Tuesday, 7 July 2026

दासों के संदर्भ में -- पत्र 47

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे उन लोगों से यह जानकर प्रसन्नता हुई जो आपके साथ रह चुके हैं। आप अपने दासों के साथ आत्मीय और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। यह आपके विवेक और शिक्षा के अनुरूप ही है। “वे दास हैं।” नहीं, वे मनुष्य हैं। “वे दास हैं।” नहीं, वे आपके घर के सहचर हैं। “वे दास हैं।” नहीं, वे निम्न जन्म वाले मित्र हैं। “वे दास हैं।” बल्कि वे आपके सह-दास हैं। यदि आप यह ध्यान रखें कि भाग्य का प्रभाव आप पर भी उतना ही पड़ता है जितना उन पर।


By Liu Kang

    इसी कारण मैं उन लोगों पर हँसता हूँ जो यह समझते हैं कि अपने दासों के साथ भोजन करना उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। क्यों? इसका केवल एक ही कारण है—अहंकार की वह परंपरा, जिसमें स्वामी भोजन करता है और उसके चारों ओर दासों की भीड़ खड़ी रहती है। वह अपनी क्षमता से अधिक खाता है। अत्यधिक लालच उसके फूले हुए पेट पर बोझ डाल देता है। ऐसे पेट पर जो अपने वास्तविक कार्य को ही भूल चुका है। सिर्फ इसलिए कि वह भोजन करने की अपेक्षा उसे उल्टी करने में अधिक परिश्रम कर सके। उधर बेचारे दासों को बोलने के लिए अपने होंठ तक हिलाने की अनुमति नहीं होती। उनकी हर फुसफुसाहट को भी छड़ी के भय से रोक दिया जाता है। न छींक, न अनायास खाँसी, न ही हिचकी। कुछ भी दंड से मुक्त नहीं होता। यदि मौन किसी भी आवाज़ से टूट जाए तो उन्हें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वे पूरी रात भूखे और मौन खड़े रहते हैं।

    परिणाम यह होता है कि वही दास जो अपने स्वामी की उपस्थिति में बोल नहीं सकते, उसके बारे में दूसरों से बातें करने को तत्पर रहते हैं। लेकिन प्राचीन समय में, जब दास न केवल अपने स्वामी के सामने बोलते थे बल्कि उससे बातचीत भी करते थे, तब उनके होंठ सिले हुए नहीं थे। फिर भी वे उसके लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार रहते थे और उस पर आने वाले संकटों को स्वयं अपने ऊपर लेने का साहस रखते थे। वे भोज-समारोहों में खुलकर बोलते थे परंतु यातना के समय मौन रहते थे। बाद में, इसी अहंकार से प्रेरित होकर यह कहावत प्रचलित हुई—'अपने दासों की गिनती करो, तो अपने शत्रुओं की गिनती करोगे।' वास्तव में वे केवल दास होने के कारण हमारे शत्रु नहीं होते। हम स्वयं अपने व्यवहार से उन्हें शत्रु बना देते हैं।

    मैं उन सभी क्रूर और अमानवीय व्यवहारों की सूची भी नहीं बना सकता जो बोझ ढोने वाले पशुओं के साथ भी नहीं किए जाने चाहिए। मनुष्यों की तो बात ही अलग है। जब स्वामी भोजन के समय आराम से सोफे पर लेटा होता है तब एक दास उसके थूक के ढेरों को साफ कर रहा होता है। दूसरा मेज़ या सोफे के नीचे रेंग-रेंगकर उन टुकड़ों को बटोर रहा होता है जो नशे में धुत्त लोगों ने नीचे गिरा दिए हैं। तीसरा महँगे पक्षियों का मांस काट रहा होता है। उसका प्रशिक्षित हाथ बड़ी कुशलता से सीने और जाँघ के हिस्सों को सुंदर टुकड़ों में अलग करता है। कितना अभागा है वह जिसका जीवन केवल मुर्गे या पक्षी को ठीक ढंग से काटने की कला तक सीमित है! हालाँकि उससे भी अधिक अभागा वह व्यक्ति है जो उसे यह कला सिखाता है। पहला इसलिए सीखता है क्योंकि वह विवश है। दूसरा केवल अपने विलास और मनोरंजन के लिए उसे सिखाता है।

    एक अन्य दास मदिरा परोसने वाला है। उसे स्त्री की भाँति सजाया-सँवारा जाता है और वह अपनी बढ़ती आयु से संघर्ष कर रहा होता है। उसे बचपन से निकलने नहीं दिया जाता बल्कि बार-बार उसी अवस्था में लौटने के लिए बाध्य किया जाता है। उसकी चाल-ढाल किसी सैनिक जैसी हो चुकी है फिर भी उसके गाल चिकने रखे जाते हैं। शरीर के प्रत्येक बाल को या तो मुंडवा दिया जाता है या उखाड़ दिया जाता है। वह पूरी रात सेवा में लगा रहता है। उसकी पहली ड्यूटी अपने स्वामी के मद्यपान की सेवा करना है और दूसरी उसकी काम-वासना की पूर्ति करना। भोज-सभा में वह केवल एक लड़का माना जाता है पर शयनकक्ष में उसे पुरुष बना दिया जाता है।

    एक अन्य दास का काम अतिथियों का मूल्यांकन करना है। उसका दुर्भाग्यपूर्ण दायित्व है कि वह खड़ा होकर यह देखे कि कौन अतिथि चापलूस है, कौन अपने पेटू स्वभाव पर नियंत्रण नहीं रख सकता और कौन अपनी ज़बान पर लगाम नहीं रखता। ऐसे ही लोगों को अगले दिन फिर निमंत्रण दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी होते हैं जो भोजन-संबंधी रुचियों के निर्णायक होते हैं। उन्हें अपने स्वामी की पसंद-नापसंद का अत्यंत सूक्ष्म ज्ञान होता है— कौन-सा भोजन उसकी जिह्वा को उत्तेजित करता है, कौन-सा उसकी आँखों को अच्छा लगता है, कौन-सी नई वस्तु उसे आकर्षित कर सकती है, यहाँ तक कि तब भी जब उसका मन उचट रहा हो, कौन-सी चीज़ वह बार-बार परोसे जाने के कारण नापसंद करने लगा है और किसी विशेष दिन उसे किस भोजन की इच्छा है। इन्हीं लोगों के साथ वह भोजन करना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझता है। वह यह मानता है कि अपने ही दास के साथ एक ही मेज़ पर बैठना उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। हे भगवान, कैसी विचित्र सोच है!

    फिर भी, उन्हीं दासों में उसके कितने सच्चे मित्र हो सकते हैं! एक बार मैंने कैलिस्टस (Callistus) के द्वार पर एक विचित्र दृश्य देखा। स्वयं कैलिस्टस का पूर्व स्वामी वहाँ प्रवेश पाने की प्रतीक्षा में खड़ा था। जिस व्यक्ति ने कभी उसे बेच दिया था जिसने उसे पुराने और निकम्मे दासों के साथ नीलामी में चढ़ा दिया था, वही अब भीतर प्रवेश तक नहीं पा सकता था जबकि अन्य लोगों को अनुमति मिल रही थी। यह उस दास की ओर से मिला हुआ प्रतिदान था जिसे उसने नीलामी की पहली खेप में डाल दिया था। उन दासों के साथ जिन्हें नीलामीकर्ता केवल बोली लगाने वालों को उत्साहित करने के लिए पहले प्रस्तुत करता है। भाग्य का चक्र घूम चुका था। अब बारी कैलिस्टस की थी कि वह उसे प्रवेश से वंचित करे। अब कैलिस्टस ही यह निर्णय कर रहा था कि वह व्यक्ति उसकी देहरी पार करने योग्य नहीं है। जिस स्वामी ने कभी कैलिस्टस को बेच दिया था, अब वही अपने कर्मों की कीमत चुका रहा था। कैलिस्टस को उसने बेचा था। अब कैलिस्टस उससे उसका मूल्य वसूल रहा था।

