प्रिय लुसीलियस
तुम पूछते हो कि सबसे अधिक किस चीज़ से बचना चाहिए? मैं कहूँगा, भीड़ से। अभी तुम इतने सुरक्षित नहीं हुए हो कि अपने आपको भीड़ में शामिल कर सको।
मैं इस संदर्भ में अपनी कमजोरी खुले रूप से स्वीकार करता हूँ। जब भी मैं बाहर जाता हूँ, कभी भी उसी चरित्र के साथ वापस नहीं लौटता जिसके साथ गया था। हमेशा ऐसा कुछ फिर से उद्वेलित हो जाता है जिसे मैं पहले शांत कर चुका था, कुछ ऐसा भी जिससे छुटकारा पा लिया था, पर वह फिर से लौट आती है। जैसे लंबे समय तक बीमारी से उबर रहे रोगी को बाहर ले जाने पर उसकी हालत बिगड़ सकती है, वैसा ही हमारे साथ भी होता है। हमारा मन एक लंबी बीमारी से स्वस्थ हो रहा है, ऐसे में लोगों की भीड़ का (से) संपर्क हमारे लिए हानिकारक है। हर व्यक्ति किसी न किसी दोष को हमारे भीतर बढ़ावा देता है, हमें कोई अवगुण सिखा देता है या बिना हमारे जाने हमें उससे संक्रमित कर देता है।
निस्संदेह, जितनी बड़ी भीड़ के साथ हम रहते हैं, उतना ही बड़ा खतरा होता है। अच्छे चरित्र के लिए सार्वजनिक मनोरंजन और तमाशों में बैठना सबसे अधिक विनाशकारी है क्योंकि वहाँ दृश्य का आनंद, अवगुणों को अधिक आसानी से हमारे भीतर प्रवेश करा देता है। तुम सोचोगे कि मेरा क्या मतलब है? क्या मैं वहाँ से लौटकर अधिक लालची, अधिक सत्ता-लोभी या अधिक भोग-विलासी बन जाता हूँ? इससे भी बुरा! मैं अधिक क्रूर और अमानवीय बन जाता हूँ, केवल इसलिए कि मैं इंसानों के बीच रहा हूँ।
संयोग से मैं एक दिन दोपहर के प्रदर्शन में पहुँच गया। मुझे आशा थी कि वहाँ कुछ मनोरंजन, बुद्धिमत्ता या विश्राम मिलेगा जिससे लोगों की आँखों को रक्तपात देखने से थोड़ी राहत मिले। पर हुआ इसका बिल्कुल उलटा। पहले जो युद्ध हुए थे, वे तो तुलना में दयालु प्रतीत हुए। अब खेल-तमाशा समाप्त हो चुका था और केवल निर्मम हत्या शेष थी। लड़ने वालों को कोई सुरक्षा-कवच नहीं दिया जाता था। उनका शरीर पूरी तरह खुला रहता था इसलिए कोई भी वार व्यर्थ नहीं जाता था। लोगों को यह कार्यक्रम साधारण ग्लैडिएटर युद्धों से अधिक पसंद था। और क्यों न हो? न कोई हेलमेट, न कोई ढाल जो तलवार को रोक सके। रक्षा की क्या आवश्यकता? युद्ध-कौशल की क्या आवश्यकता? ये सब तो केवल मृत्यु को देर से आने देते हैं। सुबह मनुष्यों को शेरों और भालुओं के सामने फेंका जाता है...। दोपहर में उन्हें दर्शकों के सामने फेंका जाता है। जो मारते हैं, उन्हें स्वयं दूसरे हत्यारों के सामने मरने के लिए भेज दिया जाता है। विजेता को भी अगली हत्या के लिए रोक लिया जाता है। अखाड़े से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है — मृत्यु। तलवार और अग्नि ही उस समय का व्यवसाय बन जाते हैं। और यह सब तब भी चलता रहता है जब अखाड़ा लगभग खाली होता है।
(कोई कह प्रश्न करता है) "लेकिन उसने डकैती की थी! उसने किसी की हत्या की थी!" तो क्या? यदि वह हत्यारा था तो शायद वह इस दंड का पात्र था। लेकिन तुमने क्या अपराध किया है कि तुम्हें यह सब देखने का दंड मिले?
(लोग चिल्लाते हैं) "उसे मारो! उसे कोड़े लगाओ! उसे जला दो! वह तलवार पर झपटने में इतना डर क्यों रहा है? वह साहसपूर्वक मर क्यों नहीं जाता? उसे कोड़ों से युद्ध में धकेलो! उन्हें खुली छाती के साथ एक-दूसरे के प्रहार सहने दो!" और जब प्रदर्शन में थोड़ी देर का विराम होता है तो घोषणा होती है, "तब तक कुछ लोगों के गले काट दिए जाएँ ताकि मनोरंजन चलता रहे!" क्या तुम यह भी नहीं समझते कि बुरे उदाहरण केवल देखने वालों को ही नहीं, उन्हें प्रस्तुत करने वालों को भी भ्रष्ट करते हैं? देवताओं का धन्यवाद करो कि जिसे तुम क्रूरता सिखा रहे हो, वह उसे सीखने में सक्षम नहीं है!
