Thursday, 6 August 2026

कर्म जो सद्गुण हैं, के बारे में - पत्र - 118

 प्रिय लूसीलियस 


तुम्हारे पत्र में अनेक छोटे-छोटे प्रश्न उठाए गए थे पर अंततः वह एक ही प्रश्न पर आकर ठहर गया। तुमने मुझसे पूछा है कि हमारे मन में ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ (honorable) की अवधारणा कैसे उत्पन्न हुई। कुछ दार्शनिकों के अनुसार ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ दो भिन्न वस्तुएँ हैं किन्तु हम स्टोइक इन्हें केवल भेदयुक्त मानते हैं, अलग नहीं। 



    मेरा आशय यह है कि कुछ लोग ‘शुभ’ को केवल वही मानते हैं जो उपयोगी हो। इसलिए वे धन, घोड़े, शराब और जूतों तक को ‘शुभ’ कह देते हैं। उनके लिए ‘शुभ’ का मूल्य इतना गिर जाता है कि वह साधारण उपयोग की वस्तुओं तक सीमित रह जाता है। दूसरी ओर, उनके मत में ‘सम्माननीय’ वह है जो किसी पूर्णतः उचित कर्म के तर्कसंगत स्वरूप के अनुरूप हो जैसे, वृद्ध पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करना, निर्धन मित्र की सहायता करना, साहसपूर्वक युद्ध करना, अथवा विवेकपूर्ण और संतुलित नीति-भाषण देना। हम भी ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ में एक प्रकार का भेद स्वीकार करते हैं, किन्तु उन्हें मूलतः एक ही मानते हैं। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती, जब तक वह सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह अनिवार्य रूप से शुभ भी है। इन दोनों धारणाओं के बीच का अंतर मैं फिर से विस्तार से नहीं बताऊँगा क्योंकि इसका उल्लेख मैं पहले अनेक बार कर चुका हूँ। केवल एक बात कहूँगा, हमारे मत में कोई भी वस्तु शुभ नहीं हो सकती, जिसका दुरुपयोग किया जा सके। तुम स्वयं देख सकते हो कि कितने लोग धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और शारीरिक बल का दुरुपयोग करते हैं।

    अब मैं उस प्रश्न पर लौटता हूँ, जिस पर तुम मुझसे चर्चा करना चाहते हो। हमने सबसे पहले ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ की अवधारणा कैसे प्राप्त की? प्रकृति हमें यह नहीं सिखा सकती थी क्योंकि प्रकृति ने हमें ज्ञान नहीं दिया है बल्कि केवल ज्ञान के बीज दिए हैं। कुछ दार्शनिकों का कहना है कि यह अवधारणा हमें संयोगवश प्राप्त हो गई किन्तु यह विश्वास करना कठिन है कि कोई व्यक्ति केवल संयोग से सद्गुण की धारणा तक पहुँच गया हो। हमारा मत यह है कि ‘सम्माननीय’ और ‘शुभ’ की अवधारणा बार-बार होने वाले कर्मों के निरीक्षण और उनकी तुलना के द्वारा निष्कर्ष रूप में प्राप्त होती है। हमारे मतानुसार इन्हें ‘एनालॉजी’ (analogy- समानता के आधार पर) के आधार पर समझा जाता है।

    चूँकि इस शब्द ‘एनालॉजी’ (analogy) को लैटिन विद्वानों ने अपनी भाषा में अपना लिया है। इसलिए मेरा विचार है कि इसे अस्वीकार करने के बजाय रोमन भाषा-समुदाय में पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए। अतः मैं इसका प्रयोग केवल वैध शब्द के रूप में ही नहीं बल्कि एक पूर्णतः स्थापित शब्द के रूप में भी करूँगा। अब मैं स्पष्ट करता हूँ कि यह ‘एनालॉजी’ क्या है। हम शरीर के स्वास्थ्य से परिचित थे। उसी के आधार पर हमने यह समझा कि मन का भी एक स्वास्थ्य होता है। हम शरीर की शक्ति को जानते थे। उसी से हमने निष्कर्ष निकाला कि मन की भी एक शक्ति होती है। उदारता, मानवता और साहस के कुछ कार्यों ने हमें विस्मित कर दिया। हमने उनकी प्रशंसा ऐसे करनी शुरू की मानो वे पूर्णतः निर्दोष हों। यद्यपि उनमें अनेक दोष भी थे किन्तु किसी एक उत्कृष्ट कर्म की दीप्ति ने उन दोषों को ढँक दिया था और हमने उन्हें अनदेखा कर दिया। प्रकृति हमें यह प्रेरणा देती है कि प्रशंसनीय कर्मों को महान मानें और प्रत्येक व्यक्ति उनकी प्रशंसा करते समय प्रायः वास्तविकता से आगे बढ़ जाता है। इन्हीं कर्मों के आधार पर हमने एक महान शुभ की अवधारणा निर्मित की। 

    फ़ैब्रिसियस (रोमन सेनापति और राजनेता) ने पायरूस (प्राचीन यूनान के एपिरस राज्य के राजा) द्वारा दिया गया स्वर्ण अस्वीकार कर दिया। उसके विचार में किसी राजा के धन का तिरस्कार कर सकना, स्वयं किसी राज्य का स्वामी होने से भी अधिक महान था। बाद में, जब पायरूस के चिकित्सक ने उसे विष देकर मार डालने का प्रस्ताव किया, तब उसी फ़ैब्रिसियस ने राजा को इस षड्यंत्र से सावधान कर दिया। इन दोनों कार्यों में उसके चरित्र की एक ही दृढ़ता प्रकट होती है न तो स्वर्ण से खरीदा जाना और न ही विष देकर विजय प्राप्त करना। हमने ऐसे महान पुरुष की प्रशंसा की, जो न तो राजा के उपहारों से प्रभावित हुआ और न ही राजा के विरुद्ध दिए गए प्रस्तावों से। वह अपने आदर्शों पर अटल रहा और उसने वह कार्य किया, जो सबसे कठिन होता है, युद्ध की स्थिति में भी अपनी नैतिक निष्कलुषता बनाए रखना। उसका विश्वास था कि शत्रु के साथ भी अन्याय नहीं किया जाना चाहिए। अत्यन्त निर्धनता में जीवन बिताते हुए भी, जिसे वह अपने गौरव का विषय मानता था, उसने धन को उसी प्रकार ठुकरा दिया, जैसे उसने विष के प्रयोग को अस्वीकार किया था। उसने कहा, “पायरूस, मेरे कारण जीवित रहो और अब उस बात पर प्रसन्न हो जाओ जो पहले तुम्हें दुःख देती थी कि फ़ैब्रिसियस को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता।” 

    होरातियस कोक्लेस (प्राचीन रोम का एक महान वीर और लोकनायक) अकेला ही उस संकरे पुल पर डट गया। उसने अपने साथियों को आदेश दिया कि वे उसके पीछे का पुल काट दें ताकि शत्रु के लिए आगे बढ़ने का मार्ग बंद हो जाए। वह तब तक आक्रमणकारियों को रोके रहा, जब तक कि गिरते हुए पुल की विशाल लकड़ियों के टूटने की प्रचंड ध्वनि उसके कानों में नहीं गूँज उठी। जब उसने पीछे मुड़कर देखा और पाया कि उसके अपने संकट ने उसके देश को संकट से मुक्त कर दिया है, तब उसने पुकारकर कहा, “आओ, यदि कोई उसी मार्ग से मेरा पीछा करना चाहता है, जिस मार्ग से मैं जा रहा हूँ!” इसके बाद वह सीधे नदी में कूद पड़ा। प्रबल वेग से बहती धारा को पार करते समय उसने अपने शस्त्रों की रक्षा उतनी ही सावधानी से की, जितनी अपने प्राणों की। अंततः वह अपने विजयी शस्त्रों का सम्मान अक्षुण्ण रखते हुए उतनी ही सुरक्षित लौट आया, मानो उसने पुल पार करके ही वापसी की हो।  

    ऐसे और इसी प्रकार के कर्मों ने हमें सद्गुण का स्वरूप समझाया। अब मैं एक ऐसी बात जोड़ूँगा जो तुम्हें आश्चर्यजनक लग सकती है। कभी-कभी हमें सम्माननीय के स्वरूप का ज्ञान बुरी बातों से भी प्राप्त हुआ अर्थात उत्कृष्टता अपने विपरीत के माध्यम से भी स्पष्ट हुई। जैसा कि तुम जानते हो, कुछ सद्गुण और दुर्गुण एक-दूसरे के बहुत निकट प्रतीत होते हैं। यहाँ तक कि दुष्ट और अनैतिक व्यक्तियों में भी कभी-कभी सदाचार का आभास दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, अपव्ययी व्यक्ति उदार होने का भ्रम उत्पन्न करता है। जबकि देना जानने और बचाकर रखना न जानने के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लूसीलियस, मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसे बहुत-से लोग हैं जो अपना धन दान नहीं करते बल्कि उसे केवल उड़ा देते हैं। मैं उस व्यक्ति को उदार नहीं कह सकता जिसे धन का कोई मूल्य ही न हो। इसी प्रकार लापरवाही कभी-कभी सरल स्वभाव जैसी लगती है और उतावलापन साहस का आभास देता है। 

    इसी प्रकार की समानता ने हमें विवश किया कि हम विचार करें और उन बातों में भेद स्थापित करें जो देखने में तो एक जैसी लगती हैं किन्तु वास्तव में अत्यन्त भिन्न होती हैं। जब हमने उन लोगों को देखा जो किसी एक महान कार्य के कारण प्रसिद्ध हो गए थे, तब हमने यह भी ध्यान देना आरम्भ किया कि ऐसा व्यक्ति किसी एक अवसर पर तो बड़े उत्साह और गौरव के साथ श्रेष्ठ कार्य कर सकता है, किन्तु केवल उसी एक अवसर पर। हमने किसी व्यक्ति को युद्ध में साहसी देखा किन्तु जनसभा में भयभीत। हमने उसे निर्धनता को धैर्यपूर्वक सहते हुए देखा, किन्तु अपमान का सामना करते समय अत्यन्त हीन और दुर्बल पाया। उसके कार्य की हमने प्रशंसा की, परन्तु उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं किया। इसके विपरीत, हमने एक दूसरे व्यक्ति को देखा जो अपने मित्रों के प्रति दयालु था, अपने शत्रुओं के प्रति सहनशील था तथा सार्वजनिक और निजी, दोनों प्रकार के जीवन में कर्तव्यनिष्ठ और सम्मानशील था। 

    हमने देखा कि वह अपने कष्टों को कितने धैर्य से सहता है और अपने दायित्वों का निर्वाह कितनी दूरदर्शिता से करता है। जब धन देने की आवश्यकता होती तो वह उदारतापूर्वक देता और जब परिश्रम अपेक्षित होता तो वह बिना थके परिश्रम करता तथा अपने चरित्र की दृढ़ता से थकान पर विजय पा लेता। इसके अतिरिक्त, वह प्रत्येक कार्य में सदैव एक-सा रहता था। उसका आचरण परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली नीति पर आधारित नहीं था बल्कि ऐसे दृढ़ संस्कार के मार्गदर्शन में था जिसने उसे केवल उचित कर्म करने में समर्थ ही नहीं बनाया था, बल्कि अनुचित कर्म करना उसके लिए असंभव-सा कर दिया था। ऐसे व्यक्ति में हमने समझा कि सद्गुण अपनी पूर्णता को प्राप्त कर चुका है। 

    इसके बाद हमने इस सद्गुण के विभिन्न अंगों का विभाजन किया। यह उचित था कि इच्छाओं को संयमित किया जाए, भय को नियंत्रण में रखा जाए, प्रत्येक कार्य बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को उसका उचित अधिकार दिया जाए। इस प्रकार हमने संयम, साहस, विवेक और न्याय को समझा तथा प्रत्येक के लिए उसका विशिष्ट कार्य निर्धारित किया। तो फिर हमें सद्गुण की समझ कहाँ से प्राप्त हुई? उस मनुष्य के सुव्यवस्थित जीवन ने हमें उसका परिचय कराया, उसके गरिमापूर्ण आचरण, उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, उसके सभी कर्मों के बीच विद्यमान सामंजस्य और प्रत्येक कठिनाई पर विजय प्राप्त करने वाली उसकी महानता ने हमें सद्गुण का स्वरूप दिखाया। इसी प्रकार हम सुख की उस अवस्था को समझ पाए, ऐसे जीवन को, जो सहज प्रवाह के साथ चलता है और जो पूर्णतः अपने ही नियंत्रण में रहता है।  

    फिर यह बात हमें कैसे स्पष्ट हुई? मैं तुम्हें बताता हूँ। पूर्ण मनुष्य अर्थात वह जो सद्गुण से संपन्न था, कभी अपने भाग्य को कोसता नहीं था और न ही परिस्थितियों का सामना उदास या कटु मुखमुद्रा के साथ करता था।वह स्वयं को समस्त विश्व का नागरिक और सैनिक मानता था। इसलिए वह प्रत्येक श्रम को ऐसे स्वीकार करता था, मानो वह उसे सौंपा गया कोई आदेश हो। उसने किसी भी घटना को कष्टदायक बाधा या दुर्भाग्य नहीं माना बल्कि अपने लिए नियत एक कर्तव्य समझा। वह कहता था, “यह जो कुछ भी है, यही मेरा कार्य है। यदि यह कठिन और दुर्गम है, तो आओ, इसे पूरा करने में लग जाएँ।” इसी कारण उस व्यक्ति की महानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी, जो कभी विपत्तियों पर कराहता नहीं था और न ही अपने भाग्य की शिकायत करता था। उसने बहुत-से लोगों को अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय कराया। वह अंधकार में दीपक की भाँति प्रकाशित होता था और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता था, क्योंकि वह शांत और सौम्य था तथा मानवीय परिस्थितियों और ईश्वर की व्यवस्था, दोनों को समान भाव से स्वीकार करता था। उसका मन पूर्ण था और अपनी सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर चुका था।  

    उससे श्रेष्ठ केवल दैवी बुद्धि हो सकती है, जिसका एक अंश हमारे इस नश्वर हृदय में अवतरित हुआ है। यह हृदय तब सबसे अधिक दिव्य होता है, जब वह अपनी नश्वरता पर विचार करता है। तब वह समझता है कि मनुष्य का जन्म इस शरीर में केवल जीवन की निर्धारित अवधि पूरी करने के लिए हुआ है। यह शरीर उसका स्थायी घर नहीं, बल्कि एक प्रकार का अस्थायी अतिथिगृह है, जिसे उसे तब छोड़ देना चाहिए, जब उसे अनुभव हो कि अब वह अपने मेज़बान पर बोझ बनने लगा है। 

