कुछ आदतें देर से लगती हैं। लेकिन चलती बहुत दूर तक हैं। यानि लंबे सफर में कोई साथ दे या न दे, लेकिन कुछ आदतें चिपक जाती है और साथ भी देती हैं। ऐसी एक आदत अखबार पढ़ने की है। चाहे लाख इन्हें कोस लूँ, पढ़ूँ न पढ़ूँ, फिर भी मैं पन्ने पलट लेती हूँ। मामूली हूँ सो एक अदद नौकरी की कामना कर के ही जीती हूँ। जी. के. को दुरुस्त रखना कोई बच्चों का खेल नहीं। इसलिए अखबार से बेहतर कोई और साधन समझ नहीं आता।
सुर्खियां अब धोखा देती हैं। क्या पढ़ा जाये और क्या छोड़ा जाये का विकल्प शुक्र है कि अभी तक अपने हाथ में वरना तो खैरियत ही नहीं होती। विमुद्रीकरण के मौसम में आरोप और प्रत्यारोप की प्रक्रिया चल रही है। अखबार इसी खबर से भरे हुए हैं। लोगों की दिक्कत और उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनजर कितने ही शोध छप कर आ रहे हैं और शायद ये सब अखबार के पन्नों में जरूरी हिस्सा भी हैं। लेकिन एक खबर दिखी जिस पर मेरा ध्यान गया और सुबह से उस पर थोड़ा बहुत दिमाग का खर्चा भी किया।
खबर है तो दुखद फिर भी मुझे खास लगी। तमिलनाडु के दूसरे सबसे बड़े शहर माने जाने वाले कोयंबटूर में एक स्थानीय डॉक्टर के इंतकाल के बाद उन्हें श्र्द्धांजलि देने के लोग उमड़ पड़े। हर रोज़ कई लोग मरते हैं। लेकिन यकायक इतने अधिक लोगों की आँखें एक साथ नम हो जाएँ ऐसा आजकल कहाँ होता है! बगल में सिर काट लिया जाता है, सड़कों पर जच्चगी हो जाती है तब भी संवेदनशील लोगों की संवेदनाएँ सोई रहती हैं। फिर ऐसा आखिर क्या हो गया कि एक डॉक्टर की मौत पर लोग इकट्ठा हो गए?
अखबार में छपी खबर के मुताबिक डॉक्टर साहब का नाम वी. बालासुब्रमण्यम था। उनका क्लीनिक सिधापुदुर में था। खास और चौंकाने वाली बात यह थी कि महंगाई के इस जमाने में डॉक्टर साहब ने कभी भी अपनी फीस 20 रुपये से ज़्यादा नहीं की। क्लीनिक की शुरुआत में उनकी फीस मात्र 2 रुपये बताई जाती है। इसके अलावा यदि कोई बड़ी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति उनके पास आता था तब वह उसकी अनगिनत विज़िट पर भी उससे केवल एक बार ही फीस के रूपये लेते थे। बाहर की दावा लिखने का बाद भी फीस का रुपया 50 से अधिक नहीं जाता था। पूरे शहर में उन्हें लोग '20 रुपये वाला डॉक्टर' कहकर पुकारते थे। इसके पीछे यही फीस 20 रुपये होना है।
मुझे उनके मौत का दुख है। उनकी मौत एक न भर पाने वाला नुकसान जरूर है। लेकिन सबसे ज़्यादा अहम उनकी सोच का मूल्य है। उनका संतोष है। हम लाख एन. सी. आर. टी. की आदर्शवादी कहानी पढ़ लेते हैं पर न जाने बड़े होने पर किस रेत के नीचे दबा आते हैं। (नदी गंदी कर चुके हैं, मिट्टी की भी अच्छी दशा नहीं रख छोड़ी है) डॉक्टर साहब का इतनी कम फीस लेने के बारे में कहना था कि भगवान ने मुझे मेरा खयाल रखने के लिए काफी पैसा दिया है। इसलिए मैं गरीबों को स्वस्थ रहने में मदद करता हूँ।
