Monday, 27 July 2026

विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच अंतर के बारे में - पत्र - 87

 प्रिय लूसीलियस 


दर्शनशास्त्र को विभाजित करके उसके विशाल स्वरूप को विभिन्न अंगों में समझने का जो अनुरोध तुम कर रहे हो, वह उपयोगी ही नहीं बल्कि उस व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है जो शीघ्रता से प्रज्ञा प्राप्त करना चाहता है। किसी संपूर्ण वस्तु को उसके विभिन्न भागों के माध्यम से समझना हमारे लिए अधिक सरल होता है। यदि हम दर्शनशास्त्र को उसके पूर्ण रूप में वैसे ही देख पाते, जैसे एक ही दृष्टि में पूरे आकाश का अवलोकन करते हैं तो वह दृश्य भी आकाश के समान ही विस्मयकारी होता। तब प्रत्येक मनुष्य उसे देखकर आश्चर्य से भर जाता और उन वस्तुओं का मोह छोड़ देता जिन्हें आज हम केवल इसलिए महान समझते हैं क्योंकि हमें वास्तविक महानता का ज्ञान नहीं है। किन्तु चूँकि ऐसा संभव नहीं है। इसलिए हमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन उसी प्रकार करना चाहिए जैसे कोई व्यक्ति आकाश के विभिन्न भागों का अलग-अलग निरीक्षण करके अंततः पूरे आकाश को समझने का प्रयास करता है।



    निस्संदेह, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि दर्शनशास्त्र के सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेट लेती है और उस पर उतनी ही शीघ्रता से दृष्टि डालती है, जितनी शीघ्रता से हमारी आँख पूरे आकाश का अवलोकन कर लेती है। परन्तु हम, जिनकी दृष्टि उन धुंधों से सीमित है जिनके बीच से हमें देखना पड़ता है, उनके लिए अलग-अलग बातों को समझना अधिक सरल है क्योंकि अभी हम सम्पूर्णता को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा और दर्शनशास्त्र को विभाजित करूँगा, किन्तु उसे अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ों में नहीं बल्कि उसके मुख्य भागों में। इस प्रकार का विभाजन उपयोगी है परन्तु उसे अत्यधिक छोटे-छोटे अंशों में बाँट देना उचित नहीं। जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है, उसे समझना उतना ही कठिन होता है जितना किसी अत्यन्त विशाल वस्तु को समझना। जैसे किसी जनसमुदाय को विभिन्न जनजातियों में विभाजित किया जाता है और किसी सेना को सौ-सौ सैनिकों की टुकड़ियों में बाँटा जाता है, उसी प्रकार जो भी वस्तु पर्याप्त विशाल हो, उसे उसके उपयुक्त भागों में विभाजित करके समझना अधिक सरल होता है। किन्तु, जैसा मैंने कहा, ये भाग इतने अधिक और इतने छोटे नहीं होने चाहिए कि उनका कोई स्वतंत्र स्वरूप ही न रह जाए। अत्यधिक विभाजन उतना ही दोषपूर्ण है जितना बिल्कुल भी विभाजन न करना; क्योंकि जब किसी वस्तु को पीसकर चूर्ण बना दिया जाता है, तब उसकी संरचना ही समाप्त हो जाती है।

    यदि तुम्हें उचित लगे तो मैं सबसे पहले विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच का अंतर बताकर आरम्भ करूँगा।प्रज्ञा मानव-मन का सर्वोच्च कल्याण है जबकि दर्शनशास्त्र प्रज्ञा के प्रति प्रेम और उसकी प्राप्ति की आकांक्षा है। दर्शनशास्त्र उस लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जहाँ प्रज्ञा पहले ही पहुँच चुकी होती है। 'फिलॉसफी' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह तो स्पष्ट है। इसका नाम ही घोषित करता है कि यह किससे प्रेम करता है। कुछ लोगों ने प्रज्ञा को मानव और दैवीय विषयों का विज्ञान कहा है। अन्य लोगों ने इसे मानव और दैवीय विषयों तथा उनके कारणों का ज्ञान बताया है। मेरे विचार से यह अंतिम जोड़ अनावश्यक है क्योंकि मानव और दैवीय विषयों के कारण स्वयं दैवीय क्षेत्र का ही एक भाग हैं। दर्शनशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ भी दी गई हैं। कुछ ने इसे सद्गुण के प्रति समर्पण कहा है। कुछ ने मन को सुधारने का संकल्प और कुछ विचारकों के अनुसार यह सही ढंग से तर्क करने का प्रयास है। सामान्यतः सभी इस बात से सहमत हैं कि दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा में अंतर है क्योंकि जिस वस्तु की आकांक्षा की जाती है, वह स्वयं आकांक्षा नहीं हो सकती। जिस प्रकार लोभ और धन में बहुत अंतर है। एक चाहने की प्रवृत्ति है और दूसरा चाही जाने वाली वस्तु। उसी प्रकार दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा भी भिन्न हैं। दर्शनशास्त्र एक यात्रा है और प्रज्ञा उस यात्रा का फल तथा पुरस्कार। दर्शनशास्त्र आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। जबकि प्रज्ञा उसका अंतिम गंतव्य है। 'सोफिया' (Sophia) वास्तव में यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रज्ञा' या 'बुद्धिमत्ता' है। रोमन लोग भी कभी 'सोफिया' शब्द का प्रयोग करते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज भी हम यूनानी शब्द 'फिलॉसोफिया' (Philosophia) का प्रयोग करते हैं। इसका प्रमाण हमारी प्राचीन हास्य-रचनाओं में मिलता है और डोसेनस की समाधि पर अंकित इस लेख में भी, "हे पथिक, ठहरो और डोसेनस की प्रज्ञा (सोफिया) को पढ़ो।"

    यद्यपि दर्शनशास्त्र को सद्गुण के प्रति समर्पण कहा जाता है, जहाँ एक साधक है और दूसरा साध्य, फिर भी हमारे मत (स्टोइक परंपरा) के कुछ विचारकों का मानना है कि इन दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं किया जा सकता क्योंकि न तो सद्गुण के बिना दर्शनशास्त्र संभव है और न ही दर्शनशास्त्र के बिना सद्गुण। वास्तव में दर्शनशास्त्र सद्गुण के प्रति समर्पण है। परन्तु वह स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही संभव होता है। न तो सद्गुण उसके प्रति समर्पण के बिना अस्तित्व में रह सकता है और न ही सद्गुण के बिना उसके प्रति समर्पण हो सकता है। यह उस धनुर्धर के समान नहीं है, जो दूर स्थित किसी लक्ष्य पर निशाना साधता है। यहाँ लक्ष्य साधक से अलग किसी अन्य स्थान पर नहीं है। उसी प्रकार सद्गुण तक पहुँचने के मार्ग भी सद्गुण से बाहर नहीं होते, जैसे किसी नगर तक पहुँचने के लिए सड़कें नगर से बाहर होती हैं। मनुष्य सद्गुण तक स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही पहुँचता है। इसलिए दर्शनशास्त्र और सद्गुण एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। 

    अधिकांश और सबसे प्रतिष्ठित दार्शनिकों के अनुसार दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। नीतिशास्त्र (एथिक्स), प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) और तर्कशास्त्र (लॉजिक)। इनमें से पहला भाग मन को संयमित और निर्देशित करता है। दूसरा वस्तुओं के स्वभाव और प्रकृति का अध्ययन करता है और तीसरा शब्दों के अर्थ, वाक्यों की संरचना तथा तर्कों के रूपों की परीक्षा करता है ताकि असत्य सत्य का रूप धारण करके लोगों को धोखा न दे सके।किन्तु कुछ दार्शनिक परंपराओं ने दर्शनशास्त्र के इन विभागों को या तो कम कर दिया या बढ़ा दिया। कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) दार्शनिकों ने राजनीति को दर्शनशास्त्र का चौथा भाग माना क्योंकि उनके विचार में उसके लिए एक विशिष्ट प्रकार के अध्ययन और अलग विषय-वस्तु की आवश्यकता होती है। कुछ ने इसके अतिरिक्त 'अर्थशास्त्र' (ओइकोनोमिक्स) को भी जोड़ा, जिसका अर्थ है गृह-प्रबंधन का विज्ञान। कुछ ने 'जीवन की विभिन्न शैलियों' को भी एक स्वतंत्र विषय माना। परन्तु इन सभी विषयों को वास्तव में नीतिशास्त्र के अंतर्गत ही समाहित किया जा सकता है। एपिक्यूरियन दार्शनिकों का मत था कि दर्शनशास्त्र के केवल दो ही भाग हैं। प्रकृतिशास्त्र और नीतिशास्त्र। उन्होंने तर्कशास्त्र को अलग विभाग के रूप में स्वीकार नहीं किया। लेकिन जब उन्हें शब्दों की अस्पष्टताओं को दूर करने और उन असत्यों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता पड़ी जो सत्य का रूप धारण कर लेते हैं, तब उन्होंने भी 'निर्णय और मानदंड' नामक एक विषय को स्वीकार किया। वस्तुतः यही तर्कशास्त्र था, यद्यपि वे इसे प्रकृतिशास्त्र का केवल एक पूरक मानते थे। 

    साइरेनाइक दार्शनिकों ने तो प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र, दोनों को ही हटाकर केवल नीतिशास्त्र को स्वीकार किया। फिर भी उन्होंने दूसरे ढंग से उन्हीं विषयों को पुनः शामिल कर लिया। उन्होंने नीतिशास्त्र को पाँच भागों में विभाजित किया—

  1. किन वस्तुओं का अनुसरण करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए।

  2. भावनाएँ।

  3. कर्म।

  4. कारण।

  5. तर्क।

वास्तव में 'कारणों' का अध्ययन प्रकृतिशास्त्र के अंतर्गत आता है और 'तर्कों' का अध्ययन तर्कशास्त्र के अंतर्गत।किओस के अरिस्टो का मत था कि प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र न केवल अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने नीतिशास्त्र का भी संकुचन कर दिया जबकि वही एकमात्र भाग था जिसे उन्होंने स्वीकार किया था। उन्होंने उपदेश और नैतिक परामर्श से संबंधित विषय को भी हटाते हुए कहा कि यह कार्य किसी विद्यालय के शिक्षक का है। दार्शनिक का नहीं, मानो दार्शनिक मानवता का शिक्षक ही न हो! 

    चूँकि दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। इसलिए हम उसके नीतिशास्त्र (एथिक्स) से आरम्भ करें। परंपरागत रूप से नीतिशास्त्र को तीन शाखाओं में विभाजित किया जाता है। पहली शाखा प्रत्येक वस्तु का उचित मूल्य निर्धारित करती है और यह निर्णय करती है कि उसका वास्तविक महत्व कितना है। यह अत्यंत उपयोगी अध्ययन है क्योंकि वस्तुओं का सही मूल्यांकन करने से अधिक आवश्यक और क्या हो सकता है? दूसरी शाखा मनुष्य की प्रवृत्तियों और इच्छाओं (आवेगों) का अध्ययन करती है। तीसरी शाखा कर्मों का अध्ययन करती है। अर्थात नीतिशास्त्र का उद्देश्य यह है कि—

  1. सबसे पहले, तुम यह सही ढंग से निर्णय कर सको कि प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य क्या है।

  2. दूसरे, उन वस्तुओं के प्रति तुम्हारी इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ संतुलित, संयमित और विवेकपूर्ण हों।

  3. तीसरे, तुम्हारी इच्छाओं तथा तुम्हारे कर्मों में पूर्ण सामंजस्य हो ताकि तुम्हारे समस्त आचरण में एकरूपता, स्थिरता और संगति बनी रहे।

यही वह अवस्था है जिसमें मनुष्य जैसा उचित समझता है, वैसा ही चाहता है और जैसा चाहता है, वैसा ही करता भी है। यही नैतिक जीवन की पूर्णता है।

    इन तीनों क्षेत्रों में से किसी एक में भी दोष आ जाए तो उसका प्रभाव शेष दोनों पर भी पड़ता है। यदि तुमने सभी वस्तुओं का सही मूल्यांकन कर लिया हो, लेकिन तुम्हारी इच्छाएँ और आवेग असंयमित हों तो उस ज्ञान का क्या लाभ? यदि तुमने अपनी इच्छाओं को वश में कर लिया हो तथा अपनी कामनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो, लेकिन कर्म करते समय परिस्थितियों की समझ न हो, और यह न जानते हो कि किस समय, किस स्थान पर और किस प्रकार कार्य करना उचित है तो उससे भी क्या लाभ? वस्तुओं का मूल्य और महत्व समझना एक बात है। समय की माँग को समझना दूसरी बात है और अपनी इच्छाओं को संयमित रखते हुए बिना उतावलेपन के उचित कर्म करना उससे भी भिन्न बात है। जीवन तभी अपने भीतर पूर्ण सामंजस्य प्राप्त करता है, जब कर्म, इच्छा से पीछे न रह जाए और इच्छा भी प्रत्येक वस्तु के वास्तविक मूल्य के आधार पर उत्पन्न हो तथा उसकी तीव्रता भी उसी वस्तु के महत्व के अनुरूप हो। 

    दर्शनशास्त्र का प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) दो उपभागों में विभाजित किया जाता है— साकार (शारीरिक) वस्तुएँ और निराकार (अशारीरिक) वस्तुएँ। इन दोनों के भी अपने-अपने स्तर या विभाग हैं। साकार वस्तुओं का अध्ययन मुख्यतः दो वर्गों में किया जाता है—

  1. वे वस्तुएँ जो कारण (कारक) हैं।

  2. वे वस्तुएँ जो कारणों से उत्पन्न होती हैं अर्थात तत्त्व (एलिमेंट्स)।

जहाँ तक तत्त्वों का प्रश्न है, कुछ दार्शनिकों के अनुसार उनका कोई और विभाजन नहीं है। किन्तु अन्य विचारक उन्हें तीन भागों में बाँटते हैं—

  • पदार्थ (मैटर),

  • वह सक्रिय कारण (क्रियाशील सिद्धांत) जो समस्त वस्तुओं को गति और कार्यशीलता प्रदान करता है,

तत्त्व (एलिमेंट्स) स्वयं। 

पहले प्रकार को तकनीकी भाषा में वाक्पटुता (रेटोरिक) कहा जाता है, और दूसरे को द्वंद्वात्मक तर्क (डायलेक्टिक)

वाक्पटुता का संबंध भाषा की अभिव्यक्ति, विचारों और उनकी सुव्यवस्थित प्रस्तुति से है। द्वंद्वात्मक तर्क दो भागों में विभाजित होता है, शब्दों का अध्ययन और अर्थों का अध्ययन अर्थात एक ओर वे बातें जो कही जाती हैं। दूसरी ओर वे शब्द या कथन जिनके माध्यम से वे बातें व्यक्त की जाती हैं।

इसके बाद इन दोनों विषयों के भी अत्यंत विस्तृत उपविभाग हैं। किन्तु इस समय मैं अपनी सूची को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ और केवल 'मुख्य बिंदुओं का स्पर्श' भर करूँगा। अन्यथा यदि मैं इन विभाजनों को इसी प्रकार विस्तार से बताने लगूँ तो यह पत्र एक साधारण संवाद न रहकर एक तकनीकी ग्रंथ बन जाएगा। अब मेरे लिए दर्शनशास्त्र के तर्कशास्त्र (लॉजिक) का विभाजन करना शेष रह जाता है। समस्त वाक्-विनिमय (विमर्श) दो प्रकार का होता है या तो वह निरंतर प्रवाह के रूप में होता है अथवा प्रश्न और उत्तर के रूप में विभाजित होता है। इन विषयों का अध्ययन तुम स्वयं भी कर सकते हो, प्रिय ल्यूसीलियस। मेरा उद्देश्य तुम्हें उनसे विमुख करना नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसे तुरंत अपने आचरण से जोड़ो। 

    अपने चरित्र को अनुशासित करो। अपने भीतर जो गुण शिथिल पड़ गए हैं, उन्हें जागृत करो। जो प्रवृत्तियाँ आवश्यकता से अधिक उन्मुक्त हो गई हैं, उन्हें संयमित करो। जो विद्रोही हैं, उन्हें वश में लाओ। अपने भीतर की वासनाओं पर प्रहार करने में कोई कसर न छोड़ो, और जहाँ तक संभव हो, संसार में व्याप्त दोषों और विकारों का भी प्रतिरोध करो। जो लोग तुमसे कहते हैं, "क्या तुम कभी रुकने वाले नहीं हो?", उन्हें यह उत्तर दो— "तुम्हें तो मुझसे यह पूछना चाहिए। 'तुम अपनी भूलों को दोहराना कब बंद करोगे?' क्या तुम चाहते हो कि रोग से पहले ही उसका उपचार समाप्त हो जाए? मैं तो इस विषय पर और भी अधिक बोलूँगा और तुम्हारे विरोध के कारण ही इसे और दृढ़ता से करता रहूँगा। जिस प्रकार सुन्न पड़ चुके अंग पर लगाई गई औषधि तभी प्रभाव दिखाने लगती है, जब उसके स्पर्श से पीड़ा का अनुभव होने लगे, उसी प्रकार मेरी बातें भी तुम्हारे लिए लाभकारी होंगी। चाहे तुम्हें वे अच्छी लगें या नहीं। अब समय आ गया है कि एक निर्भीक और निष्कपट स्वर तुम्हारे कानों तक पहुँचे। जब मैं तुममें से प्रत्येक को अलग-अलग समझाने में सफल नहीं हो सकता, तब मैं तुम सबको एक साथ, सार्वजनिक रूप से संबोधित करूँगा।"
    "तुम अपनी संपत्ति की सीमाएँ बढ़ाना आखिर कब बंद करोगे? जो भूमि कभी एक पूरे राष्ट्र के लिए पर्याप्त थी, क्या वह अब एक अकेले स्वामी के लिए भी छोटी पड़ गई है? तुम अपने विशाल कृषि-भूखंडों का विस्तार कब तक करते रहोगे? तुम्हें तो इतना भी पर्याप्त नहीं लगता कि तुम्हारी निजी जागीरें पूरे-पूरे प्रांतों के बराबर फैली हों। प्रसिद्ध नदियाँ पूरी की पूरी तुम्हारी निजी संपत्ति के बीच से बहती हैं। वे महान नदियाँ, जो कभी शक्तिशाली राष्ट्रों की सीमाएँ निर्धारित करती थीं, अपने उद्गम से लेकर समुद्र में मिलने तक तुम्हारे अधिकार में हैं। फिर भी तुम्हें यह सब कम लगता है, यदि तुम्हारी ज़मीन समुद्रों तक न पहुँच जाए। यदि तुम्हारा प्रबंधक एड्रियाटिक, आयोनियन और एजियन समुद्रों के पार तक आदेश न दे। यदि वे द्वीप, जो कभी महान शासकों के निवास रहे थे, तुम्हें तुच्छ संपत्ति न प्रतीत हों। जितना चाहे अपनी संपत्ति का विस्तार कर लो। जिसे कभी एक साम्राज्य कहा जाता था, उसे अपनी निजी जागीर बना लो। जितना कुछ अपने अधिकार में ले सकते हो, ले लो। फिर भी दूसरों की संपत्ति तुम्हारी संपत्ति से अधिक ही रहेगी।"
    "अब मैं तुम लोगों से भी संबोधित होता हूँ, जिनका भोग-विलास उतना ही असीम है जितना उन दूसरे लोगों का लोभ। मैं तुमसे पूछता हूँ, यह सब आखिर कब तक चलता रहेगा? हर झील के किनारे तुम्हारी अट्टालिकाएँ खड़ी हैं। हर नदी के तट पर तुम्हारी इमारतें फैली हुई हैं। जहाँ कहीं भी गर्म जल के स्रोत फूटते हैं, वहीं तुम नए विलास-भवन बनाना शुरू कर देते हो। जहाँ भी समुद्र का किनारा किसी खाड़ी का रूप लेता है, तुम तुरंत उसकी भूमि पर नींव डाल देते हो। जिस भूमि को तुमने अपनी इच्छा के अनुसार बदल न दिया हो, उससे तुम्हें संतोष नहीं होता। यहाँ तक कि तुम समुद्र को भी अपनी भूमि के भीतर खींच लाते हो। तुम्हारे भवन हर ओर चमकते दिखाई देते हैं। कहीं वे पर्वतों की चोटियों पर इसलिए बनाए जाते हैं कि वहाँ से धरती और समुद्र का विशाल दृश्य दिखाई दे, तो कहीं समतल भूमि पर उन्हें पर्वतों जितना ऊँचा खड़ा कर दिया जाता है। किन्तु इतने विशाल और भव्य निर्माण कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास रहने के लिए केवल एक ही शरीर है और वह भी अत्यंत छोटा और दुर्बल। इतने अधिक शयनकक्षों का क्या लाभ? तुम एक समय में केवल एक ही कमरे में सो सकते हो। जिस स्थान पर तुम स्वयं रहते ही नहीं, वह वास्तव में तुम्हारा नहीं है।"
    "और अंत में, मैं तुम लोगों से भी कहता हूँ जिनकी अतृप्त और असीम भोग-लालसा स्वादिष्ट भोजन की खोज में समुद्रों और धरती को छान मारती है। कभी काँटों से, कभी फंदों से और कभी तरह-तरह के जालों से। जब तक तुम उनसे ऊब नहीं जाते, तब तक किसी भी जीव को चैन नहीं मिलता। इतने लोगों की मेहनत से जुटाए गए तुम्हारे इन भव्य भोजों में से तुम अपने सुख-भोग से थके हुए मुँह से कितना ही थोड़ा-सा चखते हो! इतने जोखिम उठाकर पकड़े गए उस शिकार में से अपच और मतली से पीड़ित स्वामी कितना ही थोड़ा-सा खा पाता है! इतनी दूर-दूर से मँगाए गए उन असंख्य शंख-सीपों और समुद्री व्यंजनों में से तुम्हारे इस अतृप्त पेट में वास्तव में कितना ही थोड़ा-सा पहुँचता है! अभागे लोगो! क्या तुम्हें यह भी समझ में नहीं आता कि तुम्हारी भूख तुम्हारे पेट से कहीं अधिक बड़ी है?"
    यह सब दूसरों से कहो, पर इस भावना के साथ कि बोलते समय तुम स्वयं भी उसे सुन रहे हो। इसे लिखो पर इस उद्देश्य से कि लिखते समय तुम स्वयं उसे पढ़ भी रहे हो और जो कुछ लिखो उसे अपने आचरण तथा अपनी उन्मत्त वासनाओं के शमन से जोड़ो। अपने अध्ययन का लक्ष्य अधिक जानना नहीं बल्कि बेहतर ढंग से जानना बनाओ।

