Friday, 12 June 2026

सच्ची और झूठी मैत्री के संदर्भ में -- (पत्र - 3)

प्रिय लूसीलियस,

तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेतावनी देते हो कि मैं उससे उन बातों की चर्चा न करूँ जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हैं, यह कहते हुए कि तुम स्वयं भी उसके साथ ऐसी बातें साझा करने के अभ्यस्त नहीं हो। दूसरे शब्दों में, उसी पत्र में तुमने उसे अपना मित्र भी कहा और मित्र नहीं भी माना।

यदि तुमने 'मित्र' शब्द का प्रयोग सामान्य लोगों की तरह किया है, जैसे हम चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को 'माननीय सज्जन' कह देते हैं या रास्ते में मिलने वाले किसी व्यक्ति का नाम भूल जाने पर उसे 'आदरणीय महोदय' कहकर संबोधित करते हैं, तो ठीक है। लेकिन यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को मित्र मानते हो जिस पर तुम्हें उतना विश्वास नहीं जितना स्वयं पर है तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो और सच्ची मित्रता का अर्थ पर्याप्त रूप से नहीं समझते।

वास्तव में, मैं चाहता हूँ कि तुम अपने मित्र के साथ हर बात साझा करो; लेकिन सबसे पहले उस व्यक्ति को परखो। जब मित्रता स्थापित हो जाए तब पूरा यकीन करो; लेकिन मैत्री स्थापित करने से पहले उसका मूल्यांकन अवश्य करो। जो लोग पहले मित्र बना लेते हैं और बाद में उसका परीक्षण करते हैं, वे अपने कर्तव्यों को उलट देते हैं और भ्रमित कर देते हैं। वे थियोफ्रेस्टस के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं जिन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को परखकर ही उसे मित्र बनाना चाहिए न कि मित्र बनाने के बाद उसकी परीक्षा करनी चाहिए। लंबे समय तक विचार करो कि किसी व्यक्ति को अपना दोस्त बनाना अथवा या नहीं। लेकिन जब एक बार उसे स्वीकार करने का निर्णय कर लो तब उसे पूरे हृदय और आत्मा से अपनाओ। उसके साथ उतनी ही निर्भीकता से बात करो जितनी तुम स्वयं से करते हो।


                                                               New Fairy Tale by Belsky

जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि तुम्हारे पास ऐसा कोई राज़ न हो जिसे तुम अपने शत्रु को भी न बता सको। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें सामाजिक परंपरा गोपनीय रखती है इसलिए तुम्हें कम-से-कम अपनी चिंताओं और विचारों को अपने मित्र के साथ अवश्य साझा करना चाहिए। उस पर यकीन करो और तुम देखोगे कि वह निष्ठावान व्यक्ति में परिवर्तित हो रहा है।  

कुछ लोग धोखा खाने के भय से दूसरों को धोखा देना सिखा देते हैं। अपनी शंकाओं के कारण वे अपने मित्र को गलत करने का अवसर दे देते हैं। मेरे मित्र की उपस्थिति में मैं कोई बात क्यों छिपाऊँ? उसके साथ रहते हुए मैं स्वयं को अकेला क्यों समझूँ?

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जिनसे भी मिलते हैं उन्हें वे बातें बता देते हैं जो केवल मित्रों को ही बताई जानी चाहिए। वे अपनी हर परेशानी किसी भी आकस्मिक श्रोता पर उँडेल देते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग अपने सबसे निकट के लोगों पर भी विश्वास करने से डरते हैं और यदि संभव हो तो वे स्वयं पर भी विश्वास न करें, अपने रहस्यों को हृदय की गहराइयों में दबाकर रखते हैं। लेकिन हमें इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। हर किसी पर विश्वास करना भी दोष है और किसी पर विश्वास न करना भी। फिर भी मैं कहूँगा कि पहला दोष अधिक सरल और निष्कपट है जबकि दूसरा अधिक सुरक्षित।

इसी प्रकार तुम्हें दो प्रकार के लोगों को फटकारना चाहिए। एक वे जो कभी शांत नहीं बैठते और दूसरे वे जो हमेशा निष्क्रिय बने रहते हैं। अत्यधिक व्यस्तता से प्रेम करना परिश्रम नहीं है। यह केवल एक बेचैन और चिंतित मन की अस्थिरता है। और सच्चा आराम भी हर प्रकार की गतिविधि को कष्ट मानकर उससे दूर भागने में नहीं है। ऐसा आराम तो केवल आलस्य और जड़ता है।

इसलिए तुम्हें मेरे अध्ययन में पढ़ी हुई पोम्पोनियस की यह उक्ति याद रखनी चाहिए। "कुछ लोग इतने अँधेरे कोनों में सिमट जाते हैं कि वे दिन के उजाले में भी अंधकार ही देखते हैं।"

नहीं, मनुष्य को इन दोनों प्रवृत्तियों का समन्वय करना चाहिए। जो आराम करता है उसे काम भी करना चाहिए और जो काम करता है उसे आराम भी करना चाहिए।

इस विषय पर प्रकृति से परामर्श करो।  वह तुम्हें बताएगी कि उसने दिन और रात दोनों की रचना की है।

अभी के लिए विदा।

Thursday, 11 June 2026

पठन और मन की छिटकती एकाग्रता के संदर्भ में -- (पत्र 2)


प्रिय लूसीलियस,

तुम मुझे जो लिखते हो और जो मैं सुनता हूँ, उसके आधार पर मैं तुम्हारे भविष्य के बारे में अच्छी राय बना रहा हूँ। तुम इधर-उधर नहीं भटकते और न ही बार-बार अपना निवास स्थान बदलकर स्वयं को विचलित करते हो; क्योंकि ऐसी बेचैनी एक अव्यवस्थित मन का संकेत है। मेरे विचार में, एक सुव्यवस्थित मन की पहली पहचान यह है कि व्यक्ति एक ही स्थान पर रह सके और अपने ही साथ समय बिता सके।

फिर भी सावधान रहो कि अनेक प्रकार के लेखकों और पुस्तकों का अध्ययन तुम्हें चंचल और अस्थिर न बना दे। यदि तुम ऐसे विचार प्राप्त करना चाहते हो जो तुम्हारे मन में दृढ़ता से स्थापित हो जाएँ तो तुम्हें कुछ चुनिंदा महान विचारकों के साथ टिककर रहना चाहिए और उनके कार्यों को अच्छी तरह आत्मसात करना चाहिए। जो व्यक्ति हर जगह होता है, वह वास्तव में कहीं भी नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति अपना सारा समय विदेश यात्राओं में बिताता है तो उसके बहुत-से परिचित तो बन जाते हैं पर मित्र नहीं बनते। ठीक ऐसा उन लोगों के साथ भी होता है जो किसी एक लेखक से गहरा परिचय स्थापित नहीं करते बल्कि सबके पास जल्दी-जल्दी और सतही रूप से जाते रहते हैं।


                                    Keats’ last moments in 1821, Joseph Severn

भोजन तब तक शरीर को लाभ नहीं पहुँचाता और न ही उसका अंग बनता है, जब तक वह पेट में ठहरकर पच न जाए। बार-बार दवा बदलने से रोग का उपचार बाधित होता है। बार-बार नई दवा लगाने से घाव नहीं भरता। यदि किसी पौधे को बार-बार उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, तब वह कभी मजबूत पेड़ में तब्दील नहीं हो सकता।

कोई भी वस्तु इतनी प्रभावशाली नहीं होती कि लगातार इधर-उधर किए जाने पर भी लाभ पहुँचा सके। इसी प्रकार बहुत-सी पुस्तकों का अध्ययन मन को बिखेर देता है। क्योंकि तुम अपनी सभी पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते इसलिए उतनी ही पुस्तक रखो जितनी तुम वास्तव में पढ़ सकते हो।

पर तुम कहोगे, "मैं पहले एक पुस्तक को थोड़ा-सा पढ़ना चाहता हूँ और फिर दूसरी को।" मैं कहता हूँ कि यह अत्यधिक अच्छी वाली भूख का लक्षण है जो अनेक प्रकार के व्यंजनों का स्वाद तो लेना चाहती है पर उनसे पोषण नहीं पाती। अलग-अलग तरह का अत्यधिक भोजन तृप्त नहीं करता बल्कि ऊब उत्पन्न करता है।

इसलिए तुम्हें हमेशा बेहतरीन लेखकों को पढ़ना चाहिए और जब बदलाव का मन हो तो उन्हीं लेखकों की ओर लौटना चाहिए जिन्हें तुम पहले पढ़ चुके हो। हर दिन कुछ ऐसा सीखो या जानो जो तुम्हें गरीबी, मृत्यु और अन्य दुर्भाग्यों का सामना करने के लिए मजबूत बनाए... और जब तुम अनेक विचारों को देख-पढ़ लो तब उनमें से एक विचार चुनो और उस दिन उसे पूरी तरह आत्मसात करो।

यह मेरी अपनी आदत है; जो अनेक बातें मैं पढ़ता हूँ, उनमें से किसी एक को मैं अपना बना लेता हूँ।

आज का विचार मुझे एपिक्यूरस से मिला है क्योंकि मैं कभी-कभी शत्रु के शिविर में भी जाता हूँ। एक भगोड़े की तरह नहीं बल्कि एक टोह लेने वाले व्यक्ति की तरह।

एपिक्यूरस कहता है: "संतोषपूर्ण गरीबी एक सम्मानजनक अवस्था है।"

वास्तव में यदि गरीबी में संतोष है तो वह किसी भी तरह से गरीबी नहीं रह जाती। गरीब वह नहीं है जिसके पास बहुत कम है बल्कि वह है जो और अधिक पाने की लालसा करता रहता है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने अपनी तिजोरी या गोदाम में कितना धन जमा किया है, उसके पास कितने पशु हैं अथवा वह कितना मुनाफा प्राप्त करता है इसके बाद भी यदि वह अपने पड़ोसी की संपत्ति पर नज़र रखता है और अपने पिछले लाभों के बजाय भविष्य में मिलने वाले लाभों की ही गणना करता रहता है? यदि तुम पूछो कि धन की उचित सीमा क्या है तो उसका उत्तर यह है कि सबसे पहले जरूरत के सामान या वस्तुओं की प्राप्ति और दूसरा उतना ही रखना जितना पर्याप्त है।   

अभी के लिए विदा
सेनेका 

On Discursiveness in Reading

 Judging by what you write me, and by what I hear, I am forming a good opinion regarding your future. You do not run hither and thither and distract yourself by changing your abode; for such restlessness is the sign of a disordered spirit. The primary indication, to my thinking, of a well-ordered mind is a man's ability to remain in one place and linger in his own company.

 Be careful, however, lest this reading of many authors and books of every sort may tend to make you discursive and unsteady. You must linger among a limited number of master thinkers, and digest their works, if you would derive ideas which shall win firm hold in your mind. Everywhere means nowhere. When a person spends all his time in foreign travel, he ends by having many acquaintances, but no friends. And the same thing must hold true of men who seek intimate acquaintance with no single author, but visit them all in a hasty and hurried manner.

 Food does no good and is not assimilated into the body if it leaves the stomach as soon as it is eaten; nothing hinders a cure so much as frequent change of medicine; no wound will heal when one salve is tried after another; a plant which is often moved can never grow strong.

There is nothing so efficacious that it can be helpful while it is being shifted about. And in reading of many books is distraction.

Accordingly, since you cannot read all the books which you may possess, it is enough to possess only as many books as you can read.

"But," you reply, "I wish to dip first into one book and then into another." I tell you that it is the sign of an overnice appetite to toy with many dishes: for when they are manifold and varied, they cloy but do not nourish. So you should always read standard authors; and when you crave a change, fall back upon those whom you read before. Each day acquire something that will fortify you against poverty, against death, indeed against other misfortunes as well; and after you have run over many thoughts, select one to be thoroughly digested that day.

This is my own custom; from the many things which I have read, claim some one part for myself.

The thought for today is one which I discovered in Epicurus; for I am wont to cross over even into the enemy's camp – not as a deserter but as a scout.

He says: "Contented poverty is an honourable estate." Indeed, if it be contented, it is not poverty at all. It is not the man who has too little but the man who craves more, that is poor. What does it matter how much a man has laid up in his safe, or in his warehouse, how large are his flocks and how fat his dividends, if he covets his neighbour's property, and reckons, not his past gains, but his hopes of gains to come? Do you ask what is the proper limit to wealth? It is, first, to have what is necessary, and, second, to have what is enough.

Farewell.

 

 

 

 

Wednesday, 10 June 2026

सेनेका का अपने मित्र लूसीलियस को लिखा पत्र -- समय के संदर्भ में (पत्र-1)

 प्रिय लूसीलियस,

जैसा तुम कर रहे हो, वैसा ही करते रहो—अपने हित के लिए स्वयं को मुक्त करो। अपने समय को इकट्ठा करो और बचाकर रखो क्योंकि अब तक वह या तो तुमसे छीन लिया गया है, या चोरी हो गया है, या फिर तुम्हारे हाथों से यूँ ही फिसल गया है। मेरी बात पर विश्वास करो कि कुछ पल हमसे जबरदस्ती छीन लिए जाते हैं, कुछ धीरे-धीरे हमसे दूर कर दिए जाते हैं और कुछ हमारी पहुँच से बाहर निकल जाते हैं। परंतु सबसे शर्मनाक नुकसान वह है जो हमारी लापरवाही के कारण होता है। यदि तुम इस बात पर ध्यान से विचार करोगे तो पाओगे कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा उस समय बीत रहा होता है जब हम बुरा कर रहे होते हैं, एक अच्छा-खासा हिस्सा कुछ भी न करने में चला जाता है। यह उन कामों में जाता है जो वास्तव में उद्देश्यपूर्ण नहीं होते।

मुझे ऐसा कौन-सा व्यक्ति दिखा सकते हो जो अपने वक़्त की कीमत समझता हो...  जो हर दिन की कीमत का अनुमान लगाता हो... जो यह जानता हो कि वह प्रतिदिन मर रहा है? हम मृत्यु को लेकर भ्रम में रहते हैं क्योंकि हम उसे भविष्य की घटना समझते हैं जबकि मृत्यु का बड़ा हिस्सा तो पहले ही बीत चुका है। हमारे जीवन के जो साल पीछे छूट गए हैं, वे मृत्यु के दायरे में जा चुके हैं।



इसलिए, लूसीलियस, जैसा तुम अपने पत्र में लिखते हो, वैसा ही करो—हर घंटे को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ो। आज के कार्य को आज ही पूरा करो, तब तुम्हें कल पर इतना निर्भर नहीं रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम जानते हो? जब तक हम जीवन को टालते रहते हैं, जीवन तेजी से आगे निकलता जाता है।

लूसीलियस, समय के अलावा में हमारा कुछ भी नहीं है। प्रकृति ने हमें केवल इसी एक वस्तु का स्वामित्व सौंपा है—जो इतनया क्षणभंगुर और फिसलनभरा (रेत की तरह हाथों से फिसलने वाला) है कि कोई भी व्यक्ति हमें इससे वंचित कर सकता है। कितने मूर्ख हैं ये मनुष्य! वे सस्ती और तुच्छ वस्तुओं का हिसाब रखते हैं जिन्हें आसानी से फिर से पाया जा सकता है; लेकिन जब उन्हें समय जैसी अमूल्य संपत्ति मिलती है तब वे कभी स्वयं को उसका कर्जदार नहीं मानते। जबकि समय ऐसा कर्जा है जिसे सबसे कृतज्ञ व्यक्ति भी कभी चुका नहीं सकता।

तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं, जो तुम्हें इतनी स्वतंत्रता से उपदेश देता हूँ, स्वयं इसका पालन कैसे करता हूँ। मैं दिल से स्वीकारता हूँ कि मेरा हिसाब-किताब संतुलित है, जैसा किसी उदार लेकिन सावधान व्यक्ति का होना चाहिए। मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैं कुछ भी व्यर्थ नहीं करता लेकिन मैं कम से कम यह बता सकता हूँ कि मैं क्या बर्बाद कर रहा हूँ, इसका कारण और मैं किस तरीके से कर रहा हूँ।  मैं यह भी बता सकता हूँ कि मैं गरीब क्यों हूँ। हालाँकि मेरी स्थिति उन बहुत-से लोगों जैसी है जो अपनी गलती के बिना ही तंगहाली में पहुँच जाते हैं। सब लोग उन्हें माफ तो कर देते हैं पर उन्हें बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता।

तो फिर स्थिति क्या है? स्थिति यह है कि मैं किसी व्यक्ति को गरीब नहीं मानता, यदि उसके पास बचा हुआ थोड़ा-सा भी उसके लिए काफी है। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि जो वास्तव में तुम्हारा है, उसे सुरक्षित रखो और तुम इसकी शुरुआत जल्दी नहीं कर सकते। जैसा हमारे पूर्वज मानते थे, जब पीपे के तल तक पहुँच जाओ, तब बचत शुरू करना बहुत देर हो चुकी होती है। तल में जो बचता है, वह मात्रा में तो कम होता ही है और गुणवत्ता में भी खराब होता है।

अभी के लिए विदा

सेनेका  


(मूल पत्र जो पेंग्विन क्लासिक्स में प्रकाशित है।)  

                                                      On Saving Time

 

Greetings from Seneca to his friend, Lucilius.

