Wednesday, 12 August 2026

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 1 (अध्याय दो)

 

जॉन का जन्मदिन मार्च 1935 में शनिवार के दिन पड़ा था। उस जन्मदिन की सुबह जब उसकी आँख खुली, तो उसे महसूस हुआ कि उसके आस-पास की हवा में कोई अनिष्ट छिपा हुआ है, मानो उसके भीतर कुछ ऐसा घट चुका हो, जिसे अब किसी भी तरह पलटा नहीं जा सकता। वह अपने सिर के ठीक ऊपर छत पर पड़े पीले दाग को घूरता रहा। रॉय अभी भी बिस्तर की चादरों में पूरी तरह दुबका हुआ था और उसकी साँसें धीमी, सीटी जैसी आवाज़ के साथ आ-जा रही थीं। घर में और कहीं कोई आवाज़ नहीं थी। अभी तक कोई भी नहीं जागा था। पड़ोसियों के रेडियो भी खामोश थे और उसकी माँ अभी तक उसके पिता का नाश्ता बनाने के लिए नहीं उठी थी। जॉन को अपनी इस घबराहट पर आश्चर्य हुआ। फिर उसे समय का खयाल आया और तभी जब छत का वह पीला दाग धीरे-धीरे एक नग्न स्त्री के शरीर का रूप लेने लगा। उसे याद आया कि आज उसका चौदहवाँ जन्मदिन है और उसने पाप किया है।

By Carl Van Vechen

            फिर भी उसका पहला विचार था, “क्या किसी को याद रहेगा?” क्योंकि ऐसा एक-दो बार हो चुका था कि उसका जन्मदिन पूरी तरह किसी की नज़र में आए बिना बीत गया था और किसी ने भी यह नहीं कहा था, “जन्मदिन मुबारक हो, जॉनी,” न ही उसे कुछ दिया था। यहाँ तक कि उसकी माँ ने भी नहीं।

रॉय फिर से हिला और जॉन ने उसे अपने से दूर कर दिया तथा सन्नाटे को सुनता रहा। दूसरी सुबहों में जब उसकी आँख खुलती थी तो वह अपनी माँ को रसोई में गाते हुए सुनता था। अपने पीछे वाले कमरे में कपड़े पहनते समय अपने पिता को कराहते और मन-ही-मन प्रार्थनाएँ बुदबुदाते हुए सुनता था। कभी-कभी सारा की बातचीत और रूथ के चीख-चीखकर रोने की आवाज़ भी सुनाई देती थी। रेडियो बज रहे होते, बर्तन और कड़ाहियाँ खड़खड़ा रहे होते और आस-पास के सभी लोगों की आवाज़ें सुनाई देती थीं। लेकिन आज सुबह तो बिस्तर के स्प्रिंग की चरमराहट तक ने इस सन्नाटे को भंग नहीं किया। इसलिए जॉन को ऐसा लग रहा था, मानो वह अपने ही उस अनकहे विनाश को सुन रहा हो। उसे लगभग विश्वास हो चला था कि वह उस महान “उठ खड़े होने वाले दिन” की सुबह देर से जागा है। उसे लगा सभी उद्धार पाए हुए लोग पलक झपकते ही रूपांतरित हो गए हैं और बादलों में यीशु से मिलने के लिए उठ गए हैं। जबकि वह अपने पापी शरीर के साथ पीछे छूट गया है ताकि उसे एक हज़ार वर्षों तक नरक में बाँधकर रखा जाए।

उसने पाप किया था। संतों, अपनी माँ और अपने पिता की मौजूदगी के बावजूद। उन चेतावनियों के बावजूद जिन्हें उसने अपने जीवन की शुरुआत से ही सुना था। उसने अपने हाथों से ऐसा पाप किया था जिसे क्षमा करना कठिन था। स्कूल के शौचालय में अकेले, वह उन लड़कों के बारे में सोच रहा था जो उससे उम्र में बड़े, कद में ऊँचे और अधिक निडर थे और जो आपस में यह शर्त लगाया करते थे कि किसका पेशाब सबसे ऊँची मेहराब बनाते हुए दूर तक जाएगा। वहीं उसने अपने भीतर हो रहे एक ऐसे परिवर्तन को देखा था, जिसके बारे में वह कभी किसी से कहने का हिम्मत नहीं कर सकता था।

जॉन के पाप का अँधेरा शनिवार की शाम को चर्च के भीतर छाए अँधेरे जैसा था। उस सन्नाटे जैसा, जो चर्च में तब होता था जब वह वहाँ अकेला होता था। वह झाड़ू लगाता, बड़े बाल्टी में पानी भरता और कुर्सियों को उलट-पलटकर ठीक करता, उस समय से बहुत पहले, जब संत लोग वहाँ आते थे। यह उस उपासना घर (tabernacle) के भीतर रहते हुए उसके मन में उठने वाले विचारों जैसा था, जिसमें उसका पूरा जीवन बीता था। उस उपासना घर जैसा, जिससे वह घृणा भी करता था। लेकिन प्रेम भी करता था और डरता भी था। यह रॉय की गालियों जैसा था। उन गालियों की वे प्रतिध्वनियाँ जैसी थीं जो जॉन के भीतर उठती थीं। उसे याद आया कि किसी दुर्लभ शनिवार को, जब रॉय जॉन की चर्च साफ करने में मदद करने आया था, तब उसने ईश्वर के घर में ही गालियाँ दी थीं और यीशु की आँखों के सामने अश्लील इशारे किए थे। उसका पाप इन सब चीज़ों जैसा था। उन दीवारों जैसा भी, जो सब कुछ देखती थीं और उन दीवारों पर लगे पोस्टरों जैसा, जो यह गवाही देते थे कि पाप की मज़दूरी मृत्यु है। उसके पाप का अँधेरा उस कठोर हृदयता में था, जिसके कारण वह ईश्वर की शक्ति का प्रतिरोध करता था। उस उपहास में था जो अक्सर उसके भीतर तब उठता था, जब वह उन लोगों की रोती, टूटती हुई आवाज़ें सुनता था और देखता था कि उनकी काली त्वचा पसीने से चमक रही है, जब वे अपने हाथ ऊपर उठाते और प्रभु के सामने मुँह के बल गिर पड़ते थे। क्योंकि उसने अपना निर्णय कर लिया था। वह अपने पिता जैसा नहीं बनेगा, न अपने पिता के पिता जैसा। उसका जीवन अलग होगा।

क्योंकि जॉन पढ़ाई में बहुत अच्छा था, हालाँकि एलिशा की तरह गणित या बास्केटबॉल में नहीं। लोग कहते थे कि उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है। वह अपने लोगों का एक महान नेता बन सकता है। जॉन को अपने लोगों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी और उन्हें कहीं नेतृत्व देकर ले जाने में तो उससे भी कम। लेकिन यह वाक्य, जो वह बार-बार सुनता आया था, उसके मन में एक विशाल पीतल के फाटक की तरह उभरता था, जो उसके लिए बाहर की ओर खुल रहा था। एक ऐसी दुनिया की ओर, जहाँ लोग उसके पिता के घर के अँधेरे में नहीं रहते थेजहाँ उसके पिता के चर्च के अँधेरे में यीशु से प्रार्थना नहीं करते थेजहाँ वह अच्छा खाना खाता, बढ़िया कपड़े पहनता और जितनी बार चाहता, सिनेमा देखने जाता। उस दुनिया में जॉन, जिसे उसके पिता बदसूरत कहते थे, जो अपनी कक्षा में हमेशा सबसे छोटा लड़का होता था और जिसका कोई दोस्त नहीं था अचानक सुंदर, लंबा और लोकप्रिय हो जाता था। लोग जॉन ग्राइम्स से मिलने के लिए एक-दूसरे से आगे बढ़कर आतुर हो जाते थे। वह कवि होता या किसी कॉलेज का अध्यक्ष या फिल्मी सितारा। वह महँगी व्हिस्की पीता और हरे पैकेट वाली लकी स्ट्राइक सिगरेट पीता।

जॉन की प्रशंसा केवल अश्वेत लोग ही नहीं करते थे क्योंकि जॉन को लगता था कि वे किसी भी हालत में उसे वास्तव में जान नहीं सकते। बल्कि श्वेत लोग भी ऐसा कहते थे... बल्कि सबसे पहले उन्होंने ही यह बात कही थी और अब भी कहते थे। जब जॉन पाँच साल का था और पहली कक्षा में पढ़ता था, तभी पहली बार किसी की नज़र उस पर पड़ी थी। चूँकि जिस नज़र ने उसे देखा था, वह पूरी तरह अपरिचित और निर्वैयक्तिक थी। इसलिए पहली बार उसे बेचैनी के साथ अपने अलग, स्वतंत्र अस्तित्व का एहसास होने लगा।

उस दिन वे वर्णमाला सीख रहे थे। एक बार में छह बच्चों को ब्लैकबोर्ड के पास भेजा जाता था ताकि बच्चे वे अक्षर लिखें जिन्हें उन्होंने याद किया था। छह बच्चे लिख चुके थे और अध्यापक के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे कि तभी पीछे का दरवाज़ा खुला और स्कूल की प्रधानाचार्य कमरे में दाखिल हुई। उससे हर कोई बहुत डरता था। कोई भी कुछ नहीं बोला, न ही कोई हिला। उस सन्नाटे में प्रधानाचार्य की आवाज़ गूँजी:

वह बच्चा कौन है?”