अभी के लिए विदा 

लिबरल आर्ट्स एवं दर्शन के बारे में -- पत्र - 86

 प्रिय लूसीलियस 


तुम पूछते हो कि लिबरल आर्ट्स के विषय में मेरा क्या विचार है। मुझे उनमें से किसी के प्रति कोई विशेष सम्मान नहीं है और न ही मैं उस अध्ययन को अच्छा मानता हूँ जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना हो। ये तो केवल ऐसी कलाएँ हैं जिन्हें बाज़ार में उपयोग में लाया जा सकता है। उनका महत्त्व केवल इतना है कि वे मन को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करती हैं, न कि इसलिए कि उन्हें जीवनभर का व्यवसाय बना लिया जाए। इनका अध्ययन केवल तब तक करना चाहिए, जब तक मन किसी अधिक महत्त्वपूर्ण विषय को ग्रहण करने योग्य न हो जाए। ये हमारी प्रारम्भिक शिक्षा हैं, हमारा वास्तविक कार्य नहीं। यह स्पष्ट है कि इन्हें 'लिबरल' स्टडीज़ क्यों कहा जाता है क्योंकि वे एक स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य हैं। किन्तु वास्तव में केवल एक ही अध्ययन ऐसा है जो सच्चे अर्थों में उदार है और वह है वह अध्ययन जो मनुष्य को मुक्त करता है अर्थात् दर्शन का अध्ययन। केवल दर्शन ही उदात्त है, सामर्थ्यवान है और महान आत्मा वाला है। अन्य सभी विद्याएँ तुच्छ और बालसुलभ हैं। या क्या तुम यह सोचते हो कि किसी ऐसी विद्या में वास्तव में कोई मूल्य हो सकता है, जिसके शिक्षक या उसे अपना व्यवसाय बनाने वाले लोग स्वयं अत्यन्त भ्रष्ट और तिरस्करणीय हों? हमारा उद्देश्य इन विद्याओं को सीखते रहना नहीं होना चाहिए बल्कि इन्हें सीखकर आगे बढ़ जाना होना चाहिए।


By Caravaggio 


    कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या लिबरल आर्ट्स मनुष्य को अच्छा बनाती हैं। परन्तु स्वयं वे विद्याएँ भी ऐसा दावा नहीं करतीं  क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह नहीं है। साहित्य का अध्ययन भाषा की शुद्धता से संबंधित है। यदि उसे आगे बढ़ाया जाए तो वह कथाओं तथा आख्यानों के अध्ययन तक पहुँचता है। अधिक से अधिक वह कविता के अध्ययन तक विस्तृत होता है। किन्तु इनमें से कौन-सा विषय सद्गुण की ओर जाने वाला मार्ग प्रशस्त करता है? अक्षरों और वर्णों की पहचान, शब्दों और वाक्यांशों का सूक्ष्म विश्लेषण, कथाओं का कंठस्थ करना, छंद-रचना के नियम, या छंदों के परिवर्तन, इनमें से कौन-सी बात हमारे भय को शांत करती है, हमारे लोभ को दूर करती है या हमारी इच्छाओं पर संयम स्थापित करती है? अब ज्यामिति और संगीत की ओर चलो। वहाँ भी ऐसी कोई शिक्षा नहीं मिलती जो हमें भय और वासना से मुक्त होने का उपदेश दे। यदि हमें यह नहीं आता कि भय और इच्छा पर कैसे विजय प्राप्त की जाए तो अन्य किसी भी ज्ञान का होना व्यर्थ है। 

    प्रश्न यह है कि क्या ये लोग सद्गुण की शिक्षा देते हैं। यदि नहीं तो वे अपने विद्यार्थियों को सद्गुण नहीं सिखा रहे हैं। और यदि हाँ तो वे दार्शनिक हैं। क्या तुम जानना चाहते हो कि वे इस उद्देश्य से कितने दूर हैं? बस यह देखो कि उनकी सभी विद्याएँ एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं। यदि वे सभी एक ही सत्य की शिक्षा दे रही होतीं तो उनमें किसी न किसी प्रकार की समानता अवश्य दिखाई देती। 

    जब तक कि वे तुम्हें यह विश्वास न दिला दें कि होमर एक दार्शनिक था! किन्तु ऐसा करते हुए वे स्वयं अपने तर्कों का खंडन कर बैठते हैं। कभी वे उसे स्टोइक सिद्ध करते हैं, जो केवल सद्गुण को ही श्रेष्ठ मानता है और अमर जीवन प्राप्त करने के लिए भी सम्माननीय आचरण का त्याग नहीं करता, कभी वे उसे एपिक्यूरियन बताते हैं, जो गीत-संगीत और उत्सवों के बीच रहते हुए शांत नागरिक जीवन की प्रशंसा करता है, कभी वे उसे पेरिपैटेटिक कहते हैं, जो तीन प्रकार के शुभों का प्रतिपादन करता है और कभी उसे अकादमिक घोषित करते हैं, जो यह मानता है कि किसी भी विषय में पूर्ण निश्चितता संभव नहीं है। इससे तो केवल यही सिद्ध होता है कि इनमें से कोई भी दर्शन वास्तव में उसका नहीं है क्योंकि यदि वे सभी उसके होते तो वे एक-दूसरे के साथ असंगत न होते। किन्तु मान लो कि होमर वास्तव में एक दार्शनिक था। तब भी वह दार्शनिक तो अपनी कविताएँ सीखने या रचने से पहले ही बन चुका होगा। इसलिए हमें उन बातों का अध्ययन करना चाहिए जिन्होंने होमर को बुद्धिमान बनाया, न कि केवल उसकी कविताओं का। 

    मेरे लिए यह जाँच करना कि होमर पहले हुए या हेसिओड, उतना ही निरर्थक है जितना यह जानना कि हेकुबा समय से पहले वृद्ध कैसे हो गई, जबकि वास्तव में वह हेलेन से छोटी थी। मैं तुमसे पूछता हूँ, पैट्रोक्लस और अकिलीस की आयु में कौन बड़ा था और कौन छोटा, यह जानने का क्या महत्व है? क्या तुम यह जानना चाहते हो कि यूलिसीस (ओडीसियस) अपनी भटकनों के दौरान कहाँ-कहाँ गया था या यह सीखना चाहते हो कि हमें अपनी निरंतर भटकन से कैसे मुक्त होना चाहिए? हमारे पास यह सुनने का समय नहीं है कि वह इटली और सिसिली के बीच के समुद्र में तूफ़ान का शिकार हुआ था या ज्ञात संसार की सीमाओं से बाहर क्योंकि इतना लंबा समय वह इतने संकरे जलडमरूमध्य में भटक ही नहीं सकता था। सच्चाई यह है कि हम स्वयं अपने जीवन के प्रत्येक दिन मन के तूफ़ानों से घिरे रहते हैं, और हमारे अपने दुर्गुण हमें वही सब कष्ट देते हैं जिनका सामना यूलिसीस ने किया था। वे सब हमारे जीवन में उपस्थित हैं, ऐसा सौंदर्य जो आँखों को मोहित कर ले, शत्रु, मानव-रक्त के प्यासे भयंकर राक्षस, एक ओर सायरनों का मोहक गीत और दूसरी ओर जहाज़-डूबने तथा हर प्रकार के संकट। मुझे यह सिखाओ कि अपने देश से कैसे प्रेम करूँ, अपनी पत्नी से कैसे प्रेम करूँ, अपने पिता से कैसे प्रेम करूँ। मुझे यह सिखाओ कि यदि मार्ग में मेरा जहाज़ भी डूब जाए, तब भी मैं उस सम्मानपूर्ण लक्ष्य तक कैसे पहुँचूँ। तुम यह जानने का प्रयास क्यों करते हो कि पेनेलोपे पवित्र थी या नहीं? क्या उसने अपने आस-पास के सभी लोगों को धोखा दिया था? और क्या उसने यह पहचान लिया था कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति यूलिसीस ही है, उससे पहले कि किसी ने उसे यह बताया? मुझे यह सिखाओ कि पवित्रता क्या है, उसका वास्तविक मूल्य क्या है और वह शरीर में निवास करती है या मन में।

    अब मैं संगीत की ओर आता हूँ। तुम मुझे सिखाते हो कि ऊँचे और नीचे स्वरों में किस प्रकार सामंजस्य स्थापित होता है। भिन्न-भिन्न सुरों वाले तार किस प्रकार मधुर संगति उत्पन्न करते हैं। इसके स्थान पर मुझे यह सिखाओ कि मेरे अपने मन में सामंजस्य कैसे स्थापित हो और मेरे संकल्प एक-दूसरे के विरोधी न हों। तुम मुझे बताते हो कि कौन-से राग या संगीत-रूप विषाद व्यक्त करते हैं। इसके बजाय मुझे यह सिखाओ कि विपत्तियों के बीच भी मैं शोक से कैसे बचा रहूँ। 

    ज्यामिति का ज्ञाता मुझे यह सिखाता है कि किसी खेत का क्षेत्रफल कैसे निकाला जाए, किन्तु वह यह नहीं सिखाता कि मनुष्य के लिए कितनी संपत्ति पर्याप्त है। वह मुझे गणना करना सिखाता है और मेरी उँगलियों को लोभ की सेवा में लगा देता है। परन्तु वह यह नहीं सिखाता कि ऐसी गणनाएँ वास्तव में निरर्थक हैं और यह कि अपनी आय-व्यय का हिसाब रखने वालों को थका देने से कोई अधिक सुखी नहीं हो जाता। बल्कि सच्चाई तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति का हिसाब स्वयं करने को ही दुर्भाग्य समझता है, उसके पास आवश्यकता से अधिक और अनावश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि मैं अपने भाई के साथ खेत का उचित बँटवारा करना ही नहीं जानता तो किसी भूमि का सही-सही विभाजन करना सीखने से मुझे क्या लाभ? यदि पड़ोसी मेरी भूमि की सीमा से थोड़ा-सा भाग काट ले जाने पर मैं व्याकुल हो उठता हूँ तो एक बगीचे के टुकड़े का क्षेत्रफल एक फुट के दसवें भाग तक की शुद्धता से निकालना मेरे किस काम का? वह मुझे सिखाता है कि अपनी भूमि की सीमा पर स्थित उस छोटे-से हिस्से को खोने से कैसे बचूँ। किन्तु मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि अपनी सारी संपत्ति खोकर भी प्रसन्नचित्त कैसे रहा जाए। “मुझसे वह भूमि छीनी जा रही है जो मेरे पिता और दादा की थी!” तो इससे क्या हुआ? तुम्हारे दादा से पहले उसका स्वामी कौन था? क्या तुम यह भी बता सकते हो कि वह किस जाति या राष्ट्र की थी, किसी व्यक्ति की तो बात ही छोड़ो? तुम उस भूमि पर स्वामी बनकर नहीं बल्कि एक अत्याचारी शासक की तरह अधिकार जमाकर बैठे हो। 

    तुम किसके किरायेदार हो? यदि तुम्हारा सौभाग्य है तो उसी व्यक्ति के किरायेदार हो जो तुम्हारे बाद उसका उत्तराधिकारी बनेगा। विधिवेत्ता कहते हैं कि सार्वजनिक भूमि पर कोई भी व्यक्ति स्थायी स्वामित्व स्थापित नहीं कर सकता। जिस भूमि पर तुम रहते हो और जिसे अपनी कहते हो, वह वास्तव में सार्वजनिक है बल्कि उससे भी बढ़कर, वह समस्त मानव-जाति की है। क्या अद्भुत कौशल है! तुम वक्र आकृतियों का माप जानते हो। तुम्हें जो भी आकृति दी जाए, उसे वर्ग में परिवर्तित कर सकते हो। तुम तारों के बीच की दूरी बता सकते हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे तुम माप न सको। यदि तुम इतने ही कुशल मापक हो तो मनुष्य के मन को मापो। बताओ कि वह कितना महान है और कितना तुच्छ भी हो सकता है। तुम जानते हो कि कौन-सी रेखा समकोण बनाती है। किन्तु यदि तुम्हें यह नहीं मालूम कि जीवन में क्या सही है, तो उस ज्ञान का तुम्हारे लिए क्या उपयोग है?

    अब मैं उस विद्या की ओर आता हूँ जो स्वयं को आकाश और नक्षत्रों के ज्ञान पर गर्व करती है—

जहाँ शीतल ज्योति वाला शनि अपना मार्ग बनाता है,
और चंचल बुध का अग्निमय तारा किन-किन कक्षाओं में विचरण करता है।

    इन बातों को जानकर मुझे क्या लाभ होगा? क्या केवल इसलिए कि जब शनि और मंगल आमने-सामने हों या जब बुध संध्या समय शनि की दृष्टि में अस्त हो, तब मैं चिंता करता रहूँ? इसके बजाय मुझे यह सीखना चाहिए कि ग्रह जहाँ कहीं भी हों, वे मेरे लिए अनुकूल ही हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। उनकी गतियाँ भाग्य के निरंतर और अटल विधान द्वारा निर्धारित हैं। वे निश्चित मार्गों पर चलते हैं और या तो संसार की सभी घटनाओं का निर्धारण करते हैं अथवा उनका संकेत देते हैं। किन्तु यदि वे सब कुछ घटित कराते हैं तो ऐसी बातों को जानने से क्या लाभ जिन्हें बदला ही नहीं जा सकता? और यदि वे केवल भविष्य की घटनाओं का संकेत देते हैं तो उन बातों को पहले से जान लेने का क्या लाभ जिनसे बचा ही नहीं जा सकता? वे घटनाएँ तो तुम्हें पता हों या न हों, घटित होकर ही रहेंगी।

यदि तुम सूर्य की तीव्र गति पर और उसके पीछे क्रम से चलने वाले तारों पर दृष्टि रखो,
तो आने वाला कल तुम्हें कभी अचानक नहीं चौंकाएगा,
और निर्मल रात्रि भी तुम्हें किसी छिपे हुए आक्रमण से भयभीत नहीं करेगी।

किन्तु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैंने ऐसे किसी भी आकस्मिक आघात से बचने के लिए पहले ही पर्याप्त तैयारी कर रखी है। 

    “क्या सचमुच यह सत्य है कि आने वाला कल मुझे कभी आश्चर्यचकित नहीं करेगा? जो घटना किसी व्यक्ति के ज्ञान के बिना घटती है, क्या वह उसे आश्चर्यचकित नहीं करती?” मैं यह नहीं जानता कि कल क्या होगा। किन्तु मैं यह अवश्य जानता हूँ कि क्या-क्या हो सकता है। ऐसी किसी भी संभावना को मैं अपनी अपेक्षा से बाहर नहीं रखता। मैं हर संभावित घटना की अपेक्षा करता हूँ और यदि उनमें से किसी से मेरा बचाव हो जाए, तो मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ। आने वाला कल मुझे तभी चकित करता है जब वह मुझे किसी विपत्ति से बचा लेता है। परन्तु तब भी वह मुझे वास्तव में आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि जिस प्रकार मैं जानता हूँ कि ऐसी कोई भी घटना नहीं है जो मेरे साथ घटित न हो सके, उसी प्रकार मैं यह भी जानता हूँ कि उनमें से कोई भी घटना निश्चित रूप से घटित होगी, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए मैं सर्वोत्तम की आशा करता हूँ, किन्तु सबसे बुरे के लिए भी स्वयं को तैयार रखता हूँ। 

    यदि मैं नियमित क्रम का पालन न करूँ तो इसे सहन करना। मैं चित्रकारों को उदार कलाओं के साधकों में नहीं गिन सकता। उसी प्रकार मूर्तिकारों, संगमरमर तराशने वालों और विलासिता की सेवा करने वाले अन्य सभी कारीगरों को भी नहीं। इसी प्रकार मैं पहलवानों तथा उन सभी विद्याओं को भी अस्वीकार करता हूँ जिनका संबंध केवल तेल और धूल-मिट्टी से है। अन्यथा मुझे मालिश करने वालों, रसोइयों और उन सभी लोगों को भी उदार कलाओं में गिनना पड़ेगा जो अपनी कला को केवल हमारे भोग-विलास की पूर्ति में लगाते हैं। ज़रा बताओ तो सही, उन भूखे-से दिखने वाले लोगों की कला को कैसे उदार कला कहा जा सकता है, जो शरीर को तो भोजन की नाँद के सामने पालते-पोसते हैं। जबकि उनका मन पोषण के अभाव में दुर्बल होता जाता है? क्या हमें आज के युवकों की इस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए कि यही उदार शिक्षा है? हमारे पूर्वज अपने युवकों को सीधा और दृढ़ खड़ा होना सिखाते थे, भाला फेंकना, बरछी चलाना, घुड़सवारी करना तथा तलवार और ढाल का उपयोग करना सिखाते थे। वे अपने बच्चों को ऐसी कोई शिक्षा नहीं देते थे जिसे लेटकर सीखा जाए। किन्तु न तो ये प्राचीन कलाएँ और न ही आज की नई कलाएँ सद्गुण की शिक्षा देती हैं या उसका विकास करती हैं। क्योंकि घोड़े को नियंत्रित करना, लगाम से उसकी चाल को रोकना और दिशा देना सीख लेने से क्या लाभ, यदि स्वयं सवार ही अपनी अनियंत्रित और बेलगाम वासनाओं के वश में हो? कुश्ती या मुक्केबाज़ी में अनेक प्रतिद्वंद्वियों को परास्त कर लेने से क्या लाभ, यदि विजेता स्वयं अपने क्रोध का पराजित बंदी बना हुआ हो?

