7— गुर्जिएफ़ बनाम उस्पेन्स्की?
बीएलज़ेबब्स टेल्स टू हिज़ ग्रैंडसन (Beelzebub’s Tales to His Grandson), जिसे गुर्जिएफ़
अपने शिक्षण का सार मानते थे, बारह
सौ से अधिक पृष्ठों की है। उस्पेन्स्की की ‘इन सर्च ऑफ़ द मिरैक्युलस’ (In
Search of the Miraculous) जो
निस्संदेह गुर्जिएफ़ के विचारों का सबसे अच्छा संक्षिप्त विवरण है, चार सौ से अधिक पृष्ठों की है। एक
बुद्धिमान और सद्भावनापूर्ण पाठक के लिए भी यह एक बड़ी समस्या है।
गुर्जिएफ़ और उस्पेन्स्की के अनुसार, यह समस्या अपरिहार्य है। पुस्तक की यह लम्बाई पाठक से एक
निश्चित प्रयास की माँग करती है और यह प्रयास अनिवार्य है, यदि इन विचारों को केवल पूरा का पूरा निगल जाने के बजाय
वास्तव में समझना और आत्मसात करना है।
फिर भी उस्पेन्स्की की अपनी पुस्तक उनके मूल विचार से एक
समझौता है। उनका मूल विचार यह था कि इन विचारों को केवल शिक्षक से शिष्य तक सीधे
पहुँचाया जा सकता है और उन्हें लिखित रूप में पहुँचाने का कोई भी प्रयास उनके मूल
सार को पतला कर देगा और इस प्रकार उन्हें विकृत कर देगा।
उस्पेन्स्की को आधुनिक युग की उस प्रवृत्ति से परेशानी थी
जिसमें महत्वपूर्ण विचारों को आम लोगों के लिए सरल बना दिया जाता है जैसे, ‘रिलेटिविटी मेड ईजी, कांट फॉर बिगीनर्स’ (Relativity
Made Easy, Kant for Beginners)। लेकिन
वे एक महत्वपूर्ण बात को नज़रअंदाज़ कर रहे थे। ऐसी पुस्तकें आवश्यक रूप से आलसी
लोगों के लिए नहीं होतीं। यदि आप बिल्कुल शुरू से कांट या सापेक्षता के सिद्धान्त
को सीखना चाहते हैं तो
निश्चय ही आपके लिए किसी सरल विवरण से शुरुआत करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि आप सीधे ‘द क्रिटीक ऑफ प्योर रीज़न’ (The
Critique of Pure Reason)
या आइंस्टीन के संकलित गणितीय शोध-पत्रों में उतर जाएँ।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए, आइए देखें कि क्या गुर्जिएफ़ तक पहुँचने के मार्ग को कुछ कम
भयावह बनाया जा सकता है।
हम इसकी शुरुआत गुर्जिएफ़ और उस्पेन्स्की के बीच के संघर्ष
से कर सकते हैं। बेनेट लिखते हैं, “गुर्जिएफ़ अक्सर शिकायत करते थे कि उस्पेन्स्की ने अपने
अत्यधिक बौद्धिक दृष्टिकोण के कारण अपने शिष्यों को बिगाड़ दिया था और यह कि वे उन
लोगों के साथ बेहतर काम कर सकते थे जो बिना किसी तैयारी के उनके पास आते थे।” और
हम पहले ही केनेथ वॉकर की यह टिप्पणी देख चुके हैं कि उस्पेन्स्की ने अपने शिष्यों
को बहुत अधिक कठोर और उदास बना दिया था। बेनेट, उस्पेन्स्की के उस कथन को उद्धृत करते हैं जिसमें उन्होंने
अपने शिष्यों से कहा था कि “लंदन में सभी लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि
मेरे द्वारा छोड़े गए लेखनों में जिस रूप में ‘सिस्टम’ दिया गया है, उससे ज़रा-सा भी विचलन न हो।” जब बेनेट ने पाँचवें आयाम पर
लिखा हुआ अपना एक लेख उस्पेन्स्की को भेजा तो उस्पेन्स्की ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया, “केवल बौद्धिक प्रक्रियाओं के माध्यम से कुछ भी नया नहीं
पाया जा सकता। केवल एक ही आशा है कि हम उच्चतर भावनात्मक केन्द्र के साथ काम करने
का मार्ग खोज लें।” और उन्होंने उदास होकर यह भी जोड़ा, “और हम नहीं जानते कि यह कैसे किया जाए।”
संक्षेप में, उस्पेन्स्की का मूल दृष्टिकोण अजीब ढंग से निराशावादी और
नकारात्मक है। उनका विश्वास है कि ‘सिस्टम’ ही मनुष्य को उसकी ‘यांत्रिकता’ से उसकी
‘कुछ करने’ में पूर्ण असमर्थता से बचाने का एकमात्र साधन है। लेकिन उन्हें लगता है
कि यह रास्ता अत्यन्त कठिन और खड़ी चढ़ाई जैसा है। बेनेट की पत्नी ने उनसे कहा, “तुम्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं है और यह अच्छी बात नहीं है...
तुम अपनी राह पर थोड़ा अधिक क्यों नहीं चलते और श्री उस्पेन्स्की की नकल करना
क्यों नहीं छोड़ देते?” उन्होंने
पहचान लिया था कि समस्या यही थी ‘सिस्टम’ के प्रति उस्पेन्स्की का उदास, लगभग कैल्विनवादी दृष्टिकोण[1]।
गुर्जिएफ़ का दृष्टिकोण पूरी तरह अधिक आशावादी था। उन्होंने
प्रीएरे के अपने विद्यार्थियों से कहा था, “हर मनुष्य यह स्वतंत्र मन प्राप्त कर सकता है। हर वह
व्यक्ति,
जिसकी इच्छा गंभीर है, इसे कर सकता है।” यहाँ ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह मार्ग
केवल अत्यन्त निराश या दृढ़ निश्चयी लोगों के लिए ही सम्भव है। एक गंभीर इच्छा ही
पर्याप्त थी। ठीक उसी प्रकार की गंभीरता, जैसी किसी विदेशी भाषा को सीखने या गणित का अध्ययन करने के
लिए आवश्यक होती है।
फिर भी, प्रीएरे
के जीवन के वर्णनों से यह स्पष्ट लगता है कि कुछ हद तक स्वयं गुर्जिएफ़ ही
उस्पेन्स्की के इस दृष्टिकोण के लिए जिम्मेदार थे। शिष्यों से करवाए जाने वाले
अत्यन्त कठिन शारीरिक परिश्रम, उपवास, फटकार और भावनात्मक झटके, ये सभी मानो यह संकेत देते थे कि
‘यांत्रिकता’ से मुक्ति के लिए लगभग अतिमानवीय समर्पण आवश्यक है। और स्वयं बेनेट
को भी इस पर संदेह था। वे लिखते हैं, “लेकिन इन परिणामों के बावजूद कुछ ठीक नहीं था। सब कुछ बहुत
उन्मत्त था, हम सभी बहुत अधिक
जल्दी में थे... हम चलना सीखने से पहले ही दौड़ना चाहते थे।” और
यद्यपि बहुत संकोच के साथ, बेनेट इसके लिए गुर्जिएफ़ को भी जिम्मेदार ठहराते हैं:
“अब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि गुर्जिएफ़ अभी भी
प्रयोग कर रहे थे। वे यह देखना चाहते थे कि यूरोपीय लोग वास्तव में कितना कर सकते
हैं। उन्होंने पाया कि हम ऐसे प्रयास करने के लिए तैयार थे जिन्हें बहुत कम एशियाई
लोग स्वीकार करेंगे। सिर्फ इसलिए कि सामान्यतः एशियाई लोग जल्दी में नहीं होते। यह
अन्तर भ्रामक हो सकता है और सम्भव है कि गुर्जिएफ़ ने प्रयास करने की क्षमता को
गलत समझ लिया हो और उसे भीतर से परिवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार करने की क्षमता
मान लिया हो। अब मुझे ऐसा लगता है कि
‘कार्य’ हममें स्वतंत्र रूप से काम कर सके, उससे पहले स्वयं के प्रति दृष्टिकोण में जिस गहरे परिवर्तन
की आवश्यकता है, उसे हम वास्तव में
समझ ही नहीं पाए थे। शायद गुर्जिएफ़ के प्रयास और उससे भी अधिक प्रयास करने के
आग्रह ने हमें गुमराह किया।”
अब, जैसा कि
सभी प्रमुख धार्मिक शिक्षकों ने समझा है, अत्यधिक प्रयास अपने आप में प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न कर
सकता है। क्योंकि जो ‘मैं’ प्रयास करता है, वह चिंता से ग्रस्त बाएँ मस्तिष्क का अहम है। यह चेतन
