Monday, 6 July 2026

वाणी के संदर्भ में -- पत्र - 40 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुम मुझे इतनी बार पत्र लिखते हो क्योंकि इस प्रकार तुम मुझे अपना स्वरूप दिखाते हो जितना किसी अनुपस्थित व्यक्ति के लिए संभव है। ऐसा कभी नहीं होता कि तुम्हारा पत्र मुझे मिले और मुझे तुरंत यह न लगे कि हम साथ हैं। यदि अनुपस्थित मित्रों के चित्र हमें आनंद देते हैं, हमारी स्मृति को ताज़ा कर देते हैं और वियोग की पीड़ा को कुछ सांत्वना देकर हल्का कर देते हैं। यद्यपि वह सांत्वना आभासी और रिक्त ही क्यों न हो तो पत्र कितने अधिक आनंददायक होते हैं क्योंकि वे अनुपस्थित मित्र के वास्तविक चिह्न और वास्तविक समाचार लेकर आते हैं। क्योंकि किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष देखने में जो सबसे मधुर बात होती है, वही एक ऐसे पत्र में भी मिल जाती है जिस पर मित्र के हाथों की छाप अंकित हो... पहचान का वह सुखद क्षण।


By Sandor Nayilasi 

    तुम लिखते हो कि तुम्हें दार्शनिक सेरापियो (Serapio) को सुनने का अवसर मिला, जब वे तुम्हारे क्षेत्र के पास कुछ समय के लिए ठहरे थे। “उनकी शैली यह है कि वे शब्दों की एक प्रबल धारा बहा देते हैं। वे उन्हें एक-एक करके नहीं छोड़ते बल्कि मानो झुंड के झुंड आगे हाँक देते हैं। इतने शब्द एक साथ निकलते हैं कि उन्हें सँभालने के लिए एक आवाज़ भी पर्याप्त नहीं पड़ती!” मुझे किसी दार्शनिक में यह शैली पसंद नहीं है। दार्शनिक की वाणी उतनी ही संयमित और सुव्यवस्थित होनी चाहिए जितना उसका जीवन। जो कुछ भी अत्यधिक उतावलेपन में होता है, वह व्यवस्थित नहीं हो सकता। इसी कारण होमर (Homer) ने अपने काव्य में हिम-तूफ़ान के समान तीव्र और अविराम वाणी युवा वक्ता को दी है जबकि मधु से भी अधिक मधुर और शांत प्रवाह वाली वाणी वृद्ध वक्ता के हिस्से में रखी है।

    मेरा विश्वास करो, जिस शब्द-प्रवाह का तुमने वर्णन किया है, वह किसी गंभीर और महत्त्वपूर्ण कार्य करने तथा उसे सिखाने वाले व्यक्ति की अपेक्षा व्याख्यान-मंच के लिए अधिक उपयुक्त है। यह नहीं कि मैं शब्दों की धीमी टपकन या रुक-रुककर बहने वाली धारा चाहता हूँ। लेकिन मैं बाढ़ जैसी उफनती वाणी भी नहीं चाहता। वक्ता को न तो श्रोताओं के कानों को प्रतीक्षा करते-करते थका देना चाहिए और न ही उन पर शब्दों का ऐसा प्रहार करना चाहिए कि वे अभिभूत हो जाएँ। क्योंकि अत्यन्त क्षीण और निर्धन-सी वाणी श्रोताओं को कम सजग बनाती है। वे उसकी धीमी और अटकती हुई गति से ऊब जाते हैं। फिर भी, जो बात हमें थोड़ी प्रतीक्षा कराती है, उससे हम उस बात की अपेक्षा अधिक आसानी से सीखते हैं जो हमारे सामने से उड़ती हुई निकल जाती है। फिर, हम कहते हैं कि उपदेश या शिक्षाएँ शिष्य को 'प्रदान' की जाती हैं। जो बात भागती चली जाए, उसे भला प्रदान करना कैसे कहा जा सकता है?

    इसके अतिरिक्त, जो वाणी सत्य की खोज करती है, वह बनावटी नहीं बल्कि सरल और स्वाभाविक होनी चाहिए। यह लोकप्रिय वक्तृत्व-शैली सत्य से कोई संबंध नहीं रखती। उसका उद्देश्य भीड़ को उत्तेजित करना, असावधान कानों पर चुपके से अधिकार कर लेना और उन्हें आवेग के बल पर बहा ले जाना होता है। वह स्वयं को जाँच-परख के लिए प्रस्तुत नहीं करती बल्कि तुरंत आगे निकल जाती है। लेकिन यदि वाणी स्वयं ही असंयमित हो तो वह हमें अनुशासन कैसे सिखा सकती है? यह भी याद रखो कि जिस वाणी का उद्देश्य मन को स्वस्थ करना है, उसे हमारे भीतर गहराई तक उतरना चाहिए। जो औषधियाँ शरीर में ठहरती ही नहीं, वे प्रभावी नहीं हो सकतीं। और वैसे भी, यह लोकप्रिय शैली प्रायः खोखली और निरर्थक होती है। उसमें सार से अधिक शोर होता है। मुझे ऐसी वाणी चाहिए जो मेरे भय को शांत करे, मेरे क्रोध को संयमित करे, मेरे भ्रमों को दूर करे, मेरे भोग-विलास को सीमित करे और मेरे लोभ को धिक्कारे। इनमें से कौन-सा कार्य जल्दबाज़ी में किया जा सकता है? कौन-सा वैद्य यात्रा करते-करते ही रोगियों का उपचार कर देता है?