वह ब्लैकबोर्ड पर लिखे जॉन के अक्षरों की ओर इशारा कर रही थी। उसके द्वारा ध्यान दिए जाने को कोई विशेष सम्मान या पहचान मिलने की संभावना जॉन के मन में आई ही नहीं। इसलिए वह बस उसे घूरता रहा। फिर उसने दूसरे बच्चों की स्थिरता और इस बात से समझ लिया कि वे उसकी ओर देखने से बच रहे थे कि चुना तो उसी को गया है, सज़ा देने के लिए।

बोलो, जॉन,” अध्यापिका ने धीरे से कहा।

उसकी आँखों में आँसू आने ही वाले थे। उसने धीमी आवाज़ में अपना नाम बुदबुदाया और प्रतीक्षा करने लगा। सफेद बालों और लोहे जैसी कठोर मुखाकृति वाली प्रधानाचार्या ने नीचे झुककर उसकी ओर देखा।

तुम बहुत होशियार लड़के हो, जॉन ग्राइम्स,” उसने कहा। “अच्छा काम करते रहो।”

फिर वह कमरे से बाहर चली गई।

उस पल ने उस समय से आगे के लिए उसे, यदि हथियार नहीं तो कम-से-कम एक ढाल अवश्य दे दी थी। उसे पूरी तरह बिना किसी विश्वास या समझ के यह एहसास हो गया था कि उसके भीतर एक ऐसी शक्ति है जो दूसरे लोगों में नहीं है। वह इस शक्ति का उपयोग स्वयं को बचाने और स्वयं को ऊपर उठाने के लिए कर सकता है। शायद इसी शक्ति के बल पर एक दिन वह वह प्रेम पा सकेगा, जिसकी उसे इतने लंबे समय से तीव्र लालसा थी। जॉन के भीतर यह कोई ऐसी आस्था नहीं थी जो मृत्यु या परिवर्तन के अधीन हो सकती थी, न ही ऐसी आशा थी जिसे नष्ट किया जा सके। यह उसकी पहचान थी और इसलिए उस दुष्टता का भी एक हिस्सा थी, जिसके कारण उसका पिता उसे पीटता था और जिसे वह अपने पिता का सामना करने के लिए अपने भीतर थामे रहता था। उसके पिता की बाँह ऊपर उठती और फिर नीचे आती तो जॉन रो पड़ता। उसके पिता की आवाज़ उसे काँपने पर मजबूर कर देती। फिर भी उसका पिता कभी पूरी तरह विजयी नहीं हो सकता था क्योंकि जॉन अपने भीतर ऐसी कोई चीज़ सँजोए हुए था, जिस तक उसका पिता पहुँच नहीं सकता था। वह अपने भीतर अपनी घृणा और अपनी बुद्धि को सँजोए हुए था। दोनों एक-दूसरे को पोषित करती थीं। वह उस दिन के लिए जी रहा था जब उसका पिता मृत्युशय्या पर पड़ा होगा और वहजॉन, उसकी मृत्युशय्या के पास खड़े होकर उसे गालियाँ देगा। और यही कारण था कि यद्यपि उसका जन्म इसी आस्था में हुआ था, यद्यपि उसका पूरा जीवन संतों, उनकी प्रार्थनाओं और उनके उल्लास से घिरा रहा था, और यद्यपि वह उपासना घर, जिसमें वे उपासना करते थे, उन अस्थिर और असुरक्षित घरों की अपेक्षा उसके लिए कहीं अधिक वास्तविक था, जिनमें वह और उसका परिवार जीवन भर रहे थे। फिर भी जॉन का हृदय प्रभु के प्रति कठोर हो गया था। उसका पिता ईश्वर का सेवक था। स्वर्ग के राजा का दूत था। जॉन अनुग्रह के सिंहासन के सामने तब तक झुक नहीं सकता था, जब तक कि उसे पहले अपने पिता के सामने घुटने न टेकने पड़ें। और ऐसा करने से उसका इनकार ही उसके जीवन का आधार बन गया था। उसके गुप्त हृदय में यह दुष्टता फलती-फूलती रही, जब तक कि वह दिन नहीं आया, जब उसका पाप पहली बार उसके सामने आ खड़ा हुआ।

 

Tuesday, 11 August 2026

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 1 (अध्याय एक)

 

मैंने दूर तक जाती राह को देखा,
और सोच में पड़ गया

हर कोई हमेशा से यही कहता आया था कि जॉन बड़ा होकर उपदेशक बनेगा, ठीक अपने पिता की तरह। यह बात इतनी बार कही गई थी कि जॉन ने, इस बारे में कभी सचमुच सोचे बिना ही, स्वयं भी इसे सच मान लिया था। अपने चौदहवें जन्मदिन की सुबह तक उसने वास्तव में इस बारे में सोचना शुरू नहीं किया था और तब तक बहुत देर हो चुकी थी।



    जॉन की सबसे आरंभिक स्मृतियाँ जो एक तरह से उसकी एकमात्र स्मृतियाँ थीं, रविवार की सुबहों की भागदौड़ और उजास से जुड़ी थीं। उस दिन वे सभी एक साथ उठते थे। उसके पिता, जिन्हें काम पर नहीं जाना होता था और जो नाश्ते से पहले उन्हें प्रार्थना करवाते थे। उसकी माँ, जो उस दिन सजती-सँवरती थी और अपने सीधे किए हुए बालों तथा सिर पर पवित्र स्त्रियों की वेशभूषा के रूप में पहनी जाने वाली, सिर से सटी सफेद टोपी में लगभग युवती जैसी लगती थी। उसका छोटा भाई रॉय, जो उस दिन चुप रहता था क्योंकि उसके पिता घर पर होते थे। सारा, जो उस दिन अपने बालों में लाल फीता लगाती थी और जिसे उसके पिता दुलारते थे। और नन्ही रूथ, जिसे गुलाबी और सफेद कपड़े पहनाए जाते थे और जो अपनी माँ की बाँहों में सवार होकर चर्च जाती थी।

    चर्च बहुत दूर नहीं था, लेनॉक्स एवेन्यू पर चार ब्लॉक आगे, अस्पताल से ज्यादा दूर नहीं, एक कोने पर। इसी अस्पताल में उसकी माँ गई थी, जब रॉय, सारा और रूथ पैदा हुए थे। जॉन को यह ठीक-ठीक याद नहीं था कि पहली बार, रॉय को जन्म देने के लिए, उसकी माँ जब वहाँ गई थी, तब क्या हुआ था। लोगों ने कहा था कि उसकी माँ के दूर रहने के पूरे समय वह रोता और हंगामा करता रहा था। उसे बस इतना ही याद था कि जब भी उसकी माँ का पेट उभरने लगता, वह डर जाता था। वह जानता था कि हर बार यह उभार तब तक नहीं थमेगा, जब तक उसकी माँ को उससे दूर ले जाकर, एक अजनबी को साथ लेकर वापस नहीं लाया जाता। हर बार ऐसा होने पर उसकी माँ स्वयं भी उसके लिए थोड़ी और अजनबी हो जाती थी। रॉय ने कहा था कि वह जल्द ही फिर कहीं जाने वाली है। ऐसी बातों के बारे में वह जॉन से कहीं अधिक जानता था। जॉन अपनी माँ को ध्यान से देख रहा था। अभी उसके पेट में कोई उभार दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन एक सुबह उसके पिता ने प्रार्थना में कहा था कि “नन्हा यात्री शीघ्र ही उनके बीच आने वाला है,” और इसलिए जॉन जान गया कि रॉय सच कह रहा था।

    इसलिए, जॉन को जितना याद था, तब से हर रविवार की सुबह ग्राइम्स परिवार चर्च जाने के लिए सड़कों पर निकल पड़ता था। एवेन्यू के किनारे खड़े पापी लोग उन्हें देखते रहते। वे पुरुष, जिन्होंने अभी तक शनिवार की रात वाले अपने कपड़े ही पहन रखे होते थे, जो अब सिकुड़े और धूल से भरे होते, जिनकी आँखें और चेहरे मैले दिखाई देते थे और वे स्त्रियाँ, जिनकी आवाज़ें कर्कश थीं और जिन्होंने तंग, चटख कपड़े पहन रखे थे, उनकी उँगलियों के बीच सिगरेट दबी होती या होठों के कोनों में कसकर फँसी होती। वे आपस में बातें करते, हँसते और लड़ते थे। वे स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह ही लड़ती थीं। जॉन और रॉय जब उन स्त्री-पुरुषों के पास से गुजरते तो एक क्षण के लिए एक-दूसरे की ओर देखते, जॉन संकोच से और रॉय मनोरंजन के भाव से। अगर प्रभु ने उसका हृदय नहीं बदला तो बड़ा होकर रॉय भी उन्हीं जैसा होगा। रविवार की सुबह जिन स्त्री-पुरुषों के पास से वे गुजरते, उन्होंने अपनी रात शराबखानों में, वेश्यागृहों में, सड़कों पर, छतों पर या सीढ़ियों के नीचे बिताई होती थी। उन्होंने शराब पी होती थी। वे गालियों से हँसी की ओर, हँसी से क्रोध की ओर और क्रोध से वासना की ओर चले गए होते थे। एक बार उसने और रॉय ने एक जर्जर घोषित किए जा चुके मकान के तहखाने में एक स्त्री और पुरुष को देखा था। वे खड़े-खड़े ही संभोग कर रहे थे। उस स्त्री ने पचास सेंट माँगे थे और उस पुरुष ने उस्तरा चमका दिया था।

    जॉन ने फिर कभी उन्हें नहीं देखा। वह डर गया था। लेकिन रॉय ने उन्हें कई बार देखा था और उसने जॉन से कहा था कि उसने गली के नीचे रहने वाली कुछ लड़कियों के साथ ऐसा किया था।

    और उसके माँ और पिता भी, जो हर रविवार चर्च जाते थे, ऐसा करते थे। कभी-कभी जॉन उनके पीछे वाले शयनकक्ष से उनकी आवाज़ें सुनता था। चूहों के पैरों की आहट और उनकी चीख़ों, तथा नीचे रहने वाली वेश्या के घर से आती संगीत और गालियों की आवाज़ों के बीच।

    उनके चर्च का नाम “टेंपल ऑफ द फायर बैप्टाइज़्ड” था। वह हार्लेम का न तो सबसे बड़ा चर्च था, न ही सबसे छोटा। लेकिन जॉन का पालन-पोषण इस विश्वास के साथ हुआ था कि यही सबसे पवित्र और सबसे श्रेष्ठ चर्च है। उसके पिता इस चर्च के मुख्य डीकन[1] थे।  कुल दो डीकन थे। दूसरे का नाम डीकन ब्रेथवेट था, जो गोल-मटोल अश्वेत व्यक्ति था। जॉन के पिता चर्च में दान एकत्र करते थे और कभी-कभी प्रवचन भी देते थे। चर्च के पादरी फादर जेम्स हँसमुख और खाते-पीते, भरे-पूरे शरीर वाले व्यक्ति थे, जिनका चेहरा किसी गहरे रंग के चाँद जैसा था। पेंटेकोस्ट के रविवारों को प्रवचन वही देते थे, गर्मियों में धार्मिक पुनर्जागरण सभाएँ [2](revivals) वही आयोजित करते थे, वे बीमारों का अभिषेक कर उन्हें चंगा करते थे।

            रविवार की सुबह और रविवार की रात चर्च हमेशा लोगों से भरा रहता था। विशेष रविवारों को तो पूरे दिन वहाँ भीड़ रहती थी। ग्राइम्स परिवार हमेशा एक साथ चर्च पहुँचता था। लेकिन हमेशा थोड़ा देर से, आमतौर पर रविवार के स्कूल के बीच में, जो सुबह नौ बजे शुरू होता था। इस देर से पहुँचने के लिए हमेशा उनकी माँ ही जिम्मेदार ठहराई जाती थी। कम-से-कम उनके पिता की नज़र में। वह कभी भी खुद को और बच्चों को समय पर तैयार नहीं कर पाती थीं। कभी-कभी तो वह घर पर ही रह जाती थीं और सुबह की मुख्य प्रार्थना-सभा तक चर्च में दिखाई नहीं देती थीं। जब वे सब एक साथ पहुँचते तो दरवाज़े के भीतर प्रवेश करते ही अलग-अलग हो जाते। पिता और माँ वयस्कों के वर्ग[3] में जाकर बैठते, जिसे सिस्टर मैककैंडलेस पढ़ाती थीं। सारा शिशु-वर्ग में चली जाती और जॉन और रॉय छोटे बच्चों से कुछ बड़े बच्चों के वर्ग में बैठते, जिसे ब्रदर एलिशा पढ़ाते थे।

