प्रिय लूसीलियस
क्या तुम्हें लगता है कि ऐसा केवल तुम्हारे साथ ही हुआ है? क्या तुम्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि इतने व्यापक भ्रमण के बाद, इतने विविध स्थानों पर जाने के बाद भी, तुम अपने मन की उदासी और बोझिलता को दूर नहीं कर पाए? मानो यह कोई नई बात हो! तुम्हें स्थान नहीं, अपने मन को बदलना चाहिए। चाहे तुम समुद्र पार कर लो, चाहे — जैसा हमारे कवि वर्जिल ने कहा है, “भूमियाँ और नगर पीछे छूटते चले जाएँ”, फिर भी तुम्हारे दोष और कमज़ोरियाँ तुम्हारे साथ-साथ चलती रहेंगी, जहाँ कहीं भी तुम जाओगे।
By Adolph Tidemand
तुम्हारी ही तरह शिकायत करने वाले एक व्यक्ति से सुकरात (Socrates) ने कहा था, “तुम्हें यह देखकर आश्चर्य क्यों होता है कि यात्रा से तुम्हें कोई लाभ नहीं हुआ जबकि तुम स्वयं अपनी ही संगति में यात्रा कर रहे हो? जो चीज़ तुम्हारे मन पर बोझ बनी हुई है, वही तुम्हें घर से बाहर भी ले गई थी।” नए देशों से तुम्हें क्या लाभ होगा? नगरों और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किस काम आएगा? अंततः तुम्हारी यह सारी भागदौड़ व्यर्थ सिद्ध होगी। क्या तुम पूछते हो कि तुम्हारा यह पलायन क्यों निष्फल है? इसका कारण यह है कि तुम स्वयं को अपने साथ लिए फिरते हो।
तुम्हें अपने मन पर पड़े हुए बोझ को उतार फेंकना होगा। जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे तब तक कोई भी स्थान तुम्हें सुखद नहीं लगेगा। समझो कि तुम्हारी वर्तमान स्थिति वैसी ही है जैसी वर्जिल (Virgil) ने सिबिल (भविष्यवक्ता स्त्री) के बारे में वर्णित की है। उस समय जब वह व्याकुल और उन्मत्त हो उठती है क्योंकि उसके भीतर एक विशाल शक्ति निवास कर रही होती है जो उसकी अपनी नहीं है, “वह भविष्यवक्ता उछलती है, तड़पती है और अपने हृदय से उस देवता को बाहर झटक देने का प्रयास करती है।” तुम भी उसी प्रकार भीतर से अशांत हो। तुम्हारा मन अनेक चिंताओं, इच्छाओं और व्याकुलताओं से भरा हुआ है। उनसे मुक्त हुए बिना न तो तुम्हें शांति मिलेगी न किसी स्थान में संतोष।
तुम इधर-उधर भटकते फिरते हो, अपने ऊपर पड़े बोझ को झटककर उतार फेंकने की कोशिश में। परंतु जितना अधिक तुम भागते-दौड़ते हो, वह बोझ उतना ही अधिक भारी और कष्टदायक हो जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी जहाज़ का माल। यदि वह ठीक प्रकार से रखा गया हो तो जहाज़ पर उसका बहुत कम प्रभाव पड़ता है। लेकिन यदि वह इधर-उधर खिसकने लगे तो शीघ्र ही जहाज़ का एक भाग नीचे झुकने लगता है और वह संकट में पड़ जाता है। इसी प्रकार, तुम जो कुछ भी करते हो, वह अंततः तुम्हारे ही विरुद्ध काम करता है। तुम्हारी हर गतिविधि तुम्हें ही हानि पहुँचाती है क्योंकि तुम एक ऐसे व्यक्ति को झकझोर रहे हो जो पहले से ही बीमार है।
लेकिन जब तुम्हारे भीतर जो कुछ विकृत और अशांत है, वह दूर हो जाएगा, तब हर स्थान-परिवर्तन तुम्हें सुखद लगने लगेगा। यदि तुम्हें पृथ्वी के सबसे दूरस्थ कोनों में भी निर्वासित कर दिया जाए तब भी तुम जिस किसी बर्बर या अपरिचित प्रदेश में पहुँचोगे, उसे अपने लिए एक आतिथ्यपूर्ण आश्रय के रूप में पाओगे। तुम कहाँ जाते हो, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि जाते समय तुम स्वयं कैसे व्यक्ति हो। इसी कारण हमें अपने मन को किसी एक स्थान से बाँधकर नहीं रखना चाहिए। हमें इस विश्वास के साथ जीना चाहिए, “मेरा जन्म केवल किसी एक स्थान के लिए नहीं हुआ है। यह समस्त संसार ही मेरी मातृभूमि है।” यदि यह बात तुम्हारे लिए स्पष्ट होती तो तुम्हें यह देखकर आश्चर्य न होता कि हर बार किसी स्थान से ऊब जाने पर दूसरे प्रदेश में जाने से भी तुम्हें कोई लाभ नहीं मिलता। यदि तुम सचमुच यह मानते कि प्रत्येक प्रदेश तुम्हारा अपना है तो जिस पहले स्थान पर तुम थे, उसी में संतुष्ट हो गए होते।