 

Continue to act thus, my dear Lucilius – set yourself free for your own sake; gather and save your time, which till lately has been forced from you, or filched away, or has merely slipped from your hands. Make yourself believe the truth of my words that certain moments are torn from us, that some are gently removed, and that others glide beyond our reach. The most disgraceful kind of loss, however, is that due to carelessness. Furthermore, if you will pay close heed to the problem, you will find that the largest portion of our life passes while we are doing ill, a goodly share while we are doing nothing, and the whole while we are doing that which is not to the purpose.

 

What man can you show me who places any value on his time, who reckons the worth of each day, who understands that he is dying daily? For we are mistaken when we look forward to death; the major portion of death has already passed. Whatever years be behind us are in death's hands.

 

Therefore, Lucilius, do as you write me that you are doing: hold every hour in your grasp. Lay hold of today's task, and you will not need to depend so much upon tomorrow's. While we are postponing life speeds by.

 

Nothing, Lucilius, is ours, except time. We were entrusted by nature with the ownership of this single thing, so fleeting and slippery that anyone who will can oust us from possession. What fools these mortals be! They allow the cheapest and most useless things, which can easily be replaced, to be charged in the reckoning, after they have acquired them; but they never regard themselves as in debt when they have received some of that precious commodity-time! And yet time is the one loan which even a grateful recipient cannot repay.

 

You may desire to know how I, who preach to you so freely, am practicing. I confess frankly: my expense account balances, as you would expect from one who is free-handed but careful. I cannot boast that I waste nothing, but I can at least tell you what I am wasting, and the cause and manner of the loss; I can give you the reasons why I am a poor man. My situation, however, is the same as that of many who are reduced to slender means through no fault of their own: every one forgives them, but no one comes to their rescue.

 

What is the state of things, then? It is this: I do not regard a man as poor, if the little which remains is enough for him. I advise you, however, to keep what is really yours; and you cannot begin too early. For, as our ancestors believed, it is too late to spare when you reach the dregs of the cask. Of that which remains at the bottom, the amount is slight, and the quality is vile. Farewell.

Tuesday, 9 June 2026

एक बुजुर्ग औरत की डायरी

 

उम्र तो दिमाग का तेल है। खामखां का फितूर है। फिर भी एक बात कहूँऔरतों को उम्र जल्दी छूती है। खुद औरतें भी अजीब हो जाती हैं उम्र को लेकर और जमाना तो सिर के ऊपर के पके बालों को सबसे पहले देखता है। जाने कैसे, कब यह सफ़ेद रंग चुभने-सा लगा था... याद नहीं! जब स्कूल में थी तब तो सरसों का तेल ही चुपटा रहता था। मैं आज की बात नहीं बता रही। तब की बात बता रही हूँ जब घरों में टीवी होना भी अचरज और अमीरी की निशानी हुआ करती थी। मैं तब के जमाने की ख़वातीन हूँ। आज भी अपने को जवान ही समझती हूँ। पचपन की हूँ तो भी क्या हुआ? दिल तो अब भी वही सोलह-सत्रह वाला है। और आज भी यह बहुत गुलाबी धड़कता है।



पर मेरे बेटे और नाती-पोते सभी मुझे यह बताने पर तुले रहते हैं कि मैं बहुत बूढ़ी हो गई हूँ। उनकी एक ही चाहत कि मैं मंतर-संतर का जाप करूँ या फिर मोती मनका फेरूँ। कभी जो मेरे लिए कपड़े लाते हैं तब अधिकतर कपड़ों का रंग सफ़ेद या बुझा हुआ-सा रहता है। कसम खाकर कहती हूँ। मुझे वे रंग तनिक भी नहीं भाते। उनका बाप मरा हैमैं तो ज़िंदा हूँ। ये आधुनिक जमाने के लोग भले ही अपने आप को नए जमाने के लोग बोले पर अपनी माँ के नाम पर ये निहायती मूढ़ हैं। विधवा पति ने बनाया... रस्म ने बनाया पर एहसास तो इन बच्चों ने कराया जो खूब पढ़े-लिखे हैं। उन्हें आज भी बुढ़िया या बुढ़ापे की सभी रस्में याद हैं। मुझे बहुत खीझ बढ़ने लगी है इन पर।

जनवरी 20..

शुक्र है कि मुझे पढ़ने और थोड़ा बहुत कलम चलाने का शौक है वरना ये बहुएँ मुझसे अपने बच्चे ही संभालवाती रहतीं। मुझे बच्चों से प्यार है पर दूर से। कम उम्र में माँ बन गई थी... ज़बर्दस्ती का मातृत्व उठाया और सबके आगे अच्छी बनी रही। पर सच कहूँमुझे हमेशा से ही उड़ान पसंद थी। आज पैरों में दर्द नहीं है। मन कर रहा है छत पर टहल आऊँ। अभी 12 बज रहे हैं। सर्दी के दिन चढ़े हैं पर मुझे अच्छे लगते हैं।

जनवरी 20..

उस दिन मैं जरा देर छत पर टहलने क्या चली गईछोटी वाली ने अगले दिन सभी के सामने ड्रामा रच दिया। कहती है, “अम्मा आपकी उम्र हो रही है। ऐसे में आप ध्यान रखा करो। कहीं तबीयत खराब हो गई तब हम आपको कहाँ-कहाँ लेकर फिरते रहेंगे! धूप में जाया कीजिए और आराम से बैठा कीजिए ...दिन में! लेकिन इतनी रात में छत पर क्या करने गई थीं आप?” उसके कहने भर की देर थी। सब आँखों से ही मुझे उलाहना देने लगे। मैंने यह महसूस किया कि मेरी तबीयत की फिक्र किसी को नहीं थी। न कभी होती है। इनको दिन-रात बस यही खयाल रहता है कि मैं कब मरूँ! अब बताओ मौत की भी कहीं दुआ में माँगी जाती हैपर ये सब लोग माँगते हैं! हाय! मेरे बच्चे...

14 जनवरी 20..

पुस्तक मेला लगा था। मैंने कई रोज़ पहले ही चलने की इच्छा घर में जता दी थी। तब भी बहू ने टोक दिया था, “आप क्या करेंगी चलकर... थक जाएँगी!” मैंने भी गुस्से में कहा था, “तुम क्या करोगी जाकरतुम किताबें तो पढ़ती नहीं हो।” गुस्से में मुझे सब छोड़कर चले गए थे। पर क्या मैं अनाथ हूँ... जिनके खुद के हाथ वो काहे का अनाथ। इतनी पेंशन मिलती है कि मैं अच्छे से जी सकती हूँ और किताब भी खरीद सकती हूँ!

 

16 जनवरी 20..     

सच में! किताबों के मेले हमेशा लगे रहने चाहिए। हर दिनहर पल। वहाँ दर्द का पता नहीं चलता। किताब मरहम की तरह लगती है। मुझे याद नहीं कब से मुझे किताब पढ़ने का शौक़ चढ़ा! इनको भी तो मेरी ये आदत अच्छी लगती थी। किताब पढ़ने के बाद नींद भी अच्छी आती है। मुझे तो किताबें एक वजह देती हैं ज़िंदगी की। ख़ैरमैंने पुस्तक मेले में अपनी ही उम्र के पति- पत्नी देखे। पत्नी ने भूरी स्कर्टटी-शर्ट के साथ पहनी थी। बाल भी कितने अच्छे से कटे हुए थे। सोच रही हूँ मैं भी कटवा ही लूँ। और स्कर्ट..सोच पर भी लगाम लगा रखी है जमाने ने... तहलका भी तो मच जाएगा। इस उम्र में स्कर्ट पहन रही हैं माँ और सासु माँ! उफ़्फ़... जीने भी नहीं देते मन से!  

19 जनवरी 20..

आज सुबह एक सपना आया था। मैं रफ़्तार से कहीं भाग रही थी। हाँफ गई थीफिर भी कितनी तेज़ी से भाग रही थी। कभी कभी लगता है घर से बाहर सितारों तक एक दौड़ लगा आऊँ रफ़्तार के साथ। पर कहीं इस उम्र में हड्डियों का सुर्मा बन गया तो! आख़िर शरीर की भी तो अपनी सीमा है। पर दिल का तो कुछ नहींहाँ दिल तो बच्चे की तरह ही होता है।

14 फरवरी 20..

आज प्यार के दिन बेटे-बहू सब बच्चों के साथ मौज मनाने गए हैं। मैं यहाँ अकेले घर में पड़ी हूँ। वो लोग तो चाहते हैं कि मैं रामचरित मानस की चौपाई गा-गा कर मर जाऊँ। वो इंतज़ार कर रहे हैं कि कब मेरा दिल मुझे धोखा दे कर रूक जाए। पर क्यों रुकेगामुझे किसी बात का ग़म नहीं है। मैं तो खुश रहती हूँ। मुझे तो लगता है कि मेरे मन के अंदर कोई बैठकर किसी लड़की की तरह हँस रही है... खिलखिला रही है। कभी गाल लाल हो रहे हैं तो कभी मासूमियत अपना साया मुझ पर ओढ़ा रही है। मैं कल जाकर अपने मन से अपना प्यार का दिन मनाऊँगी। पर कहाँसोचना पड़ेगा।

19 फरवरी 20..

बूढ़े लोग या बूढ़ी औरत आख़िर क्यों नहीं प्यार का सोच सकतीदुनिया को क्यों आग लग जाती है? 15 को जैसे ही मैंने सुबह नहा-धोकर लाल साड़ी निकाली तो बातों के तीर मेरे सीने में जबरन धंसा दिए गए। इतनी लानत दी गई कि मेरा दिल भी रो गया। क्यों बूढ़ी जैसी सोच मैं सोच नहीं पाती...यही मेरा गुनाह है। हे भगवान...मैं क्या करूँ?

मार्च 20..

आह! क्या मौसम आया है...मैं खुश हूँबहुत! मेरी नज़र इस बहार को न लग जाए! एक गाना याद आ रहा है...आज मदहोश हुआ जाए रे ... मेरा मन ...मेरा मन! ...ये गीत गाने न होते तो मेरी ज़िंदगी एक बुझा हुआ दीया ही होती। मुझे तो हर पल गुनगुनाना पसंद है। खुश रहना इतना मुश्किल भी नहीं होता। लोगों को गीत गाना चाहिए। सुर की परवाह के बगैर।



जून 20..

मेरी डायरी जला दी गई। उनको लगता है विधवा और बूढ़ी जब मन का करे तो बदचलन मानी जाती है। उनके मुताबिक़ मैं बदचलन हूँ। खुद उनकी माँ बदचलन हैअगर वो ऐसा सोचते हैं तब मैं हूँ। चाहे जितनी डायरी जला दो। चाहे राख कर दो...मेरे मन को कभी न जला पाओगे। मुझे नहीं गाने तुम्हारे सड़े हुए भजन। मैं ज़िंदगी के गीत गाऊँगी। जब तक सांस चल रही हैतब तक मैं गाऊँगी। ...लो अब खुल्लम-खुल्ला डायरी सबके सामने रखी जाएगी। जो करना है करो...बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की डायरी। अब खुश?     

 ... जारी 

(पेंटिंग्स प्रिय सेराफिन की)


Friday, 30 May 2025

21 बरस की बाली उमर को सलाम, लेकिन

 


दो साल पहले प्रथम वर्ष में पढ़ने वाली लड़की से मेरी बातचीत बस में सफ़र के दौरान शुरू हुई थी। शाम को काम से थकी हारी वह मुझे बस स्टॉप पर मिलती थी और दुनिया जहान की बातें, बातों-बातों में बताया करती थी। उसकी बातों में दफ़्तर में मालिक को कोसने के अतिरिक्त घरेलू सदस्यों से भी शिकायतें थीं। हमारी सफ़र वाली दोस्ती थी। उसका विश्वास मुझ पर कुछ इस क़द्र था कि वह मुझे ‘दीदी’ कहकर पुकारने लगी थी। कुछ ही समय बाद, एक दिन वह शादीशुदा लड़की के वेश में मिली। मुझे हैरानी हुई। मैंने कहा- “शादी में बुलाया भी नहीं!” उसने कहा- “मेरी मर्ज़ी से नहीं हुई। अब शायद काम भी नहीं करुँगी।” हर तरह के श्रृंगार से सजी वह लड़की उदास चेहरे के साथ थी। उसकी उम्र 19 या 20 के बीच थी। बाद के सालों में सफ़र का रिश्ता सफ़र बनकर ही रह गया। मेरी मुलाक़ात उससे फिर कभी नहीं हुई।

भारतीय कानून के मुताबिक़ लड़कियों की विवाह की उम्र 18 साल है। यदि लड़की 18 वर्ष की है तो वह विवाह के योग्य मानी जाती है। अंटी-अंकल उर्फ़ माता-पिता बातचीत का क़रीब से विश्लेषण किया जाए तब कुछ ख़ास तरह की पंक्तियाँ सुनने को मिलती हैं। जैसे, हमारी लड़की की शादी हो जाए तो चिंता ख़त्म हो, ये तो पराया धन है, लड़कियाँ सिल की तरह हैं, जो छाती पर धरी रहती हैं, हम एक अच्छा-सा लड़का खोज रहे हैं, इसकी शादी के लिए बचत कर रहे हैं, आजकल ज़माना बहुत ख़राब है, इन्हें क्या आगे पढ़ाएँ, नौकरी थोड़ी करवानी है, अपने घर जाकर जो मर्ज़ी आए वो करना, हमने तो अपनी लड़की शादी जल्दी कर दी, अब हम चैन से हैं, जवान लड़की घर में पड़ी हो तो नींद कहाँ आती है, सिलाई वगैरह का कोर्स करवाना है, लड़कियों में घरेलू काम करने का हुनर होना चाहिए, आदि-आदि। ये सब आज भी मध्यम वर्गीय परिवारों में सुनने को मिल जाता है। इस तरह की पंक्तियाँ मोहल्ले से लेकर दफ़्तरों में मौज़ूद माताओं और पिताओं के मुँह से सुनी जा सकती है। इन पंक्तियों में एक नागरिक को उसके संपूर्ण व्यक्तित्व के लिहाज़ से न देखकर किसी वस्तु की तरह देखने के प्रयास है, क्योंकि वह एक स्त्री है। ये प्रयास एक दिन में तैयार नहीं हुए हैं। संस्कृतियों ने इन प्रयासों को और इस तरह के व्यवहारों को पोसा है। इक्कसवीं शताब्दी में आज भी बहुत से लोगों की सोच का दायरा कुएँ के पानी की तरह ही है। उसमें बदलाव की झलक नहीं है और यह बात परेशान करने वाली है। गाँव और शहर के बीच बँटे भारत में आज भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा गाँवों में रहता है और चुनौतियों का सामना कर रहा है।

