प्रिय लूसीलियस
इस प्रकार के तुच्छ प्रश्न पूछकर तुम मुझे बहुत व्यस्त बनाए रखोगे और बिना जाने ही मुझे अनेक तर्क-वितर्कों और कठिनाइयों में उलझा दोगे। इन विषयों पर मैं पूरी निष्ठा के साथ अपने स्टोइक सम्प्रदाय का खंडन भी नहीं कर सकता और न ही पूर्णतः संतुष्ट होकर उससे सहमत हो सकता हूँ। तुम स्टोइक सिद्धांत के उस कथन के बारे में पूछ रहे हो कि 'बुद्धि (Wisdom) एक शुभ (Good) है, परन्तु बुद्धिमान होना (Being wise) शुभ नहीं है।' पहले मैं स्टोइकों का अभिप्राय स्पष्ट करूँगा, उसके बाद अपना मत प्रस्तुत करूँगा।
By Blanca Dsouza
हमारे सम्प्रदाय का मत है कि जो कुछ शुभ है, वह शरीर (भौतिक सत्ता) है क्योंकि शुभ वस्तु क्रिया करती है और जो भी क्रिया करता है, वह शरीर होता है। शुभ वस्तु लाभ पहुँचाती है। परन्तु किसी वस्तु के लिए लाभ पहुँचाना तभी संभव है जब वह क्रिया करे। और यदि वह क्रिया करती है, तो वह शरीर है। स्टोइक यह भी कहते हैं कि बुद्धि एक शुभ है। इसलिए उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि बुद्धि भौतिक सत्ता (शरीर) है। किन्तु वे यह नहीं मानते कि 'बुद्धिमान होना' (Being wise) भी उसी प्रकार का अस्तित्व रखता है। उनके अनुसार बुद्धिमान होना एक अभौतिक (अशरीरी) अवस्था है, जो किसी अन्य वस्तु अर्थात बुद्धि पर आश्रित होकर उत्पन्न होती है। इसी कारण वह स्वयं न तो कोई क्रिया करती है और न ही किसी को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाती है। “तो क्या बात है? क्या हम यह नहीं कहते कि बुद्धिमान होना भी एक शुभ है?” हाँ, हम ऐसा कहते हैं। परन्तु यह कथन स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि उस वस्तु के संदर्भ में है जिस पर वह निर्भर करता है अर्थात स्वयं बुद्धि के संदर्भ में।
इन बातों के विपरीत, अब पहले यह सुनो कि दूसरे दार्शनिक क्या उत्तर देते हैं। उसके बाद मैं अपना स्वतंत्र मत प्रस्तुत करूँगा और एक भिन्न दृष्टिकोण का समर्थन करूँगा। वे कहते हैं, “यदि तुम्हारी यह दलील मान ली जाए तो ‘सुखी जीवन’ भी शुभ नहीं होगा। तब चाहे तुम्हें अच्छा लगे या न लगे, तुम्हारे सम्प्रदाय को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ‘सुखी जीवन’ तो शुभ है, पर ‘सुखपूर्वक जीना’ शुभ नहीं है।” वे एक और आपत्ति भी उठाते हैं, “तुम बुद्धिमान बनना चाहते हो। इसलिए ‘बुद्धिमान होना’ एक वरणीय (जिसे चुनना उचित हो) वस्तु है। यदि वह वरणीय है तो वह अवश्य ही शुभ भी होगी।” इस आपत्ति का उत्तर देने के लिए हमारे स्टोइक सम्प्रदाय को शब्दों का ऐसा अर्थ-भेद करना पड़ता है, जो हमारी भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के अनुकूल नहीं है। यदि तुम मुझे इसकी अनुमति दो तो मैं उस भेद को स्पष्ट करूँ। स्टोइकों का कहना है, “जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह ‘वरणीय’ (choice worthy) है। परन्तु जो अवस्था उस शुभ वस्तु को प्राप्त हो जाने के बाद हमारे भीतर उत्पन्न होती है, वह केवल ‘चयनयोग्य’ (choose able) है।” अर्थात उस दूसरी अवस्था की कामना स्वयं उसके लिए नहीं की जाती, मानो वह स्वतंत्र रूप से कोई शुभ वस्तु हो बल्कि वह उस शुभ वस्तु की प्राप्ति के परिणामस्वरूप मिलने वाली एक अतिरिक्त उपलब्धि मात्र है, जिसकी पहले से ही कामना की गई थी।
