Tuesday, 9 June 2026

एक बुजुर्ग औरत की डायरी

 

उम्र तो दिमाग का तेल है। खामखां का फितूर है। फिर भी एक बात कहूँ, औरतों को उम्र जल्दी छूती है। खुद औरतें भी अजीब हो जाती हैं उम्र को लेकर और जमाना तो सिर के ऊपर के पके बालों को सबसे पहले देखता है। जाने कैसे, कब यह सफ़ेद रंग चुभने-सा लगा था... याद नहीं! जब स्कूल में थी तब तो सरसों का तेल ही चुपटा रहता था। मैं आज की बात नहीं बता रही। तब की बात बता रही हूँ जब घरों में टीवी होना भी अचरज और अमीरी की निशानी हुआ करती थी। मैं तब के जमाने की ख़वातीन हूँ। आज भी अपने को जवान ही समझती हूँ। पचपन की हूँ तो भी क्या हुआ? दिल तो अब भी वही सोलह-सत्रह वाला है। और आज भी यह बहुत गुलाबी धड़कता है।



पर मेरे बेटे और नाती-पोते सभी मुझे यह बताने पर तुले रहते हैं कि मैं बहुत बूढ़ी हो गई हूँ। उनकी एक ही चाहत कि मैं मंतर-संतर का जाप करूँ या फिर मोती मनका फेरूँ। कभी जो मेरे लिए कपड़े लाते हैं तब अधिकतर कपड़ों का रंग सफ़ेद या बुझा हुआ-सा रहता है। कसम खाकर कहती हूँ। मुझे वे रंग तनिक भी नहीं भाते। उनका बाप मरा है, मैं तो ज़िंदा हूँ। ये आधुनिक जमाने के लोग भले ही अपने आप को नए जमाने के लोग बोले पर अपनी माँ के नाम पर ये निहायती मूढ़ हैं। विधवा पति ने बनाया... रस्म ने बनाया पर एहसास तो इन बच्चों ने कराया जो खूब पढ़े-लिखे हैं। उन्हें आज भी बुढ़िया या बुढ़ापे की सभी रस्में याद हैं। मुझे बहुत खीझ बढ़ने लगी है इन पर।

7 जनवरी 20..

शुक्र है कि मुझे पढ़ने और थोड़ा बहुत कलम चलाने का शौक है वरना ये बहुएँ मुझसे अपने बच्चे ही संभालवाती रहतीं। मुझे बच्चों से प्यार है पर दूर से। कम उम्र में माँ बन गई थी... ज़बर्दस्ती का मातृत्व उठाया और सबके आगे अच्छी बनी रही। पर सच कहूँ, मुझे हमेशा से ही उड़ान पसंद थी। आज पैरों में दर्द नहीं है। मन कर रहा है छत पर टहल आऊँ। अभी 12 बज रहे हैं। सर्दी के दिन चढ़े हैं पर मुझे अच्छे लगते हैं।

9 जनवरी 20..

उस दिन मैं जरा देर छत पर टहलने क्या चली गई, छोटी वाली ने अगले दिन सभी के सामने ड्रामा रच दिया। कहती है, “अम्मा आपकी उम्र हो रही है। ऐसे में आप ध्यान रखा करो। कहीं तबीयत खराब हो गई तब हम आपको कहाँ-कहाँ लेकर फिरते रहेंगे! धूप में जाया कीजिए और आराम से बैठा कीजिए ...दिन में! लेकिन इतनी रात में छत पर क्या करने गई थीं आप?” उसके कहने भर की देर थी। सब आँखों से ही मुझे उलाहना देने लगे। मैंने यह महसूस किया कि मेरी तबीयत की फिक्र किसी को नहीं थी। न कभी होती है। इनको दिन-रात बस यही खयाल रहता है कि मैं कब मरूँ! अब बताओ मौत की भी कहीं दुआ में माँगी जाती है? पर ये सब लोग माँगते हैं! हाय! मेरे बच्चे...

14 जनवरी 20..

