Tuesday, 23 June 2026

दर्शन द्वारा मन को उत्कृष्ट बनाने के संदर्भ में -- पत्र - 17

प्रिय लूसीलियस 

यदि तुम बुद्धिमान हो या बुद्धिमान बनना चाहते हो तो इन सबको फेंक दो। अपनी पूरी गति और अपनी पूरी शक्ति के साथ मन की उत्कृष्टता की ओर बढ़ो। यदि कोई चीज़ तुम्हें रोक रही हो तो उसकी गाँठ खोल दो और यदि वह न खुले तो उसे काट दो।



    “जो मुझे रोक रहा है,” तुम कहते हो, “वह मेरा पारिवारिक व्यवसाय है। मैं उसे इस प्रकार व्यवस्थित कर देना चाहता हूँ कि जब मैं स्वयं निष्क्रिय रहूँ तब भी वह मेरा भरण-पोषण कर सके ताकि न तो गरीबी मेरे लिए बोझ बने और न मैं किसी और के लिए।” जब तुम यह कहते हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि जिस शुभ वस्तु को तुम लक्ष्य बना रहे हो उसके अर्थ और शक्ति को तुम पूरी तरह नहीं समझते। तुम सामान्य रूप से यह तो समझते हो कि दर्शन कितने महान लाभ प्रदान करता है पर तुम इसकी सूक्ष्म बातों को नहीं देख पाते कि वह हमारे प्रत्येक प्रयत्न में कितनी सहायता करता है। वह केवल हमारे बड़े कार्यों को ही, जैसा कि सिसेरो कहता है, “सुगम” नहीं बनाता बल्कि हमारी सबसे छोटी आवश्यकताओं तक का भी ध्यान रखता है। मेरा विश्वास करो। दर्शन को अपना पक्षधर बना लो। वह तुम्हें यह समझाएगा कि अपनी हिसाब-किताब की पुस्तकों पर अधिक समय तक झुके रहना उचित नहीं है।

    निस्संदेह तुम्हारा उद्देश्य और तुम्हारे इस विलंब का कारण, यह सुनिश्चित करना है कि तुम्हें गरीबी का भय न रहे लेकिन यदि गरीबी वास्तव में ऐसी वस्तु हो जिसे अपनाया जाना चाहिए, तब? अनेक लोगों ने पाया है कि धन-दौलत दार्शनिक जीवन के मार्ग में बाधा बन जाती है जबकि गरीबी बंधनों से मुक्त और निश्चिंत होती है। जब युद्ध का बिगुल बजता है तो गरीब जानता है कि आक्रमण उसी पर नहीं हो रहा। जब आग लगने का शोर उठता है तो वह अपने सामान की नहीं, बाहर निकलने के मार्ग की तलाश करता है। जब किसी गरीब को यात्रा पर निकलना होता है तो बंदरगाह पर कोई कोलाहल नहीं होता, न समुद्र-तट पर उसके पीछे दौड़ती भीड़ होती है, न किसी एक व्यक्ति की सेवा में लगे असंख्य परिचारक होते हैं न दासों का ऐसा झुंड खड़ा होता है कि उन्हें खिलाने के लिए विदेशी देशों की उपज की आवश्यकता पड़े। कुछ ही पेटों को भरना एक सरल काम है, विशेषकर तब जब वे अच्छे से प्रशिक्षित हों और केवल तृप्त होने की इच्छा रखते हों। भूख सस्ती होती है। महँगी तो जिह्वा की चंचलता होती है। गरीबी तत्काल आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट हो जाती है।

    तो फिर तुम ऐसे साथी को अपनाने से क्यों इंकार करते हो जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करना धनवानों के लिए भी बुद्धिमानी की बात है? यदि तुम अपने मन के लिए समय चाहते हो तो या तो गरीब बनो या गरीबों जैसा जीवन जीने लगो। मितव्ययिता के प्रति कुछ चिंता के बिना अध्ययन लाभदायक नहीं हो सकता और मितव्ययिता वास्तव में स्वेच्छा से स्वीकार की गई गरीबी ही है। इसलिए अपने बहाने छोड़ दो। “मेरे पास अभी पर्याप्त नहीं है। जब मैं एक निश्चित मात्रा में धन इकट्ठा कर लूँगा तब मैं स्वयं को पूरी तरह दर्शन के लिए समर्पित कर दूँगा।” किन्तु जिस वस्तु को तुम्हें सबसे पहले प्राप्त करना चाहिए, वही तो है जिसे तुम टाल रहे हो। वही तो तुम्हारी सूची में सबसे नीचे पड़ी है। आरम्भ तुम्हें वहीं से करना चाहिए। तुम कहते हो, “मैं अपने जीवन-निर्वाह के लिए कुछ व्यवस्था कर लेना चाहता हूँ।” जब तुम यह कर रहे हो, तो उससे भी अधिक आवश्यक है कि तुम स्वयं को तैयार करना सीखो। यदि कोई बात तुम्हें अच्छा जीवन जीने से रोक भी दे तो भी कोई बात तुम्हें अच्छी मृत्यु पाने से नहीं रोक सकती।

    दर्शन के अभ्यास में न तो गरीबी बाधा बन सकती है और न ही अत्यन्त अभाव। जो लोग इस मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं उन्हें भूख तक सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। घेराबंदी के समय लोगों ने भूख सही है और उनके धैर्य का प्रतिफल क्या था? केवल इतना कि वे विजेता की दया पर निर्भर नहीं हुए। किन्तु यहाँ जो प्रतिज्ञा की जा रही है, वह उससे कहीं महान है। स्थायी स्वतंत्रता और किसी भी मनुष्य या देवता से भयमुक्त जीवन। क्या यह ऐसी वस्तु नहीं है जिसके लिए मनुष्य भूखा रहकर भी प्रयास करे? सेनाओं ने हर प्रकार के अभाव को सहा है। वे पौधों की जड़ों पर जीवित रही हैं। उन्होंने ऐसी चीज़ों से अपनी भूख मिटाई है जिनका नाम लेना भी घृणास्पद है। और यह सब किसलिए? प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए और इससे भी विचित्र बात यह कि किसी दूसरे व्यक्ति के प्रभुत्व के लिए! फिर कौन ऐसा होगा जो अपने मन को उन्माद और विक्षिप्त इच्छाओं से मुक्त करने के उद्देश्य से गरीबी सहने में संकोच करेगा? अतः ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम्हें पहले से प्राप्त करना आवश्यक हो। तुम दर्शन के पास बिना यात्रा-व्यय के भी पहुँच सकते हो।

    क्या वास्तव में बात ऐसी ही है? क्या तुम तभी बुद्धिमत्ता प्राप्त करना चाहोगे जब तुम्हारे पास बाकी सब कुछ भी हो जाएगा? क्या यह तुम्हारे जीवन की अंतिम आवश्यकता होगी मानो बाद में याद आने वाली कोई बात? तो फिर ऐसा करो।  यदि तुम्हारे पास कुछ संपत्ति है तो अभी दर्शन की ओर मुड़ो क्योंकि तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारे पास पहले से ही आवश्यकता से अधिक नहीं है? और यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो किसी और वस्तु को प्राप्त करने से पहले इसी को प्राप्त करने का प्रयास करो।

    “लेकिन तब मैं उन चीज़ों से वंचित हो जाऊँगा जिनकी मुझे आवश्यकता है।” सबसे पहले तो ऐसी आवश्यक वस्तुओं से वंचित होना कठिन ही है क्योंकि प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं और बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढाल लेता है। किन्तु यदि उस पर अन्तिम और चरम अभाव आ ही पड़े तो वह बहुत सहजता से जीवन को छोड़ देगा और इस प्रकार स्वयं अपने लिए बोझ बने रहना भी समाप्त कर देगा। दूसरी ओर, यदि जीवन को बनाए रखने के लिए केवल थोड़ी-सी वस्तुओं की आवश्यकता हो तो वह स्वयं को सम्पन्न मानेगा और अपने पेट तथा शरीर को उनकी आवश्यकतानुसार जो कुछ चाहिए, वह दे देगा। बिना किसी चिंता के और आवश्यकता से अधिक किसी वस्तु की परवाह किए बिना। सुखी और निश्चिंत होकर वह धनवानों के व्यस्त जीवन पर तथा धन के लिए प्रतिस्पर्धा करने वालों की भाग-दौड़ पर हँसेगा और कहेगा, “तुम अपने ही जीवन को क्यों टालते रहते हो? क्या तुम ब्याज बढ़ने की प्रतीक्षा करोगे, व्यापारिक उपक्रमों के सफल होने की प्रतीक्षा करोगे या किसी बड़े उत्तराधिकार के मिलने की प्रतीक्षा करोगे जबकि तुम इसी क्षण धनी बन सकते हो? बुद्धिमत्ता का लाभ तुरंत मिलता है। उसका धन उन सभी को प्राप्त हो जाता है जिनके लिए धन अब महत्वहीन प्रतीत होने लगा है।”

    यह बात दूसरों पर अधिक लागू होती है क्योंकि तुम तो सम्पन्न लोगों की श्रेणी के अधिक निकट हो। यदि युग बदल भी जाए तब भी तुम्हारे पास आवश्यकता से अधिक है। किन्तु “पर्याप्त” क्या है, यह हर युग में एक ही रहता है।

    मैं यहीं इस पत्र को समाप्त कर सकता था, यदि मैंने तुम्हें इस प्रकार अभ्यस्त न बना दिया होता। पार्थियन राजाओं का अभिवादन बिना भेंट चढ़ाए नहीं किया जाता और तुम्हें भी बिना कुछ दिए विदा नहीं किया जा सकता। तो क्या दिया जाए? मैं एपिक्यूरस से एक उधार लिया हुआ वचन प्रस्तुत करता हूँ,  “बहुत-से लोगों के लिए धन की प्राप्ति कष्टों का अंत नहीं होती बल्कि कष्टों की एक नई श्रृंखला की शुरुआत होती है।”

    इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, दोष परिस्थितियों में नहीं बल्कि मन में होता है। जो चीज़ गरीबी को कष्टदायक बनाती है, वही समृद्धि को भी कष्टदायक बना देती है। जब कोई व्यक्ति बीमार होता है तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसे लकड़ी के बिस्तर पर लिटाया जाए या सोने के बिस्तर पर। जहाँ भी उसे ले जाओगे, वह अपना रोग अपने साथ ही ले जाएगा। ठीक इसी प्रकार, मानसिक रूप से रोगग्रस्त व्यक्ति को धन में रखा जाए या गरीबी में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका कष्ट उसी का अपना है और वह हर जगह उसका पीछा करता रहता है।

