Sunday, 21 June 2026

मैत्री और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में -- (पत्र - 9)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम यह जानने के इच्छुक हो कि क्या एपिक्यूरस ने अपने एक पत्र में उन लोगों की आलोचना करके उचित किया था, जो कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है और इसलिए उसे मित्र की आवश्यकता नहीं होती। यह आरोप उसने स्टिलपो (Stilpo) और उन अन्य दार्शनिकों पर लगाया था जो मानते थे कि सर्वोच्च कल्याण एक ऐसी मानसिक अवस्था है जो किसी भी भावनात्मक आघात से अछूती रहती है। (यदि हम ग्रीक शब्द अपैथिया (apatheia-इसका अर्थ स्टोइक दर्शन के अनुसार मन की ऐसी स्थिति है जहाँ मन, इच्छाओं और जीवन के सुख-दुख के बीच शांत व स्थिर रहता है ) को केवल एक ही शब्द में व्यक्त करना चाहें और उसके लिए इम्पैशन्सिया (impatientia) शब्द का प्रयोग करें,तो उससे अर्थ की अस्पष्टता उत्पन्न हो सकती है। कारण यह है कि इम्पैशन्सिया (impatientia) का अर्थ उस अर्थ के बिल्कुल उल्टा भी समझा जा सकता है जिसे हम व्यक्त करना चाहते हैं। हमारा आशय ऐसे व्यक्ति से है जो किसी भी दुर्भाग्य या विपत्ति को अपने मन पर प्रभाव नहीं डालने देता। पर इसे ऐसे व्यक्ति के रूप में समझ लिया जाएगा जो किसी भी विपत्ति को सहन ही नहीं कर सकता। इसलिए विचार कीजिए कि क्या यह अधिक उचित नहीं होगा कि हम इसे अजेय  मन या ऐसा मन जो समस्त दुःखों से परे स्थापित हो, कहें।) हमारा मत उनसे भिन्न है। हमारा बुद्धिमान व्यक्ति विपत्तियों पर विजय प्राप्त करता है पर उन्हें अनुभव भी करता है जबकि उनका बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें महसूस ही नहीं करता। फिर भी एक बात दोनों में समान है—बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है। यद्यपि वह स्वयं में संतुष्ट रहता है, फिर भी वह मित्र, पड़ोसी और साथी रखना चाहता है।


    उसकी आत्मनिर्भरता को इस प्रकार समझो। काभी-काभी वह अपने एक हिस्से से संतुष्ट होता है। यदि युद्ध में उसका हाथ कट जाए या किसी दुर्घटना में उसकी एक या दोनों आँखें चली जाएँ, तब भी जो कुछ उसके पास बचा रहेगा, वह उसके लिए पर्याप्त होगा। वह अपने शरीर के कुछ हिस्से खो जाने पर भी उतना ही प्रसन्न रहेगा जितना पूर्ण शरीर के साथ था। फिर भी वह यह नहीं चाहेगा कि उसके अंग नष्ट हों। वह मित्र के बिना रह सकता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह मित्र-विहीन रहना चाहता है। यदि वह किसी मित्र को खो देता है तो वह उस क्षति को धैर्यपूर्वक सहन करता है। वास्तव में वह कभी मित्रों से वंचित नहीं रहता क्योंकि नए मित्र बनाना उसके अपने हाथ में है। जैसे महान मूर्तिकार फीडियस (Phidias) अपनी किसी मूर्ति के नष्ट हो जाने पर दूसरी बना सकता था, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति खोए हुए मित्र के स्थान पर दूसरा मित्र बना लेता है।

    तुम पूछते हो कि वह इतनी शीघ्रता से मित्र कैसे बना लेता है? मैं बताता हूँ। दार्शनिक हेकाटो कहता है, “मैं तुम्हें बिना औषधि, बिना जड़ी-बूटी और बिना किसी जादुई मंत्र के प्रेम प्राप्त करने का उपाय बताऊँगा, यदि तुम प्रेम पाना चाहते हो... तो स्वयं प्रेम करो।”

