प्रिय लूसीलियस
जहाँ तक हमारे उन दो मित्रों का संबंध है, हमें प्रत्येक के साथ अलग ढंग से व्यवहार करना चाहिए। एक के दोषों को दूर करने की आवश्यकता है जबकि दूसरे के दोषों को तोड़कर समाप्त करने की। मैं पूरी स्पष्टवादिता का प्रयोग करूँगा, यदि मैं उसे अप्रसन्न नहीं करता तो मैं उससे प्रेम नहीं करता।
“क्या?” तुम कहते हो। “क्या तुम चालीस वर्ष के एक शिष्य को अपने संरक्षण में लेने का इरादा रखते हो? उसकी आयु का विचार करो जो अब कठोर हो चुकी है और जिसे संभालना कठिन है। उसे फिर से नहीं ढाला जा सकता। वस्तुओं को तभी आकार दिया जाता है जब वे नरम हों।” मुझे नहीं पता कि मैं सफल होऊँगा या नहीं लेकिन मैं उसके प्रति अपने कर्तव्य में असफल होने की अपेक्षा अपने प्रयास में असफल होना अधिक पसंद करूँगा। तुम्हें भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। यदि तुम असंयम के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े हो जाओ और उन्हें बार-बार उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने तथा कुछ सहने के लिए बाध्य करो तो लंबे समय से बीमार लोग भी स्वस्थ किए जा सकते हैं।
मुझे दूसरे व्यक्ति के बारे में भी बहुत अधिक विश्वास नहीं है सिवाय इस बात के कि वह अभी भी अपने दुष्कर्मों पर लज्जित हो जाता है। हमें उस लज्जा-बोध का पोषण करना चाहिए। एक बार वह उसके मन में दृढ़ हो जाए तो आशा के लिए कुछ स्थान रहेगा। चूँकि वह इस मामले में पुराना अभ्यस्त है, मुझे लगता है कि हमें उसके साथ पहले वाले की अपेक्षा अधिक कोमलता से व्यवहार करना चाहिए ताकि वह स्वयं से ही निराश न हो जाए। उसके पास जाने का इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा, जितना अभी है, जब वह एक शांत अवधि में है, जब उसमें एक सुधरे हुए चरित्र की झलक दिखाई देती है। उसकी यह शांति दूसरों को धोखा दे चुकी है पर मुझे नहीं। मैं अपेक्षा करता हूँ कि उसके दोष फिर लौटेंगे और पहले से अधिक प्रबल रूप में लौटेंगे क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे समाप्त नहीं हुए हैं बल्कि केवल कुछ समय के लिए दबे हुए हैं। मैं इस विषय पर कुछ दिन लगाऊँगा और पता करूँगा कि कुछ किया जा सकता है या नहीं।
जहाँ तक तुम्हारा प्रश्न है, अपना साहस दिखाओ। जैसा कि तुम दिखाते भी हो और अपना बोझ हल्का करो। जिन वस्तुओं के हम स्वामी हैं उनमें से एक भी आवश्यक नहीं है। हमें केवल प्रकृति के नियम की ओर लौटना है और तब संपदा हमारे लिए तैयार और उपलब्ध मिलेगी। जिसकी हमें आवश्यकता है, वह या तो निःशुल्क है या बहुत सस्ता। रोटी और पानी ही वे चीज़ें हैं जिनकी माँग प्रकृति करती है। इनके लिए कोई भी इतना गरीब नहीं होता। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को इन्हीं तक सीमित कर लेता है, वह सुख-समृद्धि में जुपिटर के साथ भी प्रतिस्पर्धा कर सकता है, जैसा कि एपिक्यूरस कहता है। और एपिक्यूरस की बात चली है तो मैं इस पत्र में उसका एक सूत्र-वाक्य भी संलग्न कर रहा हूँ। वह कहता है, “हर कार्य इस प्रकार करो मानो एपिक्यूरस तुम्हें देख रहा हो।”
निस्संदेह, अपने ऊपर निगरानी रखना और किसी ऐसे व्यक्ति को आदर्श बनाना लाभदायक है जिसकी उपस्थिति तुम्हारे आचरण और योजनाओं में अंतर ला सकती हो। और निश्चय ही यह कहीं अधिक महान है कि तुम इस प्रकार जीवन बिताओ मानो कोई श्रेष्ठ पुरुष सदा तुम्हारे सामने उपस्थित हो और तुम्हें देख रहा हो। लेकिन मैं इससे भी कम पर संतुष्ट हूँ। तुम्हारा प्रत्येक कार्य इस प्रकार हो मानो कोई उसे देख रहा हो। एकांत हमारे भीतर हर प्रकार के दोष को प्रोत्साहित करता है। जब तुम इतनी प्रगति कर लो कि स्वयं अपने प्रति भी श्रद्धा रखने लगो, तब तुम अपने मार्गदर्शक को विदा कर सकते हो लेकिन तब तक अपने आपको किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के संरक्षण में रखो। वह कैटो हो या स्किपियो या लेलियस या कोई और ऐसा व्यक्ति, जिसकी उपस्थिति में अत्यन्त दुष्ट स्वभाव के लोग भी अपने दोषों को दबा लें। इसी बीच, स्वयं को ऐसा व्यक्ति बनाने का प्रयास करो जिसकी संगति में तुम स्वयं भी कोई गलत काम करने का साहस न कर सको।
जब तुम ऐसा कर लोगे और अपनी ही दृष्टि में कुछ सम्मान प्राप्त करने लगोगे तब मैं तुम्हें वह करने की अनुमति देना शुरू करूँगा जिसकी सलाह एपिक्यूरस भी देता है, “विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ, जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो।”
तुम्हें स्वयं को बहुत से लोगों से अलग रखना चाहिए, जब तक कि तुम उस स्थिति में न पहुँच जाओ जहाँ अकेले रहना तुम्हारे लिए सुरक्षित हो। उनमें से प्रत्येक को अलग-अलग देखकर विचार करो। ऐसा एक भी नहीं है जो किसी और की संगति की अपेक्षा अपनी ही संगति में अधिक अच्छा हो। विशेष रूप से उसी समय एकांत में चले जाओ जब तुम्हें भीड़ में रहने के लिए विवश किया जा रहा हो। बशर्ते कि तुम एक अच्छे, शांत और संयमी व्यक्ति हो। अन्यथा तुम्हें अपने आप से दूर होकर भीड़ में चले जाना चाहिए। जहाँ तुम अभी हो, वहाँ तुम एक बुरे आदमी के बहुत निकट हो।
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment