Monday, 22 June 2026

शारीरिक स्वास्थ्य एवं धन के संदर्भ में -- पत्र - 14

प्रिय लूसीलियस 

मैं स्वीकार करता हूँ कि अपने शरीर के प्रति लगाव हमारे स्वभाव में जन्मजात होता है। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि उसके संरक्षण और देखभाल का दायित्व हमें सौंपा गया है। मैं यह नहीं कहता कि शरीर के लिए कोई रियायत या सुविधा नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन मेरा यह कहना अवश्य है कि मनुष्य को शरीर का दास नहीं बनना चाहिए। जो व्यक्ति शरीर का दास बन जाता है, जो उसके कारण अत्यधिक भयभीत रहता है और हर बात को उसी की दृष्टि से देखता है, वह अनेक प्रकार की दासताओं में जकड़ जाता है। हमें ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए मानो शरीर ही हमारे जीवन का उद्देश्य हो। बल्कि ऐसा समझना चाहिए कि वह केवल जीवन जीने का एक आवश्यक साधन है। शरीर के प्रति अत्यधिक मोह हमें भय से भर देता है, चिंताओं का बोझ लाद देता है और आलोचना तथा अपमान का पात्र बना देता है। जो व्यक्ति शरीर को अत्यधिक महत्व देता है, उसके लिए सम्मान का मूल्य बहुत सस्ता हो जाता है। शरीर की सावधानीपूर्वक देखभाल करो पर इस शर्त के साथ कि जब विवेक, आत्मसम्मान या निष्ठा इसकी माँग करें, तब उसे अग्नि में झोंक देने के लिए भी तैयार रहो।

                                           


    फिर भी, हमें जहाँ तक संभव हो केवल खतरों ही नहीं बल्कि कष्टों से भी बचना चाहिए और सुरक्षित आश्रय में जाकर निरंतर ऐसे उपाय सोचते रहना चाहिए जिनसे भय के कारणों से दूर रहा जा सके। यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो भय की वस्तुएँ मुख्यतः तीन प्रकार की हैं। हम निर्धनता से डरते हैं। हम रोग से डरते हैं, और हम अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों के हिंसक कर्मों से डरते हैं। इन सबमें जो भय हमें सबसे अधिक विचलित करता है, वह किसी दूसरे की शक्ति से उत्पन्न होने वाला भय है क्योंकि वह बहुत शोर-शराबे और हलचल के साथ आता है। जिन प्राकृतिक विपत्तियों का मैंने उल्लेख किया—निर्धनता और रोग—वे चुपचाप आती हैं। उनमें ऐसा कुछ नहीं होता जो हमारी आँखों या कानों को आतंकित कर दे। परन्तु किसी दूसरे मनुष्य द्वारा पहुँचाई जाने वाली बुराई बड़े प्रदर्शन के साथ आती है। उसके साथ अग्नि और तलवार, बेड़ियाँ और मनुष्य के शरीर को चीर डालने के लिए तैयार हिंसक पशुओं के झुंड होते हैं। जरा कारागार, सूली, यातना-चक्र, लोहे के काँटे, उस नुकीले खूँटे की कल्पना करो जिसे किसी व्यक्ति के शरीर के बीचों-बीच घुसाकर मुँह तक निकाल दिया जाता है। उन अंगों की कल्पना करो जिन्हें विपरीत दिशाओं में दौड़ते रथों द्वारा फाड़ डाला जाता है। उस वस्त्र की कल्पना करो जो ज्वलनशील तारकोल से लिपटा हुआ हो और उन सब यातनाओं की भी जिन्हें मनुष्य की क्रूरता ने आविष्कृत किया है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि हमारा सबसे बड़ा भय इसी प्रकार की बुराई से होता है क्योंकि वह अनेक रूपों में और अत्यन्त भयावह साधनों के साथ हमारे सामने आती है। जिस प्रकार यातना देने वाला व्यक्ति तब सबसे अधिक प्रभावी होता है जब वह अपने यातना-उपकरणों को सामने प्रदर्शित करता है क्योंकि अनेक लोग जो वास्तविक पीड़ा सह सकते थे, केवल उन्हें देखकर ही टूट जाते हैं। उसी प्रकार मन को वश में करने और दबाने वाली वस्तुओं में भी सबसे अधिक प्रभाव उन्हीं का होता है जिनके पास दिखाने के लिए कुछ होता है। अन्य संकट कम गंभीर नहीं हैं, जैसे भूख, प्यास, शरीर को गलाने वाले घाव, या पेट की गहराइयों तक जलाने वाला ज्वर। किन्तु वे दृष्टिगोचर नहीं होते। वे हमारे सिर पर या आँखों के सामने मंडराते नहीं दिखाई देते। जबकि ये बाहरी भय, विशाल युद्धों की तरह अपने शस्त्र-सज्जा और प्रदर्शन के बल पर हमें परास्त कर देते हैं।

