मैं
तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूँ कि तुम अपने अध्ययन में दृढ़ बने हुए हो
तथा अन्य सभी बातों को एक ओर रखकर प्रतिदिन स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने का प्रयास
करते हो। मैं केवल तुम्हें ऐसा करते रहने की सलाह ही नहीं देता
बल्कि विनती भी करता हूँ कि ऐसा करते रहो। लेकिन मैं
तुम्हें सावधान करता हूँ कि उन लोगों की तरह व्यवहार मत करना जो सुधार की अपेक्षा
लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। ऐसे कार्यों से बचो जो तुम्हारे कपड़ों या
जीवन-शैली के कारण लोगों में चर्चा का विषय बन जाएँ।
घृणा उत्पन्न करने वाले कपड़े, बिखरे हुए बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी-मूँछ, चाँदी के बर्तनों का दिखावटी तिरस्कार, धरती पर सोना, अथवा आत्म-प्रदर्शन के ऐसे अन्य विकृत रूपों से बचना चाहिए।
दर्शन का नाम ही, चाहे वह
कितनी ही शांति से क्यों न अपनाया जाए, लोगों के उपहास का पर्याप्त कारण बन जाता है।
फिर यदि हम स्वयं को समाज की परंपराओं से अलग दिखाने लगें, तो क्या होगा? भीतर से हमें हर दृष्टि से भिन्न होना चाहिए
पर बाहरी रूप से हमें समाज के अनुरूप रहना चाहिए।
The Thinker by Auguste Rodin, 1904
न तो बहुत सुंदर कपड़े पहनने चाहिए और न ही अत्यंत मैले।
सोने से जड़ी हुई चाँदी की थालियों की आवश्यकता नहीं है पर हमें यह भी नहीं समझना चाहिए कि सोना-चाँदी का अभाव ही
सादगी का प्रमाण है। हमें ऐसा जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए जो सामान्य लोगों से
अच्छा हो पर उनसे
बिल्कुल विपरीत नहीं। अन्यथा हम उन्हीं लोगों को डरा देंगे और अपने से दूर कर
देंगे जिन्हें हम सुधारना चाहते हैं। नतीजा यह होगा कि वे हमारी किसी भी बात का
अनुसरण नहीं करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें डर होगा कि कहीं उन्हें हर बात में हमारा
अनुकरण न करना पड़े।
दर्शन का पहला काम सभी मनुष्यों में एक-दूसरे के के प्रति भाईचारा उत्पन्न करना है। इसे दूसरे शब्दों में सहानुभूति और सामाजिकता कहा जा सकता है। यदि हम स्वयं को दूसरों से बिल्कुल अलग बना लें तो हम अपने ही उद्देश्य से भटक जाते हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिन साधनों से हम प्रशंसा पाना चाहते हैं, वे हास्यास्पद या घृणित न हों। हमारा आदर्श है —"प्रकृति के अनुसार जीवन जीना।" लेकिन शरीर को कष्ट देना, सहज सौन्दर्य से घृणा करना, जान-बूझकर गंदा रहना, या ऐसा भोजन करना जो केवल साधारण ही नहीं बल्कि अरुचिकर और घिनौना भी हो — यह प्रकृति के विपरीत है।
जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की खोज विलासिता का संकेत है
वैसे ही सामान्य और सस्ते भोजन से बचना भी मूर्खता है।
दर्शन सादगीपूर्ण जीवन की माँग करता है, तपस्या या आत्म-यातना की नहीं। मनुष्य एक साथ सादा और
स्वच्छ दोनों हो सकता है। यही वह मध्यम मार्ग (Mean) है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। हमारा जीवन एक ज्ञानी पुरुष
के जीवन और सामान्य संसार के जीवन के बीच संतुलित होना चाहिए। लोग उसकी प्रशंसा
करें पर उसे समझ भी सकें।
तुम पूछ सकते हो —"तो क्या हम सामान्य लोगों की तरह ही
रहें?
क्या हमारे और संसार के बीच कोई अंतर न होगा?" हाँ, फर्क
अवश्य होगा और बहुत
बड़ा होगा। लेकिन वह अंतर तभी दिखाई दे जब लोग हमें ध्यान से देखें। यदि वे हमारे
घर आएँ,
तो उन्हें हमारे फर्नीचर या सजावट की नहीं
बल्कि हमारी प्रशंसा करनी चाहिए। वह व्यक्ति महान है जो
मिट्टी के बर्तनों का उपयोग ऐसे करता है मानो वे चाँदी के हों
किन्तु उतना ही महान वह भी है जो चाँदी के बर्तनों का उपयोग
ऐसे करता है मानो वे मिट्टी के हों। धन को सहन न कर पाना अस्थिर मन का लक्षण है।
अब मैं आज की एक और सीख तुम्हारे साथ बाँटना चाहता हूँ।
मैंने हमारे दार्शनिक हेकाटो की रचनाओं में पाया है कि इच्छाओं को सीमित करना भय को भी
समाप्त करने में सहायक होता है। वह कहते हैं, "आशा करना छोड़ दो और तुम भय करना भी छोड़ दोगे।" तुम पूछ सकते हो, "इतनी
भिन्न चीज़ें एक साथ कैसे चल सकती हैं?" प्रिय लूसिलियस, वास्तव में वे उतनी भिन्न नहीं हैं जितनी दिखाई देती हैं।
जैसे एक ही जंजीर कैदी और उसकी रखवाली करने वाले सैनिक दोनों को बाँधती है
वैसे ही आशा और भय भी साथ-साथ चलते हैं। भय, आशा का अनुसरण करता है।
मुझे इसमें आश्चर्य नहीं होता क्योंकि दोनों ही उस मन की
उपज हैं जो अनिश्चितता में जीता है और भविष्य की चिंता में व्याकुल रहता है। इन
दोनों बुराइयों का मुख्य कारण यह है कि हम वर्तमान के अनुसार स्वयं को ढालने के
बजाय अपने विचारों को बहुत दूर भविष्य में भेज देते हैं। इस प्रकार दूरदर्शिता, जो मानव जाति का सबसे महान वरदान है, विकृत हो जाती है।
पशु उन खतरों से बचते हैं जिन्हें वे सामने देखते हैं
और उनसे बच जाने के बाद निश्चिन्त हो जाते हैं। पर हम
मनुष्य भविष्य की संभावनाओं और अतीत की स्मृतियों दोनों से स्वयं को पीड़ित करते
रहते हैं। हमारे अनेक वरदान ही हमारे लिए अभिशाप बन जाते हैं। स्मृति, पुराने भय
और कष्टों को फिर से जीवित कर देती है और दूरदर्शिता आने वाले कष्टों की कल्पना करके हमें पहले ही
दुःखी कर देती है। वास्तव में केवल वर्तमान ही ऐसा है जो किसी मनुष्य को दुःखी
नहीं कर सकता।
अभी के लिए विदा
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