Tuesday, 28 July 2026

जीवन के मूल्य के बारे में -- पत्र - 91

 प्रिय लूसीलियस 


तुमने दार्शनिक मेट्रोनैक्स की मृत्यु पर मुझे जो पत्र लिखा, उसमें व्यक्त शोक से ऐसा प्रतीत हुआ कि तुम्हारा मानना था कि वह कुछ और समय तक जीवित रह सकता था बल्कि उसे जीवित रहना ही चाहिए था। मुझे उसमें वह निष्पक्षता दिखाई नहीं दी जो तुम सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक व्यावहारिक मामले में प्रचुर मात्रा में दिखाते हो, पर इस एक विषय में जैसा कि लगभग सभी लोग करते हैं, तुम उससे वंचित रह गए। मेरे अनुभव में बहुत-से लोग मनुष्यों के प्रति तो न्यायपूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं, पर देवताओं के प्रति कोई भी निष्पक्ष नहीं होता। हम प्रतिदिन भाग्य को कोसते हुए कहते हैं, “इस व्यक्ति को उसके जीवन-कार्य के बीच में ही क्यों उठा लिया गया? उस दूसरे को क्यों नहीं? वह उस व्यक्ति की वृद्धावस्था को क्यों लंबा खींच रहा है, जो स्वयं अपने लिए भी बोझ बन चुका है और दूसरों के लिए भी?” 



    देखो, तुम्हें क्या अधिक न्यायसंगत प्रतीत होता है, प्रकृति तुम्हारी आज्ञा माने या तुम प्रकृति की? इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम उस स्थान को कितनी जल्दी छोड़ते हो, जिसे एक दिन तुम्हें छोड़ना ही है? हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम कितने लंबे समय तक जीते हैं बल्कि इस बात की कि क्या हमने पर्याप्त रूप से जीवन जिया है। लंबे जीवन के लिए भाग्य की सहायता चाहिए। पर पर्याप्त जीवन जीने के लिए सबसे आवश्यक चीज़ मनुष्य का चरित्र है। जीवन तभी लंबा होता है जब वह पूर्ण हो और वह तभी पूर्ण होता है जब मन स्वयं को वही नैतिक उत्कृष्टता प्रदान करता है जो उसके स्वभाव के अनुरूप है। अपने ऊपर स्वयं का अधिकार स्थापित करता है। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन कुछ भी सार्थक किए बिना बिताया हो, उसके लिए अस्सी वर्ष किस काम के? ऐसे व्यक्ति ने वास्तव में जीवन नहीं जिया। वह केवल जीवन से चिपका रहा। उसने वृद्धावस्था में मरना नहीं सीखा बल्कि लंबे समय तक मरते रहने का अनुभव किया। तुम कहते हो, “वह अस्सी वर्ष जिया।” पर वास्तविक प्रश्न यह है कि उसकी मृत्यु की गणना तुम किस दिन से करते हो। 

    “लेकिन वह व्यक्ति तो अपनी युवावस्था के उत्कर्ष में ही मर गया।” फिर भी उसने एक अच्छे नागरिक, एक अच्छे मित्र और एक अच्छे पुत्र के सभी कर्तव्यों का पालन किया। वह किसी भी भूमिका में अधूरा नहीं रहा। यद्यपि उसकी आयु पूरी नहीं हुई, उसका जीवन वास्तव में पूर्ण था। “वह दूसरा व्यक्ति अस्सी वर्ष तक जीवित रहा।” सच तो यह है कि वह केवल उतने वर्षों तक अस्तित्व में रहा, जब तक कि तुम 'जीवित रहने' का वही अर्थ न लो, जो हम पेड़ों के लिए लेते हैं। सुनो, लूसीलियस, हमें प्रयास करना चाहिए कि हमारे जीवन का मूल्य उसी प्रकार आँका जाए, जैसे बहुमूल्य वस्तुओं का होता है। उनके आकार से नहीं बल्कि उनके भार (मूल्य और सार) से। उसी प्रकार हमारे जीवन का मूल्य उसकी अवधि से नहीं बल्कि उसके कर्मों और उपलब्धियों से मापा जाना चाहिए।

    क्या तुम जानना चाहते हो कि उस दृढ़ और साहसी व्यक्ति में, जो भाग्य को तुच्छ समझता है, जिसने जीवन के हर संघर्ष में एक अनुभवी योद्धा की तरह लड़ते हुए जीवन के परम कल्याण को प्राप्त कर लिया है और उस व्यक्ति में क्या अंतर है जिसके ऊपर केवल बहुत-से वर्ष बीत गए हैं? पहला व्यक्ति मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है। जबकि दूसरा अपनी मृत्यु आने से पहले ही मर चुका होता है। इसलिए हमें उस व्यक्ति की प्रशंसा करनी चाहिए और उसे बधाई देनी चाहिए जिसने अपने समय का सर्वोत्तम उपयोग किया हो, चाहे उसका जीवन कितना ही संक्षिप्त क्यों न रहा हो। उसने जीवन के वास्तविक प्रकाश का दर्शन किया है। वह भीड़ का मात्र एक सदस्य बनकर नहीं रहा। उसने सचमुच जीवन जिया और उसका पूर्ण विकास किया। कभी उसके जीवन में निर्मल और उज्ज्वल दिन आए। उससे भी अधिक बार उसे केवल सूर्य के क्षणिक प्रकाश की झलकियाँ ही मिलीं। फिर भी तुम यह क्यों पूछते हो कि वह कितने समय तक जीवित रहा? वह आज भी जीवित है। वह समय की सीमाओं को लाँघकर आने वाली पीढ़ियों में प्रवेश कर चुका है और स्वयं को हमारी स्मृति के सुपुर्द कर गया है। 

    लेकिन यह मत समझना कि मैं अपने जीवन में और अधिक वर्षों की वृद्धि को अस्वीकार करूँगा। यदि मेरे जीवन की अवधि छोटी भी रह जाए तो भी मैं यह नहीं कहूँगा कि मैंने सुख के लिए आवश्यक किसी वस्तु का अभाव अनुभव किया। मैंने अपने आपको इस आशा में तैयार नहीं किया कि किसी लालची व्यक्ति की तरह अंतिम दिन तक जीता रहूँ बल्कि मैंने प्रत्येक दिन को ऐसे देखा है मानो वही मेरा अंतिम दिन हो। तुम यह क्यों पूछते हो कि मेरा जन्म कब हुआ था या क्या मेरा नाम अभी भी युवकों की सूची में दर्ज है? जो वास्तव में मेरा है, वह मेरे पास है। जैसे छोटा कद होने पर भी कोई मनुष्य पूर्ण मनुष्य हो सकता है, उसी प्रकार कम अवधि का जीवन भी पूर्ण हो सकता है। आयु तो बाहरी वस्तु है। मैं कितने समय तक अस्तित्व में रहूँगा, यह मेरे अधिकार में नहीं है। परंतु मैं वास्तव में कैसे जीता हूँ, यह मेरा अपना है। तुम मुझसे केवल यही अपेक्षा कर सकते हो कि मैं अपना जीवन साधारण, निष्क्रिय और गुमनामी में बिताकर वर्षों की गणना न करूँ बल्कि सचमुच जीवन जीऊँ, केवल समय बिताता न रहूँ।

    तुम पूछते हो कि सबसे समृद्ध जीवन की अवधि कितनी होती है। उसका उत्तर यह है, वह जीवन जो तब तक जिया जाए, जब तक मनुष्य प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) को प्राप्त न कर ले। जो उस अवस्था तक पहुँच जाता है, वह जीवन की सबसे बड़ी अवधि नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। ऐसा व्यक्ति निडर होकर अपनी उपलब्धि पर गर्व करेगा। वह देवताओं का और स्वयं को भी उनमें सम्मिलित मानते हुए आभार व्यक्त करेगा तथा अपने अस्तित्व का श्रेय प्रकृति को देगा। ऐसा करने में वह पूर्णतः उचित होगा क्योंकि उसने प्रकृति को उससे बेहतर जीवन लौटाया है, जितना उसे प्रकृति से प्राप्त हुआ था। उसने एक आदर्श मनुष्य का प्रतिमान स्थापित किया है। उसने यह दिखा दिया है कि सच्चा कल्याण (श्रेष्ठ जीवन) कैसा होता है और उसका महत्व कितना महान है। यदि उसे इससे भी अधिक लंबा जीवन मिला होता तो वह उसके पहले के जीवन के समान ही होता अर्थात उसी उत्कृष्टता, प्रज्ञा और सद्गुण का विस्तार मात्र होता।

    वास्तव में हमें कितना जीना चाहिए? उतना कि हम इस ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त कर लें। हम जान लें कि प्रकृति की सृष्टि का आरंभ कैसे हुआ, वह इस विश्व को किस प्रकार व्यवस्थित रखती है, किन-किन परिवर्तनों के माध्यम से वह प्रत्येक वर्ष का पुनर्निर्माण करती है और किस प्रकार वह उन सभी वस्तुओं को अपने भीतर समेटे रहती है जो कभी अस्तित्व में आएँगी तथा स्वयं ही अपना अंतिम लक्ष्य भी है। हम यह जान लें कि तारागण अपनी ही शक्ति से गतिमान हैं। पृथ्वी के अतिरिक्त कुछ भी स्थिर नहीं है और शेष सभी खगोलीय पिंड निरंतर वेग से गतिशील हैं। हम समझ लें कि चंद्रमा सूर्य को कैसे और क्यों पीछे छोड़ देता है। जबकि उसकी गति धीमी है। वह अपना प्रकाश कैसे प्राप्त करता है और कैसे खो देता है तथा वे कौन-से कारण हैं जो रात्रि को लाते हैं और फिर दिन को वापस ले आते हैं। इन सबका अधिक निकट से दर्शन करने के लिए तुम्हें वहाँ जाना होगा जहाँ से इन्हें और स्पष्ट देखा जा सके। 

    फिर भी, ज्ञानी व्यक्ति कहता है, “मैं इसलिए अधिक निर्भीक होकर मृत्यु का सामना नहीं करता कि मुझे विश्वास है कि मैं सीधे अपने देवताओं के पास जा रहा हूँ। मैंने उनके बीच स्थान पाने की योग्यता अर्जित कर ली है। मैं पहले ही उनके साथ रह चुका हूँ। मैंने अपने विचार उनके पास भेजे हैं और उन्होंने अपने विचार मेरे पास भेजे हैं। किन्तु यदि ऐसा हो कि मृत्यु के बाद मेरा संपूर्ण अस्तित्व ही मिट जाए और मेरे मानवीय स्वरूप का कुछ भी शेष न बचे, तब भी मेरा आत्मविश्वास उतना ही अडिग रहेगा। यदि मैं ऐसी यात्रा पर निकलूँ जहाँ पहुँचकर कहीं भी ठहरना न हो, तब भी मैं निर्भय होकर प्रस्थान करूँगा।”

    “वह तो बहुत अधिक समय तक जीवित रह सकता था।” हाँ, परंतु कोई पुस्तक केवल कुछ ही श्लोकों की होकर भी उत्कृष्ट और उपयोगी हो सकती है। तुम जानते हो कि टैनूसियस के इतिहास-वृत्तांत (Annals) कितने विशाल हैं और लोग उनके बारे में कैसी राय रखते हैं। कुछ लोगों का लंबा जीवन भी ठीक वैसा ही होता है, बहुत लंबा, पर सारहीन। क्या तुम उस व्यक्ति को अधिक भाग्यशाली मानते हो जो खेलों के अंतिम दिन मारा जाता है, उस व्यक्ति की अपेक्षा जो बीच ही में मर जाता है? क्या कोई इतना मूर्खतापूर्वक जीवन से चिपका हो सकता है कि वह अखाड़े में लड़ते हुए मरने के बजाय कपड़े उतारने वाले घेरे (stripping circle) में मारा जाना अधिक पसंद करे? हममें से कोई केवल थोड़ा पहले जाता है और कोई थोड़ा बाद में। मृत्यु तो सबके पास आती है। जो मारा गया है, उसके पीछे मारने वाला भी शीघ्र ही चल पड़ता है। जिस बात को लोग इतना बड़ा दुख समझते हैं, वह वास्तव में बहुत छोटी-सी बात है। इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम उस चीज़ को कितने समय तक टालते रहते हो, जिससे अंततः बचा ही नहीं जा सकता?


अभी के लिए विदा 

तर्कहीन और तर्कयुक्त के संदर्भ में -- पत्र - 90

 प्रिय लूसीलियस 


मुझे लगता है कि तुम और मैं इस बात पर सहमत होंगे कि बाहरी वस्तुओं की इच्छा हम शरीर के लिए करते हैं। शरीर की देखभाल हम मन के सम्मान के लिए करते हैं। मन के भीतर भी कुछ अधीनस्थ शक्तियाँ होती हैं, जो हमारी गति और पोषण जैसी क्रियाओं का संचालन करती हैं तथा जिन्हें वास्तव में उस प्रधान संचालक शक्ति की सेवा के लिए ही हमें दिया गया है। यह प्रधान संचालक शक्ति स्वयं दो भागों से बनी है, एक तर्कहीन और दूसरा तर्कयुक्त। तर्कहीन भाग, तर्कयुक्त भाग की सेवा करता है। तर्कयुक्त भाग ही ऐसा है जो स्वयं किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहता बल्कि वह अन्य सभी बातों को अपने अधीन रखता है और उनका मार्गदर्शन करता है। इसी प्रकार, जैसा कि तुम जानते हो, दिव्य बुद्धि भी समस्त सृष्टि के शीर्ष पर स्थित है। वह किसी अन्य के अधीन नहीं है। हमारी बुद्धि, जो उसी दिव्य बुद्धि से उत्पन्न हुई है, उसी प्रकार की है। 


By Kitagawa Utamaro

    यदि हम इस बात पर सहमत हैं तो यह भी स्वाभाविक है कि हम इस दूसरे निष्कर्ष पर भी सहमत हों कि सुखी जीवन केवल अपनी तर्कशक्ति को पूर्णता तक विकसित करने में ही निहित है। क्योंकि पूर्ण विकसित तर्कशक्ति ही ऐसी शक्ति है जो मन को सदैव ऊँचा बनाए रखती है और भाग्य के सामने दृढ़ता से खड़ी रहती है।परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वही हमें चिंता और व्याकुलता से मुक्त रखती है। यही एकमात्र ऐसा शुभ है जो कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता। मेरा आशय यह है कि वास्तव में सुखी वही व्यक्ति है जिसे कोई भी घटना छोटा या दुर्बल नहीं बना सकती। जिसने जीवन की वास्तव में महत्त्वपूर्ण बातों पर अधिकार प्राप्त कर लिया है और जो अपने अतिरिक्त किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहता। जो व्यक्ति सहारे के लिए किसी और पर निर्भर करता है, उसके गिर जाने की संभावना बनी रहती है। अन्यथा वे वस्तुएँ, जो वास्तव में हमारी अपनी नहीं हैं, हमारे ऊपर अत्यधिक अधिकार जमाने लगेंगी। भला कौन ऐसा होगा जो भाग्य पर निर्भर रहना चाहे? कौन-सा बुद्धिमान व्यक्ति उन वस्तुओं पर गर्व करेगा जो वास्तव में उसकी अपनी नहीं हैं?