    लुसिलियस, मैं तुम्हें विश्वासपूर्वक कहता हूँ कि जब मन यह पहचान लेता है कि उसका वर्तमान निवास कितना तुच्छ और सीमित है तथा उसे छोड़ने से भयभीत नहीं होता, तब वह इस बात का अत्यन्त प्रबल संकेत देता है कि उसका उद्गम किसी उच्चतर स्रोत से हुआ है। जब हम यह स्मरण रखते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, तभी हम यह भी जान लेते हैं कि हमें कहाँ जाना है। क्या हम नहीं देखते कि हमारा शरीर कितनी असुविधाओं से घिरा रहता है और हम उससे कितने असंतुष्ट रहते हैं? कभी हम अपने सिर की शिकायत करते हैं, कभी पेट की, कभी छाती और गले की। कभी मांसपेशियों में पीड़ा होती है तो कभी पैरों में दर्द। कभी अतिसार होता है तो कभी नाक बहने लगती है। कभी शरीर में रक्त अधिक हो जाता है तो कभी उसकी कमी हो जाती है। हम चारों ओर से रोगों और कष्टों से घिरे रहते हैं और मानो अपने ही घर से निकाल दिए जाते हैं। यही दशा उन लोगों की होती है, जो दूसरे के घर में रहते हैं। फिर भी, जबकि हमें ऐसा क्षयशील शरीर मिला है, हम अनन्त काल तक जीवित रहने की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपनी आशाओं में हम मनुष्य-जीवन की अधिकतम सीमा तक अधिकार करना चाहते हैं। न धन की कोई सीमित मात्रा हमें संतुष्ट करती है और न ही प्रभाव और प्रतिष्ठा की कोई सीमा। 

    इससे अधिक निर्लज्ज और इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? जबकि हमारी मृत्यु निकट है, तब भी हमारे लिए कुछ भी पर्याप्त नहीं होता। वास्तव में, हम अभी से मर रहे हैं। प्रत्येक दिन हमें हमारे अंतिम क्षण के और निकट ले आता है, और प्रत्येक घड़ी हमें उस स्थान की ओर धकेल रही है, जहाँ से अंततः हमें गिरना ही है। देखो, हमारे मन पर कैसी अंधता छाई हुई है! जिसे मैं भविष्य कहता हूँ, वह अभी इसी क्षण घटित हो रहा है और उसका एक बड़ा भाग तो पहले ही बीत चुका है। जितना जीवन हम जी चुके हैं, वह अब उसी स्थान पर पहुँच चुका है जहाँ हमारे जन्म से पहले था। हम अपने अंतिम दिन से व्यर्थ ही भयभीत होते हैं; प्रत्येक दिन हमें मृत्यु की ओर समान रूप से अग्रसर करता है। डगमगाते हुए कदम हमें थकाते नहीं, वे केवल यह बता देते हैं कि हम पहले से ही थक चुके हैं। हमारा अंतिम दिन मृत्यु तक पहुँचा देता है, किन्तु हमारा प्रत्येक दिन उसी की ओर बढ़ता रहता है। मृत्यु हमें एक ही क्षण में नहीं पकड़ लेती। वह तो धीरे-धीरे, प्रतिदिन हमारा कुछ-न-कुछ अंश छीनती चली जाती है। 

    अतः वह महान मस्तिष्क, जो अपने उच्चतर स्वरूप से परिचित है, जिस स्थान पर उसे रखा गया है वहाँ सम्मानपूर्वक और परिश्रमपूर्वक अपना कर्तव्य निभाने का पूरा प्रयास करता है। किन्तु वह अपने चारों ओर की किसी भी वस्तु को अपना नहीं मानता। वह उनका उपयोग केवल उधार में मिली वस्तुओं के समान करता है, जैसे कोई यात्री यात्रा के दौरान अस्थायी रूप से किसी सराय की वस्तुओं का उपयोग करता है और फिर आगे बढ़ जाता है। जब हमने ऐसे दृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति को देखा, तब उसके उत्कृष्ट स्वभाव की कल्पना किए बिना कैसे रह सकते थे? विशेषतः तब, जब उसके चरित्र की निरंतर एकरूपता, जैसा कि मैंने कहा, यह प्रमाणित करती थी कि उसकी महानता वास्तविक है। सत्य स्थिर और सुसंगत होता है। असत्य टिक नहीं सकता। 

    कुछ लोग कभी वातिनियस (पहली शताब्दी ईसा पूर्व के एक रोमन राजनेता) बन जाते हैं तो कभी कैटो। कभी उन्हें लगता है कि क्यूरियस (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रसिद्ध रोमन सेनापति और राजनेता) पर्याप्त कठोर नहीं है, फ़ैब्रिसियस पर्याप्त निर्धन नहीं है और ट्यूबेरो पर्याप्त मितव्ययी तथा सादा जीवन जीने वाला नहीं है। फिर कभी वही लोग धन-संपत्ति में लिसिनस (वे सम्राट औगस्टस के काल के एक मुक्तदास) की बराबरी करना चाहते हैं, स्वादिष्ट भोजन के शौक में अपीसियस (रोम के अत्यंत धनी और विलासप्रिय व्यक्ति) का अनुकरण करते हैं और विलासिता तथा परिष्कृत जीवन में मैकेनास जैसा बनना चाहते हैं। दुष्ट चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उसमें स्थिरता नहीं होती। वह निरंतर बदलता रहता है और कभी सद्गुणों का दिखावा करता है तो कभी दुर्गुणों से प्रेम करने लगता है। कभी उसके पास दो सौ दास होते थे और कभी केवल दस। कभी वह बड़े-बड़े विषयों, राजाओं और राजकुमारों की बातें करता था। कभी कहता था, “मेरे लिए तो बस तीन पैरों वाली एक छोटी-सी मेज़, नमक रखने का एक पात्र और घर में बुना हुआ एक ऊनी चोगा ही पर्याप्त है, जो मुझे ठंड से बचा सके।” किन्तु यदि ऐसे इस अल्प में संतुष्ट रहने का दावा करने वाले व्यक्ति को दस लाख सेस्टर्स (रोमन मुद्रा) दे दिए जाएँ तो वे पाँच ही दिनों में समाप्त हो जाएँगे। 

    ऐसे लोगों की संख्या बहुत है, जिनका वर्णन होरातियस फ्लैकस (होरेस) ने किया है। ऐसे व्यक्ति, जो कभी एक जैसे नहीं रहते बल्कि इतनी भिन्न-भिन्न दिशाओं में भटकते रहते हैं कि अंततः स्वयं अपने ही समान नहीं रह जाते। क्या मैंने कहा, “बहुत-से”? मेरा आशय तो लगभग सभी लोगों से था। लगभग प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन अपनी योजनाएँ और अपनी आकांक्षाएँ बदलता रहता है। आज वह विवाह करना चाहता है, तो अगले ही दिन केवल एक प्रेमिका से संतुष्ट रहना चाहता है। कभी वह लोगों पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा रखता है, तो कभी उसका व्यवहार दास से भी अधिक चापलूसीपूर्ण हो जाता है। कभी वह अपने महत्व का इतना प्रदर्शन करता है कि लोगों की घृणा का पात्र बन जाता है तो कभी स्वयं को इतना तुच्छ दिखाता है कि निम्नतम श्रेणी के लोगों से भी अधिक आत्महीन प्रतीत होता है। कभी वह जनता पर उदारतापूर्वक धन लुटाता है तो कभी वही स्वयं उस धन के लिए झपटने लगता है। 

    यही उस मन का सबसे स्पष्ट लक्षण है, जिसमें सद्बुद्धि का अभाव है। उसका कोई स्थिर स्वरूप नहीं होता और जो मुझे सबसे अधिक अनादरणीय प्रतीत होता है, वह स्वयं अपने ही प्रति एकनिष्ठ नहीं रहता। यह समझो कि जीवनभर एक ही व्यक्ति बने रहना अत्यन्त महान बात है। किन्तु ऐसा केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही कर सकता है। हममें से शेष लोग तो अनेक प्रकार के रूप धारण करते रहते हैं। कभी तुम हमें मितव्ययी और गंभीर पाओगे, तो कभी अपव्ययी और मूर्ख। हम निरंतर अपने मुखौटे बदलते रहते हैं, एक उतारकर उसका ठीक विपरीत दूसरा पहन लेते हैं। इसलिए तुम्हें स्वयं से यही अपेक्षा करनी चाहिए कि जिस भूमिका का निर्वाह तुमने आरम्भ किया है, उसे रंगमंच से विदा होने तक निभाते रहो। यह सुनिश्चित करो कि तुम्हारा जीवन ऐसा हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा कर सकें। यदि इतना भी संभव न हो तो कम-से-कम इतना अवश्य हो कि लोग तुम्हें पहचान सकें। जिस व्यक्ति को लोगों ने कल देखा था, उसके बारे में आज यह कहना न पड़े, “यह कौन है?” वह इतना बदल चुका है।


अभी के लिए विदा 

प्राकृतिक संपदा के बारे में -- पत्र - 117

 प्रिय लूसीलियस 


हर बार जब मुझे कोई नई बात समझ में आती है तो मैं यह प्रतीक्षा नहीं करता कि तुम कहो, “उसे साझा करो!” मैं स्वयं ही उसे तुम्हारे साथ साझा कर देता हूँ। क्या तुम जानना चाहते हो कि मैंने क्या खोज निकाली है? अपना बटुआ निकालो। यह अत्यंत लाभदायक सौदा है। मैं तुम्हें सिखाने जा रहा हूँ कि सबसे शीघ्र और सरल तरीके से धनवान कैसे बना जा सकता है। निश्चय ही अब तुम इसे सुनने के लिए उत्सुक हो। तुम्हारी उत्सुकता उचित भी है। मैं तुम्हें अपार संपत्ति प्राप्त करने का एक सीधा और छोटा मार्ग बताऊँगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें एक वित्तीय सहायक की आवश्यकता होगी। कोई भी व्यापार आरंभ करने के लिए तुम्हें ऋण लेना पड़ता है। परंतु कृपया किसी बिचौलिए के माध्यम से नहीं। मैं नहीं चाहता कि दलाल तुम्हारे विषय में इधर-उधर बातें बनाते फिरें। मेरे पास तुम्हारे लिए एक ऐसा ऋणदाता पहले से तैयार है जिसकी अनुशंसा कैटो द एल्डर (Cato the Elder) ने अपने प्रसिद्ध वचन में की है, “तुम्हें उधार स्वयं अपने ही पास से लेना चाहिए।” 



    चाहे वह राशि कितनी ही थोड़ी क्यों न हो, यदि हमें अपनी आवश्यकता की वस्तु अपने ही भीतर से मिल जाए तो वही पर्याप्त है। प्रिय लूसीलियस, किसी वस्तु की इच्छा न करना, उसे प्राप्त कर लेने के समान ही है। दोनों का परिणाम एक ही होता है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य चिंता से मुक्त रहता है। मैं तुम्हें यह नहीं कह रहा कि तुम अपनी प्रकृति का दमन करो क्योंकि प्रकृति अडिग है, उसे जीता नहीं जा सकता। वह अपना उचित अधिकार अवश्य माँगती है। बल्कि तुम्हें यह समझना चाहिए कि जो कुछ प्रकृति की आवश्यकताओं से अधिक है, वह केवल एक अतिरिक्त अनुग्रह है, आवश्यकता नहीं। मुझे भूख लगी है। इसलिए मुझे भोजन करना चाहिए। प्रकृति को इससे कोई सरोकार नहीं कि रोटी मोटे आटे की है या अत्यंत महीन आटे से बनी हुई है। उसका उद्देश्य पेट को स्वाद देना नहीं बल्कि उसे भरना है। मुझे प्यास लगी है, पर प्रकृति को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मैं निकटतम जलाशय का पानी पीता हूँ या बर्फ के ढेर में शीतल किया हुआ जल। प्रकृति की केवल एक ही माँग है, प्यास बुझनी चाहिए। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि मेरा पात्र सोने, क्रिस्टल या अकीक (सिलिका क्वार्ट्ज का एक प्रकार है, जिसकी पहचान इसकी रंग-बिरंगी परतों से बनी होती है) का बना है या वह केवल टाइबर (इटली के शहर का नाम) का साधारण मिट्टी का प्याला है अथवा मैं अपनी हथेली को ही पात्र बना लूँ। हर वस्तु के अंतिम उद्देश्य पर दृष्टि रखो, तब तुम उसकी अनावश्यक सजावट और अतिरिक्त बातों का मोह छोड़ दोगे। जब भूख मुझे पुकारती है तो मेरा हाथ निकट उपलब्ध भोजन की ओर बढ़ना चाहिए। भूख ऐसी अवस्था है कि जो भी भोजन मिल जाए, वही स्वीकार्य हो जाता है। भूखा व्यक्ति किसी भी खाद्य पदार्थ को अस्वीकार नहीं करता। क्या अब भी तुम यह जानने को उत्सुक हो कि मुझे किस बात पर इतना आनंद हो रहा है? मुझे यह उत्कृष्ट वचन प्राप्त हुआ है, “बुद्धिमान व्यक्ति प्राकृतिक संपदा का सबसे सूक्ष्म अन्वेषक होता है।”

    तुम इसका उत्तर यह कहकर देते हो, “यह तो बहुत निराशाजनक निकला। क्या तुम सचमुच गंभीर हो? मेरे पास तो धन तैयार रखा था। मैं सोच रहा था कि व्यापार करने के लिए किस स्थान की यात्रा करूँ, कौन-सा सार्वजनिक ठेका प्राप्त करूँ या किस प्रकार का माल खरीदकर व्यापार करूँ। यह तो छल हुआ कि अपार धन का वचन देकर तुम मुझे निर्धनता का पाठ पढ़ाने लगे।” तो क्या तुम्हारे विचार में वह व्यक्ति निर्धन है, जिसे किसी वस्तु का अभाव नहीं है? “नहीं,” तुम उत्तर देते हो, “लेकिन यह उसकी अपनी वृत्ति और अपनी स्थिति को स्वीकार कर लेने के कारण है, भाग्य के कारण नहीं।” तो क्या तुम किसी व्यक्ति को इसलिए धनवान नहीं मानोगे कि उसकी संपत्ति उससे छीनी नहीं जा सकती? बताओ, तुम क्या चाहोगे, बहुत अधिक धन, या जितना पर्याप्त हो उतना? जिसके पास बहुत अधिक धन होता है, वह और अधिक चाहता है। यही इस बात का प्रमाण है कि उसके पास अभी भी पर्याप्त नहीं है। लेकिन जिसके पास पर्याप्त है, उसने वह वस्तु प्राप्त कर ली है जिसे धनी लोग कभी प्राप्त नहीं कर सकते, एक सीमा, जहाँ पहुँचकर और अधिक पाने की इच्छा समाप्त हो जाती है। या क्या तुम इसे इसलिए धन नहीं मानते कि इसके कारण किसी व्यक्ति का कभी सर्वस्व नहीं छीना गया? केवल इसलिए कि इसके लिए किसी पुत्र ने अपने पिता को या किसी पत्नी ने अपने पति को विष नहीं दिया? केवल इसलिए कि यह युद्ध के समय भी सुरक्षित रहता है और शांति के समय भी निश्चिंत? केवल इसलिए कि इसका स्वामी होना न तो जोखिमपूर्ण है और न ही इसका प्रबंधन कष्टदायक?