हिंदी सिनेमा की यात्रा में महबूब खान द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) को जो प्रसिद्धि मिली उसे कौन नहीं जानता! क़िस्सों की दुनिया में कहा जाता है कि वास्तव में उस फ़िल्म का निर्माण कैथरीन मेयो द्वारा लिखी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ के जवाब के तौर पर किया था। इस पुस्तक का प्रकाशन सन् 1927 में हुआ था। पुस्तक में उन्होंने भारत में स्त्रियों की स्थिति पर गौर किया है। उस समय इस पुस्तक का काफी विरोध हुआ था। लेकिन इस पुस्तक के कुछ अंशों को झुठलाया नहीं जा सकता। पुस्तक के पहले भाग के अंतिम अध्याय में एक अस्पताल में भर्ती महिला मरीज़ों का वर्णन किया गया है। वे लिखती हैं कि डॉक्टर ने उन्हें एक हिंदू अधिकारी की पत्नी के बारे में बताया। इस महिला के पहले प्रसव में ही बच्चा जीवित नहीं रह सका था। इसलिए जब तीन दिन पहले उसके दूसरे प्रसव का दर्द शुरु हुआ तो उसका पति उसे अस्पताल ले आया था। महिला को दिल की बीमारी और दमे की शिकायत थी। उसकी एक टाँग में भी परेशानी थी। डॉक्टर ने टाँग का इलाज करके उस महिला का प्रसव कराया। जुड़वाँ बच्चे हुए, पर वे जीवित नहीं थे। अंदरूनी संक्रमण होने से कोख नष्ट हो गई। अब यह महिला दुबारा बच्चे को जन्म नहीं दे सकती। इस महिला की उम्र 13 वर्ष थी। इस महिला को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह अब माँ नहीं बन सकती वरना उसे सदमा लग सकता है.[1] ऐसे ही अन्य उदहारण पुस्तक में दिए गए हैं जिन्हें पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सरकारी दावों और आंकड़ों में वर्तमान में स्थिति को नियंत्रण में बताया जा रहा है। सरकारी आंकड़ें कहते हैं कि भारत में मातृ मृत्यु अनुपात (Maternal Mortality Ratio) गिर रहा है।[2] ये आंकड़ें वाकई में सुखद हैं पर ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि आज भी कई इलाक़ों में बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया दाई द्वारा घरों में ही संपन्न करवाई जाती है। सुविधाओं का न होना, महिलाओं की मृत्यु की वजह बन रहा है। अख़बारों में तो अस्पताल के बाहर ही जच्चगी हो जाने की ख़बरें भी प्रकाशित होती रहती हैं।        

कैथरीन मेयो की विदेशी आँखों के अनुभवों की भरपूर आलोचना हुई थी। पर इस बात से इंकार नहीं कि कम उम्र में विवाह के बाद एक लड़की को बहुत-सी मानसिक और शारीरिक परेशानी उठानी पड़ती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों में गौना नामक प्रथा का आज भी निर्वाह होता है। इस प्रथा के अंतर्गत लड़की का कम उम्र में विवाह होने के बाद गौना किया जाता है। उसके द्वारा एक निश्चित आयु प्राप्त करने के बाद ही उसे पति के साथ ‘विदा’[3] किया जाता है। इस प्रथा के बाद भी कम उम्र में विवाह के चलते लड़कियों को कई परेशानियों से गुज़रना पड़ता था। समय ने अपने भीतर स्त्रियों से जुड़े कई दर्दनाक अनुभवों को समेटकर रखा है। परंपरा और प्रथा के नाम पर उनके साथ सलूक के तौर पर की जाती रही कई दुखद रीतियाँ अब तक जारी हैं। साल 2019 में फरवरी के महीने नवभारत टाइम्स की मौज़ूदा ऑनलाइन ख़बर कहती है कि शहरों में बाल विवाह का औसत 6.9 फीसदी है और गाँवों में 14.1 फीसदी है।[4] बाल विवाह एक कड़वी सच्चाई अभी भी है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली में 10+2 की संरचना को भी गौर से देखना चाहिए। आज से काफी वर्ष पहले प्री-स्कूलिंग या नर्सरी कक्षाओं का बहुत चलन नहीं था। इसलिए विद्यालयों में दाख़िले पाँच वर्ष की आयु से लिए जाते थे। बारहवीं कक्षा को पास करते समय लड़की और लड़के की उम्र 17 से 18 वर्ष होती है। बारहवीं के बाद लड़के के लिए दुनिया के दरवाजे खुल जाते हैं, जिसमें कॉलेज जाना, किसी तरह का कोर्स करना, किसी अन्य परीक्षा की तैयारी करना, बड़े भाई या पुत्र की भूमिका में आना, परिवार में क़द के साथ हैसियत का बढ़ना भी अनुभव किया जा सकता है। यदि कोई लड़का कॉलेज में दाख़िला लेता है तब उसके पास पूरे तीन वर्ष मौज़ूद हैं जिसमें वह अपने करियर को एक आकार देता है और दुनियादारी की समझ विकसित करता है। लेकिन इसके विपरीत लड़कियों के संदर्भ में घोर पारिवारिक और सामाजिक बदलाव आता है। लड़कियों का बड़ा होना मतलब, ढेरों क़ायदों का बनकर तैयार होना है। इसके अलावा उन्हें निगरानी के भीतर भी रहना पड़ता है।   

अपने सामाजिक कार्य के दौरान एक लड़की जिसने बारहवीं कक्षा पास की थी, मुझसे मिलने आई। मैंने उसे शुभकामना दी और आगे की पढ़ाई के बारे में उससे जानना चाहा। उसने कहा- “नहीं... अब घरवाले शादी करेंगे!” मैंने हैरानी से कहा- “अभी तो तुम छोटी हो। शादी से ज़्यादा ज़रूरी कुछ बनना है।” इसके बाद उसका चेहरा उदास ही बना रहा। अगले दिन जब उसकी माँ मुझसे मिलने आईं तब भी मैंने उन्हें यही कहा। उसकी माँ बोलीं- “बस अब बहुत हो गई पढ़ाई-वढ़ाई, इसे कौन-सी नौकरी करनी है! मैं तो मान भी जाऊँ पर इसके पापा और भाई नहीं सुनने के। लड़का भी खोज लिया है। ठीक ही है। सही सलामत अपने घर चली जाए, अब और क्या चाहिए!” मैंने उनसे कई बार बात की पर वे अपनी मानसिक पितृसत्तात्मक ज़मीन पर टिकी रहीं। उसके कुछ ही महीने बाद उस लड़की की शादी हो गई। पितृसत्ता संरचना में लड़की ख़ुद का चुनाव तो दूर अपने लिए फैसले भी नहीं ले सकती। इसलिए यदि कानून का दबाव हो तो शायद बहुत-सी लड़कियों को अपने करियर के बारे में सोचने का वक़्त मिल जाए।                

सरकार की ओर से लड़कियों की विवाह की उम्र को 21 साल करने के मंथन के लिए एक कमिटी भी गठित की गई है। इस कमिटी की रिपोर्ट इसी साल आने वाली थी लेकिन कोरोना महामारी के चलते हो सकता है इसमें अभी और वक़्त लगे। बहरहाल सरकार लड़कियों के लिए 21 साल की उम्र करने के पीछे कुछ बातों को सामने रख रही है। जेंडर समानता, लड़कियों का कम उम्र में शीघ्र गर्भवती होना और और जोख़िम का बढ़ना, लड़कियों के स्वास्थ्य पर असर होना, कुपोषण का शिकार होना और बाल मृत्यु दर का अधिक होना आदि कारण, सरकार बता रही है। इसके अलावा संविधान की धारा 14 और 21 में समानता का अधिकार और सम्मान के साथ जीने के अधिकार के तहत मौज़ूदा 18 वर्ष की उम्र इन धाराओं के विरुद्ध जाती है.[5] भारत में लड़कों के विवाह की कानूनी उम्र 21 साल निश्चित की गई है। इन सभी बिंदुओं पर सरकार चर्चा कर रही है और सुझाव भी माँग रही है।

लेकिन यह क़दम जिस आधी आबादी के लिए उठाया जा रहा है वह तबका क्या सोचता है, बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे याद है मेरी एक महिला टीचर मित्र ने एक मुलाक़ात में अपनी प्रथम वर्ष की एक नहीं कई छात्राओं के विवाह की बात बताई और अपनी चिंता भी जाहिर की। मैंने अपनी मित्र से पूछा- “आपने उन लड़कियों से इसके पीछे की वजह पूछी?” उसने जो बताया वह सब सोच के निम्नतम स्तर पर था। उन लड़कियों के माता-पिता (कुछ मामलों में भाई भी) का मानना था कि समाज में लड़कियों के साथ ग़लत घटनाएँ घट रही हैं, उनके बलात्कार किए जा रहे हैंउन्हें डर है कि उनकी बेटियों के साथ भी कुछ ग़लत न हो जाए। इसलिए शादी उनकी बेटियों की सुरक्षा का उपाय है। एक और कारण जो माता-पिता द्वारा दिया गया वह न सिर्फ चौंका देता है बल्कि परिवारों में मौज़ूद मानसिकता को प्रकट करता है। मेरी महिला मित्र ने उन लड़कियों के हवाले से बताया कि उनके माता-पिता का मानना है कि मोबाइल के इस्तेमाल के चलते लड़कियाँ बिगड़ रही हैं। वे लड़कों से बात करती हैं। कई बार वे ख़ुद की पसंद के लड़के के साथ घर छोड़ कर ‘भाग जाती’ हैं और घर-परिवार की ‘इज्जत’ का सत्यानाश कर देती हैं। इसलिए अगर उन्हें जल्दी शादी के बंधन में बाँध दिया जाए तो इज्जत बची रहती है। इस तरह की सोच ने लड़कियों के जीवन को अधर में अटका रखा है.

इज्जत का बोझ लड़कियां ताउम्र सिर पर उठाकर जीती हैं। लड़की के ख़ुद के लिए किए गए चुनावों को परिवार के सदस्यों में कभी मान्यता नहीं मिलती बल्कि किसी पुरुष से बात करने पर ही बवंडर उठ जाता है। इसके अतिरिक्त जो लड़कियाँ हिम्मत कर अपने लिए घर से बाहर का दरवाज़ा खोलती हैं, उनके लिए बाहर की व्यवस्था उतनी सुलभ, सरल और मददगार नहीं होती। अक्टूबर 2019 में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की ख़बर परेशान करने वाली है। अख़बार ने आंकड़ों के सहारे सूचना दी है कि महिला श्रम बल साझेदारी दर (female labor force participation rates) 2017-18 में 17.5% दर्ज़ की गई जो बीते वर्षों की तुलना में बेहद कम प्रतिशत है.[6] इसके पीछे कई कारण हैं जो एक महिला को वे स्थिति और स्पेस मुहैया नहीं होने देते जिसकी काम के लिए ज़रुरत होती है।

इसके अतिरिक्त महिला सुरक्षा को लेकर भले ही राजनीतिज्ञों ने निरंतर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकी हों पर ज़मीन पर कुछ हासिल नहीं है। महिला सुरक्षा अथवा यौन उत्पीड़न के मामलों में कोई कमी नहीं हुई है। महिलाओं को घर और बाहर, दोनों ही जगहों पर उत्पीड़न, अपराध और भेदभावों का शिकार होना पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी किये गए आँकड़े निराश करते हैं। वर्ष 2017 में महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों के मामलों में वृद्धि दर्ज़ की गई है। ‘द प्रिंट’ की एक ख़बर के मुताबिक़ सन् 2017 में महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों की संख्या 3,59,849 रही.[7] यह संख्या बीते वर्षों के मुक़ाबले अधिक है। ‘आज तक’ की वेबसाइट पर मौज़ूद एक और ख़बर सरकार और मंत्रियों की लापरवाही के बारे में साफ़ बताती है। पिछले वर्ष महिला और बाल विकास की मंत्री साहिबा ने संसद में बताया कि निर्भया फंड का कुछ राज्यों ने इस्तेमाल ही नहीं किया और कुछ राज्यों द्वारा ख़र्च की गई राशि बेहद कम रही.[8] ऐसे में विवाह की उम्र बढ़ाकर जिस समानता की बात सरकार कर रही है वह दूर की कौड़ी ही है।

मंशा, शंका और सवालों के बीच सरकार को स्थिति को बाक़ी आयामों के साथ जोड़कर देखना होगा। यदि विवाह की आयु 21 वर्ष की जाती है तब इसका एक अर्थ यह भी होगा कि 21 वर्ष की आयु के पूर्व बनने वाले यौनिक संबंध कानून की दृष्टि में दंडनीय अपराध की श्रेणी में आयेंगे। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार की नीति और रणनीति क्या होगी यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा। मैंने ख़ुद युवा होती लड़कियों (19-20 वर्ष) से जो शहरी समाज का हिस्सा हैं, से जब जानना चाहा तब उनमें से बहुतों का मानना था कि उम्र बढ़ा देनी चाहिए। इससे उन्हें पढ़ने लिखने का मौका मिलेगा। करियर की ओर रुझान गहरा होगा। समझदारी ज़्यादा आएगी। एक लड़की ने कहा कि 21 साल उम्र कर देनी चाहिए क्योंकि मेरे माता-पिता मेरे लिए लड़का खोज रहे हैं। लेकिन कुछ अन्य लड़कियों की सोच अलग रही। उनका मानना है कि उम्र बढ़ा देने से कोई ख़ास असर नहीं होगा जब तक सरकार हमारे लिए कुछ करती नहीं। मसलन सुरक्षा, सुविधा, स्कूल कॉलेज अधिक खोलना और उनमें पढ़ाई के तमाम अवसर होना। इसके अलावा काम की दुनिया में भी महिलाएँ अपने लिए मुनासिब मौक़े चाहती हैं। अतः विवाह की उम्र 21 वर्ष अच्छा क़दम होगा पर मनोवांछित नतीजे तब तक नहीं मिलेंगे जब तक बाक़ी आयामों पर काम नहीं किया जाएगा। यदि विवाह की उम्र 21 वर्ष की जाती है तब लड़कियों को कुछ और वक़्त मिलेगा जिसमें वे ख़ुद के लिए ‘अपना कमरा’[9] तैयार कर सकेंगी। वह ऐसा कमरा होगा जहाँ लड़कियाँ अपनी पसंद के अनुसार जी सकेंगी। अपने कमाने के लिए ज़रिये तलाशेंगी। इसके साथ ही अपने बौद्धिक ज्ञान और विकास के लिए इत्मिनान से बैठकर पढ़ सकेंगी।       

 

 

 



[1] मदर इंडिया, कैथरीन मेयो, अनु.- कँवल भारती, फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली, 2019, पृ। 58

[2] https://www.thehindu.com/sci-tech/health/india-registers-a-steep-decline-in-maternal-mortality-ratio/article32106662.ece

[3] यह शब्द ‘भेज देना’ और ‘जाना’ क्रियाओं से अलग और गहरा अर्थ रखता है, विशेषरूप से लड़की के विवाह के संदर्भ में। प्रचलित कथन यह है कि अब बेटी/लड़की/बहू का विवाह के बाद शव ही ससुराल से वापस आएगा। लड़कियों के संदर्भ में ‘वापसी’ की कल्पना असहनीय है। अमृता प्रीतम द्वारा लिखे उपन्यास ‘पिंजर’ में जब नायिका वापस अपने पिता के घर आती है तब उसे स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि वह अब पवित्र नहीं रह गई है।    

[4] https://navbharattimes.indiatimes.com/india/in-ten-years-child-marriage-has-reduced-up-to-five-times/articleshow/67894747.cms

