Wednesday, 8 July 2026

मन की शांति के संदर्भ में -- पत्र - 55 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


अभी-अभी मैं पालकी की सवारी करके लौटा हूँ। मैं उतना ही थक गया हूँ, मानो जितनी देर मैं बैठा रहा, उतनी ही देर पैदल चला होता। लंबे समय तक दूसरों के द्वारा ढोया जाना भी एक प्रकार का श्रम है। शायद उससे भी अधिक कठिन क्योंकि यह प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति ने हमें पैर इसलिए दिए हैं कि हम स्वयं चल सकें और आँखें इसलिए दी हैं कि हम स्वयं देख सकें। विलासपूर्ण और अत्यधिक आराम का जीवन अंततः हमें दुर्बल बना देता है। जब हम किसी कार्य को लंबे समय तक करना छोड़ देते हैं तो धीरे-धीरे उसे करने की हमारी क्षमता ही समाप्त हो जाती है।



    लेकिन वास्तव में मेरे लिए इस शरीर को अच्छी तरह झकझोरना आवश्यक था ताकि यदि मेरी श्वासनली में कोई द्रव जमा हो गया हो तो वह ढीला पड़ जाए या यदि किसी कारण से मेरी साँस की नलियाँ संकुचित हो गई हों तो यह झटके उन्हें खोल दें। अनुभव से मैंने जान लिया है कि इससे मुझे कुछ लाभ अवश्य होता है। इसी कारण मैं अपेक्षा से अधिक देर तक उसी सवारी में बना रहा। समुद्रतट का वह मार्ग मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, जो क्यूमे और सर्विलियस वातिया के भवन के बीच से होकर जाता है। उसके एक ओर समुद्र है और दूसरी ओर झील। वह किसी सँकरे मार्ग के समान प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, हाल ही में आए तूफ़ान के कारण वह मार्ग काफ़ी सख्त और मजबूत हो गया था। जैसा कि तुम जानते हो, जब लहरें लगातार और तीव्र गति से आती हैं तो वे रेत को दबाकर उसे ठोस बना देती हैं जबकि लंबे समय तक शांत मौसम रहने पर, रेत को बाँधे रखने वाली नमी सूख जाती है और वह फिर ढीली पड़ जाती है।

    अपनी आदत के अनुसार मैंने चारों ओर दृष्टि दौड़ानी शुरू की, यह देखने के लिए कि वहाँ ऐसी कौन-सी बात है जिससे मुझे कोई लाभदायक शिक्षा मिल सके।

मेरी दृष्टि उस भवन पर जाकर ठहर गई जो कभी वातिया का था। वहीं वह धनी भूतपूर्व प्रेटर अपने बुढ़ापे तक रहा। विश्राम और एकांत के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से वह प्रसिद्ध नहीं था। केवल इसी कारण लोग उसे भाग्यशाली समझते थे। जब भी कोई व्यक्ति ऐसीनियस गेलस (Asinius Gallus) से मित्रता के कारण या सेजानस (Sejanus) की शत्रुता के कारण और बाद में उसके प्रेम या मित्रता के कारण भी क्योंकि सेजानुस का मित्र होना उतना ही खतरनाक हो गया था जितना उसका शत्रु होना, विनष्ट हो जाता था, तब लोग कहा करते थे, “हे वातिया! केवल तुम ही जानते हो कि जीवन कैसे जिया जाता है!” किन्तु वास्तव में वह जीना नहीं बल्कि स्वयं को छिपाकर रखना जानता था। आराम और अवकाश का जीवन जीने तथा भय के कारण संसार से छिप जाने में बहुत बड़ा अंतर होता है। वातिया के जीवनकाल में मैं जब भी उस भवन के पास से गुज़रता था, तो यही कहा करता था, “यहाँ वातिया दफ़न है।”

    फिर भी, प्रिय लूसीलियस, दर्शन इतना पवित्र और इतना सम्मान के योग्य है कि जो वस्तु केवल उसका आभास भी देती है, वह भी कुछ संतोष प्रदान करती है, चाहे वह केवल उसका बाहरी दिखावा ही क्यों न हो। जब कोई व्यक्ति एकांत और अवकाश का जीवन बिताता है तो सामान्य लोग प्रायः यह समझ लेते हैं कि वह आत्मचिंतन में लीन है, शांत है, आत्मनिर्भर है और अपने लिए जी रहा है। जबकि वास्तव में ये गुण केवल बुद्धिमान व्यक्ति में ही होते हैं। वास्तव में केवल वही व्यक्ति अपने लिए जीना जानता है क्योंकि वही जीना जानता है। यही सबसे पहली आवश्यकता है। परन्तु जो व्यक्ति संसार और लोगों से भाग जाता है, जिसकी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं, इसलिए वह स्वयं निर्वासन में चला गया, जो दूसरों को अपने से अधिक समृद्ध देखकर सहन नहीं कर सका या जो किसी आलसी और भयभीत पशु की तरह डरकर अपने बिल में छिप गया, वह अपने लिए नहीं जी रहा होता। वह तो, और इससे अधिक लज्जाजनक क्या होगा, केवल अपने पेट के लिए, अपनी नींद के लिए और अपनी वासनाओं के लिए जी रहा होता है। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी और के लिए नहीं जी रहा, यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने लिए जी रहा है। फिर भी, उद्देश्य की दृढ़ता और अपने संकल्प पर अटल बने रहने का गुण इतना महान है कि यदि कोई व्यक्ति अपने चुने हुए एकांत और निष्क्रियता पर भी निरंतर स्थिर बना रहे तो उसका वह निष्क्रिय जीवन भी लोगों के सम्मान का पात्र बन जाता है।

    जहाँ तक उस भवन का प्रश्न है, उसके बारे में मैं तुम्हें निश्चित रूप से कुछ नहीं लिख सकता। मैं केवल उतना ही जानता हूँ जितना बाहर से दिखाई देता है। उसका अग्रभाग और वे अन्य हिस्से जो राहगीरों की दृष्टि में आते हैं। उसमें दो कृत्रिम गुफाएँ हैं, जिन्हें अत्यन्त परिश्रम से बनाया गया है। वे किसी भी विशाल प्रांगण जितनी बड़ी हैं। उनमें से एक में सूर्य का प्रकाश बिल्कुल प्रवेश नहीं करता जबकि दूसरी में सूर्यास्त तक प्रकाश बना रहता है। वहाँ चनार (प्लेन) के वृक्षों का एक उपवन भी है जिसके बीच से एक नहर बहती है। वह नहर अकेरोन झील और समुद्र को उसी प्रकार जोड़ती है जैसे यूरिपुस जलडमरूमध्य। यदि नियमित रूप से भी वहाँ से मछलियाँ पकड़ी जाएँ तो भी वह नहर निरंतर मछलियों की आपूर्ति कर सकती है। किन्तु जब तक समुद्र में मछली पकड़ना संभव रहता है, तब तक उसका उपयोग नहीं किया जाता। केवल जब तूफ़ान के कारण समुद्र मछुआरों के लिए अनुपयोगी हो जाता है, तब वह नहर तुरंत उपयोग के लिए उपलब्ध हो जाती है।

    किन्तु उस भवन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उसके बिल्कुल निकट बाइए का प्रसिद्ध विश्राम-स्थल स्थित है। इस प्रकार वह बाइए की असुविधाओं से तो मुक्त रहता है पर उसके सुख-सुविधाओं का आनंद भी प्राप्त कर लेता है। मैं भी स्वीकार करता हूँ कि ये उसके वास्तविक गुण हैं। मुझे यह भी लगता है कि वह भवन पूरे वर्ष रहने के लिए उपयुक्त है, क्योंकि वहाँ पश्चिमी हवा अच्छी तरह पहुँचती है। बल्कि वह स्वयं ऐसी स्थिति में है कि बाइए तक उस हवा के पहुँचने में भी कुछ रुकावट उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार, अपने एकांत और विश्राम के जीवन के लिए इस स्थान का चुनाव करने में वातिया कोई मूर्ख नहीं था।

    वास्तव में, किसी स्थान का मन की शांति में बहुत अधिक योगदान नहीं होता। सबसे महत्त्वपूर्ण बात वह मन है, जो प्रत्येक परिस्थिति को अपने अनुकूल बना लेना जानता है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सुखद, सुंदर और आनंददायक भवनों में रहते हुए भी उदास और व्यथित रहते हैं। ऐसे लोगों को भी देखा है जो पूर्ण एकांत में रहकर भी इतने व्यस्त और सक्रिय दिखाई देते हैं मानो उनके पास अनगिनत कार्य हों। इसलिए केवल इस कारण अपने आपको कम भाग्यशाली मत समझो कि तुम कैंपानिया में नहीं रहते। फिर भी, क्यों न विचारों के माध्यम से यहीं आ जाओ? अपने मन को सदा इसी दिशा में ले आया करो। मित्रों से उनकी अनुपस्थिति में भी बातचीत की जा सकती है। वास्तव में, तुम ऐसा जितनी बार चाहो और जितनी देर चाहो, उतनी देर तक कर सकते हो। यह आनंद, निस्संदेह बहुत बड़ा आनंद है। हम वास्तव में तब अधिक अनुभव करते हैं जब हम एक-दूसरे से दूर होते हैं। क्योंकि निरंतर साथ रहने से हम एक-दूसरे के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि साथ बैठने, साथ चलने और साथ बातचीत करने के बाद, जब अलग होते हैं तो उन्हीं लोगों के बारे में भी सोचना छोड़ देते हैं जिन्हें हम अभी कुछ ही समय पहले देखकर आए होते हैं।