अभी के लिए विदा 



दर्शन और जीवन के संदर्भ में -- पत्र - 16

 प्रिय लूसीलियस 

मुझे विश्वास है लूसीलियस, कि तुम समझते हो कि दर्शन के बिना कोई भी व्यक्ति न तो वास्तव में सुखी जीवन जी सकता है और न ही ऐसा जीवन जो सहन करने योग्य हो। यह भी कि जहाँ पूर्ण प्रज्ञा (ज्ञान) जीवन को सुखी बनाती है, वहीं उसके अध्ययन का आरम्भ मात्र भी जीवन को सहनीय बना देता है। किन्तु इस समझ को प्रतिदिन के अभ्यास द्वारा पुष्ट और अधिक गहराई से स्थापित करना आवश्यक है। सम्माननीय उद्देश्यों की कल्पना कर लेना जितना सरल है उन्हें व्यवहार में उतारना उससे कहीं अधिक कठिन है। मनुष्य को निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए और सतत अध्ययन द्वारा अपनी शक्ति बढ़ानी चाहिए जब तक कि उसके श्रेष्ठ संकल्प उसके मन का स्थायी उत्कृष्ट गुण न बन जाएँ।



    जब तुम मेरे साथ हो तब तुम्हें बहुत अधिक शब्दों या इतनी लंबी सफ़ाइयों की आवश्यकता नहीं है। मैं समझता हूँ कि तुमने काफ़ी प्रगति की है। मैं जानता हूँ कि जो बातें तुम लिखते हो, वे कहाँ से आ रही हैं। तुम उन्हें न तो गढ़ रहे हो और न ही उन्हें सजाकर प्रस्तुत कर रहे हो। फिर भी मैं तुम्हें अपनी राय बताता हूँ। मुझे तुमसे आशाएँ हैं लेकिन अभी मुझे पूर्ण विश्वास नहीं है। और यदि मेरी चले तो तुम स्वयं के प्रति भी यही दृष्टिकोण अपनाओगे और बिना पर्याप्त कारण के अपने ऊपर शीघ्रता से विश्वास नहीं करोगे। अपने आपको झकझोरो। अपनी जाँच-पड़ताल करो। अपने को विभिन्न दृष्टियों से देखो। सबसे बढ़कर, यह विचार करो कि जो प्रगति तुमने की है, वह दर्शन में हुई है या स्वयं जीवन में। दर्शन कोई ऐसी कला नहीं है जो दर्शकों के सामने करतब दिखाने के लिए हो, न ही वह प्रदर्शन के लिए सजाई गई कोई वस्तु है। उसका सार शब्दों में नहीं, कर्मों में है। मनुष्य उसे केवल मनोरंजन या ऊब दूर करने के साधन के रूप में नहीं अपनाता। वह मन को ढालता और आकार देता है, जीवन को व्यवस्था प्रदान करता है, आचरण को अनुशासित करता है, और यह दिखाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

    दर्शन पतवार पर बैठता है और हमें मार्ग दिखाता है जबकि हम अनिश्चितता की लहरों में इधर-उधर उछाले जा रहे होते हैं। उसके बिना ऐसा कोई जीवन नहीं है जो चिंताओं और व्याकुलताओं से भरा न हो। क्योंकि हर घड़ी असंख्य ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जिनके लिए सलाह की आवश्यकता होती है और वह सलाह केवल दर्शन ही दे सकता है।

    कोई कहेगा, “यदि सब कुछ भाग्य द्वारा निर्धारित है तो दर्शन मेरे किस काम का? यदि ईश्वर ही सबका संचालक है तो दर्शन का क्या उपयोग? और यदि संयोग (भाग्य-चक्र) का ही प्रभुत्व है तो फिर दर्शन से क्या लाभ? क्योंकि जो निश्चित है उसे बदला नहीं जा सकता और जो अनिश्चित है उसके विरुद्ध पहले से कोई तैयारी भी नहीं की जा सकती। या तो ईश्वर ने पहले ही मेरे लिए सब कुछ निर्धारित कर दिया है और तय कर दिया है कि मुझे क्या करना चाहिए या फिर भाग्य ने मेरी योजना के लिए कुछ भी शेष नहीं छोड़ा है।” किन्तु इनमें से जो भी सत्य हो लूसीलियस, अथवा यदि ये सभी सत्य हों, तब भी हमें दर्शन का अभ्यास करना चाहिए। चाहे भाग्य का अटल नियम हमें बाँधे हुए हो। चाहे ईश्वर, जो समस्त जगत का नियामक है, सभी घटनाओं का संचालन करता हो या चाहे संयोग ही मानव जीवन को चलाता और अस्त-व्यस्त करता हो। फिर भी दर्शन ही हमारी रक्षा करेगा। दर्शन हमें ईश्वर की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना सिखाएगा और भाग्य के सामने अनिच्छा से ही सही, झुकना सिखाएगा। वह तुम्हें ईश्वर का अनुसरण करना और संयोग का सामना करना सिखाएगा।

    किन्तु यह वह समय नहीं है कि हम इस प्रश्न पर चर्चा आरम्भ करें कि यदि दैवी व्यवस्था का शासन है तो हमारे अधिकार में क्या है या यदि नियति की घटनाओं की एक अविच्छिन्न श्रृंखला हमें जंजीरों में बाँधकर खींचती चली जाती है अथवा यदि आकस्मिक घटनाएँ ही सब पर शासन करती हैं। इसके बजाय, मैं अब अपने मूल विषय पर लौटता हूँ। तुम्हें सलाह देने और प्रेरित करने के लिए कि अपने मन के प्रयत्न को बिखरने और शिथिल पड़ने मत दो। उसे बनाए रखो। उसे स्थिर करो ताकि जो अभी केवल प्रयास है, वह आगे चलकर स्वभाव बन जाए।

    यदि मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ तो जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया होगा, तुम यह देखने के लिए आगे झाँकने लगे होगे कि यह पत्र अपने साथ कौन-सा छोटा-सा उपहार लाया है। अच्छा, इसे खोलकर देखो। तुम्हें वह मिल जाएगा! लेकिन मेरी उदारता पर आश्चर्य मत करना क्योंकि मैं अभी भी किसी और के भंडार से ही उदारता दिखा रहा हूँ। पर मैं इसे “किसी और का” क्यों कहूँ? जो कुछ भी किसी के द्वारा अच्छी तरह कहा गया है, वह मेरा है। यह बात भी एपिक्यूरस ने कही थी,  “यदि तुम प्रकृति के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी गरीब नहीं होगे और यदि लोगों की धारणाओं के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी धनी नहीं हो सकोगे।”

    प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं। मतों और धारणाओं की माँगों की कोई सीमा नहीं होती। मान लो कि अनेक धनवान लोगों की सारी संपत्ति तुम्हारे ऊपर ढेर कर दी जाए। मान लो कि भाग्य तुम्हें किसी भी निजी व्यक्ति की सामर्थ्य से कहीं अधिक ऊँचा उठा दे, तुम्हें सोने से ढक दे, तुम्हें बैंगनी वस्त्रों से सजा दे, तुम्हें इतना वैभव और धन दे दे कि तुम संगमरमर से धरती तक को ढक सको, ऐसा धन जो केवल तुम्हारे अधिकार में ही न हो बल्कि तुम्हारे पैरों के नीचे भी बिछा हो! मान लो कि मूर्तियाँ हों, चित्र हों और वे सब वस्तुएँ हों जिन्हें कला ने विलासिता और महँगे स्वाद की तुष्टि के लिए रचा है। इन सब चीज़ों से तुम क्या सीखोगे? केवल और अधिक चाहना। प्राकृतिक इच्छाएँ सीमित होती हैं किन्तु मिथ्या धारणाओं से उत्पन्न इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता क्योंकि असत्य स्वभावतः असीम होता है। जो लोग किसी मार्ग पर चलते हैं, उनका कोई गंतव्य होता है पर भटकने की कोई सीमा नहीं होती।

    इसलिए निरर्थक वस्तुओं से स्वयं को पीछे खींच लो। जब तुम यह जानना चाहो कि जिस वस्तु का तुम पीछा कर रहे हो वह प्राकृतिक इच्छा का विषय है या अंधी लालसा का तो यह देखो कि क्या कहीं ऐसा स्थान है जहाँ तुम्हारी इच्छा जाकर ठहर सकती है। यदि वह बहुत दूर तक जाती है और फिर भी उसके आगे और रास्ता शेष रहता है तो समझ लो कि वह प्राकृतिक नहीं है।


मन मंथन के संदर्भ में -- पत्र - 15

प्रिय लूसीलियस 

हमारे पूर्वजों में यह प्रथा थी और मेरे जीवनकाल तक भी प्रचलित रही कि पत्र के आरम्भ में लिखा जाता था, “यदि तुम कुशलपूर्वक हो तो अच्छा है। मैं भी कुशलपूर्वक हूँ।” लेकिन हमारे लिए यह कहना अधिक उचित है, “यदि तुम दर्शन का अभ्यास कर रहे हो तो अच्छा है।” क्योंकि वास्तव में मनुष्य केवल उसी स्थिति में कुशल हो सकता है। इसके बिना मन रोगग्रस्त रहता है और शरीर भी, चाहे उसमें कितनी ही शक्ति क्यों न हो, उतना ही स्वस्थ कहा जा सकता है जितना किसी पागल या विक्षिप्त व्यक्ति का शरीर स्वस्थ होता है। अतः सबसे पहले और सबसे बढ़कर मन के स्वास्थ्य का ध्यान रखो और शरीर के स्वास्थ्य का उसके बाद। यदि तुमने सचमुच स्वस्थ और श्रेष्ठ बनने का निश्चय कर लिया है तो यह तुम्हें अधिक मूल्य नहीं चुकवाएगा।



    प्रिय लूसीलियस, मांसपेशियों का व्यायाम करने, कंधों को चौड़ा करने और धड़ को सुदृढ़ बनाने में लगे रहना मूर्खता है और एक शिक्षित व्यक्ति के लिए शोभा नहीं देता। तुम अपने विशेष आहार और शरीर-निर्माण में चाहे कितनी ही सफलता प्राप्त कर लो फिर भी तुम कभी किसी श्रेष्ठ बैल की शक्ति और भार की बराबरी नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, तुम्हारा मन एक अधिक बोझिल शरीर के भार से दब जाता है और परिणामस्वरूप उसकी फुर्ती कम हो जाती है। इसलिए अपने शरीर को जितना संभव हो संयमित रखो और अपने मन को अधिक स्वतंत्रता दो।

    जो लोग ऐसे नियमों और अभ्यासों के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं उन्हें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। पहला, ये व्यायाम आत्मा को परिश्रम से थका देते हैं और उसमें एकाग्रता तथा गहन अध्ययन के लिए कम शक्ति छोड़ते हैं। दूसरा, अत्यधिक और विस्तृत आहार उसकी सूक्ष्म प्रकृति में बाधा उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सबसे निकृष्ट प्रकार के दासों को अपना स्वामी बनाना पड़ता है। ऐसे लोगों को जो अपना समय तेल-मालिश और मदिरा के बीच बाँटते हैं और जिनके लिए दिन तभी सफल माना जाता है जब वे भरपूर पसीना बहाएँ और फिर शरीर से निकले द्रव की पूर्ति ऐसे पेय से करें जिसका प्रभाव थके और क्षीण शरीर पर और भी अधिक पड़ता है। पसीना बहाना और मदिरापान करना, यह तो अम्लता और जलन से भरा जीवन है!

