Wednesday, 15 April 2020

सोशल-वोशल

जब सब कुछ धुंधला सा हो जाए तब क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, ये बाद की बातें हैं. सबसे पहले अपने दिल-दिमाग का ख़याल रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. इससे हम सब जूझ रहे हैं. हम बहुत खुशकिस्मत हैं कि हम इस बात को सोच रहे हैं. लेकिन याद रखिए कि कई परिवार और लोग ऐसे हैं जिनके पास भोजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. यह सोचकर ही बहुत ख़तरनाक लगता है कि हम इस दौर में ऐसे भूख के दृश्य देख रहे हैं. लोगों को सामूहिक तौर पर बेवकूफी करते हुए देख रहे हैं, यह सोचनीय विषय है. न सिर्फ यह इन लोगों के लिए ख़तरनाक है, बल्कि यह उन आम लोगों के लिए भी ख़तरनाक है जो मामूली सी ज़िंदगी को भी अपना तोहफा मानते हैं. 

यह बहुत बड़ी घटना हमारी आँखों के आगे घट रही हैं और हम सब इसके गवाह बन रहे हैं. यादाश्त का मसला बेहद संगीन होता है. लेकिन यह जानना जरुरी है कि आपको जो याद रहता है वह ही पूरा दृश्य नहीं होता. एक बहुत बड़े दृश्य में आपकी यादाश्त ज़रूरी हिस्सा होती है. हमारे इतिहास के साथ यही दिक्क़त भी है. और भी होंगी लेकिन इन तमाम दिक्कतों के साथ यह भी है कि आप इतिहास जानना बंद नहीं कर सकते. इसलिए आपको करना यह है कि अपने दृश्य को जितना अधिक सच से भर सकते हैं, भर दीजिए. मुझे लगता है सच से भर देना ही सब कुछ नहीं है. सच के साथ मानवता को ऊपर रखना होगा. kindness या फिर compassion को दिल और दिमाग में कूट कूटकर भर देना होगा. तब कहीं जाकर हमारा दृश्य पूरा होने की तरफ़ अग्रसर होगा. प्रेम और स्नेह भी मिला दीजिएगा तो तस्वीर के रंग बेहतर उभर आएंगे. 

लेकिन इसके एवज में अगर आप कुछ इच्छा रखते हैं तब मामला अलग हो सकता है. इस पोस्ट में इसी जूझने को लिखने की कोशिश करती हूँ. मुझे किसी ने कहा- "दिमाग बेहद ख़राब हो रहा है. क्या करें कुछ समझ नहीं आता!" मैंने कहा- "मैं आपको सुन रही हूँ इसका मतलब यह नहीं कि आप अपनी परेशानी को मुझे घड़ा समझकर उड़ेल देंगे! कुछ हद तक तो मुझे ऐतराज नहीं है लेकिन मुझे नहीं लगता कि मुझे आपके गम को अपना समझना चाहिए." उन्हें बुरा लगा और उन्हों ने फोन काट दिया. मेरी उम्र तक आते आते हम सबको खुश रखने वाला खयाल छोड़ने लग जाते हैं. यह बुरा नहीं है. ज़िन्दगी मुझे सिर्फ इसलिए तो नहीं मिली कि मेरे पास लोग आयें और अपना गम मेरे कन्धों पर चिपका कर चले जाएं. मुझे ऐसे लोगों से बहुत कुफ्त होती है जो एक परिपक्व उम्र में भी आकर अपने अच्छे दोस्तों का कंधा तलाशते हैं और जब उनका काम सध जाता है तब ख़ुशी के दिनों में नज़रन्दाज़ कर देते हैं. मैंने ऐसे लोगों से मुँह मोड़ना शुरू कर दिया है. मुझे लगता है मेरी ख़ुद की कहानी ही इतनी पेचीदा है कि मैं उनकी नहीं सुन सकती.

एक रोज़ सुबह जब मैंने नेट ऑन किया तब व्हाट्सएप पर मैसेज की बाढ़ के बीच जो मैसेज मुझे चौंका गया वह एक ऐसे व्यक्ति का था जो बहुत दिनों से अपने ज़िंदगी के तरह तरह के जश्न में मशगुल थे. ऐसा उनके डीपी के बदलने से मालूम चलता था. मुझे उनकी ज़िंदगी की ख़ुशी देखकर सुखद एहसास होता था. मुझे यह लगता था कि मेरी न सही, लोगों की ज़िंदगी में जश्न तो है. यह क्या बुरा है! इस दौरान उन्होंने मुझे कभी भी याद नहीं किया. जिस रोज़ का ज़िक्र कर रही हूँ उस रोज़ उन्होंने मुझे अल सुबह याद कर लिया था. मैसेज वास्तव में बहुत दुखद था. मैसेज में मेरे नाम के बाद उनकी माँ के इंतकाल की ख़बर थी. आप सोचिए कि आप सुबह नींद और ख़्वाब की दुनिया से जागकर उठे हैं और आपको सुबह सुबह कोई अपनी ज़िंदगी का बड़ा दुःख साझा कर रहा है. आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? मैं घबरा गई और मैंने घबराहट में नेट ऑफ़ कर फ़ोन रख दिया. मेरे चेहरे पर सन्नाटा सा छा गया था. फटाफट बिस्तर से उठकर अपनी माँ साहेब को खोजा कि वे हैं कहाँ? जब उन्हें देख लिया तब वे बोलीं- "क्या हुआ है? ये भी कोई वक़्त हैं उठने का?" मैंने अपना मासूम सा चेहरा बनाया और ब्रश करने चल दी. ब्रश करने के बाद बहुत बेहतरीन तरीके से हाथ पैर धोकर चाय बनाई और अपने दिल को सांत्वना देने लगी. मुझे क्योंकर किसी दूसरे के गम में शरीक हो जाना चाहिए, वह भी फ़ोन से?

 
मैंने लगभग 12 बजे उन्हें एक सांत्वना मैसेज भेजा. लेकिन चिंता ऐसी अंदर समा गई कि मुझे लगा फिलोसफी बाक़ी रह गई है इसलिए मौत और ज़िंदगी के बारे में जो भी पंक्तियाँ दिमाग में आईं, वह उन्हें लिखकर भेज दीं. बाद में उनका जवाब शुक्रिया के तौर पर आया. हालाँकि मुझे इस बात का ग़ुस्सा नहीं था लेकिन मुझे यह बहुत अजीब लगा कि लोग अपने दुःख लेकर मुझसे चर्चा क्यों करना चाहते हैं? यह तो सिर्फ एक नजीर है. ऐसे कई लोग हैं जिनको लगता है मेरे पास जादू की छड़ी है और मैं उनके गम कम कर सकती हूँ. लेकिन जब से मैंने रेंगता हुआ ही सही 'न' कहना शुरू किया है तब से मेरे दोस्त कम हो रहे हैं. यकीन मानिए आपके आसपास लोग जोंक की तरह भी हो सकते हैं. इसमें बहुत उर्ज़ा जाती है. लेकिन अगर एक बार आप नज़रन्दाज़ करना सीख जाएं तब आपके जीवन में सुकून बढ़ने लगेगा. मैं सीख रही हूँ. 

इस प्रक्रिया में मुझे कभी कभी अपने में स्वार्थी होने की भावना विकसित होती महसूस होती है. लेकिन इसमें की खामी नहीं, ऐसा मैं मान कर चल रही हूँ. जब आप अपने बचे हुए दोस्तों से यह सब साझा करते हैं तब वे आपको अजीब सी सुई चुभोते हैं. वे कहते हैं- "हम्म! बात तो ठीक है पर सोशल होना भी ज़रूरी है. लोगों से न घुले मिलें तो नुकसान होता है." ओह! यह सुनकर एक चिंता तुरंत घुसने लगती है. क्या मैं लोगों से कटकर ठीक कर रही हूँ? लगातार इस पर सोचने के बाद मुझे अपने कटने वाले स्वभाव में फिर से कोई खामी नजर नहीं आती. मैं उन लोगों से कट रही हूँ जो मुझे सिर्फ ख़ास वजहों और स्थलों पर याद करते हैं. मेरे दोस्तों की फेहरिश्त लम्बी नहीं है. इसलिए वे सब अगर कटते भी हैं तो मुझे उन पर सोचने की बजाय नए दोस्त बनाने के बारे में सोचना चाहिए. मरी हुई लकीर को पीटने से फायदा नहीं होता. नए लोगों से मिलने पर कुछ नया तो हासिल होगा. 

वास्तव में एक बात यह भी है कि कभी कभी जटिलता बहुत दुःख देती है. जो सभी में प्रिय है, वह बन जाना मंजूर नहीं. मुझे अपने आप का प्रिय बनने का मौका कम मिला है. इस एकांत में लोगों से बात करने की बजाय छत को घूरना बहुत बढ़िया लगता है. उन लेखकों को पढ़ना भी बहुत बढ़िया लगता है जो अपने शब्द आपसे बात करने में उड़ेल देते हैं. उनकी नितांत नयी कहानी, आपके लिए है न कि किसी और के लिए. उनके लिखे दुःख कितने सादे से होते हैं. कभी बहुत सींचे हुए से. अगर आप उनके हमदर्द बनते हो तो आपको सुकून मिलता है. आपको यह एहसास है कि आप किसी के दुःख में साझी हुए लेकिन, लेखक एक ऐसा व्यक्ति भी है जो अपनी ख़ुशी में भी आपको शामिल करता है. वो यह नहीं देखता कि आप कैसे कपड़े पहनकर उनके जन्मदिन की पार्टी में आए, आपकी त्वचा का रंग क्या है, आपका धर्म और आदत क्या है, आपका मजहब है भी या आप गैर मजहबी हैं. और तो और अगर उसकी किताब आप न भी पढ़ें तो आपके स्वाद की कद्र करता है न कि आपसे नाराज़गी रखता है. 

इसलिए अगर अब कोई मुझे कहेगा कि मैं सोशल नहीं हूँ, तब मैं कहूँगी- "मैं आपसे ज़्यादा सोशल हूँ!" लेकिन मेरी मदद और compassion वाली बात का क्या? हम्म! यह करना चाहिए. इसे सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि आप अपने ही इंसान बने रहने में सहयोग कर रहे हैं. आप उन लोगों की मदद करें जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रुरत है. जैसे हमारी स्टूडेंट्स बिरादरी. इस बिरादरी को अफवाह फैला कर टारगेट किया जा रहा है और एक पूरी पौध को जहर से सींचा जा रहा है. आपको अगर वे कभी चर्चा के लिए याद करें तब उनके आगे सही तथ्य रख दें. सही ग़लत किये बगैर. बाक़ी उन पर छोड़ दें कि उनका क्या सोचना है! इसके अलावा हमारे आसपास के लोग जिनसे हम रूबरू नहीं हैं. आप ख़ुद सोचिये, आप ख़ुद खाकर सो लिए और बगल में कोई भूख से बिलख रहा है तो सो पाएंगे? नहीं न! तो कीजिए उनकी मदद लेकिन ख़ुद को मत छोड़िये इन मामलों में भी. याद रखिए आपके सही होने का तराजू ख़ुद आपके पास भी है. ग़लत बाट मत रख लेना. वरना नींद नहीं आएगी.

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फोटो: गूगल से        


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