Thursday, 2 July 2026

जीवन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 22

 प्रिय लूसीलियस 

अब तुम समझते हो कि तुम्हें उन दिखने में महत्वपूर्ण पर वास्तव में तुम्हारे लिए हानिकारक कार्यों से दूर हो जाना चाहिए। लेकिन तुम पूछते हो कि यह कैसे किया जाए। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल आमने-सामने ही समझाया जा सकता है। कोई चिकित्सक केवल पत्र लिखकर यह निर्धारित नहीं कर सकता कि भोजन करने या स्नान करने का उचित समय क्या है। उसे स्वयं रोगी की नाड़ी देखनी पड़ती है। जैसा कि पुरानी कहावत है, “ग्लैडिएटर अखाड़े में ही सलाह लेता है।” वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के चेहरे के भाव, हाथों की गति, यहाँ तक कि उसके शरीर के संतुलन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन को देखकर अपनी रणनीति तय करता है। जो कार्य सामान्यतः किए जाते हैं और जिन्हें कर्तव्य की माँग कहा जा सकता है, उनके बारे में सामान्य सलाह दी जा सकती है और उन्हें लिखकर भी बताया जा सकता है। ऐसी सलाह केवल दूर रहने वालों के लिए ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ी जा सकती है। किन्तु जब प्रश्न यह हो कि किसी कार्य को कब और किस प्रकार करना चाहिए तब कोई भी व्यक्ति दूर बैठकर सलाह नहीं दे सकता। उसका निर्णय परिस्थितियों को देखकर ही करना पड़ता है। तेजी से बीतते अवसर को पहचानने के लिए केवल वहाँ उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें सतर्क भी रहना होगा। इसलिए अवसर पर लगातार नज़र रखो। जब वह दिखाई दे तो उसे तुरंत पकड़ लो और पूरे दृढ़ निश्चय तथा अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उन जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त कर लो जो तुम्हें बाँधे हुए हैं।

By Suza 

    वास्तव में, यही वह सलाह है जो मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हें बाहर निकलना ही होगा या तो उस जीवन-स्थिति से बाहर निकलो या फिर स्वयं जीवन से। फिर भी मेरा विचार है कि तुम्हें यह काम धीरे-धीरे और सावधानी से करना चाहिए। जिस भयानक गाँठ को तुमने बाँध रखा है उसे रस्सी तोड़कर नहीं बल्कि ढीला करके खोलने का प्रयास करो। लेकिन यदि कोई दूसरा उपाय सफल न हो तो रस्सी तोड़ने में भी संकोच मत करो।तुम चाहे जितने भी भयभीत क्यों न हो निश्चित ही तुम यह नहीं चाहोगे कि जीवन भर किसी खाई के किनारे लटके रहो। उससे तो यह कहीं बेहतर है कि एक ही बार में गिर पड़ो।

    इस बीच, सबसे पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि अपने ऊपर और अधिक बोझ न लादो। जिन कार्यों का दायित्व तुम पहले ही ले चुके हो, उन्हीं तक स्वयं को सीमित रखो या यदि तुम ऐसा कहना चाहो तो उन्हीं कार्यों तक जो तुम्हारे हिस्से में आ गए हैं। नए दायित्वों को खोज-खोजकर अपने ऊपर मत लो क्योंकि तब तुम्हारा बहाना भी नहीं चलेगा। यह स्पष्ट हो जाएगा कि वे कार्य अपने-आप तुम्हारे पास नहीं आए थे बल्कि तुमने स्वयं उन्हें अपनाया था। लोग जो बातें अक्सर कहा करते हैं, वे वास्तव में सत्य नहीं हैं। “मैं इससे बच नहीं सकता था। मैं यह नहीं करना चाहता था लेकिन क्या कर सकता था?”

    “मुझे यह करना ही पड़ा।” समृद्धि और सफलता के पीछे भागने के लिए किसी को विवश नहीं किया जाता। रुक जाने में भी एक प्रकार की बुद्धिमत्ता है। यदि तुम भाग्य और परिस्थितियों का सक्रिय रूप से विरोध नहीं भी कर रहे हो तब भी तुम्हें उस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है जिस ओर भाग्य तुम्हें बहाए लिए जा रहा है।

    क्या तुम्हें बुरा लगेगा यदि मैं अपनी सलाह के साथ कुछ महान आचार्यों की राय भी जोड़ दूँ? वे मुझसे कहीं बेहतर मार्गदर्शक हैं। वास्तव में जब मुझे किसी कार्य के बारे में निर्णय लेना होता है तो मैं स्वयं भी उनसे परामर्श करता हूँ। इस विषय पर एपिक्यूरस का वह पत्र पढ़ो जो उसने इडोमिनिअस को लिखा था। उसमें वह उसे सलाह देता है कि जहाँ तक संभव हो, वह अपने को उन बंधनों से मुक्त करे और शीघ्रता करे इससे पहले कि कोई अधिक शक्तिशाली परिस्थिति हस्तक्षेप कर दे और उसके पास निवृत्त होने की स्वतंत्रता ही न बचे। वह यह भी जोड़ता है कि उचित समय आने से पहले किसी कार्य का प्रयास नहीं करना चाहिए। लेकिन जब वह लंबे समय से प्रतीक्षित अवसर वास्तव में आ जाए तब तुरंत उठ खड़ा होना चाहिए और बिना विलंब के कार्य करना चाहिए। वह कहता है, “यदि तुम मुक्त होने की योजना बना रहे हो तो कभी सुस्त मत पड़ो।” और यह भी, “परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, मुझे विश्वास है कि निवृत्ति लाभदायक सिद्ध होगी बशर्ते हम न तो समय से पहले उसकी ओर दौड़ें और न ही समय आने पर उससे पीछे हटें।”

    मुझे लगता है कि अब तुम स्टोइक्स की ओर से भी कोई कथन सुनना चाहते हो। अपने आस-पास किसी को यह मत कहने दो कि वे उतावले या अविवेकी हैं। वास्तव में वे जितने साहसी हैं उससे कहीं अधिक सावधान भी हैं। शायद तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि वे तुमसे कहेंगे, “बोझ के नीचे झुक जाना लज्जाजनक है। जिस जिम्मेदारी को तुमने स्वीकार किया है उसका दृढ़तापूर्वक सामना करो। जो व्यक्ति परिश्रम से भागता है और जिसकी हिम्मत परिस्थिति की कठिनाइयों के साथ बढ़ने के बजाय घट जाती है, वह न तो साहसी है और न ही ऊर्जावान।” वे निश्चय ही ऐसी बातें कहेंगे लेकिन केवल तब तक जब तक उस दृढ़ता और धैर्य से कोई सार्थक लाभ प्राप्त हो रहा हो। जब तक किसी अच्छे एवं चरित्रवान व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य न करना पड़े या ऐसी कोई परिस्थिति न सहनी पड़े जो उसकी गरिमा के विरुद्ध हो। अन्यथा, एक श्रेष्ठ चरित्र वाला व्यक्ति स्वयं को तुच्छ और अपमानजनक कार्यों में खपा नहीं देगा। वह केवल व्यस्त रहने के लिए व्यापार या कामकाज में नहीं उलझेगा। और न ही वह वैसा करेगा जैसा तुम शायद सोचते हो अर्थात् महत्त्वाकांक्षी जीवन-यात्रा में फँसा रहेगा और उसकी कठिनाइयों को लगातार सहता रहेगा। जब उसे लगेगा कि उसका यह जुड़ाव अत्यधिक बोझिल, अनिश्चित या खतरनाक हो गया है तब वह उससे पीछे हट जाएगा। यह नहीं कि वह अचानक मुँह मोड़कर भाग जाएगा बल्कि वह धीरे-धीरे विवेकपूर्वक और सुरक्षित मार्ग की ओर कदम बढ़ाते हुए उससे स्वयं को अलग कर लेगा।

    प्रिय लूसीलियस, यदि तुम्हें अपने पद और उससे मिलने वाले पुरस्कारों की परवाह न हो तो उससे मुक्त होना बहुत आसान है। वास्तव में वही पुरस्कार हमें बाँधकर रखते हैं और आगे बढ़ने नहीं देते। लोग सोचते हैं, “क्या? क्या मैं इतनी बड़ी आशाओं को छोड़ दूँ? क्या मैं तब पीछे हट जाऊँ जब फसल कटने के लिए तैयार है? क्या मैं अपने सम्मान और वैभव से वंचित हो जाऊँ? क्या मेरी पालकी बिना सेवकों के रह जाएगी और मेरा स्वागत-कक्ष सूना पड़ जाएगा?” यही वे बातें हैं जिन्हें लोग छोड़ना नहीं चाहते। वे अपनी दुर्दशा से मिलने वाले लाभों से प्रेम करते हैं जबकि उसी दुर्दशा की शिकायत भी करते रहते हैं। वे अपने व्यवसाय या करियर की शिकायत ठीक उसी प्रकार करते हैं जैसे कोई व्यक्ति अपनी प्रेमिका की शिकायत करता है। अर्थात् यदि तुम उनके वास्तविक भावों को ध्यान से देखो तो पाओगे कि वे उससे घृणा नहीं करते, उनका उससे केवल अस्थायी झगड़ा है। जो लोग लगातार रोते-शिकायत करते हैं और छोड़कर चले जाने की धमकी देते हैं, उन्हें ध्यान से परखो। तुम देखोगे कि उनका वहाँ रुके रहना स्वेच्छा से है। जिन चीज़ों को वे अपनी पीड़ा का कारण बताते हैं, वास्तव में वही चीज़ें वे चाहते थे और उन्हीं के बिना वे रह भी नहीं सकते।

    ऐसा ही है, लूसीलियस! दासता केवल कुछ लोगों को पकड़कर नहीं रखती बल्कि बहुत से लोग स्वयं दासता को पकड़े रहते हैं। लेकिन यदि तुम सचमुच अपनी दासता को त्यागना चाहते हो। यदि तुम्हारी स्वतंत्रता की इच्छा वास्तविक है। यदि प्रोत्साहन माँगने का तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि जो करना आवश्यक है, उसे निरंतर चिंता में पड़े बिना कर सको तो स्टोइक्स का पूरा समुदाय तुम्हारा उत्साहवर्धन करेगा। और वे ऐसा क्यों न करें? सभी ज़ेनो और क्रिसिप्पुस तुम्हें उसी मार्ग को चुनने के लिए प्रेरित करेंगे जो संयमित हो, जो सम्मानजनक हो और जो वास्तव में तुम्हारा अपना हो।

