Sunday, 21 June 2026

स्वयं के संदर्भ में -- (पत्र - 10)

प्रिय लूसीलियस 

हाँ, मैं अपने कथन को नहीं बदलता। भीड़ से दूर रहो। थोड़े लोगों की संगति से भी दूर रहो। यहाँ तक कि एक अकेले साथी से भी बचो। ऐसा कोई नहीं है जिसके साथ मैं तुम्हें साझा करना चाहूँ। और देखो, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है, मैं तुम्हें स्वयं तुम्हारे ही भरोसे छोड़ने का साहस करता हूँ। कहा जाता है कि क्रेटीस, जो उस स्टिल्पो का शिष्य था जिसका मैंने अपने पिछले पत्र में उल्लेख किया था, ने एक बार एक युवक को अकेले टहलते हुए देखा और उससे पूछा कि वह अकेले क्या कर रहा है। युवक ने उत्तर दिया, "मैं अपने आप से बात कर रहा हूँ।' क्रेटीस ने कहा, 'सावधान रहो। मैं तुमसे विनती करता हूँ, ध्यान से देखो कि तुम क्या कर रहे हो क्योंकि तुम एक बुरे व्यक्ति से बात कर रहे हो।

    जब लोग अवसादग्रस्त या चिंतित होते हैं तो हम उन पर नज़र रखते हैं ताकि वे अपने एकांत समय का किसी दुर्भाग्यपूर्ण कार्य में उपयोग न कर बैठें। मूर्ख लोगों में से ऐसा एक भी नहीं है जिसे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए।इसी समय वे बुरी योजनाएँ बनाना शुरू करते हैं। इसी समय वे दूसरों या स्वयं अपने लिए भविष्य के संकटों की साज़िश रचते हैं। इसी समय वे अपनी निर्लज्ज इच्छाओं को व्यवस्थित करते हैं। इसी समय मन उन बातों को बाहर लाता है जिन्हें उसने भय या लज्जा के कारण छिपाकर रखा था। इसी समय वह अपने साहस को बढ़ाता है, अपनी वासनाओं को उकसाता है और अपने क्रोध को भड़काता है। एकांत का एकमात्र लाभ यह है कि व्यक्ति किसी के सामने अपने रहस्य नहीं खोलता और उसे किसी मुखबिर का भय नहीं रहता। लेकिन मूर्ख व्यक्ति इस लाभ को भी खो देता है क्योंकि वह स्वयं ही अपना भेद खोल देता है।



    अब देखो कि तुम्हारे बारे में मेरी कैसी आशा है या यूँ कहूँ कि मैं अपने आप से क्या वचन लेता हूँ क्योंकि 'आशा' उस भलाई का नाम है जिसके बारे में निश्चितता नहीं होती। मैं तो यह अधिक पसंद करूँगा कि तुम अकेले रहो, बजाय इसके कि तुम उन लोगों में से किसी के साथ रहो जिनके बारे में मैं सोच सकता हूँ। मुझे याद है कि तुमने एक अवसर पर कितने साहस के साथ एक घोषणा की थी और तुम्हारे शब्दों में कितनी शक्ति थी। उस समय मैंने स्वयं को बधाई दी और कहा, "ये बातें यूँ ही अचानक मन में आकर नहीं कही गई हैं। इनके पीछे कोई ठोस आधार है। यह व्यक्ति साधारण लोगों जैसा नहीं है। यह तो अपने वास्तविक उपचार और सुधार की ओर देख रहा है।" तुम्हें इसी प्रकार बोलना चाहिए और इसी प्रकार जीवन जीना चाहिए। ध्यान रखना कि कोई भी बात तुम्हें निराश या हताश न कर दे। जैसे तुम अपनी पूर्व प्रार्थनाओं को स्वीकार करने के लिए देवताओं का धन्यवाद करते हो, वैसे ही नई और भिन्न प्रार्थनाएँ भी करो। मन की उत्कृष्टता और मानसिक शांति की याचना करो और उसके बाद शारीरिक स्वास्थ्य की। क्या कोई कारण है कि तुम ऐसी प्रार्थनाएँ बार-बार न करो? ईश्वर से माँगने में साहसी बनो क्योंकि तुम उससे ऐसी किसी वस्तु की याचना नहीं कर रहे हो जो वास्तव में तुम्हारी न हो।

    लेकिन मैं अपनी परंपरा का पालन करूँगा और इस पत्र के साथ एक छोटी-सी भेंट भी भेजूँगा। मुझे एथेनोडोरस के लेखों में एक ऐसी बात मिली है जो बिल्कुल सत्य प्रतीत होती है, "तुम यह तभी जान सकते हो कि तुम सभी इच्छाओं से मुक्त हो चुके हो, जब तुम उस अवस्था तक पहुँच जाओ कि ईश्वर से ऐसी किसी वस्तु की याचना न करो जिसे तुम खुले रूप से लोगों के सामने भी न माँग सको।"

    वास्तव में लोग कितने पागल होते हैं! जब उनकी प्रार्थनाएँ अत्यन्त लज्जाजनक होती हैं तो वे उन्हें देवताओं के कानों में फुसफुसाकर कहते हैं। लेकिन यदि कोई मनुष्य सुन रहा हो तो वे तुरंत चुप हो जाते हैं। जिस बात को वे मनुष्यों के सुनने योग्य नहीं समझते, वही बात वे ईश्वर से कहते हैं! विचार करो कि क्या यह एक लाभकारी उपदेश नहीं हो सकता। मनुष्यों के बीच ऐसे जियो मानो ईश्वर तुम्हें देख रहा हो और ईश्वर से ऐसे बात करो मानो मनुष्य तुम्हारी बात सुन रहे हों।

अभी के लिए विदा 

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