प्रिय लूसीलियस,
तुम मुझे जो लिखते हो और जो मैं सुनता हूँ, उसके आधार पर मैं तुम्हारे भविष्य के बारे में अच्छी राय बना रहा हूँ। तुम इधर-उधर नहीं भटकते और न ही बार-बार अपना निवास स्थान बदलकर स्वयं को विचलित करते हो; क्योंकि ऐसी बेचैनी एक अव्यवस्थित मन का संकेत है। मेरे विचार में, एक सुव्यवस्थित मन की पहली पहचान यह है कि व्यक्ति एक ही स्थान पर रह सके और अपने ही साथ समय बिता सके।
फिर भी सावधान रहो कि अनेक प्रकार के लेखकों और पुस्तकों का अध्ययन तुम्हें चंचल और अस्थिर न बना दे। यदि तुम ऐसे विचार प्राप्त करना चाहते हो जो तुम्हारे मन में दृढ़ता से स्थापित हो जाएँ तो तुम्हें कुछ चुनिंदा महान विचारकों के साथ टिककर रहना चाहिए और उनके कार्यों को अच्छी तरह आत्मसात करना चाहिए। जो व्यक्ति हर जगह होता है, वह वास्तव में कहीं भी नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति अपना सारा समय विदेश यात्राओं में बिताता है तो उसके बहुत-से परिचित तो बन जाते हैं पर मित्र नहीं बनते। ठीक ऐसा उन लोगों के साथ भी होता है जो किसी एक लेखक से गहरा परिचय स्थापित नहीं करते बल्कि सबके पास जल्दी-जल्दी और सतही रूप से जाते रहते हैं।
Keats’ last moments in 1821, Joseph Severn
भोजन तब तक शरीर को लाभ नहीं पहुँचाता और न ही उसका अंग बनता है, जब तक वह पेट में ठहरकर पच न जाए। बार-बार दवा बदलने से रोग का उपचार बाधित होता है। बार-बार नई दवा लगाने से घाव नहीं भरता। यदि किसी पौधे को बार-बार उखाड़कर दूसरी जगह लगाया जाता है, तब वह कभी मजबूत पेड़ में तब्दील नहीं हो सकता।
कोई भी वस्तु इतनी प्रभावशाली नहीं होती कि लगातार इधर-उधर किए जाने पर भी लाभ पहुँचा सके। इसी प्रकार बहुत-सी पुस्तकों का अध्ययन मन को बिखेर देता है। क्योंकि तुम अपनी सभी पुस्तकों को पढ़ नहीं सकते इसलिए उतनी ही पुस्तक रखो जितनी तुम वास्तव में पढ़ सकते हो।
पर तुम कहोगे, "मैं पहले एक पुस्तक को थोड़ा-सा पढ़ना चाहता हूँ और फिर दूसरी को।" मैं कहता हूँ कि यह अत्यधिक अच्छी वाली भूख का लक्षण है जो अनेक प्रकार के व्यंजनों का स्वाद तो लेना चाहती है पर उनसे पोषण नहीं पाती। अलग-अलग तरह का अत्यधिक भोजन तृप्त नहीं करता बल्कि ऊब उत्पन्न करता है।
इसलिए तुम्हें हमेशा बेहतरीन लेखकों को पढ़ना चाहिए और जब बदलाव का मन हो तो उन्हीं लेखकों की ओर लौटना चाहिए जिन्हें तुम पहले पढ़ चुके हो। हर दिन कुछ ऐसा सीखो या जानो जो तुम्हें गरीबी, मृत्यु और अन्य दुर्भाग्यों का सामना करने के लिए मजबूत बनाए... और जब तुम अनेक विचारों को देख-पढ़ लो तब उनमें से एक विचार चुनो और उस दिन उसे पूरी तरह आत्मसात करो।
यह मेरी अपनी आदत है; जो अनेक बातें मैं पढ़ता हूँ, उनमें से किसी एक को मैं अपना बना लेता हूँ।
आज का विचार मुझे एपिक्यूरस से मिला है क्योंकि मैं कभी-कभी शत्रु के शिविर में भी जाता हूँ। एक भगोड़े की तरह नहीं बल्कि एक टोह लेने वाले व्यक्ति की तरह।
एपिक्यूरस कहता है: "संतोषपूर्ण गरीबी एक सम्मानजनक अवस्था है।"
वास्तव में यदि गरीबी में संतोष है तो वह किसी भी तरह से गरीबी नहीं रह जाती। गरीब वह नहीं है जिसके पास बहुत कम है बल्कि वह है जो और अधिक पाने की लालसा करता रहता है। क्या फर्क पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने अपनी तिजोरी या गोदाम में कितना धन जमा किया है, उसके पास कितने पशु हैं अथवा वह कितना मुनाफा प्राप्त करता है इसके बाद भी यदि वह अपने पड़ोसी की संपत्ति पर नज़र रखता है और अपने पिछले लाभों के बजाय भविष्य में मिलने वाले लाभों की ही गणना करता रहता है? यदि तुम पूछो कि धन की उचित सीमा क्या है तो उसका उत्तर यह है कि सबसे पहले जरूरत के सामान या वस्तुओं की प्राप्ति और दूसरा उतना ही रखना जितना पर्याप्त है।

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