सच्ची बोलूँ मुझे खुद नहीं पता था कि मुझे क्या बनना था। लेकिन आज मुझे पता है कि मुझे क्या बन जाना चाहिए। मैं आज भी आसमान में ताकना बंद नहीं करती। देखती हूँ। जब तक गर्दन में दर्द नहीं हो जाता। निहारती हूँ जब तक कि आँखें नहीं थक जाती। मुझे यह भी पता है कि एक रोज़ मेरा वक़्त खत्म हो जाएगा। तब शायद आसमान को घूरने का मौका नहीं मिलेगा।
स्कूल में पढ़ाई लिखाई और बेहतरीन अदब के लिए दाखिला दिलवाया गया था। इस समय भी यह तय नहीं किया था कि क्या बनना है। बस क्योंकि सभी अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं और क्योंकि सभी बेटियाँ पढ़ रही हैं इसलिए मैंने भी बस्ता उठाना और कलम घिसना शुरू कर दिया। याद नहीं आता कि सबसे जबर्दस्त रट्टा किसका लगाया था। शायद 13 या 14 के पहाड़े का। याद ही नहीं होता था। लेकिन जब याद हो गया तब भी यह तय नहीं किया था कि क्या बनना है। घर के लोगों से कोई बाहर वाला पूछता कि क्या बनाओगे तब हैरत कि बात थी उनके पास भी मेरे लिए कोई कल्पना नहीं थी क्या बनाएँगे। यही जवाब होता- 'जो भी बनना चाहे बन जाएगी। अभी छोटी है। इसकी खुशी में हमारी खुशी है।'
स्कूल में टीचर ने भी कभी अपने पाठ्यक्रम से इतर इस तरह के बीज की रोपाई दिमाग में नहीं की थी। हाँ, यह बात जरूर थी कि अंग्रेज़ी और हिन्दी में यह निबंध लिखवा लिया जाता था कि बड़े होकर क्या बनना है। उस टाइम वही चमकीले किरदार चुन लिए जाते थे कि जो आसपास ज़्यादा चमकते थे।
बात यही पर खत्म हो जाती तो क्या बात थी। हुई नहीं। कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्रश्नपत्र में यह सवाल खासतौर से पूछा गया था कि क्या बनोग। मुझे याद है कि खराब अंग्रेज़ी के बाद भी ज़्यादा नंबर मिले थे। हुआ यह था कि मुझे समझ नहीं आया था कि क्या और किसके जैसे बनना है सो मेरे हरदम पास रहने वाला चरित्र माँ का था इसलिए मैंने अपनी माँ का रूटीन खूब अच्छे से लिख दिया। और अंत में यह लिखा कि फिलहाल मैं मम्मी जैसी बनूँगी और कुछ अभी सोचा नहीं।
मैं खुश थी कि चलो कहीं से तो शुरुआत हुई। इस बहाने नंबर भी अच्छे आ गए। हिन्दी माध्यम के पढ़ाकुओं से पूछिए कि अंग्रेज़ी में ज़्यादा नंबर लाने का सुख क्या होता है। इसमें मजेदार यह भी था कि कक्षा में मुझे कई लोगों के बारे में पता चला कि वह क्या बनना चाहते हैं। एक लड़के ने लिखा था कि वह अमिताभ बच्चन बनना चाहता है। यह मजेदार था मेरे लिए। ऐसे ही कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा था। लेकिन नंबर तो मेरे ही ज़्यादा आए थे।
किसी रोज़ एक दूसरे भाषा के सर कक्षा में पढ़ा रहे थे। उन्हों ने अचानक सबसे पूछ लिया कि आगे क्या करना है या बनना है। मैं फिर से सफ़ेद थी। मैंने कहा सर अभी सोचा ही नहीं। तब उन्हों ने कहा- 'धिक्कार है तुम पर! अभी तक इतना भी नहीं सोच पाई तो क्या करोगी आगे!' बात में दम था। मैंने अब जबर्दस्ती सोचना शुरू किया कि क्या बनना है। बहुत कुछ सोचा और खोजा। कई लिबास अपने लिए तय किए। पर मनभावन कुछ भी नहीं लगा।
आज जहां पर हूँ वहाँ पर रुकी हुई हूँ तो लगता है कि शायद यही है जो बनना है। लेकिन कभी कभी अटक सी जाती हूँ कि यह भी नहीं तो क्या। इसलिए आज जब मैं कुछ बच्चों से मिलती हूँ तब मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि उन्हें पता है कि उन्हें क्या बनना है। यह मेरी विडम्बना है या बिखराव कि मुझे नहीं पता कि वास्तव में बनना क्या है। ...लेकिन मुझे इंतज़ार है उस रोज़ और पवित्र मुहरत का जब मुझे पता चलेगा कि मैं क्या बनूँगी!
