Thursday, 2 July 2026

जीवन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 22

 प्रिय लूसीलियस 

अब तुम समझते हो कि तुम्हें उन दिखने में महत्वपूर्ण पर वास्तव में तुम्हारे लिए हानिकारक कार्यों से दूर हो जाना चाहिए। लेकिन तुम पूछते हो कि यह कैसे किया जाए। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल आमने-सामने ही समझाया जा सकता है। कोई चिकित्सक केवल पत्र लिखकर यह निर्धारित नहीं कर सकता कि भोजन करने या स्नान करने का उचित समय क्या है। उसे स्वयं रोगी की नाड़ी देखनी पड़ती है। जैसा कि पुरानी कहावत है, “ग्लैडिएटर अखाड़े में ही सलाह लेता है।” वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के चेहरे के भाव, हाथों की गति, यहाँ तक कि उसके शरीर के संतुलन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन को देखकर अपनी रणनीति तय करता है। जो कार्य सामान्यतः किए जाते हैं और जिन्हें कर्तव्य की माँग कहा जा सकता है, उनके बारे में सामान्य सलाह दी जा सकती है और उन्हें लिखकर भी बताया जा सकता है। ऐसी सलाह केवल दूर रहने वालों के लिए ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ी जा सकती है। किन्तु जब प्रश्न यह हो कि किसी कार्य को कब और किस प्रकार करना चाहिए तब कोई भी व्यक्ति दूर बैठकर सलाह नहीं दे सकता। उसका निर्णय परिस्थितियों को देखकर ही करना पड़ता है। तेजी से बीतते अवसर को पहचानने के लिए केवल वहाँ उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें सतर्क भी रहना होगा। इसलिए अवसर पर लगातार नज़र रखो। जब वह दिखाई दे तो उसे तुरंत पकड़ लो और पूरे दृढ़ निश्चय तथा अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उन जिम्मेदारियों से स्वयं को मुक्त कर लो जो तुम्हें बाँधे हुए हैं।

By Suza 

    वास्तव में, यही वह सलाह है जो मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हें बाहर निकलना ही होगा या तो उस जीवन-स्थिति से बाहर निकलो या फिर स्वयं जीवन से। फिर भी मेरा विचार है कि तुम्हें यह काम धीरे-धीरे और सावधानी से करना चाहिए। जिस भयानक गाँठ को तुमने बाँध रखा है उसे रस्सी तोड़कर नहीं बल्कि ढीला करके खोलने का प्रयास करो। लेकिन यदि कोई दूसरा उपाय सफल न हो तो रस्सी तोड़ने में भी संकोच मत करो।तुम चाहे जितने भी भयभीत क्यों न हो निश्चित ही तुम यह नहीं चाहोगे कि जीवन भर किसी खाई के किनारे लटके रहो। उससे तो यह कहीं बेहतर है कि एक ही बार में गिर पड़ो।

    इस बीच, सबसे पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि अपने ऊपर और अधिक बोझ न लादो। जिन कार्यों का दायित्व तुम पहले ही ले चुके हो, उन्हीं तक स्वयं को सीमित रखो या यदि तुम ऐसा कहना चाहो तो उन्हीं कार्यों तक जो तुम्हारे हिस्से में आ गए हैं। नए दायित्वों को खोज-खोजकर अपने ऊपर मत लो क्योंकि तब तुम्हारा बहाना भी नहीं चलेगा। यह स्पष्ट हो जाएगा कि वे कार्य अपने-आप तुम्हारे पास नहीं आए थे बल्कि तुमने स्वयं उन्हें अपनाया था। लोग जो बातें अक्सर कहा करते हैं, वे वास्तव में सत्य नहीं हैं। “मैं इससे बच नहीं सकता था। मैं यह नहीं करना चाहता था लेकिन क्या कर सकता था?”