    “तो क्या उदार विद्याओं का हमें कोई लाभ ही नहीं है?” है, पर केवल कुछ सीमित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। सद्गुण की प्राप्ति के लिए नहीं। क्योंकि वे कलाएँ भी, जो अपने निम्न स्तर को खुले रूप में स्वीकार करती हैं और जिनका आधार हाथ का कौशल है, जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। फिर भी उनका सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। “तो फिर हम अपने बच्चों को उदार विद्याओं की शिक्षा क्यों देते हैं?” इसलिए नहीं कि वे उन्हें सद्गुण सिखा सकती हैं बल्कि इसलिए कि वे उनके मन को सद्गुण ग्रहण करने योग्य बनाती हैं। जैसे प्रारंभिक शिक्षा, जिसे पहले ‘अक्षर-ज्ञान’ कहा जाता था, बच्चों को शिक्षा की मूल बातें सिखाती है। पर स्वयं उदार विद्याओं की शिक्षा नहीं देती। वह केवल उनके लिए आधार तैयार करती है। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी मन को सीधे सद्गुण तक नहीं पहुँचातीं बल्कि उस यात्रा के लिए उसे तैयार करती हैं। 

    पॉसिडोनियस के अनुसार कलाएँ चार प्रकार की होती हैं— साधारण और निम्न कलाएँ, मनोरंजन की कलाएँ, बाल्यावस्था की कलाएँ और उदार कलाएँ। साधारण कलाएँ वे हैं जिनका अभ्यास कारीगर करते हैं। उनका आधार हाथ का कौशल है और उनका उद्देश्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इनमें न तो कोई विशेष आकर्षण है और न ही सम्माननीयता का कोई आभास। मनोरंजन की कलाएँ वे हैं जिनका संबंध आँखों और कानों के सुख से है। इनमें उन अभियंताओं की कला भी आती है जो रंगमंच पर ऐसे यंत्र बनाते हैं जिनसे मंच बिना किसी सहारे के ऊपर उठता हुआ दिखाई देता है या मंच के भाग बिना किसी आवाज़ के आकाश की ओर उठ जाते हैं। इसी प्रकार वे अनेक विचित्र युक्तियाँ बनाते हैं, जहाँ समतल भूमि थी वहाँ अचानक दरारें खुल जाती हैं, फिर अपने-आप बंद हो जाती हैं या ऊँचे उठे हुए मंच धीरे-धीरे नीचे आ जाते हैं। जो लोग इन युक्तियों से परिचित नहीं होते, उनकी आँखों को ये सब अत्यंत अद्भुत लगते हैं। वे प्रत्येक अप्रत्याशित दृश्य पर आश्चर्य करते हैं क्योंकि वे उसके कारण को नहीं जानते। बाल्यावस्था की कलाएँ उदार विद्याओं से कुछ समानता रखती हैं। यूनानी इन्हें ‘एन्साइक्लिकल’ (encyclical) कहते हैं। हमारी भाषा में इन्हें ‘उदार विद्याएँ’ कहा जाता है। किन्तु वास्तव में केवल वही विद्याएँ उदार हैं और सच कहूँ तो केवल वही वास्तव में स्वतंत्र मनुष्य के योग्य हैं जिनका संबंध सद्गुण से है। 

    कोई इस प्रकार आपत्ति कर सकता है। “दर्शन के कई विभाग हैं। एक प्राकृतिक जगत का अध्ययन है, दूसरा नीतिशास्त्र और तीसरा तर्कशास्त्र। उसी प्रकार उदार विद्याएँ भी दर्शन के भीतर अपना स्थान चाहती हैं। जब हम प्रकृति से संबंधित प्रश्नों की जाँच करते हैं, तब हम ज्यामिति के प्रमाणों का सहारा लेते हैं। इसलिए, यदि ज्यामिति दर्शन की सहायता करती है तो वह दर्शन का एक भाग भी होनी चाहिए।” किन्तु अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो हमारी सहायता तो करती हैं पर हमारा अंग नहीं होतीं। बल्कि यदि वे स्वयं हमारा अंग होतीं तो वे हमारी सहायता करने वाली वस्तुएँ न कहलातीं। भोजन शरीर की सहायता करता है, फिर भी वह शरीर का अंग नहीं है। उसी प्रकार ज्यामिति दर्शन के लिए उपयोगी है जैसे, ज्यामिति के लिए उपकरण बनाने वाला कारीगर आवश्यक होता है। परंतु जैसे वह कारीगर स्वयं ज्यामिति का भाग नहीं है, वैसे ही ज्यामिति भी दर्शन का भाग नहीं है। इसके अतिरिक्त, दोनों का अपना-अपना निश्चित विषय है। दार्शनिक प्राकृतिक घटनाओं की जाँच करता है और उनका ज्ञान प्राप्त करता है। जबकि ज्यामितिज्ञ आकृतियों और मापों का अध्ययन करता है तथा उनके आधार पर गणनाएँ करता है। आकाशीय पिंडों की गति का कारण, उनका प्रभाव और उनका स्वभाव—ये सब दार्शनिक के अध्ययन के विषय हैं। किन्तु उनकी कक्षाएँ, उपवृत्त (एपिसाइकिल), और वे प्रत्यक्ष गतियाँ जिनमें वे कभी ऊपर उठते, कभी नीचे आते या कभी स्थिर प्रतीत होते हैं। जबकि वास्तव में कोई भी आकाशीय पिंड स्थिर नहीं रहता, ये सब गणितीय खगोलशास्त्री के विषय हैं। दार्शनिक यह जानता है कि दर्पण में प्रतिबिंब क्यों दिखाई देता है। जबकि ज्यामितिज्ञ तुम्हें बता सकता है कि वस्तु अपने प्रतिबिंब से कितनी दूरी पर होनी चाहिए और किस प्रकार का दर्पण किस प्रकार का प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। दार्शनिक यह सिद्ध करेगा कि सूर्य विशाल है। जबकि खगोलशास्त्री अनुभव और निरीक्षण के आधार पर यह ज्ञात करेगा कि वह वास्तव में कितना बड़ा है। परंतु इस प्रकार निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उसे कुछ मूल सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। कोई भी विद्या अपने बल पर पूर्ण नहीं हो सकती यदि उसके मूल सिद्धांत किसी दूसरी विद्या से प्राप्त होते हों। दर्शन किसी अन्य विद्या से कुछ नहीं माँगता। वह अपनी पूरी इमारत की नींव स्वयं रखता है। गणितीय खगोलशास्त्र मानो उस इमारत की ऊपरी मंज़िल है, जो किसी दूसरी नींव पर खड़ी की गई है। वह अपने मूल सिद्धांत कहीं और से ग्रहण करता है और उन्हीं के सहारे आगे बढ़ता है। यदि वह अपने बल पर सत्य तक पहुँच सकता, यदि वह स्वयं सम्पूर्ण विश्व-प्रकृति को समझ पाने में समर्थ होता, तो मैं स्वीकार कर लेता कि उसके पास हमें देने के लिए बहुत कुछ है। क्योंकि आकाशीय घटनाओं का अध्ययन करते हुए हमारा मन भी अधिक व्यापक और अधिक ऊँचा बनता है। 

    मनुष्य का मन अपनी पूर्ण ऊँचाई केवल एक ही मार्ग से प्राप्त करता है जब उसे इस बात का अटल ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में क्या शुभ है और क्या अशुभ। और इस विषय में किसी अन्य विद्या के पास सिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। अब आओ, हम एक-एक करके सद्गुणों का विचार करें। साहस वह सद्गुण है जो भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु का तिरस्कार करता है। जो कुछ भी हमें भयभीत करता है और हमारी स्वतंत्रता को दासता के जुए के नीचे झुका देता है, उसका साहस तिरस्कार करता है, उसका सामना करता है और उस पर विजय प्राप्त करता है। क्या उदार विद्याएँ इस साहस को दृढ़ बनाने में कोई सहायता करती हैं? निष्ठा मनुष्य के हृदय का सबसे पवित्र गुण है। कोई भी कष्ट उसे छल करने के लिए विवश नहीं कर सकता और कोई भी पुरस्कार उसे विश्वासघात के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। निष्ठा कहती है, “मुझे जला दो, मेरे अंग काट दो, मुझे मार डालो, फिर भी मैं अपने विश्वास के साथ विश्वासघात नहीं करूँगी। जितना अधिक पीड़ा मुझसे मेरे रहस्य उगलवाने का प्रयास करेगी, उतना ही अधिक मैं उन्हें अपने भीतर छिपाकर रखूँगी।” क्या उदार विद्याएँ ऐसा चरित्र गढ़ सकती हैं? आत्मसंयम हमारी इच्छाओं और भोगों पर शासन करता है। कुछ इच्छाओं का वह तिरस्कार करके उन्हें पूरी तरह त्याग देता है और कुछ को सीमित कर स्वस्थ मर्यादा के भीतर रखता है। वह कभी भी सुखों को केवल उनके अपने लिए नहीं चाहता क्योंकि वह जानता है कि इच्छाओं की सबसे उत्तम सीमा यही है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही ग्रहण किया जाए, न कि जितनी इच्छा हो उतना। सद्भाव या दयालुता मनुष्य को अपने साथियों के प्रति घमंडी या दोष-दृष्टि रखने वाला बनने से रोकती है। वह वाणी, व्यवहार और भावना, तीनों में सबके प्रति कोमल और सहज रहती है। वह दूसरों के प्रत्येक दुःख को अपना दुःख समझती है और प्रत्येक शुभ अवसर का स्वागत मुख्यतः इसलिए करती है कि उसका लाभ दूसरों के साथ बाँट सके। क्या उदार विद्याएँ ऐसा आचरण सिखाती हैं? नहीं। वे हमें ईमानदारी, आत्मसंयम, मर्यादा, सादगी और मितव्ययिता भी नहीं सिखातीं। उसी प्रकार वे हमें क्षमा और करुणा भी नहीं सिखातीं। वह करुणा जो दूसरे के रक्त के प्रति उतनी ही सावधान रहती है जितनी अपने रक्त के प्रति क्योंकि वह जानती है कि किसी भी मनुष्य को कभी भी दूसरे मनुष्य के जीवन का मूल्य नहीं भूलना चाहिए।

    “तुम लोग कहते हो कि उदार विद्याओं के बिना सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर तुम यह कैसे कहते हो कि उनका सद्गुण में कोई योगदान नहीं है?” इसका उत्तर यह है, जिस प्रकार भोजन के बिना भी सद्गुण की प्राप्ति नहीं हो सकती, फिर भी भोजन का सद्गुण से कोई संबंध नहीं है। उसी प्रकार लकड़ी जहाज़ के निर्माण में कोई योगदान नहीं देती, यद्यपि जहाज़ लकड़ी के बिना बनाया नहीं जा सकता। मेरा आशय यह है कि केवल इसलिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि एक वस्तु दूसरी में योगदान देती है क्योंकि दूसरी वस्तु उसके बिना अस्तित्व में नहीं आ सकती। इसके अतिरिक्त, यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में उदार विद्याओं के बिना भी बुद्धिमत्ता प्राप्त की जा सकती है। क्योंकि यद्यपि सद्गुण को सीखना आवश्यक है, पर उसे इन विद्याओं के माध्यम से नहीं सीखा जाता। मेरे पास यह मानने का क्या कारण है कि जो व्यक्ति अक्षर-ज्ञान से वंचित है, वह बुद्धिमान नहीं बन सकता? बुद्धिमत्ता अक्षरों में नहीं रहती। अक्षर केवल तथ्य सिखाते हैं, शब्द नहीं और संभव है कि जब स्मृति को अपने अतिरिक्त किसी दूसरे सहारे पर निर्भर न रहना पड़े, तब वह और भी अधिक दृढ़ हो जाती है। 

    बुद्धिमत्ता विशाल और व्यापक होती है। उसे पर्याप्त स्थान चाहिए। मनुष्य को मानव-संबंधी और दैवी विषयों का अध्ययन करना चाहिए। भूतकाल और भविष्य का, नश्वर और शाश्वत का भी। समय के विषय में भी उसे विचार करना चाहिए और देखो, केवल इसी एक विषय पर कितने प्रश्न उठते हैं! पहला, क्या समय स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता है? दूसरा, क्या समय से पहले भी कुछ था, क्या कोई ऐसी सत्ता है जो समय से परे है? क्या समय का आरंभ संसार के साथ ही हुआ या चूँकि संसार से पहले भी कुछ अस्तित्व में था, इसलिए समय भी तब से विद्यमान था? केवल आत्मा के विषय में ही असंख्य प्रश्न पूछे जा सकते हैं। वह कहाँ से आती है? उसका स्वरूप क्या है? उसका अस्तित्व कब प्रारंभ होता है। वह कितने समय तक रहती है? क्या वह एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती रहती है, एक जीवित प्राणी से दूसरे में अपना निवास बदलती रहती है? या क्या वह केवल एक बार ही इस देह-बंधन को सहती है और मुक्त होकर समस्त ब्रह्मांड में विचरण करती है? क्या वह साकार है या निराकार? जब वह हमारे माध्यम से कार्य करना बंद कर देती है, तब वह क्या करती है? इस कारागार से मुक्त होने के बाद वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग किस प्रकार करती है? या क्या वह अपने पूर्व जीवन को भूल जाती है और शरीर से अलग होकर उच्च लोकों में पहुँचते ही पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप को जानती है? मानव और दैवी विषयों में से तुम किसी भी एक को चुन लो, तुम्हें इतने अधिक प्रश्न मिलेंगे कि उनके अध्ययन और विचार में पूरा जीवन लग सकता है। जब हमारे मन को व्यस्त रखने के लिए इतने महान विषय उपस्थित हैं, तब हमें उनके लिए स्थान बनाना चाहिए और उन सब बातों को निकाल देना चाहिए जो अनावश्यक हैं। सद्गुण इतने संकुचित स्थान में निवास नहीं करता। इतना महान अतिथि विस्तृत स्थान चाहता है। इसलिए सब अनावश्यक बातों को हृदय से बाहर कर दो और अपने पूरे हृदय को सद्गुण के लिए खुला रहने दो। 

    “फिर भी अनेक प्रकार की विद्याओं का ज्ञान होना आनंददायक है।” यदि ऐसा है तो हमें उनमें से केवल उतना ही रखना चाहिए जितनी वास्तव में आवश्यकता हो। या क्या तुम्हें यह उचित लगता है कि जो व्यक्ति अपने घर के लिए अनुपयोगी सामान खरीदता है और महँगी वस्तुओं का प्रदर्शन करता है, उसकी तो आलोचना की जाए, पर जो व्यक्ति अनावश्यक साहित्यिक ज्ञान का विशाल भंडार इकट्ठा करने में लगा रहता है, उसकी नहीं? आवश्यकता से अधिक जानने की इच्छा भी असंयम का ही एक रूप है। वास्तव में उदार विद्याओं का ऐसा अध्ययन मनुष्यों को अप्रिय, वाचाल, आडंबरपूर्ण और आत्मसंतुष्ट बना देता है। क्योंकि वे उन बातों को सीखते रहते हैं जिन्हें जानने की उन्हें आवश्यकता नहीं होती, और परिणामस्वरूप वे उन बातों को सीख ही नहीं पाते जिन्हें वास्तव में जानना चाहिए। साहित्य के विद्वान डिडिमस ने चार हज़ार ग्रंथ लिखे थे। यदि उसने केवल उतनी ही निरर्थक पुस्तकों का अध्ययन किया होता तो भी मुझे उस पर दया आती। कुछ ग्रंथों में वह यह खोजता है कि होमर का जन्मस्थान कहाँ था। कुछ में यह कि ऐनियस की वास्तविक माता कौन थी। कुछ में यह कि अनाक्रेयोन अधिक कामुक था या अधिक मद्यपान का अभ्यासी। कुछ में यह कि क्या सैफो वास्तव में वेश्या थी और ऐसे ही अनेक अन्य विषयों पर भी उसने लिखा। यदि तुम्हें ऐसे प्रश्नों के उत्तर मालूम भी हों तो तुम्हें उन्हें भूलने का प्रयत्न करना चाहिए। फिर भी तुम कहते हो कि जीवन बहुत छोटा है! किन्तु हमारे अपने देशवासियों में भी ऐसी अनेक अतिशयताएँ हैं जिन्हें कुल्हाड़ी से काटकर हटाने की आवश्यकता है। कितना समय नष्ट करके और दूसरों के कानों को कितना कष्ट पहुँचाकर हम केवल यह प्रशंसा सुनने के लिए प्रयत्न करते हैं—“क्या विद्वान व्यक्ति है!” इससे कहीं अच्छा है कि हम एक कम आडंबरपूर्ण उपाधि से ही संतुष्ट रहें—“क्या अच्छा मनुष्य है!”