    और एक कारण यह भी है कि हमें अपने बिछोह को शांत मन से स्वीकार करना चाहिए। वह यह कि जो लोग हमारे बिल्कुल निकट रहते हैं, उनसे भी हम अधिकांश समय अलग ही रहते हैं। ज़रा सोचो, सबसे पहले तो रात हमें एक-दूसरे से अलग कर देती है। फिर प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहता है। उसके बाद एकांत में अध्ययन करने का समय होता है और आस-पास के स्थानों की यात्राएँ भी होती हैं। यदि इन सबको जोड़कर देखो तो समझ में आएगा कि दूर की दूरी वास्तव में हमसे बहुत थोड़ा ही छीन पाती है। मित्र को अपने मन में सदा सँजोए रखना चाहिए क्योंकि मन कभी अनुपस्थित नहीं होता। वह प्रतिदिन जिस किसी से मिलना चाहे, उससे मिल सकता है। इसलिए मेरे साथ अध्ययन करो! मेरे साथ भोजन करो! मेरे साथ सैर करो! हमारे विचारों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। यदि ऐसा संभव होता तो हमारा जीवन सचमुच किसी मठ या कारागार में बंद जीवन के समान हो जाता। प्रिय लूसीलियस, मैं तुम्हें देखता हूँ। मैं तुम्हें सुनता हूँ— उतनी ही स्पष्टता से, जितनी पहले। मैं अपने आपको तुम्हारे इतना निकट अनुभव करता हूँ कि मुझे तो ऐसा लगता है, मानो तुम्हें पत्रों के स्थान पर प्रतिज्ञा-पत्र (हस्तलिखित दस्तावेज़) भेजने ही वाला हूँ।


अभी के लिए विदा 

मृत्यु के दर्शन के संदर्भ में -- पत्र - 54 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


अस्वस्थता ने मुझे लंबे समय तक कुछ राहत दी थी। परन्तु अचानक उसने फिर मुझ पर आक्रमण कर दिया। तुम पूछोगे, “इस बार क्या तकलीफ़ थी?” और तुम्हारा यह प्रश्न उचित भी है क्योंकि ऐसा कोई रोग नहीं है जिससे मेरा कभी परिचय न हुआ हो। किन्तु एक रोग ऐसा है जिसने मानो मुझे पूरी तरह अपने अधिकार में ले रखा है। भला मैं उसका यूनानी नाम क्यों लूँ? मैं उसे सरल शब्दों में 'साँस फूलना' या 'घरघराहट' ही कह सकता हूँ। यही नाम उसके लिए पर्याप्त और उपयुक्त है।


इथोपिया कलाचित्र 

    इसका दौरा बहुत थोड़े समय के लिए आता है बिल्कुल किसी अचानक उठने वाले तूफ़ानी झोंके की तरह। प्रायः वह एक घंटे के भीतर ही समाप्त हो जाता है। आखिर कोई व्यक्ति बहुत देर तक अंतिम साँस की अवस्था में तो नहीं रह सकता! शरीर की लगभग हर प्रकार की पीड़ा और हर संकट से मैं गुज़र चुका हूँ। फिर भी मुझे लगता है कि इससे अधिक कष्टदायक कुछ नहीं है। और ऐसा क्यों न हो? अन्य सभी रोगों में मनुष्य केवल बीमार होता है। पर इस रोग में ऐसा लगता है मानो उसके प्राण ही शरीर से बाहर निकल रहे हों। इसी कारण चिकित्सक इसे 'मृत्यु का पूर्वाभ्यास' कहते हैं क्योंकि यह साँस का अवरोध कई बार वही करने का प्रयास करता है, जिसे एक दिन मृत्यु वास्तव में पूरा कर देती है। क्या तुम्हें लगता है कि मैं यह सब तुम्हें बड़े आनंद से लिख रहा हूँ, केवल इसलिए कि मैं इस बार बच निकला? यदि मैं इस थोड़ी-सी राहत पर ऐसे प्रसन्न होऊँ मानो मैं पूर्णतः स्वस्थ हो गया हूँ तो मैं उतना ही हास्यास्पद होऊँगा, जितना वह व्यक्ति जो केवल इसलिए यह समझ बैठे कि उसने अपना मुक़दमा जीत लिया है क्योंकि उसकी सुनवाई कुछ समय के लिए टल गई है।

    फिर भी, जब मेरा दम घुट रहा था, तब भी मैं प्रसन्न और साहसपूर्ण विचारों के सहारे अपनी मानसिक शांति बनाए रखने में सफल रहा। मैंने अपने आप से कहा, “यह क्या है? क्या मृत्यु बार-बार मेरी परीक्षा ले रही है? तो लेने दो। मैं भी बहुत पहले उसकी परीक्षा ले चुका हूँ।” तुम पूछोगे, “कब?” जन्म लेने से पहले। मृत्यु तो केवल अस्तित्व का अभाव है। यह कैसी अवस्था होती है, मैं पहले से ही जानता हूँ। मेरे बाद जो स्थिति होगी, वही तो मेरे जन्म से पहले भी थी। यदि इस अवस्था में कोई यातना होती तो हमारे इस संसार का प्रकाश देखने से पहले भी अवश्य ही वह यातना रही होती। पर उस समय तो हमें किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं हुआ था।

    मैं तुमसे पूछता हूँ। क्या तुम उस व्यक्ति को अत्यन्त मूर्ख नहीं कहोगे, जो यह समझे कि एक दीपक बुझ जाने के बाद, जलाए जाने से पहले की अपेक्षा अधिक बुरी अवस्था में होता है? हम भी उसी दीपक के समान हैं। हम प्रज्वलित होते हैं और फिर बुझ जाते हैं। इन दोनों अवस्थाओं के बीच ही कुछ समय ऐसा होता है, जब हमें अनुभव और चेतना होती है। परन्तु दोनों ओर केवल पूर्ण अनस्तित्व और किसी भी प्रकार की अनुभूति का अभाव है। प्रिय लूसीलियस, यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम समझते हैं कि मृत्यु केवल जीवन के बाद आती है। वास्तव में, मृत्यु जीवन से पहले भी होती है और उसके बाद भी। जो कुछ हमारे जन्म से पहले था, वही तो मृत्यु थी। फिर अंत हो जाने और कभी आरम्भ ही न होने में क्या अंतर है? दोनों का परिणाम एक ही है—अनस्तित्व।

    इन उत्साहवर्धक विचारों से और इसी प्रकार के अनेक अन्य विचारों से, मैं निरंतर अपने आपको धैर्य और साहस देता रहा। स्वाभाविक ही है कि मैं उन्हें बोलकर नहीं कह सकता था क्योंकि मेरे पास बोलने के लिए साँस ही नहीं बची थी। फिर धीरे-धीरे मेरी घरघराहट, जो पहले ही हाँफने में बदल चुकी थी, अधिक लंबे अंतराल पर आने लगी। उसके बाद उसकी तीव्रता कम होती गई और अंततः मेरी साँस कुछ स्थिर हो गई। फिर भी, अब जबकि वह दौरा समाप्त हो चुका है, मेरी साँस अभी तक पूरी तरह स्वाभाविक नहीं हुई है। अब भी उसमें एक प्रकार का रुकाव, अटकाव और झिझक-सी बनी रहती है।

    तो ऐसा ही सही, जब तक कि मैं जान-बूझकर आहें नहीं भर रहा हूँ! मैं तुम्हें यह वचन देता हूँ। अपने जीवन के अंत के समय मैं भय से नहीं काँपूँगा। मैं पहले से ही उसके लिए तैयार हूँ। मैं अपने जीवन की कुल अवधि के बारे में तनिक भी चिंता नहीं करता। प्रशंसा और अनुकरण उसी व्यक्ति का करना चाहिए जो जीवन का आनंद तो लेता है, परन्तु मृत्यु आने पर उससे विमुख या अनिच्छुक नहीं होता। आखिर उस व्यक्ति में क्या विशेष गुण है, जो केवल तब जीवन छोड़ता है जब उसे उससे बलपूर्वक अलग कर दिया जाता है? फिर भी, इसमें भी एक सद्गुण है। यद्यपि मुझे सचमुच जीवन से बाहर किया जा रहा है फिर भी मैं इस प्रकार विदा हो रहा हूँ मानो यह मेरा अपना स्वेच्छापूर्ण प्रस्थान हो।

    इसी कारण बुद्धिमान व्यक्ति को वास्तव में कभी भी जीवन से बलपूर्वक बाहर नहीं किया जाता। क्योंकि बलपूर्वक निकाला जाना उसी को कहा जाता है जिसे उस स्थान से हटाया जाए, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता। परन्तु ज्ञानी पुरुष ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिसे वह अनिच्छा से करे। वह अनिवार्यता पर इस प्रकार विजय प्राप्त कर लेता है कि जो कार्य परिस्थितियों की अनिवार्यता उससे किसी भी स्थिति में करवाने वाली है, उसे वह अपनी इच्छा से ही करने लगता है।


अभी के लिए विदा 

दर्शन की शक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 53 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


ऐसी कौन-सी बात है जिसके लिए मुझे राज़ी न किया जा सके? इस बार तो मुझे समुद्र-मार्ग से यात्रा करने के लिए भी मना लिया गया! जब मैं रवाना हुआ, तब समुद्र बिल्कुल शांत था। हाँ, आकाश पर चितकबरे बादल अवश्य छाए हुए थे। वैसे बादल जो प्रायः वर्षा या आँधी में बदल जाते हैं। फिर भी मैंने सोचा कि तुम्हारे नगर पार्थेनोपे से पुटेओली तक की दूरी इतनी कम है कि अनिश्चित और भय उत्पन्न करने वाले मौसम में भी यह यात्रा पूरी की जा सकती है। इसलिए मैंने शीघ्र पहुँचने के उद्देश्य से गहरे समुद्र का मार्ग अपनाया और सीधे नेसिस द्वीप की ओर बढ़ चला ताकि सभी खाड़ियों को छोड़कर निकट का रास्ता ले सकूँ।