            जब जॉन छोटा था, तब वह रविवार के स्कूल में पढ़ाई पर कोई ध्यान नहीं देता था और गोल्डन टेक्स्ट’ (मुख्य बाइबिल-वचन) हमेशा भूल जाता था, जिसके कारण उसके पिता उस पर बहुत क्रोधित होते थे। अपने चौदहवें जन्मदिन के आस-पास, जब चर्च और घर, दोनों का दबाव मिलकर उसे वेदी के सामने आत्मसमर्पण करने की ओर धकेल रहा था, तब उसने अधिक गंभीर और इसलिए कम ध्यान आकर्षित करने वाला दिखने की कोशिश की। लेकिन उसका ध्यान उसके नए शिक्षक एलिशा की ओर भटक जाता था। एलिशा पादरी के भतीजे थे और अभी हाल ही में जॉर्जिया से आए थे। वे जॉन से बहुत अधिक बड़े नहीं थे। सिर्फ सत्रह वर्ष के थे और वे पहले ही “उद्धार पा चुके” थे तथा उपदेशक भी थे। पूरे पाठ के दौरान जॉन, एलिशा को ही निहारता रहता था। उसे एलिशा की आवाज़ की गहराई बहुत आकर्षित करती थी, जो उसकी अपनी आवाज़ से कहीं अधिक गहरी और मर्दाना थी। वह एलिशा के रविवार वाले सूट में उनकी दुबली काया, शालीनता, शक्ति और साँवले रंग को निहारता रहता था और सोचता था कि क्या वह भी कभी उतना पवित्र हो पाएगा, जितने एलिशा थे। लेकिन वह पाठ पर ध्यान नहीं दे पाता था। कभी-कभी जब एलिशा रुककर जॉन से कोई प्रश्न पूछते तो जॉन शर्म और उलझन में पड़ जाता। उसे लगता कि उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग रही हैं और उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा है। एलिशा मुस्कराते हुए उसे हल्के से डाँटते और फिर पाठ आगे चलता रहता था।

            रॉय को भी अपनी रविवार की स्कूल की पाठ-शिक्षा कभी याद नहीं रहती थी, लेकिन रॉय के मामले में बात अलग थी। कोई भी वास्तव में रॉय से वह अपेक्षा नहीं करता था, जो जॉन से की जाती थी। हर कोई हमेशा प्रार्थना करता रहता था कि प्रभु रॉय के हृदय को बदल दें। लेकिन जॉन से अपेक्षा की जाती थी कि वह अच्छा बने। दूसरों के लिए एक अच्छा उदाहरण बने।

            रविवार के स्कूल की सभा समाप्त होने के बाद सुबह की मुख्य प्रार्थना-सभा शुरू होने से पहले थोड़ी देर का विराम होता था। इस दौरान, यदि मौसम अच्छा होता तो बुज़ुर्ग लोग कुछ देर के लिए बाहर निकलकर आपस में बातें कर लेते थे। चर्च की बहनें लगभग हमेशा सिर से पैर तक सफेद वस्त्रों में सजी होती थीं। इस दिन, इस जगह पर और अपने बड़ों के दबाव में, छोटे बच्चे इस तरह खेलने की भरसक कोशिश करते थे कि ऐसा न लगे कि वे ईश्वर के घर का अनादर कर रहे हैं। लेकिन कभी-कभी, घबराहट या शरारत के कारण, वे चिल्लाने लगते, भजन की किताबें फेंक देते या रोने लगते। तब उनके माता-पिता, चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ और चाहे वे ईश्वर की सेवा में समर्पित ही क्यों न हों, इस बात को साबित करने के लिए विवश हो जाते कि किसी पवित्र परिवार में आखिर हुकूमत किसकी चलती है, कठोरता से या प्यार से। जॉन और रॉय जैसे बड़े बच्चे एवेन्यू पर थोड़ी दूर तक घूम सकते थे। लेकिन बहुत दूर नहीं। उनके पिता जॉन और रॉय को अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देते थे क्योंकि रॉय अक्सर रविवार के स्कूल और सुबह की मुख्य सभा के बीच गायब हो जाता था और फिर पूरे दिन वापस नहीं लौटता था।

            रविवार की सुबह की सभा तब शुरू होती थी, जब ब्रदर एलिशा पियानो पर बैठकर एक भजन छेड़ते थे। यह क्षण और यह संगीत जॉन के साथ मानो तब से थे, जब उसने पहली बार साँस ली थी। ऐसा लगता था कि ऐसा कोई समय कभी था ही नहीं, जब वह इस क्षण से परिचित न रहा हो। जब ठसाठस भरा चर्च एक पल के इंतज़ार में थम जाता था। सफेद कपड़ों में सजी बहनें सिर उठाए रहतीं, नीले कपड़े पहने भाई सिर पीछे किए खड़े रहते। स्त्रियों की सफेद टोपियाँ उस उत्तेजना से भरी हवा में मुकुटों की तरह चमकती हुई लगतीं। पुरुषों के घुँघराले, चमकते बालों वाले सिर मानो ऊपर उठे हुए दिखाई देते। खड़खड़ाहट और फुसफुसाहट थम जाती और बच्चे शांत हो जाते। शायद कोई खाँस देता या कार के हॉर्न की आवाज़ भीतर आ जाती या सड़क से किसी की गाली सुनाई दे जाती। फिर एलिशा एकाएक पियानो की कुंजियों पर उँगलियाँ रख देते और गाना शुरू कर देते और पूरा चर्च उनके साथ गाने लगता। लोग तालियाँ बजाते, उठ खड़े होते और डफली बजाते।

भजन कुछ ऐसा होगा, उस क्रूस के नीचे, जहाँ मेरे उद्धारकर्ता ने प्राण दिए!” या यीशु, मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा कि तुमने मुझे कैसे मुक्त किया!” या हे प्रभु, जब तक मैं जीवन की इस दौड़ में दौड़ता रहूँ, मेरा हाथ थामे रखना!”

            वे अपने भीतर की पूरी शक्ति लगाकर गाते और आनंद से तालियाँ बजाते थे। जॉन को ऐसा कोई समय याद नहीं था, जब उसने संतों को इस तरह आनंद मनाते हुए न देखा हो और उसके हृदय में भय और विस्मय न भर गया हो। उनका गायन जॉन को प्रभु की उपस्थिति में विश्वास करने के लिए विवश कर देता था। बल्कि यह अब विश्वास का प्रश्न ही नहीं रह गया था क्योंकि वे अपने गायन से उस उपस्थिति को साकार कर देते थे। वे जिस आनंद को महसूस करते थे, जॉन स्वयं उसे महसूस नहीं करता था, फिर भी वह इस बात पर संदेह नहीं कर सकता था कि उनके लिए वही आनंद जीवन की सच्ची रोटी था। कम-से-कम तब तक तो नहीं, जब तक संदेह करने में बहुत देर हो चुकी थी। उनके चेहरों और आवाज़ों में, उनके शरीरों की लय में और उस हवा में कुछ घटित हो जाता था जिसे वे साँसों में भरते थे। ऐसा लगता था मानो वे जहाँ कहीं भी हों, वही स्थान ऊपरी कक्ष में बदल गया हो और पवित्र आत्मा हवा पर सवार होकर वहाँ विचरण कर रहा हो। उसके पिता का चेहरा, जो हमेशा ही भयावह लगता था, अब और भी भयावह हो जाता था। उसके पिता का रोज़ का क्रोध अब भविष्यवक्ता के प्रचंड क्रोध में बदल जाता था। उसकी माँ अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाए, हाथों को सामने धनुषाकार किए, उन्हें लय में हिलाती हुई, जॉन के लिए उस धैर्य, उस सहनशीलता और उस दीर्घ-सहनशीलता को साकार कर देती थी, जिसके बारे में उसने बाइबिल में पढ़ा था। लेकिन जिसकी कल्पना करना उसके लिए बहुत कठिन था।

            रविवार की सुबहें ऐसी होती थीं कि सभी स्त्रियाँ मानो धैर्य की प्रतिमूर्ति लगती थीं और सभी पुरुष शक्तिशाली दिखाई देते थे। जॉन देखता रहता, तभी वह शक्ति किसी पुरुष या स्त्री पर आ पड़ती। वे चीख उठते—एक लंबी, शब्दहीन चीख और बाँहों को पंखों की तरह फैलाकर “शाउट”[4] करने लगते। कोई व्यक्ति उन्हें जगह देने के लिए अपनी कुर्सी थोड़ी खिसका देता। लय एक क्षण के लिए थम जाती, गायन रुक जाता। केवल पैरों की धमक और तालियों की आवाज़ सुनाई देती। फिर एक और चीख उठती, एक और नर्तक आगे आता। फिर डफली बजने लगती, आवाज़ें फिर ऊँची होने लगतीं और संगीत फिर उसी तरह बहने लगता जैसे, आग, बाढ़ या न्याय का प्रचंड वेग। तब चर्च मानो अपने भीतर समाई उस शक्ति से फूलने लगता और जैसे अंतरिक्ष में झूलता हुआ कोई ग्रह हो, वैसे ही मंदिर भी ईश्वर की शक्ति के साथ झूमने लगता। जॉन देखता रहता। चेहरों को, भारहीन-से शरीरों को और उन कालातीत चीखों को सुनता रहता। सब लोग कहते थे कि एक दिन यह शक्ति उसे भी अपने वश में कर लेगी। तब वह भी उन्हीं की तरह गाएगा और चीखेगा और अपने राजा के सामने नाचेगा। वह युवा एला मे वॉशिंगटन को देख रहा था। प्रेइंग मदर वॉशिंगटन की सत्रह वर्षीय पोती जब नाचना शुरू करती है और फिर एलिशा भी नाचने लगता।