मैं स्वयं इस मत से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार में हमारे स्टोइक सम्प्रदाय के दार्शनिक इस कठिनाई में इसलिए फँस जाते हैं कि वे पहले से स्वीकार किए हुए एक सिद्धांत की पहली कड़ी से बँधे हुए हैं और उसे बदलने की स्वतंत्रता अपने लिए नहीं रखते। हम लोगों की एक सामान्य प्रवृत्ति यह है कि हम समस्त मनुष्यों की स्वाभाविक धारणाओं (पूर्वधारणाओं) को बहुत महत्त्व देते हैं और यदि किसी बात पर सबकी सहमति हो, तो उसे उसके सत्य होने का प्रमाण मान लेते हैं। उदाहरण के लिए, हम देवताओं के अस्तित्व का एक प्रमाण यह भी मानते हैं कि लगभग सभी मनुष्यों के मन में देवताओं के अस्तित्व का विश्वास स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। संसार में कोई भी ऐसा राष्ट्र, चाहे वह कानूनों और सभ्यता से कितना ही दूर क्यों न हो, ऐसा नहीं मिलता जो किसी-न-किसी देवता के अस्तित्व में विश्वास न रखता हो। इसी प्रकार, जब हम आत्मा की अमरता पर विचार करते हैं, तब भी इस बात का हमारे लिए विशेष महत्त्व होता है कि अधिकांश लोग आत्मा के मृत्यु के बाद भी अस्तित्व में रहने को स्वीकार करते हैं और अधोलोक की आत्माओं से या तो भय करते हैं या उनका सम्मान करते हैं। मैं भी इसी सार्वभौमिक मान्यता का सहारा लेता हूँ। तुम ऐसा कोई व्यक्ति नहीं पाओगे जो यह न मानता हो कि बुद्धि भी शुभ है और बुद्धिमान होना (Being wise) भी शुभ है।
मैं उन पराजित ग्लैडिएटरों की तरह नहीं करूँगा जो जनता से दया की अपील करते हैं। आओ, हम अपने ही तर्कों और अपने ही शस्त्रों से इस विषय पर विचार करें। जो वस्तु किसी अन्य वस्तु पर अध्यारोपित (अधिष्ठित) होती है, वह या तो उसके भीतर होती है या उसके बाहर। यदि वह उसके भीतर है तो वह भी उसी वस्तु की भाँति भौतिक सत्ता (शरीर) होगी। क्योंकि कोई भी वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर उसके स्पर्श के बिना अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो स्पर्श करती है, वह शरीर होती है। इसी प्रकार, कोई भी वस्तु क्रिया किए बिना किसी दूसरी वस्तु पर अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो क्रिया करती है, वह भी शरीर होती है। यदि वह उस वस्तु के बाहर है तो अध्यारोपित होने के बाद उसे उससे अलग हो जाना चाहिए। यदि वह अलग हो सकती है तो उसमें गति करने की क्षमता होगी और जिसमें गति करने की क्षमता है, वह शरीर है।
अब तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि मैं यह स्वीकार करूँ कि ‘दौड़’ और ‘दौड़ना’, ‘ऊष्मा’ और ‘गरम करना’, ‘प्रकाश’ और ‘प्रकाश देना’... ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इनमें भेद है। परन्तु मैं यह नहीं मानता कि उनका अस्तित्वगत स्वरूप (status) भिन्न है। यदि स्वास्थ्य एक उदासीन (न अच्छा, न बुरा) वस्तु है तो स्वस्थ होना भी उदासीन ही होगा। यदि सौन्दर्य उदासीन है तो सुन्दर होना भी उदासीन होगा। यदि न्याय एक शुभ है तो न्यायी होना भी शुभ है। यदि लज्जाजनक आचरण बुरा है तो लज्जाजनक व्यवहार करना भी बुरा है। ठीक उसी प्रकार जैसे यदि नेत्र-रोग बुरा है तो नेत्र-पीड़ा से ग्रस्त होना भी बुरा है। इसका प्रमाण भी स्पष्ट है। इनमें से कोई भी अपने समकक्ष के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। जिसके पास बुद्धि है, वही बुद्धिमान है। जो बुद्धिमान है, उसी के पास बुद्धि है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों एक-दूसरे के इतने निकट हैं कि अनेक लोग उन्हें वस्तुतः एक ही मानते हैं।