पुस्तक मेला लगा था। मैंने कई रोज़ पहले ही चलने की इच्छा घर में जता दी थी। तब भी बहू ने टोक दिया था, “आप क्या करेंगी चलकर... थक जाएँगी!” मैंने भी गुस्से में कहा था, “तुम क्या करोगी जाकर? तुम किताबें तो पढ़ती नहीं हो।” गुस्से में मुझे सब छोड़कर चले गए थे। पर क्या मैं अनाथ हूँ... जिनके खुद के हाथ वो काहे का अनाथ। इतनी पेंशन मिलती है कि मैं अच्छे से जी सकती हूँ और किताब भी खरीद सकती हूँ!

 

16 जनवरी 20..     

सच में! किताबों के मेले हमेशा लगे रहने चाहिए। हर दिन, हर पल। वहाँ दर्द का पता नहीं चलता। किताब मरहम की तरह लगती है। मुझे याद नहीं कब से मुझे किताब पढ़ने का शौक़ चढ़ा! इनको भी तो मेरी ये आदत अच्छी लगती थी। किताब पढ़ने के बाद नींद भी अच्छी आती है। मुझे तो किताबें एक वजह देती हैं ज़िंदगी की। ख़ैर, मैंने पुस्तक मेले में अपनी ही उम्र के पति- पत्नी देखे। पत्नी ने भूरी स्कर्ट, टी-शर्ट के साथ पहनी थी। बाल भी कितने अच्छे से कटे हुए थे। सोच रही हूँ मैं भी कटवा ही लूँ। और स्कर्ट..? सोच पर भी लगाम लगा रखी है जमाने ने... तहलका भी तो मच जाएगा। इस उम्र में स्कर्ट पहन रही हैं माँ और सासु माँ! उफ़्फ़... जीने भी नहीं देते मन से!  

19 जनवरी 20..

आज सुबह एक सपना आया था। मैं रफ़्तार से कहीं भाग रही थी। हाँफ गई थी, फिर भी कितनी तेज़ी से भाग रही थी। कभी कभी लगता है घर से बाहर सितारों तक एक दौड़ लगा आऊँ रफ़्तार के साथ। पर कहीं इस उम्र में हड्डियों का सुर्मा बन गया तो! आख़िर शरीर की भी तो अपनी सीमा है। पर दिल का तो कुछ नहीं, हाँ दिल तो बच्चे की तरह ही होता है।

14 फरवरी 20..

आज प्यार के दिन बेटे-बहू सब बच्चों के साथ मौज मनाने गए हैं। मैं यहाँ अकेले घर में पड़ी हूँ। वो लोग तो चाहते हैं कि मैं रामचरित मानस की चौपाई गा-गा कर मर जाऊँ। वो इंतज़ार कर रहे हैं कि कब मेरा दिल मुझे धोखा दे कर रूक जाए। पर क्यों रुकेगा? मुझे किसी बात का ग़म नहीं है। मैं तो खुश रहती हूँ। मुझे तो लगता है कि मेरे मन के अंदर कोई बैठकर किसी लड़की की तरह हँस रही है... खिलखिला रही है। कभी गाल लाल हो रहे हैं तो कभी मासूमियत अपना साया मुझ पर ओढ़ा रही है। मैं कल जाकर अपने मन से अपना प्यार का दिन मनाऊँगी। पर कहाँ? सोचना पड़ेगा।

19 फरवरी 20..

बूढ़े लोग या बूढ़ी औरत आख़िर क्यों नहीं प्यार का सोच सकती? दुनिया को क्यों आग लग जाती है? 15 को जैसे ही मैंने सुबह नहा-धोकर लाल साड़ी निकाली तो बातों के तीर मेरे सीने में जबरन धंसा दिए गए। इतनी लानत दी गई कि मेरा दिल भी रो गया। क्यों बूढ़ी जैसी सोच मैं सोच नहीं पाती...यही मेरा गुनाह है। हे भगवान...मैं क्या करूँ?

4 मार्च 20..

आह! क्या मौसम आया है...मैं खुश हूँ, बहुत! मेरी नज़र इस बहार को न लग जाए! एक गाना याद आ रहा है...आज मदहोश हुआ जाए रे ... मेरा मन ...मेरा मन! ...ये गीत गाने न होते तो मेरी ज़िंदगी एक बुझा हुआ दीया ही होती। मुझे तो हर पल गुनगुनाना पसंद है। खुश रहना इतना मुश्किल भी नहीं होता। लोगों को गीत गाना चाहिए। सुर की परवाह के बगैर।



6 जून 20..