    सुखी जीवन क्या है? वह है सुरक्षा और स्थायी मानसिक शांति। इन दोनों का स्रोत है महान आत्मा और उस उत्तम निर्णय पर अटल बने रहने का दृढ़ संकल्प जिसे एक बार सही समझकर स्वीकार किया गया हो। इन गुणों तक कैसे पहुँचा जाए? प्रत्येक वस्तु के सत्य को उसकी संपूर्णता में देखकर, अपने प्रत्येक कर्म में व्यवस्था, संयम और मर्यादा बनाए रखकर, ऐसी इच्छा-शक्ति रखकर जो सदैव शुभ और उदार हो, जो केवल तर्क के मार्ग पर चलती हो और उससे कभी विचलित न होती हो, ऐसी इच्छा-शक्ति जो जितनी प्रशंसनीय है, उतनी ही प्रिय भी है।संक्षेप में मैं इसे इस प्रकार कहूँगा, बुद्धिमान व्यक्ति का मन ऐसा होना चाहिए जो किसी देवता के योग्य हो। जिस मनुष्य के पास वह सब कुछ है जो सम्माननीय और सद्गुणपूर्ण है, उसे और किस वस्तु की कमी हो सकती है? यदि अन्य प्रकार की वस्तुएँ जीवन की सर्वोत्तम अवस्था में कोई योगदान दे सकती हैं तो वे सुखी जीवन की केवल सहायक परिस्थितियाँ हो सकती हैं, उसका आधार नहीं। क्योंकि यह सर्वथा अनुचित और निरर्थक होगा कि एक तर्कशील आत्मा की उत्कृष्टता को उन वस्तुओं पर निर्भर माना जाए जो स्वयं तर्कहीन हैं। 

    फिर भी कुछ लोग यह दावा करते हैं कि परम शुभ ऐसी वस्तु है जिसमें वृद्धि हो सकती है क्योंकि प्रतिकूल परिस्थितियों में वह अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता। यहाँ तक कि महान स्टोइक आचार्यों में से एक, एंटिपेटर भी कहते हैं कि वे बाहरी वस्तुओं को कुछ महत्त्व देते हैं, यद्यपि बहुत ही थोड़ा। इसका अर्थ कुछ ऐसा हुआ मानो कोई व्यक्ति दिन के उजाले से तब तक संतुष्ट न हो, जब तक उसके साथ किसी छोटे-से दीपक का प्रकाश भी न जुड़ जाए। पर जब सूर्य का तेज उपस्थित है, तब एक छोटी-सी चिंगारी उससे क्या अंतर ला सकती है? यदि तुम्हें केवल सदाचरण ही पर्याप्त नहीं लगता तो फिर तुम उसके साथ या तो मानसिक कष्टों की अनुपस्थिति (जिसे यूनानी भाषा में "आओख्लेसिया" कहते हैं) या फिर सुख का भी समावेश करना चाहोगे। इनमें से पहली बात तो किसी सीमा तक स्वीकार की जा सकती है क्योंकि चिंता और व्याकुलता से मुक्त मन न तो ब्रह्मांड के अध्ययन में बाधित होता है और न ही प्रकृति के चिंतन से विचलित होता है। लेकिन दूसरी बात, अर्थात इन्द्रिय-सुख तो चरने वाले पशु का शुभ है। यह तर्कशील के साथ अतार्किक को, सम्माननीय के साथ असम्माननीय को और महान के साथ तुच्छ को जोड़ने जैसा है, यदि यह कहा जाए कि सुखी जीवन केवल शरीर में होने वाली हल्की-सी सुखद अनुभूति से बन जाता है। यदि ऐसा है तो फिर यह कहने में संकोच कैसा कि कोई मनुष्य इसलिए अच्छा जीवन जी रहा है क्योंकि उसकी जीभ स्वाद का आनंद ले रही है? क्या तुम उस व्यक्ति को, जिसका परम शुभ स्वाद, रंग और ध्वनियों जैसी इन्द्रियानुभूतियों में निहित है, वास्तव में मनुष्य तो दूर, एक श्रेष्ठ मनुष्य भी मानोगे? नहीं, उसे तो उस प्राणी की श्रेणी से ही बाहर कर देना चाहिए जो सभी जीवों में श्रेष्ठ है और जो देवताओं के बाद दूसरा स्थान रखता है। उसे तो उन पशुओं की श्रेणी में भेज देना चाहिए जो अपनी तृप्ति केवल नांद में खोजते हैं। 

    मन का अतार्किक भाग स्वयं भी दो भागों में विभाजित है। एक भाग उत्साही, महत्वाकांक्षी और उच्छृंखल है, जो भावनाओं और आवेगों का क्षेत्र है। दूसरा भाग निकृष्ट, आलसी और इन्द्रिय-सुखों में लिप्त रहने वाला है। इन लोगों ने पहले भाग को, जो यद्यपि अनुशासनहीन है, फिर भी दूसरे की अपेक्षा श्रेष्ठ है और निश्चय ही अधिक साहसी तथा मनुष्य के अधिक योग्य है, एक ओर रख दिया और दूसरे भाग को, जो कायर और अत्यंत हीन है, सुखी जीवन के लिए अनिवार्य मान लिया। इस प्रकार उन्होंने तर्कशक्ति को उसी का दास बना दिया और सबसे श्रेष्ठ प्राणी के परम शुभ को गिराकर उसका अवमूल्यन कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने परस्पर बिल्कुल भिन्न और असंगत तत्वों को मिलाकर एक विकृत मिश्रण तैयार कर दिया। जैसा कि हमारे कवि वर्जिल ने स्किला का वर्णन करते हुए कहा है—

“ऊपर से उसका मुख मनुष्य का था,
और वक्ष तक वह एक सुंदर युवती दिखाई देती थी। 
पर कमर के नीचे वह एक घृणित समुद्री राक्षसी थी,
जिसके भेड़िए जैसे शरीर से डॉल्फ़िन की पूँछें जुड़ी हुई थीं।”

किन्तु स्किला के अंग तो उग्र, भयावह और तीव्र गति वाले जंगली पशुओं के थे। ज़रा उन विकृत रूपों पर विचार करो जिनसे इन लोगों ने बुद्धिमत्ता की रचना की है! मनुष्य का सर्वोच्च भाग तो स्वयं सद्गुण है। पर उसके साथ उन्होंने ऐसा शरीर जोड़ दिया है जो किसी वास्तविक उपयोग का नहीं, अस्थिर है और केवल भोजन को संचित रखने का पात्र मात्र है, जैसा कि पोसिडोनियस कहते हैं। इस प्रकार सद्गुण, जो दिव्यता का एक अंश है, जाकर एक चिपचिपे मांस-पिंड पर समाप्त होता है। उसके उन उच्च और वास्तव में दिव्य अंगों के साथ, जो श्रद्धा के योग्य हैं, उन्होंने एक ऐसे प्राणी को जोड़ दिया है जो सुस्त, निर्बल और रोगग्रस्त है। उनका दूसरा लक्ष्य, मानसिक क्लेश का अभाव। यद्यपि आत्मा को कोई सकारात्मक लाभ नहीं देता, फिर भी कम-से-कम उसके मार्ग की बाधाएँ तो दूर कर देता है। लेकिन इन्द्रिय-सुख तो इसके विपरीत आत्मा को ही दुर्बल बना देता है और उसकी सारी शक्ति को शिथिल कर देता है। इतने बेमेल तत्वों का ऐसा संयोग शायद ही कहीं और मिल सके। उन्होंने सबसे दृढ़ वस्तु को सबसे निर्बल वस्तु के साथ, सबसे गंभीर को सबसे तुच्छ के साथ और सबसे पवित्र को हर प्रकार की अनैतिकता के साथ जोड़ दिया है। 

    “इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुँचो,” विरोधी कहता है। “यदि अच्छा स्वास्थ्य, विश्राम और पीड़ा का अभाव सद्गुण में कोई बाधा नहीं डालते तो क्या तुम उनका अनुसरण नहीं करोगे?” निश्चय ही करूँगा। लेकिन इसलिए नहीं कि वे अपने आप में शुभ हैं बल्कि इसलिए कि वे प्रकृति के अनुरूप हैं। उनका चुनाव करना मेरे लिए विवेकपूर्ण निर्णय का अभ्यास है। फिर उनमें शुभ क्या है? केवल यही कि उनका चयन उचित ढंग से किया गया है। देखो, जब मैं अच्छे वस्त्र पहनता हूँ, उचित ढंग से टहलता हूँ या जैसा करना चाहिए वैसा भोजन करता हूँ, तब शुभ वस्त्र, टहलना या भोजन नहीं होते। शुभ तो मेरी वह भावना और मंशा होती है जिसके द्वारा मैं प्रत्येक कार्य में तर्क के अनुरूप मर्यादा और संतुलन बनाए रखता हूँ। इसे मैं और स्पष्ट करता हूँ। स्वच्छ वस्त्र चुनना मनुष्य का कर्तव्य है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से स्वच्छता और शालीनता को पसंद करने वाला प्राणी है। इसलिए स्वच्छ वस्त्र अपने आप में कोई शुभ नहीं हैं। शुभ तो उनका उचित चयन है। क्योंकि शुभता वस्तु में नहीं बल्कि उसके चयन की गुणवत्ता में निहित होती है। सम्माननीय वह कर्म है, न कि वे वस्तुएँ जिनके साथ वह कर्म किया जाता है। अब यही बात शरीर के संबंध में भी समझो। शरीर भी एक प्रकार का वस्त्र है, जिसमें प्रकृति ने आत्मा को मानो लपेट रखा है। पर भला किसने कभी वस्त्रों का मूल्य उस संदूक के आधार पर आँका है जिसमें उन्हें रखा जाता है? जैसे म्यान तलवार को न अच्छा बनाती है, न बुरा, उसी प्रकार शरीर भी आत्मा का मूल्य निर्धारित नहीं करता। इसलिए शरीर के विषय में भी मेरा उत्तर वही है। यदि मुझे चुनाव का अवसर दिया जाए, तो मैं अच्छा स्वास्थ्य और शारीरिक बल ही चुनूँगा। किंतु जो वास्तव में शुभ होगा, वह स्वास्थ्य और बल नहीं बल्कि उनके संबंध में मेरा विवेकपूर्ण निर्णय होगा। 

    “निस्संदेह बुद्धिमान व्यक्ति सुखी होता है। पर वह परम शुभ को तब तक प्राप्त नहीं करता, जब तक उसके पास प्रकृति द्वारा दिए गए कुछ साधन उपलब्ध न हों। इसलिए, यद्यपि सद्गुण से संपन्न व्यक्ति दुखी नहीं हो सकता, फिर भी यदि उसके पास अच्छा स्वास्थ्य और अक्षुण्ण शारीरिक अवस्था जैसे प्राकृतिक लाभ न हों तो वह पूर्णतः सुखी भी नहीं होता।” तुम ऐसी बात स्वीकार कर रहे हो जिस पर विश्वास करना और भी कठिन है। तुम यह मान लेते हो कि जो व्यक्ति अत्यंत तीव्र और निरंतर पीड़ा सह रहा है, वह केवल दुखी ही नहीं है बल्कि सुखी भी है। लेकिन तुम इस अपेक्षाकृत सरल बात को स्वीकार करने में हिचकते हो कि वही व्यक्ति पूर्णतः सुखी भी हो सकता है। यदि सद्गुण में इतनी शक्ति है कि वह किसी मनुष्य को दुखी होने से बचा सकता है तो उसके लिए उसे पूर्णतः सुखी बनाना तो और भी आसान होना चाहिए। आखिर सुखी और पूर्णतः सुखी होने के बीच का अंतर, दुखी और सुखी होने के बीच के अंतर से कहीं कम है। जो शक्ति किसी मनुष्य को विपत्तियों से निकालकर सुखी लोगों की श्रेणी में ला सकती है, क्या उसमें इतना सामर्थ्य भी नहीं होगा कि वह शेष छोटा-सा अंतर भी मिटाकर उसे पूर्णतः सुखी बना दे? क्या वह शिखर तक पहुँचते-पहुँचते ही अपनी शक्ति खो बैठती है? 

    जीवन में कुछ लाभ होते हैं और कुछ हानियाँ और दोनों ही हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। यदि सद्गुणी मनुष्य सभी प्रकार की हानियों से घिरा होने पर भी दुखी नहीं होता तो केवल कुछ लाभों के अभाव में वह पूर्णतः सुखी क्यों नहीं रह सकता? जैसे हानियों का बोझ उसे दुखी नहीं बना सकता, वैसे ही लाभों का अभाव उसे पूर्ण सुख से वंचित नहीं कर सकता। वह लाभों के बिना भी उतना ही पूर्णतः सुखी रहता है, जितना सभी हानियों के बीच भी दुःख से मुक्त रहता है। अन्यथा, यदि उसके भीतर का शुभ कुछ कम किया जा सकता है तो उसे पूरी तरह छीन भी लिया जा सकता है। जैसा कि मैंने थोड़ी देर पहले कहा था, सूर्य के प्रकाश में एक छोटी-सी चिंगारी कोई वृद्धि नहीं करती क्योंकि सूर्य का तेज अपने सामने हर उस प्रकाश को फीका कर देता है, जो उसके अभाव में दिखाई देता।

    “लेकिन सूर्य का प्रकाश भी तो कभी-कभी कुछ वस्तुओं से ढक जाता है।” हाँ, परंतु सूर्य स्वयं कभी क्षीण नहीं होता, चाहे वह हमारी दृष्टि से ओझल ही क्यों न हो जाए। यदि कोई वस्तु हमारे और सूर्य के बीच आकर उसे देखने से रोक देती है, तब भी सूर्य अपना कार्य करता रहता है और अपने निर्धारित पथ पर निरंतर चलता रहता है। जब भी वह बादलों के बीच से निकलकर चमकता है, तब वह न तो पहले से छोटा होता है और न ही उसकी गति कम होती है। निर्मल आकाश और बादलों से ढके आकाश में केवल इतना अंतर है कि एक स्थिति में सूर्य दिखाई देता है और दूसरी में नहीं। किसी वस्तु का वास्तव में क्षीण होना और केवल दृष्टि से ओझल हो जाना, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। इसी प्रकार, जो परिस्थितियाँ सद्गुण के मार्ग में बाधा बनती हैं, वे उससे कुछ भी कम नहीं कर पातीं। सद्गुण घटता नहीं है। केवल उसका प्रकाश कभी-कभी कम दिखाई देता है। हो सकता है कि वह हमें पहले जैसी चमक के साथ दिखाई न दे। पर अपने भीतर वह वैसा ही रहता है और अपनी शक्ति को अदृश्य रूप से प्रकट करता रहता है, ठीक वैसे ही जैसे बादलों के पीछे छिपा हुआ सूर्य। इसलिए विपत्तियाँ, हानियाँ और अन्याय सद्गुण के विरुद्ध उतनी ही कम शक्ति रखते हैं, जितनी बादलों में सूर्य के विरुद्ध होती है।

    हम जानते हैं कि कुछ लोग यह कहते हैं कि यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति शारीरिक रूप से विकलांग या अशक्त हो जाए, तो वह न तो दुखी होता है और न ही सुखी। यह भी एक भूल है। यह मत संयोगवश घटने वाली बाहरी घटनाओं को सद्गुणों के बराबर शक्ति दे देता है और सम्माननीय वस्तुओं का वही मूल्य ठहराता है जो वह उन वस्तुओं को देता है जिनमें सम्मान का कोई गुण नहीं है। इससे अधिक घृणित और तुच्छ बात और क्या हो सकती है कि सबसे उत्कृष्ट और आदरणीय गुणों की तुलना उन वस्तुओं से की जाए जो सम्मान के योग्य ही नहीं हैं? न्याय, धर्मनिष्ठा, सत्यनिष्ठा, साहस और विवेक, ये सब प्रशंसनीय हैं। इसके विपरीत, मज़बूत टाँगें, शक्तिशाली मांसपेशियाँ और स्वस्थ दाँत, ये केवल सामान्य शारीरिक विशेषताएँ हैं और अक्सर बिल्कुल साधारण लोगों में भी पाई जाती हैं। फिर यदि यह माना जाए कि शारीरिक कष्ट झेलने वाला बुद्धिमान व्यक्ति न तो दुःखी है और न ही सुखी बल्कि किसी बीच की अवस्था में है, तो उसका जीवन भी न तो वांछनीय होगा और न ही अवांछनीय। लेकिन यह कहना कि एक बुद्धिमान व्यक्ति का जीवन वांछनीय नहीं है, सर्वथा हास्यास्पद है। यह मानना भी अत्यंत अविश्वसनीय है कि जीवन की कोई ऐसी अवस्था हो सकती है जो न वांछनीय हो और न अवांछनीय। इसके अतिरिक्त, यदि शारीरिक हानियाँ किसी मनुष्य को दुखी बनाने की शक्ति नहीं रखतीं तो वे उसे सुखी होने से भी नहीं रोक सकतीं। क्योंकि जिन बातों में किसी स्थिति को बदतर बनाने की शक्ति ही नहीं है, वे उसे सर्वोत्तम बनने से भी नहीं रोक सकतीं। 

    विरोधी कहता है, “हम गर्म और ठंडे को जानते हैं और उनके बीच गुनगुना होता है। उसी प्रकार एक व्यक्ति सुखी होता है, दूसरा दुःखी और तीसरा न सुखी होता है, न दुखी।” मैं इस उपमा की त्रुटि दिखाना चाहता हूँ। यदि मैं गुनगुने पानी में और अधिक ठंडक मिला दूँ तो वह ठंडा हो जाएगा और यदि उसमें अधिक गर्मी जोड़ दूँ तो वह अंततः गर्म हो जाएगा। लेकिन जिस व्यक्ति की तुम कल्पना करते हो कि वह न सुखी है और न दुखी, उसके ऊपर चाहे मैं कितने ही दुख बढ़ा दूँ, तुम्हारे अपने सिद्धांत के अनुसार वह तब भी दुखी नहीं बनेगा। इसलिए यह उपमा यहाँ लागू ही नहीं होती। अब मैं इस कल्पित व्यक्ति को तुम्हारे हवाले करता हूँ। मैं उसे अंधापन दे देता हूँ, फिर भी वह दुखी नहीं होता। मैं उसमें शारीरिक दुर्बलता जोड़ देता हूँ, फिर भी वह दुखी नहीं होता। मैं उसे निरंतर और असहनीय पीड़ाओं से घेर देता हूँ, तब भी वह दुखी नहीं होता। यदि इतनी सारी विपत्तियाँ भी उसे दुखी नहीं बना सकतीं, तो वे उसे सुखी जीवन से भी वंचित नहीं कर सकतीं। यदि, जैसा कि तुम स्वयं स्वीकार करते हो, बुद्धिमान व्यक्ति सुख की अवस्था से गिरकर दुख की अवस्था में नहीं पहुँच सकता तो वह ऐसी अवस्था में भी नहीं पहुँच सकता जो सुखी न हो। आख़िर जो व्यक्ति गिरना शुरू करता है, वह बीच में ही क्यों रुक जाएगा? जो शक्ति उसे नीचे की अंतिम सीमा तक गिरने नहीं देती, वही उसे सर्वोच्च स्थिति पर भी बनाए रखती है। इसलिए सुखी जीवन को नष्ट नहीं किया जा सकता। बल्कि उसे थोड़ा-सा भी कम नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सद्गुण अकेला ही सुखी जीवन के लिए पर्याप्त आधार है।

