कभी कभी ऐसा लगता है कि घड़ी की सुइयों को हमसे अधिक जल्दी है। कभी लगता है, समय को खींचकर अपने साथ लेकर भाग रही हैं। उनको जलन तो नहीं होती हमसे? हो भी सकता है। आजकल सब कुछ हो सकता है। जो होना है वो भी हो रहा है पर जो नहीं होना चाहिए वो तो पक्का हो रहा है। कुछ दिन से माथे के अंदर अजब गजब सी शांति थी सो कुछ नहीं छापा। आज इस शांति ने मुझे एक पर्ची पकड़ाई कि कुछ तो अपने लिए लिखो। दूसरों के लिए क्या लिखना! आसपास कितना कुछ हो रहा है। सब कुछ चक्कर-घिन्नी की तरह घूमता है। फिर भी सपनों की बात करना ज़्यादा महत्वपूर्ण है। घटनाओं के लिए मीडिया तो है ही।
रोज़ कोशिश करती हूँ कि अपने दिमाग को समेट लूँ। उसमें इतनी लहरे हैं कि उनकी लगाम मेरे वश से बाहर है। जितनी कोशिश करूँ, उन्हें संभाल नहीं पाती। आज उस सपने का ज़िक्र रह रह कर मन में आ रहा है जो तीन साल पहले देखा था। जब मेरे शरीर का ऊपरी भाग यकायक विशाल हो गया था और मेरे सीधे हाथ पर पृथ्वी अपनी चरम रफ़्तार में घूम रही थी। इस सपने ने मुझे कुछ ऐसा चौंकया कि आजतक इसे अपनी छवि तिजोरी में लिए रहती हूँ। मैंने कभी इसे तालाबंद करने की कोशिश नहीं की। चाहती हूँ कि इसे भाग निकलने का मौक़ा मिले। पर यह छवि वाला सपना कभी फरार नहीं होता। आज भी फेविकोल के मजबूत जोड़ के साथ मुझसे चिपका हुआ है। स्कूल के समय से ही मेरी याद में जंग लगा हुआ है। कभी कोई चीज़ याद ही नहीं हुई न रट्टा लगा पाई। लेकिन इस तरह के सपने मुझे रटे हुए हैं।
अगर वास्तव में भोलेनाथ मेरे सिर के ऊपर वाले आसमान में रहते हैं तब तो मेरा एक दिल वाला शुक्रिया कि क्या गज़ब किए हो महादेव! इतने सपने मेरे माथे में भरे हैं। मुझे शुरुआत में कुफ्त होती थी। लेकिन अब इनके प्रति दिलचस्पी और जिज्ञासा होती है। इनमें फैले रंग और बनावट इतने जुदा होते हैं कि मुझे इस बात की हैरानी होती है कि हमारा दिमाग अपनी ही तरह का शानदार वर्कशॉप है।
सपने सबसे ज़्यादा गुंजल और बिखरे हुए होते हैं। बेताल की तरह पीठ पर सवार। इनकी अपनी एक भाषा होती है। कुछ चेहरों और पल पल में बदलते घटनाक्रम कुछ संकेत देते हैं। ये संकेत आसपास की हमारी दुनिया से जुड़े होते हैं। इनको समझना अपने वास्तविक जीवन की जटिलताओं को सुलझाने जैसा है। कम-से-कम उनके नजदीक तो पहुँचना ही है।
सपने बेवजह की उपज नहीं होते। वे कहीं न कहीं और किसी भी तरह से हमसे ही जुड़े होते हैं। उनकी जगह बेशक दिमागी दुनिया होती है पर वे उस तरह का साया हैं जो काफी विशाल है। वे छलिया होते हैं। छलते हुए भी सही की ओर इशारा करते हैं। वे लोगों और परिस्थितियों के ठगने के घटनाक्रम का हल्का ब्योरा पेश करने की कोशिश करते हैं। वे जो नहीं कहा जाता, उसे सामने लाने की कोशिश करते हैं। वे यह भी साबित करते हैं कि आपका कुछ हिस्सा डिवाइन है। रोबोट को सपने नहीं आते। कम्प्यूटर सपने नहीं देख सकता। वो तो आप और मैं ही देख सकते हैं।
कुछ सपने एक ही स्लाइड में आते हैं। कुछ सपनों की बनावट एक के अंदर दूसरे सपने की संरचना में दिखती है। यह मेरा अनुभव है। हो सकता है किसी और को दूसरी तरह के सपने आते हों। सपनों का अंतराल या उनकी उम्र का मतलब सीधे तौर पर जागने के बाद याद में महज़ कुछ छवियों के रह जाने से जुड़ा है। यह प्रक्रिया इतनी गजब है कि जो किसी में भी रचनात्मकता को जन्म देते हैं। सपनों से बहुत कुछ उधार लिया जा सकता है।
....जारी है, अगली पोस्ट में सपना का ज़िक्र!