            एक क्षण ऐसा आया जब उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका रखा था, आँखें बंद थीं और माथे पर पसीने की बूँदें उभर आई थीं। वह पियानो पर बैठा गा और बजा रहा था। फिर, जैसे जंगल में संकट में फँसी कोई विशाल, काली बिल्ली अकड़कर काँपने लगे, वैसे ही उसका शरीर तन गया और काँप उठा और वह चीख पड़ा— यीशु, यीशु, हे प्रभु यीशु!” उसने पियानो पर आखिरी, उन्मत्त स्वर बजाया और दोनों हाथ ऊपर उठा दिए।  हथेलियाँ ऊपर की ओर थीं और बाँहें पूरी तरह फैली हुई थीं। उसके मौन हो चुके पियानो से पैदा हुए खालीपन को डफली की आवाज़ों ने दौड़कर भर दिया। उसकी चीख के उत्तर में चारों ओर से दूसरी चीखें उठने लगीं। फिर वह अपने पैरों पर खड़ा हो गया। वह घूम रहा था जैसे, उसे कुछ दिखाई न दे रहा हो। उसका चेहरा खून से भर आया था। इस उग्र आवेश में विकृत हो गया था। उसकी लंबी, साँवली गर्दन की मांसपेशियाँ उभर-उभरकर फड़क रही थीं। ऐसा लगता था मानो वह साँस नहीं ले पा रहा हो, मानो उसका शरीर इस आवेग को समेट पाने में असमर्थ हो, मानो सबकी आँखों के सामने वह स्वयं को उस प्रतीक्षारत हवा में बिखेर देगा। उसके हाथ, जिनकी उँगलियों के सिरों तक तनाव जड़ हो गया था, बाहर की ओर जाते और फिर उसकी कमर के पास लौट आते। उसकी दृष्टिहीन आँखें ऊपर की ओर उठी हुई थीं और वह नाचने लगा। फिर उसकी मुट्ठियाँ बँध गईं और उसका सिर झटके से नीचे की ओर झुक गया। उसके पसीने ने उसके बालों पर चिपकी चिकनाई को ढीला कर दिया। बाकी सभी लोगों की लय भी एलिशा की लय से ताल मिलाने के लिए तेज़ हो गई। उसके सूट के कपड़े पर उसकी जाँघें उन्मत्त ढंग से हिल रही थीं। उसकी एड़ियाँ फर्श पर पड़ रही थीं। उसकी मुट्ठियाँ उसके शरीर के दोनों ओर इस तरह चल रही थीं, मानो वह अपना ही ढोल बजा रहा हो। और इस तरह कुछ देर तक वह नर्तकों के बीचोंबीच सिर झुकाए, मुट्ठियों से ताल देता हुआ, लगातारलगातार इतनी तीव्रता से नाचता रहा कि सहना मुश्किल हो जाए। जब तक कि ऐसा लगने नहीं लगा कि केवल इस प्रचंड शोर से ही चर्च की दीवारें ढह जाएँगी। और फिर, एक क्षण में, एक चीख के साथ उसका सिर ऊपर उठा, बाँहें हवा में ऊँची उठ गईं। उसके माथे से पसीना धारों की तरह बहने लगा। उसका पूरा शरीर इस तरह नाचने लगा, मानो वह कभी रुकने वाला ही न हो। कभी-कभी वह तब तक नहीं रुकता था, जब तक गिर नहीं पड़ता। जब तक किसी हथौड़े से गिराए गए जानवर की तरह कराहता हुआ मुँह के बल ज़मीन पर नहीं गिर जाता। और तब पूरे चर्च में एक गहरी, सामूहिक कराह भर जाती थी।

            उनके बीच पाप था। एक रविवार, जब नियमित प्रार्थना-सभा समाप्त हो चुकी थी, फादर जेम्स ने धर्मनिष्ठ माने जाने वाले इस समुदाय के बीच छिपे पाप को उजागर कर दिया। उन्होंने एलिशा और एला मे के बारे में सबके सामने कहा। वे “अनुचित आचरण कर रहे थे।” उन्हें सत्य के मार्ग से भटक जाने का खतरा था। जब फादर जेम्स उस पाप के बारे में बोल रहे थे, जिसे वे जानते थे कि उन्होंने अभी तक किया नहीं था, उस अधपके अंजीर के बारे में, जिसे पेड़ से समय से पहले तोड़ लिया जाए और जिससे बच्चों के दाँत खट्टे हो जाएँ। तब जॉन को अपनी जगह बैठे-बैठे चक्कर-सा आने लगा। वह एलिशा की ओर देख भी नहीं पा रहा था, जो वेदी के सामने एला मे के पास खड़ा था। फादर जेम्स के बोलते समय एलिशा ने अपना सिर झुका रखा था और सभा में धीमी-धीमी फुसफुसाहट होने लगी थी। एला मे भी अब उतनी सुंदर नहीं लग रही थी, जितनी वह गाते और अपने विश्वास की गवाही देते समय लगती थी। अब वह एक रूखी, साधारण-सी लड़की दिखाई दे रही थी। उसके भरे हुए होंठ ढीले पड़ गए थे और उसकी आँखें काली थीं— शर्म से, क्रोध से, या दोनों से। उसकी दादी, जिसने उसका पालन-पोषण किया था, हाथ बाँधे चुपचाप बैठी देख रही थी। वह चर्च के प्रमुख स्तंभों में से एक थीं। एक प्रभावशाली प्रचारिका और बहुत प्रसिद्ध धार्मिक महिला। उन्होंने एला मे के बचाव में कुछ नहीं कहा क्योंकि उन्हें भी, पूरी सभा की तरह लगा होगा कि फादर जेम्स केवल अपने उस स्पष्ट और पीड़ादायक कर्तव्य का पालन कर रहे थे, जिसे निभाना उनके लिए आवश्यक था। आखिर एलिशा की जिम्मेदारी फादर जेम्स की थी जैसे एला मे की जिम्मेदारी प्रेइंग मदर वॉशिंगटन की थी। फादर जेम्स ने कहा कि किसी धार्मिक समुदाय के चरवाहे का पादरी होना आसान काम नहीं था। बाहर से यह आसान लग सकता है कि रात-दर-रात, साल-दर-साल बस वहाँ ऊपर मिम्बर[5] पर बैठा रहा जाए। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने उनके कंधों पर कितनी भयानक जिम्मेदारी रखी है। उन्हें याद रखना चाहिए कि एक दिन ईश्वर उनसे उनके झुंड की हर आत्मा का हिसाब माँगेगा। जब वे उन्हें कठोर समझें, तब यह बात याद रखें। यह भी याद रखें कि ईश्वर का वचन कठोर है और पवित्रता का मार्ग भी कठिन मार्ग है। ईश्वर की सेना में कायर हृदय के लिए कोई जगह नहीं है। और जो व्यक्ति अपनी माँ या पिता, बहन या भाई, प्रियतम या मित्र को ईश्वर की इच्छा से ऊपर रखे, उसके लिए कोई मुकुट प्रतीक्षा नहीं कर रहा। इस बात पर चर्च ‘आमेन’ कहे!” और सबने पुकारकर कहा, आमेन! आमेन!”

            फादर जेम्स ने उस लड़के और लड़की की ओर देखते हुए कहा कि प्रभु ने ही उन्हें यह समझ देने के लिए प्रेरित किया था कि बहुत देर हो जाने से पहले उन्हें सबके सामने चेतावनी दे दी जाए। क्योंकि वे जानते थे कि दोनों सच्चे और ईमानदार युवक-युवती हैं, जो प्रभु की सेवा के लिए समर्पित हैं। बस बात इतनी थी कि कम उम्र होने के कारण वे उन खतरों को नहीं जानते थे, जो शैतान अनजान और असावधान लोगों के लिए बिछाता है। वे जानते थे कि उनके मन में पाप नहीं था। अभी तक नहीं। लेकिन पाप शरीर में था। यदि वे इसी तरह अकेले एक-दूसरे के साथ घूमते रहे, अपने रहस्य बाँटते रहे, हँसते रहे और एक-दूसरे का हाथ छूते रहे तो निश्चय ही वे ऐसा पाप कर बैठेंगे जिसकी कोई क्षमा नहीं होगी। और जॉन सोचने लगा कि एलिशा क्या सोच रहा होगा। वही एलिशा, जो लंबा और सुंदर था, जो बास्केटबॉल खेलता था और जिसने ग्यारह वर्ष की उम्र में दक्षिण के उन अविश्वसनीय खेतों में प्रभु से उद्धार पाया था। क्या उसने पाप किया था? क्या वह प्रलोभित हुआ था? उसके पास खड़ी वह लड़की, जिसके सफेद वस्त्र अब उसके उभरे हुए वक्ष और दृढ़, आग्रहपूर्ण जाँघों की नग्नता को ढकने वाला अत्यंत मामूली और पतला आवरण मात्र लग रहे थे। जब वह एलिशा के साथ अकेली होती होगी, तब उसका चेहरा कैसा होता होगा? जब वहाँ कोई गायन नहीं होता होगा, जब वे संतों से घिरे हुए नहीं होते होंगे? जॉन इस बारे में सोचने से डर रहा था, फिर भी उसके अलावा वह और कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। जिस वासना के लिए उन दोनों पर आरोप लगाया गया था, उसकी तपिश अब जॉन के भीतर भी भड़कने लगी थी।

            उस रविवार के बाद एलिशा और एला मे अब हर दिन स्कूल के बाद एक-दूसरे से नहीं मिलते थे। न ही शनिवार की दोपहर सेंट्रल पार्क में घूमते या समुद्र-तट पर लेटते थे। उन दोनों के लिए यह सब अब समाप्त हो चुका था। यदि वे फिर कभी एक-दूसरे के साथ होंगे तो विवाह के बंधन में बँधकर। वे बच्चे पैदा करेंगे और उन्हें चर्च की शिक्षाओं के अनुसार पालेंगे।

यही एक पवित्र जीवन का अर्थ था। यही क्रूस के मार्ग की माँग थी। शायद उसी रविवार को... अपने जन्मदिन से कुछ ही पहले के उस रविवार को जॉन को पहली बार एहसास हुआ कि उसके सामने भी यही जीवन पड़ा है। इस बार उसने इसे केवल धुँधली-सी आशंका के रूप में नहीं बल्कि पूरी चेतना के साथ महसूस किया। एक ऐसी चीज़ के रूप में जो अब बहुत दूर नहीं थी बल्कि सामने आ रही थी... दिन-ब-दिन उसके और करीब आती जा रही थी।



[1] वह व्यक्ति जो चर्च के धार्मिक और सामुदायिक कार्यों में पादरी/पादरी के सहयोगी के रूप में सेवा करता है।

[2] ईसाई, विशेषकर प्रोटेस्टेंट/इवेंजेलिकल परंपरा में revival का अर्थ धार्मिक पुनर्जागरण या आध्यात्मिक जागरण से है। इस बैठक में लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं, प्रार्थना, भजन, उपदेश, पश्चात्ताप और धर्म में नए सिरे से समर्पण करते हैं।

[3] चर्च में बैठने की निश्चित जगह

[4] चर्च की एक विशेष धार्मिक अभिव्यक्ति/नृत्य है, जिसमें व्यक्ति धार्मिक आवेश में आकर हाथ-पाँव चलाता, नाचता, कभी चीखता और ईश्वर के प्रति अपनी भावावस्था व्यक्त करता है।

[5] चर्च में वह ऊँचा स्थान या मंच होता है जहाँ पादरी खड़े होकर बाइबिल का पाठ और प्रवचन देते हैं।

Friday, 7 August 2026

यह अनुवाद - माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि

 


लूसियस अनेयस सेनेका, जिन्हें सामान्यतः सेनेका कहा जाता है, प्राचीन रोम के महान दार्शनिक, लेखक, नाटककार और स्टोइक विचारक थे। उनका जीवन पहली शताब्दी ईस्वी के उस रोमन संसार में बीता, जहाँ सत्ता, वैभव, महत्वाकांक्षा और नैतिक संकट एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। वे केवल दर्शन के सिद्धांतकार नहीं थे। उन्होंने मनुष्य के दैनिक जीवन, उसकी इच्छाओं, भय, क्रोध, सुख, धन, मृत्यु और आत्मसंयम जैसे प्रश्नों पर अत्यंत व्यावहारिक ढंग से विचार किया। 



