Friday, 3 July 2026

मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 24 (सेनेका द्वारा लिखे पत्रों का हिंदी अनुवाद)

 प्रिय लूसीलियस 

तुम लिखते हो कि तुम्हें उस मुकदमे के परिणाम की चिंता है जिसे तुम्हारे किसी शत्रु के क्रोध ने तुम्हारे विरुद्ध खड़ा कर दिया है। तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम अपना ध्यान सबसे अच्छे संभावित परिणाम पर केंद्रित करो और आशावादी अपेक्षाओं से अपने मन को शांत करो। आख़िर भविष्य की परेशानियों को पहले ही क्यों झेलना? भविष्य के भय से वर्तमान को नष्ट करने का क्या लाभ? जब कष्ट वास्तव में आएँगे, तब उन्हें सहने का समय होगा। निश्चय ही यह मूर्खता है कि कोई व्यक्ति अभी से दुखी हो जाए केवल इसलिए कि वह बाद में दुखी हो सकता है।


By Suza 

    लेकिन मैं तुम्हें मन की शांति की ओर एक अलग मार्ग से ले जाऊँगा। यदि तुम चिंता से मुक्त होना चाहते हो तो जिस बात के होने से तुम डरते हो, उसे अपने मन में निश्चित रूप से होने वाली घटना मान लो। जो भी वह संभावित बुरी घटना हो, उसका मन ही मन आकलन करो और इस प्रकार अपने भय का सही मूल्यांकन करो। तब तुम्हें शीघ्र ही यह समझ में आ जाएगा कि जिससे तुम डरते हो, वह या तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है या फिर उसका प्रभाव अधिक समय तक रहने वाला नहीं है।

    और तुम्हें साहस देने के लिए मुझे उदाहरण खोजने में भी अधिक समय नहीं लगाना पड़ेगा। हर युग ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। तुम अपनी स्मृति को चाहे सार्वजनिक जीवन की घटनाओं की ओर मोड़ो या निजी जीवन की ओर। तुम्हें ऐसे लोग याद आ जाएँगे जो या तो उच्च चरित्र वाले थे या असाधारण साहस से संपन्न थे। मान लो कि तुम्हें दोषी ठहरा दिया जाए, तब तुम्हारे साथ इससे अधिक बुरा क्या हो सकता है कि तुम्हें निर्वासित कर दिया जाए या जेल में डाल दिया जाए? और क्या इससे भी अधिक भयावह कुछ है कि तुम्हें जला दिया जाए या मृत्यु दे दी जाए? इनमें से प्रत्येक परिस्थिति पर अलग-अलग विचार करो और उन लोगों को याद करो जिन्होंने इन बातों को बहुत महत्व नहीं दिया। तुम्हें उन्हें खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी बल्कि तुम्हारे पास चुनने के लिए अनेक उदाहरण होंगे। रुटिलियस ने अपने दोषसिद्ध होने को इस प्रकार सहन किया मानो उसे केवल इस बात का दुख हो कि उसका गलत मूल्यांकन किया गया था। मेटेलस ने निर्वासन को साहसपूर्वक सहा और रुटिलियस ने तो उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। जहाँ मेटेलस ने अपने देश के हित में वापस लौटना सुनिश्चित किया, वहीं रुटिलियस ने लौटने से इनकार कर दिया ताकि वह सुला का विरोध न करे क्योंकि उस समय सुला का कोई विरोध नहीं कर रहा था। सुकरात ने जेल में रहते हुए भी लोगों को शिक्षा देना जारी रखा। और यद्यपि वहाँ ऐसे लोग मौजूद थे जो उसके भागने की व्यवस्था कर सकते थे, उसने जेल छोड़ने से इनकार कर दिया। वह वहीं रुका रहा क्योंकि उसका उद्देश्य मानव जाति के दो सबसे बड़े भय— मृत्यु और कारावास, को समाप्त कर देना था।

