दो दिन पहले की बात है। FB पर किसी म्यूचुअल दोस्त के दोस्त ने रिक्वेस्ट भेजी। मैंने एक्सेप्ट कर ली। लेकिन सज्जन इतने आतुर दिखे कि मुझे बेहद अजीबो-गरीब मैसेज करने लगे। इतना ही नहीं मुझे उनके चलते एक जानकारी और मिली कि FB में कॉलिंग फीचर भी है। मुझे इसका इल्म नहीं था। सज्जन लगातार कॉल कर रहे थे। न जाने उन्हें मुझमें दिलचस्पी थी या कोई अनंत रहस्य दिखाई दे गया था। ख़ैर, मैंने उनका और अपना दोनों का समय बचाया और ब्लॉक करने का विकल्प इस्तेमाल किया। इस व्यक्ति की एक बात और खास थी। इनका FB कवर फ़ोटो अपनी पत्नी के साथ था। पहली नज़र में किसी को भी लगेगा कि भला व्यक्ति है। बिलकुल पत्नी भक्त। फिर मुझे इतने मैसेज करने के पीछे क्या मतलब निकाला जाए?
इन दो दिनों से कुछ दिन पहले मैंने इस नोटबंदी के मौसम से बचने के लिए फिल्म 'देट गर्ल इन यैलो बूट्स' देखी। फिल्म मुझे बेहतर लगी। हालांकि यह फिल्म मैंने दो टुकड़ों में देखी। एक हिस्सा पहले और दूसरा हिस्सा दो दिन बाद। लेकिन इतना तय था कि फिल्म की मुख्य किरदार भारतीय पिता और ब्रितानी माता की बेटी 'रूथ' मेरे साथ हो चुकी थी। वह हजारों मील दूर अपने भारतीय पिता को खोजने के लिए बॉम्बे आने वाली एक नौजवान लड़की है। वह तोड़ मरोड़ की हिन्दी से बेहतर हिन्दी भी बोल लेती है। लेकिन यह लड़की हर भारतीय लड़की जैसी ही दिक्कतों का सामना करती है।
फिल्म को हर कोण से देखा जा सकता है। जैसे एक विदेशी लड़की की नज़र से। रिश्तों में मजबूत रिश्ता यानि पिता को पाने की चाह रखने वाली बेटी की नज़र से। एक मसाज पार्लर में आदमियों को मसाज देने वाली और 1000 रुपये की अतिरिक्त फीस के साथ 'हैंड मसाज' करने वाली पार्लर वाली की नज़र से। एक ड्रग लेने वाले लड़के की प्रेमिका की नज़र से। ...कहने का मकसद है कि 'रूथ' अंजान बॉम्बे शहर में कई चेहरे के साथ जीने की कोशिश करती है। उसके चरित्र में चालाकी का भी शेड है जिसे फिल्म के कई दृश्य में देखा जा सकता है। जैसे बॉम्बे शहर के सरकारी कार्यलयों में या फिर पोस्ट ऑफिस में जब वह अपना काम निकलवाना चाहती है तब 'घूस' जैसी चीज को वह दान जैसे शब्द से जोड़ते हुए देती है। उसे भारतीय सरकारी दफ्तरों का खूब अंदाज़ा है। यह दान देना उसके कई अटके हुए काम बखूबी करवा भी देता है।
उसकी बॉम्बे की ज़िंदगी में कई मर्द हैं। एक उसका प्रेमी, जो नशे में रहता है और ड्रग के बिना जी नहीं सकता, दूसरा एक माफिया का आदमी जो अपने पिता को बचपन में खो चुका है, तीसरा एक अंजान आदमी जो उसके घर के बाहर कभी पैसे लेने तो कभी उससे से संबंध बनाने की चाहत लिए आता रहता है, चौथा एक बुजुर्ग आदमी जो मसाज करवाने आता है और उसे 'बेटी या बेटा' कहकर पुकारता है, पांचवा एक अमीर आदमी जो उसके पिता से मिलवाने का भरोसा देकर उसका फायदा अपने बिजनेस के लिए उठाना चाहता है और छठा आदमी उसका एक और मसाज कस्टमर जो उसका पिता है। वह अपने पिता को 'हैंड मसाज' भी देती है।
