Friday, 19 June 2026

एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- (पत्र - 8)

प्रिय लूसीलियस 

"तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फिर तुम्हारे दर्शनशास्त्र की वह शिक्षा कहाँ गई जो हमें कर्म करते हुए मरने का उपदेश देती है?"

    क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें निष्क्रिय रहने की सलाह दे रहा हूँ? मैंने स्वयं को लोगों की भीड़ से अलग किया है और अपने द्वार बंद कर लिए हैं, लेकिन इसका कारण यह है कि मैं अधिक से अधिक लोगों का हित कर सकूँ। मेरा एक भी दिन आलस्य में नहीं बीतता। मैं रात का भी एक हिस्सा अध्ययन के लिए सुरक्षित रखता हूँ। नींद के लिए मेरे पास समय नहीं होता जब तक वह मुझे परास्त न कर दे, मैं काम करता रहता हूँ। मेरी आँखें देर रात तक जागने से थक जाती हैं और झुकने लगती हैं... फिर भी मैं उन्हें कार्य में लगाए रखता हूँ।

    मैंने केवल समाज से ही नहीं बल्कि व्यवसायों से भी और विशेष रूप से अपने निजी कामों से भी स्वयं को अलग कर लिया है। जो कार्य मैं कर रहा हूँ, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए है। वे ही मेरे लेखन से लाभान्वित हो सकेंगी। मैं अपने अनुभव से प्राप्त स्वास्थ्यवर्धक उपदेशों को लिख रहा हूँ, जैसे कोई उपयोगी मरहम के नुस्खे लिखता है। मैंने इन्हें अपने घावों पर आज़माया है। वे अभी पूरी तरह भले न भरे हों, पर उनका फैलना रुक गया है। जीवन का जो सही मार्ग मुझे बहुत भटकने और थक जाने के बाद मिला, वही अब मैं दूसरों को दिखा रहा हूँ।

    मेरा संदेश यह है, "उन वस्तुओं से दूर रहो जो बहुसंख्यक लोगों को प्रिय लगती हैं और उन उपहारों से भी जो भाग्य प्रदान करता है। उनसे सावधान रहो, उनसे डरो और संयोग से प्राप्त होने वाली हर अच्छी वस्तु का प्रतिरोध करो। जैसे मछली आशा के प्रलोभन से फँसती है और शिकार चारे से पकड़ा जाता है, वैसे ही मनुष्य भी फँस जाता है। क्या तुम इन्हें भाग्य का वरदान समझते हो? नहीं, ये जाल हैं। जो व्यक्ति सुरक्षित जीवन जीना चाहता है, उसे इन लुभावने उपकारों से यथासंभव दूर रहना चाहिए। हम अभागे लोग यह समझते हैं कि हमने इन्हें पकड़ रखा है जबकि वास्तव में इन्होंने हमें पकड़ रखा होता है।"

    तुम्हारा यह जीवन-पथ एक खाई की ओर जाता है। ऐसी ऊँची स्थिति से नीचे उतरने का अर्थ है गिरना। और जब समृद्धि हमें धक्का देने लगती है, तब हम उसका विरोध भी नहीं कर सकते। हम चाहें कि केवल एक बार गिरें या कम-से-कम सीधे खड़े हुए गिरें, पर हमें इसकी भी अनुमति नहीं मिलती। भाग्य केवल हमें गिराता ही नहीं बल्कि उलट देता है और फिर कुचल भी देता है।

    इसलिए जीवन के इस स्वस्थ और कल्याणकारी नियम को अपनाओ। "शरीर को उतना ही सुख दो जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो। उसके साथ कठोरता बरतो ताकि वह मन का आज्ञापालन करना सीखे। भोजन केवल भूख मिटाने के लिए हो, पेय केवल प्यास बुझाने के लिए। वस्त्र ठंड से रक्षा के लिए हों और घर केवल मौसम की कठोरताओं से बचने के लिए। यह कोई महत्व नहीं रखता कि वह घर मिट्टी का बना है या विदेशी संगमरमर से सुसज्जित। विश्वास करो, मनुष्य फूस की छत के नीचे भी उतना ही सुरक्षित रह सकता है जितना सोने के महल में। उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करो जिन्हें अनावश्यक परिश्रम केवल दिखावे और सजावट के लिए खड़ा करता है। याद रखो कि केवल मन ही वास्तव में अद्भुत है और महान मन के लिए उसके अतिरिक्त कुछ भी महान नहीं है।"



    यदि मैं ये बातें स्वयं से और आने वाली पीढ़ियों से कह रहा हूँ तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं तब से अधिक उपयोगी कार्य कर रहा हूँ जब मैं वकील के रूप में किसी की ज़मानत कराता था, किसी वसीयत पर मुहर लगाता था या किसी सीनेटर पद के उम्मीदवार की सहायता में अपना प्रभाव और वाणी लगाता था? विश्वास करो, जो लोग देखने में कुछ नहीं करते प्रतीत होते हैं, वे अक्सर सबसे बड़े कार्य कर रहे होते हैं क्योंकि वे मानव और दैवीय दोनों विषयों पर विचार कर रहे होते हैं।

    अब मुझे इस पत्र को समाप्त करना चाहिए और जैसा कि मेरी आदत बन गई है, मुझे इस पत्र का मूल्य भी चुकाना होगा। लेकिन यह भुगतान मेरी अपनी पूँजी से नहीं होगा। मैं अभी भी एपिक्यूरस के खजाने से उधार ले रहा हूँ। आज मुझे उसके लेखन में यह वचन मिला:

"दर्शन का दास बनो ताकि तुम सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सको।"

    जो लोग स्वयं को दर्शन की आज्ञाकारिता में समर्पित कर देते हैं, उनकी स्वतंत्रता किसी भविष्य की तिथि तक नहीं टाली जाती। उन्हें उसी क्षण स्वतंत्रता मिल जाती है। क्योंकि दर्शन की यह दासता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

    शायद तुम पूछो कि मैं एपिक्यूरस के इतने सुंदर वचनों का उल्लेख क्यों करता हूँ, अपने स्टोइक विद्यालय के नहीं। लेकिन क्या कोई कारण है कि इन्हें केवल एपिक्यूरस की संपत्ति माना जाए, न कि समस्त मानवता की?कितने ही कवि ऐसी बातें कहते हैं जिन्हें दार्शनिकों ने कहा है या कहना चाहिए था। मुझे न तो त्रासदीकारों का उल्लेख करने की आवश्यकता है और न ही उन नाटककारों का जो हास्य और त्रासदी के बीच की शैली में लिखते हैं। यहाँ तक कि साधारण मूक-अभिनय (माइम) में भी अनेक अत्यंत गहन पंक्तियाँ मिलती हैं।

मैं तुम्हें पब्लिलियस की एक पंक्ति सुनाता हूँ, जो अभी जिस विषय पर मैं चर्चा कर रहा था, उसी से संबंधित है:

"जो वस्तु केवल इच्छा करने से मिल जाए, वह वास्तव में तुम्हारी संपत्ति नहीं है।"

मुझे याद है कि तुमने स्वयं यही विचार और भी बेहतर तथा संक्षिप्त रूप में व्यक्त किया था, "जिसे भाग्य तुम्हारा बनाता है, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं होता।" और मैं तुम्हारी एक और इससे भी श्रेष्ठ उक्ति का उल्लेख किए बिना नहीं रह सकता, "जो भलाई दी जा सकती है, वह वापस भी ली जा सकती है।"

इन बातों का मूल्य मैं तुम्हारे खाते में नहीं लिख रहा.ये तो तुम्हारी अपनी ही संपत्ति हैं।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 18 June 2026

भीड़ के संदर्भ में -- (पत्र - 7)

प्रिय लुसीलियस

तुम पूछते हो कि सबसे अधिक किस चीज़ से बचना चाहिए? मैं कहूँगा, भीड़ से। अभी तुम इतने सुरक्षित नहीं हुए हो कि अपने आपको भीड़ में शामिल कर सको। 

    मैं इस संदर्भ में अपनी कमजोरी खुले रूप से स्वीकार करता हूँ। जब भी मैं बाहर जाता हूँ, कभी भी उसी चरित्र के साथ वापस नहीं लौटता जिसके साथ गया था। हमेशा ऐसा कुछ फिर से उद्वेलित हो जाता है जिसे मैं पहले शांत कर चुका था, कुछ ऐसा भी जिससे छुटकारा पा लिया था, पर वह फिर से लौट आती है। जैसे लंबे समय तक बीमारी से उबर रहे रोगी को बाहर ले जाने पर उसकी हालत बिगड़ सकती है, वैसा ही हमारे साथ भी होता है। हमारा मन एक लंबी बीमारी से स्वस्थ हो रहा है, ऐसे में लोगों की भीड़ का (से) संपर्क हमारे लिए हानिकारक है। हर व्यक्ति किसी न किसी दोष को हमारे भीतर बढ़ावा देता है, हमें कोई अवगुण सिखा देता है या बिना हमारे जाने हमें उससे संक्रमित कर देता है।

 

    निस्संदेह, जितनी बड़ी भीड़ के साथ हम रहते हैं, उतना ही बड़ा खतरा होता है। अच्छे चरित्र के लिए सार्वजनिक मनोरंजन और तमाशों में बैठना सबसे अधिक विनाशकारी है क्योंकि वहाँ दृश्य का आनंद, अवगुणों को अधिक आसानी से हमारे भीतर प्रवेश करा देता है। तुम सोचोगे कि मेरा क्या मतलब है? क्या मैं वहाँ से लौटकर अधिक लालची, अधिक सत्ता-लोभी या अधिक भोग-विलासी बन जाता हूँ? इससे भी बुरा! मैं अधिक क्रूर और अमानवीय बन जाता हूँ, केवल इसलिए कि मैं इंसानों के बीच रहा हूँ।

    संयोग से मैं एक दिन दोपहर के प्रदर्शन में पहुँच गया। मुझे आशा थी कि वहाँ कुछ मनोरंजन, बुद्धिमत्ता या विश्राम मिलेगा जिससे लोगों की आँखों को रक्तपात देखने से थोड़ी राहत मिले। पर हुआ इसका बिल्कुल उलटा। पहले जो युद्ध हुए थे, वे तो तुलना में दयालु प्रतीत हुए। अब खेल-तमाशा समाप्त हो चुका था और केवल निर्मम हत्या शेष थी। लड़ने वालों को कोई सुरक्षा-कवच नहीं दिया जाता था। उनका शरीर पूरी तरह खुला रहता था इसलिए कोई भी वार व्यर्थ नहीं जाता था। लोगों को यह कार्यक्रम साधारण ग्लैडिएटर युद्धों से अधिक पसंद था। और क्यों न हो? न कोई हेलमेट, न कोई ढाल जो तलवार को रोक सके। रक्षा की क्या आवश्यकता? युद्ध-कौशल की क्या आवश्यकता? ये सब तो केवल मृत्यु को देर से आने देते हैं। सुबह मनुष्यों को शेरों और भालुओं के सामने फेंका जाता है...।  दोपहर में उन्हें दर्शकों के सामने फेंका जाता है। जो मारते हैं, उन्हें स्वयं दूसरे हत्यारों के सामने मरने के लिए भेज दिया जाता है। विजेता को भी अगली हत्या के लिए रोक लिया जाता है। अखाड़े से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है — मृत्यु। तलवार और अग्नि ही उस समय का व्यवसाय बन जाते हैं। और यह सब तब भी चलता रहता है जब अखाड़ा लगभग खाली होता है।

    (कोई कह प्रश्न करता है) "लेकिन उसने डकैती की थी! उसने किसी की हत्या की थी!" तो क्या? यदि वह हत्यारा था तो शायद वह इस दंड का पात्र था। लेकिन तुमने क्या अपराध किया है कि तुम्हें यह सब देखने का दंड मिले?

    (लोग चिल्लाते हैं) "उसे मारो! उसे कोड़े लगाओ! उसे जला दो! वह तलवार पर झपटने में इतना डर क्यों रहा है? वह साहसपूर्वक मर क्यों नहीं जाता? उसे कोड़ों से युद्ध में धकेलो! उन्हें खुली छाती के साथ एक-दूसरे के प्रहार सहने दो!" और जब प्रदर्शन में थोड़ी देर का विराम होता है तो घोषणा होती है, "तब तक कुछ लोगों के गले काट दिए जाएँ ताकि मनोरंजन चलता रहे!" क्या तुम यह भी नहीं समझते कि बुरे उदाहरण केवल देखने वालों को ही नहीं, उन्हें प्रस्तुत करने वालों को भी भ्रष्ट करते हैं? देवताओं का धन्यवाद करो कि जिसे तुम क्रूरता सिखा रहे हो, वह उसे सीखने में सक्षम नहीं है!