    यदि आप चाहें तो इस बात पर विचार कीजिए। जिस व्यक्ति को आप अपना दास कहते हैं, वह भी उसी प्रकार जन्मा है जैसे आप। वह भी उसी आकाश के नीचे रहता है। वह भी आपकी ही तरह साँस लेता है, जीता है और मरता है। यह पूरी तरह संभव है कि आप उसे एक दिन स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखें और उतना ही संभव है कि वह आपको दासता में पड़ा हुआ देखे। ट्यूटोबर्ग अरण्य युद्ध (Battle of the Teutoburg Forest) के समय, जब वरुस की सेना का विनाश हुआ था तब अनेक उच्च कुलों के प्रतिष्ठित व्यक्ति पतन का शिकार हो गए थे। वे लोग जो सैनिक सेवा के बाद सीनेटर बनने की आशा रखते थे, भाग्य के एक ही झटके में गिरा दिए गए। किसी को भाग्य ने चरवाहा बना दिया तो किसी को एक झोपड़ी का रखवाला। अब जाइए और उपहास कीजिए! जिन लोगों को आप तुच्छ समझते हैं, उनकी जैसी परिस्थितियाँ किसी भी समय आपके जीवन में भी आ सकती हैं। भाग्य का चक्र निरंतर घूमता रहता है और किसी के लिए भी स्थायी रूप से एक-सा नहीं रहता।

    मैं दासों के साथ व्यवहार के विषय में कोई लंबा भाषण देना नहीं चाहता। निस्संदेह, हम उनके प्रति अत्यंत घमंडी, कठोर और अपमानजनक व्यवहार करते हैं। पर मेरी सारी शिक्षा का सार केवल इतना है, अपने से निम्न स्थिति वाले व्यक्ति के साथ उसी प्रकार व्यवहार करो, जैसा तुम चाहते हो कि तुमसे उच्च स्थिति वाला व्यक्ति तुम्हारे साथ करे। जब भी तुम्हें यह स्मरण हो कि तुम्हारे पास अपने दास पर कितना अधिकार है, उसी समय यह भी याद रखो कि तुम्हारे स्वामी के पास तुम पर भी उतना ही अधिकार है। “लेकिन मेरा तो कोई स्वामी नहीं है,” तुम कहोगे। तुम अभी युवा हो। संभव है कि एक दिन तुम्हारा भी कोई स्वामी हो जाए। क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि हेकुबा कितनी आयु में दासी बनी थी? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि क्रोएसस की आयु कितनी थी? दारायस की माता की? प्लेटो की? और डायोजनीज़ की? 

    अपने दास के साथ दयालुता और मित्रतापूर्ण व्यवहार करो। उसे अपनी बातचीत में, अपनी योजनाओं में और अपने भोजन में भी सहभागी बनाओ। इस पर विलासप्रिय लोगों का पूरा वर्ग मेरे विरुद्ध चिल्लाने लगेगा। “इससे अधिक अपमानजनक और तुच्छ बात कुछ नहीं हो सकती! इससे बढ़कर लज्जाजनक क्या होगा!” किन्तु मैं इन्हीं लोगों को दूसरों के दासों के हाथ चूमते हुए पकड़ सकता हूँ।

    क्या तुम लोगों को यह ज्ञात नहीं कि हमारे पूर्वजों ने स्वामियों के प्रति उत्पन्न होने वाले वैमनस्य और दासों पर होने वाले अत्याचार को समाप्त करने के लिए क्या किया था? वे स्वामी को  'गृह-पिता' और दासों को 'गृह-परिवार के सदस्य' कहा करते थे। एक ऐसा संबोधन जो आज भी रंगमंचीय प्रहसनों में प्रचलित है। उन्होंने एक ऐसा उत्सव-दिवस निर्धारित किया था जिस दिन स्वामी अपने दासों के साथ भोजन करते थे। इसका अर्थ यह नहीं था कि वे केवल उसी दिन ऐसा करते थे बल्कि उस दिन विशेष रूप से ऐसा करना एक स्थापित परंपरा थी। उन्होंने दासों को घर के भीतर पद धारण करने और निर्णय देने का अधिकार भी प्रदान किया था क्योंकि वे घर को एक लघु राज्य के समान मानते थे।

    “तुम क्या कह रहे हो? क्या मैं अपने सभी दासों को अपनी मेज़ पर स्थान दूँ?” नहीं, उतना ही नहीं जितना तुम सभी स्वतंत्र व्यक्तियों को भी अपनी मेज़ पर स्थान नहीं देते। लेकिन यदि तुम यह सोचते हो कि मैं कुछ लोगों को केवल इसलिए बाहर रखना चाहता हूँ क्योंकि उनका काम कम सम्मानजनक या कम स्वच्छ है— जैसे अस्तबल का कर्मचारी या गायों की देखभाल करने वाला तो तुम गलत हो। मैं उनका मूल्यांकन उनके काम के आधार पर नहीं बल्कि उनके चरित्र के आधार पर करूँगा। काम तो संयोगवश मिलते हैं पर चरित्र वह चीज़ है जिसे प्रत्येक व्यक्ति स्वयं गढ़ता है। कुछ लोगों को अपने साथ भोजन करने दो क्योंकि वे उस सम्मान के योग्य हैं और कुछ को इसलिए कि वे उस सम्मान के योग्य बन सकें। यदि उनमें कोई दासोचित या हीन प्रवृत्ति है जो निम्न वातावरण में जीवन बिताने के कारण उत्पन्न हुई है तो सम्मानित और सद्गुणी लोगों के साथ भोजन करना उसे दूर कर देगा।

    मेरे प्रिय लूसीलियस, तुम्हें मित्रों की खोज केवल सभा-स्थलों या सीनेट भवन में ही करने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम ध्यानपूर्वक देखोगे तो अपने ही घर में भी उन्हें पा सकते हो। अच्छी सामग्री अक्सर केवल इसलिए व्यर्थ चली जाती है क्योंकि उसे कोई कुशल शिल्पकार नहीं मिलता। उन्हें परखो, तब तुम स्वयं देखोगे। जिस प्रकार कोई व्यक्ति घोड़ा खरीदते समय केवल उसकी जीन और लगाम देखकर, स्वयं घोड़े की जाँच किए बिना निर्णय करे तो वह मूर्ख कहलाएगा। उसी प्रकार किसी मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसके वस्त्रों और सामाजिक स्थिति के आधार पर करना भी अत्यंत मूर्खता है। क्योंकि सामाजिक स्थिति तो केवल एक और वस्त्र है जो हमारे ऊपर ओढ़ा हुआ है।

    “वह दास है।” पर संभव है कि उसका मन स्वतंत्र हो। “वह दास है।” तो क्या इससे उसकी योग्यता या संभावना कम हो जाती है? मुझे बताओ, ऐसा कौन है जो दास नहीं है? कोई व्यक्ति वासना का दास है, दूसरा लोभ का, तीसरा महत्त्वाकांक्षा का और सभी आशा के दास हैं। सभी भय के दास हैं। मैं तुम्हें एक ऐसे पूर्व कौंसुल (अधिकारी) को दिखा सकता हूँ जो एक वृद्धा स्त्री का दास बना हुआ है। एक धनी व्यक्ति को दिखा सकता हूँ जो अपनी दासी कन्या का दास है। मैं तुम्हें श्रेष्ठ कुलों के ऐसे युवकों को भी दिखा सकता हूँ जो रंगमंच के नर्तकों के अधीन बने हुए हैं। स्वेच्छा से स्वीकार की गई दासता से अधिक लज्जाजनक कोई दासता नहीं होती।

