प्रिय लूसीलियस
मैंने सोचा था कि शेष जटिल तर्कों को छोड़कर तुम्हें कुछ राहत दूँ। मेरा विचार था कि केवल इतना ही बता दूँ कि हमारा दर्शन किस प्रकार यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (Virtue) अपने आप में ही मनुष्य के जीवन को पूर्णतः सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन तुम चाहते हो कि मैं सब कुछ लिखूँ। हमारे अपने तर्क भी और वे तर्क भी, जिन्हें विशेष रूप से हमारा उपहास उड़ाने के लिए गढ़ा गया है। यदि मैं ऐसा करने बैठूँ तो यह पत्र नहीं रहेगा। यह एक पुस्तक बन जाएगा!
मैं तुम्हें बार-बार विश्वास दिलाता हूँ कि इस प्रकार के तर्कों में मुझे कोई आनंद नहीं मिलता। मुझे तो लज्जा आती है कि देवताओं और मनुष्यों जैसे महान विषयों के लिए हमें केवल एक सुई की नोक जितने सूक्ष्म और तुच्छ तर्कों से युद्ध करना पड़े।
जो व्यक्ति बुद्धिमान है, वह आत्मसंयमी भी होता है।
जो आत्मसंयमी है, वह स्थिरचित्त भी होता है।
जो स्थिरचित्त है, वह व्याकुल नहीं होता।
जो व्याकुल नहीं होता, वह शोक से मुक्त रहता है।
जो शोक से मुक्त है, वही सुखी है।
अतः बुद्धिमान व्यक्ति सुखी होता है और बुद्धिमत्ता ही सुख प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।
इस न्याय-तर्क (सिलोजिज़्म) का उत्तर देते हुए कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति को 'अविचल', 'स्थिरचित्त' या 'शोकरहित' कहा जाता है तो उसका अर्थ यह नहीं होता कि वह कभी भी विचलित या दुःखी नहीं होता। उनका अभिप्राय केवल इतना होता है कि वह बहुत कम और सीमित मात्रा में ही विचलित होता है। इसी प्रकार, वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति को 'शोकरहित' तब कहा जाता है जब वह स्वभाव से शोकग्रस्त रहने वाला न हो और उसमें यह दोष न तो बार-बार प्रकट होता हो और न ही अत्यधिक मात्रा में। वे आगे कहते हैं कि मानव-स्वभाव ऐसा नहीं है कि किसी का मन पूरी तरह शोक से अछूता रह सके। उनके अनुसार, ज्ञानी व्यक्ति शोक से पराजित नहीं होता। परंतु वह उससे पूरी तरह अछूता भी नहीं रहता। शोक उसे स्पर्श अवश्य करता है। इसी प्रकार की अन्य बातें भी वे कहते हैं, जो उनके दर्शन के अनुरूप हैं। अर्थात वे मनोवेगों (भावनाओं) का पूर्ण उन्मूलन नहीं करते बल्कि उन्हें केवल सीमित और नियंत्रित करना चाहते हैं।
यदि ज्ञानी पुरुष की प्रशंसा केवल इस आधार पर की जाए कि वह दुर्बलों से कुछ अधिक दृढ़ है, अत्यंत निराश लोगों से कुछ अधिक सुखी है, असंयमी लोगों से कुछ अधिक संयमी है और निकृष्टतम लोगों से कुछ अधिक श्रेष्ठ है तो हम उसके गुणों का कितना तुच्छ मूल्यांकन कर रहे होंगे! कल्पना करो कि प्रसिद्ध धावक लाडास इस बात पर गर्व करे कि वह कितना तेज़ दौड़ता है जबकि उसके पीछे केवल लँगड़े और अपंग लोग ही दौड़ रहे हों!
