प्रिय लूसीलियस
क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें यह लिखूँगा कि इस वर्ष शीत ऋतु ने हमारे साथ कितनी उदारता बरती है (और वह भी कितनी छोटी तथा सौम्य रही) या यह कि वसंत कितना कठोर और असमय ठंडा निकला है और वे सारी दूसरी निरर्थक बातें जिनके बारे में लोग तब लिखते हैं जब उनके पास कहने के लिए कुछ सार्थक नहीं होता? नहीं, मैं तुम्हें ऐसी बात लिखूँगा जो तुम्हारे और मेरे, दोनों के लिए लाभकारी हो। और वह क्या होगी? और क्या सिवाय इसके कि मैं तुम्हें मन की उत्कृष्टता (श्रेष्ठता) की ओर प्रेरित करूँ? क्या तुम जानना चाहते हो कि ऐसी उत्कृष्टता की नींव किस पर टिकी होती है? यह है—व्यर्थ और खोखली चीज़ों में आनंद मत खोजो, उनसे प्रसन्न मत हो।
क्या मैंने कहा था कि यह उसकी नींव है? नहीं, यह तो उसका शिखर है। उस ऊँचाई तक पहुँचने का अर्थ है यह जानना कि किस बात में प्रसन्न होना चाहिए— अपनी समृद्धि उसी में खोजना जिसे कोई दूसरा नियंत्रित नहीं कर सकता। जो व्यक्ति आशा के आकर्षण में पड़ जाता है, वह चिंतित और अपने ही बारे में अनिश्चित बना रहता है। चाहे उसकी आशा किसी ऐसी वस्तु के लिए ही क्यों न हो जो हाथ के पास हो या जिसे पाना कठिन न हो और चाहे जिन वस्तुओं की उसने आशा की हो वे कभी निराशाजनक सिद्ध न होती हों।
सबसे बढ़कर यह करो, प्रिय लूसीलियस! आनंद का अनुभव करना सीखो। क्या अब तुम्हें यह लगता है कि क्योंकि मैं तुमसे भाग्य की देनों को दूर कर रहा हूँ और यह मानता हूँ कि तुम्हें आशाओं से उन सबसे मधुर छलनाओं से बचना चाहिए, इसलिए मैं तुमसे अनेक सुख भी छीन रहा हूँ? कदापि नहीं। मैं तो यह चाहता हूँ कि प्रसन्नता कभी भी तुमसे अनुपस्थित न हो। मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारे अपने घर में जन्म ले और ऐसा ही होगा, यदि वह तुम्हारे भीतर उत्पन्न हो। अन्य सुख हृदय को नहीं भरते। वे तो केवल तुच्छ भावनाएँ हैं जो क्षणभर के लिए माथे की शिकन को समतल कर देती हैं। निश्चय ही तुम यह नहीं सोचते कि जो भी मुस्कुराता है, वह वास्तव में आनंदित होता है! मन में उत्साह और आत्मविश्वास होना चाहिए। उसे सीधा, अडिग और हर परीक्षा से ऊपर होना चाहिए।
मेरा विश्वास करो, सच्चा आनंद एक गंभीर विषय है। क्या तुम्हें लगता है कि मृत्यु का तिरस्कार करना, निर्धनता के लिए अपने घर के द्वार खोल देना, सुख-भोग पर लगाम कसना और पीड़ा सहने का अभ्यास करना, ये सब कोई ढीले-ढाले भाव से या जैसा कि विलासी लोग कहते हैं, (मुस्कान के साथ) करता है? जो व्यक्ति ऐसी बातों पर मनन करता है, वह महान आनंद का अनुभव कर रहा होता है, पर वह आनंद कोमल या मोहक नहीं होता। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे पास भी यही आनंद हो। एक बार जब तुम जान जाओगे कि उसे कहाँ पाया जा सकता है, तब वह कभी समाप्त नहीं होगा। ऊपरी खदानें बहुत थोड़ा देती हैं। सबसे मूल्यवान धातु-भंडार धरती की गहराइयों में छिपे होते हैं और वही ऐसे होते हैं जो खोदने के परिश्रम का प्रतिफल लगातार बढ़ती हुई प्रचुरता के रूप में देते हैं। जनसाधारण के मनोरंजनों में जो सुख मिलता है, वह क्षीण और सतही होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।
केवल एक ही मार्ग है जो तुम्हें सुखी बना सकता है। अतिप्रिय लूसीलियस, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि उसे अपनाओ। उन सभी वस्तुओं को त्याग दो जो बाहर से चमकती हैं। उन सबको जो तुम्हें किसी दूसरे द्वारा या किसी दूसरे स्रोत से मिलने का वादा किया जाता है और उन्हें अपने पैरों तले रौंद दो। अपने वास्तविक कल्याण की ओर दृष्टि करो और उसी में आनंदित हो जो वास्तव में तुम्हारा है। और तुम्हारा क्या है? तुम स्वयं... तुम्हारा श्रेष्ठतम भाग। जहाँ तक तुम्हारे इस तुच्छ शरीर का प्रश्न है, यह सत्य है कि इसके बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता पर इसे किसी महान वस्तु के रूप में नहीं बल्कि एक आवश्यक साधन के रूप में समझो। जो सुख यह एकत्र करता है, वे खोखले, क्षणभंगुर और अंततः पछतावे का कारण बनने वाले होते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि उन्हें पर्याप्त आत्म-संयम द्वारा नियंत्रित न किया जाए तो वे शीघ्र ही सुख के विपरीत रूप में बदल जाते हैं। हाँ, सुख एक खड़ी चट्टान के किनारे खड़ा रहता है और यदि वह अपनी सीमाओं के भीतर न रहे तो पीड़ा की ओर झुक जाता है। परंतु किसी वस्तु को अच्छा मान लेने के बाद उसके संबंध में सीमा के भीतर बने रहना कठिन होता है। और कोई भी आनंद स्थिर आधार नहीं रखता, यदि उसे बाहर से आयात किया गया हो। जिस आनंद की मैं बात कर रहा हूँ और जिसकी ओर मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करना चाहता हूँ, वह भीतर तक ठोस और दृढ़ है। उसका सबसे विशाल क्षेत्र स्वयं मनुष्य के भीतर है।
जो वास्तव में अच्छा है, उसके प्रति लालसा तृप्ति प्राप्त करने में कभी असफल नहीं होती। वह क्या है?” तुम पूछते हो, “वह कहाँ से आती है?” मैं तुम्हें बताऊँगा, वह एक शुद्ध अंतरात्मा से आती है, सम्मानपूर्ण विचारों से, सही कर्मों से, भाग्य की वस्तुओं को तुच्छ समझने से और जीवन की उस शांत तथा स्थिर शैली से जो एक ही मार्ग पर चलती है। क्योंकि जो लोग स्वयं ही एक योजना से दूसरी योजना पर कूदते रहते हैं, वे किसी निश्चित या भरोसेमंद वस्तु को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? और यदि वे ऐसा भी नहीं करते बल्कि केवल संयोग की हर हवा से इधर-उधर उड़ाए जाते रहते हैं, जीवन भर मंडराते और भटकते रहते हैं तो वे किसी बात पर कैसे निर्भर कर सकते हैं? बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अपने लिए और अपनी संपत्ति के लिए सोच-समझकर व्यवस्था करते हैं। बाकी लोग नदी में बहती वस्तुओं के समान हैं। वे आगे नहीं बढ़ रहे होते बल्कि केवल धारा के साथ बह रहे होते हैं। कोई लहर अपेक्षाकृत शांत होती है और उन्हें सहजता से आगे ले जाती है। दूसरी उन्हें अधिक कठोरता से बहा ले जाती है। कोई धीमी गति से बहती है और उन्हें किनारे के पास छोड़ देती है जबकि दूसरी प्रचंड बाढ़ बनकर उन्हें खुले समुद्र में फेंक देती है। अतः हमें यह निश्चित कर लेना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं और फिर उसी पर दृढ़तापूर्वक बने रहना चाहिए।
अब वह अवसर आ गया है जब मुझे अपना ऋण चुकाना चाहिए। इस पत्र के बदले में मैं तुम्हें तुम्हारे प्रिय एपिक्यूरस का एक कथन दे सकता हूँ—
“अपने जीवन की शुरुआत बार-बार करते रहना थकाने वाला होता है।”
यदि इस विचार को और बेहतर ढंग से व्यक्त किया जाए—
“वे लोग बुरा जीवन जीते हैं जो सदा जीवन जीना शुरू ही करते रहते हैं।”
“क्यों?” तुम पूछते हो। इस कथन को स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।
क्योंकि ऐसे लोगों के लिए जीवन सदैव अधूरा रहता है। जो व्यक्ति अभी-अभी जीना शुरू कर रहा है, वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं हो सकता। हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम जीवन को पर्याप्त रूप से जी लें। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता जब वह अभी केवल अपने जीवन की योजना ही बना रहा हो।
और तुम्हारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि ऐसे लोग बहुत कम होते हैं; वास्तव में लगभग सभी लोग ऐसे ही हैं। बल्कि कुछ लोग तो ठीक उसी समय जीवन शुरू कर रहे होते हैं जब उसे समाप्त करने का समय आ चुका होता है। यदि तुम्हें यह आश्चर्यजनक लगता है तो मैं इससे भी अधिक विस्मयकारी बात जोड़ूँगा, कुछ लोग जीना शुरू करने से पहले ही जीना छोड़ देते हैं।
अभी के लिए विदा
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