मैंने दूर तक जाती राह को देखा,
और सोच में पड़ गया
हर
कोई हमेशा से यही कहता आया था कि जॉन बड़ा होकर उपदेशक बनेगा, ठीक अपने पिता की तरह। यह बात इतनी बार कही गई थी कि जॉन ने, इस बारे में कभी सचमुच सोचे बिना ही, स्वयं भी इसे सच मान लिया था। अपने चौदहवें जन्मदिन की सुबह
तक उसने वास्तव में इस बारे में सोचना शुरू नहीं किया था और तब तक बहुत देर हो
चुकी थी।
जॉन की सबसे आरंभिक स्मृतियाँ जो एक तरह से उसकी एकमात्र
स्मृतियाँ थीं, रविवार की सुबहों की
भागदौड़ और उजास से जुड़ी थीं। उस दिन वे सभी एक साथ उठते थे।
उसके पिता, जिन्हें
काम पर नहीं जाना होता था और जो नाश्ते से पहले उन्हें प्रार्थना करवाते थे।
उसकी माँ, जो
उस दिन सजती-सँवरती थी और अपने सीधे किए हुए बालों तथा सिर पर पवित्र स्त्रियों की
वेशभूषा के रूप में पहनी जाने वाली, सिर से सटी सफेद टोपी में लगभग युवती जैसी लगती थी।
उसका छोटा भाई रॉय, जो उस दिन चुप रहता था क्योंकि उसके पिता घर पर होते थे। सारा, जो उस दिन अपने बालों में लाल फीता लगाती थी और जिसे उसके
पिता दुलारते थे। और नन्ही रूथ, जिसे
गुलाबी और सफेद कपड़े पहनाए जाते थे और जो अपनी माँ की बाँहों में सवार होकर चर्च
जाती थी।
चर्च बहुत दूर नहीं था, लेनॉक्स एवेन्यू पर चार ब्लॉक आगे, अस्पताल से ज्यादा दूर नहीं, एक कोने पर। इसी अस्पताल में उसकी माँ गई थी, जब रॉय, सारा
और रूथ पैदा हुए थे। जॉन को यह ठीक-ठीक याद नहीं था कि पहली बार, रॉय को जन्म देने के लिए, उसकी माँ जब वहाँ गई थी, तब क्या हुआ था। लोगों ने कहा था कि उसकी माँ के दूर रहने के पूरे समय वह
रोता और हंगामा करता रहा था। उसे बस इतना ही याद था कि जब भी उसकी माँ का पेट
उभरने लगता, वह डर जाता था। वह
जानता था कि हर बार यह उभार तब तक नहीं थमेगा, जब तक उसकी माँ को उससे दूर ले जाकर, एक अजनबी को साथ लेकर वापस नहीं लाया जाता। हर बार ऐसा होने
पर उसकी माँ स्वयं भी उसके लिए थोड़ी और अजनबी हो जाती थी। रॉय ने कहा था कि वह
जल्द ही फिर कहीं जाने वाली है। ऐसी बातों के बारे में वह जॉन से कहीं अधिक जानता
था। जॉन अपनी माँ को ध्यान से देख रहा था। अभी उसके पेट में कोई उभार दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन एक
सुबह उसके पिता ने प्रार्थना में कहा था कि “नन्हा यात्री शीघ्र ही उनके बीच आने
वाला है,”
और इसलिए जॉन जान गया कि रॉय सच कह रहा था।
इसलिए, जॉन
को जितना याद था, तब से हर
रविवार की सुबह ग्राइम्स परिवार चर्च जाने के लिए सड़कों पर निकल पड़ता था।
एवेन्यू के किनारे खड़े पापी लोग उन्हें देखते रहते। वे पुरुष, जिन्होंने अभी तक शनिवार की रात वाले अपने कपड़े ही पहन रखे
होते थे,
जो अब सिकुड़े और धूल से भरे होते, जिनकी आँखें और चेहरे मैले दिखाई देते थे और वे स्त्रियाँ, जिनकी आवाज़ें कर्कश थीं और जिन्होंने तंग, चटख कपड़े पहन रखे थे, उनकी उँगलियों के बीच सिगरेट दबी होती या होठों के कोनों
में कसकर फँसी होती। वे
आपस में बातें करते, हँसते और
लड़ते थे। वे स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह ही लड़ती थीं। जॉन और रॉय जब उन
