Tuesday, 1 August 2017

महिला तस्करी और उसके सच

कई दफ़े हम टर्मिनोलॉजी का शिकार हो जाते हैं और लगभग सभी चीजों को उसके अंदर से ही गुज़ार कर देखना शुरू कर देते हैं। याद कीजिये उस लेंस को जो चीज़ों को बड़ा बनाकर हमें दिखाता है जिन्हें हम सूक्ष्म होने के कारण देख नहीं पाते। लेकिन यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रत्येक वस्तु की अपनी एक सीमा है। और उस सीमा के बाद चीजें वैसे ही हैं जैसे कि वह पहले से ही हैं। लेंस जहां जहां फिराया जाएगा केवल वहाँ वहाँ ही चीजें बड़ी होकर दिखाई देंगी। लेकिन उसके बाहर की सीमा में नहीं। हम आजकल इसी लेंस वाली नज़र का इस्तेमाल खूब करते हैं। जहां देखते हैं वहीं लेंस लगा लेते हैं। इसे नज़र का केन्द्रीयकरण क़रार दिया जा सकता है।  इसकी अपनी खूबियाँ और खामियाँ दोनों हैं।

ठीक इसी तरह बहुत सी और भी शब्द-शब्दावली है जो आजकल शक़ की निगाह से देखी जा रही है। चिंतन की विचारधारा से जुड़े हुए शब्द जो किसी एक जाति को चेहरा और प्रतिनिधित्व करने की क्षमता दे रहे हैं वे भी तो अब पवित्र नहीं माने जा रहे हैं। 'नारीवाद' एक ऐसा ही शब्द है। इस शब्द को सुनते ही कुछ लोग चिढ़ जाते हैं। बहुत बुरी तरह। पर यह एक जरूरी, जायज़ और दिलचस्प शब्दावली है। औरतों का इतिहास इतना अधिक क्रूर दिखाई देता है कि 'आधी आबादी' जैसा शब्द अगर इस्तेमाल हो जाता है तो इसमें क्या हर्ज़ा है? नारीवादी शब्द विचार, स्त्री विमर्श में तब्दील होता है तो इसके अपने ही गुण और मायने हैं। लेकिन जरूरत यह भी है कि लेंस के इर्द गिर्द हो रही घटनाओं की भी सुध ली जाये। 

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इसी विमर्श से थोड़ा सा इधर उधर देखें तो कुछ बातें जो लेंस से बाहर हो रही हैं पता चलती हैं। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन महाराष्ट्र में सम्पन्न हुआ। इसमें 18 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इसका मूल विषय महिला तस्करी था। कार्यकर्ता सुनीता कृष्णन के मुताबिक़ तस्करी से केवल 7% ही लड़कियों को छुड़वाया जा रहा है जबकि 93% अभी भी उसी  दलदल में फंसी हैं। इसके पीछे की वजहें ज़्यादा गंभीर हैं। औरतों की तस्करी के गिरोह बेहद मज़बूत हैं। उन्हें सरकारी रसूखदार लोगों का संरक्षण प्राप्त है। साधारण पंक्ति में कहा जाये तब - 'सब मिले हुए हैं।' हमारा पूरा तंत्र जो हमारे कल्याण की बात कहता है वही इसका पोषण कर रहा है। वरना इस हमाम में कोई एक ही नंगा नहीं हो सकता। एक बस की बात नहीं है। 

इसके पीछे का एक और कारण यह भी है कि एक बार उन्हें तस्करी के गिरोह से निकाल लेने के बाद उनके घर वाले उन्हें नहीं अपनाते। उनके लिए वे लड़कियां या औरतें जो एक बार खरीद फ़रोख्त का शिकार हो जाती हैं वे मर चुकी होती हैं। यह सबसे दयनीय बात है। इंच भर की जगह कैसे किसी परिवार की इज्जत की नंबर प्लेट है, यह आज भी दकियानूस सोच है। इसलिए जब तस्लीमा नसरीन यह कहती हैं कि औरत का कोई देश नहीं तो वह पूरी तरह सच ही कह रही होती हैं। वास्तव में घर भी कब औरत का रहा है? वहाँ भी वह नौकरानी से भी बदतर हो जाती है, एक औरत! हाँ, यह बात अलग है कि उसे गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, गृहणी, अन्नपूर्णा आदि आदि नाम से पुकारते हैं। जबकि इन शब्दों के पीछे लंबी चौड़ी वह फ़ेहरिश्त है जिसमें मुफ़्त का श्रम मौजूद है। इस श्रम का आज तक कोई बहीखाता किसी ने तैयार नहीं करवाया। आज भी यह जारी है। जब किसी लड़की को तस्करी से  बचाया जाता है तब वह कई बार घर में जाने से मना भी कर देती है। साफ वजह है कि उसे वह सम्मान वहाँ नहीं मिलता जिसकी वह हक़दार होती है। इसके साथ ही घर के लोगों का बर्ताव बहुत ही खराब हो जाता है। कई घर वाले तो मिलना भी पसंद नहीं करते।