    तो क्या मुझे सभी राष्ट्रों के इतिहास खँगालने चाहिए ताकि यह पता लगा सकूँ कि कविता सबसे पहले किसने लिखी? क्या मुझे यह गणना करनी चाहिए कि ऑर्फ़ियस और होमर के बीच कितने वर्ष बीते। जबकि इस संबंध में कोई लिखित प्रमाण ही उपलब्ध नहीं हैं? क्या मुझे उन संपादकीय चिह्नों का अध्ययन करना चाहिए जिनसे अरिस्टार्कस ने दूसरे कवियों की रचनाओं पर अपनी टिप्पणियाँ अंकित की थीं और अपना जीवन मात्र अक्षरों और मात्राओं के विश्लेषण में बिता देना चाहिए? क्या मुझे ज्यामिति की धूल में ही उलझे रहना चाहिए? क्या मैं वह हितकारी उपदेश भूल गया हूँ, “अपने समय का सदुपयोग करो”? यदि मैं इन सब बातों को सीखने में लगा रहूँ तो फिर किन बातों को छोड़ दूँ? गायस सीज़र के शासनकाल में एपियोन नामक एक साहित्य-विद्वान यूनान की यात्रा पर गया। वहाँ के नगरों ने उसे होमर के नाम पर अपना नागरिक बना लिया। वह कहा करता था कि होमर ने ओडिसी और इलियड की रचना पूरी करने के बाद अपनी कृति के आरंभ में एक प्रस्तावना भी जोड़ दी थी, जिसमें पूरे ट्रॉय-युद्ध का सार समाहित था। इसके प्रमाण के रूप में वह यह तर्क देता था कि इलियड की पहली पंक्ति के पहले दो अक्षर जान-बूझकर इस उद्देश्य से रखे गए थे कि वे उस कृति के खंडों (पुस्तकों) की संख्या का संकेत दें। यही वे बातें हैं जिन्हें तथाकथित बहुश्रुत विद्वान के लिए जानना आवश्यक माना जाता है! ज़रा सोचो, तुम्हारे जीवन का कितना समय रोगों में बीत जाता है। कितना सार्वजनिक और निजी कार्यों में। कितना दैनिक आवश्यकताओं में और कितना नींद में। अपने जीवन का ठीक-ठीक हिसाब लगाओ। उसमें इतनी सारी निरर्थक बातों के लिए स्थान ही नहीं है। 

    मैं अब तक उदार विद्याओं की चर्चा कर रहा था। किन्तु दार्शनिकों के पास भी समय नष्ट करने के अपने तरीके हैं और उनके भी अपने निरर्थक विषय हैं। वे भी अक्षरों की मात्राएँ गिनने, तथा अव्ययों और संबंधबोधक शब्दों के सही अर्थ निर्धारित करने में लग जाते हैं। साहित्य-विदों और ज्यामितिज्ञों से ईर्ष्या करके उन्होंने उनकी सारी अनावश्यक सूक्ष्मताओं को अपना लिया है। परिणाम यह हुआ कि वे सही ढंग से बोलने की कला तो अधिक जानते हैं। पर सही ढंग से जीना नहीं। मैं तुम्हें बताता हूँ कि ऐसी अतिसूक्ष्म तर्कबाज़ी कितनी हानिकारक हो सकती है और वह सत्य से कितनी दूर ले जाती है। प्रोटागोरस का दावा था कि वह किसी भी प्रश्न के दोनों पक्षों का समान शक्ति से समर्थन कर सकता है, यहाँ तक कि इस प्रश्न का भी कि क्या वास्तव में हर प्रश्न के दोनों पक्षों का समर्थन किया जा सकता है। नाउसिफ़ानेस का कहना था कि जो वस्तुएँ हमें वास्तविक प्रतीत होती हैं, वे वास्तव में अवास्तविक वस्तुओं से अधिक वास्तविक नहीं हैं। पार्मेनिदेस का मत था कि जो कुछ हमें अनेक और भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, वह वास्तव में उस एकमात्र सत्ता से अलग नहीं है। एलेआ के ज़ेनो ने तो पूरा विवाद ही समाप्त कर दिया। उसका कहना था कि वास्तव में कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। पाइर्रोनवादी, मेगारावादी, एरेट्रियावादी और अकादमिक, ये सब भी कमोबेश इसी दिशा में चले गए। उन्होंने एक ऐसी नई प्रकार की विद्या प्रस्तुत की, जो यह दावा करती है कि वह कुछ भी नहीं जानती। इन सबको भी लिबरल आर्ट्स की उसी निरर्थक भीड़ में डाल दो। पहली श्रेणी के लोग मुझे कोई उपयोगी ज्ञान नहीं देते। दूसरी श्रेणी तो मुझसे ज्ञान प्राप्त करने की आशा भी छीन लेती है। निरर्थक बातें सीख लेना, कुछ भी न सीखने से फिर भी बेहतर है। एक वर्ग मेरे सामने सत्य का मार्ग दिखाने के लिए कोई दीपक नहीं जलाता। दूसरा तो मेरी आँखें ही निकाल देता है। 

    यदि मैं प्रोटागोरस पर विश्वास करूँ तो संसार में कोई भी बात निश्चित नहीं रह जाती। सब कुछ विवादास्पद हो जाता है। यदि मैं नाउसिफ़ानेस पर विश्वास करूँ, तो केवल एक बात निश्चित है कि कुछ भी निश्चित नहीं है। यदि मैं पार्मेनिदेस पर विश्वास करूँ तो उस एकमात्र सत्ता के अतिरिक्त कुछ भी अस्तित्व में नहीं है। और यदि मैं ज़ेनो पर विश्वास करूँ तो वह एकमात्र सत्ता भी नहीं है। तो फिर हम क्या हैं? और ये सब वस्तुएँ क्या हैं जो हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं, हमारा पालन-पोषण करती हैं और हमें जीवित रखती हैं? क्या यह समूचा संसार केवल एक छाया है या तो पूर्णतः शून्य या फिर छल से भरी हुई? मैं तो यह भी नहीं कह सकता कि मुझे किस पर अधिक क्रोध आता है, उन पर, जिन्होंने चाहा कि हम कुछ भी न जानें या उन पर, जिन्होंने हमसे इतना भी छीन लिया कि हम यह भी न जान सकें कि हम कुछ नहीं जानते।


अभी के लिए विराम 

Sunday, 26 July 2026

कम संसाधनों पर आधारित जीवन के बारे में -- पत्र - 85

 प्रिय लूसीलियस 


जहाज़ पर सवार होने से पहले ही मैं एक प्रकार से जहाज़-डूबा हुआ नाविक था। यह कैसे हुआ, इसका उल्लेख मैं नहीं करूँगा, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसे स्टोइक दर्शन के विरोधाभासों में से एक समझ बैठो। उनमें से कोई भी असत्य नहीं है और न ही उनमें से कोई उतना विचित्र है जितना पहली दृष्टि में प्रतीत होता है। जब भी तुम चाहोगे, मैं यह तुम्हें सिद्ध कर दूँगा बल्कि यदि तुम न भी चाहो, तब भी। फिलहाल, इस यात्रा ने मुझे यह सिखाया है कि हमारी कितनी ही वस्तुएँ वास्तव में अनावश्यक होती हैं। हम उन्हें कितनी आसानी से स्वेच्छा से त्याग सकते हैं। क्योंकि जब आवश्यकता हमें उनसे वंचित कर देती है, तब उनके अभाव का हमें विशेष दुःख नहीं होता।



    मैक्सिमस और मैं केवल कुछ दासों के साथ जितनों के लिए एक साधारण गाड़ी में स्थान हो सकता है और उतने ही सामान के साथ, जितना हम अपने शरीर पर धारण किए हुए हैं, पिछले दो दिनों से अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक रह रहे हैं। मेरा बिछौना भूमि पर बिछा है और मैं उसी पर लेटता हूँ। मेरे पास केवल दो चोगे हैं।एक बिछौने को ढकने के लिए और दूसरा स्वयं को ढकने के लिए। हमारे दोपहर के भोजन में कोई अतिरिक्त व्यंजन नहीं था और उसे तैयार होने में एक घंटे से भी कम समय लगा। सूखे अंजीर मैं हर जगह अपने साथ रखता हूँ और अपनी लेखन-पट्टिकाएँ भी। यदि रोटी मिल जाती है तो अंजीर उसके साथ खाने का व्यंजन बन जाते हैं और यदि रोटी नहीं होती तो वही अंजीर मेरी रोटी बन जाते हैं। वे मेरे लिए प्रत्येक दिन को नए वर्ष का आरम्भ बना देते हैं। मैं भी उत्तम विचारों तथा महान आत्मबल के सहारे उसे सचमुच एक सुखद नया वर्ष बना लेता हूँ। क्योंकि मनुष्य की आत्मा उससे अधिक महान कभी नहीं होती, जितनी तब होती है जब वह उन सभी वस्तुओं का त्याग कर देती है जो वास्तव में उसकी अपनी नहीं हैं। किसी भी वस्तु से भय न रखकर वह शांति प्राप्त करती है और किसी भी वस्तु की इच्छा न करके वह सच्ची समृद्धि प्राप्त करती है।

    जिस गाड़ी में मैं यात्रा कर रहा हूँ, वह केवल एक साधारण देहाती बैलगाड़ी जैसी है। उसे खींचने वाले खच्चरों में जीवित होने का एकमात्र प्रमाण यही है कि वे चल रहे हैं। गाड़ीवान ने अपने जूते उतार रखे हैं और वह भी गर्मी के कारण नहीं। मुझे अपने-आप को यह समझाने में कठिनाई होती है कि कोई मुझे ऐसी गाड़ी में देखे। यह मेरे स्वभाव की एक विचित्र कमजोरी है कि सही काम करते हुए भी मुझे अब तक लज्जा आती है। जब भी रास्ते में किसी की अधिक भव्य सवारी दिखाई देती है तो अनचाहे ही मेरा चेहरा लज्जा से लाल हो जाता है। यही इस बात का प्रमाण है कि जिन आदतों को मैं सही मानता हूँ और जिनकी प्रशंसा करता हूँ, वे अभी मेरे भीतर पूरी तरह दृढ़ नहीं हुई हैं। जो व्यक्ति साधारण गाड़ी में बैठने पर लज्जित होता है, वही किसी महँगी और शानदार सवारी का स्वामी बनकर उसका घमंड भी करेगा। अब तक मैंने केवल थोड़ी-सी ही प्रगति की है। मैं अभी अपनी सादगी को खुले रूप में अपनाने का साहस नहीं जुटा पाया हूँ। मैं अब भी राह चलते लोगों की राय की परवाह करता हूँ जबकि मुझे तो पूरी मानव-जाति की राय के विरुद्ध निर्भीक होकर यह कहना चाहिए—

“तुम लोग पागल हो। तुम भ्रम में हो। तुम अनावश्यक वस्तुओं पर मुग्ध हो जाते हो और किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसकी वास्तविक संपत्ति से नहीं करते। जब किसी को ऋण देना होता है या कोई उपकार करना होता है क्योंकि उपकार भी तुम एक प्रकार का खर्च ही मानते हो तब तुम उसकी आर्थिक स्थिति का ध्यानपूर्वक हिसाब लगाते हो।

‘इस व्यक्ति के पास बहुत संपत्ति है लेकिन उस पर भारी कर्ज भी है।’

‘इसका घर बहुत सुंदर है पर उसने उसे खरीदने के लिए उधार लिया है।’

‘इससे अधिक शानदार सेवकों का दल किसी के पास नहीं है लेकिन यह अपने ऋण नहीं चुकाता।’

‘यदि यह अपने सभी लेनदारों का भुगतान कर दे तो इसके पास कुछ भी नहीं बचेगा।’

इसी प्रकार तुम्हें हर व्यक्ति के विषय में भी विचार करना चाहिए। यह जानने का प्रयास करो कि उसके पास वास्तव में ऐसा क्या है जो सचमुच उसका अपना है।

क्या तुम किसी मनुष्य को केवल इसलिए धनी समझते हो कि वह घर से बाहर भी सोने की थालियों और प्यालों में भोजन करता है, कि हर प्रांत में उसकी एक-एक जागीर है, कि उसकी हिसाब-किताब की पुस्तकें इतनी अधिक हैं कि वे एक मोटे ग्रंथ का रूप ले लें, कि नगर के बाहर उसकी इतनी विशाल भूमि है कि यदि वह विरल जनसंख्या वाले अपूलिया में भी होती, तब भी लोगों को उससे ईर्ष्या होती?

फिर भी वह मनुष्य निर्धन है। क्यों? क्योंकि वह ऋणग्रस्त है।

तुम पूछोगे, “उस पर कितना ऋण है?”

सब कुछ!

या क्या तुम यह समझते हो कि अपनी सारी संपत्ति भाग्य की देन होने के कारण उस पर निर्भर होना, किसी मनुष्य का ऋणी होने से किसी प्रकार भिन्न है? क्या इससे कोई अंतर पड़ता है कि उसके खच्चर खूब हृष्ट-पुष्ट हैं और सब एक ही रंग के हैं? क्या उसकी अलंकृत और भव्य गाड़ी का कोई वास्तविक महत्व है?

तीव्र गति वाले घोड़े, बहुमूल्य जरीदार आवरणों से सुसज्जित हैं,
उनकी मार्टिंगेलें (घोड़े की लगाम का एक हिस्सा) सोने से जड़ी हुई हैं,
और उनके मुख में लगी लगामों के बिट भी शुद्ध स्वर्ण के बने हुए हैं।

ऐसी वस्तुएँ न तो उनके स्वामी को बेहतर बनाती हैं और न ही खच्चर को। कैटो द सेंसर, जिसका जीवन राज्य के लिए उतना ही लाभदायक था जितना सिपियो का क्योंकि एक ने हमारे शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध किया था और दूसरे ने हमारे दुर्गुणों के विरुद्ध, प्रायः एक साधारण बोझा ढोने वाले घोड़े पर यात्रा करता था। वास्तव में उस घोड़े पर दोनों ओर झोले लटके रहते थे ताकि वह अपने साथ आवश्यक और उपयोगी वस्तुएँ ले जा सके। मैं तो यही चाहता हूँ कि किसी दिन मार्ग में उसकी भेंट हमारे किसी धनी नवयुवक अश्वारोही से हो जाए, जिसके आगे-आगे दौड़ने वाले सेवक हों, न्यूमिडियाई दासों का दल साथ चल रहा हो और जिसके पीछे उड़ती हुई धूल का बड़ा बादल उठ रहा हो। निस्संदेह, ऐसा व्यक्ति मार्कस कैटो की अपेक्षा अधिक सुसज्जित और अधिक सेवकों से घिरा हुआ यात्री दिखाई देगा। फिर भी, उस सारी फैशनेबल सज-धज के बीच वह गंभीरतापूर्वक यह विचार कर रहा होगा कि कहीं वह स्वयं को किसी ग्लैडिएटर या जंगली पशुओं से लड़ने वाले योद्धा के रूप में किराए पर दे दे। उस युग के लिए इससे बढ़कर सम्मान की बात और क्या हो सकती है कि एक विजयी सेनापति, एक सेंसर और वह भी कैटो जैसा व्यक्ति, एक साधारण-से घोड़े में ही संतुष्ट था! और वह घोड़ा भी पूरी तरह उसके लिए उपलब्ध नहीं था क्योंकि उसके दोनों ओर लटके हुए गठ्ठरों ने उसका कुछ भाग घेर रखा था। फिर भी, क्या तुम उन मोटे-ताज़े, आरामदेह चाल वाले और तेज़ रफ़्तार शानदार घोड़ों की अपेक्षा उस एक साधारण घोड़े को नहीं चुनोगे, जिसकी पीठ कैटो के पैरों के स्पर्श से घिस गई थी?

    मुझे लगता है कि यदि मैं स्वयं ही इस विषय का अंत न करूँ तो इसका कोई अंत नहीं होगा। इसलिए अब मैं कम-से-कम सामान और यात्रा-भार की चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ। जिसने सबसे पहले यात्रा के सामान को इम्पेडिमेंटा (अर्थात् ‘बोझ’ या ‘बाधा’) कहा था, उसने मानो पहले ही उसके वास्तविक स्वरूप की भविष्यवाणी कर दी थी। अब मैं तुम्हारे साथ हमारे स्टोइक विद्यालय के कुछ ऐसे विचार साझा करना चाहता हूँ जो सद्गुण से संबंधित हैं। हमारे मत में, मनुष्य के सुखी होने के लिए केवल सद्गुण ही पर्याप्त है। 

जो वस्तु वास्तव में अच्छी (शुभ) होती है, वही मनुष्य को भी अच्छा बनाती है। ठीक उसी प्रकार जैसे संगीत-कला में जो वस्तु अच्छी होती है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाती है। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को अच्छा नहीं बनातीं। अतः ऐसी वस्तुएँ वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हैं।

इस तर्क का पेरिपैटेटिक दार्शनिक इस प्रकार खंडन करते हैं कि हमारी पहली मान्यता ही असत्य है। वे कहते हैं, “केवल किसी अच्छी वस्तु के कारण मनुष्य अपने-आप अच्छा नहीं बन जाता। उदाहरण के लिए, संगीत-कला में बाँसुरी, वीणा या वादन के लिए उपयुक्त कोई उत्तम वाद्य-यंत्र अच्छी वस्तुएँ हैं। परन्तु इनमें से कोई भी किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ नहीं बना देता।” 

    हम उन्हें इस प्रकार उत्तर देंगे। “तुम संगीत में ‘अच्छी वस्तु’ से हमारा अभिप्राय नहीं समझ पाए। हमारा संकेत उन वस्तुओं की ओर नहीं है जो केवल संगीतज्ञ को साधन उपलब्ध कराती हैं बल्कि उन गुणों की ओर है जो उसे वास्तव में संगीतज्ञ बनाते हैं। तुम केवल संगीत-कला के बाहरी उपकरणों पर ध्यान दे रहे हो, स्वयं उस कला पर नहीं। संगीत-कला में जो वास्तव में अच्छा है, वही किसी व्यक्ति को संगीतज्ञ बनाता है।”

    मैं इस बात को और अधिक स्पष्ट करना चाहता हूँ। संगीत-कला में ‘अच्छा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। पहला, उस वस्तु के लिए जो संगीतज्ञ के कार्य या प्रदर्शन में सहायता करती है। दूसरा, उस वस्तु के लिए जो स्वयं उसकी कला या कौशल को विकसित करती है। बाँसुरी, वीणा, ऑर्गन और तार वाले अन्य वाद्य-यंत्र पहले प्रकार की वस्तुएँ हैं। उनका संबंध संगीत के प्रदर्शन से है, स्वयं संगीत-कला से नहीं। क्योंकि एक व्यक्ति इन वाद्य-यंत्रों के बिना भी संगीत-कला में निपुण हो सकता है, यद्यपि वह उस समय अपनी कला का प्रदर्शन न कर सके। किन्तु मनुष्य के मामले में ऐसी दोहरी स्थिति नहीं पाई जाती। मनुष्य का वास्तविक शुभ (अच्छाई) और उसके जीवन का वास्तविक शुभ, दोनों एक ही हैं। 

    जो वस्तु सबसे निकृष्ट और तिरस्कृत लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में अच्छी (शुभ) नहीं हो सकती। धन तो दलाल और ग्लैडिएटरों के प्रबंधक जैसे लोगों के पास भी हो सकता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में अच्छा (शुभ) नहीं है। 

    “वे कहते हैं, ‘तुम्हारी पहली मान्यता ही असत्य है। साहित्य-शिक्षण, चिकित्सा और नौचालन (जहाज़ चलाने की कला) में हम देखते हैं कि उनसे संबंधित अच्छी वस्तुएँ अत्यन्त साधारण और निम्न श्रेणी के लोगों के पास भी हो सकती हैं।’” किन्तु ये कलाएँ महान आत्मा का दावा नहीं करतीं। वे मनुष्य को ऊँचाइयों तक नहीं उठातीं और न ही उसे भाग्य की वस्तुओं के प्रति उदासीन बनाती हैं। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्य को ऊँचा उठाता है और उसे उन सभी वस्तुओं से ऊपर स्थापित करता है जिन्हें सामान्य लोग अत्यन्त मूल्यवान समझते हैं। जिन वस्तुओं को लोग प्रायः अच्छा या बुरा कहते हैं, वे सद्गुणी व्यक्ति के लिए न तो अत्यधिक लालसा का विषय होती हैं और न ही भय का। 

    क्लियोपेट्रा के एक हिजड़े सेवक चेलिडोन के पास एक विशाल संपत्ति थी। हाल के समय में नातालिस नाम का एक व्यक्ति जिसकी वाणी उतनी ही अश्लील थी जितना उसका व्यवहार निर्लज्ज (क्योंकि वह स्त्रियों का मुख द्वारा यौन-शोषण करता था) बहुत बड़ी संपत्ति का उत्तराधिकारी बना और स्वयं भी अनेक लोगों का उत्तराधिकार छोड़ गया। तो अब हमें क्या कहना चाहिए? क्या धन ने उसे अशुद्ध बना दिया था या उसने स्वयं धन को कलंकित कर दिया? कुछ लोगों के पास धन उसी प्रकार पहुँचता है जैसे चाँदी के सिक्के किसी गटर में गिर पड़ते हैं। सद्गुण इन सब वस्तुओं से ऊपर स्थित रहता है। उसका मूल्यांकन उसके अपने मापदंड से किया जाता है। जो वस्तुएँ किसी भी व्यक्ति के पास हो सकती हैं, उन्हें वह वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं मानता चिकित्सा और नौचालन जैसी कलाएँ न तो स्वयं को और न ही उनका अभ्यास करने वालों को ऐसी वस्तुओं के प्रति आकर्षित होने से रोकती हैं। कोई व्यक्ति अच्छा मनुष्य न होते हुए भी एक कुशल चिकित्सक, कुशल नाविक, साहित्य का शिक्षक और, यदि कहो, एक उत्कृष्ट रसोइया भी हो सकता है। जब किसी व्यक्ति में कोई असाधारण गुण दिखाई देता है, तब तुम कहते हो कि वह एक असाधारण व्यक्ति है क्योंकि मनुष्य का स्वरूप उसके गुणों के अनुरूप ही पहचाना जाता है। 

    धन की थैली का मूल्य उसके भीतर रखे धन के कारण होता है। वास्तव में थैली तो केवल उसके भीतर की वस्तु का एक आवरण मात्र है। भला कौन भरी हुई थैली को उसके भीतर के धन से अधिक मूल्यवान मानता है? यही बात विशाल सम्पत्तियों के स्वामियों पर भी लागू होती है। वे मानो अपनी सम्पत्ति के केवल सहायक या परिशिष्ट भर हैं। फिर बुद्धिमान मनुष्य महान क्यों है? इसलिए कि उसका मन महान है। अतः यह बात सत्य है कि जो वस्तु सबसे तुच्छ और निकृष्ट लोगों के पास भी हो सकती है, वह वास्तविक अर्थ में शुभ (अच्छी) नहीं हो सकती। इसी कारण मैं पीड़ा से मुक्त रहने को भी शुभ नहीं कहूँगा क्योंकि यह तो एक झींगुर और एक पिस्सू को भी प्राप्त है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि शांत और निश्चिन्त जीवन ही शुभ है क्योंकि केंचुए से अधिक निश्चिन्त जीवन किसका होता है? तुम पूछते हो कि मनुष्य को बुद्धिमान क्या बनाता है? वही जो किसी को देवतुल्य बनाता है। उसमें कुछ दैवी, उदात्त और महान अवश्य होना चाहिए। वास्तविक शुभ सभी के हिस्से में नहीं आता। वह किसी भी साधारण धारक में निवास नहीं करता। इस बात पर विचार करो—

प्रत्येक प्रदेश अपनी-अपनी विशेष उपज देता है,
कहीं अन्न अधिक होता है, कहीं अंगूर की बेलें लहलहाती हैं।
कहीं बागों के फल प्रचुर मात्रा में मिलते हैं,
तो कहीं बिना बोए ही हरी घास उग आती है।
क्या तुम नहीं देखते कि ट्मोलुस पर्वत हमें सुगंधित केसर भेजता है,
भारत हमें हाथीदाँत प्रदान करता है। 
कोमल स्वभाव वाले सबाई लोग अपनी धूप (लोबान) भेजते हैं,
और वस्त्रहीन कैलिब्स लोग हमें लोहा उपलब्ध कराते हैं?