[5] https://indianexpress.com/article/explained/pm-modi-74th-independence-day-women-empowerment-marriage-age-6555937/

 

[6] https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/irrational-economics/where-are-indias-working-women/

[7] https://hindi.theprint.in/india/crime-against-women-increase-ncrb-data-show/92132/  

[8] https://www.aajtak.in/india/story/most-of-the-nirbhaya-funds-remain-unused-says-women-child-development-ministry-990092-2019-11-30  

[9] यह वर्जीनिया वुल्फ द्वारा लिखी प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण किताब है सन् 1928 में वर्जीनिया वुल्फ ने ‘औरत और कथा-साहित्य’ विषय पर दो आख्यान दिए थे इस पर बहुत समय देकर उन्होंने सन् 1929 ‘अ रूम ऑफ़ वंस ओन’ ( A Room of One’s Own) नामक किताब लिखी जो स्त्री विमर्श की महत्वपूर्ण किताब है       

Tuesday, 15 November 2022

वेटिंग फॉर ए वीज़ा- डॉ. बी. आर. आंबेडकर (हिंदी अनुवाद)

 

वीज़ा की प्रतीक्षा में 

(वेटिंग फॉर ए वीज़ा का हिंदी अनुवाद)

छुआछूत के अस्तित्व के बारे में विदेशी जानते तो हैं पर उनका सामना इससे नहीं हुआ है कहा जाए तो, वे यह महसूस नहीं कर सकते कि छुआछूत प्रथा अपनी वास्तविकता में कितनी उत्पीड़क है उनके लिए यह समझना मुश्किल है कि यह कैसे संभव है कि कुछ अछूत, हिंदुओं से भरे हुए गाँव के हाशिए पर रहते हैं हर रोज़ उस गाँव में जाकर, उसकी घिनौनी गंदगी हटाते हैं और कई तरह के कामों को करते हैं गाँव के हिंदुओं के घरों की चौखटों से भोजन इकठ्ठा करते हैं, हिंदू  बनिया की दुकानों से दूरी बनाते हुए, मसाले और तेल ख़रीदते हैं, गाँव को हर तरह का आदर देते हैं जैसे यह उनका अपना घर हो और इसके बाद भी वे गाँव की किसी वस्तु को न छूते हैं और न छुआते हैं कठिनाई यह है कि कैसे बेहतरीन ढंग से जातिवादी हिंदुओं के बारे में बताया जाए कि अछूत के साथ वे कैसा बर्ताव करते हैं सामान्य विवरण या जातिवादी हिंदुओं के अपने अनुसार किए गए बर्ताव वाले केसों के रिकॉर्ड्स, ऐसी दो विधियाँ जिससे यह उद्देश्य पाया जा सकता है मैंने यह महसूस किया है कि इनमें से दूसरा तरीका पहले वाले से ज़्यादा असरदार होगा इनके चित्रणों के चुनाव में, मैंने अपने और कुछ दूसरों के अनुभव में से कुछ-कुछ हिस्से लिए हैं मैं उन घटनाओं से शुरुआत कर रहा हूँ जो मेरी ज़िंदगी में ख़ुद मेरे साथ हुई हैं





एक

हमारा परिवार मूलतः बॉम्बे प्रेज़ीडेंसी में दापोली तालुका के रत्नागिरी जिले से आया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती शासन में मेरे पूर्वजों ने अपना पुस्तैनी पेशा कंपनी की आर्मी के लिए छोड़ दिया था। मेरे पिता ने भी इसी पारिवारिक परंपरा को अपनाया और अपनी सेवा देने के लिए आर्मी में गए। एक अधिकारी के पद तक उन्होंने तरक्की की और जब सेवा निवृत्त हुए तब तक वे सूबेदार बन चुके थे। अपने रिटायरमेंट पर पिता परिवार को दापोली ले गए ताकि वहाँ रहने के लिए जगह को देख लिया जाए। लेकिन कुछ वजहों से पिता ने अपनी योजना बदल ली। परिवार दापोली को छोड़कर सतारा चला गया जहाँ हम सन् 1904 तक रहे। मैं पहली घटना को यहाँ दर्ज़ करते हुए याद भी कर सकता हूँ, यह सन् 1901 के आस-पास हुई थी जब हम सातारा में रह रहे थे। मेरी माँ की मृत्यु हो चुकी थी। मेरे पिता कैशियर की नौकरी के चलते दूर कोरेगाँव नामक जगह पर काम कर रहे थे। यह जगह खटाव तालुके के सातारा जिले में थी, जहाँ सरकार ने एक टैंक खोदने का काम अकाल से पीड़ित लोगों को रोजगार देने के लिए शुरू किया था, जो हज़ारों की संख्या में मर रहे थे।   

जब मेरे पिता कोरेगाँव गए तब मुझे, मेरे बड़े भाई और मेरी मर चुकी बड़ी बहन के दो बड़े लड़कों को मेरी काकी और कुछ अच्छे पड़ोसियों की देख-रेख में छोड़ गए मेरी काकी एक रहमदिल रूह थीं जिन्हें मैं जानता हूँ, लेकिन वे हमारी मदद नहीं कर पाती थीं उनका क़द बेहद छोटा था और उनके पैरों में भी दिक्कत थी जिससे उन्हें बिना किसी की मदद के सहारे चलने फिरने में परेशानी होती थी अक्सर उन्हें उठाना पड़ता था मेरी बहनें थीं वे विवाहिता थीं और वे अपने परिवारों के संग दूर रहा करती थीं हमारे लिए अपना खाना पकाना एक बड़ी परेशानी बन गई, क्योंकि हमारी काकी खाना नहीं बना पाने में मजबूर थीं फिर भी किसी तरह काम चलता रहा। हम चार बच्चे स्कूल जाते थे और अपना खाना भी बनाते थे हम रोटी नहीं बना पाते थे इसलिए अधिकतर हम पुलाव बना लिया करते जो हमारे लिए बनाना काफ़ी आसान था जिसमें चावल और गोश्त मिलाने भर की ज़रूरत थी

कैशियर होने के चलते मेरे पिता अपने स्थान से हमें देखने सातारा नहीं आ सकते थे, इसलिए उन्होंने हमें ख़त लिखकर कोरेगाँव आकर ही अपनी गर्मी की छुट्टियाँ उनके साथ बिताने के लिए कहा हम सभी बच्चे बहुत ज़्यादा उत्साहित थे क्योंकि हममें से किसी ने भी अभी तक रेलगाड़ी नहीं देखी थी

जाने की बेहतरीन तैयारियाँ की गईं। सफ़र के लिए नई इंग्लिश तहजीब की कमीजें, चमकदार और बढ़िया टोपियाँ, नए जूते और सिल्क बॉर्डर की धोतियाँ खरीदी गईं मेरे पिता ने हमारे सफ़र का पूरा ब्यौरा दिया और कहा कि किस दिन आने की तैयारियाँ हैं, उन्हें ख़बर कर दी जाए ख़बर होने से वे उस दिन अपने चपरासी को कोरेगाँव रेलवे स्टेशन लेने के लिए भेज देंगे इस योजना के तहत मैं, मेरा भाई और मेरी बहन का बेटा सातारा से सफ़र के लिए निकल पड़े हमने पड़ोसियों को हमारी काकी की देख-रेख करने के लिए भी कहा, जिन्होंने इसका वायदा भी किया रेलवे स्टेशन हमारी जगह से दस मील की दूरी पर था स्टेशन जाने के लिए एक घोड़ागाड़ी का इंतजाम किया गया था हमने नए कपड़े पहने हुए थे, जो ख़ासतौर से इस यात्रा के लिए तैयार किए गए थे हम काकी की रोने-धोने की आवाजों के बीच ही आनंद के साथ सफ़र के लिए निकले हमारे बिछड़ने के दुःख में वह बेतहाशा रोती रहीं

स्टेशन पहुँचने पर बड़े भाई ने टिकट ख़रीदे और मुझे और मेरी बहन के दोनों बेटों को दो-दो आने दिए ताकि हम अपने मज़े की चीज़ें ले सकें हमने ख़ूब ख़र्च करना शुरू कर दिया हमने शुरुआत में अपने लिए नींबूपानी की बोतल ख़रीदी कुछ देर बाद ही ट्रेन के रवाना होने की सीटी बजी और इस डर से कि ट्रेन कहीं छूट न जाए हम जितना जल्दी रेल में चढ़ सकते थे चढ़ गए हमें बोला गया था कि हमें मसूर पर उतरना है यह कोरेगाँव के लिए सबसे नजदीकी स्टेशन था

ट्रेन मसूर शाम के करीब पाँच बजे पहुँची हम अपने सामान के साथ स्टेशन पर उतर गए कुछ ही देर में जो भी यात्री ट्रेन से उतरे थे अपने-अपने गंतव्य स्थानों पर चले गए अब हम चार बच्चे ही प्लेटफार्म पर बचे रह गए थे हम अपने पिता की राह देख रहे थे हम उस चपरासी का भी इंतज़ार कर रहे थे जिसके बारे में पिता ने वायदा किया था कि उसे लेने के लिए स्टेशन भेज देंगे हमने लंबा इंतज़ार किया पर कोई भी नहीं दिखा एक घंटा बीत गया इसी बीच स्टेशन मास्टर पूछताछ के लिए आ गया उसने हमसे टिकट दिखाने के लिए कहा हमने उसे अपने टिकट दिखाए उसने हमसे अभी तक रुकने का कारण पूछा., हमने उसे बताया कि हमें कोरेगाँव जाना है इसलिए हम अपने पिता या उनके नौकर का इंतज़ार कर रहे हैं पर दोनों में से कोई नहीं आया हमें यह भी नहीं पता कि कोरेगाँव कैसे पहुँचा जा सकता है हम अच्छे कपड़े पहने हुए बच्चे थे हमारे पहनावे और बातों से कोई भी यह अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि हम अछूतों के बच्चे हैं वास्तव में स्टेशन मास्टर को यह पक्का यकीन था कि हम ब्राह्मण बच्चे हैं और वह हमारे इस हालात पर द्रवित भी था जैसा कि अक्सर हिंदुओं में होता है, स्टेशन मास्टर ने भी पूछा कि हम कौन हैं बिना एक पल की देरी किए मैंने तुरंत उगल दिया कि हम महार हैं (बॉम्बे प्रेज़ीडेंसी में महार उन समुदायों में से एक हैं जिन्हें अछूत माना जाता है) वह हैरान हो गया उसका चेहरा अचानक बदल गया हम यह देख सकते थे कि वह अजीब-सी घृणा से भर गया था जैसे ही उसने मेरा जवाब सुना वह अपने कमरे की ओर तेज़ क़दमों से जल्दी चला गया और हम वहीं खड़े रहे जहाँ हम पहले थे पंद्रह से बीस मिनट बीत गए; सूरज लगभग अस्त हो रहा था न तो पिता आए थे और न ही उन्होंने अपने नौकर को भेजा था, और अब स्टेशन-मास्टर भी हमें छोड़कर जा चुका था हम काफ़ी व्यग्र थे यात्रा की शुरुआत में जो आनंद और ख़ुशी थी वह अब अत्यधिक मायूसी में बदल गई थी

आधे घंटे के बाद स्टेशन मास्टर लौटा और हम क्या करेंगे पूछने लगा हमने कहा कि अगर हमें एक बैलगाड़ी मिल जाए तो हम कोरेगाँव चले जाएँगे और अगर यह बहुत दूर नहीं है तो हम इसी पल चल देंगे वहाँ ढेरों बैलगाड़ियाँ कहीं भी जाने के लिए खड़ी थीं लेकिन मेरा स्टेशन-मास्टर को दिया गया जवाब गाड़ीवानों के बीच पहुँच चुका था कि हम महार हैं इसलिए उनमें से एक भी अपनी बैलगाड़ी को दूषित होने और न ही अपने आप को अछूत वर्ग के यात्रियों को ले जाने के चलते नीच दिखने के लिए तैयार था हम यात्रा का किराया दुगुना तक देने को तैयार थे लेकिन हमने पाया कि धन ने भी यहाँ काम नहीं किया स्टेशन-मास्टर जो हमारे बदले बातचीत कर रहा था वह खामोश था और नहीं जानता था कि क्या करना है अचानक लगा कि एक ख़याल उसके दिमाग में आया और उसने हमसे पूछा, “क्या तुम लोग बैलगाड़ी हांक सकते हो?” हमें लगा कि उसने हमारी दिक्कत का समाधान खोज लिया है, हम चिल्लाए, “जी हाँ, हम हाँक सकते हैं” इस जवाब के साथ वह बैलगाड़ी वाले के पास हमारी ओर से गया और यह पेशकश कि हम बैलगाड़ी वाले को दुगुना किराया देंगे और उसे हाँकेंगे भी साथ ही वह गाड़ी के साथ हमारे इस सफ़र में पैदल चलेगा एक बैलगाड़ी वाला राज़ी हो गया क्योंकि उसे इस तरकीब से दुगुनी कमाई का मौका मिल गया और साथ ही वह दूषित होने से भी बच गया था

शाम के लगभग साढ़े छ बजे थे, जब हमने गाड़ी हाँकना शुरू किया लेकिन हम स्टेशन न छोड़ने को लेकर चिंतित थे, जब तक कि यह तय न हो जाता कि हम कोरेगाँव अँधेरा होने से पहले न पहुँच जाएँगे इसलिए हमने गाड़ीवाले से कोरेगाँव की दूरी और उसमें लगने वाले वक़्त के बारे में पूछा उसने हमको विश्वास दिलाया कि तीन घंटे से ज़्यादा नहीं लगेंगे उसकी बातों पर यकीन कर हमने अपना सामान बैलगाड़ी पर लादा और स्टेशन-मास्टर को उसकी मदद के लिए शुक्रिया कह गाड़ी पर चढ़ गए हममें से एक ने लगाम थामी और गाड़ी चल पड़ी बैलगाड़ी वाला गाड़ी के साथ पैदल चल रहा था

