Monday, 22 June 2026

आशा, भय एवं शंका के संदर्भ में -- पत्र - 13

प्रिय लूसीलियस  

मैं जानता हूँ कि तुममें साहस और आत्मबल की कोई कमी नहीं है। उन शिक्षाओं से स्वयं को सुसज्जित करने से पहले भी जो मन को स्वस्थ बनाती हैं और विपत्तियों पर विजय पाना सिखाती हैं। तुम यह अनुभव करते थे कि भाग्य के प्रहारों का सामना तुम अच्छी तरह कर रहे हो। और जब तुमने वास्तव में भाग्य से टक्कर ली तथा अपनी शक्ति को परखा, तब यह आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति का वास्तविक ज्ञान तब तक नहीं हो सकता जब तक चारों ओर से अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित न हों या कम-से-कम तब तक नहीं जब तक वे उसके बिल्कुल निकट न आ जाएँ। यही वह अवसर होता है जब सच्चा मन अपने को सिद्ध करता है। वह मन जो अपने निर्णय के अतिरिक्त किसी अन्य निर्णय के सामने नहीं झुकता।



    भाग्य मनुष्य के साहस और चरित्र की परीक्षा लेता है। जिस मुक्केबाज़ ने कभी मार नहीं खाई, वह मुकाबले में सच्चा आत्मविश्वास लेकर नहीं उतर सकता। वह व्यक्ति, जिसने अपना रक्त बहते देखा हो, जिसने अपनी मुट्ठियों और प्रतिद्वन्द्वी के प्रहारों के बीच अपने दाँतों की चरमराहट सुनी हो, जो अपना संतुलन खोकर प्रतिद्वन्द्वी के पैरों तले गिर पड़ा हो और फिर भी, यद्यपि उसे हार माननी पड़ी हो, उसने अपने मनोबल को कभी पराजित न होने दिया हो, जो हर बार गिरने के बाद और अधिक उग्र तथा दृढ़ होकर उठ खड़ा हुआ हो, वही व्यक्ति अगली प्रतियोगिता में प्रबल आशा और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश करता है। इसी उपमा को आगे बढ़ाएँ तो भाग्य ने भी अनेक बार तुम पर विजय प्राप्त की है। फिर भी तुमने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। तुम हर बार उठ खड़े हुए हो और पहले से भी अधिक साहस के साथ अपने पैरों पर डटे हो।

    लूसीलियस, बहुत-सी बातें हमें वास्तव में जितना प्रभावित करती हैं उससे कहीं अधिक भयभीत करती हैं। हम वास्तविकता से कम, अपनी कल्पनाओं और विचारों से अधिक पीड़ित होते हैं। मैं यह बात स्टोइक दर्शन के उच्च अर्थ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि एक अधिक सामान्य अर्थ में कह रहा हूँ। निस्संदेह, हमारा सिद्धान्त यह है कि जिन बातों पर लोग आहें भरते हैं और विलाप करते हैं, वे तुच्छ हैं और उन पर ध्यान देने योग्य भी नहीं हैं। पर उन ऊँची बातों को अभी रहने दें, हालांकि, देवताओं की शपथ, वे सत्य हैं।  फिलहाल मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ, समय आने से पहले दुखी मत हो। जिन बातों से तुम इस प्रकार भयभीत हो जैसे वे अभी-अभी घटित होने वाली हों, वे शायद कभी घटें ही नहीं और निश्चित रूप से अभी तक तो वे घटी नहीं हैं। इस प्रकार कुछ बातें हमें जितना कष्ट देना चाहिए, उससे अधिक कष्ट देती हैं। कुछ हमें समय से पहले ही कष्ट देने लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो हमें बिल्कुल कष्ट नहीं देनी चाहिए। हम या तो अपने दुख को बढ़ा लेते हैं,  उसे स्वयं गढ़ लेते हैं अथवा उसके आने से पहले ही उसे जीने लगते हैं क्योंकि चुनौती का सामना करने पर साहस बढ़ता है। फिर भी, यदि तुम चाहो तो अपनी रक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए मेरी ओर से कुछ शब्द स्वीकार करो।

    उस पहले प्रश्न पर अभी हमारा मतभेद बना हुआ है और वह विषय अभी विवादास्पद है। इसलिए फिलहाल उसे स्थगित रहने देते हैं। जिसे मैं तुच्छ कहता हूँ, वह तुम्हें बहुत गंभीर प्रतीत हो सकता है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कुछ लोग कोड़ों की मार खाते हुए भी हँसते रहते हैं जबकि कुछ दूसरे केवल एक थप्पड़ लगने पर ही कराह उठते हैं। बाद में हम यह जाँच करेंगे कि ऐसी बातों की शक्ति स्वयं उनमें निहित होती है या हमारी दुर्बलता से उत्पन्न होती है। फिलहाल मैं तुमसे केवल इतना चाहता हूँ कि जब भी तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हें यह विश्वास दिलाने लगें कि तुम दुखी हो तब इस पर ध्यान दो कि तुम वास्तव में क्या अनुभव कर रहे हो न कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कह रहे हैं। अपनी सहनशक्ति से परामर्श करो। और चूँकि अपने मामलों के सबसे अच्छे निर्णायक तुम स्वयं हो, अपने आप से पूछो,  “ये लोग मुझ पर दया क्यों कर रहे हैं? किस आधार पर वे मुझसे कतराते हैं, यहाँ तक कि मेरे संपर्क में आने से भी डरते हैं मानो दुर्भाग्य कोई संक्रामक रोग हो?” क्या वास्तव में तुम्हारी स्थिति में कोई बुराई है? या फिर उसकी ख्याति और चर्चा वास्तविकता से अधिक भयावह है? अपने आप से पूछो,  “क्या ऐसा तो नहीं कि मैं बिना किसी उचित कारण के कष्ट भोग रहा हूँ और विलाप कर रहा हूँ? क्या मैं स्वयं ही किसी ऐसी चीज़ को बुरा बना रहा हूँ जो वास्तव में बुरी नहीं है?”

    “मैं कैसे जानूँ,” तुम कहते हो, “मेरी चिंता के कारण वास्तविक हैं या केवल कल्पना मात्र?” इसके लिए एक कसौटी है। हम या तो बीती हुई बातों से पीड़ित होते हैं या आने वाली बातों से अथवा दोनों से। जहाँ तक वर्तमान की बात है, उसके बारे में निर्णय करना आसान है। यदि तुम्हारा शरीर स्वतंत्र है, स्वस्थ है और किसी चोट या बीमारी के कारण तुम्हें कोई पीड़ा नहीं हो रही तो फिर जो कुछ भविष्य में आने वाला है, उसे आने दो और तब देखा जाएगा। आज का दिन तो किसी समस्या का विषय नहीं है।

    “फिर भी, वह तो आने वाला है।” सबसे पहले यह पता करो कि क्या सचमुच कोई ठोस प्रमाण है कि विपत्ति आने वाली है। क्योंकि अक्सर हम उन बातों को लेकर चिंतित हो जाते हैं जिनके बारे में हमारे पास केवल अनुमान होता है। अफवाहें हमारे साथ छल करती हैं। वही अफवाहें जो सेनाओं को युद्धभूमि से भगा देती हैं और व्यक्तियों को तो उससे भी अधिक विचलित कर देती हैं। हाँ, प्रिय लूसीलियस, हम बहुत जल्दी जनमत और सुनी-सुनाई बातों के आगे झुक जाते हैं। जो बातें हमें भयभीत करती हैं, उनके लिए हम प्रमाण नहीं माँगते न ही उनकी सावधानीपूर्वक जाँच करते हैं। हम घबरा जाते हैं और भाग खड़े होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई सेना पशुओं के झुंड से उठी धूल देखकर अपना शिविर छोड़ देती है या जैसे लोग किसी अनाम अफवाह से आतंकित हो उठते हैं। एक अर्थ में, निराधार कारण और भी अधिक भय उत्पन्न करते हैं। वास्तविक खतरों की एक निश्चित सीमा होती है।  परन्तु जो भय अनिश्चितता से जन्म लेता है, वह कल्पनाओं और बेलगाम चिंताओं के हवाले हो जाता है। इसी कारण हमारे सबसे विनाशकारी और सबसे कठिन नियंत्रित होने वाले भय वे होते हैं जो तर्कहीन और काल्पनिक होते हैं। हमारे अन्य भय भले ही अविवेकपूर्ण हों परन्तु ये भय तो पूरी तरह विवेकहीन होते हैं। इसलिए आइए, हम तथ्यों को ध्यानपूर्वक और निष्पक्ष दृष्टि से परखें।

    भविष्य में कोई विपत्ति आने की संभावना हो सकती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह निश्चित रूप से आने ही वाली है। कितनी ही ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती और कितनी ही हमारी आशंकाएँ तथा अपेक्षाएँ कभी सच नहीं होतीं। और यदि वह विपत्ति वास्तव में आने वाली भी हो तो उसके आने से पहले ही शोक मनाने से क्या लाभ? जब वह आएगी तब दुःख करने के लिए पर्याप्त समय होगा। अभी तो अपने लिए कुछ बेहतर बचाकर रखो। इससे तुम्हें क्या प्राप्त होगा? समय। 

    बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घट सकती हैं जो आने वाले संकट को टाल दें। चाहे वह कितना ही निकट क्यों न प्रतीत हो या उसे समाप्त कर दें अथवा उसका रुख किसी और दिशा में मोड़ दें। आग भी कभी-कभी बच निकलने का मार्ग छोड़ देती है। गिरती हुई इमारत कुछ लोगों को बिना गंभीर क्षति पहुँचाए नीचे उतार देती है। तलवार गले तक पहुँचकर भी वापस खिंच जाती है। मृत्यु-दंड पाया हुआ व्यक्ति भी कभी-कभी अपने जल्लाद से अधिक समय तक जीवित रह जाता है। दुर्भाग्य भी स्थिर नहीं होता; उसका स्वभाव चंचल है। हो सकता है कि वह विपत्ति आए, और यह भी हो सकता है कि न आए। लेकिन एक बात निश्चित है, वह इस समय घटित नहीं हो रही है। इसलिए अपनी दृष्टि उन बातों पर रखो जो अच्छी हैं न कि उन आशंकाओं पर जो अभी केवल संभावना मात्र हैं।

