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एकांत एवं दर्शन के संदर्भ में -- (पत्र - 8)
प्रिय लूसीलियस "तो क्या तुम मुझे यह कह रहे हो कि मैं भीड़ से दूर रहूँ, एकांत में चला जाऊँ और अपने निजी विचारों में ही संतुष्ट रहूँ? फि...
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प्रिय लूसीलियस, जैसा तुम कर रहे हो, वैसा ही करते रहो—अपने हित के लिए स्वयं को मुक्त करो। अपने समय को इकट्ठा करो और बचाकर रखो क्योंकि अब तक...
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प्रिय लूसीलियस, तुमने अपने एक 'मित्र' के हाथ मेरे पास एक पत्र भेजा है जैसाकि तुम उसे कहते हो। लेकिन अगले ही वाक्य में तुम मुझे चेताव...
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प्रिय लूसीलियस, जिस प्रकार तुमने आरम्भ किया है उसी प्रकार आगे बढ़ते रहो और जितनी शीघ्र हो सके उतनी प्रगति करो ताकि तुम एक ऐसे मन का अधिक समय...


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