Sunday, 8 September 2019

'अ' से मतलब अभी जागो

आसपास की दुनिया काफी बड़ी हो गई है. हाँ, मैं कोई गणितीय माप लेकर नहीं घूम रही, बस जो महसूस कर रही हूँ वह लिख रही हूँ. हम कई दुनियाओं में जीते हैं. जो दुनिया मुझे बेहद पसंद है वह मेरे अंदर की दुनिया है. कितना कुछ तिलिस्म छुपा कर हम जीते हैं. एक औरत के मन का तिलिस्म तो जानती हूँ पर किसी पुरुष के मन का तिलिस्म क्या होता है, अभी तक नहीं जानती. पिता के मन का तिलिस्म अक्सर चिंताओं में पाती हूँ. आज के समय में किसी बेटी का पिता होना नाज़ की बात तो है ही और बहादुरी की भी. 

कई बार मैं अपनी बातों के पास पैदल चलकर आती हूँ. पैदल चलना मतलब उर्ज़ा लगाकर आना. जब भी कोई किताब पढ़ने के लिए खोलती हूँ और जब मुझे यह पता चलता है कि वह किसी औरत ने लिखी है तब महसूस करती हूँ कि मन में कुछ घुल रहा है. एक रिश्ता पनप जाता है. पुरुष लेखनी को पढ़ने की आदत स्कूल वालों ने डाल दी वरना मैंने कभी कहा ही नहीं था कि मुझे पुरुष की लेखनी पढ़नी है. कभी कभी सोचती हूँ कि अगर स्कूल के बारह सालों में पाठ्यक्रम का 50 प्रतिशत हिस्सा भी सिर्फ औरत के द्वारा लिखा हुआ पढ़ा होता तो मेरा दिमाग की मिट्टी का आज बना होता. कुछ तो फर्क होता उया नहीं? शायद होता!  

बचपन में तो कहानीकारा माएं हुआ करती हैं. फिर आदमी कब शिक्षा में अपनी जुबान हमारे सामने पटक देता है? कब पुरुष हाथ में कलम थामकर हमारी जीभ और दिमाग में लिखने लगता है, मालूम ही नहीं चलता! यह सब बहुत धीमा होता है और पता भी नही चलता. ठीक इसके विपरीत अगर पुरुष बच्चों को महिलाओं के हाथो से लिखे लेख और क़िताबें पढाई जाती तब क्या वे आज की तरह ही इन्सान होते जो बात बात पर माँ-बहन के अंगों से जुड़ी गालियाँ देते हैं? ये सभी सवाल परेशान करने वाले नहीं हैं भी और नहीं भी. 

आज  विश्व साक्षरता दिवस है. मुझे बचपन की वे सभी किताबेंयाद आ रही हैं जिनमें अ से अनार से लेकरज्ञ तक के अक्षर लिखे होते थे.बढ़ती हुई क्लासों में कमला को घर चलने के लिए कहने वाला एक भाई होता था. शिक्षा मतलब लोगों के व्यवहार में अच्छे परिवर्तन लाने का साधन. लेकिन मैंने इन अच्छे परिवर्तनों कब लोगों के व्यवहार में देखा हो, याद ही नहीं आता. जितना पढ़ा लिखा, उतना घमंड. जितनी पढ़ी लिखी उतना घमंड. जितने पढ़े लिखे उतने ही फासले, ऊँचे और नीचे वाले. यह सच है. शब्द कमाल करते हैं. उनमें पूरी दुनिया बदल देने की ताक़त है. ठीक ऐसे ही गणित के नंबर के साथ भी है. सूत्रों में बंधे नंबर दुनिया के बारे में कितने राज खोल देते हैं. ठीक ऐसे ही पढाई लिखाई बहुत बड़ा फर्क ले आने में सक्षम है. 



लेकिन आजकल की पढ़ाई-लिखाई आखिर है क्या? क्या है आज पढ़ने लिखने का मतलब? दिमाग पर ज़ोर डालिए तो कितनी निराशा सी मिलती है महसूस करने को. यह नहीं कह रही कि स्थिति बेहद ख़राब है पर कह यह भी तो नहीं रही कि स्थिति ख़राब नहीं है. शब्दों का फेर है. मुर्खता और हिंसा इतनी हावी है कि इसके रोज़ नए कीर्तिमान खड़े किए जा रहे हैं. सोचिए, जरा महसूस कीजिए की देश का इतना संपन्न कानून है फिर भी लोग लिंच कर के मार दिए जा रहे हैं. भीड़ इकठ्ठा होती है. उनके दिमाग में यह भर दिया जाता है कि आप मारने वाले की तरफ खड़े हैं और सामने जो व्यक्ति दिख रहा है उसे जान से मारना है क्योंकि वह दलित है या मुस्लिम है. कितना डरावना है यह सब. सोच कर रूह कांप जाती है. आप अपने आप को उस अकेले व्यक्ति के स्थान पर रखकर सोचिए, आप डर से सदमे में आ जाएंगे. यही बात मैं आपको बतलाना चाह रही हूँ कि हमने सोचना बंद कर दिया है. हमने दूसरों के दर्द और चोट को सहलाना और महसूस करना बंद कर दिया है. अगर कोई शिक्षा इन ख़ूबियों का क़त्ल करती है तो वह शिक्षा वास्तव में शिक्षा नहीं है. 

कुछ लोगों का मकान इतना बड़ा है कि उसकी ऊंचाई देखने पर गरदन में मोच आ जाती है वहीं कुछ लोग ऐसे हैं जो सड़ते हुए नाले के करीब या फिर कूड़े के ढेरों पर रहते हैं. क्या यह शिक्षा का काम नहीं कि वह यह सब बताए कि असमानता कितनी भयानक चीज है और यह कितनी तेज़ी से बढ़ रही है. जिस देश में हजारों मंदिर है उसी देश में हमारे विचार और मतभेद एक मंदिर पर आकर पिछले कई सालों से दम तोड़ रहे हैं. क्या हम इस ज़मीन में एक मंदिर निर्माण के लिए ही पैदा हुए हैं? मुझे यह सवाल परेशान करता है. मैं यह सोचती हूँ कि हम यहाँ जीने और एक दूसरे के साथ कुछ समय बिताने आये हैं. अगर इससे बढ़कर आगे जाएं तब इस धरती को जानने के लिए अपनी है. अपनी हैरानी को एक जगह देने आये हैं. अगर कहीं दुःख दर्द है तो अपने आप को मारने के अलावा उनके दर्द को बांटने आये हैं. 

शिक्षा की एक कमी के बारे में यह भी है कि हम अपने आसपास और उसके जीवन को बेहद क्रूरता से मार रहे हैं. किसी कुत्ते को तेज लात मारनी हो या फिर अपनी किसी नदी को गन्दा करना हो. हम हर काम में अव्वल हैं. यह इंसानों की भयानक क्रूरता है. बहुत ही बुरी तरह हम इन चीजो को नज़रन्दाज़ कर रहे हैं. कभी कभी लगता है करियर बनाने का क्या फायदा जब हम आने वाले कुछ ही सालों में इस पृथ्वी को नाश की कगार पर ले जा रहे हैं. कभी कभी ख़ुद ही कुछ न कर पाने का मलाल होता है इसलिए शब्दों से चिल्ला लेती हूँ. 

बैठ कर सोचिए कि मैं और आप किस साक्षरता के शिकार हो रहे हैं? हमें किस तरह की साक्षरता की ज़रूरत है? जल्दी अपने मन को बदलिए. जल्दी. वक़्त बेहद कम है!  



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