प्रिय लूसीलियस,
जैसा तुम कर रहे हो, वैसा ही करते रहो—अपने हित के लिए स्वयं को मुक्त करो। अपने समय को इकट्ठा करो और बचाकर रखो क्योंकि अब तक वह या तो तुमसे छीन लिया गया है, या चोरी हो गया है, या फिर तुम्हारे हाथों से यूँ ही फिसल गया है। मेरी बात पर विश्वास करो कि कुछ पल हमसे जबरदस्ती छीन लिए जाते हैं, कुछ धीरे-धीरे हमसे दूर कर दिए जाते हैं और कुछ हमारी पहुँच से बाहर निकल जाते हैं। परंतु सबसे शर्मनाक नुकसान वह है जो हमारी लापरवाही के कारण होता है। यदि तुम इस बात पर ध्यान से विचार करोगे तो पाओगे कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा उस समय बीत रहा होता है जब हम बुरा कर रहे होते हैं, एक अच्छा-खासा हिस्सा कुछ भी न करने में चला जाता है। यह उन कामों में जाता है जो वास्तव में उद्देश्यपूर्ण नहीं होते।
मुझे ऐसा कौन-सा व्यक्ति दिखा सकते हो जो अपने वक़्त की कीमत समझता हो... जो हर दिन की कीमत का अनुमान लगाता हो... जो यह जानता हो कि वह प्रतिदिन मर रहा है? हम मृत्यु को लेकर भ्रम में रहते हैं क्योंकि हम उसे भविष्य की घटना समझते हैं जबकि मृत्यु का बड़ा हिस्सा तो पहले ही बीत चुका है। हमारे जीवन के जो साल पीछे छूट गए हैं, वे मृत्यु के दायरे में जा चुके हैं।
इसलिए, लूसीलियस, जैसा तुम अपने पत्र में लिखते हो, वैसा ही करो—हर घंटे को अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ो। आज के कार्य को आज ही पूरा करो, तब तुम्हें कल पर इतना निर्भर नहीं रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम जानते हो? जब तक हम जीवन को टालते रहते हैं, जीवन तेजी से आगे निकलता जाता है।
लूसीलियस, समय के अलावा हमारा कुछ भी नहीं है। प्रकृति ने हमें केवल इसी एक वस्तु का स्वामित्व सौंपा है—जो इतना क्षणभंगुर और फिसलनभरा (रेत की तरह हाथों से फिसलने वाला) है कि कोई भी व्यक्ति हमें इससे वंचित कर सकता है। कितने मूर्ख हैं ये मनुष्य! वे सस्ती और तुच्छ वस्तुओं का हिसाब रखते हैं जिन्हें आसानी से फिर से पाया जा सकता है; लेकिन जब उन्हें समय जैसी अमूल्य संपत्ति मिलती है तब वे कभी स्वयं को उसका कर्जदार नहीं मानते। जबकि समय ऐसा कर्जा है जिसे सबसे कृतज्ञ व्यक्ति भी कभी चुका नहीं सकता।
तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं, जो तुम्हें इतनी स्वतंत्रता से उपदेश देता हूँ, स्वयं इसका पालन कैसे करता हूँ। मैं दिल से स्वीकारता हूँ कि मेरा हिसाब-किताब संतुलित है, जैसा किसी उदार लेकिन सावधान व्यक्ति का होना चाहिए। मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैं कुछ भी व्यर्थ नहीं करता लेकिन मैं कम से कम यह बता सकता हूँ कि मैं क्या बर्बाद कर रहा हूँ, इसका कारण और मैं किस तरीके से कर रहा हूँ। मैं यह भी बता सकता हूँ कि मैं गरीब क्यों हूँ। हालाँकि मेरी स्थिति उन बहुत-से लोगों जैसी है जो अपनी गलती के बिना ही तंगहाली में पहुँच जाते हैं। सब लोग उन्हें माफ तो कर देते हैं पर उन्हें बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता।
तो फिर स्थिति क्या है? स्थिति यह है कि मैं किसी व्यक्ति को गरीब नहीं मानता, यदि उसके पास बचा हुआ थोड़ा-सा भी उसके लिए काफी है। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि जो वास्तव में तुम्हारा है, उसे सुरक्षित रखो और तुम इसकी शुरुआत जल्दी नहीं कर सकते। जैसा हमारे पूर्वज मानते थे, जब पीपे के तल तक पहुँच जाओ, तब बचत शुरू करना बहुत देर हो चुकी होती है। तल में जो बचता है, वह मात्रा में तो कम होता ही है और गुणवत्ता में भी खराब होता है।
अभी के लिए विदा

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