    अतः तुम्हें उन घमंडी लोगों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। अपने दासों के प्रति प्रसन्नचित्त और सौम्य व्यवहार रखो। उनसे ऊँचे पद पर रहते हुए भी अहंकारी मत बनो। ऐसा प्रयास करो कि वे तुमसे भय न करें बल्कि तुम्हारा सम्मान करें। इस पर कोई कहेगा कि मैं दासों की मुक्ति का समर्थन कर रहा हूँ और स्वामियों को उनके उच्च पद से नीचे उतारना चाहता हूँ, केवल इसलिए कि मैंने कहा है, “वे तुमसे भय न करें बल्कि तुम्हारा सम्मान करें।” वह कहेगा, “क्या बात है! क्या वे तुम्हारा सम्मान उसी प्रकार करें जैसे आश्रित लोग या सुबह अभिवादन करने वाले आगंतुक करते हैं?” जो व्यक्ति ऐसा कहता है, वह यह भूल जाता है कि जो बात एक देवता के लिए पर्याप्त है, वह दास-स्वामियों के लिए अपर्याप्त नहीं हो सकती। जिस व्यक्ति का सम्मान किया जाता है, उससे प्रेम भी किया जाता है। प्रेम तथा भय कभी साथ-साथ नहीं रह सकते। इसलिए मेरा विचार है कि तुम सही कर रहे हो, यदि तुम अपने दासों से भय उत्पन्न नहीं करना चाहते और उन्हें केवल शब्दों के द्वारा ही सुधारते हो। चाबुक तो उन पशुओं को प्रशिक्षित करने के लिए होते हैं जो बोल नहीं सकते।

    जो कुछ हमें अप्रिय या अपमानजनक लगता है, वह आवश्यक नहीं कि वास्तव में हमारे लिए हानिकारक भी हो। हमारी विलासप्रिय आदतें ही हमें उन्मत्त बना देती हैं; जो भी बात हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होती, उसी पर हम क्रोधित हो उठते हैं। हम ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हम स्वयं राजा हों। राजा भी अक्सर अपनी शक्ति और दूसरों की दुर्बलता को भूल जाते हैं। इस कारण क्रोधित हो उठते हैं, मानो उन्हें कोई क्षति पहुँची हो जबकि अपनी विशाल सत्ता और भाग्य के कारण वे वास्तव में ऐसी क्षति से सुरक्षित रहते हैं। वे इस तथ्य को भली-भाँति जानते भी हैं फिर भी अपनी तुच्छ मानसिकता के कारण दूसरों को हानि पहुँचाने का अवसर खोजते रहते हैं। वे स्वयं को पीड़ित मान लेते हैं ताकि दूसरों के साथ अन्याय कर सकें।

    मैं तुम्हें अधिक देर तक नहीं रोकना चाहता क्योंकि तुम्हें किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है। उत्तम चरित्र की एक विशेषता यह है कि वह स्वयं में संतुष्ट रहता है और इसलिए स्थिर बना रहता है। दुष्ट चरित्र चंचल होता है। वह बार-बार बदलता है परंतु बेहतर बनने के लिए नहीं बल्कि केवल परिवर्तन के लिए बदलता रहता है।


अभी के लिए विदा 

पढ़ी गई पुस्तक के संदर्भ में -- पत्र - 46

 प्रिय लूसीलियस 


आपकी पुस्तक वचनानुसार पहुँच गई। मैंने उसे यह सोचकर खोला कि बाद में अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ूँगा और उस समय केवल थोड़ा-सा स्वाद लेने के उद्देश्य से उसे देखूँगा। परंतु स्वयं उस कृति ने मुझे आगे पढ़ते रहने के लिए आकर्षित कर लिया। वह कितनी प्रभावशाली और वाग्मिता से परिपूर्ण थी, इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि उसका आकार-प्रकार प्रथम दृष्टि में लिवी या एपिक्यूरस की रचनाओं जैसा विशाल प्रतीत होता है न कि आपकी या मेरी रचनाओं जैसा। फिर भी उसमें ऐसी मधुरता थी कि उसने मुझे बाँधे रखा और आगे बढ़ाती रही। परिणामस्वरूप मैंने उसे बिना किसी विलंब के पूरा पढ़ डाला। सूर्य का प्रकाश मुझे बाहर बुला रहा था। भूख सताने लगी थी। तूफ़ान का भय भी था फिर भी मैं उसे अंत तक पढ़ता रहा। उसने मुझे केवल आनंद ही नहीं दिया बल्कि हर्ष और प्रसन्नता से भी भर दिया।



    इस रचना में कैसी प्रतिभा और कैसी ऊर्जस्विता दिखाई देती है! मैं इसे 'प्रभावशाली' कहता, यदि इसमें कहीं-कहीं शांत और विश्रामपूर्ण अंश भी होते, यदि इसका उत्कर्ष केवल बीच-बीच में प्रकट होता। परंतु यहाँ तो प्रभाव क्षणिक नहीं बल्कि निरंतर बना रहता है। इसकी शैली पुरुषोचित, संयत और शुद्ध है। फिर भी समय-समय पर उसमें मधुरता का ऐसा स्वर उभर आता है जो बिल्कुल उपयुक्त और कोमल प्रतीत होता है। आप ऊँचे और सीधे खड़े हैं। मैं चाहता हूँ कि आप ऐसे ही बने रहें। आपको इसी प्रकार आगे बढ़ना चाहिए। विषय-वस्तु ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। इसी कारण व्यक्ति को ऐसा उर्वर और समृद्ध विषय चुनना चाहिए जो उसकी प्रतिभा को प्रेरित करे और उसे पूरी तरह सक्रिय बनाए रखे।

    मैं इस पुस्तक के बारे में दूसरी बार पढ़ लेने के बाद और अधिक लिखूँगा। इस समय मेरा निर्णय अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। ऐसा लगता है मानो मैंने इन बातों को पढ़ा नहीं बल्कि सुना हो। मुझे कुछ प्रश्न पूछने की भी अनुमति दीजिए। आपको किसी बात का भय नहीं होना चाहिए। मैं आपको सत्य ही बताऊँगा। आप सचमुच भाग्यशाली हैं! आपके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को आपसे झूठ बोलने का कारण दे, चाहे वह व्यक्ति आपसे इतनी दूर ही क्यों न हो। हाँ, एक बात अवश्य है। आजकल लोग बिना किसी कारण के भी, केवल आदतवश, झूठ बोलने लगते हैं।


अभी के लिए विराम 

विदा 

सुखी व्यक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 45 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम शिकायत करते हो कि जहाँ तुम रहते हो वहाँ पुस्तकों की कमी है। लेकिन महत्त्व इस बात का नहीं है कि तुम्हारे पास कितनी पुस्तकें हैं बल्कि इस बात का है कि वे कितनी अच्छी हैं। विविध प्रकार का पढ़ना आनंद देता है। परंतु चुनिंदा और विचारपूर्वक किया गया अध्ययन वास्तविक लाभ पहुँचाता है। यदि किसी व्यक्ति को अपने गंतव्य तक पहुँचना है तो उसे एक ही मार्ग पर चलना चाहिए, अनेक रास्तों पर भटकते नहीं फिरना चाहिए। तुम जो कर रहे हो, वह यात्रा नहीं है। वह तो इधर-उधर भटकना मात्र है।



    “तुम्हारी सलाहों को छोड़ो,” तुम कहते हो, “और बस पुस्तकें भेजो!” मैं उन्हें भेज दूँगा, जितनी भी मेरे पास हैं। बल्कि तुम्हारे लिए तो मैं अपना पूरा पुस्तक-संग्रह ही खाली कर देने को तैयार हूँ। यदि संभव होता तो मैं स्वयं भी तुम्हारे पास आ जाता। यदि मुझे यह आशा न होती कि तुम शीघ्र ही वहाँ के अपने दायित्वों से मुक्त हो जाओगे तो मैं अपनी वृद्धावस्था की परवाह किए बिना यात्रा करने का निश्चय कर लेता। यहाँ तक कि स्किला और कैरीब्डिस जैसे पौराणिक और भयावह जलडमरूमध्य भी मुझे रोक नहीं पाते। मैं केवल उन्हें पार ही न करता बल्कि तैरकर भी पार कर जाता, यदि इससे मुझे तुम्हें फिर से गले लगाने और अपनी आँखों से यह देखने का अवसर मिलता कि तुम्हारा मन और बुद्धि कितनी विकसित हो गई है।

