प्रिय लूसीलियस
मुझे विश्वास है लूसीलियस, कि तुम समझते हो कि दर्शन के बिना कोई भी व्यक्ति न तो वास्तव में सुखी जीवन जी सकता है और न ही ऐसा जीवन जो सहन करने योग्य हो। यह भी कि जहाँ पूर्ण प्रज्ञा (ज्ञान) जीवन को सुखी बनाती है, वहीं उसके अध्ययन का आरम्भ मात्र भी जीवन को सहनीय बना देता है। किन्तु इस समझ को प्रतिदिन के अभ्यास द्वारा पुष्ट और अधिक गहराई से स्थापित करना आवश्यक है। सम्माननीय उद्देश्यों की कल्पना कर लेना जितना सरल है उन्हें व्यवहार में उतारना उससे कहीं अधिक कठिन है। मनुष्य को निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए और सतत अध्ययन द्वारा अपनी शक्ति बढ़ानी चाहिए जब तक कि उसके श्रेष्ठ संकल्प उसके मन का स्थायी उत्कृष्ट गुण न बन जाएँ।
जब तुम मेरे साथ हो तब तुम्हें बहुत अधिक शब्दों या इतनी लंबी सफ़ाइयों की आवश्यकता नहीं है। मैं समझता हूँ कि तुमने काफ़ी प्रगति की है। मैं जानता हूँ कि जो बातें तुम लिखते हो, वे कहाँ से आ रही हैं। तुम उन्हें न तो गढ़ रहे हो और न ही उन्हें सजाकर प्रस्तुत कर रहे हो। फिर भी मैं तुम्हें अपनी राय बताता हूँ। मुझे तुमसे आशाएँ हैं लेकिन अभी मुझे पूर्ण विश्वास नहीं है। और यदि मेरी चले तो तुम स्वयं के प्रति भी यही दृष्टिकोण अपनाओगे और बिना पर्याप्त कारण के अपने ऊपर शीघ्रता से विश्वास नहीं करोगे। अपने आपको झकझोरो। अपनी जाँच-पड़ताल करो। अपने को विभिन्न दृष्टियों से देखो। सबसे बढ़कर, यह विचार करो कि जो प्रगति तुमने की है, वह दर्शन में हुई है या स्वयं जीवन में। दर्शन कोई ऐसी कला नहीं है जो दर्शकों के सामने करतब दिखाने के लिए हो, न ही वह प्रदर्शन के लिए सजाई गई कोई वस्तु है। उसका सार शब्दों में नहीं, कर्मों में है। मनुष्य उसे केवल मनोरंजन या ऊब दूर करने के साधन के रूप में नहीं अपनाता। वह मन को ढालता और आकार देता है, जीवन को व्यवस्था प्रदान करता है, आचरण को अनुशासित करता है, और यह दिखाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।
दर्शन पतवार पर बैठता है और हमें मार्ग दिखाता है जबकि हम अनिश्चितता की लहरों में इधर-उधर उछाले जा रहे होते हैं। उसके बिना ऐसा कोई जीवन नहीं है जो चिंताओं और व्याकुलताओं से भरा न हो। क्योंकि हर घड़ी असंख्य ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जिनके लिए सलाह की आवश्यकता होती है और वह सलाह केवल दर्शन ही दे सकता है।
कोई कहेगा, “यदि सब कुछ भाग्य द्वारा निर्धारित है तो दर्शन मेरे किस काम का? यदि ईश्वर ही सबका संचालक है तो दर्शन का क्या उपयोग? और यदि संयोग (भाग्य-चक्र) का ही प्रभुत्व है तो फिर दर्शन से क्या लाभ? क्योंकि जो निश्चित है उसे बदला नहीं जा सकता और जो अनिश्चित है उसके विरुद्ध पहले से कोई तैयारी भी नहीं की जा सकती। या तो ईश्वर ने पहले ही मेरे लिए सब कुछ निर्धारित कर दिया है और तय कर दिया है कि मुझे क्या करना चाहिए या फिर भाग्य ने मेरी योजना के लिए कुछ भी शेष नहीं छोड़ा है।” किन्तु इनमें से जो भी सत्य हो लूसीलियस, अथवा यदि ये सभी सत्य हों, तब भी हमें दर्शन का अभ्यास करना चाहिए। चाहे भाग्य का अटल नियम हमें बाँधे हुए हो। चाहे ईश्वर, जो समस्त जगत का नियामक है, सभी घटनाओं का संचालन करता हो या चाहे संयोग ही मानव जीवन को चलाता और अस्त-व्यस्त करता हो। फिर भी दर्शन ही हमारी रक्षा करेगा। दर्शन हमें ईश्वर की आज्ञा का स्वेच्छा से पालन करना सिखाएगा और भाग्य के सामने अनिच्छा से ही सही, झुकना सिखाएगा। वह तुम्हें ईश्वर का अनुसरण करना और संयोग का सामना करना सिखाएगा।