‘इच्छाशक्ति’ अपनी ही आत्म-जागरूकता के कारण बाधित होती है। ‘वास्तविक इच्छाशक्ति’
कहीं और से काम करती हुई प्रतीत होती है—‘सार’ (essence) के क्षेत्र से जो, जैसा कि गुर्जिएफ़ कहते हैं, मस्तिष्क के किसी दूसरे हिस्से में स्थित है। और वास्तव में
बाएँ मस्तिष्क के ‘व्यक्तित्व’ की व्यग्र चिंता उसे दबा देती है और उसे निष्क्रिय
बना देती है।
यदि यह आलोचना वास्तव में सही है और यह केवल उस्पेन्स्की की
पद्धति पर ही नहीं बल्कि गुर्जिएफ़
की पद्धति पर भी लागू होती है तो इससे संकेत मिलता है कि ‘सिस्टम’ उतना पूर्ण या
अंतिम नहीं था, जितना उस्पेन्स्की
मानना पसंद करते थे। इस बात में किसी को संदेह नहीं था कि यह काम करता था।
उस्पेन्स्की, बेनेट, ओरेज, दे
हार्टमैन और वॉकर जैसे प्रमुख अनुयायियों ने हमें इस बारे में कोई संदेह नहीं रहने
दिया है। फिर भी यह बात भी उतनी ही स्पष्ट लगती है कि उन सभी के अंत में एक प्रकार
की अपूर्णता की भावना रह गई थी, मानो वे किसी तरह वह चीज़ प्राप्त करने में असफल
रहे हों जिसका मूलतः उनसे वादा किया गया था। उस्पेन्स्की के जीवन के अंतिम वर्षों
के विवरणों से स्पष्ट होता है कि वे एक थके हुए और उदास व्यक्ति बन गए थे। पच्चीस
वर्ष बाद जब बेनेट ने गुर्जिएफ़ को देखा तो उनके भीतर की उदासी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया
और बाद के सभी चित्रों में भी यह उदासी दिखाई देती है।
यह अपेक्षा करना शायद भोला-भाला लगे कि ‘कार्य’ (Work)
धार्मिक रूपांतरण जैसी ही आंतरिक रूपान्तरण की अवस्था
उत्पन्न कर दे। ऐसी अवस्था जिसमें दर्शन और आध्यात्मिक परमानंद भी शामिल हों। फिर
भी यह अपेक्षा करना उचित लगता है कि उससे कम-से-कम कुछ मात्रा में आंतरिक संतोष और
शांति तो प्राप्त होनी चाहिए। लेकिन गुर्जिएफ़ के विभिन्न शिष्यों के विवरणों से
स्पष्ट होता है कि इस मामले में भी वह सफल नहीं हुआ। ऐसा क्यों हुआ, यह समस्या एक
रोचक चुनौती प्रस्तुत करती है। हर हाल में, इसे अधिक निकटता से जाँचना सार्थक है।
शायद शुरुआत करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम उस
प्रश्न को ही नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास करें, जिसे गुर्जिएफ़ का ‘सिस्टम’ हल करने का प्रयास करता है।
दैनिक चेतना ‘यांत्रिकता’, अर्थात ‘रोबोट’, द्वारा सीमित है। हम रोज़मर्रा के जीवन की दोहराई जाने वाली
दिनचर्या के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि अंततः आदत हमारे हाथ-पाँव बाँध देती है, मानो
कोई मक्खी मकड़ी के जाले में लिपट गई हो। फिर भी, सबसे आलसी व्यक्ति भी वास्तव में इस स्थिति से खुश नहीं
होता क्योंकि हम पहचानते
हैं कि यह हमसे एक निश्चित तीव्रता, पूरी तरह जीवित होने की अनुभूति छीन लेती है। हमें सुरक्षा
की आवश्यकता होती है, लेकिन
वह अक्सर ‘पूरी तरह जाग्रत’ रहने की हमारी इच्छा से टकराती है। और ‘पूरी तरह
जाग्रत’ रहने की अनुभूति अक्सर असुरक्षा से जुड़ी होती है। उदाहरण के लिए, सार्त्र ने कहा था कि उसने स्वयं को उतना जीवित कभी महसूस
नहीं किया जितना फ्रांसीसी प्रतिरोध आंदोलन में रहते हुए, जब उसे किसी भी क्षण
गिरफ्तार किया जा सकता था और गोली मारी जा सकती थी।
यह संघर्ष उस समस्या को जन्म देता है जिसे मैंने ‘आउटसाइडर
की दुविधा’ (The Dilemma of
the
Outsider) कहा है। प्रभावशाली और प्रबल स्वभाव वाले मनुष्य सुरक्षा
और ऊब की तुलना में असुरक्षा और तीव्रता को अधिक पसंद करते हैं। बेशक, कम प्रभावशाली लोग भी ‘तीव्रता’ की लालसा रखते हैं, लेकिन
वे उसे पाने के लिए सुरक्षा छोड़ने को तैयार नहीं होते। सभी के लिए आदर्श स्थिति
यह होगी कि सुरक्षा और तीव्रता का मेल हो जाए। वास्तव में, सभी प्रमुख धर्मों का मूल उद्देश्य यही रहा है। उदाहरण के
लिए,
मठ ऐसी जगह है जिसकी दीवारें सुरक्षा की गारंटी देती हैं, लेकिन वहाँ रहने वाले लोग अनुशासन और प्रार्थना के माध्यम
से आध्यात्मिक तीव्रता प्राप्त करने के लिए समर्पित होते हैं। पूरे इतिहास में
पैग़म्बर,
संत और आध्यात्मिक शिक्षक इसी समस्या से जूझते रहे हैं। ऐसे
जीवन-मार्ग का निर्धारण करना जो ‘पूरी तरह जाग्रत’ रहने को उचित मात्रा की सुरक्षा
और सामान्य जीवन के साथ जोड़ सके।
अत्यन्त कठोर समाधान कभी लोकप्रिय नहीं रहे। बुद्ध ने योगिक
अनुशासन (yogic discipline) के
अधिक कठोर रूपों से मुँह मोड़ लिया। चर्च के धर्मपिताओं ने हमेशा ‘उत्साह’ अर्थात
कट्टरता पर भौंहें सिकोड़कर देखा और उसके कुछ कुख्यात समर्थकों को जला भी दिया।
समस्या यह है कि कम कठोर समाधान जिनमें मानवीय डर और आलस्य के लिए भी जगह थी, वे
भी दीर्घकाल में उतने ही असंतोषजनक सिद्ध हुए हैं। ऐसा लगता है कि मनुष्य के भीतर
अपनी सामान्य सीमाओं से बाहर निकलने की एक गहरी, जड़ जमा चुकी लालसा है।
यांत्रिकता की समस्या के प्रति गुर्जिएफ़ की पद्धति अपने
वैज्ञानिक और सटीक दृष्टिकोण के कारण असाधारण है। अपनी रचनात्मक क्षमताओं को साकार
करने के लिए हमें सुरक्षा की आवश्यकता होती है क्योंकि जिस व्यक्ति के पास सुरक्षा नहीं है, वह कुछ और सोच ही नहीं सकता सिवाय इसके कि उसका अगला भोजन
कहाँ से आएगा। लेकिन सुरक्षा एक प्रकार की स्वचालित शिथिलता पैदा करती है। ठीक उसी
प्रकार जैसे कोई सम्मोहनकर्ता अपनी उँगलियाँ चटकाकर किसी अच्छे सम्मोहन-ग्राही को
नींद में भेज सकता है। हाल के ‘संवेदी-वंचना’ (sensory deprivation) के प्रयोगों, ‘ब्लैक रूम’[2] में किए गए प्रयोगों ने इसे और
भी स्पष्ट कर दिया है। जब मन को सभी बाहरी उद्दीपनों से वंचित कर दिया जाता है
तो वह केवल सोता ही नहीं, वह सचमुच विघटित होने लगता है। बाहरी चुनौतियाँ और समस्याएँ
ही हमें एक साथ बाँधे रखती हैं। जब ये नहीं रहतीं तो हम अलग-अलग दिशाओं में बहने लगते हैं। ठीक उस बेड़े की
तरह जिसकी रस्सियाँ काट दी गई हों।
सैद्धान्तिक रूप से इसका उत्तर काफी सरल है। हमें स्वयं को
सम्मोहन से बाहर निकालना होगा। हमें ऐसी रस्सियाँ बनानी होंगी जो सुरक्षा प्राप्त कर लेने
के बाद भी हमें बाँधे रखें... ऐसे आंतरिक बंधन, जो बाहरी बंधनों के समाप्त हो जाने पर भी हमें थामे रहें। गुर्जिएफ़
ने तय किया कि इसका उत्तर ऐसी चीज़ में है जिसे ‘कृत्रिम असुरक्षा’ कहा जा सकता है
न कि खुरदरे बालों से बने वस्त्र पहनना या कीलों की शय्या पर लेटना
बल्कि बौद्धिक प्रयास, शारीरिक अनुशासन और भावनात्मक झटके। यह फ़कीर, साधु और योगी के मार्गों का एक संयोजन था— शारीरिक, बौद्धिक और भावनात्मक प्रयास। लेकिन गुर्जिएफ़ ने ‘चौथे
मार्ग’ की आवश्यकता को भी पहचाना, जिसे