    पुरानी और स्थापित मित्रता का आनंद तो होता ही है पर नई दोस्ती की शुरुआत और उसे अर्जित करने में भी आनंद सुख है। मित्र बनाने और मित्र होने का अंतर वैसा ही है जैसा बीज बोने और फसल काटने का। दार्शनिक अटालुस (Attalus) कहा करते थे कि मित्र बनाना, मित्र होने से अधिक आनंददायक है, जैसे किसी कलाकार के लिए चित्र बनाना, चित्र बनाकर रख लेने से अधिक सुखद होता है। अपने कार्य में पूरी तरह एकाग्र होकर लगे रहना अपने-आप में अत्यंत आनंददायक होता है। कार्य पूरा हो जाने के बाद उसके परिणाम से जो सुख मिलता है, वह उस सुख के बराबर नहीं होता जो कार्य करते समय मिलता है। कलाकार अपनी कला की पूर्ण कृति का आनंद अवश्य लेता है लेकिन जब वह चित्र बना रहा होता है, तब वह स्वयं कला-सृजन की प्रक्रिया का आनंद ले रहा होता है। बच्चे बड़े होकर अधिक उपयोगी और संतोष देने वाले हो सकते हैं, पर वे शैशव अवस्था में वे अधिक मधुर और प्रिय लगते हैं।

    अब आइए, अपने मूल विषय पर लौटें। यदि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर भी हो, तब भी वह मित्र चाहता है। यदि और किसी कारण से नहीं, तो कम-से-कम इसलिए कि इतना महान सद्गुण (मित्रता करने और प्रेम करने की क्षमता) निष्क्रिय न पड़ा रहे। उसका उद्देश्य वह नहीं होता जो एपिक्यूरस इसी पत्र में कहता है, "उसके पास ऐसा कोई हो जो बीमारी में उसके पास बैठ सके या कारावास अथवा आवश्यकता के समय उसकी सहायता कर सके।" इसके विपरीत, उसका उद्देश्य यह होता है कि उसके पास ऐसा कोई हो जिसके पास वह स्वयं बीमारी में बैठ सके जिसे वह स्वयं शत्रु की कैद से मुक्त करा सके। जो व्यक्ति केवल अपने लाभ की दृष्टि से मित्रता करता है और इसी कारण मित्र बनाता है, वह गलत सोचता है। जैसे उसने मित्रता की शुरुआत की थी, वैसा ही उसका अंत भी होगा। उसने मित्र इसलिए बनाया कि यदि वह कभी कैद में पड़े तो मित्र उसकी सहायता करे। लेकिन ज्यों ही बेड़ियों की पहली झनकार सुनाई देगी, वह स्वयं भाग खड़ा होगा। इन्हें ही सामान्यतः अच्छे मौसम की मित्रताएँ कहा जाता है। जो मित्र केवल उपयोगिता के कारण बनाया जाता है, वह तब तक ही प्रिय रहता है जब तक वह उपयोगी बना रहता है। इसी कारण समृद्धि और सफलता के समय लोगों के आस-पास मित्रों की भीड़ लगी रहती है जबकि जिन लोगों का पतन हो जाता है, वे अकेले छोड़ दिए जाते हैं। मित्र उसी समय भाग खड़े होते हैं, जब उनके पास अपनी मित्रता को सिद्ध करने का अवसर होता है। यही कारण है कि हमें ऐसी अनेक दुखद कहानियाँ सुनने को मिलती हैं जिनमें लोग भय के कारण अपने मित्रों का साथ छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि उनके साथ विश्वासघात भी कर बैठते हैं।

    आरंभ और अंत में सामंजस्य होना चाहिए। जो व्यक्ति सुविधा या स्वार्थ के लिए मित्र बनता है, वह सुविधा या स्वार्थ के लिए ही मित्रता समाप्त भी कर देगा। यदि मित्रता को उसके अपने लिए नहीं बल्कि किसी अन्य लाभ के लिए मूल्यवान समझा जाता है तो धन की कोई न कोई राशि उस मित्रता पर भारी पड़ जाएगी। "मित्र क्यों बनाया जाए?" इसलिए कि मेरे पास ऐसा कोई हो जिसके लिए मैं प्राण तक दे सकूँ। ऐसा कोई हो जिसके साथ मैं निर्वासन में जा सकूँ। ऐसा कोई हो जिसका जीवन बचाने के लिए मैं अपना जीवन भी दाँव पर लगा सकूँ। लेकिन तुम जो मित्रता का वर्णन कर रहे हो, वह मित्रता नहीं बल्कि एक व्यापारिक सौदा है क्योंकि वह अपने ही लाभ को देखती है और हर बात को परिणाम तथा फायदे की दृष्टि से तौलती है।