    “यदि ऐसा है तो वह बुद्धिमान व्यक्ति, जिसने अधिक समय तक जीवन जिया है और जिसे पीड़ा का सामना नहीं करना पड़ा, उस व्यक्ति से अधिक सुखी क्यों नहीं है जिसने जीवन भर विपत्तियों का सामना किया है?” मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या वह इसलिए अधिक श्रेष्ठ और अधिक सद्गुणी भी है? यदि नहीं तो वह अधिक सुखी भी नहीं हो सकता। अधिक सुखी होने के लिए आवश्यक है कि वह अधिक सदाचारी जीवन जिए। यदि उसके लिए अधिक सदाचारी होना संभव नहीं है तो उसके लिए अधिक सुखी होना भी संभव नहीं है। सद्गुण में कम या अधिक का कोई स्थान नहीं होता और इसलिए सुख, जो सद्गुण पर आधारित है, उसमें भी कम या अधिक का कोई स्थान नहीं होता। देखो, सद्गुण इतना महान शुभ है कि अकाल मृत्यु, शारीरिक पीड़ा या शरीर की विभिन्न व्याधियों जैसी छोटी-छोटी बाहरी बातें उसमें तनिक भी कमी नहीं ला सकतीं। जहाँ तक इन्द्रिय-सुख का प्रश्न है, सद्गुण तो उसकी ओर ध्यान देना भी अपनी गरिमा के विरुद्ध समझता है। सद्गुण की एक विशेषता यह भी है कि उसे भविष्य की कोई आवश्यकता नहीं होती और वह अपने जीवन के दिनों की गणना नहीं करता। वह एक क्षण के भीतर ही शाश्वत कल्याण का पूर्ण आनंद प्राप्त कर लेता है। 

    हमें ये बातें अविश्वसनीय और मानवीय स्वभाव से परे लगती हैं। इसका कारण यह है कि हम सद्गुण की महानता का आकलन अपनी ही दुर्बलता के आधार पर करते हैं और अपने दोषों को ही सद्गुण का नाम दे देते हैं। लेकिन ठहरो। क्या हमें यह बात भी उतनी ही अविश्वसनीय नहीं लगती कि कोई व्यक्ति असहनीय यातना सहते हुए भी कहे, “मैं सुखी हूँ”? फिर भी ऐसे शब्द सुखवाद के विद्यालय के भीतर ही सुनने को मिले हैं। एपिक्यूरस ने, जब वह मूत्ररुद्धता और पेट के असाध्य घाव, इन दोनों भीषण पीड़ाओं से एक साथ ग्रस्त था, तब कहा था, “मेरे जीवन का यह अंतिम दिन सबसे अधिक सुखद है।” तो फिर जो लोग सद्गुण का अनुसरण करते हैं, उनके विषय में ऐसी बात अविश्वसनीय क्यों मानी जाए। जबकि यही बात सुख को जीवन का लक्ष्य मानने वालों में भी दिखाई देती है? ये लोग भी, अपनी हीन और पतित मानसिकता के बावजूद, कहते हैं कि यदि बुद्धिमान व्यक्ति अत्यंत भीषण पीड़ाओं और विपत्तियों का सामना करे, तो वह न दुःखी होगा और न सुखी।लेकिन यह बात भी अविश्वसनीय है बल्कि उससे भी अधिक अविश्वसनीय। क्योंकि मैं नहीं समझता कि सद्गुण, यदि अपने सर्वोच्च स्थान से नीचे गिरा दिया जाए, तो बीच में कहीं कैसे ठहर सकता है। या तो वह मनुष्य को सुखी बनाए रखेगा, या यदि वह उस स्थान से हट गया तो फिर वह मनुष्य को दुःखी होने से भी नहीं बचा सकेगा।जब तक सद्गुण अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़ा है, तब तक उसे पराजित नहीं किया जा सकता। अंततः या तो वही विजय प्राप्त करेगा या स्वयं पराजित हो जाएगा। 

    “पूर्ण सद्गुण और पूर्ण सुखी जीवन तो केवल अमर देवताओं के ही भाग्य में है। मनुष्यों को तो उन श्रेष्ठ वस्तुओं की केवल छाया और आभास ही मिल सकता है। हम उनके निकट तो पहुँचते हैं, पर उन्हें वास्तव में प्राप्त नहीं कर पाते।” ऐसा नहीं है। देवताओं और मनुष्यों में एक बात समान है, दोनों के पास तर्कशक्ति है। अंतर केवल इतना है कि देवताओं में वह पूर्ण रूप से विकसित है। जबकि हमारे भीतर उसमें पूर्णता प्राप्त करने की क्षमता है। समस्या यह है कि हमारी अपनी कमजोरियाँ हमें निराश कर देती हैं। जो व्यक्ति अभी दूसरे स्तर पर है अर्थात जो हर परिस्थिति में सदैव सही आचरण पर अडिग नहीं रह पाता, जिसका निर्णय अभी भी भूल कर सकता है और जिसकी बुद्धि अभी पूरी तरह दृढ़ नहीं हुई है। वह भी लक्ष्य के बहुत निकट पहुँच चुका है।मान लो कि ऐसे व्यक्ति के पास दृष्टि न हो, श्रवण-शक्ति न हो, अच्छा स्वास्थ्य न हो, आकर्षक रूप न हो और न ही अपने सभी अंगों सहित लंबा जीवन मिला हो। फिर भी, इन सभी अभावों के बावजूद वह ऐसा जीवन जी सकता है, जिस पर उसे कोई पश्चाताप न हो। लेकिन जो व्यक्ति अभी पूर्ण नहीं हुआ है, उसके भीतर बुराई की ओर झुकने की कुछ प्रवृत्ति अभी भी बनी रहती है। उसका मन अब भी कभी-कभी गलत कर्म की ओर प्रेरित हो सकता है, यद्यपि गहराई तक जमी हुई और सक्रिय दुष्टता उससे समाप्त हो चुकी होती है। वह अभी वास्तव में सद्गुणी नहीं है। वह केवल उस दिशा में ढल रहा है। और जो व्यक्ति सद्गुण की दृष्टि से किसी भी बात में अपूर्ण है, वह अभी भी सद्गुणी नहीं बल्कि उसी अपूर्णता के कारण दोषयुक्त है।

    लेकिन जो व्यक्ति, जैसा कि कवि कहता है, “अपने शरीर में साहस और पुरुषार्थ की भावना रखता है,” वह देवताओं के समकक्ष खड़ा होता है और उनकी ओर अग्रसर होता है क्योंकि उसे अपने उद्गम का स्मरण रहता है। जिस स्थान से हम आए हैं, उसी तक पुनः पहुँचने का प्रयास करने में कोई अनुचित बात नहीं है। वास्तव में, यह मानने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जो स्वयं ईश्वर का एक अंश है, उसमें कुछ दिव्य अवश्य है।यह समस्त ब्रह्मांड, जिसमें हम निवास करते हैं, एक अखंड सत्ता है। वही ईश्वर है। हम ईश्वर के सहचर हैं, ईश्वर के ही अंग हैं। हमारे मन में भी वही सामर्थ्य है। यदि वह अपने दोषों के बोझ से दबा न हो तो वह भी उसी दिव्य ऊँचाई तक पहुँच सकता है। जिस प्रकार हमारा शरीर सीधा खड़ा होता है और उसकी दृष्टि आकाश की ओर रहती है, उसी प्रकार हमारा मन भी जहाँ तक चाहे वहाँ तक उन्नति कर सकता है। स्वयं प्रकृति ने उसे इस प्रकार बनाया है कि वह दिव्य स्तर की वस्तुओं की आकांक्षा करे। यदि वह अपनी अंतर्निहित शक्ति का पूरा उपयोग करे और अपनी पूर्ण क्षमता तक विकसित हो जाए तो उसे शिखर तक पहुँचने के लिए किसी बाहरी मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं होती। अपनी ही प्रकृति उसका मार्ग बन जाती है। 

    स्वर्ग तक पहुँचना निश्चय ही एक महान कार्य प्रतीत होता है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि मन तो केवल वहीं लौट रहा होता है जहाँ से वह आया था। एक बार जब उसे मार्ग मिल जाता है, तब वह निर्भीक होकर आगे बढ़ता है। वह अन्य सभी वस्तुओं को तुच्छ समझता है और धन, सोने तथा चाँदी की बिल्कुल परवाह नहीं करता। उन धातुओं की, जो उसी अंधकार में पड़ी रहने के योग्य थीं जहाँ वे पहले छिपी हुई थीं। वह उनके मूल्य का आकलन उस चमक से नहीं करता जो अज्ञानी लोगों की आँखों को चकाचौंध कर देती है बल्कि उस निकृष्ट धातु और मिट्टी से करता है, जिसमें से मनुष्य के लोभ ने उन्हें खोदकर अलग किया है। अर्थात उदात्त आत्मा यह जानती है कि सच्ची संपत्ति किसी खज़ाने में नहीं बल्कि कहीं और है। जिसे वास्तव में परिपूर्ण होना चाहिए, वह धन का संदूक नहीं बल्कि स्वयं मनुष्य का अपना व्यक्तित्व है। मन को यह अधिकार है कि वह समस्त वस्तुओं का स्वामी बने, उसे समूचे विश्व का अधिकार प्राप्त हो, और उसकी संपत्ति पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई हो। देवताओं की भाँति वह सब कुछ अपना मान सकता है। उस उच्च स्थान से वह धनी लोगों को उनकी अपार संपत्ति के बीच देखकर भी उन पर दृष्टि डालता है और समझता है कि वे अपनी संपत्ति से जितने प्रसन्न नहीं हैं। उससे कहीं अधिक दूसरों की संपत्ति को देखकर दुखी रहते हैं। 

    जब मन इस ऊँचाई तक पहुँच जाता है, तब वह शरीर को भी केवल एक आवश्यक बोझ समझता है। ऐसी वस्तु जिसकी देखभाल तो करनी चाहिए। पर उससे आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। वह स्वयं को उस वस्तु का दास नहीं बनाता, जिस पर उसे शासन करना चाहिए। जो व्यक्ति शरीर का दास है, वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता। केवल इसलिए नहीं कि शरीर की अत्यधिक चिंता करने वाला अनेक अन्य स्वामियों का भी दास बन जाता है बल्कि इसलिए भी कि स्वयं शरीर ही एक चिड़चिड़ा और मनमौजी स्वामी है। ऐसा मन कभी शांतिपूर्वक तो कभी एक महान छलाँग लगाकर शरीर से विदा हो जाता है। तब उसे इस बात की कोई चिंता नहीं रहती कि उसके छोड़ जाने के बाद शरीर का क्या होगा। जैसे हम अपनी दाढ़ी या सिर से कटे हुए बालों की कोई परवाह नहीं करते, उसी प्रकार जब यह दिव्य आत्मा मनुष्य को छोड़कर जाने वाली होती है, तब उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि उसके शरीर का आगे क्या होगा। वह जलाया जाएगा, दफ़नाया जाएगा या जंगली पशुओं द्वारा नोच लिया जाएगा। जिस प्रकार अभी-अभी जन्मे शिशु को उस झिल्ली की कोई चिंता नहीं होती जिससे वह जन्मा है, उसी प्रकार आत्मा को भी अपने छोड़े हुए शरीर की कोई चिंता नहीं होती। यदि पक्षी उस शव को टुकड़े-टुकड़े कर दें या वह समुद्री जीवों का आहार बन जाए तो उससे उस व्यक्ति का क्या बिगड़ता है, जो अब स्वयं कुछ भी नहीं रहा? लेकिन जब तक आत्मा जीवितों के बीच रहती है, तब भी क्या वह मृत्यु के बाद मिलने वाले ऐसे अपमानों से भयभीत होगी, जबकि उसे केवल मृत्यु की धमकियाँ ही पर्याप्त नहीं लगीं? वह कहती है, “मैं जल्लाद के लोहे के काँटे से नहीं डरता, न ही अपने शव का अपमान करने के लिए किए जाने वाले घृणित अंग-भंग से। मैं किसी से अपने अंतिम संस्कार की याचना नहीं करता और न ही अपने अवशेषों को किसी के भरोसे छोड़ता हूँ। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था की है कि कोई भी बिना कब्र के नहीं रहता। जिसे क्रूरता खुला छोड़ देगी, उसे समय स्वयं दफ़ना देगा।” मैकेनस ने इस विचार को बड़े सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है—

“मुझे कब्र की कोई चिंता नहीं। जिन्हें लोग यूँ ही छोड़ देते हैं, उन्हें प्रकृति स्वयं दफ़ना देती है।”

ऐसा लगता है मानो यह किसी पूर्ण शस्त्र-सज्जित सैनिक का कथन हो। वास्तव में मैकेनस में महान और पुरुषोचित प्रतिभा थी। यदि निरंतर ऐश्वर्य ने उसे शिथिल और विलासी न बना दिया होता तो वह और भी महान सिद्ध होता।

नियति को समझने वाले मन के बारे में -- पत्र - 89 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

प्रिय लूसीलियस 


हमारे मित्र लिबेरालिस को यह समाचार सुनकर गहरा आघात पहुँचा है कि आग ने लियॉन नगर को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। यह विपत्ति किसी भी व्यक्ति को विचलित कर सकती थी, फिर वह तो अपने जन्मस्थान से अत्यंत प्रेम करने वाला व्यक्ति है। इस घटना ने उसके मन की उस दृढ़ता को भी डगमगा दिया है, जिसे उसने उन सभी संभावित भयावह परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया था जिनकी वह कल्पना करता था। फिर भी मुझे आश्चर्य नहीं है कि उसे इस आपदा का पहले से कोई भय नहीं था। यह घटना इतनी अप्रत्याशित और लगभग अकल्पनीय थी कि पहले कभी इसका कोई उदाहरण ही नहीं था। आग ने अनेक नगरों को क्षति पहुँचाई है। पर उन्हें पूरी तरह मिटा नहीं दिया। शत्रुओं द्वारा लगाई गई आग में भी कुछ न कुछ भवन बच ही जाते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि आग, चाहे वह बार-बार भड़काई जाए, सब कुछ इस सीमा तक भस्म कर दे कि गिराने के औज़ारों के लिए भी कुछ शेष न रहे। यहाँ तक कि भूकंप भी बहुत कम ऐसे हुए हैं जो पूरे नगरों को समतल कर दें और पूर्ण विनाश का कारण बनें। संक्षेप में, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। इतनी भयंकर और अडिग आग कि उसके बाद जलाने के लिए भी कुछ शेष न बचा। 



    ऐसी भव्य इमारतों की इतनी विशाल शृंखला जिनमें से प्रत्येक अकेले ही किसी नगर की शोभा बढ़ाने के लिए पर्याप्त थी। एक ही रात ने उन सबको धराशायी कर दिया! इतने लंबे शांति-काल में हमने ऐसी हानि झेली है, जो युद्ध से भी होने की हमने कभी कल्पना नहीं की थी। यह बात विश्वास करने योग्य कैसे लग सकती है? जब हर ओर युद्ध थम चुका था, जब समूचे सभ्य संसार में सुरक्षा और शांति का वातावरण था, तब गॉल (प्राचीन यूरोप का एक विशाल भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र) का रत्न कहलाने वाला लियॉन देखते-ही-देखते विलुप्त हो गया।अतीत में, जब कोई व्यापक विपत्ति आती थी, तब भी लोगों को उसके आने की आशंका पहले से हो जाती थी। इतना बड़ा और महत्त्वपूर्ण नगर कभी एक ही क्षण में नष्ट नहीं हुआ था। पर यहाँ तो केवल एक ही रात ने एक महान और समृद्ध नगर को अस्तित्वहीन बना दिया। उसके विनाश में उससे भी कम समय लगा, जितना समय मुझे तुम्हें यह घटना सुनाने में लगा।

    यद्यपि हमारा मित्र लिबेरालिस अपनी व्यक्तिगत विपत्तियों का सामना करने में दुर्बल नहीं है, फिर भी इस घटना ने उसे गहरे अवसाद में डाल दिया है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। जब कोई आपदा बिना किसी पूर्व संकेत के आ घेरती है तो उसका आघात और भी अधिक तीव्र होता है क्योंकि अचानक लगा हुआ धक्का दुख को और बढ़ा देता है। ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जिसका शोक इस कारण अधिक गहरा न हो जाए कि उसकी हानि के साथ विस्मय भी जुड़ गया हो। इसीलिए हमें किसी भी घटना के लिए अप्रस्तुत नहीं रहना चाहिए। हमें हर संभावित परिस्थिति का पहले से अनुमान लगाने का प्रयास करना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि क्या-क्या संभव है, न कि केवल इस पर कि सामान्यतः क्या होता है। 

    भाग्य की मनमानी से कोई भी वस्तु, चाहे वह अपनी समृद्धि और वैभव के चरम पर ही क्यों न हो, एक ही क्षण में धराशायी हो सकती है। जितना अधिक कोई चमकता है, उतना ही वह आक्रमण और आघात का लक्ष्य बनता है। भाग्य के लिए कुछ भी कठिन या दुष्कर नहीं है। वह हमेशा एक ही मार्ग से नहीं आता, न ही हमेशा उन्हीं रास्तों पर चलता है जिन पर वह पहले चल चुका है। कभी वह हमारे अपने ही हाथों को एक-दूसरे के विरुद्ध कर देता है तो कभी केवल अपनी शक्ति के बल पर ऐसी विपत्तियाँ उत्पन्न कर देता है जिनके लिए किसी बाहरी कारण या व्यक्ति की आवश्यकता ही नहीं होती। कोई भी क्षण सुरक्षित नहीं है। आनंद के बीच ही ऐसी घटनाएँ जन्म ले लेती हैं जो दुःख का कारण बनती हैं। शांति के समय में ही युद्ध छिड़ जाता है। जिन बातों पर हमने अपनी सुरक्षा का भरोसा किया होता है, वही भय का कारण बन जाती हैं। मित्र शत्रु बन जाते हैं और सहयोगी विरोधी। ग्रीष्म ऋतु के शांत दिन भी अचानक ऐसी भयंकर आँधियों में बदल जाते हैं जो शीत ऋतु के तूफ़ानों से भी अधिक प्रचंड होती हैं। शत्रु सामने न होने पर भी हमें युद्ध के समान कष्ट सहने पड़ते हैं। यदि विपत्ति का कोई दूसरा कारण न भी हो तो अत्यधिक समृद्धि स्वयं अपने विनाश के कारण खोज लेती है। सबसे सावधान व्यक्ति भी बीमारी का शिकार हो जाता है। सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी शारीरिक दुर्बलता से घिर जाता है। जो पूरी तरह निर्दोष हैं, वे भी दंड भोगते हैं और जो पूर्ण एकांत में रहते हैं, वे भी उपद्रवों की चपेट में आ जाते हैं। जो लोग संयोग की शक्ति को लगभग भूल चुके होते हैं, वही किसी नई और अनपेक्षित विपत्ति के लिए चुन लिए जाते हैं। जीवन भर के परिश्रम, अनगिनत प्रयासों और अनेक प्रार्थनाओं से प्राप्त उपलब्धियाँ एक ही दिन में नष्ट हो जाती हैं। बल्कि एक दिन कहना भी इन तीव्र गति से आने वाली विपत्तियों को वास्तविकता से अधिक धीमा बताना है। किसी साम्राज्य को उलट देने के लिए एक घंटा, बल्कि एक क्षण ही पर्याप्त है। यदि सब कुछ उसी धीमी गति से नष्ट होता जिस धीमी गति से वह अस्तित्व में आता है तो हमारी दुर्बलता और हमारी चिंताओं को कुछ राहत मिल सकती थी। पर वास्तविकता यह है कि किसी वस्तु के विकसित होने में समय लगता है। जबकि उसके नष्ट होने में बहुत कम समय लगता है या बिल्कुल भी नहीं।

