Wednesday, 24 June 2026

जीवन-दर्शन के संदर्भ में -- पत्र - 19

 प्रिय लूसीलियस 

जब भी तुम्हारा कोई पत्र मुझे प्राप्त होता है, मैं अत्यन्त प्रसन्न हो उठता हूँ क्योंकि वे मुझे बड़ी आशा से भर देते हैं। अब वे केवल तुम्हारी ओर से आश्वासन नहीं दे रहे, अब तो हमारे पास तुम्हारी गंभीर प्रतिज्ञा है। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, नहीं, मैं तुमसे विनती करता हूँ कि ऐसा ही करते रहो। क्योंकि मैं अपने मित्र से उसके ही हित के लिए जो माँग सकता हूँ, उससे बेहतर और क्या माँग हो सकती है? यदि सम्भव हो तो अपने उस व्यवसाय या व्यस्त जीवन से धीरे-धीरे स्वयं को मुक्त कर लो। यदि यह सम्भव न हो तो उससे स्वयं को बलपूर्वक अलग कर लो। हम पहले ही बहुत समय व्यर्थ गँवा चुके हैं। अब वृद्धावस्था हमारे सामने आ पहुँची है इसलिए समय आ गया है कि हम अपनी यात्रा का सामान समेटना शुरू करें। निश्चय ही, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। हमने जीवन समुद्र में यात्रा करते हुए बिताया है। अब हमें बंदरगाह में पहुँचकर मरना चाहिए।



    मैं यह नहीं चाहता कि तुम अपने एकांतवास या सार्वजनिक जीवन से निवृत्ति को प्रसिद्धि प्राप्त करने का साधन बनाओ। न तुम्हें उसका प्रदर्शन करना चाहिए और न ही उसे छिपाने का प्रयास करना चाहिए। मैं तुम्हें कभी इस सीमा तक नहीं ले जाना चाहूँगा कि तुम मानव-जाति की मूर्खता को कोसते हुए किसी गुफा में जाकर छिप बैठो। प्रयत्न करो कि तुम्हारा एकांत ऐसा हो जो लोगों की दृष्टि में आए परन्तु दिखावे का विषय न बने। जो लोग अभी अपने जीवन की दिशा तय करने की प्रारम्भिक अवस्था में हैं, वे यह विचार कर सकते हैं कि क्या वे "गुमनामी में जीवन बिताना" चाहते हैं। लेकिन तुम्हारे लिए यह विकल्प खुला नहीं है। तुम्हारी प्रखर प्रतिभा, तुम्हारे उत्कृष्ट लेखन और तुम्हारे प्रतिष्ठित संबंधों ने तुम्हें पहले ही लोगों के सामने ला खड़ा किया है। अब ख्याति ने तुम्हें अपने अधिकार में ले लिया है। यदि तुम स्वयं को छिपाने का प्रयास भी करो, यदि तुम पूरी तरह संसार से ओझल हो जाओ, तब भी तुम्हारी पूर्व उपलब्धियाँ लोगों का ध्यान तुम्हारी ओर खींचती रहेंगी। तुम पूर्ण अंधकार प्राप्त नहीं कर सकते। तुम जहाँ कहीं भी भागोगे, तुम्हारे पूर्व जीवन का बहुत-सा प्रकाश तुम्हारे साथ-साथ चलता रहेगा।

    तुम बिना किसी के प्रति कटुता रखे, बिना किसी चीज़ की कमी महसूस किए और बिना किसी पीड़ा के अपना विश्राम प्राप्त कर सकते हो। आख़िर ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे छोड़ने का तुम्हें दुख होना चाहिए? क्या तुम्हारे अनुयायी? वे तुम्हारे पीछे नहीं चलते न ही उनमें से कोई वास्तव में तुम्हारा अनुसरण करता है। वे तो उस लाभ का अनुसरण करते हैं जो उन्हें तुमसे मिल सकता है। पहले लोग मित्रता की तलाश में आते थे अब वे लाभ और हिस्से की आशा में आते हैं। जैसे ही कोई निःसंतान वृद्ध अपनी वसीयत बदल देता है, वे उसी क्षण किसी दूसरे के द्वार पर जाना शुरू कर देते हैं। महान वस्तुएँ छोटी कीमत देकर प्राप्त नहीं होतीं। ज़रा हिसाब लगाओ, तुम क्या छोड़ना अधिक उचित समझोगे-- अपनी कुछ संपत्ति या स्वयं अपने आप को?

