Wednesday, 2 August 2017

हर बार इश्क़ का रंग पक्का नहीं होता (भाग-2)

परिस्थितियों का जमा और घटा यह था कि यह नौजवान जोड़ा कुछ परेशान-सा बैठा हुआ था। दोनों की सांसें मानो कहीं से जान बचाकर भाग रही हों तेज़ी से अंदर-बाहर निकल रही थीं। चेहरे और बगल से पसीना बह रहा था और उनकी बदहवाशी को बयां कर था। इतना तय था कि वे दोनों डरे हुए थे और बुरी तरह परेशान थे। 

पर लोग तो परेशान ही रहते हैं। इसलिए मैंने अधिक ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। लेटे लेटे शाम की बातें याद करने लगी।

रेल के हिचकोलों में रात गहरा रही थी। आधा रास्ता माँ के प्रवचन सुन के कट गया। थोड़ी देर बाद अचानक गाड़ी को सिग्नल न मिलने के कारण वह कुछ समय तक एक स्टेशन पर रुक गई। जगह काफी सुहानी थी और माँ के लिए सुनसान। 

 

अप्रैल का महीना उतरने लगा था। दिन गरमाने लगे थे। मौसम की बेईमानी धीरे-धीरे समझ आने लगी थी। दिन की गुनगुनी धूप रात के लिए कुछ मसमसाहट और चिपचिपाहट उधार छोड़ रही थी। पसीना बदन पर सुखकर कुनकुनाने लगा था और महक बोनस के साथ बाहर निकलने लगी थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि गर्मी का मौसम दस्तक दे चुका था।

इसी माहौल में छुट्टियों की महक के लिए अपने साज़ो-सामान के साथ माँ पीहर और मैं अपने ननिहाल के लिए निकल चुके थे। माँ ने ज़िद्द कर के मुझे सलवार क़मीज़ में कस दिया था। उनका कहना था कि सफ़र दूर का है और ज़माना बहुत खराब है। पर असल बात तो यह थी कि मेरे शरीर ने उम्र के परे जाकर बाहर झांकना शुरू कर दिया था। मैं अब चहकती हुई नहीं बल्कि छलकती हुई मालूम नज़र आती थी। मैं उम्र से ज्यादा बड़ी हो रही थी।  

मैंने भी उनका विरोध नहीं किया मन में खयाल आया ठीक ही कह रही हैं।

पापा फिर नहीं आ पाये। उनका काम इन दिनों ही बढ़ जाता है। पर माँ मुझे अपना ननिहाल दिखाना चाहती थीं। उनका कहना है कि इस समय सरकारी काम बढ़ जाते हैं। नहीं आए तो अच्छा ही है वरना रेल में भी अपनी राजनीति लेकर बैठ जाते। कम से कम इनकी बातों से मुक्ति तो मिलेगी! लेकिन माँ को नहीं पता था कि असल मुक्ति तो पापा को तोहफे में मिली थी।  

पापा ने हमें समय से कुछ पहले ही रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया था और ढेर सारी हिदायतें देते हुए वो किसी न्यूज़ रीडर की तरह मुझे ज़माने भर की खबरें और उनके नतीजे बताते रहे थे। ये मत करना, बाहर मत जाना, ज़्यादा किसी से बात करने की जरूरत नहीं, माँ का ध्यान रखना, रात तक टी. वी. मत देखना(मामा के यहाँ), छुट्टियों का काम पूरा कर लेना... इतनी बातें! उनके कहने पर मन में उस समय बस यही बात फुदक रही थी कि गाड़ी कब चलेगी!

 

मैं अपनी सोलह बरस की उम्र के चश्मे से इस दुनिया को देख रही थी। ऊपर से इतनी सारी हिदायतों से उसमें दरार आ रही थी। मैं घर में भी अक्सर इसी तरह के साये में जीती हूँ। पर ननिहाल के नाम पर मन उछला था। स्टेशन की गहमा-गहमी कितनी अच्छी लग रही थी। कोई नन्ही चिड़िया जिसने अभी अभी अपने घोंसले की सीमा को पार कर दिया हो, जैसी रोमांचित थी मैं। आकाश के जैसे स्टेशन फैला हुआ था। यहाँ हर तरह की दुकान, हर तरह की आवाज़ और हर तरह के चेहरे थे। देखकर मन में खयाल आया, ‘इसे ही दुनिया कहते हैं। यही वो जगह और माहौल जिसे शहर कहा जाता है।