    चाहे सार्वजनिक जीवन हो या निजी, इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं रहता। व्यक्ति और नगर, दोनों ही भाग्य की गति के साथ बहते चले जाते हैं। जब चारों ओर पूर्ण शांति दिखाई देती है, तभी भय अचानक सामने आ खड़ा होता है और जब क्षितिज पर किसी संकट का कोई संकेत भी नहीं होता, तब विपत्ति वहीं से फूट पड़ती है जहाँ उसकी सबसे कम अपेक्षा होती है। जो राज्य गृहयुद्धों और विदेशी युद्धों के बीच भी अडिग बने रहे, वे भी कभी-कभी बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के ही ढह जाते हैं। कोई नगर लंबे समय तक निरंतर समृद्ध बना रहे, ऐसा कितना दुर्लभ है! इसलिए हमें हर संभावना पर विचार करना चाहिए और अपने मन को इस प्रकार दृढ़ बनाना चाहिए कि वह हर प्रकार की संभावित परिस्थिति का सामना कर सके।

    निर्वासन, यातना, युद्ध, जलपोत के डूब जाने जैसी घटनाओं का अपने मन में बार-बार अभ्यास करते रहो। ऐसा हो सकता है कि तुम्हें अपने देश से दूर कर दिया जाए, या तुम्हारा देश ही तुमसे छिन जाए। ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हें किसी निर्जन प्रदेश में निर्वासित कर दिया जाए या जहाँ आज लोगों की भीड़ उमड़ती है, वही स्थान स्वयं एक उजाड़ मरुभूमि बन जाए। मानव जीवन में घट सकने वाली हर प्रकार की परिस्थिति को अपनी आँखों के सामने रखो और भविष्य के बारे में अपने विचारों का अनुमान केवल उन घटनाओं से मत लगाओ जो सामान्यतः घटती हैं बल्कि उन सब बातों से लगाओ जो घट सकती हैं। यदि हम यह नहीं चाहते कि कोई दुर्लभ घटना हमें इस प्रकार स्तब्ध कर दे मानो वह पहले कभी हुई ही न हो तो हमें भाग्य के समूचे स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। एशिया और यूनान के कितने ही नगर एक ही भूकंप में धराशायी हो चुके हैं! सीरिया और मकदूनिया के कितने ही नगर धरती में समा गए! कितनी ही बार इस प्रकार की विपत्ति ने साइप्रस को उजाड़ दिया है! कितनी ही बार पाफ़ोस स्वयं अपने ऊपर ढह गया है! हमें बार-बार यह समाचार मिलता रहा है कि पूरे-के-पूरे नगर नष्ट हो गए और हम तो उन असंख्य लोगों का केवल एक छोटा-सा भाग हैं जो ऐसे समाचार बार-बार सुनते रहते हैं। 

    इसलिए हमें भाग्य के प्रहारों का दृढ़ता से सामना करना चाहिए। यह जानते हुए कि अफ़वाहें हमेशा घटित घटनाओं के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं। एक समृद्ध नगर जलकर नष्ट हो गया। वह प्रांतों में स्थित होने पर भी केवल उनमें से एक नहीं था बल्कि उन सबकी शोभा था। फिर भी वह केवल एक पहाड़ी पर बसा था। वह पहाड़ी भी कोई बहुत बड़ी नहीं थी। लेकिन आज जिन नगरों की समृद्धि और वैभव की बड़ी ख्याति है, समय एक दिन उनके अस्तित्व के सभी चिह्न भी मिटा देगा। क्या तुम नहीं देखते कि यूनान के कितने ही प्रसिद्ध नगर आज पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं? उनके तो आधार तक शेष नहीं बचे, जिनसे यह भी पता चल सके कि वे कभी अस्तित्व में थे। केवल मनुष्य के बनाए हुए कार्य ही नष्ट नहीं होते, केवल मानव-निर्मित संरचनाएँ ही समय के प्रवाह से नहीं ढहतीं। पर्वतों की चोटियाँ भी टूटकर बिखर जाती हैं। पूरे-के-पूरे प्रदेश धरती में धँस जाते हैं। जो भूमि कभी समुद्र से बहुत दूर थी, वह समुद्र की लहरों से ढक जाती है। प्रचंड ज्वालामुखीय अग्नि उन पहाड़ियों को भी काट-घिस देती है जिनसे कभी उसकी ज्वाला फूटती थी। जो ऊँचे-ऊँचे शिखर कभी नाविकों के लिए आश्वस्त करने वाले मार्गदर्शक थे, वे भी समय के साथ बहुत छोटे हो जाते हैं। जब स्वयं प्रकृति की रचनाएँ भी विनाश से सुरक्षित नहीं हैं, तब नगरों के नष्ट होने पर हमें शिकायत नहीं करनी चाहिए। 

    नगर केवल इसलिए खड़े हैं कि एक दिन गिर जाएँ। यही अंत उन सबकी प्रतीक्षा कर रहा है। कभी धरती के भीतर की वायु का दबाव अपनी सीमाएँ तोड़कर उन्हें ढहा देता है; कभी भूमिगत जल इकट्ठा होकर प्रचंड वेग से फूट पड़ता है और उन्हें चकनाचूर कर देता है। कभी ज्वालामुखी का विस्फोट पृथ्वी की सतह को फाड़ देता है। कभी समय, जिससे कुछ भी सुरक्षित नहीं है, धीरे-धीरे उन्हें निगल जाता है और कभी महामारी पूरी आबादी का सफाया कर देती है, जिसके बाद उजड़ी हुई इमारतें उपेक्षा के कारण स्वयं ढह जाती हैं। विपत्ति किन-किन मार्गों से आ सकती है, उन सबकी गणना करना बहुत लंबा काम होगा। पर मैं एक बात निश्चित रूप से जानता हूँ। हम नश्वर मनुष्यों द्वारा निर्मित हर वस्तु स्वयं नश्वर होने के लिए अभिशप्त है। हम ऐसी वस्तुओं के बीच जीवन बिताते हैं जिनका एक दिन नष्ट होना निश्चित है।

    इसी प्रकार की सांत्वना मैं हमारे मित्र लिबेरालिस को भेजता हूँ, जो अपनी जन्मभूमि के प्रति असाधारण प्रेम के कारण इस समय दुःख की अग्नि में जल रहा है। संभव है कि वह नगर इसलिए नष्ट हुआ हो ताकि पहले से भी अधिक सुंदर रूप में उसका पुनर्निर्माण किया जा सके। अनेक बार विनाश ने ही अधिक समृद्धि के लिए स्थान बनाया है। बहुत-सी वस्तुएँ केवल इसलिए गिरी हैं कि वे पहले से भी अधिक ऊँचाई तक उठ सकें। रोम की उन्नति से ईर्ष्या रखने वाला टिमाजेनीज़ कहा करता था कि रोम में लगी आग से उसे केवल इसलिए दुःख होता है क्योंकि वह जानता था कि जो इमारतें दोबारा बनेंगी, वे जली हुई इमारतों से भी अधिक भव्य होंगी। लियॉन के विषय में भी संभवतः यही होगा। लोग पूरी लगन से उन भवनों की अपेक्षा और भी अधिक सुंदर तथा ऊँची इमारतें बनाएँगे, जिन्हें उन्होंने खो दिया है। हमारी कामना है कि उनका यह निर्माण अधिक स्थायी सिद्ध हो और अधिक शुभ भविष्य की नींव पर लंबे समय तक टिके रहे। इस नगर की स्थापना को अभी केवल सौ वर्ष ही हुए हैं। इतना समय भी नहीं, जितना किसी दीर्घायु मनुष्य का जीवन हो सकता है। प्लैंकस ने इसकी स्थापना की थी। अपनी अनुकूल भौगोलिक स्थिति के कारण यह शीघ्र ही उस घनी आबादी वाले समृद्ध नगर में बदल गया जिसे हम आज जानते हैं। फिर भी सोचो, केवल एक वृद्ध व्यक्ति के जीवनकाल के भीतर ही इसे कितनी भीषण विपत्तियों का सामना करना पड़ा है! 

    इसलिए हमें अपने मन को ऐसा बनाना चाहिए कि वह अपनी नियति को समझ भी सके और उसे सह भी सके। यह जान लो कि भाग्य किसी पर भी दया नहीं करता। वह साम्राज्य और सम्राट, दोनों पर समान अधिकार रखता है। नगरों पर भी उतनी ही शक्ति चलाता है जितनी व्यक्तियों पर। इन बातों पर क्रोधित होने का हमारे पास कोई कारण नहीं है। हम ऐसे संसार में जन्मे हैं जहाँ जीवन इन्हीं शर्तों पर जीया जाता है। या तो इन्हें स्वीकार करके इनके अनुरूप जीवन बिताओ या इन्हें अस्वीकार करके जिस मार्ग से चाहो इस संसार से विदा हो जाओ।यदि तुम्हारे साथ व्यक्तिगत रूप से कोई अन्याय हो तो उस पर तुम्हें शिकायत करने का अधिकार है। लेकिन यदि वही अनिवार्यता समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से अपने अधीन रखती है तो उस नियति के साथ समझौता कर लो जो अंततः हर वस्तु का अंत कर देती है। हमारा मूल्यांकन हमारी कब्रों या मार्ग के किनारे बने विभिन्न ऊँचाई वाले स्मारकों से नहीं किया जाना चाहिए। राख बन जाने के बाद हम सब एक ही समान हो जाते हैं। जन्म के समय हम चाहे समान न हों, मृत्यु हमें समान बना देती है। जो बात मैं मनुष्यों के बारे में कह रहा हूँ, वही नगरों पर भी लागू होती है। रोम भी पराजित हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे आर्देआ हुआ था। जिसने मानव जीवन के नियम निर्धारित किए, उसने जन्म, पद या प्रसिद्धि के आधार पर हमारे बीच कोई भेद नहीं किया। उसने केवल हमारे जीवन की अवधि में अंतर रखा। जब हमारा नश्वर जीवन समाप्त होता है, तब वह मानो कहता है, “अब महत्वाकांक्षा को छोड़ दो। पृथ्वी पर चलने वाले प्रत्येक प्राणी पर एक ही नियम लागू होगा।” हम सब समान हैं क्योंकि हममें से प्रत्येक हर प्रकार के दुःख और विपत्ति का पात्र है। कोई भी दूसरे से अधिक सुरक्षित नहीं है। किसी को भी यह निश्चित नहीं है कि वह कल तक जीवित रहेगा। 

    सिकंदर महान ज्यामिति का अध्ययन करने लगा था। एक ऐसा अध्ययन जिसने उसे दुखी कर दिया क्योंकि उससे उसे पता चला कि पृथ्वी कितनी छोटी है और उसने उसका कितना थोड़ा-सा भाग ही जीत पाया है। मैं फिर कहता हूँ, वह वास्तव में दुखी था क्योंकि तब उसे यह समझ जाना चाहिए था कि उसका 'महान' कहलाना उचित नहीं था। जो व्यक्ति इतनी छोटी-सी पृथ्वी के एक छोटे-से हिस्से का स्वामी हो, वह भला किस अर्थ में 'महान' कहलाने का अधिकारी है? वह जिन विषयों का अध्ययन कर रहा था, वे जटिल थे और उन्हें समझने के लिए गहरी एकाग्रता की आवश्यकता थी। वे ऐसी बातें नहीं थीं जिन्हें कोई उन्मत्त व्यक्ति, जिसका मन समुद्रों के पार विजय के स्वप्नों में भटक रहा हो, आसानी से समझ सके। उसने कहा, “मुझे आसान बातें सिखाओ।” उसके शिक्षक ने उत्तर दिया, “ये बातें सबके लिए समान हैं और सबके लिए समान रूप से कठिन हैं।” कल्पना करो कि स्वयं प्रकृति भी तुमसे यही कह रही है, “जिन बातों की तुम शिकायत कर रहे हो, वे सबके साथ समान रूप से घटित होती हैं। मैं किसी के लिए इन्हें अधिक आसान नहीं बना सकता। लेकिन जो चाहे, वह इन्हें अपने लिए आसान बना सकता है।” कैसे? अपने मन को शांत और स्थिर रखकर।

    तुम्हें पीड़ा सहनी होगी, प्यास और भूख का अनुभव करना होगा। यदि तुम्हें मनुष्यों के बीच अधिक समय तक जीवित रहने का अवसर मिलता है तो वृद्धावस्था भी आएगी। तुम्हें बीमारी का सामना करना होगा, अपने प्रियजनों या अपनी संपत्ति का वियोग सहना होगा। अंततः मृत्यु को भी स्वीकार करना होगा। फिर भी, तुम्हें उन लोगों की बातों पर विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है जो लगातार तुम्हारे कानों में इन्हीं बातों का भय भरते रहते हैं। वास्तव में इन सबमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपने आप में हानिकारक, असहनीय या अत्यंत कठोर हो। लोगों का भय केवल इसलिए है क्योंकि इस विषय में सब एक-दूसरे की बातों से सहमत हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति केवल अफ़वाह के कारण मृत्यु से डरने लगे। जबकि शब्दों या अफ़वाहों से डरने से अधिक हास्यास्पद और क्या हो सकता है? हमारे मित्र दिमीत्रियस एक व्यंग्यपूर्ण बात कहा करते थे, जिससे वे यह जताते थे कि अज्ञानी लोगों की बातें उनके लिए पेट की गुड़गुड़ाहट से अधिक महत्त्व नहीं रखतीं। वे कहते थे, “मुझे इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि आवाज़ ऊपर से निकल रही है या नीचे से?” 

    यह तो मूर्खता की पराकाष्ठा है कि मनुष्य तुच्छ लोगों द्वारा तुच्छ समझे जाने की चिंता करे। लोगों की बातों से डरने का तुम्हारे पास कभी कोई उचित कारण नहीं था। यही बात उन सभी चीज़ों पर भी लागू होती है जिनसे तुम केवल इसलिए डरते हो क्योंकि लोग उनसे डरते हैं। क्या किसी सज्जन व्यक्ति को उसके विरुद्ध फैलाई गई झूठी बदनामी वास्तव में कोई हानि पहुँचा सकती है? निश्चय ही नहीं। उसी प्रकार हमें मृत्यु के बारे में फैली हुई बुरी धारणाओं पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि उसकी बदनामी भी केवल लोगों की बनाई हुई है। मृत्यु के विरुद्ध आरोप लगाने वालों में से किसी ने भी स्वयं मृत्यु का अनुभव नहीं किया है। जब तक उसका अनुभव न हो, तब तक जिस वस्तु को तुम जानते ही नहीं, उसकी निंदा करना उतावलेपन की बात है। लेकिन एक बात तुम निश्चित रूप से जानते हो, कितने ही लोगों के लिए मृत्यु वरदान सिद्ध हुई है। कितनों को उसने यातना, अभाव, बीमारी, कष्ट और जीवन की थकान से मुक्त किया है। जब मृत्यु हमारे अपने अधिकार में है, तब वास्तव में कोई भी व्यक्ति हम पर पूर्ण अधिकार नहीं रखता।


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Monday, 27 July 2026

दर्शन ने क्या-क्या किया है, के बारे में -- पत्र - 88 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


कौन इस बात पर संदेह कर सकता है, प्रिय लूसीलियस, कि हमारा जीवन अमर देवताओं का उपहार है, परन्तु अच्छा जीवन जीने की कला दर्शन का उपहार है? इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि हम दर्शन के प्रति देवताओं से भी अधिक ऋणी हैं क्योंकि केवल जीवन की अपेक्षा उत्तम जीवन कहीं बड़ा वरदान है। फिर भी ऐसा तभी तक कहा जा सकता है, जब तक यह न याद रखा जाए कि स्वयं दर्शन भी देवताओं का ही दिया हुआ उपहार है। उन्होंने किसी को भी दर्शन का ज्ञान जन्म से नहीं दिया। परन्तु उसे प्राप्त करने की क्षमता सभी को प्रदान की है। यदि उन्होंने इस ज्ञान को सबका जन्मसिद्ध अधिकार बना दिया होता और प्रत्येक मनुष्य को जन्म से ही विवेकवान बना दिया होता तो बुद्धिमत्ता अपनी सबसे बड़ी विशेषता खो बैठती। वह संयोग से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। इसके विपरीत, उसका वास्तविक मूल्य और गौरव इसी में है कि वह अपने-आप नहीं मिलती। उसके लिए हमें स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है। उसके लिए हम स्वयं अपने प्रति ऋणी होते हैं, किसी दूसरे से उसे माँगने या प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि दर्शन केवल एक उपहार भर होता तो उसमें प्रशंसा करने योग्य क्या रह जाता? 




