Thursday, 2 July 2026

प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21

प्रिय लूसीलियस

क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा काम उन लोगों से है जिनके बारे में तुमने लिखा है? तुम्हारा सबसे बड़ा काम तो स्वयं अपने साथ है। समस्या वास्तव में तुम ही हो। तुम्हें यह नहीं पता कि तुम वास्तव में क्या चाहते हो। तुम सम्मानजनक और सदाचारी आचरण की प्रशंसा तो करते हो पर उसका अनुसरण कम करते हो। तुम यह देख लेते हो कि सुख कहाँ है लेकिन उसे पाने का साहस नहीं जुटा पाते। इसलिए, क्योंकि तुम्हें यह स्पष्ट समझ नहीं है कि तुम्हें आगे बढ़ने से क्या रोक रहा है, मैं तुम्हें बतलाऊँगा।

By Giulio Vittini 

    तुम यह मानते हो कि जिन चीज़ों को तुम पीछे छोड़ने वाले हो, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। और जब तुम उस शांति की ओर नज़रें टिकाते हो जिसकी ओर तुम बढ़ रहे हो। तब भी तुम उस जीवन की चमक पर ठहर जाते हो जिसे तुम पीछे छोड़ रहे हो ठीक वैसे ही जैसे कोई व्यक्ति कीचड़ और अँधेरे में उतरने वाला हो। तुम भूल कर रहे हो, लूसीलियस! इस जीवन से उस जीवन की ओर जाना नीचे उतरना नहीं बल्कि ऊपर उठना है। तुम जानते हो कि आभा (glow) और झलकती चमक (gleam) में क्या अंतर है। एक अपने स्वयं के निश्चित स्रोत से प्रकाश देती है जबकि दूसरी किसी और से प्राप्त प्रकाश को परावर्तित करती है। इसी प्रकार इस जीवन और उस जीवन में भी अंतर है। यह जीवन ऐसी चमक से प्रकाशित है जो इसके बाहर से आती है। इसलिए जो भी उसके और प्रकाश के बीच आ जाए, वह इसे गहरे अँधेरे में डुबो सकता है। परन्तु वह जीवन अपने ही प्रकाश और तेज से आलोकित है। उसकी ज्योति उसकी अपनी है।

    तुम्हारा अध्ययन तुम्हें प्रसिद्ध बनाएगा। इस विषय में मैं एपिक्यूरस का एक उदाहरण प्रस्तुत करूँगा। जब वह इडोमिनीअस (Idomeneus) को पत्र लिख रहा था और उसे बाहरी आडंबर तथा दिखावटी जीवन से हटाकर विश्वसनीय और स्थायी यश की ओर लौटने के लिए बुला रहा था (यद्यपि उस समय इडोमेनेउस एक शक्तिशाली राजा का सहायक था और बड़े-बड़े कार्यों का भार संभाल रहा था), तब उसने कहा,  “यदि यश तुम्हारे लिए महत्त्व रखता है तो मेरे पत्र तुम्हें उन सभी बातों से अधिक प्रसिद्ध बनाएँगे जिनमें तुम इस समय लगे हुए हो और जिनके कारण दूसरे लोग तुम्हारी ओर आकर्षित होते हैं।”

    क्या वह सत्य नहीं कह रहा था? यदि एपिक्यूरस ने इडोमिनीअस को पत्र न लिखे होते तो उसके बारे में कौन जानता? वे सभी शक्तिशाली शासक और क्षत्रप, यहाँ तक कि वह राजा भी जिसने इडोमिनीअस को उसका पद प्रदान किया था, आज गुमनामी की गहराइयों में दफन हो चुके हैं। सिसरो के पत्र ही हैं जो एटिकस के नाम को नष्ट होने से बचाए हुए हैं। उससे उसे कोई लाभ न होता कि एग्रीप्पा ने उसकी पुत्री से विवाह किया था और टाइबेरियस ने उसकी पौत्री से या कि ड्रूसस सीज़र उसका प्रपौत्र था। इतने महान नामों के बीच उसका अपना नाम अब नहीं लिया जाता, यदि सिसरो ने उसे अपने पत्रों का प्राप्तकर्ता न बनाया होता। समय की वह खाई जो हम सबको अपने भीतर समेट लेगी, अत्यन्त गहरी है। कुछ ही प्रतिभाशाली मस्तिष्क उसके ऊपर अपना सिर उठा पाते हैं और यद्यपि अंततः उन्हें भी मौन में विलीन होना पड़ता है। फिर भी वे लंबे समय तक विस्मृति का प्रतिरोध करते हैं और अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करते रहते हैं।

    जो वचन एपिक्यूरस अपने मित्र को दे सका था, वही वचन मैं तुम्हें देता हूँ, लूसीलियस। मैं आने वाली पीढ़ियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करूँगा और अपने साथ दूसरों के नाम भी ले जा सकूँगा ताकि वे भी स्थायी रूप से बने रहें। हमारे कवि वर्जिल ने दो व्यक्तियों को चिरस्थायी स्मरण का वचन दिया था और वास्तव में उन्हें प्रदान भी किया:

“हे सौभाग्यशाली युगल! यदि मेरी कविताओं में कुछ सामर्थ्य है... 
तो कोई भी आने वाला दिन तुम्हें युगों की स्मृति से कभी मिटा नहीं सकेगा। 
जब तक एनीअस की संतति अटल कैपिटोल की चट्टान पर निवास करती रहेगी, 
और जब तक रोमन जाति का अधिपति शासन करता रहेगा,
तब तक तुम्हारा स्मरण भी बना रहेगा।”