लेकिन मैं उनसे यह पूछना चाहता हूँ। चूँकि सभी वस्तुएँ या तो शुभ होती हैं या अशुभ अथवा उदासीन तो ‘बुद्धिमान होना’ इनमें से किस श्रेणी में रखा जाएगा? उनके मत के अनुसार वह शुभ नहीं है। निश्चय ही अशुभ भी नहीं है। तब यह निष्कर्ष निकलता है कि वह मध्यवर्ती श्रेणी में आता है। परन्तु इसी मध्यवर्ती श्रेणी को हम ‘उदासीन’ कहते हैं, जैसे धन, सौन्दर्य और उच्च पद, जो अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोगों को समान रूप से प्राप्त हो सकते हैं। किन्तु ‘बुद्धिमान होना’ ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी दुष्ट व्यक्ति को प्राप्त हो सके। इसलिए वह उदासीन नहीं हो सकता। वह अशुभ भी नहीं है क्योंकि वह किसी बुरे व्यक्ति में पाया ही नहीं जा सकता। अतः वह शुभ ही होना चाहिए। जो वस्तु केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है, वह शुभ होती है। बुद्धिमान होना केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए बुद्धिमान होना भी शुभ है।
कोई यह कह सकता है, “बुद्धिमान होना तो केवल बुद्धि पर अधिष्ठित होने वाली एक अवस्था है।” तब मैं उससे पूछूँगा, जिसे तुम ‘बुद्धिमान होना’ कहते हो, क्या वह बुद्धि को सक्रिय करता है अथवा स्वयं बुद्धि द्वारा सक्रिय होता है? दोनों ही स्थितियों में, चाहे वह क्रिया करे या उस पर क्रिया की जाए, उसे भौतिक सत्ता (शरीर) मानना पड़ेगा। क्योंकि जो भी वस्तु क्रिया करती है या जिस पर क्रिया की जाती है, वह शरीर होती है।यदि वह शरीर है, तो वह शुभ भी है क्योंकि उसे शुभ न मानने का एकमात्र कारण यह बताया गया था कि वह अभौतिक है।
पेरिपैटेटिक दार्शनिकों का मत है कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को अनिवार्य रूप से सूचित करते हैं। क्या तुम वास्तव में यह मान सकते हो कि कोई व्यक्ति बुद्धि के बिना बुद्धिमान हो सकता है या जो बुद्धिमान है उसके पास बुद्धि न हो? किन्तु प्राचीन तर्कशास्त्रियों ने इन दोनों में भेद किया था और उन्हीं से यह भेद स्टोइक दार्शनिकों तक पहुँचा है। मैं इसे स्पष्ट करता हूँ। क्या ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व होना’ एक ही बात है? नहीं। क्योंकि ‘खेत का स्वामित्व होना’ उस व्यक्ति से संबंधित है जो खेत का स्वामी है, न कि स्वयं खेत से। उसी प्रकार ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में भी भेद है। मेरा विश्वास है कि तुम यह स्वीकार करोगे कि यहाँ दो भिन्न वस्तुएँ हैं। एक वह जो धारण की जाती है और दूसरी वह जो उसे धारण करती है। बुद्धि वह है जिसे धारण किया जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति उसका धारक होता है। बुद्धि एक परिपूर्ण मन है अथवा ऐसा मन जो अपनी सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कर चुका हो। दूसरे शब्दों में, बुद्धि जीवन जीने की कला है। तो फिर ‘बुद्धिमान होना’ क्या है? मैं उसे परिपूर्ण मन नहीं कहूँगा बल्कि उस अवस्था का नाम दूँगा जो उस व्यक्ति में विद्यमान होती है जिसके पास परिपूर्ण मन है। इस प्रकार, एक ओर ‘उत्तम मन’ है। दूसरी ओर उस उत्तम मन का धारक होना, ये दोनों एक-दूसरे से संबंधित होने पर भी भिन्न हैं।
मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “शरीरों के भी अनेक प्रकार होते हैं। उदाहरण के लिए, यह एक मनुष्य है और वह एक घोड़ा। इनके साथ विचार की ऐसी प्रक्रियाएँ भी जुड़ी होती हैं जो इन शरीरों के बारे में कथन करती हैं। इन विचार-प्रक्रियाओं का अपना एक विशिष्ट स्वरूप होता है, जो स्वयं शरीरों से भिन्न है। उदाहरण के लिए, मैं देखता हूँ कि ‘केटो चल रहा है।’ यह बात मुझे इन्द्रियों के द्वारा ज्ञात हुई और मेरे मन ने उसे सत्य मान लिया। जो वस्तु मैं देख रहा हूँ, वह एक शरीर है। उसी शरीर पर मेरी दृष्टि तथा मेरा मन केन्द्रित हैं। फिर मैं कहता हूँ, ‘केटो चल रहा है।’ अब जो मैं कह रहा हूँ, वह स्वयं कोई शरीर नहीं है बल्कि शरीर के विषय में किया गया एक कथन है। इसे कुछ लोग ‘प्रस्ताव’ (proposition) कहते हैं। कुछ ‘विधेय’ (predication) और कुछ ‘कथ्य’ (what is said) कहते हैं। इसी प्रकार, जब हम ‘बुद्धि’ कहते हैं, तब हमारा अभिप्राय एक भौतिक सत्ता (शरीर) से होता है। जब हम कहते हैं ‘बुद्धिमान है’ (is wise), तब हम किसी शरीर के विषय में एक कथन कर रहे होते हैं। किसी वस्तु का केवल उल्लेख करना और उसके विषय में कुछ कहना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।”
अभी के लिए मान लेते हैं कि यहाँ वास्तव में दो भिन्न बातें हैं। (मैं अभी अपना मत प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ।) किन्तु यदि वे भिन्न हैं तो ऐसा क्या है जो उनमें से किसी एक को शुभ होने से रोकता हो? अभी थोड़ी देर पहले मैंने ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व’ होने के बीच भेद किया था। स्पष्ट है कि स्वामी का स्वरूप उस वस्तु से भिन्न होता है जिसका वह स्वामी है। एक ओर भूमि है और दूसरी ओर मनुष्य। परन्तु जिस विषय पर यहाँ चर्चा हो रही है, उसमें स्थिति भिन्न है। यहाँ बुद्धि का धारक और स्वयं बुद्धि, दोनों का स्वरूप एक ही प्रकृति का है। इसके अतिरिक्त, खेत और उसके स्वामी के उदाहरण में स्वामी और स्वामित्व की वस्तु वास्तव में अलग-अलग हैं। पर यहाँ बुद्धि और उसका धारक एक ही व्यक्ति में अंतर्निहित हैं। भूमि का स्वामित्व विधि (कानून) के आधार पर होता है। जबकि बुद्धि का स्वामित्व स्वभावतः होता है। भूमि को बेचा जा सकता है और किसी दूसरे को सौंपा जा सकता है। पर बुद्धि अपने स्वामी को छोड़कर किसी और के पास नहीं जा सकती। इसलिए तुम्हें उन वस्तुओं की तुलना नहीं करनी चाहिए जिनका स्वभाव मूलतः एक-दूसरे से भिन्न है।
मैं यह कहने लगा था कि जिन बातों पर हम विचार कर रहे हैं, वे संख्या की दृष्टि से दो हो सकती हैं। फिर भी दोनों ही शुभ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ दो अलग बातें हैं। फिर भी तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि दोनों ही शुभ हैं। जिस प्रकार यह मानने में कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और उसका धारक, दोनों शुभ हैं, उसी प्रकार यह मानने में भी कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और बुद्धि का धारण करना अर्थात बुद्धिमान होना, दोनों ही शुभ हैं। मैं बुद्धिमान व्यक्ति इसलिए बनना चाहता हूँ कि मैं बुद्धिमान हो सकूँ। यदि ऐसा है तो क्या ‘बुद्धिमान होना’ भी शुभ नहीं होना चाहिए? क्योंकि उसके बिना ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ होना भी कोई शुभ नहीं रह जाता। आखिर तुम्हारा अपना सिद्धांत भी तो यही है कि यदि बुद्धि का उपयोग न किया जाए तो उसे स्वीकार ही नहीं करना चाहिए। तो बुद्धि का उपयोग क्या है? बुद्धिमान होना। यही वह बात है जो बुद्धि को सर्वोच्च मूल्य प्रदान करती है। यदि उसके उपयोग को हटा दिया जाए, तो बुद्धि निरर्थक हो जाएगी। यदि यातनाएँ बुरी हैं तो यातना सहना भी बुरा है। वास्तव में, यदि परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली अवस्था को ही हटा दिया जाए, तो यातनाएँ भी बुरी नहीं कहलाएँगी। बुद्धि परिपूर्ण मन की अवस्था (स्थिति) है। बुद्धिमान होना उस परिपूर्ण मन का प्रयोग है। यदि किसी वस्तु का उपयोग ही शुभ न हो तो वह वस्तु स्वयं अपने उपयोग के बिना शुभ कैसे हो सकती है?
मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या बुद्धि वरणीय है? तुम उत्तर देते हो, हाँ। फिर मैं पूछता हूँ, क्या बुद्धि का उपयोग भी वरणीय है? तुम फिर उत्तर देते हो, हाँ। इतना ही नहीं, तुम यह भी कहते हो कि यदि तुम्हें उसका उपयोग करने से रोक दिया जाए तो तुम उसे स्वीकार ही नहीं करोगे। जो वस्तु वरणीय है, वह शुभ है। बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रभावशाली ढंग से बोलना वाक्पटुता का उपयोग है और देखना नेत्रों का उपयोग है। अतः बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है। यदि बुद्धि का उपयोग वरणीय है तो बुद्धिमान होना भी वरणीय है। यदि वह वरणीय है तो वह शुभ भी है।
इतनी देर से मैं स्वयं को ही धिक्कार रहा हूँ कि जिन लोगों की मैं आलोचना करता हूँ, उन्हीं की भाँति मैं भी एक स्पष्ट और सरल विषय पर शब्दों का अनावश्यक व्यय कर रहा हूँ। क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि यदि ऊष्मा बुरी है, तो गर्म होना भी बुरा होगा? यदि शीत बुरा है, तो ठंड से ग्रस्त होना भी बुरा होगा? और यदि जीवन शुभ है, तो जीना भी शुभ होगा? यद्यपि ये सभी बातें बुद्धि के विषय से संबंधित हैं। फिर भी वे बुद्धि के अंतरतम स्वरूप का स्पर्श नहीं करतीं। हमें अपना समय बुद्धि के वास्तविक स्वरूप के भीतर प्रवेश करके उसका विचार करने में लगाना चाहिए।
यदि हम चर्चा को किसी दूसरी दिशा में ले जाना चाहें तो दर्शन हमें विचार के लिए असीम विषय प्रदान करता है। आओ, हम देवताओं के स्वरूप का अन्वेषण करें अथवा तारों के पोषण, उनकी विविध गतियों और परिक्रमाओं का अध्ययन करें या यह विचार करें कि क्या मानवीय जीवन की घटनाएँ तारों की गतियों के अनुरूप विकसित होती हैं अथवा क्या वही पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं और मनुष्यों के मन में गति के मूल कारण हैं या फिर यह कि जिन्हें हम संयोगवश घटित होने वाली घटनाएँ कहते हैं, क्या वे भी किसी निश्चित नियम से बँधी हुई हैं और क्या इस विश्व-व्यवस्था के बाहर या उसके क्रम से अलग वास्तव में कुछ भी नहीं घटित होता। ये विषय प्रत्यक्ष रूप से नैतिक शिक्षा से संबंधित नहीं हैं।। किन्तु वे मन को ऊँचा उठाते हैं और उसे अपने महान विषयों के अनुरूप विशाल बना देते हैं। इसके विपरीत, जिन बातों की मैं अभी कुछ देर पहले चर्चा कर रहा था, वे हमारे मन को ऊँचा उठाने के स्थान पर उसे छोटा और संकीर्ण बना देती हैं। वे मन को तीक्ष्ण नहीं करतीं, जैसा कि तुम लोग समझते हो। वे केवल उसे सीमित कर देती हैं। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या हम अपनी शक्ति ऐसे विषय पर व्यर्थ करेंगे जो संभवतः असत्य हो सकता है और निश्चित रूप से किसी व्यावहारिक उपयोग का भी नहीं है? हमें अपनी बुद्धि और परिश्रम को ऐसे कार्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। हम उसे अधिक महान और अधिक श्रेष्ठ विषयों के ऋणी हैं। आख़िर मुझे इससे क्या लाभ होगा कि मैं यह जान लूँ कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ अलग-अलग हैं अथवा यह कि पहली शुभ है और दूसरी नहीं? मैं इस विवाद में जोखिम उठाने को तैयार हूँ। आओ, पासा फेंकते हैं, तुम्हें ‘बुद्धि’ मिल जाए और मुझे ‘बुद्धिमान होना’। परिणाम दोनों के लिए समान ही रहेगा।