    उनकी प्रसिद्ध कृति लेटर्स टू लूसीलियस (Letters to Lucilius),  मॉरल लेटर्स टू लूसीलियस (Moral Letters to Lucilius) अथवा सेनेका द्वारा लूसीलियस को नीतिशास्त्र पर पत्र (Letters on Ethics) वास्तव में ऐसे दार्शनिक पत्र हैं जिनमें सेनेका अपने मित्र लूसिलियस से संवाद करते हुए जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला पर विचार करते हैं। इन पत्रों की विशेषता यह है कि दर्शन यहाँ किसी दूर की, अमूर्त वस्तु के रूप में नहीं आता. वह हमारे भोजन, धन, मित्रता, समय, इच्छाओं, आदतों और मृत्यु-बोध तक पहुँचता है। कोशिश की है कि अनुवाद में यह सब अच्छी तरह से स्पष्ट हो।

     ये पत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने होते हुए भी मनुष्य की उन समस्याओं को संबोधित करते हैं जो आज भी हमारे भीतर उपस्थित हैं। हम क्या चाहें? कितना धन पर्याप्त है? दूसरों की स्वीकृति की हमें कितनी आवश्यकता है? सुख और शुभ में क्या अंतर है? मृत्यु से क्यों डरें? अपने मन को परिस्थितियों का दास बनने से कैसे बचाएँ? सेनेका इन प्रश्नों के आसान उत्तर नहीं देते बल्कि हमें अपने जीवन की ओर नए ढंग से देखने के लिए बाध्य करते हैं।

    इन पत्रों को पढ़ते हुए हम केवल स्टोइक दर्शन नहीं सीखते। हम अपने भीतर की बेचैनी, लालसा, भय और असंतोष को पहचानना सीखते हैं। सेनेका का आग्रह है कि मनुष्य बाहरी परिस्थितियों पर अपना जीवन निर्भर न करे बल्कि अपने विवेक और चरित्र को इतना दृढ़ बनाए कि वह परिस्थितियों के बीच भी अपने भीतर स्वतंत्र रह सके। इसी कारण उनके पत्र आज भी दर्शन की पुस्तकों से अधिक एक आत्म-संवाद जैसे प्रतीत होते हैं।

    इस अनुवाद में प्राचीन चित्रों का भी प्रयोग किया है। चित्र और उनकी शैली पत्रों के समान ही है। इन चित्रों में एक विशेष प्रकार का संवाद देखने वालों के लिए प्रतीक्षारत है। अलग-अलग देशों के चित्रों का प्रयोग करते हुए संस्कृति को प्रस्तुत करने का प्रयास है। 

    अपने गहरे दुख भरे अंतराल में मेरी ओर से यह अनुवाद, मेरी दिवंगत माँ को दार्शनिक श्रद्धांजलि! 


(सेनेका के) अन्य पत्र का अंश

 प्रिय लूसीलियस 


एनियस के कुछ विचार इतने उत्कृष्ट हैं कि यद्यपि वे मैले-कुचैले लोगों के बीच लिखे गए थे, फिर भी वे इत्र लगाए हुए लोगों के बीच भी निश्चय ही सुखद लग सकते हैं। लेकिन उसकी कविताएँ कभी-कभी बहुत हास्यास्पद भी होती हैं। उदाहरण के लिए, कैथेगस के बारे में ये पंक्तियाँ— “उसके बारे में उन आम लोगों ने, जो उन दिनों जीवित थे और अपना जीवन बिताते थे, कहा कि वह जनता का सबसे श्रेष्ठ पुष्प और वाक्पटुता का सार था।” तुम निश्चिंत रहो कि जिस प्रकार की पंक्तियाँ पसंद करने वाले लोग हैं, वे सोटेरिकस के सोफों की भी प्रशंसा करेंगे।



    मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग स्वयं अत्यंत वाक्पटु हैं और एनियस के प्रति बहुत अनुरक्त हैं, उन्होंने उसकी श्रेष्ठ पंक्तियों के बजाय उसकी हास्यास्पद पंक्तियों की प्रशंसा की। उदाहरण के लिए, सिसरो ने एनियस की जिन उत्कृष्ट पंक्तियों को उद्धृत किया है, उनमें इन पंक्तियों को भी शामिल किया है। मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि कोई व्यक्ति इन पंक्तियों को लिख सकता था क्योंकि जब इनकी प्रशंसा करने वाला कोई व्यक्ति मौजूद था तो इन्हें लिखने वाला भी मिल ही सकता था। या फिर ऐसा तो नहीं कि महान वक्ता सिसरो वास्तव में अपना ही पक्ष प्रस्तुत कर रहे थे। अर्थात वे अपनी कविता को तुलना में अच्छा दिखाना चाहते थे! स्वयं सिसरो की रचनाओं में, यहाँ तक कि उनके गद्य में भी, ऐसे अंश मिलते हैं जिनसे तुम अनुमान लगा सकते हो कि एनियस को पढ़ने से उन्हें कुछ लाभ मिला था। उदाहरण के लिए, अपनी पुस्तक ‘राज्य के विषय में’ में वे लिखते हैं, “क्योंकि स्पार्टा के मेनेलाउस में एक प्रकार की मधुर-वाणी वाली विनम्रता थी,” और एक अन्य स्थान पर, “वह अपने वक्तृत्व में संक्षिप्त-वाणी का अभ्यास करता है।” 

    दोष सिसरो का नहीं बल्कि उस समय का था। जब पढ़ने के लिए ऐसी ही सामग्री उपलब्ध हो, तब उसी ढंग से बोलने से बच पाना संभव नहीं होता। लेकिन सिसरो के पास अपने लेखन में एनियस की कुछ पंक्तियों को सम्मिलित करने का एक कारण भी था। ऐसा करके वे अपनी शैली को अत्यधिक अलंकृत और परिष्कृत कहे जाने वाली आलोचना से बच जाते थे। हमारे कवि वर्जिल ने भी अपनी रचनाओं में कुछ अटपटी और भद्दी पंक्तियाँ तथा कुछ ऐसी पंक्तियाँ सम्मिलित कीं जो छंद की सामान्य सीमा से अधिक लंबी थीं ताकि एनियस के अनुयायी और उसके साहित्यिक परंपरा से जुड़े लोग नई कविता में भी प्राचीनता की एक झलक पहचान सकें।


विदा 

शुभ की प्राप्ति का मार्ग -- पत्र - 122

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुम्हें प्राचीन लोगों की बुद्धिमत्ता से अवगत करा सकता हूँ, यदि तुम इसका विरोध न करो। यदि तुम्हें उनकी सूक्ष्म विचारधारा को समझना कठिन न लगे।

    लेकिन तुम इसका विरोध नहीं करते। किसी भी पारिभाषिक जटिलता से तुम विचलित नहीं होते। तुम्हारा मन उच्च कोटि का है और केवल बड़े-बड़े विषयों से ही सरोकार नहीं रखता। फिर भी मैं इस बात की भी प्रशंसा करता हूँ कि तुम हर बात को आत्म-सुधार से जोड़कर देखते हो। तुम्हें केवल तभी अधीरता होती है, जब अत्यधिक पारिभाषिक सूक्ष्मता का कोई उपयोगी परिणाम नहीं निकलता। मैं अब यह सुनिश्चित करने का प्रयास करूँगा कि ऐसा न हो। यहाँ प्रश्न यह है कि ‘शुभ’ का बोध इंद्रिय-बोध के माध्यम से होता है या बुद्धि के माध्यम से। 



    यह प्रश्न उस मत से भी संबंधित है कि जिन प्राणियों में वाणी नहीं है और शिशुओं में ‘शुभ’ विद्यमान नहीं होता। जो लोग सुख को सर्वोच्च स्थान देते हैं, वे सभी शुभ को इंद्रियों द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु मानते हैं। इसके विपरीत, हम, जो शुभ को मन के अधीन मानते हैं, उसे बोध और बुद्धि द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु मानते हैं।

    यदि इंद्रियाँ ही शुभ का निर्धारण करतीं तो हम किसी भी सुख को अस्वीकार नहीं करते क्योंकि ऐसा कोई सुख नहीं है जो हमें आकर्षित और प्रसन्न न करता हो। इसके विपरीत, हम स्वेच्छा से कभी भी किसी पीड़ा को सहन नहीं करते, क्योंकि ऐसी कोई पीड़ा नहीं है जिसकी अनुभूति हमें अप्रिय न लगती हो। इसके अतिरिक्त, जो लोग सुख के अत्यधिक प्रेमी हैं और पीड़ा से बहुत अधिक भयभीत रहते हैं, वे आलोचना के पात्र भी नहीं होने चाहिए। फिर भी हम पेटू लोगों और कामवासना के आदी लोगों को बुरा मानते हैं और उन लोगों को तुच्छ समझते हैं जो पीड़ा के भय से हर पुरुषोचित कार्य से पीछे हट जाते हैं। यदि इंद्रियाँ ही शुभ और अशुभ का मापदंड होतीं तो ये लोग अपनी इंद्रियों की आज्ञा मानकर गलत कैसे कर सकते थे? क्योंकि तुमने तो इंद्रियों को ही यह अधिकार दे दिया है कि वे तय करें कि किस वस्तु की इच्छा करनी चाहिए और किससे बचना चाहिए। 

    लेकिन स्पष्ट रूप से यह अधिकार बुद्धि के पास है। बुद्धि ही सुखी जीवन, सद्गुण और सम्माननीयता के विषय में निर्णय करती है और इसी प्रकार शुभ और अशुभ के विषय में भी निर्णय करती है। जब हमारे विरोधी इंद्रियों को शुभ के विषय में निर्णय देने देते हैं, तो वे सबसे कम मूल्यवान अंग को श्रेष्ठ के विषय में निर्णय करने का अधिकार दे देते हैं क्योंकि इंद्रिय-बोध मंद और अस्पष्ट होता है और मनुष्यों में यह अन्य प्राणियों की तुलना में भी कम तीक्ष्ण होता है। मान लो कोई व्यक्ति बहुत छोटी-छोटी वस्तुओं में अंतर करने के लिए दृष्टि के बजाय स्पर्श का सहारा लेना चाहे! हमारे पास दृष्टि से अधिक सटीक और केंद्रित कोई दूसरी इंद्रिय नहीं है, जो हमें शुभ और अशुभ में अंतर करने में सक्षम बना सके। इसलिए तुम देख सकते हो कि जो व्यक्ति स्पर्श को परम शुभ और अशुभ का मापदंड मानता है, वह अज्ञान की गहराइयों में पड़ा हुआ है और उसने उदात्त तथा दिव्य वस्तु को नीचे धरातल पर गिरा दिया है।

    विरोधी कहता है, “ज्ञान की प्रत्येक शाखा और प्रत्येक कौशल का कोई न कोई आधार ऐसी वस्तुओं में होना चाहिए जो प्रत्यक्ष हों और इंद्रियों के लिए उपलब्ध हों। वहीं से उसका विकास और विस्तार होना चाहिए। इसी प्रकार, सुखी जीवन की भी नींव और आरंभ-बिंदु ऐसी वस्तुओं में होना चाहिए जो प्रत्यक्ष हों और इंद्रियों के लिए उपलब्ध हों। निश्चय ही तुम्हारा भी यही मत है कि सुखी जीवन का आरंभ प्रत्यक्ष वस्तुओं से ही होता है।”

    हमारा मत यह है कि सुखी होना प्रकृति के अनुरूप होना है और कोई वस्तु प्रकृति के अनुरूप है या नहीं, यह उतना ही स्पष्ट और प्रत्यक्ष है, जितना यह जानना कि कोई वस्तु साबुत और पूर्ण है या नहीं। नवजात शिशु में भी प्रकृति के अनुरूप होने का कुछ अंश होता है। लेकिन मैं इसे ‘शुभ’ नहीं बल्कि केवल ‘शुभ का आरंभ’ कहता हूँ।तुम परम शुभ, सुख... को शैशवावस्था में ही स्थापित कर देते हो। इसका परिणाम यह होता है कि जो व्यक्ति अभी-अभी जन्मा है, वह वहीं से शुरुआत करता है जहाँ पूर्णता को प्राप्त व्यक्ति अंततः पहुँचता है। तुम वृक्ष की चोटी को उसकी जड़ की जगह रख रहे हो! 