“वह बढ़ती हुई फसल की पत्तियों के सिरों को छूती हुई इस प्रकार निकल जाती कि कोमल तिनके भी न झुकें।
वह उफनते समुद्र की लहरों के ऊपर से इस प्रकार दौड़ जाती कि उसके तीव्र चरण जल की एक बूँद से भी न भीगें।”
यह गति उस व्यक्ति की है जिसकी माप स्वयं उसकी अपनी उत्कृष्टता से की जाती है न कि इसलिए कि वह सबसे धीमे धावकों से तेज़ है। इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए स्वस्थ कह दिया जाए कि उसे हल्का-सा बुखार है तो क्या यह उचित होगा? रोग थोड़ा हो जाने से स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो जाता। हल्की बीमारी भी बीमारी ही है, स्वास्थ्य नहीं।
“ज्ञानी पुरुष को ‘अविचल’ उसी अर्थ में कहा जाता है, जिस अर्थ में कुछ फलों को ‘बीजरहित’ कहा जाता है अर्थात उनमें कठोर बीज बहुत कम या लगभग दिखाई नहीं देते, यद्यपि वे पूरी तरह अनुपस्थित नहीं होते।” यह बात सही नहीं है। मेरे विचार में, एक सद्गुणी व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जाना चाहिए कि उसके दोष केवल कम हो गए हैं बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि उनमें कोई दोष है ही नहीं। दोष बिल्कुल नहीं होने चाहिए। चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों। क्योंकि यदि वे मौजूद हैं तो समय के साथ बढ़ेंगे और अंततः गंभीर समस्या बन जाएँगे। जैसे आँख का तीव्र और गंभीर संक्रमण अंततः अंधापन ला सकता है, वैसे ही हल्का संक्रमण भी कष्टदायक होता है।
यदि तुम ज्ञानी पुरुष में किसी भी प्रकार के मनोवेग (भावनात्मक आवेग) को स्वीकार कर लेते हो तो अंततः विवेक उनके सामने टिक नहीं पाएगा। वह प्रबल बाढ़ की धारा में बह जाने वाली वस्तु की तरह उनके प्रवाह में बह जाएगा। यह संकट इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि तुम उसमें केवल एक ही मनोवेग नहीं बल्कि सभी मनोवेगों को स्थान देते हो। अनेक मनोवेगों का समूह, चाहे वे प्रत्येक सीमित ही क्यों न हों, किसी एक अकेले मनोवेग से अधिक शक्तिशाली होता है, भले ही वह अकेला मनोवेग अपनी पूरी तीव्रता पर हो। मान लो कि ज्ञानी पुरुष में धन की इच्छा है पर केवल थोड़ी-सी। उसमें महत्त्वाकांक्षा है पर अत्यधिक नहीं। उसमें क्रोध है पर असीम नहीं। उसमें चंचलता है पर बहुत अधिक बेचैन करने वाली नहीं। उसमें कामवासना है पर उन्मत्त नहीं।फिर भी ऐसी स्थिति उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक कठिन होगी, जिसमें केवल एक ही दोष हो, चाहे वह दोष अत्यंत प्रबल ही क्यों न हो। क्योंकि जिस व्यक्ति में सभी दोष थोड़ी-थोड़ी मात्रा में उपस्थित हैं, उससे निपटना उस व्यक्ति से अधिक कठिन है, जिसमें केवल एक ही दोष पूर्ण रूप से विद्यमान हो।
इसके अतिरिक्त, मनोवेग (भावनात्मक आवेग) की मात्रा से कोई अंतर नहीं पड़ता। वह चाहे कम हो या अधिक, उसका स्वभाव एक-सा ही रहता है। वह न तो आज्ञा मानना जानता है और न ही किसी उचित सलाह पर ध्यान देता है। जैसे कोई भी पशु, चाहे वह जंगली हो या पालतू और देखने में कितना ही शांत क्यों न लगे, तर्कपूर्ण समझाने से संचालित नहीं होता क्योंकि उसका स्वभाव समझाने-बुझाने के प्रति बहरा होता है। उसी प्रकार मनोवेग भी, चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों, हमारी बात नहीं मानते और न ही हमारी सुनते हैं। सिंह और बाघ अपनी हिंसक प्रकृति को कभी पूरी तरह नहीं छोड़ते। कभी-कभी वे शांत और वश में प्रतीत होते हैं लेकिन जब इसकी सबसे कम अपेक्षा होती है, तभी उनकी भीतर छिपी हुई उग्रता फिर से भड़क उठती है। इसी प्रकार, हमें कभी यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि हमारे दोष पूरी तरह वश में आ गए हैं। वे अवसर मिलते ही फिर से सिर उठा सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, यदि विवेक (तर्कबुद्धि) का वास्तव में कोई उपयोग है तो मनोवेगों को प्रारम्भ ही नहीं होना चाहिए। यदि वे विवेक की स्वीकृति के बिना ही उत्पन्न हो जाते हैं तो वे उसके बिना ही आगे बढ़ते रहेंगे। इसलिए उन्हें आरम्भ होने से पहले ही रोक देना, उनके उत्पन्न हो जाने के बाद उनके वेग को नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है। इसी कारण 'संयमित मनोवेग' या 'भावनाओं में मध्यमता' की धारणा मिथ्या और निरर्थक है। उसका व्यवहार भी हमें उसी प्रकार करना चाहिए जैसे, कोई यह कहे कि मनुष्य को संयमित रूप से पागल होना चाहिए या संयमित रूप से बीमार होना चाहिए।