मैं तो यह अधिक चाहता हूँ कि तुम मुझे इन बातों को प्राप्त करने का मार्ग दिखाओ। मुझे बताओ कि मुझे किन बातों से बचना चाहिए और किन बातों को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। कौन-से अभ्यास मेरे दुर्बल पड़ते हुए मन को दृढ़ बना सकते हैं? मैं उन परिस्थितियों से अपनी रक्षा कैसे करूँ जो अचानक आकर मुझे विचलित कर देती हैं? मैं असंख्य विपत्तियों का सामना करने में समर्थ कैसे बनूँ? जो दुःख भाग्य ने मुझ पर डाले हैं और जो मैंने स्वयं अपने ऊपर लाद लिए हैं, उनसे मैं कैसे मुक्त हो सकता हूँ? मुझे यह सिखाओ कि मैं शोक को बिना विलाप किए कैसे सहन करूँ। सफलता को इस प्रकार कैसे धारण करूँ कि उसके कारण दूसरों को पीड़ा न पहुँचे। यह भी सिखाओ कि मैं मृत्यु के उस अंतिम और अनिवार्य क्षण की निष्क्रिय प्रतीक्षा न करूँ बल्कि जब उचित समझूँ, तब स्वयं अपने प्रस्थान का निर्णय कर सकूँ। मेरे विचार में मृत्यु के लिए प्रार्थना करने से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं है। यदि तुम जीना चाहते हो, तो फिर मरने की प्रार्थना क्यों करते हो? और यदि जीना ही नहीं चाहते तो जन्म के समय देवताओं ने तुम्हें जो जीवन दिया था, उसी को वापस माँगने के लिए उनसे प्रार्थना क्यों करते हो? जिस प्रकार यह निश्चित है कि तुम्हें किसी-न-किसी समय मृत्यु अवश्य प्राप्त होगी, चाहे तुम चाहो या न चाहो, उसी प्रकार यह भी तुम्हारे अधिकार में है कि जब तुम उचित समझो, तब स्वयं मृत्यु का वरण कर लो। पहली बात तुम्हारे लिए अनिवार्य है। दूसरी तुम्हारी अपनी इच्छा और निर्णय पर निर्भर करती है।
मैंने अभी-अभी एक ऐसे वक्ता के भाषण की शुरुआत पढ़ी, जिसे लोग बड़ा प्रतिष्ठित वाक्पटु मानते हैं। उसने कहा था, “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” कैसा पागलपन है! तुम उस वस्तु की प्रार्थना कर रहे हो जो पहले से ही तुम्हारे अधिकार में है। “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” क्या यह कहते-कहते तुम इतने वृद्ध हो गए कि अब प्रतीक्षा करना आवश्यक हो? यदि नहीं तो फिर विलंब किस बात का है? तुम्हें कौन रोक रहा है? जिस प्रकार चाहो, जीवन का त्याग कर सकते हो। प्रकृति के किसी भी तत्त्व की ओर देखो और उसी से अपने प्रस्थान का मार्ग चुन लो। जल, पृथ्वी और वायु, इन तत्त्वों पर विचार करो जिनके द्वारा यह संसार संचालित होता है। ये केवल जीवन के कारण ही नहीं हैं। ये मृत्यु के भी उतने ही साधन हैं। “काश, मैं शीघ्र मर जाऊँ!” 'शीघ्र' से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? तुम समय क्यों निश्चित करना चाहते हो? मृत्यु तो तुम्हारी इस प्रार्थना से भी अधिक शीघ्र आ सकती है। ऐसे शब्द एक दुर्बल मन के होते हैं, जो इस प्रकार के शाप का प्रयोग केवल दूसरों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए करता है। जो व्यक्ति सचमुच मृत्यु की प्रार्थना करता है, वह वास्तव में मरना नहीं चाहता। देवताओं से जीवन और स्वास्थ्य की प्रार्थना करो। किन्तु यदि तुम्हारी वास्तविक इच्छा मरने की ही है, तो मृत्यु का एक लाभ यह है कि उसके लिए तुम्हें किसी से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं रहती।
