प्रिय लूसीलियस
तुम्हारे पत्र में अनेक छोटे-छोटे प्रश्न उठाए गए थे पर अंततः वह एक ही प्रश्न पर आकर ठहर गया। तुमने मुझसे पूछा है कि हमारे मन में ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ (honorable) की अवधारणा कैसे उत्पन्न हुई। कुछ दार्शनिकों के अनुसार ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ दो भिन्न वस्तुएँ हैं किन्तु हम स्टोइक इन्हें केवल भेदयुक्त मानते हैं, अलग नहीं।
मेरा आशय यह है कि कुछ लोग ‘शुभ’ को केवल वही मानते हैं जो उपयोगी हो। इसलिए वे धन, घोड़े, शराब और जूतों तक को ‘शुभ’ कह देते हैं। उनके लिए ‘शुभ’ का मूल्य इतना गिर जाता है कि वह साधारण उपयोग की वस्तुओं तक सीमित रह जाता है। दूसरी ओर, उनके मत में ‘सम्माननीय’ वह है जो किसी पूर्णतः उचित कर्म के तर्कसंगत स्वरूप के अनुरूप हो जैसे, वृद्ध पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करना, निर्धन मित्र की सहायता करना, साहसपूर्वक युद्ध करना, अथवा विवेकपूर्ण और संतुलित नीति-भाषण देना। हम भी ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ में एक प्रकार का भेद स्वीकार करते हैं, किन्तु उन्हें मूलतः एक ही मानते हैं। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती, जब तक वह सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह अनिवार्य रूप से शुभ भी है। इन दोनों धारणाओं के बीच का अंतर मैं फिर से विस्तार से नहीं बताऊँगा क्योंकि इसका उल्लेख मैं पहले अनेक बार कर चुका हूँ। केवल एक बात कहूँगा, हमारे मत में कोई भी वस्तु शुभ नहीं हो सकती, जिसका दुरुपयोग किया जा सके। तुम स्वयं देख सकते हो कि कितने लोग धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और शारीरिक बल का दुरुपयोग करते हैं।
अब मैं उस प्रश्न पर लौटता हूँ, जिस पर तुम मुझसे चर्चा करना चाहते हो। हमने सबसे पहले ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ की अवधारणा कैसे प्राप्त की? प्रकृति हमें यह नहीं सिखा सकती थी क्योंकि प्रकृति ने हमें ज्ञान नहीं दिया है बल्कि केवल ज्ञान के बीज दिए हैं। कुछ दार्शनिकों का कहना है कि यह अवधारणा हमें संयोगवश प्राप्त हो गई किन्तु यह विश्वास करना कठिन है कि कोई व्यक्ति केवल संयोग से सद्गुण की धारणा तक पहुँच गया हो। हमारा मत यह है कि ‘सम्माननीय’ और ‘शुभ’ की अवधारणा बार-बार होने वाले कर्मों के निरीक्षण और उनकी तुलना के द्वारा निष्कर्ष रूप में प्राप्त होती है। हमारे मतानुसार इन्हें ‘एनालॉजी’ (analogy- समानता के आधार पर) के आधार पर समझा जाता है।
चूँकि इस शब्द ‘एनालॉजी’ (analogy) को लैटिन विद्वानों ने अपनी भाषा में अपना लिया है। इसलिए मेरा विचार है कि इसे अस्वीकार करने के बजाय रोमन भाषा-समुदाय में पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए। अतः मैं इसका प्रयोग केवल वैध शब्द के रूप में ही नहीं बल्कि एक पूर्णतः स्थापित शब्द के रूप में भी करूँगा। अब मैं स्पष्ट करता हूँ कि यह ‘एनालॉजी’ क्या है। हम शरीर के स्वास्थ्य से परिचित थे। उसी के आधार पर हमने यह समझा कि मन का