    जिन लोगों को भाग्य ने घटनाओं और सत्ता के केंद्र में पहुँचा दिया है, जो दूसरों की शक्ति के सहभागी और भागीदार रहे हैं, उन्हें बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त होती है और उनके यहाँ आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती है। परन्तु यह सब तब तक ही रहता है जब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। जैसे ही वे चले जाते हैं, उनका स्मरण भी समाप्त हो जाता है। किन्तु प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व का सम्मान समय के साथ बढ़ता जाता है। और यह सम्मान केवल स्वयं उन रचनाकारों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि उन सभी बातों तक फैल जाता है जो उनकी स्मृति से जुड़ी होती हैं।
    
    अब मैं इडोमिनीअस को अपने पत्र में यूँ ही निःशुल्क स्थान नहीं दूँगा! उसे इसका मूल्य स्वयं चुकाना होगा। उसी को एपिक्यूरस ने वह सुंदर वचन लिखकर भेजा था जिसमें उसने उसे पायथोक्लीज़ को एक असाधारण और निस्संदिग्ध ढंग से समृद्ध बनाने की प्रेरणा दी थी। वह कहता है:

“यदि तुम पायथोक्लीज़ को धनी बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके धन में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए।”

    यह कथन इतना स्पष्ट है कि उसे किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं और इतना सुंदर ढंग से कहा गया है कि उसमें किसी सुधार की भी आवश्यकता नहीं। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि इसे केवल धन-संपत्ति के संदर्भ में मत समझो। जहाँ कहीं भी इसे लागू किया जाएगा, इसका अर्थ वही रहेगा। यदि तुम पायथोक्लीज़ को सम्माननीय बनाना चाहते हो तो तुम्हें उसके सम्मान और पुरस्कारों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ निरंतर आनंद का अनुभव करे तो तुम्हें उसके सुखों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। यदि तुम चाहते हो कि पायथोक्लीज़ एक लंबा और पूर्ण जीवन जिए तो तुम्हें उसके वर्षों में वृद्धि नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी इच्छाओं में कमी करनी चाहिए। तुम्हें इन कथनों को केवल एपिक्यूरस की संपत्ति नहीं समझना चाहिए; ये तो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। मेरा विचार है कि दार्शनिकों को सीनेट की प्रथा अपनानी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा मत प्रस्तुत करता है जिसका कुछ भाग मुझे पसंद आता है तो मैं उससे उसके मत को विभाजित करने के लिए कहता हूँ। फिर मैं उस भाग का अनुसरण करता हूँ जिसे मैं स्वीकार करता हूँ।

    एपिक्यूरस के ये उत्कृष्ट कथन एक और उद्देश्य भी पूरा करते हैं। यही कारण है कि मैं उनका उल्लेख करने के लिए और भी अधिक इच्छुक हूँ। वे उन लोगों को भी प्रमाणित करते हैं, जो निकृष्ट उद्देश्यों से उसकी शरण लेते हैं और यह सोचते हैं कि वहाँ उन्हें अपने दोषों के लिए आड़ मिल जाएगी कि वे जहाँ कहीं भी जाएँ, उन्हें सम्मानपूर्वक और सदाचारपूर्ण जीवन ही जीना चाहिए। जब तुम एपिक्यूरस के उद्यानों में पहुँचोगे और वहाँ यह लिखित वचन देखोगे:

    “हे अतिथि, यहाँ तुम्हारा उत्तम सत्कार होगा; यहाँ सुख को सर्वोच्च कल्याण माना जाता है।”

    तब उस गृह का संरक्षक तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार मिलेगा। वह आतिथ्य और सद्भाव के साथ तुम्हें दलिये की एक थाली और पानी का एक भरपूर पात्र परोसेगा और कहेगा, “क्या यह उत्तम आतिथ्य नहीं है?” वह कहेगा, “ये उद्यान भूख को भड़काते नहीं बल्कि उसे शांत करते हैं। ये ऐसे पेय नहीं देते जो पीने वाले को और अधिक प्यासा बना दें बल्कि प्यास को उसके स्वाभाविक उपचार से बुझाते हैं, जो बिना किसी मूल्य के उपलब्ध है। यही वह सुख है जिसमें मैंने अपना जीवन बिताया है और इसी में वृद्धावस्था तक पहुँचा हूँ।”

    मैं अभी तुमसे उन इच्छाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें केवल समझाने-बुझाने से शांत नहीं किया जा सकता बल्कि जिन्हें समाप्त करने के लिए कुछ वास्तविक वस्तु देनी पड़ती है। जहाँ तक उन अनावश्यक इच्छाओं का संबंध है जिन्हें टाला जा सकता है, डाँटकर रोका जा सकता है या दबाया जा सकता है। मैं तुम्हें केवल इतना स्मरण दिलाता हूँ कि ऐसा सुख प्राकृतिक तो है पर आवश्यक नहीं। तुम उस पर किसी प्रकार के ऋणी नहीं हो जो कुछ भी तुम उसे देते हो, वह स्वेच्छा से देते हो। पेट उपदेश नहीं सुनता। वह केवल अपनी माँग करता है और आग्रह करता है। फिर भी वह कोई कठिन लेनदार नहीं है। उसे बहुत थोड़े में टाला जा सकता है। यदि तुम उसे उतना ही दो जितना उसका अधिकार है न कि उतना जितना तुम दे सकते हो।

अभी के लिए विदा 




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प्रतिभाशाली व्यक्तियों की बुद्धि और कृतित्व के संदर्भ में -- पत्र - 21

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