केवल सद्गुण (Virtue) ही वास्तविक आत्मसंयम का परिचय देता है। मन की दुर्बलताएँ संयम को स्वीकार नहीं करतीं। उन्हें नियंत्रित करने की अपेक्षा उनका पूर्ण उन्मूलन कर देना अधिक सरल है। निस्संदेह यह बात विवाद से परे है कि मनुष्य के मन में जड़ जमा चुके और गहरे पैठे हुए दोष जैसे, लोभ, क्रूरता और असंयम,संयम के अधीन नहीं किए जा सकते। इसलिए मनोवेग भी संयम के अधीन नहीं हो सकते क्योंकि यही मनोवेग आगे चलकर उन दोषों को जन्म देते हैं।
इसके अतिरिक्त, यदि तुम शोक, भय, इच्छा और अन्य सभी दूषित मनोवेगों को थोड़ी-सी भी छूट दे देते हो तो वे फिर हमारे वश में नहीं रहेंगे। क्यों? क्योंकि उन्हें उत्पन्न करने वाले कारण हमारे भीतर नहीं बल्कि हमारे बाहर होते हैं। इसलिए वे बाहरी परिस्थितियों के अनुसार बढ़ते या घटते रहते हैं। यदि भय उत्पन्न करने वाली वस्तु अधिक भयानक हो जाए या और निकट आ जाए तो भय भी बढ़ जाएगा। इसी प्रकार, जितनी बड़ी वस्तु प्राप्त करने की आशा होगी, इच्छा भी उतनी ही प्रबल होती जाएगी। यदि यह हमारे अधिकार में ही नहीं है कि मनोवेग उत्पन्न हों या न हों तो फिर यह भी हमारे अधिकार में नहीं होगा कि वे कितने बड़े या छोटे हों। एक बार तुम उन्हें आरम्भ होने की अनुमति दे दो तो वे अपने कारणों के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं भी बढ़ते जाएँगे और उनकी तीव्रता उतनी ही हो जाएगी जितनी परिस्थितियाँ उसे बना देंगी। इसके अतिरिक्त, सबसे छोटे मनोवेग भी कभी-कभी नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। जो वस्तु विनाशकारी होती है, वह कभी किसी सीमा का पालन नहीं करती। रोगों की शुरुआत भले ही बहुत मामूली हो परन्तु वे धीरे-धीरे फैलते जाते हैं। जब शरीर रोगग्रस्त हो जाता है, तब कभी-कभी रोग में हुई सबसे छोटी-सी वृद्धि भी उसे पूरी तरह पराजित कर देने के लिए पर्याप्त होती है।
लेकिन यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि यह तो माना जाए कि मनोवेगों की शुरुआत हमारे वश में नहीं होती और फिर यह विश्वास किया जाए कि उनके अंत को हम अपने वश में रख सकते हैं! जिस चीज़ को उत्पन्न होने से रोकने की शक्ति ही मेरे पास नहीं थी, उसे एक बार उत्पन्न हो जाने के बाद सीमित करने की शक्ति मेरे पास कैसे हो सकती है? क्या किसी वस्तु को भीतर प्रवेश करने ही न देना, उसे भीतर आने देने के बाद नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल नहीं है?
कुछ लोग निम्नलिखित भेद करते हैं—
“बुद्धिमान और आत्मसंयमी व्यक्ति अपने मन के स्वभाव और चरित्र की दृष्टि से शांत रहता है परंतु घटनाओं के स्तर पर नहीं। अर्थात उसके मन का स्वभाव अविचल होता है। वह न शोक करता है और न भय का अनुभव करता है। फिर भी बाहरी परिस्थितियाँ उस पर प्रभाव डालती हैं और कभी-कभी उसके मन में हलचल उत्पन्न कर देती हैं।” उनका आशय यह है कि ज्ञानी व्यक्ति स्वभाव से क्रोधी नहीं होता फिर भी कभी-कभी क्रोधित हो जाता है। वह भयभीत रहने वाला नहीं होता फिर भी कभी-कभी भय का अनुभव करता है। अर्थात उसमें भयभीत होने का दोष तो नहीं होता लेकिन भय का मनोवेग अवश्य होता है। यदि हम यह मान लें तो बार-बार भय का अनुभव करते-करते वह अंततः भयभीत स्वभाव का दोष बन जाएगा। उसी प्रकार, यदि क्रोध को एक बार मन में प्रवेश करने दिया जाए तो वह धीरे-धीरे उस चरित्र की पूरी संरचना को नष्ट कर देगा, जो पहले क्रोध से मुक्त था। फिर मान लो कि ज्ञानी पुरुष बाहरी परिस्थितियों से ऊपर नहीं उठ पाता और उसके पास भी ऐसी कोई वस्तु है जिससे वह डरता है। तब जब देश, कानून और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उसे युद्ध और अग्नि का सामना करना पड़ेगा, तो वह अनिच्छा से आगे बढ़ेगा क्योंकि उसका मन भय से काँप उठेगा। किन्तु इस प्रकार का मानसिक विरोधाभास और असंगति किसी भी सच्चे ज्ञानी पुरुष में नहीं पाई जाती।
