प्रिय लूसीलियस
मैं जिधर भी देखता हूँ, अपनी बढ़ती हुई उम्र के संकेत दिखाई देते हैं। शहर के निकट स्थित अपने विला पर पहुँचकर मैंने उसके रख-रखाव पर होने वाले खर्च को लेकर शिकायत करनी शुरू कर दी क्योंकि वह धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा था। मेरे संपत्ति-प्रबंधक ने कहा कि इसमें उसका कोई दोष नहीं है। वह अपनी ओर से सब कुछ कर रहा है पर मकान अब पुराना हो चुका है। वह विला तो मेरे ही निर्देशन में बनवाया गया था! यदि मेरी ही उम्र के पत्थर और दीवारें इतनी जर्जर हो गई हैं तो मेरा क्या होगा?
उस पर झुँझलाकर मैंने अपना क्रोध निकालने के लिए निकटतम बहाना पकड़ लिया। मैंने कहा, “वे चिनार के पेड़ स्पष्ट रूप से उपेक्षित हैं। उन पर पत्ते नहीं हैं। उनकी शाखाएँ बुरी तरह टेढ़ी-मेढ़ी हो गई हैं और धूप से सूख चुकी हैं। उनके तने बदरंग हो गए हैं और उनकी छाल झड़ रही है। यदि उन्हें ठीक से खाद और पानी दिया जाता तो उनकी यह दशा नहीं होती।”
उसने मेरे पूर्वजों की आत्मा की शपथ खाकर कहा कि वह यह सब कर रहा है और हर प्रकार से उनकी देखभाल कर रहा है पर पेड़ अब बूढ़े हो चले हैं। तुमसे सच कहूँ, उन पेड़ों को मैंने ही लगाया था! जब उन पर पहली बार पत्तियाँ फूटी थीं तब मैं स्वयं वहाँ उपस्थित था और उन्हें देख रहा था।
फिर मैं द्वार की ओर मुड़ा और पूछा, “यह कौन है? यह तो बिल्कुल जर्जर हो चुका है! इसे द्वार पर खड़ा करना उचित ही था। यह तो मानो जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। तुम इसे कहाँ से ले आए? क्या किसी का बोझ हल्का करने के लिए यह चलता-फिरता शव यहाँ उठा लाए हो?”
लेकिन उस व्यक्ति ने कहा, “क्या आप मुझे पहचानते नहीं? मैं फेलिसियो हूँ! आप अपनी छोटी-छोटी वस्तुएँ मुझे दिखाने लाया करते थे। मैं संपत्ति-प्रबंधक फिलोस्टितुस का पुत्र हूँ, आपके बचपन का मित्र।”
मैंने कहा, “यह व्यक्ति पागल हो गया है! क्या अब यह फिर से छोटा बच्चा बन गया है और मेरा खेल का साथी भी? लेकिन शायद ऐसा ही है। इसके दाँत तो इतने गिर चुके हैं कि यह सचमुच बच्चे जैसा लगने लगा है!”
मेरे उपनगरीय विला ने मेरे लिए एक बड़ा उपकार किया है। उसने हर मोड़ पर मुझे मेरी वृद्धावस्था का बोध करा दिया है। आइए, हम बुढ़ापे को अपनाएँ और उससे प्रेम करें। यदि कोई उसका उचित उपयोग करना जानता हो तो वह अनेक सुखों से भरा हुआ है। फल सबसे अधिक मीठा तब होता है जब वह खराब होने के बिल्कुल निकट होता है। बाल्यावस्था सबसे अधिक आकर्षक तब लगती है जब वह विदा होने वाली होती है और जो व्यक्ति मदिरा का प्रेमी हो, उसके लिए सबसे अधिक आनंद अंतिम प्याले में होता है। वही जो उसे पूरी तरह मदहोश कर देता है और नशे को उसकी चरम सीमा तक पहुँचा देता है। हर सुख अपने सबसे बड़े आनंद को अपने अंतिम क्षणों के लिए बचाकर रखता है। जीवन का सबसे सुखद समय वह है जब वह ढलान पर उतर रहा होता है किंतु अभी अंतिम गिरावट नहीं आई होती। मेरा विश्वास है कि जो समय बिल्कुल किनारे पर खड़ा होता है, उसके भी अपने विशेष आनंद होते हैं। और यदि ऐसा न भी हो तो कम से कम उसमें यह लाभ अवश्य है कि मनुष्य को अब किसी वस्तु की चाह नहीं रह जाती। कितना मधुर अनुभव है अपनी इच्छाओं को पूरी तरह जी लेना, उन्हें क्षीण कर देना और अंततः अपने पीछे छोड़ देना!