    व्यायाम के ऐसे तरीके भी हैं जो सरल और शीघ्र हैं जो शरीर को पर्याप्त अभ्यास दे देते हैं और बहुत अधिक समय भी नहीं लेते क्योंकि समय ही वह वस्तु है जिसका हमें सबसे अधिक हिसाब रखना चाहिए। दौड़ना, विभिन्न भारों के साथ भुजाओं का अभ्यास करना और कूदना, चाहे ऊँची कूद हो या लंबी कूद या नृत्य में की जाने वाली छलाँगें अथवा (यदि वर्ग-भेद की चिंता न की जाए) धोबी की तरह पैरों से ठोकर मारने वाला अभ्यास। इनमें से जो तुम्हें पसंद हो, उसे चुन लो और अभ्यास द्वारा उसे सहज बना लो। लेकिन तुम जो भी करो, शरीर से शीघ्र ही मन की ओर लौट आओ और उसे दिन-रात अभ्यास में लगाओ। मन को पोषित करने के लिए मध्यम प्रयास ही पर्याप्त है और उसका ऐसा अभ्यास है जिसे न तो सर्दी बाधित कर सकती है, न गर्मी और न ही बुढ़ापा। उस अच्छाई की देखभाल करो जो समय के साथ और अधिक उत्तम होती जाती है।

    मैं यह नहीं कह रहा कि तुम हमेशा किसी पुस्तक या लेखन-पट्टिका पर झुके रहो। मन को भी कुछ विश्राम मिलना चाहिए किंतु ऐसा विश्राम जो उसे तरोताज़ा करे, न कि शिथिल बना दे। पालकी में बाहर निकलना शरीर को चुस्त रखता है और अध्ययन में भी बाधा नहीं डालता। तुम पढ़ सकते हो, बोलकर लिखवा सकते हो, बातचीत कर सकते हो या किसी की बात सुन सकते हो। वास्तव में, टहलना भी इन कार्यों में से किसी को करने से नहीं रोकता।

    तुम्हें अपनी वाणी के अभ्यास की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। लेकिन मैं तुम्हें ऊँचे और नीच सुरों, स्वरों के उतार-चढ़ाव तथा लयों का अभ्यास करने से मना करता हूँ क्योंकि फिर तुम्हें चलने का प्रशिक्षण लेने की भी इच्छा हो सकती है! एक बार यदि तुम उन लोगों को प्रवेश दे दोगे जो नए-नए उपाय गढ़कर अपनी जीविका चलाते हैं तो तुम पाओगे कि कोई तुम्हारे कदमों की लंबाई नाप रहा है, कोई तुम्हारे चबाने के ढंग पर नज़र रख रहा है और वे उतनी ही निर्भीकता से आगे बढ़ते जाएँगे जितना तुम्हारा धैर्य और विश्वास उन्हें बढ़ावा देता रहेगा। तो क्या तुम अपनी वाणी का अभ्यास तुरंत पूरे ज़ोर से चिल्लाकर आरम्भ करोगे? स्वाभाविक तरीका यह है कि आवाज़ को धीरे-धीरे ऊँचा किया जाए। वास्तव में, न्यायालयों में बोलने वाले वक्ता भी बातचीत के स्वर से आरम्भ करते हैं और फिर क्रमशः अपनी पूरी आवाज़ तक पहुँचते हैं। कोई भी शुरुआत ही में यह नहीं पुकारता—“हे क्विराइटेस, निष्ठा!”

    इसलिए तुम्हारा विश्वास तुम्हें चाहे जितनी प्रबलता से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, दोषों पर तुम्हारा आक्रमण कभी अधिक तीव्र हो और कभी अधिक मृदु, जैसा तुम्हारी आवाज़ और श्वास-शक्ति उचित समझे। और जब तुम अपनी आवाज़ को फिर नीचे लाओ तो उसे एकदम गिरा मत दो बल्कि मध्यम स्वरों से होते हुए धीरे-धीरे नीचे उतारो, उसे किसी अनगढ़ देहाती की तरह तीखी चीख के साथ अचानक समाप्त मत कर दो। उद्देश्य यह नहीं है कि आवाज़ को व्यायाम कराया जाए बल्कि यह है कि आवाज़ सुनने वाले पर प्रभाव डाले और उसे सक्रिय करे।

    मैंने तुम्हें काफ़ी परिश्रम से मुक्त कर दिया है। अब इस उपकार के साथ एक छोटा-सा भुगतान भी जोड़ देता हूँ, यूनान से आया हुआ एक उपहार! लो, यह एक उत्तम उपदेश है,  “मूर्ख का जीवन कृतघ्न और भय से भरा होता है। उसकी दृष्टि पूरी तरह भविष्य पर टिकी रहती है।”

    “यह किसने कहा?” तुम पूछते हो। उसी व्यक्ति ने जिसने पिछली बात कही थी। तुम्हारे विचार में यहाँ किस जीवन को मूर्ख कहा गया है? क्या बाबा और इसियोन के जीवन को? नहीं, बात उनकी नहीं है। यहाँ तो हमारे ही जीवन की चर्चा हो रही है। अंधी लोभ-लालसा हमें उन वस्तुओं की ओर धकेलती है जो हमें हानि पहुँचा सकती हैं और जो निश्चित रूप से हमें कभी संतुष्ट नहीं कर सकतीं। यदि कोई वस्तु हमें सचमुच संतुष्ट कर सकती तो अब तक कर चुकी होती। हम इस बात पर विचार ही नहीं करते कि कुछ भी न माँगना कितना सुखद है और यह कितनी महान बात है कि अपनी पूर्णता और संतोष के लिए भाग्य पर निर्भर न रहना पड़े।

    इसलिए, लूसीलियस, बार-बार स्वयं को याद दिलाओ कि तुमने कितना कुछ प्राप्त कर लिया है। जब तुम देखो कि कितने लोग तुमसे आगे हैं तो यह भी सोचो कि कितने लोग तुम्हारे पीछे हैं। यदि तुम देवताओं और अपने जीवन के प्रति कृतज्ञ होना चाहते हो तो यह विचार करो कि तुमने कितने लोगों को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन दूसरों की बात से क्या लेना-देना? तुमने स्वयं को ही पीछे छोड़ दिया है। 

    अपने लिए ऐसा लक्ष्य निर्धारित करो जिसे तुम चाहो तब भी पार न कर सको। अन्ततः उन भ्रामक वस्तुओं को त्याग दो जो प्राप्त होने की अपेक्षा में अधिक मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उन्हें पा लेने पर उनका मूल्य उतना नहीं होता। यदि उनमें कोई वास्तविक और स्थायी तत्त्व होता तो कभी न कभी वे हमें तृप्त कर देतीं। परन्तु होता यह है कि वे हमें पीते समय भी और अधिक प्यासा बना देती हैं। इस बोझ को उतार फेंको। यह केवल दिखावे के लिए है। जहाँ तक भविष्य का प्रश्न है, वह अनिश्चित है और भाग्य की इच्छा पर निर्भर है। मैं भाग्य से वस्तुएँ माँगूँ ही क्यों बजाय इसके कि उन्हें स्वयं से प्राप्त करने की अपेक्षा करूँ? और फिर मुझे किसी वस्तु की माँग करनी ही क्यों चाहिए? क्या केवल इसलिए कि मैं उनका एक बड़ा ढेर इकट्ठा कर लूँ, यह भूलकर कि मनुष्य का जीवन कितना नाज़ुक है? इतना परिश्रम किसलिए? देखो, यह दिन मेरा अंतिम दिन हो सकता है और यदि वास्तव में अंतिम नहीं भी है तो भी अंतिम के बहुत निकट अवश्य है।

अभी के लिए विदा 



Monday, 22 June 2026

शारीरिक स्वास्थ्य एवं धन के संदर्भ में -- पत्र - 14

प्रिय लूसीलियस 

मैं स्वीकार करता हूँ कि अपने शरीर के प्रति लगाव हमारे स्वभाव में जन्मजात होता है। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि उसके संरक्षण और देखभाल का दायित्व हमें सौंपा गया है। मैं यह नहीं कहता कि शरीर के लिए कोई रियायत या सुविधा नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन मेरा यह कहना अवश्य है कि मनुष्य को शरीर का दास नहीं बनना चाहिए। जो व्यक्ति शरीर का दास बन जाता है, जो उसके कारण अत्यधिक भयभीत रहता है और हर बात को उसी की दृष्टि से देखता है, वह अनेक प्रकार की दासताओं में जकड़ जाता है। हमें ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए मानो शरीर ही हमारे जीवन का उद्देश्य हो। बल्कि ऐसा समझना चाहिए कि वह केवल जीवन जीने का एक आवश्यक साधन है। शरीर के प्रति अत्यधिक मोह हमें भय से भर देता है, चिंताओं का बोझ लाद देता है और आलोचना तथा अपमान का पात्र बना देता है। जो व्यक्ति शरीर को अत्यधिक महत्व देता है, उसके लिए सम्मान का मूल्य बहुत सस्ता हो जाता है। शरीर की सावधानीपूर्वक देखभाल करो पर इस शर्त के साथ कि जब विवेक, आत्मसम्मान या निष्ठा इसकी माँग करें, तब उसे अग्नि में झोंक देने के लिए भी तैयार रहो।

                                           