    इसमें किसी को संदेह नहीं कि प्रेमियों की भावनाएँ मित्रता से कुछ समानता रखती हैं। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम, मित्रता का पागलपन की सीमा तक पहुँचा हुआ रूप है। तो क्या कोई व्यक्ति प्रेम इसलिए करता है कि उसे उससे कोई लाभ मिले? या महत्वाकांक्षा की पूर्ति हो... या यश और प्रसिद्धि प्राप्त हो? प्रेम अपने आप में ही, किसी अन्य उद्देश्य की परवाह किए बिना, मन को दूसरे व्यक्ति के सौन्दर्य और आकर्षण की ओर आकृष्ट कर देता है और यह आशा करता है कि उसका स्नेह भी प्रत्युत्तर में प्राप्त होगा। तो फिर हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? क्या कोई निम्न या तुच्छ भावना किसी अधिक सम्माननीय और श्रेष्ठ स्रोत से उत्पन्न हो सकती है?

    तुम कहते हो, “हमारा प्रश्न यह नहीं है कि मित्रता अपने-आप में वरणीय (चयन करने योग्य) है या नहीं।” इसके विपरीत, यही वह बात है जिसे सबसे पहले और सबसे दृढ़ता से स्थापित किया जाना चाहिए। क्योंकि यदि मित्रता अपने-आप में ही वरणीय है, तो आत्मनिर्भर व्यक्ति भी उसका अनुसरण कर सकता है। “तो फिर वह उसे किस प्रकार अपनाता है?” उसी प्रकार जैसे कोई व्यक्ति किसी अत्यंत सुंदर वस्तु को अपनाता है— न लाभ के आकर्षण से खिंचकर और न ही भाग्य के उतार-चढ़ाव से भयभीत होकर। जब कोई व्यक्ति केवल अपनी स्थिति सुधारने, लाभ प्राप्त करने या जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए मित्र बनाता है, तब वह मित्रता की महानता को छोटा कर देता है।

   “बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है।” प्रिय लूसीलियस, बहुत-से लोग इस कथन का गलत अर्थ निकालते हैं। वे बुद्धिमान व्यक्ति को हर ओर से घेरकर मानो उसकी अपनी ही त्वचा के भीतर कैद कर देते हैं। वास्तविकता यह है कि इस कथन का अर्थ क्या है और इसकी सीमा कहाँ तक है, इसका भेद समझना आवश्यक है। बुद्धिमान व्यक्ति अच्छा जीवन जीने के संदर्भ में आत्मनिर्भर होता है, लेकिन सामान्य रूप से जीवन जीने के संदर्भ में नहीं। क्योंकि सामान्य जीवन के लिए उसे अनेक वस्तुओं और साधनों की आवश्यकता होती है। किन्तु अच्छा और श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए उसे केवल एक स्वस्थ, सच्चरित्र और सीधा मन चाहिए जो भाग्य के उतार-चढ़ाव से ऊपर उठ चुका हो।

    मैं तुम्हें क्रिसिप्पुस (Chrysippus) का यह भेद भी बताता हूँ। वह कहता है कि यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति को किसी चीज़ की कमी नहीं होती फिर भी उसे अनेक वस्तुओं का उपयोग होता है। इसके विपरीत, मूर्ख व्यक्ति के लिए कोई भी वस्तु वास्तव में उपयोगी नहीं होती,क्योंकि वह चीज़ों का सही उपयोग करना नहीं जानता; फिर भी उसे हर चीज़ की कमी रहती है। बुद्धिमान व्यक्ति को हाथों, आँखों और ऐसी अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है जो दैनिक जीवन के लिए आवश्यक हैं फिर भी उसमें किसी चीज़ की कमी नहीं होती। क्योंकि "कमी" का अर्थ है "ज़रूरतमंद होना", और बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी वस्तु का मोहताज नहीं होता।