    अक्सर ऐसा होता है कि किसी भी प्रकार का संकेत नहीं होता कि कोई बुरी घटना आने वाली है फिर भी मन स्वयं ही झूठी कल्पनाएँ गढ़ लेता है। या तो वह किसी अस्पष्ट कथन का अर्थ सबसे बुरे रूप में निकाल लेता है अथवा यह मान बैठता है कि कोई व्यक्ति वास्तव में जितना क्रोधित है उससे कहीं अधिक क्रोधित है। वह यह नहीं सोचता कि सामने वाला कितना नाराज़ है बल्कि यह सोचकर भयभीत होता है कि क्रोध में वह क्या-क्या कर सकता है। लेकिन यदि भय को उसकी चरम सीमा तक पहुँचने दिया जाए तो जीवन जीने योग्य नहीं रह जाता और हमारे दुखों का कोई अंत नहीं होता। इसलिए कभी विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का उपयोग करो और कभी मानसिक दृढ़ता के बल पर प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले खतरे को भी तुच्छ समझो। यदि यह संभव न हो तो एक दोष को दूसरे दोष से संतुलित करो, भय का संतुलन आशा से करो। जिस बात से तुम डर रहे हो, चाहे वह कितनी ही निश्चित क्यों न प्रतीत होती हो, यह भी उतना ही निश्चित है कि घबराहट शांत हो जाती है और उम्मीद, डर का मजाक बनाती है।

    इसलिए उम्मीद और डर, दोनों पर सावधानीपूर्वक विचार करो। जब परिस्थिति अनिश्चित हो तो अपने ऊपर एक उपकार करो। जिस परिणाम को तुम अधिक पसंद करते हो, उसी पर विश्वास करो। यदि परिस्थितियाँ भय के पक्ष में अधिक झुकी हुई दिखाई दें, तब भी अपने मन को दूसरी दिशा में मोड़ो। स्वयं को व्यर्थ परेशान करना बंद करो। बार-बार इस बात पर विचार करो कि अधिकांश लोग तब भी व्याकुल और परेशान हो जाते हैं, जब न तो कोई वास्तविक विपत्ति उपस्थित होती है और न ही भविष्य के लिए कोई निश्चित संकट दिखाई देता है। क्योंकि एक बार जब मन भय की दिशा में चल पड़ता है तो शायद ही कोई उसे रोक पाता है। कोई भी अपने भय को वास्तविकता के अनुरूप सीमित नहीं करता। कोई यह नहीं कहता, “जिस व्यक्ति ने मुझे यह सूचना दी है, वह भरोसे के योग्य नहीं। वह या तो मनगढ़ंत बातें कर रहा है या स्वयं किसी और की अफवाह पर विश्वास कर बैठा है।” हम अपने आपको हवा के झोंकों की तरह इधर-उधर उड़ने देते हैं। अस्पष्ट और अनिश्चित बातों से ऐसे भयभीत हो जाते हैं मानो वे पूरी तरह सिद्ध तथ्य हों। हम अपना संतुलन खो बैठते हैं और बेचैनी का सबसे छोटा कारण भी तुरंत भय का रूप ले लेता है।

    मुझे यह सब इस प्रकार कहते हुए लज्जा आती है मानो मैं तुम्हें बहुत कोमल उपचारों से दुलार रहा हूँ। कोई दूसरा व्यक्ति कह सकता है, “शायद वह विपत्ति आए ही नहीं।” लेकिन तुम्हें अपने आप से कहना चाहिए, “यदि वह आ भी गई तो क्या हुआ? तब देखा जाएगा कि विजय किसकी होती है। संभव है कि उसका आना ही मेरे हित में हो और ऐसी मृत्यु मेरे जीवन को गौरव प्रदान करे।” सुकरात को महान बनाने वाला विष का वह प्याला था। यदि तुम कैटो से उसकी तलवार छीन लो, वह तलवार जो उसकी स्वतंत्रता की संरक्षक थी... तो तुम उसकी महिमा का बड़ा भाग भी छीन लोगे। लेकिन मैं तुम्हें आवश्यकता से अधिक प्रेरित कर रहा हूँ जबकि तुम्हें प्रेरणा से अधिक स्मरण की आवश्यकता है। हम तुम्हें तुम्हारे स्वभाव से भिन्न किसी दिशा में नहीं ले जा रहे हैं। तुम तो इन सिद्धांतों के लिए ही जन्मे हो। इसलिए तुम्हारे भीतर जो अच्छाई और शक्ति पहले से मौजूद है, उसे और बढ़ाओ। उसे और अधिक सुंदर तथा परिष्कृत बनाओ।

    अब मेरा पत्र समाप्त होने वाला है। केवल उस पर मुहर लगाना शेष है अर्थात् उसे तुम्हारे पास पहुँचाने के लिए एक उत्कृष्ट सूक्ति सौंपनी है। “मूर्खता की बुराइयों में से एक यह भी है कि वह हमेशा जीवन की शुरुआत ही करती रहती है।”

    परम उत्कृष्ट लूसीलियस, इस कथन के अर्थ पर गहराई से विचार करो। तब तुम समझोगे कि यह कितना खेदजनक है कि लोग इतने चंचल होते हैं कि हर दिन जीवन की नई नींव रखने लगते हैं और मृत्यु के द्वार पर खड़े होकर भी नए-नए कार्यों की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपने आस-पास के लोगों के बारे में सोचो। तुम्हें ऐसे वृद्ध दिखाई देंगे जो जीवन के अंतिम चरण में पहुँचकर भी किसी नए व्यवसाय, नई यात्रा या नए पद-प्रतिष्ठा की तैयारी में पहले से अधिक व्यस्त हैं। उस वृद्ध व्यक्ति से अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है जो जीवन के अंत में भी जीवन की शुरुआत करने में लगा हुआ हो?

    मैं इस कथन के लेखक का नाम न बताता, यदि यह एपिक्यूरस की कम प्रसिद्ध और कम प्रचलित उक्तियों में से एक न होती, ऐसी उक्ति जिसकी मैंने न केवल प्रशंसा की है बल्कि उसे अपनाया भी है।


अभी के लिए विदा 



वृद्धावस्था एवं जीवन के संदर्भ में -- पत्र - 12

प्रिय लूसीलियस 

मैं जिधर भी देखता हूँ, अपनी बढ़ती हुई उम्र के संकेत दिखाई देते हैं। शहर के निकट स्थित अपने विला पर पहुँचकर मैंने उसके रख-रखाव पर होने वाले खर्च को लेकर शिकायत करनी शुरू कर दी क्योंकि वह धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा था। मेरे संपत्ति-प्रबंधक ने कहा कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है। वह अपनी ओर से सब कुछ कर रहा है पर मकान अब पुराना हो चुका है। वह विला तो मेरे ही निर्देशन में बनवाया गया था! यदि मेरी ही उम्र के पत्थर और दीवारें इतनी जर्जर हो गई हैं तो मेरा क्या होगा?



    उस पर झुँझलाकर मैंने अपना क्रोध निकालने के लिए निकटतम बहाना पकड़ लिया। मैंने कहा, “वे चिनार के पेड़ स्पष्ट रूप से उपेक्षित हैं। उन पर पत्ते नहीं हैं। उनकी शाखाएँ बुरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी हो गई हैं और धूप से सूख चुकी हैं। उनके तने बदरंग हो गए हैं और उनकी छाल झड़ रही है। यदि उन्हें ठीक से खाद और पानी दिया जाता तो उनकी यह दशा नहीं होती।”

    उसने मेरे पूर्वजों की आत्मा की शपथ खाकर कहा कि वह यह सब कर रहा है और हर प्रकार से उनकी देखभाल कर रहा है पर पेड़ अब बूढ़े हो चले हैं। तुमसे सच कहूँ, उन पेड़ों को मैंने ही लगाया था! जब उन पर पहली बार पत्तियाँ फूटी थीं तब मैं स्वयं वहाँ उपस्थित था और उन्हें देख रहा था।

    फिर मैं द्वार की ओर मुड़ा और पूछा, “यह कौन है? यह तो बिल्कुल जर्जर हो चुका है! इसे द्वार पर खड़ा करना उचित ही था। यह तो मानो जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। तुम इसे कहाँ से ले आए? क्या किसी का बोझ हल्का करने के लिए यह चलता-फिरता शव यहाँ उठा लाए हो?”

    लेकिन उस व्यक्ति ने कहा, “क्या आप मुझे पहचानते नहीं? मैं फेलिसियो हूँ! आप अपनी छोटी-छोटी वस्तुएँ मुझे दिखाने लाया करते थे। मैं संपत्ति-प्रबंधक फिलोस्टितुस का पुत्र हूँ, आपके बचपन का मित्र।”

    मैंने कहा, “यह व्यक्ति पागल हो गया है! क्या अब यह फिर से छोटा बच्चा बन गया है और मेरा खेल का साथी भी? लेकिन शायद ऐसा ही है। इसके दाँत तो इतने गिर चुके हैं कि यह सचमुच बच्चे जैसा लगने लगा है!”

