बिजली के गुल हो जाने में सबसे पहला खयाल जो मुझे आता है वह रोशनी को फिर से पा लेने का होता है। उसके लिए मोमबत्ती चाहिए। मोमबत्ती है, तब उसके लिए माचिस की नन्ही डिबिया भी चाहिए। जी हाँ, जब से शहरीकरण के शिकार हुए हैं, माचिस से हल्की दूरी हो गई है। लेकिन यह डिबिया कभी घर से नदारद नहीं हो पाई। एक या दो डिबिया आड़े-टेढ़े वक़्त के लिए घर की 'अन्नपूर्णा' घर में जरूर रखती है।
पिछले कुछ महीनों से बिजली काफी गुल खिलाती है। इस बहाने अंधेरे से मुलाक़ात हो जाती है। पर अंधेरे की चाहत किसी को बहुत देर तक के लिए नहीं होती। सभी इस 'तम' से बाहर निकल आना चाहते हैं। मुझे अंधेरा पसंद है पर मोमबत्ती की चाहत भी नहीं छोड़ी जा सकती। इसलिए माचिस को भूलना ज़रा मुश्किल काम है।
छोटी सी डिबिया में जादू है। आग को आपकी इच्छा पर जलाया जा सकता है। एक रगड़ से छोटी सी तीली में नन्ही आग जल जाती है और पल में गैस, मोमबत्ती, अलाव वगैरह को जलाया जा सकता है। यह सुलभ तरीका है। यह सस्ता है। यह भरोसेमंद है। इसमें समय भी बेहद कम लगता है। माचिस की तीली पर रगड़ से आग लग जाने वाली चीज फास्फोरस है। यह ज्वलंतशील है। इसका पता सन् 1669 में चला था। उसके बाद कई वैज्ञानिकों ने माचिस के सफर को गढ़ा। इसमें आइरिश वैज्ञानिक रोबर्ट बोयल, अंग्रेज़ वैज्ञानिक जॉन वॉकर, फ्रेंच वैज्ञानिक चार्ल्स सौरिया आदि वैज्ञानिकों ने तरह तरह के प्रयोग करते हुए माचिस में तब्दीलियाँ कीं। सन् 1855 में स्वीडन के जॉन एडवर्ड लण्ड्स्ट्रोम ने माचिस का पेटेंट किया। इसके बाद भी माचिस बनाने के क्षेत्र में तमाम कंपनियों ने काफी कुछ बदलाव किए और लोकप्रियता हासिल की।
भारत के संदर्भ में दिलचस्प है कि माचिस का आयात किया जाता था। यह आयात, जापान, स्वीडन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से होता था। 1910 के आसपास प्रवासियों ने कलकत्ता में इसे बनाना शुरू किया और जल्द ही वहाँ के लोगों ने इसे बनाने का हुनर सीखते हुए खुद से ही इसे बनाना आरंभ कर दिया। बाद में माचिस निर्माताओं ने दक्षिण भारत में तमिलनाडु का रुख किया और वहाँ अपने इस उद्योग कि स्थापना की। इसके पीछे की वजहें बेहतरीन जलवायु, सस्ते मजदूर और कच्चे माल की सहूलियतें बताई जाती हैं। आज भी तमिलनाडु में 67% माचिस का उत्पादन किया जाता है। विमको(1924) लिमिटेड नामक कंपनी जो कि पुरानी कंपनी भी है, इस क्षेत्र में अपनी 5 कंपनियों की मदद से लगभग 18% माचिस का उत्पादन करती है। माचिस उद्योग, कुटीर और लघु उद्योग से सीधे तौर पर जुड़ा है। पर आजकल इस उद्योग को भी मुश्किलें हो रही हैं। खासतौर से कच्चे माल के लिए।
हैं न दिलचस्प माचिस का अतीत! लेकिन इस सफर से भी ज़्यादा मजेदार माचिसों के कागज़ी(लुगद्दी) डिबिया का डिज़ाइन है। आप यदि गूगल में जाकर इसकी खोज करेंगे तो आपको तमाम तरह के अद्भुत माचिस के सुंदर और बेमिसाल कलाकारी के नमूने मिल जाएंगे। आप का दिमाग तुरंत उन माचिस के सुंदर चित्र के सहारे उन यादों में सोई कहानियों को जगाएगा जिसे आपने किसी किताब में नहीं या किसी प्रदर्शनी में नहीं देखा। किसी महान पैंटर के हाथ से नहीं बनी होगी। सरलता में ही सुंदरता दिखेगी। इसका ये डिज़ाइनर माचिसें बेहतरीन उदाहरण हैं। चलिये कुछ माचिसों के इन्हीं चित्रों की सैर की जाये।