रोज़ कोशिश करती हूँ कि अपने दिमाग को समेट लूँ। उसमें इतनी लहरे हैं कि उनकी लगाम मेरे वश से बाहर है। जितनी कोशिश करूँ, उन्हें संभाल नहीं पाती। आज उस सपने का ज़िक्र रह रह कर मन में आ रहा है जो तीन साल पहले देखा था। जब मेरे शरीर का ऊपरी भाग यकायक विशाल हो गया था और मेरे सीधे हाथ पर पृथ्वी अपनी चरम रफ़्तार में घूम रही थी। इस सपने ने मुझे कुछ ऐसा चौंकया कि आजतक इसे अपनी छवि तिजोरी में लिए रहती हूँ। मैंने कभी इसे तालाबंद करने की कोशिश नहीं की। चाहती हूँ कि इसे भाग निकलने का मौक़ा मिले। पर यह छवि वाला सपना कभी फरार नहीं होता। आज भी फेविकोल के मजबूत जोड़ के साथ मुझसे चिपका हुआ है। स्कूल के समय से ही मेरी याद में जंग लगा हुआ है। कभी कोई चीज़ याद ही नहीं हुई न रट्टा लगा पाई। लेकिन इस तरह के सपने मुझे रटे हुए हैं।
अगर वास्तव में भोलेनाथ मेरे सिर के ऊपर वाले आसमान में रहते हैं तब तो मेरा एक दिल वाला शुक्रिया कि क्या गज़ब किए हो महादेव! इतने सपने मेरे माथे में भरे हैं। मुझे शुरुआत में कुफ्त होती थी। लेकिन अब इनके प्रति दिलचस्पी और जिज्ञासा होती है। इनमें फैले रंग और बनावट इतने जुदा होते हैं कि मुझे इस बात की हैरानी होती है कि हमारा दिमाग अपनी ही तरह का शानदार वर्कशॉप है।
सपने सबसे ज़्यादा गुंजल और बिखरे हुए होते हैं। बेताल की तरह पीठ पर सवार। इनकी अपनी एक भाषा होती है। कुछ चेहरों और पल पल में बदलते घटनाक्रम कुछ संकेत देते हैं। ये संकेत आसपास की हमारी दुनिया से जुड़े होते हैं। इनको समझना अपने वास्तविक जीवन की जटिलताओं को सुलझाने जैसा है। कम-से-कम उनके नजदीक तो पहुँचना ही है।
सपने बेवजह की उपज नहीं होते। वे कहीं न कहीं और किसी भी तरह से हमसे ही जुड़े होते हैं। उनकी जगह बेशक दिमागी दुनिया होती है पर वे उस तरह का साया हैं जो काफी विशाल है। वे छलिया होते हैं। छलते हुए भी सही की ओर इशारा करते हैं। वे लोगों और परिस्थितियों के ठगने के घटनाक्रम का हल्का ब्योरा पेश करने की कोशिश करते हैं। वे जो नहीं कहा जाता, उसे सामने लाने की कोशिश करते हैं। वे यह भी साबित करते हैं कि आपका कुछ हिस्सा डिवाइन है। रोबोट को सपने नहीं आते। कम्प्यूटर सपने नहीं देख सकता। वो तो आप और मैं ही देख सकते हैं।
कुछ सपने एक ही स्लाइड में आते हैं। कुछ सपनों की बनावट एक के अंदर दूसरे सपने की संरचना में दिखती है। यह मेरा अनुभव है। हो सकता है किसी और को दूसरी तरह के सपने आते हों। सपनों का अंतराल या उनकी उम्र का मतलब सीधे तौर पर जागने के बाद याद में महज़ कुछ छवियों के रह जाने से जुड़ा है। यह प्रक्रिया इतनी गजब है कि जो किसी में भी रचनात्मकता को जन्म देते हैं। सपनों से बहुत कुछ उधार लिया जा सकता है।
....जारी है, अगली पोस्ट में सपना का ज़िक्र!


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