स्त्री-पुरुषों के पास से गुजरते तो एक क्षण के लिए एक-दूसरे की ओर देखते, जॉन संकोच से और रॉय मनोरंजन के भाव से। अगर प्रभु ने उसका
हृदय नहीं बदला तो बड़ा होकर रॉय भी उन्हीं जैसा होगा। रविवार की सुबह जिन स्त्री-पुरुषों के पास से वे गुजरते, उन्होंने अपनी रात शराबखानों में, वेश्यागृहों में, सड़कों पर, छतों
पर या सीढ़ियों के नीचे बिताई होती थी। उन्होंने शराब पी होती थी। वे गालियों से
हँसी की ओर, हँसी से क्रोध की ओर
और क्रोध से वासना की ओर चले गए होते थे। एक बार उसने और रॉय ने एक जर्जर घोषित किए जा चुके मकान के
तहखाने में एक स्त्री और पुरुष को देखा था। वे खड़े-खड़े ही संभोग कर रहे थे। उस
स्त्री ने पचास सेंट माँगे थे और उस पुरुष ने उस्तरा चमका दिया था।
जॉन ने फिर कभी उन्हें नहीं देखा। वह डर गया था। लेकिन रॉय ने उन्हें कई बार देखा था और उसने
जॉन से कहा था कि उसने गली के नीचे रहने वाली कुछ लड़कियों के साथ ऐसा किया था।
और उसके माँ और पिता भी, जो हर रविवार चर्च जाते थे, ऐसा करते थे। कभी-कभी जॉन उनके पीछे वाले शयनकक्ष से उनकी
आवाज़ें सुनता था। चूहों के पैरों की आहट और उनकी चीख़ों, तथा नीचे रहने वाली वेश्या के घर से आती संगीत और गालियों
की आवाज़ों के बीच।
उनके चर्च का नाम “टेंपल ऑफ द फायर बैप्टाइज़्ड” था। वह हार्लेम का न तो सबसे बड़ा चर्च था, न ही सबसे छोटा। लेकिन जॉन का पालन-पोषण इस विश्वास के साथ हुआ था कि यही
सबसे पवित्र और सबसे श्रेष्ठ चर्च है। उसके पिता इस चर्च के मुख्य डीकन थे। कुल दो डीकन थे। दूसरे का नाम डीकन ब्रेथवेट था, जो गोल-मटोल अश्वेत व्यक्ति था। जॉन के पिता चर्च में दान
एकत्र करते थे और कभी-कभी प्रवचन भी देते थे। चर्च के पादरी फादर जेम्स हँसमुख और खाते-पीते, भरे-पूरे शरीर वाले व्यक्ति थे, जिनका चेहरा किसी गहरे रंग के चाँद जैसा था। पेंटेकोस्ट के रविवारों को प्रवचन वही देते थे, गर्मियों में धार्मिक पुनर्जागरण सभाएँ (revivals)
वही आयोजित करते थे, वे बीमारों का अभिषेक कर उन्हें चंगा करते थे।
रविवार की सुबह और रविवार की रात चर्च
हमेशा लोगों से भरा रहता था। विशेष रविवारों को तो पूरे दिन वहाँ भीड़ रहती थी।
ग्राइम्स परिवार हमेशा एक साथ चर्च पहुँचता था। लेकिन हमेशा थोड़ा देर से, आमतौर
पर रविवार के स्कूल के बीच में, जो
सुबह नौ बजे शुरू होता था। इस देर से पहुँचने के लिए हमेशा उनकी माँ ही जिम्मेदार
ठहराई जाती थी। कम-से-कम उनके पिता की नज़र में। वह कभी भी खुद को और बच्चों को
समय पर तैयार नहीं कर पाती थीं। कभी-कभी तो वह घर पर ही रह जाती थीं और सुबह की
मुख्य प्रार्थना-सभा तक चर्च में दिखाई नहीं देती थीं। जब वे सब एक साथ पहुँचते तो
दरवाज़े के भीतर प्रवेश करते ही अलग-अलग हो जाते। पिता और माँ वयस्कों के वर्ग में जाकर बैठते, जिसे सिस्टर मैककैंडलेस पढ़ाती थीं। सारा शिशु-वर्ग में चली जाती और जॉन
और रॉय छोटे बच्चों से कुछ बड़े बच्चों के वर्ग में बैठते, जिसे
ब्रदर एलिशा पढ़ाते थे।
जब जॉन छोटा था, तब वह रविवार के स्कूल में पढ़ाई पर कोई
