इस बच्ची की रंगोली को देखकर बहुत कुछ दिमाग में काफी दिनों से चल रहा था। जब आज बाहर गई तब एक दृश्य दिखाई दिया। घर आई तो किसी ने कुछ बातें बताई और इस पोस्ट को लिखने बैठ गई।
माफ कीजिएगा। हम बचपन कहीं किसी पेटी में बंद कर आए हैं और चाभी भी हमने खो दी है। अपने कु-हाथों से किसी समंदर तल में डाल आए हैं। आज दिल्ली के मौसम का देखूँ, सुनूँ, जानूँ, सोचूँ, पहचानूँ, सूंघूँ या महसूस करूँ तो सबसे ज़्यादा बच्चे त्रस्त होते दिखाई दे रहे हैं।... आज बस में जाते वक़्त एक बुजुर्ग महिला को गुलाबी छोटे कंबल में एक नन्ही जान को लपेटे देखा। उनका घर सड़क के किनारे था। जैसे ही मैंने यह छवि देखी तो पहला खयाल उस बच्चे की साँसों पर गया। कौन सी हवा वो ले रहा होगा, उसका स्वास्थ्य भविष्य क्या होगा, अगर उसके मुंह पर मास्क लगाया भी तो उसके साथ कुछ हो भी सकता है, उसके लिए सरकार क्या करेगी, उसका आसपड़ोस क्या करेगा, उसकी माँ की लाचारी क्या होगी, उसके पिता की कोशिश क्या होगी, ...कुछ यही सवाल और ख़यालों को अभी भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।
दूसरी वजह किसी सज्जन ने बताई। वह अपनी बेटी का ईलाज कराने के सिलसिले में 'मेडिकल' (एम्स) जाते हैं और वहाँ होने वाले ढेर सारे किस्से हमें बताते हैं। सच में उनकी बातों को सुनकर मुझे यही एहसास होता है कि वह बहुत बहादुर हैं। वह बड़ी बारीकीयत से वहाँ के माहौल, डॉक्टर (सीनियर और जूनियर), स्वयं सहायक, टेस्ट्स की पर्चियाँ बनवाने की लाइन, पैसे जमा करने की जद्दोजहद, टेस्ट्स करवाने की लाइन, फिर डॉक्टरों में होने वाली आपसी बहसें, बच्ची का मुआयना, फिर लिखी गई दवाइयों को लेने की मशक्कत... कुछ ऐसी ही और भी बातें कहानी की तरह बताते हैं। वह जब भी ये सब बयान साझा करते हैं तब मुझे मन में यह खयाल आता है - 'क़िला फतेह हुआ!'
उन्हों ने आज बताया कि एक 11 बरस के बच्चे को उसकी माँ लाई थी। बच्चे का मर्ज़ इतनी सी उम्र में लगभग 70 किलो का वजन था।
डॉक्टर ने माँ से बच्चे के रूटीन के बारे में पूछा तो माँ ने बताया- 'स्कूल से घर आने के बाद ट्यूशन जाता है। फिर घर में आकर अपने होमवर्क पर लग जाता है। टीवी देखता है फिर सो जाता है।'
डॉक्टर ने ट्यूशन वाली बात को पकड़ा और कहा- 'ये क्या मतलब है ट्यूशन का! जब बच्चा एक जगह पहले से पढ़ रहा है तब इसे ट्यूशन में कौन सा ज्ञान दिलवा रहे हैं आप लोग? इसकी ज़िंदगी तो आपने ही खराब कर दी है। कहीं भी बच्चा खेलेगा नहीं तो क्या होगा इसका? आप लोग खुद ही इसके दुश्मन हैं...' माँ को इतना सुना लेने के बाद डॉक्टर ने बच्चे से पूछा- 'आपके स्कूल में दोस्त हैं?'
बच्चा दो टूक जवाब देते हुए बोला- 'नहीं। मेरा कोई दोस्त नहीं है।'...