फिल्म के अंत में रूथ तब और चौंक (सदमा) जाती है जब उसे मालूम चलता है कि उसका पिता और कोई नहीं वही व्यक्ति है जो उसका नियमित मसाज ग्राहक है। उसका सब्र का बांध टूट भी जाता है। अंत के दृश्य में उसे दुखी, हैरान और सदमे के चेहरे के साथ टॅक्सी में बैठकर जाते हुए दिखाया जाता है। मुझे लगता है कि यह दृश्य वास्तव में उस सच्चाई की परतें खोलता है जिसमें रूथ को पता चलता है कि लड़की होना बहुत से लोगों के लिए सिर्फ शरीर भर होना ही है। मुझे इस बाबत एक बैठक याद आ जाती है जिसमें एक कार्यकर्ता ने बताया था कि एक 7 साल की बच्ची का रेप उसके खुद के पिता द्वारा रोजाना किया जाता था। इस हरकत की खबर माँ को भी थी पर वह चुप रही।
रूथ पूरी फिल्म में पीले जूतों में नज़र आती है। वह हर जगह इन्हीं जूतों को पहनकर जाती है। एक ही जोड़ी जूता और वह भी एक ही रंग का, यह बतलाता है कि आप कहीं भी जाओ, किसी भी कोने में... औरत और उसके शरीर को लेकर 'आबादी' की सोच साफ है। उस सोच में वही एक रंग है। वही एक झलकी है। शरीर से बाहर कुछ भी नहीं दिखता। जब आप गूगल में इस फिल्म के बारे में पढ़ेंगे तो पायेंगे वास्तव में हर आदमी उसके खूबसूरत शरीर में एक मौज-मस्ती वाली हिस्सेदारी चाहता है। खुद उसका पिता भी यही करना चाहता है। (...And everyone wants a piece of her.)
हाल ही में आई दो फिल्में 'पार्च्ड' और 'पिंक' दोनों ही महिला आधारित फिल्में हैं। दोनों ही फिल्मों की आलोचना की जा सकती है। फिर भी दोनों फिल्में एक संवाद रचने में कामयाब हैं। 'पार्च्ड' में वे मुख्य महिला किरदार हैं जो ग्रामीण इलाक़े से ताल्लुक रखती हैं और वे पढ़ी लिखी नहीं हैं। जबकि 'पिंक' फिल्म में शहर से ताल्लुक रखने वाली और आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़कियों की कहानी है। तीनों लड़कियां पढ़ी लिखी हैं फिर भी उनको निशाने पर लिया जाता है। 'देट गर्ल इन यैलो बूट्स' फिल्म काफी पहले बन चुकी है और इसमें एक विदेशी मूल की लड़की की कहानी है। लेकिन वह भी उसी तरह की तकलीफ़ों का सामना कर रही है जिसका कि बाक़ी भारतीय लड़कियां।
ये सभी फिल्में मेरे लिए ख़ास हैं। इसलिए नहीं कि इनसे मेरा मनोरंजन हो रहा है या फिर कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। मुझे इस राजनीति, समाज, संस्कृति और पारिवारिक संरचना में कब क्या देखने और समझने को मिल जाये, इसका अंदाज़ा लगाने में ये सभी फिल्में मददगार हैं। अपने आसपास एक जाल की बुनावट समझ आती है। हर स्तर पर मोटी-मोटी तहें हैं। नियम व शर्तें लागू हैं। इन फिल्मों से बहुत न सही कुछ तो समझ आ ही जाता है।
'रूथ' का किरदार ज़्यादा दिलचस्प है 'पार्च्ड' फिल्म की नायिकाओं की तरह। अंजान बॉम्बे शहर में वह अपनी शैली से जी रही है। वह काम कर रही है। पिता को खोजने का व्यक्तिगत खोजी अभियान चला रही है। सड़े-गले नोकिया फोन का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। वह चालाक है। वह दिक्कतों से बाहर निकलने का तरीका भी जानती है। अपने प्रेमी को न कहना और थप्पड़ जड़ना भी वह जानती है। वह माफिया के सरगना से निपटने का जरिया जानती है और उसे अपनाती भी है। अपने मानसिक रूप से विकृत पिता को गरम तैल से जलाती है और तो और उस पर पिस्तौल भी तानती है। वह रोती है पर खुद पर नहीं लोगों के दिमाग पर। रोना अपने आप को हल्के करने का साधन है न कि लाचारी और कमजोर करने का। कुल मिलाकर 'रूथ' से मुलाक़ात बेहतरीन रही।


No comments:
Post a Comment