    ज़रा इस पर भी विचार करो। शब्दों के ऐसे कोलाहल से जो बिना किसी विवेक के निरंतर दौड़ता चला जाता है, कोई विशेष आनंद भी प्राप्त नहीं होता। सामान्यतः जब कोई ऐसी बात घटती है जिसे तुम असंभव समझते थे तो उसके बारे में एक बार सुन लेना ही तुम्हारे लिए पर्याप्त होता है। इसी प्रकार उन लोगों की वाणी भी है जो शब्दों को बस दौड़ाते रहते हैं। उन्हें एक बार सुन लेना ही काफ़ी है। आख़िर ऐसी वाणी में ऐसा क्या होता है जिसे कोई सीखना चाहे या जिसका अनुकरण करना चाहे? जब किसी वक्ता की वाणी अव्यवस्थित, अनियंत्रित और रुकने में असमर्थ हो तो उसके मन के बारे में क्या निर्णय किया जा सकता है? जैसे कोई व्यक्ति ढलान पर दौड़ते हुए ठीक वहाँ नहीं रुक पाता जहाँ उसका इरादा था बल्कि अपने शरीर के वेग के कारण उससे कहीं आगे निकल जाता है, वैसे ही वाणी की यह अत्यधिक तीव्रता स्वयं अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रखती। ऐसी वाणी दर्शन के लिए उपयुक्त नहीं है। दर्शन को अपने शब्दों को सावधानी से रखना चाहिए, उन्हें उगलना नहीं चाहिए। उसे एक-एक कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या वाणी को कभी-कभी उड़ान नहीं भरनी चाहिए?” निश्चय ही भरनी चाहिए। लेकिन इस प्रकार कि उसकी गरिमा बनी रहे। अत्यधिक उग्रता उस गरिमा को छीन लेती है। दर्शन में महान शक्ति होनी चाहिए पर वह शक्ति नियंत्रण में होनी चाहिए। उसकी वाणी एक निरंतर बहने वाली धारा के समान होनी चाहिए बाढ़ के समान उफनती हुई नहीं।

    मैं तो किसी वकील को भी इतनी तीव्र गति से बोलने की अनुमति शायद ही दूँ। क्योंकि ऐसी वाणी बिना नियंत्रण के आगे बढ़ती चली जाती है और फिर उसे वापस नहीं बुलाया जा सकता। ऐसे में न्यायनिर्णायक (जूरी) उसका अनुसरण कैसे कर पाएँगे? विशेषकर इसलिए कि जूरी के सदस्य कभी-कभी अनुभवहीन और अप्रशिक्षित भी होते हैं। यहाँ तक कि जब कोई वकील अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के उत्साह में हो या अपनी भावनाओं के आवेग में बह रहा हो, तब भी उसे अपनी वाणी की गति और विचारों के संचय को उतनी ही सीमा में रखना चाहिए जितना श्रोता का कान ग्रहण कर सके।

    इसलिए तुम ठीक ही करोगे यदि उन लोगों की परवाह न करो जो यह देखते हैं कि कोई कितना बोलता है, यह नहीं कि कितना अच्छा बोलता है। और यदि चुनाव करना ही पड़े तो मैं चाहूँगा कि तुम रुक-रुककर बोलो, जैसे पबलियस विनिशियस (Publius Vinicius) बोलते थे। जब किसी ने एसेलियस (Asellius) से पूछा कि विनीशियस की वाणी कैसी थी तो उसने उत्तर दिया, “टुकड़ों-टुकड़ों में।” जैसा कि जरमिनियस वेरीयस (Geminius Varius) ने कहा था, “मैं नहीं समझता कि तुम उस व्यक्ति को वक्ता कैसे कह सकते हो। वह तीन शब्द भी एक साथ नहीं जोड़ पाता।” फिर भी, तुम विनीशियस की तरह बोलना क्यों न पसंद करोगे? तो क्या हुआ यदि कोई मसखरा तुम्हें वैसा ही कुछ कह दे जैसा एक व्यक्ति ने विनीशियस से कहा था, जब वह शब्द खोजते हुए बोल रहे थे, मानो भाषण नहीं दे रहे हों बल्कि किसी को लिखवा रहे हों। उसने कहा, “कहो, क्या तुम कुछ कहने भी वाले हो?” फिर भी, यद्यपि क्विंटस हेटेरियस (Quintus Haterius) अपने समय के अत्यंत प्रसिद्ध वक्ता थे, उनकी तीव्र और अविराम बोलने की शैली वही चीज़ है जिससे मैं किसी समझदार व्यक्ति को बचने की सलाह दूँगा। वे कभी नहीं रुकते थे, कभी साँस लेने के लिए भी ठहरते नहीं थे। एक बार बोलना शुरू करते तो केवल अंत आने पर ही रुकते थे।

    मेरा विचार है कि कुछ बातें कुछ जातियों और लोगों के स्वभाव के अधिक अनुकूल होती हैं और कुछ कम। यूनानियों में ऐसी भाषिक उच्छृंखलता को सहन किया जा सकता है। पर हम रोमन तो लिखते समय भी विराम-चिह्न लगाने का ध्यान रखते हैं। सिसरो (Cicero) जो रोमन वाक्पटुता के महान स्रोत थे, वे भी एक-एक कदम बढ़ते हुए आगे बढ़ते थे। रोमन वाणी अधिक सावधान होती है। वह स्वयं का मूल्य समझती है और दूसरों को भी उसका मूल्यांकन करने का अवसर देती है। फैबिआनस (Fabianus) जीवन-चर्या में भी उत्कृष्ट व्यक्ति थे, ज्ञान की गहराई में भी और साथ ही वाक्पटु भी थे। यद्यपि यह अंतिम गुण अपेक्षाकृत कम महत्त्व का है। वे अपने व्याख्यान उत्साहपूर्ण आवेग के साथ नहीं बल्कि प्रभावी और व्यवस्थित ढंग से देते थे। उनके बारे में यह कहा जा सकता था कि उनमें भाषा की सहजता थी परन्तु अत्यधिक तीव्र गति नहीं थी। मैं मानता हूँ कि यह गुण एक बुद्धिमान व्यक्ति में हो सकता है, यद्यपि मैं इसे अनिवार्य नहीं मानता।  निश्चय ही उसकी वाणी बिना किसी बाधा के प्रवाहित हो। परन्तु प्रवाह और उफान में अंतर है। मैं उफनती हुई धारा की अपेक्षा संयमित और नियंत्रित प्रवाह को अधिक पसंद करता हूँ।