भी एक स्वास्थ्य होता है। हम शरीर की शक्ति को जानते थे। उसी से हमने निष्कर्ष निकाला कि मन की भी एक शक्ति होती है। उदारता, मानवता और साहस के कुछ कार्यों ने हमें विस्मित कर दिया। हमने उनकी प्रशंसा ऐसे करनी शुरू की मानो वे पूर्णतः निर्दोष हों। यद्यपि उनमें अनेक दोष भी थे किन्तु किसी एक उत्कृष्ट कर्म की दीप्ति ने उन दोषों को ढँक दिया था और हमने उन्हें अनदेखा कर दिया। प्रकृति हमें यह प्रेरणा देती है कि प्रशंसनीय कर्मों को महान मानें और प्रत्येक व्यक्ति उनकी प्रशंसा करते समय प्रायः वास्तविकता से आगे बढ़ जाता है। इन्हीं कर्मों के आधार पर हमने एक महान शुभ की अवधारणा निर्मित की।
फ़ैब्रिसियस (रोमन सेनापति और राजनेता) ने पायरूस (प्राचीन यूनान के एपिरस राज्य के राजा) द्वारा दिया गया स्वर्ण अस्वीकार कर दिया। उसके विचार में किसी राजा के धन का तिरस्कार कर सकना, स्वयं किसी राज्य का स्वामी होने से भी अधिक महान था। बाद में, जब पायरूस के चिकित्सक ने उसे विष देकर मार डालने का प्रस्ताव किया, तब उसी फ़ैब्रिसियस ने राजा को इस षड्यंत्र से सावधान कर दिया। इन दोनों कार्यों में उसके चरित्र की एक ही दृढ़ता प्रकट होती है न तो स्वर्ण से खरीदा जाना और न ही विष देकर विजय प्राप्त करना। हमने ऐसे महान पुरुष की प्रशंसा की, जो न तो राजा के उपहारों से प्रभावित हुआ और न ही राजा के विरुद्ध दिए गए प्रस्तावों से। वह अपने आदर्शों पर अटल रहा और उसने वह कार्य किया, जो सबसे कठिन होता है, युद्ध की स्थिति में भी अपनी नैतिक निष्कलुषता बनाए रखना। उसका विश्वास था कि शत्रु के साथ भी अन्याय नहीं किया जाना चाहिए। अत्यन्त निर्धनता में जीवन बिताते हुए भी, जिसे वह अपने गौरव का विषय मानता था, उसने धन को उसी प्रकार ठुकरा दिया, जैसे उसने विष के प्रयोग को अस्वीकार किया था। उसने कहा, “पायरूस, मेरे कारण जीवित रहो और अब उस बात पर प्रसन्न हो जाओ जो पहले तुम्हें दुःख देती थी कि फ़ैब्रिसियस को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।”
होरातियस कोक्लेस (प्राचीन रोम का एक महान वीर और लोकनायक) अकेला ही उस संकरे पुल पर डट गया। उसने अपने साथियों को आदेश दिया कि वे उसके पीछे का पुल काट दें ताकि शत्रु के लिए आगे बढ़ने का मार्ग बंद हो जाए। वह तब तक आक्रमणकारियों को रोके रहा, जब तक कि गिरते हुए पुल की विशाल लकड़ियों के टूटने की प्रचंड ध्वनि उसके कानों में नहीं गूँज उठी। जब उसने पीछे मुड़कर देखा और पाया कि उसके अपने संकट ने उसके देश को संकट से मुक्त कर दिया है, तब उसने पुकारकर कहा, “आओ, यदि कोई उसी मार्ग से मेरा पीछा करना चाहता है, जिस मार्ग से मैं जा रहा हूँ!” इसके बाद वह सीधे नदी में कूद पड़ा। प्रबल वेग से बहती धारा को पार करते समय उसने अपने शस्त्रों की रक्षा उतनी ही सावधानी से की, जितनी अपने प्राणों की। अंततः वह अपने विजयी शस्त्रों का सम्मान अक्षुण्ण रखते हुए उतनी ही सुरक्षित लौट आया, मानो उसने पुल पार करके ही वापसी की हो।
