र में अधिक विस्तार से चर्चा की थी। यहाँ मैंने उन्हें केवल संक्षेप में प्रस्तुत किया है। किन्तु इस प्रकार का सिद्धांत तुम्हें तब तक सत्य प्रतीत नहीं होगा, जब तक तुम अपने मन को एक उच्चतर स्तर तक नहीं उठाते। अपने आप से यह प्रश्न पूछो। यदि ऐसी परिस्थिति आ जाए कि तुम्हें अपने देश के लिए प्राण देने पड़ें और अपने जीवन के बदले अपने सभी देशवासियों का जीवन बचाना हो, तो क्या तुम अपना सिर केवल स्वेच्छा से ही नहीं, बल्कि प्रसन्नतापूर्वक भी आगे बढ़ा दोगे? यदि तुम्हारा उत्तर 'हाँ' है तो इसका अर्थ है कि सम्माननीय के अतिरिक्त कोई अन्य शुभ नहीं है। क्योंकि उस एक श्रेष्ठ वस्तु को प्राप्त करने के लिए तुम बाकी सब कुछ त्याग देने को तैयार हो।
देखो, सम्माननीय (नैतिक रूप से श्रेष्ठ) में कितनी महान शक्ति होती है। उसके लिए मनुष्य राज्य के हित में अपने प्राण तक दे देता है, चाहे उसे इस आवश्यकता का बोध अपने बलिदान के ठीक पहले ही क्यों न हुआ हो। कभी-कभी किसी अत्यन्त सुंदर और महान कार्य से मनुष्य को केवल कुछ क्षणों के लिए ही सही, पर गहन आनंद की अनुभूति होती है। यद्यपि उस कार्य का कोई प्रत्यक्ष लाभ उस व्यक्ति को नहीं मिलता, जो मर चुका है और मानव जीवन से विदा हो चुका है, फिर भी उस महान कर्म की कल्पना मात्र से उसे संतोष प्राप्त होता है। एक न्यायप्रिय और साहसी मनुष्य, जब वह अपनी मृत्यु से होने वाले लाभों की कल्पना करता है। अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता, उन सभी लोगों की सुरक्षा जिनके लिए वह अपने प्राण न्योछावर कर रहा है, तब वह अपने जीवन के सर्वोच्च आनंद का अनुभव करता है। अपने ऊपर आए संकट से भी उसका हृदय प्रसन्न रहता है। यदि उसे इस महान और अंतिम कर्म को करने से मिलने वाला यह आनंद भी प्राप्त न हो, तब भी वह मृत्यु की ओर बिना हिचक आगे बढ़ेगा। क्योंकि उसके लिए सही और कर्तव्यनिष्ठ आचरण करना ही अपने आप में संतोष का कारण है। मान लो, कोई उसे रोकने के लिए अनेक तर्क दे और कहे, “तुम्हारा यह कार्य शीघ्र ही भुला दिया जाएगा। जनता से तुम्हें न तो विशेष कृतज्ञता मिलेगी और न ही सम्मान।” तो वह उत्तर देगा, “जो कुछ तुम कह रहे हो, वह सब मेरे कर्तव्य से बाहर की बातें हैं। मेरा ध्यान केवल अपने कर्तव्य पर है। मैं जानता हूँ कि वह कर्तव्य सम्माननीय है। इसलिए वह जहाँ भी मुझे बुलाता है, मैं उसके पीछे चल पड़ता हूँ।”
अतः यही एकमात्र वास्तविक शुभ है। इसे केवल पूर्णतः विवेकवान व्यक्ति ही नहीं पहचानता बल्कि वह व्यक्ति भी पहचान लेता है जिसका स्वभाव जन्म से ही उदात्त और श्रेष्ठ है। अन्य सभी वस्तुएँ क्षणभंगुर और परिवर्तनशील हैं। उनका स्वामी होना भी चिंता का कारण बन जाता है। भाग्य चाहे कितनी ही उदारता से उन्हें किसी के ऊपर क्यों न उँडेल दे, वे अंततः अपने स्वामी पर बोझ बन जाती हैं। वे सदैव मनुष्य को दबाए रखती हैं और कभी-कभी तो उसका उपहास तक बन जाती हैं। जिन लोगों को तुम बैंगनी राजसी वस्त्र पहने देखते हो, उनमें से कोई भी वास्तव में भाग्यशाली नहीं है; ठीक वैसे ही जैसे रंगमंच पर राजदंड और राजसी वस्त्र धारण करने वाले अभिनेता वास्तव में राजा नहीं होते। वे मंच पर लंबे वस्त्रों और ऊँची एड़ियों वाले जूतों में दर्शकों के सामने चलते हैं, पर नाटक समाप्त होते ही वे वेष उतार देते हैं, जूते निकाल देते हैं