Tuesday, 14 July 2026

महान दार्शनिकों के सदर्भ में -- पत्र - 64

 प्रिय लूसीलियस 


कल तुम हमारे साथ थे। अब यदि वास्तव में शिकायत करने का कोई कारण होता तो वह तभी होता जब तुम हमारे साथ केवल कल ही रहे होते। इसलिए मैंने कहा, 'हमारे साथ थे', क्योंकि तुम तो आज भी मेरे साथ हो। कल कुछ मित्र मेरे घर आए थे, इसलिए मेरे घर की रसोई से थोड़ा-सा धुआँ उठ रहा था। वैसा नहीं जैसा अमीरों और फैशनपरस्त लोगों की विशाल रसोइयों से उठता है, जिसे देखकर अग्निशमन दल तक सचेत हो जाए बल्कि केवल इतना-सा धुआँ, जो यह संकेत दे रहा था कि घर में अतिथि आए हुए हैं। भोजन के समय हमारी बातचीत अनेक विषयों पर घूमती रही। जैसा प्रायः भोज-सभा में होता है, हम किसी एक विषय को अंत तक नहीं ले गए बल्कि एक बात से दूसरी बात पर सहज ही चले जाते रहे। फिर एक पुस्तक का पाठ किया गया। वह क्विंटस सेक्स्टियस वरिष्ठ की रचना थी। निश्चय ही वे एक महान व्यक्ति थे और यद्यपि वे स्वयं इससे इनकार करते थे, फिर भी वे वास्तव में एक स्टोइक दार्शनिक थे। ईश्वर की शपथ! उस व्यक्ति में कितना अद्भुत ओज है, कितना प्राणबल है! ऐसा गुण हर दार्शनिक में नहीं मिलता। कुछ दार्शनिक अत्यंत प्रसिद्ध हैं किन्तु उनका लेखन नीरस और निर्जीव है। वे तर्क प्रस्तुत करते हैं, वाद-विवाद करते हैं, आपत्तियाँ उठाते हैं, पर पाठक के भीतर कोई उत्साह नहीं जगा पाते क्योंकि उनके अपने शब्दों में ही जीवन का अभाव होता है। किन्तु जब तुम सेक्स्टियस को पढ़ोगे तो तुम्हारे मुँह से अनायास निकलेगा, “यह व्यक्ति सचमुच जीवित है। यह ऊर्जावान है, स्वतंत्र है। यह सामान्य मनुष्यों से कहीं ऊपर उड़ता है। इसे पढ़कर मैं अपार आत्मविश्वास और महान उत्साह से भर उठता हूँ।”



    मैं तुम्हें बताता हूँ कि उन्हें पढ़ते समय मेरी अपनी मनःस्थिति कैसी हो जाती है। मेरा मन हर प्रकार के दुर्भाग्य को ललकारने के लिए व्याकुल हो उठता है। मैं मानो ऊँचे स्वर में पुकारना चाहता हूँ, “हे भाग्य! क्यों रुक गया है? अपना पूरा प्रहार कर। देख, मैं तैयार हूँ!” उस समय मैं अपने भीतर उसी मनुष्य का साहस अनुभव करता हूँ, जो स्वयं अपने लिए परीक्षा-भूमि खोजता है। ऐसा अवसर, जहाँ वह अपने धैर्य और वीरता का प्रमाण दे सके —

वह विनती करता है कि शांत झुंडों के बीच, उसे किसी झाग उड़ाते हुए जंगली वराह का सामना हो या फिर पर्वत-शिखर से उतरते हुए किसी सुनहरे सिंह का।

मेरा मन ऐसी किसी चुनौती की खोज करता है, जिस पर मैं विजय प्राप्त कर सकूँ। ऐसी किसी कठिनाई की, जिसे मैं अपने आत्म-प्रशिक्षण का भाग बनाकर धैर्यपूर्वक सह सकूँ। सेक्स्टियस की यही एक और विलक्षण विशेषता है। वे तुम्हें सच्चे सुख की महानता का दर्शन तो कराते हैं पर उसे प्राप्त करने की आशा तुमसे कभी नहीं छीनते। तुम्हें यह अवश्य अनुभव होता है कि वह आदर्श अभी तुमसे बहुत ऊँचा है फिर भी यह विश्वास बना रहता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से चाहे, वह उस ऊँचाई तक पहुँच सकता है।

    यही भावना स्वयं सद्गुण भी उत्पन्न करती है। तुम उसका आदर और प्रशंसा करते हो और साथ ही यह आशा भी रखते हो कि एक दिन तुम स्वयं भी उसे प्राप्त कर सकोगे। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, प्रज्ञा का चिंतन ही मेरे समय का बहुत बड़ा भाग अपने में समेट लेता है। उसे निहारते हुए मैं उतना ही विस्मित होता हूँ, जितना कभी-कभी आकाश को देखकर होता हूँ। उस आकाश को भी, जिसे मैं अनेक बार ऐसे देखता हूँ मानो पहली बार देख रहा हूँ।

    इसी कारण मैं दर्शन के उन महान आविष्कारों का भी आदर करता हूँ और उन महापुरुषों का भी, जिन्होंने उन्हें खोजा। यह सोचकर मेरा हृदय आनंद से भर उठता है कि मानो मुझे अनेक पूर्वजों की छोड़ी हुई एक महान विरासत प्राप्त हुई है। उन्होंने जो कुछ एकत्र किया, जिस ज्ञान के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया, वह सब मेरे लिए है। पर हमें भी एक योग्य गृहस्वामी की भाँति आचरण करना चाहिए। जैसे वह अपनी पैतृक संपत्ति में वृद्धि करता है, वैसे ही हमें भी इस बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत को समृद्ध करना चाहिए। जब यह धरोहर मुझसे आगे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचे तो वह पहले से अधिक समृद्ध हो। अभी भी बहुत-सा कार्य किया जाना शेष है। सदा शेष रहेगा। कोई भी बात उन लोगों को, जो आज से हजारों पीढ़ियों बाद जन्म लेंगे, इस महान कार्य में अपना योगदान देने से नहीं रोक सकती। 

    किन्तु यदि यह मान भी लिया जाए कि प्राचीनों ने सब कुछ खोज लिया था, तब भी एक कार्य ऐसा है जो सदैव नया बना रहेगा। दूसरों द्वारा की गई खोजों को व्यवहार में लाना, उन्हें ठीक प्रकार से समझना और व्यवस्थित रूप देना। मान लो, आँखों के उपचार के लिए आवश्यक सभी औषधियाँ हमें पहले से ही विरासत में मिल गई हों। तब मुझे नई दवाएँ खोजने की आवश्यकता नहीं होगी, परंतु मुझे उनका उपयोग रोग और परिस्थिति के अनुसार करना तो सीखना ही होगा। एक औषधि आँख की सूजन दूर करती है, दूसरी पलक की सूजन कम करती है, तीसरी अचानक होने वाले दर्द और आँसू बहने को रोकती है और चौथी दृष्टि को बेहतर बनाती है। किंतु इन सबका लाभ तभी मिलता है, जब तुम स्वयं भी अपना कर्तव्य निभाओ। औषधि को उचित मात्रा में तैयार करो और रोगी की अवस्था के अनुसार सही समय तथा सही विधि से उसका प्रयोग करो। मन के रोगों की औषधियाँ भी प्राचीन मनीषियों ने खोज ली थीं। पर उन्हें कब, कैसे और किस परिस्थिति में प्रयोग करना है। यह पता लगाना हमारा कार्य है। हमारे पूर्वजों ने निस्संदेह बहुत महान कार्य किए हैं, पर उनका कार्य अभी भी पूर्ण नहीं हुआ है।

    फिर भी हमें उन सबका आदर करना चाहिए बल्कि उनका सम्मान उसी श्रद्धा से करना चाहिए, जैसी हम देवताओं के प्रति रखते हैं। आखिर मैं उन महान पुरुषों की प्रतिमाएँ अपने पास क्यों न रखूँ ताकि वे मेरे मन को सत्कर्म के लिए प्रेरित करती रहें? मैं उनके जन्मदिवस क्यों न मनाऊँ? प्रत्येक अवसर पर सम्मानपूर्वक उनका नाम लेकर उन्हें श्रद्धांजलि क्यों न अर्पित करूँ? जितना सम्मान मैं अपने गुरुओं का करता हूँ, उतना ही सम्मान मुझे समस्त मानवजाति के उन महान आचार्यों का भी करना चाहिए, जिनसे हमें इतना महान कल्याण प्राप्त हुआ है।

    यदि मेरे सामने कोई कौंसुल या प्रेटर आ जाए तो मैं उसके पद का सम्मान करते हुए वही सब करूँगा जो प्रथा के अनुसार उचित है। घोड़े से उतरूँगा, अपना सिर अनावृत करूँगा और उसे मार्ग दूँगा। तो फिर बताओ, क्या मुझे मार्कस कैटो (ज्येष्ठ और कनिष्ठ), बुद्धिमान लेलियस, सुकरात, प्लेटो, ज़ेनो और क्लीन्थीस जैसे महापुरुषों का इससे भी अधिक सम्मानपूर्वक स्वागत नहीं करना चाहिए? निस्संदेह, मैं इन महान व्यक्तियों के प्रति गहरी श्रद्धा रखता हूँ। जब भी उनके महान नामों का उच्चारण होता है, मैं आदरवश खड़ा हो जाता हूँ।


अभी के लिए विदा 

शोक के संदर्भ में -- पत्र - 63

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे इस बात का दुःख है कि तुम्हारे मित्र फ्लैकस का निधन हो गया है। पर मैं चाहता हूँ कि तुम इस शोक में आवश्यकता से अधिक दुःखी न हो।


शगाल द्वारा  

    मैं तुमसे यह तो नहीं कहूँगा कि बिल्कुल भी शोक मत करो। यद्यपि मैं जानता हूँ कि वही सबसे अच्छा होता। पर ऐसी अडिग मानसिक दृढ़ता केवल उसी व्यक्ति में होती है, जो दुर्भाग्य से बहुत ऊपर उठ चुका हो। वह भी ऐसी घटना से क्षणभर के लिए अवश्य व्यथित होगा, पर केवल क्षणभर के लिए। जहाँ तक हमारी बात है, यदि हमारे आँसू अधिक न हों और हम शीघ्र ही स्वयं पर फिर से नियंत्रण पा लें तो हमारे आँसू क्षम्य हैं। मित्र के वियोग में तुम्हारी आँखें बिल्कुल सूखी भी न रहें, पर वे आँसुओं में डूब भी न जाएँ। रोओ, पर विलाप मत करो।

    क्या तुम्हें मेरा यह नियम कठोर प्रतीत होता है? फिर भी यूनान के महानतम कवि ने भी शोक मनाने के लिए केवल एक दिन को ही उचित माना है। वह तो यहाँ तक कहता है कि नायोबी ने भी अंततः भोजन करने का विचार किया।