    “लेकिन केवल इतना होना कि न ठंड लगे, न भूख लगे और न प्यास लगे, यह तो बहुत ही तुच्छ संपत्ति हुई।” किन्तु स्वयं जुपिटर के पास भी इससे अधिक कुछ नहीं है। जो पर्याप्त है, वह कभी बहुत थोड़ा नहीं होता। जो अपर्याप्त है, वह कभी बहुत अधिक नहीं हो सकता। डेरियस (प्राचीन फारसी सम्राट का मूल नाम) और भारत को जीत लेने के बाद भी सिकंदर निर्धन ही बना रहता है। क्या यह सत्य नहीं है? वह अभी भी अपने अधिकार में लेने के लिए नए-नए राज्यों की खोज करता फिरता है। वह अज्ञात समुद्रों का अन्वेषण करता है, महासागर में नए बेड़े भेजता है और मानो स्वयं संसार की सीमाओं को भी भेद डालना चाहता है। जिससे प्रकृति संतुष्ट हो जाती है, उससे मनुष्य संतुष्ट नहीं होता। देखो, एक ऐसा व्यक्ति जिसने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, फिर भी उसे और अधिक की लालसा है। हमारा मन कितना अंधा है! जैसे ही मनुष्य आगे बढ़ने लगता है, वह भूल जाता है कि उसने आरंभ कहाँ से किया था। उसने एक छोटे-से, नगण्य प्रदेश के अधिकार के लिए संघर्ष आरंभ किया था और पृथ्वी के अंतिम छोर तक पहुँच गया। फिर भी अब वह इसलिए असंतुष्ट है कि उसे उसी संसार के भीतर लौटना पड़ रहा है, जो पूरी तरह उसी का हो चुका है। 

    धन ने आज तक किसी को वास्तव में धनी नहीं बनाया। वह तो केवल जिसे भी स्पर्श करता है, उसके भीतर और अधिक धन पाने की लालसा उत्पन्न कर देता है। तुम पूछते हो कि इसका कारण क्या है? कारण यह है कि जितना अधिक किसी के पास होता है, उतना ही अधिक वह और प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। संक्षेप में, तुम उन लोगों में से किसी एक को चुन लो, जिनके नाम क्रैसस (प्राचीन रोम के अत्यंत धनी और प्रभावशाली राजनेता) और लिसिनस (रोमन परंपरा में अत्यधिक धनवान व्यक्तियों में गिना जाता था।) के साथ गिने जाते हैं। उसे हमारे सामने खड़ा करो और उससे कहो कि वह अपनी सारी संपत्ति का हिसाब बताए, जो कुछ इस समय उसके पास है और जिसकी वह अभी भी आशा लगाए बैठा है, सब कुछ जोड़कर। यदि तुम मेरा मत स्वीकार करो तो मैं कहूँगा कि वह व्यक्ति निर्धन है। और यदि तुम्हारे अपने मत से भी देखा जाए तो वह किसी भी समय निर्धन हो सकता है। किन्तु जिसने अपनी आवश्यकताओं को प्रकृति की माँगों के अनुरूप बना लिया है, वह न केवल निर्धनता की अनुभूति से मुक्त हो जाता है, बल्कि निर्धन हो जाने के भय से भी परे पहुँच जाता है। फिर भी, वास्तव में अपनी संपत्ति को प्रकृति की सीमा तक सीमित रखना अत्यन्त कठिन है। यहाँ तक कि जिस व्यक्ति को हम आवश्यकताओं की सीमा तक ले आए हैं, जिसे तुम निर्धन कहते हो, उसके पास भी उसकी आवश्यकता से कुछ अधिक अवश्य होता है।

    किन्तु लोगों की आँखें धन के आकर्षण से अंधी और मोहित हो जाती हैं। जैसे जब किसी धनी व्यक्ति के घर से सिक्कों के ढेर प्रदर्शन के लिए जुलूस में ले जाए जाते हैं। जब उसके भवन की छत तक सोने से जड़ी होती है। जब उसके घरेलू सेवक या तो उनके स्वाभाविक सौंदर्य के कारण चुने जाते हैं या इस प्रकार सजाए जाते हैं कि वे देखने वालों का ध्यान आकर्षित करें। ऐसी सारी समृद्धि का उद्देश्य केवल लोगों की दृष्टि अपनी ओर खींचना होता है। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति को हमने जनसमूह की दृष्टि और भाग्य के उतार-चढ़ाव से अलग कर दिया है, उसका सुख उसके भीतर निवास करता है। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिनके मन में दयनीय निर्धनता ही धन का रूप धारण कर लेती है, तो उनके पास धन उसी प्रकार होता है, जैसे हम कहते हैं कि हमें बुखार है। जबकि वास्तव में बुखार ने ही हमें अपने वश में कर रखा होता है। हम प्रायः इसे उलटकर कहते हैं, “बुखार ने उसे जकड़ रखा है।” उसी प्रकार हमें यह भी कहना चाहिए, “धन ने उसे अपने वश में कर रखा है।”

    मैं तुम्हें इससे बढ़कर कोई और उपदेश देना नहीं चाहता और न ही ऐसा कोई उपदेश है जिसे बार-बार सुनने की आवश्यकता इससे अधिक हो। हर वस्तु का मूल्यांकन अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के आधार पर करो। ये आवश्यकताएँ या तो बिना किसी खर्च के पूरी हो जाती हैं, या बहुत थोड़े खर्च में। केवल इतना ध्यान रखो कि इन प्राकृतिक आवश्यकताओं को अपने दुर्गुणों के साथ मत मिला देना। क्या तुम यह पूछते हो कि जिस मेज़ पर तुम्हारा भोजन परोसा जा रहा है, वह कैसी होनी चाहिए या चाँदी के बर्तनों की गुणवत्ता कैसी हो या क्या तुम्हारे सेवक रूपवान और जोड़े के रूप में चुने गए हों, जिनकी कोमल त्वचा लोगों का ध्यान आकर्षित करे? प्रकृति को भोजन के अतिरिक्त और किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती। यदि तुम्हारा कंठ प्यास से सूख रहा हो तो क्या तुम स्वर्ण-पात्र की माँग करोगे? यदि तुम भूख से व्याकुल हो तो क्या तुम मोर और टर्बट (एक उत्कृष्ट समुद्री मछली) के अतिरिक्त हर प्रकार के भोजन को तुच्छ समझोगे? 

    भूख महत्त्वाकांक्षी नहीं होती। उसका उद्देश्य केवल इतना होता है कि वह शांत हो जाए। उसे इससे कोई विशेष सरोकार नहीं कि वह किस वस्तु से शांत होती है। इसके बाद जो कुछ आता है, वह केवल उस दयनीय विलासप्रियता की यातना है, जो तृप्त हो जाने के बाद भी भूख को फिर से उकसाने के उपाय खोजती है। जो पेट को भरने के बजाय उसे ठूँसने का प्रयत्न करती है; जो पहली बार पीने से शांत हो चुकी प्यास को फिर से जगाना चाहती है। 

    इसीलिए होरेस (प्राचीन रोम के महानतम गीतिकवियों में से एक थे) ने बिल्कुल ठीक कहा है कि प्यास को न तो पात्र की चिंता होती है और न ही उसे परोसने वाले की सुघड़ता की। यदि तुम्हें यह महत्वपूर्ण लगता है कि तुम्हें पानी परोसने वाले दास-बालक के बाल घुँघराले हों और जिस पात्र से तुम पी रहे हो वह किसी पारदर्शी बहुमूल्य पदार्थ का बना हो तो समझ लो कि तुम्हें वास्तव में प्यास नहीं लगी है। प्रकृति ने हमें जो अनेक वरदान दिए हैं, उनमें यह सबसे श्रेष्ठ है कि वास्तविक आवश्यकता कभी नखरे नहीं करती। केवल अनावश्यक वस्तुएँ ही चुनाव की माँग करती हैं, “यह पर्याप्त अच्छा नहीं है, वह बहुत साधारण है, यह मेरी आँखों को अच्छा नहीं लगता।” इस संसार के सृष्टिकर्ता और हमारे जीवन के नियमों के विधानकर्ता ने हमारी व्यवस्था इस प्रकार की है कि हमारा भली-भाँति पालन-पोषण हो, किन्तु हमें विलासिता का अभ्यस्त न बनाया जाए। हमारे कल्याण के लिए जो कुछ आवश्यक है, वह सब सहज ही उपलब्ध है किन्तु विलासिता की वस्तुएँ केवल कष्ट, परिश्रम और दुःख के मूल्य पर ही प्राप्त होती हैं। 

    अतः आओ, हम प्रकृति के इस वरदान का लाभ उठाएँ और इसे उसके श्रेष्ठतम उपहारों में से एक मानें। हम यह स्वीकार करें कि प्रकृति विशेष रूप से इस कारण हमारी कृतज्ञता की अधिकारी है कि जब हम आवश्यकता के कारण किसी वस्तु की इच्छा करते हैं, तब उसके चयन को लेकर हम नखरे नहीं करते।


अभी के लिए विदा 

   

Wednesday, 5 August 2026

वस्तुओं के बारे में -- पत्र - 116

 प्रिय लूसीलियस 


तुम मुझ पर यह आग्रह कर रहे हो कि मैं तुम्हें अधिक बार पत्र लिखूँ। अच्छा तो आओ हिसाब-किताब कर लें। तब तुम्हें यह नहीं लगेगा कि तुम्हारा घाटा हुआ है। हमारे बीच यह तय हुआ था कि पहले तुम पत्र लिखोगे और उसके उत्तर में मैं लिखूँगा। फिर भी, मैं तुम्हारे प्रति अधिक कठोर नहीं बनूँगा। मैं जानता हूँ कि तुम विश्वसनीय हो। इसलिए मैं तुम्हें उधार पर भी कुछ दे सकता हूँ। किन्तु मैं वैसा नहीं करूँगा जैसा भाषा के महान आचार्य सिसरो ने अपने मित्र एटिकस को करने की सलाह दी थी कि यदि कहने के लिए कुछ न भी हो, तब भी मन में जो आए, वही लिख भेजो। मेरे पास लिखने के लिए विषयों की कभी कमी नहीं हो सकती, चाहे मैं सिसरो के पत्रों में भरी उन बातों को पूरी तरह छोड़ भी दूँ, जैसे कि कौन-सा उम्मीदवार कठिनाई में है। कौन उधार के धन के सहारे चुनाव लड़ रहा है और कौन अपनी ही संपत्ति के बल पर; किसे कौंसल-पद के लिए सीज़र का समर्थन प्राप्त है, किसे पोम्पेय का और किसे केवल अपनी धन-थैली का या यह कि कैसिलियस कितना कठोर साहूकार है, जो अपने संबंधियों को भी प्रति माह एक प्रतिशत से कम ब्याज पर ऋण नहीं देता। दूसरों के झंझटों में उलझने से कहीं अधिक अच्छा है कि मनुष्य अपनी ही समस्याओं पर ध्यान दे। स्वयं का परीक्षण करे, यह देखे कि वह किन-किन वस्तुओं का अभिलाषी (उम्मीदवार) बना हुआ है और फिर उन सबके लिए प्रयास करना ही छोड़ दे।


By Nurudeen Popoola

    प्रिय लूसीलियस, सबसे उत्तम मार्ग और साथ ही सुरक्षा तथा स्वतंत्रता का मार्ग यह है कि किसी भी पद की आकांक्षा ही न रखी जाए बल्कि भाग्य द्वारा आयोजित सभी चुनावों को ही छोड़ दिया जाए। जब मतदाता एकत्र होते हैं और उम्मीदवार अपने-अपने मंचों पर व्याकुल होकर परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं। कोई रिश्वत देकर समर्थन खरीद रहा होता है, कोई अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से सौदेबाज़ी कर रहा होता है तो कोई उन लोगों के हाथ चूम रहा होता है जिन्हें चुने जाने के बाद वह छूना भी पसंद नहीं करेगा। इस बीच सबकी दृष्टि उद्घोषक की उस घोषणा पर लगी रहती है जो विजेता का नाम बताएगी, तब सोचो, उस पूरे बाज़ार को केवल एक दर्शक की तरह खड़े होकर देखना कितना सुखद होगा। जबकि तुम्हारे पास न बेचने के लिए कुछ हो और न खरीदने के लिए। किन्तु इससे भी कहीं अधिक महान आनंद तब प्राप्त होता है, जब मनुष्य न केवल प्रेटर या कौंसल के चुनावों को बल्कि उन सब प्रयत्नों को भी निस्पृह होकर देखता है जो लोग प्रतिवर्ष नवीनीकृत होने वाले पदों के लिए, स्थायी सत्ता प्राप्त करने के लिए, युद्ध में विजय और विजय-उत्सव के लिए, धन-संपत्ति के लिए, विवाह और संतान के लिए अथवा अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए करते रहते हैं। मन की कितनी महान उपलब्धि है यह कि मनुष्य ऐसा बन जाए जो किसी वस्तु की कामना ही न करे, किसी से कोई अनुग्रह न माँगे और भाग्य से कह सके, “हे भाग्य! मेरा और तुम्हारा अब कोई संबंध नहीं है। मैं तुम्हें अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं देता। मैं जानता हूँ कि तुम कैटो जैसे पुरुषों को अस्वीकार कर देती हो। जबकि वेटिनियस जैसे लोगों को ऊँचे पदों पर पहुँचा देती हो। इसलिए मैं तुमसे कुछ भी नहीं माँगता।” यही वह मार्ग है जिससे भाग्य को उसके पद से हटाया जा सकता है। 