उन्होंने ‘चतुर व्यक्ति’ (cunning man) का मार्ग कहा। यह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास किसी विषय का
निश्चित और सटीक ज्ञान होता है और वह इस ‘भीतरी जानकारी’ का उपयोग अपने लक्ष्य को
प्राप्त करने के लिए करता है। अर्थात गुर्जिएफ़ यह जानते थे कि केवल कच्ची शक्ति
और प्रयास ही पूरा उत्तर नहीं हैं। इसके बावजूद ‘सिस्टम’ में ज़ोर अनिवार्य रूप से
‘प्रयास और उससे भी अधिक प्रयास’ की ओर झुक गया।
उस्पेन्स्की के मामले में यह समझना आसान है कि गलती कहाँ
हुई। उनका आरम्भिक बिंदु था मनुष्य की यांत्रिकता पर ज़ोर, उसकी कार्य करने या
‘कुछ करने’ की पूर्ण असमर्थता। वास्तव में, मनुष्य की यांत्रिकता या उसकी बंधनावस्था न तो गुर्जिएफ़ के
‘सिस्टम’ का और न ही किसी अन्य प्रणाली का आरम्भिक बिंदु है। यदि हम हर समय
यांत्रिक ही होते तो हमें
‘स्वतंत्रता’ की खोज करने की कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। वास्तविक आरम्भिक
बिंदु स्वतंत्रता की एक झलक है... तीव्रता के वे क्षण, ‘पूरी तरह जाग्रत’ होने के वे क्षण जिन्हें अब्राहम मैस्लो
‘चरम अनुभव’ (peak experience)[3] कहते हैं। यही अनुभव हमारी सामान्य चेतना की अवस्थाओं से
हमें असंतुष्ट बनाते हैं।
इसके बाद हम यह देखते हैं कि जब भी कोई समस्या या
आपातस्थिति हमें तत्काल तत्परता की भावना से भर देती है, तब हमें स्वतंत्रता की झलक मिलती है। यही गुर्जिएफ़ की
पद्धति का केन्द्र बन गया। अपने शिष्यों को स्थायी तत्परता की भावना के लिए
प्रशिक्षित करना। बीएलजेबब (Beelzebub) अपने
पोते से कहता है कि मानवजाति को बचाने का एकमात्र उपाय ऐसा ‘अंग’ विकसित करना है
जो हमें अपनी मृत्यु की अनिवार्यता और अपने आस-पास के हर व्यक्ति की मृत्यु की
अनिवार्यता को समझने में सक्षम बनाए। इस बात को एक खोई हुई कहानी के अंश में और
स्पष्ट किया गया है, जिसका
वर्णन बेनेट ने किया है। उसमें एक व्यक्ति मरने के बाद जागता है और “समझता है कि
उसने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साधन, अपना शरीर खो दिया है
और याद करता है कि जीवित रहते हुए वह उसके साथ कितना कुछ कर
सकता था।”
आपातस्थिति की यह भावना पैदा करने का एक तरीका है— जानबूझकर
चुनौती की तलाश करना। ग्राहम ग्रीन ने बताया है कि एक ऊबे हुए किशोर के रूप में
उन्होंने भरी हुई रिवॉल्वर से रूसी रूलेट खेला था। जब हथौड़ा खाली चैम्बर पर गिरा
तो “ऐसा लगा जैसे कोई रोशनी जला दी गई हो... और मुझे लगा कि
जीवन में अनन्त सम्भावनाएँ मौजूद हैं।”[4] ग्रीन ने ‘मन को झकझोरकर
जगाने’ के लिए एक काफी खतरनाक तरीका चुना था, लेकिन उनका अनुभव हमें स्पष्ट रूप से यह समझाता है कि मन
(या मस्तिष्क) के भीतर रोबोट से छुटकारा पाने और हमें जगाने की एक व्यवस्था मौजूद
है। उसे एक रोशनी की तरह चालू किया जा सकता है।
थोड़ा-सा ‘आत्म-अवलोकन’ हमें यह अनुभव कराता है कि इस
‘व्यवस्था’ की तुलना मस्तिष्क के भीतर कसकर लपेटकर रखी गई एक शक्तिशाली स्प्रिंग
से भी की जा सकती है। जब किसी आपातस्थिति या उत्तेजना की भावना हमें अचानक सक्रिय
कर देती है तो हमारे
भीतर इच्छाशक्ति का कोई गहरा स्रोत उस स्प्रिंग को कसकर लपेट देता है और हमें
शक्ति तथा नियंत्रण की अनुभूति होती है।
दुर्भाग्य से, यह ‘स्प्रिंग’ हमारी चेतन नियंत्रण-क्षमता अर्थात
‘व्यक्तित्व’ के नियंत्रण में केवल आंशिक रूप से होती है। वह उस ‘दूसरे स्व’ के
क्षेत्र में स्थित है, जिसे गुर्जिएफ़
‘सार’ कहते हैं। ‘व्यक्तित्व’
में इस ‘दूसरे स्व’ को अपनी गंभीरता का विश्वास दिलाने का अधिकार नहीं है। यह
स्प्रिंग उस चीज़ के प्रति प्रतिक्रिया करती है जिसे ‘गंभीरता का कंपन’ कहा जा
सकता है। इसीलिए एक सम्मोहनकर्ता, जो बाहरी सत्ता या अधिकार की आवाज़ होता है उसे
ऐसे प्रयास करने के लिए प्रेरित कर सकता है जो चेतन इच्छाशक्ति की क्षमता से कहीं
अधिक होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि गुर्जिएफ़ सम्मोहन की प्रकृति को समझते थे।
एक ऐसी समस्या जो आज भी आधुनिक मनोविज्ञान को उलझन में डालती है। वे सम्मोहन को
‘झूठी चेतना’ के निलंबन के रूप में परिभाषित करते हैं। उस ‘शासक स्वामी’ के निलंबन
के रूप में जो हमारी सामूहिक उपस्थिति पर शासन करता है ताकि ‘वास्तविक चेतना’
स्वयं को अभिव्यक्त कर सके। अर्थात, यह ‘बाएँ मस्तिष्क की चेतना’ का निलंबन है, (जिसे गुर्जिएफ़
हमारी दोहरी चेतना का शासक अहम मानते थे) ताकि कहीं अधिक शक्तिशाली ‘दाएँ मस्तिष्क
की चेतना’ बिना किसी हस्तक्षेप के स्वयं को अभिव्यक्त कर सके।
यह बाएँ मस्तिष्क की चेतना मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि भी
है और उसके पतन का कारण भी। अपनी तार्किक सटीकता के कारण इसी ने मनुष्य को सभ्यता
का निर्माण करने और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान का विशाल भंडार तैयार करने में सक्षम
बनाया है। लेकिन पूरी दक्षता से काम करने के लिए इसे मनुष्य के उस ‘दूसरे’
अस्तित्व, सहज या अंतर्बोधात्मक चेतना के समर्थन की आवश्यकता होती है। इसी से यह
समझ में आता है कि जब हम किसी महत्वपूर्ण गतिविधि में लगे होते हैं, किसी ऐसी चीज़ में जो हमें संकट या आपातस्थिति की अनुभूति
देती है,
तब हम स्वयं को सबसे अधिक ‘जीवित’ क्यों महसूस करते हैं। उस
समय हमारा वह ‘दूसरा स्व’ बाएँ मस्तिष्क की चेतना को अपना पूरा समर्थन और सहयोग
देता है। लेकिन यदि मैं बहुत देर तक टेलीविजन देखता रहूँ या एक ही बैठक में कोई लम्बी पुस्तक पढ़ने की कोशिश करूँ
तो मुझे अवास्तविकता की एक विचित्र अनुभूति होने लगती है।
मैं स्वयं को ‘हल्का’, अवास्तविक
महसूस करता हूँ। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे ‘दूसरे स्व’ ने यह तय कर लिया है
कि किसी समर्थन की आवश्यकता नहीं है। हम अवास्तविक चीज़ों से निपट रहे हैं, इसलिए उसे लगता है कि वह अपने काम से हटकर आराम कर सकता है।
यही, तब
हमारी समस्या को परिभाषित करता है। तुच्छ आपातस्थितियों और
महत्वहीन निर्णयों से भरी इस दुनिया में मनुष्य ने बाएँ मस्तिष्क की चेतना पर
निर्भरता विकसित कर ली है, जो उसके
अस्तित्व पर हावी रहती है। वह इस ‘हल्की’ चेतना और उससे जुड़ी अवास्तविकता की
अनुभूति का इतना अभ्यस्त हो गया है कि वह लगभग भूल ही गया है कि ‘वास्तविक चेतना’
कैसी होती है। उसका ‘दूसरा स्व’ लगभग स्थायी रूप से काम से बाहर है।
उसे अपने उचित काम बाएँ मस्तिष्क की चेतना को ‘समर्थन देने’
के लिए वापस कैसे प्रेरित किया जाए?