ध्यान नहीं देता था और ‘गोल्डन टेक्स्ट’ (मुख्य बाइबिल-वचन)
हमेशा भूल जाता था, जिसके कारण उसके पिता उस पर बहुत क्रोधित
होते थे। अपने चौदहवें जन्मदिन के आस-पास, जब चर्च और घर, दोनों
का दबाव मिलकर उसे वेदी के सामने आत्मसमर्पण करने की ओर धकेल रहा था, तब उसने अधिक गंभीर और इसलिए कम ध्यान आकर्षित करने वाला दिखने की कोशिश
की। लेकिन उसका ध्यान उसके नए शिक्षक एलिशा की ओर भटक जाता था। एलिशा पादरी के
भतीजे थे और अभी हाल ही में जॉर्जिया से आए थे। वे जॉन से बहुत अधिक बड़े नहीं थे।
सिर्फ सत्रह वर्ष के थे और वे पहले ही “उद्धार पा चुके” थे तथा उपदेशक भी थे। पूरे
पाठ के दौरान जॉन, एलिशा को ही निहारता रहता था। उसे एलिशा की आवाज़ की गहराई बहुत
आकर्षित करती थी, जो उसकी अपनी आवाज़ से कहीं अधिक गहरी और
मर्दाना थी। वह एलिशा के रविवार वाले सूट में उनकी दुबली काया, शालीनता, शक्ति और साँवले रंग को निहारता रहता था और
सोचता था कि क्या वह भी कभी उतना पवित्र हो पाएगा, जितने
एलिशा थे। लेकिन वह पाठ पर ध्यान नहीं दे पाता था। कभी-कभी जब एलिशा रुककर जॉन से
कोई प्रश्न पूछते तो जॉन शर्म और उलझन में पड़ जाता। उसे लगता कि उसकी हथेलियाँ
पसीने से भीग रही हैं और उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा है। एलिशा मुस्कराते हुए
उसे हल्के से डाँटते और फिर पाठ आगे चलता रहता था।
रॉय को भी अपनी रविवार की स्कूल की
पाठ-शिक्षा कभी याद नहीं रहती थी, लेकिन
रॉय के मामले में बात अलग थी। कोई भी वास्तव में रॉय से वह अपेक्षा नहीं करता था,
जो जॉन से की जाती थी। हर कोई हमेशा प्रार्थना करता रहता था कि
प्रभु रॉय के हृदय को बदल दें। लेकिन जॉन से अपेक्षा की जाती थी कि वह अच्छा बने। दूसरों
के लिए एक अच्छा उदाहरण बने।
रविवार के स्कूल की सभा समाप्त होने
के बाद सुबह की मुख्य प्रार्थना-सभा शुरू होने से पहले थोड़ी देर का विराम होता
था। इस दौरान, यदि मौसम अच्छा होता तो
बुज़ुर्ग लोग कुछ देर के लिए बाहर निकलकर आपस में बातें कर लेते थे। चर्च की बहनें
लगभग हमेशा सिर से पैर तक सफेद वस्त्रों में सजी होती थीं। इस दिन, इस जगह पर और अपने बड़ों के दबाव में, छोटे बच्चे इस
तरह खेलने की भरसक कोशिश करते थे कि ऐसा न लगे कि वे ईश्वर के घर का अनादर कर रहे
हैं। लेकिन कभी-कभी, घबराहट या शरारत के कारण, वे चिल्लाने लगते, भजन की किताबें फेंक देते या रोने
लगते। तब उनके माता-पिता, चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ और चाहे वे ईश्वर की सेवा
में समर्पित ही क्यों न हों, इस बात को साबित करने के लिए विवश हो जाते कि किसी
पवित्र परिवार में आखिर हुकूमत किसकी चलती है, कठोरता से या प्यार से। जॉन और रॉय
जैसे बड़े बच्चे एवेन्यू पर थोड़ी दूर तक घूम सकते थे। लेकिन बहुत दूर नहीं। उनके
पिता जॉन और रॉय को अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देते थे क्योंकि रॉय अक्सर
रविवार के स्कूल और सुबह की मुख्य सभा के बीच गायब हो जाता था और फिर पूरे दिन
वापस नहीं लौटता था।