    “मुझे यह करना ही पड़ा।” समृद्धि और सफलता के पीछे भागने के लिए किसी को विवश नहीं किया जाता। रुक जाने में भी एक प्रकार की बुद्धिमत्ता है। यदि तुम भाग्य और परिस्थितियों का सक्रिय रूप से विरोध नहीं भी कर रहे हो तब भी तुम्हें उस दिशा में लगातार आगे बढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है जिस ओर भाग्य तुम्हें बहाए लिए जा रहा है।

    क्या तुम्हें बुरा लगेगा यदि मैं अपनी सलाह के साथ कुछ महान आचार्यों की राय भी जोड़ दूँ? वे मुझसे कहीं बेहतर मार्गदर्शक हैं। वास्तव में जब मुझे किसी कार्य के बारे में निर्णय लेना होता है तो मैं स्वयं भी उनसे परामर्श करता हूँ। इस विषय पर एपिक्यूरस का वह पत्र पढ़ो जो उसने इडोमिनिअस को लिखा था। उसमें वह उसे सलाह देता है कि जहाँ तक संभव हो, वह अपने को उन बंधनों से मुक्त करे और शीघ्रता करे इससे पहले कि कोई अधिक शक्तिशाली परिस्थिति हस्तक्षेप कर दे और उसके पास निवृत्त होने की स्वतंत्रता ही न बचे। वह यह भी जोड़ता है कि उचित समय आने से पहले किसी कार्य का प्रयास नहीं करना चाहिए। लेकिन जब वह लंबे समय से प्रतीक्षित अवसर वास्तव में आ जाए तब तुरंत उठ खड़ा होना चाहिए और बिना विलंब के कार्य करना चाहिए। वह कहता है, “यदि तुम मुक्त होने की योजना बना रहे हो तो कभी सुस्त मत पड़ो।” और यह भी, “परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, मुझे विश्वास है कि निवृत्ति लाभदायक सिद्ध होगी बशर्ते हम न तो समय से पहले उसकी ओर दौड़ें और न ही समय आने पर उससे पीछे हटें।”

    मुझे लगता है कि अब तुम स्टोइक्स की ओर से भी कोई कथन सुनना चाहते हो। अपने आस-पास किसी को यह मत कहने दो कि वे उतावले या अविवेकी हैं। वास्तव में वे जितने साहसी हैं उससे कहीं अधिक सावधान भी हैं। शायद तुम यह अपेक्षा कर रहे हो कि वे तुमसे कहेंगे, “बोझ के नीचे झुक जाना लज्जाजनक है। जिस जिम्मेदारी को तुमने स्वीकार किया है उसका दृढ़तापूर्वक सामना करो। जो व्यक्ति परिश्रम से भागता है और जिसकी हिम्मत परिस्थिति की कठिनाइयों के साथ बढ़ने के बजाय घट जाती है, वह न तो साहसी है और न ही ऊर्जावान।” वे निश्चय ही ऐसी बातें कहेंगे लेकिन केवल तब तक जब तक उस दृढ़ता और धैर्य से कोई सार्थक लाभ प्राप्त हो रहा हो। जब तक किसी अच्छे एवं चरित्रवान व्यक्ति को कोई ऐसा कार्य न करना पड़े या ऐसी कोई परिस्थिति न सहनी पड़े जो उसकी गरिमा के विरुद्ध हो। अन्यथा, एक श्रेष्ठ चरित्र वाला व्यक्ति स्वयं को तुच्छ और अपमानजनक कार्यों में खपा नहीं देगा। वह केवल व्यस्त रहने के लिए व्यापार या कामकाज में नहीं उलझेगा। और न ही वह वैसा करेगा जैसा तुम शायद सोचते हो अर्थात् महत्त्वाकांक्षी जीवन-यात्रा में फँसा रहेगा और उसकी कठिनाइयों को लगातार सहता रहेगा। जब उसे लगेगा कि उसका यह जुड़ाव अत्यधिक बोझिल, अनिश्चित या खतरनाक हो गया है तब वह उससे पीछे हट जाएगा। यह नहीं कि वह अचानक मुँह मोड़कर भाग जाएगा बल्कि वह धीरे-धीरे विवेकपूर्वक और सुरक्षित मार्ग की ओर कदम बढ़ाते हुए उससे स्वयं को अलग कर लेगा।