जब सज्जन व्यक्ति की ये बातें सुनी तो कहीं न कहीं बच्चों को इस समय सबसे कठोर जगह पर खड़े हुए पाया। खुशहाल परिवार जैसे शब्दों को सोचती हूँ तब कुछ परिभाषाएँ सुनने को मिलती है। कहीं कहीं सरकार की शब्दावली में हम दो हमारे, हमारे दो, छोटा परिवार सुखी परिवार जैसे जुमले बहुत समय पहले से सुनती चले आ रहे हैं। वाजिब है इन जुमलों में स्वास्थ्य की भी कल्पना की गई है, जिसका आधार पारिवारिकता है। लेकिन अगर इससे बाहर जायें तब आसपड़ोस, स्कूल और समाज जैसी इकाई आती हैं।
घर-परिवार-फ़ैमिली
वास्तव में परिवार से लेकर समाज तक सभी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी में अब बच्चे छुटते जा रहे हैं। इन ढांचों को देखने पर मालूम देता है कि कुछ झोल हैं जो अब विकराल रूप में दिखाई दे रहे हैं। परिवार की बनावट में बदलाव आया है। शायद दो बच्चों वाली बात में लेकिन उन दो बच्चों के रोज़मर्रा में हुए बुनियादी बदलाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मसलन माता पिता यदि दोनों कामकाजी हैं तब शायद कहीं न कहीं रिश्तों में साथ बिताए जाने वाले वक़्त में भारी कटौती हो रही है। रिश्ते उस मुकाम तक विकसित और संवेदनशील नहीं हो पा रहे जितनी की जरूरत है। तकनीक ने हमारे जीवन में बड़ी वाली और घातक घुसपैठ की है। हमें यह बात पता भी है। बात यह भी है कि कुछ एकल परिवारों से लेकर संयुक्त परिवारों में ज़्यादा की तमन्ना ही नहीं बल्कि उनकी यह बड़ी उम्मीद है कि बच्चा आसमान से तारे तोड़ ले आए। एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी के नाम पर उससे उसका रूटीन जो सामान्य होना चाहिए था वही लिया भी जा रहा है। क्या हम यह सोचते हैं कि इस 'एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी' का कितना एक्सट्रापन बच्चे तक पहुंचा, पहुंचा भी या दिमाग में थैलाभर बोझ रख गया?
स्कूल-विद्यालय
मैं जब सरकारी विद्यालयों में घुसती हूँ तब दिमाग में लापरवाही से लेकर स्कूल का पाठ्यक्रम नाचने लगता है। जिनको मेरी बात बुरी लगे उसके लिए मैं माफी भी मांगती हूँ। लेकिन यह मेरा खयाल है। क्लासरूम में चिपके हुए विज्ञान और आदर्श की खूबसूरत पेंटिंग में भी उन बच्चों को जगह दी जाती है जिसका चित्र टीचर को खूबसूरत लगे। ऐसा अक्सर होता है। हो सकता है कहीं न भी हो। क्लास रूम दरवाजे के ऊपर शानदार लाइन होती है जिसे शायद कोई ही पढ़ता है। जैसे समय अमूल्य धन है...आदि आदि। पाठ्यक्रम में घुसी हुईं आदर्श कहानियाँ आदर्श क्यों नहीं दे पातीं, यह सोचने लायक है। क्यों नहीं बच्चों को सच्चाई से रूबरू कराया जाये कि आपका आसपास अब खतरनाक है और जहरीला भी। समाज में बहुत असमानता है, आपको हर अजनबी से अब खतरा हो गया है। काबुलीवाला अब बदल चुका है। भारत में ही रहने लगा है और मौका देखकर वह आपको उठाने की कोशिश करता है...