    युवा मन, जो अभी सत्य और सदाचार पर दृढ़ नहीं हुआ है, उसे भीड़ से दूर रखना चाहिए। बहुमत का अनुसरण करना बहुत आसान है। यहाँ तक कि सुकरात (Socrates), केटो (Cato) और लैलियस (Laelius) जैसे महान व्यक्तियों का चरित्र भी ऐसी भीड़ के प्रभाव से डगमगा सकता था जो उनसे बिल्कुल भिन्न थी। तो फिर हम जो अभी अपने भीतर सामंजस्य स्थापित करना ही शुरू कर रहे हैं, उन दोषों के आक्रमण का सामना कैसे कर सकते हैं जो इतनी बड़ी सेना लेकर आते हैं? विलासिता या लालच का केवल एक उदाहरण भी बहुत हानि पहुँचाता है। एक विलासी साथी धीरे-धीरे हमारे साहस और दृढ़ता को कम कर देता है। एक धनी पड़ोसी हमारी इच्छाओं को भड़का देता है। एक द्वेषपूर्ण मित्र सबसे सरल और निष्कपट स्वभाव को भी अपने विष से दूषित कर देता है। तो सोचो, जब पूरी जनता ही किसी व्यक्ति के चरित्र पर आक्रमण करे, तब क्या होगा? तुम्हें या तो उनका अनुकरण करना पड़ेगा या उनसे घृणा करनी पड़ेगी।

    दोनों ही मार्गों से बचना चाहिए। बुरों की नकल मत करो क्योंकि वे बहुत हैं और लोगों से घृणा भी मत करो क्योंकि वे तुमसे भिन्न हैं। जितना संभव हो, अपने भीतर लौट जाओ। उन लोगों के साथ समय बिताओ जो तुम्हें बेहतर बनाएँ। और उनका स्वागत करो जिन्हें तुम बेहतर बना सकते हो। यह प्रभाव पारस्परिक होता है क्योंकि लोग सिखाते हुए भी सीखते हैं।

    अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की अहंकारी इच्छा तुम्हें भीड़ के बीच भाषण देने या वाद-विवाद करने के लिए आकर्षित न करे। यदि तुम्हारे पास ऐसा ज्ञान होता जो इस भीड़ के लिए उपयुक्त होता तो मैं तुम्हें ऐसा करने को कहता। परंतु वास्तविकता यह है कि वहाँ कोई भी तुम्हें समझने योग्य नहीं है। शायद कोई एक व्यक्ति मिल जाए और उसे भी पहले शिक्षित करना पड़ेगा ताकि वह तुम्हें समझ सके।

    (तुम पूछ सकते हो) "फिर मैंने यह सब किसके लिए सीखा?" चिंता मत करो। यदि तुमने यह सब अपने लिए सीखा है तो तुम्हारा समय व्यर्थ नहीं गया। और ताकि आज का मेरा अध्ययन केवल मेरे लिए न रहे, मैं तुम्हारे साथ तीन उत्कृष्ट कथन साझा करता हूँ।

    डेमोक्रिटस (Democritus) कहता है, "मेरे लिए एक व्यक्ति एक राष्ट्र के समान है और एक राष्ट्र एक व्यक्ति के समान।"

    जब एक अज्ञात लेखक से पूछा गया कि कला के ऐसे काम में आपने इतनी मेहनत या प्रयास क्यों किया है जिसे बहुत काम लोग देख पाएँगे तब उन्होंने बढ़िया बात कही, "कुछ लोग पर्याप्त हैं, एक व्यक्ति पर्याप्त है और कभी-कभी कोई भी न हो... तो भी पर्याप्त है।"

    तीसरा कथन विशेष रूप से सुंदर है। एपीक्यूरस (Epicurus) ने अपने एक दार्शनिक मित्र को लिखा, "मैं यह बहुतों के लिए नहीं, तुम्हारे लिए लिखता हूँ क्योंकि तुम और मैं एक-दूसरे के लिए पर्याप्त श्रोता हैं।"

    प्रिय लुसीलियस, इन वचनों को अपने मन में रखो ताकि तुम बहुसंख्यकों की प्रशंसा से मिलने वाले सुख को तुच्छ समझो। बहुत-से लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं पर क्या इससे तुम्हें स्वयं पर संतोष करने का कारण मिल जाता है, यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे बहुत-से लोग आसानी से समझ सकते हैं? अपने श्रेष्ठ गुणों को बाहर नहीं, भीतर की ओर निर्देशित करो।

अभी के लिए विदा

सेनेका 

Monday, 15 June 2026

ज्ञान साझा करने के संदर्भ में -- (पत्र - 6)

 

प्रिय लुसीलियस,

मुझे ऐसा लगता है कि मैं केवल सुधर ही नहीं रहा हूँ बल्कि रूपांतरित भी हो रहा हूँ। फिर भी मैं यह दावा नहीं करता, न ही ऐसी आशा करता हूँ कि अब मुझमें ऐसा कुछ भी शेष नहीं है जिसे बदलने की आवश्यकता हो। निस्संदेह मेरे भीतर बहुत-सी बातें हैं जिन्हें और सुदृढ़ बनाना चाहिए, कुछ को हल्का करना चाहिए, और कुछ को अधिक स्पष्ट रूप से उभारना चाहिए। वास्तव में, यही तथ्य इस बात का प्रमाण है कि मेरी आत्मा पहले से बेहतर हो गई है। अब वह अपनी उन त्रुटियों को पहचान सकती है जिनसे वह पहले अनभिज्ञ थी। जैसे कुछ रोगियों को इस बात पर बधाई दी जाती है कि उन्हें स्वयं अपनी बीमारी का बोध हो गया है, वैसे ही मुझे भी अपने दोषों का ज्ञान होना प्रगति का संकेत लगता है।

    इसलिए मैं अपने भीतर आए इस अचानक परिवर्तन को तुम्हारे साथ साझा करना चाहता हूँ। ऐसा करने से मुझे हमारी मित्रता पर और भी दृढ़ विश्वास होगा...  उस सच्ची मित्रता पर जिसे न आशा तोड़ सकती है, न भय, और न ही स्वार्थ। ऐसी मित्रता, जिसके लिए और जिसमें मनुष्य मृत्यु तक का सामना कर सकता है।