ऐसे और इसी प्रकार के कर्मों ने हमें सद्गुण का स्वरूप समझाया। अब मैं एक ऐसी बात जोड़ूँगा जो तुम्हें आश्चर्यजनक लग सकती है। कभी-कभी हमें सम्माननीय के स्वरूप का ज्ञान बुरी बातों से भी प्राप्त हुआ अर्थात उत्कृष्टता अपने विपरीत के माध्यम से भी स्पष्ट हुई। जैसा कि तुम जानते हो, कुछ सद्गुण और दुर्गुण एक-दूसरे के बहुत निकट प्रतीत होते हैं। यहाँ तक कि दुष्ट और अनैतिक व्यक्तियों में भी कभी-कभी सदाचार का आभास दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, अपव्ययी व्यक्ति उदार होने का भ्रम उत्पन्न करता है। जबकि देना जानने और बचाकर रखना न जानने के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लूसीलियस, मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसे बहुत-से लोग हैं जो अपना धन दान नहीं करते बल्कि उसे केवल उड़ा देते हैं। मैं उस व्यक्ति को उदार नहीं कह सकता जिसे धन का कोई मूल्य ही न हो। इसी प्रकार लापरवाही कभी-कभी सरल स्वभाव जैसी लगती है और उतावलापन साहस का आभास देता है।
इसी प्रकार की समानता ने हमें विवश किया कि हम विचार करें और उन बातों में भेद स्थापित करें जो देखने में तो एक जैसी लगती हैं किन्तु वास्तव में अत्यन्त भिन्न होती हैं। जब हमने उन लोगों को देखा जो किसी एक महान कार्य के कारण प्रसिद्ध हो गए थे, तब हमने यह भी ध्यान देना आरम्भ किया कि ऐसा व्यक्ति किसी एक अवसर पर तो बड़े उत्साह और गौरव के साथ श्रेष्ठ कार्य कर सकता है, किन्तु केवल उसी एक अवसर पर। हमने किसी व्यक्ति को युद्ध में साहसी देखा किन्तु जनसभा में भयभीत। हमने उसे निर्धनता को धैर्यपूर्वक सहते हुए देखा, किन्तु अपमान का सामना करते समय अत्यन्त हीन और दुर्बल पाया। उसके कार्य की हमने प्रशंसा की, परन्तु उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं किया। इसके विपरीत, हमने एक दूसरे व्यक्ति को देखा जो अपने मित्रों के प्रति दयालु था, अपने शत्रुओं के प्रति सहनशील था तथा सार्वजनिक और निजी, दोनों प्रकार के जीवन में कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानशील था।
हमने देखा कि वह अपने कष्टों को कितने धैर्य से सहता है और अपने दायित्वों का निर्वाह कितनी दूरदर्शिता से करता है। जब धन देने की आवश्यकता होती तो वह उदारतापूर्वक देता और जब परिश्रम अपेक्षित होता तो वह बिना थके परिश्रम करता तथा अपने चरित्र की दृढ़ता से थकान पर विजय पा लेता। इसके अतिरिक्त, वह प्रत्येक कार्य में सदैव एक-सा रहता था। उसका आचरण परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली नीति पर आधारित नहीं था बल्कि ऐसे दृढ़ संस्कार के मार्गदर्शन में था जिसने उसे केवल उचित कर्म करने में समर्थ ही नहीं बनाया था, बल्कि अनुचित कर्म करना उसके लिए असंभव-सा कर दिया था। ऐसे व्यक्ति में हमने समझा कि सद्गुण अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुका है।