     इन विविध वस्तुओं को अलग-अलग प्रदेशों को सौंपा गया है ताकि यदि मनुष्य एक-दूसरे की उपज प्राप्त करना चाहें तो उन्हें परस्पर आदान-प्रदान करना पड़े। परन्तु सर्वोच्च शुभ का अपना एक अलग ही प्रदेश है। वह न तो वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ हाथीदाँत मिलता है और न वहाँ जहाँ लोहा मिलता है। तुम पूछते हो, उसका स्थान कहाँ है? वह मनुष्य का मन है। यदि मन पवित्र और निष्कलुष नहीं है तो उसमें ईश्वर का निवास नहीं हो सकता।जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह किसी अशुभ वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती। पर धन से लोभ उत्पन्न होता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है।

इस पर कोई आपत्ति कर सकता है। “यह सत्य नहीं है कि शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। धन तो मंदिरों की लूट और चोरी से भी प्राप्त होता है। इसलिए मंदिर-लूट और चोरी निश्चय ही बुरे कर्म हैं किन्तु केवल इसलिए नहीं कि उनसे धन प्राप्त होता है बल्कि इसलिए कि वे लाभ के साथ-साथ भय, चिंता तथा मन और शरीर, दोनों की यातनाएँ भी उत्पन्न करते हैं।”

    जो यह तर्क देता है, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि जिस प्रकार मंदिर-लूट अपने अनेक बुरे परिणामों के कारण बुरी है, उसी प्रकार वह अपने अच्छे परिणाम, धन प्राप्त होने के कारण किसी अर्थ में अच्छी भी है। इससे अधिक विकृत विचार और क्या हो सकता है? फिर भी आज हम मानो स्वयं को यह विश्वास दिला चुके हैं कि मंदिर-लूट, चोरी और व्यभिचार भी अच्छी बातें हैं। कितने ही लोग चोरी करने में लज्जा का अनुभव नहीं करते और कितने ही अपने व्यभिचार का घमंड करते हैं! छोटी-मोटी मंदिर-लूट करने वालों को दंड मिलता है जबकि बड़े पैमाने पर ऐसा करने वालों का विजय-यात्राओं में सम्मान किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी दृष्टि से मंदिर-लूट वास्तव में अच्छी है तो वह सम्माननीय भी होगी। चूँकि सम्माननीय कर्म ही उचित कर्म होता है, इसलिए उसे उचित कार्य भी माना जाएगा। ऐसी बात की कल्पना भी संसार का कोई मनुष्य नहीं कर सकता। अतः शुभ वस्तु अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि यदि, जैसा तुम कहते हो, मंदिर-लूट केवल इसलिए बुरी है कि उसके अनेक बुरे परिणाम होते हैं तो यदि उससे दंड हटा दिया जाए और उसे पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे दी जाए, तब वह पूरी तरह अच्छी ठहरेगी। किन्तु वास्तव में अपराधों का सबसे बड़ा दंड उन्हीं अपराधों के भीतर निहित होता है। यदि तुम यह समझते हो कि उनका दंड जेल या जल्लाद के हाथों बाद में मिलता है तो तुम भ्रम में हो। ऐसे कर्मों का दंड तो उसी क्षण आरम्भ हो जाता है जब वे किए जाते हैं बल्कि वे अपने किए जाने की प्रक्रिया में ही मनुष्य को दंडित करने लगते हैं। इसलिए शुभ वस्तु अशुभ से उसी प्रकार उत्पन्न नहीं हो सकती, जैसे जैतून के वृक्ष से अंजीर नहीं उग सकता। पौधा अपने बीज के अनुरूप ही होता है। शुभ वस्तुएँ भी अपने स्वभाव के अनुरूप ही उत्पन्न होती हैं। जिस प्रकार सम्माननीय वस्तु लज्जाजनक वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती, उसी प्रकार शुभ भी अशुभ से उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि जो वास्तव में शुभ है और जो वास्तव में सम्माननीय है, दोनों एक ही हैं। 

    हमारे विद्यालय के कुछ दार्शनिक इस आपत्ति का उत्तर इस प्रकार देते हैं। “मान लो कि धन, चाहे वह किसी भी प्रकार से प्राप्त किया गया हो, अपने-आप में एक शुभ वस्तु है। तब भी, यदि कभी धन मंदिर-लूट से प्राप्त होता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह धन वास्तव में मंदिर-लूट के कारण ही प्राप्त हुआ है। इसे इस प्रकार समझो। मान लो कि एक घड़े में एक सोने का सिक्का और एक साँप दोनों रखे हैं। यदि तुम उस घड़े से सोने का सिक्का निकालते हो तो तुमने उसे साँप के कारण नहीं निकाला। अर्थात घड़ा मुझे सोना इसलिए नहीं देता कि उसमें साँप भी है बल्कि वह मुझे सोना इस तथ्य के बावजूद देता है कि उसमें साँप भी मौजूद है। उसी प्रकार, मंदिर-लूट से लाभ इसलिए नहीं मिलता कि वह एक घृणित और अपराधपूर्ण कर्म है बल्कि इसलिए कि उस कर्म के साथ लाभ भी जुड़ा हुआ है। जैसे घड़े में बुरी वस्तु साँप है, उसके साथ रखा हुआ सोना नहीं, उसी प्रकार मंदिर-लूट में बुरी वस्तु अपराध है, उससे प्राप्त होने वाला लाभ नहीं।”

    किन्तु मैं इस मत से सहमत नहीं हूँ। ये दोनों उदाहरण समान नहीं हैं। पहले उदाहरण में मैं साँप के बिना भी सोना निकाल सकता हूँ। पर दूसरे उदाहरण में मैं मंदिर-लूट किए बिना लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। वहाँ लाभ अपराध के पास मात्र नहीं रखा है बल्कि उसी के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। 

    यदि किसी वस्तु की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है तो वह वस्तु शुभ नहीं है। धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है। 

    कोई इस पर आपत्ति कर सकता है। “तुम्हारी पहली मान्यता के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला यह कि धन की प्राप्ति का प्रयास अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न करता है। किन्तु सद्गुण की प्राप्ति का प्रयास भी अनेक बुरे परिणाम ला सकता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अध्ययन के उद्देश्य से समुद्री यात्रा करता है और उसका जहाज़ डूब जाता है या कोई दूसरा व्यक्ति यात्रा के दौरान बंदी बना लिया जाता है। दूसरा अर्थ यह है कि जिस वस्तु के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं, वह शुभ नहीं है। यदि यह अर्थ लिया जाए तो या तो यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि धन या सुख के कारण हमें बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं अथवा यदि यह मान लिया जाए कि धन के कारण वास्तव में अनेक बुरे परिणाम उत्पन्न होते हैं तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि वह स्वयं एक अशुभ वस्तु होगा। किन्तु तुम्हारा विद्यालय तो केवल इतना कहता है कि धन शुभ नहीं है। इसके अतिरिक्त, तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि धन का उपयोग है। तुम उसे जीवन की उपयोगी वस्तुओं में गिनते हो। लेकिन इसी तर्क के अनुसार वह उपयोगी भी नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि उसी के कारण हमें अनेक हानियाँ भी उठानी पड़ती हैं।” 

    कुछ लोग इसका उत्तर इस प्रकार देते हैं। “तुम यह समझने में भूल कर रहे हो कि धन अपने-आप में हानिकारक है। धन किसी को हानि नहीं पहुँचाता। हानि पहुँचाती है मनुष्य की अपनी मूर्खता या किसी दूसरे की दुष्टता। जैसे तलवार स्वयं किसी को नहीं मारती, वह तो केवल हत्यारे का उपकरण होती है। उसी प्रकार केवल इसलिए कि तुम्हें धन के कारण हानि पहुँची है, यह नहीं कहा जा सकता कि धन ने तुम्हें हानि पहुँचाई।” किन्तु मेरे विचार में पॉसिडोनियस का उत्तर इससे भी अधिक उचित है। वह कहते हैं कि धन बुराइयों का कारण इस अर्थ में नहीं है कि वह स्वयं कोई बुरा कार्य करता है बल्कि इसलिए कि वह उन लोगों को प्रेरित करता है जो बुरे कर्म करने को तत्पर होते हैं। क्योंकि प्रत्यक्ष (या कार्यकारी) कारण और पूर्ववर्ती कारण में अंतर होता है। प्रत्यक्ष कारण वह है जो अनिवार्य रूप से किसी वस्तु को सीधे प्रभावित करता है। जबकि धन दूसरे प्रकार का कारण है। वह मन में वासनाओं को भड़काता है, अहंकार को जन्म देता है, दूसरों की ईर्ष्या और द्वेष को आकर्षित करता है और मनुष्य के मन को स्वयं अपने ही विरुद्ध इस सीमा तक खड़ा कर देता है कि वह केवल धनी कहलाने की प्रतिष्ठा से ही प्रसन्न होने लगता है। जबकि वही प्रतिष्ठा अंततः उसके लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। वास्तविक शुभ वस्तुएँ दोषरहित होनी चाहिए। शुभ वस्तुएँ निर्मल होती हैं। वे मन को भ्रष्ट नहीं करतीं, न ही उसे चिंता से भरती हैं। वे मन को ऊँचा उठाती हैं और उसका विस्तार करती हैं। परन्तु उसमें अहंकार उत्पन्न नहीं करतीं। शुभ वस्तुएँ आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं। जबकि धन प्रायः दुस्साहस को जन्म देता है। शुभ वस्तुएँ मन में महानता उत्पन्न करती हैं, जबकि धन आडंबर को जन्म देता है और आडंबर महानता का केवल एक झूठा प्रदर्शन है। 

    “यदि तुम इसी प्रकार तर्क करोगे,” मेरा प्रतिपक्षी कहता है, “तो धन केवल शुभ नहीं होगा बल्कि अशुभ भी होगा।” धन तभी अशुभ होता यदि वह अपने-आप में हमें हानि पहुँचाता अर्थात यदि, जैसा मैंने पहले कहा, वह प्रत्यक्ष (कार्यकारी) कारण होता। किन्तु वास्तव में वह केवल पूर्ववर्ती कारण है। फिर भी धन ऐसा कारण अवश्य है जो केवल हमारे मन को उत्तेजित ही नहीं करता बल्कि उसे अपनी ओर आकर्षित भी करता है। क्योंकि वह शुभ का ऐसा आभास उत्पन्न करता है जो देखने में इतना विश्वसनीय लगता है कि अधिकांश लोग उससे भ्रमित हो जाते हैं। इसी प्रकार सद्गुण भी कभी-कभी लोगों की ईर्ष्या और द्वेष का पूर्ववर्ती कारण बन जाता है। बहुत-से लोग अपनी बुद्धिमत्ता के कारण दूसरों की ईर्ष्या का पात्र बनते हैं और बहुत-से अपनी न्यायप्रियता के कारण। परन्तु यह कारण सद्गुण के स्वभाव में निहित नहीं है और न ही यह कोई स्वाभाविक या विश्वसनीय परिणाम है। इसके विपरीत, सद्गुण मनुष्यों के मन पर ऐसा प्रभाव डालता है जो उन्हें उसकी ओर आकर्षित करता है तथा उसके प्रति प्रेम और आदर उत्पन्न करता है। 

    पॉसिडोनियस का कहना है कि इस विषय में इस प्रकार तर्क करना चाहिए—

जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास और न ही चिंता से मुक्ति देती हैं, वे शुभ नहीं हैं।किन्तु धन, स्वास्थ्य और इसी प्रकार की अन्य वस्तुएँ इनमें से कोई भी गुण प्रदान नहीं करतीं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं।

    वे इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—

जो वस्तुएँ मन को न महानता प्रदान करती हैं, न आत्मविश्वास, न ही चिंता से मुक्ति देती हैं बल्कि इसके विपरीत उसे अपव्यय, घमंड और अहंकार की ओर ले जाती हैं, वे अशुभ हैं। भाग्य पर निर्भर रहने वाली वस्तुएँ मनुष्य को इन्हीं दोषों की ओर प्रेरित करती हैं। अतः वे वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं हैं। 

    कोई इस पर कह सकता है, “यदि यह तर्क सही है तो इन्हें उपयोगी वस्तुएँ भी नहीं कहा जा सकता।” किन्तु उपयोगी वस्तुओं (लाभदायक वस्तुओं) का स्थान शुभ वस्तुओं से बिल्कुल भिन्न है। उपयोगी वस्तु वह है जिसमें हानि की अपेक्षा लाभ अधिक हो। जबकि शुभ वस्तु का पूर्णतः शुभ होना आवश्यक है और उसमें किसी भी प्रकार की हानि का लेशमात्र भी नहीं होना चाहिए। शुभ वह नहीं है जो अधिकांशतः लाभदायक हो बल्कि वह है जो पूरी तरह और हर दृष्टि से लाभदायक हो। इसके अतिरिक्त, उपयोगी वस्तु का लाभ पशुओं को भी हो सकता है, अपरिपक्व लोगों को भी और मूर्खों को भी। इसलिए उसमें कुछ हानि भी मिली हो सकती है, फिर भी उसे उपयोगी कहा जाता है क्योंकि उसका मूल्यांकन उसके प्रमुख गुण अर्थात उसमें निहित अधिक लाभ के आधार पर किया जाता है। किन्तु शुभ वस्तु केवल बुद्धिमान व्यक्ति की ही संपत्ति होती है, और वह अनिवार्य रूप से हर प्रकार की मिलावट या दोष से रहित होती है। 

    साहस बनाए रखो। अब केवल एक पहेली शेष रह गई है। परन्तु वह हरक्यूलिस के पराक्रम जैसी कठिन पहेली है—

जो वस्तु वास्तव में शुभ है, वह अशुभ वस्तुओं से मिलकर नहीं बन सकती। किन्तु अनेक व्यक्तियों की निर्धनता मिलकर एक व्यक्ति की धन-संपत्ति का निर्माण करती है। अतः धन वास्तविक अर्थ में शुभ नहीं है। 

    इस न्याय-वाक्य (सिलोजिज़्म) को हमारा स्टोइक विद्यालय स्वीकार नहीं करता। यह पेरिपैटेटिक दार्शनिकों द्वारा गढ़ा गया है और उसी परंपरा के दार्शनिक इसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। किन्तु पॉसिडोनियस कहते हैं कि इस कुतर्क का जिसे विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के तर्कशास्त्रियों ने बार-बार दोहराया है, एंटीपेटर ने इस प्रकार खंडन किया है—

“‘निर्धनता’ शब्द का अर्थ किसी वस्तु का होना नहीं बल्कि उसका अभाव होना है (या जैसा प्राचीन दार्शनिक कहते थे, ‘वंचना’ या ‘अभाव’)। यूनानी भाषा में इसे काता स्तेरेसिन (kata sterēsin) कहा जाता है। यह शब्द इस बात का द्योतक नहीं है कि किसी के पास क्या है बल्कि इस बात का कि उसके पास क्या नहीं है। इसलिए अनेक अभावों को जोड़कर कोई वास्तविक वस्तु नहीं बनाई जा सकती। धन अनेक संसाधनों से बनता है, न कि अनेक निर्धनताओं से। तुम निर्धनता का सही अर्थ नहीं समझते। निर्धनता का अर्थ केवल थोड़ी-सी वस्तुओं का होना नहीं है बल्कि बहुत-सी वस्तुओं का न होना है। इसलिए इसका अर्थ उस आधार पर निर्धारित होता है जिसकी कमी है, न कि उस आधार पर जो किसी के पास है।” यदि लैटिन भाषा में यूनानी शब्द अनुपारक्सिया (anuparxia) के अर्थ वाला कोई उपयुक्त शब्द होता तो मैं यह बात और भी सरलता से समझा सकता। एंटीपेटर इसी शब्द का प्रयोग निर्धनता के लिए करते हैं। किन्तु मेरे विचार में निर्धनता का अर्थ इससे अधिक कुछ नहीं है कि किसी व्यक्ति के पास बहुत कम संपत्ति या साधन हों।