घर में आई एक पड़ोसन ने माँ से अपनी चिंता इस बात में कही कि उसका बच्चा हिन्दी पढ़ने में तो अच्छा है पर अंग्रेज़ी बहुत खराब है। इसलिए स्कूल से बार बार मैडम की शिकायतें आ रही हैं। काम छोड़कर रोज़ रोज़ जाना मुश्किल है। पर ये लड़का जरा सा समझने को तैयार नहीं। ...वह आगे बोली कि मैडम कहती है कैसे माँ बाप हो जो आप बच्चे पर ध्यान नहीं देते। आप लोग अपने में लगे रहते हो। घर में आप लोग टाइम नहीं देते।...अब टीचर को कैसे बताऊँ कि अगर एक छुट्टी हुई तो 'तनखा' कट जाएगी। शाम को लौटो तो हम दोनों इस हालत में नहीं रह पाते कि उसे बैठकर पढ़ाएँ... उनके जाने के बाद मैं उस भली टीचर के बारे में सोचने लगी कि आखिर उनकी बच्चे को लेकर और अँग्रेजी को लेकर क्या कोशिश है...शायद उनकी परेशानी यह भी होगी कि एक जान पर 50 बच्चे...इन महीन बुनावटी तारों को समझो तो सिर चकरा जाये। मैं अगर 2004-05 में आपको अपने स्कूल की बातों में हाथ पकड़ कर ले जाऊं तो हम क्लास में 45 तक की संख्या में थे। हमारे पास भी अंग्रेज़ी का विषय था। हमारी टीचर कसं से ऐसा पढ़ाती थीं कि मैं आज भी अंग्रेज़ी कि उनकी पढ़ाई हुई कहानियाँ न तो भूली हूँ और न ही इस भाषा का आधार।
मेरी माँ का इस किताबी पढ़ाई से रिश्ता नहीं। इसके अलावा उनका समय काम में जाता था। वो बातें भी अपने सीखे हुए हुनर की करती हैं। मसलन बीज को मिट्टी में कितनी दूरी तक डालना है। बीज से क्या बातें कहनी हैं। पानी कितना डालना है। यही सब...इसलिए मेरी पढ़ाई में उनका होमवर्क करवाने वाला हाथ नहीं है। इसके अलावा पिताजी की 8 से 9 वाली ड्यूटी उन्हें थका दिया करती थी। इसलिए शिक्षा में हाथ मेरी तमाम टीचरों का ही रहा। बिना ट्यूशन के।
मोहल्ला-आसपड़ोस
मैं जब पीछे मुड़कर अपना और अपने हम उम्र लोगों के बचपन के बारे में बात करती हूँ तब बहुत सारी गतिविधियों को देखती हूँ। जैसे तरह के खेल खेलना, हर तरह के त्योहारों पर कुछ गतिविधियां करना, मेले जाना, गर्मी की छुट्टियों में घर में रहते हुए भी रूटीन में खेल खेलना, पड़ोस में रात को इकट्ठा होकर कहानियाँ सुनाने की ज़िद्द करना, अंताक्षरी खेलना, खिलौने बनाना...ऐसे ही आपका बचपन मुझसे ज़्यादा खास होगा। बचपन देखती हूँ तब ट्यूशन से परे एक मुक्कमल दिनचर्या दिखती है। हाँ, उसमें झोल भी काफी रही हैं पर वे इतनी भयानक नहीं थीं कि दिमाग पर असर कर दें। मुझे याद है जब गली में किसी का बच्चा खोया था तब मोहल्ले में शोर तो हुआ ही साथ में सभी लोग चप्पा चप्पा खोजकर बिना पुलिस की मदद से बच्चे को खोज लाये थे। लेकिन अब यह माहौल 180 डिग्री तक उल्टा घूम गया है। अब लोग अपने अपने घरों में मजबूत दरवाजे लगाए जीते हैं या जाने रहते हैं। मुझे नहीं पता।