    लेकिन यदि तुम बार-बार पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश कर रहे हो कि अपने साथ कितना कुछ ले जा सकोगे अर्थात् निवृत्ति के बाद तुम्हारी आय कितनी होगी तो तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम अपना सूटकेस पकड़े रहोगे तब तक सुरक्षित तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच सकते। पहले अपना सिर पानी के ऊपर रखो और एक बेहतर जीवन जीना शुरू करो। ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दें पर उस प्रकार नहीं जिस प्रकार वे कुछ लोगों को देते प्रतीत होते हैं— मधुर मुस्कान के साथ उन्हें महान दुख प्रदान करके। क्योंकि ऐसे उपहार, जो अपने प्राप्तकर्ता को जलाते हैं और यातना देते हैं, देने के लिए देवताओं के पास केवल एक ही सफाई होती है। उन्होंने वही दिया था जिसकी उनसे प्रार्थना की गई थी।

    मैं अभी-अभी इस पत्र को सील कर रहा था लेकिन अब मुझे इसे फिर से खोलना पड़ रहा है ताकि यह अपनी छोटी-सी पारंपरिक भेंट के बिना यहाँ से न जाए बल्कि अपने साथ कोई सुंदर और सार्थक सूक्ति भी ले जाए। एक ऐसी सूक्ति अभी मेरे मन में आ रही है। मैं यह भी नहीं कह सकता कि वह अधिक सत्य है या अधिक सुंदर ढंग से कही गई है। “यह किसकी है?” तुम पूछते हो। यह एपिक्यूरस की है क्योंकि मैं अभी भी दूसरों के ख़ज़ानों से उधार ले रहा हूँ।

"हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।"

    जिसे चाहो देख लो— युवा, वृद्ध, या इनके बीच की किसी भी आयु का व्यक्ति, तुम पाओगे कि सभी मृत्यु से समान रूप से भयभीत हैं और जीवन के विषय में समान रूप से अज्ञानी हैं। किसी ने भी वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। जो कुछ हमारा अपना है, उसे हम सब भविष्य के लिए टालते रहते हैं।

    इस कथन में मुझे सबसे अधिक यह बात पसंद है कि यह वृद्ध लोगों को उनकी बालसुलभ अपरिपक्वता के लिए धिक्कारता है। वह कहता है, “हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।” यह सही नहीं है। जब हम मरते हैं तब हम जन्म के समय की अपेक्षा और भी बुरे हो चुके होते हैं। इसका दोष हमारी प्रकृति का नहीं हमारा अपना है। प्रकृति को तो हमारे विरुद्ध शिकायत करनी चाहिए और कहना चाहिए, “यह क्या है? मैंने तुम्हें संसार में बिना इच्छाओं, बिना भय, बिना अंधविश्वासी विश्वास, बिना विश्वासघात और उन सभी अन्य दोषों के भेजा था जो आज तुम्हें सताते हैं। कम-से-कम वैसे ही लौटो जैसे आए थे!” जो व्यक्ति उसी शांति के साथ मरता है जिस शांति के साथ वह जन्मा था, उसने बुद्धिमत्ता प्राप्त कर ली है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जैसे ही कोई संकट निकट आता है, हम काँपने लगते हैं। हमारी साँसें भारी हो जाती हैं, चेहरे का रंग उड़ जाता है, आँसू बहने लगते हैं और वह भी व्यर्थ। जब हम शांति के बिल्कुल द्वार पर खड़े होते हैं तब भी चिंतित रहते हैं। इससे अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है?

   लेकिन इसका कारण यह है कि हम हर प्रकार के वास्तविक कल्याण से रिक्त हैं। इसलिए जीवन का खो जाना हमें कष्टदायक प्रतीत होता है। हममें से किसी के लिए भी जीवन का कोई भाग वास्तव में लाभदायक नहीं बन पाता। हम उसे पूरा का पूरा खर्च कर देते हैं। वह हमारी उँगलियों के बीच से फिसल जाता है। कोई यह नहीं सोचता कि वह कितना अच्छा जीवन जी रहा है। सब केवल यह सोचते हैं कि वह कितने लंबे समय तक जीवित रहेगा। जबकि सच्चाई यह है कि हममें से प्रत्येक के पास अच्छा जीवन जीने का अवसर है लेकिन कोई भी लंबे समय तक जीवित रहने की गारंटी नहीं पा सकता।

अभी के लिए विदा 


प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21

प्रिय लूसीलियस

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा काम उन लोगों से है जिनके बारे में तुमने लिखा है? तुम्हारा सबसे बड़ा काम तो स्वयं अपने साथ है। समस्या वास्तव में तुम ही हो। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। तुम सम्मानजनक और सदाचारी आचरण की प्रशंसा तो करते हो पर उसका अनुसरण कम करते हो। तुम यह देख लेते हो कि सुख कहाँ है लेकिन उसे पाने का साहस नहीं जुटा पाते। इसलिए, क्योंकि तुम्हें यह स्पष्ट समझ नहीं है कि तुम्हें आगे बढ़ने से क्या रोक रहा है, मैं तुम्हें बतलाऊँगा।

By Giulio Vittini 

    तुम यह मानते हो कि जिन चीज़ों को तुम पीछे छोड़ने वाले हो, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। और जब तुम उस शांति की ओर नज़रें टिकाते हो जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। तब भी तुम उस जीवन की चमक पर ठहर जाते हो जिसे तुम पीछे छोड़ रहे हो ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति कीचड़ और अँधेरे में उतरने वाला हो। तुम भूल कर रहे हो, लूसीलियस! इस जीवन से उस जीवन की ओर जाना नीचे उतरना नहीं बल्कि ऊपर उठना है। तुम जानते हो कि आभा (glow) और झलकती चमक (gleam) में क्या अंतर है। एक अपने स्वयं के निश्चित स्रोत से प्रकाश देती है जबकि दूसरी किसी और से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करती है। इसी प्रकार इस जीवन और उस जीवन में भी अंतर है। यह जीवन ऐसी चमक से प्रकाशित है जो इसके बाहर से आती है। इसलिए जो भी उसके और प्रकाश के बीच आ जाए, वह इसे गहरे अँधेरे में डुबो सकता है। परन्तु वह जीवन अपने ही प्रकाश और तेज से आलोकित है। उसकी ज्योति उसकी अपनी है।

    तुम्हारा अध्ययन तुम्हें प्रसिद्ध बनाएगा। इस विषय में मैं एपिक्यूरस का एक उदाहरण प्रस्तुत करूँगा। जब वह इडोमिनीअस (Idomeneus) को पत्र लिख रहा था और उसे बाहरी आडंबर तथा दिखावटी जीवन से हटाकर विश्वसनीय और स्थायी यश की ओर लौटने के लिए बुला रहा था (यद्यपि उस समय इडोमेनेउस एक शक्तिशाली राजा का सहायक था और बड़े-बड़े कार्यों का भार संभाल रहा था), तब उसने कहा,  “यदि यश तुम्हारे लिए महत्त्व रखता है तो मेरे पत्र तुम्हें उन सभी बातों से अधिक प्रसिद्ध बनाएँगे जिनमें तुम इस समय लगे हुए हो और जिनके कारण दूसरे लोग तुम्हारी ओर आकर्षित होते हैं।”

    क्या वह सत्य नहीं कह रहा था? यदि एपिक्यूरस ने इडोमिनीअस को पत्र न लिखे होते तो उसके बारे में कौन जानता? वे सभी शक्तिशाली शासक और क्षत्रप, यहाँ तक कि वह राजा भी जिसने इडोमिनीअस को उसका पद प्रदान किया था, आज गुमनामी की गहराइयों में दफन हो चुके हैं। सिसरो के पत्र ही हैं जो एटिकस के नाम को नष्ट होने से बचाए हुए हैं। उससे उसे कोई लाभ न होता कि एग्रीप्पा ने उसकी पुत्री से विवाह किया था और टाइबेरियस ने उसकी पौत्री से या कि ड्रूसस सीज़र उसका प्रपौत्र था। इतने महान नामों के बीच उसका अपना नाम अब नहीं लिया जाता, यदि सिसरो ने उसे अपने पत्रों का प्राप्तकर्ता न बनाया होता। समय की वह खाई जो हम सबको अपने भीतर समेट लेगी, अत्यन्त गहरी है। कुछ ही प्रतिभाशाली मस्तिष्क उसके ऊपर अपना सिर उठा पाते हैं और यद्यपि अंततः उन्हें भी मौन में विलीन होना पड़ता है। फिर भी वे लंबे समय तक विस्मृति का प्रतिरोध करते हैं और अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करते रहते हैं।

    जो वचन एपिक्यूरस अपने मित्र को दे सका था, वही वचन मैं तुम्हें देता हूँ, लूसीलियस। मैं आने वाली पीढ़ियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करूँगा और अपने साथ दूसरों के नाम भी ले जा सकूँगा ताकि वे भी स्थायी रूप से बने रहें। हमारे कवि वर्जिल ने दो व्यक्तियों को चिरस्थायी स्मरण का वचन दिया था और वास्तव में उन्हें प्रदान भी किया:

“हे सौभाग्यशाली युगल! यदि मेरी कविताओं में कुछ सामर्थ्य है... 
तो कोई भी आने वाला दिन तुम्हें युगों की स्मृति से कभी मिटा नहीं सकेगा। 
जब तक एनीअस की संतति अटल कैपिटोल की चट्टान पर निवास करती रहेगी, 
और जब तक रोमन जाति का अधिपति शासन करता रहेगा,
तब तक तुम्हारा स्मरण भी बना रहेगा।”