    आओ, निर्धनता और धन के वास्तविक स्वरूप की इस जाँच को किसी और अवसर के लिए स्थगित रखें, जब हमारे पास पर्याप्त समय हो। जब वह समय आए, तब हम स्वयं से यह पूछें कि क्या शब्दों के अर्थ पर व्यर्थ विवाद करने की अपेक्षा निर्धनता की कठोरता को कम करना और धन के अहंकार को नियंत्रित करना अधिक उचित नहीं होगा, मानो हमने पहले ही इस विषय के सभी तथ्य निश्चित कर लिए हों। कल्पना करो कि हमें किसी सार्वजनिक सभा में बुलाया गया है, जहाँ यह निर्णय होना है कि धन-संपत्ति को समाप्त करने का कोई कानून पारित किया जाए या नहीं। क्या ये तर्क-वाक्य (सिलोजिज़्म) उस बहस में हमारी विजय दिला देंगे? क्या वे रोमन जनता को निर्धनता की प्रशंसा करने और उसकी आकांक्षा रखने के लिए प्रेरित करेंगे। उस निर्धनता की, जो उनके साम्राज्य की नींव और कारण रही है? क्या वे उन्हें उनकी वर्तमान संपन्नता से भयभीत कर देंगे? क्या ऐसे तर्क उन्हें यह समझा पाएँगे कि उनका धन पराजित राष्ट्रों से प्राप्त हुआ है और यही धन आज उस नगर में जो कभी अत्यंत पवित्र और संयमशील था, महत्त्वाकांक्षा, रिश्वतखोरी और अशांति का कारण बन गया है? कि विजय में प्राप्त लूट का प्रदर्शन अत्यधिक आडंबरपूर्ण हो गया है? कि यद्यपि एक राष्ट्र अनेक राष्ट्रों को लूट सकता है, फिर भी अनेक राष्ट्रों के लिए उस एक राष्ट्र को लूट लेना कहीं अधिक सरल होता है? यही वे बातें हैं जिन्हें हमें लोगों के सामने प्रभावपूर्वक रखना चाहिए। उनकी लोभ-वृत्ति को शब्दों के खेल से चकमा देने के बजाय, हमें उसका सीधे सामना करना चाहिए। यदि संभव हो, तो हमें निर्भीक होकर बोलना चाहिए। यदि वह भी संभव न हो, तो कम-से-कम स्पष्ट और सरल भाषा में अवश्य बोलना चाहिए।


अभी के लिए विराम 

Friday, 24 July 2026

सामान्य जनजीवन के बारे में -- पत्र - 84

 प्रिय लूसीलियस 


मैं आपको यह पत्र स्किपियो अफ़्रीकानस के विला के भीतर बने एक साधारण निवास से लिख रहा हूँ। यहाँ आकर मैंने उस महान पुरुष की आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की है। उस वेदी के समक्ष भी नमन किया है, जो मुझे प्रतीत होती है कि उसी का समाधि-स्थल भी है। निश्चय ही उसकी आत्मा उसी स्वर्ग में लौट गई है जहाँ से वह आई थी। मैं ऐसा केवल इसलिए नहीं मानता कि उसने महान सेनाओं का नेतृत्व किया था क्योंकि कैम्बाइसीज़ के पास भी विशाल सेनाएँ थीं। वह तो पागल था तथा अपनी उसी पागलपन का लाभ उठाता था बल्कि इसलिए कि उसमें असाधारण आत्मसंयम और अद्वितीय देशभक्ति थी। मेरे विचार में उसका यह गुण अपने देश की रक्षा करते समय जितना प्रशंसनीय था, उससे भी अधिक तब था जब उसने स्वयं अपने देश को छोड़ दिया। 


By Sergey Levin

    या तो स्किपियो रोम में रह सकता था या फिर रोम स्वतंत्र रह सकता था। दोनों साथ संभव नहीं थे। उसने कहा, “मैं ऐसा कुछ नहीं चाहता जो हमारे कानूनों और परंपराओं को क्षति पहुँचाए। मेरे सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान रहें। हे मेरे देश, मैंने जो सेवा तुम्हारे लिए की है उसका उपयोग करो पर मेरी अनुपस्थिति में। तुम्हारी स्वतंत्रता का कारण मैं हूँ और उसका प्रमाण भी मैं ही बनूँगा। यदि मैं तुम्हारे हित से बड़ा हो गया हूँ तो मैं स्वयं ही यहाँ से चला जाऊँगा।” मैं उसके उस महान आत्मबल की प्रशंसा कैसे न करूँ, जिसके कारण उसने स्वेच्छा से निर्वासन स्वीकार किया और इस प्रकार राज्य का भार हल्का कर दिया? परिस्थितियाँ ऐसी हो गई थीं कि या तो स्वतंत्रता को स्किपियो के साथ अन्याय करना पड़ता या स्किपियो को स्वतंत्रता के साथ। दोनों में से कोई भी उचित नहीं था। इसलिए उसने कानून के आगे सिर झुका दिया और लिटर्नुम चला गया, जिससे राज्य उस पर केवल हैनिबल को निर्वासित करने के लिए ही नहीं बल्कि उसके अपने स्वैच्छिक निर्वासन के लिए भी ऋणी हो गया। 

    मैंने उस विला को देखा, जो तराशे हुए पत्थरों से बना हुआ था। उसके चारों ओर उपवन को घेरती हुई दीवार थी, और प्रवेश-द्वार की दोनों ओर उसकी रक्षा के लिए ऊँचे बुर्ज बने हुए थे। भवनों और हरित प्रांगण के नीचे एक विशाल जलाशय था, जो आवश्यकता पड़ने पर पूरी सेना के लिए भी पर्याप्त हो सकता था। वहाँ का स्नानागार अत्यंत छोटा और संकुचित था। उसमें बहुत कम प्रकाश पहुँचता था क्योंकि पुराने समय के लोगों का विश्वास था कि स्नानागार तब तक पर्याप्त गर्म नहीं हो सकता जब तक वह अँधेरा न हो। यह सब देखकर मुझे स्किपियो की जीवन-शैली और अपनी वर्तमान जीवन-शैली की तुलना करने में बड़ा आनंद आया। इसी छोटे-से कोने में कार्थेज का वह विख्यात आतंक, वह पुरुष जिसने रोम को दूसरी बार शत्रुओं के हाथों में जाने से बचाया था, खेतों में कठोर परिश्रम करके थके हुए अपने शरीर को धोया करता था। वह व्यायाम के रूप में स्वयं खेत जोतता था, जैसा कि प्राचीन काल के लोग किया करते थे। इसी साधारण और जर्जर छत के नीचे वह रहता था, और उसके पैरों के नीचे यही सस्ती टाइलों का फर्श बिछा हुआ था। 

    लेकिन आज के समय में कौन ऐसे स्नानागार में स्नान करना स्वीकार करेगा? आज तो कोई व्यक्ति स्वयं को अत्यंत निर्धन और तुच्छ समझने लगता है यदि उसकी दीवारें बड़े-बड़े और अत्यंत महँगे दर्पणों से न चमकती हों; यदि उसके अलेक्ज़ान्द्रिया के संगमरमर पर नुमीडिया के संगमरमर की विपरीत रंगों वाली जड़ाई न की गई हो और उसके चारों ओर चित्रकला जैसी बहुरंगी मोज़ेक की सजावट न हो। यदि स्नान-कक्ष की छत काँच की न बनी हो। यदि थासोस का डोलोमाइट, जो कभी मंदिरों में भी विरले ही दिखाई देता था, उन जलकुंडों के किनारों पर न लगा हो, जिनमें हम अत्यधिक पसीना बहाने के बाद अपने अंगों को डुबोते हैं और यदि जल चाँदी की टोंटियों से न बहता हो। यह तो केवल सामान्य लोगों के स्नानागारों का वर्णन है! मुक्त दासों (फ़्रीडमैन) के स्नानागारों के बारे में क्या कहा जाए? वहाँ कितनी मूर्तियाँ हैं, कितने ऐसे स्तंभ हैं जो किसी छत का भार नहीं उठाते बल्कि केवल सजावट और वैभव के प्रदर्शन के लिए खड़े किए गए हैं! कितने फव्वारे हैं, जिनका जल एक स्तर से दूसरे स्तर तक कल-कल करता हुआ बहता रहता है! हम विलासिता की ऐसी पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं कि अब हमें तब तक चलना भी अच्छा नहीं लगता, जब तक हमारे पैर बहुमूल्य पत्थरों पर न पड़ें। 

    स्किपियो के स्नानागार में खिड़कियाँ बहुत छोटी थीं। पत्थर की दीवारों में बनी हुई संकरी दरारों जैसी। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि भीतर प्रकाश आ सके, पर भवन की सुरक्षा में कोई कमी न आए। लेकिन आज यदि किसी स्नानागार में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ न हों, जिनसे दिन के हर समय सूर्य का प्रकाश भीतर आता रहे, यदि वहाँ स्नान करते-करते धूप सेंकने की सुविधा न हो और यदि स्नान-कुंड में बैठे-बैठे ग्रामीण दृश्य तथा समुद्र का नज़ारा न दिखाई दे तो लोग ऐसे स्नानागार को तिरस्कारपूर्वक 'चूहे का बिल' कहने लगते हैं। यही कारण है कि जिन स्नानागारों के उद्घाटन के समय लोगों की भीड़ उन्हें देखकर मुग्ध हो जाती थी, वे भी जैसे ही विलासिता अपने प्रदर्शन का कोई नया साधन खोज लेती है, तुरंत पुराने और उपेक्षणीय समझे जाने लगते हैं। प्राचीन समय में स्नानागार बहुत कम होते थे और उनमें किसी प्रकार की सजावट नहीं होती थी। जब प्रवेश-शुल्क केवल एक चौथाई सिक्के (फ़ार्थिंग) के बराबर हो और उद्देश्य केवल उपयोगिता हो, मनोरंजन नहीं, तब भवन को सजाने की आवश्यकता ही क्या थी? वहाँ पानी के भीतर फूटने वाले फव्वारे नहीं थे, न ही गर्म जलस्रोत की तरह निरंतर ताज़ा पानी आता रहता था। किसी को इस बात की चिंता भी नहीं होती थी कि शरीर की धूल-मिट्टी धोने वाला पानी बिल्कुल क्रिस्टल की तरह स्वच्छ है या नहीं। 

    फिर भी, सच तो यह है कि उन अँधेरे, साधारण पलस्तर वाले स्नानागारों में प्रवेश करना कितना सुखद लगता है, जब यह ज्ञात हो कि वहाँ के जल का तापमान स्वयं अपने हाथ से जाँचकर उसे आपके लिए उपयुक्त बनाने वाला अधिकारी कैटो, फैबियस मैक्सिमस या कॉर्नेलियस कुल का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति था। उस समय श्रेष्ठ कुलों के एडाइल (नगर अधिकारी) सार्वजनिक स्नानागारों में स्वयं जाकर यह सुनिश्चित करते थे कि वहाँ स्वच्छता बनी रहे और पानी का तापमान स्वास्थ्यकर तथा उपयोगी हो, वैसा नहीं जैसा आज होता है, जो किसी भट्ठी की तपिश जैसा प्रतीत होता है। आज तो पानी इतना गर्म होता है कि यदि किसी अपराधी दास को दंड देना हो, तो उसे जीवित ही उसमें स्नान कराने की सज़ा दी जा सकती है! मेरी दृष्टि में आज के अत्यधिक गर्म स्नानागार और किसी जलते हुए भवन में प्रवेश करने में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है। 

    "आज के लोग शायद कहें, 'स्किपियो कितना असभ्य था! उसके भाप-स्नान कक्ष में प्रकाश आने के लिए अभ्रक (माइका) की चौड़ी खिड़कियाँ तक नहीं थीं। वह स्नान-कुंड में उतरने से पहले धूप में बैठकर शरीर को ताम्रवर्ण भी नहीं करता था। कितना अभागा व्यक्ति था! उसे जीना ही नहीं आता था! उसके स्नान का पानी छाना हुआ नहीं होता था। वह प्रायः मटमैला रहता था और यदि अधिक वर्षा हो जाती तो लगभग कीचड़ जैसा दिखाई देता था।'" किन्तु स्किपियो को इस प्रकार के स्नान से कोई आपत्ति नहीं थी। वह वहाँ सुगंधित तेलों को धोने नहीं बल्कि अपने शरीर का पसीना और श्रम की मैल धोने के लिए जाता था। 

    तुम्हें क्या लगता है, आज के कुछ लोग इस पर क्या कहेंगे? “मुझे तो स्किपियो से तनिक भी ईर्ष्या नहीं होती। यदि उसे ऐसे स्नानागार में स्नान करना पड़ता था तो वास्तव में वह निर्वासन में ही जी रहा था!” वास्तविकता तो यह है कि उसे प्रतिदिन ऐसा स्नान भी नहीं मिलता था। प्राचीन रोम के जीवन के विवरण बताते हैं कि लोग रोज़ केवल अपने हाथ और पैर धोते थे। वे अंग जो स्वाभाविक रूप से काम करते समय मैले हो जाते थे। पूरे शरीर का स्नान वे केवल बाज़ार के दिन (साप्ताहिक अवकाश या विश्राम के दिन) करते थे। इस पर कोई कहेगा, “तो फिर वे लोग अवश्य ही बहुत गंदे रहते होंगे! सोचो, उनके शरीर से कैसी दुर्गंध आती होगी?” उत्तर है, उनसे सैनिक जीवन की गंध आती थी। परिश्रम की गंध आती थी और मनुष्यता की गंध आती थी। अब जबकि अत्यधिक विलासपूर्ण स्नानागारों का आविष्कार हो चुका है, लोग पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मैले हो गए हैं।

    जब होरेस ने एक कुख्यात विलासी और आडंबरप्रिय व्यक्ति का चित्रण किया तो उसने कहा, “बुकिलस से मीठी गोलियों (लॉज़ेंज) जैसी सुगंध आती है।” आज के समय में यदि होरेस ऐसा कहता तो बुकिलुस को तो साधारण व्यक्ति माना जाता। उसकी जगह वह गार्गोनियस का उदाहरण देता, जिसकी तुलना होरेस ने बुकिलस से की थी। अब केवल इत्र लगाना ही पर्याप्त नहीं समझा जाता। अपेक्षा यह की जाती है कि दिन में दो-तीन बार उसे फिर से लगाया जाए ताकि उसकी सुगंध त्वचा से उड़ न जाए। आश्चर्य की बात यह है कि लोग उस कृत्रिम सुगंध पर ऐसे गर्व करते हैं, मानो वह उनके अपने शरीर की स्वाभाविक गंध हो। 

    यदि मेरी यह सारी बातें कुछ अधिक कठोर प्रतीत हों तो इसका दोष इस विला को देना। यहीं मुझे एजियालस से, जो अब इस खेत का स्वामी है और अत्यंत परिश्रमी गृह-प्रबंधक है। यह शिक्षा मिली कि सबसे पुराने वृक्ष को भी एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। यह ऐसी बात है जिसे हमें अपनी वृद्धावस्था में विशेष रूप से सीखना चाहिए। क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए ही तो जैतून के वृक्ष लगाता है। इतना ही नहीं, मैंने स्वयं ऐसा जैतून का उपवन देखा है जिसने तीसरे या चौथे वर्ष में ही पर्याप्त और संतोषजनक मात्रा में फल देना शुरू कर दिया था। तुम भी उस वृक्ष की छाया का आनंद लोगे,

“जो बाद में उगकर तुम्हारे वंशजों को छाया प्रदान करेगा,”

जैसा कि हमारे कवि वर्जिल कहते हैं। यद्यपि वर्जिल का उद्देश्य कृषि का यथार्थ वर्णन करना नहीं बल्कि मनोहारी काव्य रचना करना था। उनका अभिप्राय किसानों को शिक्षा देना नहीं बल्कि अपने पाठकों को आनंदित करना था। इसका केवल एक उदाहरण दूँ। आज मेरी दृष्टि इस पंक्ति पर गई:

“बसंत ऋतु में सेम (फलियाँ) बोई जाती हैं 

उसी समय तुम भुरभुरी मिट्टी की क्यारियों में समृद्ध अल्फ़ाल्फ़ा (लूसर्न) भी बोते हो

और वर्ष के उसी मौसम में बाजरे की भी देखभाल की जाती है।”

क्या इन दोनों फ़सलों को एक ही समय और वह भी वसंत ऋतु में बोया जाना चाहिए? इसका निर्णय तुम स्वयं करो। मैं तुम्हें यह पत्र जून के महीने में लिख रहा हूँ, जब जुलाई आने ही वाली है और मैंने अभी-अभी अपनी आँखों से देखा है कि एक ही दिन लोग सेम (फलियों) की कटाई भी कर रहे थे और बाजरे की बुवाई भी कर रहे थे। 

    अब मैं फिर उस जैतून के उपवन की बात पर लौटता हूँ। मैंने देखा कि एजियालस उसे दो प्रकार से तैयार करता है। बड़े वृक्षों के मामले में वह उनकी शाखाओं को काटकर लगभग एक फुट तक छोड़ देता है और फिर मुख्य जड़ (टैप्रूट) सहित पूरे तने को उखाड़कर दूसरी जगह लगा देता है। वह पार्श्व जड़ों को छाँट देता है और केवल बीच का वह भाग छोड़ता है जिससे सभी जड़ें जुड़ी होती हैं। इसके बाद वह उस भाग पर गोबर की खाद का लेप करता है, उसे गड्ढे में रखता है और फिर केवल मिट्टी भरकर नहीं छोड़ देता बल्कि उसे पैरों से अच्छी तरह दबाकर सघन कर देता है। उसका कहना है कि इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। वह इसे 'मिट्टी का सघनीकरण' कहता है। उसके अनुसार इससे ठंड और तेज़ हवा का प्रभाव कम पड़ता है। साथ ही, वृक्ष अपनी जगह पर हिलता-डुलता नहीं है और इसी कारण नई जड़ों को निकलने तथा मिट्टी को मजबूती से पकड़ने का अवसर मिल जाता है। जब तक वे नई जड़ें पतली और पूरी तरह स्थापित नहीं हो जातीं, तब तक हल्का-सा हिलना भी उन्हें उखाड़ सकता है। वह पुनः रोपने से पहले मुख्य जड़ को थोड़ा खुरच भी देता है क्योंकि उसका विश्वास है कि जहाँ-जहाँ लकड़ी खुल जाती है, वहीं से नई जड़ें निकल आती हैं। तने का केवल तीन या चार फुट भाग ही भूमि के ऊपर रहना चाहिए। इससे वृक्ष ज़मीन के निकट से ही नई शाखाएँ और पत्तियाँ निकालता है। पुराने वृक्षों की तरह उसका ऊपरी बड़ा भाग सूखा और निर्जीव नहीं रह जाता। रोपने की दूसरी विधि यह है कि वह ऐसी मज़बूत शाखाएँ लेता है जिनकी छाल अभी कोमल होती है, जैसी कि अपेक्षाकृत युवा वृक्षों में मिलती है। फिर उन्हें भी उसी प्रकार भूमि में रोप देता है। इस विधि से वृक्ष कुछ धीमी गति से बढ़ते हैं, परंतु क्योंकि वे मानो कलम (स्कायन) से विकसित हुए हों। इसलिए उनमें पुराने वृक्षों जैसी टेढ़ी-मेढ़ी, गाँठदार या भद्दी बनावट नहीं होती।

    मैंने एक और बात भी देखी है। एक ऐसी अंगूर की बेल, जिसे काफी पुरानी हो जाने पर उसके सहारे वाले एल्म वृक्ष से अलग करके दूसरी जगह प्रतिरोपित किया गया था। ऐसी स्थिति में, यदि संभव हो तो उसकी बारीक से बारीक जड़ों को भी सुरक्षित रखना चाहिए। साथ ही, बेल के तने का पर्याप्त बड़ा भाग मिट्टी में दबा देना चाहिए ताकि उसी तने से नई जड़ें फूट सकें। मैंने ऐसी बेलें देखी हैं जिन्हें केवल फ़रवरी में ही नहीं बल्कि मार्च के अंतिम दिनों में भी लगाया गया था और अब वे उन एल्म वृक्षों को मजबूती से पकड़कर उनसे लिपट चुकी हैं, जो पहले उनके सहारे नहीं थे। एजियालस यह भी जोड़ता है कि जिन वृक्षों का तना मोटा और बड़ा हो। यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ, उन्हें भूमिगत जलाशय (सिस्टर्न) के पानी से सींचना चाहिए। यदि इससे वास्तव में उन्हें लाभ पहुँचता है तो फिर हम वर्षा पर निर्भर नहीं रहते। 

    मैं तुम्हें इससे अधिक कुछ सिखाना नहीं चाहता क्योंकि मुझे भय है कि कहीं मैं तुम्हें अपना प्रतिद्वंद्वी न बना दूँ। ठीक वैसे ही जैसे एजियालस ने मुझे बना दिया।


अभी के लिए विदा 

भावनात्मक आवेग के बारे में -- पत्र - 83

 प्रिय लूसीलियस 


मैंने सोचा था कि शेष जटिल तर्कों को छोड़कर तुम्हें कुछ राहत दूँ। मेरा विचार था कि केवल इतना ही बता दूँ कि हमारा दर्शन किस प्रकार यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (Virtue) अपने आप में ही मनुष्य के जीवन को पूर्णतः सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन तुम चाहते हो कि मैं सब कुछ लिखूँ। हमारे अपने तर्क भी और वे तर्क भी, जिन्हें विशेष रूप से हमारा उपहास उड़ाने के लिए गढ़ा गया है। यदि मैं ऐसा करने बैठूँ तो यह पत्र नहीं रहेगा। यह एक पुस्तक बन जाएगा! 