    क्या तुम पूछते हो कि विलाप कहाँ से उत्पन्न होता है अथवा असीमित रुदन का स्रोत क्या है? अपने आँसुओं के द्वारा हम अपने दुःख को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। हम इसलिए नहीं रोते कि शोक हमें विवश करता है बल्कि इसलिए कि हम दूसरों के सामने अपना शोक प्रदर्शित करना चाहते हैं। लोग केवल अपने लिए दुःखी नहीं होते। कैसी दुर्भाग्यपूर्ण मूर्खता है! शोक में भी मानो एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा होती है।

    “तो फिर?” तुम पूछते हो, “क्या मैं अपने मित्र को भूल जाऊँ?” यदि तुम्हारी स्मृति केवल उतने समय तक ही बनी रहती है, जितने समय तक तुम्हारा शोक रहता है तो यह स्मरण बहुत अल्पकालिक है। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब कोई आकस्मिक बात तुम्हारे चेहरे पर फिर से मुस्कान ले आएगी। मैं कहता हूँ, बहुत जल्द तुम्हारी पीड़ा, चाहे वह कितनी ही तीव्र क्यों न हो शांत पड़ जाएगी और वियोग की प्रत्येक वेदना कम हो जाएगी। जैसे ही तुम अपने शोक का प्रदर्शन करना छोड़ दोगे, तुम्हारे चेहरे की उदासी भी समाप्त हो जाएगी। अभी तो तुम अपने शोक की मानो रक्षा कर रहे हो, फिर भी वह धीरे-धीरे तुमसे दूर होता जा रहा है। शोक जितना अधिक तीव्र होता है, उतनी ही जल्दी उसका अंत भी हो जाता है।

    आओ, हम यह प्रयास करें कि जो लोग इस संसार से जा चुके हैं, उनकी स्मृति हमारे लिए सुखद बन जाए। यदि उनकी याद केवल पीड़ा ही दे तो कोई भी स्वेच्छा से उसे बार-बार स्मरण नहीं करना चाहेगा। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रियजनों का नाम आते ही हमारे हृदय में एक कसक उठे। किंतु उस कसक में भी अपना एक विशेष आनंद छिपा होता है। हमारे मित्र एटालस कहा करते थ, “दिवंगत मित्रों की स्मृति वैसा ही आनंद देती है, जैसा हल्की खटास और मिठास से भरे सेबों का स्वाद या फिर पुराने मदिरा की मनभावन खटास। समय बीतने पर जो कुछ हमें पीड़ा देता है, वह सब मिट जाता है और केवल आनंद ही शेष रह जाता है।”

    यदि हम उनकी बात मानें तो जीवित और सकुशल मित्रों का स्मरण करना मानो मधुर पकवानों और शहद का स्वाद लेने जैसा है। जबकि जो मित्र इस संसार से चले गए हैं, उनका स्मरण एक ऐसी अनुभूति है जिसमें मिठास और कड़वाहट दोनों साथ-साथ होती हैं। फिर भी कौन इस बात से इनकार करेगा कि कभी-कभी तीखे और कड़वे स्वाद भी हमें प्रिय लगते हैं?

    मेरा अनुभव इससे भिन्न है। मेरे लिए दिवंगत मित्रों का स्मरण मधुर और सांत्वनादायक होता है। क्योंकि जब वे मेरे साथ थे, तब भी मैं उन्हें इस भावना के साथ चाहता था कि एक दिन उनसे बिछुड़ना पड़ सकता है।  और अब, जब वे इस संसार में नहीं हैं, तब भी मैं उन्हें इस भाव से स्मरण करता हूँ मानो वे आज भी मेरे साथ हों।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, वही करो जो न्याय और विवेक के अनुकूल हो। भाग्य ने तुम्हारे साथ जो किया है, उसका गलत अर्थ लगाना छोड़ दो। भाग्य ने तुमसे एक चीज़ अवश्य छीन ली है, पर यह भी मत भूलो कि वही भाग्य उसे तुम्हें देकर भी गया था।

    चूँकि हमें यह निश्चित रूप से कभी ज्ञात नहीं होता कि हमारे मित्र कितने समय तक हमारे साथ रहेंगे, इसलिए जब तक वे हमारे पास हैं, तब तक हमें उनके सान्निध्य का भरपूर आनंद लेना चाहिए। यह भी सोचो कि कितनी ही बार हम लंबी यात्राओं पर गए और उन्हें पीछे छोड़ आए। कितनी ही बार एक ही नगर में रहते हुए भी उनसे मिल न सके। तब हमें समझ में आएगा कि उनके जीवित रहते हुए ही हमने उनके साथ बिताने योग्य कितना समय खो दिया था। कुछ लोग अपने मित्रों के रहते हुए उनकी उपेक्षा करते हैं। जब वे इस संसार से चले जाते हैं, तब उनके लिए अत्यधिक शोक करते हैं। क्या ऐसी प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है? उन्हें अपने मित्रों से प्रेम तभी होता है, जब वे उन्हें खो चुके होते हैं! उन्हें यह भय सताता है कि कहीं लोगों को उनके प्रेम पर संदेह न हो जाए। इसलिए वे अपने शोक का और भी अधिक प्रदर्शन करते हैं। मानो वे अपने स्नेह का प्रमाण बहुत देर से खोजने का प्रयास कर रहे हों।

    यदि हमारे अन्य मित्र भी हैं तो हम उनके साथ अन्याय करते हैं और उनके सम्मान के योग्य भी नहीं रहते, यदि हम उन्हें उस मित्र के वियोग में कोई मूल्यवान सांत्वना देने योग्य नहीं समझते जो अब इस संसार में नहीं रहा। यदि हमारे पास कोई दूसरा मित्र ही नहीं है तो हम अपने साथ भाग्य से भी अधिक अन्याय कर रहे हैं। भाग्य ने हमसे केवल एक व्यक्ति को छीना है जबकि हम स्वयं उन सभी लोगों को अपने से दूर कर रहे हैं जिन्हें हम अपना मित्र बना सकते थे। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति एक से अधिक लोगों के साथ मित्रता नहीं कर सकता, वह वास्तव में उस एक से भी बहुत गहरा प्रेम नहीं करता। मान लो किसी व्यक्ति का एकमात्र वस्त्र खो जाए और वह दूसरा वस्त्र खोजकर अपने शरीर को ढकने और ठंड से बचने के बजाय केवल रोता-बिलखता रहे तो क्या तुम उसे मूर्ख नहीं कहोगे? जिस व्यक्ति से तुम प्रेम करते थे, वह अब इस संसार में नहीं है। इसलिए किसी और को अपना स्नेह दो। नए मित्र बनाना और प्रेम का संबंध स्थापित करना, शोक में डूबे रहने से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

    मैं जानता हूँ कि जो बात मैं अब कहने जा रहा हूँ, वह बहुत पुरानी और बार-बार दोहराई गई उक्ति है। फिर भी केवल इसलिए कि उसे सभी कह चुके हैं, मैं उसे छोड़ने वाला नहीं हूँ।

    समय स्वयं शोक का अंत कर देता है —

भले ही तुम स्वयं उसे समाप्त करने का निर्णय न लो। अंततः मनुष्य शोक करते-करते थक जाता है। किंतु एक विवेकशील व्यक्ति को यह सोचकर लज्जा होनी चाहिए कि उसके शोक का उपचार केवल समय के कारण हुआ। इससे कहीं बेहतर है कि तुम स्वयं अपने शोक का त्याग करो न कि शोक तुम्हारा साथ छोड़ दे। जब यह निश्चित है कि तुम चाहकर भी बहुत लंबे समय तक शोक नहीं कर सकते तो फिर जितनी जल्दी संभव हो, उतनी जल्दी उसे छोड़ देना ही उचित है।

    हमारे पूर्वजों ने स्त्रियों के लिए शोक की अवधि एक वर्ष निर्धारित की थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि उन्हें पूरे एक वर्ष तक शोक करना चाहिए बल्कि यह था कि वे उससे अधिक समय तक शोक न करें। पुरुषों के लिए तो शोक की कोई कानूनी अवधि निर्धारित ही नहीं की गई क्योंकि उनके लिए किसी भी अवधि तक शोक करते रहना सम्मानजनक नहीं माना गया। फिर भी उन स्त्रियों में भी जो मृतक की अर्थी से बड़ी कठिनाई से हटाई जाती हैं, जिन्हें शव से अलग करना पड़ता है, ऐसी एक भी स्त्री दिखाना कठिन है जिसके आँसू पूरे एक महीने तक लगातार बहते रहे हों। शोक से अधिक शीघ्र घृणित कोई और चीज़ नहीं बनती। जब वह नया होता है, तब लोगों की सहानुभूति और सांत्वना प्राप्त करता है। पर जब वह लंबा खिंच जाता है, तब वह केवल उपहास का विषय बन जाता है। यह उचित भी है क्योंकि उस समय तक वह या तो मूर्खता बन चुका होता है या मात्र दिखावा।

    और ये बातें मैं तुम्हें वही व्यक्ति लिख रहा हूँ, जिसने अपने प्रिय अनेयुस सेरेनस के निधन पर इतना असंयमित होकर विलाप किया था कि स्वयं मुझे ही अपनी इच्छा के विरुद्ध शोक से पराजित मनुष्य का उदाहरण बनना पड़ता है। किन्तु आज मैं अपने उस व्यवहार की स्वयं आलोचना करता हूँ। अब मैं समझता हूँ कि मेरे इतने गहरे शोक का मुख्य कारण यह था कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं था कि उसकी मृत्यु मेरी मृत्यु से पहले भी हो सकती है। मेरे मन में केवल यही बात थी कि वह मुझसे छोटा है, बहुत छोटा। मानो जन्म का क्रम ही हमारे भाग्य और मृत्यु का समय निर्धारित करता हो!

    इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी और अपने प्रियजनों, दोनों की मरणशीलता को सदैव स्मरण रखें। उस समय मुझे अपने आप से यह कहना चाहिए था, “मेरा प्रिय सेरेनस मुझसे आयु में छोटा है, पर इससे क्या अंतर पड़ता है? उचित तो यही है कि उसकी मृत्यु मेरे बाद हो किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि वह मुझसे पहले ही मर जाए।” चूँकि मैंने ऐसा नहीं सोचा, इसलिए भाग्य ने मुझे अचानक और पूरी तरह अप्रस्तुत अवस्था में आ घेरा। अब मैं यह बात सदा ध्यान में रखता हूँ कि केवल इतना ही नहीं कि प्रत्येक मनुष्य और प्रत्येक वस्तु को एक दिन नष्ट होना है बल्कि यह भी कि मृत्यु किसी निश्चित नियम या क्रम का पालन नहीं करती। जो कभी भी हो सकता है, वह आज भी हो सकता है।

    इसलिए, प्रिय लूसीलियस, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम भी शीघ्र ही उसी स्थान पर जाने वाले हैं, जहाँ वह पहुँच चुका है जिसके लिए हम शोक कर रहे हैं। यदि दार्शनिकों की यह बात सत्य हो कि मृत्यु के बाद कोई ऐसा लोक है जो हमें अपने भीतर स्थान देता है तो जिस व्यक्ति को हम खोया हुआ समझते हैं, वह वास्तव में नष्ट नहीं हुआ है वह तो केवल हमसे पहले वहाँ पहुँच गया है।


अभी के लिए विदा 

उचित चुनाव के संदर्भ में - पत्र 62

 प्रिय लूसीलियस 


जो लोग यह दिखाना चाहते हैं कि उनके कार्यों का बोझ उन्हें उदार विद्याओं के अध्ययन से वंचित कर देता है, वे असत्य बोलते हैं। यह सब केवल दिखावा है क्योंकि वे स्वयं ही अपने ऊपर नए-नए काम लादते रहते हैं। यदि वे अत्यधिक व्यस्त हैं तो उसका कारण वे स्वयं हैं। लूसीलियस, मेरे पास समय है। हाँ, मेरे पास वास्तव में समय है। मैं जहाँ भी रहता हूँ, अपने ही अधिकार में रहता हूँ। मैं अपने आपको कार्यों के हवाले नहीं कर देता। मैं केवल उन्हें अपने समय का उधार देता हूँ। मैं अपना समय नष्ट करने के बहाने नहीं खोजता। जहाँ कहीं भी मुझे ठहरने का अवसर मिलता है, वहीं मैं अपने विचारों को परखता हूँ और उनमें से कोई-न-कोई कल्याणकारी चिंतन प्राप्त कर लेता हूँ। जब मैं अपने मित्रों के साथ समय बिताता हूँ, तब भी मैं स्वयं से दूर नहीं होता। जिन लोगों के साथ केवल संयोगवश या किसी सार्वजनिक दायित्व के कारण मेरा संपर्क हो जाता है, उनके साथ मैं आवश्यकता से अधिक समय नहीं बिताता। इसके विपरीत, मैं स्वयं अपने लिए सर्वोत्तम संगति का चुनाव करता हूँ। अपना मन उन्हीं को समर्पित करता हूँ, चाहे वे किसी भी स्थान के हों और किसी भी युग में जीवित रहे हों। मैं अपने साथ दिमीत्रियस जैसे श्रेष्ठ पुरुष को लेकर चलता हूँ। मैं टायरियन बैंगनी वस्त्र पहनने वालों को छोड़कर उसी से संवाद करता हूँ और उसी का आदर करता हूँ, जो लगभग वस्त्रहीन है। मैं उसका आदर क्यों न करूँ? मैंने देखा है कि उसे किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है।


By Gogh 

    किसी भी मनुष्य के पास सब कुछ नहीं हो सकता पर ऐसा मनुष्य अवश्य हो सकता है जो सब कुछ तुच्छ समझ सके। धनवान बनने का सबसे शीघ्र मार्ग धन का तिरस्कार करना है। पर हमारा मित्र दिमीत्रियस इस प्रकार जीवन नहीं जीता कि मानो वह केवल सब वस्तुओं का तिरस्कार करता हो बल्कि वह इस प्रकार जीता है मानो उसने उन सब वस्तुओं को दूसरों के उपभोग के लिए छोड़ दिया हो।

इच्छा और मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 61

 प्रिय लूसीलियस 


आओ, अब उन वस्तुओं की इच्छा करना छोड़ दें, जिनकी हम पहले किया करते थे। मैं तो वास्तव में यही कर रहा हूँ। अब जब मैं वृद्ध हो गया हूँ तो मैंने उन इच्छाओं का त्याग कर दिया है, जिन्हें मैं बच्चा रहते हुए करता था। मेरा एकमात्र प्रयत्न, मेरा दिन-रात का एकमात्र विचार यही है कि अपने पुराने दोषों और दुर्बलताओं का अंत कर दूँ। मैं प्रयास करता हूँ कि मेरा एक-एक दिन पूरे जीवन के बराबर मूल्यवान बन जाए। ऐसा नहीं है कि मैं प्रत्येक दिन को अपना अंतिम दिन समझकर उससे चिपका रहता हूँ... बिल्कुल नहीं। फिर भी मैं उसे इस प्रकार देखता हूँ, मानो वह वास्तव में मेरा अंतिम दिन हो सकता है। मैं तुम्हें यह पत्र भी उसी भावना से लिख रहा हूँ, मानो लिखते-लिखते ही मृत्यु मुझे बुलाने वाली हो। मैं जाने के लिए तैयार हूँ। जीवन का आनंद मैं इसलिए ले पाता हूँ कि मुझे इस बात की अधिक चिंता नहीं रहती कि यह सब कितने समय तक चलेगा।


By Maria Popova 

    वृद्धावस्था से पहले मेरी चिंता अच्छी तरह जीने की थी। वृद्धावस्था में मेरी चिंता अच्छी तरह मरने की है। अच्छी तरह मरने का अर्थ है— स्वेच्छा से मृत्यु को स्वीकार करना। प्रयास करो कि तुम कभी भी अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य न करो। जिस कार्य को तुम विरोध करने पर करने के लिए विवश हो जाओगे, वही कार्य यदि अपनी इच्छा से करो तो वह विवशता नहीं रह जाती। मेरा आशय यह है कि जो व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक आदेश का पालन करता है, वह दासता के सबसे कटु पक्ष से बच जाता है। अर्थात वह काम करने से, जिसे वह करना नहीं चाहता। मनुष्य को दुःखी आदेश का पालन करना नहीं बनाता बल्कि अपनी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना उसे दुःखी बनाता है।

    इसलिए हमें अपने मन को इस प्रकार तैयार करना चाहिए कि परिस्थितियाँ हमसे जो कुछ चाहें, वही हमारी भी इच्छा बन जाए। सबसे बढ़कर, हमें अपने अंत के विषय में बिना किसी शोक के विचार करना सीखना चाहिए। हमें जीवन की तैयारी करने से पहले ही मृत्यु की तैयारी कर लेनी चाहिए। जीवन के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं। फिर भी हम जीवन की सुविधाओं के लिए लालची बने रहते हैं। हमें हमेशा लगता है कि हमारे पास कुछ न कुछ कमी है। यह भावना बनी ही रहती है। जीवन से तृप्ति न तो दिनों की संख्या से मिलती है और न वर्षों की लंबाई से। वह केवल मन की अवस्था से प्राप्त होती है। प्रिय लूसीलियस, मैंने अपना जीवन पूरी तरह पर्याप्त जिया है। अब मैं पूर्ण संतोष के साथ अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।


अभी के लिए विदा 

मनुष्य की अतृप्ति के संदर्भ में -- पत्र - 60

 प्रिय लूसीलियस 


मैं तुमसे असंतुष्ट हूँ, तुमसे असहमति रखता हूँ, तुम पर क्रोधित हूँ। क्या तुम अब भी उन्हीं वस्तुओं की कामना करते हो, जिनकी तुम्हारे लिए तुम्हारी धाय, तुम्हारे शिक्षक या तुम्हारी माँ कामना किया करते थे? क्या तुम्हें अब भी यह समझ में नहीं आया कि जिन बातों की वे तुम्हारे लिए इच्छा करते थे, उनमें से कितनी वास्तव में हानिकारक थीं? अरे, हमारे अपने सबसे निकट और प्रिय लोगों की प्रार्थनाएँ भी कितनी बार हमारे लिए अहितकारी सिद्ध होती हैं! और जब वे प्रार्थनाएँ सचमुच पूरी हो जाती हैं, तब तो वे और भी अधिक अनिष्टकारी बन जाती हैं। अब मुझे यह आश्चर्य नहीं होता कि बचपन से ही हम इतने प्रकार के कष्टों से घिरे रहते हैं क्योंकि हम अपने माता-पिता की ऐसी ही अहितकारी कामनाओं के बीच बड़े होते हैं। ईश्वर करे कि हम अपने लिए ऐसी प्रार्थना करें, जिसे पूरा करने में कुछ भी मूल्य न चुकाना पड़े।



    हम कब तक देवताओं से कुछ-न-कुछ माँगते रहेंगे? क्या हम अब भी अपना पेट स्वयं भरने में समर्थ नहीं हुए हैं? हमारे बोए हुए खेत इतने विशाल क्षेत्र में फैले हैं कि उनमें बड़े-बड़े नगर बस सकते हैं। कब तक? कब तक हमारी फसल काटने के लिए पूरी की पूरी आबादी लगी रहेगी? और एक ही भोजन की मेज़ सजाने के लिए कितने जहाज़ों को और एक से अधिक समुद्रों को पार करना पड़ेगा? एक बैल कुछ ही एकड़ चरागाह से तृप्त हो जाता है। एक ही वन एक से अधिक हाथियों के लिए पर्याप्त होता है। पर मनुष्य भूमि और समुद्र— दोनों का उपभोग करता है। ऐसा क्यों है? क्या प्रकृति ने हमें इतनी अतृप्त भूख दी है कि शरीर तो हमें छोटा-सा मिला है, फिर भी हम भोजन की लालसा में सबसे बड़े और सबसे अधिक खाने वाले पशुओं से भी आगे निकल जाएँ? ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमारी प्राकृतिक आवश्यकताएँ तो बहुत थोड़ी हैं। प्रकृति की माँगों को पूरा करने के लिए बहुत कम ही पर्याप्त होता है। हमारे व्यय का कारण शरीर की भूख नहीं, बल्कि हमारी महत्त्वाकांक्षा है। इसलिए, जैसा कि सालुस्त  ने कहा है, "जो लोग केवल अपने पेट की ही चिंता करते हैं, उन्हें मनुष्यों की अपेक्षा पशुओं की जाति का सदस्य समझना चाहिए।"

    वास्तव में कुछ लोगों को तो हमें जीवित प्राणियों की श्रेणी में भी नहीं गिनना चाहिए बल्कि उन्हें चलते-फिरते शव समझना चाहिए। मनुष्य तभी वास्तव में जीवित होता है, जब वह बहुत-से लोगों के लिए उपयोगी हो। तब भी जीवित होता है, जब वह स्वयं अपने लिए उपयोगी हो। जो लोग आलस्य में डूबे घरों में छिपे रहते हैं, वे मानो कब्र में ही पड़े हों। चाहो तो उनके द्वार के ऊपर संगमरमर पर यह लिखवा दो —

“इनकी मृत्यु
इनसे पहले ही
हो चुकी थी।”