    तुम्हें उस संक्रामक प्रवृत्ति से दूर रहने की सलाह देने का मेरे पास एक और कारण है। तुम ऐसी बोलने की शैली को अपनी लज्जा-भावना खोए बिना अपना ही नहीं सकते। तुम्हें अपनी संवेदनशीलता को कुंठित करना होगा और कभी स्वयं को सुनना नहीं होगा। वह लापरवाह और बेलगाम वेग अपने साथ अनेक ऐसे शब्द और अभिव्यक्तियाँ ले आएगा जिन्हें तुम स्वयं आलोचना के योग्य समझोगे। मैं फिर कहता हूँ, अपनी शालीनता और मर्यादा-बोध को खोए बिना तुम इसे प्राप्त नहीं कर सकते।

    इसके अतिरिक्त, इसके लिए तुम्हें प्रतिदिन अभ्यास करना पड़ता है। इसका अर्थ है कि अपनी शक्ति विषय-वस्तु के बजाय शब्दों पर लगाना। यदि शब्दों का तीव्र प्रवाह तुम्हें सहज रूप से प्राप्त हो बिना किसी विशेष प्रयास के भी, तब भी तुम्हें उसे नियंत्रण में रखना चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार एक बुद्धिमान व्यक्ति की चाल-ढाल विनम्र और संयमित होनी चाहिए उसी प्रकार उसकी वाणी भी नियंत्रित होनी चाहिए, उतावली नहीं। मेरे समस्त निष्कर्ष का सार और मेरा निर्देश, यह है, धीरे बोलो।


अभी के लिए विदा 

संतुलित साधनों के संदर्भ में -- पत्र - 39 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस

निश्चय ही मैं तुम्हारे अनुरोध के अनुसार वे संक्षिप्त ग्रंथ तैयार करूँगा जो सावधानीपूर्वक व्यवस्थित हों और सीमित दायरे में साररूप से प्रस्तुत किए गए हों। किन्तु संभव है कि तुम्हें ऐसे संक्षेपों की अपेक्षा नियमित और क्रमबद्ध अध्ययन से अधिक लाभ हो। जिसे आजकल सामान्यतः ब्रेवियारियम (संक्षिप्त सार-संग्रह) कहा जाता है उसे उस समय, जब लैटिन अपनी शुद्ध अवस्था में बोली जाती थी, सुम्मारियम कहा जाता था। सीखने की अवस्था में हमें पहले प्रकार की सामग्री की अधिक आवश्यकता होती है जबकि दूसरा प्रकार तब उपयोगी होता है जब हम पहले से ही विषय को जानते हों। क्योंकि पहला हमें सिखाता है। दूसरा हमें स्मरण कराता है। फिर भी, मैं तुम्हें दोनों ही उपलब्ध कराऊँगा।

    जहाँ तक तुम्हारा और मेरा संबंध है, किसी विशेष लेखक की माँग करने का कोई कारण नहीं है। केवल अपरिचित व्यक्ति ही अपने समर्थन में प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करता है। मैं वह लिखूँगा जो तुम मुझसे चाहते हो, लेकिन अपने ही ढंग से। इस बीच, तुम्हारे पास और भी बहुत-से लेखकों की रचनाएँ उपलब्ध हैं जो मुझे लगता है कि तुम्हें पर्याप्त रूप से सही मार्ग पर बनाए रखेंगी। बस दार्शनिकों की सूची या अनुक्रमणिका उठा लो। उसे देखकर ही तुम्हारे भीतर परिश्रम करने की प्रेरणा जाग उठेगी। जब तुम देखोगे कि तुम्हारे हित के लिए कितने लोगों ने श्रम किया है तब तुम्हारी भी इच्छा होगी कि तुम स्वयं उन लोगों में से एक बनो।

    किसी उदात्त और महान प्रकृति का यह सबसे श्रेष्ठ गुण है कि वह सम्माननीय उदाहरणों से प्रेरणा ग्रहण करती है। उच्च चरित्र वाला कोई भी व्यक्ति निकृष्ट और तुच्छ बातों में आनंद नहीं लेता। उसे तो महानता का दर्शन ही आकर्षित करता है और ऊपर उठाता है। जिस प्रकार अग्नि की लौ सदैव ऊपर की ओर उठती है और उसे न तो दबाया जा सकता है, न ही स्थिर रखा जा सकता है, उसी प्रकार हमारा मन भी निरंतर गतिशील रहता है। जितना अधिक वह शक्तिशाली होता है, उतना ही अधिक जीवंत और सक्रिय होता है। किन्तु वह व्यक्ति वास्तव में सौभाग्यशाली है जो इस ऊर्जा को शुभ और श्रेष्ठ कार्यों की ओर मोड़ देता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को भाग्य के अधिकार-क्षेत्र से बाहर स्थापित कर लेता है। वह समृद्धि को संयमित रखता है, विपत्तियों को छोटा कर देता है, उन वस्तुओं को तुच्छ समझता है जिनकी अन्य लोग प्रशंसा करते हैं।