इथियोपिया - कलाचित्र 

    जैसे ही मैं उस स्थान पर पहुँचा जहाँ आगे बढ़ने और लौट जाने— दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया था। वैसे ही वह शांत समुद्र जिसने मुझे यात्रा के लिए आकर्षित किया था, वैसा नहीं रहा। अभी पूर्ण तूफ़ान तो नहीं आया था पर समुद्र की लहरें तिरछी होकर उठने लगी थीं और वे लगातार अधिक ऊँची तथा अधिक बार आने लगीं। मैंने नाविक से आग्रह किया कि वह मुझे कहीं किनारे उतार दे। पर उसने कहा कि तट पथरीला है, वहाँ कहीं भी जहाज़ ठहराने का सुरक्षित स्थान नहीं है और तूफ़ान के समय उसे समुद्र से अधिक भय भूमि से लगता है। किन्तु मेरी अवस्था इतनी खराब हो चुकी थी कि मुझे किसी भी खतरे की परवाह नहीं रही। मुझे वह लगातार बनी रहने वाली समुद्री बीमारी हो गई थी जो मितली तो उत्पन्न करती है। पर उल्टी होने पर भी राहत नहीं देती। आखिरकार मैंने नाविक पर ज़ोर डाला और उसे विवश कर दिया कि वह चाहे उसकी इच्छा हो या न हो, नाव को किनारे की ओर मोड़ दे।

    जैसे ही हम तट के निकट पहुँचे, मैंने वर्जिल (Virgil) के बताए हुए निर्देशों की प्रतीक्षा नहीं की। न इस बात की कि 'जहाज़ का अग्रभाग समुद्र की ओर मोड़ा जाए' और न ही इस बात की कि 'जहाज़ के अगले भाग से लंगर डाला जाए।' अपनी तैरने की क्षमता को याद करते हुए क्योंकि मैं बहुत पहले से अच्छा तैराक रहा हूँ। मैंने एक शीत-जल स्नान के उत्साही व्यक्ति की भाँति अपना चोगा पहने-पहने ही समुद्र में छलाँग लगा दी। ज़रा कल्पना करो कि टूटती हुई लहरों के बीच रास्ता खोजते हुए, अपना मार्ग बनाते हुए, मैं किस प्रकार लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ा और कितनी कठिनाइयाँ झेलीं। तभी मुझे समझ में आया कि नाविकों को भूमि से भय क्यों लगता है। यह विश्वास करना कठिन है कि मैंने केवल इसलिए इतनी यातना सही क्योंकि मैं अपनी ही अवस्था को और अधिक सहन नहीं कर पा रहा था। मैं तुम्हें बताता हूँ, ओडीसियस (Odysseus) के साथ हर जगह जहाज़-डूबने की घटनाएँ इसलिए नहीं हुईं कि समुद्र उसके प्रति क्रोधित था। बल्कि उसका कारण यह था कि वह स्वयं समुद्री बीमारी का शिकार हो जाता था। यदि मुझे समुद्र-मार्ग से ही यात्रा करनी पड़े तो जहाँ भी जाना होगा वहाँ पहुँचने में मुझे भी बीस वर्ष लग जाएँगे!

    जैसे ही मेरा पेट कुछ संभला क्योंकि तुम जानते ही हो कि समुद्री बीमारी से छुटकारा पाना, समुद्र से बाहर निकल आने की अपेक्षा अधिक समय लेता है। जैसे ही मैंने शरीर को तरोताज़ा करने के लिए उस पर तेल लगाया, मैं यह सोचने लगा कि हम अपनी कमियों को कितनी आसानी से भूल जाते हैं। हम अपने शरीर की उन स्पष्ट कमियों तक को भूल जाते हैं, जो हर समय हमें अपनी उपस्थिति का एहसास कराती रहती हैं। फिर जो दोष बाहर से दिखाई ही नहीं देते, उन्हें तो हम और भी अधिक भूल जाते हैं। और आश्चर्य यह है कि जितने बड़े दोष होते हैं, उन्हें पहचानना उतना ही कठिन होता है। हल्का-सा ज्वर मनुष्य को धोखा दे सकता है। पर जब वह बढ़कर वास्तविक बीमारी का रूप ले लेता है, तब सबसे कठोर और सहनशील व्यक्ति भी यह स्वीकार करने के लिए विवश हो जाता है कि वह बीमार है। यदि पैरों में दर्द हो या जोड़ों में हल्की-सी चुभन महसूस हो तो हम उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हम कह देते हैं कि शायद टखना मुड़ गया है या अधिक परिश्रम करने से ऐसा हो गया है। जब तक बीमारी आरम्भिक अवस्था में होती है और उसके विषय में संदेह बना रहता है, तब तक हम उसे कोई-न-कोई सुविधाजनक नाम दे देते हैं। लेकिन जब वही रोग पिंडलियों को जकड़ने लगता है और दोनों पैरों को विकृत कर देता है, तब हमें स्वीकार करना ही पड़ता है कि यह गठिया है। किन्तु मन के रोगों के साथ स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है। वहाँ जितना अधिक मनुष्य रोगग्रस्त होता है, उतना ही कम उसे अपने रोग का बोध होता है।

    इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, प्रिय लूसीलियस। जब मनुष्य केवल हल्की नींद में होता है, तब उसे अपने आस-पास की कुछ बातें अनुभव होती रहती हैं। कभी-कभी उसे यह भी पता होता है कि वह सो रहा है। परन्तु गहरी नींद तो स्वप्नों तक को मिटा देती है। वह मन को इतनी गहराई में डुबो देती है कि उसे अपने अस्तित्व तक का बोध नहीं रहता। लोग अपने दोषों को स्वीकार क्यों नहीं करते? इसलिए कि वे अभी भी उन्हीं दोषों के वश में जी रहे होते हैं। स्वप्न का वर्णन वही कर सकता है जो जाग चुका हो; उसी प्रकार अपने दोषों को स्वीकार कर लेना भी इस बात का संकेत है कि मनुष्य मानसिक रूप से स्वस्थ होने लगा है।

    आओ, हम जाग उठें ताकि अपनी भूलों को पहचान सकें। किन्तु हमें जगा सकने वाली केवल एक ही शक्ति है—दर्शन। वही हमें इस गहरी निद्रा से जगाकर सचेत कर सकता है। अपने आपको पूरी तरह दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। तुम उसके योग्य हो और वह तुम्हारे योग्य है। एक-दूसरे को दृढ़ता से अपना लो। दूसरे सभी दावों को साहस और स्पष्टता के साथ अस्वीकार कर दो। ऐसा कोई कारण नहीं कि तुम दर्शन का अध्ययन केवल अपने अवकाश के समय में ही करो। यदि तुम बीमार होते तो अपने घर-परिवार के दायित्वों से कुछ समय के लिए अलग हो जाते। अपने व्यवसाय और कार्यों की चिंता छोड़ देते। किसी का मुकदमा भी तुम्हारे लिए इतना महत्त्वपूर्ण न होता कि रोग के फिर से उभर आने की आशंका रहते हुए भी तुम न्यायालय पहुँच जाते। तब तुम्हारा पूरा प्रयास केवल एक ही उद्देश्य में लगा रहता— यथाशीघ्र रोगमुक्त होना। तो फिर अब ऐसा क्यों नहीं करते? जो कुछ भी तुम्हारे मार्ग में बाधा बन रहा है, उसे दूर कर दो। अपने मन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए समय निकालो। जो व्यक्ति सांसारिक कार्यों और निरंतर व्यस्तताओं में उलझा रहता है, वह कभी भी आत्मिक उत्कृष्टता और सच्चे ज्ञान की ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता।

    दर्शन अपनी सत्ता और अधिकार का दावा करता है। वह हमें समय प्रदान करता है। वह केवल उतने समय से संतुष्ट नहीं होता जितना हम उसे देना चाहें। दर्शन कोई अवकाश के समय का शौक नहीं बल्कि पूर्णकालिक साधना है। वह हमारा मार्गदर्शक और स्वामी है, जो हमें अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश देता है। एक बार सिकंदर महान (Alexander the Great) से एक नगर ने यह वचन दिया कि वह उसे अपनी खेती योग्य भूमि का एक भाग और अपनी समस्त उपज का आधा हिस्सा देगा। इस पर उसने उत्तर दिया, “मैं एशिया इसलिए नहीं आया हूँ कि तुम मुझे जो देना चाहो, वही स्वीकार कर लूँ बल्कि मैं इसलिए आया हूँ कि जो कुछ मैं तुम्हारे लिए छोड़ दूँ, वही तुम्हारे पास रह सके।” दर्शन भी प्रत्येक परिस्थिति में यही बात कहता है,  “मैं तुम्हारे बचे-खुचे समय को स्वीकार करने नहीं आया हूँ बल्कि जो समय मैं अस्वीकार कर दूँगा, केवल वही तुम्हारे लिए बचेगा।”

    अपने संपूर्ण मन को दर्शन के प्रति समर्पित कर दो। दर्शन के समीप बैठो, उसकी सेवा करो। तब तुम सामान्य मनुष्यों से बहुत ऊपर उठ जाओगे। सभी नश्वर मनुष्य तुमसे बहुत पीछे रह जाएँगे और देवता भी तुमसे बहुत अधिक आगे नहीं होंगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि तब तुम्हारे और देवताओं के बीच क्या अंतर रह जाएगा? केवल इतना कि उनका अस्तित्व तुमसे अधिक समय तक रहता है। किन्तु किसी विशाल और पूर्ण वस्तु को एक लघु कृति में समेट देना ही तो महान कलाकार की वास्तविक पहचान है। उसी प्रकार, बुद्धिमान व्यक्ति के लिए उसका सीमित जीवन उतना ही व्यापक और पूर्ण होता है, जितना ईश्वर के लिए समस्त काल। बल्कि एक अर्थ में ज्ञानी मनुष्य ईश्वर से भी श्रेष्ठ होता है। ईश्वर तो अपनी प्रकृति के कारण निर्भय है; परन्तु ज्ञानी मनुष्य उसी निर्भयता को अपने स्वयं के प्रयास और साधना से प्राप्त करता है। निस्संदेह, यह अत्यन्त महान उपलब्धि है कि मनुष्य अपनी मानवीय दुर्बलताओं के साथ रहते हुए भी ईश्वर जैसी शांति और समत्व को बनाए रखे।