इसके बाद हमने इस सद्गुण के विभिन्न अंगों का विभाजन किया। यह उचित था कि इच्छाओं को संयमित किया जाए, भय को नियंत्रण में रखा जाए, प्रत्येक कार्य बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित अधिकार दिया जाए। इस प्रकार हमने संयम, साहस, विवेक और न्याय को समझा तथा प्रत्येक के लिए उसका विशिष्ट कार्य निर्धारित किया। तो फिर हमें सद्गुण की समझ कहाँ से प्राप्त हुई? उस मनुष्य के सुव्यवस्थित जीवन ने हमें उसका परिचय कराया, उसके गरिमापूर्ण आचरण, उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, उसके सभी कर्मों के बीच विद्यमान सामंजस्य और प्रत्येक कठिनाई पर विजय प्राप्त करने वाली उसकी महानता ने हमें सद्गुण का स्वरूप दिखाया। इसी प्रकार हम सुख की उस अवस्था को समझ पाए, ऐसे जीवन को, जो सहज प्रवाह के साथ चलता है और जो पूर्णतः अपने ही नियंत्रण में रहता है।
फिर यह बात हमें कैसे स्पष्ट हुई? मैं तुम्हें बताता हूँ। पूर्ण मनुष्य अर्थात वह जो सद्गुण से संपन्न था, कभी अपने भाग्य को कोसता नहीं था और न ही परिस्थितियों का सामना उदास या कटु मुखमुद्रा के साथ करता था।वह स्वयं को समस्त विश्व का नागरिक और सैनिक मानता था। इसलिए वह प्रत्येक श्रम को ऐसे स्वीकार करता था, मानो वह उसे सौंपा गया कोई आदेश हो। उसने किसी भी घटना को कष्टदायक बाधा या दुर्भाग्य नहीं माना बल्कि अपने लिए नियत एक कर्तव्य समझा। वह कहता था, “यह जो कुछ भी है, यही मेरा कार्य है। यदि यह कठिन और दुर्गम है, तो आओ, इसे पूरा करने में लग जाएँ।” इसी कारण उस व्यक्ति की महानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी, जो कभी विपत्तियों पर कराहता नहीं था और न ही अपने भाग्य की शिकायत करता था। उसने बहुत-से लोगों को अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय कराया। वह अंधकार में दीपक की भाँति प्रकाशित होता था और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता था, क्योंकि वह शांत और सौम्य था तथा मानवीय परिस्थितियों और ईश्वर की व्यवस्था, दोनों को समान भाव से स्वीकार करता था। उसका मन पूर्ण था और अपनी सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर चुका था।
उससे श्रेष्ठ केवल दैवी बुद्धि हो सकती है, जिसका एक अंश हमारे इस नश्वर हृदय में अवतरित हुआ है। यह हृदय तब सबसे अधिक दिव्य होता है, जब वह अपनी नश्वरता पर विचार करता है। तब वह समझता है कि मनुष्य का जन्म इस शरीर में केवल जीवन की निर्धारित अवधि पूरी करने के लिए हुआ है। यह शरीर उसका स्थायी घर नहीं, बल्कि एक प्रकार का अस्थायी अतिथिगृह है, जिसे उसे तब छोड़ देना चाहिए, जब उसे अनुभव हो कि अब वह अपने मेज़बान पर बोझ बनने लगा है।
लुसिलियस, मैं तुम्हें विश्वासपूर्वक कहता हूँ कि जब मन यह पहचान लेता है कि उसका वर्तमान निवास कितना तुच्छ और सीमित है तथा उसे छोड़ने से भयभीत नहीं होता, तब वह इस बात का अत्यन्त प्रबल संकेत देता है कि उसका उद्गम किसी उच्चतर स्रोत से हुआ है। जब हम यह स्मरण रखते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, तभी हम यह भी जान लेते हैं कि हमें कहाँ जाना है। क्या हम नहीं देखते कि हमारा शरीर कितनी असुविधाओं से घिरा रहता है और हम उससे कितने असंतुष्ट रहते हैं? कभी हम अपने सिर की शिकायत करते हैं, कभी पेट की, कभी छाती और गले की। कभी मांसपेशियों में पीड़ा होती है तो कभी