    दर्शन का एकमात्र कार्य मानव और दैवीय विषयों के संबंध में सत्य की खोज करना है। दर्शन कभी भी भक्ति, श्रद्धा, न्याय तथा अन्य सभी परस्पर जुड़े और एक-दूसरे का सहारा बनने वाले सद्गुणों से अलग नहीं होता। वह हमें दैवीय सत्ता का सम्मान और उपासना करना सिखाता है तथा मनुष्यों से प्रेम करना भी सिखाता है। वह यह बताता है कि शक्ति देवताओं के अधीन है। जबकि मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली शक्ति सामाजिकता है।यह सामाजिकता बहुत लंबे समय तक निष्कलुष बनी रही। परंतु लोभ ने अंततः इस पारस्परिक बंधन को तोड़ दिया। लोभ ने उन लोगों को भी दरिद्र बना दिया जिन्हें उसने सबसे अधिक धनवान बनाया था क्योंकि जैसे ही मनुष्यों ने निजी स्वामित्व को अपनाया, उन्होंने सब कुछ मिल-जुलकर साझा रखना छोड़ दिया। 

    किन्तु प्रथम मनुष्य और उनके वे वंशज, जो प्रकृति के मार्ग से विचलित हुए बिना उसी के अनुसार जीवन जीते थे, किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को अपना नेता और अपना नियम, दोनों मानते थे तथा स्वयं को उसके अधिकार के अधीन सौंप देते थे। क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि जो हीन है, वह श्रेष्ठ के अधीन रहता है। पशुओं के झुंडों में नेतृत्व सामान्यतः सबसे बड़े या सबसे प्रचंड प्राणी के हाथ में होता है। गायों के झुंड का अगुआ कोई दुर्बल बैल नहीं होता बल्कि वही होता है जो आकार और शक्ति में अन्य नर बैलों से बढ़कर हो। हाथियों के झुंड का नेतृत्व भी सबसे विशाल हाथी करता है। किन्तु मनुष्यों में महत्व शरीर के आकार का नहीं बल्कि चरित्र और उत्कृष्टता का होता है। इसलिए प्राचीन काल में नेताओं का चयन उनके मानसिक गुणों और सद्गुणों के आधार पर किया जाता था। यही कारण है कि वे समाज सबसे अधिक सौभाग्यशाली थे, जो केवल योग्यता के आधार पर सत्ता सौंपते थे। जिस व्यक्ति को यह विश्वास हो कि उसे उतनी ही शक्ति का प्रयोग करना चाहिए जितनी उचित है। उससे अधिक नहीं, उसकी शक्ति पर अंकुश लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

    इसी कारण पोसिडोनियस (Posidonius) का मत है कि तथाकथित स्वर्णयुग में शासन बुद्धिमान व्यक्तियों के हाथों में था। वे हिंसा और अत्याचार को रोकते थे, शक्तिशाली लोगों से निर्बलों की रक्षा करते थे, राज्य का संचालन करते थे और लोगों को बताते थे कि क्या उनके हित में है और क्या नहीं। उनकी बुद्धिमत्ता यह सुनिश्चित करती थी कि उनकी प्रजा को किसी वस्तु का अभाव न हो। उनका साहस उन्हें संकटों से सुरक्षित रखता था। उनकी उदारता अपनी प्रजा की समृद्धि को बढ़ाती थी। वे दूसरों पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं बल्कि उनकी सेवा करने के लिए शासन करते थे। वे कभी भी अपनी शक्ति का प्रयोग उन्हीं लोगों के विरुद्ध नहीं करते थे, जिनसे उन्हें प्रारम्भ में वह शक्ति प्राप्त हुई थी। उनमें न तो अन्याय करने की इच्छा थी और न ही उसका कोई कारण। क्योंकि उनके आदेश न्यायसंगत होते थे। इसलिए उनका पालन भी स्वेच्छा से और उचित रूप से किया जाता था। किसी राजा के लिए अपनी आज्ञा न मानने वाली प्रजा के विरुद्ध इससे बड़ी कोई धमकी नहीं हो सकती थी कि वह स्वयं राजपद त्याग देगा।

    लेकिन जब दुर्गुणों के प्रवेश से राजतंत्र अत्याचारी शासन में बदल गए, तब कानूनों की आवश्यकता उत्पन्न हुई। इन कानूनों की रचना भी सबसे पहले बुद्धिमानों ने ही की। सोलन, जिसने न्याय और समानता के सिद्धांत पर एथेंस की शासन-व्यवस्था स्थापित की, उन सात महापुरुषों में से एक था जो अपनी बुद्धिमत्ता के कारण प्रसिद्ध हुए। यदि लाइकर्गस उसी काल में जीवित होता तो वह उस धन्य समूह का आठवाँ सदस्य होता। आज भी हम ज़ालेयूकस और कैरोंडास के बनाए हुए कानूनों का सम्मान करते हैं। इन लोगों ने सिसिली (जो उस समय अत्यंत समृद्ध था) तथा इटली के यूनानी नगरों के लिए जिन न्याय-सिद्धांतों की स्थापना की, उनका ज्ञान उन्होंने न तो न्यायालयों में प्राप्त किया था और न ही विधिवेत्ताओं के कार्यालयों में बल्कि पाइथागोरस के शांत और पवित्र आश्रम में प्राप्त किया था।

    अब तक मैं पोसिडोनियस से सहमत हूँ। परन्तु मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि दर्शन ने उन कलाओं और तकनीकों का आविष्कार किया जिनका हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं। मैं दर्शन को वह यश नहीं दूँगा जो वास्तव में शिल्प-कला और कारीगरी का है। उसके अनुसार—

“जब मनुष्य इधर-उधर बिखरे हुए रहते थे और झोपड़ियों, गुफाओं या वृक्षों के खोखलों में आश्रय लेते थे, तब दर्शन ने ही उन्हें घर बनाना सिखाया।”

    मेरे विचार से न तो दर्शन ने आज की तरह ऊँची-ऊँची बहुमंज़िला इमारतें बनाना सिखाया और न ही बड़े-बड़े शहर बसाने की कला दी। उसी तरह यह भी दर्शन नहीं था जिसने मछलियों को पिंजरों में पालने का तरीका निकाला ताकि स्वाद के पीछे पागल लोग तूफ़ान का खतरा उठाए बिना ही बंदरगाह की सुरक्षित जगह पर हर तरह की मछलियाँ मोटी करते रहें, चाहे समुद्र में कितना भी भयंकर मौसम क्यों न हो। क्या आप कहेंगे कि लोगों को ताले लगाकर चीज़ें सुरक्षित रखना भी दर्शन ने सिखाया? क्या यही वह बात नहीं थी जिसने लालच को बढ़ावा दिया? क्या दर्शन ने ही ऐसी ऊँची-ऊँची इमारतें बनवाईं, जो अपने ही रहने वालों के लिए खतरा बन जाती हैं? मानो लोगों के लिए अपने आस-पास आसानी से मिलने वाली चीज़ों से घर बना लेना ही काफ़ी न था और बिना किसी विशेष कला या कठिन मेहनत के प्रकृति से मिला आश्रय उनके लिए पर्याप्त न था। 

    मेरा विश्वास कीजिए, वह समय सचमुच सुखी था जब न वास्तुकार थे और न बड़े-बड़े भवन बनाने वाले कारीगर। ये सारी कलाएँ और साधन तब आए, जब लोगों में आराम, ऐश्वर्य और भोग-विलास की चाह बढ़ गई। तभी लकड़ियों को बराबर आकार में काटा जाने लगा, आरी से उन पर सीधी रेखाओं के अनुसार चीरा लगाया जाने लगा और बहुत बारीकी से बढ़ईगिरी होने लगी। आदिम लोग तो मुलायम लकड़ी को केवल फाँकों (कीलों जैसे लकड़ी के टुकड़ों) की मदद से चीर लेते थे। 

    और ऐसा करना उनके लिए स्वाभाविक भी था क्योंकि वे किसी भविष्य के भव्य भोज-भवन की छत नहीं बना रहे थे। उस समय सड़कों पर देवदार और फर के विशाल पेड़ों को ढोने वाली लंबी-लंबी गाड़ियों की कतारें नहीं चलती थीं, जो सोने से सजी हुई छतों को सहारा देने के लिए लकड़ी पहुँचाती थीं। उनकी झोपड़ियाँ दोनों ओर गाड़े गए दोमुंहे खंभों पर टिकी होती थीं। शाखाओं के गट्ठरों और ढलान बनाकर बिछाई गई पत्तियों की मोटी परतों से बनी छत पर बारिश का पानी आसानी से बह जाता था, चाहे वर्षा कितनी ही तेज़ क्यों न हो। ऐसी छतों के नीचे वे पूरी सुरक्षा के साथ रहते थे। घास-फूस की उनकी झोपड़ियाँ उन्हें स्वतंत्र जीवन देती थीं। लेकिन जो लोग संगमरमर और सोने के महलों में रहते हैं, वे वास्तव में दासता में जीते हैं। 

    पोसिडोनियस की एक और बात से भी मैं सहमत नहीं हूँ। उसका कहना है कि लोहे के औज़ारों का आविष्कार बुद्धिमान लोगों ने किया था। मेरे विचार में यह बात भी सही नहीं है। अगर ऐसा माना जाए तो फिर यह भी कहना पड़ेगा कि बुद्धिमान लोगों ने ही "जंगली जानवरों को फँसाना सीखा, पक्षियों के लिए जाल बिछाए और जंगल की घाटियों के चारों ओर शिकार के लिए कुत्तों को तैनात किया।" 

    यह सब बुद्धिमानी से नहीं बल्कि इंसान की सूझ-बूझ और काम निकालने की क्षमता से खोजा गया था। मैं पोसिडोनियस की इस बात से भी सहमत नहीं हूँ कि जंगलों में आग लगने पर, जब धरती झुलस गई और उसकी ऊपरी परत के पास मौजूद धातु की नसों से पिघलकर लोहा और ताँबा बाहर निकल आया, तब उन धातुओं की खोज बुद्धिमान लोगों ने की थी। ऐसी चीज़ों की खोज वे लोग करते हैं जिनकी रुचि और काम ही इन्हीं बातों से जुड़ा होता है। फिर, पोसिडोनियस के विपरीत, मुझे यह भी कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं लगता कि हथौड़ा पहले बना या चिमटा। ये दोनों औज़ार किसी ऐसे व्यक्ति ने बनाए होंगे जिसकी बुद्धि तेज़ और काम करने में कुशल थी, लेकिन जो कोई महान या असाधारण बुद्धिमान व्यक्ति नहीं था। यही बात उन सभी चीज़ों पर लागू होती है, जिनकी खोज ऐसे लोग करते हैं जो झुककर मेहनत करते हैं और जिनका ध्यान हमेशा ज़मीन पर, अपने काम पर लगा रहता है। 

    बुद्धिमान व्यक्ति सादा जीवन जीता था। उसे ऐसा ही होना भी चाहिए था। आज के समय में भी सच्चा बुद्धिमान वही है जो अपने ऊपर जितना कम बोझ रख सके, उतना अच्छा समझे। मैं आपसे पूछता हूँ, आप एक साथ डायोजनीज़ और डेडलस, दोनों की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं? आपके विचार में इनमें से वास्तव में बुद्धिमान कौन है? वह जिसने आरी का आविष्कार किया या वह जिसने एक लड़के को अपनी हथेली से पानी पीते देखा और तुरंत अपने झोले से प्याला निकालकर तोड़ दिया? फिर उसने स्वयं को डाँटते हुए कहा, "मैं कितना मूर्ख था कि इतने समय तक यह बेकार का सामान अपने साथ ढोता रहा!" इसके बाद वह अपने पीपे में जाकर लेट गया और सो गया। इसी तरह, आज आपके अनुसार अधिक बुद्धिमान कौन है? वह जो ऐसी तरकीब निकालता है कि छिपी हुई नलियों से केसर मिला हुआ सुगंधित पानी बहुत ऊँचाई तक फूटने लगे, जो एक झटके में पानी की धाराएँ भर और खाली कर दे, जो भोजन-कक्ष की छत पर चलने वाले पट बनाए ताकि हर नए पकवान के साथ उसकी सजावट भी तुरंत बदल जाए या फिर वह व्यक्ति, जो खुद भी समझता है और दूसरों को भी समझाता है कि प्रकृति ने हमसे कोई कठिन या कठोर माँग नहीं की है कि हम संगमरमर तराशने वाले कारीगरों और बड़े-बड़े निर्माण करने वाले इंजीनियरों के बिना भी घर बना सकते हैं कि रेशम के व्यापार के बिना भी कपड़े पहन सकते हैं और यह कि धरती की सतह पर जो कुछ प्रकृति ने हमें दिया है, यदि हम उसी में संतुष्ट रहना सीख लें तो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ हमारे पास होगी। जिस दिन मनुष्य इस व्यक्ति की बात ध्यान से सुनने लगेगा, उस दिन उसे समझ में आ जाएगा कि रसोइए उतने ही अनावश्यक हैं, जितने सैनिक। 

    बुद्धिमान लोग या कम-से-कम वे लोग जो बुद्धिमानों जैसे थे, शरीर की सुरक्षा को बहुत सरल बात मानते थे। जीवन की ज़रूरी चीज़ें बहुत कम मेहनत से मिल जाती हैं। असली मेहनत तो आराम और विलास की चीज़ें जुटाने में लगती है। यदि आप प्रकृति का साथ दें तो आपको किसी कारीगर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। प्रकृति ने कभी नहीं चाहा कि हम इन बातों में अपनी जान खपा दें। उसने हमें अपनी सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पहले से ही पर्याप्त साधन दे दिए हैं। "नंगा शरीर ठंड कैसे सह सकता है?" तो फिर क्या हुआ? क्या जंगली जानवरों और दूसरे पशुओं की खाल ठंड से पूरी तरह बचाने के लिए काफ़ी नहीं है? क्या बहुत-से लोग पेड़ों की छाल से अपने शरीर को नहीं ढकते या पक्षियों के पंखों से कपड़े नहीं बनाते? क्या आज भी अधिकांश स्किथियन (मध्य एशिया के घुमंतू लोग) लोमड़ी और मार्टेन जैसे जानवरों की खाल नहीं पहनते? ये खालें छूने में मुलायम होती हैं और तेज़ हवा को भी अंदर नहीं आने देतीं। फिर बताइए, ऐसा कौन है जो टहनियों से एक ढाँचा न बना सके, उस पर साधारण मिट्टी न पोत सके, उसे घास-फूस या झाड़ियों से न ढक सके और पूरी सर्दी आराम और सुरक्षा से न बिता सके। जबकि बारिश का पानी उसकी छत से बहकर नीचे गिरता रहे? "लेकिन गर्मियों की तेज़ धूप से बचने के लिए तो गहरी छाया चाहिए।" तो फिर क्या? क्या बहुत पुराने समय से ऐसी गुफाएँ नहीं हैं, जो समय के बीतने या किसी प्राकृतिक कारण से अपने-आप बन गईं? क्या यह सच नहीं है कि उत्तरी अफ्रीका और दूसरे बहुत गर्म इलाकों के लोग ज़मीन खोदकर बनाए गए घरों में रहते हैं? जब कोई और उपाय काम नहीं आता, तब वे उसी तपी हुई धरती के भीतर रहकर गर्मी से अपनी रक्षा करते हैं। 

    प्रकृति हमारे साथ इतनी अन्यायी नहीं थी कि उसने दूसरे सभी जीवों के लिए जीवन आसान बना दिया हो। लेकिन मनुष्य के लिए बिना तरह-तरह की तकनीकी कलाओं के जीना असंभव कर दिया हो। उसने हमसे कोई कठोर माँग नहीं की। हमारे जीवन के लिए जो भी ज़रूरी था, उसे पाना कठिन नहीं बनाया। हम ऐसी दुनिया में पैदा हुए थे जहाँ हमारी ज़रूरत की चीज़ें पहले से ही मौजूद थीं। मुश्किलें हमने खुद पैदा कीं क्योंकि हमने आसान चीज़ों को तुच्छ समझना शुरू कर दिया। घर, कपड़े, शरीर को गर्म रखने के साधन, भोजन बल्कि वे सारी चीज़ें जो आज बहुत बड़ा कारोबार बन चुकी हैं, उस समय आसानी से उपलब्ध थीं। वे बिना किसी कीमत के मिल जाती थीं और उन्हें पाने के लिए बहुत कम मेहनत करनी पड़ती थी। क्योंकि कोई भी अपनी ज़रूरत से ज़्यादा नहीं लेता था। इन चीज़ों को महँगा, दुर्लभ और अनेक कठिन कलाओं तथा हुनरों से ही हासिल किया जा सकने वाला हमने स्वयं बना दिया है। 

