Friday, 12 June 2026

सच्ची और झूठी मैत्री के संदर्भ में -- (पत्र - 3)

प्रिय लूसीलियस,

तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेतावनी देते हो कि मैं उससे उन बातों की चर्चा न करूँ जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हैं, यह कहते हुए कि तुम स्वयं भी उसके साथ ऐसी बातें साझा करने के अभ्यस्त नहीं हो। दूसरे शब्दों में, उसी पत्र में तुमने उसे अपना मित्र भी कहा और मित्र नहीं भी माना।

यदि तुमने 'मित्र' शब्द का प्रयोग सामान्य लोगों की तरह किया है, जैसे हम चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को 'माननीय सज्जन' कह देते हैं या रास्ते में मिलने वाले किसी व्यक्ति का नाम भूल जाने पर उसे 'आदरणीय महोदय' कहकर संबोधित करते हैं, तो ठीक है। लेकिन यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को मित्र मानते हो जिस पर तुम्हें उतना विश्वास नहीं जितना स्वयं पर है तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो और सच्ची मित्रता का अर्थ पर्याप्त रूप से नहीं समझते।

वास्तव में, मैं चाहता हूँ कि तुम अपने मित्र के साथ हर बात साझा करो; लेकिन सबसे पहले उस व्यक्ति को परखो। जब मित्रता स्थापित हो जाए तब पूरा यकीन करो; लेकिन मैत्री स्थापित करने से पहले उसका मूल्यांकन अवश्य करो। जो लोग पहले मित्र बना लेते हैं और बाद में उसका परीक्षण करते हैं, वे अपने कर्तव्यों को उलट देते हैं और भ्रमित कर देते हैं। वे थियोफ्रेस्टस के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं जिन्होंने कहा था कि किसी व्यक्ति को परखकर ही उसे मित्र बनाना चाहिए न कि मित्र बनाने के बाद उसकी परीक्षा करनी चाहिए। लंबे समय तक विचार करो कि किसी व्यक्ति को अपना दोस्त बनाना अथवा या नहीं। लेकिन जब एक बार उसे स्वीकार करने का निर्णय कर लो तब उसे पूरे हृदय और आत्मा से अपनाओ। उसके साथ उतनी ही निर्भीकता से बात करो जितनी तुम स्वयं से करते हो।


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जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि तुम्हारे पास ऐसा कोई राज़ न हो जिसे तुम अपने शत्रु को भी न बता सको। फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें सामाजिक परंपरा गोपनीय रखती है इसलिए तुम्हें कम-से-कम अपनी चिंताओं और विचारों को अपने मित्र के साथ अवश्य साझा करना चाहिए। उस पर यकीन करो और तुम देखोगे कि वह निष्ठावान व्यक्ति में परिवर्तित हो रहा है।  

कुछ लोग धोखा खाने के भय से दूसरों को धोखा देना सिखा देते हैं। अपनी शंकाओं के कारण वे अपने मित्र को गलत करने का अवसर दे देते हैं। मेरे मित्र की उपस्थिति में मैं कोई बात क्यों छिपाऊँ? उसके साथ रहते हुए मैं स्वयं को अकेला क्यों समझूँ?

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जिनसे भी मिलते हैं उन्हें वे बातें बता देते हैं जो केवल मित्रों को ही बताई जानी चाहिए। वे अपनी हर परेशानी किसी भी आकस्मिक श्रोता पर उँडेल देते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग अपने सबसे निकट के लोगों पर भी विश्वास करने से डरते हैं और यदि संभव हो तो वे स्वयं पर भी विश्वास न करें, अपने रहस्यों को हृदय की गहराइयों में दबाकर रखते हैं। लेकिन हमें इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। हर किसी पर विश्वास करना भी दोष है और किसी पर विश्वास न करना भी। फिर भी मैं कहूँगा कि पहला दोष अधिक सरल और निष्कपट है जबकि दूसरा अधिक सुरक्षित।

इसी प्रकार तुम्हें दो प्रकार के लोगों को फटकारना चाहिए। एक वे जो कभी शांत नहीं बैठते और दूसरे वे जो हमेशा निष्क्रिय बने रहते हैं। अत्यधिक व्यस्तता से प्रेम करना परिश्रम नहीं है। यह केवल एक बेचैन और चिंतित मन की अस्थिरता है। और सच्चा आराम भी हर प्रकार की गतिविधि को कष्ट मानकर उससे दूर भागने में नहीं है। ऐसा आराम तो केवल आलस्य और जड़ता है।

इसलिए तुम्हें मेरे अध्ययन में पढ़ी हुई पोम्पोनियस की यह उक्ति याद रखनी चाहिए। "कुछ लोग इतने अँधेरे कोनों में सिमट जाते हैं कि वे दिन के उजाले में भी अंधकार ही देखते हैं।"

नहीं, मनुष्य को इन दोनों प्रवृत्तियों का समन्वय करना चाहिए। जो आराम करता है उसे काम भी करना चाहिए और जो काम करता है उसे आराम भी करना चाहिए।

इस विषय पर प्रकृति से परामर्श करो।  वह तुम्हें बताएगी कि उसने दिन और रात दोनों की रचना की है।

अभी के लिए विदा।

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