    अतः हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम किसी को अनावश्यक रूप से नाराज़ न करें। कभी हमें जनसामान्य से सावधान रहना पड़ता है। कभी, यदि राज्य की व्यवस्था ऐसी हो कि अधिकांश मामलों का नियंत्रण सीनेट के हाथ में हो तो वहाँ के प्रभावशाली लोगों से और कभी उन व्यक्तियों से जिनके हाथों में जनता की शक्ति और जनता पर शासन करने का अधिकार निहित होता है। इन सभी को अपना मित्र बनाना अत्यन्त कठिन कार्य है। इतना ही पर्याप्त है कि वे हमारे शत्रु न बनें। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी सत्ताधारियों के क्रोध को उकसाता नहीं बल्कि उससे वैसे ही बचकर चलता है जैसे समुद्र में नाविक तूफ़ान से बचता है। जब तुम सिसिली की ओर जा रहे थे तब तुम्हें उस संकरे जलडमरूमध्य को पार करना पड़ा था। उतावला नाविक दक्षिणी पवन की चेतावनी की उपेक्षा कर देता है। वही दक्षिणी पवन सिसिली के समुद्र को उग्र लहरों से भर देती है। वह बाएँ तट के सहारे सुरक्षित मार्ग नहीं चुनता बल्कि उस ओर बढ़ता है जहाँ कैरिब्डिस का भयंकर भँवर निकट होता है। किन्तु अधिक सावधान नाविक वहाँ के जानकार लोगों से ज्वार-भाटों की स्थिति पूछता है, बादलों के संकेतों को समझता है और उस क्षेत्र से दूर रहता है जो अशांत जल के लिए कुख्यात है। बुद्धिमान व्यक्ति भी ऐसा ही करता है। वह उस शक्ति से दूर रहता है जो उसे हानि पहुँचा सकती है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखता है कि उसका यह बचाव स्पष्ट रूप से दिखाई न दे। क्योंकि सुरक्षा का एक भाग यह भी है कि उसकी खोज विवेकपूर्ण ढंग से की जाए; खुलकर बचना मानो सामने वाले की निंदा करने के समान होता है।

    अतः हमें यह विचार करना चाहिए कि सामान्य भीड़ से अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। सबसे पहले, हमें उन्हीं वस्तुओं की कामना नहीं करनी चाहिए जिनकी कामना सब लोग करते हैं क्योंकि संघर्ष उन्हीं लोगों के बीच उत्पन्न होता है जो एक ही वस्तु के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं। दूसरे, हमारे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए जिसे चुराना अत्यधिक लाभदायक हो और हमारे साथ बहुत कम ऐसी चीज़ें हों जो लूटे जाने योग्य समझी जाएँ। बहुत कम लोग केवल रक्तपात के लिए किसी की हत्या करते हैं। अधिकांश लोग घृणा से नहीं बल्कि लाभ की गणना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। यदि कोई व्यक्ति लगभग निराधार और निर्धन है, तो लुटेरा उसे अनदेखा करके आगे बढ़ जाता है। निर्धन व्यक्ति को शांति प्राप्त रहती है, यहाँ तक कि उन मार्गों पर भी जहाँ घात लगाकर बैठे डाकुओं का भय हो।

    इसके बाद, हमें उन तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिए जिनसे बचना आवश्यक है, जैसा कि एक प्राचीन कहावत कहती है-- घृणा, ईर्ष्या और तिरस्कार। इनसे कैसे बचा जाए, यह केवल बुद्धिमत्ता ही सिखा सकती है। क्योंकि एक बात को दूसरी के साथ संतुलित करना कठिन होता है। यदि हम लोगों के रोष और द्वेष से बचना चाहते हैं तो हमें यह भी सावधानी रखनी होगी कि हम उनके तिरस्कार का पात्र न बन जाएँ। ऐसा न हो कि दूसरों को रौंदने से बचते-बचते हम यह आभास देने लगें कि हमें ही रौंदा जा सकता है। बहुत-से लोगों ने दूसरों में भय उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करके स्वयं अपने लिए भय के कारण पैदा कर लिए हैं। इसलिए हमें दोनों ही अतियों से बचना चाहिए। दूसरों से श्रेष्ठ समझा जाना उतना ही हानिकारक है जितना कि तुच्छ और तिरस्कृत समझा जाना।