मेरी डायरी जला दी गई। उनको लगता है विधवा और बूढ़ी जब मन का करे तो बदचलन मानी जाती है। उनके मुताबिक़ मैं बदचलन हूँ। खुद उनकी माँ बदचलन है? अगर वो ऐसा सोचते हैं तब मैं हूँ। चाहे जितनी डायरी जला दो। चाहे राख कर दो...मेरे मन को कभी न जला पाओगे। मुझे नहीं गाने तुम्हारे सड़े हुए भजन। मैं ज़िंदगी के गीत गाऊँगी। जब तक सांस चल रही है, तब तक मैं गाऊँगी। ...लो अब खुल्लम-खुल्ला डायरी सबके सामने रखी जाएगी। जो करना है करो...बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम की डायरी। अब खुश?     

 ... जारी 

(पेंटिंग्स प्रिय सेराफिन की)

बेवकूफ जूलिएट और अकेला रोमियो

जून 12 - अकेलापन और रोमियो

तुम इतना अकेले क्यों रहते हो जबकि मैं तुम्हारे साथ ही रहती हूँ ? पास रहने पर भी लगता है कि कहीं किसी समुद्र के ऊपर तैर रहे हो। यह गलत है। मैं तुम्हारे साथ रहने के बाद भी बस तुम्हारा इंतजार करती रह जाती हूँ। अकेलेपन का यह कौन सा रूप है? मुझे समझ नहीं आता। अजीब सी छटपटाहट होती है। बेचैनी सी रहती है। सांस भी रुक जाती है। उफ़! मुझे क्या हो रहा है! एक छोटा पत्थर भी पानी में फेंक दो तो तरंग उठ जाती है। पर तुम तो समुद्र की गहराई की तरह शांत रहते हो। भला ऐसे भी कोई करता है !

जून 13 - बेवकूफ जूलिएट

तुम इतना समझाते क्यों हो? मैं बेवकूफ तो नहीं हूँ। सुनती हूँ क्योंकि इस बहाने तुम अपनी ख़ामोशी तोड़ते हो। चलो ठीक है तुम्हारी आवाज़ सुनने का मोल मेरी बेवकूफी है तो कभी कभी तो मंजूर कर ही सकती हूँ। हमेशा नहीं। तुम्हें ऐसा लगता है कि मुझे कुछ खबर ही नहीं है। तो क्या जरा देर से बातें समझ आती हैं! आती तो हैं। घर लौट के आने के बाद तक मैं तुम्हारी बातें दोहराती हूँ...रुको, गुनगुनाती हूँ। पर सुनो मैं बेवकूफ नहीं हूँ...समझे! प्यार है तुमसे वरना तो हिसाब मैं नंबर वन हूँ। एक पाई इधर न उधर ! एक बात कहूँ, मुझे तुम्हारे साथ बैठना और बात करना बहुत पसंद है। तुम्हें सुनना, मुझे इतनी ख़ुशी और तसल्ली देता है कि मैं बता नहीं सकती। प्यार आपको एक अच्छा सुनने वाले में तब्दील करता है। सुनना धैर्य देता है। जान-बूझकर मासूम बनती हूँ ताकि तुम मुझे समझा सको। इस बहाने तुम्हारा साथ मिलता है...पर सुनो ! मैं बेवकूफ नहीं हूँ !

18 जून - खोजकर्ता जूलिएट

लो अब मैंने क्या कर दिया? तुम हर बार यही पूछते हो। पर मैं दुविधा में पड़ जाती हूँ कि इसका वाजिब जवाब क्या दूँ। तुम्हें अपने जवाब से संतुष्ट नहीं करना चाहती। पर यकीं करो मैं खुद के लिए तुमसे जुड़े जवाब खोजती रहती हूँ। घर में रहूँ या बाहर, मैं कुछ न कुछ खोजती रहती हूँ। महबूबा बन रही हूँ या खोजकर्ता, यह भी नहीं समझ पा रही। तुम मेरी मदद भी तो नहीं करते ! 'खोजना' यह बतलाता है कि कुछ गुम हुआ है। यह भी बताता है कि कोई नई चीज मिलेगी या किसी नई बात का पता चलेगा। कोई रहस्य खुल जायेगा। लेकिन तुम्हारे पास रहो तो हर पल तुम्हें नई तरह से पाती हूँ। तुम चौंका देने वाले शख्सियत लगते हो। मेरे लिए यह सब आसान नहीं है। प्रेमिका का हर पल चौंकना ठीक बात नहीं। हाँ, पर इस हैरान हो जाने में भी एक मज़ा है। मुझे इस बात का घमंड है कि मेरा प्रेमी कोई नीरस आदमी नहीं है। वह तो तिलिस्म है। मैं तुम्हें पाकर बहुत खुश हूँ। मैं बता नहीं सकती कितनी!