    यह आश्चर्यजनक है कि भाग्य के सभी आक्रमणों को परास्त कर देने की शक्ति दर्शन में कितनी प्रबल होती है। कोई भी अस्त्र उसके शरीर में धँस नहीं सकता। उसकी रक्षा-व्यवस्था अभेद्य होती है। जब भाग्य के बाण उसकी ओर आते हैं, तब वह या तो झुककर उन्हें अपने ऊपर से निकल जाने देता है अथवा अडिग खड़ा रहता है और उन्हें इस प्रकार लौटा देता है कि वे प्रहार करने वाले की ओर ही पलट जाते हैं।


अभी के लिए विदा 

दर्शन का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित करने के संदर्भ में -- पत्र - 52 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


प्रिय लूसीलियस, वह क्या है जो हमें उस दिशा के विपरीत खींच ले जाता है, जिधर हम जाना चाहते हैं, जो हमें उसी स्थान की ओर वापस धकेल देता है, जहाँ से हम दूर जाना चाहते हैं? वह क्या है जो हमारे मन से संघर्ष करता रहता है और हमें किसी एक बात को एक बार और सदा के लिए पूरे मन से चाहने नहीं देता? हम एक योजना से दूसरी योजना के बीच डगमगाते रहते हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं होती जिसे हम स्वतंत्र रूप से बिना किसी शर्त के और सदा के लिए चाहें। तुम कहोगे, "किसी बात का दृढ़ निश्चय न कर पाना, किसी एक विकल्प पर स्थिर न रह पाना— यही तो मूर्खता है।" किन्तु हम इस मूर्खता से स्वयं को कैसे मुक्त करें और कब? कोई भी व्यक्ति इतना समर्थ नहीं होता कि वह केवल अपने बल पर तैरकर सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाए। किसी को अपना हाथ बढ़ाना पड़ता है। किसी को उसे पकड़कर ऊपर खींचना पड़ता है।



    एपिक्यूरस (Epicurus) कहते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी की सहायता के बिना ही सत्य तक पहुँच जाते हैं। वे अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं। वे ऐसे लोगों की सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं जिनकी प्रेरणा और प्रगति उनके अपने भीतर से उत्पन्न होती है। वे यह भी कहते हैं कि कुछ लोगों को किसी दूसरे के सहारे की आवश्यकता होती है। यदि कोई उनसे पहले मार्ग न दिखाए तो वे लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। किन्तु वे अच्छे अनुयायी सिद्ध होते हैं। उनके अनुसार मिटरोडोरस (Metrodorus) इसी दूसरी श्रेणी के व्यक्ति थे। यह भी एक उत्कृष्ट बुद्धि है, यद्यपि प्रथम श्रेणी की नहीं बल्कि दूसरी श्रेणी की। हम भी प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों में नहीं आते। हमारे लिए इतना ही बहुत है कि हमें दूसरी श्रेणी में स्थान मिल जाए। ऐसा भी नहीं है कि तुम्हें उस व्यक्ति को तुच्छ समझना चाहिए जो किसी दूसरे की कृपा और मार्गदर्शन से सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाता है। बचाए जाने की इच्छा और तत्परता भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।

    इन दोनों प्रकार के लोगों के अतिरिक्त तुम्हें एक तीसरी श्रेणी के लोग भी मिलेंगे और उन्हें भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। ये वे लोग हैं जिन्हें सही मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना पड़ता है, यहाँ तक कि कभी-कभी बाध्य भी करना पड़ता है। उन्हें केवल एक मार्गदर्शक ही नहीं बल्कि एक सहायक और मानो किसी प्रशिक्षक की भी आवश्यकता होती है। यह तीसरी श्रेणी है। यदि तुम इसका भी एक उदाहरण चाहते हो तो एपिक्यूरस कहते हैं कि हर्मरकुस (Hermarchus) ऐसे ही व्यक्ति थे। इसी कारण वे एक के लिए अधिक बधाई प्रकट करते हैं। किन्तु दूसरे के प्रति अधिक प्रशंसा व्यक्त करते हैं। क्योंकि यद्यपि दोनों अंततः एक ही लक्ष्य तक पहुँच गए फिर भी अधिक कठिन स्वभाव और सामग्री के साथ उसी परिणाम को प्राप्त करना अधिक प्रशंसनीय होता है।

    मान लो कि दो भवन बनाए गए हैं और दोनों एक समान हैं, ऊँचाई में भी और भव्यता में भी। एक भवन ऐसी भूमि पर बनाया गया जहाँ ज़मीन दृढ़ और ठोस थी। इसलिए उसका निर्माण शीघ्रता से पूरा हो गया। दूसरे भवन की नींव ढीली और खिसकने वाली मिट्टी पर रखी जानी थी। उसे मजबूत और स्थिर बनाने में बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ा, तभी निर्माण आगे बढ़ सका। पहले निर्माणकर्ता का कार्य तो सबकी आँखों के सामने दिखाई देता है पर दूसरे के परिश्रम का सबसे बड़ा और सबसे कठिन भाग दर्शकों की दृष्टि से ओझल रहता है क्योंकि वह नींव को मजबूत करने में लगा होता है। इसी प्रकार कुछ लोगों का स्वभाव सहज और बिना किसी विशेष बाधा के विकसित हो जाता है जबकि कुछ अन्य, जैसा कि कहा जाता है, “हाथों के कठिन परिश्रम का काम” होते हैं। उन्हें सबसे पहले अपने चरित्र की नींव को ही मजबूत बनाने में जुटना पड़ता है। इसलिए मैं कहूँगा कि जिसे अपने ही स्वभाव से संघर्ष नहीं करना पड़ता, वह निश्चय ही अधिक भाग्यशाली है। किन्तु वास्तविक प्रशंसा का अधिक अधिकारी वह है जिसने अपने स्वभाव की कमजोरियों पर विजय प्राप्त की हो, जो केवल बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ा ही नहीं बल्कि अपने आपको खींचते हुए, संघर्ष करते हुए, वहाँ तक पहुँचाया हो।

    जिस बुद्धि और मन पर हमें कार्य करना है, वह कठोर और आसानी से न झुकने वाला है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लेना ही उचित है। हमारे मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। अतः हमें उनका डटकर सामना करना चाहिए और सहायता के लिए अतिरिक्त शक्ति भी बुला लेनी चाहिए।

    तुम पूछते हो, “मैं किसे बुलाऊँ? इस व्यक्ति को या उस व्यक्ति को?” वास्तव में, तुम्हें अपने पूर्वजों और प्राचीन महान व्यक्तियों की ओर भी लौटना चाहिए। वे किसी काम में व्यस्त नहीं हैं। केवल जीवित लोग ही हमारी सहायता नहीं कर सकते। जो इस संसार से जा चुके हैं, वे भी अपने विचारों और शिक्षाओं के माध्यम से हमारी सहायता कर सकते हैं।

    फिर भी, जहाँ तक जीवित लोगों का प्रश्न है, हमें ऐसे लोगों को नहीं चुनना चाहिए जो शब्दों की बाढ़ बहा देते हैं, घिसी-पिटी बातें दोहराते रहते हैं और घर में भी मानो भीड़ को संबोधित कर रहे हों। इसके बजाय, हमें ऐसे लोगों को अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए जो अपने जीवन के आचरण से शिक्षा देते हैं। वे केवल यह नहीं बताते कि क्या करना चाहिए बल्कि स्वयं वैसा करके भी दिखाते हैं। और जिन बातों से बचने की शिक्षा वे देते हैं, बाद में तुम उन्हें स्वयं वही करते हुए नहीं पाओगे। अपने सहायक के रूप में ऐसे व्यक्ति को चुनो, जिसे देखकर तुम उससे उतना ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक प्रभावित और सम्मानित हो जाओ, जितना केवल उसकी बातें सुनकर होते हो।

    इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो सामान्यतः श्रोताओं के सामने व्याख्यान देते हैं। मैं तुम्हें उनकी बातें सुनने से भी नहीं रोकता बशर्ते कि वे लोगों के बीच यश और प्रतिष्ठा पाने की महत्त्वाकांक्षा से न जाएँ बल्कि केवल इस उद्देश्य से जाएँ कि वे अपने श्रोताओं का भी और अपना भी सुधार कर सकें। क्योंकि प्रशंसा की भूखी दर्शन-विद्या से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं हो सकता। क्या कोई रोगी उस चिकित्सक की प्रशंसा करता है जो उसका शल्य-चिकित्सा द्वारा उपचार कर रहा हो?

    इसलिए तुम सब शांत रहो और मौन रहकर अपना उपचार होने दो। यदि तुम पीड़ा में चिल्लाओ भी, तब भी मैं तुम्हारी बात उसी प्रकार सुनूँगा, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की कराह सुनता हूँ जिसके घाव पर हाथ लग गया हो। क्या तुम यह प्रकट करना चाहते हो कि तुम ध्यानपूर्वक सुन रहे हो और विषय की महानता से तुम्हारा हृदय प्रभावित हुआ है? निश्चय ही ऐसा कर सकते हो। मैं इसकी अनुमति क्यों न दूँ, जब तक कि तुम्हारी प्रतिक्रिया अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के विचारों के समर्थन और सम्मान की अभिव्यक्ति हो?