    महान आत्मा विशाल धन-संपत्ति को तुच्छ समझती है। वह अपार वैभव की अपेक्षा सीमित और संतुलित साधनों को अधिक पसंद करती है। क्योंकि संयम उपयोगी और जीवनदायी होता है जबकि अति-समृद्धि अपनी अधिकता के कारण मनुष्य को हानि पहुँचाती है। यह उसी प्रकार है जैसे गेहूँ की ऐसी भारी उपज जिसका भार बालियों को झुका दे। या फलों का ऐसा बोझ, जो शाखाओं को तोड़ डाले।  या ऐसे पशु, जो इतने अधिक बच्चे उत्पन्न करें कि उनमें से सभी परिपक्वता तक न पहुँच सकें। मनुष्य का मन भी इसी प्रकार प्रभावित होता है, जब वह अत्यधिक समृद्धि द्वारा बिगाड़ दिया जाता है। तब वह उस समृद्धि का उपयोग न केवल दूसरों के अहित के लिए करता है बल्कि अंततः अपने ही नुकसान के लिए भी।

    कौन-सा शत्रु कभी किसी मनुष्य के साथ उतनी कठोरता से पेश आया है जितनी कठोरता से कुछ लोगों के अपने ही सुख और भोग-विलास उनके साथ पेश आते हैं? उनकी इच्छाएँ अनियंत्रित होती हैं, मानो उन्मादग्रस्त। वे क्षमायोग्य भी न होतीं, यदि उनका दुष्परिणाम केवल उन्हीं पर न पड़ता। यह भी बिना कारण नहीं है कि वे ऐसे उन्माद से पीड़ित रहते हैं। क्योंकि जो इच्छाएँ प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती हैं, वे अनिवार्य रूप से अनंत की ओर बढ़ती चली जाती हैं। प्रकृति ने हमारी आवश्यकताओं की एक सीमा निर्धारित कर रखी है परंतु शून्य और विकृत इच्छाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि उनकी कोई सीमा नहीं होती। हमारी आवश्यकताएँ उपयोगिता द्वारा मापी जाती हैं। लेकिन उसके आगे सीमा-रेखा कहाँ खींची जा सकती है?

    इस प्रकार वे स्वयं को भोग-विलास में डुबो देते हैं और उनके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि फिर उनके बिना रह ही नहीं सकते। उनकी सबसे बड़ी दुर्दशा यह है कि जो वस्तुएँ कभी विलासिता थीं, वे अब उनके लिए आवश्यकताएँ बन चुकी हैं। वे अपने सुखों का उपभोग नहीं करते बल्कि उनके दास बन जाते हैं। सबसे बुरी बात यह है कि वे अपने भीतर की सबसे निकृष्ट प्रवृत्तियों से भी प्रेम करने लगते हैं। उनकी स्थिति का सबसे भयावह पक्ष यह है कि वे न केवल अपने लज्जाजनक आचरण में आनंद लेते हैं बल्कि उसे उचित भी मानने लगते हैं। जब अवगुण ही आचरण का नियम बन जाता है, तब सुधार या उपचार की कोई संभावना शेष नहीं रहती।

शब्दों के संदर्भ में -- पत्र - 38 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम्हारा यह आग्रह उचित है कि हम एक-दूसरे को अधिक बार पत्र लिखें। संवाद के इतना लाभकारी होने का कारण यह है कि वह धीरे-धीरे मन के भीतर प्रवेश करता है। पहले से तैयार किए गए और भीड़ के सामने दिए गए भाषण अधिक शोर तो पैदा करते हैं। उनमें आत्मीयता कम होती है। दर्शन तो सदुपदेश है। कोई भी व्यक्ति उपदेश ऊँचे और गूँजते स्वर में नहीं देता। निश्चय ही ऐसे अवसर आते हैं जब किसी प्रकार का प्रेरणात्मक भाषण देना आवश्यक होता है। यदि मैं उसे ऐसा कहूँ, जब कोई व्यक्ति संकोच कर रहा हो और उसे आगे बढ़ाने के लिए एक धक्का चाहिए। लेकिन जब उद्देश्य केवल सीखने की प्रेरणा देना नहीं बल्कि वास्तव में किसी को सीखाना हो, तब इन अपेक्षाकृत शांत और संयत वचनों का सहारा लेना पड़ता है। वे अधिक आसानी से मन में प्रवेश करते हैं और टिके भी रहते हैं क्योंकि आवश्यकता बहुत अधिक शब्दों की नहीं होती बल्कि ऐसे शब्दों की होती है जो प्रभावशाली हों।


By Stevie Unknown 

    उन्हें बीजों की तरह बिखेरा जाना चाहिए। बीज स्वयं तो बहुत छोटी-सी वस्तु होता है फिर भी जब वह उचित स्थान पर गिरता है तो अपनी अंतर्निहित शक्ति को विकसित करता है और एक विशाल तथा निरंतर बढ़ने वाले पौधे में बदल जाता है। तर्क और विचार भी इसी प्रकार काम करते हैं। जब तुम उन्हें देखते हो तो वे आकार में छोटे प्रतीत होते हैं। लेकिन जब उन्हें व्यवहार में लाया जाता है तो वे विकसित होकर फैलते हैं। कुछ ही शब्द कहे जाते हैं। यदि मन उन्हें भली-भाँति ग्रहण कर ले तो वे ऊँचे और सशक्त बन जाते हैं। 

    मैं फिर कहता हूँ, शब्द बीजों के समान कार्य करते हैं। यद्यपि वे छोटे होते हैं फिर भी बहुत कुछ कर दिखाते हैं। किन्तु, जैसा मैंने कहा, उन्हें ग्रहण करने वाला मन उनके योग्य होना चाहिए और उन्हें अपने भीतर आत्मसात करना चाहिए। तब वही मन उन विचारों को पुनः उत्पन्न करेगा। जितना उसने प्राप्त किया था उससे कहीं अधिक फल उत्पन्न करेगा।


अभी के लिए विदा 

दर्शन के प्रति समर्पण के संदर्भ में -- पत्र - 37 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 