    यह कहना स्पष्ट रूप से गलत होगा कि गर्भस्थ शिशु, जो दुर्बल, अपूर्ण और अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ है और जिसका लिंग तक निर्धारित नहीं हुआ है... पहले से ही शुभ की अवस्था में है। लेकिन वास्तव में एक नवजात शिशु और माँ के गर्भ में छिपे हुए, अभी भारी-भरकम भ्रूण में कितना अंतर है? शुभ और अशुभ को समझने की दृष्टि से दोनों समान रूप से अपरिपक्व हैं। एक शिशु अभी शुभ को समझने में सक्षम नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे कोई वृक्ष या कोई अवाक् प्राणी उसे समझने में सक्षम नहीं है। फिर वृक्ष या किसी प्राणी में शुभ क्यों नहीं होता? क्योंकि वहाँ बुद्धि भी नहीं होती। इसी प्रकार शिशु में भी शुभ विद्यमान नहीं होता क्योंकि उसमें भी बुद्धि का अभाव होता है। जब उसमें बुद्धि विकसित होगी, तभी वह शुभ तक पहुँच सकेगा।

    कुछ प्राणी बुद्धि से रहित होते हैं, कुछ अभी बुद्धिसंपन्न नहीं हुए होते। कुछ बुद्धिसंपन्न तो होते हैं लेकिन उनकी बुद्धि अभी अपूर्ण होती है। इनमें से किसी में भी ‘शुभ’ विद्यमान नहीं होता। शुभ का आगमन तभी होता है जब बुद्धि का विकास होता है। तो फिर, जिन प्राणियों का मैंने अभी उल्लेख किया है, उनमें क्या अंतर है? जो प्राणी बुद्धि से रहित है, उसमें शुभ कभी भी विद्यमान नहीं होगा। जो अभी बुद्धिसंपन्न नहीं हुआ है, उसमें इस समय शुभ का होना संभव नहीं है। जो बुद्धिसंपन्न तो है। लेकिन उसकी बुद्धि अभी अपूर्ण है, उसमें शुभ का होना संभव तो है। लेकिन वास्तव में अभी शुभ उसमें विद्यमान नहीं है। लूसीलियस, मेरा आशय यह है कि ‘शुभ’ किसी भी शरीर में या जीवन की किसी भी अवस्था में नहीं पाया जाता। वह शैशवावस्था से उतना ही दूर है, जितना अंतिम अवस्था आरंभ से या पूर्ण वस्तु अपने आरंभिक रूप से दूर होती है। इसलिए किसी छोटे, कोमल और अभी विकसित होना शुरू ही हुए शरीर में शुभ नहीं होता। बिल्कुल नहीं। ठीक उसी तरह जैसे किसी बीज में शुभ नहीं होता।

    तुम इस बात को इस प्रकार भी समझ सकते हो। हम वृक्षों और पौधों के लिए भी एक प्रकार के ‘शुभ’ को स्वीकार करते हैं। यह उस समय उपस्थित नहीं होता जब उनकी पहली कोपलें धरती को चीरकर बाहर निकलती हैं। गेहूँ के लिए भी एक प्रकार का ‘शुभ’ होता है। वह न तो कोमल तने में होता है और न उस समय जब नरम बालियाँ भूसी से अलग होना शुरू करती हैं बल्कि तब होता है जब गेहूँ गर्मियों की धूप और उचित परिपक्वता से पूरी तरह पक जाता है। प्रकृति की कोई भी रचना अपने ‘शुभ’ को तब तक प्रकट नहीं करती, जब तक वह पूर्णता को प्राप्त न कर ले। इसलिए मनुष्य का ‘शुभ’ केवल उसी व्यक्ति में पाया जा सकता है, जिसमें बुद्धि पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी हो। यह ‘शुभ’ क्या है? मैं तुम्हें बताता हूँ: यह ऐसा मन है जो स्वतंत्र और सत्यनिष्ठ है, जो अन्य सभी वस्तुओं को अपने से नीचे रखता है। लेकिन स्वयं को किसी के नीचे नहीं रखता। यह ‘शुभ’ शैशवावस्था की समझ से इतना परे है कि इसकी अपेक्षा किसी बच्चे से नहीं की जा सकती। न ही उचित रूप से किसी युवा वयस्क से। वृद्धावस्था तक पहुँचकर भी यदि कोई व्यक्ति लंबे और एकाग्र अध्ययन के बाद इसे प्राप्त कर ले तो यह उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी। यदि यही ‘शुभ’ है तो यह बुद्धि द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तु भी है।

    “तुमने कहा है कि वृक्षों और पौधों के लिए भी एक प्रकार का शुभ होता है तो फिर शिशुओं में भी शुभ हो सकता है।” वास्तविक शुभ वृक्षों या अवाक् प्राणियों में विद्यमान नहीं होता। इन प्राणियों में जो कुछ अच्छा होता है, उसे उदार अर्थ में ‘शुभ’ कहा जाता है। “तो फिर वह क्या है?” तुम पूछते हो। वह वही है जो प्रत्येक वस्तु की प्रकृति के अनुरूप हो। निस्संदेह, शुभ किसी अवाक् प्राणी को प्राप्त हो ही नहीं सकता बल्कि वह अधिक सौभाग्यशाली और श्रेष्ठ प्रकृति का गुण है। जहाँ बुद्धि के लिए कोई स्थान ही नहीं है, वहाँ शुभ भी नहीं हो सकता। यहाँ चार प्रकार की प्रकृतियों पर विचार करना चाहिए— वृक्षों की, प्राणियों की, मनुष्यों की और देवताओं की। इनमें अंतिम दो की प्रकृति इस अर्थ में समान है कि दोनों बुद्धिसंपन्न हैं। लेकिन उनमें यह अंतर भी है कि एक नश्वर है और दूसरा अमर। 

    इनमें से एक का अर्थात देवता का शुभ केवल प्रकृति के कारण ही पूर्ण होता है। जबकि दूसरे का अर्थात मनुष्य का, शुभ प्रयास के द्वारा पूर्ण होता है। शेष प्राणी, जिनमें बुद्धि का अभाव है केवल अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्ण होते हैं, वास्तव में पूर्ण नहीं। ऐसा इसलिए है कि निरपेक्ष पूर्णता का अर्थ सार्वभौमिक प्रकृति के अनुरूप पूर्णता है और सार्वभौमिक प्रकृति बुद्धिसंपन्न है। अन्य वस्तुएँ अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्ण हो सकती हैं। जिस प्राणी में सुखी होने की क्षमता ही नहीं है, उसमें सुख उत्पन्न करने वाली वस्तु की क्षमता भी नहीं हो सकती; और जो वस्तुएँ सुख उत्पन्न करती हैं, वे ही शुभ हैं। किसी अवाक् प्राणी में न तो सुखी होने की क्षमता होती है और न ही उस वस्तु की क्षमता जो सुख उत्पन्न करती है। इसलिए किसी अवाक् प्राणी में शुभ भी नहीं होता।

    एक प्राणी इंद्रिय-बोध के माध्यम से वर्तमान को ग्रहण करता है। वह अतीत को तभी याद करता है, जब कोई घटना उसके इस इंद्रिय-बोध को जागृत करती है। उदाहरण के लिए, जब घोड़े को उस स्थान पर ले जाया जाता है जहाँ से कोई रास्ता शुरू होता है तो उसे वह रास्ता याद आ जाता है। लेकिन अस्तबल में रहते हुए उसे उस रास्ते की कोई स्मृति नहीं होती, चाहे वह उस रास्ते से कितनी ही बार गुज़र चुका हो। समय का तीसरा भाग भविष्य, प्राणियों के लिए कोई महत्व नहीं रखता। फिर हम यह कैसे मान सकते हैं कि उन प्राणियों में पूर्ण प्रकृति संभव है, जिनका समय का अनुभव ही अपूर्ण है? 