स्टेशन से कुछ ही दूरी पर एक नदी बह रही थी यह काफ़ी सूखी हुई थी सिवाय कुछ गड्डों के जिनमें थोड़ा-थोड़ा पानी जमा था बैलगाड़ी वाले ने कहा कि हमें यहीं रूक कर खाना खा लेना चाहिए क्योंकि आगे शायद हमें पानी न मिले हम राज़ी हो गए उसने तय भाड़े में से कुछ रुपया हमसे माँगा ताकि वह गाँव में जाकर खाना खा सके मेरे भाई ने उसे कुछ रुपए दिए और वह जल्दी वापस आने का वायदा कर चल दिया हम बहुत भूखे थे हम ख़ुश हुए कि चलो हमें खाना खाने का मौका मिला हमारी काकी ने पड़ोस की औरतों को कहकर रास्ते के लिए बढ़िया खाना तैयार करवाया था हम अपने टिफिन बॉक्स खोलकर खाना खाने लगे हमें अपनी चीज़ों को धोने के लिए पानी की ज़रूरत थी हममें से एक पास बह रही नदी के एक पोखर के नजदीक गया लेकिन वह पानी वास्तव में पानी नहीं था उस पानी में कीचड़ घुला हुआ था जिससे वह ख़ूब गाढ़ा था और उसमें गाय-बैल व अन्य जानवरों का पेशाब और मल मिला हुआ था जो वहाँ पानी पीने आते थे असल में वह पानी मनुष्यों के इस्तेमाल के लिए था ही नहीं पानी में तेज़ बदबू होने से हम उसे पी ही न सके इसलिए हमें अपना खाना आधे पेट ही समेटना पड़ा और इसके बाद हम बैलगाड़ी वाले का इंतजार करने लगे वह बहुत देर तक नहीं आया हम उसे हर दिशा में देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे आख़िरकार वह आया और उसके बाद हमने अपनी यात्रा फिर शुरू कर दी लगभग चार या पाँच मील तक हमने बैलगाड़ी हाँकी और वह हमारे संग पैदल चला इसके बाद वह अचानक ही उछल कर बैलगाड़ी पर चढ़ा और लगाम हमारे हाथों से ले ली हमें उसका यह बर्ताव बहुत अजीब लगा जिस व्यक्ति ने बैलगाड़ी दूषित होने के डर से हमें ले जाने से मना कर दिया था, अब वही अपने धार्मिक संकोच को एक तरफ कर हमारे साथ उसी बैलगाड़ी में बैठने को राज़ी हो गया था लेकिन हमें इस पल डर से उससे एक भी सवाल करने की हिम्मत न हुई हम कोरेगाँव जाने को लेकर बहुत चिंतित थे और किसी भी तरह जल्द से जल्द वहाँ पहुँचना चाहते थे और इसके बाद हम कुछ देर गाड़ी के चलने में ही दिलचस्पी लेने लगे लेकिन जल्दी हमारे चारों ओर अँधेरा छा गया वहाँ कोई भी स्ट्रीट लाइट्स नहीं थीं जो अँधेरे से निजात दिलातीं. वहाँ से कोई मर्द, औरत या यहाँ तक कि जानवर भी नहीं गुज़र थे जो हमें यह एहसास दिलाते कि हम उनके बीच में हैं अकेले होने से हम डर गए और इस डर ने हमें घेर लिया हमारी चिंता बढ़े जा रही थी हमने भरसक हिम्मत जुटाई हम मसूर से काफ़ी दूर आ गए थे तीन घंटे से ज़्यादा हो गए थे लेकिन कोरेगाँव का कोई निशान भी नहीं दिखा हमारे भीतर एक अजीब विचार उठा हमें शक़ हुआ कि बैलगाड़ी वाला धोखे से कहीं सुनसान जगह ले जाकर हमारी हत्या करना चाहता है हमने काफ़ी सोना पहना हुआ था और इस बात से हमारा शक़ और पक्का हो गया हम उससे पूछने लगे कि कोरेगाँव अभी कितना दूर है, हमें पहुँचने में इतनी देर क्यों हो रही है वह एक ही बात कहे जा रहा था, “ज़्यादा दूर नहीं है, हम वहाँ जल्दी ही पहुँच जाएँगे” रात के क़रीब दस बजे जब हमने कोरेगाँव का नामोनिशान तक नहीं पाया तब हमने रोना और गाड़ीवाले को कोसना शुरू कर दिया हमारा रोना और चीख़ना-चिल्लाना लंबे समय तक हुआ बैलगाड़ी वाले ने कोई जवाब ही नहीं दिया तभी अचानक हमने कुछ दूरी पर रोशनी देखी बैलगाड़ी वाले ने कहा, “वह रोशनी देख रहे हो? वह टोल-कलेक्ट करने वाले के यहाँ जल रही है हम रात में आराम के लिए यहीं रुकेंगे” हमने कुछ राहत महसूस की और रोना बंद किया रोशनी दूर दिखाई पड़ रही थी, हमें यह नहीं लगा कि हम वहाँ पहुँच सकते हैं टोल-कलेक्टर की कुटिया तक पहुँचने में हमें दो घंटे लग गए इस दौरान हमारी चिंता और बढ़ गई और रास्ते भर हम गाड़ीवाले से तरह-तरह के सवाल पूछते रहे कि वहाँ पहुँचने में देर क्यों हो रही है, क्या हम उसी रास्ते पर हैं या नहीं, आदि-आदि?





आख़िरकार मध्यरात्रि को बैलगाड़ी टोल-कलेक्टर की कुटिया तक पहुँच गई यह एक पहाड़ के तल पर स्थित थी इसकी दूसरी तरफ पहाड़ था. जब हम वहाँ पहुँचे तब हमने बड़ी संख्या में बैलगाड़ियाँ देखीं जो (बैलगाड़ी वाले) वहाँ रात में ठहरकर आराम कर रहे थे हम बहुत ही ज़्यादा भूखे थे और बस भोजन करना चाहते थे लेकिन फिर से पानी का सवाल था अतः हमने गाड़ीवाले से पूछा कि क्या पानी मिलने की संभावना है उसने हमें चेताया कि टोल-कलेक्टर हिंदू है और पानी मिलने की कोई संभावना नहीं है अगर हमने सच कहा और यह बताया कि हम महार हैं उसने कहा, “जाकर कहो हम मुसलमान हैं और अपनी किस्मत आजमाओ” उसके सुझाव पर मैं टोल-कलेक्टर के दफ़्तर पहुँचा और उससे कहा कि क्या हमें वह पानी दे सकता है “तुम कौन हो?” उसने पूछताछ की मैंने उसे जवाब दिया कि हम मुसलमान हैं मैंने उससे उर्दू में बात की जो कि मैं अच्छी तरह जानता था ताकि उसे कोई शक़ ही न रह जाए कि मैं असली मुसलमान नहीं हूँ लेकिन तरकीब ने काम नहीं किया और उसका जवाब बहुत रुखा-सा था “तुम्हारे लिए यहाँ किसने पानी रखा है? पहाड़ी पर पानी है, अगर तुम वहाँ जाकर लेना चाहो तो... मेरे पास तो नहीं है” इस तरह उसने बातचीत ही खारिज़ कर दी मैं अपनी बैलगाड़ी की ओर वापस लौट आया और उसका जवाब अपने भाई को बताया मुझे नहीं पता मेरे भाई ने क्या महसूस किया यह सुनकर उसने हमें लेट जाने के लिए ही कहा

बैलों को गाड़ी से हटा दिया गया और बचा हुआ लकड़ी का हिस्सा झुका कर ज़मीन से टिका दिया गया हमने अपनी चादरें बैलगाड़ी के भीतर लकड़ी के तख़्त पर बिछाई और अपने-अपने शरीरों को आराम की खातिर लेटा लिया अब हम सुरक्षित जगह पर थे और परवाह नहीं थी कि क्या हुआ है लेकिन हमारे दिमाग उस घटना से हट ही नहीं पा रहे थे जो हाल में ही हुई थी हमारे पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन था हम भीतर भूख से लगभग जल रहे थे; इसके बाद भी हम भूखे सो रहे थे; क्योंकि हमें पानी नहीं मिल सकता था, क्योंकि हम अछूत थे यह अंतिम ख़याल ही दिमाग में घूम रहा था इस दौरान मैंने कहा, हम एक सुरक्षित जगह पर आ गए थे पर मेरे बड़े भाई ने स्पष्ट रूप से अपने संदेहों को उजागर किया उसने कहा कि हम चारों का एक साथ सो जाना बुद्धिमता नहीं होगी कुछ भो हो सकता है उसने सुझाव दिया कि एक बार में दो लोग सो जाएँ और दो लोग जाग कर चौकन्ने रहें इस प्रकार पहाड़ के तल पर हमारी रात बीती

अल-सुबह हमारा गाड़ीवान पाँच बजे आया और हमें सुझाव दिया कि अब हमें अपनी कोरेगाँव जाने की यात्रा को शुरू करना चाहिए हमने साफ़ मना कर दिया हमने उससे कहा कि हम आठ बजे के पहले यहाँ से नहीं हिलेंगे हम कोई जोख़िम नहीं लेना चाहते थे अतः हमने आठ बजे चलना शुरू किया और कोरेगाँव ग्यारह बजे पहुँचे हमारे पिता हमें देखकर हैरान हुए और बोले कि उन्हें हमारे आने की कोई सूचना नहीं मिली उन्होंने बिल्कुल ही मना कर दिया बाद में मालूम पड़ा कि ग़लती मेरे पिता के नौकर की है उसे हमारी चिट्ठी मिली थी पर वह पिता को उसके बारे में बता ही नहीं पाया था

मेरी ज़िदगी में यह घटना महत्वपूर्ण जगह रखती है मैं नौ बरस का था जब यह घटना घटी लेकिन इस घटना ने मेरे दिमाग पर अपनी अमिट छाप छोड़ी इस घटना के पहले मैं जानता था कि मैं एक अछूत हूँ और यह अछूतपन का व्यवहार निश्चित ही अपमान और भेदभाव के विषय से जुड़ा है मिसाल के तौर पर, मैं अपने पदानुसार स्कूल में अपनी क्लास के अन्य साथियों के साथ नहीं बैठ सकता था इसलिए मुझे एक कोने में बैठना पड़ता था मैं यह जानता था कि स्कूल में मुझे एक अलग से बोरीनुमा कपड़ा रखना होता था जिस पर मुझे पालथी मारकर बैठना होता था यह भी था कि जो स्कूल में सफाई का काम करते, वे मेरी उस बोरीनुमा चटाई को छूते नहीं मेरे लिए यह तय था कि वह चटाई मैं शाम को घर वापस ले जाऊँ और फिर अगले दिन अपने संग वापस लाऊँ. स्कूल के दौरान मुझे यह मालूम था कि सछूत (सवर्ण) वर्ग के बच्चे प्यास लगने पर पानी के नल के पास जाकर उसे खोलकर अपनी प्यास बुझा सकते थे उन्हें बस टीचर की इजाज़त की ज़रूरत थी लेकिन मेरी स्थिति अलग थी मैं पानी का नल नहीं छू सकता था जब तक कि कोई सवर्ण इसे न खोले, (तब तक) मेरे लिए अपनी प्यास बुझाना संभव नहीं था मेरे संदर्भ में टीचर की इजाज़त काफ़ी नहीं थी स्कूल के चपरासी की उपस्थिति अनिवार्य थी, वही अकेला व्यक्ति था जिसे क्लास टीचर इस काम के लिए नियुक्त कर सकता था अगर चपरासी नहीं रहता तो मुझे बिना पानी के ही पूरा दिन गुज़ारना पड़ता यह स्थिति एक वक्तव्य में समेटी जा सकती है- चपरासी नहीं तो पानी भी नहीं मैं यह जानता था कि कपड़े धोने का काम घर में मेरी बहनों द्वारा किया जाता था ऐसा नहीं था कि वहाँ धोबी नहीं थे ऐसा भी नहीं था कि हम धोबी को कपड़े धोने के पैसे का खर्च नहीं उठा  सकते थे कपड़े धुलाई का काम मेरी बहनों के द्वारा इसलिए किया जाता क्योंकि हम अछूत थे और कोई धोबी अछूतों के कपड़े नहीं धोता बालों को काटने और मेरे समेत मेरे अन्य भाइयों की शेविंग का काम मेरी बड़ी बहन द्वारा किया जाता था जो लगभग एक नाई की तरह हमारे बाल काटकर और शेविंग करने में माहिर हो चुकी थी, इसलिए नहीं कि सातारा में नाई नहीं थे, या हम नाई को पैसा नहीं दे सकते थे बाल काटने और शेविंग का काम इसलिए मेरी बहन द्वारा किया जाता था क्योंकि हम अछूत थे और कोई नाई हमारी हजामत बनाने के लिए राज़ी नहीं था मैं यह सब जानता था लेकिन इस घटना ने मुझे जो झकझोर दिया ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था इस घटना ने मुझे छुआछूत के बारे में सोचने पर मज़बूर किया इस घटना के पहले यह विषय मेरे लिए ऐसा था जैसे बाकी अन्यों के साथ होता आया था जिसमें सछूत और अछूत दोनों शामिल थे          



दो

सन् 1918 में मैं भारत लौटा मुझे हायर एजुकेशन के लिए बड़ौदा के महाराज द्वारा अमरीका भेजा गया था मैंने न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में सन् 1913 से 1917 तक पढ़ाई की सन् 1917 में मैं लंदन आया और लंदन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट में दाख़िल हुआ सन् 1918 में पढ़ाई पूरी किए बगैर में भारत आने को बाध्य था क्योंकि मुझे बड़ौदा राज्य द्वारा पढ़ाया गया था अतः मैं राज्य को अपनी सेवा देने के लिए बाध्य था भारत पहुँचकर मैं पहले से तय योजना के अनुसार सीधे बड़ौदा पहुँचा मैंने क्यों बड़ौदा को दी जाने वाली अपनी सेवाओं को छोड़ा, उसके कारण मेरे वर्तमान उद्देश्य में काफ़ी अप्रासंगिक हैं इसलिए मैं उनका ज़िक्र यहाँ नहीं करना चाहता मैं यहाँ सिर्फ बड़ौदा में हुए अपने सामाजिक अनुभवों के प्रति ही सचेत हूँ और उनका ही विवरण देने के लिए ख़ुद को यहाँ सीमित करूँगा

मेरे पाँच वर्षों के यूरोप और अमेरिका के प्रवास ने मेरे दिमाग और चेतना से यह पूरी तरह ही मिटा दिया था कि मैं एक अछूत हूँ और एक अछूत जब कभी भी भारत में जाता है तो वह ख़ुद और साथ ही दूसरों के लिए परेशानी बनता है जब मैं स्टेशन से बाहर आया तब मैं एक सवाल से काफी परेशान था, “कहाँ जाऊँ? मुझे कौन रखेगा?” मैं गहराई तक व्यथित था वहाँ विशिज़ नाम के हिंदू होटल्स भी थे जिन्हें मैं जानता था. वे मुझे अपने यहाँ नहीं ठहरने देते अपनी छद्म पहचान जैसे एक मात्र तरीके से ही वहाँ रहने-रुकने की व्यवस्था हो सकती थी लेकिन मैं उसके लिए तैयार नहीं था क्योंकि मैं पहले से ही भयानक नतीजों के पुर्वानुमान लगा सकता था जो कि आने तय थे, अगर मेरी पहचान का पता लगवा लिया जाता और यह निश्चित भी था बड़ौदा में मेरे मित्र थे जो अमरीका में पढ़ने के लिए आए थे “अगर मैं उनके यहाँ गया तो क्या वे मेरा स्वागत करेंगे?” मैं अपने आप को इसका विश्वास नहीं दिला सकता था शायद वे एक अछूत को घर में पनाह देने के लिए शर्मिंदगी महसूस कर सकते थे मैं स्टेशन की छत के नीचे कुछ देर खड़ा सोचता रहा, कहाँ जाऊँ, क्या करूँ! तभी मुझे ख़याल आया कि कैंप में किसी जगह के बारे में पता करना चाहिए इस समय तक सभी यात्री जा चुके थे मैं अकेला वहाँ रह गया था कुछ किराए पर ले जाने वाले ड्राईवर जिन्हें अभी तक कोई सवारी नहीं मिली थी, मेरी ओर देख मेरा इंतजार का रहे थे मैंने उनमें से एक को बुलाया और पूछा कि क्या वह कैंप में किसी होटल के बारे में जानता है? उसने बताया कि वहाँ एक पारसी लोगों का सराय है और वहाँ वे मुसाफिरों द्वारा रुपए देने पर ठहरने देते हैं यह सुनकर कि यह सराय पारसियों द्वारा संचालित होती है मेरा मन ख़ुश हुआ पारसी लोग ज़रथुस्त्र के अनुयायी होते हैं वहाँ मेरे अछूत होने से जुड़े उनके व्यवहार का कोई डर नहीं था क्योंकि उनका धर्म छुआछूत को नहीं मानता ख़ुशी और उम्मीद के ह्रदय के साथ और दिमाग में बिना किसी डर के मैंने अपना सामान किराए की एक जगह पर रख दिया और ड्राईवर को कैंप में स्थित पारसी सराय जाने के लिए कहा 