    अतः हमें दर्शन की शरण लेनी चाहिए। ये अध्ययन पुरोहितों के पवित्र वस्त्रों की भाँति मनुष्य को ऐसा संरक्षण प्रदान करते हैं कि वह केवल सज्जनों के बीच ही नहीं बल्कि सामान्य रूप से दुष्ट लोगों के बीच भी आदर का पात्र बन जाता है। न्यायालयों में प्रयुक्त वाक्पटुता, या कोई भी ऐसी कला जो जनसमूह को उद्वेलित करती है, प्रतिस्पर्धियों और प्रतिद्वंद्वियों को जन्म देती है। किन्तु दर्शन का यह शांत साधन, जो केवल अपने कार्य से कार्य रखता है, तिरस्कार का विषय नहीं बन सकता। इसके विपरीत, सभी कलाओं में उसे विशेष सम्मान प्राप्त होता है, यहाँ तक कि सबसे बुरे लोगों के बीच भी। दुष्टता कभी इतनी शक्तिशाली नहीं हो सकती न ही सद्गुणों के विरुद्ध इतना बड़ा षड्यंत्र रच सकती है कि दर्शन का नाम पवित्र और आदरणीय माना जाना बंद हो जाए।

    किन्तु दर्शन का अभ्यास भी शांतिपूर्वक और संयम के साथ किया जाना चाहिए। “क्या?” तुम कहोगे, “क्या तुम्हें लगता है कि मार्कस कैटो ने दर्शन का अभ्यास संयम के साथ किया था? वही कैटो जिसने अपने शब्दों से गृहयुद्ध को रोकने का प्रयास किया, जिसने उग्र सेनानायकों के हथियारों के बीच खड़े होकर उनका सामना किया और जब कुछ लोग पोम्पेई को तथा कुछ सीज़र को चुनौती दे रहे थे, तब उसने एक साथ दोनों का विरोध किया?” इस बिन्दु पर यह विवाद उठाया जा सकता है कि क्या उस परिस्थिति में एक बुद्धिमान व्यक्ति के लिए राजनीति में सक्रिय होना आवश्यक था।

    कैटो, तुम क्या कर रहे हो? यह संघर्ष स्वतंत्रता के लिए नहीं है, वह तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुकी है। अब प्रश्न केवल इतना है कि राज्य पर अधिकार सीज़र का होगा या पोम्पेई का। ऐसे विवाद से तुम्हारा क्या संबंध है? इसमें किसी एक पक्ष का समर्थन करना तुम्हारा कार्य नहीं है। यहाँ तो केवल एक स्वामी चुना जा रहा है। तुम्हारे लिए इससे क्या अंतर पड़ता है कि विजेता कौन होता है? संभव है कि अपेक्षाकृत बेहतर व्यक्ति विजयी हो जाए। किन्तु यह संभव नहीं कि कोई व्यक्ति विजय प्राप्त करे और फिर भी उस विजय से नैतिक रूप से कुछ बुरा न बन जाए।

    मैंने कैटो के अंतिम प्रतिरोध का उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रारम्भिक वर्षों में भी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि कोई बुद्धिमान व्यक्ति राज्य की उस लूट-खसोट में भाग लेता। कैटो ने आखिर प्राप्त क्या किया, सिवाय इसके कि उसने अपनी आवाज़ उठाई, और वह भी व्यर्थ? एक अवसर पर भीड़ ने उसे अपने हाथों पर उठाकर फ़ोरम से बाहर फेंक दिया। वह अपमानजनक गालियों और लोगों की थूक से लथपथ हो गया। और दूसरे अवसर पर उसे सीनेट से निकालकर सीधे कारागार पहुँचा दिया गया। फिर भी वह अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलता रहा। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं जिनमें किसी बुद्धिमान व्यक्ति के लिए सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करना वास्तव में फलदायक हो सकता था, या फिर वह केवल व्यर्थ संघर्ष में अपनी शक्ति नष्ट कर रहा था।