    प्रकृति हमारी ज़रूरत की हर चीज़ देती है। लेकिन भोग-विलास ने प्रकृति का साथ छोड़ दिया है। वह हर दिन अपनी इच्छाओं को और बढ़ाता है, हर बीतती सदी के साथ फैलता जाता है और अपनी ही चतुराई से बुराइयों को बढ़ावा देता है। पहले इंसान ने उन चीज़ों की इच्छा की जो ज़रूरी नहीं थीं। फिर उसने उन चीज़ों की चाह की जो उसके लिए नुकसानदेह थीं। और अब तो हालत यह है कि उसने अपने मन को ही शरीर का गुलाम बना दिया है। अब मन का काम केवल शरीर की हर इच्छा पूरी करना रह गया है। समाज में जितने भी शोर-शराबे वाले धंधे और कारोबार चल रहे हैं, वे सब शरीर की सेवा के लिए हैं। एक समय था जब शरीर को उतना ही दिया जाता था जितना किसी नौकर को काम चलाने के लिए दिया जाता है। लेकिन आज शरीर मालिक बन बैठा है और उसकी हर माँग पूरी की जाती है। इसीलिए कहीं कपड़ों के बड़े-बड़े कारोबार दिखाई देते हैं, कहीं तरह-तरह के कारीगरों की कार्यशालाएँ। कहीं रसोइयों के बनाए सुगंधित और लुभावने व्यंजन हैं तो कहीं नृत्य सिखाने वालों की आकर्षक अदाएँ और मन को लुभाने वाले, कोमल और बनावटी गीत-संगीत। एक समय था जब हम अपनी इच्छाओं को केवल ज़रूरत भर की चीज़ों तक सीमित रखते थे और उतना ही चाहते थे जितना हमारी सामर्थ्य में था। लेकिन अब वह सीमा मिट चुकी है। आज यदि कोई व्यक्ति केवल उतना ही चाहता है जितना उसके लिए पर्याप्त है तो लोग उसे असभ्य, पिछड़ा और गरीब समझते हैं। 

    प्रिय लूसीलियस, यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े विद्वान भी कभी-कभी अपनी भाषा की चमक और अपनी बात कहने के आनंद में इतने बह जाते हैं कि सच्चाई से भटक जाते हैं। उदाहरण के लिए पोसिडोनियस को ही देखिए। मेरे विचार में उसने दर्शन को बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन जब वह यह बताने लगता है कि ऊन के ढीले गुच्छों से कुछ रेशों को कैसे मरोड़ा जाता है, कुछ को कैसे खींचकर धागा बनाया जाता है, फिर कैसे करघे पर लटके हुए भार ताने के धागों को सीधा और तना हुआ रखते हैं और कैसे बाने के धागे को कसकर दबाया जाता है ताकि ताने के मोटे धागों के बीच कपड़ा अच्छी तरह बुना जा सके तो वह यह दावा करने लगता है कि बुनाई की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था। वह यह भूल जाता है कि बुनाई की यह जटिल विधि बहुत बाद में विकसित हुई, जिसमें—

"ताना करघे के बीम पर कसकर बाँधा जाता है। सरकंडे की कंघी से धागों को अलग-अलग रखा जाता है। बाने का धागा नाव जैसी छोटी शटल के सहारे उनके बीच से निकाला जाता है और फिर चौड़े दाँतेदार कंघे से उसे कसकर बैठा दिया जाता है।"

अगर पोसिडोनियस आज के करघों को देखता, जो इतने महीन और पारदर्शी कपड़े बनाते हैं कि वे न शरीर को ठीक से ढकते हैं और न ही लज्जा की रक्षा करते हैं तो पता नहीं वह क्या कहता। 

    फिर वह किसानों की बात करने लगता है। वह बड़े प्रभावशाली ढंग से बताता है कि पहले हल से ज़मीन कैसे जोती जाती है, फिर दूसरी बार जुताई करके मिट्टी को कैसे भुरभुरा किया जाता है ताकि पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें। इसके बाद बीज बोए जाते हैं और खेत से खरपतवार हाथों से निकाल दी जाती है ताकि जंगली पौधे फसल का नुकसान न करें। पोसिडोनियस का कहना है कि खेती के ये तरीके भी बुद्धिमान लोगों की ही देन थे। लेकिन वह यह भूल जाता है कि किसान आज भी खेती को अधिक उपजाऊ और बेहतर बनाने के लिए लगातार नई-नई खोजें और तरीके विकसित कर रहे हैं। इन बातों से भी उसका मन नहीं भरता। वह बुद्धिमान व्यक्ति को चक्की तक ले आता है और कहता है कि सबसे पहले उसी ने प्रकृति की नकल करते हुए रोटी बनाना शुरू किया:

"जब अनाज मुँह में जाता है तो दाँतों के आपस में रगड़ने से वह पिस जाता है। जो दाने बच जाते हैं, उन्हें जीभ फिर से दाँतों के बीच ले आती है। इसके बाद वे लार के साथ मिल जाते हैं, जिससे वे नरम हो जाते हैं और आसानी से निगले जा सकते हैं। जब भोजन पेट में पहुँचता है तो वहाँ लगातार होने वाली पाचन-क्रिया से वह पकता और पचता है और अंत में शरीर का हिस्सा बन जाता है। इसी प्रक्रिया को देखकर किसी व्यक्ति ने दो खुरदरे पत्थर लिए और उन्हें एक-दूसरे के ऊपर इस तरह रखा कि वे दाँतों जैसे काम करें। एक पत्थर को स्थिर रखा गया और दूसरे को उसके ऊपर घुमाया गया ताकि दोनों के आपसी घर्षण से अनाज के दाने पिस जाएँ। उन्हें बार-बार पीसा गया, जब तक कि वे बहुत बारीक आटे में न बदल गए। फिर उस आटे में पानी मिलाया गया, उसे अच्छी तरह गूँथा गया और उससे रोटी बनाई गई। शुरू-शुरू में रोटी को गरम अंगारों पर या मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता था। बाद में धीरे-धीरे भट्टियों और दूसरे ऐसे पकाने के साधनों का आविष्कार हुआ, जिनकी गर्मी को आवश्यकता के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता था।" 

    अगर वह थोड़ा और आगे बढ़ जाता तो शायद यह भी कह देता कि जूते बनाने की कला का आविष्कार भी बुद्धिमान लोगों ने ही किया था! 

    इन सभी चीज़ों की खोज निश्चय ही बुद्धि ने की है। लेकिन वह पूर्ण और सर्वोच्च बुद्धि नहीं थी। ये साधारण मनुष्यों की खोजें हैं, किसी सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति की नहीं। यही बात उन नावों पर भी लागू होती है जिनसे हम नदियाँ और समुद्र पार करते हैं। उनकी पाल इस तरह बनाई जाती हैं कि वे हवा की ताकत को पकड़ सकें और पीछे लगा पतवार नाव को दाएँ-बाएँ मोड़कर उसकी दिशा नियंत्रित करता है। यह विचार भी मनुष्य ने मछलियों को देखकर सीखा क्योंकि मछलियाँ अपनी पूँछ को दाएँ-बाएँ हिलाकर अपनी दिशा बदलती हैं। पोसिडोनियस कहता है—

"असल में इन सभी चीज़ों का आविष्कार किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने ही किया था। लेकिन क्योंकि ये काम उसके लिए बहुत छोटे और साधारण थे। इसलिए उसने इन्हें अपने सेवकों और काम करने वाले लोगों के जिम्मे छोड़ दिया।" 

    असलियत यह है कि इन चीज़ों का आविष्कार उन्हीं लोगों ने किया, जिनका काम आज भी इन्हें बनाना है। हमें अच्छी तरह पता है कि कुछ चीज़ें तो हमारे ही समय में सामने आई हैं। जैसे, ऐसी खिड़कियाँ जिनमें पारदर्शी काँच लगाया जाता है, जिससे भरपूर रोशनी भीतर आती है या ऐसे स्नानघर जिनकी फ़र्श मेहराबदार होती है और जिनकी दीवारों के भीतर पाइप लगाए जाते हैं ताकि गर्मी पूरे कमरे में समान रूप से फैल जाए और ऊपर से नीचे तक हर जगह एक-सा ताप बना रहे। फिर उन संगमरमर के पत्थरों का क्या कहना, जिनसे हमारे मंदिर और घर चमक उठते हैं या उन गोल और चिकने तराशे हुए पत्थर के खंभों का, जो बरामदों और बड़ी-बड़ी इमारतों को सहारा देते हैं, जहाँ बहुत-से लोग एक साथ इकट्ठा हो सकते हैं। आशुलिपि (तेज़ी से लिखने की विशेष लेखन-पद्धति) के उन संकेतों का भी उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी मदद से बोलने वाले की बहुत तेज़ गति से कही गई बातों को भी तुरंत लिख लिया जाता है और लिखने वाले का हाथ बोलने वाले की ज़बान की रफ़्तार के साथ चल पाता है। इन सभी चीज़ों का आविष्कार समाज के सबसे साधारण और मेहनतकश लोगों ने किया है न कि तथाकथित बुद्धिमान लोगों ने। 

    बुद्धिमत्ता का स्थान इससे कहीं ऊँचा है। वह हाथों को काम करना नहीं सिखाती बल्कि मन को शिक्षित करती है। क्या आप जानना चाहते हैं कि उसने क्या खोजा है और क्या उपलब्धि हासिल की है? उसका उत्तर न तो सुंदर नृत्य की मुद्राएँ हैं और न ही तुरही और बाँसुरी से निकलने वाले वे सुर, जो उनमें फूँकी गई हवा को अलग-अलग ढंग से बहाकर संगीत में बदल देते हैं। बुद्धिमत्ता का काम हथियार बनाना, किले खड़े करना या युद्ध के साधन तैयार करना नहीं है। उसका काम शांति को बढ़ावा देना है। वह पूरे मानव समाज को आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव के साथ जीने का आह्वान करती है। मैं फिर कहता हूँ, बुद्धिमत्ता रोज़मर्रा के काम आने वाले औज़ार बनाने वाली नहीं है। आप इतनी छोटी-छोटी चीज़ों का श्रेय उसे क्यों देते हैं? आपके सामने तो वह शक्ति है जो स्वयं जीवन को दिशा देती है। असल में, बाकी सभी कलाएँ और हुनर उसी के अधीन हैं क्योंकि जब बुद्धिमत्ता जीवन की स्वामिनी है तो जीवन के लिए आवश्यक सभी साधनों की भी वही स्वामिनी है। बुद्धिमत्ता का लक्ष्य मनुष्य को सुख और सच्चे आनंद तक पहुँचाना है। वही उस मार्ग का नेतृत्व करती है और उसी तक पहुँचने के द्वार खोलती है। वह हमें बताती है कि वास्तव में बुरा क्या है और क्या केवल देखने में बुरा लगता है। वह हमारे मन से भ्रम दूर करती है। वह हमें ऐसा आत्मसम्मान देती है जिसका ठोस आधार होता है और उस झूठे दिखावे वाले सम्मान को कम करती है जो केवल बाहरी आडंबर पर टिका होता है। वह हमें महानता और केवल दिखावटी भव्यता के बीच का अंतर समझाती है। 

    वह हमें पूरे प्रकृति-जगत का ज्ञान कराती है और अपने स्वरूप को भी समझाती है। वह बताती है कि देवता कौन हैं, उनका स्वभाव क्या है। अधोलोक की दिव्य शक्तियाँ कौन हैं; घर-परिवार की रक्षा करने वाले देवता कौन हैं और वे रक्षक आत्माएँ कौन हैं जो मनुष्यों की देखभाल करती हैं। वह उन महान आत्माओं के बारे में भी बताती है जो मृत्यु के बाद देवताओं के समान सम्मान प्राप्त करती हैं। वह यह भी समझाती है कि उनका स्थान कहाँ है, वे क्या कार्य करती हैं, उनकी शक्ति क्या है और उनका उद्देश्य क्या है। 

    इसके बाद बुद्धिमत्ता हमें इस संसार की शुरुआत तक ले जाती है। वह हमें उस शाश्वत बुद्धि के बारे में बताती है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है और उस शक्ति के बारे में भी, जिसके कारण हर जीव और हर वस्तु अपने स्वभाव के अनुसार जन्म लेती और विकसित होती है। फिर वह मन का अध्ययन शुरू करती है। वह पूछती है, मन कहाँ से आया? उसका स्थान कहाँ है? वह कितने समय तक बना रहता है? उसके कितने भाग हैं? इसके बाद वह भौतिक चीज़ों से आगे बढ़कर उन बातों की जाँच करती है जिनका कोई भौतिक रूप नहीं है। वह सत्य क्या है, इसे समझाती है और यह भी बताती है कि सत्य को पहचानने का सही आधार क्या है। अंत में वह हमें यह सिखाती है कि जीवन में और भाषा में पैदा होने वाले भ्रमों और उलझनों को कैसे दूर किया जाए क्योंकि दोनों ही जगह सत्य और असत्य अक्सर एक-दूसरे में मिल जाते हैं और उन्हें अलग-अलग पहचानना आवश्यक होता है।जब हम बुद्धिमत्ता के अनुयायी बनते हैं, तब हमें किसी एक नगर या स्थान के छोटे-से मंदिर में नहीं बल्कि सभी देवताओं के विराट मंदिर में प्रवेश मिलता है। उस आकाश में, जो स्वयं उनका विशाल निवास है। वहाँ हमारा मन पूरे ब्रह्मांड को उसके वास्तविक रूप में देखना सीखता है, क्योंकि हमारी साधारण आँखें इतने विशाल दृश्य को पूरी तरह देख पाने में सक्षम नहीं हैं।

    मैं यह नहीं मानता, जैसा कि पोसिडोनियस मानता है कि बुद्धिमान व्यक्ति ने कारीगरी और तकनीकी कलाओं से अपने आपको बाद में अलग कर लिया था। सच तो यह है कि वह कभी उन कामों में पड़ा ही नहीं।वह किसी ऐसी चीज़ का आविष्कार करना अपने योग्य नहीं समझता, जिसे बाद में खुद ही छोड़ देना पड़े। वह ऐसे काम में हाथ ही क्यों डालता, जिसे कुछ समय बाद त्याग देना हो? पोसिडोनियस का कहना है, "अनाकार्सिस ने कुम्हार का चाक बनाया था, जो घूमकर मिट्टी के बर्तन तैयार करता है।" लेकिन होमर की रचनाओं में कुम्हार के चाक का उल्लेख मिलता है। इसलिए पोसिडोनियस यह मानने के बजाय कि उसकी अपनी कहानी गलत हो सकती है, यह कहता है कि होमर का वह अंश बाद में जोड़ा गया है और असली नहीं है। मेरी बात अलग है। मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि कुम्हार का चाक अनाकार्सिस ने बनाया था। अगर मान भी लें कि उसने बनाया था, तब भी उसने यह काम इसलिए नहीं किया कि वह बुद्धिमान था। उसने यह काम इसलिए किया क्योंकि वह एक मनुष्य था। बुद्धिमान व्यक्ति भी बहुत-से काम केवल इसलिए करता है क्योंकि वह इंसान है न कि इसलिए कि वे उसकी बुद्धिमत्ता का परिणाम हैं। मान लीजिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति बहुत तेज़ धावक भी है। अगर वह दौड़ में जीतता है तो वह अपनी तेज़ दौड़ने की क्षमता के कारण जीतता है, अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं। 

    मैं चाहता हूँ कि पोसिडोनियस किसी काँच बनाने वाले कारीगर को देखे। वह केवल अपनी साँस की मदद से काँच को ऐसे-ऐसे आकार दे देता है, जिन्हें बहुत कुशल हाथ भी बड़ी मुश्किल से बना पाएँ। यह ऐसी कला है जो उस समय विकसित हुई, जब उसके अनुसार बुद्धिमान व्यक्ति अब दुनिया में रहे ही नहीं थे। पोसिडोनियस यह भी कहता है कि डेमोक्रिटस को मेहराब का आविष्कारक माना जाता है। मेहराब वह रचना है जिसमें बीच का सबसे ऊपर वाला पत्थर (कुंजी-पत्थर) दोनों ओर झुके हुए पत्थरों को सहारा देकर पूरी मेहराब को मज़बूती से बाँधे रखता है। लेकिन मैं इस बात को सही नहीं मानता। डेमोक्रिटस से बहुत पहले ही पुल और दरवाज़े बनाए जाते थे और उनके ऊपरी हिस्से अक्सर मेहराब के आकार के होते थे। तुम यह भी भूल रहे हो कि उसी डेमोक्रिटस के बारे में यह भी कहा जाता है कि उसने हाथी-दाँत को मुलायम बनाने का तरीका खोजा था और साधारण कंकड़ को पकाकर पन्ने जैसा हरा रंग देने की विधि भी बताई थी। आज भी कुछ पत्थरों को इसी तरह रंगा जाता है, यदि वे उस प्रक्रिया को स्वीकार कर लें। हो सकता है कि इन बातों की खोज वास्तव में किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने की हो, लेकिन उसने यह काम अपनी बुद्धिमत्ता के कारण नहीं किया। बुद्धिमान व्यक्ति भी अनेक ऐसे काम करता है जिन्हें हम साधारण लोग, जो किसी अर्थ में बुद्धिमान नहीं कहलाते, भी उतनी ही अच्छी तरह। कई बार उससे भी अधिक कुशलता और आसानी से कर लेते हैं। 

    क्या आप जानना चाहते हैं कि दर्शन ने वास्तव में कौन-सी खोजें की हैं? सबसे पहले, उसने हमें प्रकृति के गहरे सत्य समझाए। उसने उन्हें दूसरे जीवों से बिल्कुल अलग ढंग से जाना क्योंकि दूसरे प्राणियों की समझ दैवीय और सार्वभौमिक सत्य को देखने में सीमित होती है। दूसरी बात, उसने जीवन जीने का नियम बताया और उसे पूरे ब्रह्मांड की व्यवस्था के अनुरूप रखा। उसने हमें केवल देवताओं के बारे में जानना ही नहीं सिखाया बल्कि उनके अनुसार जीवन जीना भी सिखाया। उसने यह भी सिखाया कि जो कुछ भी घटित होता है, उसे देवताओं की इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए। उसने हमें झूठी धारणाओं के पीछे न भागने की शिक्षा दी। उसने हर चीज़ का मूल्य सही कसौटी पर परखा। उसने उन सुखों की निंदा की जिनके पीछे अंत में पछतावा मिलता है। उन सच्चे अच्छे गुणों की प्रशंसा की जो हमेशा संतोष देते हैं। उसने हमें बताया कि सबसे भाग्यशाली वह है जिसे भाग्य के सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। सबसे शक्तिशाली वह है जो स्वयं पर अधिकार रखता है। 