    लेकिन जहाँ तक तुम्हारे इस अनुरोध का प्रश्न है कि मैं तुम्हें अपनी पुस्तकें भेजूँ तो मैं इस कारण स्वयं को विद्वान नहीं समझता। ठीक वैसे ही जैसे यदि तुम मेरा चित्र माँगो तो मैं स्वयं को सुंदर नहीं मान लूँगा। मैं जानता हूँ कि यह तुम्हारा निर्णय नहीं बल्कि स्नेह का परिणाम है या यदि इसमें कोई निर्णय निहित भी है तो वह स्नेह से प्रभावित निर्णय है। फिर भी, वे जैसी भी हैं, उन्हें ऐसे व्यक्ति की पुस्तकें समझकर पढ़ना जो सत्य को अभी तक नहीं जानता बल्कि उसकी खोज में लगा हुआ है। उस खोज में अटल बना हुआ है। क्योंकि मैं किसी का अनुचर नहीं हूँ। मैं अपने अतिरिक्त किसी और का नाम धारण नहीं करता। महान व्यक्तियों के विचारों पर मुझे बहुत विश्वास है परंतु मैं अपने विचारों के लिए भी कुछ स्थान का दावा करता हूँ। क्योंकि उन महान लोगों ने भी हमारे लिए अंतिम उत्तर नहीं छोड़े। उन्होंने तो हमारे सामने प्रश्न छोड़े हैं, जिनकी खोज हमें स्वयं करनी है।

    शायद वे उन उत्तरों तक पहुँच जाते जिनकी वास्तव में आवश्यकता थी, यदि उन्होंने अनावश्यक बातों की खोज में भी स्वयं को न उलझाया होता। उनका बहुत-सा समय शब्दों की बाज़ीगरी और पहेलीनुमा विवादों में व्यतीत हुआ, जो बुद्धि को तो व्यस्त रखते हैं पर किसी वास्तविक लाभ तक नहीं पहुँचाते। हम गाँठें बाँधते हैं। अपने शब्दों में जान-बूझकर अस्पष्ट अर्थ पिरो देते हैं और फिर उन्हीं गाँठों को खोलने में लग जाते हैं। क्या सचमुच हमारे पास इतना समय है? क्या हम पहले से ही यह जान चुके हैं कि कैसे जीना चाहिए और कैसे मरना चाहिए? हमें अपने पूरे मनोयोग के साथ उस लक्ष्य की ओर शीघ्रता से बढ़ना चाहिए, जहाँ उन भ्रमों और छलों का पर्दाफाश हो जाता है जो हमें सत्य से दूर रखते हैं।

    तुम मेरे लिए ऐसे शब्दों के बीच भेद क्यों कर रहे हो जिनके अनेक अर्थ होते हैं जबकि उन्हें कोई भी व्यक्ति वास्तव में भ्रमित नहीं करता सिवाय वाद-विवाद के समय? भ्रम तो हमारे जीवन में है। भेद वहीं स्पष्ट करो! हम अच्छाइयों के बजाय बुराइयों को अपनाते हैं। एक चीज़ चुनते हैं और फिर उसके विपरीत का अनुसरण करने लगते हैं। हमारे लक्ष्य और हमारी इच्छाएँ आपस में टकराती रहती हैं। चापलूसी मित्रता से बहुत मिलती-जुलती है बल्कि केवल मिलती-जुलती ही नहीं अक्सर उसी पर भारी पड़ जाती है। मनुष्य उसे उत्सुक कानों से सुनता है, उसे अपने हृदय में गहराई तक उतार लेता है। उन्हीं गुणों से प्रसन्न होता है जो उसे सबसे अधिक खतरनाक बनाते हैं। मुझे वहाँ भेद करना सिखाओ! एक मनोहर शत्रु मित्र बनकर मेरे पास आता है। दोष स्वयं को सद्गुण कहकर भीतर प्रवेश कर जाते हैं। उतावलापन साहस का नाम ओढ़ लेता है। कायरता को संयम कहा जाता है। डरपोकपन स्वयं को सावधानी के रूप में प्रस्तुत करता है। ये वे खतरे हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं। हमें इन्हीं के विषय में कुछ मार्गदर्शन दो!

    लेकिन जिस व्यक्ति से तुम पूछ रहे हो, “क्या तुम्हारे सींग हैं?”, वह इतना मूर्ख नहीं है कि उन्हें टटोलने के लिए अपने माथे पर हाथ फेरने लगे! न ही वह इतना बुद्धिहीन है कि जब तक तुम अपने चतुर तर्कों और कुतर्कों से उसे विश्वास न दिलाओ, तब तक उसे यह पता ही न चले कि उसके सींग हैं। ये सब केवल निर्दोष चालबाज़ियाँ हैं। वे जादूगर के उन खेलों की तरह हैं जिनमें वह प्यालों और कंकड़ों से भ्रम पैदा करता है। मुझे वे केवल इसलिए मनोरंजक लगते हैं क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं धोखा खा रहा हूँ। इन्हीं तथाकथित “पहेलियों” के बारे में भी यही कहा जा सकता है— कुतर्कों (सोफ़िज़्म) के लिए इससे बेहतर शब्द और क्या हो सकता है? जो लोग उन्हें नहीं समझते, उन्हें वे कोई हानि नहीं पहुँचातीं। जो उन्हें समझ लेते हैं, उन्हें भी उनसे कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता।

यदि तुम वास्तव में शब्दों के बीच भेद करना चाहते हो तो हमें यह समझाओ कि सुखी व्यक्ति वह नहीं है जिसे सामान्य लोग सुखी कहते हैं। वह नहीं जिस पर धन की वर्षा हुई हो बल्कि वह है जिसकी सारी अच्छाइयाँ उसके मन में निवास करती हैं। वही व्यक्ति सीधा, दृढ़ और महान होता है। वह उन वस्तुओं को अपने पैरों तले रौंद देता है जिन पर लोग आश्चर्य और श्रद्धा करते हैं। वह अपने जीवन को किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन से बदलना नहीं चाहेगा। वह मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसी आधार पर करता है जो उसे वास्तव में मनुष्य बनाता है। वह प्रकृति को अपना शिक्षक मानता है। अपने जीवन को प्रकृति के नियमों के अनुसार संचालित करता है। वैसे ही जीता है जैसा प्रकृति ने निर्देश दिया है। उसकी संपत्ति ऐसी होती है जिसे कोई शक्ति उससे छीन नहीं सकती। जो कुछ बुरा होता है, उसे भी वह अच्छाई में बदल देता है। उसका निर्णय दृढ़ होता है। वह न डगमगाता है, न भयभीत होता है और न ही विचलित। ऐसी शक्तियाँ अवश्य हैं जो उसे प्रभावित करती हैं पर ऐसी कोई नहीं जो उसे आतंकित कर सके। भाग्य के सबसे तीखे और घातक प्रहार भी उसे घायल नहीं कर पाते। वे उसे केवल हल्की-सी चुभन का अनुभव कराते हैं और वह भी बहुत कम। जहाँ तक उन अन्य बाणों का प्रश्न है जो सामान्यतः मानव जाति पर आक्रमण करते हैं, वे उससे वैसे ही टकराकर लौट जाते हैं जैसे छत पर पड़ने वाली ओलों की मार— जो कुछ देर खड़खड़ाहट करती है और फिर पिघल जाती है बिना भीतर रहने वाले को कोई क्षति पहुँचाए।

    तुम मेरा समय उस चीज़ में क्यों नष्ट करते हो जिसे तुम स्वयं भी 'झूठे की पहेली' कहते हो। जिसके विषय में इतनी सारी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं? यह देखो, मेरा पूरा जीवन ही एक झूठ है। यदि तुम इतने चतुर हो, तो इसका खंडन करो! इसके असत्य को सत्य में बदल दो। यह जीवन उन वस्तुओं को आवश्यक समझता है जो वास्तव में केवल विलासिता या अनावश्यक चीज़ें हैं। जो वस्तुएँ वास्तव में अनावश्यक नहीं भी हैं, उनका भी एक धन्य और सुखी जीवन के संदर्भ में कोई स्वाभाविक या मौलिक महत्व नहीं है।