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अमृता प्रीतम का मशहूर उपन्यास 'पिंजर' बड़ी मार्मिकता से यह दृश्य आँखों के आगे रख देता है। पुरो को रशीद उठाकर ले गया। खानदानी रंजिश के चलते। वह उसे भाग जाने देता है। जब पुरो अपने घर के किवाड़ खटखटाती है तो उसे उसके ही बचपन के घर में नहीं घुसने दिया जाता। उसकी ही हम-नस्ल उसकी माँ जाने किन किन बातों का वास्ता देकर उसे घर के अंदर नहीं आने देती। आह! निकल जाती है एक। वैसी आह रोज़ निकला करती हैं जब तस्करी से छुड़ाई गई लड़की को घर में पनाह नहीं मिलती। 

इसके अलावा सरकारें भी अव्वल दर्ज़े की जिम्मेदार हैं। वह छुड़ाई गई लड़कियों के लिए कोई आर्थिक आधार विकसित नहीं कर पाती। जो मौजूद हैं वे भी टोकरी बीनने तक समेट दिये जाते हैं। उनके लिए नितांत सभी सुविधाओं का अभाव रहता है। वे इन हालातों में कई बार वापस उसी रास्ते का रुख कर लेती हैं। राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव ही है कि महज़ 7 % ही लड़कियों को छुड़वाया जा पाता है। यह प्रतिशत बेहद कम है। एक बार फिर महिला आरक्षण बिल पर सोचने की जरूरत है और उसका जल्द से जल्द क्रियान्वयन करने की शीघ्र आवश्यकता है। राजनीति में उन सक्रिय और ज़मीन से जुड़ी औरतों की बेहद अनिवार्यता है जो जानती हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दे कितने संवेदनशील होते हैं। उनके पीछे शोषण और हिंसा की लंबी सूची होती है। 

यह बहुत अफसोस की बात लगती है कि जो औरतें राजनीति में हैं भी तो वे पानी साफ करने वाली, हवा साफ करने वाली, फल और सब्ज़ी साफ करने वाली मशीनों के विज्ञापन देती हैं। यह बहुत निराशाजनक है। हवा स्सफ करने के लिए महोदया जी को खुद पेड़ लगाने चाहिए और अपने संसदीय क्षेत्र में भी लोगों को पेड़ लगाने में मदद करनी चाहिए। इसी तरह पानी और सब्ज़ी साफ करने का मसला हल किया जा सकता है। 

आप पैसा कमाना बंद करें और इन संवेदनशील मुद्दों को सुलझाइए। आपको इसलिए ही चुना गया है कि आप परेशानियों का स्वस्थ हल निकालें। सभी के लिए बेहतर स्पेस बनाएँ ताकि सब जी सकें सम्मान के साथ। बाकी धीरे धीरे और भी तबके और जाति की महिलाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरणा और मदद दें। स्थिति सुधरनी तो कम से कम शुरू हो ही जाएगी।

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1.यह चित्र सन् 2013 में जोएल ने ओहायो, अमरीका में Sex Trafficking Awareness Project के दौरान कुछ छात्रों के साथ मिलकर बनाया था। 

https://joelartista.com/ohio-sex-trafficking-awareness/

2. Anna Kuntsman’s Catherine the Great deals with human trafficking. | Photo: Tricky Women 2013

https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=6111194188281992144#editor/target=post;postID=1434132795482902528



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