प्रिय लूसीलियस
यदि तुम अच्छी प्रगति कर रहे हो और स्वयं को इस योग्य समझते हो कि एक दिन अपने ही स्वामी बन सको तो मुझे प्रसन्नता है। क्योंकि यदि मैं तुम्हें उस स्थिति से बाहर निकाल सकूँ, जहाँ तुम इस समय बिना किसी आशा के निकलने का मार्ग खोजते हुए भटक रहे हो तो यह मेरे लिए भी गौरव की बात होगी। लेकिन मैं तुमसे यह चाहता हूँ, प्रिय लूसीलियस... और इसी के लिए तुम्हें प्रेरित करता हूँ। दर्शन को अपने हृदय की गहराइयों तक उतरने दो और अपनी प्रगति की परीक्षा अपने भाषणों या लेखन से नहीं बल्कि अपने मन की दृढ़ता और अपनी इच्छाओं में आई कमी से करो। अपने कर्मों द्वारा अपने शब्दों को सत्य सिद्ध करो।
जो लोग श्रोताओं की सहमति प्राप्त करना चाहते हैं, उनका उद्देश्य कुछ और होता है। आज के वे वक्ता जो केवल ऐसे युवकों के मनोरंजन के लिए लंबे और विविध प्रकार के प्रलाप प्रस्तुत करते हैं जिनके पास करने के लिए कोई सार्थक काम नहीं है, उनका उद्देश्य भी कुछ और होता है। दर्शन हमें बोलना नहीं बल्कि कर्म करना सिखाता है। उसकी अपेक्षा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति उसी आदर्श के अनुसार जीवन जिए जिसे उसने स्वयं अपने लिए निर्धारित किया है। उसका जीवन न तो स्वयं अपने भीतर विरोध में हो और न ही उसके कथनों से भिन्न हो। उसके सभी कार्यों में एक ही स्वर और एक ही संगति हो। यही बुद्धिमत्ता का मुख्य कार्य है। यही उसका सर्वोत्तम प्रमाण भी है कि कर्म शब्दों के अनुरूप हों। व्यक्ति हर स्थान पर एक-सा बना रहे। वह स्वयं के अनुरूप हो। "क्या ऐसा कोई व्यक्ति है?" बहुत अधिक नहीं लेकिन कुछ अवश्य हैं। यह वास्तव में कठिन है। मेरा यह आशय भी नहीं है कि बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा एक जैसे कदम उठाता है बल्कि केवल इतना है कि वह एक ही मार्ग पर चलता है।
इसलिए स्वयं का परीक्षण करो। क्या तुम्हारा पहनावा तुम्हारे घर-परिवार की स्थिति से मेल नहीं खाता? क्या तुम अपने ऊपर तो उदारतापूर्वक खर्च करते हो लेकिन अपने परिवार के प्रति कंजूसी बरतते हो? क्या तुम भोजन में सादगी दिखाते हो लेकिन भवन-निर्माण और निर्माण-कार्य पर अत्यधिक खर्च करते हो? एक बार और हमेशा के लिए जीवन जीने का कोई एक नियम अपनाओ और अपने पूरे जीवन को उसके अनुरूप बना लो। कुछ लोग घर में तो अत्यधिक मितव्ययिता दिखाते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हैं और ठाठ-बाट से रहते हैं। यह असंगति एक दोष है। यह इस बात का संकेत है कि मन अभी भी डगमगा रहा है और उसने अभी तक अपने वास्तविक स्वभाव को दृढ़ता से नहीं अपनाया है।
इसके अतिरिक्त, मैं तुम्हें बताऊँगा कि यह असंगति, यह कर्म और अभिप्राय के बीच का अंतर, कहाँ से उत्पन्न होता है। कोई भी व्यक्ति इस बात पर स्थिर होकर विचार नहीं करता कि वह वास्तव में क्या चाहता है. यदि करता भी है तो उस पर दृढ़ नहीं रहता। बल्कि उससे हट जाता है। वह केवल अपने आचरण में परिवर्तन ही नहीं करता बल्कि पीछे की ओर लौट जाता है और फिर वही व्यवहार अपनाने लगता है, जिसे वह त्याग देने की शपथ ले