    इसलिए हमें एक-दूसरे को इन्हीं विषयों पर पत्र लिखने चाहिए और ऐसे विचारों का आदान-प्रदान करना चाहिए जिनकी कभी कमी न हो। क्योंकि हमारे सामने ऐसे असंख्य व्याकुल मनुष्य हैं, जो किसी विनाशकारी वस्तु की प्राप्ति के लिए निरंतर एक बुराई से दूसरी और उससे भी बड़ी बुराई की ओर बढ़ते जाते हैं। वे जिन वस्तुओं के पीछे भाग रहे हैं, शीघ्र ही उन्हीं से उन्हें या तो बचना पड़ेगा या उन्हें तुच्छ समझना पड़ेगा। आख़िर ऐसा कौन है जो उस वस्तु को प्राप्त कर लेने के बाद भी संतुष्ट हो गया हो, जिसे पहले वह अपनी पहुँच से बाहर समझता था? लोग समझते हैं कि समृद्धि कोई महान पुरस्कार है, जिसके लिए लालच करना उचित है। परन्तु वास्तव में वह अत्यन्त तुच्छ वस्तु है। इसी कारण वह किसी को भी संतुष्ट नहीं कर पाती। तुम्हें अपनी इच्छाएँ बहुत ऊँची प्रतीत होती हैं क्योंकि तुम अभी उनसे दूर हो। किन्तु जो व्यक्ति उन्हें प्राप्त कर लेता है, उसे वे नगण्य लगने लगती हैं। यदि मैं भूल नहीं कर रहा तो वह उसी क्षण किसी और ऊँचाई पर चढ़ने की इच्छा करने लगता है। जिसे तुम अपनी यात्रा का शिखर समझते हो, वही उसके लिए केवल अगली सीढ़ी बन जाता है। इस प्रकार सभी लोग सत्य के अज्ञान के कारण दुख उठाते हैं। दूसरों की बातों से भ्रमित होकर वे उन वस्तुओं की ओर आकर्षित होते हैं जिन्हें वे शुभ समझते हैं। पर जब अत्यधिक परिश्रम और कष्ट सहकर उन्हें प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें ज्ञात होता है कि वे या तो बुरी हैं या तुच्छ हैं अथवा उनकी अपेक्षा से कहीं कम मूल्यवान हैं। अधिकांश लोग उन वस्तुओं से प्रभावित हो जाते हैं जो दूर से आकर्षक दिखाई देती हैं। सामान्यतः लोग ‘बड़ा’ और ‘अच्छा’, इन दोनों को एक ही समझ बैठते हैं। 

    ऐसा हमारे साथ भी न हो इसलिए हमें यह जाँच करनी चाहिए कि वास्तव में ‘शुभ’ (Good) क्या है। इस विषय में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ और परिभाषाएँ दी गई हैं। एक परिभाषा यह है, “शुभ वह है जो मन को अपनी ओर आकर्षित करे और उसे अपनी ओर खींच ले।” किन्तु इसका तुरंत उत्तर दिया जा सकता है। यदि कोई वस्तु हमें अपनी ओर आकर्षित तो करे। पर हमारे लिए हानिकारक सिद्ध हो, तब क्या होगा? तुम जानते ही हो कि कितनी बुरी वस्तुएँ भी अत्यन्त आकर्षक होती हैं। जो वास्तव में सत्य है और जो केवल सत्य प्रतीत होता है, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसी कारण ‘शुभ’ का संबंध ‘सत्य’ से होना चाहिए क्योंकि जो वास्तव में शुभ नहीं है, उसे शुभ नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो वस्तु हमें अपनी ओर खींचती और लुभाती है, वह केवल शुभ प्रतीत होती है। वह धीरे-धीरे हमारे मन में प्रवेश करती है, हमें आकर्षित करती है और अंततः हमें मोहित कर लेती है। दूसरी परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो अपने प्रति इच्छा उत्पन्न करे अथवा जो मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाए।” किन्तु इस पर भी वही आपत्ति लागू होती है। बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ हैं जो मनुष्य को अपनी ओर प्रेरित करती हैं। जबकि उनका पीछा करने वालों के लिए वे अंततः हानिकारक सिद्ध होती हैं। एक और अधिक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप मन में अपनी ओर बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न करे और जिसकी खोज तभी की जानी चाहिए जब वह वास्तव में वरणीय (चुनने योग्य) सिद्ध हो जाए।” ऐसी वस्तु उसी समय ‘सम्माननीय’ (Honorable) भी होती है अर्थात वह ऐसी होती है जो हर प्रकार से अपनाए जाने और प्राप्त किए जाने के योग्य हो। 

    यह विषय मुझे ‘शुभ’ और ‘सम्माननीय’ के बीच का अंतर स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करता है। इन दोनों में एक ऐसा संबंध है जो अभिन्न और अविभाज्य है। कोई भी वस्तु तब तक शुभ नहीं हो सकती जब तक उसमें कुछ सम्माननीय न हो और जो वास्तव में सम्माननीय है, वह निश्चय ही शुभ भी है। तो फिर इन दोनों में अंतर क्या है? सम्माननीय वह है जो पूर्णतः शुभ हो अर्थात वही जिसके द्वारा सुखमय जीवन अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है और जिसके साथ संबंध स्थापित होने पर अन्य वस्तुएँ भी शुभ बन जाती हैं। मेरा अभिप्राय यह है, कुछ वस्तुएँ अपने-आप में न तो शुभ होती हैं और न अशुभ जैसे, सैनिक सेवा, राजनयिक सेवा या न्यायिक पद। जब इन कार्यों का निर्वाह सम्मानपूर्वक और सदाचार के साथ किया जाता है, तभी वे शुभ बन जाते हैं और अपनी पहले की उदासीन (न शुभ, न अशुभ) स्थिति से निकलकर शुभ की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसी वस्तुएँ सम्माननीयता के संसर्ग से शुभ बनती हैं; परन्तु सम्माननीयता स्वयं अपने-आप में शुभ है। शुभता का मूल्य सम्माननीयता से प्राप्त होता है। जबकि सम्माननीयता किसी अन्य वस्तु पर निर्भर नहीं करती। उसका आधार वह स्वयं है। जो वस्तु शुभ है, वह किसी परिस्थिति में अशुभ भी हो सकती थी। किन्तु जो वास्तव में सम्माननीय है, वह शुभ के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकती। 

    एक परिभाषा इस प्रकार भी दी जाती है, “शुभ वह है जो प्रकृति के अनुरूप हो।” अब मेरी बात ध्यान से सुनो। जो वास्तव में शुभ है, वह निश्चय ही प्रकृति के अनुरूप होता है; किन्तु जो कुछ भी प्रकृति के अनुरूप है, वह तत्काल शुभ नहीं हो जाता। वास्तव में अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो प्रकृति के अनुरूप तो हैं। पर इतनी तुच्छ हैं कि उन्हें ‘शुभ’ कहना उचित नहीं होगा। वे नगण्य और महत्वहीन हैं। कोई भी शुभ वस्तु तुच्छ या महत्वहीन नहीं हो सकती। जब तक कोई वस्तु नगण्य है, तब तक वह शुभ नहीं है। जब वह वास्तव में शुभ बन जाती है, तब वह नगण्य नहीं रहती। तो किसी वस्तु को शुभ कैसे पहचाना जाए? जब वह पूर्णतः प्रकृति के अनुरूप हो, तभी उसे वास्तव में शुभ कहा जा सकता है।

    तुम कहते हो, “तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि जो शुभ है, वह प्रकृति के अनुरूप होता है। यही उसका विशिष्ट लक्षण है। तुम यह भी स्वीकार करते हो कि कुछ ऐसी वस्तुएँ भी हैं जो शुभ तो नहीं हैं, फिर भी प्रकृति के अनुरूप हैं। तब ऐसा कैसे हो सकता है कि पहली वस्तुएँ शुभ कहलाएँ और दूसरी नहीं? जब दोनों में प्रकृति के अनुरूप होने का एक ही विशेष गुण है तो फिर उनके विशिष्ट स्वरूप में यह अंतर कैसे उत्पन्न होता है?” मेरा उत्तर है, उनकी परिपूर्णता और विकास के कारण। इसमें कोई नई या आश्चर्यजनक बात नहीं है कि कुछ वस्तुएँ अपने विकास के साथ अपना स्वरूप भी बदल लेती हैं। उदाहरण के लिए, एक बालक बड़ा होकर युवक बन जाता है। उसके साथ उसका विशिष्ट गुण भी बदल जाता है। बालक में तर्क-बुद्धि का पूर्ण विकास नहीं होता, जबकि युवक तर्क करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। कुछ वस्तुएँ जब विकसित होती हैं तो वे केवल आकार में ही बड़ी नहीं होतीं बल्कि अपने स्वरूप और गुण में भी भिन्न हो जाती हैं। 

    कोई यह कह सकता है, “केवल आकार में बड़ा हो जाना किसी वस्तु का भिन्न स्वरूप धारण कर लेना नहीं है। चाहे तुम एक छोटी सुराही में शराब भरो या एक बड़े पात्र में, शराब का गुण दोनों में समान रहता है। उसी प्रकार, थोड़ी-सी मधु और बहुत-सी मधु, दोनों के स्वाद में कोई अंतर नहीं होता।” किन्तु तुम्हारे ये उदाहरण भिन्न प्रकार के हैं। इनमें वस्तु चाहे जितनी बढ़ जाए, उसका मूल गुण अपरिवर्तित रहता है। निस्संदेह, कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो आकार में बड़ी होने पर भी अपनी जाति और अपने विशिष्ट गुण को बनाए रखती हैं।परन्तु कुछ दूसरी वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें आकार की अनेक क्रमिक वृद्धियों के बाद अन्तिम वृद्धि एक निर्णायक परिवर्तन ला देती है। वह उन्हें एक ऐसी नई अवस्था प्रदान करती है जो पहले की अवस्था से भिन्न होती है। एक-एक पत्थर जोड़ने से मेहराब नहीं बनती। उसे पूर्ण करने वाला वह अंतिम शिलाखंड होता है, शीर्ष-पत्थर (की-स्टोन), जो दोनों ओर झुके हुए पत्थरों के बीच जड़ दिया जाता है और अपने स्थान पर आकर पूरी मेहराब को एक साथ बाँध देता है। वह अंतिम पत्थर स्वयं आकार में छोटा होते हुए भी इतना महत्त्वपूर्ण कार्य क्यों कर देता है? 

    क्योंकि वह केवल एक और पत्थर जोड़ता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संरचना को पूर्णता भी प्रदान करता है। इसी प्रकार कुछ वस्तुएँ अपने विकास के क्रम में अपना पूर्व स्वरूप छोड़ देती हैं और एक नए स्वरूप को धारण कर लेती हैं। जब मन किसी वस्तु के विस्तार का बहुत देर तक विचार करता रहता है और उसकी विशालता का अनुमान लगाते-लगाते थक जाता है, तब वह उसे ‘अनन्त’ कहने लगता है। उस समय वह वस्तु पहले जैसी नहीं रह जाती। वह उस अवस्था से भिन्न हो जाती है जब वह केवल बड़ी किन्तु सीमित प्रतीत होती थी। उसी प्रकार, हम पहले किसी वस्तु को केवल कठिनाई से विभाजित होने योग्य समझते थे; परन्तु जब वह कठिनाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तब हमने उसे ‘अविभाज्य’ मान लिया। इसी प्रकार, जो वस्तु पहले केवल बड़ी कठिनाई से या लगभग न चलने योग्य थी, वही अंततः ‘अचल’ कही जाने लगी। ठीक इसी तर्क के अनुसार, कोई वस्तु पहले केवल प्रकृति के अनुरूप होती है; किन्तु जब उसका विकास अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, तब वह एक नए विशिष्ट स्वरूप में प्रवेश करती है और वास्तव में ‘शुभ’ बन जाती है।


अभी के लिए विदा 

स्टोइक दर्शन के बारे में -- पत्र - 115

 प्रिय लूसीलियस 


इस प्रकार के तुच्छ प्रश्न पूछकर तुम मुझे बहुत व्यस्त बनाए रखोगे और बिना जाने ही मुझे अनेक तर्क-वितर्कों और कठिनाइयों में उलझा दोगे। इन विषयों पर मैं पूरी निष्ठा के साथ अपने स्टोइक सम्प्रदाय का खंडन भी नहीं कर सकता और न ही पूर्णतः संतुष्ट होकर उससे सहमत हो सकता हूँ। तुम स्टोइक सिद्धांत के उस कथन के बारे में पूछ रहे हो कि 'बुद्धि (Wisdom) एक शुभ (Good) है, परन्तु बुद्धिमान होना (Being wise) शुभ नहीं है।' पहले मैं स्टोइकों का अभिप्राय स्पष्ट करूँगा, उसके बाद अपना मत प्रस्तुत करूँगा। 

By Blanca Dsouza 

    हमारे सम्प्रदाय का मत है कि जो कुछ शुभ है, वह शरीर (भौतिक सत्ता) है क्योंकि शुभ वस्तु क्रिया करती है और जो भी क्रिया करता है, वह शरीर होता है। शुभ वस्तु लाभ पहुँचाती है। परन्तु किसी वस्तु के लिए लाभ पहुँचाना तभी संभव है जब वह क्रिया करे। और यदि वह क्रिया करती है, तो वह शरीर है। स्टोइक यह भी कहते हैं कि बुद्धि एक शुभ है। इसलिए उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि बुद्धि भौतिक सत्ता (शरीर) है। किन्तु वे यह नहीं मानते कि 'बुद्धिमान होना' (Being wise) भी उसी प्रकार का अस्तित्व रखता है। उनके अनुसार बुद्धिमान होना एक अभौतिक (अशरीरी) अवस्था है, जो किसी अन्य वस्तु अर्थात बुद्धि पर आश्रित होकर उत्पन्न होती है। इसी कारण वह स्वयं न तो कोई क्रिया करती है और न ही किसी को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाती है। “तो क्या बात है? क्या हम यह नहीं कहते कि बुद्धिमान होना भी एक शुभ है?” हाँ, हम ऐसा कहते हैं। परन्तु यह कथन स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि उस वस्तु के संदर्भ में है जिस पर वह निर्भर करता है अर्थात स्वयं बुद्धि के संदर्भ में।