और भी बहुत चित्रकारी वाली माचिसें हैं। आपको गूगल में हजारियों मिल जाएंगी। गौर से देखने में मालूम चलता है कि ये सभी चित्र भारत देश के प्रतिकों को खूबसूरती से वहन करते हैं। जानवर से लेकर धर्म तक को सहेजा गया है। सन् 1910 के बाद के इतिहास में उद्योगों के साथ साथ इन चित्रों के होने की वजह के अतीत में इनके बिना नहीं झाँका जा सकता। इन माचिसों की तरफ एक बार देखना होगा। उस समय के लोगों और समाज का मूड इससे समझने में जरूरत मिलेगी। एक रिश्ता दिखेगा। हिन्दू देवता भी माचिस में छपे दिखेंगे और महात्मा बुद्ध भी, इसका एक मतलब यह भी लिया जा सकता है कि उस समय में लोग धर्म और उसके देवता के नाम पर काट-मार या भावनाएँ आहत होने कि शिकायतें न के बराबर करते होंगे।
इन पर किसान से लेकर नेता जी सुभाष चंद्र बोस तक दिखेंगे। इसका सीधा मतलब यह है भी समझा जा सकता है कि गुलाम भारत में नेताओं के संदेशों को घर घर तक पहुँचाने के लिए बहुत सी और बिना शोर मचाने वाली मेहनत इन डिबियाओं ने की होगी। यह भी समझा जा सकता है कि आज़ाद भारत में किसान और नेताओं की स्थिति का स्तर कैसा होगा! इन डिबियाओं पर भारतीय मिथकों का भी बेहद असर दिख रहा है। जैसे काली माँ के चित्र वाली माचिस का चित्र या कंपनी शकुंतला पर छपी तस्वीर।
आज के समय में डिबियाओं के चित्रकारी में बहुत विभिन्नता नहीं रह गई है। आज केक वाली माचिस सबसे अधिक सामान्य है। इसके पीछे की वजह यही होगी- जाने किसकी भावना कब आहत हो जाए। दूसरा कारण लाइटर का इस्तेमाल घरों में अधिक होता है, चाहे सिगरेट सुलगाने के लिए हो या फिर गैस चूल्हा जलाने के लिए। अगली वजह इलेक्ट्रोनिक रीचार्ज लाइट्स भी हैं। बिजली जाते ही ये मशीनी लाइट्स घर और आँख या फिर दिमाग सब कुछ रोशन कर देती हैं।
माचिस शब्द को लगभग कुछ खास अर्थ से जोड़ा जाता है। मसलन जलाने, गुस्सा करने, आग लगाने(कानाफूसी करने) आदि से। लेकिन मुझे लगता है इस तरह कि एक सैर जरूरी है। शब्दों के जमे हुए चित्र को तोड़ने की भी जरूरत है। माचिस इसलिए भी मायने हैं क्योंकि इसके साथ सामान्य लोगों के रोज़मर्रा के बयान जुड़े हुए हैं। बड़े-बुज़ुर्गों से पूछिए माचिस के बारे में, फिर देखिये क्या बेहतरीन कहानियाँ सुनने को मिलेंगी।
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सभी चित्र गूगल से- दिल से शुक्रिया के साथ
इन लिंक्स में अच्छी जानकारी है। आप भी पढ़ सकते हैं।
https://en.wikipedia.org/wiki/Match
http://www.fao.org/docrep/x5860e/x5860e05.htm
http://engrave.in/blog/history-of-indian-matchbox-art/






















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