    मैं जिस दर्शन की बात कर रहा हूँ, वह ऐसा दर्शन नहीं है जो मनुष्य को उसके समाज से अलग कर दे या देवताओं को इस संसार से बाहर मान ले, या सद्गुण को केवल सुख पाने का साधन बना दे। मैं उस दर्शन की बात कर रहा हूँ जो मानता है कि सम्मान और नैतिक श्रेष्ठता के अलावा कोई भी चीज़ वास्तव में अच्छी नहीं है। जिसे न मनुष्यों के उपहार लुभा सकते हैं और न भाग्य की कृपा और जिसका सबसे बड़ा पुरस्कार यही है कि उसके अनुयायियों को किसी भी प्रकार के पुरस्कार या लालच से डगमगाया नहीं जा सकता। 

    मैं यह नहीं मानता कि उस आदिम युग में दर्शन का अस्तित्व था, जब न कोई तकनीकी कला विकसित हुई थी और न ही लोग चीज़ों का उपयोग ठीक से जानते थे। उस समय लोग अनुभव करते-करते और बार-बार कोशिश करके सीख रहे थे कि किस चीज़ का कैसे इस्तेमाल करना है। दर्शन तो उस सुखद युग के बाद आया, जब प्रकृति की दी हुई चीज़ें सबके लिए आसानी से उपलब्ध थीं। उस समय न लालच ने लोगों को एक-दूसरे से अलग किया था, न भोग-विलास ने उन्हें बाँटा था। उन्होंने अभी तक लाभ कमाने के लिए मिल-जुलकर रहने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति को नहीं छोड़ा था। उस समय के लोग बुद्धिमान नहीं थे, भले ही उनका जीवन और उनका व्यवहार वैसा था जैसा किसी बुद्धिमान व्यक्ति का होना चाहिए। 

    मनुष्य जाति के लिए इससे बेहतर जीवन की कल्पना करना कठिन है। यहाँ तक कि यदि स्वयं ईश्वर किसी को यह अवसर दे दें कि वह पृथ्वी की व्यवस्था नए सिरे से बनाए और लोगों के लिए जीवन के नियम तय करे, तब भी वह इससे अच्छा जीवन नहीं बना सकेगा। उस जीवन-पद्धति से बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था नहीं हो सकती, जिसके बारे में कहा गया है—

"कोई किसान खेत नहीं जोतता था
यहाँ तक कि ज़मीन पर अपनी सीमा-रेखाएँ खींचना भी अनुमति नहीं थी
लोगों का श्रम और उनका प्रयास सबके साझा हित के लिए होता था
और धरती भी, जब उससे ज़बरदस्ती कुछ नहीं माँगा जाता था
तो अपने सारे उपहार और भी अधिक उदारता से देती थी"

 मनुष्य जाति इससे अधिक सुखी और सौभाग्यशाली कैसे हो सकती थी? प्रकृति के दिए हुए फलों और संसाधनों में सबका बराबर हिस्सा था। जैसे कोई माता या पिता अपने सभी बच्चों का पालन-पोषण करता है, वैसे ही प्रकृति सबकी ज़रूरतें पूरी करती थी। लोग चिंता से मुक्त थे क्योंकि वे प्रकृति की चीज़ों का उपयोग तो करते थे। लेकिन उन पर अपना निजी अधिकार नहीं जताते थे। वे उन्हें सबकी साझी संपत्ति मानते थे। निश्चय ही मैं उस समाज को सबसे अधिक समृद्ध कह सकता हूँ क्योंकि वहाँ आपको एक भी व्यक्ति गरीब नहीं मिलता था।

    उस सुंदर व्यवस्था को लालच ने नष्ट कर दिया। ज़्यादा-से-ज़्यादा पाने और हर चीज़ पर अपना निजी अधिकार जमाने की चाह में उसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि जो चीज़ें पहले सबकी थीं, वे अलग-अलग लोगों की संपत्ति बन गईं। इस तरह उसने अपनी ही पहले की असीम संपदा को बहुत छोटा कर लिया। लालच ने ही गरीबी को जन्म दिया। उसने सब कुछ पाने की इच्छा की। लेकिन उसी इच्छा में वह सब कुछ खो बैठा। आज भी लालच अपनी खोई हुई चीज़ों को वापस पाने की कोशिश करता है। वह एक ज़मीन के साथ दूसरी ज़मीन जोड़ता जाता है। पड़ोसियों की ज़मीन कभी खरीदकर तो कभी उन्हें हटाकर अपने अधिकार में कर लेता है। अपनी संपत्ति का विस्तार करते-करते वह पूरे-के-पूरे प्रांतों जितना बड़ा इलाका अपने नाम कर लेता है। उसकी ज़मीन इतनी फैल जाती है कि उसे अपनी ही संपत्ति के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है और वह इसे अपना मालिकाना हक़ कहता है। लेकिन चाहे हम अपनी ज़मीन की सीमाएँ कितनी भी बढ़ा लें, हम कभी उस पहली अवस्था में वापस नहीं पहुँच सकते। जब हम यह सब कर लेंगे, तब हमारे पास बहुत-सी संपत्ति होगी। लेकिन एक समय ऐसा था जब पूरी पृथ्वी ही हमारी थी। 

    धरती उस समय कहीं अधिक उपजाऊ थी, जब उसे जोता नहीं जाता था। वह उन लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए भरपूर उपज देती थी, जो लूटकर इकट्ठा करने वाले नहीं थे। प्रकृति की उदारता से मिली किसी चीज़ को खोज लेने में जितनी खुशी मिलती थी, उतनी ही खुशी उसे किसी दूसरे के साथ बाँटने में भी होती थी। कोई भी व्यक्ति अपनी ज़रूरत से ज़्यादा या कम नहीं रखता था। लोग आपस में मिल-जुलकर हर चीज़ साझा करते थे। वह समय अभी नहीं आया था जब ताकतवर लोग कमज़ोरों पर कब्ज़ा करने लगे थे। लालची लोग अपने लिए चीज़ें छिपाकर जमा नहीं करते थे और इस तरह दूसरों को जीवन की ज़रूरी चीज़ों से वंचित नहीं करते थे। वे दूसरों की भलाई का उतना ही ध्यान रखते थे, जितना अपना। उस समय हथियार हर समय इस्तेमाल नहीं होते थे। लोगों के हाथ इंसानों के खून से नहीं रंगे होते थे। उनका संघर्ष केवल जंगली जानवरों से होता था। उस युग के लोग घने जंगलों की छाया में धूप से बचते थे। पत्तों से बने साधारण आश्रय उन्हें बारिश और तूफ़ान से सुरक्षित रखते थे। वे दिन भर निश्चिंत रहते थे और रात को बिना किसी चिंता या आह के गहरी नींद सोते थे। इसके विपरीत, आज हम मुलायम और शानदार बिस्तरों पर भी बेचैनी में करवटें बदलते रहते हैं। हमारी चिंताएँ हमें सोने नहीं देतीं। लेकिन वे लोग कठोर ज़मीन पर भी कितनी गहरी और मीठी नींद सोते थे! उनके सिर पर नक्काशीदार और सजी हुई छतें नहीं थीं। वे खुले आकाश के नीचे लेटते थे। उनके ऊपर असंख्य तारे धीरे-धीरे चलते दिखाई देते थे, और पूरा आकाश बिना किसी आवाज़ के अपनी महान गति से चलता रहता था। दिन हो या रात, प्रकृति का यह अद्भुत संसार उनकी आँखों के सामने खुला रहता था। वे देखते थे कि कुछ नक्षत्र आकाश में ऊपर पहुँचकर पश्चिम की ओर डूब रहे हैं और कुछ दूसरे फिर से उगकर दिखाई देने लगते हैं। इतने विशाल और आश्चर्य से भरे इस ब्रह्मांड के बीच घूमना-फिरना क्या अपने आप में एक अनोखा आनंद नहीं था? 

    लेकिन आज के लोग हर छोटी-सी आवाज़ से घबरा उठते हैं। अगर उनके घर में कहीं ज़रा-सी चरमराहट सुनाई दे जाए, तो वे अपनी रंग-बिरंगी चित्रकारी से सजी दीवारों के बीच भी डरकर भागने लगते हैं। उस समय के लोगों के घर आज के नगरों जैसे विशाल और जटिल नहीं थे। खुले वातावरण की स्वच्छ और ठंडी हवा, चट्टानों या पेड़ों की हल्की छाया, बिलकुल साफ़ पानी वाले झरने, बिना किसी बाँध, नहर, पाइप या दूसरी कृत्रिम व्यवस्था के बहती नदियाँ और अपनी प्राकृतिक सुंदरता से भरे घास के मैदान, यही उनके घरों का परिवेश था।उनके घर केवल गाँव के साधारण कारीगरों की मेहनत से बने होते थे। उनमें कोई दिखावा नहीं था। वे पूरी तरह प्रकृति के अनुरूप थे। ऐसे घरों में रहना आनंद की बात थी। न तो उन घरों के कारण कोई चिंता होती थी और न ही उनकी रक्षा या देखभाल की फ़िक्र सताती थी। लेकिन आज हमारे घर ही हमारी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गए हैं। 

    उनका जीवन भले ही बहुत सुंदर और निष्कपट था, लेकिन वे बुद्धिमान नहीं थे। 'बुद्धिमान' कहलाने का अधिकार केवल उसी को है जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि तक पहुँच चुका हो। फिर भी मैं यह नहीं कहूँगा कि वे साधारण लोग थे। उनमें ऊँचे विचार और महान स्वभाव था। यदि ऐसा कहना उचित हो तो वे मानो अभी-अभी देवताओं के सान्निध्य से पृथ्वी पर आए थे। जब संसार अभी अपनी पूरी शक्ति से भरा हुआ था, तब वह ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यों को जन्म देता था। उनका स्वभाव अधिक मज़बूत था। वे शारीरिक मेहनत के लिए हमसे कहीं अधिक सक्षम थे। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे चरित्र की पूर्णता तक पहुँच चुके थे। प्रकृति हमें सद्गुण देकर पैदा नहीं करती। अच्छा इंसान बनना एक ऐसी कला है जिसे अभ्यास और प्रयास से सीखना पड़ता है।निश्चय ही वे लोग धरती की गहराइयों में सोना, चाँदी या चमकते हुए रत्न खोजने के लिए खदानें नहीं खोदते थे। उस समय ऐसा भी नहीं था कि लोग केवल तमाशा देखने के आनंद के लिए एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य की हत्या करवाएँ। न उनमें क्रोध ऐसा था, न भय, जो उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करे। वे तो बोल न सकने वाले पशुओं पर भी दया करते थे। वे न कढ़ाईदार कपड़े पहनते थे और न सोने के तारों से बुने हुए वस्त्र क्योंकि उस समय तक सोना धरती से निकाला ही नहीं गया था।

    तो फिर हमारा निष्कर्ष क्या है? यह कि वे लोग बुरे नहीं थे। लेकिन उनकी भलमनसाहत ज्ञान के कारण नहीं बल्कि अज्ञान के कारण थी। किसी व्यक्ति का गलत काम न करना और यह न जानना कि गलत काम कैसे किया जाता है, इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है। उनमें न्याय, विवेक, संयम और साहस जैसे सद्गुण वास्तव में मौजूद नहीं थे। हाँ, उनका सरल जीवन इन गुणों जैसा ज़रूर दिखाई देता था। लेकिन वह सच्चा सद्गुण नहीं था। सच्चा सद्गुण केवल उसी मन में जन्म लेता है जिसे शिक्षा मिली हो, जिसने सही प्रशिक्षण पाया हो, और जो निरंतर अभ्यास के द्वारा अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुँच गया हो। निस्संदेह, हम सबमें सद्गुण प्राप्त करने की क्षमता लेकर जन्म होता है, लेकिन हम जन्म से ही सद्गुणी नहीं होते। जब तक मनुष्य को उचित शिक्षा और अभ्यास नहीं मिलता, तब तक उसका स्वभाव चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसके पास केवल सद्गुण बनने की संभावना होती है, स्वयं सद्गुण नहीं।


अभी के लिए विराम 

विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच अंतर के बारे में -- पत्र - 87 (एक स्टोइक के पत्र/सेनेका के पत्रों का हिन्दी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 


दर्शनशास्त्र को विभाजित करके उसके विशाल स्वरूप को विभिन्न अंगों में समझने का जो अनुरोध तुम कर रहे हो, वह उपयोगी ही नहीं बल्कि उस व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है जो शीघ्रता से प्रज्ञा प्राप्त करना चाहता है। किसी संपूर्ण वस्तु को उसके विभिन्न भागों के माध्यम से समझना हमारे लिए अधिक सरल होता है। यदि हम दर्शनशास्त्र को उसके पूर्ण रूप में वैसे ही देख पाते, जैसे एक ही दृष्टि में पूरे आकाश का अवलोकन करते हैं तो वह दृश्य भी आकाश के समान ही विस्मयकारी होता। तब प्रत्येक मनुष्य उसे देखकर आश्चर्य से भर जाता और उन वस्तुओं का मोह छोड़ देता जिन्हें आज हम केवल इसलिए महान समझते हैं क्योंकि हमें वास्तविक महानता का ज्ञान नहीं है। किन्तु चूँकि ऐसा संभव नहीं है। इसलिए हमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन उसी प्रकार करना चाहिए जैसे कोई व्यक्ति आकाश के विभिन्न भागों का अलग-अलग निरीक्षण करके अंततः पूरे आकाश को समझने का प्रयास करता है।



    निस्संदेह, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि दर्शनशास्त्र के सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेट लेती है और उस पर उतनी ही शीघ्रता से दृष्टि डालती है, जितनी शीघ्रता से हमारी आँख पूरे आकाश का अवलोकन कर लेती है। परन्तु हम, जिनकी दृष्टि उन धुंधों से सीमित है जिनके बीच से हमें देखना पड़ता है, उनके लिए अलग-अलग बातों को समझना अधिक सरल है क्योंकि अभी हम सम्पूर्णता को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा और दर्शनशास्त्र को विभाजित करूँगा, किन्तु उसे अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ों में नहीं बल्कि उसके मुख्य भागों में। इस प्रकार का विभाजन उपयोगी है परन्तु उसे अत्यधिक छोटे-छोटे अंशों में बाँट देना उचित नहीं। जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है, उसे समझना उतना ही कठिन होता है जितना किसी अत्यन्त विशाल वस्तु को समझना। जैसे किसी जनसमुदाय को विभिन्न जनजातियों में विभाजित किया जाता है और किसी सेना को सौ-सौ सैनिकों की टुकड़ियों में बाँटा जाता है, उसी प्रकार जो भी वस्तु पर्याप्त विशाल हो, उसे उसके उपयुक्त भागों में विभाजित करके समझना अधिक सरल होता है। किन्तु, जैसा मैंने कहा, ये भाग इतने अधिक और इतने छोटे नहीं होने चाहिए कि उनका कोई स्वतंत्र स्वरूप ही न रह जाए। अत्यधिक विभाजन उतना ही दोषपूर्ण है जितना बिल्कुल भी विभाजन न करना; क्योंकि जब किसी वस्तु को पीसकर चूर्ण बना दिया जाता है, तब उसकी संरचना ही समाप्त हो जाती है।

    यदि तुम्हें उचित लगे तो मैं सबसे पहले विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच का अंतर बताकर आरम्भ करूँगा।प्रज्ञा मानव-मन का सर्वोच्च कल्याण है जबकि दर्शनशास्त्र प्रज्ञा के प्रति प्रेम और उसकी प्राप्ति की आकांक्षा है। दर्शनशास्त्र उस लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जहाँ प्रज्ञा पहले ही पहुँच चुकी होती है। 'फिलॉसफी' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह तो स्पष्ट है। इसका नाम ही घोषित करता है कि यह किससे प्रेम करता है। कुछ लोगों ने प्रज्ञा को मानव और दैवीय विषयों का विज्ञान कहा है। अन्य लोगों ने इसे मानव और दैवीय विषयों तथा उनके कारणों का ज्ञान बताया है। मेरे विचार से यह अंतिम जोड़ अनावश्यक है क्योंकि मानव और दैवीय विषयों के कारण स्वयं दैवीय क्षेत्र का ही एक भाग हैं। दर्शनशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ भी दी गई हैं। कुछ ने इसे सद्गुण के प्रति समर्पण कहा है। कुछ ने मन को सुधारने का संकल्प और कुछ विचारकों के अनुसार यह सही ढंग से तर्क करने का प्रयास है। सामान्यतः सभी इस बात से सहमत हैं कि दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा में अंतर है क्योंकि जिस वस्तु की आकांक्षा की जाती है, वह स्वयं आकांक्षा नहीं हो सकती। जिस प्रकार लोभ और धन में बहुत अंतर है। एक चाहने की प्रवृत्ति है और दूसरा चाही जाने वाली वस्तु। उसी प्रकार दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा भी भिन्न हैं। दर्शनशास्त्र एक यात्रा है और प्रज्ञा उस यात्रा का फल तथा पुरस्कार। दर्शनशास्त्र आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। जबकि प्रज्ञा उसका अंतिम गंतव्य है। 'सोफिया' (Sophia) वास्तव में यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रज्ञा' या 'बुद्धिमत्ता' है। रोमन लोग भी कभी 'सोफिया' शब्द का प्रयोग करते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज भी हम यूनानी शब्द 'फिलॉसोफिया' (Philosophia) का प्रयोग करते हैं। इसका प्रमाण हमारी प्राचीन हास्य-रचनाओं में मिलता है और डोसेनस की समाधि पर अंकित इस लेख में भी, "हे पथिक, ठहरो और डोसेनस की प्रज्ञा (सोफिया) को पढ़ो।"