एक और बात है, जिसका उल्लेख मैं आवश्यक समझता हूँ ताकि हम उन दो प्रमाणों को आपस में न मिला दें जिन्हें अलग-अलग ही रखना चाहिए। एक प्रकार का तर्क यह सिद्ध करता है कि केवल वही वस्तु शुभ है जो नैतिक रूप से सम्माननीय (honorable) है। दूसरा, इससे भिन्न तर्क यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (virtue) ही मनुष्य को सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। सभी लोग यह स्वीकार करते हैं कि यदि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है, तो सद्गुण सुख के लिए पर्याप्त है। लेकिन वे इसका उल्टा निष्कर्ष स्वीकार नहीं करते अर्थात यदि केवल सद्गुण ही मनुष्य को सुखी बना देता है तो इससे यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है। ज़ेनोक्रेटीस और स्प्यूसिपस का मत है कि यद्यपि केवल सद्गुण के द्वारा मनुष्य सुखी हो सकता है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ हो।एपिक्यूरस का भी यही विश्वास है कि सद्गुण से युक्त व्यक्ति सुखी होता है। किंतु उसका मत यह है कि सद्गुण अपने आप में सुख के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार, मनुष्य को सुखी सद्गुण स्वयं नहीं बनाता बल्कि सद्गुण से उत्पन्न होने वाला आनंद उसे सुखी बनाता है। किन्तु यह भेद वास्तव में निरर्थक है क्योंकि एपिक्यूरस स्वयं यह भी कहता है कि सद्गुण कभी आनंद से अलग नहीं होता। यदि एक वस्तु सदैव दूसरी के साथ जुड़ी रहती है और उससे कभी अलग नहीं हो सकती तो सद्गुण अपने आप में भी सुख के लिए पर्याप्त है। क्योंकि जब वह अकेला भी प्रतीत होता है, तब भी वह आनंद से कभी रहित नहीं होता।
लेकिन पहला मत यह कि मनुष्य केवल सद्गुण के कारण तो सुखी हो सकता है पर पूरी तरह सुखी नहीं, सर्वथा असंगत है। यह कैसे संभव हो सकता है, मेरी समझ से परे है। सुखी जीवन में एक ऐसा परम कल्याण निहित होता है जो पूर्ण भी है और अजेय भी। यदि ऐसा है तो वह जीवन पूर्णतः सुखी ही होगा। यदि देवताओं के जीवन में इससे बढ़कर या इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यदि सुखी जीवन दैवीय स्वरूप का है तो फिर ऐसा कोई आधार नहीं बचता जिसके द्वारा उसे और भी ऊँचे स्तर पर पहुँचाया जा सके। इसके अतिरिक्त, यदि सुखी जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं है तो प्रत्येक सुखी जीवन पूर्ण है। और वही जीवन केवल सुखी ही नहीं बल्कि जितना संभव है उतना अधिक सुखी भी है। निश्चय ही तुम यह स्वीकार करोगे कि सुखी जीवन ही परम शुभ है। यदि उसमें परम शुभ विद्यमान है तो वह परम सुखी भी होना चाहिए। परम शुभ में किसी प्रकार की वृद्धि संभव नहीं है क्योंकि परम से आगे और क्या हो सकता है? ठीक यही बात सुखी जीवन पर भी लागू होती है क्योंकि सुखी जीवन का अर्थ ही परम शुभ की प्राप्ति है। फिर यदि तुम यह मानते हो कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे से अधिक सुखी हो सकता है तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि कोई उससे भी अधिक सुखी हो सकता है। इस प्रकार तुम परम शुभ के अनगिनत स्तर बना दोगे। किन्तु मेरी समझ में परम शुभ वही है, जिसके आगे श्रेष्ठता की कोई और अवस्था संभव नहीं होती।
यदि एक सुखी व्यक्ति दूसरे सुखी व्यक्ति की अपेक्षा कम सुखी है तो इसका अर्थ यह होगा कि वह अपने जीवन की अपेक्षा उस अधिक सुखी व्यक्ति के जीवन की अधिक इच्छा करेगा। किन्तु वास्तव में सुखी व्यक्ति अपने जीवन को किसी भी दूसरे जीवन से अधिक प्रिय मानता है। इन दोनों बातों में से कोई भी स्वीकार नहीं की जा सकती न यह कि कोई ऐसी अवस्था है जिसे सुखी व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन से अधिक वांछनीय समझे और न यह कि वह अपने पास जो है, उससे बेहतर वस्तु को भी प्राप्त करना न चाहे। निस्संदेह, मनुष्य जितना अधिक बुद्धिमान होता है, उतना ही वह सर्वोत्तम वस्तु की ओर अग्रसर होता है और उसे हर संभव उपाय से प्राप्त करना चाहता है। फिर यदि कोई ऐसी वस्तु या अवस्था अभी भी शेष है, जिसकी इच्छा वह कर सकता है और वास्तव में करनी भी चाहिए तो उसे सुखी कैसे कहा जा सकता है?