    किसी वस्तु का आवश्यक होना उसे तुरंत अच्छा (वास्तविक शुभ) नहीं बना देता। अन्यथा हम अच्छाई के मूल्य को ही घटा देंगे, यदि हम रोटी, दलिया और उन अन्य वस्तुओं को भी ‘अच्छा’ कहने लगें जिनके बिना जीवन का निर्वाह संभव नहीं है। जो वास्तव में अच्छा है, वह आवश्यक भी होता है पर जो आवश्यक है, वह इसी कारण अच्छा नहीं हो जाता। वास्तव में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जो आवश्यक तो हैं किन्तु मूल्य की दृष्टि से बहुत निम्न स्तर की हैं। कोई भी व्यक्ति मूल्य के प्रति इतना अंधा नहीं होता कि जो वस्तु वास्तव में अच्छी है, उसे केवल दैनिक उपयोगिता की वस्तु के स्तर तक गिरा दे।

    तो फिर! क्या तुम अपने प्रयासों की दिशा नहीं बदलोगे? हमें यह दिखाओ कि किस प्रकार अनावश्यक चीज़ों के पीछे भागते हुए बहुत-सा समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है। कितने लोग जीवन की आवश्यकताओं को जुटाने के चक्कर में स्वयं जीवन से ही वंचित रह जाते हैं। लोगों को देखो, और सामान्य रूप से मानव-समाज का अध्ययन करो। तुम पाओगे कि हममें से हर कोई आने वाले कल के लिए जी रहा है।

    “क्या इसमें कोई हानि है?” तुम कहते हो। हाँ, अनंत हानि है। क्योंकि वे वास्तव में जी नहीं रहे हैं, वे केवल जीने की तैयारी कर रहे हैं। हर चीज़ को टाल दिया जाता है। यदि हम सचेत होकर भी जीवन पर ध्यान देते, तब भी जीवन हमारे हाथों से फिसल जाता लेकिन हम तो जीने को ही टालते रहते हैं। हमारा जीवन ऐसे तेज़ी से हमारे पास से निकल जाता है मानो वह किसी और का हो। अंतिम दिन पर समाप्त हो जाता है फिर भी हर दिन हमसे खोता रहता है। 

    लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस पत्र की उचित लंबाई से अधिक बढ़ जाऊँ, जिसे पाठक के बाएँ हाथ का पूरा भाग भी नहीं भरना चाहिए। इसलिए अत्यधिक सूक्ष्म तर्क-वितर्क करने वाले दार्शनिकों के साथ मेरा जो विवाद है, उसे किसी और दिन के लिए स्थगित करता हूँ। तर्कशास्त्र में रुचि रखना एक बात है लेकिन जब वे तर्कशास्त्र को ही अपना एकमात्र विषय बना लेते हैं तो बात बिल्कुल अलग हो जाती है।


अभी के लिए विदा 

दर्शन की अच्छाई एवं विश्वास के संदर्भ में -- पत्र - 44 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम फिर स्वयं को कम आँक रहे हो। तुम कहते हो कि जन्म से ही तुम्हें बहुत कम मिला है। भाग्य ने भी तुम्हें थोड़ी ही संपत्ति दी जबकि वास्तव में तुम साधारण भीड़ से अपने को अलग कर सकते हो और मानवीय समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई तक पहुँच सकते हो।



    यदि दर्शन में कोई विशेष अच्छाई है तो यह है कि वह वंशावली का कोई महत्व नहीं मानता। यदि हम अपनी वंश-परंपरा को उसके आदि स्रोत तक ले जाएँ तो समस्त मानवजाति दिव्य उत्पत्ति की है। तुम रोमन अश्वारोही वर्ग (Equestrian Order) के सदस्य हो। अपने परिश्रम के बल पर तुमने यह पद प्राप्त किया है। लेकिन, देवताओं की कसम, ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सम्मानित आसनों में बैठने का अधिकार नहीं मिलता। कुछ तो सीनेट भवन में प्रवेश भी नहीं पा सकते। यहाँ तक कि सेना भी कठिन परिश्रम और जोखिम भरे कार्यों के लिए लोगों का चयन बड़ी सावधानी से करती है। परंतु मन की उत्कृष्टता सबके लिए उपलब्ध है। इस दृष्टि से हम सभी उच्च कुल में जन्मे हुए हैं।

    दर्शन न किसी को अस्वीकार करता है और न किसी को चुनकर विशेषाधिकार देता है। वह सबके लिए समान रूप से प्रकाश फैलाता है। सुकरात किसी कुलीन (पैट्रिशियन) परिवार से नहीं थे। क्लीन्थीस पानी ढोते थे और लोगों के बाग़ों में सिंचाई करने के लिए मजदूरी करते थे। प्लेटो दर्शन के पास कुलीन बनकर नहीं आए थे बल्कि दर्शन ने ही उन्हें वास्तव में महान और कुलीन बनाया। तो फिर तुम क्यों आशा न करो कि शायद तुम भी उनके समान बन सको? यदि तुम स्वयं को उनके योग्य सिद्ध कर दो तो वे सभी तुम्हारे पूर्वज हैं। और तुम ऐसा कर सकोगे, यदि अभी इसी क्षण अपने मन को यह विश्वास दिला दो कि केवल उच्च कुल में जन्म लेने के कारण कोई भी व्यक्ति तुमसे श्रेष्ठ नहीं हो जाता।

    सबके पूर्वजों की संख्या समान है। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्पत्ति विस्मृति (अज्ञात अतीत) के अतिरिक्त कहीं और से हुई हो। प्लेटो कहते हैं कि प्रत्येक राजा की उत्पत्ति किसी न किसी दास से हुई है। प्रत्येक दास की उत्पत्ति किसी न किसी राजा से। समय के उतार-चढ़ाव और भाग्य के खेल ने सभी चीज़ों को उलट-पुलट कर मिला दिया है। अच्छे कुल का व्यक्ति कौन है? वह, जिसे प्रकृति ने सद्गुण की ओर एक उत्तम प्रवृत्ति प्रदान की है। हमें केवल इसी बात को देखना चाहिए। अन्यथा, यदि तुम अपने विचारों को प्राचीनतम काल तक ले जाओ तो हर व्यक्ति की उत्पत्ति उस क्षण से है जिसके पहले कुछ भी नहीं था। सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक हमारा इतिहास वैभव और दरिद्रता, गौरव और पतन, इन दोनों की निरंतर चलती हुई श्रृंखला रहा है।

    धुएँ से काली पड़ चुकी पूर्वजों की तस्वीरों से भरा हुआ आँगन किसी व्यक्ति को कुलीन नहीं बना देता। किसी ने अपना जीवन इसलिए नहीं जिया था कि हम बाद में उसका नाम लेकर अपनी शान बघारें। जो कुछ हमारे जन्म से पहले घटित हुआ, वह हमारा नहीं है। मन ही वह चीज़ है जो वास्तविक कुलीनता प्रदान करता है क्योंकि मन को यह स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह अपनी सामाजिक स्थिति चाहे जो हो, भाग्य के उतार-चढ़ावों से ऊपर उठ सके। कल्पना करो कि तुम रोमन अश्वारोही वर्ग के सदस्य नहीं बल्कि एक मुक्त दास (फ्रीडमैन) हो। तब भी तुम ऐसी अवस्था प्राप्त कर सकते हो जिसमें केवल तुम ही वास्तव में स्वतंत्र हो, भले ही तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हारी दासवत उत्पत्ति को साझा न करते हों।