इसके
लिए अनेक उपाय सुझाए गए हैं। डी. एच. लॉरेंस का विचार था कि इसका उत्तर सेक्स में
है। हेमिंग्वे ‘साहसिक जीवन’ बड़े शिकार, बुलफाइटिंग आदि का समर्थन करते थे। लेकिन गुर्जिएफ़ ने समझ
लिया था कि ये उपाय पर्याप्त नहीं हैं। उस ‘दूसरे स्व’ को बार-बार सक्रिय करके
झकझोरना और जगाना पड़ता है... हर दिन, दिन-प्रतिदिन। ‘व्यक्तित्व’ (बाएँ मस्तिष्क की चेतना) को
संकटों और अप्रत्याशित चुनौतियों के द्वारा कमजोर करना पड़ता है। ज्ञान भी, निश्चय ही, महत्वपूर्ण
है, ‘कम्प्यूटर’ की कार्यप्रणाली को समझना। लेकिन सैद्धान्तिक ज्ञान एक बार फिर
तर्कशील अहम को मजबूत करता है जिसे लॉरेंस ‘सिर की चेतना’ कहते थे। इसलिए सही
समाधान एक संतुलित आहार है। सैद्धान्तिक ज्ञान को सावधानीपूर्वक ‘प्रयास’ के साथ
मिलाना। यही गुर्जिएफ़ का समाधान था और उस्पेन्स्की ने इसे एक कठोर प्रणाली में
बदल दिया।
गुर्जिएफ़ स्वयं कठोरता के खतरों को समझते थे। उन्होंने
पहचाना था कि मनुष्य के आंतरिक अस्तित्व के रहस्य को समझने जैसे कठिन और जटिल
विषयों में भाषा आसानी से हमें धोखा दे सकती है। मन को खुला रखना और समस्या को
अनेक अलग-अलग कोणों से देखने की आवश्यकता है। इसका परिणाम यह है कि जो व्यक्ति गुर्जिएफ़
की तीनों पुस्तकें पढ़ने के बाद उनके शिष्यों द्वारा दिए गए व्याख्यानों के
विवरणों की ओर जाता है, वह अक्सर
विरोधाभासों से उलझ जाएगा। ये विरोधाभास इस बात का प्रमाण हैं कि गुर्जिएफ़ किसी
रहस्यमय ‘प्राचीन ज्ञान’ के प्राप्तकर्ता नहीं थे, जिसे उन्होंने शिष्यों को ठीक उसी तरह सौंप दिया हो जैसे
कभी मूसा को विधि की पट्टिकाएँ[5] मिली थीं। वे असाधारण प्रतिभा
वाले मनोवैज्ञानिक थे, जिनकी
अंतर्दृष्टि निरन्तर विकसित होती रही। उनकी मूल समझ यह थी कि मनुष्य एक विशाल
कम्प्यूटर है, जिसमें नियंत्रण के
अनेक स्तर हैं। इस समय इस विशाल मशीन पर उसका इतना कम नियंत्रण है कि वह लगभग उसका
गुलाम है। लेकिन सैद्धान्तिक रूप से वह इस पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। और
चूँकि इस कम्प्यूटर के संसाधन किसी भी व्यक्ति की कल्पना से कहीं अधिक विशाल
प्रतीत होते हैं, इसलिए
सैद्धान्तिक रूप से मनुष्य एक प्रकार का देवता बन सकता है।
इसलिए उसका मूल कार्य है— इस कम्प्यूटर को जानना। सैद्धान्तिक
रूप से यह बहुत कठिन नहीं है। इसके लिए केवल निरन्तर आत्म-अवलोकन की आवश्यकता है। लेकिन
दूसरा कार्य कहीं अधिक कठिन है। आत्म-अवलोकन सबसे अच्छी तरह उन अवस्थाओं में किया
जाता है जब अंतर्दृष्टि और तीव्रता मौजूद हो। ऐसी अवस्थाएँ, जब ‘दोनों चेतनाएँ’ सामंजस्य में हों और एक-दूसरे के साथ
घनिष्ठ सहयोग कर रही हों। लेकिन हम इन अवस्थाओं को अपनी इच्छा से कैसे उत्पन्न कर
सकते हैं? यदि इसका कोई सरल उपाय होता तो मनुष्य की समस्याएँ समाप्त हो जातीं। उदाहरण के लिए, यदि वह सेक्स, बुलफाइटिंग या कोई नशीली दवा निगलने के माध्यम से यह अवस्था
प्राप्त कर सकता तो उसने
अपने विकास की सबसे बड़ी समस्या हल कर ली होती। दुर्भाग्य से इनके समर्थकों के विवरणों को देखते हुए, इनमें से कोई भी उपाय दीर्घकालिक संतोष प्रदान नहीं कर
सकता।
और गुर्जिएफ़ के ‘सिस्टम’ का क्या? यह निश्चित रूप से कहीं अधिक प्रभावशाली परिणाम दिखा सकता
है। फिर भी, जैसा कि हमने देखा है, इसमें उनके शिष्यों को बहुत-सी पीड़ा, थकान और भ्रम से भी गुजरना पड़ सकता था और उनमें से अनेक के
लिए अंतिम परिणाम उतना संतोषजनक नहीं था, जितनी उन्होंने आशा की थी। उदाहरण के लिए, बेनेट बाद में इंडोनेशियाई ‘मसीहा’ पाख सुबुह के शिष्य बन
गए और उसके बाद रोमन कैथोलिक बन गए। यह इस बात का काफी स्पष्ट संकेत है कि
‘सिस्टम’ ने उनके स्वभाव के कुछ पक्षों को अतृप्त छोड़ दिया था।
अब तक इस पुस्तक में मैंने जानबूझकर अपने विचारों और दृष्टिकोणों
को पृष्ठभूमि में रखा है। लेकिन इस बिंदु पर यह स्वीकार करना आवश्यक हो जाता है कि
लगभग तीन दशकों तक गुर्जिएफ़ के विचारों को आत्मसात करने के बाद मुझे लगता है कि
कुछ छोटी,
लेकिन महत्वपूर्ण बातें ऐसी थीं जिन्हें आत्म-अवलोकन के उस
महान गुरु ने ध्यान में नहीं रखा।
मनुष्य की ‘यांत्रिकता’ पर गुर्जिएफ़ का अत्यधिक ज़ोर और एक
क्षण के लिए भी उससे बाहर निकलने की कठिनाई का उनका वर्णन ऐसा प्रतीत कराता है
मानो ‘गैर-यांत्रिकता’ के क्षण अत्यन्त दुर्लभ या अस्तित्वहीन हों। वास्तव में, जैसा कि मैंने बताया है, यह सही नहीं है। मनुष्य लगातार ‘जाग्रत होने’ की झलकियाँ, स्वतंत्रता की झलकियाँ अनुभव करता रहता है। टी. ई. लॉरेंस
ने ‘सेवन पिलर्स ऑफ विज़्डम’ (Seven Pillars of Wisdom) में
ऐसी ही एक झलक का वर्णन किया है:
“हम उन साफ़-सुथरी भोरों में से एक में निकले, जो सूर्य के साथ हमारी इन्द्रियों को जगा देती हैं
जबकि रात भर सोचने के कारण थका हुआ बुद्धि-तंत्र अभी बिस्तर
में पड़ा था। ऐसी सुबह में एक-दो घंटे तक दुनिया की ध्वनियाँ, गंध और रंग मनुष्य पर सीधे और व्यक्तिगत रूप से प्रहार करते
थे। वे विचारों से छनकर
या विचारों द्वारा किसी सामान्य रूप में ढलकर नहीं आते थे। वे अपने आप में
पर्याप्त रूप से अस्तित्वमान प्रतीत होते थे।”
वास्तव में, बायाँ मस्तिष्क, ‘बुद्धि’ अभी सो रहा था। इसलिए लॉरेंस ऐसी
अवस्था में थे जो सम्मोहन के समान थी, जिसमें दायाँ मस्तिष्क उनकी ‘विचारों से भरी प्रकृति’ के
अवरोध के बिना चीज़ों को सीधे अनुभव कर सकता था। ऐसे क्षण दुर्लभ नहीं हैं। बच्चे
उन्हें हर समय अनुभव करते हैं, जैसा
कि वर्ड्सवर्थ ने बताया है। और ‘कारागार-गृह की छायाएँ’ हमारे चारों ओर घिरने के
बाद भी स्वस्थ लोग उन्हें पर्याप्त नियमितता से ‘आशावादी प्रत्याशा’ और ‘चरम
अनुभवों’ के रूप में अनुभव करते रहते हैं।
इन ‘झलकियों’ की सबसे दिलचस्प बात उनमें निहित वह चीज़ है
जिसे ‘अर्थ-सामग्री’ कहा जा सकता है। ग्रीन कहते हैं कि जब उनकी रिवॉल्वर नहीं चली
तो “ऐसा लगा जैसे कोई रोशनी जला दी गई हो... और मुझे लगा कि
जीवन में अनन्त सम्भावनाएँ हैं।” और ऐसी सभी अनुभूतियों में यह बात समान होती है।
वे उद्घाटन की अनुभूति पैदा करती हैं। ‘असाधारण रूप से अच्छी खबर’ मिलने की
अनुभूति, एक ऐसा एहसास कि दुनिया में उतना अधिक अर्थ है जितना हम सामान्यतः उसे
मानते हैं। इसका कारण स्पष्ट है। हम सामान्यतः दुनिया को तर्कशील अहम के काले
चश्मे से ‘देखते’ हैं। (मेरे सिर के भीतर रहने वाला ‘मैं’ बाएँ मस्तिष्क में रहता
है।) जब हम संयोग से उन काले चश्मों को हटा देते हैं तो भूले हुए अर्थ के जो विस्तृत दृश्य अचानक हमारे सामने
खुलते हैं, उन्हें देखकर हम चकित
रह जाते हैं। स्पष्ट है कि यह अत्यन्त सूक्ष्म और बारीक हिसाब रखने वाला बायाँ
मस्तिष्क बहुत-सी चीज़ों को ध्यान में ही नहीं रखता और क्योंकि वह इतना कुछ छोड़
देता है,
इसलिए वह निराशावाद का इतना शिकार होता है। और सामान्य
चेतना में यही समस्या है। इसी कारण हम रोबोट के गुलाम हैं। सामान्य चेतना के भीतर
अर्थ के अभाव की एक अंतर्निहित धारणा होती है। और अर्थ का अभाव ही नींद की
प्रक्रिया को सक्रिय करता है। (जब
आपको लगता है कि आगे देखने के लिए कुछ भी नहीं है तो आप ऊबने और उनींदे होने लगते हैं।) यदि हम इच्छा के
अनुसार अर्थ को सक्रिय कर सकते, ठीक वैसे ही जैसे ग्रीन ने रूसी रूलेट के माध्यम
से उसे सक्रिय कर दिया था तो ‘नींद’ की समस्या समाप्त हो जाती। अर्थ हमें किसी भी
मात्रा में हिंसक और थका देने वाले प्रयास से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से जगा देता।