    मैं तुम्हें ऐसे अनेक लोगों के उदाहरण दिखा सकता हूँ जिनके पास मित्र तो थे परंतु मित्रता नहीं थी। किंतु यह स्थिति वहाँ कभी उत्पन्न नहीं हो सकती जहाँ दो आत्माएँ समान प्रवृत्तियों और सम्माननीय इच्छाओं के आधार पर एक हो जाती हैं। ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि ऐसे लोगों को ज्ञात होता है कि उनकी सभी वस्तुएँ साझी हैं —विशेषकर उनके दुःख। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि मैं प्रतिदिन अपने भीतर कितनी स्पष्ट प्रगति अनुभव करता हूँ।



    और जब तुम कहते हो, “जो लाभ तुम्हें इतने उपयोगी लगे हैं, उनमें मुझे भी भागीदार बनाओ” तो मैं उत्तर देता हूँ कि मैं इन सभी उपहारों को तुम्हारे ऊपर उँडेल देना चाहता हूँ। मैं इसलिए सीखने में आनंद पाता हूँ कि जो सीखा है उसे दूसरों को सिखा सकूँ। कोई भी वस्तु, चाहे वह कितनी ही उत्कृष्ट और लाभदायक क्यों न हो, मुझे तब तक सुखद नहीं लग सकती जब तक मैं उसका ज्ञान केवल अपने तक सीमित रखूँ। यदि मुझे यह शर्त रखकर बुद्धि दी जाए कि उसे छिपाकर रखना होगा और किसी से कहना नहीं होगा तो मैं ऐसी बुद्धि को स्वीकार ही नहीं करूँगा। किसी भी उत्तम वस्तु का स्वामित्व सुखद नहीं होता यदि उसे साझा करने के लिए मित्र न हों।

    अतः मैं तुम्हें वे पुस्तकें भेजूँगा। ताकि तुम उपयोगी विषयों की खोज में समय नष्ट न करो, मैं उनमें कुछ विशेष अंशों को चिह्नित कर दूँगा जिससे तुम सीधे उन्हीं स्थानों पर पहुँच सको जिन्हें मैं सराहता और प्रशंसनीय मानता हूँ। फिर भी, जीवित वाणी और साथ-साथ बिताया गया जीवन तुम्हारी अधिक सहायता करेंगे, लिखित शब्दों की अपेक्षा। तुम्हें स्वयं कर्मक्षेत्र में आना चाहिए। पहला कारण यह है कि लोग अपनी आँखों पर अपने कानों से अधिक विश्वास करते हैं। दूसरा कारण यह है कि यदि कोई केवल उपदेशों का अनुसरण करता है तो मार्ग लंबा होता है परंतु यदि वह उदाहरणों का अनुसरण करता है तो मार्ग छोटा और अधिक सहायक होता है।

    यदि क्लेन्थीस ने केवल ज़ेनो के व्याख्यान सुने होते तो वह कभी उसका सच्चा प्रतिबिंब नहीं बन सकता था। उसने उसके साथ जीवन बिताया, उसके गुप्त उद्देश्यों को समझा, और यह देखा कि क्या वह स्वयं अपने नियमों के अनुसार जीवन जीता है। प्लेटो, अरस्तू और उन सभी महान दार्शनिकों ने, जो आगे चलकर अपने-अपने मार्ग पर चले, सुकरात के शब्दों से कम और उसके चरित्र से अधिक लाभ प्राप्त किया। मेट्रोडोरस, हर्मार्कस और पॉलीएनस जैसे महान पुरुष एपिक्यूरस की कक्षा में बैठकर नहीं बल्कि उसके साथ एक ही छत के नीचे रहकर महान बने। इसलिए मैं तुम्हें केवल इसलिए नहीं बुला रहा कि तुम लाभ प्राप्त करो बल्कि इसलिए भी कि तुम लाभ पहुँचाओ। हम दोनों एक-दूसरे की बहुत सहायता कर सकते हैं।

इस बीच, मैं तुम्हें अपना छोटा-सा दैनिक उपहार देना चाहता हूँ। आज हेकाटो के लेखन में जो बात मुझे विशेष रूप से पसंद आई, वह यह है, “तुम पूछते हो कि मैंने क्या प्रगति की है? मैंने स्वयं अपना मित्र बनना सीख लिया है।” यह वास्तव में एक महान उपलब्धि है। ऐसा व्यक्ति कभी अकेला नहीं रह सकता। निश्चिंत रहो, जो व्यक्ति स्वयं का मित्र बन जाता है, वह समस्त मानवजाति का भी मित्र बन जाता है।

अभी के लिए विदा

Sunday, 14 June 2026

दार्शनिक के मध्यम मार्ग के संदर्भ में -- (पत्र - 5)


मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूँ कि तुम अपने अध्ययन में दृढ़ बने हुए हो तथा अन्य सभी बातों को एक ओर रखकर प्रतिदिन स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास करते हो। मैं केवल तुम्हें ऐसा करते रहने की सलाह ही नहीं देता बल्कि विनती भी करता हूँ कि ऐसा करते रहो। लेकिन मैं तुम्हें सावधान करता हूँ कि उन लोगों की तरह व्यवहार मत करना जो सुधार की अपेक्षा लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। ऐसे कार्यों से बचो जो तुम्हारे कपड़ों या जीवन-शैली के कारण लोगों में चर्चा का विषय बन जाएँ।

घृणा उत्पन्न करने वाले कपड़े, बिखरे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ, चाँदी के बर्तनों का दिखावटी तिरस्कार, धरती पर सोना, अथवा आत्म-प्रदर्शन के ऐसे अन्य विकृत रूपों से बचना चाहिए। दर्शन का नाम ही, चाहे वह कितनी ही शांति से क्यों न अपनाया जाए, लोगों के उपहास का पर्याप्त कारण बन जाता है। फिर यदि हम स्वयं को समाज की परंपराओं से अलग दिखाने लगें, तो क्या होगा? भीतर से हमें हर दृष्टि से भिन्न होना चाहिए पर बाहरी रूप से हमें समाज के अनुरूप रहना चाहिए।

                                 

                 The Thinker by Auguste Rodin, 1904

न तो बहुत सुंदर कपड़े पहनने चाहिए और न ही अत्यंत मैले। सोने से जड़ी हुई चाँदी की थालियों की आवश्यकता नहीं है पर हमें यह भी नहीं समझना चाहिए कि सोना-चाँदी का अभाव ही सादगी का प्रमाण है। हमें ऐसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए जो सामान्य लोगों से अच्छा हो पर उनसे बिल्कुल विपरीत नहीं। अन्यथा हम उन्हीं लोगों को डरा देंगे और अपने से दूर कर देंगे जिन्हें हम सुधारना चाहते हैं। नतीजा यह होगा कि वे हमारी किसी भी बात का अनुसरण नहीं करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें डर होगा कि कहीं उन्हें हर बात में हमारा अनुकरण न करना पड़े।