    जिन लोगों को भाग्य ने घटनाओं और सत्ता के केंद्र में पहुँचा दिया है, जो दूसरों की शक्ति के सहभागी और भागीदार रहे हैं, उन्हें बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उनके यहाँ आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती है। परन्तु यह सब तब तक ही रहता है जब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। जैसे ही वे चले जाते हैं, उनका स्मरण भी समाप्त हो जाता है। किन्तु प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व का सम्मान समय के साथ बढ़ता जाता है। और यह सम्मान केवल स्वयं उन रचनाकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उन सभी बातों तक फैल जाता है जो उनकी स्मृति से जुड़ी होती हैं।
    
    अब मैं इडोमिनीअस को अपने पत्र में यूँ ही निःशुल्क स्थान नहीं दूँगा! उसे इसका मूल्य स्वयं चुकाना होगा। उसी को एपिक्यूरस ने वह सुंदर वचन लिखकर भेजा था जिसमें उसने उसे पायथोक्लीज़ को एक असाधारण और निस्संदिग्ध ढंग से समृद्ध बनाने की प्रेरणा दी थी। वह कहता है:

“यदि तुम पायथोक्लीज़ को धनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके धन में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए।”

    यह कथन इतना स्पष्ट है कि उसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं और इतना सुंदर ढंग से कहा गया है कि उसमें किसी सुधार की भी आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि इसे केवल धन-संपत्ति के संदर्भ में मत समझो। जहाँ कहीं भी इसे लागू किया जाएगा, इसका अर्थ वही रहेगा। यदि तुम पायथोक्लीज़ को सम्माननीय बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके सम्मान और पुरस्कारों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ निरंतर आनंद का अनुभव करे तो तुम्हें उसके सुखों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ एक लंबा और पूर्ण जीवन जिए तो तुम्हें उसके वर्षों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। तुम्हें इन कथनों को केवल एपिक्यूरस की संपत्ति नहीं समझना चाहिए; ये तो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। मेरा विचार है कि दार्शनिकों को सीनेट की प्रथा अपनानी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा मत प्रस्तुत करता है जिसका कुछ भाग मुझे पसंद आता है तो मैं उससे उसके मत को विभाजित करने के लिए कहता हूँ। फिर मैं उस भाग का अनुसरण करता हूँ जिसे मैं स्वीकार करता हूँ।

    एपिक्यूरस के ये उत्कृष्ट कथन एक और उद्देश्य भी पूरा करते हैं। यही कारण है कि मैं उनका उल्लेख करने के लिए और भी अधिक इच्छुक हूँ। वे उन लोगों को भी प्रमाणित करते हैं, जो निकृष्ट उद्देश्यों से उसकी शरण लेते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ उन्हें अपने दोषों के लिए आड़ मिल जाएगी कि वे जहाँ कहीं भी जाएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक और सदाचारपूर्ण जीवन ही जीना चाहिए। जब तुम एपिक्यूरस के उद्यानों में पहुँचोगे और वहाँ यह लिखित वचन देखोगे:

    “हे अतिथि, यहाँ तुम्हारा उत्तम सत्कार होगा; यहाँ सुख को सर्वोच्च कल्याण माना जाता है।”

    तब उस गृह का संरक्षक तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार मिलेगा। वह आतिथ्य और सद्भाव के साथ तुम्हें दलिये की एक थाली और पानी का एक भरपूर पात्र परोसेगा और कहेगा, “क्या यह उत्तम आतिथ्य नहीं है?” वह कहेगा, “ये उद्यान भूख को भड़काते नहीं बल्कि उसे शांत करते हैं। ये ऐसे पेय नहीं देते जो पीने वाले को और अधिक प्यासा बना दें बल्कि प्यास को उसके स्वाभाविक उपचार से बुझाते हैं, जो बिना किसी मूल्य के उपलब्ध है। यही वह सुख है जिसमें मैंने अपना जीवन बिताया है और इसी में वृद्धावस्था तक पहुँचा हूँ।”

    मैं अभी तुमसे उन इच्छाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें केवल समझाने-बुझाने से शांत नहीं किया जा सकता बल्कि जिन्हें समाप्त करने के लिए कुछ वास्तविक वस्तु देनी पड़ती है। जहाँ तक उन अनावश्यक इच्छाओं का संबंध है जिन्हें टाला जा सकता है, डाँटकर रोका जा सकता है या दबाया जा सकता है। मैं तुम्हें केवल इतना स्मरण दिलाता हूँ कि ऐसा सुख प्राकृतिक तो है पर आवश्यक नहीं। तुम उस पर किसी प्रकार के ऋणी नहीं हो जो कुछ भी तुम उसे देते हो, वह स्वेच्छा से देते हो। पेट उपदेश नहीं सुनता। वह केवल अपनी माँग करता है और आग्रह करता है। फिर भी वह कोई कठिन लेनदार नहीं है। उसे बहुत थोड़े में टाला जा सकता है। यदि तुम उसे उतना ही दो जितना उसका अधिकार है न कि उतना जितना तुम दे सकते हो।

अभी के लिए विदा 




Wednesday, 1 July 2026

दर्शन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 20

 प्रिय लूसीलियस

यदि तुम अच्छी प्रगति कर रहे हो और स्वयं को इस योग्य समझते हो कि एक दिन अपने ही स्वामी बन सको तो मुझे प्रसन्नता है। क्योंकि यदि मैं तुम्हें उस स्थिति से बाहर निकाल सकूँ, जहाँ तुम इस समय बिना किसी आशा के निकलने का मार्ग खोजते हुए भटक रहे हो तो यह मेरे लिए भी गौरव की बात होगी। लेकिन मैं तुमसे यह चाहता हूँ, प्रिय लूसीलियस... और इसी के लिए तुम्हें प्रेरित करता हूँ। दर्शन को अपने हृदय की गहराइयों तक उतरने दो और अपनी प्रगति की परीक्षा अपने भाषणों या लेखन से नहीं बल्कि अपने मन की दृढ़ता और अपनी इच्छाओं में आई कमी से करो। अपने कर्मों द्वारा अपने शब्दों को सत्य सिद्ध करो।




    जो लोग श्रोताओं की सहमति प्राप्त करना चाहते हैं, उनका उद्देश्य कुछ और होता है। आज के वे वक्ता जो केवल ऐसे युवकों के मनोरंजन के लिए लंबे और विविध प्रकार के प्रलाप प्रस्तुत करते हैं जिनके पास करने के लिए कोई सार्थक काम नहीं है, उनका उद्देश्य भी कुछ और होता है। दर्शन हमें बोलना नहीं बल्कि कर्म करना सिखाता है। उसकी अपेक्षा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति उसी आदर्श के अनुसार जीवन जिए जिसे उसने स्वयं अपने लिए निर्धारित किया है। उसका जीवन न तो स्वयं अपने भीतर विरोध में हो और न ही उसके कथनों से भिन्न हो। उसके सभी कार्यों में एक ही स्वर और एक ही संगति हो। यही बुद्धिमत्ता का मुख्य कार्य है। यही उसका सर्वोत्तम प्रमाण भी है कि कर्म शब्दों के अनुरूप हों। व्यक्ति हर स्थान पर एक-सा बना रहे। वह स्वयं के अनुरूप हो। "क्या ऐसा कोई व्यक्ति है?" बहुत अधिक नहीं लेकिन कुछ अवश्य हैं। यह वास्तव में कठिन है। मेरा यह आशय भी नहीं है कि बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा एक जैसे कदम उठाता है बल्कि केवल इतना है कि वह एक ही मार्ग पर चलता है।

    इसलिए स्वयं का परीक्षण करो। क्या तुम्हारा पहनावा तुम्हारे घर-परिवार की स्थिति से मेल नहीं खाता? क्या तुम अपने ऊपर तो उदारतापूर्वक खर्च करते हो लेकिन अपने परिवार के प्रति कंजूसी बरतते हो? क्या तुम भोजन में सादगी दिखाते हो लेकिन भवन-निर्माण और निर्माण-कार्य पर अत्यधिक खर्च करते हो? एक बार और हमेशा के लिए जीवन जीने का कोई एक नियम अपनाओ और अपने पूरे जीवन को उसके अनुरूप बना लो। कुछ लोग घर में तो अत्यधिक मितव्ययिता दिखाते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं और ठाठ-बाट से रहते हैं। यह असंगति एक दोष है। यह इस बात का संकेत है कि मन अभी भी डगमगा रहा है और उसने अभी तक अपने वास्तविक स्वभाव को दृढ़ता से नहीं अपनाया है।

    इसके अतिरिक्त, मैं तुम्हें बताऊँगा कि यह असंगति, यह कर्म और अभिप्राय के बीच का अंतर, कहाँ से उत्पन्न होता है। कोई भी व्यक्ति इस बात पर स्थिर होकर विचार नहीं करता कि वह वास्तव में क्या चाहता है. यदि करता भी है तो उस पर दृढ़ नहीं रहता। बल्कि उससे हट जाता है। वह केवल अपने आचरण में परिवर्तन ही नहीं करता बल्कि पीछे की ओर लौट जाता है और फिर वही व्यवहार अपनाने लगता है, जिसे वह त्याग देने की शपथ ले चुका था। इसलिए मैं बुद्धिमत्ता की पुरानी परिभाषाओं को एक ओर रखकर तुम्हें ऐसी परिभाषा दूँगा जो सम्पूर्ण मानवीय जीवन-पद्धति को समेट ले। यह परिभाषा मुझे संतोषजनक लगती है। बुद्धिमत्ता क्या है? सदैव एक ही चीज़ की इच्छा करना और सदैव एक ही चीज़ को अस्वीकार करना। इसमें यह शर्त जोड़ने की भी आवश्यकता नहीं कि जिसकी इच्छा की जाए वह उचित हो क्योंकि केवल उचित और सही वस्तु के प्रति ही मनुष्य की इच्छा निरंतर और एकरूप बनी रह सकती है।