    मैं तुम्हें बार-बार विश्वास दिलाता हूँ कि इस प्रकार के तर्कों में मुझे कोई आनंद नहीं मिलता। मुझे तो लज्जा आती है कि देवताओं और मनुष्यों जैसे महान विषयों के लिए हमें केवल एक सुई की नोक जितने सूक्ष्म और तुच्छ तर्कों से युद्ध करना पड़े। 

जो व्यक्ति बुद्धिमान है, वह आत्मसंयमी भी होता है। 

जो आत्मसंयमी है, वह स्थिरचित्त भी होता है।

जो स्थिरचित्त है, वह व्याकुल नहीं होता।

जो व्याकुल नहीं होता, वह शोक से मुक्त रहता है।

जो शोक से मुक्त है, वही सुखी है।

अतः बुद्धिमान व्यक्ति सुखी होता है और बुद्धिमत्ता ही सुख प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।

    इस न्याय-तर्क (सिलोजिज़्म) का उत्तर देते हुए कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति को 'अविचल', 'स्थिरचित्त' या 'शोकरहित' कहा जाता है तो उसका अर्थ यह नहीं होता कि वह कभी भी विचलित या दुःखी नहीं होता। उनका अभिप्राय केवल इतना होता है कि वह बहुत कम और सीमित मात्रा में ही विचलित होता है। इसी प्रकार, वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति को 'शोकरहित' तब कहा जाता है जब वह स्वभाव से शोकग्रस्त रहने वाला न हो और उसमें यह दोष न तो बार-बार प्रकट होता हो और न ही अत्यधिक मात्रा में। वे आगे कहते हैं कि मानव-स्वभाव ऐसा नहीं है कि किसी का मन पूरी तरह शोक से अछूता रह सके। उनके अनुसार, ज्ञानी व्यक्ति शोक से पराजित नहीं होता। परंतु वह उससे पूरी तरह अछूता भी नहीं रहता। शोक उसे स्पर्श अवश्य करता है। इसी प्रकार की अन्य बातें भी वे कहते हैं, जो उनके दर्शन के अनुरूप हैं। अर्थात वे मनोवेगों (भावनाओं) का पूर्ण उन्मूलन नहीं करते बल्कि उन्हें केवल सीमित और नियंत्रित करना चाहते हैं।

    यदि ज्ञानी पुरुष की प्रशंसा केवल इस आधार पर की जाए कि वह दुर्बलों से कुछ अधिक दृढ़ है, अत्यंत निराश लोगों से कुछ अधिक सुखी है, असंयमी लोगों से कुछ अधिक संयमी है और निकृष्टतम लोगों से कुछ अधिक श्रेष्ठ है तो हम उसके गुणों का कितना तुच्छ मूल्यांकन कर रहे होंगे! कल्पना करो कि प्रसिद्ध धावक लाडास इस बात पर गर्व करे कि वह कितना तेज़ दौड़ता है जबकि उसके पीछे केवल लँगड़े और अपंग लोग ही दौड़ रहे हों!

“वह बढ़ती हुई फसल की पत्तियों के सिरों को छूती हुई इस प्रकार निकल जाती कि कोमल तिनके भी न झुकें। 
वह उफनते समुद्र की लहरों के ऊपर से इस प्रकार दौड़ जाती कि उसके तीव्र चरण जल की एक बूँद से भी न भीगें।”

यह गति उस व्यक्ति की है जिसकी माप स्वयं उसकी अपनी उत्कृष्टता से की जाती है न कि इसलिए कि वह सबसे धीमे धावकों से तेज़ है। इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए स्वस्थ कह दिया जाए कि उसे हल्का-सा बुखार है तो क्या यह उचित होगा? रोग थोड़ा हो जाने से स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो जाता। हल्की बीमारी भी बीमारी ही है, स्वास्थ्य नहीं।

    “ज्ञानी पुरुष को ‘अविचल’ उसी अर्थ में कहा जाता है, जिस अर्थ में कुछ फलों को ‘बीजरहित’ कहा जाता है अर्थात उनमें कठोर बीज बहुत कम या लगभग दिखाई नहीं देते, यद्यपि वे पूरी तरह अनुपस्थित नहीं होते।” यह बात सही नहीं है। मेरे विचार में, एक सद्गुणी व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जाना चाहिए कि उसके दोष केवल कम हो गए हैं बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि उनमें कोई दोष है ही नहीं। दोष बिल्कुल नहीं होने चाहिए। चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों। क्योंकि यदि वे मौजूद हैं तो समय के साथ बढ़ेंगे और अंततः गंभीर समस्या बन जाएँगे। जैसे आँख का तीव्र और गंभीर संक्रमण अंततः अंधापन ला सकता है, वैसे ही हल्का संक्रमण भी कष्टदायक होता है। 

    यदि तुम ज्ञानी पुरुष में किसी भी प्रकार के मनोवेग (भावनात्मक आवेग) को स्वीकार कर लेते हो तो अंततः विवेक उनके सामने टिक नहीं पाएगा। वह प्रबल बाढ़ की धारा में बह जाने वाली वस्तु की तरह उनके प्रवाह में बह जाएगा। यह संकट इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि तुम उसमें केवल एक ही मनोवेग नहीं बल्कि सभी मनोवेगों को स्थान देते हो। अनेक मनोवेगों का समूह, चाहे वे प्रत्येक सीमित ही क्यों न हों, किसी एक अकेले मनोवेग से अधिक शक्तिशाली होता है, भले ही वह अकेला मनोवेग अपनी पूरी तीव्रता पर हो। मान लो कि ज्ञानी पुरुष में धन की इच्छा है पर केवल थोड़ी-सी। उसमें महत्त्वाकांक्षा है पर अत्यधिक नहीं। उसमें क्रोध है पर असीम नहीं। उसमें चंचलता है पर बहुत अधिक बेचैन करने वाली नहीं। उसमें कामवासना है पर उन्मत्त नहीं।फिर भी ऐसी स्थिति उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक कठिन होगी, जिसमें केवल एक ही दोष हो, चाहे वह दोष अत्यंत प्रबल ही क्यों न हो। क्योंकि जिस व्यक्ति में सभी दोष थोड़ी-थोड़ी मात्रा में उपस्थित हैं, उससे निपटना उस व्यक्ति से अधिक कठिन है, जिसमें केवल एक ही दोष पूर्ण रूप से विद्यमान हो।

    इसके अतिरिक्त, मनोवेग (भावनात्मक आवेग) की मात्रा से कोई अंतर नहीं पड़ता। वह चाहे कम हो या अधिक, उसका स्वभाव एक-सा ही रहता है। वह न तो आज्ञा मानना जानता है और न ही किसी उचित सलाह पर ध्यान देता है। जैसे कोई भी पशु, चाहे वह जंगली हो या पालतू और देखने में कितना ही शांत क्यों न लगे, तर्कपूर्ण समझाने से संचालित नहीं होता क्योंकि उसका स्वभाव समझाने-बुझाने के प्रति बहरा होता है। उसी प्रकार मनोवेग भी, चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों, हमारी बात नहीं मानते और न ही हमारी सुनते हैं। सिंह और बाघ अपनी हिंसक प्रकृति को कभी पूरी तरह नहीं छोड़ते। कभी-कभी वे शांत और वश में प्रतीत होते हैं लेकिन जब इसकी सबसे कम अपेक्षा होती है, तभी उनकी भीतर छिपी हुई उग्रता फिर से भड़क उठती है। इसी प्रकार, हमें कभी यह विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि हमारे दोष पूरी तरह वश में आ गए हैं। वे अवसर मिलते ही फिर से सिर उठा सकते हैं।


डेनी फॉक्स द्वारा 

    इसके अतिरिक्त, यदि विवेक (तर्कबुद्धि) का वास्तव में कोई उपयोग है तो मनोवेगों को प्रारम्भ ही नहीं होना चाहिए। यदि वे विवेक की स्वीकृति के बिना ही उत्पन्न हो जाते हैं तो वे उसके बिना ही आगे बढ़ते रहेंगे। इसलिए उन्हें आरम्भ होने से पहले ही रोक देना, उनके उत्पन्न हो जाने के बाद उनके वेग को नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है। इसी कारण 'संयमित मनोवेग' या 'भावनाओं में मध्यमता' की धारणा मिथ्या और निरर्थक है। उसका व्यवहार भी हमें उसी प्रकार करना चाहिए जैसे, कोई यह कहे कि मनुष्य को संयमित रूप से पागल होना चाहिए या संयमित रूप से बीमार होना चाहिए

    केवल सद्गुण (Virtue) ही वास्तविक आत्मसंयम का परिचय देता है। मन की दुर्बलताएँ संयम को स्वीकार नहीं करतीं। उन्हें नियंत्रित करने की अपेक्षा उनका पूर्ण उन्मूलन कर देना अधिक सरल है। निस्संदेह यह बात विवाद से परे है कि मनुष्य के मन में जड़ जमा चुके और गहरे पैठे हुए दोष जैसे, लोभ, क्रूरता और असंयम,संयम के अधीन नहीं किए जा सकते। इसलिए मनोवेग भी संयम के अधीन नहीं हो सकते क्योंकि यही मनोवेग आगे चलकर उन दोषों को जन्म देते हैं।

    इसके अतिरिक्त, यदि तुम शोक, भय, इच्छा और अन्य सभी दूषित मनोवेगों को थोड़ी-सी भी छूट दे देते हो तो वे फिर हमारे वश में नहीं रहेंगे। क्यों? क्योंकि उन्हें उत्पन्न करने वाले कारण हमारे भीतर नहीं बल्कि हमारे बाहर होते हैं। इसलिए वे बाहरी परिस्थितियों के अनुसार बढ़ते या घटते रहते हैं। यदि भय उत्पन्न करने वाली वस्तु अधिक भयानक हो जाए या और निकट आ जाए तो भय भी बढ़ जाएगा। इसी प्रकार, जितनी बड़ी वस्तु प्राप्त करने की आशा होगी, इच्छा भी उतनी ही प्रबल होती जाएगी। यदि यह हमारे अधिकार में ही नहीं है कि मनोवेग उत्पन्न हों या न हों तो फिर यह भी हमारे अधिकार में नहीं होगा कि वे कितने बड़े या छोटे हों। एक बार तुम उन्हें आरम्भ होने की अनुमति दे दो तो वे अपने कारणों के बढ़ने के साथ-साथ स्वयं भी बढ़ते जाएँगे और उनकी तीव्रता उतनी ही हो जाएगी जितनी परिस्थितियाँ उसे बना देंगी। इसके अतिरिक्त, सबसे छोटे मनोवेग भी कभी-कभी नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। जो वस्तु विनाशकारी होती है, वह कभी किसी सीमा का पालन नहीं करती। रोगों की शुरुआत भले ही बहुत मामूली हो परन्तु वे धीरे-धीरे फैलते जाते हैं। जब शरीर रोगग्रस्त हो जाता है, तब कभी-कभी रोग में हुई सबसे छोटी-सी वृद्धि भी उसे पूरी तरह पराजित कर देने के लिए पर्याप्त होती है। 

    लेकिन यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि यह तो माना जाए कि मनोवेगों की शुरुआत हमारे वश में नहीं होती और फिर यह विश्वास किया जाए कि उनके अंत को हम अपने वश में रख सकते हैं! जिस चीज़ को उत्पन्न होने से रोकने की शक्ति ही मेरे पास नहीं थी, उसे एक बार उत्पन्न हो जाने के बाद सीमित करने की शक्ति मेरे पास कैसे हो सकती है? क्या किसी वस्तु को भीतर प्रवेश करने ही न देना, उसे भीतर आने देने के बाद नियंत्रित करने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल नहीं है?

    कुछ लोग निम्नलिखित भेद करते हैं—

“बुद्धिमान और आत्मसंयमी व्यक्ति अपने मन के स्वभाव और चरित्र की दृष्टि से शांत रहता है परंतु घटनाओं के स्तर पर नहीं। अर्थात उसके मन का स्वभाव अविचल होता है। वह न शोक करता है और न भय का अनुभव करता है। फिर भी बाहरी परिस्थितियाँ उस पर प्रभाव डालती हैं और कभी-कभी उसके मन में हलचल उत्पन्न कर देती हैं।” उनका आशय यह है कि ज्ञानी व्यक्ति स्वभाव से क्रोधी नहीं होता फिर भी कभी-कभी क्रोधित हो जाता है। वह भयभीत रहने वाला नहीं होता फिर भी कभी-कभी भय का अनुभव करता है। अर्थात उसमें भयभीत होने का दोष तो नहीं होता लेकिन भय का मनोवेग अवश्य होता है। यदि हम यह मान लें तो बार-बार भय का अनुभव करते-करते वह अंततः भयभीत स्वभाव का दोष बन जाएगा। उसी प्रकार, यदि क्रोध को एक बार मन में प्रवेश करने दिया जाए तो वह धीरे-धीरे उस चरित्र की पूरी संरचना को नष्ट कर देगा, जो पहले क्रोध से मुक्त था। फिर मान लो कि ज्ञानी पुरुष बाहरी परिस्थितियों से ऊपर नहीं उठ पाता और उसके पास भी ऐसी कोई वस्तु है जिससे वह डरता है। तब जब देश, कानून और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उसे युद्ध और अग्नि का सामना करना पड़ेगा, तो वह अनिच्छा से आगे बढ़ेगा क्योंकि उसका मन भय से काँप उठेगा। किन्तु इस प्रकार का मानसिक विरोधाभास और असंगति किसी भी सच्चे ज्ञानी पुरुष में नहीं पाई जाती।

    एक और बात है, जिसका उल्लेख मैं आवश्यक समझता हूँ ताकि हम उन दो प्रमाणों को आपस में न मिला दें जिन्हें अलग-अलग ही रखना चाहिए। एक प्रकार का तर्क यह सिद्ध करता है कि केवल वही वस्तु शुभ है जो नैतिक रूप से सम्माननीय (honorable) है। दूसरा, इससे भिन्न तर्क यह सिद्ध करता है कि सद्गुण (virtue) ही मनुष्य को सुखी बनाने के लिए पर्याप्त है। सभी लोग यह स्वीकार करते हैं कि यदि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है, तो सद्गुण सुख के लिए पर्याप्त है। लेकिन वे इसका उल्टा निष्कर्ष स्वीकार नहीं करते अर्थात यदि केवल सद्गुण ही मनुष्य को सुखी बना देता है तो इससे यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ है। ज़ेनोक्रेटीस और स्प्यूसिपस का मत है कि यद्यपि केवल सद्गुण के द्वारा मनुष्य सुखी हो सकता है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि केवल नैतिक रूप से सम्माननीय ही शुभ हो।एपिक्यूरस का भी यही विश्वास है कि सद्गुण से युक्त व्यक्ति सुखी होता है। किंतु उसका मत यह है कि सद्गुण अपने आप में सुख के लिए पर्याप्त नहीं है। उसके अनुसार, मनुष्य को सुखी सद्गुण स्वयं नहीं बनाता बल्कि सद्गुण से उत्पन्न होने वाला आनंद उसे सुखी बनाता है। किन्तु यह भेद वास्तव में निरर्थक है क्योंकि एपिक्यूरस स्वयं यह भी कहता है कि सद्गुण कभी आनंद से अलग नहीं होता। यदि एक वस्तु सदैव दूसरी के साथ जुड़ी रहती है और उससे कभी अलग नहीं हो सकती तो सद्गुण अपने आप में भी सुख के लिए पर्याप्त है। क्योंकि जब वह अकेला भी प्रतीत होता है, तब भी वह आनंद से कभी रहित नहीं होता।

    लेकिन पहला मत यह कि मनुष्य केवल सद्गुण के कारण तो सुखी हो सकता है पर पूरी तरह सुखी नहीं, सर्वथा असंगत है। यह कैसे संभव हो सकता है, मेरी समझ से परे है। सुखी जीवन में एक ऐसा परम कल्याण निहित होता है जो पूर्ण भी है और अजेय भी। यदि ऐसा है तो वह जीवन पूर्णतः सुखी ही होगा। यदि देवताओं के जीवन में इससे बढ़कर या इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यदि सुखी जीवन दैवीय स्वरूप का है तो फिर ऐसा कोई आधार नहीं बचता जिसके द्वारा उसे और भी ऊँचे स्तर पर पहुँचाया जा सके। इसके अतिरिक्त, यदि सुखी जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं है तो प्रत्येक सुखी जीवन पूर्ण है। और वही जीवन केवल सुखी ही नहीं बल्कि जितना संभव है उतना अधिक सुखी भी है। निश्चय ही तुम यह स्वीकार करोगे कि सुखी जीवन ही परम शुभ है। यदि उसमें परम शुभ विद्यमान है तो वह परम सुखी भी होना चाहिए। परम शुभ में किसी प्रकार की वृद्धि संभव नहीं है क्योंकि परम से आगे और क्या हो सकता है? ठीक यही बात सुखी जीवन पर भी लागू होती है क्योंकि सुखी जीवन का अर्थ ही परम शुभ की प्राप्ति है। फिर यदि तुम यह मानते हो कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे से अधिक सुखी हो सकता है तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि कोई उससे भी अधिक सुखी हो सकता है। इस प्रकार तुम परम शुभ के अनगिनत स्तर बना दोगे। किन्तु मेरी समझ में परम शुभ वही है, जिसके आगे श्रेष्ठता की कोई और अवस्था संभव नहीं होती।

    यदि एक सुखी व्यक्ति दूसरे सुखी व्यक्ति की अपेक्षा कम सुखी है तो इसका अर्थ यह होगा कि वह अपने जीवन की अपेक्षा उस अधिक सुखी व्यक्ति के जीवन की अधिक इच्छा करेगा। किन्तु वास्तव में सुखी व्यक्ति अपने जीवन को किसी भी दूसरे जीवन से अधिक प्रिय मानता है। इन दोनों बातों में से कोई भी स्वीकार नहीं की जा सकती न यह कि कोई ऐसी अवस्था है जिसे सुखी व्यक्ति अपने वर्तमान जीवन से अधिक वांछनीय समझे और न यह कि वह अपने पास जो है, उससे बेहतर वस्तु को भी प्राप्त करना न चाहे। निस्संदेह, मनुष्य जितना अधिक बुद्धिमान होता है, उतना ही वह सर्वोत्तम वस्तु की ओर अग्रसर होता है और उसे हर संभव उपाय से प्राप्त करना चाहता है। फिर यदि कोई ऐसी वस्तु या अवस्था अभी भी शेष है, जिसकी इच्छा वह कर सकता है और वास्तव में करनी भी चाहिए तो उसे सुखी कैसे कहा जा सकता है?

