मेरी पैदाइश 90 के आसपास की है। उस समय हर जगह कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हो रही थीं। आज जब लप्रेक किताब पर नज़र गई तब यकायक एक कहानी याद आ गई। उस समय हमारा इलाका बसना शुरू हुआ था। लोग छोटी छोटी जगहें खरीद रहे थे और वे लोग भी शामिल थे जिनकी अच्छी हैसियत थी। उनके जमीन के टुकड़े बड़े बड़े हुआ करते थे। इस जगह की खूबसूरती यही है कि यहाँ हर तरह के लोग रहने के लिए आ रहे थे। बाद के बरसों में खिचड़ी के समान मोहल्ला तैयार हो गया। बड़ा मज़ेदार मोहल्ला।
(यह किस्सा बहुत पहले किसी ने बड़े अवसाद मन के साथ मुझे बताया था। उनकी इजाजत से लिखा गया है।)
यहाँ एक कच्चे शहर की बू भी रहती थी और पक्के रिश्ते बनने की महक भी आने लगी थी। आपसी रिश्तों में गहराई और मिठास की वजह यह भी थी कि सभी अपनी जड़ों से निकल कर एक सतुष्टिजनक जीवन के लिए यहाँ आए थे। इन हालातों में यह मुनासिब है कि इन लोगों के पास रोज़मर्रा की जरूरत अधिक थी और सामान कम। इसलिए यह पड़ोसी धर्म को बनाते और निभाते हुए एक दूसरे के घरेलू सामानों का विनिमय करते थे। इस विनिमय में बेसन की कढ़ी से लेकर सफ़ेद कपड़ों को हल्का नीला करने वाला नील भी शामिल था जो उस समय पाउडर की शक्ल में बिकता था।
इसी मोहल्ले में नौजवान होते एक जोड़े को प्रेम का चस्का लग गया। दोनों के परिवारों में बहुत मेलजोल था। किसी एक घर के यदि किसी व्यक्ति को बुखार हो जाये तो दूसरे की माँ आकर पट्टी कर जाती थी। इस गज़ब के मेल का यह नतीजा निकला कि यह जोड़ा स्कूल से घर तक अपना काफी समय साथ बिताने लगे। सबसे मासूमियत इसमें झलकती थी कि मोहब्बत की बातों का जरिया चिट्ठी पत्री थी और वाहक गली के सबसे छोटे बच्चे। यह बच्चे खुशी खुशी फरिश्तों के जैसे दोनों के संदेशों का आदान प्रदान करते थे। बिना किसी को कुछ बताए।
बाज़ार ने ताजमहल को मुनाफे का प्रतीक मानते हुए खूब सौदा किया है। उसके नमूने और ग्रीटिंग कार्ड वो भी गुलाबी रंग वाले काफी बड़ी संख्या में उस समय बिका करते थे। लगभग 25 से 30 रुपये में सुंदर कार्ड मिल जाया करता था। इस जोड़े ने कई बार स्कूल जाने के समय मिलने वाले रुपयों से बचाकर कार्ड खरीदा और एक दूसरे को शायरी लिखकर दिया भी।
कहा जाता है कि इश्क़ और मुश्क छुपाय नहीं छुपता। घर में माओं को सबसे पहले पता चला। दोनों ने अपने ढंग से छुपाने की बहुत कोशिश की लेकिन 'फूल और कांटे' फिल्म के गीत अब लोकप्रिय हो चले थे। दोनों परिवारों को इन गीतों का मतलब अब समझ आ गया था। पिटाई की गई। दोनों परिवारों में खूब झगड़ा हुआ। मोहल्ले की बैठकें बैठीं। इन बैठकों में वही बे-गैरत लोग बैठे जिन्हों ने अपने समय में भी ढेरों गुल कभी खिलाये होंगे। दोनों के साथ बहुत बुरा सलूक किया गया।
लड़के को कहा गया कि तुम्हें यह तो सोचना चाहिए थे कि तुम किसी के घर की इज्जत से खेल रहे हो। तुम्हारी भी दो बहने हैं। उनके साथ ऐसा कोई करे तो कैसा लगेगा। लड़का सर नीचे कर के रह गया। लड़की को कहा गया कि तुमने तो अपने घर की इज्जत को गरम तवे पर रख दिया। बेशरम, बेहया और न जाने क्या क्या!
लगाम लगाई गई। दोनों को भाई बहन बनाया गया। कुछ महीने बाद लड़की के पिता ने शर्म और बेइज्जती से बचने के लिए घर बेच दिया। लड़के वाले भी कहीं चले गए। किसी को नहीं पता कहाँ।
अब यह मोहल्ला पक चुका है। नए लोग आ कर बस गए हैं। पर मैंने सुना हैं ऐसे ही कई क़िस्से रात को अंधेरे में आकर आह भरते हैं। शायद कई लप्रेक अपनी मुक्ति खोज रही हैं।
(यह किस्सा बहुत पहले किसी ने बड़े अवसाद मन के साथ मुझे बताया था। उनकी इजाजत से लिखा गया है।)

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