मन की उत्कृष्टता से स्वयं को बाँधने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है कि तुम अपने दिए हुए वचन और अपने द्वारा खाई गई प्रतिज्ञा को निभाओ। एक उत्कृष्ट मनुष्य बनने की प्रतिज्ञा। कोई व्यक्ति केवल मज़ाक में ही तुम्हें यह कह सकता है कि यह सेवा सरल और आरामदायक है। मैं नहीं चाहता कि तुम धोखा खाओ। इस अत्यंत सम्माननीय प्रतिज्ञा के शब्द उसी दूसरी, अत्यंत अपमानजनक प्रतिज्ञा के समान हैं, “जलाया जाना, बाँधा जाना, और तलवार से मारा जाना।” जो लोग ग्लैडिएटर बनकर अपना जीवन बेच देते हैं और भोजन तथा पेय के बदले अपना रक्त चुकाते हैं, वे इन सब कष्टों को अपनी इच्छा के विरुद्ध सहने के लिए अनुबंधित होते हैं।  लेकिन तुम इन्हें अपनी इच्छा से और स्वेच्छा से सहने के लिए प्रतिबद्ध हो। उन्हें अपने हथियार नीचे रख देने और भीड़ की दया की परीक्षा लेने का अवसर मिलता है।  लेकिन तुम न अपने हथियार नीचे रखोगे और न ही अपने जीवन की भीख माँगोगे। तुम्हें अपने पैरों पर खड़े हुए, अपराजित अवस्था में मरना होगा। कुछ अतिरिक्त दिनों या वर्षों को प्राप्त कर लेने से क्या लाभ? एक बार जन्म लेने के बाद हमें किसी प्रकार की मोहलत नहीं मिलती।


By Inayat Malik 

    “तो फिर,” तुम पूछते हो, “मुझे इससे मुक्ति कैसे मिलेगी?” तुम इसकी शर्तों से बच नहीं सकते। लेकिन उन पर विजय अवश्य पा सकते हो। “शक्ति अपना मार्ग खोज लेती है।” दर्शन तुम्हें वही शक्ति प्रदान करेगा। यदि तुम सुरक्षित रहना चाहते हो, शांत रहना चाहते हो, सुखी रहना चाहते हो और सबसे बढ़कर यदि तुम स्वतंत्र होना चाहते हो तो स्वयं को दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

    मूर्खता नीच, तुच्छ, घृणित और दासवत होती है। अनेक प्रबल भावनाओं की अधीन रहती है। ये भावनाएँ अत्यंत कठोर स्वामी हैं। कभी वे बारी-बारी से तुम पर शासन करती हैं और कभी सब मिलकर। बुद्धि तुम्हें उनसे मुक्त करती है। केवल बुद्धि ही स्वतंत्रता है। उस तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है। वह सीधा मार्ग है। तुम भटकोगे नहीं, आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ो। यदि तुम चाहते हो कि सब वस्तुएँ तुम्हारे अधीन हों तो स्वयं को तर्कबुद्धि के अधीन कर दो। जब तर्क तुम्हारा शासक बन जाएगा, तब तुम बहुत-सी चीज़ों के शासक बन जाओगे। तर्क से तुम सीखोगे कि क्या कार्य करना है और किस प्रकार करना है। तुम केवल संयोगवश किसी चीज़ से नहीं टकराओगे।

    तुम किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं बता सकते जो यह जानता हो कि उसने उस वस्तु की इच्छा करना कैसे शुरू किया जिसकी वह अब इच्छा करता है। लोग अपने विचारपूर्वक बनाए गए उद्देश्यों से नहीं चलते बल्कि मन की चंचल इच्छाओं द्वारा इधर-उधर धकेले जाते हैं। कभी-कभी हम भाग्य का अच्छा उपयोग कर लेते हैं। लेकिन उतनी ही बार भाग्य हम पर हावी हो जाता है। आगे बढ़ने के बजाय बहते चले जाना लज्जाजनक है। घटनाओं के बवंडर के बीच स्वयं को पाकर आश्चर्य से यह पूछना भी लज्जाजनक है, “मैं यहाँ कैसे पहुँच गया?”


अभी के लिए विदा 

लोगों के संदर्भ में -- पत्र - 36 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

अपने मित्र से कहो कि वह इतना साहसी बने कि उन लोगों की आलोचना को तुच्छ समझ सके जो कहते हैं कि वह छाया और आराम का जीवन खोज रहा है। अपने प्रतिष्ठित पद को छोड़ रहा है और जबकि वह इससे भी बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता था। उसने सब कुछ छोड़कर शांति को चुन लिया है। उसे प्रतिदिन, एक-एक करके, उन्हें यह दिखाना चाहिए कि अपने ही कार्यों और मामलों पर ध्यान देना उसके लिए कितना लाभकारी है।


Painter Unknown, Spain, 17th Century 

    जो लोग दूसरों की ईर्ष्या का कारण बनते हैं, वे हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं। कुछ को एक ओर धकेल दिया जाता है और कुछ गिर पड़ते हैं। समृद्धि एक अशांत वस्तु है। वह स्वयं को ही व्याकुल कर देती है। वह बुद्धि को भ्रमित कर देती है और हमेशा एक ही प्रकार से नहीं क्योंकि वह लोगों को भिन्न-भिन्न दिशाओं में उकसाती है। कुछ को सत्ता की ओर तो कुछ को भोग-विलास की ओर। कुछ उससे फूलकर घमंडी हो जाते हैं जबकि कुछ उससे निर्बल और पूरी तरह शक्तिहीन हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे अच्छी तरह संभाल लेते हैं। हाँ, ऐसे लोग हैं, जैसे कुछ लोग मदिरा को भी अच्छी तरह संभाल लेते हैं। लेकिन इससे तुम्हें यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि भाग्यशाली वह व्यक्ति है जिसके चारों ओर बहुत-से अनुयायी जमा रहते हैं। वे उसके चारों ओर वैसे ही इकट्ठा होते हैं जैसे पशु किसी जलाशय के चारों ओर। वे पानी पीते हैं और उसे गंदला कर देते हैं।