    फिर भी, हमें जहाँ तक संभव हो केवल खतरों ही नहीं बल्कि कष्टों से भी बचना चाहिए और सुरक्षित आश्रय में जाकर निरंतर ऐसे उपाय सोचते रहना चाहिए जिनसे भय के कारणों से दूर रहा जा सके। यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो भय की वस्तुएँ मुख्यतः तीन प्रकार की हैं। हम निर्धनता से डरते हैं। हम रोग से डरते हैं, और हम अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों के हिंसक कर्मों से डरते हैं। इन सबमें जो भय हमें सबसे अधिक विचलित करता है, वह किसी दूसरे की शक्ति से उत्पन्न होने वाला भय है क्योंकि वह बहुत शोर-शराबे और हलचल के साथ आता है। जिन प्राकृतिक विपत्तियों का मैंने उल्लेख किया—निर्धनता और रोग—वे चुपचाप आती हैं। उनमें ऐसा कुछ नहीं होता जो हमारी आँखों या कानों को आतंकित कर दे। परन्तु किसी दूसरे मनुष्य द्वारा पहुँचाई जाने वाली बुराई बड़े प्रदर्शन के साथ आती है। उसके साथ अग्नि और तलवार, बेड़ियाँ और मनुष्य के शरीर को चीर डालने के लिए तैयार हिंसक पशुओं के झुंड होते हैं। जरा कारागार, सूली, यातना-चक्र, लोहे के काँटे, उस नुकीले खूँटे की कल्पना करो जिसे किसी व्यक्ति के शरीर के बीचों-बीच घुसाकर मुँह तक निकाल दिया जाता है। उन अंगों की कल्पना करो जिन्हें विपरीत दिशाओं में दौड़ते रथों द्वारा फाड़ डाला जाता है। उस वस्त्र की कल्पना करो जो ज्वलनशील तारकोल से लिपटा हुआ हो और उन सब यातनाओं की भी जिन्हें मनुष्य की क्रूरता ने आविष्कृत किया है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि हमारा सबसे बड़ा भय इसी प्रकार की बुराई से होता है क्योंकि वह अनेक रूपों में और अत्यन्त भयावह साधनों के साथ हमारे सामने आती है। जिस प्रकार यातना देने वाला व्यक्ति तब सबसे अधिक प्रभावी होता है जब वह अपने यातना-उपकरणों को सामने प्रदर्शित करता है क्योंकि अनेक लोग जो वास्तविक पीड़ा सह सकते थे, केवल उन्हें देखकर ही टूट जाते हैं। उसी प्रकार मन को वश में करने और दबाने वाली वस्तुओं में भी सबसे अधिक प्रभाव उन्हीं का होता है जिनके पास दिखाने के लिए कुछ होता है। अन्य संकट कम गंभीर नहीं हैं, जैसे भूख, प्यास, शरीर को गलाने वाले घाव, या पेट की गहराइयों तक जलाने वाला ज्वर। किन्तु वे दृष्टिगोचर नहीं होते। वे हमारे सिर पर या आँखों के सामने मंडराते नहीं दिखाई देते। जबकि ये बाहरी भय, विशाल युद्धों की तरह अपने शस्त्र-सज्जा और प्रदर्शन के बल पर हमें परास्त कर देते हैं।

    अतः हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम किसी को अनावश्यक रूप से नाराज़ न करें। कभी हमें जनसामान्य से सावधान रहना पड़ता है। कभी, यदि राज्य की व्यवस्था ऐसी हो कि अधिकांश मामलों का नियंत्रण सीनेट के हाथ में हो तो वहाँ के प्रभावशाली लोगों से और कभी उन व्यक्तियों से जिनके हाथों में जनता की शक्ति और जनता पर शासन करने का अधिकार निहित होता है। इन सभी को अपना मित्र बनाना अत्यन्त कठिन कार्य है। इतना ही पर्याप्त है कि वे हमारे शत्रु न बनें। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी सत्ताधारियों के क्रोध को उकसाता नहीं बल्कि उससे वैसे ही बचकर चलता है जैसे समुद्र में नाविक तूफ़ान से बचता है। जब तुम सिसिली की ओर जा रहे थे तब तुम्हें उस संकरे जलडमरूमध्य को पार करना पड़ा था। उतावला नाविक दक्षिणी पवन की चेतावनी की उपेक्षा कर देता है। वही दक्षिणी पवन सिसिली के समुद्र को उग्र लहरों से भर देती है। वह बाएँ तट के सहारे सुरक्षित मार्ग नहीं चुनता बल्कि उस ओर बढ़ता है जहाँ कैरिब्डिस का भयंकर भँवर निकट होता है। किन्तु अधिक सावधान नाविक वहाँ के जानकार लोगों से ज्वार-भाटों की स्थिति पूछता है, बादलों के संकेतों को समझता है और उस क्षेत्र से दूर रहता है जो अशांत जल के लिए कुख्यात है। बुद्धिमान व्यक्ति भी ऐसा ही करता है। वह उस शक्ति से दूर रहता है जो उसे हानि पहुँचा सकती है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखता है कि उसका यह बचाव स्पष्ट रूप से दिखाई न दे। क्योंकि सुरक्षा का एक भाग यह भी है कि उसकी खोज विवेकपूर्ण ढंग से की जाए; खुलकर बचना मानो सामने वाले की निंदा करने के समान होता है।

    अतः हमें यह विचार करना चाहिए कि सामान्य भीड़ से अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। सबसे पहले, हमें उन्हीं वस्तुओं की कामना नहीं करनी चाहिए जिनकी कामना सब लोग करते हैं क्योंकि संघर्ष उन्हीं लोगों के बीच उत्पन्न होता है जो एक ही वस्तु के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं। दूसरे, हमारे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए जिसे चुराना अत्यधिक लाभदायक हो और हमारे साथ बहुत कम ऐसी चीज़ें हों जो लूटे जाने योग्य समझी जाएँ। बहुत कम लोग केवल रक्तपात के लिए किसी की हत्या करते हैं। अधिकांश लोग घृणा से नहीं बल्कि लाभ की गणना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। यदि कोई व्यक्ति लगभग निराधार और निर्धन है, तो लुटेरा उसे अनदेखा करके आगे बढ़ जाता है। निर्धन व्यक्ति को शांति प्राप्त रहती है, यहाँ तक कि उन मार्गों पर भी जहाँ घात लगाकर बैठे डाकुओं का भय हो।

    इसके बाद, हमें उन तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिए जिनसे बचना आवश्यक है, जैसा कि एक प्राचीन कहावत कहती है-- घृणा, ईर्ष्या और तिरस्कार। इनसे कैसे बचा जाए, यह केवल बुद्धिमत्ता ही सिखा सकती है। क्योंकि एक बात को दूसरी के साथ संतुलित करना कठिन होता है। यदि हम लोगों के रोष और द्वेष से बचना चाहते हैं तो हमें यह भी सावधानी रखनी होगी कि हम उनके तिरस्कार का पात्र न बन जाएँ। ऐसा न हो कि दूसरों को रौंदने से बचते-बचते हम यह आभास देने लगें कि हमें ही रौंदा जा सकता है। बहुत-से लोगों ने दूसरों में भय उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करके स्वयं अपने लिए भय के कारण पैदा कर लिए हैं। इसलिए हमें दोनों ही अतियों से बचना चाहिए। दूसरों से श्रेष्ठ समझा जाना उतना ही हानिकारक है जितना कि तुच्छ और तिरस्कृत समझा जाना।

    अतः हमें दर्शन की शरण लेनी चाहिए। ये अध्ययन पुरोहितों के पवित्र वस्त्रों की भाँति मनुष्य को ऐसा संरक्षण प्रदान करते हैं कि वह केवल सज्जनों के बीच ही नहीं बल्कि सामान्य रूप से दुष्ट लोगों के बीच भी आदर का पात्र बन जाता है। न्यायालयों में प्रयुक्त वाक्पटुता, या कोई भी ऐसी कला जो जनसमूह को उद्वेलित करती है, प्रतिस्पर्धियों और प्रतिद्वंद्वियों को जन्म देती है। किन्तु दर्शन का यह शांत साधन, जो केवल अपने कार्य से कार्य रखता है, तिरस्कार का विषय नहीं बन सकता। इसके विपरीत, सभी कलाओं में उसे विशेष सम्मान प्राप्त होता है, यहाँ तक कि सबसे बुरे लोगों के बीच भी। दुष्टता कभी इतनी शक्तिशाली नहीं हो सकती न ही सद्गुणों के विरुद्ध इतना बड़ा षड्यंत्र रच सकती है कि दर्शन का नाम पवित्र और आदरणीय माना जाना बंद हो जाए।

    किन्तु दर्शन का अभ्यास भी शांतिपूर्वक और संयम के साथ किया जाना चाहिए। “क्या?” तुम कहोगे, “क्या तुम्हें लगता है कि मार्कस कैटो ने दर्शन का अभ्यास संयम के साथ किया था? वही कैटो जिसने अपने शब्दों से गृहयुद्ध को रोकने का प्रयास किया, जिसने उग्र सेनानायकों के हथियारों के बीच खड़े होकर उनका सामना किया और जब कुछ लोग पोम्पेई को तथा कुछ सीज़र को चुनौती दे रहे थे, तब उसने एक साथ दोनों का विरोध किया?” इस बिन्दु पर यह विवाद उठाया जा सकता है कि क्या उस परिस्थिति में एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए राजनीति में सक्रिय होना आवश्यक था।

    कैटो, तुम क्या कर रहे हो? यह संघर्ष स्वतंत्रता के लिए नहीं है, वह तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुकी है। अब प्रश्न केवल इतना है कि राज्य पर अधिकार सीज़र का होगा या पोम्पेई का। ऐसे विवाद से तुम्हारा क्या संबंध है? इसमें किसी एक पक्ष का समर्थन करना तुम्हारा कार्य नहीं है। यहाँ तो केवल एक स्वामी चुना जा रहा है। तुम्हारे लिए इससे क्या अंतर पड़ता है कि विजेता कौन होता है? संभव है कि अपेक्षाकृत बेहतर व्यक्ति विजयी हो जाए। किन्तु यह संभव नहीं कि कोई व्यक्ति विजय प्राप्त करे और फिर भी उस विजय से नैतिक रूप से कुछ बुरा न बन जाए।