    मेरे उपनगरीय विला ने मेरे लिए एक बड़ा उपकार किया है। उसने हर मोड़ पर मुझे मेरी वृद्धावस्था का बोध करा दिया है। आइए, हम बुढ़ापे को अपनाएँ और उससे प्रेम करें। यदि कोई उसका उचित उपयोग करना जानता हो तो वह अनेक सुखों से भरा हुआ है। फल सबसे अधिक मीठा तब होता है जब वह खराब होने के बिल्कुल निकट होता है। बाल्यावस्था सबसे अधिक आकर्षक तब लगती है जब वह विदा होने वाली होती है और जो व्यक्ति मदिरा का प्रेमी हो, उसके लिए सबसे अधिक आनंद अंतिम प्याले में होता है। वही जो उसे पूरी तरह मदहोश कर देता है और नशे को उसकी चरम सीमा तक पहुँचा देता है। हर सुख अपने सबसे बड़े आनंद को अपने अंतिम क्षणों के लिए बचाकर रखता है। जीवन का सबसे सुखद समय वह है जब वह ढलान पर उतर रहा होता है किंतु अभी अंतिम गिरावट नहीं आई होती। मेरा विश्वास है कि जो समय बिल्कुल किनारे पर खड़ा होता है, उसके भी अपने विशेष आनंद होते हैं। और यदि ऐसा न भी हो तो कम से कम उसमें यह लाभ अवश्य है कि मनुष्य को अब किसी वस्तु की चाह नहीं रह जाती। कितना मधुर अनुभव है अपनी इच्छाओं को पूरी तरह जी लेना, उन्हें क्षीण कर देना और अंततः अपने पीछे छोड़ देना!

    तुम कहते हो, “मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखना दुखद है।” पहली बात तो यह है कि मृत्यु केवल वृद्धों के सामने ही नहीं, युवाओं के सामने भी समान रूप से उपस्थित रहती है क्योंकि हमें मृत्यु का बुलावा आयु की गणना देखकर नहीं आता। दूसरी बात, कोई भी व्यक्ति इतना वृद्ध नहीं होता कि वह एक और दिन जीने की आशा करने का अधिकारी न हो। और एक दिन भी जीवन की सीढ़ी का एक पायदान है।

    सम्पूर्ण जीवन अनेक भागों से मिलकर बना है, जैसे बड़े वृत्त अपने भीतर छोटे-छोटे वृत्तों को समेटे रहते हैं। एक वृत्त उन सभी को अपने भीतर समाहित करता है। यह जन्म से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक की पूरी अवधि है। दूसरा वृत्त युवावस्था के वर्षों को घेरे रहता है एक अन्य वृत्त सम्पूर्ण बाल्यावस्था को अपने घेरे में बाँधता है। इसी प्रकार एक वर्ष अपने भीतर उन सभी समय-खंडों को समेटे रहता है जिनके बार-बार जुड़ने से पूरा जीवन बनता है। एक महीना उससे भी छोटे वृत्त से सीमित है, और एक दिन सबसे छोटे वृत्त से। किन्तु एक दिन भी अपने आरम्भ से अंत तक चलता है, सूर्योदय से सूर्यास्त तक। इसी कारण, अपने गूढ़ और कठिन कथनों के लिए प्रसिद्ध दार्शनिक हेराक्लिटस (Heraclitus) ने कहा था, “एक दिन प्रत्येक दिन के बराबर है।”

    इस कथन की विभिन्न प्रकार से व्याख्या की जाती है। एक व्यक्ति कहता है कि “समान” का अर्थ है “घंटों की संख्या में समान”। यह बात काफ़ी हद तक सही है क्योंकि यदि एक दिन चौबीस घंटों का होता है तो सभी दिन अनिवार्य रूप से एक-दूसरे के समान हैं। दिन के समय में जो कमी होती है, उसकी भरपाई रात कर देती है। दूसरा व्यक्ति कहता है कि एक दिन अपनी प्रकृति में सभी दिनों के समान है। क्योंकि समय की सबसे लंबी अवधि में भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जो एक दिन में न पाया जाता हो। दोनों में प्रकाश और अंधकार होते हैं। आकाशीय चक्रों की नियमित गति हमें कभी अधिक रातें और कभी अधिक दिन देती है पर उनकी मूल प्रकृति को नहीं बदलती। यद्यपि दिन कभी छोटे होते हैं और कभी लंबे। अतः प्रत्येक दिन को इस प्रकार जीना चाहिए मानो वह सबसे अंतिम दिन हो। मानो वही हमारे जीवन की पूर्णता, उसकी परिणति और उसकी अंतिम उपलब्धि हो।

    पैकुवियस (Pacuvius), जिसने अधिकार और संपत्ति के बल पर सीरिया को मानो अपना निजी राज्य बना लिया था, अपने लिए प्रतिदिन अंतिम संस्कार जैसे अनुष्ठान आयोजित किया करता था। मदिरापान और भोज के बाद वह स्वयं को बिस्तर तक उठाकर ले जाने को कहता जबकि उसके सेवक ताली बजाते और वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ यूनानी भाषा में गाते,  “जीवन समाप्त हो गया! जीवन समाप्त हो गया!” इस प्रकार वह प्रतिदिन अपना ही अंतिम संस्कार किया करता था। आओ, हम भी ऐसा ही करें। परन्तु उसके समान बुरे कारणों से नहीं बल्कि अच्छे कारणों से। प्रसन्न और संतोषपूर्ण मन से, जब हम विश्राम के लिए जाएँ, तो कह सकें —

“मैंने जीवन जी लिया है
भाग्य ने मेरे लिए जो दौड़ निर्धारित की थी, उसे मैंने पूरा कर लिया है।”

    यदि ईश्वर हमें एक और कल प्रदान करे तो हमें उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। सबसे सुखी व्यक्ति, और वह जो स्वयं का सबसे निश्चिंत स्वामी है, वही है जो आने वाले कल की प्रतीक्षा बिना किसी चिंता के करता है। जिसने यह कह दिया है, “मैं जीवन जी चुका हूँ”, वह प्रत्येक सुबह लाभ के साथ उठता है क्योंकि उसे एक अतिरिक्त दिन प्राप्त हुआ है। अब समय आ गया है कि मैं इस पत्र को समाप्त करूँ। “क्या?” तुम कहते हो, “क्या यह पत्र मेरे पास बिना किसी उपहार के ही पहुँचेगा?” निश्चिंत रहो, यह तुम्हारे लिए कुछ न कुछ अवश्य ला रहा है। पर मैं ‘कुछ’ क्यों कहूँ? यह तो बहुत कुछ ला रहा है। उस वचन से बढ़कर क्या हो सकता है जिसे मैं अब इस पत्र के माध्यम से तुम्हें सौंप रहा हूँ—

“बंधन में जीना बुरा है, पर किसी को भी बंधन में जीने के लिए विवश नहीं किया जाता।”

    यह कैसे संभव हो सकता है? स्वतंत्रता के मार्ग हर ओर खुले पड़े हैं, अनेक मार्ग और वे भी छोटे तथा सरल। ईश्वर का धन्यवाद कि किसी भी मनुष्य को जीवित रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हम उन्हीं बंधनों को रौंद सकते हैं जो हमें बाँधने का प्रयास करते हैं।

    “यह तो एपिक्यूरस ने कहा था,” तुम कहते हो। “तुम्हें किसी दूसरे की संपत्ति से क्या लेना-देना?” जो कुछ सत्य है, वह मेरा अपना है। मैं तुम्हें आगे भी एपिक्यूरस के विचार सुनाता रहूँगा, विशेषकर उन लोगों के लाभ के लिए जो किसी कथन को शब्दशः दोहराते हैं और यह नहीं देखते कि क्या कहा जा रहा है बल्कि केवल यह देखते हैं कि उसे किसने कहा है। इस प्रकार वे जान सकेंगे कि श्रेष्ठ विचार किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होते बल्कि सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होते हैं।

अभी के लिए विदा 

Sunday, 21 June 2026

भावों और सद्गुणी व्यक्ति के संदर्भ में -- पत्र - 11

प्रिय लूसीलियस 

आपके उस आशाजनक युवा मित्र के साथ हुई मेरी बातचीत ने तुरंत ही मुझे यह दिखा दिया कि उसमें कितनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा है और वास्तव में उसने कितनी प्रगति भी कर ली है। उसने हमें अपने व्यक्तित्व की एक झलक दिखाई और उसका शेष व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा क्योंकि जो कुछ उसने कहा, वह पहले से तैयार किया हुआ नहीं था। वह अचानक ऐसी स्थिति में आ गया था जहाँ उसे बिना तैयारी के बोलना पड़ा। जब उसने स्वयं को संभालना शुरू किया तो उसके चेहरे पर गहरी लज्जा की लालिमा छा गई क्योंकि वह उस संकोच और विनम्रता से मुक्त नहीं हो सका था, जो किसी युवा व्यक्ति में एक अत्यंत शुभ और प्रशंसनीय गुण माना जाता है।



    मुझे लगता है कि वह उन लोगों में से है जो पूर्णतः परिपक्व हो जाने, सभी दोषों से मुक्त हो जाने, यहाँ तक कि बुद्धिमान बन जाने के बाद भी इस प्रवृत्ति को बनाए रखेंगे। क्योंकि शरीर और मन की कुछ स्वाभाविक कमजोरियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बुद्धिमत्ता पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। जो बातें जन्मजात और प्रकृति द्वारा आरोपित हैं उन्हें अभ्यास और अनुशासन से कुछ हद तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है पर पूरी तरह जीता नहीं जा सकता। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं फिर भी सार्वजनिक रूप से उपस्थित होते ही उनके शरीर में पसीना आने लगता है, मानो वे अत्यधिक थके हुए हों या गर्मी से व्याकुल हों। कुछ अन्य लोगों के घुटने भाषण देने से पहले काँपने लगते हैं, उनके दाँत बजने लगते हैं, होंठ सख्त हो जाते हैं और जीभ लड़खड़ाने लगती है। इन प्रवृत्तियों को न तो शिक्षा समाप्त कर सकती है और न ही निरंतर अभ्यास। प्रकृति अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती रहती है और इन कमजोरियों के माध्यम से सबसे दृढ़ व्यक्तियों को भी यह स्मरण कराती है कि उनकी अपनी एक मानवीय प्रकृति है। मेरा विश्वास है कि लज्जा के कारण चेहरा लाल हो जाना भी ऐसी ही एक प्रवृत्ति है। यह सबसे संयमी और परिपक्व व्यक्तियों में भी अचानक प्रकट हो जाती है। निस्संदेह युवाओं में यह अधिक दिखाई देती है क्योंकि उनमें स्वाभाविक ऊष्मा अधिक होती है और उनका रंग-रूप अधिक कोमल होता है किन्तु यह अनुभवी सैनिकों और वृद्ध व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है। कुछ लोग तो उस समय सबसे अधिक खतरनाक हो जाते हैं जब उनका चेहरा लाल हो उठता है मानो उनकी सारी लज्जा उसी लालिमा में समा गई हो।