20 जून - कन्फ्यूजन है

कभी कभी लगता है कि तुम्हें भी मोहब्बत है। इस बात से राहत मिलती है। आहिस्ता-आहिस्ता जब तुम्हारी हर बात को दोहराती हूँ तब लगता है कि हाँ है न मोहब्बत। लेकिन तभी तुम सब कुछ उलट पलट कर रख देते हो। फिर बढ़ते कदम थम जाते हैं। तब समझ नहीं आता कि बातें दोस्तों की तरह करूँ, महबूबा की तरह करूँ या फिर अजनबी की तरह? तुम्हें घूरते हुए पहचानने की कोशिश रहती है। मैं क्यों कन्फ्यूज हो रही हूँ? मैं अपने को तुम पर थोपना भी तो नहीं चाहती। थोपना प्यार का क़त्ल कर देता है। शायद एक रोज़ मेरी कंफ्यूजन दूर हो जाएगी। मुझे उस दिन का इंतजार है। असमंजस प्यार को बरक़रार रखने या दिलचस्प बनाये रखने के मसाले जैसा है। पर कभी कभी यह दहला भी देता है। जो शख्स आपके अन्दर घुल रहा है, वह यदि अपने बर्ताव से एक पल में ही अनजाना और अजनबी बन जाये तो डर लगना तय है। यही सब सोचकर कंफ्यूजन बढ़ जाती है। तुम भी तो इसे दूर करने की कोशिश नहीं कर रहे!

25 जून - झगड़ा फिर इकरार

अरे यार हद है! मैं पागल हो जाउंगी। अगर यह सब ऐसा ही चलता रहा तो पक्का एक रोज़ मेरा दिमागी संतुलन बिगड़ जायेगा। अच्छा हुआ जो आज झगड़ा हो ही गया। सच में, मेरा माथा सनक जाता है रोज़ सोच सोचकर। ठीक हुआ जो किस्सा ख़त्म हुआ। मैं तुम्हें नहीं झेल सकती। भला कोई अपनी जिद्द पर इस तरह भी अड़ा रहता है! मैंने तो उसी दिन कहा था, कि या तो तुम चले जाओ या फिर मुझे जाने दो। लेकिन तुम्हें कुछ समझ आये तब न। जब लगता है कि तुम गए तब राहत होती है कि चलो एक बार दर्द होगा फिर समय उस पर भी मरहम लगा देगा।लेकिन कुछ दिन बाद फिर आ जाते हो। आज गए हो तो खुदा की कसम न लौट कर आना। जहाँ हो वहीं रह जाना..। फिर भी एक बात बोलूं - “मैं तुमसे प्यार करती हूँ!”

तुमसे झगड़ा हो तो कहीं अन्दर तुम्हें खो देने का खौफ समा जाता है। दो आंसू निकलते हैं और मैं उनमें घुल-सी जाती हूँ। यह सब इतना आसान नहीं। प्रेमिका की बनावट कच्चे घड़े की तरह होती है। अगर प्रेमी का प्यार उसे पकाए नहीं तो मजबूती कहाँ से आएगी ? तुमने कभी सोचा है इन बातों के बारे में ? तुम इस डायरी में ज्यादा नजदीक रहते हो। यहाँ झगड़ते भी नहीं। इसलिए यहाँ बार-बार यही लिख देने का मन होता है - 'तुमसे प्यार है... तुमसे ही तो प्यार है!'

 

No comments:

Post a Comment

थॉर्नटन वाइल्डर के प्रसिद्ध उपन्यास The Bridge of San Luis Rey का हिंदी अनुवाद (भाग पाँच: शायद कोई मंशा)

  भाग पाँच: शायद कोई मंशा By Simon Poe पुराने पुल की जगह पत्थर का एक नया पुल बना दिया गया है , लेकिन वह घटना भुलाई नहीं गई है। वह कहावतों ...