    इसलिए यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, फिर भी उसे मित्रों का उपयोग होता है और वह यथासंभव अधिक मित्र रखना चाहता है। लेकिन वह मित्रों को इसलिए नहीं चाहता कि उनके बिना वह अच्छा जीवन नहीं जी सकता। अच्छा जीवन तो वह मित्रों के बिना भी जी सकता है, क्योंकि परम शुभ अपने बाहर किसी साधन की खोज नहीं करता। वह मनुष्य के अपने ही भीतर जन्म लेता है और अपने आप में पूर्ण होता है। यदि तुम उसके किसी भी अंश को बाहर की वस्तुओं पर निर्भर कर दोगे, तो वह भाग्य के अधीन होने लगेगा।

    “लेकिन यदि बुद्धिमान व्यक्ति मित्रों से वंचित हो जाए, जैसे कि वह कैद में हो, किसी विदेशी देश में अकेला फँस गया हो, किसी लंबी समुद्री यात्रा में विलंबित हो गया हो, या किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दिया गया हो तो वह किस प्रकार का जीवन जिएगा?” वह उसी प्रकार का जीवन जिएगा जैसा जुपिटर उस समय जीता है जब संसार विलीन हो जाता है, जब सभी देवता एक में समा जाते हैं, जब प्रकृति कुछ समय के लिए अपनी गतिविधियाँ रोक देती है और वह स्वयं अपने विचारों में लीन होकर अपने भीतर विश्राम करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही करता है। वह अपने भीतर लौट जाता है, स्वयं में आश्रय लेता है और स्वयं ही अपनी संगति बन जाता है।

    फिर भी, जब तक बुद्धिमान व्यक्ति को अपने जीवन की व्यवस्था अपनी इच्छा के अनुसार करने का अवसर प्राप्त है, तब तक वह आत्मनिर्भर होते हुए भी विवाह करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी बच्चों का पालन-पोषण करता है। आत्मनिर्भर होते हुए भी ऐसा जीवन नहीं जीना चाहेगा जिसमें अन्य मनुष्यों का साथ बिल्कुल न हो। उसे मित्रता की ओर ले जाने वाली शक्ति उसका स्वार्थ या लाभ नहीं बल्कि एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। जिस प्रकार कुछ अन्य वस्तुएँ हमें स्वभावतः आकर्षित करती हैं, उसी प्रकार मित्रता भी हमें आकर्षित करती है। जैसे एकांत से बचना और संगति की तलाश करना हमारे स्वभाव में निहित है, जैसे प्रकृति ने मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ रखा है उसी प्रकार मित्रता स्थापित करने की एक सहज और जन्मजात प्रेरणा भी हमारे भीतर विद्यमान है।

    यद्यपि बुद्धिमान व्यक्ति अपने मित्रों से अत्यन्त गहरा प्रेम करता है, उन्हें अपने समान, और कई बार स्वयं से भी अधिक महत्व देता है। तथापि वह यह मानता है कि सभी वास्तविक अच्छाइयाँ उसके अपने भीतर ही सीमित हैं। इस विषय में वह वही मत रखेगा जो स्टिल्पो (Stilpo) ने व्यक्त किया था। फिर भी एपिक्यूरस के पत्र में उसकी आलोचना की गई है। स्टिल्पो का नगर शत्रुओं द्वारा जीत लिया गया था; उसके बच्चे नष्ट हो गए, उसकी पत्नी भी उससे छिन गई और अपने पूरे राष्ट्र के विनाश में वह अकेला जीवित बचा। फिर भी वह प्रसन्नचित्त होकर उस आपदा से बाहर निकला। जब दिमेत्रियस जिसे "पोलियोरकेटेस" अर्थात् "नगर-विजेता" कहा जाता था, ने उससे पूछा, "क्या तुमने कुछ खोया है?" तो उसने उत्तर दिया,  "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास ही है।" 