अर्थ तुरन्त ऊर्जा पैदा करता है। काश हम उस ‘रोशनी’ के स्विच को खोज पाते जिसे
ग्रीन ने ट्रिगर दबाकर जला दिया था।
लेकिन जब हम समस्या को इस तरह व्यक्त करते हैं, तो हम एक महत्वपूर्ण कारक को ध्यान में रखना भूल जाते हैं। मनुष्य
की ‘दो चेतनाएँ’ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। चेतन और अचेतन अलग-अलग संस्थाओं की
तरह काम नहीं करते। उसी
तरह मस्तिष्क के दाएँ और बाएँ हिस्से भी अलग-अलग होकर काम नहीं करते।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि ‘नकारात्मकता’ किस प्रकार काम
करती है। जब मैं सुबह जागता हूँ तो दुनिया का सामना मेरा तर्कशील अहम करता है। यदि ‘मैं’
देखता हूँ कि बाहर बारिश हो रही है और मुझे याद आता है कि मुझे दाँतों के डॉक्टर
के पास जाना है और मेरा
बैंक मैनेजर मेरे ओवरड्राफ्ट के बारे में मुझसे बात करना चाहता है तो मेरा ‘दिल
बैठ जाता है’। मेरी ऊर्जा भी उसी के साथ गिर जाती है। जब मैं प्रसन्न होता हूँ और
उत्सुक प्रत्याशा से भरा होता हूँ तो मेरे अचेतन मन से ऊर्जा का एक झरना फूट पड़ता है। अर्थ
ऊर्जा पैदा करता है। इसके विपरीत, जब
मैं उदास और निरुत्साहित महसूस करता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे मेरी ऊर्जा निकलती जा रही है। इसके
परिणामस्वरूप उत्पन्न थकान मेरी निराशा की भावना को और गहरा करती है
और यह जब तक कोई चीज़ मुझे प्रसन्न करने के लिए बीच में
हस्तक्षेप न करे मेरी थकान को और बढ़ाती है। अर्थात, मेरे ‘दोनों स्व’ के बीच नकारात्मक प्रतिपुष्टि (negative
feedback) का प्रभाव काम करता है।
इसके विपरीत, यदि मैं तेज़ धूप में जागता हूँ और मुझे याद आता है कि कुछ
ही घंटों में मैं छुट्टी मनाने के लिए यात्रा पर निकलने वाला हूँ
तो मेरा तर्कशील अहम संतोष की एक हल्की हँसी के साथ
प्रतिक्रिया करता है और मुझे भीतर से एक सुखद गर्माहट महसूस होने लगती है। ‘सकारात्मक प्रतिपुष्टि’ (positive feedback) स्थापित हो गई है।
यहाँ हम देखते हैं कि यद्यपि ऊर्जा की आपूर्ति को नियंत्रित
करने वाला तंत्र ‘अचेतन’ है, लेकिन
उसके निर्णय पूरी तरह ‘तर्कशील अहम’ द्वारा दिए गए संकेतों से संचालित होते हैं। यदि
मैं स्वभाव से कमजोर और आत्म-दया में डूबा रहने वाला व्यक्ति हूँ
तो मेरे अधिकांश संकेत नकारात्मक होंगे और मैं अधिकांश समय
थका हुआ और उदास महसूस करूँगा। यदि मैं प्रसन्नचित्त और तर्कशील व्यक्ति हूँ
तो मेरा अचेतन सकारात्मक संकेतों, अर्थ की मेरी अनुभूति का
उत्तर देगा और मुझे पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध कराता रहेगा। इसके अलावा, इस ऊर्जा का प्रभाव यह होगा कि दुनिया मुझे अधिक प्रसन्न और
उजली दिखाई देगी। मुझे अधिक अर्थ दिखाई देगा और इस प्रकार मेरा आशावाद और पुष्ट
होगा।
जब हम आधुनिक मानवता को सामान्य रूप से देखते हैं
तो एक बात काफी स्पष्ट दिखाई देती है। अस्तित्व के प्रति
हमारा मूल दृष्टिकोण नकारात्मक और अविश्वास से रंगा हुआ होता है। इससे संकेत मिलता
है कि हममें से अधिकांश ‘नकारात्मक प्रतिपुष्टि’ की आदत में पड़ चुके हैं। इसके
अच्छे कारण भी दिखाई देते हैं। आधुनिक जीवन कठिन और जटिल है। मानवता अनेक समस्याओं
का सामना कर रही है। लेकिन जो व्यक्ति गुर्जिएफ़ के विचारों को समझ चुका है, वह जानता होगा कि ये ‘कारण’ अप्रासंगिक हैं। यह बात भी उतनी
ही सही होगी कि आज मानवजाति इतिहास में पहले की अपेक्षा अधिक सुखी और अधिक
आरामदायक जीवन जी रही है। असल मुद्दा हमारे नकारने की आदत है।
गुर्जिएफ़ ने सिखाया कि यह आदत मूर्खतापूर्ण और अनावश्यक
है। मनुष्य के बारे में वास्तव में महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके भीतर वास्तविक
स्वतंत्रता की संभावना मौजूद है। एक बार जब वह इस तथ्य को समझ ले कि इस समय उसका
जीवन लगभग पूरी तरह यांत्रिक है। उसे अपनी तर्कशक्ति, अपनी विश्लेषणात्मक प्रक्रियाओं की ‘खोजी रोशनी’ को अपनी
सभी अचेतन धारणाओं पर डालना होगा।
और जब हम अपनी ‘दो चेतनाओं’ की परस्पर विपरीत गतिविधियों पर
खोजी रोशनी डालते हैं, तभी हम
मानव-अस्तित्व के बारे में एक मूलभूत सत्य को समझ पाते हैं। एक ऐसा सत्य, जिसका मुझे संदेह है कि गुर्जिएफ़ स्वयं भी केवल आंशिक रूप
से ही समझ पाए थे। तर्कशील अहम निराशावादी होने की ओर इसलिए प्रवृत्त होता है
क्योंकि वह चीज़ों को बहुत पास से देखता है। यह ऐसा है जैसे किसी बड़े चित्र की
गुणवत्ता का निर्णय उसके कैनवास को आवर्धक काँच या सूक्ष्मदर्शी से देखकर करने की
कोशिश की जाए। वास्तव में, ऐसी जाँच
कितनी भी सावधानी से क्यों न की जाए, वह यह प्रकट नहीं कर पाएगी कि चित्रकार ने उस चित्र में
क्या अभिव्यक्त किया है। इसके विपरीत, दायाँ मस्तिष्क अर्थों और समग्र प्रतिरूपों के स्तर पर काम
करता है। और जैसा कि हम देख चुके हैं, शुद्ध और अविच्छिन्न दाएँ-मस्तिष्क की चेतना हमेशा अत्यन्त
आनंद,
‘असाधारण रूप से अच्छी खबर’ जैसी
अनुभूति उत्पन्न करती है।
संक्षेप में, बाएँ मस्तिष्क का ‘कीड़े की नज़र’ से देखना स्वभावतः
नकारात्मक है। दाएँ मस्तिष्क की ‘पक्षी की नज़र’ स्वभावतः सकारात्मक है।
वह अर्थ और परस्पर-संबंधों के ऐसे विस्तृत दृश्य सामने लाती
है,
जो उस कीड़े को दिखाई ही नहीं देते।
हमारी व्यावहारिक समस्या, वह समस्या जिसका सामना हम अपने
जीवन के हर दिन करते हैं। यह तय करना है कि इन दोनों में से कौन सच कह रहा है। लेकिन
जब तक हम यह नहीं समझते कि एक ‘तात्कालिक अनुभूति’ (immediacy
perception) के स्तर पर काम करता है और
दूसरा ‘अर्थ की अनुभूति’ (meaning perception) के स्तर पर, तब तक हमारे पास उनके प्रमाणों को तौलने का कोई साधन नहीं
है। शुरुआत में, इन दोनों को तौलने का
प्रयास भी बायाँ मस्तिष्क ही करता है। दूसरे, ‘दृष्टि के क्षण’ (moments of vision) ऊब और निरुत्साह के क्षणों की तुलना में इतने दुर्लभ हैं कि
केवल गणितीय हिसाब से ही हम नकारात्मक प्रमाण पर विश्वास करने लगते हैं। लेकिन
हमें यह जानना आवश्यक है कि तर्कशील अहम, अपनी सारी तार्किकता और स्पष्टता के बावजूद, मूलतः एक सूक्ष्मदर्शी है, जो चीज़ों को केवल टुकड़े-टुकड़े करके देख सकता है। ‘दूसरे स्व’ के पास शायद स्वयं को व्यक्त करने की कोई शक्ति
न हो,
लेकिन वह अर्थों को तत्काल और सम्पूर्ण रूप से ग्रहण कर
लेता है। एक बार जब हम यह समझ लेते हैं तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि हमें किसके प्रमाण
को स्वीकार करना चाहिए। बायाँ मस्तिष्क मूलतः झूठा नहीं है, लेकिन उसकी आंशिक दृष्टि उसे संसार के बारे में गलत
निष्कर्षों तक पहुँचा देती है। उसकी स्थिति रामकृष्ण की उस दृष्टान्त-कथा में
वर्णित अंधे भिखारियों जैसी है, जो
केवल स्पर्श की इन्द्रिय के आधार पर हाथी का वर्णन करने का प्रयास करते हैं।
फिर हमारे पास सबसे अधिक प्रभावशाली प्रमाण है। जब दायाँ और
बायाँ मस्तिष्क अपने उन दुर्लभ सामंजस्यपूर्ण क्षणों में पहुँचते हैं, वे विचित्र, तनावमुक्त क्षण, जो अंतर्दृष्टि और बौद्धिक उत्तेजना दोनों को एक साथ समेटे
होते हैं। तब बायाँ मस्तिष्क पूरी तरह आश्वस्त हो जाता है कि दायाँ मस्तिष्क शुरू
से ही सही था। अब वह स्पष्ट रूप से देखता है कि उसका निराशावाद अपर्याप्त तथ्यों
की गलत व्याख्या पर आधारित था। उसे सीधे उद्घाटन की अनुभूति होती है, जिसे केवल इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है: ‘बेशक!’