    पायथागोरस (Pythagoras) के शिष्यों को पाँच वर्षों तक मौन रहने का अभ्यास कराया जाता था। इसलिए क्या तुम यह समझते हो कि जब उन्हें बोलने का अधिकार मिला तो उसी क्षण उन्हें प्रशंसा करने का अधिकार भी मिल गया? लेकिन अशिक्षित लोगों की तालियों और जय-जयकार से रोमांचित होकर सभा से बाहर निकलना वास्तव में अत्यन्त मूर्खता है। तुम उन लोगों की प्रशंसा से प्रसन्न क्यों होते हो, जिनकी प्रशंसा तुम स्वयं करने योग्य नहीं समझते? पापिरीअस फैबियानस (Papirius Fabianus) श्रोताओं के सामने व्याख्यान दिया करते थे। किन्तु लोग उन्हें बड़े संयम और गंभीरता के साथ सुनते थे। कभी-कभी उनके मुख से प्रशंसा के उद्गार अवश्य फूट पड़ते थे, परन्तु वे किसी अलंकृत वाक्पटुता या भाषण-कौशल के कारण नहीं, बल्कि विषय की गहनता और महत्ता से उत्पन्न होते थे। नाट्यशाला में बजने वाली तालियों और व्याख्यान-सभा में व्यक्त की जाने वाली प्रशंसा के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। प्रशंसा करने की भी एक मर्यादा, शालीनता और सौंदर्य होता है।

    यदि मनुष्य ध्यानपूर्वक देखे तो प्रत्येक वस्तु किसी न किसी दूसरी वस्तु का संकेत होती है। किसी व्यक्ति के चरित्र का अनुमान उसकी अत्यन्त छोटी-से-छोटी बातों से भी लगाया जा सकता है। चरित्रहीन व्यक्ति अपने चलने के ढंग, अपनी मुद्राओं, कभी-कभी केवल एक उत्तर देने के ढंग, सिर पर उँगली फेरने की आदत या आँखें घुमाने की शैली से ही पहचाना जाता है। दुराचारी व्यक्ति उसकी हँसी से प्रकट हो जाता है। पागल व्यक्ति उसके चेहरे के भाव तथा उसके व्यवहार से पहचाना जाता है। इन सब बातों को उनके संकेतों को पढ़कर जाना जा सकता है। इसी प्रकार, यदि तुम यह देखो कि कोई व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा किस प्रकार करता है और स्वयं किस प्रकार प्रशंसा प्राप्त करता है तो तुम उसके चरित्र का भी अनुमान लगा सकते हो। जब तुम देखते हो कि चारों ओर से श्रोता किसी दार्शनिक की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं और प्रशंसकों की भीड़ उसे चारों ओर से घेरे खड़ी है तो समझ लो कि वहाँ क्या हो रहा है। वह अब वास्तविक प्रशंसा नहीं रह जाती। वह केवल तालियाँ और शोर बनकर रह जाती है। ऐसी धूमधाम और दिखावटी प्रशंसा उन कलाओं के लिए छोड़ देनी चाहिए जिनका उद्देश्य जनता का मनोरंजन करके उन्हें प्रसन्न करना है। दर्शन का स्वागत केवल श्रद्धा और सम्मान के साथ होना चाहिए।

    हमें युवाओं को उनके आवेगपूर्ण मन के अनुसार प्रतिक्रिया करने की कुछ छूट देनी होगी। पर केवल तब, जब वे वास्तव में सहज आवेग से ऐसा कर रहे हों और स्वयं को शांत रहने का आदेश देने में अभी समर्थ न हों। ऐसी प्रशंसा स्वयं श्रोताओं के लिए भी एक प्रकार की प्रेरणा का कार्य करती है। वह युवा मन में उत्साह और प्रोत्साहन उत्पन्न करती है। परन्तु उन्हें विषय की महानता से प्रभावित होना चाहिए न कि कृत्रिम और बनावटी शब्द-सज्जा से। अन्यथा वाक्पटुता उनके लिए हानिकारक सिद्ध होती है क्योंकि तब वे विषय के प्रति नहीं बल्कि केवल भाषण-कला के प्रति आकर्षित होने लगते हैं। 

    इस विषय पर मैं आगे की चर्चा अभी स्थगित करता हूँ क्योंकि यह अपने आप में विस्तृत विवेचन की माँग करता है कि जनता के सामने किस प्रकार बोलना चाहिए, उनकी उपस्थिति में स्वयं को कितनी स्वतंत्रता देनी चाहिए, और उन्हें कितनी। इसमें कोई संदेह नहीं कि दर्शन ने अपने आपको सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनाकर कुछ न कुछ खो दिया है। फिर भी उसके सबसे अंतरंग और पवित्र रहस्यों को भी लोगों के सामने प्रकट किया जा सकता है। किन्तु इसके लिए उसका प्रतिनिधि कोई व्यापारी या दिखावा करने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि एक पुजारी के समान श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा रखने वाला होना चाहिए।


अभी के लिए विदा 

चरित्र के लिए हितकारी स्थान एवं व्यवहार के संदर्भ में -- पत्र - 51 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


प्रिय लूसीलियस, जो कुछ हमारे पास है, उसी में हमें संतोष करना चाहिए। तुम्हारे वहाँ एटना है, जो सिसिली का सबसे ऊँचा और सबसे महान पर्वत है। यद्यपि मेस्साला उसे 'अद्वितीय' क्यों कहता है, यह मैं समझ नहीं पाता। या शायद यह बात वाल्गियस ने कही हो। मैंने यह दोनों के यहाँ पढ़ी है।

    बहुत-से स्थान अग्नि उगलते हैं। केवल ऊँचे पर्वत ही नहीं, यद्यपि वहाँ ऐसा अधिक होता है क्योंकि अग्नि स्वभावतः ऊपर की ओर उठती है बल्कि समतल भूमि भी ऐसा करती है। और जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं अपनी सामर्थ्य भर बाइए से ही संतोष कर लेता हूँ। मैं वहाँ पहुँचने के केवल एक दिन बाद ही उसे छोड़ आया। यद्यपि वहाँ प्रकृति ने कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान की हैं। फिर भी वह ऐसा स्थान है जिससे बचना चाहिए। इसका कारण यह है कि विलासिता और भोग-विलास ने उसे अपने उत्सवों और मौज-मस्ती का नगर बना लिया है।

    “तुम क्या कह रहे हो? क्या ऐसा भी कोई स्थान है जिससे हमें विरक्ति घोषित कर देनी चाहिए?” नहीं। परन्तु जिस प्रकार कुछ वस्त्र बुद्धिमान और सदाचारी व्यक्ति के लिए अन्य वस्त्रों की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होते हैं, जिस प्रकार वह किसी भी रंग से घृणा नहीं करता, फिर भी कुछ रंगों को उस व्यक्ति के लिए कम उपयुक्त मानता है, जिसने सादगी और मितव्ययिता का जीवन अपनाने का संकल्प लिया है, उसी प्रकार कुछ ऐसे स्थान भी होते हैं जिनसे बुद्धिमान व्यक्ति या वह जो बुद्धिमत्ता की ओर अग्रसर है, इसलिए बचता है क्योंकि वे उत्तम चरित्र के विकास के अनुकूल नहीं होते।


मलेशिया की पारंपरिक कला- होलिडिफाई 

    इस प्रकार, जो व्यक्ति एकांतवास के लिए किसी स्थान का चयन करेगा, वह कभी कैनोपस को नहीं चुनेगा। यद्यपि कैनोपस किसी को सादा जीवन जीने से नहीं रोकता। उसी प्रकार वह बाइए को भी नहीं चुनेगा क्योंकि वह दुर्गुणों का अड्डा बन चुका है। वहाँ भोग-विलास अपने को और अधिक छूट दे देता है, मानो उस स्थान के विशेष अधिकार के कारण वहाँ वह स्वयं को पूरी तरह उन्मुक्त छोड़ देता हो।

    हमें ऐसा वातावरण चुनना चाहिए जो केवल हमारे शरीर के लिए ही नहीं बल्कि हमारे चरित्र के लिए भी हितकारी हो। जिस प्रकार मैं जल्लादों के बीच रहना नहीं चाहूँगा, उसी प्रकार मैं मदिरालयों के बीच भी नहीं रहना चाहूँगा। मुझे यह सब देखने की क्या आवश्यकता है। समुद्रतट पर लड़खड़ाते हुए शराबी, नाविकों के उन्मत्त उत्सव, बाजों और वाद्ययंत्रों की ध्वनि से गूँजते हुए सरोवर और वे सब दृश्य जिन्हें निरंकुश भोग-विलास न केवल करता है बल्कि खुलेआम प्रदर्शित भी करता है?

