Saturday, 13 June 2026

मृत्यु के भय के संदर्भ में -- (पत्र - 4)


प्रिय लूसीलियस,

जिस प्रकार तुमने आरम्भ किया है उसी प्रकार आगे बढ़ते रहो और जितनी शीघ्र हो सके उतनी प्रगति करो ताकि तुम एक ऐसे मन का अधिक समय तक आनंद ले सको जो बेहतर हुआ हो और स्वयं के साथ शांति में हो। निस्संदेह, अपने मन को बेहतर व शांत करते समय भी तुम्हें आनंद मिलेगा पर वह सुख बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो उस समय प्राप्त होता है जब मन हर प्रकार के कलंक से मुक्त होकर चमक उठता है।

    तुम्हें याद होगा कि जब तुमने बचपन के कपड़े छोड़कर पुरुषों का कपड़ा पहना था और तुम्हें सम्मानपूर्वक सभा-स्थल तक ले जाया गया था तब तुम्हें कितना आनंद हुआ था। फिर भी उससे कहीं अधिक आनंद की आशा करो जब तुम बालसुलभ मनोवृत्ति का त्याग करोगे और विवेक तुम्हें सच्चे मनुष्यों की श्रेणी में सम्मिलित करेगा।

                                              

                                                          The Misery by Cristobal Rojas Poelo

                                               

हमारे भीतर केवल बचपन ही नहीं रह गया है बल्कि उससे भी बुरी चीज़ — लड़कपन —अब भी बना हुआ है। यह स्थिति और भी गंभीर इसलिए है कि हमारे पास वृद्धावस्था का सम्मान तो है पर मूर्खताएँ अब भी बच्चों जैसी हैं... बल्कि शिशुओं जैसी भी। लड़के तुच्छ बातों से डरते हैं, बच्चे परछाइयों से डरते हैं, और हम दोनों से डरते हैं।

    तुम्हें केवल आगे बढ़ना है तब तुम समझोगे कि कुछ चीज़ें वास्तव में उतनी भयावह नहीं हैं जितनी वे प्रतीत होती हैं। कोई भी बुराई बड़ी नहीं होती यदि वह अंतिम बुराई हो। मृत्यु आती है। वह भय का विषय तब होती यदि वह हमारे साथ बनी रहती। लेकिन मृत्यु या तो आएगी ही नहीं और यदि आएगी तो गुज़रकर चली जाएगी।

    तुम कह सकते हो, “पर मन को इस स्थिति तक पहुँचाना कठिन है कि वह जीवन का तिरस्कार कर सके।” पर क्या तुम नहीं देखते कि कितने तुच्छ कारणों से लोग जीवन का त्याग कर देते हैं? कोई अपनी प्रेमिका के द्वार पर फाँसी लगा लेता है, कोई घर की छत से कूद पड़ता है ताकि गुस्साए मालिक की डाँट न सहनी पड़े, कोई पकड़े जाने के भय से अपनी छाती में तलवार भोंक लेता है। क्या तुम्हें नहीं लगता कि सद्गुण उतना ही प्रभावशाली हो सकता है जितना अत्यधिक भय? हर पल लंबे जीवन की कामना करने वाला व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी सकता या यह मानता हो कि बहुत वर्षों तक जीवित रहना ही महान सौभाग्य है।                                              

    प्रतिदिन इस विचार का अभ्यास करो कि जब समय आए तो तुम संतोषपूर्वक जीवन से विदा हो सको क्योंकि बहुत से लोग जीवन से उसी प्रकार चिपके रहते हैं जैसे तीव्र धारा में बहते हुए लोग काँटों और नुकीली चट्टानों को पकड़ लेते हैं।

                                                        

                                                                  Picasso -- Blue Period 

    अधिकांश लोग मृत्यु के भय और जीवन की कठिनाइयों के बीच दुखपूर्वक झूलते रहते हैं। वे जीना नहीं चाहते यह भी की मरना कैसे है।

    इसलिए जीवन को अपने लिए उपयुक्त बनाओ और उसके विषय में सारी चिंता दूर कर दो। कोई भी अच्छी वस्तु अपने स्वामी को सुखी नहीं बना सकती यदि उसका मन उसके खो जाने की संभावना को स्वीकार न कर चुका हो। वास्तव में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका खोना मृत्यु से कम पीड़ादायक हो क्योंकि मृत्यु के बाद उसकी कमी का अनुभव ही नहीं किया जा सकता। इसलिए अपने मन को सुदृढ़ बनाओ और उन विपत्तियों के लिए तैयार करो जो सबसे शक्तिशाली लोगों पर भी आती हैं।