रविवार की सुबह की सभा तब शुरू होती
थी, जब ब्रदर एलिशा पियानो पर बैठकर एक भजन
छेड़ते थे। यह क्षण और यह संगीत जॉन के साथ मानो तब से थे, जब
उसने पहली बार साँस ली थी। ऐसा लगता था कि ऐसा कोई समय कभी था ही नहीं, जब वह इस क्षण से परिचित न रहा हो। जब ठसाठस भरा चर्च एक पल के इंतज़ार
में थम जाता था। सफेद कपड़ों में सजी बहनें सिर उठाए रहतीं, नीले
कपड़े पहने भाई सिर पीछे किए खड़े रहते। स्त्रियों की सफेद टोपियाँ उस उत्तेजना से
भरी हवा में मुकुटों की तरह चमकती हुई लगतीं। पुरुषों के घुँघराले, चमकते बालों वाले सिर मानो ऊपर उठे हुए दिखाई देते। खड़खड़ाहट और
फुसफुसाहट थम जाती और बच्चे शांत हो जाते। शायद कोई खाँस देता या कार के हॉर्न की
आवाज़ भीतर आ जाती या सड़क से किसी की गाली सुनाई दे जाती। फिर एलिशा एकाएक पियानो
की कुंजियों पर उँगलियाँ रख देते और गाना शुरू कर देते और पूरा चर्च उनके साथ गाने
लगता। लोग तालियाँ बजाते, उठ खड़े होते और डफली बजाते।
भजन
कुछ ऐसा होगा, “उस क्रूस के नीचे,
जहाँ मेरे उद्धारकर्ता ने प्राण दिए!” या “यीशु,
मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा कि तुमने मुझे कैसे मुक्त किया!” या “हे प्रभु, जब तक मैं जीवन की इस दौड़ में दौड़ता
रहूँ, मेरा हाथ थामे रखना!”
वे अपने भीतर की पूरी शक्ति लगाकर
गाते और आनंद से तालियाँ बजाते थे। जॉन को ऐसा कोई समय याद नहीं था, जब उसने संतों को इस तरह आनंद मनाते हुए न
देखा हो और उसके हृदय में भय और विस्मय न भर गया हो। उनका गायन जॉन को प्रभु की
उपस्थिति में विश्वास करने के लिए विवश कर देता था। बल्कि यह अब विश्वास का प्रश्न
ही नहीं रह गया था क्योंकि वे अपने गायन से उस उपस्थिति को साकार कर देते थे। वे
जिस आनंद को महसूस करते थे, जॉन स्वयं उसे महसूस नहीं करता
था, फिर भी वह इस बात पर संदेह नहीं कर सकता था कि उनके लिए
वही आनंद जीवन की सच्ची रोटी था। कम-से-कम तब तक तो नहीं, जब
तक संदेह करने में बहुत देर हो चुकी थी। उनके चेहरों और आवाज़ों में, उनके शरीरों की लय में और उस हवा में कुछ घटित हो जाता था जिसे वे साँसों
में भरते थे। ऐसा लगता था मानो वे जहाँ कहीं भी हों, वही
स्थान ऊपरी कक्ष में बदल गया हो और पवित्र आत्मा हवा पर सवार होकर वहाँ विचरण कर
रहा हो। उसके पिता का चेहरा, जो हमेशा ही भयावह लगता था,
अब और भी भयावह हो जाता था। उसके पिता का रोज़ का क्रोध अब
भविष्यवक्ता के प्रचंड क्रोध में बदल जाता था। उसकी माँ अपनी आँखें स्वर्ग की ओर
उठाए, हाथों को सामने धनुषाकार किए, उन्हें
लय में हिलाती हुई, जॉन के लिए उस धैर्य, उस सहनशीलता और उस
दीर्घ-सहनशीलता को साकार कर देती थी, जिसके बारे में उसने
बाइबिल में पढ़ा था। लेकिन जिसकी कल्पना करना उसके लिए बहुत कठिन था।
रविवार की सुबहें ऐसी
होती थीं कि सभी स्त्रियाँ मानो धैर्य की प्रतिमूर्ति लगती थीं और सभी पुरुष
शक्तिशाली दिखाई देते थे। जॉन देखता रहता, तभी वह शक्ति किसी
पुरुष या स्त्री पर आ पड़ती। वे चीख उठते—एक लंबी, शब्दहीन
चीख और बाँहों को पंखों की तरह फैलाकर “शाउट” करने लगते। कोई व्यक्ति उन्हें