सराय दो मंजिला ईमारत थी जिसके ग्राउंड फ्लोर पर एक बुज़ुर्ग पारसी अपने परिवार के साथ रहता था वे एक केयरटेकर था और जो टूरिस्ट सराय में कुछ दिनों के लिए ठहरने आते थे उनके खाने का प्रबंध करता था गाड़ी पहुँची इसके बाद पारसी केयरटेकर मुझे ऊपर की मंजिल पर ले गया मैं जब तक ऊपर गया ड्राईवर मेरा सामान ले आया था मैंने उसे रुपए दिए और वह चला गया मैं ख़ुश था कि आख़िरकार मैंने अपनी समस्या का हल निकाल ठहरने की जगह खोज ली थी मैं ख़ुद को आराम देना चाहता था इसलिए कपड़े उतार रहा था इसी समय केयरटेकर अपने हाथों में एक किताब लिए आया मैं अपने आधे कपड़े उतार चुका था मैंने सदरी और कस्ती नहीं पहना था, जो यह साबित करते थे कि ये पहनने वाला पारसी होता है, यह देखकर उसने कड़ी आवाज़ में मुझसे पूछा कि मैं कौन हूँ? मुझे यह नहीं मालूम था कि पारसियों द्वारा संचालित यह पारसी सराय केवल पारसी लोगों के लिए के प्रयोग के लिए ही है, मैंने उसे बताया कि मैं एक हिंदू  हूँ वह चौंक गया और कहने लगा कि मैं इस सराय में नहीं ठहर सकता मैं उसके जवाब से पूरी तरह से हैरान हो सुन्न पड़ गया था वही सवाल फिर मेरे सामने वापस आ गया कि कहाँ जाऊँ? मैंने ख़ुद को कुछ शांत रखकर कहा कि हालाँकि मैं हिंदू हूँ और मुझे यहाँ रहने में कोई दिक्कत नहीं है अगर उसे भी कोई परेशानी न हो तो उसने पूछा, “कैसे रूक सकते हो? मुझे उन लोगों का एक रजिस्टर मेन्टेन करना होता है जो लोग यहाँ आकर ठहरते हैं” मैं उसकी दिक्कत समझ गया मैंने उससे कहा कि मैं रजिस्टर पर दर्ज़ करने के लिए एक पारसी नाम लिख सकता हूँ “तुमको क्या दिक्कत होगी अगर मुझे नहीं है, तुम कुछ खोने वाले नहीं हो बल्कि कुछ पैसे ही कमाओगे अगर मैं यहाँ ठहरा तो” मैं देख सकता कि इस बात से वह मेरे पक्ष में झुकता हुआ दिखाई दे रहा था यह बिलकुल साफ़ था कि उसके यहाँ लंबे समय से कोई मुसाफिर ठहरा नहीं था और कुछ रुपए कमाने का मौका वह गंवाना भी नहीं चाहता था वह इस शर्त पर राज़ी हो गया कि मैं उसे हर दिन का डेढ़ रुपया खाने-पीने व ठहरने का दूँ और अपना पारसी नाम रजिस्टर पर लिखूँ वह सीढ़ियों से होता हुआ नीचे चला गया और इसके बाद मैंने एक राहत की साँस ली कि जैसे सिर से कोई बोझ उतर गया हो समस्या सुलझ चुकी थी और मैं बहुत ख़ुश था पर ओह! मैं उस समय यह नहीं जानता था कि यह प्रसन्नता कितने कम वक़्त के लिए थी लेकिन इससे पहले कि मैं यह बताऊँ कि इस सराय में ठहरने का अंत कितना दुखांत था उससे पहले यहाँ मैंने अपना थोड़ा-सा समय कैसे बिताया, बताना चाहिए 

इस सराय के पहले तल पर एक छोटा-सा बेडरूम था और उसी से सटा हुआ छोटा गुसलखाना था जिसमें नल लगा हुआ था बाक़ी का हिस्सा एक बड़ा हॉल था मेरे रहने के दौरान हॉल सभी तरह के कबाड़, तख्तों, बेंचों और टूटी कुर्सियों आदि से भरा पड़ा था इस सब के बीच में मैं अकेला एकांत में रहा केयरटेकर सुबह के समय चाय लेकर आता था इसके बाद वह करीब साढ़े नौ बजे नाश्ता या सुबह का खाना लेकर आता था तीसरी बार वह करीब रात के साढ़े आठ बजे डिनर लेकर आता था वह तभी आता जब उसे लगता कि उसे आना ही पड़ेगा और इन अवसरों पर वह कभी बातों के लिए नहीं रूकता था किसी तरह यह दिन बीते थे

मैं, बड़ौदा महाराजा द्वारा अकाउंटेंट जनरल के कार्यालय में प्रोबेशनर नियुक्त किया गया था मैं सराय से सुबह लगभग दस बजे निकलता और लगभग आठ बजे शाम को लौटता था मैं इस प्रयास में रहता कि अधिक से अधिक समय दोस्तों के साथ रह सकूँ सराय लौट कर वहाँ रात बिताने का विचार बहुत ही डराने वाला था मैं सराय महज़ इसलिए ही लौटता था क्योंकि मेरे पास इस आसमान तले आराम करने की कोई और जगह ही नहीं थी सराय के पहले तल के इस बड़े हॉल में बातें करने के लिए अन्य साथी व्यक्ति नहीं थे मैं काफी अकेला था पूरा हॉल अँधेरे से ढका हुआ मालूम पड़ता था वहाँ कोई बिजली का बल्ब नहीं था और न ही कोई तेल का दीया था जो अँधेरे से राहत दिलाता केयरटेकर एक हरिकेन लैंप मेरे इस्तेमाल के लिए लाया करता था इसकी रोशनी कुछ इंच तक भी नहीं पहुँच पाती थी मुझे महसूस होता कि मैं किसी तहख़ाने में हूँ मैं अन्य व्यक्तियों के साथ और उनसे बातें करने के लिए लालायित रहता लेकिन वहाँ कोई नहीं था साथी इंसानों के साथ की अनुपस्थिति में मैं यह साथ किताबों में खोजता और पढ़ता, और सिर्फ पढ़ता पढ़ने में पूरी तरह से घुल (खो) जाने में मैं अपना अकेलापन भूल जाता लेकिन चमगादड़ों, जिन्होंने उस बड़े हॉल को अपना घर बना लिया था, की चहक और उड़ने की आवाज़, मेरा पढ़ने में लगा ध्यान भंग कर देती, उनकी आवाजें मुझे यह याद दिलाते हुए सिहरनें दे जातीं कि मैं क्या भूलने का प्रयास कर रहा था कि मैं एक अजीब जगह पर अजीब हालातों के बीच था कई बार मैं बहुत क्रोधित हो उठता लेकिन मैं अपनी व्यथा और गुस्से को यह सोचकर शांत करता कि हालाँकि यह एक तहख़ाना है, पर यह एक शेल्टर है और कोई शेल्टर न होने से यह बेहतर था मेरी स्थिति कुछ इस तरह शोक संतप्त थी कि जब मेरी बहन का बेटा बॉम्बे से मेरा बाक़ी सामान लाया, जो मैं पीछे छोड़ आया था, मेरी इस स्थिति को देखकर वह इतना ज़ोर से रोने लगा कि मुझे उसे फ़ौरन ही वापस भेजना पड़ा मैं इस स्थिति में पारसी सराय में पारसी नाम के साथ रहा मैं जानता था कि मैं लंबे समय तक इस गढ़े गए पारसी नाम के साथ सराय में रहना जारी नहीं सकता था क्योंकि एक न एक दिन मेरी असली पहचान खोज ली जाएगी इसलिए मैं राज्य द्वारा दिए जाने वाले बंगले को पाने की कोशिश रहा था लेकिन प्रधानमंत्री ने मेरी अर्ज़ी पर उस गंभीरता से विचार नहीं किया जितनी गंभीर मेरी स्थिति थी मेरी याचिका एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी तक जा रही थी और जब तक मुझे अंतिम जवाब मिलता उससे पहले मेरा क़यामत का दिन आ पहुँचा

यह सराय में रहने का मेरा ग्यारहवाँ दिन था मैं अपना सुबह का नाश्ता कर तैयार हो गया था और दफ्तर के लिए कमरे से बाहर निकलने ही वाला था जब मैं कुछ किताबों को वापस करने के लिए उठा रहा था जिन्हें बीती रात मैंने पढ़ने के लिए लायब्रेरी से ली थीं, तभी मैंने क़दमों की आहट सुनी जो काफी संख्या में सीढ़ियों से ऊपर चले आ रहे थे मुझे लगा वे टूरिस्ट हैं जो यहाँ रहने आए हैं इसलिए मैं उन्हें देखने बाहर निकला कि ये मित्र कौन हैं तत्क्षण, मैंने दर्ज़न के करीब गुस्सैल दिख रहे, लंबे और तगड़े पारसियों को देखा, हर किसी के पास एक छड़ी थी और वे मेरे कमरे की तरफ ही चले आ रहे थे मुझे पता लग चुका था कि ये साथी टूरिस्ट नहीं हैं क्योंकि इस बात का सबुत उन्होंने उसी वक़्त दे दिया था मेरे कमरे के सामने वे पंक्ति बनाकर खड़े हो गए और अपने सवालों की झड़ी मुझ पर दागनी शुरू कर दी “तुम कौन हो? तुम यहाँ क्यों आए हो? तुम्हारी पारसी नाम रखने की हिम्मत कैसे हुई?... धोखेबाज! तुमने इस पारसी सराय को दूषित कर दिया है!” मैं ख़ामोश खड़ा रहा मैं कोई जवाब न दे सका मैं गढ़ी गई पारसी पहचान से नहीं बच सकता था बल्कि यह धोखाधड़ी थी और इसे अब पकड़ लिया गया था मुझे इस बात का पक्का यकीन था कि जो खेल मैं पारसी बनकर खेल रहा था अगर उसी पर कायम रहता तो इस गुस्सैल और कट्टर पारसियों की भीड़ द्वारा मुझ पर हमला किया गया होता और संभवतः मैं मरने की कगार पर पहुँच गया होता मेरी नम्रता और ख़ामोशी ने इस क़यामत को टाल दिया। उनमें से एक ने मुझसे पूछा कि मैंने कब कमरा ख़ाली करने का सोचा है उस वक़्त मेरा यह आशियाना मेरी ज़िंदगी से बढ़कर था इस सवाल में एक कब्रनुमा धमकी छुपी थी यह सोचकर कि प्रधानमंत्री को मेरी बंगले की अर्ज़ी इस दरम्यां देखने का अनुकूल मौका मिल जाएगा, इसलिए अपनी चुप्पी तोड़ मैंने उन लोगों से गुजारिश की कि मुझे कम से कम एक हफ़्ता और रहने दिया जाए लेकिन पारसी सुनने को तैयार ही नहीं थे उन्होंने अल्टीमेटम जारी कर दिया कि मैं शाम तक इस सराय में न मिलूँ. मुझे अपना सामान पैक करना चाहिए वे गंभीर परिणाम निकलने की बात कह चल दिए मेरा ह्रदय मेरे भीतर ही सिकुड़ गया मैं उन सभी को बुरा-भला कह कड़वाहट के साथ रोया आख़िरकार मुझे अपने कीमती आशियाने से वंचित कर दिया गया था यह शेल्टर किसी क़ैदी के क़ैदख़ाने से बेहतर नहीं था पर फिर भी यह बेशकीमती था

पारसियों के जाने के बाद मैं कुछ देर बैठ कर इस स्थिति से बाहर निकलने के बारे में सोचने लगा मुझे उम्मीद थी कि मुझे जल्द ही राज्य द्वारा प्रदत्त बंगला मिल जाएगा और मेरी मुश्किलें ख़त्म हो जाएँगी मेरी समस्या टेम्पररी थी इसलिए मैंने सोचा कि मित्रों के यहाँ जाना ठीक रहेगा बड़ौदा राज्य में मेरे अछूत मित्र नहीं थे लेकिन अलग वर्गों में मेरे मित्र थे एक हिंदू था और दूसरा भारतीय इसाई था मैं सबसे पहले हिंदू मित्र के पास गया और उसे बताया कि मेरे संग क्या घटित हुआ वह एक अच्छी आत्मा वाला मेरा बहुत अच्छा मित्र था वह दुखी और क्रोधित हुआ था इसके बाद भी उसने अपनी एक दुविधा बताई उसने कहा, “अगर तुम मेरे घर रहने आते हो तो मेरे नौकर चले जाएँगे” मैं उसका संकेत समझ गया और मैंने उस पर मुझे रहने देने का दबाव नहीं डाला मुझे भारतीय इसाई दोस्त के यहाँ जाना अच्छा नहीं लगा एक बार उसने मुझे अपने साथ रहने के लिए आमंत्रित किया था लेकिन मैंने पारसी सराय में रहने को तरजीह देते हुए उसके आमंत्रण को नकार दिया था न जाने का कारण यह था कि हम दोनों की आदतें एक-दूसरे के अनुकूल नहीं थीं अब उसके पास जाना प्रतिघात जैसा होता इसलिए मैं अपने दफ्तर चला गया लेकिन मैंने शेल्टर पाने के इस मौके को पूरी तरह से नहीं छोड़ा था एक मित्र से बात करने के उपरांत मैंने यह तय किया कि उसके पास जाकर उससे पूछता हूँ कि क्या वह मुझे अपने साथ रहने देगा जब मैंने अपना यह सवाल उसके आगे रखा तो उसका जवाब था कि उसकी पत्नी कल ही बड़ौदा आ रही है और वह उससे इस बारे में विचार-विमर्श करके बताएगा तत्पश्चात मैं समझ गया कि यह एक बहुत चतुर उत्तर था वह और उसकी पत्नी मूल रूप से एक ऐसे परिवार से थे जो जाति से ब्राह्मण थे हालाँकि ईसायत में धर्मांतरण के बाद पति विचारों से उदार था लेकिन पत्नी अभी भी अपनी तरह से रुढ़िवादी थी और किसी अछूत को अपने घर में टिकने देने के लिए राज़ी नहीं होती इस तरह उम्मीद की आख़िरी किरण भी बुझ गई शाम के चार बजे थे जब मैं अपने भारतीय इसाई दोस्त के घर से निकला कहाँ जाऊँ, यह सबसे बड़ा सवाल मेरे सामने था मुझे सराय में लिया कमरा हर हाल में ख़ाली करना था और मेरा कोई मित्र नहीं था जिसके यहाँ जाकर रह सकूँ!!! सिर्फ बॉम्बे वापस लौटने का ही विकल्प बचा था

बॉम्बे की ट्रेन रात नौ बजे बड़ौदा से थी अभी भी पाँच घंटे बिताने थे कहाँ बिताया जाए? क्या मुझे सराय जाना चाहिए? क्या मुझे अपने मित्र के पास जाना चाहिए? मैं सराय वापस जाने का साहस नहीं जुटा सकता था मुझे डर था कि पारसी आकर मुझ पर हमला कर सकते थे मैं अपने मित्र के पास नहीं जाना चाहता था हालाँकि मेरी हालत दयनीय थी पर मैं नहीं चाहता था कि कोई मुझ पर दया करे मैंने सार्वजनिक गार्डन में पाँच घंटे बिताने का फैसला किया जिसे कमाठी बाग़ कहा जाता था यह शहर और कैंप की सीमा पर स्थित था मैं वहाँ आंशिक रूप से ख़ाली दिमाग, दुःख व उस विचार के साथ बैठा जो मेरे साथ हुआ था मैंने पिता और माँ के बारे में सोचा जब वे बच्चे थे और लाचार स्थिति में थे आठ बजे मैं गार्डन से बाहर निकला, सराय जाने के लिए एक गाड़ी ली और सामान नीचे उतार कर लाया केयरटेकर बाहर आया लेकिन हम दोनों एक-दूसरे से एक शब्द भी न कह सके उसे लग रहा था कि मुझे इस मुसीबत में लाने के लिए वही जिम्मेदार था मैंने उसका बिल चुकता किया उसने ख़ामोशी से लिया और ख़ामोशी से ही चला गया मैं बड़ौदा बड़ी उम्मीदों के साथ गया था मैंने कई ऑफर्स को ठुकरा दिया था यह युद्ध का समय था इंडियन एजुकेशनल सर्विस की कई जगहें ख़ाली पड़ी हुई थीं मैं कई प्रभावकारी लोगों को लंदन में जानता था लेकिन मैंने उनसे कोई बात नहीं की मुझे लगा कि मेरा पहला कर्तव्य बड़ौदा के महाराजा को अपनी सेवाएँ देने का है जिन्होंने मेरी शिक्षा हेतु वित्तीय सहायता की थी लेकिन मुझे महज़ ग्यारह दिनों में ही बड़ौदा छोड़ बॉम्बे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था

