प्रिय लूसीलियस
यदि तुम बुद्धिमान हो या बुद्धिमान बनना चाहते हो तो इन सबको फेंक दो। अपनी पूरी गति और अपनी पूरी शक्ति के साथ मन की उत्कृष्टता की ओर बढ़ो। यदि कोई चीज़ तुम्हें रोक रही हो तो उसकी गाँठ खोल दो और यदि वह न खुले तो उसे काट दो।
“जो मुझे रोक रहा है,” तुम कहते हो, “वह मेरा पारिवारिक व्यवसाय है। मैं उसे इस प्रकार व्यवस्थित कर देना चाहता हूँ कि जब मैं स्वयं निष्क्रिय रहूँ तब भी वह मेरा भरण-पोषण कर सके ताकि न तो गरीबी मेरे लिए बोझ बने और न मैं किसी और के लिए।” जब तुम यह कहते हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि जिस शुभ वस्तु को तुम लक्ष्य बना रहे हो उसके अर्थ और शक्ति को तुम पूरी तरह नहीं समझते। तुम सामान्य रूप से यह तो समझते हो कि दर्शन कितने महान लाभ प्रदान करता है पर तुम इसकी सूक्ष्म बातों को नहीं देख पाते कि वह हमारे प्रत्येक प्रयत्न में कितनी सहायता करता है। वह केवल हमारे बड़े कार्यों को ही, जैसा कि सिसेरो कहता है, “सुगम” नहीं बनाता बल्कि हमारी सबसे छोटी आवश्यकताओं तक का भी ध्यान रखता है। मेरा विश्वास करो। दर्शन को अपना पक्षधर बना लो। वह तुम्हें यह समझाएगा कि अपनी हिसाब-किताब की पुस्तकों पर अधिक समय तक झुके रहना उचित नहीं है।
निस्संदेह तुम्हारा उद्देश्य और तुम्हारे इस विलंब का कारण, यह सुनिश्चित करना है कि तुम्हें गरीबी का भय न रहे लेकिन यदि गरीबी वास्तव में ऐसी वस्तु हो जिसे अपनाया जाना चाहिए, तब? अनेक लोगों ने पाया है कि धन-दौलत दार्शनिक जीवन के मार्ग में बाधा बन जाती है जबकि गरीबी बंधनों से मुक्त और निश्चिंत होती है। जब युद्ध का बिगुल बजता है तो गरीब जानता है कि आक्रमण उसी पर नहीं हो रहा। जब आग लगने का शोर उठता है तो वह अपने सामान की नहीं, बाहर निकलने के मार्ग की तलाश करता है। जब किसी गरीब को यात्रा पर निकलना होता है तो बंदरगाह पर कोई कोलाहल नहीं होता, न समुद्र-तट पर उसके पीछे दौड़ती भीड़ होती है, न किसी एक व्यक्ति की सेवा में लगे असंख्य परिचारक होते हैं न दासों का ऐसा झुंड खड़ा होता है कि उन्हें खिलाने के लिए विदेशी देशों की उपज की आवश्यकता पड़े। कुछ ही पेटों को भरना एक सरल काम है, विशेषकर तब जब वे अच्छे से प्रशिक्षित हों और केवल तृप्त होने की इच्छा रखते हों। भूख सस्ती होती है। महँगी तो जिह्वा की चंचलता होती है। गरीबी तत्काल आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट हो जाती है।
तो फिर तुम ऐसे साथी को अपनाने से क्यों इंकार करते हो जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करना धनवानों के लिए भी बुद्धिमानी की बात है? यदि तुम अपने मन के लिए समय चाहते हो तो या तो गरीब बनो या गरीबों जैसा जीवन जीने लगो। मितव्ययिता के प्रति कुछ चिंता के बिना अध्ययन लाभदायक नहीं हो सकता और मितव्ययिता वास्तव में स्वेच्छा से स्वीकार की गई गरीबी ही है। इसलिए अपने बहाने छोड़ दो। “मेरे पास अभी पर्याप्त नहीं है। जब मैं एक निश्चित मात्रा में धन इकट्ठा कर लूँगा तब मैं स्वयं को पूरी तरह दर्शन के लिए समर्पित कर दूँगा।” किन्तु जिस वस्तु को तुम्हें सबसे पहले प्राप्त करना चाहिए, वही तो है जिसे तुम टाल रहे हो। वही तो तुम्हारी सूची में सबसे नीचे पड़ी है। आरम्भ तुम्हें वहीं से करना चाहिए। तुम कहते हो, “मैं अपने जीवन-निर्वाह के लिए कुछ व्यवस्था कर लेना चाहता हूँ।” जब तुम यह कर रहे हो, तो उससे भी अधिक आवश्यक है कि तुम स्वयं को तैयार करना सीखो। यदि कोई बात तुम्हें अच्छा जीवन जीने से रोक भी दे तो भी कोई बात तुम्हें अच्छी मृत्यु पाने से नहीं रोक सकती।