मैं तुम्हें बताता हूँ कि इस भ्रम का कारण क्या है। वे यह नहीं समझते कि सुखी जीवन वास्तव में एक ही प्रकार का जीवन होता है। उसकी श्रेष्ठता का आधार उसकी मात्रा नहीं बल्कि उसका गुण है। इसलिए वह चाहे लंबा हो या छोटा, व्यापक हो या सीमित, अनेक स्थानों और परिस्थितियों में व्यतीत हुआ हो या एक ही स्थान पर केंद्रित रहा हो, उसकी उत्कृष्टता समान रहती है। जो व्यक्ति सुखी जीवन का मूल्य उसकी अवधि, उसके विस्तार या उसकी परिस्थितियों के आधार पर आँकता है, वह उसके सबसे बड़े गुण को ही उससे छीन लेता है। सुखी जीवन का सबसे बड़ा गुण क्या है? उसकी पूर्णता। मेरा विचार है कि खाने और पीने का उद्देश्य तृप्ति है। कोई अधिक खाता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों तृप्त हो चुके हैं तो दोनों ने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार कोई अधिक पीता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों की प्यास बुझ चुकी है तो दोनों समान रूप से संतुष्ट हैं। ठीक इसी तरह, कोई अधिक वर्षों तक जीवित रहता है और कोई कम वर्षों तक। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि अधिक वर्षों ने और कम वर्षों ने, दोनों को समान रूप से सुखी बना दिया हो। जिसे तुम 'कम सुखी' कहते हो, वह वास्तव में सुखी है ही नहीं क्योंकि 'सुखी' ऐसा गुण नहीं है, जिसे कम या अधिक की श्रेणियों में बाँटा जा सके। या तो मनुष्य सुखी होता है या नहीं होता। 'कम सुखी' जैसी कोई अवस्था नहीं होती।
जो व्यक्ति साहसी है, वह निर्भय होता है।
जो निर्भय है, वह शोक से मुक्त होता है।
जो शोक से मुक्त है, वही सुखी होता है।
यह तर्क हमारी (स्टोइक) परंपरा का है।
जो लोग इसका खंडन करने का प्रयास करते हैं, वे कहते हैं कि जिस आधार-वाक्य को हम स्वतःसिद्ध मान लेते हैं कि 'जो साहसी है, वह निर्भय है।' वह वास्तव में न तो निर्विवाद है और न ही सर्वमान्य। वे कहते हैं, “कैसे? क्या साहसी व्यक्ति सामने उपस्थित संकट से बिल्कुल भी नहीं डरेगा? तब तो तुम किसी साहसी मनुष्य की नहीं बल्कि ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे हो जो पागल है और वास्तविकता से कटा हुआ है। निस्संदेह, साहसी व्यक्ति भय का अनुभव करता है किंतु बहुत ही सीमित मात्रा में; वह भय से पूरी तरह परे नहीं होता। जो लोग ऐसा कहते हैं, वे अंततः फिर उसी पुराने मत पर पहुँच जाते हैं, जिसमें वे छोटे-छोटे दोषों को मानो सद्गुण समझने लगते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति कम बार और कम मात्रा में भयभीत होता है, वह दोष से रहित नहीं है। वह केवल अपेक्षाकृत कम गंभीर दोष से ग्रस्त है।
“लेकिन मेरा तो यह मानना है कि सामने आने वाले संकटों से बिल्कुल न डरना पागलपन है।” तुम्हारी बात सही होती, यदि वे घटनाएँ वास्तव में हानिकारक होतीं। लेकिन यदि कोई यह जानता है कि वे वास्तव में बुराइयाँ नहीं हैं और यह मानता है कि केवल लज्जाजनक या अनैतिक आचरण ही वास्तविक बुराई है तो उसे बाहरी संकटों का सामना बिना किसी चिंता के करना चाहिए। उसे उन बातों से ऊपर उठ जाना चाहिए जिन्हें सामान्य लोग भयावह समझते हैं। अन्यथा, यदि हानि से न डरना ही मूर्खता और अविवेक का लक्षण है तो फिर जितना अधिक बुद्धिमान कोई व्यक्ति होगा, उतना ही अधिक भयभीत भी होगा।
“तुम्हारी बात मानें, तो साहसी व्यक्ति स्वयं ही अपने को संकट में डाल देगा।” नहीं, ऐसा नहीं है। वह संकटों से भयभीत नहीं होगा परंतु उनसे यथासंभव बचेगा। उसके लिए सावधानी बरतना उचित है, किंतु भयभीत होना नहीं।
