प्रिय लूसीलियस
"तुम हमारे मित्र मार्सेलिनस के बारे में पूछते हो और जानना चाहते हो कि वह कैसा है। वह अब कम ही मिलने आता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि उसे सत्य सुनने का भय है। लेकिन इस समय उसे उससे कोई खतरा नहीं है। क्योंकि सत्य केवल उसी व्यक्ति से कहना चाहिए जो उसे सुनने के लिए तैयार हो।"
इसी कारण लोग अक्सर डायोजनीज़ और अन्य सिनिक दार्शनिकों के बारे में संदेह व्यक्त करते हैं, जो वाणी की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रयोग करते थे। वे जिस किसी से भी मिलते, उसे उपदेश देते थे। क्या वे ऐसा करने में सही थे? यदि वे लोग, जिन्हें डाँटा-फटकारा जा रहा था, बहरे और गूँगे होते—चाहे जन्म से या किसी रोग के कारण—तो क्या होता? तुम कहते हो, “शब्दों में कंजूसी क्यों की जाए? उनका कोई मूल्य तो नहीं है। मैं यह नहीं जान सकता कि जिसे मैं समझा रहा हूँ, उसकी सहायता कर पाऊँगा या नहीं। लेकिन यदि मैं बहुतों को समझाऊँ तो निश्चित ही किसी-न-किसी की सहायता कर दूँगा। मुझे तो बीज को व्यापक रूप से बिखेर देना चाहिए। यदि बहुत-से प्रयास किए जाएँ तो उनमें से कुछ न कुछ अवश्य सफल होंगे।” लेकिन, प्रिय ल्यूसीलियस, मुझे नहीं लगता कि किसी महान व्यक्ति को ऐसा करना चाहिए। इससे उसकी प्रतिष्ठा और प्रभाव कम हो जाता है। यदि वह अपने शब्दों को बहुत अधिक सामान्य बना दे तो उन्हीं लोगों के बीच उनका पर्याप्त महत्व नहीं रह जाता जिन्हें वह वास्तव में सुधार सकता था। एक धनुर्धर को कभी लक्ष्य भेदना और कभी चूकना नहीं चाहिए। जो कुछ संयोगवश परिणाम देता है, वह कोई कला नहीं है। बुद्धिमत्ता एक कला है। उसे निश्चित सफलता की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो उससे लाभ उठा सकें और उन लोगों से दूर रहना चाहिए जिनके लिए अब कोई आशा नहीं बची है। फिर भी, उन्हें बहुत जल्दी नहीं छोड़ देना चाहिए। निराशाजनक परिस्थितियाँ असाधारण उपायों की माँग करती हैं।
लेकिन मैं अभी तक अपने मार्सेलिनस के विषय में निराश नहीं हुआ हूँ। उसे अभी भी बचाया जा सकता है, परंतु केवल तभी जब तुरंत उसकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाया जाए। वास्तव में यह भी खतरा है कि वह अपने उद्धारक को ही अपने साथ नीचे खींच ले क्योंकि उसकी बुद्धि बहुत प्रबल है। पर इस समय उसका झुकाव बुराई की ओर है। फिर भी, मैं इस जोखिम का सामना करने जाऊँगा। मैं उसे उसकी त्रुटियाँ दिखाने का साहस करूँगा। वह वही करेगा जो वह प्रायः करता है। वह हर बात को ऐसे मज़ाक में उड़ा देगा कि शोकग्रस्त व्यक्ति भी हँस पड़े। पहले वह स्वयं का उपहास करेगा और फिर मेरा। मैं जो कुछ कहने वाला हूँ, वह उसकी हर बात को टालने का प्रयत्न करेगा। वह हमारे दर्शन-सम्प्रदाय की छानबीन करेगा और हमारे दार्शनिकों पर आरोप लगाने के लिए आपत्तियाँ खोज निकालेगा—कहीं धन-लाभ, कहीं प्रेमिकाएँ, कहीं पेटूपन। वह मुझे एक दार्शनिक दिखाएगा जो व्यभिचार में पकड़ा गया हो, दूसरे को किसी भोजनालय में और तीसरे को राजमहल में।
वह मुझे मार्कस लेपिडस के दार्शनिक सलाहकार एरिस्टो का उदाहरण देगा, जो अपनी पालकी में यात्रा करते हुए ही व्याख्यान दिया करते थे, क्योंकि वे उस समय का उपयोग अपनी रचनाओं को प्रकाशन के लिए तैयार करने में करते थे। जब किसी ने पूछा कि वह किस दार्शनिक विद्यालय से संबंधित हैं तो स्कौरस ने मज़ाक में कहा, “निश्चित रूप से वह पेरिपैटेटिक नहीं हैं!” जब उस प्रतिष्ठित पुरुष जूलियस ग्रेकिनुस से उनके बारे में राय पूछी गई तो उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकता। मुझे तो यह भी नहीं पता कि वह पैदल चलकर क्या करते हैं।” मानो उनसे किसी रथ-चालक के बारे में पूछा गया हो!