    मैंने कैटो के अंतिम प्रतिरोध का उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रारम्भिक वर्षों में भी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि कोई बुद्धिमान व्यक्ति राज्य की उस लूट-खसोट में भाग लेता। कैटो ने आखिर प्राप्त क्या किया, सिवाय इसके कि उसने अपनी आवाज़ उठाई, और वह भी व्यर्थ? एक अवसर पर भीड़ ने उसे अपने हाथों पर उठाकर फ़ोरम से बाहर फेंक दिया। वह अपमानजनक गालियों और लोगों की थूक से लथपथ हो गया। और दूसरे अवसर पर उसे सीनेट से निकालकर सीधे कारागार पहुँचा दिया गया। फिर भी वह अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता रहा। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं जिनमें किसी बुद्धिमान व्यक्ति के लिए सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करना वास्तव में फलदायक हो सकता था, या फिर वह केवल व्यर्थ संघर्ष में अपनी शक्ति नष्ट कर रहा था।

    किन्तु हम इस प्रश्न की जाँच बाद में करेंगे कि क्या बुद्धिमान व्यक्ति को सार्वजनिक सेवा में अपना श्रम लगाना चाहिए। फिलहाल, मैं तुम्हें उन स्टोइक दार्शनिकों की ओर बुलाता हूँ जिन्होंने राजनीति से स्वयं को अलग रखा और एकांत में रहकर जीवन के संचालन तथा मानवजाति के लिए नियमों और सिद्धांतों की स्थापना में अपने को समर्पित किया, बिना किसी शक्तिशाली व्यक्ति को नाराज़ किए। बुद्धिमान व्यक्ति जनता की प्रचलित परंपराओं और रीति-रिवाजों को व्यर्थ में विचलित नहीं करता, और न ही अपने विचित्र जीवन-व्यवहार द्वारा लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।

    क्या इस मार्ग को अपनाने वाला व्यक्ति विशेष रूप से सुरक्षित रहेगा?” मैं तुम्हें इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता, ठीक वैसे ही जैसे मैं यह गारंटी नहीं दे सकता कि संयमित जीवन जीने वाला व्यक्ति सदैव स्वस्थ रहेगा। फिर भी यह सत्य है कि संयम स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। जहाज़ कभी-कभी बंदरगाह में भी डूब जाते हैं। पर सोचो, खुले समुद्र के बीच उनकी स्थिति कितनी अधिक जोखिमपूर्ण होती होगी! यदि शांत जीवन भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है तो अत्यधिक व्यस्त और उथल-पुथल भरा जीवन कितना अधिक खतरनाक होगा! कभी-कभी निर्दोष लोग भी नष्ट हो जाते हैं। इससे कौन इनकार करता है? किन्तु अधिकतर दोषी ही नष्ट होते हैं। यदि कोई योद्धा अपने हथियारों सहित घायल होकर गिर भी पड़े, तब भी उसकी युद्ध-कला निरर्थक नहीं हो जाती। संक्षेप में, बुद्धिमान व्यक्ति हर परिस्थिति में परिणाम की अपेक्षा अपने उद्देश्य और संकल्प को अधिक महत्व देता है। आरम्भ हमारे अधिकार में होता है; परिणामों का निर्णय भाग्य करता है। पर मैं भाग्य को अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं देता। “लेकिन भाग्य तो कुछ कष्ट और विपत्तियाँ लेकर आएगा।” हाँ, ला सकता है। किन्तु किसी डाकू के हाथों मारा जाना अपने-आप में दोषसिद्धि या निंदा का प्रमाण नहीं है।

    अब तुम अपने दैनिक अनुदान के लिए हाथ फैला रहे हो। मैं उसे एक स्वर्णिम उपहार से भर देता हूँ। और चूँकि मैंने सोने का उल्लेख किया है इसलिए यह भी जान लो कि धन का उपयोग और उसका आनंद कैसे अधिक सुखद बनाया जा सकता है-

“वह व्यक्ति धन का सबसे अधिक आनंद लेता है जिसे धन की सबसे कम आवश्यकता होती है।”

“मुझे इसके लेखक का नाम बताओ,” तुम कहते हो। केवल यह दिखाने के लिए कि मैं कितना उदार हूँ, मैं किसी और की बात की प्रशंसा करने को तैयार हूँ। यह कथन या तो एपिक्यूरस का है या मेट्रोडोरस का या फिर उसी विचारधारा के किसी अन्य व्यक्ति का। और इससे क्या अंतर पड़ता है कि इसे किसने कहा? उसने यह बात सबके लिए कही है। 

    जो व्यक्ति धन की आवश्यकता अनुभव करता है, वह अपने धन के लिए भयभीत भी रहता है। लेकिन ऐसा चिंताओं से घिरा हुआ धन किसी को वास्तविक आनंद नहीं दे सकता। वह उसे बढ़ाने के लिए व्याकुल रहता है और उसकी वृद्धि के बारे में सोचते-सोचते उसके उपयोग को ही भूल जाता है। वह अपने ऋणों और देयों की वसूली में लगा रहता है, बाज़ार और न्यायालयों के चक्कर काटता है, अपने बही-खातों के पन्ने उलटता-पलटता रहता है। वह अपने धन का स्वामी नहीं रह जाता बल्कि उसका सेवक और प्रबंधक मात्र बनकर रह जाता है।

अभी के लिए विदा 

आशा, भय एवं शंका के संदर्भ में -- पत्र - 13

प्रिय लूसीलियस  

मैं जानता हूँ कि तुममें साहस और आत्मबल की कोई कमी नहीं है। उन शिक्षाओं से स्वयं को सुसज्जित करने से पहले भी जो मन को स्वस्थ बनाती हैं और विपत्तियों पर विजय पाना सिखाती हैं। तुम यह अनुभव करते थे कि भाग्य के प्रहारों का सामना तुम अच्छी तरह कर रहे हो। और जब तुमने वास्तव में भाग्य से टक्कर ली तथा अपनी शक्ति को परखा, तब यह आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति का वास्तविक ज्ञान तब तक नहीं हो सकता जब तक चारों ओर से अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित न हों या कम-से-कम तब तक नहीं जब तक वे उसके बिल्कुल निकट न आ जाएँ। यही वह अवसर होता है जब सच्चा मन अपने को सिद्ध करता है। वह मन जो अपने निर्णय के अतिरिक्त किसी अन्य निर्णय के सामने नहीं झुकता।



    भाग्य मनुष्य के साहस और चरित्र की परीक्षा लेता है। जिस मुक्केबाज़ ने कभी मार नहीं खाई, वह मुकाबले में सच्चा आत्मविश्वास लेकर नहीं उतर सकता। वह व्यक्ति, जिसने अपना रक्त बहते देखा हो, जिसने अपनी मुट्ठियों और प्रतिद्वन्द्वी के प्रहारों के बीच अपने दाँतों की चरमराहट सुनी हो, जो अपना संतुलन खोकर प्रतिद्वन्द्वी के पैरों तले गिर पड़ा हो और फिर भी, यद्यपि उसे हार माननी पड़ी हो, उसने अपने मनोबल को कभी पराजित न होने दिया हो, जो हर बार गिरने के बाद और अधिक उग्र तथा दृढ़ होकर उठ खड़ा हुआ हो, वही व्यक्ति अगली प्रतियोगिता में प्रबल आशा और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश करता है। इसी उपमा को आगे बढ़ाएँ तो भाग्य ने भी अनेक बार तुम पर विजय प्राप्त की है। फिर भी तुमने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। तुम हर बार उठ खड़े हुए हो और पहले से भी अधिक साहस के साथ अपने पैरों पर डटे हो।

    लूसीलियस, बहुत-सी बातें हमें वास्तव में जितना प्रभावित करती हैं उससे कहीं अधिक भयभीत करती हैं। हम वास्तविकता से कम, अपनी कल्पनाओं और विचारों से अधिक पीड़ित होते हैं। मैं यह बात स्टोइक दर्शन के उच्च अर्थ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि एक अधिक सामान्य अर्थ में कह रहा हूँ। निस्संदेह, हमारा सिद्धान्त यह है कि जिन बातों पर लोग आहें भरते हैं और विलाप करते हैं, वे तुच्छ हैं और उन पर ध्यान देने योग्य भी नहीं हैं। पर उन ऊँची बातों को अभी रहने दें, हालांकि, देवताओं की शपथ, वे सत्य हैं।  फिलहाल मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ, समय आने से पहले दुखी मत हो। जिन बातों से तुम इस प्रकार भयभीत हो जैसे वे अभी-अभी घटित होने वाली हों, वे शायद कभी घटें ही नहीं और निश्चित रूप से अभी तक तो वे घटी नहीं हैं। इस प्रकार कुछ बातें हमें जितना कष्ट देना चाहिए, उससे अधिक कष्ट देती हैं। कुछ हमें समय से पहले ही कष्ट देने लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो हमें बिल्कुल कष्ट नहीं देनी चाहिए। हम या तो अपने दुख को बढ़ा लेते हैं,  उसे स्वयं गढ़ लेते हैं अथवा उसके आने से पहले ही उसे जीने लगते हैं क्योंकि चुनौती का सामना करने पर साहस बढ़ता है। फिर भी, यदि तुम चाहो तो अपनी रक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए मेरी ओर से कुछ शब्द स्वीकार करो।

    उस पहले प्रश्न पर अभी हमारा मतभेद बना हुआ है और वह विषय अभी विवादास्पद है। इसलिए फिलहाल उसे स्थगित रहने देते हैं। जिसे मैं तुच्छ कहता हूँ, वह तुम्हें बहुत गंभीर प्रतीत हो सकता है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कुछ लोग कोड़ों की मार खाते हुए भी हँसते रहते हैं जबकि कुछ दूसरे केवल एक थप्पड़ लगने पर ही कराह उठते हैं। बाद में हम यह जाँच करेंगे कि ऐसी बातों की शक्ति स्वयं उनमें निहित होती है या हमारी दुर्बलता से उत्पन्न होती है। फिलहाल मैं तुमसे केवल इतना चाहता हूँ कि जब भी तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हें यह विश्वास दिलाने लगें कि तुम दुखी हो तब इस पर ध्यान दो कि तुम वास्तव में क्या अनुभव कर रहे हो न कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कह रहे हैं। अपनी सहनशक्ति से परामर्श करो। और चूँकि अपने मामलों के सबसे अच्छे निर्णायक तुम स्वयं हो, अपने आप से पूछो,  “ये लोग मुझ पर दया क्यों कर रहे हैं? किस आधार पर वे मुझसे कतराते हैं, यहाँ तक कि मेरे संपर्क में आने से भी डरते हैं मानो दुर्भाग्य कोई संक्रामक रोग हो?” क्या वास्तव में तुम्हारी स्थिति में कोई बुराई है? या फिर उसकी ख्याति और चर्चा वास्तविकता से अधिक भयावह है? अपने आप से पूछो,  “क्या ऐसा तो नहीं कि मैं बिना किसी उचित कारण के कष्ट भोग रहा हूँ और विलाप कर रहा हूँ? क्या मैं स्वयं ही किसी ऐसी चीज़ को बुरा बना रहा हूँ जो वास्तव में बुरी नहीं है?”