    हमें यथासंभव अपने और दुर्गुणों के लिए उकसाने वाली हर चीज़ के बीच दूरी बनाए रखनी चाहिए। हमें अपने मन को दृढ़ बनाना चाहिए और उसे सुख-भोग के प्रलोभनों से दूर रखना चाहिए। वहाँ बिताई गई केवल एक ही शीत ऋतु ने हैनिबल को दुर्बल बना दिया। जिस व्यक्ति को आल्प्स के हिमाच्छादित पर्वत पराजित नहीं कर सके, वही कैंपानिया के भाप-स्नानागारों ने निर्बल कर दिया। वह युद्धभूमि में विजयी था परन्तु दुर्गुणों के हाथों पराजित हो गया।

    हमें भी अभियान पर निकले सैनिकों के समान जीवन जीना चाहिए। ऐसे अभियान पर जिसमें न विश्राम का अवसर है और न ही अवकाश का। विशेष रूप से, हमें इन्द्रिय-सुखों पर विजय प्राप्त करनी है क्योंकि जैसा कि तुम देखते हो, उन्होंने कभी-कभी सबसे अधिक युद्धप्रिय और वीर स्वभाव वाले लोगों को भी अपना बंदी बना लिया है। यदि हम अपने कार्य की विशालता पर विचार करें तो समझ जाएँगे कि विलासपूर्ण और फैशनेबल जीवन हमारा मार्ग नहीं हो सकता। गरम स्नानागारों से मेरा क्या प्रयोजन? उन भाप से भरे कक्षों से मुझे क्या लेना-देना जिनका उद्देश्य केवल शरीर की शक्ति को निचोड़ देना है? हमारा सारा पसीना तो परिश्रम से बहना चाहिए। यदि हम भी हैनिबल की तरह अपने कार्यों को बीच में छोड़ दें, अपने संघर्ष को भूल जाएँ और अपना समय केवल शरीर को आराम और लाड़-प्यार देने में लगाने लगें तो हर व्यक्ति हमें ऐसे अनुचित समय के आलस्य के लिए दोष देगा। उसका दोष देना उचित भी होगा। ऐसा आलस्य तो एक विजेता के लिए भी घातक है। फिर उस व्यक्ति के लिए कितना अधिक जो अभी विजय प्राप्त करने के मार्ग पर ही है।

    भाग्य मेरे विरुद्ध युद्ध कर रहा है फिर भी मैं उसकी आज्ञा का पालन नहीं करूँगा। मैं उसका जुआ अपने ऊपर नहीं उठाऊँगा। बल्कि मैं उससे भी अधिक साहस का कार्य करूँगा। मैं उस जुए को अपने ऊपर से उतार फेंकूँगा। मेरे मन को दुर्बल नहीं होने देना चाहिए। यदि मैं सुख-भोग के सामने झुक गया तो मुझे पीड़ा, कठिन परिश्रम और निर्धनता के सामने भी झुकना पड़ेगा। महत्त्वाकांक्षा भी मुझ पर अपना वही अधिकार जताएगी और क्रोध भी। इतने सारे आवेगों के अधीन होकर मैं कभी एक दिशा में तो कभी दूसरी दिशा में खिंचता रहूँगा बल्कि, अंततः मैं टुकड़े-टुकड़े हो जाऊँगा। हमारे लिए तो कार्थेज के सैनिकों की अपेक्षा भी कम छूट है। यदि हम पराजित होकर इन्द्रिय-सुखों के आगे झुक जाएँ तो हमारा संकट अधिक बड़ा है। यदि हम दृढ़ बने रहें, तब भी हमारा परिश्रम उनसे कहीं अधिक कठिन है।    

    हमारे सामने स्वतंत्रता का लक्ष्य रखा हुआ है। उसी पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं। क्या तुम पूछते हो कि स्वतंत्रता क्या है? स्वतंत्रता यह है— किसी भी वस्तु की दासता स्वीकार न करना, न किसी बाध्यता की, न ही संयोगवश घटने वाली घटनाओं की बल्कि भाग्य का सामना समान स्तर पर करना। जिस दिन मुझे यह लगेगा कि भाग्य की शक्ति मुझ पर अत्यधिक भारी पड़ रही है, उसी दिन उसकी वह शक्ति मेरे लिए समाप्त हो जाएगी। जब मृत्यु सदैव मेरे हाथ की पहुँच में है, तब मुझे भाग्य का अत्याचार क्यों सहना चाहिए?

    जो व्यक्ति ऐसे विचारों को गंभीरता से अपनाता है, उसे ऐसे स्थानों का चुनाव करना चाहिए जो संयम और शुद्ध जीवन के अनुकूल हों। अत्यधिक आराम मनुष्य के मन को निर्बल और स्त्रैण बना देता है। केवल स्थान का प्रभाव भी निस्संदेह किसी की शक्ति को नष्ट करने की क्षमता रखता है। जिन भारवाही पशुओं के खुर कठोर भूमि पर चलने से मजबूत हो गए हैं, वे किसी भी मार्ग पर चल सकते हैं। परन्तु जो कोमल घास के मैदानों में पलकर मोटे-ताज़े हुए हैं, वे शीघ्र ही लँगड़ा जाते हैं। जो सैनिक दुर्गम और ऊबड़-खाबड़ प्रदेशों में तैनात रहा है, वह और अधिक सशक्त बन जाता है जबकि नगर में रहने वाला व्यक्ति आलसी हो जाता है। जिन हाथों ने हल की मूठ पकड़ने के बाद सीधे तलवार की मूठ थामी है, वे हर प्रकार का कार्य करने में सक्षम होते हैं। परन्तु जिन हाथों की चमक केवल मैनीक्योर और मालिश से आई है, वे ज़रा-सी गंदगी लगते ही काम छोड़ देते हैं।

    कुछ स्थानों का कठोर अनुशासन मनुष्य के मन को दृढ़ बनाता है और उसे महान कार्यों के योग्य बना देता है। लिटर्नम में स्पिओ (Scipio) का निर्वासन, बाइए में होता तो जितना सम्मानजनक न होता, उससे कहीं अधिक सम्मानजनक था। इतनी बड़ी पतनावस्था को इतना कोमल आश्रय नहीं मिलना चाहिए था। यह सत्य है कि गैउस मरीअस (Gaius Marius), ग्नाउस पोमपेई (Gnaeus Pompey) और जूलियस सीजर (Julius Caesar), वे सभी महान सेनानायक, जिन पर भाग्य ने रोमन जनता के समस्त संसाधनों की वर्षा की थी। उन्होंने भी बाइए के निकट अपने निवास-स्थान बनवाए थे। किन्तु उन्होंने उन्हें पहाड़ियों की चोटियों पर बनवाया क्योंकि सेनापति होने के नाते उन्हें यह अधिक उपयुक्त प्रतीत होता था कि वे ऐसी ऊँचाई पर रहें जहाँ से नीचे के समस्त प्रदेशों पर दृष्टि रखी जा सके। उनके द्वारा चुने गए स्थानों और निर्मित भवनों को ध्यान से देखो, तब तुम्हें समझ में आ जाएगा कि वे केवल विलास-भवन नहीं थे बल्कि दुर्ग थे।

    क्या तुम्हें लगता है कि मार्कस कैटो (Marcus Cato) कभी वहाँ रहना पसंद करते? किसलिए? क्या इसलिए कि वे वहाँ से नौकाओं में घूमती हुई व्यभिचारिणी स्त्रियों को देखते रहें, भिन्न-भिन्न रंगों से सजी असंख्य मनोरंजन-नौकाओं को निहारें अथवा सरोवर की सतह पर तैरते हुए गुलाबों को देखते रहें? क्या इसलिए कि वे प्रत्येक रात संगीतकारों के कोलाहल को सुनते रहें? क्या वे इसके बजाय अपने ही हाथों से केवल एक रात के उपयोग के लिए खोदी गई किसी साधारण खाई या सैनिक शिविर की परिखा में ठहरना अधिक पसंद न करते? भला कौन-सा सच्चा पुरुष ऐसा होगा जो अपनी नींद भंग करने के लिए किसी मधुर संगीत-सभा की अपेक्षा रणभेरी बजाने वाले सैनिक को अधिक पसंद न करे?

खैर, बाइए के साथ मेरा यह विवाद यहीं समाप्त होता है। यद्यपि उसके दुर्गुणों की मैं जितनी भी निंदा करूँ, वह कभी पर्याप्त नहीं होगी। प्रिय लूसीलियस, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि इन दुर्गुणों का बिना किसी सीमा और बिना किसी अंत के पीछा करो और उनका विरोध करते रहो क्योंकि वे स्वयं भी असीम और अनंत हैं। अपने भीतर से प्रत्येक उस दोष को निकाल फेंको जो तुम्हारे हृदय को घायल करता है। यदि किसी अन्य उपाय से उन्हें दूर न कर सको तो उन दोषों सहित अपने हृदय को ही उखाड़ फेंको। सबसे बढ़कर, इन्द्रिय-सुखों को अपने जीवन से दूर कर दो। उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझो। वे उन डाकुओं के समान हैं जिन्हें मिस्रवासी 'स्वीटहार्ट्स' कहते हैं, वे पहले हमें प्रेमपूर्वक आलिंगन में बाँधते हैं और फिर उसी आलिंगन में हमारा गला घोंट देते हैं।


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Tuesday, 7 July 2026

मन के विकार को दूर करने के संदर्भ में -- पत्र - 50 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


चूँकि तुम्हारा पत्र मुझे उसके भेजे जाने के कई महीनों बाद प्राप्त हुआ इसलिए मैंने पत्रवाहक से यह पूछना उचित नहीं समझा कि तुम कैसे हो। इतनी लंबी अवधि के बाद वह यदि कुछ बता भी पाता तो उसके लिए असाधारण स्मरण-शक्ति की आवश्यकता होती! किन्तु मुझे आशा है कि अब तुम इस प्रकार जीवन जी रहे हो कि तुम जहाँ कहीं भी हो, मुझे यह ज्ञात रहे कि तुम कैसे हो। आख़िर तुम्हारा और कौन-सा प्रयत्न होना चाहिए, सिवाय इसके कि तुम प्रतिदिन स्वयं को पहले से बेहतर मनुष्य बनाओ। प्रतिदिन किसी-न-किसी दोष का परित्याग करो। यह समझो कि जिन बातों को तुम अपनी परिस्थितियों की कमियाँ समझते हो, वे वास्तव में तुम्हारे अपने ही दोष हैं।


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    क्योंकि हम प्रायः उन दोषों के लिए समय और स्थान को दोषी ठहराते हैं जो वास्तव में जहाँ भी हम जाएँ, हमारे साथ ही चलते रहते हैं। तुम जानते हो कि मेरी पत्नी के पास हारपास्टे नाम की एक विदूषी स्त्री है, जो बहुत समय से हमारे घर में पैतृक आश्रिता के रूप में रह रही है। (मुझे ऐसे लोगों से, जिन्हें केवल मनोरंजन के लिए रखा जाता है, अत्यन्त अरुचि है। यदि मुझे कभी किसी मूर्ख पर हँसने की इच्छा होती है तो मुझे दूर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैं स्वयं पर ही हँस लेता हूँ।) तो हुआ यह कि वह विदूषी स्त्री अचानक अपनी दृष्टि खो बैठी। जो बात मैं कह रहा हूँ, उस पर विश्वास करना कठिन है। किन्तु यह बिल्कुल सत्य है। उसे यह तक मालूम नहीं कि वह अंधी हो चुकी है। वह बार-बार अपनी परिचारिका से कमरा बदलने के लिए कहती रहती है और शिकायत करती है कि उसका कमरा पर्याप्त प्रकाशयुक्त नहीं है।