इसलिए मैं अभी भी उन बच्चों की साँसों का सोच रही हूँ जिनकी तकलीफ का हमें अंदाज़ नहीं। हाय तौबा मचा मचा कर मैं खुद फेसबुक पर पोस्ट लिख रही हूँ। दूसरों पर इल्ज़ाम लगाने का आसान काम कर रही हूँ। मैं खुद कुछ भी नहीं कर रही। ब्लॉग लिख कर उपदेश दे रही हूँ। दिल्ली के हाल पर खांस रही हूँ, गाड़ियों वालों को कोस रही हूँ। ...सच बताऊँ तो मैं कुछ भी नहीं कर रही। मुझे नहीं पता कि मैं ऐसा क्या करूँ कि हवा सांस लेने लायक हो जाएँ। लेकिन, जब मैं यह सब सोच रही थी तब पापा कुछ पौधे बाज़ार से खरीद लाये हैं। देखभाल करेंगे तो कुछ दिन में बड़े हो जाएंगे।
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दोनों फोटो गूगल से साभार
माफ कीजिएगा। हम बचपन कहीं किसी पेटी में बंद कर आए हैं और चाभी भी हमने खो दी है। अपने कु-हाथों से किसी समंदर तल में डाल आए हैं। आज दिल्ली के मौसम का देखूँ, सुनूँ, जानूँ, सोचूँ, पहचानूँ, सूंघूँ या महसूस करूँ तो सबसे ज़्यादा बच्चे त्रस्त होते दिखाई दे रहे हैं।... आज बस में जाते वक़्त एक बुजुर्ग महिला को गुलाबी छोटे कंबल में एक नन्ही जान को लपेटे देखा। उनका घर सड़क के किनारे था। जैसे ही मैंने यह छवि देखी तो पहला खयाल उस बच्चे की साँसों पर गया। कौन सी हवा वो ले रहा होगा, उसका स्वास्थ्य भविष्य क्या होगा, अगर उसके मुंह पर मास्क लगाया भी तो उसके साथ कुछ हो भी सकता है, उसके लिए सरकार क्या करेगी, उसका आसपड़ोस क्या करेगा, उसकी माँ की लाचारी क्या होगी, उसके पिता की कोशिश क्या होगी, ...कुछ यही सवाल और ख़यालों को अभी भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।
दूसरी वजह किसी सज्जन ने बताई। वह अपनी बेटी का ईलाज कराने के सिलसिले में 'मेडिकल' (एम्स) जाते हैं और वहाँ होने वाले ढेर सारे किस्से हमें बताते हैं। सच में उनकी बातों को सुनकर मुझे यही एहसास होता है कि वह बहुत बहादुर हैं। वह बड़ी बारीकीयत से वहाँ के माहौल, डॉक्टर (सीनियर और जूनियर), स्वयं सहायक, टेस्ट्स की पर्चियाँ बनवाने की लाइन, पैसे जमा करने की जद्दोजहद, टेस्ट्स करवाने की लाइन, फिर डॉक्टरों में होने वाली आपसी बहसें, बच्ची का मुआयना, फिर लिखी गई दवाइयों को लेने की मशक्कत... कुछ ऐसी ही और भी बातें कहानी की तरह बताते हैं। वह जब भी ये सब बयान साझा करते हैं तब मुझे मन में यह खयाल आता है - 'क़िला फतेह हुआ!'
उन्हों ने आज बताया कि एक 11 बरस के बच्चे को उसकी माँ लाई थी। बच्चे का मर्ज़ इतनी सी उम्र में लगभग 70 किलो का वजन था।
डॉक्टर ने माँ से बच्चे के रूटीन के बारे में पूछा तो माँ ने बताया- 'स्कूल से घर आने के बाद ट्यूशन जाता है। फिर घर में आकर अपने होमवर्क पर लग जाता है। टीवी देखता है फिर सो जाता है।'
डॉक्टर ने ट्यूशन वाली बात को पकड़ा और कहा- 'ये क्या मतलब है ट्यूशन का! जब बच्चा एक जगह पहले से पढ़ रहा है तब इसे ट्यूशन में कौन सा ज्ञान दिलवा रहे हैं आप लोग? इसकी ज़िंदगी तो आपने ही खराब कर दी है। कहीं भी बच्चा खेलेगा नहीं तो क्या होगा इसका? आप लोग खुद ही इसके दुश्मन हैं...' माँ को इतना सुना लेने के बाद डॉक्टर ने बच्चे से पूछा- 'आपके स्कूल में दोस्त हैं?'
बच्चा दो टूक जवाब देते हुए बोला- 'नहीं। मेरा कोई दोस्त नहीं है।'...