    इन बातों के विपरीत, अब पहले यह सुनो कि दूसरे दार्शनिक क्या उत्तर देते हैं। उसके बाद मैं अपना स्वतंत्र मत प्रस्तुत करूँगा और एक भिन्न दृष्टिकोण का समर्थन करूँगा। वे कहते हैं, “यदि तुम्हारी यह दलील मान ली जाए तो ‘सुखी जीवन’ भी शुभ नहीं होगा। तब चाहे तुम्हें अच्छा लगे या न लगे, तुम्हारे सम्प्रदाय को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ‘सुखी जीवन’ तो शुभ है, पर ‘सुखपूर्वक जीना’ शुभ नहीं है।” वे एक और आपत्ति भी उठाते हैं, “तुम बुद्धिमान बनना चाहते हो। इसलिए ‘बुद्धिमान होना’ एक वरणीय (जिसे चुनना उचित हो) वस्तु है। यदि वह वरणीय है तो वह अवश्य ही शुभ भी होगी।” इस आपत्ति का उत्तर देने के लिए हमारे स्टोइक सम्प्रदाय को शब्दों का ऐसा अर्थ-भेद करना पड़ता है, जो हमारी भाषा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के अनुकूल नहीं है। यदि तुम मुझे इसकी अनुमति दो तो मैं उस भेद को स्पष्ट करूँ। स्टोइकों का कहना है, “जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह ‘वरणीय’ (choice worthy) है। परन्तु जो अवस्था उस शुभ वस्तु को प्राप्त हो जाने के बाद हमारे भीतर उत्पन्न होती है, वह केवल ‘चयनयोग्य’ (choose able) है।” अर्थात उस दूसरी अवस्था की कामना स्वयं उसके लिए नहीं की जाती, मानो वह स्वतंत्र रूप से कोई शुभ वस्तु हो बल्कि वह उस शुभ वस्तु की प्राप्ति के परिणामस्वरूप मिलने वाली एक अतिरिक्त उपलब्धि मात्र है, जिसकी पहले से ही कामना की गई थी।

    मैं स्वयं इस मत से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार में हमारे स्टोइक सम्प्रदाय के दार्शनिक इस कठिनाई में इसलिए फँस जाते हैं कि वे पहले से स्वीकार किए हुए एक सिद्धांत की पहली कड़ी से बँधे हुए हैं और उसे बदलने की स्वतंत्रता अपने लिए नहीं रखते। हम लोगों की एक सामान्य प्रवृत्ति यह है कि हम समस्त मनुष्यों की स्वाभाविक धारणाओं (पूर्वधारणाओं) को बहुत महत्त्व देते हैं और यदि किसी बात पर सबकी सहमति हो, तो उसे उसके सत्य होने का प्रमाण मान लेते हैं। उदाहरण के लिए, हम देवताओं के अस्तित्व का एक प्रमाण यह भी मानते हैं कि लगभग सभी मनुष्यों के मन में देवताओं के अस्तित्व का विश्वास स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। संसार में कोई भी ऐसा राष्ट्र, चाहे वह कानूनों और सभ्यता से कितना ही दूर क्यों न हो, ऐसा नहीं मिलता जो किसी-न-किसी देवता के अस्तित्व में विश्वास न रखता हो। इसी प्रकार, जब हम आत्मा की अमरता पर विचार करते हैं, तब भी इस बात का हमारे लिए विशेष महत्त्व होता है कि अधिकांश लोग आत्मा के मृत्यु के बाद भी अस्तित्व में रहने को स्वीकार करते हैं और अधोलोक की आत्माओं से या तो भय करते हैं या उनका सम्मान करते हैं। मैं भी इसी सार्वभौमिक मान्यता का सहारा लेता हूँ। तुम ऐसा कोई व्यक्ति नहीं पाओगे जो यह न मानता हो कि बुद्धि भी शुभ है और बुद्धिमान होना (Being wise) भी शुभ है।

    मैं उन पराजित ग्लैडिएटरों की तरह नहीं करूँगा जो जनता से दया की अपील करते हैं। आओ, हम अपने ही तर्कों और अपने ही शस्त्रों से इस विषय पर विचार करें। जो वस्तु किसी अन्य वस्तु पर अध्यारोपित (अधिष्ठित) होती है, वह या तो उसके भीतर होती है या उसके बाहर। यदि वह उसके भीतर है तो वह भी उसी वस्तु की भाँति भौतिक सत्ता (शरीर) होगी। क्योंकि कोई भी वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर उसके स्पर्श के बिना अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो स्पर्श करती है, वह शरीर होती है। इसी प्रकार, कोई भी वस्तु क्रिया किए बिना किसी दूसरी वस्तु पर अध्यारोपित नहीं हो सकती और जो क्रिया करती है, वह भी शरीर होती है। यदि वह उस वस्तु के बाहर है तो अध्यारोपित होने के बाद उसे उससे अलग हो जाना चाहिए। यदि वह अलग हो सकती है तो उसमें गति करने की क्षमता होगी और जिसमें गति करने की क्षमता है, वह शरीर है। 

    अब तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि मैं यह स्वीकार करूँ कि ‘दौड़’ और ‘दौड़ना’, ‘ऊष्मा’ और ‘गरम करना’, ‘प्रकाश’ और ‘प्रकाश देना’...  ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इनमें भेद है। परन्तु मैं यह नहीं मानता कि उनका अस्तित्वगत स्वरूप (status) भिन्न है। यदि स्वास्थ्य एक उदासीन (न अच्छा, न बुरा) वस्तु है तो स्वस्थ होना भी उदासीन ही होगा। यदि सौन्दर्य उदासीन है तो सुन्दर होना भी उदासीन होगा। यदि न्याय एक शुभ है तो न्यायी होना भी शुभ है। यदि लज्जाजनक आचरण बुरा है तो लज्जाजनक व्यवहार करना भी बुरा है। ठीक उसी प्रकार जैसे यदि नेत्र-रोग बुरा है तो नेत्र-पीड़ा से ग्रस्त होना भी बुरा है। इसका प्रमाण भी स्पष्ट है। इनमें से कोई भी अपने समकक्ष के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। जिसके पास बुद्धि है, वही बुद्धिमान है। जो बुद्धिमान है, उसी के पास बुद्धि है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों एक-दूसरे के इतने निकट हैं कि अनेक लोग उन्हें वस्तुतः एक ही मानते हैं।

    लेकिन मैं उनसे यह पूछना चाहता हूँ। चूँकि सभी वस्तुएँ या तो शुभ होती हैं या अशुभ अथवा उदासीन तो ‘बुद्धिमान होना’ इनमें से किस श्रेणी में रखा जाएगा? उनके मत के अनुसार वह शुभ नहीं है। निश्चय ही अशुभ भी नहीं है। तब यह निष्कर्ष निकलता है कि वह मध्यवर्ती श्रेणी में आता है। परन्तु इसी मध्यवर्ती श्रेणी को हम ‘उदासीन’ कहते हैं, जैसे धन, सौन्दर्य और उच्च पद, जो अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोगों को समान रूप से प्राप्त हो सकते हैं। किन्तु ‘बुद्धिमान होना’ ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी दुष्ट व्यक्ति को प्राप्त हो सके। इसलिए वह उदासीन नहीं हो सकता। वह अशुभ भी नहीं है क्योंकि वह किसी बुरे व्यक्ति में पाया ही नहीं जा सकता। अतः वह शुभ ही होना चाहिए। जो वस्तु केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है, वह शुभ होती है। बुद्धिमान होना केवल अच्छे व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए बुद्धिमान होना भी शुभ है। 

    कोई यह कह सकता है, “बुद्धिमान होना तो केवल बुद्धि पर अधिष्ठित होने वाली एक अवस्था है।” तब मैं उससे पूछूँगा, जिसे तुम ‘बुद्धिमान होना’ कहते हो, क्या वह बुद्धि को सक्रिय करता है अथवा स्वयं बुद्धि द्वारा सक्रिय होता है? दोनों ही स्थितियों में, चाहे वह क्रिया करे या उस पर क्रिया की जाए, उसे भौतिक सत्ता (शरीर) मानना पड़ेगा। क्योंकि जो भी वस्तु क्रिया करती है या जिस पर क्रिया की जाती है, वह शरीर होती है।यदि वह शरीर है, तो वह शुभ भी है क्योंकि उसे शुभ न मानने का एकमात्र कारण यह बताया गया था कि वह अभौतिक है।

    पेरिपैटेटिक दार्शनिकों का मत है कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को अनिवार्य रूप से सूचित करते हैं। क्या तुम वास्तव में यह मान सकते हो कि कोई व्यक्ति बुद्धि के बिना बुद्धिमान हो सकता है या जो बुद्धिमान है उसके पास बुद्धि न हो? किन्तु प्राचीन तर्कशास्त्रियों ने इन दोनों में भेद किया था और उन्हीं से यह भेद स्टोइक दार्शनिकों तक पहुँचा है। मैं इसे स्पष्ट करता हूँ। क्या ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व होना’ एक ही बात है? नहीं। क्योंकि ‘खेत का स्वामित्व होना’ उस व्यक्ति से संबंधित है जो खेत का स्वामी है, न कि स्वयं खेत से। उसी प्रकार ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में भी भेद है। मेरा विश्वास है कि तुम यह स्वीकार करोगे कि यहाँ दो भिन्न वस्तुएँ हैं। एक वह जो धारण की जाती है और दूसरी वह जो उसे धारण करती है। बुद्धि वह है जिसे धारण किया जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति उसका धारक होता है। बुद्धि एक परिपूर्ण मन है अथवा ऐसा मन जो अपनी सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कर चुका हो। दूसरे शब्दों में, बुद्धि जीवन जीने की कला है। तो फिर ‘बुद्धिमान होना’ क्या है? मैं उसे परिपूर्ण मन नहीं कहूँगा बल्कि उस अवस्था का नाम दूँगा जो उस व्यक्ति में विद्यमान होती है जिसके पास परिपूर्ण मन है। इस प्रकार, एक ओर ‘उत्तम मन’ है। दूसरी ओर उस उत्तम मन का धारक होना, ये दोनों एक-दूसरे से संबंधित होने पर भी भिन्न हैं। 

    मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “शरीरों के भी अनेक प्रकार होते हैं। उदाहरण के लिए, यह एक मनुष्य है और वह एक घोड़ा। इनके साथ विचार की ऐसी प्रक्रियाएँ भी जुड़ी होती हैं जो इन शरीरों के बारे में कथन करती हैं। इन विचार-प्रक्रियाओं का अपना एक विशिष्ट स्वरूप होता है, जो स्वयं शरीरों से भिन्न है। उदाहरण के लिए, मैं देखता हूँ कि ‘केटो चल रहा है।’ यह बात मुझे इन्द्रियों के द्वारा ज्ञात हुई और मेरे मन ने उसे सत्य मान लिया। जो वस्तु मैं देख रहा हूँ, वह एक शरीर है। उसी शरीर पर मेरी दृष्टि तथा मेरा मन केन्द्रित हैं। फिर मैं कहता हूँ, ‘केटो चल रहा है।’ अब जो मैं कह रहा हूँ, वह स्वयं कोई शरीर नहीं है बल्कि शरीर के विषय में किया गया एक कथन है। इसे कुछ लोग ‘प्रस्ताव’ (proposition) कहते हैं। कुछ ‘विधेय’ (predication) और कुछ ‘कथ्य’ (what is said) कहते हैं। इसी प्रकार, जब हम ‘बुद्धि’ कहते हैं, तब हमारा अभिप्राय एक भौतिक सत्ता (शरीर) से होता है। जब हम कहते हैं ‘बुद्धिमान है’ (is wise), तब हम किसी शरीर के विषय में एक कथन कर रहे होते हैं। किसी वस्तु का केवल उल्लेख करना और उसके विषय में कुछ कहना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।” 

    अभी के लिए मान लेते हैं कि यहाँ वास्तव में दो भिन्न बातें हैं। (मैं अभी अपना मत प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ।) किन्तु यदि वे भिन्न हैं तो ऐसा क्या है जो उनमें से किसी एक को शुभ होने से रोकता हो? अभी थोड़ी देर पहले मैंने ‘एक खेत’ और ‘खेत का स्वामित्व’ होने के बीच भेद किया था। स्पष्ट है कि स्वामी का स्वरूप उस वस्तु से भिन्न होता है जिसका वह स्वामी है। एक ओर भूमि है और दूसरी ओर मनुष्य। परन्तु जिस विषय पर यहाँ चर्चा हो रही है, उसमें स्थिति भिन्न है। यहाँ बुद्धि का धारक और स्वयं बुद्धि, दोनों का स्वरूप एक ही प्रकृति का है। इसके अतिरिक्त, खेत और उसके स्वामी के उदाहरण में स्वामी और स्वामित्व की वस्तु वास्तव में अलग-अलग हैं। पर यहाँ बुद्धि और उसका धारक एक ही व्यक्ति में अंतर्निहित हैं। भूमि का स्वामित्व विधि (कानून) के आधार पर होता है। जबकि बुद्धि का स्वामित्व स्वभावतः होता है। भूमि को बेचा जा सकता है और किसी दूसरे को सौंपा जा सकता है। पर बुद्धि अपने स्वामी को छोड़कर किसी और के पास नहीं जा सकती। इसलिए तुम्हें उन वस्तुओं की तुलना नहीं करनी चाहिए जिनका स्वभाव मूलतः एक-दूसरे से भिन्न है। 

    मैं यह कहने लगा था कि जिन बातों पर हम विचार कर रहे हैं, वे संख्या की दृष्टि से दो हो सकती हैं। फिर भी दोनों ही शुभ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ दो अलग बातें हैं। फिर भी तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि दोनों ही शुभ हैं। जिस प्रकार यह मानने में कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और उसका धारक, दोनों शुभ हैं, उसी प्रकार यह मानने में भी कोई बाधा नहीं है कि बुद्धि और बुद्धि का धारण करना अर्थात बुद्धिमान होना, दोनों ही शुभ हैं। मैं बुद्धिमान व्यक्ति इसलिए बनना चाहता हूँ कि मैं बुद्धिमान हो सकूँ। यदि ऐसा है तो क्या ‘बुद्धिमान होना’ भी शुभ नहीं होना चाहिए? क्योंकि उसके बिना ‘बुद्धिमान व्यक्ति’ होना भी कोई शुभ नहीं रह जाता। आखिर तुम्हारा अपना सिद्धांत भी तो यही है कि यदि बुद्धि का उपयोग न किया जाए तो उसे स्वीकार ही नहीं करना चाहिए। तो बुद्धि का उपयोग क्या है? बुद्धिमान होना। यही वह बात है जो बुद्धि को सर्वोच्च मूल्य प्रदान करती है। यदि उसके उपयोग को हटा दिया जाए, तो बुद्धि निरर्थक हो जाएगी। यदि यातनाएँ बुरी हैं तो यातना सहना भी बुरा है। वास्तव में, यदि परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली अवस्था को ही हटा दिया जाए, तो यातनाएँ भी बुरी नहीं कहलाएँगी। बुद्धि परिपूर्ण मन की अवस्था (स्थिति) है। बुद्धिमान होना उस परिपूर्ण मन का प्रयोग है। यदि किसी वस्तु का उपयोग ही शुभ न हो तो वह वस्तु स्वयं अपने उपयोग के बिना शुभ कैसे हो सकती है?

    मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या बुद्धि वरणीय है? तुम उत्तर देते हो, हाँ। फिर मैं पूछता हूँ, क्या बुद्धि का उपयोग भी वरणीय है? तुम फिर उत्तर देते हो, हाँ। इतना ही नहीं, तुम यह भी कहते हो कि यदि तुम्हें उसका उपयोग करने से रोक दिया जाए तो तुम उसे स्वीकार ही नहीं करोगे। जो वस्तु वरणीय है, वह शुभ है। बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रभावशाली ढंग से बोलना वाक्पटुता का उपयोग है और देखना नेत्रों का उपयोग है। अतः बुद्धिमान होना बुद्धि का उपयोग है। यदि बुद्धि का उपयोग वरणीय है तो बुद्धिमान होना भी वरणीय है। यदि वह वरणीय है तो वह शुभ भी है। 

    इतनी देर से मैं स्वयं को ही धिक्कार रहा हूँ कि जिन लोगों की मैं आलोचना करता हूँ, उन्हीं की भाँति मैं भी एक स्पष्ट और सरल विषय पर शब्दों का अनावश्यक व्यय कर रहा हूँ। क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि यदि ऊष्मा बुरी है, तो गर्म होना भी बुरा होगा? यदि शीत बुरा है, तो ठंड से ग्रस्त होना भी बुरा होगा? और यदि जीवन शुभ है, तो जीना भी शुभ होगा? यद्यपि ये सभी बातें बुद्धि के विषय से संबंधित हैं। फिर भी वे बुद्धि के अंतरतम स्वरूप का स्पर्श नहीं करतीं। हमें अपना समय बुद्धि के वास्तविक स्वरूप के भीतर प्रवेश करके उसका विचार करने में लगाना चाहिए। 

    यदि हम चर्चा को किसी दूसरी दिशा में ले जाना चाहें तो दर्शन हमें विचार के लिए असीम विषय प्रदान करता है। आओ, हम देवताओं के स्वरूप का अन्वेषण करें अथवा तारों के पोषण, उनकी विविध गतियों और परिक्रमाओं का अध्ययन करें या यह विचार करें कि क्या मानवीय जीवन की घटनाएँ तारों की गतियों के अनुरूप विकसित होती हैं अथवा क्या वही पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं और मनुष्यों के मन में गति के मूल कारण हैं या फिर यह कि जिन्हें हम संयोगवश घटित होने वाली घटनाएँ कहते हैं, क्या वे भी किसी निश्चित नियम से बँधी हुई हैं और क्या इस विश्व-व्यवस्था के बाहर या उसके क्रम से अलग वास्तव में कुछ भी नहीं घटित होता। ये विषय प्रत्यक्ष रूप से नैतिक शिक्षा से संबंधित नहीं हैं।। किन्तु वे मन को ऊँचा उठाते हैं और उसे अपने महान विषयों के अनुरूप विशाल बना देते हैं। इसके विपरीत, जिन बातों की मैं अभी कुछ देर पहले चर्चा कर रहा था, वे हमारे मन को ऊँचा उठाने के स्थान पर उसे छोटा और संकीर्ण बना देती हैं। वे मन को तीक्ष्ण नहीं करतीं, जैसा कि तुम लोग समझते हो। वे केवल उसे सीमित कर देती हैं। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या हम अपनी शक्ति ऐसे विषय पर व्यर्थ करेंगे जो संभवतः असत्य हो सकता है और निश्चित रूप से किसी व्यावहारिक उपयोग का भी नहीं है? हमें अपनी बुद्धि और परिश्रम को ऐसे कार्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। हम उसे अधिक महान और अधिक श्रेष्ठ विषयों के ऋणी हैं। आख़िर मुझे इससे क्या लाभ होगा कि मैं यह जान लूँ कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ अलग-अलग हैं अथवा यह कि पहली शुभ है और दूसरी नहीं? मैं इस विवाद में जोखिम उठाने को तैयार हूँ। आओ, पासा फेंकते हैं, तुम्हें ‘बुद्धि’ मिल जाए और मुझे ‘बुद्धिमान होना’। परिणाम दोनों के लिए समान ही रहेगा।

    मैं तो यह अधिक चाहता हूँ कि तुम मुझे इन बातों को प्राप्त करने का मार्ग दिखाओ। मुझे बताओ कि मुझे किन बातों से बचना चाहिए और किन बातों को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। कौन-से अभ्यास मेरे दुर्बल पड़ते हुए मन को दृढ़ बना सकते हैं? मैं उन परिस्थितियों से अपनी रक्षा कैसे करूँ जो अचानक आकर मुझे विचलित कर देती हैं? मैं असंख्य विपत्तियों का सामना करने में समर्थ कैसे बनूँ? जो दुःख भाग्य ने मुझ पर डाले हैं और जो मैंने स्वयं अपने ऊपर लाद लिए हैं, उनसे मैं कैसे मुक्त हो सकता हूँ? मुझे यह सिखाओ कि मैं शोक को बिना विलाप किए कैसे सहन करूँ। सफलता को इस प्रकार कैसे धारण करूँ कि उसके कारण दूसरों को पीड़ा न पहुँचे। यह भी सिखाओ कि मैं मृत्यु के उस अंतिम और अनिवार्य क्षण की निष्क्रिय प्रतीक्षा न करूँ बल्कि जब उचित समझूँ, तब स्वयं अपने प्रस्थान का निर्णय कर सकूँ। मेरे विचार में मृत्यु के लिए प्रार्थना करने से अधिक लज्जाजनक और कुछ नहीं है। यदि तुम जीना चाहते हो, तो फिर मरने की प्रार्थना क्यों करते हो? और यदि जीना ही नहीं चाहते तो जन्म के समय देवताओं ने तुम्हें जो जीवन दिया था, उसी को वापस माँगने के लिए उनसे प्रार्थना क्यों करते हो? जिस प्रकार यह निश्चित है कि तुम्हें किसी-न-किसी समय मृत्यु अवश्य प्राप्त होगी, चाहे तुम चाहो या न चाहो, उसी प्रकार यह भी तुम्हारे अधिकार में है कि जब तुम उचित समझो, तब स्वयं मृत्यु का वरण कर लो। पहली बात तुम्हारे लिए अनिवार्य है। दूसरी तुम्हारी अपनी इच्छा और निर्णय पर निर्भर करती है। 

    मैंने अभी-अभी एक ऐसे वक्ता के भाषण की शुरुआत पढ़ी, जिसे लोग बड़ा प्रतिष्ठित वाक्पटु मानते हैं। उसने कहा था, “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” कैसा पागलपन है! तुम उस वस्तु की प्रार्थना कर रहे हो जो पहले से ही तुम्हारे अधिकार में है। “काश, मैं यथाशीघ्र मर जाऊँ!” क्या यह कहते-कहते तुम इतने वृद्ध हो गए कि अब प्रतीक्षा करना आवश्यक हो? यदि नहीं तो फिर विलंब किस बात का है? तुम्हें कौन रोक रहा है? जिस प्रकार चाहो, जीवन का त्याग कर सकते हो। प्रकृति के किसी भी तत्त्व की ओर देखो और उसी से अपने प्रस्थान का मार्ग चुन लो। जल, पृथ्वी और वायु, इन तत्त्वों पर विचार करो जिनके द्वारा यह संसार संचालित होता है। ये केवल जीवन के कारण ही नहीं हैं। ये मृत्यु के भी उतने ही साधन हैं। “काश, मैं शीघ्र मर जाऊँ!” 'शीघ्र' से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? तुम समय क्यों निश्चित करना चाहते हो? मृत्यु तो तुम्हारी इस प्रार्थना से भी अधिक शीघ्र आ सकती है। ऐसे शब्द एक दुर्बल मन के होते हैं, जो इस प्रकार के शाप का प्रयोग केवल दूसरों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए करता है। जो व्यक्ति सचमुच मृत्यु की प्रार्थना करता है, वह वास्तव में मरना नहीं चाहता। देवताओं से जीवन और स्वास्थ्य की प्रार्थना करो। किन्तु यदि तुम्हारी वास्तविक इच्छा मरने की ही है, तो मृत्यु का एक लाभ यह है कि उसके लिए तुम्हें किसी से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं रहती। 

    प्रिय लूसीलियस, हमें इन्हीं बातों पर मनन करना चाहिए। इन्हीं के द्वारा अपने मन का निर्माण करना चाहिए। यही बुद्धि है और यही बुद्धिमानी, न कि व्यर्थ की बहसों में उलझना और अत्यन्त तुच्छ तकनीकी सूक्ष्मताओं पर विवाद करते रहना। जब भाग्य ने तुम्हारे सामने इतनी समस्याएँ खड़ी कर दी हैं, जिनका समाधान तुम अभी तक नहीं कर पाए हो, तब भी क्या तुम शब्दों के सूक्ष्म अर्थों पर विवाद करने में लगे रहोगे? युद्ध का संकेत मिल जाने के बाद भी अभ्यास के हथियार लहराते रहना कितनी मूर्खता है! इन अभ्यास वाले हथियारों को एक ओर रख दो। अब तुम्हें वास्तविक शस्त्रों की आवश्यकता है। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मेरा मन किसी भी प्रकार के विषाद या भय से विचलित न हो। मुझे वह उपाय बताओ जिससे मैं अपनी उन इच्छाओं के बोझ को उतार फेंकूँ जिन्हें मैंने स्वयं भी कभी स्वीकार नहीं किया। कुछ सार्थक करो! 

    “बुद्धि तो शुभ है, परन्तु बुद्धिमान होना शुभ नहीं है।” यदि हमें यही सिखाया जाएगा तो इसका परिणाम यही होगा कि लोग हमें अबुद्धिमान कहेंगे और हमारे पूरे दर्शन का उपहास करेंगे कि वह समय की निरर्थक बर्बादी है। मान लो कि मैं तुमसे कहूँ कि इस बात पर भी विवाद है कि भविष्य में प्राप्त होने वाली बुद्धि शुभ है या नहीं। बताओ, क्या यह सुनकर तुम्हें आश्चर्य होगा? क्या अन्न-भंडार भविष्य की फसल का अनुभव पहले से ही कर लेते हैं? क्या बच्चों में भविष्य की युवावस्था का बल और दृढ़ता पहले से विद्यमान होती है? जिस प्रकार रोगी को भविष्य में मिलने वाला स्वास्थ्य वर्तमान में कोई लाभ नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धावक या पहलवान भी कई महीनों बाद मिलने वाले विश्राम से अभी ताज़गी का अनुभव नहीं करता। यह बात तो सभी जानते हैं कि जो वस्तु अभी भविष्य में है, वह इस समय शुभ नहीं हो सकती क्योंकि वह अभी भविष्य में ही है। जो वास्तव में शुभ है, वह अनिवार्य रूप से लाभ पहुँचाता है। लाभ केवल वर्तमान में विद्यमान वस्तुएँ ही पहुँचा सकती हैं। जो वस्तु अभी लाभ नहीं पहुँचा सकती, वह शुभ नहीं है। यदि वह लाभ पहुँचा रही है तो इसका अर्थ है कि वह भविष्य की नहीं, वर्तमान की वस्तु है। मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। जब मैं वास्तव में बुद्धिमान हो जाऊँगा, तभी वह मेरे लिए शुभ होगा; अभी वह शुभ नहीं है। किसी वस्तु में कोई गुण तभी आ सकता है, जब वह वस्तु पहले अस्तित्व में हो। 

    मैं तुमसे पूछता हूँ, जो वस्तु अभी अस्तित्व में ही नहीं है, वह पहले से शुभ कैसे हो सकती है? यदि मैं किसी वस्तु के विषय में कहूँ, 'वह भविष्य में होगी,' तो क्या यही सबसे बड़ा प्रमाण नहीं है कि वह अभी अस्तित्व में नहीं है? जो अभी आने वाली है, वह स्पष्टतः अभी आई नहीं है। मैं कहता हूँ, 'वसंत आएगा।' इसका अर्थ है कि इस समय शीत ऋतु है। मैं कहता हूँ, 'ग्रीष्म आएगा।' इसका अर्थ है कि अभी ग्रीष्म नहीं है। किसी वस्तु के वर्तमान में न होने का सबसे प्रबल प्रमाण यही है कि वह अभी भविष्य की वस्तु है। मुझे आशा है कि मैं भविष्य में बुद्धिमान बनूँगा। किन्तु इस समय मैं बुद्धिमान नहीं हूँ। यदि वह शुभ मेरे पास अभी होता, तो मैं अपनी वर्तमान बुरी अवस्था से पहले ही मुक्त हो चुका होता। मेरा बुद्धिमान होना अभी भविष्य की बात है। इससे तुम समझ सकते हो कि मैं अभी बुद्धिमान नहीं हूँ। मैं एक ही समय में उस शुभ अवस्था में भी नहीं हो सकता और इस अशुभ अवस्था में भी। शुभ और अशुभ एक ही व्यक्ति में एक साथ विद्यमान नहीं रह सकते।  

    आओ, इन जटिल और तुच्छ विवादों को शीघ्रता से पीछे छोड़ दें और उन बातों की ओर बढ़ें जो वास्तव में हमारी सहायता करने वाली हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रसव-वेदना से पीड़ित पुत्री के लिए व्याकुल होकर दाई को बुलाता है, तब वह खेलों की घोषणा और कार्यक्रम पढ़ने नहीं बैठ जाता। उसी प्रकार, जिसके घर में आग लगी हो और जो उसे बुझाने के लिए दौड़ रहा हो, वह शतरंज की बिसात पर यह विचार नहीं करता कि फँसा हुआ मोहरा किस प्रकार निकल सकता है। किन्तु, देवताओं की शपथ, चारों ओर से ऐसी ही विपत्तियों के समाचार तुम्हारी ओर आ रहे हैं, तुम्हारा घर जल रहा है, तुम्हारे बच्चे संकट में हैं, तुम्हारा देश शत्रुओं से घिरा हुआ है, तुम्हारी संपत्ति लूटी जा रही है।