    म्यूशियस ने अपना हाथ स्वयं अग्नि की लपटों में रख दिया। जलना अपने आप में ही एक कठिन बात है लेकिन जब कोई स्वयं ही अपने को जलाने का कारण बने, तब वह और भी अधिक कठिन हो जाता है। देखो, एक ऐसा व्यक्ति, जिसने कोई विशेष शिक्षा नहीं पाई थी, जिसे मृत्यु या पीड़ा के विषय में कोई दार्शनिक उपदेश नहीं मिला था और जो केवल एक सैनिक की कठोरता से सुसज्जित था, अपने असफल प्रयास के लिए स्वयं को दंड दे रहा था। वह अपनी दाहिनी हथेली को शत्रु की अंगीठी पर जलते हुए देखता रहा। उसका मांस हड्डियों से अलग होता जा रहा था। फिर भी उसने अपना हाथ नहीं हटाया, जब तक कि शत्रु ने स्वयं उसके नीचे की आग बुझा नहीं दी। उस शिविर में वह और भी कई ऐसे कार्य कर सकता था जो अधिक सुखद होते लेकिन उससे अधिक साहसपूर्ण कोई कार्य नहीं हो सकता था। देखो, संकटों का सामना करने में सद्गुण (वीरता) कितनी अधिक प्रबल होती है जबकि उन्हें दूसरों पर थोपने में क्रूरता उतनी प्रबल नहीं होती। पोर्सेन्ना के लिए म्यूशियस को उसकी हत्या का प्रयास करने के अपराध के लिए क्षमा कर देना उतना कठिन नहीं था, जितना म्यूशियस के लिए अपने असफल हो जाने पर स्वयं को क्षमा करना कठिन था।

    “तुम कहोगे, ‘ये कथाएँ तो सभी दार्शनिक विद्यालयों में बार-बार सुनाई जाती हैं। जैसे ही तुम मृत्यु को तुच्छ बताने लगोगे, तुम मुझे कैटो की कहानी सुनाने लगोगे।’” और मैं कैटो की बात क्यों न करूँ? उसकी अंतिम रात की बात, जब वह अपने सिरहाने रखी तलवार के पास बैठकर प्लेटो की पुस्तक पढ़ रहा था। अपने अंतिम क्षण के लिए उसने दो ही वस्तुएँ चुनी थीं—एक, ताकि वह मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार हो सके और दूसरी, ताकि यदि आवश्यक हो तो वह उसे प्राप्त भी कर सके। जब उसने अपने सभी कार्यों को, जितना कि उस टूटी-बिखरी और निराशाजनक परिस्थिति में संभव था, व्यवस्थित कर लिया, तब उसने निश्चय किया कि वह ऐसा कदम उठाएगा जिससे किसी व्यक्ति को न तो कैटो की हत्या करने का अवसर मिले और न ही उसे बचाने का। उसने अपनी तलवार निकाली, जिसे उसने उस दिन तक किसी भी हिंसक कार्य से कलंकित नहीं होने दिया था और कहा, “हे भाग्य! मेरे सभी प्रयासों का विरोध करके भी तुमने वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। अब तक मैं अपनी स्वतंत्रता के लिए नहीं बल्कि अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ता रहा हूँ। मेरा उद्देश्य स्वतंत्र होकर जीना नहीं था बल्कि स्वतंत्र लोगों के बीच जीना था। अब जबकि मानवता के लिए वह आशा नष्ट हो चुकी है तो कैटो को सुरक्षित स्थान पर जाने दो।” यह कहकर उसने अपनी देह पर वह प्रहार किया जो उसके लिए मृत्यु का कारण बना। जब चिकित्सकों ने उसके घाव पर पट्टी बाँध दी, तब उसके शरीर में रक्त भी बहुत कम बचा था और शक्ति भी परन्तु उसका साहस और आत्मबल पहले जितना ही अडिग था। अब वह केवल सीज़र के प्रति ही नहीं बल्कि स्वयं अपने प्रति भी कठोर था। उसने अपने नंगे हाथ घाव के भीतर डाल दिए और उस महान आत्मा को, जो किसी भी प्रकार के प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, मुक्त कर दिया; उसने उसे केवल जाने नहीं दिया बल्कि मानो बलपूर्वक अपने शरीर से बाहर निकाल दिया।