फिर भी, चूँकि
बायाँ मस्तिष्क स्वभावतः चीज़ों को केवल टुकड़ों में देखने तक सीमित है, यह समस्या असाध्य लगती है। जब तक हम यह नहीं समझ लेते कि
वास्तव में हम इस समस्या को अपने जीवन के हर दिन हल करते हैं। बायाँ मस्तिष्क
लगातार ऐसे सत्यों को स्वीकार करता रहता है जो उसकी अपनी धारणाओं के विपरीत होते
हैं। तात्कालिक अनुभूति उसे बताती है कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और
पृथ्वी चपटी है। लेकिन उसे कोपरनिकस के सिद्धान्त को स्वीकार करने में कोई कठिनाई
नहीं होती। तात्कालिक अनुभूति उसे बताती है कि कोई पुस्तक द्वि-आयामी वस्तु है।
फिर भी वह सहज रूप से यह स्वीकार करता है कि वह तीन-आयामी
है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बाएँ मस्तिष्क की
अनुभूति उसे बताती है कि कोई पुस्तक केवल कागज़ और काली स्याही का मेल है।
फिर भी वह पूरी तरह जानता है कि पुस्तक का एक और आयाम है और
वह यह है कि पुस्तक में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ उसकी विषय-वस्तु, उसका अर्थ है। पढ़ने से प्रेम करने वाला बच्चा पुस्तक देखते
ही अपने हृदय में तत्काल एक उठान, एक
प्रकार का सहज आनंद अनुभव करता है। लेकिन यह वास्तव में सहज नहीं है। यह ‘सिखाया
हुआ’ है। बायाँ मस्तिष्क स्वभाव से संदेहवादी हो सकता है, लेकिन प्रशिक्षण के कारण वह विश्वास करना सीख जाता है।
इन सबका अर्थ यह है कि गुर्जिएफ़ के विचारों का परिणाम
स्वयं गुर्जिएफ़ की कल्पना से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण और रोमांचक हो सकता है। उन्होंने
अपना पूरा जीवन इस समस्या को हल करने में लगा दिया कि ‘दो चेतनाओं’ को फिर से कैसे
एक किया जाए ताकि
‘सार’ और ‘व्यक्तित्व’ सामंजस्य में विकसित हो सकें। उन्होंने ‘सार’ को जाग्रत
अवस्था में झकझोरने के लिए अनेक प्रकार की विधियाँ विकसित कीं
ताकि अहम को उसकी निरर्थकता और अवास्तविकता की अनुभूति से
बचाया जा सके। लेकिन वे यह समझने में असफल रहे कि हमारे भीतर इसे स्वतः करने की
क्षमता पहले से मौजूद है। मन को झकझोरकर जगाने की आवश्यकता नहीं है। उसे शिक्षा
देकर जगाया जा सकता है। इसके लिए केवल दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। तर्कशील
अहम ने अविश्वास की एक गहरी जड़ जमा चुकी आदत विकसित कर ली है। पश्चिमी मनुष्य
अपनी ‘पिघलती हुई अवस्थाओं’ (melting moods), अपने ‘दृष्टि के क्षणों’ को एक निश्चित संदेह के साथ ग्रहण
करता है,
मानो उनका सम्बन्ध नशे में होने से हो। ‘दो चेतनाओं’ के अलग-अलग कार्यों को समझने से हमें दिखाई
देता है कि यह अविश्वास अनावश्यक है। ‘दृष्टि के वे क्षण’ शुरू से ही सत्य कह रहे
थे। जिस क्षण हम वास्तव में इसे समझ लेते हैं तार्किक और विवेकपूर्ण ढंग से, ठीक वैसे ही जैसे हम यह समझते हैं कि पृथ्वी गोल है। हम उस
अनन्त सम्भावना की दृष्टि को देखना शुरू कर देंगे, जिसे ग्रीन ने रूसी रूलेट खेलते समय अनुभव किया था।
लेकिन एक अचानक झलक के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसी अंतर्दृष्टि के रूप में जिसे लगातार बनाए रखा
जा सके।
ग्रीन का अनुभव एक और बात को रेखांकित करता है, जिस पर गुर्जिएफ़ ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। मस्तिष्क
में एक ऐसी व्यवस्था मौजूद है जो हमें रोबोट से मुक्त कर सकती है। एक ऐसी व्यवस्था
जिसकी तुलना मैंने एक शक्तिशाली, कुंडली
की तरह लिपटी स्प्रिंग से की है। यदि मैं केवल इच्छाशक्ति के बल पर, केवल एकाग्रता के माध्यम से इस ‘स्प्रिंग’ को सिकोड़ने की
कोशिश करता हूँ तो यह
प्रयास पीड़ादायक और थका देने वाला लगता है। अचानक उत्पन्न संकट कहीं अधिक प्रभावी
होता है। लेकिन वास्तव में महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रयास
से भी इसे सिकोड़ सकता हूँ। जिस मानसिक ‘मांसपेशी’ का मैं इसके लिए उपयोग करता हूँ, वह अविकसित है। लेकिन सभी मांसपेशियों को विकसित किया जा
सकता है। वास्तव में, यदि मैं
ध्यान या एकाग्रता की इस ‘मांसपेशी’ को जानबूझकर सिकोड़ने का अभ्यास बना लूँ
तो इस ‘स्प्रिंग’ का उपयोग करने की मेरी क्षमता शीघ्र ही
विकसित होने लगती है।
और इस बिंदु पर हम इस प्रश्न का अधिक सटीक उत्तर दे सकते
हैं। दाएँ मस्तिष्क को बाएँ मस्तिष्क की चेतना को ‘समर्थन देने’ के अपने उचित
कार्य पर वापस आने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए? इसका समाधान इस तथ्य में निहित है कि दाएँ मस्तिष्क की
चेतना बाएँ मस्तिष्क की तुलना में कहीं अधिक धीमी गति से चलती है। बायाँ मस्तिष्क
हमेशा जल्दी में रहता है। यही बताता है कि वह संसार को प्रतीकों, चपटे और द्वि-आयामी सतहों में क्यों बदल देता है। यदि मैं
किसी चीज़ पर जल्दी से एक नज़र डालता हूँ तो मैं केवल उसकी ऊपरी या बाहरी विशेषताओं को ग्रहण करता
हूँ।
लेकिन यदि मैं जल्दी में हूँ और अचानक कोई चीज़ मेरा ध्यान
रोक लेती है और मेरी रुचि जगा देती है तो मैं तुरन्त धीमा हो जाता हूँ। ठीक वैसे ही जैसे किसी
रोचक दृश्य से गुजरते समय कार की गति कम कर देता हूँ। और मानसिक रूप से धीमा होने
की इस क्रिया का तत्काल प्रभाव यह होता है कि अर्थ की वे सूक्ष्म छायाएँ दिखाई
देने लगती हैं जिन्हें पहले मैंने अपनी जल्दबाज़ी के कारण देख ही नहीं पाया था।
वास्तव में, मनुष्य ने कला का आविष्कार ही उसे धीमा करने के इस उद्देश्य
से किया था। आप किसी चित्रशाला या सिम्फनी संगीत समारोह का आनंद तब तक नहीं ले
सकते,
जब तक आप स्वयं को ‘ढीला’ न छोड़ दें और अपना पूरा ध्यान
चित्रों या संगीत पर न लगा दें।
और जब मैं ‘धीमा’ हो जाता हूँ और किसी पुस्तक या संगीत में
गहराई से डूब जाता हूँ, तब क्या
होता है? अर्थ का वह ‘दूसरा आयाम’ खुलने लगता है। अचानक मुझे अपनी
भावनाओं,
अपनी आंतरिक अवस्थाओं का भी बोध होने लगता है, ठीक उसी समय जब मैं पुस्तक या सिम्फनी में पूरी तरह डूबा
हुआ होता हूँ। अर्थात मैं स्वाभाविक रूप से और बिना किसी अनुचित प्रयास के
‘आत्म-स्मरण’ की अवस्था प्राप्त कर लेता हूँ। और तब एक दिलचस्प घटना घटती है। यदि
मैं एक घंटे पहले वाले ‘अपने’ के बारे में सोचूँ जो भीड़ के बीच तनाव और चिंता से
भरा हुआ तेजी से भाग रहा था तो मैं पीछे मुड़कर उसकी ओर एक प्रकार की दयापूर्ण
श्रेष्ठता के भाव से देखता हूँ। अब मैं उसके साथ स्वयं को एकाकार
महसूस नहीं करता। मेरा ‘व्यक्तिगत गुरुत्व-केंद्र’ बाएँ से
दाएँ स्थानांतरित हो गया है। अब मैं इस अधिक शांत, अधिक ग्रहणशील स्व के साथ अपनी पहचान महसूस कर रहा हूँ।
इसका यह अर्थ नहीं है कि उत्तर केवल ‘विश्राम’ में निहित
है। सामान्य विश्राम का प्रभाव ‘व्यक्तिगत गुरुत्व-केंद्र’ को स्थानांतरित करने
वाला नहीं होता। यहाँ महत्वपूर्ण बात वह मानसिक क्रिया है जो धीमे होने का कारण
बनती है। मैं धीमा इसलिए होता हूँ क्योंकि मेरी रुचि गहरी हो गई है
क्योंकि मेरा पूरा ध्यान माँगा जा रहा है। उदाहरण के लिए, ऐसे व्यक्ति की कल्पना कीजिए जो एक ऐसे बम को निष्क्रिय कर
रहा है जो कभी भी फट सकता है। इसके अलावा, धीमा होने की प्रक्रिया में वह ‘स्प्रिंग’ भी शामिल होती है
जो हमारी ऊर्जा की आपूर्ति को नियंत्रित करती है। जानबूझकर और दृढ़ इच्छाशक्ति से
प्रयास करना अपने आप हमें धीमा कर देता है। और वास्तव में, धीमे होने की प्रक्रिया को इच्छाशक्ति द्वारा की गई एक
जानबूझकर एकाग्रता के प्रयास से प्राप्त किया जा सकता है।
यह समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि केवल विश्राम अपने आप
में लक्ष्य नहीं है। महत्वपूर्ण बात उस विश्राम के पीछे की प्रेरणा है: यह पहचान
कि हमारी सामान्य अनुभूति हमें संसार की वास्तविकता प्रकट नहीं करती। यदि आपको
रेलगाड़ी में किसी अजनबी के बारे में संदेह हो जाए कि वह वास्तव में आपका कोई
परिचित है जो किसी तरह का भेष बदलकर बैठा है तो आप उसे घूरकर देखेंगे और उसके भेष को भेदने का प्रयास
करेंगे। यहाँ उस ‘मानसिक क्रिया’ का आधार यह संदेह होगा कि आपकी सामान्य अनुभूति
आपको धोखा दे रही है और इसलिए आपकी अनुभूति को और गहरा करने की इच्छा पैदा होगी। तीव्र
आनंद का अनुभव करते समय हम सहज रूप से यही क्रिया करते हैं। चेतना के सामान्य
तेज़ी से आगे भागते प्रवाह पर ब्रेक लगाने की इच्छा।
एक बार जब ‘दूसरे आयाम’ की यह अनुभूति प्राप्त हो जाती है
तो तुरन्त राहत की अनुभूति होती है और जीवन-शक्ति का तत्काल