अभी के लिए विराम 

आनंद के संदर्भ में -- पत्र - 59

 प्रिय लूसीलियस 


आपका पत्र पढ़कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। यद्यपि आपको मुझे सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग करने की अनुमति देनी होगी। मेरे शब्दों को उनके स्टोइक अर्थों में मत लीजिए। हमारे सिद्धांत के अनुसार 'सुख' (Pleasure) एक दोष है। फिर भी, जैसा भी हो, 'सुख' वह शब्द है जिसका प्रयोग हम सामान्यतः मन की प्रसन्न अवस्था के लिए करते हैं।



    मैं जानता हूँ कि यदि हम शब्दों को अपने दार्शनिक नियमों के अनुसार ही बाँध दें तो 'सुख' निंदनीय है। जबकि 'आनंद' केवल बुद्धिमान व्यक्ति का गुण है क्योंकि आनंद उस मन की उन्नत अवस्था है जो वास्तविक और अपने स्वाभाविक शुभ की ओर उन्मुख होता है। फिर भी, सामान्य व्यवहार में हम अक्सर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति के कौंसल (Consul) चुने जाने पर हमें बहुत आनंद हुआ या किसी के विवाह पर या उसकी पत्नी के पुत्र-जन्म देने पर। जबकि ये घटनाएँ आनंद का कारण होने से बहुत दूर, प्रायः भविष्य के दुःख का आरंभ सिद्ध होती हैं। क्योंकि आनंद का स्वभाव ही ऐसा है कि वह कभी समाप्त नहीं होता और न ही अपने विपरीत में परिवर्तित होता है। इसलिए जब हमारे कवि वर्जिल कहते हैं, 'मन के दुष्ट आनंद' तो उन्होंने यह बात साहित्यिक दृष्टि से तो अत्यन्त सुंदर कही है, पर दार्शनिक दृष्टि से यह शुद्ध नहीं है क्योंकि कोई भी वास्तविक आनंद दुष्ट नहीं हो सकता। उन्होंने यहाँ 'आनंद' शब्द का प्रयोग वास्तव में 'सुख-भोग' के अर्थ में किया है। इसी प्रकार अपना आशय व्यक्त किया है क्योंकि जिन लोगों की वे बात कर रहे हैं, वे उन वस्तुओं से प्रसन्न होते हैं जो वास्तव में उनके लिए अहितकर होती हैं।

    फिर भी, यह कहने में मैं गलत नहीं था कि आपका पत्र पढ़कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। क्योंकि यदि कोई अविवेकी व्यक्ति किसी सम्मानजनक कारण से भी प्रसन्न होता है, तब भी मैं उसकी उस भावना को 'सुख' ही कहूँगा। क्योंकि वह अस्थिर होती है, शीघ्र ही अपने विपरीत रूप में बदल जाती है। किसी मिथ्या शुभ में विश्वास के कारण उत्पन्न होती है। इसलिए वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाती और सीमा का अतिक्रमण कर बैठती है।

    लेकिन अब मैं अपने मूल विषय पर लौटता हूँ और तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे पत्र में मुझे सबसे अधिक क्या अच्छा लगा। तुम्हारा अपनी भाषा पर पूरा नियंत्रण है। तुम अपनी वाक्पटुता के प्रवाह में बह नहीं जाते और न ही उसे अपनी इच्छित सीमा से अधिक बढ़ने देते हो। बहुत-से लोग किसी आकर्षक वाक्यांश के मोह में पड़कर उस विषय से भटक जाते हैं, जिस पर वे लिखना शुरू करते हैं। तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होता। तुम्हारा प्रत्येक वाक्य संक्षिप्त है और विषय के बिल्कुल अनुकूल है। तुम उतना ही कहते हो जितना कहना चाहते हो, किंतु तुम्हारे शब्दों का अर्थ उनसे कहीं अधिक व्यक्त कर देता है। यह एक और भी महत्त्वपूर्ण बात का संकेत है। यह दर्शाता है कि तुम्हारा मन भी किसी अनावश्यक या अतिशयोक्तिपूर्ण विचार से भरा हुआ नहीं है।

    हाँ, मुझे कुछ रूपक अवश्य मिले, पर वे ऐसे नहीं थे जो अत्यधिक साहसिक या जोखिमपूर्ण हों बल्कि वे पहले से प्रचलित और स्वीकृत रूपक थे। मुझे बिंबों का भी प्रयोग मिला। यदि कोई यह कहे कि बिंबों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और उन्हें केवल कवियों के लिए ही उचित माने तो मैं समझूँगा कि उसने हमारे प्राचीन लेखकों को एक बार भी नहीं पढ़ा है। वे ऐसे समय के लेखक थे, जब शैलीगत आडंबर को निरंतर लक्ष्य नहीं बनाया जाता था। वे सरलता से लिखते थे और इस प्रकार अपनी बात कहते थे कि उसका आशय स्पष्ट रूप से समझ में आ जाए। उनकी रचनाएँ उपमाओं से परिपूर्ण हैं। मेरे विचार में उपमाएँ आवश्यक हैं। इसलिए नहीं कि कवि उनका प्रयोग करते हैं बल्कि इसलिए कि वे हमारी बौद्धिक दुर्बलता का सहारा बनती हैं तथा विषय को वक्ता और श्रोता, दोनों के लिए अधिक स्पष्ट और सजीव बना देती हैं।

    संयोग से, मैं अभी-अभी सेक्स्टियस को पढ़ रहा था। एक कठोर और दृढ़ स्वभाव का व्यक्ति। उसके दर्शन के शब्द भले ही यूनानी हों पर उसके आदर्श और मूल्य पूरी तरह रोमन हैं। उसके द्वारा दी गई एक उपमा ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया। वह उस सेना का उदाहरण देता है जो वर्गाकार (चौकोर) व्यूह में आगे बढ़ती है और युद्ध के लिए हर समय तैयार रहती है क्योंकि यह आशंका रहती है कि शत्रु किसी भी दिशा से आक्रमण कर सकता है। वह कहता है, “बुद्धिमान व्यक्ति को भी यही करना चाहिए। उसे अपने सद्गुणों को चारों ओर इस प्रकार तैनात रखना चाहिए कि जब भी कोई विपत्ति आए, उसका पूरा सुरक्षा-दल तत्पर रहे और अपने सेनापति के केवल एक संकेत पर बिना किसी अव्यवस्था के तुरंत कार्य करने लगे।” हम किसी महान सेनापति की सेना में देखते हैं कि उसके आदेश का पालन सभी सैनिक एक साथ करते हैं। सेना की व्यवस्था ऐसी होती है कि एक व्यक्ति द्वारा दिया गया संकेत एक ही समय में घुड़सवारों और पैदल सैनिकों, दोनों तक पहुँच जाता है। सेक्स्टियस कहता है कि हमें भी अपने भीतर ऐसी ही तत्परता चाहिए बल्कि हमें इसकी उससे भी अधिक आवश्यकता है। सेनाएँ अनेक बार बिना किसी वास्तविक कारण के ही शत्रु से भयभीत हो जाती हैं। जिस मार्ग को वे सबसे अधिक संकटपूर्ण समझती हैं, वही प्रायः सबसे सुरक्षित निकलता है। परंतु मूर्खता के लिए कहीं भी सुरक्षा का क्षेत्र नहीं होता। उसे ऊपर से भी भय रहता है, नीचे से भी। दाएँ-बाएँ दोनों ओर से, आगे से भी और पीछे से भी। वह हर वस्तु से काँपती रहती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार नहीं होती। जो उसकी सहायता करने आते हैं, उनसे भी डर जाती है। इसके विपरीत, बुद्धिमान व्यक्ति हर प्रकार के आक्रमण के विरुद्ध सुदृढ़ और सुरक्षित रहता है। उसका संकल्प अटल होता है। वह न निर्धनता, न शोक, न अपयश और न ही पीड़ा के आक्रमण के सामने पीछे हटता है। वह बिना विचलित हुए उनका सामना करता है और आवश्यकता पड़ने पर उनके बीच भी निर्भीक होकर आगे बढ़ जाता है।

    जहाँ तक हमारी बात है, हमें बाँधने वाली बहुत-सी चीज़ें हैं और हमारी शक्ति को क्षीण करने वाले भी अनेक कारण हैं। हम बहुत लंबे समय से अपने दोषों में पड़े हुए हैं। इसलिए उनसे आसानी से मुक्त नहीं हो सकते। बात केवल इतनी नहीं है कि हम उनसे दूषित हो गए हैं बल्कि हम तो उनमें पूरी तरह डूब चुके हैं। पर अब एक रूपक से दूसरे रूपक की ओर बढ़ने के बजाय, मैं एक प्रश्न उठाना चाहता हूँ, जिस पर मैं अक्सर विचार करता हूँ। मूर्खता का हम पर इतना गहरा अधिकार क्यों है? पहला कारण यह है कि हम उसका साहसपूर्वक प्रतिरोध नहीं करते। हम अपनी समस्त शक्ति लगाकर अपने उपचार का प्रयास नहीं करते। दूसरा कारण यह है कि बुद्धिमानों द्वारा खोजे गए सत्यों पर हमारा पर्याप्त विश्वास नहीं होता। हम उन्हें अपने हृदय में स्थान नहीं देते। इतने महान उद्देश्य के लिए भी हम बहुत कम परिश्रम करते हैं। जो व्यक्ति अपने अधिकांश समय अपने ही दोषों को बढ़ाने में लगाता है और केवल बचा-खुचा समय उन्हें दूर करने की शिक्षा पाने में देता है, वह अपने अवगुणों से लड़ने के लिए आवश्यक ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकता है? हममें से कोई भी किसी विषय में गहराई तक नहीं उतरता। हम केवल ऊपरी बातें जानकर ही संतुष्ट हो जाते हैं और समझते हैं कि दर्शन के लिए कुछ क्षण दे देना ही व्यस्त लोगों के लिए पर्याप्त ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक है।

    सबसे बड़ी बाधा यह है कि हम बहुत जल्दी अपने आप से संतुष्ट हो जाते हैं। यदि कोई हमें अच्छा, विवेकशील और चरित्रवान कहने को तैयार मिल जाए तो हम तुरंत उस वर्णन को स्वीकार कर लेते हैं। थोड़ी-सी प्रशंसा से भी हमारा मन नहीं भरता। निर्लज्ज चापलूसी हमारे ऊपर जितनी भी प्रशंसा का ढेर लगा दे, हम उसे अपना उचित अधिकार समझकर स्वीकार कर लेते हैं। जब लोग हमें श्रेष्ठ, यहाँ तक कि अत्यंत बुद्धिमान बताते हैं तो हम उनकी बात मान लेते हैं जबकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे अक्सर और खुलकर झूठ बोलते हैं। हम अपने प्रति इतने पक्षपाती हो जाते हैं कि जिन गुणों का हमारे आचरण से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता, उनके लिए भी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न हो उठते हैं। कोई व्यक्ति कठोर दंड देते समय भी स्वयं को 'सबसे दयालु' कहलाते हुए सुनता है। चोरी करते हुए भी 'सबसे उदार' और मद्यपान तथा व्यभिचार में लिप्त रहते हुए भी 'सबसे संयमी' कहलाता है। परिणामस्वरूप, हमारे भीतर बदलने की कोई इच्छा ही नहीं बचती क्योंकि हम पहले से ही यह मान बैठे होते हैं कि हम उत्कृष्टता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं।