    “लोग उसे शौकिया आदमी और निकम्मा कह रहे हैं।” तुम जानते हो कि कुछ लोगों के बोलने का ढंग ही विकृत होता है। वे बातों को उलट अर्थ में कहते हैं। वे उसे पहले भाग्यशाली और सफल व्यक्ति कहा करते थे तो उससे क्या सिद्ध होता है? क्या वह वास्तव में ऐसा था? उसी प्रकार मुझे इस बात की भी कोई परवाह नहीं कि कुछ लोग उसे अत्यधिक कठोर और गंभीर समझते हैं। अरिस्टो कहा करते थे, "मैं एक प्रसन्नचित्त और भीड़ में लोकप्रिय युवक की अपेक्षा एक गंभीर और कठोर युवक को देखना अधिक पसंद करूँगा। क्योंकि जो मदिरा आगे चलकर उत्तम बनती है, वह नई होने पर तीखी और कड़वी होती है जबकि जो मदिरा पात्र में ही स्वादिष्ट लगती है, वह समय की कसौटी पर टिक नहीं पाती।

    तो उन्हें उसे 'कठोर' और 'अपने हितों का शत्रु' कहने दो। यदि वह सद्गुण की साधना में और उदार विद्याओं के अध्ययन में निरंतर लगा रहे तो यह कठोरता समय के साथ उत्तम फल देगी। और उदार विद्याओं से मेरा अभिप्राय उन विषयों से नहीं है जिनका थोड़ा-बहुत ज्ञान ही पर्याप्त हो। मेरा आशय उन विद्याओं से है जिनमें मन को पूरी तरह डुबो देना पड़ता है।

    अब सीखने का समय है। “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या ऐसा कोई समय भी होता है जो सीखने का समय न हो?” बिल्कुल नहीं। जीवन के हर समय सीखना सम्मानजनक है। लेकिन इसी के साथ ऐसा भी समय आता है जब प्रारम्भिक शिक्षा लेना सम्मानजनक नहीं रह जाता। यह लज्जाजनक बल्कि हास्यास्पद है कि कोई वृद्ध व्यक्ति अभी भी अक्षरज्ञान ही प्राप्त कर रहा हो। शिक्षा युवावस्था में प्राप्त कर लेनी चाहिए और फिर वृद्धावस्था में उसका उपयोग करना चाहिए।

    अतः यदि तुम अपने मित्र को उसकी सर्वोत्तम क्षमता तक पहुँचने में सहायता करोगे तो तुम अपने ऊपर बहुत बड़ा उपकार करोगे। कहा जाता है कि यही वे अनुग्रह हैं जिन्हें माँगना चाहिए और यही वे अनुग्रह हैं जिन्हें प्रदान करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये सर्वोच्च प्रकार के उपकार हैं जिन्हें देना भी उतना ही लाभदायक है जितना उन्हें प्राप्त करना।

    वैसे भी, अब वह स्वतंत्र नहीं रहा। वह अपना वचन दे चुका है। जितना लज्जाजनक किसी ऋण का भुगतान न करना है उससे भी अधिक लज्जाजनक अपनी ही अपेक्षाओं को पूरा न करना है। पहले प्रकार के ऋण को चुकाने के लिए व्यापारी को लाभदायक समुद्री यात्रा की आवश्यकता होती है। किसान को खेती के लिए उपजाऊ भूमि और अनुकूल मौसम की आवश्यकता होती है। लेकिन तुम्हारे मित्र पर जो ऋण है, उसे वह केवल अपनी इच्छा और तत्परता से चुका सकता है और किसी अन्य प्रकार से नहीं।

    भाग्य का उसके आचरण पर कोई अधिकार नहीं है। उसे स्वयं ही उसका नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहिए ताकि उसका मन पूर्ण शांति में अपनी परिपूर्णता प्राप्त कर सके। ऐसा कि वह न किसी हानि को हानि समझे न किसी लाभ को लाभ बल्कि जो कुछ भी घटित हो, उसके प्रति उसका दृष्टिकोण समान बना रहे। यदि साधारण सांसारिक वस्तुओं का ढेर उसके चारों ओर लगा हो तो भी वह अपनी संपत्तियों से ऊँचा बना रहता है। यदि संयोगवश उन ढेरों में से एक या वे सभी ढेर गिर जाएँ तो भी वह स्वयं किसी प्रकार छोटा नहीं हो जाता।

    यदि उसका जन्म फ़ारस में हुआ होता तो वह बचपन से ही धनुष चलाना सीख रहा होता। यदि जर्मनी (पाठकों की सुविधा के लिए देश का नाम दिया गया है। उस समय संभवतः किसी और शब्द का प्रोयोग किया गया होगा।) में हुआ होता तो वह बाल्यावस्था से ही हल्का भाला फेंकने का अभ्यास कर रहा होता। यदि वह हमारे पूर्वजों के समय में जीवित होता तो उसने घुड़सवारी और आमने-सामने के युद्ध की शिक्षा प्राप्त की होती। प्रत्येक व्यक्ति को अपने समाज की प्रशिक्षण-पद्धति के अनुसार ऐसे कौशल सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है बल्कि उनसे यह अपेक्षा भी की जाती है। तो फिर तुम्हारे मित्र को किस कला का अभ्यास करना चाहिए? ऐसी कला का, जो उसे हर प्रकार के हथियार और हर प्रकार के शत्रु के विरुद्ध समर्थ बनाए मृत्यु की बिल्कुल परवाह न करने की कला।