जब सज्जन व्यक्ति की ये बातें सुनी तो कहीं न कहीं बच्चों को इस समय सबसे कठोर जगह पर खड़े हुए पाया। खुशहाल परिवार जैसे शब्दों को सोचती हूँ तब कुछ परिभाषाएँ सुनने को मिलती है। कहीं कहीं सरकार की शब्दावली में हम दो हमारे, हमारे दो, छोटा परिवार सुखी परिवार जैसे जुमले बहुत समय पहले से सुनती चले आ रहे हैं। वाजिब है इन जुमलों में स्वास्थ्य की भी कल्पना की गई है, जिसका आधार पारिवारिकता है। लेकिन अगर इससे बाहर जायें तब आसपड़ोस, स्कूल और समाज जैसी इकाई आती हैं।
घर-परिवार-फ़ैमिली
वास्तव में परिवार से लेकर समाज तक सभी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी में अब बच्चे छुटते जा रहे हैं। इन ढांचों को देखने पर मालूम देता है कि कुछ झोल हैं जो अब विकराल रूप में दिखाई दे रहे हैं। परिवार की बनावट में बदलाव आया है। शायद दो बच्चों वाली बात में लेकिन उन दो बच्चों के रोज़मर्रा में हुए बुनियादी बदलाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मसलन माता पिता यदि दोनों कामकाजी हैं तब शायद कहीं न कहीं रिश्तों में साथ बिताए जाने वाले वक़्त में भारी कटौती हो रही है। रिश्ते उस मुकाम तक विकसित और संवेदनशील नहीं हो पा रहे जितनी की जरूरत है। तकनीक ने हमारे जीवन में बड़ी वाली और घातक घुसपैठ की है। हमें यह बात पता भी है। बात यह भी है कि कुछ एकल परिवारों से लेकर संयुक्त परिवारों में ज़्यादा की तमन्ना ही नहीं बल्कि उनकी यह बड़ी उम्मीद है कि बच्चा आसमान से तारे तोड़ ले आए। एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी के नाम पर उससे उसका रूटीन जो सामान्य होना चाहिए था वही लिया भी जा रहा है। क्या हम यह सोचते हैं कि इस 'एक्सट्रा करीकुलर एक्टिविटी' का कितना एक्सट्रापन बच्चे तक पहुंचा, पहुंचा भी या दिमाग में थैलाभर बोझ रख गया?
स्कूल-विद्यालय
मैं जब सरकारी विद्यालयों में घुसती हूँ तब दिमाग में लापरवाही से लेकर स्कूल का पाठ्यक्रम नाचने लगता है। जिनको मेरी बात बुरी लगे उसके लिए मैं माफी भी मांगती हूँ। लेकिन यह मेरा खयाल है। क्लासरूम में चिपके हुए विज्ञान और आदर्श की खूबसूरत पेंटिंग में भी उन बच्चों को जगह दी जाती है जिसका चित्र टीचर को खूबसूरत लगे। ऐसा अक्सर होता है। हो सकता है कहीं न भी हो। क्लास रूम दरवाजे के ऊपर शानदार लाइन होती है जिसे शायद कोई ही पढ़ता है। जैसे समय अमूल्य धन है...आदि आदि। पाठ्यक्रम में घुसी हुईं आदर्श कहानियाँ आदर्श क्यों नहीं दे पातीं, यह सोचने लायक है। क्यों नहीं बच्चों को सच्चाई से रूबरू कराया जाये कि आपका आसपास अब खतरनाक है और जहरीला भी। समाज में बहुत असमानता है, आपको हर अजनबी से अब खतरा हो गया है। काबुलीवाला अब बदल चुका है। भारत में ही रहने लगा है और मौका देखकर वह आपको उठाने की कोशिश करता है...