    तुम भली-भाँति समझ सकते हो कि जिस बात पर हम उसके प्रसंग में हँसते हैं, वही बात हम सबके साथ भी घटती है। कोई भी यह नहीं समझता कि वह लोभी है या धनलोलुप। कम-से-कम अंधे लोग तो किसी मार्गदर्शक की माँग करते हैं। पर हम बिना किसी मार्गदर्शक के भटकते रहते हैं और कहते हैं,“मैं महत्वाकांक्षी नहीं हूँ। रोम में रहने का यही ढंग है।” “मैं फिजूलखर्च नहीं हूँ। बड़े नगर में रहने के लिए कुछ विशेष खर्च तो करने ही पड़ते हैं।” “यह मेरी गलती नहीं कि मुझे शीघ्र क्रोध आ जाता है या अभी तक मैंने जीवन की कोई स्थिर दिशा नहीं बनाई। यह तो युवावस्था का स्वाभाविक व्यवहार है।” हम स्वयं को क्यों धोखा देते हैं? हमारा रोग हमारे बाहर नहीं है। वह हमारे भीतर, हमारे प्राणों की गहराई तक समाया हुआ है। हमारे स्वस्थ होने में इतनी कठिनाई इसलिए आती है कि हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम रोगग्रस्त हैं। हमारे रोग असंख्य हैं और अत्यन्त गंभीर भी। यदि हम उनका उपचार प्रारम्भ भी कर दें, तब भी उनसे पूरी तरह मुक्त होने में कितना समय लग सकता है! परन्तु अभी तो स्थिति यह है कि हमने डॉक्टर की खोज भी आरम्भ नहीं की है।

    और हमारा यह रोग अभी-अभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यदि ऐसा होता तो इसका उपचार अपेक्षाकृत सरल होता। डॉक्टर हमें सही मार्ग दिखा देता। हमारे मन, जो अभी युवा और ग्रहणशील होते, उसका अनुसरण कर लेते। यदि आज हमें अपने स्वाभाविक मार्ग पर लौटाना कठिन हो गया है तो उसका कारण केवल यह है कि हम स्वयं उस मार्ग को छोड़ चुके हैं। मानसिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए शिक्षा ग्रहण करने में हमें लज्जा आती है। परन्तु, ईश्वर के लिए बताओ, इतने महान गुण की प्राप्ति के लिए शिक्षा लेना भला कैसी लज्जा की बात है? क्योंकि यह आशा करना व्यर्थ है कि ऐसा गुण संयोगवश स्वयं हमारे भीतर उत्पन्न हो जाएगा। इसके लिए परिश्रम करना ही पड़ता है। किन्तु यह परिश्रम कठिन नहीं होता, बशर्ते कि हम समय रहते आरम्भ कर दें। जैसा कि मैंने कहा है, अपने मन को उसके विकार गहरे जड़ पकड़ने से पहले ही गढ़ना और सीधा करना शुरू कर दें।

    फिर भी, जब ये विकार गहराई तक जड़ जमा चुके हों, तब भी मैं निराश नहीं होता। निरंतर और एकाग्र प्रयास किसी भी प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। बलूत की लकड़ियों को चाहे वे कितनी ही टेढ़ी-मेढ़ी क्यों न हो गई हों, सीधा किया जा सकता है। टेढ़े वृक्ष-तनों को गर्मी देकर मोड़ा जाता है और उनके स्वाभाविक आकार को बदलकर उन्हें वैसा रूप दिया जाता है जैसा हम चाहते हैं। तो फिर मन के लिए अपने को नया रूप देना कितना अधिक सरल है! मन तो किसी भी द्रव से अधिक लचीला और अधिक सहजता से ढलने वाला है। आख़िर मन है ही क्या? वह तो एक विशेष प्रकार से व्यवस्थित प्राणवायु (श्वास) मात्र है। तुम देखते ही हो कि वायु, अन्य किसी भी पदार्थ से अधिक हल्की होने के कारण, उसी अनुपात में सबसे अधिक परिवर्तनशील और अनुकूलनशील भी होती है।

    यह सत्य है कि इस समय हमारे भीतर दोषों का निवास है। वे बहुत लंबे समय से हमारे भीतर बसे हुए हैं। फिर भी, प्रिय लूसीलियस, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम्हें आशा छोड़ देनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति पहले दोषपूर्ण हुए बिना उत्कृष्ट चरित्र का स्वामी नहीं बनता। हम सब पहले ही दोषों के वश में आ चुके हैं और सद्गुण सीखने का अर्थ है— अपने दोषों को भूलना और उनसे मुक्त होना। फिर भी, जब हम अपने आत्म-संशोधन के कार्य में लगते हैं तो हमें उत्साह बनाए रखना चाहिए। क्योंकि एक बार जब सद्गुण वास्तव में हमारे अधिकार में आ जाता है तब वह सदा के लिए हमारा हो जाता है। सद्गुण को फिर भुलाया नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जो गुण किसी वस्तु के स्वभाव के अनुरूप नहीं होते, वे वहाँ स्थिर नहीं रह पाते। इसलिए उन्हें हटाया और त्यागा जा सकता है। परन्तु जो वस्तु अपने स्वाभाविक स्थान पर आ जाती है, वह वहीं दृढ़तापूर्वक स्थिर रहती है। सद्गुण हमारे स्वभाव के अनुरूप है जबकि दोष हमारे स्वभाव के प्रतिकूल हैं।

    किन्तु जैसे एक बार प्राप्त हो जाने पर सद्गुण हमें छोड़कर नहीं जाते और उन्हें बनाए रखना सरल हो जाता है, वैसे ही उन्हें प्राप्त करने की शुरुआत करना कठिन होता है। क्योंकि दुर्बल और रोगग्रस्त मन की यह विशेषता होती है कि वह उस वस्तु से भयभीत रहता है जिसका उसने अभी तक अनुभव नहीं किया है। इसलिए उसे प्रारम्भ करने के लिए मानो बाध्य करना पड़ता है। परन्तु एक बार आरम्भ हो जाने पर यह औषधि कड़वी नहीं लगती बल्कि जैसे-जैसे वह रोग का उपचार करती है, वैसे-वैसे आनंद भी प्रदान करती है। अन्य प्रकार की चिकित्सा में सुख उपचार के बाद प्राप्त होता है। किन्तु दर्शन का उपचार एक साथ ही औषधि भी है और आनंद भी।


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समय की गति के संदर्भ में -- पत्र - 49 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


बिलकुल सही कहा, प्रिय लूसीलियस। यदि कोई व्यक्ति किसी मित्र को केवल तब याद करे जब कोई विशेष स्थान उसे उसकी याद दिलाए तो यह उसकी उपेक्षा और लापरवाही का संकेत है। किन्तु कभी-कभी परिचित स्थान हमारे मन में छिपी हुई आकांक्षा को जगा देते हैं। वे ऐसी स्मृति को पुनर्जीवित नहीं करते जो पूरी तरह मिट चुकी हो बल्कि उस स्मृति को आंदोलित करते हैं जो केवल शांत अवस्था में पड़ी थी। यह उसी प्रकार है जैसे किसी परिवार का शोक जो समय के साथ कुछ कम हो गया हो, फिर से ताज़ा हो उठता है जब वे किसी दास-बच्चे को, किसी वस्त्र को या उस घर को देखते हैं जो उस दिवंगत व्यक्ति का प्रिय हुआ करता था।


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    यह रहा कैम्पानिया और यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि इस प्रदेश ने, विशेषकर नेपल्स और तुम्हारे प्रिय पोम्पेई ने, मुझे एक बार फिर तुम्हारी उपस्थिति की तीव्र इच्छा से भर दिया है। मुझे ऐसा लगता है मानो तुम्हारा प्रत्येक रूप मेरी आँखों के सामने उपस्थित हो। अभी भी ऐसा प्रतीत होता है कि मैं तुमसे विदा ले रहा हूँ। मैं तुम्हें आँसू रोकने का प्रयास करते हुए देख रहा हूँ। उन भावनाओं को व्यर्थ ही दबाने का प्रयास करते हुए जिन्हें दबाया नहीं जा सकता। ऐसा लगता है मानो अभी-अभी ही मैंने तुम्हें खोया हो।

    क्योंकि स्मरण हर बात को मानो 'अभी-अभी' घटित हुई बना देता है, है न? अभी-अभी तो मैं दार्शनिक सोतियोन के घर में बैठा एक बच्चा था। अभी-अभी मैंने न्यायालय में मुक़दमे लड़ना शुरू किया था। अभी-अभी मेरा उनमें रुचि लेना समाप्त हुआ। और अभी-अभी मैं उन्हें लड़ने में असमर्थ भी हो गया। समय की गति असीम है। यह बात सबसे अधिक तब स्पष्ट होती है जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं। क्योंकि यद्यपि समय अत्यन्त तीव्र वेग से भागता है फिर भी वह इतनी सहजता से बीत जाता है कि जो लोग केवल वर्तमान क्षण में ही तल्लीन रहते हैं। उन्हें उसके बीतने का आभास तक नहीं होता।