प्रिय लूसीलियस, हमें इन्हीं बातों पर मनन करना चाहिए। इन्हीं के द्वारा अपने मन का निर्माण करना चाहिए। यही बुद्धि है और यही बुद्धिमानी, न कि व्यर्थ की बहसों में उलझना और अत्यन्त तुच्छ तकनीकी सूक्ष्मताओं पर विवाद करते रहना। जब भाग्य ने तुम्हारे सामने इतनी समस्याएँ खड़ी कर दी हैं, जिनका समाधान तुम अभी तक नहीं कर पाए हो, तब भी क्या तुम शब्दों के सूक्ष्म अर्थों पर विवाद करने में लगे रहोगे? युद्ध का संकेत मिल जाने के बाद भी अभ्यास के हथियार लहराते रहना कितनी मूर्खता है! इन अभ्यास वाले हथियारों को एक ओर रख दो। अब तुम्हें वास्तविक शस्त्रों की आवश्यकता है। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मेरा मन किसी भी प्रकार के विषाद या भय से विचलित न हो। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मैं अपनी उन इच्छाओं के बोझ को उतार फेंकूँ जिन्हें मैंने स्वयं भी कभी स्वीकार नहीं किया। कुछ सार्थक करो!
“बुद्धि तो शुभ है, परन्तु बुद्धिमान होना शुभ नहीं है।” यदि हमें यही सिखाया जाएगा तो इसका परिणाम यही होगा कि लोग हमें अबुद्धिमान कहेंगे और हमारे पूरे दर्शन का उपहास करेंगे कि वह समय की निरर्थक बर्बादी है। मान लो कि मैं तुमसे कहूँ कि इस बात पर भी विवाद है कि भविष्य में प्राप्त होने वाली बुद्धि शुभ है या नहीं। बताओ, क्या यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा? क्या अन्न-भंडार भविष्य की फसल का अनुभव पहले से ही कर लेते हैं? क्या बच्चों में भविष्य की युवावस्था का बल और दृढ़ता पहले से विद्यमान होती है? जिस प्रकार रोगी को भविष्य में मिलने वाला स्वास्थ्य वर्तमान में कोई लाभ नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धावक या पहलवान भी कई महीनों बाद मिलने वाले विश्राम से अभी ताज़गी का अनुभव नहीं करता। यह बात तो सभी जानते हैं कि जो वस्तु अभी भविष्य में है, वह इस समय शुभ नहीं हो सकती क्योंकि वह अभी भविष्य में ही है। जो वास्तव में शुभ है, वह अनिवार्य रूप से लाभ पहुँचाता है। लाभ केवल वर्तमान में विद्यमान वस्तुएँ ही पहुँचा सकती हैं। जो वस्तु अभी लाभ नहीं पहुँचा सकती, वह शुभ नहीं है। यदि वह लाभ पहुँचा रही है तो इसका अर्थ है कि वह भविष्य की नहीं, वर्तमान की वस्तु है। मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। जब मैं वास्तव में बुद्धिमान हो जाऊँगा, तभी वह मेरे लिए शुभ होगा; अभी वह शुभ नहीं है। किसी वस्तु में कोई गुण तभी आ सकता है, जब वह वस्तु पहले अस्तित्व में हो।
मैं तुमसे पूछता हूँ, जो वस्तु अभी अस्तित्व में ही नहीं है, वह पहले से शुभ कैसे हो सकती है? यदि मैं किसी वस्तु के विषय में कहूँ, 'वह भविष्य में होगी,' तो क्या यही सबसे बड़ा प्रमाण नहीं है कि वह अभी अस्तित्व में नहीं है? जो अभी आने वाली है, वह स्पष्टतः अभी आई नहीं है। मैं कहता हूँ, 'वसंत आएगा।' इसका अर्थ है कि इस समय शीत ऋतु है। मैं कहता हूँ, 'ग्रीष्म आएगा।' इसका अर्थ है कि अभी ग्रीष्म नहीं है। किसी वस्तु