“तुम्हारा क्या अर्थ है? क्या वह मृत्यु, कारावास, अग्नि और भाग्य द्वारा फेंके जाने वाले अन्य सभी प्रहारों से नहीं डरेगा?” नहीं। क्योंकि वह जानता है कि ये वस्तुएँ वास्तव में बुरी नहीं हैं। वे केवल बुरी प्रतीत होती हैं। उसके लिए वे मानव जीवन के केवल काल्पनिक भय हैं। उससे कैद, कोड़े, बेड़ियाँ, भूख, रोग और चोट की यातनाओं या किसी भी अन्य कष्ट की बात करो। उसकी दृष्टि में ये सब केवल ज्वरग्रस्त मन के भ्रम हैं। इन्हें डरने के लिए कायरों के लिए छोड़ दो। या क्या तुम यह मानते हो कि ऐसी चीज़ें वास्तव में बुरी हो सकती हैं जबकि अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब हमें स्वयं अपनी इच्छा से उनका सामना करना पड़ता है? क्या तुम जानना चाहते हो कि वास्तव में बुराई क्या है? वास्तविक बुराई है, जिन वस्तुओं को हम बुराई समझते हैं, उनके सामने आत्मसमर्पण कर देना। अपनी स्वतंत्रता उन्हें सौंप देना। जबकि उसी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हमें हर प्रकार का कष्ट सहने को तैयार रहना चाहिए। यदि हम उन सभी चीज़ों से ऊपर नहीं उठते जो हमारी गर्दन पर जुआ रखना चाहती हैं, तो हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं।
यदि वे जानते कि साहस वास्तव में क्या है तो वे यह प्रश्न ही न करते कि साहसी व्यक्ति के लिए क्या उचित है।साहस न तो उतावला दुस्साहस है, न रोमांच की खोज और न ही संकटों से प्रेम। बल्कि साहस वह ज्ञान है, जिसके द्वारा मनुष्य यह पहचान सकता है कि वास्तव में क्या बुरा है और क्या बुरा नहीं है। साहस अपनी सुरक्षा के प्रति अत्यंत सावधान रहता है, किंतु साथ ही वह उन कष्टों को भी सहने में पूर्णतः समर्थ होता है, जो केवल देखने में बुरे प्रतीत होते हैं जबकि वास्तव में बुरे नहीं होते। “कैसे?” यदि किसी साहसी व्यक्ति के गले पर छुरा रख दिया जाए, यदि उसके शरीर को थोड़ा-थोड़ा करके गहरे तक चीरा जाए, यदि वह अपनी आँतों को अपनी गोद में गिरते हुए देखे, यदि उसके कष्टों को बीच-बीच में रोककर फिर दोबारा आरम्भ किया जाए ताकि वे और भी अधिक पीड़ादायक बन जाएँ, और यदि अभी-अभी भरे हुए घाव फिर से फटकर ताज़ा रक्त बहाने लगें तो क्या वह नहीं डरेगा? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि उसे पीड़ा का अनुभव भी नहीं होगा?” निस्संदेह, उसे पीड़ा का अनुभव होगा। क्योंकि सद्गुण मनुष्य की स्वाभाविक संवेदनाओं को कभी समाप्त नहीं करता। किन्तु वह भयभीत नहीं होगा। वह अपराजित रहेगा और अपनी पीड़ा को अपने से ऊपर नहीं बल्कि अपने नीचे समझकर उसका सामना करेगा। तुम पूछते हो, उस समय उसके मन की अवस्था कैसी होगी? वह वैसी ही होगी जैसी किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो बीमारी के समय अपने मित्र का साहस बढ़ाता है।
जो कुछ बुरा होता है, वह किसी-न-किसी प्रकार की हानि पहुँचाता है।
जो किसी मनुष्य को हानि पहुँचाता है, वह उसे पहले से अधिक बुरा बना देता है।
किन्तु न पीड़ा और न ही दरिद्रता मनुष्य को नैतिक दृष्टि से बुरा बनाती है।
अतः न पीड़ा बुराई है और न ही दरिद्रता।
कोई यह आपत्ति कर सकता है—
“तुम्हारा प्रस्तुत किया हुआ आधार-वाक्य ही असत्य है। यह आवश्यक नहीं कि जो भी किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाए, वह उसे नैतिक रूप से भी बुरा बना दे। जैसे तेज़ हवा और तूफ़ान नाविक को हानि पहुँचाते हैं, पर वे उसे कम कुशल नाविक नहीं बना देते।”
इस आपत्ति का उत्तर कुछ स्टोइक इस प्रकार देते हैं। तेज़ हवा और तूफ़ान वास्तव में नाविक को एक अर्थ में हानि पहुँचाते हैं क्योंकि वे उसे उस कार्य में सफल नहीं होने देते, जिसके लिए उसने यात्रा आरम्भ की थी अर्थात जहाज़ को उसके निर्धारित मार्ग पर बनाए रखना। वे उसकी कला या कौशल को नष्ट नहीं करते किंतु उसके कार्य-निष्पादन में बाधा अवश्य डालते हैं।