    इसी कारण लोग यह नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, सिवाय उस क्षण के जब उनकी इच्छा जागृत होती है। किसी ने भी अपने जीवन के लिए समग्र रूप से यह निर्णय नहीं किया है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए। उनका निर्णय प्रतिदिन बदलता रहता है और अक्सर अपने ही विपरीत रूप में परिवर्तित हो जाता है। बहुत से लोग जीवन ऐसे जीते हैं मानो वह कोई खेल हो। इसलिए जिस मार्ग पर तुम चलना प्रारम्भ कर चुके हो, उसी पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहो। सम्भव है कि वह तुम्हें शिखर तक पहुँचा दे। यदि वहाँ तक न भी पहुँचा सके तो कम-से-कम तुम्हें ऐसे स्थान तक अवश्य ले जाएगा जहाँ तुम स्वयं जान सकोगे कि यह अभी शिखर नहीं है।

    तुम कहते हो, “यदि परिवार की आय समाप्त हो गई, तो मेरे आश्रितों और अनुयायियों के उस समूह का क्या होगा?” जब तुम उस समूह का पालन-पोषण करना बंद कर दोगे तो वह स्वयं अपना पालन करने लगेगा। और यदि ऐसा न हुआ तो निर्धनता तुम्हें वह बात सिखा देगी जिसे तुम स्वयं को नहीं सिखा पा रहे हो। तुम्हारे सच्चे और वास्तविक मित्र तब भी तुम्हारे साथ बने रहेंगे, जबकि जो लोग तुमसे नहीं बल्कि किसी और लाभ से जुड़े हुए थे, वे तुम्हें छोड़कर चले जाएँगे। यदि किसी और कारण से नहीं तो क्या केवल इसी कारण निर्धनता से प्रेम नहीं किया जाना चाहिए? वह तुम्हें दिखा देगी कि तुम्हारे मित्र वास्तव में कौन हैं। आह! वह दिन कब आएगा जब कोई व्यक्ति तुम्हारे पद, अधिकार या प्रतिष्ठा के कारण तुमसे झूठ नहीं बोलेगा!

    इसलिए अपनी अन्य सभी प्रार्थनाएँ ईश्वर के हाथों में छोड़ दो और अपने विचारों, अपनी चिंताओं तथा अपनी इच्छाओं को केवल इसी एक बात पर केंद्रित करो। अपने आप से संतुष्ट रहने पर और उन शुभ वस्तुओं से संतुष्ट रहने पर जो तुम्हारे अपने भीतर से उत्पन्न होती हैं। इससे अधिक निकट और कौन-सी समृद्धि हो सकती है? स्वयं को उस छोटी-सी संपदा तक सीमित कर लो जिसे भाग्य या संयोग तुमसे छीन नहीं सकता।

    और ताकि तुम्हारे लिए ऐसा करना अधिक सरल हो जाए। इस पत्र के साथ भेजी जाने वाली भेंट भी उसी विषय का उल्लेख करेगी। मैं उसे तुरंत प्रस्तुत करता हूँ। यद्यपि तुम शिकायत कर सकते हो फिर भी मैं अपनी यह देनदारी प्रसन्नतापूर्वक चुकाऊँगा और वह भी एपिक्यूरस के माध्यम से:

“मुझ पर विश्वास करो, तुम्हारी वाणी एक साधारण बिछौने पर और जर्जर वस्त्रों में कहीं अधिक प्रभावशाली होगी। तब तुम केवल बोल ही नहीं रहे होगे। तुम अपने कथनों का प्रमाण भी दे रहे होगे।”

    हमारे मित्र दिमित्रीयस (Demetrius) के शब्दों को मैं निश्चित ही एक भिन्न ढंग से सुनता हूँ, जब मैंने यह देखा कि वह किस प्रकार सोते थे। न केवल गद्दे के बिना बल्कि कंबल के बिना भी। वह केवल सत्य का उपदेश नहीं देते, वे उसके साक्षी भी बनते हैं।

    “यह क्या? क्या कोई व्यक्ति धन को अपनी जेब में रखते हुए भी उसका तिरस्कार नहीं कर सकता?” क्यों नहीं? उस व्यक्ति में भी महान आत्मबल होता है जो अपने चारों ओर धन का अंबार लगा हुआ देखता है और इस आश्चर्य पर खुलकर हँस पड़ता है कि यह सब उसके पास कैसे आ गया। दूसरे लोग उसे बताते हैं कि यह धन उसका है। स्वयं उसे तो मानो इसका पूरा एहसास भी नहीं होता। वैभव के बीच रहते हुए भी उससे भ्रष्ट न होना एक महान बात है। वह व्यक्ति महान है जो अपनी संपत्ति के बीच रहते हुए भी मन से निर्धन बना रहता है।

    तुम कहते हो, “मैं नहीं जानता कि ऐसा व्यक्ति यदि निर्धनता में आ जाए तो उसे किस प्रकार सहन करेगा।” मैं भी नहीं जानता, एपिक्यूरस, कि तुम्हारा वह निर्धनता का गर्व करने वाला व्यक्ति यदि धन-संपत्ति प्राप्त कर ले तो क्या वह तब भी धन का उसी प्रकार उपहास करेगा। इसलिए हमें दोनों के मन का परीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या एक व्यक्ति अपनी निर्धनता में प्रसन्न है। क्या दूसरा अपनी संपन्नता में आसक्त हुए बिना रह सकता है। अन्यथा केवल खाट पर सोना और फटे-पुराने वस्त्र पहनना अच्छे चरित्र का बहुत बड़ा प्रमाण नहीं है। यदि यह स्पष्ट न हो कि व्यक्ति उन्हें विवशता से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से स्वीकार कर रहा है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि कोई व्यक्ति उन साधारण वस्तुओं से ऐसे नहीं भागता मानो उनसे बेहतर कुछ और हो बल्कि स्वयं को पहले से ही उनके लिए तैयार रखता है और उन्हें सहन करना सरल समझता है। वास्तव में, लूसीलियस, यह सरल ही नहीं है जब कोई पहले से इसका अभ्यास कर लेता है तो यह सुखद भी हो जाता है क्योंकि ऐसे जीवन में एक ऐसी वस्तु होती है जिसके बिना कोई भी दूसरी वस्तु आनंददायक नहीं हो सकती और वह है मन की शांति।

    इसलिए मुझे लगता है कि वह करना सचमुच आवश्यक है जिसकी मैंने तुम्हें अपने पत्र में सलाह दी थी और जिसे महान व्यक्तियों ने अनेक बार किया है। कुछ दिन ऐसे निर्धारित करो जिनमें हम जान-बूझकर निर्धनता का अभ्यास करें और स्वयं को वास्तविक विपत्ति के लिए तैयार करें। हमें यह और भी अधिक करना चाहिए क्योंकि हम विलासिताओं में डूबे हुए हैं और हर चीज़ को कठोर तथा कठिन समझने लगे हैं। बेहतर है कि मन को उसकी नींद से जगाया जाए। उसे झकझोरा जाए और उसे याद दिलाया जाए कि हमारी प्रकृति को वास्तव में कितनी कम चीज़ों की आवश्यकता होती है। कोई भी मनुष्य धनी पैदा नहीं होता। जो भी इस संसार में जन्म लेता है, उसे केवल दूध और थोड़े-से वस्त्र में संतुष्ट रहने का आदेश मिलता है। हम ऐसी ही शुरुआत से आते हैं और फिर भी अब हमारे लिए पूरे-के-पूरे राज्य भी पर्याप्त नहीं रह गए हैं!

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Wednesday, 24 June 2026

जीवन-दर्शन के संदर्भ में -- पत्र - 19

 प्रिय लूसीलियस 

जब भी तुम्हारा कोई पत्र मुझे प्राप्त होता है, मैं अत्यन्त प्रसन्न हो उठता हूँ क्योंकि वे मुझे बड़ी आशा से भर देते हैं। अब वे केवल तुम्हारी ओर से आश्वासन नहीं दे रहे, अब तो हमारे पास तुम्हारी गंभीर प्रतिज्ञा है। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, नहीं, मैं तुमसे विनती करता हूँ कि ऐसा ही करते रहो। क्योंकि मैं अपने मित्र से उसके ही हित के लिए जो माँग सकता हूँ, उससे बेहतर और क्या माँग हो सकती है? यदि सम्भव हो तो अपने उस व्यवसाय या व्यस्त जीवन से धीरे-धीरे स्वयं को मुक्त कर लो। यदि यह सम्भव न हो तो उससे स्वयं को बलपूर्वक अलग कर लो। हम पहले ही बहुत समय व्यर्थ गँवा चुके हैं। अब वृद्धावस्था हमारे सामने आ पहुँची है इसलिए समय आ गया है कि हम अपनी यात्रा का सामान समेटना शुरू करें। निश्चय ही, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। हमने जीवन समुद्र में यात्रा करते हुए बिताया है। अब हमें बंदरगाह में पहुँचकर मरना चाहिए।



    मैं यह नहीं चाहता कि तुम अपने एकांतवास या सार्वजनिक जीवन से निवृत्ति को प्रसिद्धि प्राप्त करने का साधन बनाओ। न तुम्हें उसका प्रदर्शन करना चाहिए और न ही उसे छिपाने का प्रयास करना चाहिए। मैं तुम्हें कभी इस सीमा तक नहीं ले जाना चाहूँगा कि तुम मानव-जाति की मूर्खता को कोसते हुए किसी गुफा में जाकर छिप बैठो। प्रयत्न करो कि तुम्हारा एकांत ऐसा हो जो लोगों की दृष्टि में आए परन्तु दिखावे का विषय न बने। जो लोग अभी अपने जीवन की दिशा तय करने की प्रारम्भिक अवस्था में हैं, वे यह विचार कर सकते हैं कि क्या वे "गुमनामी में जीवन बिताना" चाहते हैं। लेकिन तुम्हारे लिए यह विकल्प खुला नहीं है। तुम्हारी प्रखर प्रतिभा, तुम्हारे उत्कृष्ट लेखन और तुम्हारे प्रतिष्ठित संबंधों ने तुम्हें पहले ही लोगों के सामने ला खड़ा किया है। अब ख्याति ने तुम्हें अपने अधिकार में ले लिया है। यदि तुम स्वयं को छिपाने का प्रयास भी करो, यदि तुम पूरी तरह संसार से ओझल हो जाओ, तब भी तुम्हारी पूर्व उपलब्धियाँ लोगों का ध्यान तुम्हारी ओर खींचती रहेंगी। तुम पूर्ण अंधकार प्राप्त नहीं कर सकते। तुम जहाँ कहीं भी भागोगे, तुम्हारे पूर्व जीवन का बहुत-सा प्रकाश तुम्हारे साथ-साथ चलता रहेगा।

    तुम बिना किसी के प्रति कटुता रखे, बिना किसी चीज़ की कमी महसूस किए और बिना किसी पीड़ा के अपना विश्राम प्राप्त कर सकते हो। आख़िर ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे छोड़ने का तुम्हें दुख होना चाहिए? क्या तुम्हारे अनुयायी? वे तुम्हारे पीछे नहीं चलते न ही उनमें से कोई वास्तव में तुम्हारा अनुसरण करता है। वे तो उस लाभ का अनुसरण करते हैं जो उन्हें तुमसे मिल सकता है। पहले लोग मित्रता की तलाश में आते थे अब वे लाभ और हिस्से की आशा में आते हैं। जैसे ही कोई निःसंतान वृद्ध अपनी वसीयत बदल देता है, वे उसी क्षण किसी दूसरे के द्वार पर जाना शुरू कर देते हैं। महान वस्तुएँ छोटी कीमत देकर प्राप्त नहीं होतीं। ज़रा हिसाब लगाओ, तुम क्या छोड़ना अधिक उचित समझोगे-- अपनी कुछ संपत्ति या स्वयं अपने आप को?