    कोई भी इस बात पर संदेह नहीं करता कि मृत्यु में कुछ भयावह है। कुछ ऐसा जो केवल शरीर ही नहीं बल्कि हमारी तर्कशील प्रकृति को भी झकझोर देता है क्योंकि उसे आत्म-प्रेम के लिए ही बनाया गया है। यदि हम स्वाभाविक रूप से और अपनी सहज प्रवृत्ति के अनुसार मृत्यु की ओर उसी प्रकार अग्रसर होते जैसे सभी प्राणी आत्म-सुरक्षा की प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं तो उसके लिए स्वयं को तैयार करने और अभ्यास करने की कोई आवश्यकता न होती। कोई व्यक्ति इसलिए प्रशिक्षण नहीं लेता कि आवश्यकता पड़ने पर वह गुलाबों की शय्या पर शांति से लेट सके बल्कि वह स्वयं को इसलिए कठोर बनाता है कि यातना के बीच भी अपने कर्तव्य से विमुख न हो। यदि आवश्यकता पड़े तो घायल होने पर भी पूरी रात पहरा दे सके बिना अपने भाले का सहारा लिए। क्योंकि जो लोग किसी सहारे के सहारे टिक जाते हैं, वे अंततः सो जाते हैं।

    मृत्यु में कोई हानि नहीं है क्योंकि हानि तो किसी ऐसे व्यक्ति की हो सकती है जो अस्तित्व में हो। लेकिन यदि तुम्हारी इच्छा लंबे जीवन की है तो यह स्मरण रखो कि जो वस्तुएँ हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती हैं। वे वास्तव में नष्ट नहीं होतीं। वे उस प्रकृति में सुरक्षित रहती हैं जहाँ से वे आई थीं और शीघ्र ही फिर लौटने वाली हैं। वे अस्तित्व में रहना बंद कर देती हैं पर नष्ट नहीं होतीं। मृत्यु, जिससे हम इतना भय खाते हैं और जिसका सामना करने से बचते हैं जीवन को केवल बीच में रोकती है, उसे चुरा नहीं लेती। एक दिन फिर आएगा जो हमें पुनः प्रकाश में ले आएगा। यद्यपि बहुत-से लोग ऐसे दिन को स्वीकार करने से इंकार कर दें, यदि लौटने से पहले उन्हें सब कुछ भूलना न पड़ता।

    किसी और दिन मैं तुम्हें अधिक विस्तार से समझाऊँगा कि जो वस्तुएँ नष्ट होती हुई प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में केवल रूपांतरित होती हैं। जो व्यक्ति लौटने की आशा के साथ विदा होता है, उसे शांत मन से विदा होना चाहिए। प्रकृति के चक्रों पर विचार करो। तुम देखोगे कि वहाँ कुछ भी वास्तव में समाप्त नहीं होता बल्कि वस्तुएँ बारी-बारी से नीचे जाती हैं और फिर ऊपर उठती हैं। ग्रीष्म ऋतु समाप्त हो गई है पर अगला वर्ष उसे फिर लौटा लाएगा। शीत ऋतु चली गई है पर अपने नियत महीनों में वह फिर लौटेगी। रात्रि ने सूर्य को ढक लिया है लेकिन दिन शीघ्र ही रात्रि को हटाकर स्वयं आ जाएगा। तारे भी अपने पूर्व मार्गों को दोहराते हैं। आकाश का एक भाग निरंतर उदित होता है जबकि दूसरा अस्त होता रहता है।

    अच्छा, अब मैं इसे यहीं समाप्त करता हूँ लेकिन एक बात और जोड़ दूँ। न तो छोटे बच्चे मृत्यु से डरते हैं और न ही चंचल तथा भटकते मन वाले लोग। उनकी अवस्था ही उन्हें निश्चिंतता प्रदान करती है। यह अत्यंत लज्जाजनक बात होगी यदि बुद्धि हमारे लिए वह न कर सके जो मूर्खता उनके लिए कर देती है।


अभी के लिए विदा 

अध्ययनरत रहने के संदर्भ में -- पत्र - 35 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

जब मैं तुम्हें अध्ययन करने के लिए इतनी दृढ़ता से प्रेरित करता हूँ तो मैं अपने ही हित की सेवा कर रहा होता हूँ। मैं एक मित्र पाना चाहता हूँ। यह मेरे लिए तब तक संभव नहीं है जब तक तुम आत्म-सुधार के अपने प्रयास में दृढ़तापूर्वक लगे नहीं रहते। क्योंकि अभी तुम मुझसे प्रेम तो करते हो, परंतु मेरे मित्र नहीं हो।



    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या इन दोनों में कोई अंतर है?” वास्तव में, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। मित्र प्रेम करता है लेकिन जो प्रेम करता है वह अनिवार्य रूप से मित्र नहीं होता। इसी कारण मित्रता सदैव लाभकारी होती है। जबकि प्रेम कभी-कभी हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है। यदि और किसी कारण से नहीं तो कम से कम इसी कारण प्रगति करो कि तुम प्रेम करना सीख सको।