वह दृश्य जिसमें दर्ज़न भर पारसी मेरे आगे हाथों में छड़ी लिए ख़तरनाक मिजाज के साथ पंक्तिबद्ध खड़े हैं और मैं उनके सामने बेहद डरा हुआ, रहम की गुहार लगाता हुआ खड़ा हूँ, एक ऐसा दृश्य है जो अभी मेरे साथ बना हुआ है और अठारह सालों का लंबा समय उस दृश्य को धूमिल करने में सफल नहीं हो पाया है मैं आज भी उस दृश्य को जीवंतता से याद कर सकता हूँ और कभी भी बिना आंसुओं के याद नहीं कर पाता यह पहली बार था जब मुझे मालूम चला कि एक व्यक्ति जो हिंदुओं के लिए अछूत है वह पारसियों के लिए भी अछूत है 


तीन

साल 1929 का था बॉम्बे गवर्मेंट ने अछूत लोगों की शिकायतों की जाँच के लिए एक कमिटी का गठन किया था मुझे कमिटी के एक सदस्य के तौर पर नियुक्त किया गया था कमिटी को सभी प्रांतों में अन्याय, उत्पीड़न और अत्याचार के आरोपों की जाँच के लिए जाना पड़ता था कमिटी विभाजित हुई मुझे और एक अन्य सदस्य को खानदेश के दो जिलों के काम को सौंपा गया मेरे कुलीग और मैं अपने कार्यों को पूरा करने के बाद अलग हो गए वह किसी हिंदू संत को देखने चला गया मैं बॉम्बे जाने वाली गाड़ी पकड़ने निकल पड़ा मैं चालिसगाँव पर धुलिया लाइन में एक गाँव में जातिवादी हिंदुओं द्वारा गाँव के अछूतों के ख़िलाफ़ घोषित सामाजिक बहिष्कार से जुड़े एक केस की जाँच के लिए उतरा चालिसगाँव के अछूत स्टेशन पर मुझे लेने आए और अपने साथ रात में ठहरने के लिए गुजारिश की मेरी मूल योजना सामाजिक बहिष्कार के केस की जाँच के बाद सीधे बॉम्बे जाने की थी लेकिन वे इच्छुक दिखाई दे रहे थे तो मैं रातभर रूकने के लिए राज़ी हो गया मैंने उस गाँव में जाने के लिए धुलिया जाने वाली ट्रेन पकड़ ली, वहाँ गया, गाँव में उस प्रबल स्थिति के बारे में पता लगाया और अगली गाड़ी से वापस चालिसगाँव लौट आया

मैंने चालिसगाँव के अछूत लोगों को स्टेशन पर अपने इंतजार में पाया मेरा माला पहनाकर स्वागत किया गया महारवाड़ा में अछूतों के आवास रेलवे स्टेशन से लगभग दो मील की दूरी पर थे और एक नदी पार करनी पड़ती थी जिसके ऊपर एक पुलिया बनी हुई थी स्टेशन पर बहुत-सी घोड़ागाड़ियाँ जाने के लिए मौजूद थीं स्टेशन से महारवाड़ा भी पैदल चलकर जाया जा सकता था मुझे लगा कि तुरंत ही महारवाड़ा पहुँचा दिया जाऊँगा लेकिन उस दिशा में कोई हलचल ही नहीं थी और मैं यह समझ नहीं सका कि क्यों मुझे इतना इंतजार करवाया जा रहा है एक घंटे या कुछ इतने ही समय के बाद एक टाँगा (एक घोड़े वाली गाड़ी) प्लेटफार्म के पास आया और मैं उसमें चढ़ गया। टाँगे में सिर्फ मैं और टाँगेवाला ही था बाकी लोग पैदल ही छोटे रास्ते से निकल गए टाँगा अभी दो सौ कदम भी नहीं चला था तभी एक मोटरकार से लगभग टकरा ही गया था मैं हैरान था कि जिस ड्राईवर को हर दिन जाने के लिए पैसा दिया जाता था वह इतना अधिक अनुभवहीन है दुर्घटना सिर्फ इसलिए टल गई थी क्योंकि पुलिसकर्मी तेज़ चिल्लाया जिससे टाँगेवाले ने इसे पीछे की ओर वापस खींच लिया था

हम किसी तरह नदी के पुल के पास पहुँचे पुल पर किसी भी तरह की दिवारें सहारे के लिए नहीं थीं बस पत्थरों से बनी पगडंडी पाँच या दस फीट की दूरी के फासले पर बिछी थी इसे पत्थरों से पक्का किया गया था नदी पर बनी पुलिया रोड के राईट एंगल में थी जहाँ से हम आ रहे थे रोड की तरफ से पुलिया तक आने के लिए एक खड़ी चढ़ाई ली जानी थी पुलिया के नजदीक के पहले पत्थर के पास पहुँचते ही घोड़ा सीधे जाने के बजाय पीछे की तरफ मुड़कर कुलाच मार गया बगल के पत्थर में घोड़ेगाड़ी का पहिया इतना मजबूती से फंस गया कि मैं उछलकर पुलिया पर बिछे पक्के पत्थरों पर गिर पड़ा और घोड़ा और साथ लगी हुई गाड़ी पुलिया से नदी में जा गिरे. मैं कुछ इतना तेज़ गिरा था कि सुन्न पड़ा हुआ था महारवाड़ा नदी के दूसरे किनारे की तरफ ही था जो लोग स्टेशन पर मेरा स्वागत करने आए थे वे मुझसे पहले पहुँच चुके थे मुझे रोते और विलाप करते पुरुष, स्त्री व बच्चों के बीच से उठाकर महारवाड़ा ले जाया गया इस दुर्घटना के चलते मुझे बहुत चोटें लगी थीं मेरे पैर में फ्रैक्चर हुआ और कई दिनों तक चल नहीं पाया था मैं यह नहीं समझ सका कि यह सब कैसे हुआ टाँगा हर दिन पुलिया के पार कितनी ही बार जाता है पर टाँगेवाला कभी भी बिना सुरक्षा के पुलिया पर आने-जाने में असफल नहीं होता

पूछताछ करने पर मुझे असल बातों के बारे में बताया गया रेलवे स्टेशन पर देरी इस कारण हुई क्योंकि टाँगेवाले उस टाँगे को चलाने के लिए तैयार नहीं थे जिसमें बैठा यात्री एक अछूत था यह उनकी मर्यादा के नीचे था महार लोग यह नहीं सह सकते थे कि मैं उनके आवास तक पैदल चलकर जाता यह उनके लिए मेरी गरिमा के ख़िलाफ़ था इसलिए एक समझौता हुआ इस समझौते के मुताबिक टाँगे का मालिक चलाने के लिए टाँगा तो दे देगा पर चलाएगा नहीं महार टाँगा ले सकते हैं पर इसे चलाने के लिए किसी की तलाश करनी होगी महारों ने सोचा कि यह एक बढ़िया समाधान है लेकिन जाहिर तौर पर वे यह भूल गए कि यात्री की सुरक्षा उसकी गरिमा बनाए रखने से अधिक महत्त्व रखती है अगर महारों ने इस बारे में सोचा होता तो वे विचार करते कि क्या वे एक ड्राईवर खोज पाते जो मुझे सुरक्षित गंतव्य तक पंहुँचा पाता वास्तव में उनमें से कोई भी टाँगा नहीं चला सकता था क्योंकि यह उनका पेशा नहीं था इसलिए उन लोगों ने अपने ही समुदाय में किसी को टाँगा चलाने के लिए कहा. उस व्यक्ति ने लगाम अपने हाथों में ली और यह सोचने लगा कि इसमें कुछ भी नहीं है पर जैसे ही वह इस पर चढ़ा उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास हुआ और वह इतना घबरा गया कि टाँगे को नियंत्रित करने के सारे प्रयास ही छोड़ दिए मेरी गरिमा को बचाने के लिए चालिसगाँव के महारों ने मेरे जीवन को ही ख़तरे में डाल दिया मैंने तब जाना कि एक हिंदू टाँगेवाला, भले ही वह एक नौकर हो, उसकी एक शान है जिससे वह ख़ुद को एक व्यक्ति के रूप में सभी अछूत लोगों से बेहतर (उच्चतम) मानता है, फिर चाहे वह व्यक्ति बैरिस्टर-एट-लॉ[1] ही क्यों न हो


[1] अंग्रेज़ी कानून के अंतर्गत उच्च न्यायालय में वकालत करने वाला 



चार

सन् 1934 में, मेरे साथ डिप्रेस्ड क्लास आंदोलन में काम करने वाले साथी वर्कर्स ने एक साईट पर घूमने जाने की इच्छा जताई कि अगर मैं उनके साथ जाने के लिए राज़ी हूँ तो मैं तैयार हो गया यह तय किया गया कि हमारी योजना में सभी जगहों के साथ एक विजिट वेरुल स्थित बौद्ध गुफाओं की भी होनी चाहिए यह प्रबंध हुआ कि मैं नासिक जाऊँगा और बाकी लोग नासिक में ही मुझसे मिलेंगे वेरुल जाने के लिए हमें औरंगाबाद* जाना था औरंगाबाद, हैदराबाद मुस्लिम स्टेट का एक शहर था और यह महाराजा निज़ाम के प्रभुत्व के अंतर्गत शामिल था औरंगाबाद के रास्ते में हमें पहले दौलताबाद नाम के अन्य शहर से होकर गुज़रना था जो हैदराबाद स्टेट में ही शामिल था दौलताबाद एक ऐतिहासिक शहर है और किसी ज़माने में प्रसिद्ध हिंदू राजा रामदेव राय के राज्य की राजधानी हुआ करता था दौलताबाद का क़िला एक प्रसिद्ध प्राचीन इमारत है और कोई भी टूरिस्ट इसके आस-पास होने पर इसे देखने का मौका नहीं छोड़ता इसलिए हमारे दल ने भी इस क़िले को देखना अपने कार्यक्रम में शामिल कर लिया

हमने कुछ बसें व टूर कराने वाली कारों को किराए पर लिया हम संख्या में करीब तीस लोग थे हमने नासिक से येवला तक जाना शुरू किया क्योंकि येवला औरंगाबाद के रास्ते में है हमारे टूर के इस कार्यक्रम की घोषणा नहीं की गई थी और ऐसा जानबूझकर किया गया था हम चुपचाप घूमना चाहते थे ताकि उन मुश्किलों से बचें जो एक अछूत टूरिस्ट को इस मुल्क के दूर के बाहरी हिस्सों में घूमने के दौरान सामना करना पड़ता है हमने अपने लोगों को केवल उन केंद्रों के बारे में सूचित कर दिया था जहाँ हमने ठहरना तय किया था इस तरह, हम निज़ाम के राज्य के कई गाँवों से होकर गुज़रे पर हमारे लोगों में से कोई भी हमसे मिलने नहीं आया दौलताबाद स्वाभाविक रूप से भिन्न था वहाँ हमारे लोगों को सूचित कर दिया गया था कि हम आ रहे थे वे हमारा इंतज़ार कर रहे थे और शहर के प्रवेश द्वार पर इकठ्ठा हो गए थे उन्होंने हमसे उतरकर पहले चाय और जलपान करने के बाद क़िले जाने को कहा हमने उनके इस प्रस्ताव को नहीं माना हमें उस समय चाय की गहरी तलब थी पर हम धुंधलका होने से पहले क़िला देखने का पर्याप्त समय भी चाहते थे इसलिए हम क़िला देखने के लिए निकल पड़े और अपने लोगों से वापसी में चाय पीने के लिए कहा योजना-अनुसार हमने अपने ड्राइवर्स को चलने के लिए कहाँ और कुछ ही मिनटों के भीतर हम क़िले के गेट पर थे





रमजान का महीना था, मुस्लिमों के लिए यह उपवास का महीना है क़िले के बाहर ही एक पानी की छोटी हौदी थी जो किनारे तक पानी से पूरी भरी हुई थी उसके चारों ओर चोड़े पत्थरों को जमाया गया था यात्रा के चलते हमारे चेहरे, शरीर और कपड़ों पर पूरी तरह से धूल जम गई थी हम सब इसे धोना चाहते थे बिना ज़्यादा सोचे हमारे दल के कुछ सदस्यों ने अपने चेहरे और पैरों को बिछे हुए पत्थरों पर जाकर हौदी के पानी से धो लिया इसके बाद थोड़ा ताज़ा होने पर हम क़िले के गेट पर गए वहाँ भीतर हथियारबंद सैनिक थे उन्होंने बड़ा गेट खोला और हमें मेहराबदार रास्ते में प्रवेश करने दिया हमने अभी गार्ड से क़िले के भीतर जाने की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे पूछा ही था इसी बीच लहराती सफ़ेद दाड़ी वाला मुसलमान पीछे से चिल्लाता हुआ आ रहा था, “ढेड़ों  (मतलब अछूत) ने हौदी को नापाक कर दिया है” जल्दी ही नौजवान और बूढ़े मुसलमान, जो आस-पास ही थे, उस बूढ़े के साथ इकठ्ठा हो हमें गाली देने लगे “ढेड़ों में अकड़ आ गई है. ढेड़ अपनी औकात भूल गए हैं (निम्न और अपमानित ही बने रहना) इन ढेड़ों को सबक़ सिखाना चाहिए” वे भयंकर गुस्से में थे हमने उनको बताया कि हम बाहरी हैं और यहाँ के रीति-रिवाज़ के बारे में नहीं जानते थे वे आगबबूला हो वहाँ के स्थानीय अछूत, जो इस समय तक गेट पर पहुँच चुके थे, की ओर मुखातिब थे “तुम लोगों ने इन बाहरियों को क्यों नहीं बताया कि इस हौदी का अछूत इस्तेमाल नहीं कर सकते!” यही सवाल था जिसे वे बार-बार उनसे पूछ रहे थे बेचारे लोग! ये लोग वहाँ नहीं थे जब हमने हौदी के पानी का इस्तेमाल किया यह बिल्कुल ही हमारी ग़लती है क्योंकि बिना पूछताछ हमने यह काम किया उन लोगों ने विरोध किया कि इसमें उनकी ग़लती नहीं थी लेकिन मुस्लिम मेरा स्पष्टीकरण सुनने को राज़ी ही नहीं थे वे लोग स्थानीय अछूतों और हमें गाली ही दिए जा रहे थे गालियाँ इतनी गंदी थीं कि हम भी भड़क गए वहाँ  आसानी से दंगा या संभवतः क़त्ल हो जाने लायक हालात बन सकते थे किसी तरह हमें ख़ुद पर नियंत्रण रखना था हम किसी भी आपराधिक मामले में नहीं पड़ना चाहते थे जो हमारे इस छोटे से सफ़र का आकस्मिक और रूखा अंत कर देता

एक नौजवान मुस्लिम भीड़ में से बार-बार यही कहता जा रहा था कि हर किसी को अपने धर्म के अनुरूप ही होना चाहिए, अर्थात् इस तरह से अछूतों को सार्वजनिक टंकियों से पानी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए मेरा सब्र जवाब दे गया और उससे गुस्से में पूछा, “क्या तुम्हारा धर्म यही सिखाता है? क्या तुम एक अछूत को इस टैंक से पानी लेने के लिए रोक दोगे अगर वह एक मुसलमान बन जाए?” इस तरह के सीधे सवालों का कुछ असर उन मुसलमानों पर पड़ता हुआ दिखा उन्होंने कोई भी जवाब नहीं दिया और ख़ामोशी से खड़े रहे गार्ड की तरफ मुखातिब हो मैंने गुस्से ही कहा, “क्या हम क़िले के अंदर जा सकते हैं या नहीं? हमें बताओ, अगर नहीं जा सकते तो हम यहाँ रूकना ही नहीं चाहते” गार्ड ने मेरा नाम पूछा एक काग़ज़ के टुकड़े पर मैंने अपना नाम लिखा वह काग़ज़ सुपरीटेंडेंट के पास लेकर अंदर गया और वापस आया हमें बताया गया कि हम क़िले के भीतर तो जा सकते हैं पर हम कहीं भी पानी नहीं छू सकते और एक हथियारबंद सैनिक को हमारे साथ जाने का आदेश दिया गया कि वह यह ध्यान रखे हम आदेश का उल्लंघन न करें

