प्रिय लूसीलियस
कुछ समय पहले मैं तुमसे कह रहा था कि बुढ़ापा मुझे सामने दिखाई दे रहा है। अब मुझे डर है कि मैं बुढ़ापे को भी पीछे छोड़ चुका हूँ। अब मेरी आयु और निश्चित रूप से मेरा शरीर, किसी दूसरे नाम के योग्य हैं। क्योंकि 'वृद्ध' शब्द उस आयु के लिए है जो बहुत आगे बढ़ चुकी हो न कि उस अवस्था के लिए जिसमें शरीर टूटने-बिखरने लगे। इसलिए मुझे उन जर्जर लोगों में गिनो जो जीवन के अंतिम छोर के बहुत निकट पहुँच चुके हैं।
फिर भी, मैं तुम्हारी उपस्थिति में स्वयं को धन्यवाद देता हूँ कि जहाँ मुझे अपने शरीर में दुर्बलता का अनुभव होता है वहीं अपने मन में मुझे किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता। केवल मेरे दोष ही बूढ़े हुए हैं। मेरे वे हिस्से जो उन दोषों की सेवा करते हैं। मेरा मन अब भी स्फूर्तिवान है और इस बात से प्रसन्न है कि उसे मेरे शरीर के साथ बहुत कम काम करना पड़ता है। उसने अपने बोझ का बड़ा भाग उतार फेंका है। वह मानो उछल-कूद कर रहा है और बुढ़ापे के विषय में मुझसे वाद-विवाद करता है। उसका कहना है कि यही उसका उत्कर्षकाल है। आओ, उसकी बात पर विश्वास करें और उसे उसके स्वाभाविक एवं उचित लाभों का पूरा उपयोग करने दें।
मेरा मन मुझसे कहता है कि मैं इस विषय पर विचार करूँ और यह समझूँ कि मेरी शांति तथा संयमित जीवन-शैली में कितना योगदान बुद्धि का है और कितना मेरी आयु का। साथ ही, मुझे सावधानी से यह भेद करना चाहिए कि कौन-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं कर नहीं सकता और कौन-सी ऐसी हैं जिन्हें मैं करना ही नहीं चाहता। इसका उद्देश्य यह है कि यदि कोई ऐसी बात हो जिसे न कर पाने पर मुझे प्रसन्नता होती है तो मैं उसे ऐसी चीज़ मानूँ जिसे मैं करना ही नहीं चाहता। शिकायत करने की आखिर क्या बात है? यदि वह सब, जिसका समाप्त होना आवश्यक था, वास्तव में समाप्त हो गया है तो इसमें समस्या ही क्या है?
“यह तो बहुत बड़ी समस्या है,” तुम कहते हो, “कि कोई व्यक्ति धीरे-धीरे मुरझाए और नष्ट हो जाए और यदि ठीक-ठीक कहूँ तो पिघलता चला जाए। क्योंकि हम एक ही झटके में धराशायी नहीं होते; बल्कि हम थोड़ा-थोड़ा करके क्षीण होते हैं, क्योंकि हर दिन हमारी शक्ति का कुछ अंश छीन लेता है।” तो यदि हमारा स्वभाव इसी प्रकार धीरे-धीरे अपने अंत की ओर ढल रहा है तो क्या इससे बेहतर कोई मार्ग हो सकता है? ऐसा नहीं कि अचानक आघात से या जीवन से तत्काल विदा हो जाना कोई बुरी बात है किन्तु यह तो सबसे सहज मार्ग है, बस चुपचाप फिसलते हुए चले जाना।
जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं स्वयं को ऐसे परखता हूँ मानो परीक्षा की घड़ी निकट आ रही हो, मानो वह दिन सामने खड़ा हो जो मेरे समस्त वर्षों का निर्णय करने वाला है। मैं अपने आप से कहता हूँ, “अब तक मेरे शब्द और कर्म कुछ भी सिद्ध नहीं करते। वे तो साहस के केवल छोटे और भ्रामक प्रमाण हैं, जो बहुत-सी डींगों और खोखली बातों में लिपटे हुए हैं। मृत्यु ही मुझे बताएगी कि मैंने वास्तव में कितनी प्रगति की है।” इसीलिए मैं निडर होकर उस दिन की तैयारी करता हूँ जब सारे छल और सारे मुखौटे उतर जाएँगे और मैं स्वयं अपना न्याय करूँगा। क्या यह केवल साहसपूर्ण बातें हैं या मैं वास्तव में वही कहता हूँ जो सोचता हूँ? भाग्य के विरुद्ध जो चुनौतीपूर्ण शब्द मैंने कहे थे, क्या वे सचमुच वास्तविक थे या वे केवल रंगमंच का अभिनय थे—सिर्फ़ एक भूमिका निभाना?