    इसलिए मेरी खातिर अपनी उन्नति में शीघ्रता करो, अन्यथा तुम्हारा अध्ययन किसी और के ही काम आएगा। यह सच है कि मैं अभी भी उसका लाभ पा रहा हूँ क्योंकि मैं कल्पना करता हूँ कि हम दोनों एक ही विचार के हो जाएँगे। तुम्हारी आयु का जो उत्साह और शक्ति अभी तुम्हारे पास है, वह मुझे वह सब लौटा देगी जो मैंने खो दिया है। हमारी आयु का अंतर बहुत बड़ा नहीं है। फिर भी, मैं वास्तविक रूप से प्रसन्न होना चाहता हूँ। जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनसे उनकी अनुपस्थिति में भी हमें आनंद मिलता है पर वह हल्का और क्षणिक होता है। उनका दर्शन, उनकी उपस्थिति और उनसे वार्तालाप अपने भीतर एक प्रकार का सजीव सुख रखते हैं, विशेषकर तब जब तुम न केवल उस व्यक्ति को देखते हो जिसे देखना चाहते हो बल्कि उसे वैसा भी देखते हो जैसा तुम उसे देखना चाहते थे। अतः स्वयं को मुझे समर्पित कर दो। यह एक महान उपहार होगा। ताकि तुम और भी अधिक परिश्रम करो, यह स्मरण रखो कि तुम नश्वर हो और मैं वृद्ध हूँ।

    तो शीघ्र मेरे पास आओ। लेकिन उससे भी पहले, स्वयं अपने पास पहुँचने की शीघ्रता करो। जैसे-जैसे तुम प्रगति करो, सबसे बढ़कर यह प्रयास करो कि तुम अपने प्रति सुसंगत बने रहो। यदि कभी तुम जानना चाहो कि कोई उपलब्धि हुई है या नहीं तो यह देखो कि आज तुम्हारे संकल्प और उद्देश्य वही हैं या नहीं जो कल थे। संकल्पों का बदलना यह दिखाता है कि मन समुद्र में भटकते जहाज़ की तरह है, जो हवा के झोंकों से इधर-उधर बहता रहता है। जो वस्तु दृढ़ता से स्थापित होती है, वह इधर-उधर नहीं डोलती। पूर्णतः बुद्धिमान व्यक्ति का स्वभाव ऐसा ही होता है। कुछ सीमा तक उस व्यक्ति का भी जो बुद्धिमत्ता की ओर अग्रसर है। तो फिर दोनों में अंतर क्या है? जो प्रगति कर रहा है, वह गति तो करता है पर अपनी स्थिति नहीं बदलता। वह केवल उसी स्थान पर हल्का-सा डोलता रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति बिल्कुल नहीं डोलता।

अभी के लिए विदा 

बेहतर इंसान बनने के संदर्भ में -- पत्र - 34 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

जब-जब मैं तुम्हारे पत्रों और तुम्हारे कार्यों से यह जानता हूँ कि तुमने स्वयं को भी कितना पीछे छोड़ दिया है, तब-तब मेरा हृदय गर्व से भर उठता है। मैं आनंद से पुलकित हो जाता हूँ। अपने वर्षों का बोझ झाड़ देता हूँ और फिर से युवावस्था की ऊष्मा का अनुभव करने लगता हूँ। क्योंकि तुमने बहुत पहले ही भीड़ का साथ छोड़ दिया था। यदि कोई किसान अपने वृक्ष को फलते देखकर प्रसन्न होता है, यदि कोई पशुपालक अपने पशुओं को संतान उत्पन्न करते देखकर आनंदित होता है, यदि कोई व्यक्ति अपने संरक्षण में पले युवक को वयस्क होते देखकर ऐसा अनुभव करता है मानो वह स्वयं ही परिपक्व हुआ हो तो तुम क्या सोचते हो कि उस व्यक्ति को कितना आनंद होता होगा जिसने किसी के बौद्धिक विकास का मार्गदर्शन किया हो और उस अपरिपक्व मन को अचानक पूर्ण विकसित होते देखा हो? मैं तुम्हें अपना कहता हूँ। तुम मेरी कृति हो। तुम्हारी क्षमता को पहचानकर सबसे पहले मैंने ही तुम्हें अपने संरक्षण में लिया था। मैंने ही तुम्हें प्रोत्साहित किया, आगे बढ़ाया, तुम्हें रुकने नहीं दिया बल्कि निरंतर प्रेरित करता रहा। मैं अब भी यही कर रहा हूँ। अंतर केवल इतना है कि अब मैं दौड़ में तुम्हारा उत्साह बढ़ा रहा हूँ और बदले में तुम मेरा उत्साह बढ़ा रहे हो।



    “और क्या कहूँ?” तुम पूछते हो। “मैं तो हर समय तत्पर हूँ।” यही तो मुख्य बात है। केवल आधी नहीं, जैसा कि उस कहावत में कहा जाता है कि ‘अच्छी शुरुआत आधा काम पूरा कर देती है।’ यह ऐसा विषय है जो मन पर निर्भर करता है। इसलिए जब कोई व्यक्ति अच्छा बनने की इच्छा कर लेता है तो अच्छाई का एक बड़ा भाग पहले ही प्राप्त हो जाता है।

    क्या तुम जानते हो कि मैं अच्छे मनुष्य से क्या अभिप्राय रखता हूँ? वह जो पूर्ण है। वह जो सिद्ध और परिपक्व हो चुका है। वह जिसे कोई भी शक्ति, कोई भी बाध्यता, किसी भी प्रकार से गलत कार्य करने के लिए विवश नहीं कर सकती। मुझे विश्वास है कि यदि तुम दृढ़ता से लगे रहोगे, निरंतर आगे बढ़ते रहोगे और अपने सभी कर्मों तथा वचनों को एक-दूसरे के अनुरूप और सामंजस्यपूर्ण बनाओगे, मानो वे सब एक ही साँचे में ढले हों। तुम ऐसे ही अच्छे मनुष्य बनोगे। यदि किसी व्यक्ति के कर्म परस्पर असंगत हों तो इसका अर्थ है कि उसका मन अभी तक सही रूप से व्यवस्थित और संतुलित नहीं हुआ है।

वाणी के संदर्भ में -- पत्र - 40 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुम मुझे इतनी बार पत्र लिखते हो क्योंकि इस प्रकार तुम मुझे अपना स्वरूप दिखाते हो जितना किसी अनुपस...