(मेरी एक दोस्त, जब मिलती है तो ऐसी ही फिलोसफ़ीना बात करती है )
स्कूल में पढ़ाई लिखाई और बेहतरीन अदब के लिए दाखिला दिलवाया गया था। इस समय भी यह तय नहीं किया था कि क्या बनना है। बस क्योंकि सभी अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं और क्योंकि सभी बेटियाँ पढ़ रही हैं इसलिए मैंने भी बस्ता उठाना और कलम घिसना शुरू कर दिया। याद नहीं आता कि सबसे जबर्दस्त रट्टा किसका लगाया था। शायद 13 या 14 के पहाड़े का। याद ही नहीं होता था। लेकिन जब याद हो गया तब भी यह तय नहीं किया था कि क्या बनना है। घर के लोगों से कोई बाहर वाला पूछता कि क्या बनाओगे तब हैरत कि बात थी उनके पास भी मेरे लिए कोई कल्पना नहीं थी क्या बनाएँगे। यही जवाब होता- 'जो भी बनना चाहे बन जाएगी। अभी छोटी है। इसकी खुशी में हमारी खुशी है।'
स्कूल में टीचर ने भी कभी अपने पाठ्यक्रम से इतर इस तरह के बीज की रोपाई दिमाग में नहीं की थी। हाँ, यह बात जरूर थी कि अंग्रेज़ी और हिन्दी में यह निबंध लिखवा लिया जाता था कि बड़े होकर क्या बनना है। उस टाइम वही चमकीले किरदार चुन लिए जाते थे कि जो आसपास ज़्यादा चमकते थे।
बात यही पर खत्म हो जाती तो क्या बात थी। हुई नहीं। कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्रश्नपत्र में यह सवाल खासतौर से पूछा गया था कि क्या बनोग। मुझे याद है कि खराब अंग्रेज़ी के बाद भी ज़्यादा नंबर मिले थे। हुआ यह था कि मुझे समझ नहीं आया था कि क्या और किसके जैसे बनना है सो मेरे हरदम पास रहने वाला चरित्र माँ का था इसलिए मैंने अपनी माँ का रूटीन खूब अच्छे से लिख दिया। और अंत में यह लिखा कि फिलहाल मैं मम्मी जैसी बनूँगी और कुछ अभी सोचा नहीं।
मैं खुश थी कि चलो कहीं से तो शुरुआत हुई। इस बहाने नंबर भी अच्छे आ गए। हिन्दी माध्यम के पढ़ाकुओं से पूछिए कि अंग्रेज़ी में ज़्यादा नंबर लाने का सुख क्या होता है। इसमें मजेदार यह भी था कि कक्षा में मुझे कई लोगों के बारे में पता चला कि वह क्या बनना चाहते हैं। एक लड़के ने लिखा था कि वह अमिताभ बच्चन बनना चाहता है। यह मजेदार था मेरे लिए। ऐसे ही कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा था। लेकिन नंबर तो मेरे ही ज़्यादा आए थे।
किसी रोज़ एक दूसरे भाषा के सर कक्षा में पढ़ा रहे थे। उन्हों ने अचानक सबसे पूछ लिया कि आगे क्या करना है या बनना है। मैं फिर से सफ़ेद थी। मैंने कहा सर अभी सोचा ही नहीं। तब उन्हों ने कहा- 'धिक्कार है तुम पर! अभी तक इतना भी नहीं सोच पाई तो क्या करोगी आगे!' बात में दम था। मैंने अब जबर्दस्ती सोचना शुरू किया कि क्या बनना है। बहुत कुछ सोचा और खोजा। कई लिबास अपने लिए तय किए। पर मनभावन कुछ भी नहीं लगा।
आज जहां पर हूँ वहाँ पर रुकी हुई हूँ तो लगता है कि शायद यही है जो बनना है। लेकिन कभी कभी अटक सी जाती हूँ कि यह भी नहीं तो क्या। इसलिए आज जब मैं कुछ बच्चों से मिलती हूँ तब मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि उन्हें पता है कि उन्हें क्या बनना है। यह मेरी विडम्बना है या बिखराव कि मुझे नहीं पता कि वास्तव में बनना क्या है। ...लेकिन मुझे इंतज़ार है उस रोज़ और पवित्र मुहरत का जब मुझे पता चलेगा कि मैं क्या बनूँगी!
(मेरी एक दोस्त, जब मिलती है तो ऐसी ही फिलोसफ़ीना बात करती है )
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