जगह देने के लिए अपनी कुर्सी थोड़ी खिसका देता। लय एक क्षण के लिए थम जाती,
गायन रुक जाता। केवल पैरों की धमक और तालियों की आवाज़ सुनाई देती।
फिर एक और चीख उठती, एक और नर्तक आगे आता। फिर डफली बजने
लगती, आवाज़ें फिर ऊँची होने लगतीं और संगीत फिर उसी तरह
बहने लगता जैसे, आग, बाढ़ या न्याय का प्रचंड वेग। तब चर्च
मानो अपने भीतर समाई उस शक्ति से फूलने लगता और जैसे अंतरिक्ष में झूलता हुआ कोई
ग्रह हो, वैसे ही मंदिर भी ईश्वर की शक्ति के साथ झूमने
लगता। जॉन देखता रहता। चेहरों को, भारहीन-से शरीरों को और उन
कालातीत चीखों को सुनता रहता। सब लोग कहते थे कि एक दिन यह शक्ति उसे भी अपने वश
में कर लेगी। तब वह भी उन्हीं की तरह गाएगा और चीखेगा और अपने राजा के सामने
नाचेगा। वह युवा एला मे वॉशिंगटन को देख रहा था। प्रेइंग मदर वॉशिंगटन की सत्रह
वर्षीय पोती जब नाचना शुरू करती है और फिर एलिशा भी नाचने लगता।
एक क्षण ऐसा आया जब
उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका रखा था, आँखें बंद थीं और
माथे पर पसीने की बूँदें उभर आई थीं। वह पियानो पर बैठा गा और बजा रहा था। फिर,
जैसे जंगल में संकट में फँसी कोई विशाल, काली
बिल्ली अकड़कर काँपने लगे, वैसे ही उसका शरीर तन गया और काँप
उठा और वह चीख पड़ा— “यीशु, यीशु,
हे प्रभु यीशु!” उसने पियानो पर आखिरी, उन्मत्त
स्वर बजाया और दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। हथेलियाँ
ऊपर की ओर थीं और बाँहें पूरी तरह फैली हुई थीं। उसके मौन हो चुके पियानो से पैदा
हुए खालीपन को डफली की आवाज़ों ने दौड़कर भर दिया। उसकी चीख के उत्तर में चारों ओर
से दूसरी चीखें उठने लगीं। फिर वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया। वह घूम रहा था जैसे,
उसे कुछ दिखाई न दे रहा हो। उसका चेहरा खून से भर आया था। इस उग्र आवेश में विकृत
हो गया था। उसकी लंबी, साँवली गर्दन की मांसपेशियाँ
उभर-उभरकर फड़क रही थीं। ऐसा लगता था मानो वह साँस नहीं ले पा रहा हो, मानो उसका शरीर इस आवेग को समेट पाने में असमर्थ हो, मानो सबकी आँखों के सामने वह स्वयं को उस प्रतीक्षारत हवा में बिखेर देगा।
उसके हाथ, जिनकी उँगलियों के सिरों तक तनाव जड़ हो गया था,
बाहर की ओर जाते और फिर उसकी कमर के पास लौट आते। उसकी दृष्टिहीन
आँखें ऊपर की ओर उठी हुई थीं और वह नाचने लगा। फिर उसकी मुट्ठियाँ बँध गईं और उसका
सिर झटके से नीचे की ओर झुक गया। उसके पसीने ने उसके बालों पर चिपकी चिकनाई को
ढीला कर दिया। बाकी सभी लोगों की लय भी एलिशा की लय से ताल मिलाने के लिए तेज़ हो
गई। उसके सूट के कपड़े पर उसकी जाँघें उन्मत्त ढंग से हिल रही थीं। उसकी एड़ियाँ
फर्श पर पड़ रही थीं। उसकी मुट्ठियाँ उसके शरीर के दोनों ओर इस तरह चल रही थीं,
मानो वह अपना ही ढोल बजा रहा हो। और इस तरह कुछ देर तक वह नर्तकों
के बीचोंबीच सिर झुकाए, मुट्ठियों से ताल देता हुआ, लगातार… लगातार इतनी तीव्रता से नाचता रहा कि सहना
मुश्किल हो जाए। जब तक कि ऐसा लगने नहीं लगा कि केवल इस प्रचंड शोर से ही चर्च की