वे सभी ढोंगी लोग, जो दर्शन का व्यापार करते हैं और जिनके लिए दर्शन को हाथ न लगाना ही अधिक सम्मानजनक होता, मार्सेलिनस मेरे विरुद्ध उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगा। लेकिन मैंने उसके उपहास को सहने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे मुझे हँसी में उड़ाने का प्रयास करे। संभव है कि मैं उसे रुला दूँ। और यदि वह हँसता ही रहे तो भी मैं अपने दुःखों के बीच यह सोचकर प्रसन्न होऊँगा कि उस पर पागलपन का कम-से-कम एक प्रसन्नचित्त रूप तो आया है। किन्तु ऐसी प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं टिकती। ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो लोग अभी उन्मत्त होकर हँस रहे होते हैं, थोड़ी ही देर बाद वही लोग उन्मत्त होकर विलाप भी कर रहे होते हैं।
मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं उसके पास जाऊँगा और उसे दिखाऊँगा कि जब बहुत-से लोग उसे कम मूल्य का समझते थे, तब भी वह आज की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान था। भले ही मैं उसके दोषों को पूरी तरह काट न सकूँ, कम-से-कम उनके बढ़ने को रोक दूँगा। वे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, लेकिन कुछ समय के लिए शांत अवश्य हो जाएँगे। और संभव है कि वे सचमुच समाप्त ही हो जाएँ, यदि यह विराम एक आदत बन जाए। इसे तुच्छ नहीं समझना चाहिए। वास्तव में, जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो तो रोग का अच्छा विराम भी स्वास्थ्य के समान ही माना जाता है।
जब तक मैं उसके लिए तैयारी कर रहा हूँ, तब तक तुम्हारे लिए ये मेरे निर्देश हैं। तुममें क्षमता है। तुम समझते हो कि तुम कहाँ रहे हो और अब कहाँ हो और इससे यह भी अनुमान लगा सकते हो कि तुम किस दिशा में जा रहे हो। अपने आचरण को व्यवस्थित करो। अपने मनोबल को ऊँचा उठाओ। भय उत्पन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु के सामने दृढ़ता से खड़े रहो। उन लोगों की परवाह मत करो जो तुम्हें डराने का प्रयास करते हैं। यदि कोई व्यक्ति उस स्थान पर भीड़ से डरता हो जहाँ एक समय में केवल एक ही व्यक्ति निकल सकता है तो वह कितना मूर्ख दिखाई देगा, है न? तुम्हारी मृत्यु के विषय में भी यही बात लागू होती है। यद्यपि बहुत-से लोग तुम्हें मृत्यु की धमकी दे सकते हैं पर वे सब एक साथ तुम्हारे पास नहीं पहुँच सकते। प्रकृति ने इस व्यवस्था को इसी प्रकार बनाया है। एक ही व्यक्ति तुमसे प्राण छीन लेगा, ठीक वैसे ही जैसे एक ही व्यक्ति ने तुम्हें प्राण दिए थे।
यदि तुममें कुछ भी लज्जा होती तो तुम मुझे इस अंतिम भुगतान से मुक्त कर देते। लेकिन चूँकि मेरा ऋण अब लगभग समाप्त होने को है, इसलिए मैं कंजूसी नहीं करूँगा—नहीं, मैं भी नहीं! जो कुछ तुम पर मेरा बकाया है, उसे चुका दूँगा। मैंने कभी भी जनसाधारण को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं की क्योंकि वे मेरे ज्ञान को स्वीकार नहीं करते और मुझे उस बात का कोई ज्ञान नहीं है जिसे वे स्वीकार करते हैं।
“यह किसने कहा?” तुम पूछते हो, मानो तुम्हें यह न मालूम हो कि मैं अपनी पूँजी कहाँ से लाता हूँ। यह एपिक्यूरस ने कहा था। लेकिन पेरिपैटेटिक, अकादमिक, स्टोइक और सिनिक—सभी दार्शनिक सम्प्रदायों के लोग एक स्वर में तुम्हें यही बात कहेंगे। आख़िर ऐसा कौन-सा व्यक्ति है जो सद्गुण को प्रिय मानता हो और साथ ही जनसाधारण का प्रिय भी हो? लोक-प्रशंसा तो दुष्कर्मों में निपुणता के द्वारा प्राप्त की जाती है। तुम्हें स्वयं को उनके जैसा बनाना पड़ता है। जब तक वे तुम्हें अपने जैसा न पहचान लें, वे तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे। किन्तु महत्वपूर्ण यह नहीं है कि तुम दूसरों को कैसे दिखाई देते हो बल्कि यह है कि तुम स्वयं को कैसे देखते हो। जब लोग निकृष्ट हों, तब उनकी प्रेम-प्राप्ति किसी ऐसे उपाय से नहीं की जा सकती जो स्वयं निकृष्ट न हो।
तो फिर दर्शन से तुम्हें क्या लाभ मिलेगा जबकि उसका इतना सम्मान किया जाता है और वह सभी कलाओं तथा सभी प्रकार की संपत्तियों से कहीं श्रेष्ठ है? बस यही कि तुम लोगों को प्रसन्न करने की अपेक्षा स्वयं को प्रसन्न करना अधिक पसंद करोगे, कि तुम अपने बारे में किए जाने वाले निर्णयों की संख्या नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता की चिंता करोगे, कि तुम देवताओं और मनुष्यों—दोनों के भय से मुक्त होकर जीवन बिताओगे और यह कि तुम या तो अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करोगे अथवा उनका अंत कर दोगे। इसके विपरीत, यदि मैं तुम्हें सामान्य भीड़ द्वारा अत्यधिक सराहा जाता देखूँ, यदि तुम्हारे आने पर वैसे ही शोर और तालियाँ गूँजें जैसी मूकाभिनय के प्रदर्शनों में गूँजती हैं, यदि नगर भर में स्त्रियाँ और बालक तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते फिरें तो मुझे तुम पर दया आएगी। और क्यों न आए? क्योंकि मैं जानता हूँ कि ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए तुमने कौन-सा मार्ग अपनाया है।
अभी के लिए विदा
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