   प्रकृति ने हमें इतना समय न तो इतनी कृपा से दिया है और न इतनी उदारता से कि हम उसका कोई अंश भी व्यर्थ गँवा सकें। ज़रा देखो कि सबसे अधिक सावधान रहने वाले लोग भी कितना समय खो देते हैं। किसी का कुछ समय अपनी बीमारी में व्यतीत हो जाता है, तो किसी का अपने परिवार के किसी सदस्य की बीमारी में। कुछ समय जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में चला जाता है, कुछ सार्वजनिक कर्तव्यों में और हमारी आयु का एक बड़ा भाग तो निद्रा ही ले लेती है। जब हमारा समय इतना सीमित, इतना शीघ्र बीतने वाला और इतना व्यस्त है, तब उसका अधिकांश भाग तुच्छ बातों में नष्ट करने से क्या लाभ? यह भी विचार करो कि मन अपने स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने की अपेक्षा अपना मनोरंजन करना अधिक पसंद करता है। इस प्रकार वह दर्शन को, जो वास्तव में एक उपचार है, केवल मनोरंजन का साधन बना देता है। मुझे यह नहीं मालूम कि ‘बुद्धि’ और ‘बुद्धिमान होना’ में क्या अंतर है। पर मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि इस अंतर को जानने या न जानने से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। मुझे बताओ, यदि मैं यह भेद जान भी लूँ, तो क्या उसी क्षण मैं बुद्धिमान बन जाऊँगा?फिर तुम मुझे बुद्धि से संबंधित शब्दावली में क्यों उलझाए रखते हो, बुद्धिमत्ता के वास्तविक आचरण का अभ्यास क्यों नहीं कराते? मुझे अधिक साहसी बनाओ। मुझे अधिक आत्मविश्वासी बनाओ। मुझे ऐसा बना दो कि मैं भाग्य के समकक्ष खड़ा हो सकूँ, बल्कि उससे भी श्रेष्ठ बन सकूँ। मैं उससे श्रेष्ठ बन सकता हूँ, यदि मैं जो कुछ भी सीखूँ, उसे इसी एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा दूँ।


अभी के लिए विदा 

नियंत्रित स्वभाव के बारे में -- पत्र - 114

 प्रिय लूसीलियस 


यह प्रश्न बार-बार उठाया गया है कि मनुष्य के लिए संयमित (moderate) भावनाएँ रखना अधिक अच्छा है या फिर किसी भी प्रकार की भावनाएँ न रखना। हमारे दर्शन-सम्प्रदाय (स्टोइक) के दार्शनिक भावनात्मक विकारों का पूर्णतः निषेध करते हैं। जबकि पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उन्हें केवल संयमित रखने की बात करते हैं। परंतु मुझे यह समझ में नहीं आता कि किसी रोग की थोड़ी-सी मात्रा भी कैसे स्वास्थ्यकर या उपयोगी हो सकती है। 



    डरो मत। मैं तुमसे ऐसी कोई वस्तु छीनने नहीं जा रहा जिसे तुम छोड़ना न चाहते हो। मैं तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के प्रति उदार और सहमत रहूँगा। जीवन की जिन वस्तुओं को तुम आवश्यक, उपयोगी और सुखद मानते हो, उन्हें भी मैं नहीं छीनूँगा। मैं केवल उनमें जो दोषपूर्ण है, उसी को दूर करूँगा।जब मैं कामना (तृष्णा) का निषेध करूँगा, तब भी मैं तुम्हें उचित इच्छा रखने की अनुमति दूँगा ताकि तुम वही कार्य चिंता से मुक्त होकर, अधिक दृढ़ निश्चय के साथ कर सको और अपने सुखों का भी अधिक गहराई से अनुभव कर सको। यदि तुम सुखों के स्वामी रहोगे, उनके दास नहीं तो वे तुम्हें और भी सहजता से क्यों नहीं प्राप्त होंगे? 

    तुम कहोगे, “किसी मित्र के निधन पर शोक करना तो स्वाभाविक है। मेरे उचित आँसुओं को बहने का अधिकार तो रहने दो। लोगों की राय से प्रभावित होना और उनके नकारात्मक विचारों से दुखी होना भी स्वाभाविक है। यदि लोग मेरे बारे में बुरा सोचें, तो उससे भय होना भी तो सम्मानजनक है। तुम मुझे ऐसा उचित भय रखने की अनुमति क्यों नहीं देते?” किन्तु ऐसा कोई भी दोष नहीं है जिसके पक्ष में कोई न कोई तर्क देने वाला न मिल जाए। प्रारम्भ में सभी दोष संकोची और वश में प्रतीत होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे वे बढ़ते जाते हैं और अंततः मनुष्य पर अधिकार जमा लेते हैं। यदि तुम उन्हें प्रवेश करने दोगे तो बाद में उन्हें रोक नहीं सकोगे। प्रत्येक भावनात्मक विकार आरम्भ में दुर्बल होता है। फिर वह स्वयं को उकसाता है, आगे बढ़ते-बढ़ते शक्ति प्राप्त कर लेता है। इसलिए उन्हें बाहर निकालने की अपेक्षा प्रारम्भ में ही भीतर प्रवेश न करने देना कहीं अधिक सरल है। 

    कोई भी यह नहीं कहता कि सभी भावनात्मक विकारों का उद्गम किसी न किसी अर्थ में प्रकृति से नहीं होता। प्रकृति ने हमें अपने प्रति चिंता और आत्म-सुरक्षा की भावना प्रदान की है। परंतु जब हम उसी भावना को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देते हैं, तब वही दोष बन जाती है। प्रकृति ने जीवन की आवश्यक वस्तुओं के साथ सुख का अनुभव इसलिए जोड़ा है कि हम केवल सुख के पीछे न भागें बल्कि वह अतिरिक्त सुख जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को हमारे लिए अधिक प्रिय और सहज बना दे। किन्तु यदि सुख को उसके अपने लिए ही लक्ष्य बनाकर उसका पीछा किया जाए तो वही आत्म-भोग (विलासिता) बन जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि जैसे ही भावनात्मक विकार प्रवेश करना प्रारम्भ करें, हम उसी समय उनका प्रतिरोध करें। क्योंकि जैसा कि मैंने कहा है, उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोकना, उन्हें भीतर से निकालने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है।

    मैं सुन रहा हूँ कि तुम कह रहे हो, “मुझे कुछ सीमा तक शोक करने दो और कुछ सीमा तक भय या चिंता का अनुभव करने दो।” लेकिन तुम्हारी यह 'कुछ सीमा' निरंतर बढ़ती ही चली जाती है और जब तुम उसे रोकना चाहते हो, तब वह रुकने से इनकार कर देती है। बुद्धिमान व्यक्ति बिना विचलित हुए स्वयं पर नियंत्रण रख सकता है। वह जब चाहे अपने आँसुओं को रोक सकता है और अपने सुखों पर भी विराम लगा सकता है। परंतु हम जैसे लोगों के लिए पीछे हटना ही कठिन होता है। इसलिए हमारे लिए यही अधिक अच्छा है कि हम आरम्भ ही न करें। 

    मुझे लगता है कि पनैटियस (प्राचीन यूनान के एक प्रसिद्ध स्टोइक दार्शनिक थे) ने उस युवक को बहुत उपयुक्त उत्तर दिया था जिसने उनसे पूछा था कि क्या बुद्धिमान व्यक्ति प्रेम में पड़ता है।उन्होंने कहा, “जहाँ तक बुद्धिमान व्यक्ति का प्रश्न है, उस पर हम बाद में विचार करेंगे। परन्तु तुम और मैं, जो अभी बुद्धिमत्ता से बहुत दूर हैं, हमारे लिए तो प्रेम में पड़ने से बचना ही उचित है। क्योंकि प्रेम ऐसी अवस्था है जिसमें मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, अपने ऊपर से नियंत्रण खो बैठता है, दूसरे का दास बन जाता है और अपने आत्मसम्मान तक को भूल जाता है। यदि हमारा प्रेम स्वीकार कर लिया जाता है तो हम दूसरे के अनुग्रह से उन्मत्त हो उठते हैं। और यदि अस्वीकार कर दिया जाता है, तो उसके तिरस्कार की अग्नि में जलने लगते हैं। सहज और सफल प्रेम भी उतना ही हानिकारक है जितना कठिन और असफल प्रेम। सफलता हमें अपने आकर्षण में बाँध लेती है और असफलता हमें संघर्ष और व्याकुलता में डाल देती है। अतः अपनी दुर्बलता को पहचानते हुए हमारे लिए यही श्रेयस्कर है कि हम मन की शांति बनाए रखें। हमें अपने दुर्बल स्वभाव को न शराब के हवाले करना चाहिए, न रूप-सौंदर्य के, न चापलूसी के और न ही किसी अन्य प्रकार के प्रलोभन के।”

    मेरा कहना यह है कि प्रेम के विषय में पनैटियस ने जो उत्तर दिया था, वही सभी भावनात्मक विकारों पर समान रूप से लागू होता है। जहाँ तक संभव हो, हमें फिसलन भरी भूमि से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि हमारे लिए तो सूखी भूमि पर भी दृढ़ता से खड़े रहना कठिन है। तुम इस विषय में स्टोइकों पर प्रायः लगाया जाने वाला वही पुराना आक्षेप करोगे, “तुम लोगों के वचन बहुत बड़े हैं और तुम्हारी अपेक्षाएँ अत्यधिक कठोर हैं। हम तो साधारण मनुष्य हैं। हम अपने आप को हर बात से पूरी तरह वंचित नहीं कर सकते। हम शोक करेंगे, पर थोड़ा-सा। हम इच्छाएँ रखेंगे, पर संयम के साथ। हम क्रोधित भी होंगे, पर इतना नहीं कि क्षमा करना ही भूल जाएँ।” क्या तुम जानते हो कि हम ऐसा क्यों नहीं कर पाते? क्योंकि हमें स्वयं इस बात पर विश्वास ही नहीं है कि हम ऐसा कर सकते हैं। 

    वास्तव में, इसके पीछे एक और कारण भी है। हमें अपने दोषों से प्रेम होता है। हम उनका त्याग करने के बजाय उनका बचाव करते हैं और उन्हें छोड़ने के स्थान पर उनके पक्ष में बहाने ढूँढ़ते हैं। मानव-स्वभाव को प्रकृति ने पर्याप्त शक्ति प्रदान की है, यदि हम उसका उपयोग करना चाहें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी समस्त शक्तियों को एकत्रित करें और उन्हें अपने पक्ष में कार्य करने दें, अपने विरुद्ध नहीं।असमर्थता तो केवल एक बहाना है; वास्तविक कारण हमारी अनिच्छा है।

लोभ के बारे में -- पत्र - 113

 अभिवादन 


प्रिय लूसीलियस, मैं चाहता हूँ कि तुम शब्दों और वाक्य-रचना को लेकर अत्यधिक चिंतित न रहो। तुम्हारे लिए चिंता करने योग्य इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बातें हैं। अपने आप से यह पूछो कि तुम क्या लिख रहे हो, यह नहीं कि कैसे लिख रहे हो। जहाँ तक विषय-वस्तु का संबंध है, तुम्हारा उद्देश्य केवल उसे लिख देना नहीं होना चाहिए बल्कि उसे अपने अंतर्मन में अनुभव करना चाहिए, उन विचारों को आत्मसात करना चाहिए। उन्हें अपनी आत्मा पर इस प्रकार अंकित कर लेना चाहिए जैसे कोई मुहर मोम पर अपनी छाप छोड़ देती है।



    जब किसी व्यक्ति की वाक्-शैली में अत्यधिक सावधानी, परिष्कार और बनावट दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि उसका मन भी छोटी बातों में ही उलझा हुआ है। महान व्यक्ति की वाणी इतनी बनावटी नहीं होती। उसके शब्द दिल से निकलते हैं, न कि कृत्रिम रूप से सजाए-सँवारे जाते हैं। तुम उन सजे-धजे युवकों को जानते हो जिनके केश-विन्यास और दाढ़ी की शैली अभी-अभी प्रसाधन-गृह से सँवारकर निकली हुई प्रतीत होती है। उनसे तुम किसी साहसपूर्ण या दृढ़ चरित्र वाले आचरण की अपेक्षा नहीं करते। उसी प्रकार वाणी भी मन का वस्त्र और उसका श्रृंगार है। यदि हमारी भाषा अत्यधिक कतर-ब्योंत की हुई, सजी-सँवरी और बनावटी हो तो वह इस बात का संकेत है कि मन भी निष्कपट नहीं है। उसके भीतर कहीं न कहीं कुछ विकृति या असंतुलन अवश्य है। अत्यधिक मधुर और ललित वाणी पुरुषार्थ का आभूषण नहीं है।

    यदि हमें किसी सज्जन पुरुष के मन का दर्शन करने का अवसर मिले तो हम कितना सुंदर और कितना पवित्र दृश्य देखेंगे! उसमें कैसी महानता और कैसी शांति प्रकाशित होगी! वहाँ सद्गुणों के नक्षत्र किस प्रकार आलोक बिखेरते हुए दिखाई देंगे। एक ओर न्याय, दूसरी ओर साहस। कहीं संयम और विवेक। इनके साथ-साथ मितव्ययिता, आत्मसंयम, धैर्य, उदारता और प्रसन्नचित्तता भी अपना प्रकाश फैलाएँगे। मानव-प्रेम भी, जो विश्वास करना कठिन है, पर वास्तव में मनुष्यों के बीच अत्यंत दुर्लभ है। दूरदर्शिता, सुसंस्कृतता और इन सबमें सबसे बढ़कर महान आत्मा का वैभव, ये सब मिलकर उस मन को कैसी शोभा और देवताओं की शपथ, कैसी गरिमा प्रदान करेंगे! उसका प्रभाव कितना महान होगा और वह कितना आदरणीय होगा! लोग उससे प्रेम भी करेंगे और साथ ही उसका सम्मान और श्रद्धा भी करेंगे। 

    यदि कोई उस मुखमंडल का दर्शन कर सके, जो सामान्य मानवीय जीवन में दिखाई देने वाली हर वस्तु से अधिक उदात्त और अधिक तेजस्वी हो तो क्या वह किसी देवता के प्रकट होने के समान विस्मय से ठिठक न जाएगा? क्या वह उस दिव्य दर्शन के लिए मौन प्रार्थना करते हुए, उस मुखमंडल की कृपा से प्रेरित होकर श्रद्धापूर्वक उसके समीप न बढ़ेगा और उसकी आराधना न करेगा? फिर जब वह उस स्वरूप को लंबे समय तक निहार चुका होगा, जो हमारे समस्त अनुभवों से कहीं अधिक ऊँचा और उत्कृष्ट है। उन नेत्रों को देखेगा जो कोमल प्रकाश के साथ-साथ सजीव अग्नि की ज्योति से भी दमक रहे हैं, तब अंततः भय और विस्मय से भरकर वह हमारे कवि वर्जिल के शब्दों में कह उठेगा—