के वर्तमान में न होने का सबसे प्रबल प्रमाण यही है कि वह अभी भविष्य की वस्तु है। मुझे आशा है कि मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। किन्तु इस समय मैं बुद्धिमान नहीं हूँ। यदि वह शुभ मेरे पास अभी होता, तो मैं अपनी वर्तमान बुरी अवस्था से पहले ही मुक्त हो चुका होता। मेरा बुद्धिमान होना अभी भविष्य की बात है। इससे तुम समझ सकते हो कि मैं अभी बुद्धिमान नहीं हूँ। मैं एक ही समय में उस शुभ अवस्था में भी नहीं हो सकता और इस अशुभ अवस्था में भी। शुभ और अशुभ एक ही व्यक्ति में एक साथ विद्यमान नहीं रह सकते।
आओ, इन जटिल और तुच्छ विवादों को शीघ्रता से पीछे छोड़ दें और उन बातों की ओर बढ़ें जो वास्तव में हमारी सहायता करने वाली हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रसव-वेदना से पीड़ित पुत्री के लिए व्याकुल होकर दाई को बुलाता है, तब वह खेलों की घोषणा और कार्यक्रम पढ़ने नहीं बैठ जाता। उसी प्रकार, जिसके घर में आग लगी हो और जो उसे बुझाने के लिए दौड़ रहा हो, वह शतरंज की बिसात पर यह विचार नहीं करता कि फँसा हुआ मोहरा किस प्रकार निकल सकता है। किन्तु, देवताओं की शपथ, चारों ओर से ऐसी ही विपत्तियों के समाचार तुम्हारी ओर आ रहे हैं, तुम्हारा घर जल रहा है, तुम्हारे बच्चे संकट में हैं, तुम्हारा देश शत्रुओं से घिरा हुआ है, तुम्हारी संपत्ति लूटी जा रही है।
प्रकृति ने हमें इतना समय न तो इतनी कृपा से दिया है और न इतनी उदारता से कि हम उसका कोई अंश भी व्यर्थ गँवा सकें। ज़रा देखो कि सबसे अधिक सावधान रहने वाले लोग भी कितना समय खो देते हैं। किसी का कुछ समय अपनी बीमारी में व्यतीत हो जाता है, तो किसी का अपने परिवार के किसी सदस्य की बीमारी में। कुछ समय जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में चला जाता है, कुछ सार्वजनिक कर्तव्यों में और हमारी आयु का एक बड़ा भाग तो निद्रा ही ले लेती है। जब हमारा समय इतना सीमित, इतना शीघ्र बीतने वाला और इतना व्यस्त है, तब उसका अधिकांश भाग तुच्छ बातों में नष्ट करने से क्या लाभ? यह भी विचार करो कि मन अपने स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की अपेक्षा अपना मनोरंजन करना अधिक पसंद करता है। इस प्रकार वह दर्शन को, जो वास्तव में एक उपचार है, केवल मनोरंजन का साधन बना देता है। मुझे यह नहीं मालूम कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में क्या अंतर है। पर मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि इस अंतर को जानने या न जानने से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। मुझे बताओ, यदि मैं यह भेद जान भी लूँ, तो क्या उसी क्षण मैं बुद्धिमान बन जाऊँगा?फिर तुम मुझे बुद्धि से संबंधित शब्दावली में क्यों उलझाए रखते हो, बुद्धिमत्ता के वास्तविक आचरण का अभ्यास क्यों नहीं कराते? मुझे अधिक साहसी बनाओ। मुझे अधिक आत्मविश्वासी बनाओ। मुझे ऐसा बना दो कि मैं भाग्य के समकक्ष खड़ा हो सकूँ, बल्कि उससे भी श्रेष्ठ बन सकूँ। मैं उससे श्रेष्ठ बन सकता हूँ, यदि मैं जो कुछ भी सीखूँ, उसे इसी एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा दूँ।
अभी के लिए विदा