    सुला (Sulla) तब सबसे अधिक उग्र और हिंसक हो जाता था जब उसके गालों पर रक्त की लालिमा छा जाती थी। पोमपाए (Pompey) के चेहरे से अधिक सौम्य कुछ नहीं था फिर भी जब भी वह लोगों के बीच होता, विशेषकर भाषण देते समय, उसका चेहरा लाल हो जाता था। मुझे स्मरण है कि पैपिरियसस फैबीअनस (Papirius Fabianus) जब सीनेट के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाए गए, तब उनका चेहरा भी लाल हो गया था। उनके भीतर यह संकोच और विनम्रता कुछ ऐसी शोभा देती थी कि वह विशेष रूप से आकर्षक प्रतीत होती थी।

    यह किसी मानसिक दुर्बलता के कारण नहीं होता बल्कि केवल इसलिए कि व्यक्ति उस परिस्थिति का अभ्यस्त नहीं होता। जिन लोगों को किसी अनुभव की आदत नहीं होती, वे भयभीत न होने पर भी इस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं, यदि उनके शरीर की स्वाभाविक प्रवृत्ति लज्जा से लाल पड़ जाने की हो। जैसे कुछ लोगों का रक्त स्वभावतः मंद गति का होता है, वैसे ही कुछ लोगों का रक्त अत्यन्त सक्रिय और तीव्र होता है, जो शीघ्र ही चेहरे तक पहुँच जाता है और उसे लाल कर देता है। जैसा कि मैंने कहा, ऐसी विशेषताएँ किसी भी मात्रा की बुद्धिमत्ता से समाप्त नहीं की जा सकतीं। यदि बुद्धिमत्ता सभी प्रकार के दोषों को मिटा सकती तो वह स्वयं प्रकृति पर शासन करने लगती। किन्तु ऐसा नहीं है। जन्म की परिस्थितियों और शरीर की प्राकृतिक बनावट से जो गुण अथवा प्रवृत्तियाँ हमें प्राप्त होती हैं, वे तब भी हमारे साथ बनी रहती हैं जब मन दीर्घकालीन साधना और आत्म-अनुशासन के द्वारा बहुत हद तक स्थिर और संतुलित हो चुका होता है। इनमें से किसी भी प्रवृत्ति को न तो आदेश देकर दबाया जा सकता है और न ही इच्छा करने मात्र से बुलाया जा सकता है। वे हमारी प्रकृति का हिस्सा हैं और अपने समय पर स्वयं प्रकट होती हैं।

    अभिनेता भावनाओं की नकल कर लेते हैं। वे भय और कम्पन का अभिनय कर सकते हैं। वे शोक का प्रदर्शन भी कर सकते हैं। लेकिन जब उन्हें संकोच या लज्जाशीलता दिखानी होती है तो वे केवल सिर को झुका लेते हैं, अपनी आवाज़ धीमी कर लेते हैं और अपनी दृष्टि भूमि पर टिकाए रखते हैं। पर वे स्वयं को वास्तव में लाल नहीं कर सकते क्योंकि चेहरे पर आने वाली लज्जा की लालिमा न तो इच्छा से उत्पन्न की जा सकती है और न ही इच्छा से रोकी जा सकती है। ऐसी बातों के विषय में बुद्धिमत्ता कोई वादा नहीं कर सकती और न ही उनमें कोई प्रगति कर सकती है। ये अपने ही अधिकार-क्षेत्र में आती हैं। वे बिना बुलाए आती हैं और बिना बुलाए ही चली जाती हैं।

    अब यह पत्र अपने समापन की माँग कर रहा है। लो, इसका समापन प्रस्तुत है और ऐसा समापन जो उपयोगी भी है और आत्मा के लिए कल्याणकारी भी। मैं सुझाव देता हूँ कि तुम इसे अपने मन में दृढ़ता से बसा लो। हमें किसी श्रेष्ठ और सद्गुणी व्यक्ति के प्रति गहरा सम्मान और अनुराग विकसित करना चाहिए तथा उसे सदैव अपनी आँखों के सामने उपस्थित मानना चाहिए ताकि हम इस प्रकार जीवन जिएँ मानो वह हमें देख रहा हो और प्रत्येक कार्य इस प्रकार करें मानो उसकी दृष्टि हम पर बनी हुई हो।

    प्रिय ल्यूसीलियस, यह शिक्षा एपिक्यूरस ने दी थी। उन्होंने हमें एक संरक्षक और एक शिक्षक प्रदान किया और यह बिल्कुल उचित भी था। क्योंकि जब लोग कोई गलत कार्य करने वाले होते हैं और उन्हें लगता है कि कोई साक्षी उपस्थित है तो वे प्रायः उस कार्य से रुक जाते हैं। मन के पास भी ऐसा कोई व्यक्ति होना चाहिए जिसके प्रति वह सम्मान अनुभव करे और जिसकी नैतिक प्रतिष्ठा तथा अधिकार के कारण वह अपने एकांत को भी अधिक पवित्र और मर्यादित बना सके।

    धन्य है वह व्यक्ति जो हमें केवल अपनी उपस्थिति में ही नहीं बल्कि मात्र उसकी कल्पना करने से भी बेहतर बना देता है! और धन्य है वह व्यक्ति जो किसी के प्रति इतना गहरा सम्मान रखता है कि केवल उसका स्मरण भर उसके जीवन में व्यवस्था, संयम और शांति ले आता है। जो व्यक्ति इस प्रकार श्रद्धा करना जानता है, वह शीघ्र ही स्वयं भी श्रद्धा के योग्य बन जाता है। इसलिए कैटो (Cato) को चुनो या, यदि तुम्हें लगता है कि कैटो कुछ अधिक कठोर हैं तो गैअस लैलिअस (Gaius Laelius) को चुनो जिनका स्वभाव अधिक सौम्य था। किसी ऐसे व्यक्ति को चुनो जिसकी कर्मशीलता, वाणी और यहाँ तक कि जिसका मुखमंडल भी तुम्हें प्रिय हो क्योंकि चेहरा अक्सर भीतर के मन का परिचय देता है। उस व्यक्ति को सदैव अपनी दृष्टि के सामने रखो। अपने संरक्षक या अपने आदर्श के रूप में। मैं फिर कहता हूँ, हमें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो हमारे आचरण का मानदंड निर्धारित कर सके।तुम कभी भी टेढ़ी वस्तु को सीधा नहीं कर सकते, जब तक तुम्हारे पास उसे नापने के लिए कोई सीधा पैमाना न हो।

अभी के लिए विदा  




स्वयं के संदर्भ में -- पत्र - 10

प्रिय लूसीलियस 

हाँ, मैं अपने कथन को नहीं बदलता। भीड़ से दूर रहो। थोड़े लोगों की संगति से भी दूर रहो। यहाँ तक कि एक अकेले साथी से भी बचो। ऐसा कोई नहीं है जिसके साथ मैं तुम्हें साझा करना चाहूँ। और देखो, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है, मैं तुम्हें स्वयं तुम्हारे ही भरोसे छोड़ने का साहस करता हूँ। कहा जाता है कि क्रेटीस, जो उस स्टिल्पो का शिष्य था जिसका मैंने अपने पिछले पत्र में उल्लेख किया था, ने एक बार एक युवक को अकेले टहलते हुए देखा और उससे पूछा कि वह अकेले क्या कर रहा है। युवक ने उत्तर दिया, "मैं अपने आप से बात कर रहा हूँ।' क्रेटीस ने कहा, 'सावधान रहो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, ध्यान से देखो कि तुम क्या कर रहे हो क्योंकि तुम एक बुरे व्यक्ति से बात कर रहे हो।

    जब लोग अवसादग्रस्त या चिंतित होते हैं तो हम उन पर नज़र रखते हैं ताकि वे अपने एकांत समय का किसी दुर्भाग्यपूर्ण कार्य में उपयोग न कर बैठें। मूर्ख लोगों में से ऐसा एक भी नहीं है जिसे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए।इसी समय वे बुरी योजनाएँ बनाना शुरू करते हैं। इसी समय वे दूसरों या स्वयं अपने लिए भविष्य के संकटों की साज़िश रचते हैं। इसी समय वे अपनी निर्लज्ज इच्छाओं को व्यवस्थित करते हैं। इसी समय मन उन बातों को बाहर लाता है जिन्हें उसने भय या लज्जा के कारण छिपाकर रखा था। इसी समय वह अपने साहस को बढ़ाता है, अपनी वासनाओं को उकसाता है और अपने क्रोध को भड़काता है। एकांत का एकमात्र लाभ यह है कि व्यक्ति किसी के सामने अपने रहस्य नहीं खोलता और उसे किसी मुखबिर का भय नहीं रहता। लेकिन मूर्ख व्यक्ति इस लाभ को भी खो देता है क्योंकि वह स्वयं ही अपना भेद खोल देता है।