दीवारें ढह जाएँगी। और फिर, एक क्षण में, एक चीख के साथ उसका सिर ऊपर उठा, बाँहें हवा में
ऊँची उठ गईं। उसके माथे से पसीना धारों की तरह बहने लगा। उसका पूरा शरीर इस तरह
नाचने लगा, मानो वह कभी रुकने वाला ही न हो। कभी-कभी वह तब
तक नहीं रुकता था, जब तक गिर नहीं पड़ता। जब तक किसी हथौड़े
से गिराए गए जानवर की तरह कराहता हुआ मुँह के बल ज़मीन पर नहीं गिर जाता। और तब
पूरे चर्च में एक गहरी, सामूहिक कराह भर जाती थी।
उनके बीच पाप था। एक
रविवार, जब नियमित प्रार्थना-सभा समाप्त हो चुकी थी, फादर जेम्स ने धर्मनिष्ठ माने जाने वाले इस समुदाय के बीच छिपे पाप को
उजागर कर दिया। उन्होंने एलिशा और एला मे के बारे में सबके सामने कहा। वे “अनुचित
आचरण कर रहे थे।” उन्हें सत्य के मार्ग से भटक जाने का खतरा था। जब फादर जेम्स उस
पाप के बारे में बोल रहे थे, जिसे वे जानते थे कि उन्होंने
अभी तक किया नहीं था, उस अधपके अंजीर के बारे में, जिसे पेड़
से समय से पहले तोड़ लिया जाए और जिससे बच्चों के दाँत खट्टे हो जाएँ। तब जॉन को
अपनी जगह बैठे-बैठे चक्कर-सा आने लगा। वह एलिशा की ओर देख भी नहीं पा रहा था,
जो वेदी के सामने एला मे के पास खड़ा था। फादर जेम्स के बोलते समय
एलिशा ने अपना सिर झुका रखा था और सभा में धीमी-धीमी फुसफुसाहट होने लगी थी। एला
मे भी अब उतनी सुंदर नहीं लग रही थी, जितनी वह गाते और अपने
विश्वास की गवाही देते समय लगती थी। अब वह एक रूखी, साधारण-सी
लड़की दिखाई दे रही थी। उसके भरे हुए होंठ ढीले पड़ गए थे और उसकी आँखें काली थीं—
शर्म से, क्रोध से, या दोनों से। उसकी
दादी, जिसने उसका पालन-पोषण किया था, हाथ
बाँधे चुपचाप बैठी देख रही थी। वह चर्च के प्रमुख स्तंभों में से एक थीं। एक
प्रभावशाली प्रचारिका और बहुत प्रसिद्ध धार्मिक महिला। उन्होंने एला मे के बचाव
में कुछ नहीं कहा क्योंकि उन्हें भी, पूरी सभा की तरह लगा
होगा कि फादर जेम्स केवल अपने उस स्पष्ट और पीड़ादायक कर्तव्य का पालन कर रहे थे,
जिसे निभाना उनके लिए आवश्यक था। आखिर एलिशा की जिम्मेदारी फादर
जेम्स की थी जैसे एला मे की जिम्मेदारी प्रेइंग मदर वॉशिंगटन की थी। फादर जेम्स ने
कहा कि किसी धार्मिक समुदाय के चरवाहे का पादरी होना आसान काम नहीं था। बाहर से यह
आसान लग सकता है कि रात-दर-रात, साल-दर-साल बस वहाँ ऊपर
मिम्बर पर बैठा रहा जाए। लेकिन उन्हें
याद रखना चाहिए कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने उनके कंधों पर कितनी भयानक जिम्मेदारी
रखी है। उन्हें याद रखना चाहिए कि एक दिन ईश्वर उनसे उनके झुंड की हर आत्मा का
हिसाब माँगेगा। जब वे उन्हें कठोर समझें, तब यह बात याद रखें।
यह भी याद रखें कि ईश्वर का वचन कठोर है और पवित्रता का मार्ग भी कठिन मार्ग है।
ईश्वर की सेना में कायर हृदय के लिए कोई जगह नहीं है। और जो व्यक्ति अपनी माँ या
पिता, बहन या भाई, प्रियतम या मित्र को
ईश्वर की इच्छा से ऊपर रखे, उसके लिए कोई मुकुट प्रतीक्षा
नहीं कर रहा। “इस बात पर चर्च ‘आमेन’ कहे!” और सबने पुकारकर
कहा, “आमेन! आमेन!”