यह सचमुच एक साहसी और दृढ़ व्यक्ति था; उसने अपने शत्रु की विजय पर भी विजय प्राप्त कर ली। उसने कहा, "मैंने कुछ भी नहीं खोया है," और इस प्रकार उसने विजेता को ही यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या वास्तव में उसने कोई विजय प्राप्त की भी है। "मेरी सारी संपत्ति मेरे पास है"अर्थात् मेरा न्याय, मेरा साहस, मेरी विवेकशीलता (प्रज्ञा) और सबसे बढ़कर यह क्षमता कि मैं समझता हूँ कि कोई भी ऐसी वस्तु वास्तव में अच्छी नहीं है जिसे मुझसे छीना जा सके। हम आश्चर्य करते हैं कि कुछ जीव-जन्तु बिना किसी शारीरिक क्षति के अग्नि में से निकल जाते हैं। किन्तु यह व्यक्ति उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है, जो आग, तलवार और विनाश के बीच से न केवल बिना किसी चोट के निकल आया, बल्कि बिना किसी हानि के भी। अब तुम देख सकते हो कि किसी पूरे राष्ट्र को पराजित करना एक अकेले मनुष्य को पराजित करने की अपेक्षा कितना आसान है। स्टिल्पो का यह कथन स्टोइकों का भी कथन है। स्टोइक दार्शनिक भी नगरों के विनाश के बीच से अपनी सम्पत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए निकल जाता है, क्योंकि वह आत्मनिर्भर है। यही वह सीमा है जिसके द्वारा वह अपनी समृद्धि और सुख का निर्धारण करता है।

    लेकिन यह मत समझो कि केवल हम स्टोइक ही ऐसी उदात्त बातें कहते हैं। स्टिल्पो की आलोचना करने वाले एपिक्यूरस ने भी स्वयं एक ऐसा कथन कहा है जो उसके विचार से बहुत मिलता-जुलता है। इसे आज के लिए मेरी ओर से एक उपहार समझो, यद्यपि आज का अपना ऋण मैं पहले ही चुका चुका हूँ। एपिक्यूरस कहते हैं,  "जो व्यक्ति यह नहीं मानता कि उसके पास जो कुछ है वह पर्याप्त है, वह दुखी है, चाहे वह पूरे संसार का शासक ही क्यों न हो।" या यदि तुम्हें इसे इस प्रकार कहना अधिक उपयुक्त लगे (क्योंकि हमें शब्दों की नहीं, विचारों की सेवा करनी चाहिए): "वह व्यक्ति दयनीय है जो स्वयं को पूर्णतः सुखी नहीं मानता, भले ही वह समस्त संसार पर शासन करता हो।"

    लेकिन तुम्हें यह दिखाने के लिए कि ये विचार केवल दार्शनिकों तक सीमित नहीं हैं बल्कि व्यापक रूप से स्वीकार किए गए हैं और निस्संदेह प्रकृति द्वारा ही प्रेरित हैं, एक हास्य-कवि यह पंक्ति प्रस्तुत करता है, "कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, यदि वह स्वयं को सुखी नहीं मानता।" यदि तुम अपनी परिस्थितियों को बुरा समझते हो, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे वास्तव में कैसी हैं?

    “लेकिन देखो,” तुम कहते हो, “फलाँ व्यक्ति का क्या, जिसकी संपत्ति भ्रष्ट तरीकों से अर्जित की गई है? या उस दूसरे व्यक्ति का क्या, जो बहुतों का स्वामी है और उससे भी अधिक लोगों का दास? यदि उनमें से कोई यह दावा करे कि उसका जीवन अच्छा है, तो क्या मात्र उसकी राय से यह सच हो जाएगा?” यहाँ महत्व इस बात का नहीं है कि वह क्या कहता है, बल्कि इस बात का है कि वह वास्तव में क्या सोचता है। और वह भी किसी एक दिन की क्षणिक भावना नहीं बल्कि लंबे समय तक उसके मन की स्थायी धारणा क्या है। फिर भी तुम्हें इस बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं कि इतना महान पुरस्कार किसी अयोग्य व्यक्ति को मिल जाएगा। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही अपने पास जो कुछ है उससे संतुष्ट रहता है; सभी मूर्ख लोग स्वयं से असंतुष्ट रहते हैं और उसी कारण दुःख भोगते हैं।

अभी के लिए विदा 


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