कुछ दिनों पहले मैं अपनी सिर दर्द की परेशानी को लेकर एक MBBS डॉक्टर से मुलाकात कर बैठी। एक सफ़ेद पर्चा भर गया। मालूम चला कि आधे पर्चे पर ढेर सारी दवाइयाँ लिखी गई हैं तो आधे पर दर्जन भर टेस्ट लिखे गए हैं। मैंने पूछा कि क्या मुझे ट्यूमर हो गया है या फिर मुझे घर बैठकर 'आनंद' फिल्म के गीत सुनने चाहिए तब डॉक्टर ने बड़े गंभीर लहजे से कहा - 'कुछ कहना मुश्किल है। पहले ये सब टेस्ट करवाकर आइये।' मैंने फिर पूछा कि जब कह नहीं सकते तो दवाइयाँ इतनी अधिक क्यो वो भी 500 रुपये की? तब वह झल्ला गया और बोलने लगा, आप लोगों को ज़्यादा पुछने की आदत न जाने क्यों है? डॉक्टर हम हैं या आप?...खैर कुछ दिनों तक लगा कि मेरे पास अधिक समय नहीं और दिल के ग़म में 'आनंद' फिल्म के गीत भी सुन लिए।
घर पर कभी डॉक्टर के लिखे पर्चे को पढ़ने की कोशिश करती तो कभी दवाइयों की गूगल पर खोज करती। लेकिन पर्चे पढ़ने की प्रक्रिया में मुझे एक बात यही समझ आई कि डॉक्टर ने मुझसे हुई बातचीत को पर्चे पर छाप दिया था। खैर मैंने न तो दवाइयाँ खरीदीं और न ही टेस्ट करवाए। मैं अब बेहतर महसूस करती हूँ। सारा खेल तो रूटीन और खानपान में छुपा है।
फिजूल के टेस्ट और दवाएं आजकल के झोला छाप और प्रमाणपत्र धारण किए डॉक्टरों की आय का मुख्य जरिया बन चुका है। ऐसे बहुत कम डॉक्टर हैं जो वास्तव में मरीज का मर्म और दर्द समझकर ईलाज कर रहे हैं। मेरी मुलाकात फिर भी ऐसे अच्छे डॉक्टर से अभी तक नहीं हुई। बड़े अस्पतालों का क्या कहना! उनके तो बाथरूम का फर्श भी मेरे घर के फर्श से अधिक चमकदार होता है। उसकी सफाई का खर्च भी मरीज के गले पर ऑपरेशन का चाकू रखकर आराम से ले लिया जाता है। मरीज को लगता है कि उसका बड़ा ऑपरेशन किया गया है।
क़ातिल तो सामने आकर चाकू से वार करता है। पर ये बड़े बड़े अस्पताल पीछे से ही गला काट रहे हैं। ऐसे माहौल में इन जैसे डॉक्टर का अब न होना एक बड़ी हानी है। आपको नहीं लगता?
सुर्खियां अब धोखा देती हैं। क्या पढ़ा जाये और क्या छोड़ा जाये का विकल्प शुक्र है कि अभी तक अपने हाथ में वरना तो खैरियत ही नहीं होती। विमुद्रीकरण के मौसम में आरोप और प्रत्यारोप की प्रक्रिया चल रही है। अखबार इसी खबर से भरे हुए हैं। लोगों की दिक्कत और उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनजर कितने ही शोध छप कर आ रहे हैं और शायद ये सब अखबार के पन्नों में जरूरी हिस्सा भी हैं। लेकिन एक खबर दिखी जिस पर मेरा ध्यान गया और सुबह से उस पर थोड़ा बहुत दिमाग का खर्चा भी किया।
खबर है तो दुखद फिर भी मुझे खास लगी। तमिलनाडु के दूसरे सबसे बड़े शहर माने जाने वाले कोयंबटूर में एक स्थानीय डॉक्टर के इंतकाल के बाद उन्हें श्र्द्धांजलि देने के लोग उमड़ पड़े। हर रोज़ कई लोग मरते हैं। लेकिन यकायक इतने अधिक लोगों की आँखें एक साथ नम हो जाएँ ऐसा आजकल कहाँ होता है! बगल में सिर काट लिया जाता है, सड़कों पर जच्चगी हो जाती है तब भी संवेदनशील लोगों की संवेदनाएँ सोई रहती हैं। फिर ऐसा आखिर क्या हो गया कि एक डॉक्टर की मौत पर लोग इकट्ठा हो गए?