    “कैसे?” तुम पूछते हो। यदि तुम अच्छे और बुरे का निर्णय स्वयं करो, जनसाधारण की धारणाओं के आधार पर नहीं। तुम्हें यह नहीं देखना चाहिए कि कोई वस्तु कहाँ से आई है बल्कि यह देखना चाहिए कि वह किस दिशा में ले जा रही है। यदि किसी वस्तु में तुम्हारे जीवन को सुखी बनाने की क्षमता है, तो वह अपने आप में एक अच्छाई (सद्गुण) है। क्योंकि जो वस्तु वास्तव में अच्छी है, उसे किसी भी प्रकार बुरी वस्तु में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

    तो फिर लोगों की भूल क्या है जबकि हर व्यक्ति सुखी जीवन चाहता है? वे उन साधनों को, जिनका उपयोग सुख प्राप्त करने के लिए किया जाता है, स्वयं सुख ही समझ बैठते हैं। इस प्रकार जिस वस्तु की वे खोज कर रहे होते हैं, उसी को छोड़ देते हैं। क्योंकि सुखी जीवन का मुख्य आधार है— दृढ़ सुरक्षा की भावना और उस अवस्था के प्रति अटल आत्मविश्वास। लेकिन लोग इसके विपरीत चिंता के कारणों को इकट्ठा करते रहते हैं। जीवन की धोखों से भरी यात्रा में उन बोझों को अपने पीछे ढोते नहीं बल्कि घसीटते चलते हैं। इसी कारण वे जिस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उससे निरंतर दूर होते जाते हैं। उनका प्रयास जितना अधिक बढ़ता है, वे अपने लिए उतनी ही अधिक बाधाएँ उत्पन्न कर लेते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति किसी भूलभुलैया में जल्दी-जल्दी निकलने का प्रयास करे। उसकी वही जल्दबाज़ी उसके मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।


अभी के लिए विदा 

असाधारणता एवं व्यवहारबोध के संदर्भ में - पत्र - 43 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


तुम पूछते हो, मुझे यह कैसे पता चला? तुम्हारी योजनाओं के बारे में मुझे किसने बताया जबकि तुमने स्वयं किसी को कुछ नहीं बताया था? उसने, जो अधिकांश बातों को जानता है गॉसिप द्वारा।



    तुम कहते हो, “मैं कब से इतना महत्वपूर्ण हो गया कि मेरे बारे में गॉसिप फैलने लगीं?” अपने महत्व का आकलन इस स्थान के आधार पर मत करो बल्कि उस स्थान के संदर्भ में करो जहाँ तुम रहते हो। जो भी वस्तु अपने परिवेश में सबसे अलग और प्रमुख दिखाई देती है, उसी स्थान पर वह महत्वपूर्ण मानी जाती है। महानता का कोई एक निश्चित आकार नहीं होता। तुलना ही किसी वस्तु को बड़ा या छोटा बनाती है। नदी में बड़ा दिखाई देने वाला जहाज़ समुद्र में बहुत छोटा लग सकता है। वही पतवार एक नाव के लिए बड़ी होती है तो दूसरी के लिए छोटी। इसलिए, अब जब तुम अपने प्रांत में हो तो तुम एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हो, चाहे तुम स्वयं को कितना ही साधारण क्यों न समझो। तुम्हारे कार्यकलाप, तुम्हारी भोजन-व्यवस्था, यहाँ तक कि तुम्हारे सोने-जागने की आदतें भी लोगों की रुचि और चर्चा का विषय हैं। वास्तव में सबको उनकी जानकारी है।

    इसलिए तुम्हें अपने जीवन-व्यवहार के प्रति और भी अधिक सावधान रहना चाहिए। अपने आपको भाग्यशाली समझो यदि तुम ऐसा जीवन जी सकते हो जो सबके सामने खुला हो। जहाँ दीवारें तुम्हारी रक्षा के लिए हों, छिपाने के लिए नहीं। क्योंकि सामान्यतः हम यह मानते हैं कि हमारे चारों ओर दीवारें हमें सुरक्षित रखने के लिए नहीं बल्कि हमारे दुष्कर्मों को अधिक गोपनीयता देने के लिए हैं। मैं तुम्हें हमारे नैतिक पतन का एक मापदंड बताता हूँ। तुम्हें शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो अपना दरवाज़ा खुला रखकर जी सके। द्वार पर चौकीदार दिखावे के लिए नहीं बैठाया जाता। उसका कारण अपराधबोध होता है। हम जिस प्रकार जीवन जीते हैं, उसमें किसी का बिना सूचना के आ जाना मानो रंगे हाथों पकड़े जाने के समान है।

    लेकिन अपने आपको लोगों की नज़रों और कानों से छिपाने का क्या लाभ? एक अच्छा अंतःकरण भीड़ का स्वागत करता है जबकि बुरा अंतःकरण एकांत में भी चिंता और व्याकुलता से ग्रस्त रहता है। यदि तुम्हारे कर्म सम्मानजनक हैं तो उन्हें सबके सामने आने दो। यदि वे लज्जाजनक हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि कोई और उन्हें जानता है या नहीं? तुम स्वयं तो जानते ही हो। हाय तुम्हारी दशा पर, यदि तुम्हें इस साक्षी की कोई परवाह ही नहीं है!

वस्तुओं के वास्तविक मूल्य के संदर्भ में --पत्र - 42 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

क्या उसने तुम्हें पहले ही यह विश्वास दिला दिया है कि वह एक अच्छा मनुष्य है? वास्तव में किसी मनुष्य का अच्छा होना या उसे अच्छे मनुष्य के रूप में पहचाना जाना इतनी कम अवधि में संभव नहीं है।

    तुम समझते हो कि वर्तमान संदर्भ में मैं किस प्रकार के अच्छे मनुष्य की बात कर रहा हूँ। उस दूसरे दर्जे के अच्छे मनुष्य की। क्योंकि वह सर्वोच्च प्रकार का मनुष्य तो शायद पाँच सौ वर्षों में एक बार ही जन्म लेता है, ठीक वैसे ही जैसे फीनिक्स पक्षी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो वास्तव में महान है, वह बहुत लंबे अंतराल पर ही उत्पन्न होता है। साधारण लोगों को तो संयोग और प्रकृति बड़ी संख्या में पैदा कर देते हैं। वे भीड़ का हिस्सा होते हैं। परन्तु जो असाधारण होता है, वह दुर्लभ होता है। उसका दुर्लभ होना ही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है।



    लेकिन जिस व्यक्ति का तुम उल्लेख कर रहे हो, वह अभी उस आदर्श से बहुत दूर है जिसका वह दावा करता है। यदि वह सचमुच जानता कि एक अच्छा मनुष्य क्या होता है तो वह स्वयं को अभी अच्छा मनुष्य नहीं मानता। बल्कि सम्भव है कि वह कभी ऐसा बन पाने की आशा ही छोड़ बैठता।

    “लेकिन वह दुष्ट लोगों से घृणा करता है!” हाँ, और दुष्ट लोग भी स्वयं दुष्टता से घृणा करते हैं। दुष्कर्म का इससे कठोर दंड और कोई नहीं कि मनुष्य स्वयं अपने प्रति अपराध करता है। साथ ही अपने परिवार तथा मित्रों के प्रति भी।

    “लेकिन वह उन सभी लोगों से घृणा करता है जो स्वयं पर नियंत्रण न होने के कारण अपनी महान शक्ति का मनमाना उपयोग करते हैं।” हाँ, पर जब उसके पास स्वयं वह शक्ति होगी तो वह भी वही करेगा। बहुत-से लोगों के दोष केवल इसलिए दिखाई नहीं देते क्योंकि वे उन्हें कार्यरूप देने में असमर्थ होते हैं। जैसे ही उन्हें अपनी शक्ति पर भरोसा हो जाता है। वे उतनी ही निर्भीकता से व्यवहार करते हैं जितना वे लोग, जिन्हें भाग्य पहले ही अवसर और सामर्थ्य दे चुका है। उनकी दुष्टता की पूरी सीमा प्रकट होने से केवल साधनों की कमी रोकती है। यह उसी प्रकार है जैसे विषैला साँप ठंडे मौसम में सुरक्षित प्रतीत होता है। क्योंकि वह सुस्त पड़ा रहता है। उसका विष तो तब भी मौजूद रहता है, बस निष्क्रिय होता है। इसी प्रकार अनेक लोगों की क्रूरता, महत्वाकांक्षा या भोग-विलास की प्रवृत्ति केवल भाग्य के कारण उन सबसे बुरे उदाहरणों जैसी नहीं दिखती। उन्हें बस वह शक्ति नहीं मिली होती जिसकी उन्हें इच्छा है। उन्हें केवल इतना सामर्थ्य दे दो कि वे अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर सकें, तब तुम देखोगे कि उनकी इच्छाएँ भी वही हैं जो दूसरों की हैं।