चुका था। इसलिए मैं बुद्धिमत्ता की पुरानी परिभाषाओं को एक ओर रखकर तुम्हें ऐसी परिभाषा दूँगा जो सम्पूर्ण मानवीय जीवन-पद्धति को समेट ले। यह परिभाषा मुझे संतोषजनक लगती है। बुद्धिमत्ता क्या है? सदैव एक ही चीज़ की इच्छा करना और सदैव एक ही चीज़ को अस्वीकार करना। इसमें यह शर्त जोड़ने की भी आवश्यकता नहीं कि जिसकी इच्छा की जाए वह उचित हो क्योंकि केवल उचित और सही वस्तु के प्रति ही मनुष्य की इच्छा निरंतर और एकरूप बनी रह सकती है।
इसी कारण लोग यह नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, सिवाय उस क्षण के जब उनकी इच्छा जागृत होती है। किसी ने भी अपने जीवन के लिए समग्र रूप से यह निर्णय नहीं किया है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए। उनका निर्णय प्रतिदिन बदलता रहता है और अक्सर अपने ही विपरीत रूप में परिवर्तित हो जाता है। बहुत से लोग जीवन ऐसे जीते हैं मानो वह कोई खेल हो। इसलिए जिस मार्ग पर तुम चलना प्रारम्भ कर चुके हो, उसी पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहो। सम्भव है कि वह तुम्हें शिखर तक पहुँचा दे। यदि वहाँ तक न भी पहुँचा सके तो कम-से-कम तुम्हें ऐसे स्थान तक अवश्य ले जाएगा जहाँ तुम स्वयं जान सकोगे कि यह अभी शिखर नहीं है।
तुम कहते हो, “यदि परिवार की आय समाप्त हो गई, तो मेरे आश्रितों और अनुयायियों के उस समूह का क्या होगा?” जब तुम उस समूह का पालन-पोषण करना बंद कर दोगे तो वह स्वयं अपना पालन करने लगेगा। और यदि ऐसा न हुआ तो निर्धनता तुम्हें वह बात सिखा देगी जिसे तुम स्वयं को नहीं सिखा पा रहे हो। तुम्हारे सच्चे और वास्तविक मित्र तब भी तुम्हारे साथ बने रहेंगे, जबकि जो लोग तुमसे नहीं बल्कि किसी और लाभ से जुड़े हुए थे, वे तुम्हें छोड़कर चले जाएँगे। यदि किसी और कारण से नहीं तो क्या केवल इसी कारण निर्धनता से प्रेम नहीं किया जाना चाहिए? वह तुम्हें दिखा देगी कि तुम्हारे मित्र वास्तव में कौन हैं। आह! वह दिन कब आएगा जब कोई व्यक्ति तुम्हारे पद, अधिकार या प्रतिष्ठा के कारण तुमसे झूठ नहीं बोलेगा!
इसलिए अपनी अन्य सभी प्रार्थनाएँ ईश्वर के हाथों में छोड़ दो और अपने विचारों, अपनी चिंताओं तथा अपनी इच्छाओं को केवल इसी एक बात पर केंद्रित करो। अपने आप से संतुष्ट रहने पर और उन शुभ वस्तुओं से संतुष्ट रहने पर जो तुम्हारे अपने भीतर से उत्पन्न होती हैं। इससे अधिक निकट और कौन-सी समृद्धि हो सकती है? स्वयं को उस छोटी-सी संपदा तक सीमित कर लो जिसे भाग्य या संयोग तुमसे छीन नहीं सकता।
और ताकि तुम्हारे लिए ऐसा करना अधिक सरल हो जाए। इस पत्र के साथ भेजी जाने वाली भेंट भी उसी विषय का उल्लेख करेगी। मैं उसे तुरंत प्रस्तुत करता हूँ। यद्यपि तुम शिकायत कर सकते हो फिर भी मैं अपनी यह देनदारी प्रसन्नतापूर्वक चुकाऊँगा और वह भी एपिक्यूरस के माध्यम से:
“मुझ पर विश्वास करो, तुम्हारी वाणी एक साधारण बिछौने पर और जर्जर वस्त्रों में कहीं अधिक प्रभावशाली होगी। तब तुम केवल बोल ही नहीं रहे होगे। तुम अपने कथनों का प्रमाण भी दे रहे होगे।”
हमारे मित्र दिमित्रीयस (Demetrius) के शब्दों को मैं निश्चित ही एक भिन्न ढंग से सुनता हूँ, जब मैंने यह देखा कि वह किस प्रकार सोते थे। न केवल गद्दे के बिना बल्कि कंबल के बिना भी। वह केवल सत्य का उपदेश नहीं देते, वे उसके साक्षी भी बनते हैं।
“यह क्या? क्या कोई व्यक्ति धन को अपनी जेब में रखते हुए भी उसका तिरस्कार नहीं कर सकता?” क्यों नहीं? उस व्यक्ति में भी महान आत्मबल होता है जो अपने चारों ओर धन का अंबार लगा हुआ देखता है और इस आश्चर्य पर खुलकर हँस पड़ता है कि यह सब उसके पास कैसे आ गया। दूसरे लोग उसे बताते हैं कि यह धन उसका है। स्वयं उसे तो मानो इसका पूरा एहसास भी नहीं होता। वैभव के बीच रहते हुए भी उससे भ्रष्ट न होना एक महान बात है। वह व्यक्ति महान है जो अपनी संपत्ति के बीच रहते हुए भी मन से निर्धन बना रहता है।
तुम कहते हो, “मैं नहीं जानता कि ऐसा व्यक्ति यदि निर्धनता में आ जाए तो उसे किस प्रकार सहन करेगा।” मैं भी नहीं जानता, एपिक्यूरस, कि तुम्हारा वह निर्धनता का गर्व करने वाला व्यक्ति यदि धन-संपत्ति प्राप्त कर ले तो क्या वह तब भी धन का उसी प्रकार उपहास करेगा। इसलिए हमें दोनों के मन का परीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या एक व्यक्ति अपनी निर्धनता में प्रसन्न है। क्या दूसरा अपनी संपन्नता में आसक्त हुए बिना रह सकता है। अन्यथा केवल खाट पर सोना और फटे-पुराने वस्त्र पहनना अच्छे चरित्र का बहुत बड़ा प्रमाण नहीं है। यदि यह स्पष्ट न हो कि व्यक्ति उन्हें विवशता से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से स्वीकार कर रहा है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि कोई व्यक्ति उन साधारण वस्तुओं से ऐसे नहीं भागता मानो उनसे बेहतर कुछ और हो बल्कि स्वयं को पहले से ही उनके लिए तैयार रखता है और उन्हें सहन करना सरल समझता है। वास्तव में, लूसीलियस, यह सरल ही नहीं है जब कोई पहले से इसका अभ्यास कर लेता है तो यह सुखद भी हो जाता है क्योंकि ऐसे जीवन में एक ऐसी वस्तु होती है जिसके बिना कोई भी दूसरी वस्तु आनंददायक नहीं हो सकती और वह है मन की शांति।
इसलिए मुझे लगता है कि वह करना सचमुच आवश्यक है जिसकी मैंने तुम्हें अपने पत्र में सलाह दी थी और जिसे महान व्यक्तियों ने अनेक बार किया है। कुछ दिन ऐसे निर्धारित करो जिनमें हम जान-बूझकर निर्धनता का अभ्यास करें और स्वयं को वास्तविक विपत्ति के लिए तैयार करें। हमें यह और भी अधिक करना चाहिए क्योंकि हम विलासिताओं में डूबे हुए हैं और हर चीज़ को कठोर तथा कठिन समझने लगे हैं। बेहतर है कि मन को उसकी नींद से जगाया जाए। उसे झकझोरा जाए और उसे याद दिलाया जाए कि हमारी प्रकृति को वास्तव में कितनी कम चीज़ों की आवश्यकता होती है। कोई भी मनुष्य धनी पैदा नहीं होता। जो भी इस संसार में जन्म लेता है, उसे केवल दूध और थोड़े-से वस्त्र में संतुष्ट रहने का आदेश मिलता है। हम ऐसी ही शुरुआत से आते हैं और फिर भी अब हमारे लिए पूरे-के-पूरे राज्य भी पर्याप्त नहीं रह गए हैं!
अभी के लिए विदा
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