    काश, तुम्हारा भाग्य ऐसा होता कि तुम उसी स्थिति में वृद्ध होते जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ था! काश, भाग्य ने तुम्हें जीवन के गहरे और उथल-पुथल भरे समुद्र में न धकेला होता! सच्चे और स्वस्थ जीवन का मार्ग तुम्हारी आँखों के सामने था लेकिन तुम्हारी तीव्र उन्नति, तुम्हारा प्रांतीय शासन-पद और उनसे जुड़ी आशाओं ने तुम्हें उससे बहुत दूर पहुँचा दिया है। अब तुम्हारी प्रतीक्षा में और भी ऊँचे पद हैं और एक उपलब्धि दूसरी उपलब्धि का मार्ग खोलेगी। लेकिन इसका अंत कहाँ होगा? तुम उस समय की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हो जब चाहने के लिए कुछ भी शेष न रह जाए? वह समय कभी नहीं आएगा। हम कहते हैं कि कारणों की एक श्रृंखला होती है जो मिलकर भाग्य का जाल बनाती है। निश्चय ही इच्छाओं की भी एक श्रृंखला होती है। एक इच्छा का अंत दूसरी इच्छा की शुरुआत बन जाता है।

    जिस जीवन में तुम डूब गए हो, वह अंतहीन दुःख और दासता का जीवन है और वह स्वयं तुम्हें कभी मुक्त नहीं करेगा। तुम्हारी गर्दन इस जुए से छिल चुकी है। इसे स्वयं उतार फेंको। एक ही झटके में इसका टूट जाना कहीं बेहतर है बजाय इसके कि जीवन भर इसके बोझ तले दबे रहो। यदि तुम अपने साधनों को एक साधारण निजी नागरिक की आवश्यकताओं तक सीमित कर लो तो तुम्हारे पास वस्तुएँ कम होंगी परन्तु तुम्हारी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त होंगी। लेकिन अभी तुम्हारे पास वस्तुओं के बड़े-बड़े ढेर हैं, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं हो। तुम क्या पसंद करोगे— अभाव के बीच संतोष या प्रचुरता के बीच कमी का अनुभव? समृद्धि लालची होती है और दूसरों की लालसा का भी लक्ष्य बनती है। जब तक तुम्हारे लिए कोई भी चीज़ पर्याप्त नहीं है तब तक तुम भी किसी और के लिए पर्याप्त नहीं होगे।

    “मैं इससे बाहर कैसे निकलूँ?” तुम पूछते हो। जैसे भी संभव हो, निकल आओ। सोचो, धन कमाने के लिए तुमने कितने जोखिम उठाए हैं और यश प्राप्त करने के लिए कितने परिश्रम सहे हैं। विश्राम और स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तुम्हें उतना ही साहसी होना चाहिए। अन्यथा तुम्हें प्रांतीय शासन की चिंताओं के बीच ही वृद्ध होना पड़ेगा और उसके बाद नगर के दायित्वों के बीच, एक ऐसे तूफ़ान में, ऐसी लहरों के बीच जो बार-बार उठती रहती हैं और जिनसे तुम संयम तथा शांत जीवन के सहारे भी बच नहीं सकते। तुम विश्राम चाहते हो लेकिन उससे क्या होता है? तुम्हारी सफलता कुछ और ही चाहती है। और तुम अब भी उसे बढ़ने दे रहे हो! तुम जितनी अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम्हें भय में जीना पड़ेगा।

    इस अवसर पर मैं तुम्हारा ध्यान मैकेनस के एक कथन की ओर दिलाना चाहूँगा क्योंकि उसने यातना की अवस्था में भी सत्य ही कहा था--“ऊँची से ऊँची चोटी भी स्वयं बिजली के प्रहार को अपनी ओर आकर्षित करती है।”

