Friday, 26 August 2016

अकेली

'अकेली' रहने के बहुत फायदे हैं। जब जो मर्ज़ी आए वो कर डालो। बिना वजह के भी बहुत चीजें की जा सकती हैं। मैं 'अकेला' या फिर 'अकेलापन' शब्दों या इन नामों से बनी फिल्मों की चर्चा कतई नहीं करूंगी। क्योंकि ये दोनों ही मेरी बात नहीं करते। ये एक अलग बिरादरों की बिरादरी की बास देते हैं। मुझे इस महक से दिक्कत है। अकेली होने के अपने ही मानीखेज मायने हैं।

लेकिन यह शब्द है क्या, किस बात की तरफ इसका इशारा है, यह किसके लिए है...इन सब सवालों को काजल की कोठरी में डाला जा सकता है। मुझे कहीं जाकर उत्तर पुस्तिका नहीं भरनी या फिर किसी प्रवेश परीक्षा का स्यापा नहीं करना। मैंने इस शब्द को पिछले कुछ वर्षों में जीने का प्रयत्न किया है। हाल ही में जब किसी ने मुझे यह कहा- 'आखिरकार ज्योति हम सब अंत में अकेले ही होते हैं' तब दिमाग की बत्ती जल गई। यह सही है। सौ प्रतिशत सही। जरूरी नहीं कि आप इससे सहमत हों। आप नहीं भी होंगे तब भी मैं इससे सहमत हूँ।

मेरे पड़ोस में एक बुजुर्ग औरत रहा करती थीं। वो भी 'अकेली'। उनके खानपान से लेकर उनके ओढ़ने और पहनने के तरीके दिलचस्प थे। उस पर उनकी ब्रज की भाषा जुलुम ढाती थी। उनका एक संवाद बड़ा जोरदार था- 'जब हाथ में हो न रुपैया, न पति भये अपने और... न साईयां।' इस पंक्ति में ही वह माँ को अपनी ज़िंदगी का फलसफा सुनाया करती थीं। हम सुनकर खूब हंसा भी करते थे। थोड़ा हैरान भी हुआ करते थे कि यह किस तरह की बातें करती हैं और 'अकेली' होकर भी इतनी खुश कैसे रह लेती हैं। जब तक वह हमारे मोहल्ले में रहीं मैंने उन्हें बहुत कम बीमार होते हुए देखा या शायद देखा ही नहीं।

उनके पास अपनी ही ज़िंदगी के देखे और भोगे हुए किस्से होते थे। उन्हें किसी रटे हुए किस्से को कभी सुनाते हुए नहीं सुना। लोग गम खा कर उसकी उल्टियाँ करते हैं पर वे इसके ठीक उलट थीं। वह गीत गया करती थीं। अपनी उम्र और लोगों के नियमों को ठेंगा दिखाकर। 'गुडियर' टायर में मिले सल्फर की तरह उनका रोज़मर्रा हुआ करता था। थोड़ा लचीला, ज़रा सख्त और टिकाऊ। वह अपने दिन को कुछ इस तरह सजाया करती थीं कि उन्हें अपने गम को भुलाने के लिए व्यस्त होने की ज़रूरत नहीं पड़ा करती थी। दिन के सभी काम जीने के लिए ही तैयार करती थीं।

आज मुझे नहीं पता कि वह किस मोहल्ले की रौनक हैं। हैं भी या नहीं। लेकिन जब भी मेरे आगे शादी के प्रस्ताव आते हैं तब मुझे एकदम से वह औरत याद आ जाती है। कुछ महीने पहले जब मैंने श्याम बेनेगल द्वारा निर्मित फिल्म 'मम्मो' देखी तब वह अचानक से दिमाग में उपस्थित हो गईं। वही हँसता हुआ चेहरा, न कहीं ज़िंदगी में पछतावे के छींटे दिखते हैं और न कहीं 'ऊब' की बू आती है। न अपने को व्यस्त होने की नौटंकी दिखती है और न ही घड़ी की सुइयों पर टिका हुआ रूटीन।

यह उस औरत की मामूली सी ज़िंदगी का भारी सा बयान ही तो है। नारीवाद शब्द तो कारखानों की छपाई में गुमशुदा हो गया है लेकिन वास्तव का नारीवाद आसपास ही बिखरा हुआ है। यह 'अकेली' इसका उदाहरण है।

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