हे देवी, मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ?
क्योंकि तुम्हारा मुख किसी नश्वर का नहीं है,
और तुम्हारी वाणी भी मानवीय नहीं लगती।
अतः मुझ पर कृपा करो
और मेरे समस्त श्रमों का भार हल्का कर दो।

    यह दिव्य सत्ता हमारे सामने प्रकट होगी। यदि हम उसकी उपासना करना चुनें तो वही हमारे श्रमों को हल्का कर देगी। परंतु उसकी उपासना का अर्थ मोटे-ताज़े बैलों की बलि चढ़ाना, स्वर्ण और रजत की भेंट अर्पित करना अथवा किसी कोषागार में धन का अंबार लगाना नहीं है। उसकी सच्ची आराधना केवल निर्मल और धर्मनिष्ठ संकल्प से होती है। मैं फिर कहता हूँ, यदि हम उस दिव्य स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन कर पाते तो हममें ऐसा कोई भी न होता जो उसके प्रति प्रेम से अभिभूत न हो जाता। किंतु अभी अनेक बाधाएँ हैं जो या तो अपनी अत्यधिक चकाचौंध से हमारी दृष्टि को भ्रमित कर देती हैं अथवा हमें अज्ञान के अंधकार में डुबो देती हैं। जैसे औषधियाँ हमारी आँखों को स्वच्छ कर उनकी दृष्टि को तीक्ष्ण बना देती हैं, वैसे ही यदि हम सचमुच इच्छुक हों तो अपने मन को भी उन सभी अवरोधों से मुक्त कर सकते हैं जो सत्य को देखने से उसे रोकते हैं। तब सद्गुण हमें स्पष्ट दिखाई देगा, चाहे वह शरीर के भीतर ही क्यों न हो, चाहे उसके मार्ग में निर्धनता खड़ी हो, चाहे निम्न सामाजिक स्थिति और अपकीर्ति उसे चारों ओर से घेरे हुए हों। मैं फिर कहता हूँ, हम उस सुंदर स्वरूप का दर्शन कर सकेंगे, भले ही वह धूल और मलिनता से ढका हुआ प्रतीत हो। उसी प्रकार हम उस मन की कुरूपता और मलिनता को भी पहचान लेंगे जो क्लेशों और विकारों से भरा हुआ है, चाहे उसके चारों ओर धन-वैभव की चमक बिखरी हो, चाहे ऊँची प्रतिष्ठा और महान सत्ता का मिथ्या तेज हर ओर से हमारी आँखों को चकाचौंध कर रहा हो। 

    तभी हम यह समझने की स्थिति में होंगे कि जिन वस्तुओं की हम प्रशंसा करते हैं, वे वास्तव में कितनी तुच्छ हैं। हमारी दशा उन बच्चों के समान है, जो अपने खिलौनों को अत्यधिक महत्त्व देते हैं और किसी सस्ते-से चमकीले खिलौने को अपने भाई-बहन या यहाँ तक कि माता-पिता से भी अधिक प्रिय समझते हैं। जैसा कि अरिस्टो कहते हैं, उनमें और हममें अंतर ही क्या है? केवल इतना कि हमारी मूर्खता अधिक महँगे रूप में प्रकट होती है। वे समुद्र-तट पर मिले रंग-बिरंगे चिकने कंकड़ों से प्रसन्न होते हैं। हम मिस्र के मरुस्थलों या अफ्रीका के निर्जन प्रदेशों से मँगाए गए रंगीन संगमरमर तथा उन विशाल स्तंभों से मोहित होते हैं जो ऐसे सभागारों या भोज-कक्षों को सहारा देते हैं जिनमें मानो पूरा का पूरा नगर समा जाए। 

    हम संगमरमर से मढ़ी हुई दीवारों वाले कक्षों पर आश्चर्य करते हैं। जबकि हम जानते हैं कि वह केवल ऊपर चढ़ाई गई एक पतली परत है। जब हम किसी छत पर सोने का पानी चढ़ाते हैं तो क्या हम स्वयं को धोखा नहीं दे रहे होते? क्योंकि हम जानते हैं कि उस स्वर्णिम परत के नीचे साधारण और आकर्षणहीन लकड़ी छिपी हुई है। और यह दिखावटी सजावट केवल दीवारों और छतों तक ही सीमित नहीं है। उन लोगों को देखो जो ऊँचे पदों पर इतराते हुए चलते हैं। उनका वैभव भी केवल सोने की परत के समान है। यदि तुम उसे ध्यान से परखो तो उस प्रतिष्ठा की पतली परत के नीचे कितनी सड़न और भ्रष्टता छिपी हुई है, यह स्पष्ट दिखाई देगा। एक ही वस्तु है जो प्रत्येक उच्च पद, प्रत्येक न्यायाधीश का आसन और प्रत्येक अधिकार का निर्धारण करती है— धन। जिस क्षण से धन को सम्मान मिलने लगा, उसी क्षण से सच्चा सम्मान तिरस्कृत होने लगा। हम सब व्यापारी बन गए हैं और हर वस्तु भी व्यापार की वस्तु बन गई है। हम यह नहीं पूछते कि कोई वस्तु वास्तव में क्या है। हम केवल यह पूछते हैं कि उसकी कीमत कितनी है। हम मूल्य लेकर निष्ठावान बनते हैं और मूल्य लेकर विश्वासघात भी करते हैं। जब तक हमें सदाचार से कोई लाभ मिलने की आशा रहती है, तब तक हम ईमानदारी का आचरण करते हैं। पर यदि अपराध हमें उससे अधिक लाभ देने लगे तो हम उसी का मार्ग अपना लेते हैं।

    हमने अपने माता-पिता से ही स्वर्ण और रजत को विस्मय और श्रद्धा की दृष्टि से देखना सीखा। बचपन में ही लोभ का बीज हमारे भीतर बो दिया गया। वह हमारे मन में गहराई तक जड़ें जमाकर हमारे साथ-साथ बढ़ता गया। फिर समाज का प्रभाव आता है। अन्य सभी बातों में लोग चाहे एक-दूसरे से असहमत हों। पर इस विषय में सबकी एक ही राय होती है। वे इसी की प्रशंसा करते हैं, इसी की कामना अपने लिए और अपने परिवार के लिए करते हैं। जब वे देवताओं के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहते हैं, तब भी इसी धन को अर्पित करते हैं, मानो यही मनुष्य का सबसे महान और सर्वोच्च धन हो। फलस्वरूप हमारा चरित्र इतना पतित हो जाता है कि निर्धनता को अभिशाप समझा जाने लगता है। धनी लोग उसका तिरस्कार करते हैं और निर्धन स्वयं भी उससे घृणा करने लगते हैं। फिर कवियों की रचनाएँ भी हमारे मोह को और भड़काती हैं। वे धन की ऐसी प्रशंसा करते हैं, मानो वही जीवन की एकमात्र शोभा और गौरव हो। उनके वर्णनों में तो ऐसा प्रतीत होता है कि अमर देवताओं के पास भी धन-संपदा से बढ़कर न तो कोई वरदान है और न ही कोई ऐसी वस्तु जिसे वे स्वयं अपने लिए रखना चाहें।

सूर्य का महल ऊँचे-ऊँचे स्तंभों पर खड़ा था,
दमकते हुए स्वर्ण की आभा से आलोकित और भव्य।

और उसके रथ का वर्णन देखिए—

उसका धुरा स्वर्ण का था, उसका दंड भी स्वर्ण का,
उसके घूमते हुए पहियों के घेरे स्वर्ण से मढ़े थे,
और उनसे निकलने वाली तीलियाँ रजत की बनी थीं।

इसी प्रकार वे 'स्वर्णयुग' का भी वर्णन करते हैं और उसे मानव इतिहास का सर्वोत्तम युग सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार काव्य भी हमारे मन में यह धारणा दृढ़ करता है कि स्वर्ण और वैभव ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हैं। यूनानी त्रासदियों में भी ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहाँ लोग धन के लिए अपनी निष्कपटता, अपना स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी कीर्ति तक का त्याग करने को तैयार हो जाते हैं।

लोग मुझे दुष्ट कहें, पर धनी दुष्ट कहें।
हर कोई यह पूछता है कि वह धनी है या नहीं,
यह नहीं कि वह सज्जन है या नहीं।
यह कोई नहीं पूछता कि धन तुम्हें कैसे मिला
या किस मार्ग से प्राप्त हुआ,
वे केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम्हारे पास कितना धन है।
आज संसार में मनुष्य का मूल्य उसकी संपत्ति से आँका जाता है।
लज्जा की बात क्या है? — निर्धन होना।
या तो मैं धनवान होकर जीऊँ,
या निर्धन होकर मर जाऊँ।
धन कमाते-कमाते मर जाना भी सौभाग्य माना जाता है।
धन ही मानव जाति का सर्वोच्च कल्याण है।
वह माँ के प्रेम से भी अधिक प्रिय है,
शिशु के स्नेहिल स्पर्श से भी अधिक मधुर है,
और पिता के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए, उससे भी अधिक मूल्यवान समझा जाता है।
यदि स्वयं वीनस (प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और उर्वरता की देवी) का मुख भी इस स्वर्ण की आभा की बराबरी कर सके,
तो वह सचमुच देवताओं और मनुष्यों, दोनों के प्रेम की अधिकारी है।

जब यूरिपिदेस (Euripides- यूनानी सर्वश्रेष्ठ नाटककारों में से एक) की एक त्रासदी में यह अंतिम संवाद बोला गया तो समस्त दर्शक-समूह एक साथ खड़ा हो गया। उनका उद्देश्य अभिनेता और नाटक, दोनों को रंगमंच से बाहर निकाल देना था। तब स्वयं यूरिपिदेस मंच पर आए और दर्शकों से विनती की कि वे अंत तक प्रतीक्षा करें और देखें कि स्वर्ण-लोभ का वह उपासक अंततः किस परिणाम को प्राप्त होता है। उस कथा में बेलेरोफोन (Bellerophon-प्राचीन यूनानी पौराणिक कथाओं का एक प्रसिद्ध वीर नायक)  को उसके कर्मों का उचित दंड मिलता है। वास्तविक जीवन में भी प्रत्येक लोभी व्यक्ति का अंततः यही भाग्य होता है। लोभ कभी दंड से बच नहीं पाता बल्कि सत्य तो यह है कि लोभ स्वयं ही अपना सबसे बड़ा दंड है। वह मनुष्य से कितने आँसू बहवाता है, कितना दुःख सहने पर विवश करता है! जो वस्तु उसके पास नहीं है, उसके लिए वह व्याकुल रहता है। जो कुछ उसने प्राप्त कर लिया है, उसके कारण भी उसे चैन नहीं मिलता। फिर प्रतिदिन की चिंताएँ अलग हैं। मनुष्य के पास जितना अधिक धन होता है, उतनी ही अधिक उसकी चिंता बढ़ती जाती है। वास्तव में, धन उन लोगों को उससे कहीं अधिक कष्ट देता है जिनके पास वह है, बनिस्बत उनके जो उसे प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।



जब उन्हें थोड़ी-सी भी हानि होती है तो वे विलाप करने लगते हैं। वे बड़ी-बड़ी धनराशियाँ खोते हैं और उन्हें उनकी वास्तविक मात्रा से भी अधिक बड़ी हानि प्रतीत होती है। यहाँ तक कि यदि भाग्य उनसे कुछ भी न छीने तो जो धन वे प्राप्त नहीं कर सके, उसी को वे अपनी हानि मानकर दुखी होते रहते हैं। 

    “लेकिन लोग तो उसे भाग्यशाली और धनी कहते हैं तथा स्वयं भी उसकी जितनी संपत्ति है, उतनी पाने की कामना करते हैं।” मैं यह मान लेता हूँ। पर उससे क्या सिद्ध होता है? इसके साथ वे दुख भी पाते हैं और ईर्ष्या का लक्ष्य भी बनते हैं। क्या तुम इससे अधिक दयनीय अवस्था की कल्पना कर सकते हो? काश, जो लोग दूसरों की संपत्ति पाने की इच्छा करते हैं, वे पहले उन्हीं धनी लोगों से पूछ लेते! जो लोग उच्च पद प्राप्त करने की दौड़ में लगे रहते हैं, वे पहले उन लोगों से परामर्श कर लेते जो राज्य के सबसे प्रतिष्ठित पदों पर पहुँच चुके हैं! तब वे शीघ्र ही अपनी इच्छाएँ बदल देते। किन्तु स्थिति यह है कि जो लोग अपनी ही सफलता की शिकायत करते हैं, वे भी और अधिक सफलता पाने के लिए उतने ही उत्सुक रहते हैं। मनुष्य अपनी समृद्धि से कभी संतुष्ट नहीं होता, चाहे वह उसे एक साथ ही क्यों न प्राप्त हो जाए। वह अपनी ही योजनाओं और अपनी ही उन्नति पर असंतोष व्यक्त करता है और सदैव यही कहता रहता है कि जो कुछ वह पीछे छोड़ आया, वही अधिक अच्छा था।

    यही वह कार्य है जो दर्शन तुम्हारे लिए करेगा और मेरे विचार में यही उसका सबसे महान उपहार है तुम अपने किसी भी कर्म पर कभी पछतावा नहीं करोगे। यही सुख का वह दृढ़ आधार है जिसे कोई भी तूफ़ान डिगा नहीं सकता। किन्तु तुम इस अवस्था तक वाक्पटुता के सहारे या शब्दों के सहज प्रवाह के बल पर नहीं पहुँच सकते। उन्हें अपने मार्ग पर चलने दो। पर तुम्हारा मन स्वयं में स्थिर, संतुलित और सुसंगत होना चाहिए। तुम्हारा मन महान हो, अपने सिद्धांतों में अडिग और आत्मविश्वासी हो तथा जहाँ दूसरे लोग असंतोष से भरे रहते हैं, वहाँ वह संतोष का अनुभव करे। वह अपनी प्रगति का आकलन अपने जीवन-आचरण से करे और यह समझे कि उसके पास उतना ही सच्चा ज्ञान है, जितना वह इच्छाओं और भय से मुक्त हो चुका है।


अभी के लिए विदा 

कर्म जो सद्गुण हैं, के बारे में - पत्र - 118

 प्रिय लूसीलियस  तुम्हारे पत्र में अनेक छोटे-छोटे प्रश्न उठाए गए थे पर अंततः वह एक ही प्रश्न पर आकर ठहर गया। तुमने मुझसे पूछा है कि हमारे मन...