    एक बार, जब सिकंदर भारत में इधर-उधर घूमते हुए उन जातियों को लूट रहा था, जो अपने पड़ोसी लोगों तक के लिए भी लगभग अपरिचित थीं, तभी उसे एक तीर आ लगा। यह उस समय की बात है जब वह एक नगर की घेराबंदी किए हुए उसकी प्राचीरों के चारों ओर घूम-घूमकर उनकी कमजोर जगहों का पता लगा रहा था। वह लंबे समय तक अपने आरंभ किए हुए कार्य को पूरा करने के दृढ़ निश्चय के साथ डटा रहा। किंतु जब रक्तस्राव रुक गया और घाव पर पपड़ी जम गई, तब पीड़ा और बढ़ गई। घोड़े पर सवार होने पर उसके पैर की संवेदना भी जाती रही। अंततः उसे युद्ध छोड़ना पड़ा। तब उसने कहा, “सब लोग शपथ लेकर कहते हैं कि मैं बृहस्पति का पुत्र हूँ लेकिन यह घाव पुकार-पुकारकर बता रहा है कि मैं एक मनुष्य हूँ।” हमें भी यही करना चाहिए। चापलूसी हमारे पद और प्रतिष्ठा के अनुसार हम सबको मूर्ख बना देती है। इसलिए हमें चापलूसों से कहना चाहिए, “तुम मुझे बुद्धिमान कहते हो लेकिन मैं स्वयं देखता हूँ कि मैं कितनी ऐसी वस्तुओं की इच्छा करता हूँ जो बिल्कुल निरर्थक हैं। कितनी ऐसी चीज़ों की लालसा रखता हूँ जो मेरे लिए हानिकारक हैं। मुझे तो आज तक यह भी नहीं मालूम कि भोजन और पेय में कहाँ रुकना चाहिए जबकि पशु भी तृप्ति का अनुभव होते ही अपनी सीमा पहचान लेते हैं। आज तक मैं अपने ही पेट की क्षमता नहीं जान पाया हूँ।”

    अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम कैसे पहचान सकते हो कि तुम अभी बुद्धिमान नहीं बने हो। बुद्धिमान व्यक्ति आनंद से परिपूर्ण होता है। वह प्रसन्न, शांत और निर्भय रहता है। वह देवताओं के समान आत्मविश्वास और संतुलन के साथ जीवन जीता है। अब स्वयं को देखो। यदि तुम कभी निराश नहीं होते, यदि भविष्य की किसी आशा या चिंता से तुम्हारा मन विचलित नहीं होता, यदि तुम्हारी मानसिक अवस्था दिन-रात समान, स्थिर, सीधी और अपने आप में संतुष्ट रहती है, तब निश्चय ही तुमने मनुष्य जीवन के सर्वोच्च कल्याण को प्राप्त कर लिया है। लेकिन यदि तुम हर दिशा में और हर प्रकार के सुख की खोज करते फिरते हो तो समझ लो कि तुम बुद्धिमत्ता से उतने ही दूर हो, जितने आनंद से। तुम्हारा लक्ष्य तो आनंद है, पर तुम गलत मार्ग पर चल रहे हो। तुम सोचते हो कि धन, वैभव और सम्मान के बीच तुम्हें आनंद मिल जाएगा। अर्थात् तुम चिंता के बीच आनंद खोज रहे हो। जिन वस्तुओं के पीछे तुम इसलिए भागते हो कि वे तुम्हें सुख और प्रसन्नता देंगी, वास्तव में वही दुःख और क्लेश का कारण बन जाती हैं।

    हर व्यक्ति जिसे तुम देखते हो, आनंद की खोज में लगा हुआ है। लेकिन कोई यह नहीं जानता कि महान और स्थायी आनंद कहाँ प्राप्त होता है। कोई उसे दावतों और भोग-विलास में खोजता है। कोई चुनावों और समर्थकों की भीड़ में। कोई अपनी प्रेमिका में और कोई ऐसे निरर्थक विद्या-प्रदर्शन तथा साहित्य-अध्ययन में, जो मन की वास्तविक व्याधि का उपचार नहीं कर सकते। ये सभी लोग आकर्षक प्रतीत होने वाले, परंतु क्षणिक प्रलोभनों से धोखा खा जाते हैं। यह ठीक मद्यपान के समान है, जो एक घंटे के उन्मत्त उल्लास का मूल्य लंबे समय तक रहने वाले सिरदर्द और पीड़ा से वसूल करता है। या फिर बड़ी भीड़ की तालियों और जय-जयकार के समान है, जिसे प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए भारी चिंता और व्याकुलता का मूल्य चुकाना पड़ता है।

    अतः इस बात पर गंभीरता से विचार करो कि बुद्धिमत्ता का फल स्थिर और अडिग आनंद है। बुद्धिमान का मन चंद्रलोक के ऊपर स्थित आकाश के समान होता है— सदैव निर्मल, शांत और अविचल। इसलिए यदि बुद्धिमत्ता के साथ सदा आनंद जुड़ा रहता है तो तुम्हारे पास उसे पाने की प्रबल इच्छा रखने का पर्याप्त कारण है। किंतु यह आनंद केवल एक ही स्रोत से उत्पन्न होता है— अपने सद्गुणों के प्रति सजग और आश्वस्त चेतना से। जो व्यक्ति साहसी नहीं है, जो न्यायप्रिय नहीं है और जो संयमी नहीं है, वह सच्चे आनंद का अनुभव करने में सक्षम नहीं हो सकता।

    तुम पूछते हो, “क्या कहना चाहते हो? क्या मूर्ख लोग भी आनंदित नहीं होते?” होते तो हैं, पर उनका आनंद उतना ही वास्तविक होता है जितना शिकार पकड़ लेने पर सिंह का। जब लोग मदिरा और वासना में स्वयं को पूरी तरह थका डालते हैं, जब उनके दुर्गुण रात समाप्त होने पर भी उनका साथ नहीं छोड़ते और जब शरीर की स्वाभाविक सीमा से अधिक भोगे गए सुख सड़ने लगते हैं और पीड़ा का कारण बन जाते हैं, तब वे दुःख में डूबकर वर्जिल की वह प्रसिद्ध पंक्ति दोहराते हैं —

“तुम जानते हो कि हमने वह अंतिम रात छलपूर्ण सुखों के बीच कैसे बिताई थी।”

    वास्तव में, भोग-विलास में डूबे लोग तो मानो हर रात ऐसे ही छलपूर्ण सुखों के बीच बिताते हैं, जैसे वह सचमुच उनकी अंतिम रात हो।

     परंतु जो आनंद देवताओं को प्राप्त है और उन लोगों को भी, जो देवताओं के समान जीवन जीने का प्रयास करते हैं, उसमें न कोई विराम होता है और न ही उसका कोई अंत। यदि उसका स्रोत बाहर की किसी वस्तु में होता तो उसका अंत भी संभव होता। किंतु उसका स्रोत किसी दूसरे के हाथ में नहीं है। इसलिए न कोई दूसरा उसे दे सकता है और न ही उससे छीन सकता है। जिसे भाग्य ने दिया ही नहीं, उसे भाग्य छीन भी नहीं सकता।


विदा 

Friday, 10 July 2026

प्लेटो के विचारों के बारे में -- पत्र - 58 (सेनेका के पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


आज मुझे हमारी भाषा की अत्यन्त दरिद्रता बल्कि उसकी लगभग निर्धनता का अनुभव पहले से कहीं अधिक तीव्रता से हुआ। संयोगवश हम प्लेटो के विषय में चर्चा कर रहे थे। ऐसी असंख्य बातें सामने आईं जिनके लिए हमें शब्दों की आवश्यकता थी पर वे हमें मिल नहीं सके। वास्तव में, उनमें से कुछ बातों के लिए कभी शब्द विद्यमान थे। किन्तु हमारी आज की अत्यधिक परिष्कार-प्रियता और भाषाई नखरों के कारण वे प्रचलन से लुप्त हो गए हैं।



    निर्धन और फिर भी नखरेबाज़! यह तो असह्य बात है। यूनानी लोग जिस डंक मारने वाली मक्खी को ओएस्ट्रुस कहते हैं, जो पशुओं के झुंड को आतंकित करके उन्हें तितर-बितर कर देती है और पहाड़ों की ढलानों पर इधर-उधर भगा देती है, उसे हमारी भाषा में पहले असिलुस कहा जाता था। इसके प्रमाण के लिए तुम वर्जिल का कथन देख सकते हो—

“अल्बुर्नुस के प्रदेश में और सिलारिस के निकट हरे-भरे बलूत के वनों में एक मक्खी बहुतायत से पाई जाती है। रोमवासी उसे ‘असिलुस’ कहते हैं जबकि यूनानी उसे ‘ओएस्ट्रुस’ कहते हैं। वह अत्यन्त उग्र होती है। उसकी तीखी भनभनाहट से भयभीत पशुओं के झुंड पूरे जंगल में तितर-बितर हो जाते हैं।”

    मेरा विचार है कि इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वह पुराना शब्द अब प्रचलन में नहीं रहा। पर इस विषय को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ। कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके आगे आज उपसर्ग (प्रिफिक्स) लगाया जाता है। जबकि पहले वे बिना उपसर्ग के ही प्रयुक्त होते थे। उदाहरण के लिए, लोग पहले 'तलवार से निर्णय करना' कहते थे न कि 'तलवार से निर्णीत करना' (अर्थात् उपसर्ग सहित रूप का प्रयोग नहीं करते थे)। इस बात का प्रमाण भी वर्जिल से मिलता है—

“धरती के विभिन्न प्रदेशों में जन्मे विशालकाय योद्धा
आपस में आमने-सामने आए
और तलवार के बल पर अपना निर्णय किया।”

    आज उस शब्द का बिना उपसर्ग वाला प्रयोग पूरी तरह लुप्त हो गया है। इसी प्रकार प्राचीन लोग 'यदि मैं आदेश दूँ' के स्थान पर ऐसा रूप प्रयोग करते थे जिसका अर्थ था 'यदि मैं आदेश करूँ'; बाद के समय में उसके स्थान पर उपसर्गयुक्त रूप प्रचलित हो गया। इस बात के लिए तुम्हें मेरे कथन पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। वर्जिल पर विश्वास करो—

“दूसरी सेना मेरे साथ चल पड़े,
जहाँ कहीं भी मैं आदेश दूँ।”