    अब देखो कि तुम्हारे बारे में मेरी कैसी आशा है या यूँ कहूँ कि मैं अपने आप से क्या वचन लेता हूँ क्योंकि 'आशा' उस भलाई का नाम है जिसके बारे में निश्चितता नहीं होती। मैं तो यह अधिक पसंद करूँगा कि तुम अकेले रहो, बजाय इसके कि तुम उन लोगों में से किसी के साथ रहो जिनके बारे में मैं सोच सकता हूँ। मुझे याद है कि तुमने एक अवसर पर कितने साहस के साथ एक घोषणा की थी और तुम्हारे शब्दों में कितनी शक्ति थी। उस समय मैंने स्वयं को बधाई दी और कहा, "ये बातें यूँ ही अचानक मन में आकर नहीं कही गई हैं। इनके पीछे कोई ठोस आधार है। यह व्यक्ति साधारण लोगों जैसा नहीं है। यह तो अपने वास्तविक उपचार और सुधार की ओर देख रहा है।" तुम्हें इसी प्रकार बोलना चाहिए और इसी प्रकार जीवन जीना चाहिए। ध्यान रखना कि कोई भी बात तुम्हें निराश या हताश न कर दे। जैसे तुम अपनी पूर्व प्रार्थनाओं को स्वीकार करने के लिए देवताओं का धन्यवाद करते हो, वैसे ही नई और भिन्न प्रार्थनाएँ भी करो। मन की उत्कृष्टता और मानसिक शांति की याचना करो और उसके बाद शारीरिक स्वास्थ्य की। क्या कोई कारण है कि तुम ऐसी प्रार्थनाएँ बार-बार न करो? ईश्वर से माँगने में साहसी बनो क्योंकि तुम उससे ऐसी किसी वस्तु की याचना नहीं कर रहे हो जो वास्तव में तुम्हारी न हो।

    लेकिन मैं अपनी परंपरा का पालन करूँगा और इस पत्र के साथ एक छोटी-सी भेंट भी भेजूँगा। मुझे एथेनोडोरस के लेखों में एक ऐसी बात मिली है जो बिल्कुल सत्य प्रतीत होती है, "तुम यह तभी जान सकते हो कि तुम सभी इच्छाओं से मुक्त हो चुके हो, जब तुम उस अवस्था तक पहुँच जाओ कि ईश्वर से ऐसी किसी वस्तु की याचना न करो जिसे तुम खुले रूप से लोगों के सामने भी न माँग सको।"

    वास्तव में लोग कितने पागल होते हैं! जब उनकी प्रार्थनाएँ अत्यन्त लज्जाजनक होती हैं तो वे उन्हें देवताओं के कानों में फुसफुसाकर कहते हैं। लेकिन यदि कोई मनुष्य सुन रहा हो तो वे तुरंत चुप हो जाते हैं। जिस बात को वे मनुष्यों के सुनने योग्य नहीं समझते, वही बात वे ईश्वर से कहते हैं! विचार करो कि क्या यह एक लाभकारी उपदेश नहीं हो सकता। मनुष्यों के बीच ऐसे जियो मानो ईश्वर तुम्हें देख रहा हो और ईश्वर से ऐसे बात करो मानो मनुष्य तुम्हारी बात सुन रहे हों।

अभी के लिए विदा 

मैत्री और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में -- (पत्र - 9)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम यह जानने के इच्छुक हो कि क्या एपिक्यूरस ने अपने एक पत्र में उन लोगों की आलोचना करके उचित किया था, जो कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है और इसलिए उसे मित्र की आवश्यकता नहीं होती। यह आरोप उसने स्टिलपो (Stilpo) और उन अन्य दार्शनिकों पर लगाया था जो मानते थे कि सर्वोच्च कल्याण एक ऐसी मानसिक अवस्था है जो किसी भी भावनात्मक आघात से अछूती रहती है। (यदि हम ग्रीक शब्द अपैथिया (apatheia-इसका अर्थ स्टोइक दर्शन के अनुसार मन की ऐसी स्थिति है जहाँ मन, इच्छाओं और जीवन के सुख-दुख के बीच शांत व स्थिर रहता है ) को केवल एक ही शब्द में व्यक्त करना चाहें और उसके लिए इम्पैशन्सिया (impatientia) शब्द का प्रयोग करें,तो उससे अर्थ की अस्पष्टता उत्पन्न हो सकती है। कारण यह है कि इम्पैशन्सिया (impatientia) का अर्थ उस अर्थ के बिल्कुल उल्टा भी समझा जा सकता है जिसे हम व्यक्त करना चाहते हैं। हमारा आशय ऐसे व्यक्ति से है जो किसी भी दुर्भाग्य या विपत्ति को अपने मन पर प्रभाव नहीं डालने देता। पर इसे ऐसे व्यक्ति के रूप में समझ लिया जाएगा जो किसी भी विपत्ति को सहन ही नहीं कर सकता। इसलिए विचार कीजिए कि क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि हम इसे अजेय  मन या ऐसा मन जो समस्त दुःखों से परे स्थापित हो, कहें।) हमारा मत उनसे भिन्न है। हमारा बुद्धिमान व्यक्ति विपत्तियों पर विजय प्राप्त करता है पर उन्हें अनुभव भी करता है जबकि उनका बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें महसूस ही नहीं करता। फिर भी एक बात दोनों में समान है—बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। यद्यपि वह स्वयं में संतुष्ट रहता है, फिर भी वह मित्र, पड़ोसी और साथी रखना चाहता है।


    उसकी आत्मनिर्भरता को इस प्रकार समझो। काभी-काभी वह अपने एक हिस्से से संतुष्ट होता है। यदि युद्ध में उसका हाथ कट जाए या किसी दुर्घटना में उसकी एक या दोनों आँखें चली जाएँ, तब भी जो कुछ उसके पास बचा रहेगा, वह उसके लिए पर्याप्त होगा। वह अपने शरीर के कुछ हिस्से खो जाने पर भी उतना ही प्रसन्न रहेगा जितना पूर्ण शरीर के साथ था। फिर भी वह यह नहीं चाहेगा कि उसके अंग नष्ट हों। वह मित्र के बिना रह सकता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह मित्र-विहीन रहना चाहता है। यदि वह किसी मित्र को खो देता है तो वह उस क्षति को धैर्यपूर्वक सहन करता है। वास्तव में वह कभी मित्रों से वंचित नहीं रहता क्योंकि नए मित्र बनाना उसके अपने हाथ में है। जैसे महान मूर्तिकार फीडियस (Phidias) अपनी किसी मूर्ति के नष्ट हो जाने पर दूसरी बना सकता था, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति खोए हुए मित्र के स्थान पर दूसरा मित्र बना लेता है।

    तुम पूछते हो कि वह इतनी शीघ्रता से मित्र कैसे बना लेता है? मैं बताता हूँ। दार्शनिक हेकाटो कहता है, “मैं तुम्हें बिना औषधि, बिना जड़ी-बूटी और बिना किसी जादुई मंत्र के प्रेम प्राप्त करने का उपाय बताऊँगा, यदि तुम प्रेम पाना चाहते हो... तो स्वयं प्रेम करो।”

    पुरानी और स्थापित मित्रता का आनंद तो होता ही है पर नई दोस्ती की शुरुआत और उसे अर्जित करने में भी आनंद सुख है। मित्र बनाने और मित्र होने का अंतर वैसा ही है जैसा बीज बोने और फसल काटने का। दार्शनिक अटालुस (Attalus) कहा करते थे कि मित्र बनाना, मित्र होने से अधिक आनंददायक है, जैसे किसी कलाकार के लिए चित्र बनाना, चित्र बनाकर रख लेने से अधिक सुखद होता है। अपने कार्य में पूरी तरह एकाग्र होकर लगे रहना अपने-आप में अत्यंत आनंददायक होता है। कार्य पूरा हो जाने के बाद उसके परिणाम से जो सुख मिलता है, वह उस सुख के बराबर नहीं होता जो कार्य करते समय मिलता है। कलाकार अपनी कला की पूर्ण कृति का आनंद अवश्य लेता है लेकिन जब वह चित्र बना रहा होता है, तब वह स्वयं कला-सृजन की प्रक्रिया का आनंद ले रहा होता है। बच्चे बड़े होकर अधिक उपयोगी और संतोष देने वाले हो सकते हैं, पर वे शैशव अवस्था में वे अधिक मधुर और प्रिय लगते हैं।

    अब आइए, अपने मूल विषय पर लौटें। यदि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर भी हो, तब भी वह मित्र चाहता है। यदि और किसी कारण से नहीं, तो कम-से-कम इसलिए कि इतना महान सद्गुण (मित्रता करने और प्रेम करने की क्षमता) निष्क्रिय न पड़ा रहे। उसका उद्देश्य वह नहीं होता जो एपिक्यूरस इसी पत्र में कहता है, "उसके पास ऐसा कोई हो जो बीमारी में उसके पास बैठ सके या कारावास अथवा आवश्यकता के समय उसकी सहायता कर सके।" इसके विपरीत, उसका उद्देश्य यह होता है कि उसके पास ऐसा कोई हो जिसके पास वह स्वयं बीमारी में बैठ सके जिसे वह स्वयं शत्रु की कैद से मुक्त करा सके। जो व्यक्ति केवल अपने लाभ की दृष्टि से मित्रता करता है और इसी कारण मित्र बनाता है, वह गलत सोचता है। जैसे उसने मित्रता की शुरुआत की थी, वैसा ही उसका अंत भी होगा। उसने मित्र इसलिए बनाया कि यदि वह कभी कैद में पड़े तो मित्र उसकी सहायता करे। लेकिन ज्यों ही बेड़ियों की पहली झनकार सुनाई देगी, वह स्वयं भाग खड़ा होगा। इन्हें ही सामान्यतः अच्छे मौसम की मित्रताएँ कहा जाता है। जो मित्र केवल उपयोगिता के कारण बनाया जाता है, वह तब तक ही प्रिय रहता है जब तक वह उपयोगी बना रहता है। इसी कारण समृद्धि और सफलता के समय लोगों के आस-पास मित्रों की भीड़ लगी रहती है जबकि जिन लोगों का पतन हो जाता है, वे अकेले छोड़ दिए जाते हैं। मित्र उसी समय भाग खड़े होते हैं, जब उनके पास अपनी मित्रता को सिद्ध करने का अवसर होता है। यही कारण है कि हमें ऐसी अनेक दुखद कहानियाँ सुनने को मिलती हैं जिनमें लोग भय के कारण अपने मित्रों का साथ छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि उनके साथ विश्वासघात भी कर बैठते हैं।