वास्तव में, तुम यात्रा कम और भटकाव अधिक कर रहे हो। तुम एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जा रहे हो। फिर उसे छोड़कर किसी और स्थान पर पहुँच जाते हो। लेकिन जिस वस्तु की तुम खोज कर रहे हो अर्थात् अच्छा जीवन जीने की कला, वह तो हर स्थान पर प्राप्त की जा सकती है। क्या किसी नगर का बाज़ार (फोरम) जितना शोरगुल वाला कोई और स्थान हो सकता है? फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वहाँ भी शांतिपूर्वक जीवन जिया जा सकता है। फिर भी, यदि मुझे अपनी इच्छा से रहने का स्थान चुनने की स्वतंत्रता हो तो मैं उस मोहल्ले से भी दूर रहना पसंद करूँगा जहाँ से बाज़ार दिखाई देता हो। क्योंकि जिस प्रकार कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो सबसे सुदृढ़ और स्वस्थ शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, उसी प्रकार कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जो उस मन के लिए अनुकूल नहीं होते जो अच्छा तो है पर अभी शक्ति प्राप्त कर रहा है और पूर्णता तक नहीं पहुँचा है। अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि अच्छा जीवन केवल स्थान बदलने से नहीं मिलता। फिर भी वह ऐसे वातावरण का चयन करता है जो उसके चरित्र, आत्मसंयम और आंतरिक विकास के लिए सहायक हो। जो मन अभी साधना के मार्ग पर है, उसे अनावश्यक विकर्षणों और प्रलोभनों से बचाना भी आवश्यक है।
मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ जो स्वयं को लहरों के बीच झोंक देते हैं, जो कोलाहल और हलचल भरे जीवन को उचित मानते हैं और प्रतिदिन कठिन परिस्थितियों से जूझने को ही आदर्श समझते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों को सहन तो कर लेगा पर उन्हें स्वयं नहीं चुनेगा। वह संघर्ष और युद्ध जैसी जीवन-स्थिति के बजाय शांत और स्थिर जीवन को प्राथमिकता देगा। यदि तुमने अपने स्वयं के दोषों से छुटकारा पा लिया है तो फिर दूसरों के दोषों से लगातार लड़ते रहने में बहुत लाभ नहीं है। कोई कह सकता है, “तीस अत्याचारियों ने सुकरात (Socrates) को गिरफ्तार कर लिया था। फिर भी वे उसके मनोबल को तोड़ नहीं सके।” तो इससे क्या अंतर पड़ता है कि मालिक या उत्पीड़क कितने हैं? दासता तो अंततः एक ही चीज़ है। जो व्यक्ति उस एक चीज़, दासता को तुच्छ समझना सीख लेता है, वह स्वतंत्र है, चाहे उसके चारों ओर अत्याचार करने वालों की कितनी ही बड़ी भीड़ क्यों न खड़ी हो।
अब विदा लेने का समय आ गया है। लेकिन पहले मुझे अपना बंदरगाह-कर चुका देना चाहिए, “अपने दोषों की पहचान ही उपचार का प्रारंभ है।” मुझे लगता है कि यहाँ एपिक्यूरस ने बहुत अच्छी बात कही है। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह गलत कर रहा है, वह स्वयं को सुधारने की इच्छा भी नहीं रखता। अपने को सुधारने से पहले तुम्हें अपनी गलती का एहसास होना चाहिए। कुछ लोग तो अपने दोषों पर गर्व करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे लोगों के मन में उपचार का कोई विचार होगा? निश्चय ही नहीं क्योंकि वे अपनी बुरी आदतों को ही गुण समझते हैं।
अपने विरुद्ध यथासंभव कठोर आरोप लगाओ। फिर जाँच-पड़ताल करो। पहले अभियोग लगाने वाले की भूमिका निभाओ, फिर न्यायाधीश की, और अंत में पक्ष-वकील की। कभी-कभी स्वयं को दोषी ठहराओ!
अभी के लिए विदा

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