    उदाहरण के लिए, पॉम्पी का भाग्य एक लड़के और एक हिजड़े द्वारा निर्धारित हुआ। क्रैसस का अंत एक क्रूर और उद्दण्ड पार्थियन के हाथों हुआ। गैयस सीज़र ने लेपिडस को आदेश दिया कि वह अपनी गर्दन जल्लाद की कुल्हाड़ी के सामने प्रस्तुत करे और अंततः उसने स्वयं भी अपनी गर्दन चाएरिया के सामने प्रस्तुत की। भाग्य ने किसी को भी इतना ऊँचा नहीं उठाया कि उसे उतना ही बड़ा खतरा न दिखाया हो जितना बड़ा अनुग्रह उसने पहले दिया था। उसकी शांत प्रतीत होने वाली अवस्था पर भरोसा मत करो। एक क्षण में समुद्र की गहराइयाँ उथल-पुथल हो सकती हैं। जिस दिन जहाज़ अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हैं उसी दिन वे समुद्र में डूब भी सकते हैं।

    यह भी सोचो कि कोई डाकू या शत्रु तुम्हारा गला काट सकता है और चाहे वह तुम्हारा स्वामी न हो फिर भी प्रत्येक दास तुम्हारे जीवन और मृत्यु पर शक्ति रखता है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो अपने जीवन की परवाह नहीं करता वही तुम्हारे जीवन का स्वामी बन सकता है। उन लोगों के बारे में सोचो जो अपने ही घरों में षड्यंत्रों का शिकार हुए.. . खुले रूप से या छलपूर्वक मारे गए। तुम पाओगे कि जितने लोग क्रोधित दासों द्वारा मारे गए लगभग उतने ही क्रोधित राजाओं द्वारा भी मारे गए। फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि वह व्यक्ति कितना शक्तिशाली है जिससे तुम डरते हो जब हर व्यक्ति के पास वही शक्ति है जिससे तुम भयभीत हो?

    पर तुम कहोगे, “यदि तुम शत्रु के हाथों पड़ गए तो विजेता तुम्हें मृत्यु के लिए ले जाएगा।” हाँ, पर वह तुम्हें वहीं ले जाएगा जहाँ तुम पहले से ही जा रहे हो। तुम स्वयं को धोखा क्यों देते हो और अब पहली बार यह सुनना क्यों चाहते हो कि तुम्हारा भाग्य क्या है? मेरी बात मानो, जिस दिन तुम जन्मे थे उसी दिन से तुम उसी दिशा में ले जाए जा रहे हो। यदि हम उस अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा करते समय शांत रहना चाहते हैं जिसके भय से हमारे सभी पूर्व क्षण अशांत हो जाते हैं तो हमें इस विचार और ऐसे ही अन्य विचारों पर निरंतर मनन करना चाहिए।

    पर अब मुझे अपना पत्र समाप्त करना चाहिए। आज मुझे जो उक्ति पसंद आई, उसे तुम्हारे साथ साझा करता हूँ। यह भी किसी दूसरे के उपवन से (लेखन) ली गई है — “प्रकृति के नियमों के अनुरूप बनी हुई गरीबी ही महान संपत्ति है।” क्या तुम जानते हो कि प्रकृति का नियम हमारे लिए कौन-सी सीमाएँ निर्धारित करता है? केवल भूख, प्यास और ठंड से बचना। भूख और प्यास मिटाने के लिए धनवानों के द्वार पर चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं है... न कठोर तिरस्कार सहने की... न अपमानजनक कृपा स्वीकार करने की... न समुद्रों की खाक छानने की आवश्यकता है और न युद्ध-अभियानों में भटकने की। प्रकृति की आवश्यकताएँ सरल हैं और सहज उपलब्ध हैं।

मनुष्य जिन वस्तुओं के लिए इतना परिश्रम करता है वे अधिकांशतः अनावश्यक और अतिरिक्त होती हैं। वही अतिरिक्त वस्तुएँ हमारे वस्त्रों को घिस देती हैं, हमें शिविरों में बूढ़ा कर देती हैं और हमें विदेशी तटों पर भटका देती हैं। जो पर्याप्त है, वह तो हमारे हाथों के निकट ही उपलब्ध है। जिसने गरीबी के साथ न्यायपूर्ण समझौता कर लिया है, वही वास्तव में धनी है।

अभी के लिए विदा।


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मृत्यु के भय के संदर्भ में -- (पत्र - 4)

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