    क्या तुम्हें याद है, जब तुमने मुझे बताया था कि एक व्यक्ति तुम्हारे वश में है और मैंने कहा था कि वह चंचल स्वभाव का है। भाग जाने की प्रवृत्ति रखता है। तुमने उसे उसके पैर से नहीं बल्कि उसके पंख से पकड़ रखा है? मैं गलत था। तुमने उसे पंख से भी नहीं, केवल एक पर (पंख के रेशे) से पकड़ रखा था। अब वह उसे पीछे छोड़कर उड़ चुका है। तुम जानते हो कि बाद में उसने तुम्हारे साथ कैसी चालें चलीं, कितने घुमावदार और छलपूर्ण उपाय अपनाए। अंततः उसने किसी और को नहीं, केवल स्वयं को धोखा दिया। वह यह नहीं समझ सका कि वह दूसरों के संकटों से गुजरता हुआ बड़ी तेजी से अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा था। उसे यह भी समझ में नहीं आया कि जिन वस्तुओं के पीछे वह भाग रहा था, वे अनावश्यक थीं। यदि वे अनावश्यक न भी होतीं, तब भी वे उसके लिए बोझ ही बनतीं।

    यही वह बात है जिसे हमें सदैव ध्यान में रखना चाहिए। जिन वस्तुओं के लिए हम प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिन पर हम इतना परिश्रम और ऊर्जा लगाते हैं, वे या तो हमें कोई लाभ नहीं देतीं या फिर लाभ से अधिक हानि पहुँचाती हैं। कुछ वस्तुएँ पूरी तरह अनावश्यक हैं। कुछ ऐसी हैं जो उन्हें प्राप्त करने में होने वाले कष्ट के योग्य ही नहीं हैं। लेकिन हम यह बात समझ नहीं पाते। हम सोचते हैं कि ये चीज़ें हमें बिना किसी कीमत के मिल रही हैं जबकि वास्तव में उनकी कीमत बहुत भारी होती है। यहीं हमारी मूर्खता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है। हम यह मानते हैं कि केवल वही वस्तुएँ मूल्य चुकाकर प्राप्त की जाती हैं जिनके लिए हम धन खर्च करते हैं। जिन चीज़ों को हम 'मुफ़्त' समझते हैं, उनके लिए हम वास्तव में अपना सम्पूर्ण अस्तित्व खर्च कर रहे होते हैं। जिन वस्तुओं के लिए हम अपना घर, कोई सुखद संपत्ति या उपजाऊ ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं होते, उन्हें पाने के लिए हम चिंता, संकट, स्वतंत्रता की हानि, चरित्र की क्षति और अपने बहुमूल्य समय का बलिदान देने को तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार, सच तो यह है कि हम स्वयं को संसार की किसी भी वस्तु से कम मूल्यवान समझते हैं।

    इसलिए हमें हर परिस्थिति में और अपने प्रत्येक निर्णय में वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम बाज़ार में करते हैं। जब किसी विक्रेता के पास कोई ऐसी वस्तु हो जिसे हम बहुत चाहें, हमें पूछना चाहिए कि इसकी कीमत क्या है? अक्सर किसी वस्तु की कीमत बहुत अधिक होती है, भले ही वह हमें बिना धन दिए मिल जाए। मैं तुम्हें ऐसी अनेक चीज़ें दिखा सकता हूँ जिनकी प्राप्ति के क्षण ही हमने अपनी स्वतंत्रता खो दी। यदि वे वस्तुएँ हमारी न होतीं, तो हम स्वयं अपने स्वामी होते। दूसरे शब्दों में, जिन चीज़ों को हम अपना समझकर पकड़ लेते हैं, कई बार वही हमें अपना बंधक बना लेती हैं। यदि हम उनके स्वामी न बनते तो अपने आप पर हमारा अधिकार बना रहता।

    इसलिए इस बात पर विचार करो। केवल तब नहीं जब तुम कोई वस्तु प्राप्त करो बल्कि तब भी जब तुम कोई वस्तु खो दो।

    “तुम उसे फिर कभी नहीं देखोगे।” नहीं, लेकिन वह तुम्हें संयोगवश ही मिली थी। तुम उसके बिना उतनी ही आसानी से जीवन बिताओगे जितनी आसानी से उसके मिलने से पहले बिताते थे। यदि वह लंबे समय तक तुम्हारे पास रही है तो तुम उसे पर्याप्त रूप से भोग लेने के बाद खो रहे हो। यदि वह अधिक समय तक तुम्हारे पास नहीं रही तो तुम उसे उसके अभ्यस्त होने से पहले ही खो रहे हो।

    “तुम्हारे पास अब उतना धन नहीं रहेगा।” नहीं, लेकिन तुम्हारे पास उतनी परेशानियाँ भी नहीं रहेंगी। “तुम्हारा प्रभाव और प्रतिष्ठा अब उतनी नहीं रहेगी।” और न ही तुम्हें उतनी शत्रुता और द्वेष का सामना करना पड़ेगा।

    उन सभी चीज़ों पर विचार करो जिनके कारण हम व्याकुल हो उठते हैं। जिनके खो जाने पर हम सबसे अधिक विलाप करते हैं। तुम देखोगे कि हमें वास्तव में वंचित होना नहीं सताता बल्कि वंचित होने का विचार सताता है। मनुष्य सोचता है कि उसे कोई हानि हुई है पर वास्तव में वह उस हानि को अनुभव नहीं करता।

    जब कोई व्यक्ति स्वयं का स्वामी बन जाता है, तब उससे कभी कुछ नहीं खोता। लेकिन ऐसे लोग जिन्होंने स्वयं पर यह अधिकार प्राप्त कर लिया हो, बहुत ही दुर्लभ हैं।


अभी के लिए विदा 

Monday, 6 July 2026

ईश्वर एवं मनुष्य के गुणों के संदर्भ में -- पर - 41 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

  प्रिय लूसीलियस 

यदि, जैसा कि तुम्हारे पत्र से पता चलता है, तुम मानसिक उत्कृष्टता (उत्तम चरित्र और बुद्धि) की ओर बढ़ने में निरंतर लगे हुए हो तो तुम वही कर रहे हो जो तुम्हारे लिए सबसे अच्छा और सबसे लाभदायक है। इसके लिए प्रार्थना करना कितना मूर्खतापूर्ण है! यह ऐसी कामना है जिसे तुम स्वयं ही पूरा कर सकते हो।



    तुम्हें स्वर्ग की ओर हाथ उठाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें मंदिर के पुजारी से विशेष प्रवेश की याचना करने की भी आवश्यकता नहीं है, मानो देवप्रतिमा के अधिक निकट पहुँच जाने से हमारी प्रार्थना अधिक अच्छी तरह सुनी जाएगी। ईश्वर तुम्हारे निकट है... तुम्हारे साथ है... तुम्हारे भीतर है। मैं यह बात गंभीरता से कहता हूँ, लूसीलियस। एक पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करती है जो हमारे सभी शुभ और अशुभ कर्मों की साक्षी और संरक्षिका है। हम उस आत्मा के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वह आत्मा भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करती है। वास्तव में, ईश्वर के बिना कोई मनुष्य अच्छा नहीं बन सकता। क्या कोई ऐसा है जो ईश्वर की सहायता के बिना भाग्य के उतार-चढ़ावों से ऊपर उठ सके? महान और उदात्त विचार तथा सही और धर्मपूर्ण सलाह, ईश्वर ही हमें प्रदान करता है। प्रत्येक अच्छे मनुष्य में एक देवता निवास करता है। वह कौन-सा देवता है, यह अज्ञात रहता है।