प्रवाह शुरू हो जाता है— नवीनीकरण की अनुभूति। अर्थ ऊर्जा को बुलाता है। इस अवस्था
में हम स्पष्ट रूप से पहचान सकते हैं कि हमारी ‘सामान्य चेतना’ हमारी ऊर्जा को
खर्च करती रहती है, लेकिन
उसकी भरपाई नहीं करती। जिस क्षण चेतना का संबंध अर्थ से जुड़ता है, उसी क्षण पुनर्जीवन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
अब समझ में आता है कि गुर्जिएफ़ का ‘प्रयास और उससे भी अधिक
प्रयास’ पर ज़ोर उल्टा परिणाम देने वाला क्यों था। फिर भी एक उलझाने वाला प्रश्न
बचा रहता है। गुर्जिएफ़ जितने पैने और गहरी दृष्टि वाले मनोवैज्ञानिक थे, वे धीमा होने की प्रक्रिया और अर्थ पर ध्यान केन्द्रित करने
के इस निर्णायक महत्व को कैसे नज़रअंदाज़ कर गए? मेरे विचार से इसका उत्तर बीएलज़ेबब (Beelzebub) के
आरम्भिक अध्याय में मिलता है, जहाँ
वे मनुष्य की ‘दो स्वतंत्र चेतनाओं’ की प्रकृति के बारे में बात करते हैं। वे आगे
इन्हें ‘यांत्रिक’ चेतना के रूप में पहचानते हैं, जो अनुभव से निर्मित होती है (अर्थात रोबोट)
और मनुष्य की ‘वंशानुगत’ या सहज चेतना के रूप में। (वे यह
भी कहते हैं कि यही वंशानुगत चेतना वह है जिसे हम ‘अवचेतन’ कहते हैं और वास्तव में
यही हमारी वास्तविक चेतना होनी चाहिए।) यह देखा जा सकता है कि यह मोटा विभाजन उस
महत्वपूर्ण तथ्य को छोड़ देता है कि ‘यांत्रिक’ चेतना ‘तात्कालिकता’ से संबंधित है
जबकि दूसरी प्रकार की चेतना समग्र प्रतिरूपों और अर्थों से
संबंधित है।
यह गलत धारणा उस अध्याय में और गहरी हो जाती है जिसमें वे
‘कुंडाबफ़र अंग’ (organ Kundabuffer) की बात करते हैं अर्थात मनुष्य किस प्रकार भ्रम के जाल में
फँस गया,
इसकी बीएल ज़ेबब (Beelzebub) द्वारा
दी गई व्याख्या। गुर्जिएफ़ बताते हैं कि महादूतों की एक समिति इस बात से चिंतित हो
गई थी कि कहीं मनुष्य ‘वस्तुनिष्ठ बुद्धि’ विकसित न कर ले और इस प्रकार इस ग्रह के
मूल उद्देश्य, ‘चन्द्रमा के लिए भोजन उपलब्ध कराने’ पर ही आपत्ति न करने लगे। इस
सम्भावना को रोकने के लिए उन्होंने मनुष्य के भीतर ‘कुंडाबफ़र’ नामक एक अंग
स्थापित करने का निर्णय लिया, जो
उसकी अनुभूति को विकृत कर देगा और उसे भ्रम को वास्तविकता समझने के लिए प्रेरित
करेगा। इसे गुर्जिएफ़ द्वारा मूल पाप की कथा का अपना संस्करण माना जा सकता है। न्यूमैन
की उस ‘आदिम विपत्ति’ का, जिसमें
पूरी मानवजाति शामिल है।
लेकिन जैसा कि हमने देखा है, यहाँ समस्या भ्रम की नहीं है। समस्या केवल तर्कशील अहम की
आंशिक अनुभूति की है। बहुत निकट से देखने के कारण हम अर्थ से वंचित हो जाते हैं। भ्रम
या पाप की एक कथा गढ़कर गुर्जिएफ़ ने अपने दर्शन को एक निराशावादी दिशा दे दी है। इस
बात को उस जादूगर और भेड़ों की कहानी और भी स्पष्ट करती है, जिसे उस्पेन्स्की ने उद्धृत किया है। जादूगर इतना कंजूस था
कि उसने चरवाहे रखने के लिए पैसे खर्च नहीं किए। इसलिए उसने अपनी भेड़ों को
सम्मोहित कर दिया और उन्हें यह विश्वास दिला दिया कि वे अमर हैं।
इसलिए जब उनकी खाल उतारी जाती थी, तब उनके साथ कोई बुरा नहीं हो रहा था बल्कि वे इसका आनंद ले
रही थीं। उन्हें यह भी विश्वास दिलाया गया कि जादूगर एक अच्छा मालिक है, जो अपने झुंड से प्रेम करता है। इन सुझावों के कारण भेड़ें
तब तक शांत और आज्ञाकारी बनी रहीं, जब तक वे कसाइयों के लिए तैयार नहीं हो गईं। गुर्जिएफ़ ने
आगे कहा कि यह मनुष्य की स्थिति का बहुत अच्छा उदाहरण है। इस प्रकार, एक बार फिर, दर्शन को निराशावादी साँचे में ढाल दिया गया है। मनुष्य को
इससे बचकर निकलने की आवश्यकता एक अत्यन्त गंभीर आपातस्थिति बन जाती है, ‘प्रयास और
उससे भी अधिक प्रयास’ का मामला।
और इससे हमें एक और, कहीं अधिक व्यक्तिगत और नाज़ुक प्रश्न की ओर ले जाया जाता
है। प्रीएरे में गुर्जिएफ़ के शिष्यों की तरह मैं भी गुर्जिएफ़ की जीवन-भर की
दुर्घटना-प्रवणता को लेकर उलझन में रहा हूँ। सामान्यतः दुखी या भीतर से विभाजित
लोग ही दुर्घटनाओं के अधिक शिकार होते हैं। ऐसा लगता है मानो उद्देश्य की प्रबल
भावना अपने आप एक सहज सुरक्षा-व्यवस्था उत्पन्न कर देती हो। यह सच है कि गुर्जिएफ़
बहुत ही खराब चालक थे। फिर
भी उनकी दो सबसे गंभीर दुर्घटनाएँ ऐसी प्रतीत होती हैं जिनमें उनकी अपनी कोई गलती
नहीं थी।
मुझे लगता है कि उनकी दुर्घटना-प्रवणता का संबंध बड़ी
संख्या में लोगों को अपने साथ जोड़ लेने की उनकी प्रवृत्ति से था। निश्चय ही, वे इसे अपनी शिक्षा को पहुँचाने का एकमात्र तार्किक तरीका
मानते थे। फिर भी
संस्थान स्थापित करने के उनके सभी प्रयास अंततः विपत्ति में समाप्त हुए। युद्ध और
फिर क्रांति ने रूस के संस्थान को बंद कर दिया। अतातुर्क की क्रांति ने उन्हें
तुर्की से बाहर जाने के लिए विवश कर दिया। जर्मन क्रांति ने बर्लिन में संस्थान
स्थापित करने की आशा को विफल कर दिया। ब्रिटिश होम ऑफिस ने हैम्पस्टेड में संस्थान
स्थापित करने की संभावना समाप्त कर दी। बहुत कठिनाइयों के बाद गुर्जिएफ़ ने
प्रीएरे प्राप्त किया। लेकिन दो वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे कि उनकी कार दुर्घटना ने
उनकी आशाओं को झटका दे दिया। अंततः उन्हें वही करना पड़ा, जिस पर उन्हें कई वर्ष पहले विचार कर लेना चाहिए था। अपने
विचारों को लिखित रूप में दर्ज करना। इसका परिणाम दो असाधारण कृतियाँ थीं— बीएलज़ेबब
(Beelzebub) और
मीटिंग्स विद रीमार्केबल मेन (Meetings with Remarkable Men)। लेकिन उन्होंने लाइफ़ इज़ रियल ओनली देन, व्हेन ‘आइ ऐम’ (Life
Is Real Only Then, When ‘I Am’)
को आधे से भी कम पूरा होने पर छोड़ दिया और अपने विचारों को
सीधे सिखाने की थका देने वाली मेहनत में फिर लौट गए। विलियम सीब्रुक द्वारा वर्णित
बीएलज़ेबब (Beelzebub)
के पाठ से स्पष्ट है कि गुर्जिएफ़ को आशा थी कि उनकी लिखी
हुई पुस्तकें लोगों पर तत्काल प्रभाव डालेंगी। दुर्भाग्य से, सामान्य शिक्षित लोगों की पूर्ण असमझ ने उन्हें विश्वास
दिला दिया कि यह रास्ता समाधान नहीं था।
यदि उस्पेन्स्की ने 1930 में ‘इन सर्च ऑफ़ द मिरैक्युलस’ (In
Search of the Miraculous)
प्रकाशित कर दी होती, उसी समय जब गुर्जिएफ़ बीएलज़ेबब (Beelzebub) को
अंतिम रूप दे रहे थे तो इसमें शायद ही कोई संदेह है कि वह ठीक वैसा प्रभाव डालती, जैसा प्रभाव बीएलज़ेबब (Beelzebub) डालने
में असफल रही। लेकिन तब ‘कार्य’ (Work) के
बारे में उस्पेन्स्की के असामान्य रूप से संकीर्ण और कठोर नैतिकतावादी दृष्टिकोण
ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया कि लेखन किसी तरह वर्जित है। वास्तव में, उनकी अपनी पुस्तक का अंततः प्रकाशित होना, और ‘Work’ से जुड़े अन्य लोगों द्वारा लिखी गई अनेक उत्कृष्ट पुस्तकों
का प्रकाशन, इस बात को पूरी तरह
सिद्ध करता है कि गुर्जिएफ़ के विचारों का सार मुद्रित पृष्ठों के माध्यम से बहुत
अच्छी तरह पहुँचाया जा सकता है। जैसा कि बेनेट ज़ोर देकर कहते हैं, शिक्षा के कुछ ऐसे पक्ष अवश्य हो सकते हैं जिन्हें केवल
शिक्षक से विद्यार्थी तक सीधे पहुँचाया जा सकता है। लेकिन सामान्यतः गुर्जिएफ़ के
विचार पढ़ने और उनका अध्ययन करने से और अधिक प्रभावशाली बनते हैं।
मेरा अनुमान है कि यही सब कुछ इस बात को स्पष्ट करता है कि
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में गुर्जिएफ़ बेनेट को इतने उदास व्यक्ति क्यों लगे। उनका
जीवन-कार्य असाधारण था। वे ‘गुप्त ज्ञान’ की खोज में निकले थे और उसे पा चुके थे।
उन्होंने जो ‘System’ वापस
लाया,
वह पश्चिमी संस्कृति की दृष्टि से अत्यन्त मौलिक और चौंका
देने वाला था। यदि वे इन विचारों को बीसवीं शताब्दी की दुनिया पर अधिकतम प्रभाव
डालते हुए देखने की आशा करते तो यह उन्हें मनुष्य होने के नाते स्वाभाविक ही था। यह
अहंकार नहीं था। सभी विचारकों के भीतर अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाने की
इच्छा होती है। यह विकास की प्रेरणा का ही एक हिस्सा है। फिर भी अपने जीवनकाल में गुर्जिएफ़
अधिकांश लोगों के लिए लगभग अज्ञात ही बने रहे। रोम लैंडाउ की ‘गॉड इज़ माय एडवेंचर’
(God
Is My Adventure) जो उनके जीवनकाल में
उनके बारे में प्रकाशित हुई कुछ गिनी-चुनी पुस्तकों में से एक थी, में वे केवल
अनेक आध्यात्मिक व्यक्तियों की एक श्रृंखला में से एक हैं। उस सूची में रुडोल्फ़
स्टाइनर,
कृष्णमूर्ति, श्री बाबा, डॉ.