दर्शन के अभ्यास में न तो गरीबी बाधा बन सकती है और न ही अत्यन्त अभाव। जो लोग इस मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं उन्हें भूख तक सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। घेराबंदी के समय लोगों ने भूख सही है और उनके धैर्य का प्रतिफल क्या था? केवल इतना कि वे विजेता की दया पर निर्भर नहीं हुए। किन्तु यहाँ जो प्रतिज्ञा की जा रही है, वह उससे कहीं महान है। स्थायी स्वतंत्रता और किसी भी मनुष्य या देवता से भयमुक्त जीवन। क्या यह ऐसी वस्तु नहीं है जिसके लिए मनुष्य भूखा रहकर भी प्रयास करे? सेनाओं ने हर प्रकार के अभाव को सहा है। वे पौधों की जड़ों पर जीवित रही हैं। उन्होंने ऐसी चीज़ों से अपनी भूख मिटाई है जिनका नाम लेना भी घृणास्पद है। और यह सब किसलिए? प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए और इससे भी विचित्र बात यह कि किसी दूसरे व्यक्ति के प्रभुत्व के लिए! फिर कौन ऐसा होगा जो अपने मन को उन्माद और विक्षिप्त इच्छाओं से मुक्त करने के उद्देश्य से गरीबी सहने में संकोच करेगा? अतः ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम्हें पहले से प्राप्त करना आवश्यक हो। तुम दर्शन के पास बिना यात्रा-व्यय के भी पहुँच सकते हो।
क्या वास्तव में बात ऐसी ही है? क्या तुम तभी बुद्धिमत्ता प्राप्त करना चाहोगे जब तुम्हारे पास बाकी सब कुछ भी हो जाएगा? क्या यह तुम्हारे जीवन की अंतिम आवश्यकता होगी मानो बाद में याद आने वाली कोई बात? तो फिर ऐसा करो। यदि तुम्हारे पास कुछ संपत्ति है तो अभी दर्शन की ओर मुड़ो क्योंकि तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारे पास पहले से ही आवश्यकता से अधिक नहीं है? और यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो किसी और वस्तु को प्राप्त करने से पहले इसी को प्राप्त करने का प्रयास करो।
“लेकिन तब मैं उन चीज़ों से वंचित हो जाऊँगा जिनकी मुझे आवश्यकता है।” सबसे पहले तो ऐसी आवश्यक वस्तुओं से वंचित होना कठिन ही है क्योंकि प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं और बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढाल लेता है। किन्तु यदि उस पर अन्तिम और चरम अभाव आ ही पड़े तो वह बहुत सहजता से जीवन को छोड़ देगा और इस प्रकार स्वयं अपने लिए बोझ बने रहना भी समाप्त कर देगा। दूसरी ओर, यदि जीवन को बनाए रखने के लिए केवल थोड़ी-सी वस्तुओं की आवश्यकता हो तो वह स्वयं को सम्पन्न मानेगा और अपने पेट तथा शरीर को उनकी आवश्यकतानुसार जो कुछ चाहिए, वह दे देगा। बिना किसी चिंता के और आवश्यकता से अधिक किसी वस्तु की परवाह किए बिना। सुखी और निश्चिंत होकर वह धनवानों के व्यस्त जीवन पर तथा धन के लिए प्रतिस्पर्धा करने वालों की भाग-दौड़ पर हँसेगा और कहेगा, “तुम अपने ही जीवन को क्यों टालते रहते हो? क्या तुम ब्याज बढ़ने की प्रतीक्षा करोगे, व्यापारिक उपक्रमों के सफल होने की प्रतीक्षा करोगे या किसी बड़े उत्तराधिकार के मिलने की प्रतीक्षा करोगे जबकि तुम इसी क्षण धनी बन सकते हो? बुद्धिमत्ता का लाभ तुरंत मिलता है। उसका धन उन सभी को प्राप्त हो जाता है जिनके लिए धन अब महत्वहीन प्रतीत होने लगा है।”
यह बात दूसरों पर अधिक लागू होती है क्योंकि तुम तो सम्पन्न लोगों की श्रेणी के अधिक निकट हो। यदि युग बदल भी जाए तब भी तुम्हारे पास आवश्यकता से अधिक है। किन्तु “पर्याप्त” क्या है, यह हर युग में एक ही रहता है।
मैं यहीं इस पत्र को समाप्त कर सकता था, यदि मैंने तुम्हें इस प्रकार अभ्यस्त न बना दिया होता। पार्थियन राजाओं का अभिवादन बिना भेंट चढ़ाए नहीं किया जाता और तुम्हें भी बिना कुछ दिए विदा नहीं किया जा सकता। तो क्या दिया जाए? मैं एपिक्यूरस से एक उधार लिया हुआ वचन प्रस्तुत करता हूँ, “बहुत-से लोगों के लिए धन की प्राप्ति कष्टों का अंत नहीं होती बल्कि कष्टों की एक नई श्रृंखला की शुरुआत होती है।”
इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, दोष परिस्थितियों में नहीं बल्कि मन में होता है। जो चीज़ गरीबी को कष्टदायक बनाती है, वही समृद्धि को भी कष्टदायक बना देती है। जब कोई व्यक्ति बीमार होता है तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसे लकड़ी के बिस्तर पर लिटाया जाए या सोने के बिस्तर पर। जहाँ भी उसे ले जाओगे, वह अपना रोग अपने साथ ही ले जाएगा। ठीक इसी प्रकार, मानसिक रूप से रोगग्रस्त व्यक्ति को धन में रखा जाए या गरीबी में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका कष्ट उसी का अपना है और वह हर जगह उसका पीछा करता रहता है।
अभी के लिए विदा




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