    क्या तुम इसका कारण पूछते हो? बीता हुआ समस्त समय एक ही स्थान पर स्थित है। हम उसे एक साथ देख सकते हैं। सब कुछ एक ही अथाह गर्त में गिरता चला जा रहा है। फिर, जो वस्तु समग्र रूप से ही इतनी संक्षिप्त हो, उसके भीतर बहुत लंबे अंतराल कैसे हो सकते हैं? हमारा जीवन तो एक बिंदु के समान है बल्कि बिंदु से भी छोटा। फिर भी प्रकृति ने इस अत्यल्प बिंदु को अधिक विस्तृत होने का भ्रम देकर मानो हमारा उपहास किया है। उसने इसका एक भाग शैशव बनाया, दूसरा बाल्यावस्था, तीसरा युवावस्था,। युवावस्था और वृद्धावस्था के बीच की ढलान-सी अवस्था और पाँचवाँ स्वयं वृद्धावस्था। इतने छोटे से जीवन में कितने अधिक पड़ाव बना दिए गए हैं! अभी-अभी तो मैंने तुम्हें विदा किया था। फिर भी यह 'अभी-अभी' हमारे जीवन का एक अच्छा-खासा भाग अपने भीतर समेटे हुए है। आओ, हम सदैव स्मरण रखें कि हमारा जीवन कितना छोटा है और कितनी शीघ्र समाप्त हो जाएगा। पहले समय मुझे इतना तीव्र गति से बीतता हुआ नहीं लगता था। पर अब उसकी रफ़्तार मुझे विस्मित कर देती है। चाहे इसलिए कि मुझे अपनी मंज़िल निकट आती दिखाई दे रही है या इसलिए कि मैंने अब यह ध्यान देना और हिसाब लगाना शुरू कर दिया है कि मैंने कितना समय खो दिया है।

    इसी कारण मुझे और भी अधिक आक्रोश होता है कि जहाँ समय का अत्यन्त सावधानी से किया गया प्रबन्ध भी हमारी आवश्यकताओं के लिए उसे पर्याप्त लंबा नहीं बना सकता, वहीं कुछ लोग अपने जीवन का अधिकांश भाग तुच्छ और अनावश्यक बातों में नष्ट कर देते हैं। सिसेरो का कहना था कि यदि उन्हें अपने जीवन का दुगुना समय भी मिल जाए, तब भी वह गीतिकाव्य के कवियों को पढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। मैं तर्कशास्त्रियों को भी उसी श्रेणी में रखता हूँ। बल्कि वे तो अपनी मूर्खता में और भी अधिक गंभीर हैं। कवि तो जान-बूझकर मनोरंजन और हल्केपन के लिए लिखते हैं परन्तु ये तर्कशास्त्री यह समझते हैं कि वे कोई बहुत महान कार्य कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहता कि ऐसी बातों पर बिल्कुल दृष्टि ही न डाली जाए। किन्तु उन्हें केवल एक सरसरी निगाह से देखना चाहिए, मानो द्वार पर खड़े होकर किसी का अभिवादन कर लिया जाए। बस इतना ही कि हम उनके छलावे में न आ जाएँ और यह न मान बैठें कि उनके कार्यों में कोई गहरा या रहस्यमय महत्व छिपा हुआ है।

    तुम उस प्रश्न के कारण अपने आपको क्यों कष्ट और विनाश की ओर ले जा रहे हो? उस प्रश्न का समाधान करने की अपेक्षा उसका उपहास करना ही अधिक बुद्धिमानी होगी। सूक्ष्म और तुच्छ बातों में गहराई तक उतरना उसी व्यक्ति का काम है जिसे किसी बात की चिंता न हो और जो अपनी ही सुविधा के अनुसार जीवन व्यतीत करता हो। लेकिन जब शत्रु तुम्हें पीछे हटने पर विवश कर रहा हो, जब सेना को आगे बढ़ने का आदेश मिल चुका हो, तब आवश्यकता उन सब वस्तुओं को छोड़ देती है जिन्हें शांति और अवकाश ने बड़े परिश्रम से एकत्र किया था। मेरे पास इतना भी समय नहीं है कि मैं शब्दों के दोहरे अर्थों के पीछे भागूँ और उन पर अपनी बुद्धि का कौशल दिखाने में उसे व्यर्थ नष्ट करूँ।

    “देखो, समस्त जनसमुदाय एकत्र हो चुका है, ऊँची प्राचीरों पर लोग अपने शस्त्रों की धार तेज कर रहे हैं और नगर के द्वार बंद कर दिए गए हैं।”

    चारों ओर युद्ध का शोर और हथियारों की टकराहट गूँज रही है। ऐसे समय मुझे अपना ध्यान साहस पर केंद्रित करना चाहिए। यदि घेराबंदी के बीच, जब स्त्रियाँ और वृद्ध दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर पहुँचा रहे हों, जब युवा सैनिक फाटकों के भीतर एकत्र खड़े हों और बाहर निकलकर युद्ध करने के संकेत की प्रतीक्षा ही नहीं, बल्कि उसकी उत्कंठा से याचना भी कर रहे हों, जब शत्रु के भाले नगर के द्वारों के भीतर तक आकर गिर रहे हों और हमारे पैरों के नीचे की धरती सुरंगें खोदने और किले की नींव कमजोर करने के कारण काँप रही हो... ऐसे समय मैं बैठा-बैठा इस प्रकार की छोटी-छोटी पहेलियाँ बुझाने लगूँ तो हर कोई मुझे पागल समझेगा। वे बिल्कुल सही होंगे।

“जो तुमने नहीं खोया है, वह तुम्हारे पास है।
तुमने अपने सींग नहीं खोए हैं।
अतः तुम्हारे सींग हैं।”

या फिर इसी प्रकार की कोई और बौद्धिक विक्षिप्तता!

    फिर भी, यदि मैं ऐसी बातों में अपना समय नष्ट करूँ तो तुम्हें मुझे उतना ही पागल समझने की अनुमति है जितना वे लोग उस व्यक्ति को समझते। क्योंकि वास्तव में इस समय मैं भी घिरा हुआ हूँ। उस दूसरे प्रसंग में तो बाहरी शत्रु से ही खतरा था। मेरे और शत्रु के बीच एक दीवार थी। परन्तु मेरी स्थिति में प्राणघातक संकट तो यहीं मेरे साथ उपस्थित हैं। मेरे पास ऐसी मूर्खताओं में समय गँवाने का अवसर नहीं है। मेरे सामने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य उपस्थित है।

    मैं किस काम में लगा हूँ? मृत्यु मेरा पीछा कर रही है और जीवन पीछे हटता जा रहा है। मुझे वह शिक्षा दो जो इसके विरुद्ध मेरे काम आ सके! मुझे ऐसा बनाओ कि मैं अब मृत्यु से भागता न फिरूँ। जीवन भी मुझसे यूँ ही फिसलकर न निकल जाए। जो कठिन है उसका सामना करने का साहस दो और जिसे टाला नहीं जा सकता उसे शांतचित्त होकर स्वीकार करने की धैर्यपूर्ण स्थिरता प्रदान करो। मेरे शेष जीवन की संकीर्ण सीमाओं को विस्तृत कर दो। मुझे यह सिखाओ कि जीवन की श्रेष्ठता उसकी लंबाई पर नहीं बल्कि उसके सदुपयोग पर निर्भर करती है। यह भी कि किसी व्यक्ति का जीवन बहुत लंबा होकर भी वस्तुतः जीवन न के बराबर हो सकता है। जब मैं सोने जाऊँ, तब मुझसे कहो, “संभव है, तुम फिर कभी न जागो।” और जब मैं जागूँ, तब कहो, “संभव है, अब तुम फिर कभी न सोओ।” जब मैं घर से बाहर निकलूँ, तब कहो, “संभव है, तुम लौटकर न आओ।” और जब मैं लौट आऊँ, तब कहो, “संभव है, अब तुम फिर कभी बाहर न निकलो।” यदि तुम यह सोचते हो कि केवल जहाज़ पर ही “जीवन और मृत्यु के बीच मात्र एक इंच का अंतर होता है”, तो तुम भूल करते हो। यह दूरी हर स्थान पर समान है। जहाज़ पर मृत्यु हमारी आँखों के सामने दिखाई देती है, पर वास्तव में वह हर जगह उतनी ही निकट रहती है।

    इन भ्रमों के अंधकार को मेरे लिए दूर कर दो, तब तुम मुझे वे शिक्षाएँ कहीं अधिक सरलता से दे सकोगे जिन्हें ग्रहण करने के लिए मैं स्वयं को तैयार कर रहा हूँ। प्रकृति ने हमें शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता के साथ उत्पन्न किया है। उसने हमें बुद्धि प्रदान की है जो यद्यपि पूर्ण नहीं है, फिर भी उसे पूर्णता की ओर विकसित किया जा सकता है। मुझे न्याय का उपदेश दो, कर्तव्यपरायणता का, मितव्ययिता का और संयम का। संयम के दोनों रूपों का, एक वह, जो दूसरे के शरीर से दूर रहने की मर्यादा सिखाता है और दूसरा वह, जो अपने ही शरीर की पवित्रता और मर्यादा की रक्षा करना सिखाता है। बस मुझे मेरे मार्ग से मत भटकाओ। तब मैं अपने लक्ष्य तक कहीं अधिक सरलता से पहुँच जाऊँगा। क्योंकि, जैसा कि एक त्रासदी-कवि ने कहा है, “सत्य की वाणी सरल होती है।”

और इसी कारण हमें बातों को अनावश्यक रूप से जटिल नहीं बनाना चाहिए। ऐसी कुतर्कपूर्ण पहेलियाँ तो केवल शब्दों के जाल हैं। महान उद्देश्यों में लगे हुए मन के लिए उनसे अधिक अनुपयुक्त और कुछ नहीं हो सकता।


अभी के लिए विराम 

विदा 

मन की शांति के संदर्भ में -- पत्र - 55 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस  अभी-अभी मैं पालकी की सवारी करके लौटा हूँ। मैं उतना ही थक गया हूँ, मानो जितनी देर मैं बैठा रहा, उतनी ही देर पैदल चला होता। ल...