Friday, 3 July 2026

मन की उत्कृष्टता के संदर्भ में -- पत्र - 27 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

“तुम कहते हो, ‘तुम मुझे उपदेश कैसे दे सकते हो? क्या तुमने पहले स्वयं को उपदेश दे लिया है? क्या तुमने अपने जीवन को पूरी तरह व्यवस्थित कर लिया है? क्या इसी कारण तुम्हारे पास दूसरों को सुधारने का समय है?’ मैं इतना पाखंडी नहीं हूँ कि स्वयं बीमार रहते हुए दूसरों को उपचार बताऊँ। नहीं, मैं भी मानो उसी रोगियों के वार्ड में पड़ा हूँ, जहाँ तुम हो। मैं तुमसे हमारी साझा बीमारी के बारे में बात कर रहा हूँ और उन उपायों को बाँट रहा हूँ जो हम दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए मेरी बात ऐसे सुनो जैसे मैं स्वयं से बात कर रहा हूँ। मैं तुम्हें अपने निजी कक्ष में आने दे रहा हूँ और तुम्हारे सामने खड़े रहते हुए स्वयं को ही निर्देश दे रहा हूँ।”


Art by Suza 

    मैं स्वयं से स्पष्ट और ऊँचे स्वर में कहता हूँ, “अपने बीते वर्षों की गिनती करो और तब तुम्हें लज्जा होगी कि आज भी तुम्हारी इच्छाएँ और संकल्प वही हैं जो बचपन में थे। अपने जीवन के अंतिम दिन के निकट आते समय स्वयं को यह उपहार दो कि तुम्हारे दोष तुमसे पहले ही मर जाएँ। उन उथल-पुथल मचाने वाली इच्छाओं को त्याग दो, जिन्होंने तुम्हें इतनी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया है। वे न केवल पहले से हानि पहुँचाती हैं बल्कि बाद में भी कष्ट देती हैं। जिस प्रकार अपराध किए जाने के बाद, भले ही वे पकड़े न जाएँ, उनका भय और चिंता मन से नहीं जाती, उसी प्रकार अनुचित इच्छाओं के समाप्त हो जाने पर भी उनका पश्चाताप बना रहता है। वे न तो स्थायी हैं, न विश्वसनीय। यदि वे कोई प्रत्यक्ष हानि न भी पहुँचाएँ तब भी वे क्षणभंगुर हैं।

    इसके बजाय चारों ओर देखो और ऐसे कल्याण की खोज करो जो बना रहे। ऐसा कोई कल्याण नहीं है, सिवाय उसके जिसे मन स्वयं अपने भीतर से खोज निकालता है। केवल सद्गुण ही स्थायी और निर्विघ्न आनंद प्रदान करता है। यदि कभी उस आनंद के मार्ग में कोई बाधा आ भी जाए तो वह केवल उतनी ही देर के लिए होती है जितनी देर बादल दिन के प्रकाश को ढँकते हैं, वे उसके नीचे से गुजर जाते हैं पर कभी उसे पराजित नहीं कर पाते।” तुम्हें वह आनंद कब प्राप्त होगा? अब तक तुम निष्क्रिय नहीं रहे हो पर अब अपनी गति बढ़ाओ। अभी बहुत काम शेष है। यदि तुम परिणाम चाहते हो तो आवश्यक ध्यान और परिश्रम तुम्हें स्वयं ही करना होगा। यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे किसी दूसरे को सौंपा जा सके।

    साहित्यिक कार्य का एक ऐसा प्रकार भी है जिसमें दूसरों की सहायता ली जा सकती है। मेरी स्मृति में एक व्यक्ति था जिसका नाम कैल्विसियस सबिनुस था। वह अत्यंत धनवान था पर उसका स्वभाव किसी मुक्तदास (पूर्व दास) जैसा था। मैंने कभी इतना अशिष्ट और भद्दे आचरण वाला व्यक्ति इतनी बड़ी संपत्ति का स्वामी नहीं देखा।