घर में आई एक पड़ोसन ने माँ से अपनी चिंता इस बात में कही कि उसका बच्चा हिन्दी पढ़ने में तो अच्छा है पर अंग्रेज़ी बहुत खराब है। इसलिए स्कूल से बार बार मैडम की शिकायतें आ रही हैं। काम छोड़कर रोज़ रोज़ जाना मुश्किल है। पर ये लड़का जरा सा समझने को तैयार नहीं। ...वह आगे बोली कि मैडम कहती है कैसे माँ बाप हो जो आप बच्चे पर ध्यान नहीं देते। आप लोग अपने में लगे रहते हो। घर में आप लोग टाइम नहीं देते।...अब टीचर को कैसे बताऊँ कि अगर एक छुट्टी हुई तो 'तनखा' कट जाएगी। शाम को लौटो तो हम दोनों इस हालत में नहीं रह पाते कि उसे बैठकर पढ़ाएँ... उनके जाने के बाद मैं उस भली टीचर के बारे में सोचने लगी कि आखिर उनकी बच्चे को लेकर और अँग्रेजी को लेकर क्या कोशिश है...शायद उनकी परेशानी यह भी होगी कि एक जान पर 50 बच्चे...इन महीन बुनावटी तारों को समझो तो सिर चकरा जाये। मैं अगर 2004-05 में आपको अपने स्कूल की बातों में हाथ पकड़ कर ले जाऊं तो हम क्लास में 45 तक की संख्या में थे। हमारे पास भी अंग्रेज़ी का विषय था। हमारी टीचर कसं से ऐसा पढ़ाती थीं कि मैं आज भी अंग्रेज़ी कि उनकी पढ़ाई हुई कहानियाँ न तो भूली हूँ और न ही इस भाषा का आधार।
मेरी माँ का इस किताबी पढ़ाई से रिश्ता नहीं। इसके अलावा उनका समय काम में जाता था। वो बातें भी अपने सीखे हुए हुनर की करती हैं। मसलन बीज को मिट्टी में कितनी दूरी तक डालना है। बीज से क्या बातें कहनी हैं। पानी कितना डालना है। यही सब...इसलिए मेरी पढ़ाई में उनका होमवर्क करवाने वाला हाथ नहीं है। इसके अलावा पिताजी की 8 से 9 वाली ड्यूटी उन्हें थका दिया करती थी। इसलिए शिक्षा में हाथ मेरी तमाम टीचरों का ही रहा। बिना ट्यूशन के।
मोहल्ला-आसपड़ोस
मैं जब पीछे मुड़कर अपना और अपने हम उम्र लोगों के बचपन के बारे में बात करती हूँ तब बहुत सारी गतिविधियों को देखती हूँ। जैसे तरह के खेल खेलना, हर तरह के त्योहारों पर कुछ गतिविधियां करना, मेले जाना, गर्मी की छुट्टियों में घर में रहते हुए भी रूटीन में खेल खेलना, पड़ोस में रात को इकट्ठा होकर कहानियाँ सुनाने की ज़िद्द करना, अंताक्षरी खेलना, खिलौने बनाना...ऐसे ही आपका बचपन मुझसे ज़्यादा खास होगा। बचपन देखती हूँ तब ट्यूशन से परे एक मुक्कमल दिनचर्या दिखती है। हाँ, उसमें झोल भी काफी रही हैं पर वे इतनी भयानक नहीं थीं कि दिमाग पर असर कर दें। मुझे याद है जब गली में किसी का बच्चा खोया था तब मोहल्ले में शोर तो हुआ ही साथ में सभी लोग चप्पा चप्पा खोजकर बिना पुलिस की मदद से बच्चे को खोज लाये थे। लेकिन अब यह माहौल 180 डिग्री तक उल्टा घूम गया है। अब लोग अपने अपने घरों में मजबूत दरवाजे लगाए जीते हैं या जाने रहते हैं। मुझे नहीं पता।
इसलिए मैं अभी भी उन बच्चों की साँसों का सोच रही हूँ जिनकी तकलीफ का हमें अंदाज़ नहीं। हाय तौबा मचा मचा कर मैं खुद फेसबुक पर पोस्ट लिख रही हूँ। दूसरों पर इल्ज़ाम लगाने का आसान काम कर रही हूँ। मैं खुद कुछ भी नहीं कर रही। ब्लॉग लिख कर उपदेश दे रही हूँ। दिल्ली के हाल पर खांस रही हूँ, गाड़ियों वालों को कोस रही हूँ। ...सच बताऊँ तो मैं कुछ भी नहीं कर रही। मुझे नहीं पता कि मैं ऐसा क्या करूँ कि हवा सांस लेने लायक हो जाएँ। लेकिन, जब मैं यह सब सोच रही थी तब पापा कुछ पौधे बाज़ार से खरीद लाये हैं। देखभाल करेंगे तो कुछ दिन में बड़े हो जाएंगे।
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दोनों फोटो गूगल से साभार


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