घर की चार दिवारों में सिमटे हुए घर में दुनिया सिर्फ़ घर का सामान और उसमें रह रहे कुछ लोग ही होते हैं। पर यहाँ तो मेरी आँखें चौंधियाँ गई थीं। मैं उस भीड़ को देख रही थी जिसका कोई चेहरा या सूरत नहीं थी। मैं उन आवाज़ों को सोख रही थी जिसे शहर शोर कहता है। मैं उस धूल और धुएँ को सूंघ रही थी जिसे प्रदूषण कहा जाता है।  

चाय की महक हो या अंडे के सिकने की गमक, नाक से लेकर कान तक को चालू रखने के लिए यहाँ सबकुछ था। माँ और पापा अपने घरेलू हिसाब को लेकर जद्दोजहद कर रहे थे। इतनी देर मैंने बाहर का मुआयना लेने की सोची। मुझे अपनी नज़रें सेंकनी थीं। बाद में मुझे इसका ब्यौरा अपने उसे भी तो बताना था। हाँ, मैं उससे कुछ दिन नहीं मिल पाऊँगी पर फोन नाम की चीज़ से उसे अपने संदेशे पहुंचाने का वादा कर के आई थी।  

मैंने पापा से घबराते हुए 'परमिशन' ली। उन्होंने कुछ पल सोचा कहा, “कहाँ जाओगी? रेलवे स्टेशन भी घूमने की जगह है!”

मैंने नज़रें ज़मीन में गढ़ाते हुए कहा, “मुझे चॉकलेट खाने का मन है।” इतना सुनकर उन्होंने मुझे रोका नहीं। बोले, “फटाफट लेकर आ जाओ।”

मैंने हाँ में सिर हिलाया।

मैंने एक दुकान का रुख किया। वहाँ मैंने सजी हुई चॉकलेट देखी तो जीभ में पानी न जाने कहाँ से उतर आया। मैंने दुकान की तरफ खुशी से क़दम बढ़ा दिये थे। तभी एक शोर मचा और माहौल में अफरा तफरी छा गई। अचानक मुझे पीछे से जबर्दस्त धक्का लगा और मैं मुंह के बल धड़ाम से गिरकर ज़मीन चाटने लगी।

“हाय राम!!...

बेइज्ज़ती हो गई। "किस कमीने ने मुझे गिरा डाला?...”

मैं घबराहट में अपनी धूल और खरोंचों के साथ इन अल्फ़ाज़ों को बोलते हुए उठने की कोशिश करने लगी। कुछ लोगों ने मुझे बांह पकड़ के सहारा भी दिया।

न जाने क्या हुआ था। मेरे गिरने के बाद न कोई शोर, न कोई शराबा। धड़-धड़ के साथ कुछ लोग भागे और क्यों भागे किसी को पता नहीं चला। मेरे साथ सब भौंचक्के बने देखते रहे। मैं बहुत घबरा गई। भीड़, जिसकी कोई शक्ल नहीं थी, आपस में बुदबुदाने लगी।

मैंने चॉकलेट का ख़्याल छोड़ा और वापसी का रुख किया।

अब तक माँ और पापा इस शोर से घबरा चुके थे।

मुझे देखते हुए ही माँ की आवाज़ तेज़ हो गई। पूछा, “क्या हुआ?”

मैंने उन्हें बिना देखे ही कहा, “पता नहीं पीछे से किसी ने धक्का दिया और मैं गिर गई।”

पापा बोले, “अब यहाँ कौन आतंकवादी आ गया!... कहीं भी चैन नहीं।”

मैंने इसी बीच पापा से पूछ लिया, “पापा आपको कैसे पता कि वे लोग आतंकवादी हैं?”

वो कुछ नहीं बोले और गुस्से से आँखें गरम करके वे बाहर की तरफ़ चल दिये।

मेरे मन में फिर से वही सवाल दुबारा आया, ‘रेल चल क्यों नहीं रही!

