Thursday, 8 September 2016

परी

सड़क के किनारे सजी हुई रेहड़ियों से सब्जी खरीदते हुए कानों तक एक जोरदार आवाज़ आ पहुंची। एक औरत तेज़ी से परी कहते हुए चिल्लाई। जब मैंने शब्द का पीछा किया तो 4 या 5 बरस की लड़की दिखलाई पड़ी। गोद से नीचे चलने की वह ज़िद्द कर रही थी। थी तो वह पूरी परी ही। जब मैं भिंडी का मोल भाव कर रही थी तब वह मेरी नकल उतार रही थी। मुझे यह बहुत अच्छा लगा। उसकी माँ थोड़ा झिझकते हुए मुझसे बोली- "बहुत शैतानी करती है। एक पल चैन से नहीं बैठती। बाप के प्यार ने बिगाड़ दिया है।"

शायद वह और भी कुछ बताती तभी किसी औरत ने आकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया। फिर वे दोनों मिलकर बंगाली भाषा में कुछ बातें करने लगीं। मैं घर तो आ गई और साथ में परी शब्द भी दिमाग के झोले में रखती लाई।

परी शब्द कहते ही इन्सानों से अलग किसी ऐसी पाक तस्वीर के दर्शन होने लगते हैं जो ख्वाबों में रहा करती हैं शायद। किसी की छोटी बेटी परी है तो कई अपनी माशूका को इसी नाम से पुकारा करते होंगे। कोई माँ भी परी हो सकती है और काँच की चुड़ियाँ पहने दिन भर घरेलू काम करने वाली सहायिका भी। मुझे कभी- कभी फिल्म का एक गाना बेहद पसंद है- "मेरे घर आई एक नन्ही परी।" मेरे खुद के एक रिश्तेदार इस गीत और इस शब्द से इतने प्रभावित हुए कि उन्हों ने अपनी बेटी का नाम परी ही रख दिया था।

परी शब्द का उच्चारण तुरंत ज़मीन से लगभग पूरा ऊंचा उठा देता है। लेकिन हमारी दुनिया में इस शब्द के मायने बिलकुल अलग हैं। इस स्त्रीलिंग शब्द में आजकल क्या रखा जाता है। बार्बी या उस तरह की दिखने वाली गुड़ियाँ, कार्टून चरित्र, साबुन बेचती नायिकायें, इत्र के विज्ञापनों में बेवजह अजीबो गरीब कामुक लड़कियां। कुछ इन्हीं छवियों में यह शब्द प्रचारित और प्रसारित किया जाता दिखता है।

कुछ ऐसे ही खयाल में डूबी थी तभी दरवाजे पर बंधी घंटी ने बहुत शोर मचाना शुरू कर दिया। अमूमन लोगों का घंटी बजाने का तरीका अलग सा रहता है। लेकिन यह घंटी जो भी बजा रहा था उस पर मुझे बेहद गुस्सा आया। मैं आनन और फानन में नीचे धड़ धड़ाती हुई उतरी। सोचा खूब डांट लगाऊँगी। भला यह भी कोई तरीका होता है किसी के घर की घंटी बजाने का।

जैसे ही उस चेहरे से रूबरू वैसे ही ज़ुबान मुंह में ही गुम हो गई। वो औरत गोद में एक बच्ची पकड़ते हुए बोली- "बीबी कुछ पैसे दे दे। लड़की की तबीयत ठीक न है।"...

मैं घर की सीढ़ियाँ चढ़ते  हुए परी शब्द भूल ही गई। भाभी के कमरे में झाँका तो टीवी पर विज्ञापन आ रहा था- "बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ"

फिर थोड़ी देर बाद मैं खुद इस शब्द को भूल गई।

रात को खबर के लिए टीवी चलाया तो कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। नहीं ...एक मिनट! सुनाई तो दे रहा था पर कुछ समझ नहीं आ रहा था।

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