    प्रिय लूसीलियस, यदि तुम्हें अपने पद और उससे मिलने वाले पुरस्कारों की परवाह न हो तो उससे मुक्त होना बहुत आसान है। वास्तव में वही पुरस्कार हमें बाँधकर रखते हैं और आगे बढ़ने नहीं देते। लोग सोचते हैं, “क्या? क्या मैं इतनी बड़ी आशाओं को छोड़ दूँ? क्या मैं तब पीछे हट जाऊँ जब फसल कटने के लिए तैयार है? क्या मैं अपने सम्मान और वैभव से वंचित हो जाऊँ? क्या मेरी पालकी बिना सेवकों के रह जाएगी और मेरा स्वागत-कक्ष सूना पड़ जाएगा?” यही वे बातें हैं जिन्हें लोग छोड़ना नहीं चाहते। वे अपनी दुर्दशा से मिलने वाले लाभों से प्रेम करते हैं जबकि उसी दुर्दशा की शिकायत भी करते रहते हैं। वे अपने व्यवसाय या करियर की शिकायत ठीक उसी प्रकार करते हैं जैसे कोई व्यक्ति अपनी प्रेमिका की शिकायत करता है। अर्थात् यदि तुम उनके वास्तविक भावों को ध्यान से देखो तो पाओगे कि वे उससे घृणा नहीं करते, उनका उससे केवल अस्थायी झगड़ा है। जो लोग लगातार रोते-शिकायत करते हैं और छोड़कर चले जाने की धमकी देते हैं, उन्हें ध्यान से परखो। तुम देखोगे कि उनका वहाँ रुके रहना स्वेच्छा से है। जिन चीज़ों को वे अपनी पीड़ा का कारण बताते हैं, वास्तव में वही चीज़ें वे चाहते थे और उन्हीं के बिना वे रह भी नहीं सकते।

    ऐसा ही है, लूसीलियस! दासता केवल कुछ लोगों को पकड़कर नहीं रखती बल्कि बहुत से लोग स्वयं दासता को पकड़े रहते हैं। लेकिन यदि तुम सचमुच अपनी दासता को त्यागना चाहते हो। यदि तुम्हारी स्वतंत्रता की इच्छा वास्तविक है। यदि प्रोत्साहन माँगने का तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि जो करना आवश्यक है, उसे निरंतर चिंता में पड़े बिना कर सको तो स्टोइक्स का पूरा समुदाय तुम्हारा उत्साहवर्धन करेगा। और वे ऐसा क्यों न करें? सभी ज़ेनो और क्रिसिप्पुस तुम्हें उसी मार्ग को चुनने के लिए प्रेरित करेंगे जो संयमित हो, जो सम्मानजनक हो और जो वास्तव में तुम्हारा अपना हो।

    लेकिन यदि तुम बार-बार पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश कर रहे हो कि अपने साथ कितना कुछ ले जा सकोगे अर्थात् निवृत्ति के बाद तुम्हारी आय कितनी होगी तो तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम अपना सूटकेस पकड़े रहोगे तब तक सुरक्षित तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच सकते। पहले अपना सिर पानी के ऊपर रखो और एक बेहतर जीवन जीना शुरू करो। ईश्वर तुम्हें आशीर्वाद दें पर उस प्रकार नहीं जिस प्रकार वे कुछ लोगों को देते प्रतीत होते हैं— मधुर मुस्कान के साथ उन्हें महान दुख प्रदान करके। क्योंकि ऐसे उपहार, जो अपने प्राप्तकर्ता को जलाते हैं और यातना देते हैं, देने के लिए देवताओं के पास केवल एक ही सफाई होती है। उन्होंने वही दिया था जिसकी उनसे प्रार्थना की गई थी।