इस पर पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उत्तर देते हैं, “यदि तुम्हारा यही तर्क है, तो उसी तर्क के अनुसार ज्ञानी पुरुष भी दरिद्रता, पीड़ा और ऐसी अन्य परिस्थितियों से किसी न किसी अर्थ में बुरा हो जाएगा। क्योंकि ये भी उसकी गतिविधियों और कर्मों में बाधा उत्पन्न करती हैं, यद्यपि वे उसके सद्गुण को नष्ट नहीं करतीं।”
यदि नाविक और ज्ञानी पुरुष की स्थिति में अंतर न होता तो यह आपत्ति उचित होती। लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। ज्ञानी पुरुष का जीवन-लक्ष्य केवल किसी विशेष कार्य को पूरा करना नहीं है बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उचित और सदाचारी आचरण करना है। इसके विपरीत, नाविक का उद्देश्य केवल जहाज़ को सुरक्षित बंदरगाह तक पहुँचा देना है। विभिन्न कलाएँ और कौशल अधीनस्थ होते हैं। उन्हें वही कार्य पूरा करना होता है जिसका उन्होंने वचन दिया है। लेकिन प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) सर्वोच्च शासक और मार्गदर्शक है। कलाएँ जीवन की सेवा करती हैं जबकि प्रज्ञा जीवन पर शासन करती है।
किन्तु मेरे विचार में इस आपत्ति का उत्तर एक भिन्न प्रकार से दिया जाना चाहिए। मेरे मत में, कोई भी तूफ़ान न तो नाविक की कला को कमतर बनाता है और न ही उस कला के अभ्यास को। नाविक ने तुमसे कभी यह वचन नहीं दिया कि वह हर स्थिति में अनुकूल परिणाम अवश्य प्राप्त करेगा। उसने केवल यह वचन दिया है कि वह अपनी पूरी क्षमता से उपयोगी बनने का प्रयास करेगा और जहाज़ चलाने की कला का पूरा ज्ञान रखेगा। जब भाग्य का कोई प्रचंड झोंका उसके मार्ग में बाधा डालता है, तब उसका कौशल और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जो नाविक यह कह सकता है, “हे नेप्च्यून! चाहे कुछ भी हो, यह जहाज़ कभी उलटकर नहीं डूबेगा। यदि डूबेगा भी तो सीधा खड़ा रहकर।” उसने अपनी कला की अपेक्षाओं को पूरा कर दिया है। तूफ़ान नाविक की दक्षता या उसके कर्म को बाधित नहीं करता। वह केवल उसके प्रयास के अंतिम परिणाम में बाधा डालता है।
“तुम्हारा क्या मतलब है? क्या वह प्रचंड तूफ़ान नाविक को हानि नहीं पहुँचाता, जो उसे बंदरगाह तक पहुँचने से रोक देता है, उसके सारे प्रयासों को निष्फल कर देता है और या तो उसे फिर से खुले समुद्र में धकेल देता है या जहाज़ के मस्तूल को गिराकर उसकी यात्रा रोक देता है?” नाविक को हानि पहुँचती है लेकिन एक नाविक के रूप में नहीं। केवल समुद्री यात्री के रूप में। क्योंकि यदि उसका कौशल ही ऐसी परिस्थितियों से नष्ट हो जाए तो फिर वह नाविक कहलाने योग्य ही नहीं रहेगा। वास्तव में, ऐसी परिस्थितियाँ उसके कौशल में बाधा नहीं डालतीं; बल्कि उसी समय उसका कौशल सबसे अधिक प्रकट होता है। जैसा कि कहा जाता है, “अनुकूल मौसम में तो कोई भी नाविक बन सकता है।” जिन परिस्थितियों का तुम उल्लेख कर रहे हो, वे यात्रा के लिए हानिकारक हैं, नाविक के कौशल के लिए नहीं। नाविक की दो भूमिकाएँ होती हैं। एक भूमिका वह है जो उस जहाज़ पर सवार सभी लोगों के साथ समान रूप से साझा करता है, वह स्वयं भी एक यात्री है। दूसरी उसकी अपनी विशिष्ट भूमिका है, वह जहाज़ का नाविक है। तूफ़ान उसे उसकी यात्री वाली भूमिका में हानि पहुँचाता है, नाविक वाली भूमिका में नहीं।