फादर जेम्स ने उस लड़के
और लड़की की ओर देखते हुए कहा कि प्रभु ने ही उन्हें यह समझ देने के लिए प्रेरित
किया था कि बहुत देर हो जाने से पहले उन्हें सबके सामने चेतावनी दे दी जाए।
क्योंकि वे जानते थे कि दोनों सच्चे और ईमानदार युवक-युवती हैं, जो प्रभु की सेवा के लिए समर्पित हैं। बस बात इतनी थी कि कम उम्र होने के
कारण वे उन खतरों को नहीं जानते थे, जो शैतान अनजान और
असावधान लोगों के लिए बिछाता है। वे जानते थे कि उनके मन में पाप नहीं था। अभी तक
नहीं। लेकिन पाप शरीर में था। यदि वे इसी तरह अकेले एक-दूसरे के साथ घूमते रहे,
अपने रहस्य बाँटते रहे, हँसते रहे और एक-दूसरे
का हाथ छूते रहे तो निश्चय ही वे ऐसा पाप कर बैठेंगे जिसकी कोई क्षमा नहीं होगी। और
जॉन सोचने लगा कि एलिशा क्या सोच रहा होगा। वही एलिशा, जो
लंबा और सुंदर था, जो बास्केटबॉल खेलता था और जिसने ग्यारह
वर्ष की उम्र में दक्षिण के उन अविश्वसनीय खेतों में प्रभु से उद्धार पाया था। क्या
उसने पाप किया था? क्या वह प्रलोभित हुआ था? उसके पास खड़ी वह लड़की, जिसके सफेद वस्त्र अब उसके उभरे हुए वक्ष और दृढ़,
आग्रहपूर्ण जाँघों की नग्नता को ढकने वाला अत्यंत मामूली और पतला
आवरण मात्र लग रहे थे। जब वह एलिशा के साथ अकेली होती होगी, तब
उसका चेहरा कैसा होता होगा? जब वहाँ कोई गायन नहीं होता होगा,
जब वे संतों से घिरे हुए नहीं होते होंगे? जॉन
इस बारे में सोचने से डर रहा था, फिर भी उसके अलावा वह और
कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। जिस वासना के लिए उन दोनों पर आरोप लगाया गया था,
उसकी तपिश अब जॉन के भीतर भी भड़कने लगी थी।
उस रविवार के बाद एलिशा
और एला मे अब हर दिन स्कूल के बाद एक-दूसरे से नहीं मिलते थे। न ही शनिवार की
दोपहर सेंट्रल पार्क में घूमते या समुद्र-तट पर लेटते थे। उन दोनों के लिए यह सब
अब समाप्त हो चुका था। यदि वे फिर कभी एक-दूसरे के साथ होंगे तो विवाह के बंधन में
बँधकर। वे बच्चे पैदा करेंगे और उन्हें चर्च की शिक्षाओं के अनुसार पालेंगे।
यही एक पवित्र जीवन का अर्थ था। यही क्रूस के मार्ग की माँग
थी। शायद उसी रविवार को... अपने जन्मदिन से कुछ ही पहले के उस रविवार को जॉन को
पहली बार एहसास हुआ कि उसके सामने भी यही जीवन पड़ा है। इस बार उसने इसे केवल
धुँधली-सी आशंका के रूप में नहीं बल्कि पूरी चेतना के साथ महसूस किया। एक ऐसी चीज़
के रूप में जो अब बहुत दूर नहीं थी बल्कि सामने आ रही थी... दिन-ब-दिन उसके और
करीब आती जा रही थी।