(अर्थात जितना ऊँचा व्यक्ति पद, शक्ति या प्रतिष्ठा में उठता है उतना ही वह जोखिम, भय और संकटों का लक्ष्य बन जाता है।)

    यदि तुम पूछो कि उसका यह कथन किस पुस्तक में मिलता है तो वह प्रोमेथियस नामक रचना में लिखा हुआ है। उसका आशय यह था कि बिजली उन्हीं स्थानों पर गिरती है जो सबसे ऊँचे होते हैं। मुझे बताओ, क्या किसी भी प्रकार की सत्ता या शक्ति के बदले इतनी उलझी हुई और विकृत भाषा में बोलना तुम्हें उचित लगेगा? मैकेनस स्वभाव से प्रतिभाशाली व्यक्ति था और वह रोमन वाक्पटुता का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता था किन्तु समृद्धि ने उसे दुर्बल बना दिया बल्कि कहें कि उसकी शक्ति और स्वाभाविक क्षमता को ही नष्ट कर दिया। यदि तुमने अपनी नौका के पाल नहीं समेटे, यदि तुमने किनारे के अधिक निकट चलने का मार्ग नहीं चुना तो तुम्हारी भी यही दशा होने वाली है। मैकेनस भी ऐसा करना चाहता था लेकिन उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी।

    मैं मैकेनस के इसी कथन का उपयोग करके तुम्हारे साथ अपना हिसाब बराबर कर सकता था लेकिन मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम इस पर आपत्ति उठाओगे और मेरी इस अदायगी को स्वीकार नहीं करोगे जब तक कि वह किसी गंभीर और उच्च चरित्र वाले व्यक्ति की ओर से न आई हो। इसलिए जैसा कि प्रायः होता है। मुझे फिर एपिक्यूरस का सहारा लेना पड़ेगा, “अपने भोजन से अधिक अपने भोजन-सहचर पर ध्यान दो क्योंकि मित्र के बिना भोजन करना सिंह या भेड़िए जैसा जीवन जीना है।”

    यह तुम्हारे लिए तब तक संभव नहीं है जब तक तुम सार्वजनिक जीवन से निवृत्त नहीं हो जाते। अन्यथा तुम ऐसे अतिथियों के साथ भोजन करोगे जिन्हें तुम्हारा सचिव तुम्हारे सामाजिक आगंतुकों की भीड़ में से चुनकर भेजेगा। किसी मित्र की तलाश स्वागत-कक्ष में करना और फिर भोजन की मेज़ पर उसकी परीक्षा लेना एक भूल है। यह व्यस्त और सांसारिक जीवन की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है, जहाँ मनुष्य अपनी संपत्ति और स्वार्थों में इतना उलझ जाता है कि वह यह मान बैठता है कि लोग उसके मित्र हैं जबकि वह स्वयं उनका मित्र नहीं होता। तुम सोचते हो कि जो उपकार तुम लोगों पर कर रहे हो, वे उन्हें तुम्हारा पक्षधर बना रहे हैं लेकिन कुछ लोगों के मामले में जितना अधिक वे तुम्हारे ऋणी होते जाते हैं उतनी ही अधिक उनकी घृणा बढ़ती जाती है। छोटा ऋण एक ऋणी पैदा करता है; लेकिन बड़ा ऋण एक शत्रु पैदा कर देता है।

    “क्या? क्या उपकार मित्रता उत्पन्न नहीं करते?” करते हैं, यदि यह चुनने की स्वतंत्रता हो कि उपकार किस पर किया जाए और यदि वे केवल बिखेरी हुई दान-दक्षिणा न होकर सोच-समझकर किए गए निवेश हों। इसलिए चूँकि अब तुम स्वयं अपने निर्णय लेने की अवस्था में प्रवेश कर रहे हो, दार्शनिकों की यह शिक्षा याद रखो।  महत्त्व उपकार का नहीं बल्कि उस व्यक्ति का है जिस पर उपकार किया जा रहा है।


अभी के लिए विदा 


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