समय के तीन भाग हैं— अतीत, वर्तमान और भविष्य। प्राणियों को इनमें से केवल वही भाग प्राप्त है जो सबसे क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है— वर्तमान। अतीत की उनकी स्मृति भी केवल कभी-कभार ही जागृत होती है और तब तक वापस नहीं आती, जब तक वर्तमान में किसी वस्तु के संपर्क से वह स्मृति जागृत न हो जाए। इसलिए पूर्ण प्रकृति का शुभ किसी अपूर्ण प्रकृति में विद्यमान नहीं हो सकता। यदि ऐसा होता, तो पौधों में भी शुभ होता। मैं यह नहीं कह रहा कि अवाक् प्राणियों में उन वस्तुओं को पाने की अत्यंत प्रबल प्रवृत्तियाँ नहीं होतीं, जो उन्हें अपनी प्रकृति के अनुरूप दिखाई देती हैं। लेकिन उनकी ये प्रवृत्तियाँ अव्यवस्थित और छिटपुट होती हैं। इसके विपरीत, शुभ कभी भी अव्यवस्थित और छिटपुट नहीं होता।

    “यह कैसे?” तुम पूछते हो। “क्या प्राणी अनियमित और अव्यवस्थित ढंग से चलते-फिरते हैं?” यदि उनकी प्रकृति में व्यवस्था के अनुसार चलने की क्षमता होती तो मैं उनकी गतिविधियों को इस प्रकार वर्णित करता। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे अपनी प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं। कोई वस्तु तभी अव्यवस्थित कही जा सकती है, जब उसमें व्यवस्थित होने की क्षमता हो। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति तभी चिंतित कहा जा सकता है, जब उसमें चिंता से मुक्त होने की संभावना हो। जिस व्यक्ति में सद्गुण की संभावना ही नहीं है, उसमें दुर्गुण भी नहीं हो सकता। प्राणियों की गतिविधियाँ उनकी प्रकृति से उत्पन्न होती हैं। इस बात को अधिक लंबा न खींचते हुए कहूँ तो किसी प्राणी में एक प्रकार का शुभ, एक प्रकार का सद्गुण और एक प्रकार की पूर्णता अवश्य होगी। लेकिन वह निरपेक्ष अर्थ में शुभ, सद्गुण या पूर्णता नहीं होगी। ये सभी केवल उन बुद्धिसंपन्न प्राणियों में पाए जाते हैं, जिन्हें कारण, सीमा और प्रक्रिया को समझने का विशेषाधिकार प्राप्त है। 

    क्या तुम सोच रहे हो कि यह चर्चा किस दिशा में जा रही है और इससे तुम्हारे मन को क्या लाभ होगा? मैं इसका उत्तर देता हूँ। इससे मन को प्रशिक्षित और तीक्ष्ण किया जाता है तथा उसकी भावी सभी गतिविधियों में उसे सही मार्ग पर बनाए रखा जाता है। इसका एक लाभ यह भी है कि यह हमें किसी दुर्गुणपूर्ण मार्ग की ओर भागने से रोकती है। मैं तुमसे यह भी कहना चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे लिए इससे बड़ा कोई लाभ नहीं कर सकता कि तुम्हें तुम्हारा अपना शुभ दिखाऊँ। तुम्हें अवाक् प्राणियों से अलग करूँ और तुम्हें दैवी प्रकृति के निकट स्थापित करूँ।

    मैं यह क्यों न कहूँ कि तुम अपने शरीर की शक्ति को क्यों सँवारते और प्रशिक्षित करते हो? प्रकृति ने पालतू और जंगली पशुओं को तुमसे अधिक शक्ति प्रदान की है। तुम अपने रूप-सौंदर्य को क्यों सँवारते हो? तुम अपनी ओर से सब कुछ कर लेने के बाद भी पशुओं जितने सुंदर नहीं हो पाओगे। तुम अपने बालों पर इतना अधिक परिश्रम क्यों करते हो? चाहे तुम उन्हें पार्थियनों की तरह खुला छोड़ो, जर्मनों की तरह बाँध लो या स्किथियनों की तरह उन्हें बिखरा हुआ रहने दो। कोई भी घोड़ा अपनी अयाल को उछालते हुए तुमसे अधिक घनी अयाल रखेगा। किसी भी सिंह की गर्दन पर खड़ी हुई अयाल अधिक सुंदर होगी। गति के लिए कितना ही अभ्यास कर लो फिर भी तुम खरगोश की बराबरी नहीं कर पाओगे। तो फिर उन सभी बातों को छोड़ क्यों नहीं देते, जिनमें तुमसे बेहतर होना निश्चित है। उन चीज़ों के पीछे भागना क्यों बंद नहीं करते जो तुम्हारी प्रकृति से बाहर हैं। उस शुभ की ओर क्यों नहीं लौटते जो वास्तव में तुम्हारा अपना है? 

    वह शुभ क्या है? बस यही... एक दोषरहित मन। ऐसा मन जो दैवी मन की बराबरी करता है, जो स्वयं को मानवीय सीमा से ऊपर उठाता है और अपने से परे किसी वस्तु को श्रेष्ठ नहीं मानता। तुम एक बुद्धिसंपन्न प्राणी हो। तो फिर तुममें शुभ क्या है? पूर्ण बुद्धि। अपनी बुद्धि को जहाँ वह अभी है, वहाँ से उसकी सर्वोच्च उपलब्धि तक ले जाओ। उसे उसकी पूरी संभव सीमा तक विकसित होने दो। जब तक तुम्हारे सभी आनंद स्वयं तुम्हारे भीतर से उत्पन्न न हों, तब तक अपने आपको सुखी मत समझो। जब तुम मनुष्यों की प्रतिस्पर्धा, लालसा और अधिकार-भावना की वस्तुओं को देखकर यह समझ लो कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम दूसरों से अधिक पाने योग्य समझो। मैं यह नहीं कहूँगा कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम पसंद कर सको बल्कि ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसके लिए तुम्हारा मन लालायित हो। तभी तुम अपने वास्तविक शुभ को प्राप्त करोगे। मैं तुम्हें स्वयं को परखने का एक संक्षिप्त नियम बताता हूँ, जिससे तुम यह जान सको कि तुमने पूर्णता प्राप्त कर ली है या नहीं। तुम्हारा अपना शुभ तब तुम्हारे पास होगा, जब तुम समझ जाओगे कि भाग्यशाली समझे जाने वाले लोग वास्तव में सबसे कम भाग्यशाली होते हैं।

विदा लूसीलियस 

दिखावा करने के बारे में -- पत्र - 121

 प्रिय लूसीलियस 


रात बहुत बीत चुकी है और मैं अपनी अल्बान हवेली पहुँच गया हूँ। यात्रा लंबी नहीं थी। लेकिन असुविधाजनक होने के कारण मैं थक गया हूँ। यहाँ मुझे कोई चीज़ तैयार नहीं मिलती, सिवाय मेरे अपने आप के। इसलिए अब मैंने अपने थके हुए शरीर को अपने अध्ययन-कक्ष में बैठा लिया है और अपने रसोइए तथा बेकर के देर से आने से मुझे इतना लाभ अवश्य हुआ है कि अब मुझे इस बात पर स्वयं से विचार करने का अवसर मिल गया है कि यदि हम किसी बात को हल्के ढंग से लें तो कोई भी चीज़ गंभीर नहीं होती। यदि हम अपनी झुंझलाहट को उसमें स्वयं न जोड़ें तो कोई भी बात परेशान करने वाली नहीं होती। मेरे बेकर के पास रोटी नहीं है। लेकिन मेरे प्रबंधक के पास कुछ है। मेरे मुख्य दास तथा मेरे किरायेदारों के पास भी है। “रोटी खराब है,” तुम कहते हो। लेकिन ठहरो! वह अच्छी हो जाएगी। भूख जल्द ही उसे उत्तम आटे से बनी मुलायम रोटी में बदल देगी। इसी कारण तब तक भोजन नहीं करना चाहिए, जब तक भूख स्वयं ऐसा करने का संकेत न दे। इसलिए मैं अपना भोजन तब तक टाल दूँगा, जब तक मुझे फिर से अच्छी रोटी नहीं मिल जाती या फिर तब तक, जब तक मुझे खराब रोटी से भी कोई आपत्ति न रह जाए।



    सादा और रूखा भोजन करने का अभ्यास डालना आवश्यक है। समय और स्थान की कठिन परिस्थितियाँ उन लोगों के सामने भी आ खड़ी होती हैं जो धनवान हैं और सुख-सुविधाओं के लिए पूरी तरह तैयार रहते हैं। उनकी इच्छाओं में बाधा डाल देती हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी हर इच्छा पूरी नहीं कर सकता। मनुष्य इतना अवश्य कर सकता है कि जो उसके पास नहीं है, उसे पाने की इच्छा छोड़ दे और जो उपलब्ध है, उसका प्रसन्नतापूर्वक उपयोग करे। आत्मनिर्भरता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे संयमित पेट में निहित है, जो कठिन परिस्थितियों को सहन कर सके।यह बताना भी कठिन है कि मुझे इस बात से कितना आनंद मिलता है कि मेरी थकान स्वयं अपने आप में शांत हो गई है। मुझे न मालिश की आवश्यकता है, न स्नान की। मैं केवल समय के उपचारात्मक प्रभावों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। विश्राम श्रम से आई थकान को दूर कर देता है। आने वाला भोजन, चाहे वह जो भी हो, किसी भव्य उद्घाटन-भोज से भी अधिक आनंददायक होगा। संक्षेप में, मैंने तुरंत अपने मन को एक प्रकार की परीक्षा में डाल दिया है। वह भी अत्यंत सीधी तथा सटीक परीक्षा में क्योंकि जब मन स्वयं को तैयार कर लेता है और धैर्य रखने का संकल्प कर लेता है, तब हमें उसके वास्तविक संकल्प की स्पष्ट परीक्षा नहीं मिलती। सबसे विश्वसनीय परीक्षाएँ वे होती हैं जो अचानक सामने आ जाती हैं। जब मन कठिनाइयों को केवल उदासीनता से ही नहीं बल्कि शांत भाव से भी देखता है; जब उसमें न रोष होता है, न शिकायत; जब जो चीज़ उपलब्ध नहीं है, उसकी इच्छा न करके वह उसकी कमी की भरपाई कर लेता है। जब वह यह विचार करता है कि उसकी दिनचर्या में भले ही कोई चीज़ कम हो। लेकिन अपने आप में उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं है।

    बहुत-सी चीज़ों के बारे में हमें उनकी अनावश्यकता का पता तभी चलता है, जब वे कम पड़ने लगती हैं। हम उनका उपयोग इसलिए नहीं कर रहे थे कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता था बल्कि इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे हमारे पास उपलब्ध थीं। हम ऐसी कितनी ही चीज़ें केवल इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि दूसरे लोगों ने उन्हें खरीदा है या वे दूसरे लोगों के घरों में मौजूद हैं! हमारी बहुत-सी समस्याएँ इस तथ्य से उत्पन्न होती हैं कि हम दूसरे लोगों के मानदंडों के अनुसार जीवन जीते हैं और विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाने के बजाय फैशन का अनुसरण करते हैं। यदि केवल कुछ ही लोग कोई काम करते तो हम उनकी नकल करने से इनकार कर देते। लेकिन जैसे ही अधिक लोग वही काम करने लगते हैं, हम भी उसे अपना लेते हैं, मानो केवल अधिक लोगों द्वारा किया जाना ही उसे अधिक सम्माननीय बना देता हो। जब कोई गलत धारणा व्यापक रूप से फैल जाती है, तो हम उसे ही सदाचार का स्थान दे देते हैं। 

    आजकल हर व्यक्ति नुमिडियाई घुड़सवारों के एक दल और आगे-आगे चलने वाले धावकों की एक टुकड़ी के साथ यात्रा करता है। ऐसा दिखाई देना अपमानजनक माना जाता है कि तुम्हारे पास रास्ते में आने वाले यात्रियों को हटाने के लिए कोई सेवक न हो और किसी बड़े अधिकारी के आने की सूचना देने के लिए धूल का कोई विशाल बादल न उठ रहा हो। आजकल हर व्यक्ति के पास खच्चरों का एक काफिला होता है, जो उसके क्रिस्टल और गोमेद के प्यालों तथा बारीकी से बनाए गए चाँदी के पात्रों का संग्रह ढोता है। यह भी अपमानजनक माना जाता है कि ऐसा लगे कि तुम्हारा पूरा सामान ऐसी वस्तुओं का है जिन्हें बिना टूटे आसानी से इधर-उधर ले जाया जा सकता है। हर व्यक्ति के साथ सेवकों का एक दल होता है, जो यात्रा के समय अपने चेहरे पर लोशन मलते रहते हैं ताकि सूर्य या ठंड उनकी कोमल त्वचा को नुकसान न पहुँचा सके। स्वस्थ त्वचा वाले युवा सेवक होना, जिन्हें किसी औषधीय प्रसाधन की आवश्यकता ही न हो। यह भी आजकल अपमानजनक माना जाता है!