    “मैं कैसे जानूँ,” तुम कहते हो, “मेरी चिंता के कारण वास्तविक हैं या केवल कल्पना मात्र?” इसके लिए एक कसौटी है। हम या तो बीती हुई बातों से पीड़ित होते हैं या आने वाली बातों से अथवा दोनों से। जहाँ तक वर्तमान की बात है, उसके बारे में निर्णय करना आसान है। यदि तुम्हारा शरीर स्वतंत्र है, स्वस्थ है और किसी चोट या बीमारी के कारण तुम्हें कोई पीड़ा नहीं हो रही तो फिर जो कुछ भविष्य में आने वाला है, उसे आने दो और तब देखा जाएगा। आज का दिन तो किसी समस्या का विषय नहीं है।

    “फिर भी, वह तो आने वाला है।” सबसे पहले यह पता करो कि क्या सचमुच कोई ठोस प्रमाण है कि विपत्ति आने वाली है। क्योंकि अक्सर हम उन बातों को लेकर चिंतित हो जाते हैं जिनके बारे में हमारे पास केवल अनुमान होता है। अफवाहें हमारे साथ छल करती हैं। वही अफवाहें जो सेनाओं को युद्धभूमि से भगा देती हैं और व्यक्तियों को तो उससे भी अधिक विचलित कर देती हैं। हाँ, प्रिय लूसीलियस, हम बहुत जल्दी जनमत और सुनी-सुनाई बातों के आगे झुक जाते हैं। जो बातें हमें भयभीत करती हैं, उनके लिए हम प्रमाण नहीं माँगते न ही उनकी सावधानीपूर्वक जाँच करते हैं। हम घबरा जाते हैं और भाग खड़े होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई सेना पशुओं के झुंड से उठी धूल देखकर अपना शिविर छोड़ देती है या जैसे लोग किसी अनाम अफवाह से आतंकित हो उठते हैं। एक अर्थ में, निराधार कारण और भी अधिक भय उत्पन्न करते हैं। वास्तविक खतरों की एक निश्चित सीमा होती है।  परन्तु जो भय अनिश्चितता से जन्म लेता है, वह कल्पनाओं और बेलगाम चिंताओं के हवाले हो जाता है। इसी कारण हमारे सबसे विनाशकारी और सबसे कठिन नियंत्रित होने वाले भय वे होते हैं जो तर्कहीन और काल्पनिक होते हैं। हमारे अन्य भय भले ही अविवेकपूर्ण हों परन्तु ये भय तो पूरी तरह विवेकहीन होते हैं। इसलिए आइए, हम तथ्यों को ध्यानपूर्वक और निष्पक्ष दृष्टि से परखें।

    भविष्य में कोई विपत्ति आने की संभावना हो सकती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह निश्चित रूप से आने ही वाली है। कितनी ही ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती और कितनी ही हमारी आशंकाएँ तथा अपेक्षाएँ कभी सच नहीं होतीं। और यदि वह विपत्ति वास्तव में आने वाली भी हो तो उसके आने से पहले ही शोक मनाने से क्या लाभ? जब वह आएगी तब दुःख करने के लिए पर्याप्त समय होगा। अभी तो अपने लिए कुछ बेहतर बचाकर रखो। इससे तुम्हें क्या प्राप्त होगा? समय। 

    बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घट सकती हैं जो आने वाले संकट को टाल दें। चाहे वह कितना ही निकट क्यों न प्रतीत हो या उसे समाप्त कर दें अथवा उसका रुख किसी और दिशा में मोड़ दें। आग भी कभी-कभी बच निकलने का मार्ग छोड़ देती है। गिरती हुई इमारत कुछ लोगों को बिना गंभीर क्षति पहुँचाए नीचे उतार देती है। तलवार गले तक पहुँचकर भी वापस खिंच जाती है। मृत्यु-दंड पाया हुआ व्यक्ति भी कभी-कभी अपने जल्लाद से अधिक समय तक जीवित रह जाता है। दुर्भाग्य भी स्थिर नहीं होता; उसका स्वभाव चंचल है। हो सकता है कि वह विपत्ति आए, और यह भी हो सकता है कि न आए। लेकिन एक बात निश्चित है, वह इस समय घटित नहीं हो रही है। इसलिए अपनी दृष्टि उन बातों पर रखो जो अच्छी हैं न कि उन आशंकाओं पर जो अभी केवल संभावना मात्र हैं।

    अक्सर ऐसा होता है कि किसी भी प्रकार का संकेत नहीं होता कि कोई बुरी घटना आने वाली है फिर भी मन स्वयं ही झूठी कल्पनाएँ गढ़ लेता है। या तो वह किसी अस्पष्ट कथन का अर्थ सबसे बुरे रूप में निकाल लेता है अथवा यह मान बैठता है कि कोई व्यक्ति वास्तव में जितना क्रोधित है उससे कहीं अधिक क्रोधित है। वह यह नहीं सोचता कि सामने वाला कितना नाराज़ है बल्कि यह सोचकर भयभीत होता है कि क्रोध में वह क्या-क्या कर सकता है। लेकिन यदि भय को उसकी चरम सीमा तक पहुँचने दिया जाए तो जीवन जीने योग्य नहीं रह जाता और हमारे दुखों का कोई अंत नहीं होता। इसलिए कभी विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का उपयोग करो और कभी मानसिक दृढ़ता के बल पर प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले खतरे को भी तुच्छ समझो। यदि यह संभव न हो तो एक दोष को दूसरे दोष से संतुलित करो, भय का संतुलन आशा से करो। जिस बात से तुम डर रहे हो, चाहे वह कितनी ही निश्चित क्यों न प्रतीत होती हो, यह भी उतना ही निश्चित है कि घबराहट शांत हो जाती है और उम्मीद, डर का मजाक बनाती है।

    इसलिए उम्मीद और डर, दोनों पर सावधानीपूर्वक विचार करो। जब परिस्थिति अनिश्चित हो तो अपने ऊपर एक उपकार करो। जिस परिणाम को तुम अधिक पसंद करते हो, उसी पर विश्वास करो। यदि परिस्थितियाँ भय के पक्ष में अधिक झुकी हुई दिखाई दें, तब भी अपने मन को दूसरी दिशा में मोड़ो। स्वयं को व्यर्थ परेशान करना बंद करो। बार-बार इस बात पर विचार करो कि अधिकांश लोग तब भी व्याकुल और परेशान हो जाते हैं, जब न तो कोई वास्तविक विपत्ति उपस्थित होती है और न ही भविष्य के लिए कोई निश्चित संकट दिखाई देता है। क्योंकि एक बार जब मन भय की दिशा में चल पड़ता है तो शायद ही कोई उसे रोक पाता है। कोई भी अपने भय को वास्तविकता के अनुरूप सीमित नहीं करता। कोई यह नहीं कहता, “जिस व्यक्ति ने मुझे यह सूचना दी है, वह भरोसे के योग्य नहीं। वह या तो मनगढ़ंत बातें कर रहा है या स्वयं किसी और की अफवाह पर विश्वास कर बैठा है।” हम अपने आपको हवा के झोंकों की तरह इधर-उधर उड़ने देते हैं। अस्पष्ट और अनिश्चित बातों से ऐसे भयभीत हो जाते हैं मानो वे पूरी तरह सिद्ध तथ्य हों। हम अपना संतुलन खो बैठते हैं और बेचैनी का सबसे छोटा कारण भी तुरंत भय का रूप ले लेता है।

    मुझे यह सब इस प्रकार कहते हुए लज्जा आती है मानो मैं तुम्हें बहुत कोमल उपचारों से दुलार रहा हूँ। कोई दूसरा व्यक्ति कह सकता है, “शायद वह विपत्ति आए ही नहीं।” लेकिन तुम्हें अपने आप से कहना चाहिए, “यदि वह आ भी गई तो क्या हुआ? तब देखा जाएगा कि विजय किसकी होती है। संभव है कि उसका आना ही मेरे हित में हो और ऐसी मृत्यु मेरे जीवन को गौरव प्रदान करे।” सुकरात को महान बनाने वाला विष का वह प्याला था। यदि तुम कैटो से उसकी तलवार छीन लो, वह तलवार जो उसकी स्वतंत्रता की संरक्षक थी... तो तुम उसकी महिमा का बड़ा भाग भी छीन लोगे। लेकिन मैं तुम्हें आवश्यकता से अधिक प्रेरित कर रहा हूँ जबकि तुम्हें प्रेरणा से अधिक स्मरण की आवश्यकता है। हम तुम्हें तुम्हारे स्वभाव से भिन्न किसी दिशा में नहीं ले जा रहे हैं। तुम तो इन सिद्धांतों के लिए ही जन्मे हो। इसलिए तुम्हारे भीतर जो अच्छाई और शक्ति पहले से मौजूद है, उसे और बढ़ाओ। उसे और अधिक सुंदर तथा परिष्कृत बनाओ।

    अब मेरा पत्र समाप्त होने वाला है। केवल उस पर मुहर लगाना शेष है अर्थात् उसे तुम्हारे पास पहुँचाने के लिए एक उत्कृष्ट सूक्ति सौंपनी है। “मूर्खता की बुराइयों में से एक यह भी है कि वह हमेशा जीवन की शुरुआत ही करती रहती है।”

    परम उत्कृष्ट लूसीलियस, इस कथन के अर्थ पर गहराई से विचार करो। तब तुम समझोगे कि यह कितना खेदजनक है कि लोग इतने चंचल होते हैं कि हर दिन जीवन की नई नींव रखने लगते हैं और मृत्यु के द्वार पर खड़े होकर भी नए-नए कार्यों की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपने आस-पास के लोगों के बारे में सोचो। तुम्हें ऐसे वृद्ध दिखाई देंगे जो जीवन के अंतिम चरण में पहुँचकर भी किसी नए व्यवसाय, नई यात्रा या नए पद-प्रतिष्ठा की तैयारी में पहले से अधिक व्यस्त हैं। उस वृद्ध व्यक्ति से अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है जो जीवन के अंत में भी जीवन की शुरुआत करने में लगा हुआ हो?