    काश, तुम्हारा भाग्य ऐसा होता कि तुम उसी स्थिति में वृद्ध होते जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ था! काश, भाग्य ने तुम्हें जीवन के गहरे और उथल-पुथल भरे समुद्र में न धकेला होता! सच्चे और स्वस्थ जीवन का मार्ग तुम्हारी आँखों के सामने था लेकिन तुम्हारी तीव्र उन्नति, तुम्हारा प्रांतीय शासन-पद और उनसे जुड़ी आशाओं ने तुम्हें उससे बहुत दूर पहुँचा दिया है। अब तुम्हारी प्रतीक्षा में और भी ऊँचे पद हैं और एक उपलब्धि दूसरी उपलब्धि का मार्ग खोलेगी। लेकिन इसका अंत कहाँ होगा? तुम उस समय की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो जब चाहने के लिए कुछ भी शेष न रह जाए? वह समय कभी नहीं आएगा। हम कहते हैं कि कारणों की एक श्रृंखला होती है जो मिलकर भाग्य का जाल बनाती है। निश्चय ही इच्छाओं की भी एक श्रृंखला होती है। एक इच्छा का अंत दूसरी इच्छा की शुरुआत बन जाता है।

    जिस जीवन में तुम डूब गए हो, वह अंतहीन दुःख और दासता का जीवन है और वह स्वयं तुम्हें कभी मुक्त नहीं करेगा। तुम्हारी गर्दन इस जुए से छिल चुकी है। इसे स्वयं उतार फेंको। एक ही झटके में इसका टूट जाना कहीं बेहतर है बजाय इसके कि जीवन भर इसके बोझ तले दबे रहो। यदि तुम अपने साधनों को एक साधारण निजी नागरिक की आवश्यकताओं तक सीमित कर लो तो तुम्हारे पास वस्तुएँ कम होंगी परन्तु तुम्हारी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त होंगी। लेकिन अभी तुम्हारे पास वस्तुओं के बड़े-बड़े ढेर हैं, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं हो। तुम क्या पसंद करोगे— अभाव के बीच संतोष या प्रचुरता के बीच कमी का अनुभव? समृद्धि लालची होती है और दूसरों की लालसा का भी लक्ष्य बनती है। जब तक तुम्हारे लिए कोई भी चीज़ पर्याप्त नहीं है तब तक तुम भी किसी और के लिए पर्याप्त नहीं होगे।

    “मैं इससे बाहर कैसे निकलूँ?” तुम पूछते हो। जैसे भी संभव हो, निकल आओ। सोचो, धन कमाने के लिए तुमने कितने जोखिम उठाए हैं और यश प्राप्त करने के लिए कितने परिश्रम सहे हैं। विश्राम और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तुम्हें उतना ही साहसी होना चाहिए। अन्यथा तुम्हें प्रांतीय शासन की चिंताओं के बीच ही वृद्ध होना पड़ेगा और उसके बाद नगर के दायित्वों के बीच, एक ऐसे तूफ़ान में, ऐसी लहरों के बीच जो बार-बार उठती रहती हैं और जिनसे तुम संयम तथा शांत जीवन के सहारे भी बच नहीं सकते। तुम विश्राम चाहते हो लेकिन उससे क्या होता है? तुम्हारी सफलता कुछ और ही चाहती है। और तुम अब भी उसे बढ़ने दे रहे हो! तुम जितनी अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम्हें भय में जीना पड़ेगा।

    इस अवसर पर मैं तुम्हारा ध्यान मैकेनस के एक कथन की ओर दिलाना चाहूँगा क्योंकि उसने यातना की अवस्था में भी सत्य ही कहा था--“ऊँची से ऊँची चोटी भी स्वयं बिजली के प्रहार को अपनी ओर आकर्षित करती है।”

(अर्थात जितना ऊँचा व्यक्ति पद, शक्ति या प्रतिष्ठा में उठता है उतना ही वह जोखिम, भय और संकटों का लक्ष्य बन जाता है।)

    यदि तुम पूछो कि उसका यह कथन किस पुस्तक में मिलता है तो वह प्रोमेथियस नामक रचना में लिखा हुआ है। उसका आशय यह था कि बिजली उन्हीं स्थानों पर गिरती है जो सबसे ऊँचे होते हैं। मुझे बताओ, क्या किसी भी प्रकार की सत्ता या शक्ति के बदले इतनी उलझी हुई और विकृत भाषा में बोलना तुम्हें उचित लगेगा? मैकेनस स्वभाव से प्रतिभाशाली व्यक्ति था और वह रोमन वाक्पटुता का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता था किन्तु समृद्धि ने उसे दुर्बल बना दिया बल्कि कहें कि उसकी शक्ति और स्वाभाविक क्षमता को ही नष्ट कर दिया। यदि तुमने अपनी नौका के पाल नहीं समेटे, यदि तुमने किनारे के अधिक निकट चलने का मार्ग नहीं चुना तो तुम्हारी भी यही दशा होने वाली है। मैकेनस भी ऐसा करना चाहता था लेकिन उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी।

    मैं मैकेनस के इसी कथन का उपयोग करके तुम्हारे साथ अपना हिसाब बराबर कर सकता था लेकिन मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम इस पर आपत्ति उठाओगे और मेरी इस अदायगी को स्वीकार नहीं करोगे जब तक कि वह किसी गंभीर और उच्च चरित्र वाले व्यक्ति की ओर से न आई हो। इसलिए जैसा कि प्रायः होता है। मुझे फिर एपिक्यूरस का सहारा लेना पड़ेगा, “अपने भोजन से अधिक अपने भोजन-सहचर पर ध्यान दो क्योंकि मित्र के बिना भोजन करना सिंह या भेड़िए जैसा जीवन जीना है।”

    यह तुम्हारे लिए तब तक संभव नहीं है जब तक तुम सार्वजनिक जीवन से निवृत्त नहीं हो जाते। अन्यथा तुम ऐसे अतिथियों के साथ भोजन करोगे जिन्हें तुम्हारा सचिव तुम्हारे सामाजिक आगंतुकों की भीड़ में से चुनकर भेजेगा। किसी मित्र की तलाश स्वागत-कक्ष में करना और फिर भोजन की मेज़ पर उसकी परीक्षा लेना एक भूल है। यह व्यस्त और सांसारिक जीवन की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है, जहाँ मनुष्य अपनी संपत्ति और स्वार्थों में इतना उलझ जाता है कि वह यह मान बैठता है कि लोग उसके मित्र हैं जबकि वह स्वयं उनका मित्र नहीं होता। तुम सोचते हो कि जो उपकार तुम लोगों पर कर रहे हो, वे उन्हें तुम्हारा पक्षधर बना रहे हैं लेकिन कुछ लोगों के मामले में जितना अधिक वे तुम्हारे ऋणी होते जाते हैं उतनी ही अधिक उनकी घृणा बढ़ती जाती है। छोटा ऋण एक ऋणी पैदा करता है; लेकिन बड़ा ऋण एक शत्रु पैदा कर देता है।

    “क्या? क्या उपकार मित्रता उत्पन्न नहीं करते?” करते हैं, यदि यह चुनने की स्वतंत्रता हो कि उपकार किस पर किया जाए और यदि वे केवल बिखेरी हुई दान-दक्षिणा न होकर सोच-समझकर किए गए निवेश हों। इसलिए चूँकि अब तुम स्वयं अपने निर्णय लेने की अवस्था में प्रवेश कर रहे हो, दार्शनिकों की यह शिक्षा याद रखो।  महत्त्व उपकार का नहीं बल्कि उस व्यक्ति का है जिस पर उपकार किया जा रहा है।


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Tuesday, 23 June 2026

कम संसाधनों में जीवन जीने की कला के संदर्भ में -- पत्र - 18

प्रिय लूसीलियस

दिसम्बर का महीना है और नगर पहले से भी अधिक पसीना बहा रहा है। लोगों को खुलेआम भोग-विलास की छूट मिल गई है और हर ओर तैयारियों का बड़ा कोलाहल है, मानो सैटर्नेलिया के दिन और सामान्य कार्यदिवस में वास्तव में कोई अंतर हो। परन्तु सच में उनमें तनिक भी अंतर नहीं है। इसलिए मैं उस व्यक्ति से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने कहा था कि जो कभी केवल दिसम्बर का महीना हुआ करता था, वह अब पूरा वर्ष बन गया है।



    यदि तुम यहाँ होते तो मैं तुमसे यह पूछना चाहता कि ऐसी स्थिति में हमारा आचरण कैसा होना चाहिए। क्या हमें अपनी दैनिक दिनचर्या में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए? या फिर, सामान्य प्रथा के विपरीत दिखाई न देने के लिए हमें भी अपने भोजों को सामान्य से अधिक उत्सवपूर्ण बना लेना चाहिए और टोगा को एक ओर रख देना चाहिए? क्योंकि जो काम पहले केवल किसी उथल-पुथल या राज्य के किसी संकट के समय ही किया जाता था, वही अब हम केवल त्योहार के आनंद के लिए करते हैं। हम अपने पहनावे का ढंग बदल लेते हैं।