    हमें इन सभी लोगों से बातचीत करने से बचना चाहिए। ये ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुण एक-दूसरे तक पहुँचाते हैं और उन्हें आपस में बाँटते रहते हैं। पहले हम तब इसे भयानक मानते थे, जब लोग शब्दों के माध्यम से अपनी शेखी बघारते थे। लेकिन आज ऐसे लोग हैं जो अपने दुर्गुणों का भी प्रदर्शन करते हैं। इन लोगों से बातचीत करना बहुत हानिकारक होता है। भले ही उसका तत्काल कोई प्रभाव दिखाई न दे, फिर भी वह मन में बीज बो देती है। उनके साथ से अलग हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव हमारे भीतर बना रहता है और बाद में फिर उभर आता है। संगीत का कोई कार्यक्रम सुनने के बाद भी लोगों के कानों में उसकी धुन और मधुर गायन गूँजता रहता है, जो उनकी सोचने की क्षमता को सीमित कर देता है और उन्हें गंभीर विषयों पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ बना देता है। उसी प्रकार चापलूसों और दुर्गुणों को बढ़ावा देने वाले लोगों की बातें सुन लेने के बहुत देर बाद तक मन में बनी रहती हैं। मन को किसी मधुर ध्वनि से मुक्त कर पाना आसान नहीं होता। वह बनी रहती है। उसका प्रभाव चलता रहता है। कुछ अंतराल के बाद फिर लौट आती है। इसलिए आरंभ से ही हमें अपने कानों को हानिकारक आवाज़ों के लिए बंद रखना चाहिए। एक बार उन आवाज़ों को प्रवेश मिल जाए और वे अपना प्रभाव डालना शुरू कर दें तो वे और भी अधिक दुस्साहसी हो जाती हैं।

    इसके बाद हम ऐसे लोगों के बीच जा पहुँचते हैं, जो इस तरह की बातें करते हैं “सद्गुण, दर्शन और न्याय, ये सब निरर्थक शब्दों का शोर मात्र हैं! जीवन में सुखपूर्वक रहना ही एकमात्र सुख है। खाना, पीना और अपनी संपत्ति खर्च करना, यही जीवन जीना है। यही इस बात को याद रखना है कि हम नश्वर हैं। दिन बीतते जा रहे हैं। जीवन वापस न लौटने वाले ढंग से आगे बढ़ रहा है। हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं? दर्शन का अभ्यास करने से क्या लाभ है? जब हम बूढ़े हो जाएँगे, तब हम सुख का आनंद नहीं ले सकेंगे तो अभी, जब हम सक्षम हैं और अभी भी इच्छाएँ रखते हैं, अपने जीवन पर संयम क्यों थोपें? इसलिए मृत्यु से पहले ही उससे आगे निकल जाओ और जो कुछ वह तुमसे छीनने वाली है, उसे अभी अपने ऊपर खर्च कर डालो। तुम्हारी कोई प्रेमिका नहीं है। न ही तुम्हारे पास ऐसा कोई पुरुष-प्रेमी है, जिसे देखकर तुम्हारी प्रेमिका ईर्ष्या करे। तुम कभी नशे में धुत्त नहीं होते। तुम्हारे भोजों को देखकर ऐसा लगता है मानो तुम अपने पिता से अपने रोज़मर्रा के खर्च की अनुमति मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हो। यह जीवन जीना नहीं है बल्कि किसी दूसरे के जीवन की देखभाल करना है! अपने आपको हर चीज़ से वंचित रखना और अपना ध्यान ऐसी संपत्ति पर लगाए रखना, जो अंततः तुम्हारे उत्तराधिकारी को ही मिलने वाली है। यह पूरी तरह पागलपन है। इस तरह तुम्हारी संपत्ति का आकार ही तुम्हारे मित्र को तुम्हारा शत्रु बना देगा। जितनी बड़ी उसकी विरासत होगी, तुम्हारी मृत्यु पर वह उतना ही अधिक प्रसन्न होगा। जहाँ तक उन ढोंगी लोगों का सवाल है।दूसरों के जीवन के कठोर आलोचक और अपने ही जीवन के शत्रु, जो जनता को उपदेश देना पसंद करते हैं। उन पर बिल्कुल ध्यान मत दो। अच्छे नाम की अपेक्षा अच्छा जीवन चुनने में तनिक भी संकोच मत करो।”

    ऐसी आवाज़ों से भी उतना ही बचना चाहिए, जितना उन आवाज़ों से जिनके पास से यूलिसीस तब तक आगे नहीं बढ़ना चाहता था, जब तक उसे मस्तूल से बाँध नहीं दिया गया था। इन दोनों में समान शक्ति है। ये तुम्हें तुम्हारे देश, माता-पिता, मित्रों और सद्गुणों से दूर कर देती हैं और तुम्हें लज्जाजनक जीवन की ओर इस प्रकार आकर्षित करती हैं कि ऐसे सुखों का वादा करती हैं, जो तुम्हें दुखी कर देंगे, भले ही उनमें अपने आप में कोई लज्जाजनक बात न हो।कितना बेहतर है कि सीधे मार्ग का अनुसरण किया जाए और अंततः वह तुम्हें उस बिंदु तक पहुँचा दे, जहाँ केवल वही चीज़ें तुम्हें आनंद देती हैं जो सम्माननीय हैं! 

    हम उस बिंदु तक पहुँच सकेंगे, यदि हम यह समझ लें कि ऐसी दो प्रकार की वस्तुएँ हैं जो हमें या तो आकर्षित करती हैं या हममें विरक्ति उत्पन्न करती हैं। आकर्षित करने वाली वस्तुओं में धन, सुख, सौंदर्य, महत्वाकांक्षा और ऐसी ही अन्य सभी मोहक तथा आनंददायक चीज़ें हैं। कठिन शारीरिक श्रम, मृत्यु, पीड़ा, लोगों की निंदा और सादा भोजन हमें अप्रिय लगते हैं। इसलिए हमें स्वयं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि न तो हम बाद वाली चीज़ों से भयभीत हों और न पहली वाली चीज़ों की इच्छा करें। हमें अपनी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, जो चीज़ें हमें आकर्षित करती हैं, उनका प्रतिरोध करते हुए और जो कठिनाइयाँ हम पर आक्रमण करती हैं, उनकी ओर आगे बढ़ते हुए। 

    क्या तुम ध्यान नहीं देते कि जब लोग पहाड़ी पर चढ़ रहे होते हैं और जब नीचे उतर रहे होते हैं, तब उनके शरीर की मुद्रा कितनी अलग होती है? नीचे उतरते समय वे अपने शरीर को पीछे की ओर झुका लेते हैं। जबकि चढ़ते समय आगे की ओर झुकाते हैं। नीचे उतरते समय अपने शरीर का भार आगे की ओर डालना उतना ही जानबूझकर की गई भूल है, जितना ऊपर चढ़ते समय उसे पीछे की ओर डालना। लूसीलियस, हम सुखों की ओर नीचे उतरते हैं। लेकिन कठिनाइयों और कष्टों का सामना करने के लिए हमें ऊपर चढ़ना पड़ता है। बाद वाली स्थिति में हमें अपने शरीर को आगे की ओर धकेलना चाहिए। जबकि पहली स्थिति में हमें उसे पीछे की ओर रोककर रखना चाहिए।

    क्या तुम यह समझते हो कि मैं इस समय केवल यह कहना चाहता हूँ कि हमारे कानों के लिए केवल वही लोग खतरनाक हैं, जो सुख की प्रशंसा करते हैं और पीड़ा के विचार से हमें भयभीत करते हैं। जबकि पीड़ा अपने आप में ही पर्याप्त रूप से भयावह है? नहीं, मेरा मानना है कि हमें उन लोगों से भी नुकसान पहुँचता है, जो स्टोइक मत का आवरण ओढ़कर हमें दुर्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। उदाहरण के लिए, वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि केवल वही व्यक्ति प्रेमी होता है जो बुद्धिमान और अत्यधिक शिक्षित हो। “इस विषय में केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही विशेषज्ञ होता है। इसी प्रकार, वही व्यक्ति प्रेम-समारोहों और भोजों में भाग लेने की कला में भी सबसे अधिक निपुण होता है। आइए, इस प्रश्न पर विचार करें। युवकों को किस आयु तक प्रेम का विषय बनाया जाना चाहिए?”

    इन बातों को यूनानियों की परंपरा के हवाले कर देने के बाद, हमें इसके बजाय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

“कोई भी व्यक्ति संयोगवश अच्छा नहीं बनता। सद्गुण को सीखना पड़ता है। सुख एक तुच्छ और दयनीय वस्तु है, जिसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। यहाँ तक कि अवाक् प्राणियों को भी सुख का कुछ अंश प्राप्त होता है। सबसे छोटे और तुच्छ प्राणी भी उसके पीछे दौड़ते हैं। यश एक खोखली वस्तु है, जो हवा से भी अधिक क्षणभंगुर और चंचल है। गरीबी केवल उनके लिए समस्या है जो उसे स्वीकार नहीं करते। मृत्यु कोई बुराई नहीं है। फिर, तुम पूछते हो, वह क्या है? वह वह एक अधिकार है जो समस्त मानवजाति को समान रूप से प्राप्त है। अंधविश्वास एक मूर्खतापूर्ण भूल है। वह उनसे डरता है, जिनसे प्रेम किया जाना चाहिए। जिनकी पूजा करता है, उन्हीं के प्रति अपराध करता है। यदि तुम देवताओं की निंदा ही करने वाले हो तो यह मान लेना भी बेहतर है कि उनका अस्तित्व ही नहीं है।”

    तुम्हें इन्हीं शिक्षाओं को सीखना चाहिए या बल्कि, इन्हें अपने हृदय में उतार लेना चाहिए। दर्शन को दुर्गुणों के लिए बहाने उपलब्ध नहीं कराने चाहिए। जब चिकित्सक रोगी को असंयम बरतने की सलाह देता है, तब रोगी के स्वस्थ होने की कोई आशा नहीं रहती।


अभी के लिए विदा 

जेम्स बाल्डविन के उपन्यास Go Tell It on the Mountain का हिंदी अनुवाद- भाग- 1 (अध्याय दो)

  जॉन का जन्मदिन मार्च 1935 में शनिवार के दिन पड़ा था। उस जन्मदिन की सुबह जब उसकी आँख खुली , तो उसे महसूस हुआ कि उसके आस-पास की हवा में कोई ...