    मैंने यह सारा भाषाशास्त्रीय विवेचन इसलिए नहीं किया कि यह दिखा सकूँ कि मैंने व्याकरणाचार्यों और साहित्य-विदों के बीच कितना समय नष्ट किया है बल्कि इसलिए कि तुम्हें यह स्पष्ट कर सकूँ कि एनियस और अकियस की शब्दावली का कितना बड़ा भाग अब प्रचलन से बाहर हो चुका है। यहाँ तक कि वर्जिल जैसे कवि की रचनाओं में भी जिन्हें लोग आज भी प्रतिदिन बड़े ध्यान से पढ़ते हैं। ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जो अब हमारी भाषा से लुप्त हो चुके हैं।

    तुम पूछोगे, “इन सब प्रारम्भिक बातों का उद्देश्य क्या है? तुम आखिर किस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते हो?” मैं यह बात तुमसे नहीं छिपाऊँगा। यदि संभव हो तो मैं तुम्हारे कानों को ‘एसेन्शिया’ (essentia) शब्द को स्वीकार करने के लिए तैयार करना चाहता हूँ। यदि यह शब्द तुम्हारे कानों को अप्रिय भी लगे, तब भी मैं इसका प्रयोग करूँगा। इस शब्द के समर्थन में मेरे पास सिसेरो का प्रमाण है। निश्चय ही उनकी भाषिक संपदा पर किसी को संदेह नहीं हो सकता। यदि तुम किसी अधिक निकटवर्ती लेखक का प्रमाण चाहते हो तो मैं फैबियानस का नाम ले सकता हूँ। ऐसे लेखक का जिसकी अभिव्यक्ति अत्यन्त सहज, प्रभावशाली और सुरुचिपूर्ण थी और जिसकी भाषा इतनी शुद्ध थी कि वह हमारे वर्तमान युग के कठोर भाषाई मानकों पर भी खरी उतरती है।

    प्रिय लूसीलियस, मैं और क्या कर सकता हूँ? यूनानी शब्द ओउसिया (ousia) का अनुवाद मैं कैसे करूँ? क्योंकि यह एक ऐसा अनिवार्य दार्शनिक पद है, जिसका अर्थ है— वह सत्ता या तत्त्व जो समस्त वस्तुओं का मूल आधार है। इसीलिए मैं तुमसे इस शब्द का प्रयोग करने की अनुमति माँगता हूँ। फिर भी, तुमने जो यह छूट मुझे दी है, उसका उपयोग मैं यथासंभव संयम से करूँगा। संभव है कि मुझे केवल यह संतोष ही पर्याप्त लगे कि आवश्यकता पड़ने पर मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ।

    तुमने मुझे यह छूट तो दे दी, पर उससे क्या लाभ? जिस विचार को व्यक्त करने के लिए मैंने अपनी भाषा की अपर्याप्तता की शिकायत की है, उसे मैं लैटिन में किसी भी प्रकार पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता। जब तुम्हें यह पता चलेगा कि जिस शब्द का मैं अनुवाद नहीं कर पा रहा हूँ, वह केवल एक ही अक्षरांश (सिलेबल) का है, तब तुम हमारी रोमन भाषा की सीमाओं पर मुझसे भी अधिक खेद व्यक्त करोगे। क्या तुम जानना चाहते हो कि वह शब्द कौन-सा है? वह है— तो ऑन (to on)। तुम शायद यह सोच रहे हो कि मैं कुछ अधिक ही कठिनाई पैदा कर रहा हूँ। जबकि उसका अनुवाद तो सामने ही है—क्वोद एस्ट (quod est), अर्थात् 'जो है'। किन्तु मेरी दृष्टि में 'जो है' (quod est) और तो ऑन (to on) में पर्याप्त अंतर है। मुझे एक संज्ञा के स्थान पर क्रिया का प्रयोग करने के लिए विवश होना पड़ता है। फिर भी, यदि कोई दूसरा उपाय नहीं है, तो मैं 'जो है' (that which is) ही लिखूँगा।

    हमारे एक मित्र, जो अत्यन्त विद्वान हैं, आज कह रहे थे कि प्लेटो तो ऑन (to on) शब्द का छह भिन्न अर्थों में प्रयोग करते हैं। मैं उन सभी का वर्णन करूँगा। पर उससे पहले मुझे यह बताना होगा कि जीनस (genus) और प्रजाति (species) जैसी भी चीज़ें होती हैं। इस समय हम उस मूल जीनस की खोज कर रहे हैं जिस पर अन्य सभी प्रजातियाँ निर्भर करती हैं, जिससे सभी विभाजन उत्पन्न होते हैं और जिसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। यदि हम वस्तुओं को एक-एक करके देखें और पीछे की ओर चलते जाएँ तो अंततः हम उसी मूल तत्त्व तक पहुँच जाएँगे। अरस्तू के अनुसार 'मनुष्य' एक प्रजाति (species) है। 'घोड़ा' एक प्रजाति है। 'कुत्ता' भी एक प्रजाति है। इसलिए हमें उस समान विशेषता की खोज करनी चाहिए जो इन सबको एक सूत्र में बाँधती है। ऐसी किसी व्यापक सत्ता की जो इन सबको अपने भीतर समेटे हुए हो और जिसके अधीन ये सभी आते हों। वह क्या है? वह है, 'प्राणी' (animate creature)। इस प्रकार 'मनुष्य', 'घोड़ा' और 'कुत्ता'— इन सभी के ऊपर एक सामान्य जीनस स्थापित होती है। वह है—'प्राणी'।

    किन्तु कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जिनमें जीवन तो होता है पर वे प्राणी (animate creatures) नहीं होतीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि अनिमा अर्थात जीवनदायी तत्त्व, वृक्षों और झाड़ियों में भी विद्यमान होता है। इसी कारण हम कहते हैं कि वे भी जीवित रहते हैं और मरते हैं। अतः 'जीवित वस्तुएँ' (living things) इससे भी उच्चतर श्रेणी में आएँगी क्योंकि इस वर्ग के अंतर्गत प्राणी भी आते हैं और वनस्पतियाँ भी।

    लेकिन कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं जो जीवित नहीं होतीं, जैसे—पत्थर। इसलिए 'जीवित वस्तुओं' से भी पहले एक और व्यापक श्रेणी होगी और वह है— 'शरीर' (body)। मैं इस जीनस (genus) का विभाजन इस प्रकार करूँगा। सभी शरीर दो प्रकार के होते हैं या तो वे जीवित होते हैं या फिर निर्जीव।

    किन्तु 'शरीर' (body) से भी ऊपर एक और व्यापक श्रेणी है। क्योंकि हम कहते हैं कि कुछ वस्तुएँ साकार (corporeal) हैं और कुछ निराकार (incorporeal)। इसलिए वह कौन-सी जीनस होगी जिसके अंतर्गत ये दोनों आती हैं? वह वही होगी जिसे हमने, यद्यपि यह नाम पूरी तरह उपयुक्त नहीं है, 'जो है' (that which is) कहा है। इस जीनस का विभाजन इस प्रकार होगा, 'जो है' (that which is) या तो साकार है या निराकार। यही, यदि मुझे ऐसा कहने की अनुमति हो, प्रथम और प्राथमिक जीनस (primary genus) है। वह सार्वभौमिक जाति जिसके ऊपर कोई दूसरी जाति नहीं है। अन्य सभी जातियाँ वास्तव में जातियाँ तो हैं पर साथ ही वे किसी और व्यापक जाति की प्रजातियाँ (species) भी हैं। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य एक जीनस (genus) है क्योंकि उसके भीतर अनेक प्रजातियाँ या उपवर्ग समाहित हैं जैसे, विभिन्न राष्ट्र (यूनानी, रोमी, पार्थियन) या विभिन्न वर्ण (श्वेत, श्याम, पीत)। इसके अतिरिक्त उसके अंतर्गत अनेक व्यक्ति भी आते हैं जैसे, कैटो, सिसेरो और लुक्रेतियस। इस प्रकार 'मनुष्य' उस दृष्टि से जाति है कि उसके अंतर्गत अनेक इकाइयाँ आती हैं। किन्तु वह प्रजाति भी है क्योंकि वह स्वयं किसी अधिक व्यापक श्रेणी के अधीन है। परन्तु 'जो है' (that which is) यह सार्वभौमिक और मूल जाति, अपने ऊपर किसी अन्य जाति को नहीं रखती। वही समस्त वस्तुओं का प्रारम्भिक आधार है। अन्य सभी श्रेणियाँ उसी के अधीन आती हैं।

    स्टोइक दार्शनिक इसके भी ऊपर एक और इससे भी अधिक मूलभूत जीनस (genus) स्थापित करना चाहते हैं। उसके विषय में मैं अभी थोड़ी देर में कहूँगा। पर पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जिस जाति का मैंने अभी वर्णन किया है, उसे सर्वोच्च स्थान देना उचित है क्योंकि उसके भीतर सभी वस्तुएँ समाहित हैं। मैं 'जो है' (that which is) का विभाजन इस प्रकार करता हूँ। या तो वह साकार (corporeal) है या निराकार (incorporeal)। इसके अतिरिक्त कोई तीसरी प्रजाति (species) नहीं है। अब मैं 'शरीर' (body) का विभाजन कैसे करूँ? इस प्रकार कि सभी शरीर या तो सजीव हैं या निर्जीव। फिर 'सजीव वस्तुओं' (living things) का विभाजन कैसे करूँ? एक प्रकार से इस प्रकार, कुछ में मन (mind) होता है और कुछ में केवल जीवन (life)। या दूसरे प्रकार से इस प्रकार, कुछ में प्रेरणा या स्वाभाविक गति (impulse) की क्षमता होती है। वे चलते-फिरते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं जबकि कुछ पृथ्वी में जड़ें जमाए रहते हैं, अपनी जड़ों के माध्यम से पोषण ग्रहण करते हैं और बढ़ते हैं। अब 'प्राणियों' (animate creatures) का विभाजन किन प्रजातियों में किया जाए? वे या तो नश्वर (mortal) होते हैं या अमर (immortal)।

    कुछ स्टोइक दार्शनिकों का मत है कि सबसे मूलभूत जीनस (primary genus) 'कुछ' (something) है। वे ऐसा क्यों मानते हैं। इसका कारण भी मैं यहाँ बताता हूँ। वे कहते हैं, 'विश्व-प्रकृति में कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जो वास्तव में अस्तित्व रखती हैं। कुछ ऐसी हैं जो अस्तित्व नहीं रखतीं। फिर भी, जो वस्तुएँ वास्तव में नहीं हैं, वे भी किसी न किसी रूप में विश्व के दायरे में आती हैं अर्थात वे जो केवल मन में उत्पन्न होती हैं, जैसे सेंटौर (आधा मनुष्य, आधा घोड़ा), दैत्य, और वे सभी रूप जिनकी रचना कल्पनाशक्ति करती है। वे मन में एक प्रकार की छवि तो बना लेते हैं। यद्यपि उनका वास्तविक अस्तित्व या पदार्थ (substance) नहीं होता।”