    मैं अभी-अभी इस पत्र को सील कर रहा था लेकिन अब मुझे इसे फिर से खोलना पड़ रहा है ताकि यह अपनी छोटी-सी पारंपरिक भेंट के बिना यहाँ से न जाए बल्कि अपने साथ कोई सुंदर और सार्थक सूक्ति भी ले जाए। एक ऐसी सूक्ति अभी मेरे मन में आ रही है। मैं यह भी नहीं कह सकता कि वह अधिक सत्य है या अधिक सुंदर ढंग से कही गई है। “यह किसकी है?” तुम पूछते हो। यह एपिक्यूरस की है क्योंकि मैं अभी भी दूसरों के ख़ज़ानों से उधार ले रहा हूँ।

"हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।"

    जिसे चाहो देख लो— युवा, वृद्ध, या इनके बीच की किसी भी आयु का व्यक्ति, तुम पाओगे कि सभी मृत्यु से समान रूप से भयभीत हैं और जीवन के विषय में समान रूप से अज्ञानी हैं। किसी ने भी वास्तव में कुछ प्राप्त नहीं किया है। जो कुछ हमारा अपना है, उसे हम सब भविष्य के लिए टालते रहते हैं।

    इस कथन में मुझे सबसे अधिक यह बात पसंद है कि यह वृद्ध लोगों को उनकी बालसुलभ अपरिपक्वता के लिए धिक्कारता है। वह कहता है, “हममें से प्रत्येक इस जीवन से वैसे ही जाता है, जैसे वह इसमें आया था।” यह सही नहीं है। जब हम मरते हैं तब हम जन्म के समय की अपेक्षा और भी बुरे हो चुके होते हैं। इसका दोष हमारी प्रकृति का नहीं हमारा अपना है। प्रकृति को तो हमारे विरुद्ध शिकायत करनी चाहिए और कहना चाहिए, “यह क्या है? मैंने तुम्हें संसार में बिना इच्छाओं, बिना भय, बिना अंधविश्वासी विश्वास, बिना विश्वासघात और उन सभी अन्य दोषों के भेजा था जो आज तुम्हें सताते हैं। कम-से-कम वैसे ही लौटो जैसे आए थे!” जो व्यक्ति उसी शांति के साथ मरता है जिस शांति के साथ वह जन्मा था, उसने बुद्धिमत्ता प्राप्त कर ली है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जैसे ही कोई संकट निकट आता है, हम काँपने लगते हैं। हमारी साँसें भारी हो जाती हैं, चेहरे का रंग उड़ जाता है, आँसू बहने लगते हैं और वह भी व्यर्थ। जब हम शांति के बिल्कुल द्वार पर खड़े होते हैं तब भी चिंतित रहते हैं। इससे अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है?

   लेकिन इसका कारण यह है कि हम हर प्रकार के वास्तविक कल्याण से रिक्त हैं। इसलिए जीवन का खो जाना हमें कष्टदायक प्रतीत होता है। हममें से किसी के लिए भी जीवन का कोई भाग वास्तव में लाभदायक नहीं बन पाता। हम उसे पूरा का पूरा खर्च कर देते हैं। वह हमारी उँगलियों के बीच से फिसल जाता है। कोई यह नहीं सोचता कि वह कितना अच्छा जीवन जी रहा है। सब केवल यह सोचते हैं कि वह कितने लंबे समय तक जीवित रहेगा। जबकि सच्चाई यह है कि हममें से प्रत्येक के पास अच्छा जीवन जीने का अवसर है लेकिन कोई भी लंबे समय तक जीवित रहने की गारंटी नहीं पा सकता।

अभी के लिए विदा 


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जीवन और कर्म के संदर्भ में -- पत्र - 22

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