    यदि संयोगवश तुम ऐसे वन में पहुँचो जो अत्यन्त प्राचीन और असाधारण ऊँचे वृक्षों से घना भरा हो, जहाँ एक-दूसरे में उलझी शाखाएँ दिन के प्रकाश को भीतर आने से रोक देती हों तो उस वनस्थल की ऊँचाई, एकान्तता और धरती के ऊपर इतनी गहरी तथा अखंड छाया का आश्चर्य तुम्हें यह विश्वास दिलाएगा कि वहाँ कोई दिव्य सत्ता विद्यमान है। यदि तुम किसी गुफा को देखो जो समय के प्रभाव से गहराई तक क्षरित हो चुकी हो, किसी ऐसे विशाल कक्ष को जो मनुष्य के हाथों से नहीं बनाया गया हो बल्कि प्रकृति ने स्वयं पर्वत की जड़ों में खोखला कर दिया हो तो वह तुम्हारे मन में धार्मिक विस्मय और श्रद्धा का भाव उत्पन्न करेगा। हम महान नदियों के उद्गम-स्थलों का सम्मान करते हैं। जहाँ कोई तीव्र जलधारा अचानक किसी छिपे हुए स्रोत से फूट पड़ती है, वहाँ हम वेदी स्थापित करते हैं। गर्म जल के स्रोत धार्मिक अनुष्ठानों के स्थान बन जाते हैं और अनेक झीलों को उनकी गहन अंधकारमयता या अथाह गहराई के कारण पवित्र माना गया है। इसी प्रकार, यदि तुम किसी ऐसे मनुष्य को देखो जो संकटों से निर्भय हो, इच्छाओं से अप्रभावित हो, विपत्ति में प्रसन्नचित्त रहे और तूफ़ानों के बीच भी शांत बना रहे, जो समस्त मानवजाति से ऊपर उठ चुका हो और देवताओं के समकक्ष खड़ा दिखाई दे तो क्या उसके प्रति तुम्हारे मन में गहरी श्रद्धा और आदर का भाव नहीं जाग उठेगा?

    क्या तुम यह नहीं कहोगे, “यहाँ कुछ ऐसा उपस्थित है जो इतना महान और इतना उदात्त है कि हम यह विश्वास ही नहीं कर सकते कि यह उसी तुच्छ शरीर के समान है जिसमें यह निवास करता है। एक दिव्य शक्ति इस मनुष्य पर अवतरित हुई है। वह उत्कृष्ट और अनुशासित मन, जो हर वस्तु को अपने से छोटा समझते हुए उसके पार चला जाता है, जो हमारे सभी भय और सभी लालसाओं पर हँसता है, किसी स्वर्गीय शक्ति से प्रेरित है। इतनी महान सत्ता दिव्यता के सहारे के बिना सीधी खड़ी नहीं रह सकती। इसलिए उसका अस्तित्व बहुत अंश तक उसी स्थान में है जहाँ से वह यहाँ उतरी है। जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी को स्पर्श करती हैं फिर भी उनका वास्तविक अस्तित्व अपने उद्गम-स्थल में ही रहता है, उसी प्रकार वह महान और पवित्र मन, वह मन जिसे हमें दिव्यता का अधिक निकट ज्ञान कराने के लिए भेजा गया है। यद्यपि हमारे बीच रहता है फिर भी अपनी मूल सत्ता में ही स्थित रहता है। उसका आधार वहीं है। उसी की ओर उसका लक्ष्य और प्रयोजन है। वह हमारे कार्य-व्यवहारों में सम्मिलित अवश्य होता है। परन्तु ऐसा हमारे से श्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में करता है।”

    तो वह मन कैसा है? वह ऐसा मन है जो अपने ही गुणों के प्रकाश से चमकता है। क्या हम किसी व्यक्ति की प्रशंसा उन गुणों के लिए करते हैं जो वास्तव में किसी और के हैं? इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? क्या हम उन वस्तुओं पर आश्चर्य करते हैं जो एक क्षण में किसी दूसरे के पास चली जा सकती हैं? इससे अधिक नासमझी और क्या होगी? सोने की लगाम घोड़े को बेहतर नहीं बना देती। उसी प्रकार, वह सिंह जिसका अयाल सोने के आभूषणों से सजा दिया गया हो, जिसे वश में कर लिया गया हो और तरह-तरह की सजावटी वस्तुओं से लाद दिया गया हो, तथा जिसे उसके प्रशिक्षक आगे बढ़ाते हों, वह उस जंगली सिंह से कितना भिन्न है जिसकी आत्मा अब भी अजेय है! निस्संदेह वही सिंह श्रेष्ठ है जो आक्रमण करते समय अपनी स्वाभाविक उग्रता में दिखाई देता है, जैसा प्रकृति ने उसे बनाया है; जिसकी कठोर और स्वाभाविक शोभा किसी बाहरी आभूषण की मोहताज नहीं है बल्कि जिसका वैभव केवल उसे देखने वालों के मन में उत्पन्न भय और विस्मय में निहित है। वह उस दूसरे सुस्त, स्वर्णाभूषणों से सजे हुए प्राणी से कहीं अधिक महान है।

    किसी मनुष्य को केवल उसी बात पर गर्व करना चाहिए जो वास्तव में उसकी अपनी हो। हम बेल (अंगूर की लता) की प्रशंसा तभी करते हैं जब उसकी शाखाएँ अंगूरों के गुच्छों से लदी हों। जब वह इतनी फलवती हो कि उसे संभालने वाले सहारे भी उसका भार न उठा सकें। क्या कोई सचमुच उस बेल को अधिक पसंद करेगा जिस पर सोने के फल और सोने की पत्तियाँ लटका दी गई हों? फल के साथ होना ही बेल का विशिष्ट गुण है। उसी प्रकार मनुष्य में भी हमें उसी चीज़ की प्रशंसा करनी चाहिए जो वास्तव में उसकी अपनी हो। तो क्या हुआ यदि उसके पास सुंदर दास हों, भव्य घर हो, विशाल ज़मीन-जायदाद हो या बड़ी पूँजी और निवेश हों? ये सभी वस्तुएँ उसके चारों ओर हैं। वे उसके भीतर नहीं हैं। उसमें उसी गुण की प्रशंसा करो जिसे न कोई उससे छीन सकता है और न कोई उसे प्रदान कर सकता है। उस गुण की जो मनुष्य होने की वास्तविक और विशिष्ट पहचान है।

    क्या तुम पूछते हो कि वह क्या है? वह है मन। मन के भीतर पूर्ण रूप से विकसित हुई तर्कबुद्धि। क्योंकि मनुष्य एक विवेकशील (तर्कशील) प्राणी है। इसलिए उसका कल्याण तभी पूर्ण होता है जब वह उस उद्देश्य को पूरा करे जिसके लिए उसका जन्म हुआ है। लेकिन यह तर्कबुद्धि उससे क्या अपेक्षा करती है? सबसे सरल बात कि वह अपनी प्रकृति के अनुरूप जीवन जिए। पर हमारी सामूहिक मूर्खता ही इसे कठिन बना देती है। हम एक-दूसरे को निरंतर दोषों और बुराइयों की ओर धकेलते रहते हैं। जब सभी लोग हमें आगे उसी दिशा में बढ़ा रहे हों तथा कोई भी हमें रोकने या सही मार्ग पर लौटाने वाला न हो, तब हमें स्वस्थ और सद्गुणपूर्ण जीवन की ओर वापस कैसे लाया जा सकता है?


अभी के लिए विराम 

विदा 

दासों के संदर्भ में -- पत्र 47

 प्रिय लूसीलियस  मुझे उन लोगों से यह जानकर प्रसन्नता हुई जो आपके साथ रह चुके हैं। आप अपने दासों के साथ आत्मीय और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते ह...