तुम कहते हो, “मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखना दुखद है।” पहली बात तो यह है कि मृत्यु केवल वृद्धों के सामने ही नहीं, युवाओं के सामने भी समान रूप से उपस्थित रहती है क्योंकि हमें मृत्यु का बुलावा आयु की गणना देखकर नहीं आता। दूसरी बात, कोई भी व्यक्ति इतना वृद्ध नहीं होता कि वह एक और दिन जीने की आशा करने का अधिकारी न हो। और एक दिन भी जीवन की सीढ़ी का एक पायदान है।
सम्पूर्ण जीवन अनेक भागों से मिलकर बना है, जैसे बड़े वृत्त अपने भीतर छोटे-छोटे वृत्तों को समेटे रहते हैं। एक वृत्त उन सभी को अपने भीतर समाहित करता है। यह जन्म से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक की पूरी अवधि है। दूसरा वृत्त युवावस्था के वर्षों को घेरे रहता है एक अन्य वृत्त सम्पूर्ण बाल्यावस्था को अपने घेरे में बाँधता है। इसी प्रकार एक वर्ष अपने भीतर उन सभी समय-खंडों को समेटे रहता है जिनके बार-बार जुड़ने से पूरा जीवन बनता है। एक महीना उससे भी छोटे वृत्त से सीमित है, और एक दिन सबसे छोटे वृत्त से। किन्तु एक दिन भी अपने आरम्भ से अंत तक चलता है, सूर्योदय से सूर्यास्त तक। इसी कारण, अपने गूढ़ और कठिन कथनों के लिए प्रसिद्ध दार्शनिक हेराक्लिटस (Heraclitus) ने कहा था, “एक दिन प्रत्येक दिन के बराबर है।”
इस कथन की विभिन्न प्रकार से व्याख्या की जाती है। एक व्यक्ति कहता है कि “समान” का अर्थ है “घंटों की संख्या में समान”। यह बात काफ़ी हद तक सही है क्योंकि यदि एक दिन चौबीस घंटों का होता है तो सभी दिन अनिवार्य रूप से एक-दूसरे के समान हैं। दिन के समय में जो कमी होती है, उसकी भरपाई रात कर देती है। दूसरा व्यक्ति कहता है कि एक दिन अपनी प्रकृति में सभी दिनों के समान है। क्योंकि समय की सबसे लंबी अवधि में भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जो एक दिन में न पाया जाता हो। दोनों में प्रकाश और अंधकार होते हैं। आकाशीय चक्रों की नियमित गति हमें कभी अधिक रातें और कभी अधिक दिन देती है पर उनकी मूल प्रकृति को नहीं बदलती। यद्यपि दिन कभी छोटे होते हैं और कभी लंबे। अतः प्रत्येक दिन को इस प्रकार जीना चाहिए मानो वह सबसे अंतिम दिन हो। मानो वही हमारे जीवन की पूर्णता, उसकी परिणति और उसकी अंतिम उपलब्धि हो।
पैकुवियस (Pacuvius), जिसने अधिकार और संपत्ति के बल पर सीरिया को मानो अपना निजी राज्य बना लिया था, अपने लिए प्रतिदिन अंतिम संस्कार जैसे अनुष्ठान आयोजित किया करता था। मदिरापान और भोज के बाद वह स्वयं को बिस्तर तक उठाकर ले जाने को कहता जबकि उसके सेवक ताली बजाते और वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ यूनानी भाषा में गाते, “जीवन समाप्त हो गया! जीवन समाप्त हो गया!” इस प्रकार वह प्रतिदिन अपना ही अंतिम संस्कार किया करता था। आओ, हम भी ऐसा ही करें। परन्तु उसके समान बुरे कारणों से नहीं बल्कि अच्छे कारणों से। प्रसन्न और संतोषपूर्ण मन से, जब हम विश्राम के लिए जाएँ, तो कह सकें —
यदि ईश्वर हमें एक और कल प्रदान करे तो हमें उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। सबसे सुखी व्यक्ति, और वह जो स्वयं का सबसे निश्चिंत स्वामी है, वही है जो आने वाले कल की प्रतीक्षा बिना किसी चिंता के करता है। जिसने यह कह दिया है, “मैं जीवन जी चुका हूँ”, वह प्रत्येक सुबह लाभ के साथ उठता है क्योंकि उसे एक अतिरिक्त दिन प्राप्त हुआ है। अब समय आ गया है कि मैं इस पत्र को समाप्त करूँ। “क्या?” तुम कहते हो, “क्या यह पत्र मेरे पास बिना किसी उपहार के ही पहुँचेगा?” निश्चिंत रहो, यह तुम्हारे लिए कुछ न कुछ अवश्य ला रहा है। पर मैं ‘कुछ’ क्यों कहूँ? यह तो बहुत कुछ ला रहा है। उस वचन से बढ़कर क्या हो सकता है जिसे मैं अब इस पत्र के माध्यम से तुम्हें सौंप रहा हूँ—
“यह तो एपिक्यूरस ने कहा था,” तुम कहते हो। “तुम्हें किसी दूसरे की संपत्ति से क्या लेना-देना?” जो कुछ सत्य है, वह मेरा अपना है। मैं तुम्हें आगे भी एपिक्यूरस के विचार सुनाता रहूँगा, विशेषकर उन लोगों के लाभ के लिए जो किसी कथन को शब्दशः दोहराते हैं और यह नहीं देखते कि क्या कहा जा रहा है बल्कि केवल यह देखते हैं कि उसे किसने कहा है। इस प्रकार वे जान सकेंगे कि श्रेष्ठ विचार किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होते बल्कि सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होते हैं।
अभी के लिए विदा

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