“दूसरों के आकलनों को दूर फेंक दो। वे हमेशा अविश्वसनीय और परस्पर विरोधी होते हैं। जीवनभर चलने वाले अध्ययन-कार्यक्रमों को भी छोड़ दो क्योंकि शीघ्र ही, अब किसी भी क्षण, मृत्यु तुम्हारा निर्णय करने वाली है। मेरा आशय यही है। व्याख्यान, विद्वत्-गोष्ठियाँ, दार्शनिकों की शिक्षाओं से चुने गए कथन और शिक्षित लोगों की बातचीत—ये सब मन की वास्तविक शक्ति को प्रकट नहीं करते। क्योंकि वाणी तो वहाँ भी निर्भीक होती है जहाँ बोलने वाला व्यक्ति अत्यन्त भयभीत होता है। तुमने वास्तव में क्या प्राप्त किया है, यह तभी प्रकट होगा जब तुम अपनी अंतिम साँस लोगे। मैं इस निर्णय को स्वीकार करता हूँ, उसके न्याय से मैं तनिक भी नहीं डरता।”
ये बातें मैं अपने आप से कहता हूँ लेकिन मान लो कि मैंने इन्हें तुमसे भी कही हैं। तुम मुझसे युवा हो पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है? वर्षों का वितरण किसी निश्चित हिस्से या कोटे के अनुसार नहीं किया जाता। यह जानने का कोई उपाय नहीं कि मृत्यु किस मोड़ पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। इसलिए तुम्हें हर मोड़ पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अच्छा, मैं यहीं रुकना चाहता था। मेरा हाथ पत्र समाप्त करने के लिए हस्ताक्षर करने ही वाला था। लेकिन मुझे हिसाब चुकता करना है और इस पत्र को उसकी यात्रा-व्यय राशि भी देनी है। मान लो कि मैं यह न बताऊँ कि मैं अपना ऋण कहाँ से ले रहा हूँ। तुम जानते ही हो कि मैं किसकी धन-पेटी का उपयोग करता हूँ। मुझे थोड़ा समय दो। भुगतान घर से आ जाएगा तब तक के लिए यह उधार एपिक्यूरियस देगा। वह कहता है, “मृत्यु का अभ्यास करो।” यदि इस विचार को अधिक पूर्ण रूप में बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए, “मृत्यु को भली-भाँति समझना और सीख लेना एक उत्कृष्ट बात है।”
शायद तुम सोचते हो कि ऐसी चीज़ सीखना समय की बर्बादी है जिसका उपयोग तुम्हें केवल एक ही बार करना होगा। लेकिन यही तो कारण है कि हमें उसका अभ्यास करना चाहिए। यदि हम यह परख ही नहीं सकते कि हमने उसे सीखा है या नहीं, तो हमें उसे निरंतर सीखते रहना चाहिए। “मृत्यु का अभ्यास करो”, जो यह कहता है, वह वास्तव में हमें स्वतंत्रता का अभ्यास करने को कहता है। जिसने मृत्यु को सीख लिया, उसने दासता को भुला दिया। क्योंकि मृत्यु सभी शक्तियों से ऊपर है और निस्संदेह उन सबकी पहुँच से बाहर है। मृत्यु को कारागार, बेड़ियों या कैदखाने से क्या लेना-देना? उसका द्वार तो सदा खुला रहता है। केवल एक ही जंजीर है जो हमें बाँधे रखती है—जीवन के प्रति हमारा मोह। यह सच है कि हम उसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते। फिर भी हमें उसे कम अवश्य करना चाहिए ताकि जब परिस्थितियाँ हमसे कुछ माँगें तो कोई चीज़ हमें रोक न सके और न ही हमें उस कार्य को तुरंत करने के लिए तैयार होने से वंचित करे जिसे किसी न किसी दिन करना ही है।
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