    मैं इन उदाहरणों को केवल साहित्यिक प्रदर्शन के लिए नहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ बल्कि तुम्हें उन बातों से न डरने के लिए प्रेरित कर रहा हूँ जो सबसे अधिक भयावह प्रतीत होती हैं। और यह मेरे लिए अधिक सरल होगा यदि मैं तुम्हें यह दिखा सकूँ कि केवल महान और शक्तिशाली पुरुषों ने ही उस क्षण को तुच्छ नहीं समझा, जब आत्मा शरीर को छोड़ती है बल्कि ऐसे लोग भी, जो अन्य बातों में साधारण या कमजोर थे, इस विषय में सबसे वीर पुरुषों के समान साहस दिखा चुके हैं। उदाहरण के लिए, ग्नियस पोम्पेई के श्वसुर स्किपियो को लो। प्रतिकूल हवा के कारण उन्हें अफ्रीका की ओर लौटना पड़ा और जब उन्होंने देखा कि उनका जहाज़ शत्रुओं के हाथ में पड़ चुका है तो उन्होंने अपनी तलवार अपने शरीर में भोंक ली। जब लोगों ने पूछा कि सेनापति कहाँ हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, “सेनापति कुशल हैं।” इस एक वाक्य ने उन्हें उनके पूर्वजों के समकक्ष ला खड़ा किया और अफ्रीका में स्किपियो वंश के लिए नियत गौरवशाली प्रतिष्ठा को बनाए रखा। कार्थेज को जीतना एक महान उपलब्धि थी लेकिन मृत्यु पर विजय प्राप्त करना उससे भी बड़ी उपलब्धि थी। “सेनापति कुशल हैं।” एक सेनापति को और कैसे मरना चाहिए था? और कैटो के सेनापति को भला और कैसे मरना चाहिए था?

    मैं तुम्हें इतिहास की पुस्तकों की ओर वापस नहीं भेज रहा हूँ। न ही मैं हर युग से उन लोगों के उदाहरण एकत्र करने जा रहा हूँ जिन्होंने मृत्यु को तुच्छ समझा था, यद्यपि ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है। अपने ही समय की ओर देखो। उस समय की ओर जिसे हम अत्यन्त आलसी और विलासप्रिय कहा करते हैं। वह भी हमें हर पद, हर वर्ग और हर आयु के ऐसे लोग दिखा देगा जिन्होंने मृत्यु को अपनाकर अपनी विपत्तियों का अंत कर लिया। मुझ पर विश्वास करो, लूसीलियस! मृत्यु में इतना कम भय है कि उसकी कृपा से अन्य कोई भी वस्तु भयावह नहीं रह जाती। इसलिए अपने शत्रु के अभियोग को बिना विचलित हुए सुनो। तुम्हारा निर्मल अंतःकरण तुम्हें आत्मविश्वास रखने का पर्याप्त कारण देता है। फिर भी, क्योंकि परिणाम पर अनेक बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है इसलिए सर्वोत्तम की आशा रखो, किन्तु स्वयं को सबसे बुरे के लिए भी तैयार रखो।

    सबसे बढ़कर यह याद रखो कि अपने मन की घबराहट और हलचल को दूर करो। प्रत्येक वस्तु के भीतर झाँककर देखो, तब तुम समझ जाओगे कि तुम्हारे मामलों में भय करने योग्य कोई चीज़ नहीं है, सिवाय स्वयं भय के। तुम देखते हो कि बच्चे उन लोगों से, जिन्हें वे प्यार करते हैं, जानते हैं और जिनके साथ खेलते हैं, बहुत डर जाते हैं यदि वे उन्हें मुखौटा पहने हुए देखें। ठीक यही बात हमारे साथ भी होती है, हम केवल थोड़ा बड़े बच्चे हैं। लेकिन हमारे मामले में केवल लोगों के चेहरे से ही नहीं बल्कि घटनाओं से भी मुखौटा हटाने की आवश्यकता है ताकि उनका वास्तविक स्वरूप हमारे सामने प्रकट हो सके।