    अब मैं उस विषय पर लौटता हूँ जिसका उल्लेख करने का मैंने तुमसे वचन दिया था कि प्लेटो 'जो है' (that which is) का छह प्रकार से विभाजन कैसे करते हैं। पहला 'जो है' ऐसा है जिसे न आँखों से देखा जा सकता है न स्पर्श किया जा सकता है और न ही किसी अन्य इन्द्रिय से ग्रहण किया जा सकता है। उसे केवल बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, 'मनुष्य' अपनी सामान्य या जातिगत (generic) अवस्था में आँखों के सामने उपस्थित नहीं होता। आँखों से तो केवल उसका विशिष्ट रूप (specific) दिखाई देता है जैसे, सिसेरो या कैटो। इसी प्रकार 'प्राणी' (animate creature) दिखाई नहीं देता। वह केवल विचार का विषय है। जो दिखाई देते हैं, वे उसकी प्रजातियाँ हैं जैसे, घोड़ा और कुत्ता।

    प्लेटो जिन वस्तुओं को 'जो है' (that which is) कहते हैं, उनमें दूसरी वह है जो अन्य सभी वस्तुओं से श्रेष्ठ और उनसे ऊपर है। उनके अनुसार यही 'सर्वोच्च सत्ता' (preeminent being) है। जिस प्रकार 'कवि' शब्द सामान्यतः उन सभी व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है जो कविता रचते हैं, परन्तु यूनानियों में समय के साथ यह शब्द केवल एक ही व्यक्ति का बोध कराने लगा है। इसलिए जब तुम 'कवि' शब्द सुनते हो तो तुम्हारे मन में केवल 'होमर' का ही विचार आता है। तो यह 'सर्वोच्च सत्ता' क्या है? निस्संदेह वह ईश्वर है क्योंकि वही समस्त वस्तुओं से महान और अधिक सामर्थ्यवान है।

    तीसरा प्रकार उन वस्तुओं का है जिन्हें वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' कहा जाता है। उनकी संख्या असंख्य है, पर वे हमारी दृष्टि की पहुँच से परे हैं। क्या तुम पूछते हो कि वे क्या हैं? वे प्लेटो के दर्शन की विशिष्ट अवधारणाएँ हैं, जिन्हें वे आइडियाज़ (Ideas) कहते हैं। इन्हीं से वे सभी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं जिन्हें हम देखते हैं। प्रत्येक वस्तु का रूप इन्हीं के अनुरूप निर्मित होता है। ये आइडियाज़ अमर हैं, अपरिवर्तनशील हैं और अविनाशी हैं। अब आइडिया क्या है या अधिक ठीक कहें, प्लेटो के अनुसार आइडिया क्या है— इसे सुनो। 'आइडिया उन वस्तुओं का शाश्वत प्रतिरूप (eternal model) है जो प्रकृति के अनुसार अस्तित्व में आती हैं।' इस परिभाषा को तुम्हारे लिए और स्पष्ट करने के उद्देश्य से मैं इसमें थोड़ा स्पष्टीकरण जोड़ता हूँ। मान लो कि मैं तुम्हारा चित्र बनाना चाहता हूँ। उस चित्र के लिए तुम मेरे सामने एक प्रतिरूप (model) के रूप में उपस्थित हो। तुम्हें देखकर मेरा मन तुम्हारे रूप की एक विशेष छवि ग्रहण करता है और उसी के अनुसार अपने कार्य को आकार देता है। इसलिए तुम्हारा वह रूप, जो मुझे मार्गदर्शन देता है और मेरे चित्र को स्वरूप प्रदान करता है तथा जिससे उसकी प्रतिकृति बनाई जाती है, वही आइडिया है। इसी प्रकार प्रकृति में ऐसे असंख्य शाश्वत प्रतिरूप विद्यमान हैं। मनुष्यों के, विभिन्न प्रकार की मछलियों के, वृक्षों के और अन्य सभी वस्तुओं के। प्रकृति जिन-जिन वस्तुओं को उत्पन्न करती है, वे सभी इन्हीं शाश्वत प्रतिरूपों के अनुसार आकार ग्रहण करती हैं।

    चौथा स्थान एइदोस (eidos) अर्थात रूप (form) का है। अब यह एइदोस क्या है? इसे समझने के लिए तुम्हें ध्यानपूर्वक सुनना होगा। यदि विषय कठिन लगे तो उसका दोष मुझे नहीं प्लेटो को देना क्योंकि इस प्रकार के सूक्ष्म भेद बिना कठिनाई के समझे नहीं जा सकते। अभी कुछ देर पहले मैंने एक चित्रकार का उदाहरण दिया था। जब वह चित्रकार रंगों से वर्जिल का चित्र बनाना चाहता था तो वह स्वयं वर्जिल को देखता था। वर्जिल का वास्तविक रूप जो बनने वाले चित्र का आदर्श प्रतिरूप (model) था, वही आइडिया (Idea) था। उस प्रतिरूप को देखकर कलाकार ने जो रूप अपने मन में ग्रहण किया और जिसे उसने अपनी कृति में उतार दिया, वही एइदोस (eidos) है। अब तुम पूछोगे कि दोनों में अंतर क्या है? एक आदर्श प्रतिरूप (model) है। दूसरा उस प्रतिरूप से ग्रहण किया गया रूप (form) जिसे कलाकार अपनी रचना में मूर्त रूप देता है। कलाकार पहले का अनुकरण करता है और दूसरे का निर्माण करता है। उदाहरण के लिए, किसी मूर्ति का एक रूप होता है। वही उसका एइदोस है। पर जिस मूल प्रतिरूप को देखकर मूर्तिकार ने वह मूर्ति बनाई, उसका भी एक रूप होता है वही आइडिया है। यदि तुम्हें यह भेद और स्पष्ट चाहिए तो इसे इस प्रकार भी समझ सकते हो। एइदोस कृति (work) के भीतर विद्यमान होता है जबकि आइडिया कृति के बाहर होता है। केवल बाहर ही नहीं बल्कि कृति के अस्तित्व में आने से पहले से ही विद्यमान रहता है।

    पाँचवाँ प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व सामान्य अर्थ में माना जाता है। यही वे वस्तुएँ हैं जिनसे हमारा प्रत्यक्ष संबंध होता है। जैसे, 'समस्त वस्तुएँ', 'मनुष्य', 'पालतू पशु' और 'वस्तुएँ'। छठा प्रकार उन वस्तुओं का है जिनका अस्तित्व केवल एक प्रकार से या मानो अस्तित्व जैसा है जैसे, शून्य (void) और समय (time)।

    प्लेटो उन सभी वस्तुओं को, जिन्हें हम देख सकते हैं या स्पर्श कर सकते हैं, उन वस्तुओं की श्रेणी से बाहर रखते हैं जो उनके मत में वास्तविक और शुद्ध अर्थ में 'अस्तित्ववान' हैं। क्योंकि वे निरंतर परिवर्तनशील हैं। वे लगातार घटती और बढ़ती रहती हैं। हममें से कोई भी व्यक्ति वृद्धावस्था में वैसा नहीं रहता जैसा वह युवावस्था में था। हममें से कोई भी आज प्रातः वैसा नहीं है जैसा वह कल था। हमारे शरीर तीव्र गति से बहती हुई नदियों की तरह निरंतर बहते चले जा रहे हैं। तुम जो कुछ भी देखते हो, वह समय के साथ-साथ निरंतर बीतता और बदलता रहता है। हमारी दृष्टि के सामने उपस्थित कोई भी वस्तु स्थिर नहीं रहती। मैं स्वयं भी, जबकि मैं तुम्हें इन परिवर्तनों का वर्णन कर रहा हूँ, उसी दौरान बदल चुका हूँ।

    इसी का आशय हेराक्लाइटस के उस कथन से है, “हम एक ही नदी में दो बार उतरते भी हैं और नहीं भी उतरते।” नदी का नाम तो वही रहता है, पर उसका जल आगे बढ़ चुका होता है। यह बात नदी के संबंध में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, पर ठीक यही स्थिति मनुष्य की भी है। हमें भी समय की धारा निरंतर बहाए लिए जा रही है। उसका प्रवाह किसी नदी से कम तीव्र नहीं है। इसी कारण मुझे आश्चर्य होता है कि हम कितने विवेकहीन हैं, जो इस शरीर जैसी क्षणभंगुर वस्तु से इतना प्रेम करते हैं। मृत्यु से इतने भयभीत रहते हैं जबकि प्रत्येक क्षण हमारी पूर्व अवस्था की मृत्यु ही तो है। जब वही घटना प्रतिदिन घट रही है तो उसके केवल एक बार घटने से भयभीत होने का क्या कारण है?

    मैं यह बता चुका हूँ कि मनुष्य एक ऐसा पदार्थ है जो निरंतर परिवर्तनशील है, नश्वर है और हर प्रकार के प्रभाव के अधीन है। समस्त ब्रह्मांड भी। यद्यपि वह चिरस्थायी और अजेय है। फिर भी निरंतर परिवर्तित होता रहता है और कभी भी एक-सा नहीं रहता। क्योंकि उसके भीतर जो कुछ पहले था, वह सब तो बना रहता है। परंतु वह उन्हें पहले की अपेक्षा भिन्न रूप में धारण करता है। वह केवल उनके विन्यास और व्यवस्था को बदल देता है।

    तुम कहोगे, “तुम्हारे इन सूक्ष्म भेदों से मुझे क्या लाभ होने वाला है?” यदि मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा, प्रत्यक्ष रूप से कोई विशेष लाभ नहीं। किन्तु जैसे कोई नक्काशी करने वाला कारीगर, लंबे समय तक अत्यन्त सूक्ष्म काम करते-करते थक जाने पर, अपनी आँखों को विश्राम देने और, जैसा हम कहते हैं, उन्हें फिर से तरोताज़ा करने के लिए कुछ देर अपना ध्यान हटा लेता है उसी प्रकार हमें भी कभी-कभी अपने मन को विश्राम देना चाहिए और किसी हल्के-फुल्के बौद्धिक मनोरंजन से उसे ताज़गी प्रदान करनी चाहिए। फिर भी, हमारा मनोरंजन भी सार्थक होना चाहिए। यदि तुम उसमें मन लगाकर भाग लोगे तो उससे भी तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा अवश्य प्राप्त होगा जो भविष्य में तुम्हारे लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