और अपने वास्तविक रूप में लौट आते हैं। इसी प्रकार, जिन लोगों को धन और उच्च पद ने ऊँचाई पर पहुँचा दिया है, उनमें से कोई भी वास्तव में महान नहीं हो जाता। वह महान क्यों दिखाई देता है? क्योंकि तुम उसके मूल्यांकन में उसके पद और प्रतिष्ठा को भी जोड़ देते हो। कोई बौना पर्वत की चोटी पर खड़ा हो जाए, तब भी वह लंबा नहीं हो जाता। कोई विशालकाय व्यक्ति गहरे गड्ढे में खड़ा हो, तब भी उसकी ऊँचाई कम नहीं हो जाती। यही हमारी भूल है। इसी प्रकार हम भ्रमित हो जाते हैं। हम मनुष्य का मूल्यांकन उसके वास्तविक स्वरूप से नहीं करते बल्कि उसके पद, प्रतिष्ठा और बाहरी आडंबरों को भी उसके साथ जोड़ देते हैं। किन्तु यदि तुम किसी मनुष्य का सही मूल्यांकन करना चाहते हो और जानना चाहते हो कि वह वास्तव में कैसा है तो पहले उसे इन सब बाहरी आवरणों से मुक्त करके देखो। उससे उसकी पैतृक संपत्ति छीन लो, उसके पद और अधिकार ले लो और भाग्य द्वारा दिए गए सभी झूठे आभूषण हटा दो। यहाँ तक कि उसके शरीर को भी अलग मानकर केवल उसके मन को देखो। तब विचार करो कि उसका मन कैसा है और उसका वास्तविक कद कितना है। क्या वह अपनी आंतरिक शक्ति से महान है या किसी और के सहारे महान दिखाई देता है? यदि चमकती हुई तलवारों को देखकर भी उसकी दृष्टि अटल बनी रहती है। यदि वह जानता है कि उसके लिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि अंतिम श्वास उसके मुँह से निकले या गला चीर दिए जाने पर निकले, तब उसे सचमुच सुखी कहो। यदि कारावास, निर्वासन और मनुष्यों की कल्पना से उत्पन्न अन्य निरर्थक भय की बातें सुनकर भी वह तनिक विचलित न हो बल्कि यह कह सके —
“हे सिबिल, इन कष्टों में मेरे लिए कुछ भी नया या अप्रत्याशित नहीं है।
मैं इन सबको पहले ही समझ चुका हूँ।
अपने मन में मैं इन सबका पहले ही सामना कर चुका हूँ।
और इन्हें पहले ही जीत चुका हूँ।”
तब वह कह सकता है, “हे ऐनीयस, तुम ऐसी बातें केवल आज कहते हो। पर मैं तो उन्हें प्रतिदिन स्वयं से कहता हूँ। क्योंकि मैं मनुष्य हूँ। इसलिए मनुष्य के जीवन में आने वाली सभी घटनाओं के लिए पहले से ही अपने आपको तैयार रखता हूँ।”
यदि मन पहले से ही तैयार हो तो दुर्भाग्य का आघात बहुत हल्का पड़ता है। परन्तु मूर्ख लोग और वे लोग जो अपना भरोसा भाग्य पर रखते हैं, उन्हें जीवन की प्रत्येक घटना नई और अप्रत्याशित प्रतीत होती है। अनुभवहीन मनुष्यों के लिए उनके दुःख का एक बड़ा कारण यह भी होता है कि वे उसे बिल्कुल नया और अनपेक्षित समझते हैं।इसका प्रमाण यह है कि जिन परिस्थितियों को वे पहले अत्यन्त कठोर मानते थे, उन्हीं परिस्थितियों के अभ्यस्त हो जाने पर वे उन्हें अधिक धैर्यपूर्वक सहने लगते हैं। इसी कारण बुद्धिमान व्यक्ति भविष्य में आने वाली विपत्तियों के लिए पहले से ही अपने मन को तैयार करता है। जिन कष्टों को दूसरे लोग लंबे समय तक सहते-सहते हल्का बना लेते हैं, उन्हें वह पहले ही लंबे और गंभीर चिंतन के द्वारा हल्का कर लेता है। हम प्रायः अनुभवहीन लोगों को यह कहते सुनते हैं, “मुझे पता था कि यह मेरे साथ होने वाला है।” किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि हर प्रकार की घटना उसके जीवन में आ सकती है। इसलिए चाहे जो कुछ भी घटे, वह शांत भाव से केवल इतना कहता है, “मैं पहले से ही जानता था कि ऐसा हो सकता है।”
अभी के लिए विदा