युवा मन, जो अभी सत्य और सदाचार पर दृढ़ नहीं हुआ है, उसे भीड़ से दूर रखना चाहिए। बहुमत का अनुसरण करना बहुत आसान है। यहाँ तक कि सुकरात (Socrates), केटो (Cato) और लैलियस (Laelius) जैसे महान व्यक्तियों का चरित्र भी ऐसी भीड़ के प्रभाव से डगमगा सकता था जो उनसे बिल्कुल भिन्न थी। तो फिर हम जो अभी अपने भीतर सामंजस्य स्थापित करना ही शुरू कर रहे हैं, उन दोषों के आक्रमण का सामना कैसे कर सकते हैं जो इतनी बड़ी सेना लेकर आते हैं? विलासिता या लालच का केवल एक उदाहरण भी बहुत हानि पहुँचाता है। एक विलासी साथी धीरे-धीरे हमारे साहस और दृढ़ता को कम कर देता है। एक धनी पड़ोसी हमारी इच्छाओं को भड़का देता है। एक द्वेषपूर्ण मित्र सबसे सरल और निष्कपट स्वभाव को भी अपने विष से दूषित कर देता है। तो सोचो, जब पूरी जनता ही किसी व्यक्ति के चरित्र पर आक्रमण करे, तब क्या होगा? तुम्हें या तो उनका अनुकरण करना पड़ेगा या उनसे घृणा करनी पड़ेगी।
दोनों ही मार्गों से बचना चाहिए। बुरों की नकल मत करो क्योंकि वे बहुत हैं और लोगों से घृणा भी मत करो क्योंकि वे तुमसे भिन्न हैं। जितना संभव हो, अपने भीतर लौट जाओ। उन लोगों के साथ समय बिताओ जो तुम्हें बेहतर बनाएँ। और उनका स्वागत करो जिन्हें तुम बेहतर बना सकते हो। यह प्रभाव पारस्परिक होता है क्योंकि लोग सिखाते हुए भी सीखते हैं।
अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की अहंकारी इच्छा तुम्हें भीड़ के बीच भाषण देने या वाद-विवाद करने के लिए आकर्षित न करे। यदि तुम्हारे पास ऐसा ज्ञान होता जो इस भीड़ के लिए उपयुक्त होता तो मैं तुम्हें ऐसा करने को कहता। परंतु वास्तविकता यह है कि वहाँ कोई भी तुम्हें समझने योग्य नहीं है। शायद कोई एक व्यक्ति मिल जाए और उसे भी पहले शिक्षित करना पड़ेगा ताकि वह तुम्हें समझ सके।
(तुम पूछ सकते हो) "फिर मैंने यह सब किसके लिए सीखा?" चिंता मत करो। यदि तुमने यह सब अपने लिए सीखा है तो तुम्हारा समय व्यर्थ नहीं गया। और ताकि आज का मेरा अध्ययन केवल मेरे लिए न रहे, मैं तुम्हारे साथ तीन उत्कृष्ट कथन साझा करता हूँ।
डेमोक्रिटस (Democritus) कहता है, "मेरे लिए एक व्यक्ति एक राष्ट्र के समान है और एक राष्ट्र एक व्यक्ति के समान।"
जब एक अज्ञात लेखक से पूछा गया कि कला के ऐसे काम में आपने इतनी मेहनत या प्रयास क्यों किया है जिसे बहुत काम लोग देख पाएँगे तब उन्होंने बढ़िया बात कही, "कुछ लोग पर्याप्त हैं, एक व्यक्ति पर्याप्त है और कभी-कभी कोई भी न हो... तो भी पर्याप्त है।"
तीसरा कथन विशेष रूप से सुंदर है। एपीक्यूरस (Epicurus) ने अपने एक दार्शनिक मित्र को लिखा, "मैं यह बहुतों के लिए नहीं, तुम्हारे लिए लिखता हूँ क्योंकि तुम और मैं एक-दूसरे के लिए पर्याप्त श्रोता हैं।"
प्रिय लुसीलियस, इन वचनों को अपने मन में रखो ताकि तुम बहुसंख्यकों की प्रशंसा से मिलने वाले सुख को तुच्छ समझो। बहुत-से लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं पर क्या इससे तुम्हें स्वयं पर संतोष करने का कारण मिल जाता है, यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे बहुत-से लोग आसानी से समझ सकते हैं? अपने श्रेष्ठ गुणों को बाहर नहीं, भीतर की ओर निर्देशित करो।
अभी के लिए विदा
सेनेका

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