    प्रिय लूसीलियस, मेरी तो यही आदत है कि मैं प्रत्येक विचार से, चाहे वह दर्शन से कितना ही दूर क्यों न हो— कुछ-न-कुछ उपयोगी बात निकालने का प्रयास करता हूँ और उसे किसी अच्छे उद्देश्य के लिए काम में लाता हूँ। अभी जिन विषयों की मैंने चर्चा की, उनसे चरित्र-सुधार का भला क्या संबंध हो सकता है? प्लेटो के आइडियाज़ मुझे एक बेहतर मनुष्य कैसे बना सकते हैं? उनसे मुझे ऐसा क्या मिलेगा जो मेरी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में सहायता करे? शायद केवल यही शिक्षा कि वे सभी वस्तुएँ, जो हमारी इन्द्रियों को लुभाती हैं, हमें आकर्षित करती हैं और हमारी वासनाओं को उत्तेजित करती हैं, प्लेटो के अनुसार वास्तविक अर्थ में अस्तित्ववान नहीं हैं। इस प्रकार वे केवल आभास हैं। क्षणिक प्रतीतियाँ जो थोड़े समय के लिए दिखाई देती हैं। उनमें से कोई भी स्थायी या दृढ़ नहीं है। फिर भी हम उन्हें इस प्रकार चाहते हैं, मानो वे सदा बनी रहेंगी या मानो वे सदा के लिए हमारी ही बनी रहेंगी।

    हम स्वयं भी दुर्बल और परिवर्तनशील हैं। भ्रमों के बीच खड़े हैं। इसलिए हमें अपने मन को उन वस्तुओं की ओर लगाना चाहिए जो शाश्वत हैं। हमें ऊपर उठना चाहिए और आश्चर्य के साथ समस्त वस्तुओं के शाश्वत प्रतिरूपों का तथा उनके बीच निवास करने वाले ईश्वर का दर्शन करना चाहिए। चूँकि ईश्वर अपनी सृष्टि की वस्तुओं को अमर नहीं बना सकता था क्योंकि पदार्थ की प्रकृति इसमें बाधक थी इसलिए अपनी दिव्य व्यवस्था में उसने हमें मृत्यु के विरुद्ध यह उपाय प्रदान किया कि हम विवेक के द्वारा शरीर की सीमाओं और दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करें। वास्तव में सभी वस्तुएँ इसलिए बनी नहीं रहतीं कि वे स्वभाव से अमर हैं बल्कि इसलिए कि उनका शासक उनकी रक्षा करता है। यदि वे स्वयं अमर होतीं तो उन्हें किसी संरक्षक की आवश्यकता ही न होती। सृष्टिकर्ता अपनी शक्ति से पदार्थ की दुर्बलता पर विजय पाकर उन्हें सुरक्षित रखता है। अतः हमें उन सभी वस्तुओं का तिरस्कार करना चाहिए जो इतनी तुच्छ हैं कि यह भी निश्चित नहीं कहा जा सकता कि उनका वास्तविक अस्तित्व है भी या नहीं।

    साथ ही हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि यदि दैवी व्यवस्था (प्रोविडेन्स) इस समस्त ब्रह्मांड की रक्षा करती है जो हमारी ही भाँति नश्वर है तो हमारी अपनी विवेकपूर्ण व्यवस्था भी इस तुच्छ शरीर के जीवन को कुछ समय तक और बढ़ा सकती है, बशर्ते हम उन इच्छाओं पर शासन और नियंत्रण रखना सीख लें जो प्रायः मृत्यु का कारण बनती हैं। प्लेटो ने अपने जीवन का सावधानीपूर्वक संचालन करके वृद्धावस्था तक जीवन प्राप्त किया। यह सत्य है कि उनका शरीर स्वभावतः सुदृढ़ था और वे सौभाग्यशाली भी थे। उनके चौड़े वक्षस्थल के कारण ही उन्हें 'प्लेटो' नाम मिला था। पर समुद्री यात्राओं के कष्टों ने उनके स्वास्थ्य को बहुत क्षीण कर दिया था। फिर भी, संयमित जीवन, अपने स्वास्थ्य की सतर्क देखभाल और इन्द्रिय-वासना को भड़काने वाली वस्तुओं पर नियंत्रण के कारण, उन्होंने अनेक बाधाओं के बावजूद दीर्घायु प्राप्त की। मेरा विश्वास है कि तुम जानते होगे कि अपनी इस सावधानीपूर्ण जीवन-पद्धति के कारण प्लेटो ने पूरे इक्यासी वर्ष का जीवन पूरा किया और अपने जन्मदिन के ही दिन, एक भी दिन कम हुए बिना, उनका देहावसान हुआ।

    इसी कारण एथेंस में उपस्थित कुछ फ़ारसी ज्योतिषियों ने उनकी मृत्यु के बाद उनके सम्मान में अग्नि-बलि अर्पित की। उनका विश्वास था कि चूँकि प्लेटो ने नौ गुणा नौ अर्थात इक्यासी जो उनके अनुसार सर्वाधिक पूर्ण संख्या थी, को पूरा करके जीवन समाप्त किया था। इसलिए उनका भाग्य साधारण मनुष्यों से कहीं अधिक महान था। किन्तु मेरा विचार है कि यदि तुम्हें उतने वर्षों के बदले कुछ दिन कम स्वीकार करने पड़ें और उस प्रकार के सम्मान का त्याग भी करना पड़े तो तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। फिर भी, संयमपूर्ण जीवन वृद्धावस्था को कुछ और लंबा अवश्य कर सकता है। यद्यपि मैं यह नहीं मानता कि वृद्धावस्था ऐसी वस्तु है जिसकी लालसा करनी चाहिए, फिर भी उसे ठुकराना भी उचित नहीं है। जहाँ तक संभव हो, अपने ही साथ बने रहना सुखद है, बशर्ते कि तुमने स्वयं को ऐसा बना लिया हो कि तुम्हारा अपना साथ तुम्हें अच्छा लगे।

    अब मैं उस प्रश्न पर अपना मत व्यक्त करता हूँ जो तुमने उठाया है। क्या अत्यन्त जर्जर वृद्धावस्था का तिरस्कार करना उचित है? अर्थात क्या मनुष्य को मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहने के बजाय स्वयं अपने जीवन का अंत कर देना चाहिए? मेरा विचार है कि केवल निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा करना कायरता के बहुत निकट है। ठीक उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति मदिरा के प्रति इतना आसक्त हो कि वह पात्र की अंतिम बूँद तक ही नहीं बल्कि तलछट तक भी पी जाए। किन्तु मेरा प्रश्न यह है, क्या जीवन का अंतिम भाग वास्तव में उसी तलछट के समान है या फिर वही उसका सबसे निर्मल और श्रेष्ठ अंश है? बशर्ते कि मन विकृत न हुआ हो, इन्द्रियाँ सुरक्षित हों और मन की सेवा करने में समर्थ हों तथा शरीर समय से पहले इतना जर्जर और निष्प्राण न हो गया हो कि वह अपने स्वाभाविक कार्य भी न कर सके। क्योंकि इसमें बहुत बड़ा अंतर है कि कोई व्यक्ति जीवन को लंबा कर रहा है या केवल मृत्यु की प्रक्रिया को लंबा खींच रहा है। पर यदि शरीर अब किसी प्रकार की सेवा करने में समर्थ नहीं रहा तो फिर उस पीड़ित मन को मुक्त कर देना अनुचित क्यों माना जाए?

    संभव है कि आवश्यकता पड़ने से कुछ पहले ही निर्णय लेना अधिक उचित हो ताकि जब वह समय वास्तव में आ पहुँचे, तब ऐसा न हो कि तुम निर्णय लेने में ही असमर्थ हो जाओ। दुःख और असहायता से भरा जीवन जीने का जोखिम, शीघ्र मृत्यु के जोखिम से कहीं अधिक बड़ा है। यदि ऐसा है तो थोड़े-से समय का त्याग करके इतने बड़े जोखिम से बच निकलने का अवसर न लेना मूर्खता ही होगी। बहुत कम लोगों को ऐसा सौभाग्य मिलता है कि दीर्घ वृद्धावस्था उन्हें बिना किसी शारीरिक या मानसिक क्षति के मृत्यु तक पहुँचा दे। इसके विपरीत, अधिकांश लोग अपने अंगों के उपयोग से वंचित होकर बिस्तर तक सीमित हो जाते हैं। क्या तुम्हें सचमुच यह अधिक क्रूर प्रतीत होता है कि मनुष्य अपने जीवन का कुछ अंश छोड़ दे बजाय इसके कि वह अपने जीवन का अंत स्वयं करने का अधिकार ही खो बैठे?

    यह मत सोचकर मेरी बात सुनने से इनकार मत करो कि यह विचार सीधे तुम्हारे ही विषय में है। मैं जो कह रहा हूँ, उसका मूल्यांकन उसके अपने गुण-दोषों के आधार पर करो। मैं वृद्धावस्था का त्याग तब तक नहीं करूँगा, जब तक वह मुझे मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ रहने दे अर्थात मेरे उस श्रेष्ठ भाग, मेरे विवेक और मेरे मन को अक्षुण्ण रखे। पर यदि वह मेरे मन पर आघात करने लगे, उसे धीरे-धीरे नष्ट करने लगे और मुझे केवल जीवित रखे, जीवन जीने योग्य न छोड़े, तब मैं उस जर्जर और ढहते हुए भवन से स्वयं बाहर निकल जाऊँगा। मैं केवल रोग से बचने के लिए मृत्यु का वरण नहीं करूँगा, यदि वह रोग उपचार योग्य हो और मेरे मन के लिए बाधक न हो। केवल पीड़ा के कारण भी मैं अपने ऊपर हाथ नहीं उठाऊँगा क्योंकि ऐसी मृत्यु पराजय होगी। किन्तु यदि मुझे यह निश्चित रूप से ज्ञात हो जाए कि मुझे निरंतर बिना किसी विराम के, पीड़ा सहनी पड़ेगी तो मैं वहाँ से विदा हो जाऊँगा। पीड़ा के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि वह मुझे उन सभी बातों से वंचित कर देगी जो जीवन को जीने योग्य बनाती हैं। जो व्यक्ति केवल पीड़ा के कारण मर जाता है, वह दुर्बल और आलसी है। जो व्यक्ति केवल पीड़ा सहने के लिए ही जीवित रहता है, वह मूर्ख है।

    पर मैं बहुत अधिक विस्तार में चला गया हूँ। इस विषय के अतिरिक्त भी इतनी सामग्री शेष है कि उस पर पूरे दिन चर्चा की जा सकती है। किन्तु जो व्यक्ति एक पत्र तक समाप्त नहीं कर पा रहा, वह अपने जीवन का अंत कैसे करेगा? अतः अब विदा... यह विदा का शब्द तुम निश्चय ही मृत्यु पर मेरे इस निरंतर चले आ रहे विचार-विमर्श से अधिक प्रसन्नता के साथ पढ़ोगे।

सेनेका 

महान दार्शनिकों के सदर्भ में -- पत्र - 64

 प्रिय लूसीलियस  कल तुम हमारे साथ थे। अब यदि वास्तव में शिकायत करने का कोई कारण होता तो वह तभी होता जब तुम हमारे साथ केवल कल ही रहे होते। इस...