मैंने एक उदाहरण यह दिखाने के लिए दिया था कि एक व्यक्ति जो हिंदुओं के लिए अछूत है, वह पारसी के लिए भी एक अछूत ही है यह दृष्टांत यह दिखाएगा कि वह व्यक्ति जो हिंदुओं के लिए अछूत है, वह मुसलमान के लिए भी एक अछूत ही है



पाँच 

अगला मामला भी उतना ही प्रकाश डालने वाला है यह काठियावाड़ के एक गाँव के एक अछूत स्कूल टीचर का केस है जो निम्नलिखित पत्र के रूप में दर्ज़ किया गया था यह पत्र श्रीमान गांधी द्वारा प्रकाशित ‘यंग इंडिया’ जरनल के 12 दिसंबर 1929 के अंक में सामने आया था यह पत्र उन मुश्किलों को दिखाता है कि कैसे उसने एक हिंदू डॉक्टर को अपनी पत्नी को देखने के लिए राज़ी किया, जिसकी हाल ही में जचगी हुई थी और कैसे माँ और नवजात शिशु चिकित्सीय उपचार के बगैर मर गए पत्र में लिखा है:

 “इस महीने की 5 तारीख को मेरा एक बच्चा हुआ था 7 तारीख को पत्नी बीमार हो गई और उसे पेचिस होने लगे उसका जीवन प्राण क्षीण हो गया और उसकी छाती सूज गई उसकी श्वास मुश्किल से चल रही थी और उसकी पसलियों में अत्यधिक दर्द था मैं एक डॉक्टर को बुलाने भागा- लेकिन उसने कहा कि वह एक हरिजन के घर नहीं जाएगा और न ही वह नवजात बच्चे को देखने के लिए तैयार था फिर मैं नगरसेठ और गरासिया दरबार गया और मदद की गुहार लगाई नगरसेठ ने डॉक्टर को उसकी फीस के दो रुपए मेरे द्वारा देने का आश्वासन दिया फिर डॉक्टर एक शर्त पर आया कि वह मरीजों को हरिजन बस्ती के बाहर से ही देखेगा मैं अपनी पत्नी को नवजात शिशु के साथ बस्ती के बाहर ले गया तब डॉक्टर ने अपना थर्मामीटर एक मुस्लिम को दिया, उसने थर्मामीटर मुझे दिया फिर मैंने इसे अपनी पत्नी को दिया फिर थर्मामीटर उसी प्रक्रिया के तहत चेक करने के बाद वापस दिया रात के क़रीब आठ बज रहे थे डॉक्टर ने दीये के मद्धिम प्रकाश में थर्मामीटर को देखते हुए कहा कि मरीज निमोनिया से पीड़ित है फिर डॉक्टर चला गया और दवा भेजी मैं बाज़ार से कुछ अलसी के बीज ले आया और उन्हें मरीज को दिया डॉक्टर ने पत्नी को बाद में देखने से मना कर दिया, हालाँकि मैंने उसकी फीस के दो रुपए दे दिए थे बीमारी बहुत ख़तरनाक थी और केवल ईश्वर ही हमारी मदद करने वाला था

मेरी ज़िन्दगी का दीया बुझ गया वह इस दोपहर के क़रीब दो बजे चल बसी

अछूत स्कूल टीचर का नाम नहीं दिया गया इसलिए डॉक्टर का नाम भी उल्लेखित नहीं है उस अछूत स्कूल टीचर की गुजारिश पर नाम उल्लेखित नहीं किए गए क्योंकि उसे यह डर है कि उससे कहीं प्रतिशोध न ले लिया जाए लेकिन दिए गए तथ्य निर्विवाद हैं

स्पष्टीकरण ज़रूरत नहीं है डॉक्टर, जिसने शिक्षित होने के बावजूद थर्मामीटर लगाने और एक गंभीर स्थिति वाली बीमार औरत का इलाज करने से इंकार कर दिया उसके इलाज से इंकार के परिणामस्वरूप वह औरत मर गई उसे अंतर्मन में अपने पेशे से बंधे आचार नियमों को एक ओर कर देने का कोई पछतावा महसूस नहीं हुआ हिंदू एक अछूत को छूने के बजाय अमानवीय बने रहने को तरजीह देंगे



छह 

इससे भी बड़ी एक अन्य घटना है 6 मार्च सन् 1938 के दिन कासरवाड़ी (ऊन की मिलों के पीछे) दादर, बॉम्बे में श्रीमान इंदुलाल याद्निक की अध्यक्षता में भंगियों की एक बैठक हुई इस बैठक में एक भंगी युवक ने अपने अनुभव को निम्नलिखित शब्दों में बताया:

“मैंने सन् 1933 में वर्नाकुलर[1] की फायनल परीक्षा उत्तीर्ण की. मैंने चौथी कक्षा तक अंग्रेज़ी पढ़ी है मैंने बॉम्बे नगरपालिका की स्कूलों की कमिटी में एक टीचर के रोजगार के लिए आवेदन किया लेकिन असफल रहा क्योंकि वहां कोई वैकेंसी नहीं थी फिर मैंने अहमदाबाद में पिछड़े वर्गों के अधिकारी विभाग में तलाठी (गाँव का पटवारी) पद के लिए आवेदन किया और सफल रहा 19 फरवरी सन् 1936 के दिन, खेड़ा जिला में स्थित बोरसद तालुका में मामलातदार के कार्यालय में मुझे तलाठी पद पर नियुक्त किया गया

हालाँकि मेरा परिवार मूलतः गुजरात से आया, पर इससे पहले मैं कभी गुजरात नहीं गया यह मेरा वहाँ पहला चिह्न था उसी प्रकार, मैं नहीं जानता था कि सरकारी कार्यालयों में छुआछूत बरता जाएगा मेरे आवेदन के साथ ही मेरे एक हरिजन होने का तथ्य उल्लेखित था इसलिए मुझे लगा कि कार्यलय में मेरे साथी कर्मचारी पहले से ही यह जानते होंगे कि मैं कौन था ऐसी स्थिति में, जब मैंने ख़ुद को तलाठी पद का कार्यभार लेने के लिए प्रस्तुत किया तब मैं मामलातदार के दफ्तर के क्लर्क के रवैये से हैरान रह गया

कारिंदे ने नफरत से पूछा, “तू कौन है?” मैंने जवाब दिया, “सर, मैं एक हरिजन हूँ” उसने कहा, “दूर हट, दूरी पर खड़े रह मेरे इतने पास खड़े होने की तेरी हिम्मत कैसे हुई अभी तू कार्यालय के भीतर है, बाहर होता तो छह लातें मारता, यहाँ नौकरी के लिए आने की हिम्मत कैसे हुई?” तत्पश्चात उसने मेरा प्रमाणपत्र और तलाठी पद की नियुक्ति का आदेश पत्र ज़मीन पर गिराने को कहा फिर उसने उन्हें उठाया

बोरसद में मामलातदार के कार्यालय में काम के दौरान मैंने पानी पीने को लेकर बड़ी मुश्किलों का सामना किया कार्यालय के बरामदे में पीने के पानी की केनें रखी गई थीं वहाँ एक वॉटरमैन था जो इन केनों का इंचार्ज था उसकी ड्यूटी कार्यालय के क्लर्क लोगों को ज़रूरत होने पर पानी पीने में मदद करने की थी वॉटरमैन की अनुपस्थिति में क्लर्क ख़ुद से ही केनों में से पानी लेकर पी सकते थे मेरे संदर्भ में यह असंभव था मैं केनों को नहीं छू सकता था क्योंकि मेरा छूना पानी को दूषित करता, इसलिए मुझे वॉटरमैन की दया पर ही निर्भर रहना पड़ता मेरे इस्तेमाल के लिए एक छोटा-सा जंग लगा बर्तन रखा गया था न कोई उसे छूता और न साफ करता सिवाय मेरे यही बर्तन था जिसमें वॉटरमैन मेरे लिए खैरात की तरह पानी डालता वॉटरमैन की उपस्तिथि में ही मैं पानी प्राप्त कर सकता था वॉटरमैन को मुझे पानी देने का विचार पसंद नहीं आता था मुझे पानी पीने आता देखकर वह खिसक जाता और इसके चलते मुझे बिना पानी के ही वापस जाना पड़ता वे दिन जब मुझे पीने के लिए पानी नहीं मिला, वे दिन कम नहीं थे





निवास के मामले में भी मुझे इसी तरह की मुश्किलें आईं मैं बोरसद में अजनबी था कोई भी जाति का हिंदू मुझे किराए पर मकान नहीं देता बोरसद के अछूत भी हिंदुओं को अप्रसन्न करने के डर से मुझे आवास देने के लिए राज़ी नहीं थे क्योंकि उन्हें मेरा क्लर्क के रूप में रहने का यह प्रयास पसंद नहीं आता था कि मैं अपने स्तर से ऊँचा रहूँ भोजन के मामले में तो कहीं अधिक कठिनाइयाँ थीं. वहाँ कोई जगह अथवा व्यक्ति नहीं था जहाँ मैं अपना भोजन खा सकूँ मैं सुबह-शाम ‘भाजा’ ख़रीदता, गाँव के बाहर एकांत जगहों पर उन्हें खाता और रात में मामलातदार के कार्यालय के बरामदे में बिछे पत्थरों पर आकर सो जाता था इस तरह, मैंने चार दिन बिताए यह सब मेरे लिए असहनीय बन गया फिर मैं अपने पैतृक गाँव, जेन्त्रल रहने चला गया यह बोरसद से छह मील दूर था हर दिन मुझे ग्यारह मील पैदल चलना पड़ता था यह मैंने डेढ़ महीने किया

इसके बाद मामलातदार ने मुझे एक तलाठी के पास काम सीखने के लिए भेजा यह तलाठी तीन गाँव, जेन्त्रल, खापुर और सैजपुर का प्रभारी था जेन्त्रल इसका मुख्यालय था मैं इस तलाठी के साथ जेन्त्रल में दो महीने था उसने मुझे कुछ भी नहीं सिखाया और मैंने एक बार भी गाँव के कार्यालय में प्रवेश तक नहीं किया गाँव का मुखिया ख़ासतौर पर द्वेषपूर्ण था एक बार उसने कहा, “तू, तेरा बाप, तेरा भाई झाड़ू लगाने वाले हैं जो गाँव का दफ्तर साफ़ करते हैं और तू हमारे बराबर में बैठना चाहता है? अच्छा होगा, ये नौकरी छोड़ दे  

एक दिन तलाठी ने मुझे गाँव की जनसंख्या सारणी तैयार करने के लिए सैजपुर बुलाया मैं जेन्त्रल से सैजपुर गया मैंने मुखिया और तलाठी को गाँव के कार्यालय में कुछ काम करते हुए पाया मैं गया, कार्यालय के दरवाजे के पास खड़ा हो उन्हें ‘गुड मॉर्निंग’ का अभिवादन किया लेकिन उन दोनों ने मेरा कोई संज्ञान नहीं लिया मैं बाहर क़रीब पंद्रह मिनटों तक खड़ा रहा मैं ज़िंदगी से पहले ही थक चुका था इस तरह नज़रन्दाज़ और अपमानित होने पर मैं गुस्से में आ गया मैं वहाँ  पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया मुझे कुर्सी पर बैठा देख मुखिया और तलाठी मुझसे बिना कुछ कहे चुपचाप चले गए थोड़ी देर बाद, लोग आना शुरू हुए और जल्दी ही एक बड़ी भीड़ ने मुझे घेर लिया यह भीड़ गाँव की लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन द्वारा नेतृत्व थी मैं यह नहीं समझ सका कि क्यों एक शिक्षित व्यक्ति को इस भीड़ का नेतृत्व करना चाहिए मुझे बाद में पता चला कि वह कुर्सी उसकी थी वह मुझे बेहद ही गंदी शब्दावली वाली गाली देने लगा रवानिया (गाँव का नौकर) को संबोधित कर उसने कहा, “एक भंगी के इस गंदे कुत्ते को कुर्सी पर किसने बैठने की परमिशन दी?” रवानिया ने मुझे कुर्सी से उठाकर कुर्सी ले ली मैं ज़मीन पर बैठ गया इसके बाद भीड़ गाँव के कार्यालय में घुसी और मुझे घेर लिया भीड़ में लोग आगबबुला थे, कुछ मुझे गाली दे रहे थे, कुछ मुझे धारीया (तलवार की तरह धारदार हथियार) से टुकड़ों में काट डालने की धमकी दे रहे थे मैंने उनसे मुझे छोड़ देने और माफ़ कर देने की गुहार लगाई लेकिन भीड़ पर इसका कुछ असर ही नहीं हुआ मैं नहीं जानता था कि ख़ुद को कैसे बचाऊँ  लेकिन तभी मुझे मामलातदार को अपने इस अंजाम के बारे में लिखने और बताने का एक विचार आया कि अगर मैं भीड़ द्वारा मार दिया जाऊँ तो मेरे शरीर को कैसे निपटाया जाए संयोग से, यह मेरी उम्मीद थी कि भीड़ यह जान जाए कि मैं उनके ख़िलाफ़ वास्तव में मामलातदार को रिपोर्ट कर रहा हूँ तो वे कहीं अपने हाथों को रोक लें मैंने रवानिया से एक पेज देने के लिए कहा और उसने दे दिया फिर मैंने अपने फाउंटेन पेन से उस पेज पर बड़े-बड़े अक्षरों में निम्नलिखित बात लिखी ताकि सभी इसे पढ़ सकें:

 

“मामलातदार, बोरसद तालुका

सर,

परमार कालिदास शिवराम का विनम्र अभिवादन स्वीकार करने की कृपा करें विनम्रतापूर्वक आपको सूचित किया जाता है कि आज मृत्यु का हाथ मुझपर गिर पड़ा है ऐसा नहीं होता अगर मैंने अपने माता-पिता के शब्दों को सुना होता यह बहुत अच्छा होगा अगर आप मेरी मृत्यु के बारे में मेरे माता-पिता को सूचित कर दें

जो मैंने लिखा था उसे लाइब्रेरियन ने पढ़ा और मुझसे उसे फाड़ देने के लिए कहा, मैंने यही किया उन लोगों ने मुझ पर अपशब्दों की बौछार कर मुझे ख़ूब अपमानित किया “तू हमसे चाहता है कि हम तुझे अपना तलाठी माने? तू एक भंगी है और तू चाहता है कि तो कार्यालय में घुसे और कुर्सी पर बैठे?” मैंने दया की गुहार लगाई और ऐसा दुबारा न करने का वायदा किया इसके साथ ही इस नौकरी को छोड़ने का वायदा भी किया मुझे शाम के सात बजे, भीड़ के जाने तक वहाँ रखा गया तब तक तलाठी और मुखिया दोनों नहीं आए थे इसके बाद मैंने पंद्रह दिनों का अवकाश लिया और अपने माता-पिता के पास बॉम्बे वापस लौट गया       



[1] मातृभाषा या देसी भाषा

*
औरंगाबाद अब संभाजीनगर है

(हिंदीसमय.कॉम पर उपलब्ध अनुवाद को भी पढ़ा है एक-समान कुछ वाक्य मिल भी जाएँ तो वह नक़ल नहीं है क्योंकि कुछ शब्दों का अनुवाद एक जैसा ही होता हैअनुवाद अपनी और दुनिया की बहनों को समर्पित है)  

सच्ची और झूठी मैत्री के संदर्भ में -- (पत्र - 3)

प्रिय लूसीलियस, तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेताव...