यह मेरा निजी ख़याल है। जरूरी नहीं कि आप भी सहमत हों।
आज किसी की पोस्ट पढ़ रही थी। उसमें एक बड़े विदेशी चिंतक ने राजनीति से दूर रहने वाले लोग क्या और कैसे होते हैं बताया है, लिखा था। अजीब बात है उसमें वेश्या शब्द भी था। मुझे यह शब्द बिलकुल नहीं पचा। इसकी पहली वजह यह है कि मैं खुद उसी औरत जात की हूँ। इसलिए इस शब्द को पढ़ कर सुनकर कुफ्त होती है। दूसरी वजह यह है कि वेश्या शब्द कोई प्रकृति की देन नहीं है। इस तबके में आने वाली औरतों की ईज़ाद ईश्वर ने नहीं की। इसलिए चिंतकों और लेखकों को इस शब्द का इस्तेमाल ज़रा समझदारी से करना चाहिए। अपने उदाहरण को प्रतिफलित करने के लिए नहीं।
कुछ दिन पहले नागेश कुकुनूर द्वारा बनाई फिल्म 'लक्ष्मी' (LAKSHMI) (2014) देख रही थी। इस फिल्म में दो मुद्दे उठाए गए हैं। पहला बच्चों की तस्करी और दूसरा जबर्दस्ती उन्हें देह व्यापार में धकेला जाना। फिल्म में मुख्य भूमिका 'मोह मोह के धागे' जैसा सुरीला गीत गाने वाली गायिका मोनाली ठाकुर ने औसत से बेहतर काम करते हुए निभाई है। इसमें वह 'बंगारु लक्ष्मी' बनी हैं जिसे उसका पियक्कड़ पिता चौदह बरस की उम्र में 30 हज़ार रुपयों में बेच देता है।
इसके बाद फिल्म में बेहद भयानक स्थिति में उसे दिखाया गया है। शायद स्थिति इससे से भी बुरी होती होगी। उसके साथ एक दिन में सात लोग तक जबरन संबंध बनाते हैं। वह भागने की कोशिश करती है तब उसके साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया जाता है। वह मरने की सी दशा में है तब भी उस के साथ 'ग्राहक' संबंध बनाते हैं।
हो सकता है फिल्म में निर्देशक ने 'पोएटिक लाइसेन्स' के तहत छूट ली हो पर कितनी ली होगी इसका अंदाज़ा आप और मैं लगा सकते हैं। इस लिहाज से यह देखा और सहज बुद्धि से समझा जा सकता है कि वेश्या शब्द एक उदाहरण देने का शब्द तो बिलकुल भी नहीं है, जो निर्लज है। जब गंदगी आप के खुद के खून में बह रही है तो आप कहाँ से इन शब्दों को नकारात्मकता का चोला पहना देते हैं।
मुझे उन औरतों से भी सख्त ऐतराज होता है जो गाली देने में या किसी औरत के चरित्र पर पैना हमला करने के लिए इस शब्द का खूब ख़तरनाक इस्तेमाल करती हैं। आदमी तो खैर इस जुबानी हमलों में तेज़ देखे पाये जाते हैं।
यह और हैरानी वाली बात है कि गूगल जो आज का देवता है उसके यहाँ शब्दकोश में एक अलग विचित्रता देखी जा सकती है। वाजिब है उसने भी समाज की समझ और उसके व्यवहार से वेश्या शब्द के अर्थों को उठाया होगा। उदाहरण के लिए 'वेश्या' शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद खोजने पर 'स्लट'(SLUT) लिखा हुआ मिलेगा। इसके अतिरिक्त बाकी शब्द:-
कॉल गर्ल ( CALL GIRL)- आवाज़ देकर बुलाने वाली,
होर (WHORE)- कामुक संभोग से भ्रष्ट करना,
प्रोस्टीच्यूट (PROSTITUTE)- वेश्या,
हस्टर (HUSTLER)- चालबाज़,
हार्लोट (HARLOT)- कुल्टा,
ट्रल्लोप (TROLLOP)- फूहड़ औरत,
फ़ैन्सी वुमन(FANCY WOMAN)- आकर्षित करने वाली औरत,
कोकोट्ट (COCOTTE)- वेश्या,
हूकर (HOOKER)- वेश्या,
स्ट्रीट गर्ल (STREET GIRL)- गली वाली अर्थात बाहर विचरण करने वाली,
टार्ट (TART)- दुश्चरित्र स्त्री,
लेडी ऑफ प्लेज़र (LADY OF PLEASURE)- मज़ा देने वाली औरत,
फ्लूज़ी (FLOOZY)- चरित्रहीन महिला,
बाव्ड (BAWD)- कुटनी,
आउट ऑन द स्ट्रीट (OUT ON THE STREET)- बाहर गली में रहने या चलने वाली,
स्लेटर्न (SLATTERN)- फूहड़ औरत,
सिप्रियन (CYPRIAN)- वेश्या,
ब्रास (BRASS)- एक अर्थ पीतल और एक अन्य अर्थ 'बेहयाई' (संदर्भ गूगल ऑनलाइन शब्दकोश)
सारे शब्दों की बारीक पड़ताल करने पर सिर्फ औरतों से जुड़ी हुई नकारत्मकता झलकती है। यहाँ एक सवाल यह भी सोचा जा सकता है कि यह अर्थ उपजे कैसे या कैसे उपजाए गए? इनके पीछे क्या दशा और मंशा रहीं?
हिन्दी में वेश्या के ही अर्थ में इस्तेमाल होने वाले शब्द, रांड, रंडी, नीच काम करने वाली, गणिका, आदि हैं। इन अंग्रेज़ी और हिन्दी संज्ञा शब्दों में आर्थिक शब्द जुड़ा हुआ मिलेगा। ध्यान से देखने पर यह मालूम चलता है कि कोई औरत यह काम इसलिए कर रही है क्योंकि बदले में उसे अर्थ यानि रुपयों की प्राप्ति होगी। इसका दूसरा अर्थ यह भी हुआ कि समाज या उसकी व्यवस्था उसे सम्मान जनक रोजगार देने या मुहैया करवाने में असमर्थ सिद्ध हुए। ऐसा आज ही नहीं हो रहा बल्कि सदियों से होता चला आ रहा है।
आर्यों के पुरंदर इतने शौकीन हैं कि उनके दरबार में कई नर्तकियाँ बहुत सुंदर हैं। लेकिन वहीं इंद्राणी नाम की औरत भी है जो इन्द्र की पटरानी है। प्राचीन इतिहास में ये औरतें फिर भी सम्मान पाती थीं और धरती पर उतरकर शादी व बच्चे को जन्म भी देती थीं। ऐसा हिन्दू धर्म की कहानियों में समझा जा सकता है।
बुद्ध के समय में भी अंबपाली जैसी गणिका का ज़िक्र आता है। यहाँ भी स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है। दुख तो है पर सम्मान पर्याप्त है।
मध्यकाल में अनारकाली और सलीम की कहानी दिखाई देती है। इसमें अनारकाली एक कनीज़ है जो दरबार में नाचती है। लेकिन प्रेम की सज़ा उसे ज़िंदा चुनवा कर दी जाती है।
कंपनी के जमाने में अधिकतर ध्यान समाज में औरतों के संबंध में व्याप्त दिक्कतों पर दिया गया जिसके चलते इन औरतों पर उतने बयान दर्ज़ होते नहीं दिखते। (बेशक बहुत सारे उदाहरण होंगे ) लेकिन देवदास की चन्द्रमुखी को रूमानी प्रेम में लपेट कर लेखक वाह वाही तो ले गए पर कहीं भी उसकी स्थिति में परिवर्तन की बात नहीं की। कहानी देव और पार्वती पर ही टिकी रही।...
आपके मेरे जमाने में रेड लाइट एरिया से यहाँ की औरतें यह कहकर पुकारी जाती हैं कि वे सेक्स वर्कर हैं जो जिस्म बेचती हैं। ...झोल तो हमारे ही समाज में है। ...
इसलिए शब्दों के उच्चारण से पूर्व एक बार सोचिए कि उन शब्दों में कौन और क्यों रहता है।
आज किसी की पोस्ट पढ़ रही थी। उसमें एक बड़े विदेशी चिंतक ने राजनीति से दूर रहने वाले लोग क्या और कैसे होते हैं बताया है, लिखा था। अजीब बात है उसमें वेश्या शब्द भी था। मुझे यह शब्द बिलकुल नहीं पचा। इसकी पहली वजह यह है कि मैं खुद उसी औरत जात की हूँ। इसलिए इस शब्द को पढ़ कर सुनकर कुफ्त होती है। दूसरी वजह यह है कि वेश्या शब्द कोई प्रकृति की देन नहीं है। इस तबके में आने वाली औरतों की ईज़ाद ईश्वर ने नहीं की। इसलिए चिंतकों और लेखकों को इस शब्द का इस्तेमाल ज़रा समझदारी से करना चाहिए। अपने उदाहरण को प्रतिफलित करने के लिए नहीं।
कुछ दिन पहले नागेश कुकुनूर द्वारा बनाई फिल्म 'लक्ष्मी' (LAKSHMI) (2014) देख रही थी। इस फिल्म में दो मुद्दे उठाए गए हैं। पहला बच्चों की तस्करी और दूसरा जबर्दस्ती उन्हें देह व्यापार में धकेला जाना। फिल्म में मुख्य भूमिका 'मोह मोह के धागे' जैसा सुरीला गीत गाने वाली गायिका मोनाली ठाकुर ने औसत से बेहतर काम करते हुए निभाई है। इसमें वह 'बंगारु लक्ष्मी' बनी हैं जिसे उसका पियक्कड़ पिता चौदह बरस की उम्र में 30 हज़ार रुपयों में बेच देता है।
इसके बाद फिल्म में बेहद भयानक स्थिति में उसे दिखाया गया है। शायद स्थिति इससे से भी बुरी होती होगी। उसके साथ एक दिन में सात लोग तक जबरन संबंध बनाते हैं। वह भागने की कोशिश करती है तब उसके साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया जाता है। वह मरने की सी दशा में है तब भी उस के साथ 'ग्राहक' संबंध बनाते हैं।
हो सकता है फिल्म में निर्देशक ने 'पोएटिक लाइसेन्स' के तहत छूट ली हो पर कितनी ली होगी इसका अंदाज़ा आप और मैं लगा सकते हैं। इस लिहाज से यह देखा और सहज बुद्धि से समझा जा सकता है कि वेश्या शब्द एक उदाहरण देने का शब्द तो बिलकुल भी नहीं है, जो निर्लज है। जब गंदगी आप के खुद के खून में बह रही है तो आप कहाँ से इन शब्दों को नकारात्मकता का चोला पहना देते हैं।
मुझे उन औरतों से भी सख्त ऐतराज होता है जो गाली देने में या किसी औरत के चरित्र पर पैना हमला करने के लिए इस शब्द का खूब ख़तरनाक इस्तेमाल करती हैं। आदमी तो खैर इस जुबानी हमलों में तेज़ देखे पाये जाते हैं।
यह और हैरानी वाली बात है कि गूगल जो आज का देवता है उसके यहाँ शब्दकोश में एक अलग विचित्रता देखी जा सकती है। वाजिब है उसने भी समाज की समझ और उसके व्यवहार से वेश्या शब्द के अर्थों को उठाया होगा। उदाहरण के लिए 'वेश्या' शब्द का अंग्रेज़ी अनुवाद खोजने पर 'स्लट'(SLUT) लिखा हुआ मिलेगा। इसके अतिरिक्त बाकी शब्द:-
कॉल गर्ल ( CALL GIRL)- आवाज़ देकर बुलाने वाली,
होर (WHORE)- कामुक संभोग से भ्रष्ट करना,
प्रोस्टीच्यूट (PROSTITUTE)- वेश्या,
हस्टर (HUSTLER)- चालबाज़,
हार्लोट (HARLOT)- कुल्टा,
ट्रल्लोप (TROLLOP)- फूहड़ औरत,
फ़ैन्सी वुमन(FANCY WOMAN)- आकर्षित करने वाली औरत,
कोकोट्ट (COCOTTE)- वेश्या,
हूकर (HOOKER)- वेश्या,
स्ट्रीट गर्ल (STREET GIRL)- गली वाली अर्थात बाहर विचरण करने वाली,
टार्ट (TART)- दुश्चरित्र स्त्री,
लेडी ऑफ प्लेज़र (LADY OF PLEASURE)- मज़ा देने वाली औरत,
फ्लूज़ी (FLOOZY)- चरित्रहीन महिला,
बाव्ड (BAWD)- कुटनी,
आउट ऑन द स्ट्रीट (OUT ON THE STREET)- बाहर गली में रहने या चलने वाली,
स्लेटर्न (SLATTERN)- फूहड़ औरत,
सिप्रियन (CYPRIAN)- वेश्या,
ब्रास (BRASS)- एक अर्थ पीतल और एक अन्य अर्थ 'बेहयाई' (संदर्भ गूगल ऑनलाइन शब्दकोश)
सारे शब्दों की बारीक पड़ताल करने पर सिर्फ औरतों से जुड़ी हुई नकारत्मकता झलकती है। यहाँ एक सवाल यह भी सोचा जा सकता है कि यह अर्थ उपजे कैसे या कैसे उपजाए गए? इनके पीछे क्या दशा और मंशा रहीं?
हिन्दी में वेश्या के ही अर्थ में इस्तेमाल होने वाले शब्द, रांड, रंडी, नीच काम करने वाली, गणिका, आदि हैं। इन अंग्रेज़ी और हिन्दी संज्ञा शब्दों में आर्थिक शब्द जुड़ा हुआ मिलेगा। ध्यान से देखने पर यह मालूम चलता है कि कोई औरत यह काम इसलिए कर रही है क्योंकि बदले में उसे अर्थ यानि रुपयों की प्राप्ति होगी। इसका दूसरा अर्थ यह भी हुआ कि समाज या उसकी व्यवस्था उसे सम्मान जनक रोजगार देने या मुहैया करवाने में असमर्थ सिद्ध हुए। ऐसा आज ही नहीं हो रहा बल्कि सदियों से होता चला आ रहा है।
आर्यों के पुरंदर इतने शौकीन हैं कि उनके दरबार में कई नर्तकियाँ बहुत सुंदर हैं। लेकिन वहीं इंद्राणी नाम की औरत भी है जो इन्द्र की पटरानी है। प्राचीन इतिहास में ये औरतें फिर भी सम्मान पाती थीं और धरती पर उतरकर शादी व बच्चे को जन्म भी देती थीं। ऐसा हिन्दू धर्म की कहानियों में समझा जा सकता है।
बुद्ध के समय में भी अंबपाली जैसी गणिका का ज़िक्र आता है। यहाँ भी स्थिति उतनी चिंताजनक नहीं है। दुख तो है पर सम्मान पर्याप्त है।
मध्यकाल में अनारकाली और सलीम की कहानी दिखाई देती है। इसमें अनारकाली एक कनीज़ है जो दरबार में नाचती है। लेकिन प्रेम की सज़ा उसे ज़िंदा चुनवा कर दी जाती है।
कंपनी के जमाने में अधिकतर ध्यान समाज में औरतों के संबंध में व्याप्त दिक्कतों पर दिया गया जिसके चलते इन औरतों पर उतने बयान दर्ज़ होते नहीं दिखते। (बेशक बहुत सारे उदाहरण होंगे ) लेकिन देवदास की चन्द्रमुखी को रूमानी प्रेम में लपेट कर लेखक वाह वाही तो ले गए पर कहीं भी उसकी स्थिति में परिवर्तन की बात नहीं की। कहानी देव और पार्वती पर ही टिकी रही।...
आपके मेरे जमाने में रेड लाइट एरिया से यहाँ की औरतें यह कहकर पुकारी जाती हैं कि वे सेक्स वर्कर हैं जो जिस्म बेचती हैं। ...झोल तो हमारे ही समाज में है। ...
इसलिए शब्दों के उच्चारण से पूर्व एक बार सोचिए कि उन शब्दों में कौन और क्यों रहता है।
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