    यदि मैं तुम्हें ठीक से जानता हूँ तो तुम मध्यस्थ का मार्ग अपनाते। तुम न तो यह चाहते कि हम उत्सव में टोपी पहनकर भीड़ जैसे ही बन जाएँ, और न ही यह कि हम उनसे पूरी तरह अलग दिखाई दें। फिर भी, सम्भव है कि इन्हीं दिनों में मनुष्य को अपने मन पर पहले से अधिक नियंत्रण रखना चाहिए और उसे यह आदेश देना चाहिए कि वह सुख-भोगों से दूर रहे, ठीक उसी समय जब बाकी सब लोग उनमें डूबे हुए हों। क्योंकि यदि मन आगे बढ़कर उन विलासिताओं की ओर आकर्षित नहीं होता जो अंततः पतन और उच्छृंखलता की ओर ले जाती हैं, तो वह अपनी शक्ति का अत्यन्त विश्वसनीय प्रमाण देता है। निस्सन्देह, अधिक साहसिक मार्ग तो यही है कि जब सब लोग मदिरापान करके मतवाले हो रहे हों और उल्टियाँ कर रहे हों, तब भी व्यक्ति पूर्णतः संयमित और सचेत बना रहे। किन्तु दूसरा मार्ग अधिक संतुलित है। न स्वयं को सबसे अलग करके खड़ा करना न अपने ऊपर अनावश्यक ध्यान आकर्षित करना और फिर भी हर बात में भीड़ के साथ न बह जाना अर्थात् जो अन्य लोग करते हैं, वही करना, पर उसी ढंग से नहीं करना। क्योंकि उत्सव मनाया जा सकता है बिना उच्छृंखलता और आत्म-विस्मृति में डूबे हुए।

    लेकिन मैं यह परखना चाहता हूँ कि तुम्हारा मन वास्तव में कितना दृढ़ है। इसलिए मैं तुम्हें वही अभ्यास बताऊँगा जिसकी शिक्षा महान व्यक्तियों ने दी है। अपने लिए कुछ दिनों की ऐसी अवधि निर्धारित करो जिसमें तुम बहुत थोड़े भोजन से, वह भी सबसे सस्ते प्रकार के भोजन से, संतुष्ट रहो और खुरदरे तथा असुविधाजनक वस्त्र पहनो। फिर अपने आप से पूछो,“क्या यही वह चीज़ थी जिससे मैं डरता था?” जब मन चिंताओं से मुक्त हो, वही समय है जब उसे विपत्तियों के लिए तैयार करना चाहिए। भाग्य की कृपा के बीच रहते हुए ही मनुष्य को भाग्य के आघातों का सामना करने के लिए स्वयं को सुदृढ़ बनाना चाहिए। सैनिक शांति के समय भी दौड़ का अभ्यास करता है। वह तब भी किलेबंदी खड़ी करता है जब सामने कोई शत्रु नहीं होता। वह स्वयं को अतिरिक्त परिश्रम से थकाता है ताकि जब वास्तव में परिश्रम की आवश्यकता पड़े, तब वह उसके योग्य शक्ति रखता हो। यदि तुम चाहते हो कि कोई व्यक्ति संकट के समय भयभीत न हो तो उसे पहले से ही उसका अभ्यास कराओ।

    यही उन लोगों की साधना थी जो प्रत्येक महीने कुछ समय के लिए स्वयं पर ऐसी गरीबी का अनुशासन लागू करते थे जो लगभग दीनता की सीमा तक पहुँच जाती थी। इसका उद्देश्य यह था कि यदि वे अभाव का अभ्यास कर चुके होंगे तो उससे कभी भयभीत नहीं होंगे। यह मत समझना कि मैं तुम्हें टिमोन के भोजों, भिखारियों की कोठरियों या उन अन्य दिखावटी उपायों की सलाह दे रहा हूँ जिन्हें ऐश्वर्य से ऊब चुकी विलासिता केवल खेल के रूप में अपनाती है। तुम्हारा बिछौना सचमुच साधारण हो, तुम्हारा कंबल वास्तव में टाट का हो और तुम्हारी रोटी सचमुच कठोर और मोटी हो। इसे तीन-चार दिनों तक सहो और कभी-कभी उससे भी अधिक समय तक ताकि यह कोई खेल न रह जाए बल्कि एक वास्तविक परीक्षा बन जाए। मुझ पर विश्वास करो लूसीलियस, कुछ ही सिक्कों में पेट भरकर भोजन करना तुम्हें रोमांचक लगेगा। तब तुम समझोगे कि निश्चिंत रहने के लिए भाग्य की सहायता आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रतिकूल भाग्य भी तुम्हारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन प्रदान कर देता है। फिर भी इस कारण यह मत समझना कि तुम कोई महान कार्य कर रहे हो। तुम केवल वही करोगे जो हज़ारों दास और गरीब लोग प्रतिदिन करते हैं। अपने बारे में अच्छा केवल इस बात पर सोचो कि तुम यह सब किसी मजबूरी में नहीं बल्कि अपनी इच्छा से कर रहे हो। यह कि तुम्हें इसे सदा सहना उतना ही सरल लगेगा जितना कभी-कभार इसका अभ्यास करना। आओ, कुछ अभ्यास-युद्ध लड़ें, आओ, गरीबी को अपना साथी बना लें ताकि भाग्य हमें कभी अचानक असहाय न पकड़ सके। यदि हम जान लें कि गरीब होना वास्तव में कितनी तुच्छ बात है तो समृद्धि के समय भी हम कम चिंतित रहेंगे।

    यहाँ तक कि सुख के महान ज्ञाता एपिक्यूरस भी कुछ ऐसे दिन निर्धारित करते थे जिनमें वे अपनी भूख को केवल मुश्किल से शांत करते थे। वे यह देखने के लिए ऐसा करते थे कि क्या इससे उनके पूर्ण और सर्वोच्च सुख में कोई कमी आती है। यदि आती भी है तो कितनी और क्या वह अंतर इतना बड़ा है कि उसके लिए कोई व्यक्ति भारी परिश्रम करने को उचित समझे। निस्संदेह, यही बात वह उस पत्र में कह रहा है जो उसने पॉलीएनस को, कैरिनस के मजिस्ट्रेट रहने के समय लिखा था। वहाँ वह गर्व से कहता है कि उसका भोजन एक काँस्य-मुद्रा से भी कम खर्च में हो जाता है जबकि मेट्रोडोरस जो अभी उतनी प्रगति नहीं कर पाया है। उसे एक पूरी मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे भोजन से कोई तृप्त हो सकता है? वास्तव में उसमें भी आनंद है।  वह कोई तुच्छ या क्षणिक आनंद नहीं है। ऐसा आनंद नहीं जिसे बार-बार भरना पड़े बल्कि स्थिर और निश्चित आनंद। क्योंकि यद्यपि पानी, जौ का पतला दलिया या सूखी रोटी का टुकड़ा अपने आप में कोई विशेष स्वादिष्ट वस्तु नहीं हैं, फिर भी यह एक बहुत बड़ा सुख है कि मनुष्य इन साधारण वस्तुओं से भी आनंद प्राप्त कर सके और स्वयं को ऐसी अवस्था में पहुँचा दे जिसे कोई भी प्रतिकूल भाग्य नष्ट न कर सके। कारागार में मिलने वाला भोजन इससे अधिक उदार होता है। मृत्यु-दण्ड पाए हुए अपराधियों के प्रति भी जल्लाद इतना कंजूस नहीं होता। इसलिए कितना महान है वह मन जो अपनी इच्छा से ऐसी कठोरता को स्वीकार करता है जो सबसे बुरे अपराधियों को दी जाने वाली सज़ा से भी अधिक कठोर है! भाग्य के बाणों को निष्प्रभावी करने का यही उपाय है।

    इसलिए प्रिय लूसीलियस, अब आरम्भ करो। उन लोगों की परम्परा का अनुसरण करो और कुछ ऐसे दिन निर्धारित करो जिनमें तुम अपनी संपत्ति और सुविधाओं से अलग रहो तथा अभाव को अपना साथी बना लो। गरीबी के साथ जीना सीखना शुरू करो।

साहस करो, हे मेरे अतिथि, केवल धन-संपत्ति से ऊपर उठने का
और स्वयं को भी ऐसा रूप दो
जो ईश्वर की समानता के योग्य हो।

    कोई भी व्यक्ति ईश्वर के योग्य नहीं हो सकता जब तक वह धन-संपत्ति से ऊपर न उठ जाए। मैं तुम्हें धन रखने से नहीं रोकता। मैं केवल यह चाहता हूँ कि धन के स्वामी होते हुए भी तुम उससे निर्भय रहो। इसे प्राप्त करने का एकमात्र उपाय यह है कि तुम स्वयं को यह विश्वास दिलाओ कि उसके बिना भी तुम सुखी रह सकते हो। धन को ऐसी वस्तु समझो जो किसी भी क्षण तुमसे छिन सकती है।

    अब इस पत्र को समेटना आरम्भ करें। “पहले अपना ऋण चुकाओ!” तुम कहते हो। मैं तुम्हें एपिक्यूरस के पास भेजता हूँ। यह भुगतान उसी के द्वारा किया जाएगा। अत्यधिक और सीमा से परे बढ़ा हुआ क्रोध पागलपन को जन्म देता है।

