परवरिश में पम्पराओं की ऐसी नींव जमाई गई है कि वे ताउम्र पीछा नहीं छोड़तीं। वास्तव में हम बहुत बंटे हुए हैं। अंदर से भी और बाहर से भी। अंदर का बंटवारा हमारे खुद के व्यक्तित्व में गिरगिट के तौर-तरीकों का घर कर जाना शामिल है जबकि बाहर का बंटवारा हर तरह से देखने से दिखलाई देगा। जाति के नाम पर, अमीर गरीब के नाम पर, धर्म के नाम पर, गोर-काले के नाम पर...और भी बँटवारे है।
हमारे देश में तमाम धर्म के लोगों की आदतें कभी-कभी चौंका देती हैं। कभी-कभी आपको लगेगा कि सच में ये सब भी कितना अच्छा है। जुरुरी है। हिन्दी फिल्मों में दिखाये जाने वाले अच्छे किरदार अगर धार्मिक न हो तब तक उसकी अच्छाई हमें दिखाई ही नहीं देती। जब तक नायिका सुबह सांझ की आरती न उतार दे तब तक हमारे यानी आम दर्शकों के गले से नीचे पानी नहीं उतरता। यह धार्मिकता का लिबास औरतों के हिस्से अधिक दिखाई देता है। कम उम्र से बढ़ती उम्र तक। यहाँ तक कि उम्र की आखिरी दहलीज़ तक औरत जब तक धार्मिक न हो तब तक उसके चरित्र की संदिग्धता बनी रहती है। अक्सर समाज में ऐसा देखने को भी मिलता है।
बहुत मुश्किल है विचारों की भीड़ में अपने मन माफिक विचार को खोजना। लोगों की भीड़ जिस तरह पसीने बहा देती है ठीक उसी तरह विचारों की भीड़ गुमशुदा कर देती है। भीड़ का संतुलित विचार नहीं होता। वह हज़ार आँखों के बावजूद अंधी होती है। अमूमन उनमें शामिल लोग एक दूसरे का बिना वजह पीछा कर रहे होते हैं। आप यह जरूर तय कर लें कि कहीं आप उनमें से एक तो नहीं। अगर हाँ तो उस भीड़ के आदेश और परंपरा से बाहर निकलकर सोचें। आपको कई दूसरे रास्ते मिल जाएंगे।
यदि आपके मन में मैल, दूसरों के लिए कड़वी भावनाएँ हैं, आप दिखावे के लिए अच्छे काम करते हैं, आप दूसरों का बुरा चाहते हैं और व्रत करते हैं तो आपका व्रत फलदायी कैसे होगा? हो सकता है आपके शरीर पर उपवास का अच्छा प्रभाव हो पर उपवास मन के लिए भी है। मन का मनका अगर साफ नहीं है तो ईश्वर की प्रार्थना कैसे की जा सकती है? यह सोचने का विषय है। आशा है कि हम मिलकर इस पर सोचेंगे।
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