दर्शन का पहला काम सभी मनुष्यों में एक-दूसरे के के प्रति भाईचारा उत्पन्न करना है। इसे दूसरे शब्दों में सहानुभूति और सामाजिकता कहा जा सकता है। यदि हम स्वयं को दूसरों से बिल्कुल अलग बना लें तो हम अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिन साधनों से हम प्रशंसा पाना चाहते हैं, वे हास्यास्पद या घृणित न हों। हमारा आदर्श है —"प्रकृति के अनुसार जीवन जीना।" लेकिन शरीर को कष्ट देना, सहज सौन्दर्य से घृणा करना, जान-बूझकर गंदा रहना, या ऐसा भोजन करना जो केवल साधारण ही नहीं बल्कि अरुचिकर और घिनौना भी हो — यह प्रकृति के विपरीत है।

जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की खोज विलासिता का संकेत है वैसे ही सामान्य और सस्ते भोजन से बचना भी मूर्खता है। दर्शन सादगीपूर्ण जीवन की माँग करता है, तपस्या या आत्म-यातना की नहीं। मनुष्य एक साथ सादा और स्वच्छ दोनों हो सकता है। यही वह मध्यम मार्ग (Mean) है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। हमारा जीवन एक ज्ञानी पुरुष के जीवन और सामान्य संसार के जीवन के बीच संतुलित होना चाहिए। लोग उसकी प्रशंसा करें पर उसे समझ भी सकें।

तुम पूछ सकते हो —"तो क्या हम सामान्य लोगों की तरह ही रहें? क्या हमारे और संसार के बीच कोई अंतर न होगा?" हाँ, फर्क अवश्य होगा और बहुत बड़ा होगा। लेकिन वह अंतर तभी दिखाई दे जब लोग हमें ध्यान से देखें। यदि वे हमारे घर आएँ, तो उन्हें हमारे फर्नीचर या सजावट की नहीं बल्कि हमारी प्रशंसा करनी चाहिए। वह व्यक्ति महान है जो मिट्टी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे चाँदी के हों किन्तु उतना ही महान वह भी है जो चाँदी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे मिट्टी के हों। धन को सहन न कर पाना अस्थिर मन का लक्षण है।

अब मैं आज की एक और सीख तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ। मैंने हमारे दार्शनिक हेकाटो की रचनाओं में पाया है कि इच्छाओं को सीमित करना भय को भी समाप्त करने में सहायक होता है। वह कहते हैं, "आशा करना छोड़ दो और तुम भय करना भी छोड़ दोगे।" तुम पूछ सकते हो, "इतनी भिन्न चीज़ें एक साथ कैसे चल सकती हैं?" प्रिय लूसिलियस, वास्तव में वे उतनी भिन्न नहीं हैं जितनी दिखाई देती हैं। जैसे एक ही जंजीर कैदी और उसकी रखवाली करने वाले सैनिक दोनों को बाँधती है वैसे ही आशा और भय भी साथ-साथ चलते हैं। भय, आशा का अनुसरण करता है।

मुझे इसमें आश्चर्य नहीं होता क्योंकि दोनों ही उस मन की उपज हैं जो अनिश्चितता में जीता है और भविष्य की चिंता में व्याकुल रहता है। इन दोनों बुराइयों का मुख्य कारण यह है कि हम वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने के बजाय अपने विचारों को बहुत दूर भविष्य में भेज देते हैं। इस प्रकार दूरदर्शिता, जो मानव जाति का सबसे महान वरदान है, विकृत हो जाती है।

पशु उन खतरों से बचते हैं जिन्हें वे सामने देखते हैं और उनसे बच जाने के बाद निश्चिन्त हो जाते हैं। पर हम मनुष्य भविष्य की संभावनाओं और अतीत की स्मृतियों दोनों से स्वयं को पीड़ित करते रहते हैं। हमारे अनेक वरदान ही हमारे लिए अभिशाप बन जाते हैं। स्मृति, पुराने भय और कष्टों को फिर से जीवित कर देती है और दूरदर्शिता आने वाले कष्टों की कल्पना करके हमें पहले ही दुःखी कर देती है। वास्तव में केवल वर्तमान ही ऐसा है जो किसी मनुष्य को दुःखी नहीं कर सकता।

अभी के लिए विदा

 

Saturday, 13 June 2026

मृत्यु के भय के संदर्भ में -- (पत्र - 4)


प्रिय लूसीलियस,

जिस प्रकार तुमने आरम्भ किया है उसी प्रकार आगे बढ़ते रहो और जितनी शीघ्र हो सके उतनी प्रगति करो ताकि तुम एक ऐसे मन का अधिक समय तक आनंद ले सको जो बेहतर हुआ हो और स्वयं के साथ शांति में हो। निस्संदेह, अपने मन को बेहतर व शांत करते समय भी तुम्हें आनंद मिलेगा पर वह सुख बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो उस समय प्राप्त होता है जब मन हर प्रकार के कलंक से मुक्त होकर चमक उठता है।

    तुम्हें याद होगा कि जब तुमने बचपन के कपड़े छोड़कर पुरुषों का कपड़ा पहना था और तुम्हें सम्मानपूर्वक सभा-स्थल तक ले जाया गया था तब तुम्हें कितना आनंद हुआ था। फिर भी उससे कहीं अधिक आनंद की आशा करो जब तुम बालसुलभ मनोवृत्ति का त्याग करोगे और विवेक तुम्हें सच्चे मनुष्यों की श्रेणी में सम्मिलित करेगा।

                                              

                                                          The Misery by Cristobal Rojas Poelo

                                               

हमारे भीतर केवल बचपन ही नहीं रह गया है बल्कि उससे भी बुरी चीज़ — लड़कपन —अब भी बना हुआ है। यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए है कि हमारे पास वृद्धावस्था का सम्मान तो है पर मूर्खताएँ अब भी बच्चों जैसी हैं... बल्कि शिशुओं जैसी भी। लड़के तुच्छ बातों से डरते हैं, बच्चे परछाइयों से डरते हैं, और हम दोनों से डरते हैं।

    तुम्हें केवल आगे बढ़ना है तब तुम समझोगे कि कुछ चीज़ें वास्तव में उतनी भयावह नहीं हैं जितनी वे प्रतीत होती हैं। कोई भी बुराई बड़ी नहीं होती यदि वह अंतिम बुराई हो। मृत्यु आती है। वह भय का विषय तब होती यदि वह हमारे साथ बनी रहती। लेकिन मृत्यु या तो आएगी ही नहीं और यदि आएगी तो गुज़रकर चली जाएगी।

    तुम कह सकते हो, “पर मन को इस स्थिति तक पहुँचाना कठिन है कि वह जीवन का तिरस्कार कर सके।” पर क्या तुम नहीं देखते कि कितने तुच्छ कारणों से लोग जीवन का त्याग कर देते हैं? कोई अपनी प्रेमिका के द्वार पर फाँसी लगा लेता है, कोई घर की छत से कूद पड़ता है ताकि गुस्साए मालिक की डाँट न सहनी पड़े, कोई पकड़े जाने के भय से अपनी छाती में तलवार भोंक लेता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि सद्गुण उतना ही प्रभावशाली हो सकता है जितना अत्यधिक भय? हर पल लंबे जीवन की कामना करने वाला व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता या यह मानता हो कि बहुत वर्षों तक जीवित रहना ही महान सौभाग्य है।                                              

    प्रतिदिन इस विचार का अभ्यास करो कि जब समय आए तो तुम संतोषपूर्वक जीवन से विदा हो सको क्योंकि बहुत से लोग जीवन से उसी प्रकार चिपके रहते हैं जैसे तीव्र धारा में बहते हुए लोग काँटों और नुकीली चट्टानों को पकड़ लेते हैं।

                                                        

                                                                  Picasso -- Blue Period 

    अधिकांश लोग मृत्यु के भय और जीवन की कठिनाइयों के बीच दुखपूर्वक झूलते रहते हैं। वे जीना नहीं चाहते यह भी की मरना कैसे है।

    इसलिए जीवन को अपने लिए उपयुक्त बनाओ और उसके विषय में सारी चिंता दूर कर दो। कोई भी अच्छी वस्तु अपने स्वामी को सुखी नहीं बना सकती यदि उसका मन उसके खो जाने की संभावना को स्वीकार न कर चुका हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका खोना मृत्यु से कम पीड़ादायक हो क्योंकि मृत्यु के बाद उसकी कमी का अनुभव ही नहीं किया जा सकता। इसलिए अपने मन को सुदृढ़ बनाओ और उन विपत्तियों के लिए तैयार करो जो सबसे शक्तिशाली लोगों पर भी आती हैं।

    उदाहरण के लिए, पॉम्पी का भाग्य एक लड़के और एक हिजड़े द्वारा निर्धारित हुआ। क्रैसस का अंत एक क्रूर और उद्दण्ड पार्थियन के हाथों हुआ। गैयस सीज़र ने लेपिडस को आदेश दिया कि वह अपनी गर्दन जल्लाद की कुल्हाड़ी के सामने प्रस्तुत करे और अंततः उसने स्वयं भी अपनी गर्दन चाएरिया के सामने प्रस्तुत की। भाग्य ने किसी को भी इतना ऊँचा नहीं उठाया कि उसे उतना ही बड़ा खतरा न दिखाया हो जितना बड़ा अनुग्रह उसने पहले दिया था। उसकी शांत प्रतीत होने वाली अवस्था पर भरोसा मत करो। एक क्षण में समुद्र की गहराइयाँ उथल-पुथल हो सकती हैं। जिस दिन जहाज़ अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हैं उसी दिन वे समुद्र में डूब भी सकते हैं।

    यह भी सोचो कि कोई डाकू या शत्रु तुम्हारा गला काट सकता है और चाहे वह तुम्हारा स्वामी न हो फिर भी प्रत्येक दास तुम्हारे जीवन और मृत्यु पर शक्ति रखता है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो अपने जीवन की परवाह नहीं करता वही तुम्हारे जीवन का स्वामी बन सकता है। उन लोगों के बारे में सोचो जो अपने ही घरों में षड्यंत्रों का शिकार हुए.. . खुले रूप से या छलपूर्वक मारे गए। तुम पाओगे कि जितने लोग क्रोधित दासों द्वारा मारे गए लगभग उतने ही क्रोधित राजाओं द्वारा भी मारे गए। फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि वह व्यक्ति कितना शक्तिशाली है जिससे तुम डरते हो जब हर व्यक्ति के पास वही शक्ति है जिससे तुम भयभीत हो?

    पर तुम कहोगे, “यदि तुम शत्रु के हाथों पड़ गए तो विजेता तुम्हें मृत्यु के लिए ले जाएगा।” हाँ, पर वह तुम्हें वहीं ले जाएगा जहाँ तुम पहले से ही जा रहे हो। तुम स्वयं को धोखा क्यों देते हो और अब पहली बार यह सुनना क्यों चाहते हो कि तुम्हारा भाग्य क्या है? मेरी बात मानो, जिस दिन तुम जन्मे थे उसी दिन से तुम उसी दिशा में ले जाए जा रहे हो। यदि हम उस अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा करते समय शांत रहना चाहते हैं जिसके भय से हमारे सभी पूर्व क्षण अशांत हो जाते हैं तो हमें इस विचार और ऐसे ही अन्य विचारों पर निरंतर मनन करना चाहिए।

    पर अब मुझे अपना पत्र समाप्त करना चाहिए। आज मुझे जो उक्ति पसंद आई, उसे तुम्हारे साथ साझा करता हूँ। यह भी किसी दूसरे के उपवन से (लेखन) ली गई है — “प्रकृति के नियमों के अनुरूप बनी हुई गरीबी ही महान संपत्ति है।” क्या तुम जानते हो कि प्रकृति का नियम हमारे लिए कौन-सी सीमाएँ निर्धारित करता है? केवल भूख, प्यास और ठंड से बचना। भूख और प्यास मिटाने के लिए धनवानों के द्वार पर चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं है... न कठोर तिरस्कार सहने की... न अपमानजनक कृपा स्वीकार करने की... न समुद्रों की खाक छानने की आवश्यकता है और न युद्ध-अभियानों में भटकने की। प्रकृति की आवश्यकताएँ सरल हैं और सहज उपलब्ध हैं।

मनुष्य जिन वस्तुओं के लिए इतना परिश्रम करता है वे अधिकांशतः अनावश्यक और अतिरिक्त होती हैं। वही अतिरिक्त वस्तुएँ हमारे वस्त्रों को घिस देती हैं, हमें शिविरों में बूढ़ा कर देती हैं और हमें विदेशी तटों पर भटका देती हैं। जो पर्याप्त है, वह तो हमारे हाथों के निकट ही उपलब्ध है। जिसने गरीबी के साथ न्यायपूर्ण समझौता कर लिया है, वही वास्तव में धनी है।

अभी के लिए विदा।


Friday, 12 June 2026

सच्ची और झूठी मैत्री के संदर्भ में -- (पत्र - 3)

प्रिय लूसीलियस,

तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेतावनी देते हो कि मैं उससे उन बातों की चर्चा न करूँ जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हैं, यह कहते हुए कि तुम स्वयं भी उसके साथ ऐसी बातें साझा करने के अभ्यस्त नहीं हो। दूसरे शब्दों में, उसी पत्र में तुमने उसे अपना मित्र भी कहा और मित्र नहीं भी माना।

यदि तुमने 'मित्र' शब्द का प्रयोग सामान्य लोगों की तरह किया है, जैसे हम चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को 'माननीय सज्जन' कह देते हैं या रास्ते में मिलने वाले किसी व्यक्ति का नाम भूल जाने पर उसे 'आदरणीय महोदय' कहकर संबोधित करते हैं, तो ठीक है। लेकिन यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को मित्र मानते हो जिस पर तुम्हें उतना विश्वास नहीं जितना स्वयं पर है तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो और सच्ची मित्रता का अर्थ पर्याप्त रूप से नहीं समझते।

वास्तव में, मैं चाहता हूँ कि तुम अपने मित्र के साथ हर बात साझा करो; लेकिन सबसे पहले उस व्यक्ति को परखो। जब मित्रता स्थापित हो जाए तब पूरा यकीन करो; लेकिन मैत्री स्थापित करने से पहले उसका मूल्यांकन अवश्य करो। जो लोग पहले मित्र बना लेते हैं और बाद में उसका परीक्षण करते हैं, वे अपने कर्तव्यों को उलट देते हैं और भ्रमित कर देते हैं। वे थियोफ्रेस्टस के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं जिन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को परखकर ही उसे मित्र बनाना चाहिए न कि मित्र बनाने के बाद उसकी परीक्षा करनी चाहिए। लंबे समय तक विचार करो कि किसी व्यक्ति को अपना दोस्त बनाना अथवा या नहीं। लेकिन जब एक बार उसे स्वीकार करने का निर्णय कर लो तब उसे पूरे हृदय और आत्मा से अपनाओ। उसके साथ उतनी ही निर्भीकता से बात करो जितनी तुम स्वयं से करते हो।


                                                               New Fairy Tale by Belsky

जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि तुम्हारे पास ऐसा कोई राज़ न हो जिसे तुम अपने शत्रु को भी न बता सको। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें सामाजिक परंपरा गोपनीय रखती है इसलिए तुम्हें कम-से-कम अपनी चिंताओं और विचारों को अपने मित्र के साथ अवश्य साझा करना चाहिए। उस पर यकीन करो और तुम देखोगे कि वह निष्ठावान व्यक्ति में परिवर्तित हो रहा है।  

कुछ लोग धोखा खाने के भय से दूसरों को धोखा देना सिखा देते हैं। अपनी शंकाओं के कारण वे अपने मित्र को गलत करने का अवसर दे देते हैं। मेरे मित्र की उपस्थिति में मैं कोई बात क्यों छिपाऊँ? उसके साथ रहते हुए मैं स्वयं को अकेला क्यों समझूँ?

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जिनसे भी मिलते हैं उन्हें वे बातें बता देते हैं जो केवल मित्रों को ही बताई जानी चाहिए। वे अपनी हर परेशानी किसी भी आकस्मिक श्रोता पर उँडेल देते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग अपने सबसे निकट के लोगों पर भी विश्वास करने से डरते हैं और यदि संभव हो तो वे स्वयं पर भी विश्वास न करें, अपने रहस्यों को हृदय की गहराइयों में दबाकर रखते हैं। लेकिन हमें इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। हर किसी पर विश्वास करना भी दोष है और किसी पर विश्वास न करना भी। फिर भी मैं कहूँगा कि पहला दोष अधिक सरल और निष्कपट है जबकि दूसरा अधिक सुरक्षित।

इसी प्रकार तुम्हें दो प्रकार के लोगों को फटकारना चाहिए। एक वे जो कभी शांत नहीं बैठते और दूसरे वे जो हमेशा निष्क्रिय बने रहते हैं। अत्यधिक व्यस्तता से प्रेम करना परिश्रम नहीं है। यह केवल एक बेचैन और चिंतित मन की अस्थिरता है। और सच्चा आराम भी हर प्रकार की गतिविधि को कष्ट मानकर उससे दूर भागने में नहीं है। ऐसा आराम तो केवल आलस्य और जड़ता है।

इसलिए तुम्हें मेरे अध्ययन में पढ़ी हुई पोम्पोनियस की यह उक्ति याद रखनी चाहिए। "कुछ लोग इतने अँधेरे कोनों में सिमट जाते हैं कि वे दिन के उजाले में भी अंधकार ही देखते हैं।"

नहीं, मनुष्य को इन दोनों प्रवृत्तियों का समन्वय करना चाहिए। जो आराम करता है उसे काम भी करना चाहिए और जो काम करता है उसे आराम भी करना चाहिए।

इस विषय पर प्रकृति से परामर्श करो।  वह तुम्हें बताएगी कि उसने दिन और रात दोनों की रचना की है।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 11 June 2026

पठन और मन की छिटकती एकाग्रता के संदर्भ में -- (पत्र 2)


प्रिय लूसीलियस,

तुम मुझे जो लिखते हो और जो मैं सुनता हूँ, उसके आधार पर मैं तुम्हारे भविष्य के बारे में अच्छी राय बना रहा हूँ। तुम इधर-उधर नहीं भटकते और न ही बार-बार अपना निवास स्थान बदलकर स्वयं को विचलित करते हो; क्योंकि ऐसी बेचैनी एक अव्यवस्थित मन का संकेत है। मेरे विचार में, एक सुव्यवस्थित मन की पहली पहचान यह है कि व्यक्ति एक ही स्थान पर रह सके और अपने ही साथ समय बिता सके।