    हो नहीं सकता पर फिर भी तुम इसकी सत्यता को न जानो। क्योंकि तुम्हारे पास दास भी रहे हैं और शत्रु भी। यह भाव हर प्रकार के लोगों के विरुद्ध भड़क उठता है। यह उतना ही प्रेम से उत्पन्न होता है जितना घृणा से और उतना ही हमारे व्यापारिक व्यवहारों में प्रकट होता है जितना कि हँसी-मज़ाक और खेल-कूद के अवसरों पर। उत्तेजना का कारण बड़ा है या छोटा इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। जो बात वास्तव में महत्त्व रखती है वह है उस मन की अवस्था जो उत्तेजित हुआ है। क्रोध अग्नि के समान है। इसमें यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि ज्वाला कितनी बड़ी है बल्कि यह कि उसके मार्ग में क्या पड़ा है। यदि पदार्थ ठोस और दृढ़ हो तो बहुत बड़ी आग भी उसे नहीं जला पाती। लेकिन सूखी और शीघ्र सुलगने वाली वस्तु एक छोटी-सी चिनगारी से भी आग पकड़ लेती है और उसे भयंकर दावानल में बदल देती है। प्रिय लूसीलियस, क्रोध के साथ भी यही होता है। तीव्र क्रोध का परिणाम पागलपन होता है। इसलिए हमें क्रोध से केवल इसलिए नहीं बचना चाहिए कि हम संयम बनाए रखें बल्कि इसलिए कि हम अपनी मानसिक स्वस्थता और विवेक को सुरक्षित रख सकें।

अभी के लिए विदा 

दर्शन द्वारा मन को उत्कृष्ट बनाने के संदर्भ में -- पत्र - 17

प्रिय लूसीलियस 

यदि तुम बुद्धिमान हो या बुद्धिमान बनना चाहते हो तो इन सबको फेंक दो। अपनी पूरी गति और अपनी पूरी शक्ति के साथ मन की उत्कृष्टता की ओर बढ़ो। यदि कोई चीज़ तुम्हें रोक रही हो तो उसकी गाँठ खोल दो और यदि वह न खुले तो उसे काट दो।



    “जो मुझे रोक रहा है,” तुम कहते हो, “वह मेरा पारिवारिक व्यवसाय है। मैं उसे इस प्रकार व्यवस्थित कर देना चाहता हूँ कि जब मैं स्वयं निष्क्रिय रहूँ तब भी वह मेरा भरण-पोषण कर सके ताकि न तो गरीबी मेरे लिए बोझ बने और न मैं किसी और के लिए।” जब तुम यह कहते हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि जिस शुभ वस्तु को तुम लक्ष्य बना रहे हो उसके अर्थ और शक्ति को तुम पूरी तरह नहीं समझते। तुम सामान्य रूप से यह तो समझते हो कि दर्शन कितने महान लाभ प्रदान करता है पर तुम इसकी सूक्ष्म बातों को नहीं देख पाते कि वह हमारे प्रत्येक प्रयत्न में कितनी सहायता करता है। वह केवल हमारे बड़े कार्यों को ही, जैसा कि सिसेरो कहता है, “सुगम” नहीं बनाता बल्कि हमारी सबसे छोटी आवश्यकताओं तक का भी ध्यान रखता है। मेरा विश्वास करो। दर्शन को अपना पक्षधर बना लो। वह तुम्हें यह समझाएगा कि अपनी हिसाब-किताब की पुस्तकों पर अधिक समय तक झुके रहना उचित नहीं है।

    निस्संदेह तुम्हारा उद्देश्य और तुम्हारे इस विलंब का कारण, यह सुनिश्चित करना है कि तुम्हें गरीबी का भय न रहे लेकिन यदि गरीबी वास्तव में ऐसी वस्तु हो जिसे अपनाया जाना चाहिए, तब? अनेक लोगों ने पाया है कि धन-दौलत दार्शनिक जीवन के मार्ग में बाधा बन जाती है जबकि गरीबी बंधनों से मुक्त और निश्चिंत होती है। जब युद्ध का बिगुल बजता है तो गरीब जानता है कि आक्रमण उसी पर नहीं हो रहा। जब आग लगने का शोर उठता है तो वह अपने सामान की नहीं, बाहर निकलने के मार्ग की तलाश करता है। जब किसी गरीब को यात्रा पर निकलना होता है तो बंदरगाह पर कोई कोलाहल नहीं होता, न समुद्र-तट पर उसके पीछे दौड़ती भीड़ होती है, न किसी एक व्यक्ति की सेवा में लगे असंख्य परिचारक होते हैं न दासों का ऐसा झुंड खड़ा होता है कि उन्हें खिलाने के लिए विदेशी देशों की उपज की आवश्यकता पड़े। कुछ ही पेटों को भरना एक सरल काम है, विशेषकर तब जब वे अच्छे से प्रशिक्षित हों और केवल तृप्त होने की इच्छा रखते हों। भूख सस्ती होती है। महँगी तो जिह्वा की चंचलता होती है। गरीबी तत्काल आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट हो जाती है।

    तो फिर तुम ऐसे साथी को अपनाने से क्यों इंकार करते हो जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करना धनवानों के लिए भी बुद्धिमानी की बात है? यदि तुम अपने मन के लिए समय चाहते हो तो या तो गरीब बनो या गरीबों जैसा जीवन जीने लगो। मितव्ययिता के प्रति कुछ चिंता के बिना अध्ययन लाभदायक नहीं हो सकता और मितव्ययिता वास्तव में स्वेच्छा से स्वीकार की गई गरीबी ही है। इसलिए अपने बहाने छोड़ दो। “मेरे पास अभी पर्याप्त नहीं है। जब मैं एक निश्चित मात्रा में धन इकट्ठा कर लूँगा तब मैं स्वयं को पूरी तरह दर्शन के लिए समर्पित कर दूँगा।” किन्तु जिस वस्तु को तुम्हें सबसे पहले प्राप्त करना चाहिए, वही तो है जिसे तुम टाल रहे हो। वही तो तुम्हारी सूची में सबसे नीचे पड़ी है। आरम्भ तुम्हें वहीं से करना चाहिए। तुम कहते हो, “मैं अपने जीवन-निर्वाह के लिए कुछ व्यवस्था कर लेना चाहता हूँ।” जब तुम यह कर रहे हो, तो उससे भी अधिक आवश्यक है कि तुम स्वयं को तैयार करना सीखो। यदि कोई बात तुम्हें अच्छा जीवन जीने से रोक भी दे तो भी कोई बात तुम्हें अच्छी मृत्यु पाने से नहीं रोक सकती।

    दर्शन के अभ्यास में न तो गरीबी बाधा बन सकती है और न ही अत्यन्त अभाव। जो लोग इस मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ना चाहते हैं उन्हें भूख तक सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। घेराबंदी के समय लोगों ने भूख सही है और उनके धैर्य का प्रतिफल क्या था? केवल इतना कि वे विजेता की दया पर निर्भर नहीं हुए। किन्तु यहाँ जो प्रतिज्ञा की जा रही है, वह उससे कहीं महान है। स्थायी स्वतंत्रता और किसी भी मनुष्य या देवता से भयमुक्त जीवन। क्या यह ऐसी वस्तु नहीं है जिसके लिए मनुष्य भूखा रहकर भी प्रयास करे? सेनाओं ने हर प्रकार के अभाव को सहा है। वे पौधों की जड़ों पर जीवित रही हैं। उन्होंने ऐसी चीज़ों से अपनी भूख मिटाई है जिनका नाम लेना भी घृणास्पद है। और यह सब किसलिए? प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए और इससे भी विचित्र बात यह कि किसी दूसरे व्यक्ति के प्रभुत्व के लिए! फिर कौन ऐसा होगा जो अपने मन को उन्माद और विक्षिप्त इच्छाओं से मुक्त करने के उद्देश्य से गरीबी सहने में संकोच करेगा? अतः ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम्हें पहले से प्राप्त करना आवश्यक हो। तुम दर्शन के पास बिना यात्रा-व्यय के भी पहुँच सकते हो।

    क्या वास्तव में बात ऐसी ही है? क्या तुम तभी बुद्धिमत्ता प्राप्त करना चाहोगे जब तुम्हारे पास बाकी सब कुछ भी हो जाएगा? क्या यह तुम्हारे जीवन की अंतिम आवश्यकता होगी मानो बाद में याद आने वाली कोई बात? तो फिर ऐसा करो।  यदि तुम्हारे पास कुछ संपत्ति है तो अभी दर्शन की ओर मुड़ो क्योंकि तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारे पास पहले से ही आवश्यकता से अधिक नहीं है? और यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो किसी और वस्तु को प्राप्त करने से पहले इसी को प्राप्त करने का प्रयास करो।

    “लेकिन तब मैं उन चीज़ों से वंचित हो जाऊँगा जिनकी मुझे आवश्यकता है।” सबसे पहले तो ऐसी आवश्यक वस्तुओं से वंचित होना कठिन ही है क्योंकि प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं और बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढाल लेता है। किन्तु यदि उस पर अन्तिम और चरम अभाव आ ही पड़े तो वह बहुत सहजता से जीवन को छोड़ देगा और इस प्रकार स्वयं अपने लिए बोझ बने रहना भी समाप्त कर देगा। दूसरी ओर, यदि जीवन को बनाए रखने के लिए केवल थोड़ी-सी वस्तुओं की आवश्यकता हो तो वह स्वयं को सम्पन्न मानेगा और अपने पेट तथा शरीर को उनकी आवश्यकतानुसार जो कुछ चाहिए, वह दे देगा। बिना किसी चिंता के और आवश्यकता से अधिक किसी वस्तु की परवाह किए बिना। सुखी और निश्चिंत होकर वह धनवानों के व्यस्त जीवन पर तथा धन के लिए प्रतिस्पर्धा करने वालों की भाग-दौड़ पर हँसेगा और कहेगा, “तुम अपने ही जीवन को क्यों टालते रहते हो? क्या तुम ब्याज बढ़ने की प्रतीक्षा करोगे, व्यापारिक उपक्रमों के सफल होने की प्रतीक्षा करोगे या किसी बड़े उत्तराधिकार के मिलने की प्रतीक्षा करोगे जबकि तुम इसी क्षण धनी बन सकते हो? बुद्धिमत्ता का लाभ तुरंत मिलता है। उसका धन उन सभी को प्राप्त हो जाता है जिनके लिए धन अब महत्वहीन प्रतीत होने लगा है।”

    यह बात दूसरों पर अधिक लागू होती है क्योंकि तुम तो सम्पन्न लोगों की श्रेणी के अधिक निकट हो। यदि युग बदल भी जाए तब भी तुम्हारे पास आवश्यकता से अधिक है। किन्तु “पर्याप्त” क्या है, यह हर युग में एक ही रहता है।