    “तुम मुझे तलवारों, मशालों और अपने पीछे चलने वाले जल्लादों का यह प्रदर्शन क्यों दिखा रहे हो? इस दिखावे को दूर हटाओ। जिसे तुम मूर्खों को डराने के लिए अपने सामने खड़ा करते हो। तुम तो केवल मृत्यु हो, जिसे हाल ही में मेरे दास और यहाँ तक कि मेरी दासी भी तुच्छ समझ चुके हैं। तुम फिर से मेरी आँखों के सामने कोड़ों और यातना-यंत्रों का यह विशाल प्रदर्शन क्यों कर रहे हो? शरीर के प्रत्येक जोड़ को पीड़ा देने के लिए विशेष रूप से बनाए गए इन उपकरणों का क्या प्रयोजन है? मनुष्य को टुकड़ा-टुकड़ा करके तोड़ने वाली इन असंख्य युक्तियों का क्या अर्थ है? अपने इन भयावह उपकरणों को एक ओर रख दो। इन कराहों को, इन चीखों को और कोड़ों से निकलवाई गई इन तीखी पुकारों को शांत होने दो। तुम तो केवल पीड़ा हो जिसे वहाँ वह गठिया से पीड़ित व्यक्ति तुच्छ समझता है, जिसे अपच का रोगी अपने विलासपूर्ण भोजनों के बीच सह लेता है और जिसे एक साधारण युवती प्रसव के समय सहन कर लेती है। यदि मैं तुम्हें सह सकता हूँ तो तुम तुच्छ हो। यदि मैं तुम्हें सह नहीं सकता तो तुम अल्पकालिक हो।”

    इन शब्दों पर अपने मन में गहराई से विचार करो। तुम इन्हें अनेक बार सुन चुके हो और स्वयं भी कह चुके हो। लेकिन जो कुछ तुमने सुना और कहा है, वह वास्तव में सत्य है या नहीं, यह तुम्हें अपने आचरण और परिणामों से सिद्ध करना होगा। क्योंकि हमारे विरुद्ध सबसे लज्जाजनक आरोप यही है कि हम दर्शन की बातें तो करते हैं पर उसके अनुसार आचरण नहीं करते। तो फिर! मृत्यु, निर्वासन और पीड़ा तुम्हारे सामने खड़े हैं। क्या तुम्हें पहली बार इसका पता चला है? तुम तो इन्हीं बातों का सामना करने के लिए जन्मे हो। जो कुछ भी घटित हो सकता है उसके बारे में ऐसे विचार करो मानो वह निश्चित रूप से घटित होने वाला है।

    मुझे पता है कि जिन बातों की मैं तुम्हें सलाह दे रहा हूँ उन्हें तुम पहले ही कर चुके होगे। अब मेरी आगे की सलाह यह है कि इस मामले की चिंता को अपने मन पर इतना हावी मत होने दो कि वह तुम्हारी बुद्धि और शक्ति को कुंठित कर दे। यदि तुम ऐसा करोगे तो जब स्वयं को संभालने और सक्रिय करने का समय आएगा, तब तुम्हारे पास कम ऊर्जा होगी। अपने विचारों को अपनी व्यक्तिगत परिस्थिति से हटाकर समस्त मानव जाति की स्थिति की ओर मोड़ो। अपने आप से कहो कि यह तुच्छ शरीर नश्वर है और दुर्बल भी। इसे केवल अन्यायपूर्ण आक्रमणों या अधिक शक्तिशाली शत्रुओं से ही पीड़ा का भय नहीं है। इसके अपने सुख भी अंततः कष्ट में बदल जाते हैं। भोज इसे अपच का शिकार बना देते हैं। मद्यपान की महफ़िलें शरीर में कंपन और नसों की शिथिलता उत्पन्न कर देती हैं। वासनाएँ हाथों-पैरों तथा शरीर के सभी जोड़ों में विकृतियाँ और रोग पैदा कर देती हैं।
   
     “मैं निर्धन हो जाऊँगा।” तो मैं अनेक लोगों में से एक हो जाऊँगा। “मुझे निर्वासित कर दिया जाएगा।” तो मैं अपने निर्वासन के स्थान को ही अपना जन्मस्थान मान लूँगा। “मुझे बेड़ियों में जकड़ दिया जाएगा।” तो क्या हुआ? क्या मैं अभी वास्तव में बंधनों से मुक्त हूँ? प्रकृति ने तो पहले ही मुझे मेरे इस भारी शरीर के बंधन में जकड़ रखा है। “मैं मर जाऊँगा।” तुम वास्तव में यह कह रहे हो कि मैं अब बीमारी, कारावास और मृत्यु के भय के अधीन नहीं रहूँगा।
    
    मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि यहाँ तुम्हें एपिक्यूरस का वह गीत सुनाने लगूँ कि नरक का भय निरर्थक है,  कि इक्सियोन किसी चक्र पर नहीं घूम रहा, न ही सिसिफस किसी चट्टान को पहाड़ी पर चढ़ाने के लिए निरंतर धकेल रहा है और न ही किसी मनुष्य की अंतड़ियाँ प्रतिदिन खाई जाती हैं और फिर से उत्पन्न हो जाती हैं। कोई भी इतना बच्चा नहीं है कि सेर्बेरस, अंधकार या भूत-प्रेत जैसी कंकालाकार आकृतियों से डर जाए। मृत्यु या तो हमें पूरी तरह समाप्त कर देती है या हमें मुक्त कर देती है। यदि वह हमें मुक्त करती है तो इस शरीर के बोझ से छुटकारा पाने के बाद हमारे लिए बेहतर चीज़ें प्रतीक्षारत हैं। और यदि वह हमें समाप्त कर देती है तो फिर हमारे लिए कुछ भी शेष नहीं रहता तब न अच्छाइयाँ बचती हैं और न बुराइयाँ।
    
    मुझे इस अवसर पर तुम्हारी अपनी कविता की याद दिलाने दो और सबसे पहले तुम्हें यह सलाह देने दो कि यह मानो कि तुमने उसे केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए भी लिखा था। एक बात कहना और दूसरी बात सोचना लज्जाजनक है लेकिन एक बात लिखना और दूसरी बात सोचना उससे भी अधिक लज्जाजनक है। मुझे याद है कि एक बार तुमने इस विचार का विस्तार किया था, “हम मृत्यु से एक ही बार में नहीं मिलते। हम उसकी ओर थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते हैं।” हम प्रतिदिन मरते हैं क्योंकि हर दिन हमारे जीवन का कोई न कोई भाग हमसे छिन जाता है। यहाँ तक कि जब हम बढ़ रहे होते हैं तब भी हमारा जीवन घट रहा होता है। हमने अपना शैशव खो दिया, फिर बचपन, फिर युवावस्था। कल तक का सारा समय बीतने के साथ ही हमसे छिन गया और आज का दिन भी बीतते-बीतते मृत्यु के हिस्से में चला जाता है। जैसे जलघड़ी केवल अपनी अंतिम बूँद से ही खाली नहीं होती बल्कि उन सभी बूँदों से भी जो उससे पहले टपक चुकी होती हैं उसी प्रकार हमारे जीवन का अंतिम क्षण ही वह समय नहीं है जब हम मरते हैं। वह तो केवल वह क्षण है जब हमारा मरना पूरा होता है। उस समय हम मृत्यु तक पहुँचते हैं लेकिन वहाँ पहुँचने की यात्रा हम बहुत पहले से करते आ रहे होते हैं। जब तुमने अपनी स्वाभाविक प्रभावशाली शैली में इन सब बातों को समझाया था। तुम सदैव ही एक उत्कृष्ट वक्ता रहे हो किन्तु सत्य को व्यक्त करते समय सबसे अधिक प्रभावशाली होते हो—तब तुमने कहा था, "मृत्यु कोई एक घटना नहीं है। जो मृत्यु हमें अपने साथ ले जाती है वह केवल हमारी अंतिम मृत्यु होती है।

    मैं चाहूँगा कि तुम मेरा पत्र पढ़ने के बजाय स्वयं को पढ़ो। तब तुम्हारे लिए यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस मृत्यु से हम डरते हैं वह हमारी अंतिम मृत्यु तो है किन्तु हमारी एकमात्र मृत्यु नहीं है।

    मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी नज़र कहाँ है! तुम यह जानने की कोशिश कर रहे हो कि मैंने इस पत्र में क्या छिपाकर रखा है। किसी लेखक का कौन-सा प्रेरणादायक कथन या कौन-सा उपयोगी उपदेश। मैं तुम्हें उसी विषय से एक बात भेजता हूँ जो अभी मेरे हाथ में है। एपिक्यूरस उन लोगों की निंदा करता है जो मृत्यु से डरते हैं और उन लोगों की भी जो मृत्यु की इच्छा करते हैं। वह कहता है,  “जीवन से ऊबकर मृत्यु के पीछे भागना उतना ही मूर्खतापूर्ण है क्योंकि तुम्हारे जीने के ढंग ने ही मृत्यु को ऐसी चीज़ बना दिया है जिसके पीछे भागने की इच्छा होती है।”

    इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर वह कहता है, “उस व्यक्ति से अधिक मूर्खतापूर्ण और क्या हो सकता है जो मृत्यु की खोज करता है जबकि उसके जीवन को अशांत बनाने वाली वस्तु स्वयं मृत्यु का भय ही है?”

    इसी विचार को व्यक्त करने वाला उसका एक और कथन भी जोड़ा जा सकता है, “मनुष्यों की मूर्खता नहीं, उनका पागलपन— इतना महान है कि कुछ लोग मृत्यु के भय के कारण ही अपनी मृत्यु की ओर धकेल दिए जाते हैं।”

    इनमें से किसी भी विचार पर मनन करने से तुम अपने मन को मृत्यु और जीवन, दोनों को सहन करने के लिए दृढ़ बना सकोगे। क्योंकि हमें जीवन के प्रति अत्यधिक मोह के विरुद्ध भी चेतावनी और दृढ़ता की आवश्यकता है।  जीवन के प्रति अत्यधिक घृणा के विरुद्ध भी। यहाँ तक कि जब विवेक किसी व्यक्ति को अपने जीवन का अंत कर देने की सलाह दे तब भी उसे यह कार्य लापरवाही या उतावलेपन में नहीं करना चाहिए। साहसी और बुद्धिमान व्यक्ति जीवन से भागता नहीं है। वह केवल उचित समय आने पर उससे विदा लेता है।

    इसके अतिरिक्त और विशेष रूप से, हमें उस अवस्था से बचना चाहिए जो बहुत से लोगों पर छा जाती है—मृत्यु की लालसा। क्योंकि, प्रिय लूसीलियस, जैसे अन्य वस्तुओं के प्रति अनुचित आकर्षण होता है, वैसे ही मृत्यु के प्रति भी एक अविवेकी लालसा होती है। यह अक्सर उदात्त और साहसी स्वभाव वाले लोगों को भी अपने वश में कर लेती है और उतनी ही बार डरपोक तथा निष्क्रिय लोगों को भी। पहले प्रकार के लोग जीवन को तुच्छ समझते हैं। दूसरे प्रकार के लोग उससे दबे और थके हुए होते हैं। कुछ अन्य लोग एक ही प्रकार की चीज़ों को बार-बार देखते और करते-करते इतने ऊब जाते हैं कि वे जीवन से घृणा नहीं करते बल्कि उससे विरक्ति और अरुचि अनुभव करने लगते हैं। कभी-कभी हम दर्शन के प्रभाव में भी इस मनःस्थिति में फिसल जाते हैं, जब हम कहते हैं, “आख़िर कब तक वही बातें चलती रहेंगी? मैं कब तक जागूँगा और सोऊँगा, खाऊँगा और फिर भूखा हो जाऊँगा, ठंड महसूस करूँगा और फिर गर्मी?" किसी चीज़ का कोई अंतिम अंत नहीं है; सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। वस्तुएँ एक-दूसरे का पीछा करती रहती हैं। दिन के पीछे रात आती है और रात के पीछे दिन। ग्रीष्म ऋतु शरद को स्थान देती है। शरद के बाद शीत ऋतु आती है और फिर वसंत उसका स्थान ले लेता है। सब कुछ केवल इसलिए बीतता है कि फिर लौट सके। मैं कुछ नया नहीं करता, कुछ नया नहीं देखता।” कभी-कभी यही विचार भी मन में ऊब और वितृष्णा उत्पन्न कर देते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो यह नहीं मानते कि जीवन कठिन है। वे यह महसूस करते हैं कि जीवन निरर्थक है।

अभी के लिए विदा 

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मृत्यु के संदर्भ में -- पत्र - 26

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