    आरंभ और अंत में सामंजस्य होना चाहिए। जो व्यक्ति सुविधा या स्वार्थ के लिए मित्र बनता है, वह सुविधा या स्वार्थ के लिए ही मित्रता समाप्त भी कर देगा। यदि मित्रता को उसके अपने लिए नहीं बल्कि किसी अन्य लाभ के लिए मूल्यवान समझा जाता है तो धन की कोई न कोई राशि उस मित्रता पर भारी पड़ जाएगी। "मित्र क्यों बनाया जाए?" इसलिए कि मेरे पास ऐसा कोई हो जिसके लिए मैं प्राण तक दे सकूँ। ऐसा कोई हो जिसके साथ मैं निर्वासन में जा सकूँ। ऐसा कोई हो जिसका जीवन बचाने के लिए मैं अपना जीवन भी दाँव पर लगा सकूँ। लेकिन तुम जो मित्रता का वर्णन कर रहे हो, वह मित्रता नहीं बल्कि एक व्यापारिक सौदा है क्योंकि वह अपने ही लाभ को देखती है और हर बात को परिणाम तथा फायदे की दृष्टि से तौलती है।

    इसमें किसी को संदेह नहीं कि प्रेमियों की भावनाएँ मित्रता से कुछ समानता रखती हैं। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम, मित्रता का पागलपन की सीमा तक पहुँचा हुआ रूप है। तो क्या कोई व्यक्ति प्रेम इसलिए करता है कि उसे उससे कोई लाभ मिले? या महत्वाकांक्षा की पूर्ति हो... या यश और प्रसिद्धि प्राप्त हो? प्रेम अपने आप में ही, किसी अन्य उद्देश्य की परवाह किए बिना, मन को दूसरे व्यक्ति के सौन्दर्य और आकर्षण की ओर आकृष्ट कर देता है और यह आशा करता है कि उसका स्नेह भी प्रत्युत्तर में प्राप्त होगा। तो फिर हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? क्या कोई निम्न या तुच्छ भावना किसी अधिक सम्माननीय और श्रेष्ठ स्रोत से उत्पन्न हो सकती है?

    तुम कहते हो, “हमारा प्रश्न यह नहीं है कि मित्रता अपने-आप में वरणीय (चयन करने योग्य) है या नहीं।” इसके विपरीत, यही वह बात है जिसे सबसे पहले और सबसे दृढ़ता से स्थापित किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि मित्रता अपने-आप में ही वरणीय है, तो आत्मनिर्भर व्यक्ति भी उसका अनुसरण कर सकता है। “तो फिर वह उसे किस प्रकार अपनाता है?” उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति किसी अत्यंत सुंदर वस्तु को अपनाता है— न लाभ के आकर्षण से खिंचकर और न ही भाग्य के उतार-चढ़ाव से भयभीत होकर। जब कोई व्यक्ति केवल अपनी स्थिति सुधारने, लाभ प्राप्त करने या जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए मित्र बनाता है, तब वह मित्रता की महानता को छोटा कर देता है।

   “बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है।” प्रिय लूसीलियस, बहुत-से लोग इस कथन का गलत अर्थ निकालते हैं। वे बुद्धिमान व्यक्ति को हर ओर से घेरकर मानो उसकी अपनी ही त्वचा के भीतर कैद कर देते हैं। वास्तविकता यह है कि इस कथन का अर्थ क्या है और इसकी सीमा कहाँ तक है, इसका भेद समझना आवश्यक है। बुद्धिमान व्यक्ति अच्छा जीवन जीने के संदर्भ में आत्मनिर्भर होता है, लेकिन सामान्य रूप से जीवन जीने के संदर्भ में नहीं। क्योंकि सामान्य जीवन के लिए उसे अनेक वस्तुओं और साधनों की आवश्यकता होती है। किन्तु अच्छा और श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए उसे केवल एक स्वस्थ, सच्चरित्र और सीधा मन चाहिए जो भाग्य के उतार-चढ़ाव से ऊपर उठ चुका हो।

    मैं तुम्हें क्रिसिप्पुस (Chrysippus) का यह भेद भी बताता हूँ। वह कहता है कि यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति को किसी चीज़ की कमी नहीं होती फिर भी उसे अनेक वस्तुओं का उपयोग होता है। इसके विपरीत, मूर्ख व्यक्ति के लिए कोई भी वस्तु वास्तव में उपयोगी नहीं होती,क्योंकि वह चीज़ों का सही उपयोग करना नहीं जानता; फिर भी उसे हर चीज़ की कमी रहती है। बुद्धिमान व्यक्ति को हाथों, आँखों और ऐसी अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है जो दैनिक जीवन के लिए आवश्यक हैं फिर भी उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं होती। क्योंकि "कमी" का अर्थ है "ज़रूरतमंद होना", और बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी वस्तु का मोहताज नहीं होता।

    इसलिए यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, फिर भी उसे मित्रों का उपयोग होता है और वह यथासंभव अधिक मित्र रखना चाहता है। लेकिन वह मित्रों को इसलिए नहीं चाहता कि उनके बिना वह अच्छा जीवन नहीं जी सकता। अच्छा जीवन तो वह मित्रों के बिना भी जी सकता है, क्योंकि परम शुभ अपने बाहर किसी साधन की खोज नहीं करता। वह मनुष्य के अपने ही भीतर जन्म लेता है और अपने आप में पूर्ण होता है। यदि तुम उसके किसी भी अंश को बाहर की वस्तुओं पर निर्भर कर दोगे, तो वह भाग्य के अधीन होने लगेगा।

    “लेकिन यदि बुद्धिमान व्यक्ति मित्रों से वंचित हो जाए, जैसे कि वह कैद में हो, किसी विदेशी देश में अकेला फँस गया हो, किसी लंबी समुद्री यात्रा में विलंबित हो गया हो, या किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दिया गया हो तो वह किस प्रकार का जीवन जिएगा?” वह उसी प्रकार का जीवन जिएगा जैसा जुपिटर उस समय जीता है जब संसार विलीन हो जाता है, जब सभी देवता एक में समा जाते हैं, जब प्रकृति कुछ समय के लिए अपनी गतिविधियाँ रोक देती है और वह स्वयं अपने विचारों में लीन होकर अपने भीतर विश्राम करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही करता है। वह अपने भीतर लौट जाता है, स्वयं में आश्रय लेता है और स्वयं ही अपनी संगति बन जाता है।

    फिर भी, जब तक बुद्धिमान व्यक्ति को अपने जीवन की व्यवस्था अपनी इच्छा के अनुसार करने का अवसर प्राप्त है, तब तक वह आत्मनिर्भर होते हुए भी विवाह करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी बच्चों का पालन-पोषण करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी ऐसा जीवन नहीं जीना चाहेगा जिसमें अन्य मनुष्यों का साथ बिल्कुल न हो। उसे मित्रता की ओर ले जाने वाली शक्ति उसका स्वार्थ या लाभ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। जिस प्रकार कुछ अन्य वस्तुएँ हमें स्वभावतः आकर्षित करती हैं, उसी प्रकार मित्रता भी हमें आकर्षित करती है। जैसे एकांत से बचना और संगति की तलाश करना हमारे स्वभाव में निहित है, जैसे प्रकृति ने मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ रखा है उसी प्रकार मित्रता स्थापित करने की एक सहज और जन्मजात प्रेरणा भी हमारे भीतर विद्यमान है।

    यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति अपने मित्रों से अत्यन्त गहरा प्रेम करता है, उन्हें अपने समान, और कई बार स्वयं से भी अधिक महत्व देता है। तथापि वह यह मानता है कि सभी वास्तविक अच्छाइयाँ उसके अपने भीतर ही सीमित हैं। इस विषय में वह वही मत रखेगा जो स्टिल्पो (Stilpo) ने व्यक्त किया था। फिर भी एपिक्यूरस के पत्र में उसकी आलोचना की गई है। स्टिल्पो का नगर शत्रुओं द्वारा जीत लिया गया था; उसके बच्चे नष्ट हो गए, उसकी पत्नी भी उससे छिन गई और अपने पूरे राष्ट्र के विनाश में वह अकेला जीवित बचा। फिर भी वह प्रसन्नचित्त होकर उस आपदा से बाहर निकला। जब दिमेत्रियस जिसे "पोलियोरकेटेस" अर्थात् "नगर-विजेता" कहा जाता था, ने उससे पूछा, "क्या तुमने कुछ खोया है?" तो उसने उत्तर दिया,  "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास ही है।" 

यह सचमुच एक साहसी और दृढ़ व्यक्ति था; उसने अपने शत्रु की विजय पर भी विजय प्राप्त कर ली। उसने कहा, "मैंने कुछ भी नहीं खोया है," और इस प्रकार उसने विजेता को ही यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या वास्तव में उसने कोई विजय प्राप्त की भी है। "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास है"अर्थात् मेरा न्याय, मेरा साहस, मेरी विवेकशीलता (प्रज्ञा) और सबसे बढ़कर यह क्षमता कि मैं समझता हूँ कि कोई भी ऐसी वस्तु वास्तव में अच्छी नहीं है जिसे मुझसे छीना जा सके। हम आश्चर्य करते हैं कि कुछ जीव-जन्तु बिना किसी शारीरिक क्षति के अग्नि में से निकल जाते हैं। किन्तु यह व्यक्ति उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है, जो आग, तलवार और विनाश के बीच से न केवल बिना किसी चोट के निकल आया, बल्कि बिना किसी हानि के भी। अब तुम देख सकते हो कि किसी पूरे राष्ट्र को पराजित करना एक अकेले मनुष्य को पराजित करने की अपेक्षा कितना आसान है। स्टिल्पो का यह कथन स्टोइकों का भी कथन है। स्टोइक दार्शनिक भी नगरों के विनाश के बीच से अपनी सम्पत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए निकल जाता है, क्योंकि वह आत्मनिर्भर है। यही वह सीमा है जिसके द्वारा वह अपनी समृद्धि और सुख का निर्धारण करता है।

    लेकिन यह मत समझो कि केवल हम स्टोइक ही ऐसी उदात्त बातें कहते हैं। स्टिल्पो की आलोचना करने वाले एपिक्यूरस ने भी स्वयं एक ऐसा कथन कहा है जो उसके विचार से बहुत मिलता-जुलता है। इसे आज के लिए मेरी ओर से एक उपहार समझो, यद्यपि आज का अपना ऋण मैं पहले ही चुका चुका हूँ। एपिक्यूरस कहते हैं,  "जो व्यक्ति यह नहीं मानता कि उसके पास जो कुछ है वह पर्याप्त है, वह दुखी है, चाहे वह पूरे संसार का शासक ही क्यों न हो।" या यदि तुम्हें इसे इस प्रकार कहना अधिक उपयुक्त लगे (क्योंकि हमें शब्दों की नहीं, विचारों की सेवा करनी चाहिए): "वह व्यक्ति दयनीय है जो स्वयं को पूर्णतः सुखी नहीं मानता, भले ही वह समस्त संसार पर शासन करता हो।"

    लेकिन तुम्हें यह दिखाने के लिए कि ये विचार केवल दार्शनिकों तक सीमित नहीं हैं बल्कि व्यापक रूप से स्वीकार किए गए हैं और निस्संदेह प्रकृति द्वारा ही प्रेरित हैं, एक हास्य-कवि यह पंक्ति प्रस्तुत करता है, "कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, यदि वह स्वयं को सुखी नहीं मानता।" यदि तुम अपनी परिस्थितियों को बुरा समझते हो, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे वास्तव में कैसी हैं?

    “लेकिन देखो,” तुम कहते हो, “फलाँ व्यक्ति का क्या, जिसकी संपत्ति भ्रष्ट तरीकों से अर्जित की गई है? या उस दूसरे व्यक्ति का क्या, जो बहुतों का स्वामी है और उससे भी अधिक लोगों का दास? यदि उनमें से कोई यह दावा करे कि उसका जीवन अच्छा है, तो क्या मात्र उसकी राय से यह सच हो जाएगा?” यहाँ महत्व इस बात का नहीं है कि वह क्या कहता है, बल्कि इस बात का है कि वह वास्तव में क्या सोचता है। और वह भी किसी एक दिन की क्षणिक भावना नहीं बल्कि लंबे समय तक उसके मन की स्थायी धारणा क्या है। फिर भी तुम्हें इस बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं कि इतना महान पुरस्कार किसी अयोग्य व्यक्ति को मिल जाएगा। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही अपने पास जो कुछ है उससे संतुष्ट रहता है; सभी मूर्ख लोग स्वयं से असंतुष्ट रहते हैं और उसी कारण दुःख भोगते हैं।

अभी के लिए विदा 


Friday, 19 June 2026

एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- (पत्र - 8)

प्रिय लूसीलियस 

"तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फिर तुम्हारे दर्शनशास्त्र की वह शिक्षा कहाँ गई जो हमें कर्म करते हुए मरने का उपदेश देती है?"

    क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें निष्क्रिय रहने की सलाह दे रहा हूँ? मैंने स्वयं को लोगों की भीड़ से अलग किया है और अपने द्वार बंद कर लिए हैं, लेकिन इसका कारण यह है कि मैं अधिक से अधिक लोगों का हित कर सकूँ। मेरा एक भी दिन आलस्य में नहीं बीतता। मैं रात का भी एक हिस्सा अध्ययन के लिए सुरक्षित रखता हूँ। नींद के लिए मेरे पास समय नहीं होता जब तक वह मुझे परास्त न कर दे, मैं काम करता रहता हूँ। मेरी आँखें देर रात तक जागने से थक जाती हैं और झुकने लगती हैं... फिर भी मैं उन्हें कार्य में लगाए रखता हूँ।

    मैंने केवल समाज से ही नहीं बल्कि व्यवसायों से भी और विशेष रूप से अपने निजी कामों से भी स्वयं को अलग कर लिया है। जो कार्य मैं कर रहा हूँ, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए है। वे ही मेरे लेखन से लाभान्वित हो सकेंगी। मैं अपने अनुभव से प्राप्त स्वास्थ्यवर्धक उपदेशों को लिख रहा हूँ, जैसे कोई उपयोगी मरहम के नुस्खे लिखता है। मैंने इन्हें अपने घावों पर आज़माया है। वे अभी पूरी तरह भले न भरे हों, पर उनका फैलना रुक गया है। जीवन का जो सही मार्ग मुझे बहुत भटकने और थक जाने के बाद मिला, वही अब मैं दूसरों को दिखा रहा हूँ।

    मेरा संदेश यह है, "उन वस्तुओं से दूर रहो जो बहुसंख्यक लोगों को प्रिय लगती हैं और उन उपहारों से भी जो भाग्य प्रदान करता है। उनसे सावधान रहो, उनसे डरो और संयोग से प्राप्त होने वाली हर अच्छी वस्तु का प्रतिरोध करो। जैसे मछली आशा के प्रलोभन से फँसती है और शिकार चारे से पकड़ा जाता है, वैसे ही मनुष्य भी फँस जाता है। क्या तुम इन्हें भाग्य का वरदान समझते हो? नहीं, ये जाल हैं। जो व्यक्ति सुरक्षित जीवन जीना चाहता है, उसे इन लुभावने उपकारों से यथासंभव दूर रहना चाहिए। हम अभागे लोग यह समझते हैं कि हमने इन्हें पकड़ रखा है जबकि वास्तव में इन्होंने हमें पकड़ रखा होता है।"

                                         

    तुम्हारा यह जीवन-पथ एक खाई की ओर जाता है। ऐसी ऊँची स्थिति से नीचे उतरने का अर्थ है गिरना। और जब समृद्धि हमें धक्का देने लगती है, तब हम उसका विरोध भी नहीं कर सकते। हम चाहें कि केवल एक बार गिरें या कम-से-कम सीधे खड़े हुए गिरें, पर हमें इसकी भी अनुमति नहीं मिलती। भाग्य केवल हमें गिराता ही नहीं बल्कि उलट देता है और फिर कुचल भी देता है।

    इसलिए जीवन के इस स्वस्थ और कल्याणकारी नियम को अपनाओ। "शरीर को उतना ही सुख दो जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो। उसके साथ कठोरता बरतो ताकि वह मन का आज्ञापालन करना सीखे। भोजन केवल भूख मिटाने के लिए हो, पेय केवल प्यास बुझाने के लिए। वस्त्र ठंड से रक्षा के लिए हों और घर केवल मौसम की कठोरताओं से बचने के लिए। यह कोई महत्व नहीं रखता कि वह घर मिट्टी का बना है या विदेशी संगमरमर से सुसज्जित। विश्वास करो, मनुष्य फूस की छत के नीचे भी उतना ही सुरक्षित रह सकता है जितना सोने के महल में। उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करो जिन्हें अनावश्यक परिश्रम केवल दिखावे और सजावट के लिए खड़ा करता है। याद रखो कि केवल मन ही वास्तव में अद्भुत है और महान मन के लिए उसके अतिरिक्त कुछ भी महान नहीं है।"



    यदि मैं ये बातें स्वयं से और आने वाली पीढ़ियों से कह रहा हूँ तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं तब से अधिक उपयोगी कार्य कर रहा हूँ जब मैं वकील के रूप में किसी की ज़मानत कराता था, किसी वसीयत पर मुहर लगाता था या किसी सीनेटर पद के उम्मीदवार की सहायता में अपना प्रभाव और वाणी लगाता था? विश्वास करो, जो लोग देखने में कुछ नहीं करते प्रतीत होते हैं, वे अक्सर सबसे बड़े कार्य कर रहे होते हैं क्योंकि वे मानव और दैवीय दोनों विषयों पर विचार कर रहे होते हैं।

    अब मुझे इस पत्र को समाप्त करना चाहिए और जैसा कि मेरी आदत बन गई है, मुझे इस पत्र का मूल्य भी चुकाना होगा। लेकिन यह भुगतान मेरी अपनी पूँजी से नहीं होगा। मैं अभी भी एपिक्यूरस के खजाने से उधार ले रहा हूँ। आज मुझे उसके लेखन में यह वचन मिला:

"दर्शन का दास बनो ताकि तुम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सको।"

    जो लोग स्वयं को दर्शन की आज्ञाकारिता में समर्पित कर देते हैं, उनकी स्वतंत्रता किसी भविष्य की तिथि तक नहीं टाली जाती। उन्हें उसी क्षण स्वतंत्रता मिल जाती है। क्योंकि दर्शन की यह दासता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

    शायद तुम पूछो कि मैं एपिक्यूरस के इतने सुंदर वचनों का उल्लेख क्यों करता हूँ, अपने स्टोइक विद्यालय के नहीं। लेकिन क्या कोई कारण है कि इन्हें केवल एपिक्यूरस की संपत्ति माना जाए, न कि समस्त मानवता की?कितने ही कवि ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें दार्शनिकों ने कहा है या कहना चाहिए था। मुझे न तो त्रासदीकारों का उल्लेख करने की आवश्यकता है और न ही उन नाटककारों का जो हास्य और त्रासदी के बीच की शैली में लिखते हैं। यहाँ तक कि साधारण मूक-अभिनय (माइम) में भी अनेक अत्यंत गहन पंक्तियाँ मिलती हैं।

मैं तुम्हें पब्लिलियस की एक पंक्ति सुनाता हूँ, जो अभी जिस विषय पर मैं चर्चा कर रहा था, उसी से संबंधित है:

"जो वस्तु केवल इच्छा करने से मिल जाए, वह वास्तव में तुम्हारी संपत्ति नहीं है।"

मुझे याद है कि तुमने स्वयं यही विचार और भी बेहतर तथा संक्षिप्त रूप में व्यक्त किया था, "जिसे भाग्य तुम्हारा बनाता है, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं होता।" और मैं तुम्हारी एक और इससे भी श्रेष्ठ उक्ति का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता, "जो भलाई दी जा सकती है, वह वापस भी ली जा सकती है।"

इन बातों का मूल्य मैं तुम्हारे खाते में नहीं लिख रहा.ये तो तुम्हारी अपनी ही संपत्ति हैं।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 18 June 2026

भीड़ के संदर्भ में -- (पत्र - 7)

प्रिय लुसीलियस

तुम पूछते हो कि सबसे अधिक किस चीज़ से बचना चाहिए? मैं कहूँगा, भीड़ से। अभी तुम इतने सुरक्षित नहीं हुए हो कि अपने आपको भीड़ में शामिल कर सको। 

    मैं इस संदर्भ में अपनी कमजोरी खुले रूप से स्वीकार करता हूँ। जब भी मैं बाहर जाता हूँ, कभी भी उसी चरित्र के साथ वापस नहीं लौटता जिसके साथ गया था। हमेशा ऐसा कुछ फिर से उद्वेलित हो जाता है जिसे मैं पहले शांत कर चुका था, कुछ ऐसा भी जिससे छुटकारा पा लिया था, पर वह फिर से लौट आती है। जैसे लंबे समय तक बीमारी से उबर रहे रोगी को बाहर ले जाने पर उसकी हालत बिगड़ सकती है, वैसा ही हमारे साथ भी होता है। हमारा मन एक लंबी बीमारी से स्वस्थ हो रहा है, ऐसे में लोगों की भीड़ का (से) संपर्क हमारे लिए हानिकारक है। हर व्यक्ति किसी न किसी दोष को हमारे भीतर बढ़ावा देता है, हमें कोई अवगुण सिखा देता है या बिना हमारे जाने हमें उससे संक्रमित कर देता है।

 

    निस्संदेह, जितनी बड़ी भीड़ के साथ हम रहते हैं, उतना ही बड़ा खतरा होता है। अच्छे चरित्र के लिए सार्वजनिक मनोरंजन और तमाशों में बैठना सबसे अधिक विनाशकारी है क्योंकि वहाँ दृश्य का आनंद, अवगुणों को अधिक आसानी से हमारे भीतर प्रवेश करा देता है। तुम सोचोगे कि मेरा क्या मतलब है? क्या मैं वहाँ से लौटकर अधिक लालची, अधिक सत्ता-लोभी या अधिक भोग-विलासी बन जाता हूँ? इससे भी बुरा! मैं अधिक क्रूर और अमानवीय बन जाता हूँ, केवल इसलिए कि मैं इंसानों के बीच रहा हूँ।

    संयोग से मैं एक दिन दोपहर के प्रदर्शन में पहुँच गया। मुझे आशा थी कि वहाँ कुछ मनोरंजन, बुद्धिमत्ता या विश्राम मिलेगा जिससे लोगों की आँखों को रक्तपात देखने से थोड़ी राहत मिले। पर हुआ इसका बिल्कुल उलटा। पहले जो युद्ध हुए थे, वे तो तुलना में दयालु प्रतीत हुए। अब खेल-तमाशा समाप्त हो चुका था और केवल निर्मम हत्या शेष थी। लड़ने वालों को कोई सुरक्षा-कवच नहीं दिया जाता था। उनका शरीर पूरी तरह खुला रहता था इसलिए कोई भी वार व्यर्थ नहीं जाता था। लोगों को यह कार्यक्रम साधारण ग्लैडिएटर युद्धों से अधिक पसंद था। और क्यों न हो? न कोई हेलमेट, न कोई ढाल जो तलवार को रोक सके। रक्षा की क्या आवश्यकता? युद्ध-कौशल की क्या आवश्यकता? ये सब तो केवल मृत्यु को देर से आने देते हैं। सुबह मनुष्यों को शेरों और भालुओं के सामने फेंका जाता है...।  दोपहर में उन्हें दर्शकों के सामने फेंका जाता है। जो मारते हैं, उन्हें स्वयं दूसरे हत्यारों के सामने मरने के लिए भेज दिया जाता है। विजेता को भी अगली हत्या के लिए रोक लिया जाता है। अखाड़े से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है — मृत्यु। तलवार और अग्नि ही उस समय का व्यवसाय बन जाते हैं। और यह सब तब भी चलता रहता है जब अखाड़ा लगभग खाली होता है।

    (कोई कह प्रश्न करता है) "लेकिन उसने डकैती की थी! उसने किसी की हत्या की थी!" तो क्या? यदि वह हत्यारा था तो शायद वह इस दंड का पात्र था। लेकिन तुमने क्या अपराध किया है कि तुम्हें यह सब देखने का दंड मिले?

    (लोग चिल्लाते हैं) "उसे मारो! उसे कोड़े लगाओ! उसे जला दो! वह तलवार पर झपटने में इतना डर क्यों रहा है? वह साहसपूर्वक मर क्यों नहीं जाता? उसे कोड़ों से युद्ध में धकेलो! उन्हें खुली छाती के साथ एक-दूसरे के प्रहार सहने दो!" और जब प्रदर्शन में थोड़ी देर का विराम होता है तो घोषणा होती है, "तब तक कुछ लोगों के गले काट दिए जाएँ ताकि मनोरंजन चलता रहे!" क्या तुम यह भी नहीं समझते कि बुरे उदाहरण केवल देखने वालों को ही नहीं, उन्हें प्रस्तुत करने वालों को भी भ्रष्ट करते हैं? देवताओं का धन्यवाद करो कि जिसे तुम क्रूरता सिखा रहे हो, वह उसे सीखने में सक्षम नहीं है!

    युवा मन, जो अभी सत्य और सदाचार पर दृढ़ नहीं हुआ है, उसे भीड़ से दूर रखना चाहिए। बहुमत का अनुसरण करना बहुत आसान है। यहाँ तक कि सुकरात (Socrates), केटो (Cato) और लैलियस (Laelius) जैसे महान व्यक्तियों का चरित्र भी ऐसी भीड़ के प्रभाव से डगमगा सकता था जो उनसे बिल्कुल भिन्न थी। तो फिर हम जो अभी अपने भीतर सामंजस्य स्थापित करना ही शुरू कर रहे हैं, उन दोषों के आक्रमण का सामना कैसे कर सकते हैं जो इतनी बड़ी सेना लेकर आते हैं? विलासिता या लालच का केवल एक उदाहरण भी बहुत हानि पहुँचाता है। एक विलासी साथी धीरे-धीरे हमारे साहस और दृढ़ता को कम कर देता है। एक धनी पड़ोसी हमारी इच्छाओं को भड़का देता है। एक द्वेषपूर्ण मित्र सबसे सरल और निष्कपट स्वभाव को भी अपने विष से दूषित कर देता है। तो सोचो, जब पूरी जनता ही किसी व्यक्ति के चरित्र पर आक्रमण करे, तब क्या होगा? तुम्हें या तो उनका अनुकरण करना पड़ेगा या उनसे घृणा करनी पड़ेगी।

    दोनों ही मार्गों से बचना चाहिए। बुरों की नकल मत करो क्योंकि वे बहुत हैं और लोगों से घृणा भी मत करो क्योंकि वे तुमसे भिन्न हैं। जितना संभव हो, अपने भीतर लौट जाओ। उन लोगों के साथ समय बिताओ जो तुम्हें बेहतर बनाएँ। और उनका स्वागत करो जिन्हें तुम बेहतर बना सकते हो। यह प्रभाव पारस्परिक होता है क्योंकि लोग सिखाते हुए भी सीखते हैं।

    अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की अहंकारी इच्छा तुम्हें भीड़ के बीच भाषण देने या वाद-विवाद करने के लिए आकर्षित न करे। यदि तुम्हारे पास ऐसा ज्ञान होता जो इस भीड़ के लिए उपयुक्त होता तो मैं तुम्हें ऐसा करने को कहता। परंतु वास्तविकता यह है कि वहाँ कोई भी तुम्हें समझने योग्य नहीं है। शायद कोई एक व्यक्ति मिल जाए और उसे भी पहले शिक्षित करना पड़ेगा ताकि वह तुम्हें समझ सके।

    (तुम पूछ सकते हो) "फिर मैंने यह सब किसके लिए सीखा?" चिंता मत करो। यदि तुमने यह सब अपने लिए सीखा है तो तुम्हारा समय व्यर्थ नहीं गया। और ताकि आज का मेरा अध्ययन केवल मेरे लिए न रहे, मैं तुम्हारे साथ तीन उत्कृष्ट कथन साझा करता हूँ।

    डेमोक्रिटस (Democritus) कहता है, "मेरे लिए एक व्यक्ति एक राष्ट्र के समान है और एक राष्ट्र एक व्यक्ति के समान।"

    जब एक अज्ञात लेखक से पूछा गया कि कला के ऐसे काम में आपने इतनी मेहनत या प्रयास क्यों किया है जिसे बहुत काम लोग देख पाएँगे तब उन्होंने बढ़िया बात कही, "कुछ लोग पर्याप्त हैं, एक व्यक्ति पर्याप्त है और कभी-कभी कोई भी न हो... तो भी पर्याप्त है।"

    तीसरा कथन विशेष रूप से सुंदर है। एपीक्यूरस (Epicurus) ने अपने एक दार्शनिक मित्र को लिखा, "मैं यह बहुतों के लिए नहीं, तुम्हारे लिए लिखता हूँ क्योंकि तुम और मैं एक-दूसरे के लिए पर्याप्त श्रोता हैं।"

    प्रिय लुसीलियस, इन वचनों को अपने मन में रखो ताकि तुम बहुसंख्यकों की प्रशंसा से मिलने वाले सुख को तुच्छ समझो। बहुत-से लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं पर क्या इससे तुम्हें स्वयं पर संतोष करने का कारण मिल जाता है, यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे बहुत-से लोग आसानी से समझ सकते हैं? अपने श्रेष्ठ गुणों को बाहर नहीं, भीतर की ओर निर्देशित करो।

अभी के लिए विदा

सेनेका 

आशा, भय एवं शंका के संदर्भ में -- पत्र - 13

प्रिय लूसीलियस   मैं जानता हूँ कि तुममें साहस और आत्मबल की कोई कमी नहीं है। उन शिक्षाओं से स्वयं को सुसज्जित करने से पहले भी जो मन को स्वस्थ...