किन्तु यह वह समय नहीं है कि हम इस प्रश्न पर चर्चा आरम्भ करें कि यदि दैवी व्यवस्था का शासन है तो हमारे अधिकार में क्या है या यदि नियति की घटनाओं की एक अविच्छिन्न श्रृंखला हमें जंजीरों में बाँधकर खींचती चली जाती है अथवा यदि आकस्मिक घटनाएँ ही सब पर शासन करती हैं। इसके बजाय, मैं अब अपने मूल विषय पर लौटता हूँ। तुम्हें सलाह देने और प्रेरित करने के लिए कि अपने मन के प्रयत्न को बिखरने और शिथिल पड़ने मत दो। उसे बनाए रखो। उसे स्थिर करो ताकि जो अभी केवल प्रयास है, वह आगे चलकर स्वभाव बन जाए।
यदि मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ तो जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया होगा, तुम यह देखने के लिए आगे झाँकने लगे होगे कि यह पत्र अपने साथ कौन-सा छोटा-सा उपहार लाया है। अच्छा, इसे खोलकर देखो। तुम्हें वह मिल जाएगा! लेकिन मेरी उदारता पर आश्चर्य मत करना क्योंकि मैं अभी भी किसी और के भंडार से ही उदारता दिखा रहा हूँ। पर मैं इसे “किसी और का” क्यों कहूँ? जो कुछ भी किसी के द्वारा अच्छी तरह कहा गया है, वह मेरा है। यह बात भी एपिक्यूरस ने कही थी, “यदि तुम प्रकृति के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी गरीब नहीं होगे और यदि लोगों की धारणाओं के अनुसार जीवन बिताओगे तो कभी धनी नहीं हो सकोगे।”
प्रकृति की माँगें बहुत थोड़ी होती हैं। मतों और धारणाओं की माँगों की कोई सीमा नहीं होती। मान लो कि अनेक धनवान लोगों की सारी संपत्ति तुम्हारे ऊपर ढेर कर दी जाए। मान लो कि भाग्य तुम्हें किसी भी निजी व्यक्ति की सामर्थ्य से कहीं अधिक ऊँचा उठा दे, तुम्हें सोने से ढक दे, तुम्हें बैंगनी वस्त्रों से सजा दे, तुम्हें इतना वैभव और धन दे दे कि तुम संगमरमर से धरती तक को ढक सको, ऐसा धन जो केवल तुम्हारे अधिकार में ही न हो बल्कि तुम्हारे पैरों के नीचे भी बिछा हो! मान लो कि मूर्तियाँ हों, चित्र हों और वे सब वस्तुएँ हों जिन्हें कला ने विलासिता और महँगे स्वाद की तुष्टि के लिए रचा है। इन सब चीज़ों से तुम क्या सीखोगे? केवल और अधिक चाहना। प्राकृतिक इच्छाएँ सीमित होती हैं किन्तु मिथ्या धारणाओं से उत्पन्न इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता क्योंकि असत्य स्वभावतः असीम होता है। जो लोग किसी मार्ग पर चलते हैं, उनका कोई गंतव्य होता है पर भटकने की कोई सीमा नहीं होती।
इसलिए निरर्थक वस्तुओं से स्वयं को पीछे खींच लो। जब तुम यह जानना चाहो कि जिस वस्तु का तुम पीछा कर रहे हो वह प्राकृतिक इच्छा का विषय है या अंधी लालसा का तो यह देखो कि क्या कहीं ऐसा स्थान है जहाँ तुम्हारी इच्छा जाकर ठहर सकती है। यदि वह बहुत दूर तक जाती है और फिर भी उसके आगे और रास्ता शेष रहता है तो समझ लो कि वह प्राकृतिक नहीं है।

No comments:
Post a Comment