    यद्यपि दर्शनशास्त्र को सद्गुण के प्रति समर्पण कहा जाता है, जहाँ एक साधक है और दूसरा साध्य, फिर भी हमारे मत (स्टोइक परंपरा) के कुछ विचारकों का मानना है कि इन दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं किया जा सकता क्योंकि न तो सद्गुण के बिना दर्शनशास्त्र संभव है और न ही दर्शनशास्त्र के बिना सद्गुण। वास्तव में दर्शनशास्त्र सद्गुण के प्रति समर्पण है। परन्तु वह स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही संभव होता है। न तो सद्गुण उसके प्रति समर्पण के बिना अस्तित्व में रह सकता है और न ही सद्गुण के बिना उसके प्रति समर्पण हो सकता है। यह उस धनुर्धर के समान नहीं है, जो दूर स्थित किसी लक्ष्य पर निशाना साधता है। यहाँ लक्ष्य साधक से अलग किसी अन्य स्थान पर नहीं है। उसी प्रकार सद्गुण तक पहुँचने के मार्ग भी सद्गुण से बाहर नहीं होते, जैसे किसी नगर तक पहुँचने के लिए सड़कें नगर से बाहर होती हैं। मनुष्य सद्गुण तक स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही पहुँचता है। इसलिए दर्शनशास्त्र और सद्गुण एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। 

    अधिकांश और सबसे प्रतिष्ठित दार्शनिकों के अनुसार दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। नीतिशास्त्र (एथिक्स), प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) और तर्कशास्त्र (लॉजिक)। इनमें से पहला भाग मन को संयमित और निर्देशित करता है। दूसरा वस्तुओं के स्वभाव और प्रकृति का अध्ययन करता है और तीसरा शब्दों के अर्थ, वाक्यों की संरचना तथा तर्कों के रूपों की परीक्षा करता है ताकि असत्य सत्य का रूप धारण करके लोगों को धोखा न दे सके।किन्तु कुछ दार्शनिक परंपराओं ने दर्शनशास्त्र के इन विभागों को या तो कम कर दिया या बढ़ा दिया। कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) दार्शनिकों ने राजनीति को दर्शनशास्त्र का चौथा भाग माना क्योंकि उनके विचार में उसके लिए एक विशिष्ट प्रकार के अध्ययन और अलग विषय-वस्तु की आवश्यकता होती है। कुछ ने इसके अतिरिक्त 'अर्थशास्त्र' (ओइकोनोमिक्स) को भी जोड़ा, जिसका अर्थ है गृह-प्रबंधन का विज्ञान। कुछ ने 'जीवन की विभिन्न शैलियों' को भी एक स्वतंत्र विषय माना। परन्तु इन सभी विषयों को वास्तव में नीतिशास्त्र के अंतर्गत ही समाहित किया जा सकता है। एपिक्यूरियन दार्शनिकों का मत था कि दर्शनशास्त्र के केवल दो ही भाग हैं। प्रकृतिशास्त्र और नीतिशास्त्र। उन्होंने तर्कशास्त्र को अलग विभाग के रूप में स्वीकार नहीं किया। लेकिन जब उन्हें शब्दों की अस्पष्टताओं को दूर करने और उन असत्यों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता पड़ी जो सत्य का रूप धारण कर लेते हैं, तब उन्होंने भी 'निर्णय और मानदंड' नामक एक विषय को स्वीकार किया। वस्तुतः यही तर्कशास्त्र था, यद्यपि वे इसे प्रकृतिशास्त्र का केवल एक पूरक मानते थे। 

    साइरेनाइक दार्शनिकों ने तो प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र, दोनों को ही हटाकर केवल नीतिशास्त्र को स्वीकार किया। फिर भी उन्होंने दूसरे ढंग से उन्हीं विषयों को पुनः शामिल कर लिया। उन्होंने नीतिशास्त्र को पाँच भागों में विभाजित किया—

  1. किन वस्तुओं का अनुसरण करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए।

  2. भावनाएँ।

  3. कर्म।

  4. कारण।

  5. तर्क।

वास्तव में 'कारणों' का अध्ययन प्रकृतिशास्त्र के अंतर्गत आता है और 'तर्कों' का अध्ययन तर्कशास्त्र के अंतर्गत।किओस के अरिस्टो का मत था कि प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र न केवल अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने नीतिशास्त्र का भी संकुचन कर दिया जबकि वही एकमात्र भाग था जिसे उन्होंने स्वीकार किया था। उन्होंने उपदेश और नैतिक परामर्श से संबंधित विषय को भी हटाते हुए कहा कि यह कार्य किसी विद्यालय के शिक्षक का है। दार्शनिक का नहीं, मानो दार्शनिक मानवता का शिक्षक ही न हो! 

    चूँकि दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। इसलिए हम उसके नीतिशास्त्र (एथिक्स) से आरम्भ करें। परंपरागत रूप से नीतिशास्त्र को तीन शाखाओं में विभाजित किया जाता है। पहली शाखा प्रत्येक वस्तु का उचित मूल्य निर्धारित करती है और यह निर्णय करती है कि उसका वास्तविक महत्व कितना है। यह अत्यंत उपयोगी अध्ययन है क्योंकि वस्तुओं का सही मूल्यांकन करने से अधिक आवश्यक और क्या हो सकता है? दूसरी शाखा मनुष्य की प्रवृत्तियों और इच्छाओं (आवेगों) का अध्ययन करती है। तीसरी शाखा कर्मों का अध्ययन करती है। अर्थात नीतिशास्त्र का उद्देश्य यह है कि—

  1. सबसे पहले, तुम यह सही ढंग से निर्णय कर सको कि प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य क्या है।

  2. दूसरे, उन वस्तुओं के प्रति तुम्हारी इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ संतुलित, संयमित और विवेकपूर्ण हों।

  3. तीसरे, तुम्हारी इच्छाओं तथा तुम्हारे कर्मों में पूर्ण सामंजस्य हो ताकि तुम्हारे समस्त आचरण में एकरूपता, स्थिरता और संगति बनी रहे।

यही वह अवस्था है जिसमें मनुष्य जैसा उचित समझता है, वैसा ही चाहता है और जैसा चाहता है, वैसा ही करता भी है। यही नैतिक जीवन की पूर्णता है।

    इन तीनों क्षेत्रों में से किसी एक में भी दोष आ जाए तो उसका प्रभाव शेष दोनों पर भी पड़ता है। यदि तुमने सभी वस्तुओं का सही मूल्यांकन कर लिया हो, लेकिन तुम्हारी इच्छाएँ और आवेग असंयमित हों तो उस ज्ञान का क्या लाभ? यदि तुमने अपनी इच्छाओं को वश में कर लिया हो तथा अपनी कामनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो, लेकिन कर्म करते समय परिस्थितियों की समझ न हो, और यह न जानते हो कि किस समय, किस स्थान पर और किस प्रकार कार्य करना उचित है तो उससे भी क्या लाभ? वस्तुओं का मूल्य और महत्व समझना एक बात है। समय की माँग को समझना दूसरी बात है और अपनी इच्छाओं को संयमित रखते हुए बिना उतावलेपन के उचित कर्म करना उससे भी भिन्न बात है। जीवन तभी अपने भीतर पूर्ण सामंजस्य प्राप्त करता है, जब कर्म, इच्छा से पीछे न रह जाए और इच्छा भी प्रत्येक वस्तु के वास्तविक मूल्य के आधार पर उत्पन्न हो तथा उसकी तीव्रता भी उसी वस्तु के महत्व के अनुरूप हो। 

    दर्शनशास्त्र का प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) दो उपभागों में विभाजित किया जाता है— साकार (शारीरिक) वस्तुएँ और निराकार (अशारीरिक) वस्तुएँ। इन दोनों के भी अपने-अपने स्तर या विभाग हैं। साकार वस्तुओं का अध्ययन मुख्यतः दो वर्गों में किया जाता है—

  1. वे वस्तुएँ जो कारण (कारक) हैं।

  2. वे वस्तुएँ जो कारणों से उत्पन्न होती हैं अर्थात तत्त्व (एलिमेंट्स)।

जहाँ तक तत्त्वों का प्रश्न है, कुछ दार्शनिकों के अनुसार उनका कोई और विभाजन नहीं है। किन्तु अन्य विचारक उन्हें तीन भागों में बाँटते हैं—

  • पदार्थ (मैटर),

  • वह सक्रिय कारण (क्रियाशील सिद्धांत) जो समस्त वस्तुओं को गति और कार्यशीलता प्रदान करता है,

तत्त्व (एलिमेंट्स) स्वयं। 

पहले प्रकार को तकनीकी भाषा में वाक्पटुता (रेटोरिक) कहा जाता है, और दूसरे को द्वंद्वात्मक तर्क (डायलेक्टिक)

वाक्पटुता का संबंध भाषा की अभिव्यक्ति, विचारों और उनकी सुव्यवस्थित प्रस्तुति से है। द्वंद्वात्मक तर्क दो भागों में विभाजित होता है, शब्दों का अध्ययन और अर्थों का अध्ययन अर्थात एक ओर वे बातें जो कही जाती हैं। दूसरी ओर वे शब्द या कथन जिनके माध्यम से वे बातें व्यक्त की जाती हैं।

इसके बाद इन दोनों विषयों के भी अत्यंत विस्तृत उपविभाग हैं। किन्तु इस समय मैं अपनी सूची को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ और केवल 'मुख्य बिंदुओं का स्पर्श' भर करूँगा। अन्यथा यदि मैं इन विभाजनों को इसी प्रकार विस्तार से बताने लगूँ तो यह पत्र एक साधारण संवाद न रहकर एक तकनीकी ग्रंथ बन जाएगा। अब मेरे लिए दर्शनशास्त्र के तर्कशास्त्र (लॉजिक) का विभाजन करना शेष रह जाता है। समस्त वाक्-विनिमय (विमर्श) दो प्रकार का होता है या तो वह निरंतर प्रवाह के रूप में होता है अथवा प्रश्न और उत्तर के रूप में विभाजित होता है। इन विषयों का अध्ययन तुम स्वयं भी कर सकते हो, प्रिय ल्यूसीलियस। मेरा उद्देश्य तुम्हें उनसे विमुख करना नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसे तुरंत अपने आचरण से जोड़ो। 

    अपने चरित्र को अनुशासित करो। अपने भीतर जो गुण शिथिल पड़ गए हैं, उन्हें जागृत करो। जो प्रवृत्तियाँ आवश्यकता से अधिक उन्मुक्त हो गई हैं, उन्हें संयमित करो। जो विद्रोही हैं, उन्हें वश में लाओ। अपने भीतर की वासनाओं पर प्रहार करने में कोई कसर न छोड़ो, और जहाँ तक संभव हो, संसार में व्याप्त दोषों और विकारों का भी प्रतिरोध करो। जो लोग तुमसे कहते हैं, "क्या तुम कभी रुकने वाले नहीं हो?", उन्हें यह उत्तर दो— "तुम्हें तो मुझसे यह पूछना चाहिए। 'तुम अपनी भूलों को दोहराना कब बंद करोगे?' क्या तुम चाहते हो कि रोग से पहले ही उसका उपचार समाप्त हो जाए? मैं तो इस विषय पर और भी अधिक बोलूँगा और तुम्हारे विरोध के कारण ही इसे और दृढ़ता से करता रहूँगा। जिस प्रकार सुन्न पड़ चुके अंग पर लगाई गई औषधि तभी प्रभाव दिखाने लगती है, जब उसके स्पर्श से पीड़ा का अनुभव होने लगे, उसी प्रकार मेरी बातें भी तुम्हारे लिए लाभकारी होंगी। चाहे तुम्हें वे अच्छी लगें या नहीं। अब समय आ गया है कि एक निर्भीक और निष्कपट स्वर तुम्हारे कानों तक पहुँचे। जब मैं तुममें से प्रत्येक को अलग-अलग समझाने में सफल नहीं हो सकता, तब मैं तुम सबको एक साथ, सार्वजनिक रूप से संबोधित करूँगा।"
    "तुम अपनी संपत्ति की सीमाएँ बढ़ाना आखिर कब बंद करोगे? जो भूमि कभी एक पूरे राष्ट्र के लिए पर्याप्त थी, क्या वह अब एक अकेले स्वामी के लिए भी छोटी पड़ गई है? तुम अपने विशाल कृषि-भूखंडों का विस्तार कब तक करते रहोगे? तुम्हें तो इतना भी पर्याप्त नहीं लगता कि तुम्हारी निजी जागीरें पूरे-पूरे प्रांतों के बराबर फैली हों। प्रसिद्ध नदियाँ पूरी की पूरी तुम्हारी निजी संपत्ति के बीच से बहती हैं। वे महान नदियाँ, जो कभी शक्तिशाली राष्ट्रों की सीमाएँ निर्धारित करती थीं, अपने उद्गम से लेकर समुद्र में मिलने तक तुम्हारे अधिकार में हैं। फिर भी तुम्हें यह सब कम लगता है, यदि तुम्हारी ज़मीन समुद्रों तक न पहुँच जाए। यदि तुम्हारा प्रबंधक एड्रियाटिक, आयोनियन और एजियन समुद्रों के पार तक आदेश न दे। यदि वे द्वीप, जो कभी महान शासकों के निवास रहे थे, तुम्हें तुच्छ संपत्ति न प्रतीत हों। जितना चाहे अपनी संपत्ति का विस्तार कर लो। जिसे कभी एक साम्राज्य कहा जाता था, उसे अपनी निजी जागीर बना लो। जितना कुछ अपने अधिकार में ले सकते हो, ले लो। फिर भी दूसरों की संपत्ति तुम्हारी संपत्ति से अधिक ही रहेगी।"
    "अब मैं तुम लोगों से भी संबोधित होता हूँ, जिनका भोग-विलास उतना ही असीम है जितना उन दूसरे लोगों का लोभ। मैं तुमसे पूछता हूँ, यह सब आखिर कब तक चलता रहेगा? हर झील के किनारे तुम्हारी अट्टालिकाएँ खड़ी हैं। हर नदी के तट पर तुम्हारी इमारतें फैली हुई हैं। जहाँ कहीं भी गर्म जल के स्रोत फूटते हैं, वहीं तुम नए विलास-भवन बनाना शुरू कर देते हो। जहाँ भी समुद्र का किनारा किसी खाड़ी का रूप लेता है, तुम तुरंत उसकी भूमि पर नींव डाल देते हो। जिस भूमि को तुमने अपनी इच्छा के अनुसार बदल न दिया हो, उससे तुम्हें संतोष नहीं होता। यहाँ तक कि तुम समुद्र को भी अपनी भूमि के भीतर खींच लाते हो। तुम्हारे भवन हर ओर चमकते दिखाई देते हैं। कहीं वे पर्वतों की चोटियों पर इसलिए बनाए जाते हैं कि वहाँ से धरती और समुद्र का विशाल दृश्य दिखाई दे, तो कहीं समतल भूमि पर उन्हें पर्वतों जितना ऊँचा खड़ा कर दिया जाता है। किन्तु इतने विशाल और भव्य निर्माण कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास रहने के लिए केवल एक ही शरीर है और वह भी अत्यंत छोटा और दुर्बल। इतने अधिक शयनकक्षों का क्या लाभ? तुम एक समय में केवल एक ही कमरे में सो सकते हो। जिस स्थान पर तुम स्वयं रहते ही नहीं, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं है।"
    "और अंत में, मैं तुम लोगों से भी कहता हूँ जिनकी अतृप्त और असीम भोग-लालसा स्वादिष्ट भोजन की खोज में समुद्रों और धरती को छान मारती है। कभी काँटों से, कभी फंदों से और कभी तरह-तरह के जालों से। जब तक तुम उनसे ऊब नहीं जाते, तब तक किसी भी जीव को चैन नहीं मिलता। इतने लोगों की मेहनत से जुटाए गए तुम्हारे इन भव्य भोजों में से तुम अपने सुख-भोग से थके हुए मुँह से कितना ही थोड़ा-सा चखते हो! इतने जोखिम उठाकर पकड़े गए उस शिकार में से अपच और मतली से पीड़ित स्वामी कितना ही थोड़ा-सा खा पाता है! इतनी दूर-दूर से मँगाए गए उन असंख्य शंख-सीपों और समुद्री व्यंजनों में से तुम्हारे इस अतृप्त पेट में वास्तव में कितना ही थोड़ा-सा पहुँचता है! अभागे लोगो! क्या तुम्हें यह भी समझ में नहीं आता कि तुम्हारी भूख तुम्हारे पेट से कहीं अधिक बड़ी है?"
    यह सब दूसरों से कहो, पर इस भावना के साथ कि बोलते समय तुम स्वयं भी उसे सुन रहे हो। इसे लिखो पर इस उद्देश्य से कि लिखते समय तुम स्वयं उसे पढ़ भी रहे हो और जो कुछ लिखो उसे अपने आचरण तथा अपनी उन्मत्त वासनाओं के शमन से जोड़ो। अपने अध्ययन का लक्ष्य अधिक जानना नहीं बल्कि बेहतर ढंग से जानना बनाओ।

अभी के लिए विदा 

जीवन के मूल्य के बारे में -- पत्र - 91

 प्रिय लूसीलियस  तुमने दार्शनिक मेट्रोनैक्स की मृत्यु पर मुझे जो पत्र लिखा, उसमें व्यक्त शोक से ऐसा प्रतीत हुआ कि तुम्हारा मानना था कि वह कु...