    उसकी स्मरणशक्ति इतनी कमजोर थी कि कभी वह यूलिसीस का नाम भूल जाता, कभी अकिलीस का तो कभी प्रियम का। इन व्यक्तियों को वह उतना ही जानता था जितना हम अपने बचपन से साथ रहे सेवकों को जानते हैं। वृद्ध नाम-घोषक (नॉमेनक्लेटर) जब किसी का नाम याद नहीं रख पाता तो वह कोई नाम गढ़ लेता है। पर जितने गलत नामों से कैल्विसियस ट्रोजनों और आखैयनों को पुकारता था, उतनी गलतियाँ शायद ही किसी ने की हों। फिर भी वह विद्वान दिखाई देना चाहता था। इसलिए उसने एक उपाय निकाला। उसने बहुत धन खर्च करके दास खरीद लिए। उनमें से एक को होमर का संपूर्ण काव्य कंठस्थ था, दूसरे को हेसियड का और नौ अन्य दासों को अलग-अलग गीतिकवियों की रचनाएँ याद कराई गई थीं। इस पर भारी खर्च होना स्वाभाविक था क्योंकि जो दास इस योग्य नहीं मिलते थे, उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित करवाया जाता था।

    जब उसने यह पूरा दल एकत्र कर लिया तो वह अपने भोज-मेहमानों को परेशान करने लगा। वे दास उसके पैरों के पास खड़े रहते थे। वह उनसे उद्धृत करने के लिए पंक्तियाँ पूछता रहता था। फिर भी, जबकि वे हर समय उसकी सहायता के लिए मौजूद रहते थे, वह अक्सर किसी वाक्य के बीच में ही रुक जाता और आगे नहीं बढ़ पाता।

    सैटेलियस क्वाड्राटुस नाम का एक व्यक्ति था। वह धनी और मूर्ख लोगों का लाभ उठाया करता था। वह उनकी खुशामद भी करता था। जैसा कि अक्सर ऐसे लोगों के साथ होता है, उनका उपहास भी उड़ाता था। उसी ने सबिनुस को यह विश्वास दिला दिया कि उसके भोजन परोसने वाले सेवक भी साहित्य के विद्वान होने चाहिए। जब सबिनुस ने कहा कि ऐसे दासों पर उसे प्रति व्यक्ति एक लाख सेस्टर्सेस खर्च करने पड़े हैं तो सैटेलियस ने उत्तर दिया, “इतने धन में तो तुम कई पुस्तकालय खरीद सकते थे।” लेकिन सबिनुस का मानना था कि उसके घर के किसी भी सदस्य के पास जो ज्ञान है, वह मानो उसका अपना ही ज्ञान है। फिर उसी सैटेलियस ने उसे कुश्ती सीखने के लिए भी प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जबकि सबिनुस शारीरिक रूप से दुर्बल, पीला और रोगग्रस्त था। जब सबिनुस ने कहा, “मैं यह कैसे कर सकता हूँ? मैं तो मुश्किल से जीवित हूँ।” सैटेलियस ने उत्तर दिया, “अरे, ऐसी बात मत कहो! क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि तुम्हारे पास कितने स्वस्थ और बलवान दास हैं?” मन की उत्कृष्टता न तो उधार ली जा सकती है और न खरीदी जा सकती है। मुझे तो लगता है कि यदि वह बिक्री के लिए उपलब्ध भी होती तब भी उसका कोई खरीदार न मिलता। लेकिन दुष्टता ऐसी चीज़ है जिसे लोग प्रतिदिन खरीदते रहते हैं।

    लेकिन पहले वह देन ले लो जो मैं तुम्हारा ऋणी हूँ और फिर विदा लो, “जो निर्धनता प्रकृति द्वारा निर्धारित सीमाओं के अनुसार स्वयं को ढाल लेती है, वही वास्तविक संपत्ति है।” एपिक्यूरस इस बात को अपने अनेक स्थानों पर बार-बार कहता है। परंतु किसी बात को तब तक बार-बार कहना अधिक नहीं कहलाता, जब तक वह भली-भाँति सीखी और आत्मसात न कर ली जाए। कुछ लोगों को केवल उपचार दिखा देना पर्याप्त होता है। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके लिए उन उपचारों को बार-बार और दृढ़ता से मन में बैठाना पड़ता है।

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