    मैं इस कथन के लेखक का नाम न बताता, यदि यह एपिक्यूरस की कम प्रसिद्ध और कम प्रचलित उक्तियों में से एक न होती, ऐसी उक्ति जिसकी मैंने न केवल प्रशंसा की है बल्कि उसे अपनाया भी है।


अभी के लिए विदा 



वृद्धावस्था एवं जीवन के संदर्भ में -- पत्र - 12

प्रिय लूसीलियस 

मैं जिधर भी देखता हूँ, अपनी बढ़ती हुई उम्र के संकेत दिखाई देते हैं। शहर के निकट स्थित अपने विला पर पहुँचकर मैंने उसके रख-रखाव पर होने वाले खर्च को लेकर शिकायत करनी शुरू कर दी क्योंकि वह धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा था। मेरे संपत्ति-प्रबंधक ने कहा कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है। वह अपनी ओर से सब कुछ कर रहा है पर मकान अब पुराना हो चुका है। वह विला तो मेरे ही निर्देशन में बनवाया गया था! यदि मेरी ही उम्र के पत्थर और दीवारें इतनी जर्जर हो गई हैं तो मेरा क्या होगा?



    उस पर झुँझलाकर मैंने अपना क्रोध निकालने के लिए निकटतम बहाना पकड़ लिया। मैंने कहा, “वे चिनार के पेड़ स्पष्ट रूप से उपेक्षित हैं। उन पर पत्ते नहीं हैं। उनकी शाखाएँ बुरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी हो गई हैं और धूप से सूख चुकी हैं। उनके तने बदरंग हो गए हैं और उनकी छाल झड़ रही है। यदि उन्हें ठीक से खाद और पानी दिया जाता तो उनकी यह दशा नहीं होती।”

    उसने मेरे पूर्वजों की आत्मा की शपथ खाकर कहा कि वह यह सब कर रहा है और हर प्रकार से उनकी देखभाल कर रहा है पर पेड़ अब बूढ़े हो चले हैं। तुमसे सच कहूँ, उन पेड़ों को मैंने ही लगाया था! जब उन पर पहली बार पत्तियाँ फूटी थीं तब मैं स्वयं वहाँ उपस्थित था और उन्हें देख रहा था।

    फिर मैं द्वार की ओर मुड़ा और पूछा, “यह कौन है? यह तो बिल्कुल जर्जर हो चुका है! इसे द्वार पर खड़ा करना उचित ही था। यह तो मानो जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। तुम इसे कहाँ से ले आए? क्या किसी का बोझ हल्का करने के लिए यह चलता-फिरता शव यहाँ उठा लाए हो?”

    लेकिन उस व्यक्ति ने कहा, “क्या आप मुझे पहचानते नहीं? मैं फेलिसियो हूँ! आप अपनी छोटी-छोटी वस्तुएँ मुझे दिखाने लाया करते थे। मैं संपत्ति-प्रबंधक फिलोस्टितुस का पुत्र हूँ, आपके बचपन का मित्र।”

    मैंने कहा, “यह व्यक्ति पागल हो गया है! क्या अब यह फिर से छोटा बच्चा बन गया है और मेरा खेल का साथी भी? लेकिन शायद ऐसा ही है। इसके दाँत तो इतने गिर चुके हैं कि यह सचमुच बच्चे जैसा लगने लगा है!”

    मेरे उपनगरीय विला ने मेरे लिए एक बड़ा उपकार किया है। उसने हर मोड़ पर मुझे मेरी वृद्धावस्था का बोध करा दिया है। आइए, हम बुढ़ापे को अपनाएँ और उससे प्रेम करें। यदि कोई उसका उचित उपयोग करना जानता हो तो वह अनेक सुखों से भरा हुआ है। फल सबसे अधिक मीठा तब होता है जब वह खराब होने के बिल्कुल निकट होता है। बाल्यावस्था सबसे अधिक आकर्षक तब लगती है जब वह विदा होने वाली होती है और जो व्यक्ति मदिरा का प्रेमी हो, उसके लिए सबसे अधिक आनंद अंतिम प्याले में होता है। वही जो उसे पूरी तरह मदहोश कर देता है और नशे को उसकी चरम सीमा तक पहुँचा देता है। हर सुख अपने सबसे बड़े आनंद को अपने अंतिम क्षणों के लिए बचाकर रखता है। जीवन का सबसे सुखद समय वह है जब वह ढलान पर उतर रहा होता है किंतु अभी अंतिम गिरावट नहीं आई होती। मेरा विश्वास है कि जो समय बिल्कुल किनारे पर खड़ा होता है, उसके भी अपने विशेष आनंद होते हैं। और यदि ऐसा न भी हो तो कम से कम उसमें यह लाभ अवश्य है कि मनुष्य को अब किसी वस्तु की चाह नहीं रह जाती। कितना मधुर अनुभव है अपनी इच्छाओं को पूरी तरह जी लेना, उन्हें क्षीण कर देना और अंततः अपने पीछे छोड़ देना!

    तुम कहते हो, “मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखना दुखद है।” पहली बात तो यह है कि मृत्यु केवल वृद्धों के सामने ही नहीं, युवाओं के सामने भी समान रूप से उपस्थित रहती है क्योंकि हमें मृत्यु का बुलावा आयु की गणना देखकर नहीं आता। दूसरी बात, कोई भी व्यक्ति इतना वृद्ध नहीं होता कि वह एक और दिन जीने की आशा करने का अधिकारी न हो। और एक दिन भी जीवन की सीढ़ी का एक पायदान है।

    सम्पूर्ण जीवन अनेक भागों से मिलकर बना है, जैसे बड़े वृत्त अपने भीतर छोटे-छोटे वृत्तों को समेटे रहते हैं। एक वृत्त उन सभी को अपने भीतर समाहित करता है। यह जन्म से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक की पूरी अवधि है। दूसरा वृत्त युवावस्था के वर्षों को घेरे रहता है एक अन्य वृत्त सम्पूर्ण बाल्यावस्था को अपने घेरे में बाँधता है। इसी प्रकार एक वर्ष अपने भीतर उन सभी समय-खंडों को समेटे रहता है जिनके बार-बार जुड़ने से पूरा जीवन बनता है। एक महीना उससे भी छोटे वृत्त से सीमित है, और एक दिन सबसे छोटे वृत्त से। किन्तु एक दिन भी अपने आरम्भ से अंत तक चलता है, सूर्योदय से सूर्यास्त तक। इसी कारण, अपने गूढ़ और कठिन कथनों के लिए प्रसिद्ध दार्शनिक हेराक्लिटस (Heraclitus) ने कहा था, “एक दिन प्रत्येक दिन के बराबर है।”

    इस कथन की विभिन्न प्रकार से व्याख्या की जाती है। एक व्यक्ति कहता है कि “समान” का अर्थ है “घंटों की संख्या में समान”। यह बात काफ़ी हद तक सही है क्योंकि यदि एक दिन चौबीस घंटों का होता है तो सभी दिन अनिवार्य रूप से एक-दूसरे के समान हैं। दिन के समय में जो कमी होती है, उसकी भरपाई रात कर देती है। दूसरा व्यक्ति कहता है कि एक दिन अपनी प्रकृति में सभी दिनों के समान है। क्योंकि समय की सबसे लंबी अवधि में भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जो एक दिन में न पाया जाता हो। दोनों में प्रकाश और अंधकार होते हैं। आकाशीय चक्रों की नियमित गति हमें कभी अधिक रातें और कभी अधिक दिन देती है पर उनकी मूल प्रकृति को नहीं बदलती। यद्यपि दिन कभी छोटे होते हैं और कभी लंबे। अतः प्रत्येक दिन को इस प्रकार जीना चाहिए मानो वह सबसे अंतिम दिन हो। मानो वही हमारे जीवन की पूर्णता, उसकी परिणति और उसकी अंतिम उपलब्धि हो।

    पैकुवियस (Pacuvius), जिसने अधिकार और संपत्ति के बल पर सीरिया को मानो अपना निजी राज्य बना लिया था, अपने लिए प्रतिदिन अंतिम संस्कार जैसे अनुष्ठान आयोजित किया करता था। मदिरापान और भोज के बाद वह स्वयं को बिस्तर तक उठाकर ले जाने को कहता जबकि उसके सेवक ताली बजाते और वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ यूनानी भाषा में गाते,  “जीवन समाप्त हो गया! जीवन समाप्त हो गया!” इस प्रकार वह प्रतिदिन अपना ही अंतिम संस्कार किया करता था। आओ, हम भी ऐसा ही करें। परन्तु उसके समान बुरे कारणों से नहीं बल्कि अच्छे कारणों से। प्रसन्न और संतोषपूर्ण मन से, जब हम विश्राम के लिए जाएँ, तो कह सकें —

“मैंने जीवन जी लिया है
भाग्य ने मेरे लिए जो दौड़ निर्धारित की थी, उसे मैंने पूरा कर लिया है।”

    यदि ईश्वर हमें एक और कल प्रदान करे तो हमें उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। सबसे सुखी व्यक्ति, और वह जो स्वयं का सबसे निश्चिंत स्वामी है, वही है जो आने वाले कल की प्रतीक्षा बिना किसी चिंता के करता है। जिसने यह कह दिया है, “मैं जीवन जी चुका हूँ”, वह प्रत्येक सुबह लाभ के साथ उठता है क्योंकि उसे एक अतिरिक्त दिन प्राप्त हुआ है। अब समय आ गया है कि मैं इस पत्र को समाप्त करूँ। “क्या?” तुम कहते हो, “क्या यह पत्र मेरे पास बिना किसी उपहार के ही पहुँचेगा?” निश्चिंत रहो, यह तुम्हारे लिए कुछ न कुछ अवश्य ला रहा है। पर मैं ‘कुछ’ क्यों कहूँ? यह तो बहुत कुछ ला रहा है। उस वचन से बढ़कर क्या हो सकता है जिसे मैं अब इस पत्र के माध्यम से तुम्हें सौंप रहा हूँ—

“बंधन में जीना बुरा है, पर किसी को भी बंधन में जीने के लिए विवश नहीं किया जाता।”

    यह कैसे संभव हो सकता है? स्वतंत्रता के मार्ग हर ओर खुले पड़े हैं, अनेक मार्ग और वे भी छोटे तथा सरल। ईश्वर का धन्यवाद कि किसी भी मनुष्य को जीवित रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हम उन्हीं बंधनों को रौंद सकते हैं जो हमें बाँधने का प्रयास करते हैं।