    मैं यहीं इस पत्र को समाप्त कर सकता था, यदि मैंने तुम्हें इस प्रकार अभ्यस्त न बना दिया होता। पार्थियन राजाओं का अभिवादन बिना भेंट चढ़ाए नहीं किया जाता और तुम्हें भी बिना कुछ दिए विदा नहीं किया जा सकता। तो क्या दिया जाए? मैं एपिक्यूरस से एक उधार लिया हुआ वचन प्रस्तुत करता हूँ,  “बहुत-से लोगों के लिए धन की प्राप्ति कष्टों का अंत नहीं होती बल्कि कष्टों की एक नई श्रृंखला की शुरुआत होती है।”

    इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, दोष परिस्थितियों में नहीं बल्कि मन में होता है। जो चीज़ गरीबी को कष्टदायक बनाती है, वही समृद्धि को भी कष्टदायक बना देती है। जब कोई व्यक्ति बीमार होता है तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसे लकड़ी के बिस्तर पर लिटाया जाए या सोने के बिस्तर पर। जहाँ भी उसे ले जाओगे, वह अपना रोग अपने साथ ही ले जाएगा। ठीक इसी प्रकार, मानसिक रूप से रोगग्रस्त व्यक्ति को धन में रखा जाए या गरीबी में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका कष्ट उसी का अपना है और वह हर जगह उसका पीछा करता रहता है।

अभी के लिए विदा 



दर्शन और जीवन के संदर्भ में -- पत्र - 16

 प्रिय लूसीलियस 

मुझे विश्वास है लूसीलियस, कि तुम समझते हो कि दर्शन के बिना कोई भी व्यक्ति न तो वास्तव में सुखी जीवन जी सकता है और न ही ऐसा जीवन जो सहन करने योग्य हो। यह भी कि जहाँ पूर्ण प्रज्ञा (ज्ञान) जीवन को सुखी बनाती है, वहीं उसके अध्ययन का आरम्भ मात्र भी जीवन को सहनीय बना देता है। किन्तु इस समझ को प्रतिदिन के अभ्यास द्वारा पुष्ट और अधिक गहराई से स्थापित करना आवश्यक है। सम्माननीय उद्देश्यों की कल्पना कर लेना जितना सरल है उन्हें व्यवहार में उतारना उससे कहीं अधिक कठिन है। मनुष्य को निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए और सतत अध्ययन द्वारा अपनी शक्ति बढ़ानी चाहिए जब तक कि उसके श्रेष्ठ संकल्प उसके मन का स्थायी उत्कृष्ट गुण न बन जाएँ।



    जब तुम मेरे साथ हो तब तुम्हें बहुत अधिक शब्दों या इतनी लंबी सफ़ाइयों की आवश्यकता नहीं है। मैं समझता हूँ कि तुमने काफ़ी प्रगति की है। मैं जानता हूँ कि जो बातें तुम लिखते हो, वे कहाँ से आ रही हैं। तुम उन्हें न तो गढ़ रहे हो और न ही उन्हें सजाकर प्रस्तुत कर रहे हो। फिर भी मैं तुम्हें अपनी राय बताता हूँ। मुझे तुमसे आशाएँ हैं लेकिन अभी मुझे पूर्ण विश्वास नहीं है। और यदि मेरी चले तो तुम स्वयं के प्रति भी यही दृष्टिकोण अपनाओगे और बिना पर्याप्त कारण के अपने ऊपर शीघ्रता से विश्वास नहीं करोगे। अपने आपको झकझोरो। अपनी जाँच-पड़ताल करो। अपने को विभिन्न दृष्टियों से देखो। सबसे बढ़कर, यह विचार करो कि जो प्रगति तुमने की है, वह दर्शन में हुई है या स्वयं जीवन में। दर्शन कोई ऐसी कला नहीं है जो दर्शकों के सामने करतब दिखाने के लिए हो, न ही वह प्रदर्शन के लिए सजाई गई कोई वस्तु है। उसका सार शब्दों में नहीं, कर्मों में है। मनुष्य उसे केवल मनोरंजन या ऊब दूर करने के साधन के रूप में नहीं अपनाता। वह मन को ढालता और आकार देता है, जीवन को व्यवस्था प्रदान करता है, आचरण को अनुशासित करता है, और यह दिखाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

    दर्शन पतवार पर बैठता है और हमें मार्ग दिखाता है जबकि हम अनिश्चितता की लहरों में इधर-उधर उछाले जा रहे होते हैं। उसके बिना ऐसा कोई जीवन नहीं है जो चिंताओं और व्याकुलताओं से भरा न हो। क्योंकि हर घड़ी असंख्य ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जिनके लिए सलाह की आवश्यकता होती है और वह सलाह केवल दर्शन ही दे सकता है।

    कोई कहेगा, “यदि सब कुछ भाग्य द्वारा निर्धारित है तो दर्शन मेरे किस काम का? यदि ईश्वर ही सबका संचालक है तो दर्शन का क्या उपयोग? और यदि संयोग (भाग्य-चक्र) का ही प्रभुत्व है तो फिर दर्शन से क्या लाभ? क्योंकि जो निश्चित है उसे बदला नहीं जा सकता और जो अनिश्चित है उसके विरुद्ध पहले से कोई तैयारी भी नहीं की जा सकती। या तो ईश्वर ने पहले ही मेरे लिए सब कुछ निर्धारित कर दिया है और तय कर दिया है कि मुझे क्या करना चाहिए या फिर भाग्य ने मेरी योजना के लिए कुछ भी शेष नहीं छोड़ा है।” किन्तु इनमें से जो भी सत्य हो लूसीलियस, अथवा यदि ये सभी सत्य हों, तब भी हमें दर्शन का अभ्यास करना चाहिए। चाहे भाग्य का अटल नियम हमें बाँधे हुए हो। चाहे ईश्वर, जो समस्त जगत का नियामक है, सभी घटनाओं का संचालन करता हो या चाहे संयोग ही मानव जीवन को चलाता और अस्त-व्यस्त करता हो। फिर भी दर्शन ही हमारी रक्षा करेगा। दर्शन हमें ईश्वर की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना सिखाएगा और भाग्य के सामने अनिच्छा से ही सही, झुकना सिखाएगा। वह तुम्हें ईश्वर का अनुसरण करना और संयोग का सामना करना सिखाएगा।

    किन्तु यह वह समय नहीं है कि हम इस प्रश्न पर चर्चा आरम्भ करें कि यदि दैवी व्यवस्था का शासन है तो हमारे अधिकार में क्या है या यदि नियति की घटनाओं की एक अविच्छिन्न श्रृंखला हमें जंजीरों में बाँधकर खींचती चली जाती है अथवा यदि आकस्मिक घटनाएँ ही सब पर शासन करती हैं। इसके बजाय, मैं अब अपने मूल विषय पर लौटता हूँ। तुम्हें सलाह देने और प्रेरित करने के लिए कि अपने मन के प्रयत्न को बिखरने और शिथिल पड़ने मत दो। उसे बनाए रखो। उसे स्थिर करो ताकि जो अभी केवल प्रयास है, वह आगे चलकर स्वभाव बन जाए।

    यदि मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ तो जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया होगा, तुम यह देखने के लिए आगे झाँकने लगे होगे कि यह पत्र अपने साथ कौन-सा छोटा-सा उपहार लाया है। अच्छा, इसे खोलकर देखो। तुम्हें वह मिल जाएगा! लेकिन मेरी उदारता पर आश्चर्य मत करना क्योंकि मैं अभी भी किसी और के भंडार से ही उदारता दिखा रहा हूँ। पर मैं इसे “किसी और का” क्यों कहूँ? जो कुछ भी किसी के द्वारा अच्छी तरह कहा गया है, वह मेरा है। यह बात भी एपिक्यूरस ने कही थी,  “यदि तुम प्रकृति के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी गरीब नहीं होगे और यदि लोगों की धारणाओं के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी धनी नहीं हो सकोगे।”

    प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं। मतों और धारणाओं की माँगों की कोई सीमा नहीं होती। मान लो कि अनेक धनवान लोगों की सारी संपत्ति तुम्हारे ऊपर ढेर कर दी जाए। मान लो कि भाग्य तुम्हें किसी भी निजी व्यक्ति की सामर्थ्य से कहीं अधिक ऊँचा उठा दे, तुम्हें सोने से ढक दे, तुम्हें बैंगनी वस्त्रों से सजा दे, तुम्हें इतना वैभव और धन दे दे कि तुम संगमरमर से धरती तक को ढक सको, ऐसा धन जो केवल तुम्हारे अधिकार में ही न हो बल्कि तुम्हारे पैरों के नीचे भी बिछा हो! मान लो कि मूर्तियाँ हों, चित्र हों और वे सब वस्तुएँ हों जिन्हें कला ने विलासिता और महँगे स्वाद की तुष्टि के लिए रचा है। इन सब चीज़ों से तुम क्या सीखोगे? केवल और अधिक चाहना। प्राकृतिक इच्छाएँ सीमित होती हैं किन्तु मिथ्या धारणाओं से उत्पन्न इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता क्योंकि असत्य स्वभावतः असीम होता है। जो लोग किसी मार्ग पर चलते हैं, उनका कोई गंतव्य होता है पर भटकने की कोई सीमा नहीं होती।

    इसलिए निरर्थक वस्तुओं से स्वयं को पीछे खींच लो। जब तुम यह जानना चाहो कि जिस वस्तु का तुम पीछा कर रहे हो वह प्राकृतिक इच्छा का विषय है या अंधी लालसा का तो यह देखो कि क्या कहीं ऐसा स्थान है जहाँ तुम्हारी इच्छा जाकर ठहर सकती है। यदि वह बहुत दूर तक जाती है और फिर भी उसके आगे और रास्ता शेष रहता है तो समझ लो कि वह प्राकृतिक नहीं है।


जीवन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 22

 प्रिय लूसीलियस  अब तुम समझते हो कि तुम्हें उन दिखने में महत्वपूर्ण पर वास्तव में तुम्हारे लिए हानिकारक कार्यों से दूर हो जाना चाहिए। लेकिन ...