इसके अतिरिक्त, नाविक का कौशल किसी दूसरे के हित के लिए होता है; वह उसके यात्रियों से संबंधित है, जैसे चिकित्सक का कौशल उसके रोगियों के हित के लिए होता है। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष की प्रज्ञा एक साझा कल्याण है। उसका लाभ उन लोगों को भी मिलता है जिनके साथ वह रहता है और स्वयं उसे भी। अतः यदि यह मान भी लिया जाए कि जब तूफ़ान उसके द्वारा दूसरों के लिए किए जाने वाले कार्य में बाधा डालता है, तब नाविक को किसी अर्थ में हानि पहुँचती है, तब भी ज्ञानी पुरुष को जीवन के तूफ़ानों जैसे, दरिद्रता, पीड़ा और अन्य विपत्तियों से कोई हानि नहीं पहुँचती। क्योंकि उसकी सभी गतिविधियाँ बाधित नहीं होतीं। केवल वे कार्य प्रभावित होते हैं जो दूसरों से संबंधित हैं। जहाँ तक उसका अपना प्रश्न है, वह हर परिस्थिति में अपने कर्मों में अडिग रहता है। जब भाग्य उसका विरोध करता है, तब वह और भी महान बनकर कार्य करता है। क्योंकि ठीक उसी समय वह प्रज्ञा के वास्तविक कार्य का निर्वाह करता है और जैसा कि हमने अभी कहा, प्रज्ञा उसका अपना भी कल्याण है और दूसरों का भी।
इसके अतिरिक्त, यदि परिस्थितियाँ उसे किसी कार्य में बाँध भी दें, तब भी वह दूसरों की सहायता करने से वंचित नहीं होता। यदि दरिद्रता के कारण वह लोगों को यह नहीं सिखा सकता कि राज्य के कार्यों का संचालन कैसे किया जाना चाहिए, तो भी वह उन्हें यह अवश्य सिखा सकता है कि दरिद्रता का सामना कैसे किया जाना चाहिए। उसका कार्य उसके संपूर्ण जीवन में फैला हुआ है। इसलिए कोई भी आकस्मिक घटना ज्ञानी पुरुष की सक्रियता को समाप्त नहीं कर सकती। क्योंकि जो परिस्थिति उसे किसी एक कार्य से रोकती है, वही उसके लिए एक नए कार्य का विषय बन जाती है। वह हर प्रकार की परिस्थिति के लिए समान रूप से तैयार रहता है। समृद्धि पर वह शासन करता है और विपत्ति पर विजय प्राप्त करता है। मैं फिर कहता हूँ, उसका प्रयत्न यह होता है कि वह अपनी सद्गुणशीलता को समृद्धि और विपत्ति, दोनों ही परिस्थितियों में प्रकट करे। उसकी दृष्टि सदैव स्वयं सद्गुण पर रहती है, न कि उन बाहरी परिस्थितियों पर जिनमें सद्गुण का अभ्यास किया जाता है। इसी कारण दरिद्रता, पीड़ा या ऐसी कोई भी परिस्थिति, जिनसे अप्रशिक्षित और अविवेकी लोग घबराकर पीछे हट जाते हैं, ज्ञानी पुरुष को उसके मार्ग से विचलित नहीं कर सकती।
क्या तुम समझते हो कि ज्ञानी पुरुष दुर्भाग्य के कारण विवश हो जाता है? नहीं, वह तो उसी का उपयोग कर लेता है। जैसे फिडियास केवल हाथीदाँत से ही मूर्तियाँ बनाना नहीं जानता था। वह काँसे से भी उत्कृष्ट मूर्तियाँ बना सकता था। यदि उसे संगमरमर या कोई और कम मूल्यवान सामग्री दी जाती तो भी वह उसी से अपनी सर्वोत्तम कला का प्रदर्शन करता। ठीक उसी प्रकार, यदि अवसर मिले तो ज्ञानी पुरुष धन-संपत्ति के बीच रहकर अपने सद्गुण का परिचय देगा और यदि ऐसा अवसर न मिले, तो दरिद्रता के बीच भी वही सद्गुण प्रकट करेगा। यदि संभव हो तो वह अपने देश में रहकर सद्गुण का पालन करेगा और यदि नहीं तो निर्वासन में भी। यदि अवसर मिले तो सेनापति के रूप में; और यदि नहीं, तो एक साधारण सैनिक के रूप में। यदि स्वस्थ हो तो स्वास्थ्य में और यदि रोग या दुर्बलता आए तो उसी अवस्था में भी। भाग्य उसे जैसी भी परिस्थिति प्रदान करे, वह उससे कुछ ऐसा कर दिखाएगा जो स्मरणीय होगा।
कुछ ऐसे दक्ष पशु-प्रशिक्षक होते हैं जो सबसे अधिक हिंसक और भयावह पशुओं को न केवल उनकी उग्रता छोड़ने और मनुष्यों का स्पर्श सहने का अभ्यास करा देते हैं बल्कि उन्हें इतना विनीत भी बना देते हैं कि वे मनुष्य के साथी जैसे हो जाते हैं। सिंह का प्रशिक्षक अपना हाथ उसके खुले जबड़ों के बीच डाल देता है। बाघ का प्रशिक्षक उसे चूमता है और छोटा-सा इथियोपियाई महावत विशाल हाथी को घुटने टेकने और रस्सी पर चलने तक का अभ्यास करा देता है। ज्ञानी पुरुष भी ऐसा ही होता है। वह विपत्तियों का कुशल प्रशिक्षक होता है। पीड़ा, अभाव, अपमान, कारावास और निर्वासन, जिनसे सामान्य लोग भयभीत रहते हैं, जब उसके पास आते हैं तो वे उसके सामने मानो वश में किए हुए पशुओं की तरह शांत हो जाते हैं।
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