फिर भी सावधान रहो कि अनेक प्रकार के लेखकों और पुस्तकों का अध्ययन तुम्हें चंचल और अस्थिर न बना दे। यदि तुम ऐसे विचार प्राप्त करना चाहते हो जो तुम्हारे मन में दृढ़ता से स्थापित हो जाएँ तो तुम्हें कुछ चुनिंदा महान विचारकों के साथ टिककर रहना चाहिए और उनके कार्यों को अच्छी तरह आत्मसात करना चाहिए। जो व्यक्ति हर जगह होता है, वह वास्तव में कहीं भी नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति अपना सारा समय विदेश यात्राओं में बिताता है तो उसके बहुत-से परिचित तो बन जाते हैं पर मित्र नहीं बनते। ठीक ऐसा उन लोगों के साथ भी होता है जो किसी एक लेखक से गहरा परिचय स्थापित नहीं करते बल्कि सबके पास जल्दी-जल्दी और सतही रूप से जाते रहते हैं।


                                    Keats’ last moments in 1821, Joseph Severn

भोजन तब तक शरीर को लाभ नहीं पहुँचाता और न ही उसका अंग बनता है, जब तक वह पेट में ठहरकर पच न जाए। बार-बार दवा बदलने से रोग का उपचार बाधित होता है। बार-बार नई दवा लगाने से घाव नहीं भरता। यदि किसी पौधे को बार-बार उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, तब वह कभी मजबूत पेड़ में तब्दील नहीं हो सकता।

कोई भी वस्तु इतनी प्रभावशाली नहीं होती कि लगातार इधर-उधर किए जाने पर भी लाभ पहुँचा सके। इसी प्रकार बहुत-सी पुस्तकों का अध्ययन मन को बिखेर देता है। क्योंकि तुम अपनी सभी पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते इसलिए उतनी ही पुस्तक रखो जितनी तुम वास्तव में पढ़ सकते हो।

पर तुम कहोगे, "मैं पहले एक पुस्तक को थोड़ा-सा पढ़ना चाहता हूँ और फिर दूसरी को।" मैं कहता हूँ कि यह अत्यधिक अच्छी वाली भूख का लक्षण है जो अनेक प्रकार के व्यंजनों का स्वाद तो लेना चाहती है पर उनसे पोषण नहीं पाती। अलग-अलग तरह का अत्यधिक भोजन तृप्त नहीं करता बल्कि ऊब उत्पन्न करता है।

इसलिए तुम्हें हमेशा बेहतरीन लेखकों को पढ़ना चाहिए और जब बदलाव का मन हो तो उन्हीं लेखकों की ओर लौटना चाहिए जिन्हें तुम पहले पढ़ चुके हो। हर दिन कुछ ऐसा सीखो या जानो जो तुम्हें गरीबी, मृत्यु और अन्य दुर्भाग्यों का सामना करने के लिए मजबूत बनाए... और जब तुम अनेक विचारों को देख-पढ़ लो तब उनमें से एक विचार चुनो और उस दिन उसे पूरी तरह आत्मसात करो।

यह मेरी अपनी आदत है; जो अनेक बातें मैं पढ़ता हूँ, उनमें से किसी एक को मैं अपना बना लेता हूँ।

आज का विचार मुझे एपिक्यूरस से मिला है क्योंकि मैं कभी-कभी शत्रु के शिविर में भी जाता हूँ। एक भगोड़े की तरह नहीं बल्कि एक टोह लेने वाले व्यक्ति की तरह।

एपिक्यूरस कहता है: "संतोषपूर्ण गरीबी एक सम्मानजनक अवस्था है।"

वास्तव में यदि गरीबी में संतोष है तो वह किसी भी तरह से गरीबी नहीं रह जाती। गरीब वह नहीं है जिसके पास बहुत कम है बल्कि वह है जो और अधिक पाने की लालसा करता रहता है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने अपनी तिजोरी या गोदाम में कितना धन जमा किया है, उसके पास कितने पशु हैं अथवा वह कितना मुनाफा प्राप्त करता है इसके बाद भी यदि वह अपने पड़ोसी की संपत्ति पर नज़र रखता है और अपने पिछले लाभों के बजाय भविष्य में मिलने वाले लाभों की ही गणना करता रहता है? यदि तुम पूछो कि धन की उचित सीमा क्या है तो उसका उत्तर यह है कि सबसे पहले जरूरत के सामान या वस्तुओं की प्राप्ति और दूसरा उतना ही रखना जितना पर्याप्त है।   

अभी के लिए विदा
सेनेका 

On Discursiveness in Reading

 Judging by what you write me, and by what I hear, I am forming a good opinion regarding your future. You do not run hither and thither and distract yourself by changing your abode; for such restlessness is the sign of a disordered spirit. The primary indication, to my thinking, of a well-ordered mind is a man's ability to remain in one place and linger in his own company.

 Be careful, however, lest this reading of many authors and books of every sort may tend to make you discursive and unsteady. You must linger among a limited number of master thinkers, and digest their works, if you would derive ideas which shall win firm hold in your mind. Everywhere means nowhere. When a person spends all his time in foreign travel, he ends by having many acquaintances, but no friends. And the same thing must hold true of men who seek intimate acquaintance with no single author, but visit them all in a hasty and hurried manner.

 Food does no good and is not assimilated into the body if it leaves the stomach as soon as it is eaten; nothing hinders a cure so much as frequent change of medicine; no wound will heal when one salve is tried after another; a plant which is often moved can never grow strong.

There is nothing so efficacious that it can be helpful while it is being shifted about. And in reading of many books is distraction.

Accordingly, since you cannot read all the books which you may possess, it is enough to possess only as many books as you can read.

"But," you reply, "I wish to dip first into one book and then into another." I tell you that it is the sign of an overnice appetite to toy with many dishes: for when they are manifold and varied, they cloy but do not nourish. So you should always read standard authors; and when you crave a change, fall back upon those whom you read before. Each day acquire something that will fortify you against poverty, against death, indeed against other misfortunes as well; and after you have run over many thoughts, select one to be thoroughly digested that day.

This is my own custom; from the many things which I have read, claim some one part for myself.

The thought for today is one which I discovered in Epicurus; for I am wont to cross over even into the enemy's camp – not as a deserter but as a scout.

He says: "Contented poverty is an honourable estate." Indeed, if it be contented, it is not poverty at all. It is not the man who has too little but the man who craves more, that is poor. What does it matter how much a man has laid up in his safe, or in his warehouse, how large are his flocks and how fat his dividends, if he covets his neighbour's property, and reckons, not his past gains, but his hopes of gains to come? Do you ask what is the proper limit to wealth? It is, first, to have what is necessary, and, second, to have what is enough.

Farewell.

 

 

 

 

एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- (पत्र - 8)

प्रिय लूसीलियस  "तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फि...