    किन्तु हम इस प्रश्न की जाँच बाद में करेंगे कि क्या बुद्धिमान व्यक्ति को सार्वजनिक सेवा में अपना श्रम लगाना चाहिए। फिलहाल, मैं तुम्हें उन स्टोइक दार्शनिकों की ओर बुलाता हूँ जिन्होंने राजनीति से स्वयं को अलग रखा और एकांत में रहकर जीवन के संचालन तथा मानवजाति के लिए नियमों और सिद्धांतों की स्थापना में अपने को समर्पित किया, बिना किसी शक्तिशाली व्यक्ति को नाराज़ किए। बुद्धिमान व्यक्ति जनता की प्रचलित परंपराओं और रीति-रिवाजों को व्यर्थ में विचलित नहीं करता, और न ही अपने विचित्र जीवन-व्यवहार द्वारा लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।

    क्या इस मार्ग को अपनाने वाला व्यक्ति विशेष रूप से सुरक्षित रहेगा?” मैं तुम्हें इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता, ठीक वैसे ही जैसे मैं यह गारंटी नहीं दे सकता कि संयमित जीवन जीने वाला व्यक्ति सदैव स्वस्थ रहेगा। फिर भी यह सत्य है कि संयम स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। जहाज़ कभी-कभी बंदरगाह में भी डूब जाते हैं। पर सोचो, खुले समुद्र के बीच उनकी स्थिति कितनी अधिक जोखिमपूर्ण होती होगी! यदि शांत जीवन भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है तो अत्यधिक व्यस्त और उथल-पुथल भरा जीवन कितना अधिक खतरनाक होगा! कभी-कभी निर्दोष लोग भी नष्ट हो जाते हैं। इससे कौन इनकार करता है? किन्तु अधिकतर दोषी ही नष्ट होते हैं। यदि कोई योद्धा अपने हथियारों सहित घायल होकर गिर भी पड़े, तब भी उसकी युद्ध-कला निरर्थक नहीं हो जाती। संक्षेप में, बुद्धिमान व्यक्ति हर परिस्थिति में परिणाम की अपेक्षा अपने उद्देश्य और संकल्प को अधिक महत्व देता है। आरम्भ हमारे अधिकार में होता है; परिणामों का निर्णय भाग्य करता है। पर मैं भाग्य को अपने ऊपर कोई अधिकार नहीं देता। “लेकिन भाग्य तो कुछ कष्ट और विपत्तियाँ लेकर आएगा।” हाँ, ला सकता है। किन्तु किसी डाकू के हाथों मारा जाना अपने-आप में दोषसिद्धि या निंदा का प्रमाण नहीं है।

    अब तुम अपने दैनिक अनुदान के लिए हाथ फैला रहे हो। मैं उसे एक स्वर्णिम उपहार से भर देता हूँ। और चूँकि मैंने सोने का उल्लेख किया है इसलिए यह भी जान लो कि धन का उपयोग और उसका आनंद कैसे अधिक सुखद बनाया जा सकता है-

“वह व्यक्ति धन का सबसे अधिक आनंद लेता है जिसे धन की सबसे कम आवश्यकता होती है।”

“मुझे इसके लेखक का नाम बताओ,” तुम कहते हो। केवल यह दिखाने के लिए कि मैं कितना उदार हूँ, मैं किसी और की बात की प्रशंसा करने को तैयार हूँ। यह कथन या तो एपिक्यूरस का है या मेट्रोडोरस का या फिर उसी विचारधारा के किसी अन्य व्यक्ति का। और इससे क्या अंतर पड़ता है कि इसे किसने कहा? उसने यह बात सबके लिए कही है। 

    जो व्यक्ति धन की आवश्यकता अनुभव करता है, वह अपने धन के लिए भयभीत भी रहता है। लेकिन ऐसा चिंताओं से घिरा हुआ धन किसी को वास्तविक आनंद नहीं दे सकता। वह उसे बढ़ाने के लिए व्याकुल रहता है और उसकी वृद्धि के बारे में सोचते-सोचते उसके उपयोग को ही भूल जाता है। वह अपने ऋणों और देयों की वसूली में लगा रहता है, बाज़ार और न्यायालयों के चक्कर काटता है, अपने बही-खातों के पन्ने उलटता-पलटता रहता है। वह अपने धन का स्वामी नहीं रह जाता बल्कि उसका सेवक और प्रबंधक मात्र बनकर रह जाता है।

अभी के लिए विदा 

No comments:

Post a Comment

शारीरिक स्वास्थ्य एवं धन के संदर्भ में -- पत्र - 14

प्रिय लूसीलियस  मैं स्वीकार करता हूँ कि अपने शरीर के प्रति लगाव हमारे स्वभाव में जन्मजात होता है। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि उसके संरक्षण...