    मैं तुम्हें बताता हूँ कि इस भ्रम का कारण क्या है। वे यह नहीं समझते कि सुखी जीवन वास्तव में एक ही प्रकार का जीवन होता है। उसकी श्रेष्ठता का आधार उसकी मात्रा नहीं बल्कि उसका गुण है। इसलिए वह चाहे लंबा हो या छोटा, व्यापक हो या सीमित, अनेक स्थानों और परिस्थितियों में व्यतीत हुआ हो या एक ही स्थान पर केंद्रित रहा हो, उसकी उत्कृष्टता समान रहती है। जो व्यक्ति सुखी जीवन का मूल्य उसकी अवधि, उसके विस्तार या उसकी परिस्थितियों के आधार पर आँकता है, वह उसके सबसे बड़े गुण को ही उससे छीन लेता है। सुखी जीवन का सबसे बड़ा गुण क्या है? उसकी पूर्णता। मेरा विचार है कि खाने और पीने का उद्देश्य तृप्ति है। कोई अधिक खाता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों तृप्त हो चुके हैं तो दोनों ने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार कोई अधिक पीता है, कोई कम। इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि दोनों की प्यास बुझ चुकी है तो दोनों समान रूप से संतुष्ट हैं। ठीक इसी तरह, कोई अधिक वर्षों तक जीवित रहता है और कोई कम वर्षों तक। इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि अधिक वर्षों ने और कम वर्षों ने, दोनों को समान रूप से सुखी बना दिया हो। जिसे तुम 'कम सुखी' कहते हो, वह वास्तव में सुखी है ही नहीं क्योंकि 'सुखी' ऐसा गुण नहीं है, जिसे कम या अधिक की श्रेणियों में बाँटा जा सके। या तो मनुष्य सुखी होता है या नहीं होता। 'कम सुखी' जैसी कोई अवस्था नहीं होती।

जो व्यक्ति साहसी है, वह निर्भय होता है।

जो निर्भय है, वह शोक से मुक्त होता है।

जो शोक से मुक्त है, वही सुखी होता है।

यह तर्क हमारी (स्टोइक) परंपरा का है।

जो लोग इसका खंडन करने का प्रयास करते हैं, वे कहते हैं कि जिस आधार-वाक्य को हम स्वतःसिद्ध मान लेते हैं कि 'जो साहसी है, वह निर्भय है।' वह वास्तव में न तो निर्विवाद है और न ही सर्वमान्य। वे कहते हैं, “कैसे? क्या साहसी व्यक्ति सामने उपस्थित संकट से बिल्कुल भी नहीं डरेगा? तब तो तुम किसी साहसी मनुष्य की नहीं बल्कि ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे हो जो पागल है और वास्तविकता से कटा हुआ है। निस्संदेह, साहसी व्यक्ति भय का अनुभव करता है किंतु बहुत ही सीमित मात्रा में; वह भय से पूरी तरह परे नहीं होता। जो लोग ऐसा कहते हैं, वे अंततः फिर उसी पुराने मत पर पहुँच जाते हैं, जिसमें वे छोटे-छोटे दोषों को मानो सद्गुण समझने लगते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति कम बार और कम मात्रा में भयभीत होता है, वह दोष से रहित नहीं है। वह केवल अपेक्षाकृत कम गंभीर दोष से ग्रस्त है।

    “लेकिन मेरा तो यह मानना है कि सामने आने वाले संकटों से बिल्कुल न डरना पागलपन है।” तुम्हारी बात सही होती, यदि वे घटनाएँ वास्तव में हानिकारक होतीं। लेकिन यदि कोई यह जानता है कि वे वास्तव में बुराइयाँ नहीं हैं और यह मानता है कि केवल लज्जाजनक या अनैतिक आचरण ही वास्तविक बुराई है तो उसे बाहरी संकटों का सामना बिना किसी चिंता के करना चाहिए। उसे उन बातों से ऊपर उठ जाना चाहिए जिन्हें सामान्य लोग भयावह समझते हैं। अन्यथा, यदि हानि से न डरना ही मूर्खता और अविवेक का लक्षण है तो फिर जितना अधिक बुद्धिमान कोई व्यक्ति होगा, उतना ही अधिक भयभीत भी होगा।

    “तुम्हारी बात मानें, तो साहसी व्यक्ति स्वयं ही अपने को संकट में डाल देगा।” नहीं, ऐसा नहीं है। वह संकटों से भयभीत नहीं होगा परंतु उनसे यथासंभव बचेगा। उसके लिए सावधानी बरतना उचित है, किंतु भयभीत होना नहीं। 

    “तुम्हारा क्या अर्थ है? क्या वह मृत्यु, कारावास, अग्नि और भाग्य द्वारा फेंके जाने वाले अन्य सभी प्रहारों से नहीं डरेगा?” नहीं। क्योंकि वह जानता है कि ये वस्तुएँ वास्तव में बुरी नहीं हैं। वे केवल बुरी प्रतीत होती हैं। उसके लिए वे मानव जीवन के केवल काल्पनिक भय हैं। उससे कैद, कोड़े, बेड़ियाँ, भूख, रोग और चोट की यातनाओं या किसी भी अन्य कष्ट की बात करो। उसकी दृष्टि में ये सब केवल ज्वरग्रस्त मन के भ्रम हैं। इन्हें डरने के लिए कायरों के लिए छोड़ दो। या क्या तुम यह मानते हो कि ऐसी चीज़ें वास्तव में बुरी हो सकती हैं जबकि अनेक अवसर ऐसे आते हैं जब हमें स्वयं अपनी इच्छा से उनका सामना करना पड़ता है? क्या तुम जानना चाहते हो कि वास्तव में बुराई क्या है? वास्तविक बुराई है, जिन वस्तुओं को हम बुराई समझते हैं, उनके सामने आत्मसमर्पण कर देना। अपनी स्वतंत्रता उन्हें सौंप देना। जबकि उसी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हमें हर प्रकार का कष्ट सहने को तैयार रहना चाहिए। यदि हम उन सभी चीज़ों से ऊपर नहीं उठते जो हमारी गर्दन पर जुआ रखना चाहती हैं, तो हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं।

    यदि वे जानते कि साहस वास्तव में क्या है तो वे यह प्रश्न ही न करते कि साहसी व्यक्ति के लिए क्या उचित है।साहस न तो उतावला दुस्साहस है, न रोमांच की खोज और न ही संकटों से प्रेम। बल्कि साहस वह ज्ञान है, जिसके द्वारा मनुष्य यह पहचान सकता है कि वास्तव में क्या बुरा है और क्या बुरा नहीं है। साहस अपनी सुरक्षा के प्रति अत्यंत सावधान रहता है, किंतु साथ ही वह उन कष्टों को भी सहने में पूर्णतः समर्थ होता है, जो केवल देखने में बुरे प्रतीत होते हैं जबकि वास्तव में बुरे नहीं होते। “कैसे?” यदि किसी साहसी व्यक्ति के गले पर छुरा रख दिया जाए, यदि उसके शरीर को थोड़ा-थोड़ा करके गहरे तक चीरा जाए, यदि वह अपनी आँतों को अपनी गोद में गिरते हुए देखे, यदि उसके कष्टों को बीच-बीच में रोककर फिर दोबारा आरम्भ किया जाए ताकि वे और भी अधिक पीड़ादायक बन जाएँ, और यदि अभी-अभी भरे हुए घाव फिर से फटकर ताज़ा रक्त बहाने लगें तो क्या वह नहीं डरेगा? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि उसे पीड़ा का अनुभव भी नहीं होगा?” निस्संदेह, उसे पीड़ा का अनुभव होगा। क्योंकि सद्गुण मनुष्य की स्वाभाविक संवेदनाओं को कभी समाप्त नहीं करता। किन्तु वह भयभीत नहीं होगा। वह अपराजित रहेगा और अपनी पीड़ा को अपने से ऊपर नहीं बल्कि अपने नीचे समझकर उसका सामना करेगा। तुम पूछते हो, उस समय उसके मन की अवस्था कैसी होगी? वह वैसी ही होगी जैसी किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो बीमारी के समय अपने मित्र का साहस बढ़ाता है।

जो कुछ बुरा होता है, वह किसी-न-किसी प्रकार की हानि पहुँचाता है।

जो किसी मनुष्य को हानि पहुँचाता है, वह उसे पहले से अधिक बुरा बना देता है।

किन्तु न पीड़ा और न ही दरिद्रता मनुष्य को नैतिक दृष्टि से बुरा बनाती है।

अतः न पीड़ा बुराई है और न ही दरिद्रता।

    कोई यह आपत्ति कर सकता है—

“तुम्हारा प्रस्तुत किया हुआ आधार-वाक्य ही असत्य है। यह आवश्यक नहीं कि जो भी किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाए, वह उसे नैतिक रूप से भी बुरा बना दे। जैसे तेज़ हवा और तूफ़ान नाविक को हानि पहुँचाते हैं, पर वे उसे कम कुशल नाविक नहीं बना देते।”

इस आपत्ति का उत्तर कुछ स्टोइक इस प्रकार देते हैं। तेज़ हवा और तूफ़ान वास्तव में नाविक को एक अर्थ में हानि पहुँचाते हैं क्योंकि वे उसे उस कार्य में सफल नहीं होने देते, जिसके लिए उसने यात्रा आरम्भ की थी अर्थात जहाज़ को उसके निर्धारित मार्ग पर बनाए रखना। वे उसकी कला या कौशल को नष्ट नहीं करते किंतु उसके कार्य-निष्पादन में बाधा अवश्य डालते हैं। 

    इस पर पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) उत्तर देते हैं, “यदि तुम्हारा यही तर्क है, तो उसी तर्क के अनुसार ज्ञानी पुरुष भी दरिद्रता, पीड़ा और ऐसी अन्य परिस्थितियों से किसी न किसी अर्थ में बुरा हो जाएगा। क्योंकि ये भी उसकी गतिविधियों और कर्मों में बाधा उत्पन्न करती हैं, यद्यपि वे उसके सद्गुण को नष्ट नहीं करतीं।”

    यदि नाविक और ज्ञानी पुरुष की स्थिति में अंतर न होता तो यह आपत्ति उचित होती। लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। ज्ञानी पुरुष का जीवन-लक्ष्य केवल किसी विशेष कार्य को पूरा करना नहीं है बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उचित और सदाचारी आचरण करना है। इसके विपरीत, नाविक का उद्देश्य केवल जहाज़ को सुरक्षित बंदरगाह तक पहुँचा देना है। विभिन्न कलाएँ और कौशल अधीनस्थ होते हैं। उन्हें वही कार्य पूरा करना होता है जिसका उन्होंने वचन दिया है। लेकिन प्रज्ञा (विवेकपूर्ण बुद्धि) सर्वोच्च शासक और मार्गदर्शक है। कलाएँ जीवन की सेवा करती हैं जबकि प्रज्ञा जीवन पर शासन करती है। 

    किन्तु मेरे विचार में इस आपत्ति का उत्तर एक भिन्न प्रकार से दिया जाना चाहिए। मेरे मत में, कोई भी तूफ़ान न तो नाविक की कला को कमतर बनाता है और न ही उस कला के अभ्यास को। नाविक ने तुमसे कभी यह वचन नहीं दिया कि वह हर स्थिति में अनुकूल परिणाम अवश्य प्राप्त करेगा। उसने केवल यह वचन दिया है कि वह अपनी पूरी क्षमता से उपयोगी बनने का प्रयास करेगा और जहाज़ चलाने की कला का पूरा ज्ञान रखेगा। जब भाग्य का कोई प्रचंड झोंका उसके मार्ग में बाधा डालता है, तब उसका कौशल और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जो नाविक यह कह सकता है, “हे नेप्च्यून! चाहे कुछ भी हो, यह जहाज़ कभी उलटकर नहीं डूबेगा। यदि डूबेगा भी तो सीधा खड़ा रहकर।” उसने अपनी कला की अपेक्षाओं को पूरा कर दिया है। तूफ़ान नाविक की दक्षता या उसके कर्म को बाधित नहीं करता। वह केवल उसके प्रयास के अंतिम परिणाम में बाधा डालता है।

    “तुम्हारा क्या मतलब है? क्या वह प्रचंड तूफ़ान नाविक को हानि नहीं पहुँचाता, जो उसे बंदरगाह तक पहुँचने से रोक देता है, उसके सारे प्रयासों को निष्फल कर देता है और या तो उसे फिर से खुले समुद्र में धकेल देता है या जहाज़ के मस्तूल को गिराकर उसकी यात्रा रोक देता है?” नाविक को हानि पहुँचती है लेकिन एक नाविक के रूप में नहीं। केवल समुद्री यात्री के रूप में। क्योंकि यदि उसका कौशल ही ऐसी परिस्थितियों से नष्ट हो जाए तो फिर वह नाविक कहलाने योग्य ही नहीं रहेगा। वास्तव में, ऐसी परिस्थितियाँ उसके कौशल में बाधा नहीं डालतीं; बल्कि उसी समय उसका कौशल सबसे अधिक प्रकट होता है। जैसा कि कहा जाता है, “अनुकूल मौसम में तो कोई भी नाविक बन सकता है।” जिन परिस्थितियों का तुम उल्लेख कर रहे हो, वे यात्रा के लिए हानिकारक हैं, नाविक के कौशल के लिए नहीं। नाविक की दो भूमिकाएँ होती हैं। एक भूमिका वह है जो उस जहाज़ पर सवार सभी लोगों के साथ समान रूप से साझा करता है, वह स्वयं भी एक यात्री है। दूसरी उसकी अपनी विशिष्ट भूमिका है, वह जहाज़ का नाविक है। तूफ़ान उसे उसकी यात्री वाली भूमिका में हानि पहुँचाता है, नाविक वाली भूमिका में नहीं। 

    इसके अतिरिक्त, नाविक का कौशल किसी दूसरे के हित के लिए होता है; वह उसके यात्रियों से संबंधित है, जैसे चिकित्सक का कौशल उसके रोगियों के हित के लिए होता है। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष की प्रज्ञा एक साझा कल्याण है। उसका लाभ उन लोगों को भी मिलता है जिनके साथ वह रहता है और स्वयं उसे भी। अतः यदि यह मान भी लिया जाए कि जब तूफ़ान उसके द्वारा दूसरों के लिए किए जाने वाले कार्य में बाधा डालता है, तब नाविक को किसी अर्थ में हानि पहुँचती है, तब भी ज्ञानी पुरुष को जीवन के तूफ़ानों जैसे, दरिद्रता, पीड़ा और अन्य विपत्तियों से कोई हानि नहीं पहुँचती। क्योंकि उसकी सभी गतिविधियाँ बाधित नहीं होतीं। केवल वे कार्य प्रभावित होते हैं जो दूसरों से संबंधित हैं। जहाँ तक उसका अपना प्रश्न है, वह हर परिस्थिति में अपने कर्मों में अडिग रहता है। जब भाग्य उसका विरोध करता है, तब वह और भी महान बनकर कार्य करता है। क्योंकि ठीक उसी समय वह प्रज्ञा के वास्तविक कार्य का निर्वाह करता है और जैसा कि हमने अभी कहा, प्रज्ञा उसका अपना भी कल्याण है और दूसरों का भी।

    इसके अतिरिक्त, यदि परिस्थितियाँ उसे किसी कार्य में बाँध भी दें, तब भी वह दूसरों की सहायता करने से वंचित नहीं होता। यदि दरिद्रता के कारण वह लोगों को यह नहीं सिखा सकता कि राज्य के कार्यों का संचालन कैसे किया जाना चाहिए, तो भी वह उन्हें यह अवश्य सिखा सकता है कि दरिद्रता का सामना कैसे किया जाना चाहिए। उसका कार्य उसके संपूर्ण जीवन में फैला हुआ है। इसलिए कोई भी आकस्मिक घटना ज्ञानी पुरुष की सक्रियता को समाप्त नहीं कर सकती। क्योंकि जो परिस्थिति उसे किसी एक कार्य से रोकती है, वही उसके लिए एक नए कार्य का विषय बन जाती है। वह हर प्रकार की परिस्थिति के लिए समान रूप से तैयार रहता है। समृद्धि पर वह शासन करता है और विपत्ति पर विजय प्राप्त करता है। मैं फिर कहता हूँ, उसका प्रयत्न यह होता है कि वह अपनी सद्गुणशीलता को समृद्धि और विपत्ति, दोनों ही परिस्थितियों में प्रकट करे। उसकी दृष्टि सदैव स्वयं सद्गुण पर रहती है, न कि उन बाहरी परिस्थितियों पर जिनमें सद्गुण का अभ्यास किया जाता है। इसी कारण दरिद्रता, पीड़ा या ऐसी कोई भी परिस्थिति, जिनसे अप्रशिक्षित और अविवेकी लोग घबराकर पीछे हट जाते हैं, ज्ञानी पुरुष को उसके मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। 

    क्या तुम समझते हो कि ज्ञानी पुरुष दुर्भाग्य के कारण विवश हो जाता है? नहीं, वह तो उसी का उपयोग कर लेता है। जैसे फिडियास केवल हाथीदाँत से ही मूर्तियाँ बनाना नहीं जानता था। वह काँसे से भी उत्कृष्ट मूर्तियाँ बना सकता था। यदि उसे संगमरमर या कोई और कम मूल्यवान सामग्री दी जाती तो भी वह उसी से अपनी सर्वोत्तम कला का प्रदर्शन करता। ठीक उसी प्रकार, यदि अवसर मिले तो ज्ञानी पुरुष धन-संपत्ति के बीच रहकर अपने सद्गुण का परिचय देगा और यदि ऐसा अवसर न मिले, तो दरिद्रता के बीच भी वही सद्गुण प्रकट करेगा। यदि संभव हो तो वह अपने देश में रहकर सद्गुण का पालन करेगा  और यदि नहीं तो निर्वासन में भी। यदि अवसर मिले तो सेनापति के रूप में; और यदि नहीं, तो एक साधारण सैनिक के रूप में। यदि स्वस्थ हो तो स्वास्थ्य में और यदि रोग या दुर्बलता आए तो उसी अवस्था में भी। भाग्य उसे जैसी भी परिस्थिति प्रदान करे, वह उससे कुछ ऐसा कर दिखाएगा जो स्मरणीय होगा। 

    कुछ ऐसे दक्ष पशु-प्रशिक्षक होते हैं जो सबसे अधिक हिंसक और भयावह पशुओं को न केवल उनकी उग्रता छोड़ने और मनुष्यों का स्पर्श सहने का अभ्यास करा देते हैं बल्कि उन्हें इतना विनीत भी बना देते हैं कि वे मनुष्य के साथी जैसे हो जाते हैं। सिंह का प्रशिक्षक अपना हाथ उसके खुले जबड़ों के बीच डाल देता है। बाघ का प्रशिक्षक उसे चूमता है और छोटा-सा इथियोपियाई महावत विशाल हाथी को घुटने टेकने और रस्सी पर चलने तक का अभ्यास करा देता है। ज्ञानी पुरुष भी ऐसा ही होता है। वह विपत्तियों का कुशल प्रशिक्षक होता है। पीड़ा, अभाव, अपमान, कारावास और निर्वासन, जिनसे सामान्य लोग भयभीत रहते हैं, जब उसके पास आते हैं तो वे उसके सामने मानो वश में किए हुए पशुओं की तरह शांत हो जाते हैं।


अभी के लिए विदा 

विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच अंतर के बारे में - पत्र - 87

 प्रिय लूसीलियस  दर्शनशास्त्र को विभाजित करके उसके विशाल स्वरूप को विभिन्न अंगों में समझने का जो अनुरोध तुम कर रहे हो, वह उपयोगी ही नहीं बल्...