पैरों में दर्द। कभी अतिसार होता है तो कभी नाक बहने लगती है। कभी शरीर में रक्त अधिक हो जाता है तो कभी उसकी कमी हो जाती है। हम चारों ओर से रोगों और कष्टों से घिरे रहते हैं और मानो अपने ही घर से निकाल दिए जाते हैं। यही दशा उन लोगों की होती है, जो दूसरे के घर में रहते हैं। फिर भी, जबकि हमें ऐसा क्षयशील शरीर मिला है, हम अनन्त काल तक जीवित रहने की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपनी आशाओं में हम मनुष्य-जीवन की अधिकतम सीमा तक अधिकार करना चाहते हैं। न धन की कोई सीमित मात्रा हमें संतुष्ट करती है और न ही प्रभाव और प्रतिष्ठा की कोई सीमा।
इससे अधिक निर्लज्ज और इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? जबकि हमारी मृत्यु निकट है, तब भी हमारे लिए कुछ भी पर्याप्त नहीं होता। वास्तव में, हम अभी से मर रहे हैं। प्रत्येक दिन हमें हमारे अंतिम क्षण के और निकट ले आता है, और प्रत्येक घड़ी हमें उस स्थान की ओर धकेल रही है, जहाँ से अंततः हमें गिरना ही है। देखो, हमारे मन पर कैसी अंधता छाई हुई है! जिसे मैं भविष्य कहता हूँ, वह अभी इसी क्षण घटित हो रहा है और उसका एक बड़ा भाग तो पहले ही बीत चुका है। जितना जीवन हम जी चुके हैं, वह अब उसी स्थान पर पहुँच चुका है जहाँ हमारे जन्म से पहले था। हम अपने अंतिम दिन से व्यर्थ ही भयभीत होते हैं; प्रत्येक दिन हमें मृत्यु की ओर समान रूप से अग्रसर करता है। डगमगाते हुए कदम हमें थकाते नहीं, वे केवल यह बता देते हैं कि हम पहले से ही थक चुके हैं। हमारा अंतिम दिन मृत्यु तक पहुँचा देता है, किन्तु हमारा प्रत्येक दिन उसी की ओर बढ़ता रहता है। मृत्यु हमें एक ही क्षण में नहीं पकड़ लेती। वह तो धीरे-धीरे, प्रतिदिन हमारा कुछ-न-कुछ अंश छीनती चली जाती है।
अतः वह महान मस्तिष्क, जो अपने उच्चतर स्वरूप से परिचित है, जिस स्थान पर उसे रखा गया है वहाँ सम्मानपूर्वक और परिश्रमपूर्वक अपना कर्तव्य निभाने का पूरा प्रयास करता है। किन्तु वह अपने चारों ओर की किसी भी वस्तु को अपना नहीं मानता। वह उनका उपयोग केवल उधार में मिली वस्तुओं के समान करता है, जैसे कोई यात्री यात्रा के दौरान अस्थायी रूप से किसी सराय की वस्तुओं का उपयोग करता है और फिर आगे बढ़ जाता है। जब हमने ऐसे दृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति को देखा, तब उसके उत्कृष्ट स्वभाव की कल्पना किए बिना कैसे रह सकते थे? विशेषतः तब, जब उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, जैसा कि मैंने कहा, यह प्रमाणित करती थी कि उसकी महानता वास्तविक है। सत्य स्थिर और सुसंगत होता है। असत्य टिक नहीं सकता।
कुछ लोग कभी वातिनियस (पहली शताब्दी ईसा पूर्व के एक रोमन राजनेता) बन जाते हैं तो कभी कैटो। कभी उन्हें लगता है कि क्यूरियस (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रसिद्ध रोमन सेनापति और राजनेता) पर्याप्त कठोर नहीं है, फ़ैब्रिसियस पर्याप्त निर्धन नहीं है और ट्यूबेरो पर्याप्त मितव्ययी तथा सादा जीवन जीने वाला नहीं है। फिर कभी वही लोग धन-संपत्ति में लिसिनस (वे सम्राट औगस्टस के काल के एक मुक्तदास) की बराबरी करना चाहते हैं, स्वादिष्ट भोजन के शौक में अपीसियस (रोम के अत्यंत धनी और विलासप्रिय व्यक्ति) का अनुकरण करते हैं और विलासिता तथा परिष्कृत जीवन में मैकेनास जैसा बनना चाहते हैं। दुष्ट चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उसमें स्थिरता नहीं होती। वह निरंतर बदलता रहता है और कभी सद्गुणों का दिखावा करता है तो कभी दुर्गुणों से प्रेम करने लगता है। कभी उसके पास दो सौ दास होते थे और कभी केवल दस। कभी वह बड़े-बड़े विषयों, राजाओं और राजकुमारों की बातें करता था। कभी कहता था, “मेरे लिए तो बस तीन पैरों वाली एक छोटी-सी मेज़, नमक रखने का एक पात्र और घर में बुना हुआ एक ऊनी चोगा ही पर्याप्त है, जो मुझे ठंड से बचा सके।” किन्तु यदि ऐसे इस अल्प में संतुष्ट रहने का दावा करने वाले व्यक्ति को दस लाख सेस्टर्स (रोमन मुद्रा) दे दिए जाएँ तो वे पाँच ही दिनों में समाप्त हो जाएँगे।
ऐसे लोगों की संख्या बहुत है, जिनका वर्णन होरातियस फ्लैकस (होरेस) ने किया है। ऐसे व्यक्ति, जो कभी एक जैसे नहीं रहते बल्कि इतनी भिन्न-भिन्न दिशाओं में भटकते रहते हैं कि अंततः स्वयं अपने ही समान नहीं रह जाते। क्या मैंने कहा, “बहुत-से”? मेरा आशय तो लगभग सभी लोगों से था। लगभग प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन अपनी योजनाएँ और अपनी आकांक्षाएँ बदलता रहता है। आज वह विवाह करना चाहता है, तो अगले ही दिन केवल एक प्रेमिका से संतुष्ट रहना चाहता है। कभी वह लोगों पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा रखता है, तो कभी उसका व्यवहार दास से भी अधिक चापलूसीपूर्ण हो जाता है। कभी वह अपने महत्व का इतना प्रदर्शन करता है कि लोगों की घृणा का पात्र बन जाता है तो कभी स्वयं को इतना तुच्छ दिखाता है कि निम्नतम श्रेणी के लोगों से भी अधिक आत्महीन प्रतीत होता है। कभी वह जनता पर उदारतापूर्वक धन लुटाता है तो कभी वही स्वयं उस धन के लिए झपटने लगता है।
यही उस मन का सबसे स्पष्ट लक्षण है, जिसमें सद्बुद्धि का अभाव है। उसका कोई स्थिर स्वरूप नहीं होता और जो मुझे सबसे अधिक अनादरणीय प्रतीत होता है, वह स्वयं अपने ही प्रति एकनिष्ठ नहीं रहता। यह समझो कि जीवनभर एक ही व्यक्ति बने रहना अत्यन्त महान बात है। किन्तु ऐसा केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है। हममें से शेष लोग तो अनेक प्रकार के रूप धारण करते रहते हैं। कभी तुम हमें मितव्ययी और गंभीर पाओगे, तो कभी अपव्ययी और मूर्ख। हम निरंतर अपने मुखौटे बदलते रहते हैं, एक उतारकर उसका ठीक विपरीत दूसरा पहन लेते हैं। इसलिए तुम्हें स्वयं से यही अपेक्षा करनी चाहिए कि जिस भूमिका का निर्वाह तुमने आरम्भ किया है, उसे रंगमंच से विदा होने तक निभाते रहो। यह सुनिश्चित करो कि तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा कर सकें। यदि इतना भी संभव न हो तो कम-से-कम इतना अवश्य हो कि लोग तुम्हें पहचान सकें। जिस व्यक्ति को लोगों ने कल देखा था, उसके बारे में आज यह कहना न पड़े, “यह कौन है?” वह इतना बदल चुका है।
अभी के लिए विदा