फ्रैंक बुख़मैन और ‘प्रिंसिपल’ जॉर्ज जेफ़्रीज़ भी शामिल हैं। विडंबना यह है कि
उस्पेन्स्की को भी एक पूरा अध्याय दिया गया है। गुर्जिएफ़ को बहुत संक्षिप्त और
कुछ हद तक संरक्षणवादी ढंग से उल्लेखित किया गया है। लेकिन कहीं यह संकेत नहीं
मिलता कि ‘स्लीप’ (sleep)
के विरुद्ध युद्ध’ का विचार गुर्जिएफ़ का था, उस्पेन्स्की का नहीं।
मेरे विचार में यही गुर्जिएफ़ की त्रासदी थी। उन्होंने अपने
विचारों को लेखन के माध्यम से फैलाने का विचार छोड़ दिया और उस एकमात्र दूसरी
भूमिका में लौट गए जिसे वे जानते थे— शिक्षक की भूमिका में। विभिन्न लेखकों, फ्रिट्ज़
पीटर्स,
मार्गरेट एंडरसन, इर्मिस पोपोफ़ द्वारा गुर्जिएफ़ के शिष्यों के दिए गए
विवरणों से स्पष्ट है कि उन शिष्यों ने उनकी धैर्य की खूब परीक्षा ली होगी। सामान्यतः
कोई ‘शिक्षक’ अपने शिष्यों को चुन नहीं सकता। उसे भाग्य जो लोग भेजता है, उन्हीं को स्वीकार करना पड़ता है और अनिवार्य रूप से उनमें
एक बड़ी संख्या मूर्खों की होती है। बेनेट और उस्पेन्स्की जैसे कुछ शिष्य शायद
इतने सारे अन्य शिष्यों की खराब गुणवत्ता की भरपाई कर देते थे और गुर्जिएफ़ को
उनसे सांत्वना मिलती थी। लेकिन ऐसे भी अवसर अवश्य आए होंगे जब उन्हें लगा होगा कि
भाग्य ने उनके ऊपर असाधारण रूप से भारी बोझ डाल दिया है। यदि गुर्जिएफ़ एक
प्रकाशित लेखक होते तो
वे पीछे बैठकर लोगों के स्वयं उनके पास आने की प्रतीक्षा कर सकते थे। लेकिन इसके
बजाय उन्होंने यह काम सबसे कठिन तरीके से किया। उनका आशावाद अपार था, उनकी जीवन-शक्ति असाधारण थी। फिर भी ऐसा लगता है कि उन्हें
स्वयं को सांत्वना देने के लिए बड़ी मात्रा में आर्मान्याक[6] और बड़ी-बड़ी काली सिगारों का
सहारा लेना पड़ता था। ऐसा व्यक्ति, जैसा कि हम उम्मीद करते, नब्बे वर्ष तक जीवित रहता। इसके बजाय उनकी मृत्यु सत्तर के
आस-पास की आयु में हो गई। उनकी मृत्यु के समय भी शायद उनके मन में यह प्रश्न बना
हुआ था कि उनके विचार जीवित रहेंगे या नहीं। पाँच वर्ष के भीतर इस बारे में कोई
संभव संदेह नहीं रह गया था। गुर्जिएफ़ का दुर्भाग्य यही था कि वे कभी यह जान नहीं
पाए कि वे कितनी दूर तक सफल हो चुके थे।
यदि गुर्जिएफ़ के विचारों को एक ही वाक्य में संक्षेपित
किया जा सके तो वह यह
होगा कि मनुष्य घड़ी की तरह है, जिसे
घड़ी के भीतर लगी एक छोटी-सी स्प्रिंग चलाती है। या फिर वह एक विशाल जल-चक्की की
तरह है,
जिसे कीचड़ भरे पानी की एक पतली-सी धार चला रही हो। अजीब
विरोधाभास यह है कि चालक-शक्ति की अपर्याप्तता के बावजूद हमारे भीतर पहले से ही एक
विशाल और जटिल तंत्र मौजूद प्रतीत होता है। सीढ़ी की तरह मनुष्य अनेक स्तरों से
बना है। इसलिए समस्या स्पष्ट है: चालक-शक्ति को बढ़ाना। मनुष्य आधे से अधिक
यांत्रिक हो सकता है। लेकिन
वह यह चुन सकता है कि वह एक रिक्त, सम्मोहित अवस्था में जीवन बिताए या इस तरह जिए मानो रोज़मर्रा की वास्तविकता के इस पर्दे के
दूसरी ओर कोई विराट, अभी-अनजाना
अर्थ मौजूद हो, जो उद्देश्य की भावना
के सामने स्वयं को प्रकट करने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
गुर्जिएफ़ का ‘System’ सम्भवतः मानव-विचार के इतिहास में मानव-चेतना की सम्भावनाओं
के प्रति हमें जागरूक करने का किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया सबसे महान प्रयास
है। वे इसे समझ पाए हों या नहीं, उनका
जीवन-कार्य अपने उद्देश्य को पूरा कर चुका था।
[1]
यहाँ Calvinistic (कैल्विनवादी) का संबंध John Calvin की धार्मिक
विचारधारा से है। इस संदर्भ में इसका संकेत संभवतः कठोर, नियतिवादी और पहले से निर्धारित व्यवस्था में दृढ़ विश्वास की ओर है।
[2]
Black Room (ब्लैक रूम) एक ऐसा कमरा होता
है जिसे पूरी तरह अँधेरा और बाहरी उत्तेजनाओं से लगभग मुक्त रखा जाता है। व्यक्ति
को कुछ समय के लिए उसमें रखा जाता है ताकि यह देखा जा सके कि जब आँखों को प्रकाश और मस्तिष्क को
सामान्य बाहरी संकेत नहीं मिलते,
तो चेतना और अनुभव में क्या परिवर्तन होते हैं।
[3]
यहाँ Peak Experience (पीक एक्सपीरियंस) से आशय ऐसे अत्यंत गहरे और
उत्कट अनुभव से है, जिसमें व्यक्ति को
कुछ समय के लिए असाधारण आनंद,
एकत्व, स्पष्टता, विस्मय या
आत्म-सीमा से परे होने का अनुभव हो सकता है। अब्राहम मैस्लो ने इसे मनोविज्ञान में असाधारण
सकारात्मक/आध्यात्मिक अनुभव की चरम अवस्था के अर्थ में इस्तेमाल किया था।
[4]
यहाँ Russian roulette में व्यक्ति भरी हुई रिवॉल्वर के साथ
अत्यंत जोखिमपूर्ण खेल खेलता है। ग्रीन के लिए गोली न चलने का वह क्षण इतना तीव्र
था कि अचानक उन्हें
जीवन की असंख्य संभावनाओं का बोध हुआ। यही अनुभव लेखक आगे “peak
experience” (चरम अनुभव)
की अवधारणा से जोड़ रहा है।
[5]
यहाँ “like the tables of the law” बाइबिल के मूसा को दी गई विधि
की पट्टिकाओं (Tablets of
the Law) की ओर संकेत है। अर्थात लेखक कह रहा है कि गुर्जिएफ़ को कोई
पूर्ण, अपरिवर्तनीय
प्राचीन ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था,
जिसे उन्होंने ज्यों-का-त्यों अपने अनुयायियों को दे दिया हो।
[6] यह फ़्रांस
के गैस्कोनी (Gascony) क्षेत्र में बनने
वाली एक प्रसिद्ध ब्रांडी
(मद्य) है।