लगभग दस मिनट बाद पापा कुछ फल हाथ में लिए हुए लौटे। बोले, “कुछ लोग दो लोगों की तलाश में स्टेशन में घुस आए थे। कुल चार लोग हैं। कोई लड़का-लड़की भागे हैं। उन्हें वे लोग ढूंढ रहे हैं। अब उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया है। घबराने की कोई ज़रूरत नहीं।”

जब माँ ने ये बातें सुनी तब फिर ज़माने की दुहाई दी। मेरे उभरते बदन को देखा और मुझे चुन्नी को ठीक से ओढ़ने की हिदायत दी। फिर थोड़ी देर बाद ख़ुद ही चुप हो गईं। मैंने झिझकती हुई नज़रों से सामने बैठे जोड़े को देखा और सोचा जाने यह क्या सोच रहे होंगे। लेकिन इस बार फिर वे घबराए हुए ही लगे।

मैं इसलिए सुकून से थी क्योंकि आख़िरकार रेल चले जा रही थी और माँ इसलिए बेचैन थी कि हो हल्ला हो गया था। उनकी जवान बेटी भी उनके साथ थी। ट्रेन में वक़्त गुज़ारने के लिए मैंने एक किताब जो इस उम्र की महक लिए हुए थी को, माँ की नज़रों से बचाकर अपने पास रख ली थी। मैंने अपनी क्लास की एक दोस्त से ज़िद्द करके उसे हासिल किया था। प्रेम कहानी वाली किताब। उस किताब के किरदार बस इंसान थे जिनका न तो कोई मज़हब था और न कोई ज़ात। पर वो गुनाहगार थे। सामाजिक गुनाहगार। वे प्रेमी थे।

ट्रेन में फीकी और डरी रंगत लिए बैठा नया कपल अपने में उलझा था। न तो वे दोनों कुछ खा रहे थे न कुछ पी रहे थे। मेरे मन में आया कि उनसे उनकी परेशानी का सबब पूछ लूँ। पर जब माँ का चेहरा देखा तो मेरी हिम्मत की धज्जियां उड़ गईं।

मैंने रात उनके बेइंतहा डरे-परेशान चेहरे को देख कर काटनी शुरू की। उन दोनों ने एक दूसरे के हाथों को कस कर पकड़ा हुआ था, बिलकुल मेरी किताब के प्रेम क़ैदियों की तरह। दोनों के चेहरे परेशान ज़रूर थे पर आँखों में कल के सपने भी मौजूद थे। उन्हें देखते-देखते लगभग तीन बजे मेरी आँख के पर्दे गिर गए। जब सुबह आँखों की दुकान खुली तो वो जोड़ा नदारद था।

बहरहाल स्टेशन पर मामाजी ने काफ़ी पहले आकर मोर्चा खोल दिया था। माँ को उन्होंने एक लंबा सा प्रणाम किया तो माँ गदगद हो उठीं। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार की मुद्रा अपनाई।

शाम को घर-बैठक जम गई थी। मुहल्ले के सब लोग माँ से मिलने आए थे। पूरा जमावड़ा लग चुका था। मुझे जबर्दस्ती बीच में बिठाकर रखा गया था। मेरे ज़िस्म का भराव उन लोगों की नज़रों तक पहुँच चुका था। सभी के पास मेरी शादी के लिए एक रिश्ता मौजूद था। मैं इस तरह के रिश्तों की महिमा सुन रही थी और साथ ही अपनी माँ के चेहरे की चमकीली चमक को भी देख के हैरान थी।

पर शुक्र है कि अंधेरा गहराया तो लोगों को अपने अपने घर जाने की याद आ गई। नहीं तो मेरी शादी की शहनाई ही बज जाती। आठ बजते-बजते घर पड़ोसियों से खाली हो गया। खाना खाकर मैंने सोने की इच्छा जताई तो मामाजी ने पढ़ाई का हालचाल जानने के लिए रोक लिया। मैं अभी उन्हें अपने पढ़ाई का हाल बताने ही जा रही थी कि साढ़े आठ बजे की समाचार की सुर्खियों में हम सब के कानों को अपनी ओर खींच लिया। “देश में फिर एक बार ऑनर कीलिंग का मामला सामने आया है। रेलवे स्टेशन पर एक जोड़े की सिर कटी लाशें मिलीं हैं और...।” मैंने आगे की ख़बर नहीं सुनी बस चुन्नी से अपनी छाती को ढका और सामने पड़े पानी के गिलास से एक घूंट अपने गले में उतार लिया।   

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