    “यह तो एपिक्यूरस ने कहा था,” तुम कहते हो। “तुम्हें किसी दूसरे की संपत्ति से क्या लेना-देना?” जो कुछ सत्य है, वह मेरा अपना है। मैं तुम्हें आगे भी एपिक्यूरस के विचार सुनाता रहूँगा, विशेषकर उन लोगों के लाभ के लिए जो किसी कथन को शब्दशः दोहराते हैं और यह नहीं देखते कि क्या कहा जा रहा है बल्कि केवल यह देखते हैं कि उसे किसने कहा है। इस प्रकार वे जान सकेंगे कि श्रेष्ठ विचार किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होते बल्कि सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होते हैं।

अभी के लिए विदा 

Sunday, 21 June 2026

भावों और सद्गुणी व्यक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 11

प्रिय लूसीलियस 

आपके उस आशाजनक युवा मित्र के साथ हुई मेरी बातचीत ने तुरंत ही मुझे यह दिखा दिया कि उसमें कितनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा है और वास्तव में उसने कितनी प्रगति भी कर ली है। उसने हमें अपने व्यक्तित्व की एक झलक दिखाई और उसका शेष व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा क्योंकि जो कुछ उसने कहा, वह पहले से तैयार किया हुआ नहीं था। वह अचानक ऐसी स्थिति में आ गया था जहाँ उसे बिना तैयारी के बोलना पड़ा। जब उसने स्वयं को संभालना शुरू किया तो उसके चेहरे पर गहरी लज्जा की लालिमा छा गई क्योंकि वह उस संकोच और विनम्रता से मुक्त नहीं हो सका था, जो किसी युवा व्यक्ति में एक अत्यंत शुभ और प्रशंसनीय गुण माना जाता है।



    मुझे लगता है कि वह उन लोगों में से है जो पूर्णतः परिपक्व हो जाने, सभी दोषों से मुक्त हो जाने, यहाँ तक कि बुद्धिमान बन जाने के बाद भी इस प्रवृत्ति को बनाए रखेंगे। क्योंकि शरीर और मन की कुछ स्वाभाविक कमजोरियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बुद्धिमत्ता पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। जो बातें जन्मजात और प्रकृति द्वारा आरोपित हैं उन्हें अभ्यास और अनुशासन से कुछ हद तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है पर पूरी तरह जीता नहीं जा सकता। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं फिर भी सार्वजनिक रूप से उपस्थित होते ही उनके शरीर में पसीना आने लगता है, मानो वे अत्यधिक थके हुए हों या गर्मी से व्याकुल हों। कुछ अन्य लोगों के घुटने भाषण देने से पहले काँपने लगते हैं, उनके दाँत बजने लगते हैं, होंठ सख्त हो जाते हैं और जीभ लड़खड़ाने लगती है। इन प्रवृत्तियों को न तो शिक्षा समाप्त कर सकती है और न ही निरंतर अभ्यास। प्रकृति अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती रहती है और इन कमजोरियों के माध्यम से सबसे दृढ़ व्यक्तियों को भी यह स्मरण कराती है कि उनकी अपनी एक मानवीय प्रकृति है। मेरा विश्वास है कि लज्जा के कारण चेहरा लाल हो जाना भी ऐसी ही एक प्रवृत्ति है। यह सबसे संयमी और परिपक्व व्यक्तियों में भी अचानक प्रकट हो जाती है। निस्संदेह युवाओं में यह अधिक दिखाई देती है क्योंकि उनमें स्वाभाविक ऊष्मा अधिक होती है और उनका रंग-रूप अधिक कोमल होता है किन्तु यह अनुभवी सैनिकों और वृद्ध व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है। कुछ लोग तो उस समय सबसे अधिक खतरनाक हो जाते हैं जब उनका चेहरा लाल हो उठता है मानो उनकी सारी लज्जा उसी लालिमा में समा गई हो।

    सुला (Sulla) तब सबसे अधिक उग्र और हिंसक हो जाता था जब उसके गालों पर रक्त की लालिमा छा जाती थी। पोमपाए (Pompey) के चेहरे से अधिक सौम्य कुछ नहीं था फिर भी जब भी वह लोगों के बीच होता, विशेषकर भाषण देते समय, उसका चेहरा लाल हो जाता था। मुझे स्मरण है कि पैपिरियसस फैबीअनस (Papirius Fabianus) जब सीनेट के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाए गए, तब उनका चेहरा भी लाल हो गया था। उनके भीतर यह संकोच और विनम्रता कुछ ऐसी शोभा देती थी कि वह विशेष रूप से आकर्षक प्रतीत होती थी।

    यह किसी मानसिक दुर्बलता के कारण नहीं होता बल्कि केवल इसलिए कि व्यक्ति उस परिस्थिति का अभ्यस्त नहीं होता। जिन लोगों को किसी अनुभव की आदत नहीं होती, वे भयभीत न होने पर भी इस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं, यदि उनके शरीर की स्वाभाविक प्रवृत्ति लज्जा से लाल पड़ जाने की हो। जैसे कुछ लोगों का रक्त स्वभावतः मंद गति का होता है, वैसे ही कुछ लोगों का रक्त अत्यन्त सक्रिय और तीव्र होता है, जो शीघ्र ही चेहरे तक पहुँच जाता है और उसे लाल कर देता है। जैसा कि मैंने कहा, ऐसी विशेषताएँ किसी भी मात्रा की बुद्धिमत्ता से समाप्त नहीं की जा सकतीं। यदि बुद्धिमत्ता सभी प्रकार के दोषों को मिटा सकती तो वह स्वयं प्रकृति पर शासन करने लगती। किन्तु ऐसा नहीं है। जन्म की परिस्थितियों और शरीर की प्राकृतिक बनावट से जो गुण अथवा प्रवृत्तियाँ हमें प्राप्त होती हैं, वे तब भी हमारे साथ बनी रहती हैं जब मन दीर्घकालीन साधना और आत्म-अनुशासन के द्वारा बहुत हद तक स्थिर और संतुलित हो चुका होता है। इनमें से किसी भी प्रवृत्ति को न तो आदेश देकर दबाया जा सकता है और न ही इच्छा करने मात्र से बुलाया जा सकता है। वे हमारी प्रकृति का हिस्सा हैं और अपने समय पर स्वयं प्रकट होती हैं।

    अभिनेता भावनाओं की नकल कर लेते हैं। वे भय और कम्पन का अभिनय कर सकते हैं। वे शोक का प्रदर्शन भी कर सकते हैं। लेकिन जब उन्हें संकोच या लज्जाशीलता दिखानी होती है तो वे केवल सिर को झुका लेते हैं, अपनी आवाज़ धीमी कर लेते हैं और अपनी दृष्टि भूमि पर टिकाए रखते हैं। पर वे स्वयं को वास्तव में लाल नहीं कर सकते क्योंकि चेहरे पर आने वाली लज्जा की लालिमा न तो इच्छा से उत्पन्न की जा सकती है और न ही इच्छा से रोकी जा सकती है। ऐसी बातों के विषय में बुद्धिमत्ता कोई वादा नहीं कर सकती और न ही उनमें कोई प्रगति कर सकती है। ये अपने ही अधिकार-क्षेत्र में आती हैं। वे बिना बुलाए आती हैं और बिना बुलाए ही चली जाती हैं।

    अब यह पत्र अपने समापन की माँग कर रहा है। लो, इसका समापन प्रस्तुत है और ऐसा समापन जो उपयोगी भी है और आत्मा के लिए कल्याणकारी भी। मैं सुझाव देता हूँ कि तुम इसे अपने मन में दृढ़ता से बसा लो। हमें किसी श्रेष्ठ और सद्गुणी व्यक्ति के प्रति गहरा सम्मान और अनुराग विकसित करना चाहिए तथा उसे सदैव अपनी आँखों के सामने उपस्थित मानना चाहिए ताकि हम इस प्रकार जीवन जिएँ मानो वह हमें देख रहा हो और प्रत्येक कार्य इस प्रकार करें मानो उसकी दृष्टि हम पर बनी हुई हो।

    प्रिय ल्यूसीलियस, यह शिक्षा एपिक्यूरस ने दी थी। उन्होंने हमें एक संरक्षक और एक शिक्षक प्रदान किया और यह बिल्कुल उचित भी था। क्योंकि जब लोग कोई गलत कार्य करने वाले होते हैं और उन्हें लगता है कि कोई साक्षी उपस्थित है तो वे प्रायः उस कार्य से रुक जाते हैं। मन के पास भी ऐसा कोई व्यक्ति होना चाहिए जिसके प्रति वह सम्मान अनुभव करे और जिसकी नैतिक प्रतिष्ठा तथा अधिकार के कारण वह अपने एकांत को भी अधिक पवित्र और मर्यादित बना सके।

    धन्य है वह व्यक्ति जो हमें केवल अपनी उपस्थिति में ही नहीं बल्कि मात्र उसकी कल्पना करने से भी बेहतर बना देता है! और धन्य है वह व्यक्ति जो किसी के प्रति इतना गहरा सम्मान रखता है कि केवल उसका स्मरण भर उसके जीवन में व्यवस्था, संयम और शांति ले आता है। जो व्यक्ति इस प्रकार श्रद्धा करना जानता है, वह शीघ्र ही स्वयं भी श्रद्धा के योग्य बन जाता है। इसलिए कैटो (Cato) को चुनो या, यदि तुम्हें लगता है कि कैटो कुछ अधिक कठोर हैं तो गैअस लैलिअस (Gaius Laelius) को चुनो जिनका स्वभाव अधिक सौम्य था। किसी ऐसे व्यक्ति को चुनो जिसकी कर्मशीलता, वाणी और यहाँ तक कि जिसका मुखमंडल भी तुम्हें प्रिय हो क्योंकि चेहरा अक्सर भीतर के मन का परिचय देता है। उस व्यक्ति को सदैव अपनी दृष्टि के सामने रखो। अपने संरक्षक या अपने आदर्श के रूप में। मैं फिर कहता हूँ, हमें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो हमारे आचरण का मानदंड निर्धारित कर सके।तुम कभी भी टेढ़ी वस्तु को सीधा नहीं कर सकते, जब तक तुम्हारे पास उसे नापने के लिए कोई सीधा पैमाना न हो।

अभी के लिए विदा  




दर्शन द्वारा मन को उत्कृष्ट बनाने के संदर्भ में -- पत्र - 17

प्रिय लूसीलियस  यदि तुम बुद्धिमान हो या बुद्धिमान बनना चाहते हो तो इन सबको फेंक दो। अपनी पूरी गति और अपनी पूरी शक्ति के साथ मन की उत्कृष्टता...