अखबार में छपी खबर के मुताबिक डॉक्टर साहब का नाम वी. बालासुब्रमण्यम था। उनका क्लीनिक सिधापुदुर में था। खास और चौंकाने वाली बात यह थी कि महंगाई के इस जमाने में डॉक्टर साहब ने कभी भी अपनी फीस 20 रुपये से ज़्यादा नहीं की। क्लीनिक की शुरुआत में उनकी फीस मात्र 2 रुपये बताई जाती है। इसके अलावा यदि कोई बड़ी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति उनके पास आता था तब वह उसकी अनगिनत विज़िट पर भी उससे केवल एक बार ही फीस के रूपये लेते थे। बाहर की दावा लिखने का बाद भी फीस का रुपया 50 से अधिक नहीं जाता था। पूरे शहर में उन्हें लोग '20 रुपये वाला डॉक्टर' कहकर पुकारते थे। इसके पीछे यही फीस 20 रुपये होना है।
मुझे उनके मौत का दुख है। उनकी मौत एक न भर पाने वाला नुकसान जरूर है। लेकिन सबसे ज़्यादा अहम उनकी सोच का मूल्य है। उनका संतोष है। हम लाख एन. सी. आर. टी. की आदर्शवादी कहानी पढ़ लेते हैं पर न जाने बड़े होने पर किस रेत के नीचे दबा आते हैं। (नदी गंदी कर चुके हैं, मिट्टी की भी अच्छी दशा नहीं रख छोड़ी है) डॉक्टर साहब का इतनी कम फीस लेने के बारे में कहना था कि भगवान ने मुझे मेरा खयाल रखने के लिए काफी पैसा दिया है। इसलिए मैं गरीबों को स्वस्थ रहने में मदद करता हूँ।
कुछ दिनों पहले मैं अपनी सिर दर्द की परेशानी को लेकर एक MBBS डॉक्टर से मुलाकात कर बैठी। एक सफ़ेद पर्चा भर गया। मालूम चला कि आधे पर्चे पर ढेर सारी दवाइयाँ लिखी गई हैं तो आधे पर दर्जन भर टेस्ट लिखे गए हैं। मैंने पूछा कि क्या मुझे ट्यूमर हो गया है या फिर मुझे घर बैठकर 'आनंद' फिल्म के गीत सुनने चाहिए तब डॉक्टर ने बड़े गंभीर लहजे से कहा - 'कुछ कहना मुश्किल है। पहले ये सब टेस्ट करवाकर आइये।' मैंने फिर पूछा कि जब कह नहीं सकते तो दवाइयाँ इतनी अधिक क्यो वो भी 500 रुपये की? तब वह झल्ला गया और बोलने लगा, आप लोगों को ज़्यादा पुछने की आदत न जाने क्यों है? डॉक्टर हम हैं या आप?...खैर कुछ दिनों तक लगा कि मेरे पास अधिक समय नहीं और दिल के ग़म में 'आनंद' फिल्म के गीत भी सुन लिए।
घर पर कभी डॉक्टर के लिखे पर्चे को पढ़ने की कोशिश करती तो कभी दवाइयों की गूगल पर खोज करती। लेकिन पर्चे पढ़ने की प्रक्रिया में मुझे एक बात यही समझ आई कि डॉक्टर ने मुझसे हुई बातचीत को पर्चे पर छाप दिया था। खैर मैंने न तो दवाइयाँ खरीदीं और न ही टेस्ट करवाए। मैं अब बेहतर महसूस करती हूँ। सारा खेल तो रूटीन और खानपान में छुपा है।
फिजूल के टेस्ट और दवाएं आजकल के झोला छाप और प्रमाणपत्र धारण किए डॉक्टरों की आय का मुख्य जरिया बन चुका है। ऐसे बहुत कम डॉक्टर हैं जो वास्तव में मरीज का मर्म और दर्द समझकर ईलाज कर रहे हैं। मेरी मुलाकात फिर भी ऐसे अच्छे डॉक्टर से अभी तक नहीं हुई। बड़े अस्पतालों का क्या कहना! उनके तो बाथरूम का फर्श भी मेरे घर के फर्श से अधिक चमकदार होता है। उसकी सफाई का खर्च भी मरीज के गले पर ऑपरेशन का चाकू रखकर आराम से ले लिया जाता है। मरीज को लगता है कि उसका बड़ा ऑपरेशन किया गया है।
क़ातिल तो सामने आकर चाकू से वार करता है। पर ये बड़े बड़े अस्पताल पीछे से ही गला काट रहे हैं। ऐसे माहौल में इन जैसे डॉक्टर का अब न होना एक बड़ी हानी है। आपको नहीं लगता?


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