प्रिय लूसीलियस
आपके उस आशाजनक युवा मित्र के साथ हुई मेरी बातचीत ने तुरंत ही मुझे यह दिखा दिया कि उसमें कितनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा है और वास्तव में उसने कितनी प्रगति भी कर ली है। उसने हमें अपने व्यक्तित्व की एक झलक दिखाई और उसका शेष व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा क्योंकि जो कुछ उसने कहा, वह पहले से तैयार किया हुआ नहीं था। वह अचानक ऐसी स्थिति में आ गया था जहाँ उसे बिना तैयारी के बोलना पड़ा। जब उसने स्वयं को संभालना शुरू किया तो उसके चेहरे पर गहरी लज्जा की लालिमा छा गई क्योंकि वह उस संकोच और विनम्रता से मुक्त नहीं हो सका था, जो किसी युवा व्यक्ति में एक अत्यंत शुभ और प्रशंसनीय गुण माना जाता है।
मुझे लगता है कि वह उन लोगों में से है जो पूर्णतः परिपक्व हो जाने, सभी दोषों से मुक्त हो जाने, यहाँ तक कि बुद्धिमान बन जाने के बाद भी इस प्रवृत्ति को बनाए रखेंगे। क्योंकि शरीर और मन की कुछ स्वाभाविक कमजोरियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भी बुद्धिमत्ता पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। जो बातें जन्मजात और प्रकृति द्वारा आरोपित हैं उन्हें अभ्यास और अनुशासन से कुछ हद तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है पर पूरी तरह जीता नहीं जा सकता। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं फिर भी सार्वजनिक रूप से उपस्थित होते ही उनके शरीर में पसीना आने लगता है, मानो वे अत्यधिक थके हुए हों या गर्मी से व्याकुल हों। कुछ अन्य लोगों के घुटने भाषण देने से पहले काँपने लगते हैं, उनके दाँत बजने लगते हैं, होंठ सख्त हो जाते हैं और जीभ लड़खड़ाने लगती है। इन प्रवृत्तियों को न तो शिक्षा समाप्त कर सकती है और न ही निरंतर अभ्यास। प्रकृति अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती रहती है और इन कमजोरियों के माध्यम से सबसे दृढ़ व्यक्तियों को भी यह स्मरण कराती है कि उनकी अपनी एक मानवीय प्रकृति है। मेरा विश्वास है कि लज्जा के कारण चेहरा लाल हो जाना भी ऐसी ही एक प्रवृत्ति है। यह सबसे संयमी और परिपक्व व्यक्तियों में भी अचानक प्रकट हो जाती है। निस्संदेह युवाओं में यह अधिक दिखाई देती है क्योंकि उनमें स्वाभाविक ऊष्मा अधिक होती है और उनका रंग-रूप अधिक कोमल होता है किन्तु यह अनुभवी सैनिकों और वृद्ध व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है। कुछ लोग तो उस समय सबसे अधिक खतरनाक हो जाते हैं जब उनका चेहरा लाल हो उठता है मानो उनकी सारी लज्जा उसी लालिमा में समा गई हो।
सुला (Sulla) तब सबसे अधिक उग्र और हिंसक हो जाता था जब उसके गालों पर रक्त की लालिमा छा जाती थी। पोमपाए (Pompey) के चेहरे से अधिक सौम्य कुछ नहीं था फिर भी जब भी वह लोगों के बीच होता, विशेषकर भाषण देते समय, उसका चेहरा लाल हो जाता था। मुझे स्मरण है कि पैपिरियसस फैबीअनस (Papirius Fabianus) जब सीनेट के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाए गए, तब उनका चेहरा भी लाल हो गया था। उनके भीतर यह संकोच और विनम्रता कुछ ऐसी शोभा देती थी कि वह विशेष रूप से आकर्षक प्रतीत होती थी।
यह किसी मानसिक दुर्बलता के कारण नहीं होता बल्कि केवल इसलिए कि व्यक्ति उस परिस्थिति का अभ्यस्त नहीं होता। जिन लोगों को किसी अनुभव की आदत नहीं होती, वे भयभीत न होने पर भी इस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं, यदि उनके शरीर की स्वाभाविक प्रवृत्ति लज्जा से लाल पड़ जाने की हो। जैसे कुछ लोगों का रक्त स्वभावतः मंद गति का होता है, वैसे ही कुछ लोगों का रक्त अत्यन्त सक्रिय और तीव्र होता है, जो शीघ्र ही चेहरे तक पहुँच जाता है और उसे लाल कर देता है। जैसा कि मैंने कहा, ऐसी विशेषताएँ किसी भी मात्रा की बुद्धिमत्ता से समाप्त नहीं की जा सकतीं। यदि बुद्धिमत्ता सभी प्रकार के दोषों को मिटा सकती तो वह स्वयं प्रकृति पर शासन करने लगती। किन्तु ऐसा नहीं है। जन्म की परिस्थितियों और शरीर की प्राकृतिक बनावट से जो गुण अथवा प्रवृत्तियाँ हमें प्राप्त होती हैं, वे तब भी हमारे साथ बनी रहती हैं जब मन दीर्घकालीन साधना और आत्म-अनुशासन के द्वारा बहुत हद तक स्थिर और संतुलित हो चुका होता है। इनमें से किसी भी प्रवृत्ति को न तो आदेश देकर दबाया जा सकता है और न ही इच्छा करने मात्र से बुलाया जा सकता है। वे हमारी प्रकृति का हिस्सा हैं और अपने समय पर स्वयं प्रकट होती हैं।
अभिनेता भावनाओं की नकल कर लेते हैं। वे भय और कम्पन का अभिनय कर सकते हैं। वे शोक का प्रदर्शन भी कर सकते हैं। लेकिन जब उन्हें संकोच या लज्जाशीलता दिखानी होती है तो वे केवल सिर को झुका लेते हैं, अपनी आवाज़ धीमी कर लेते हैं और अपनी दृष्टि भूमि पर टिकाए रखते हैं। पर वे स्वयं को वास्तव में लाल नहीं कर सकते क्योंकि चेहरे पर आने वाली लज्जा की लालिमा न तो इच्छा से उत्पन्न की जा सकती है और न ही इच्छा से रोकी जा सकती है। ऐसी बातों के विषय में बुद्धिमत्ता कोई वादा नहीं कर सकती और न ही उनमें कोई प्रगति कर सकती है। ये अपने ही अधिकार-क्षेत्र में आती हैं। वे बिना बुलाए आती हैं और बिना बुलाए ही चली जाती हैं।
अब यह पत्र अपने समापन की माँग कर रहा है। लो, इसका समापन प्रस्तुत है और ऐसा समापन जो उपयोगी भी है और आत्मा के लिए कल्याणकारी भी। मैं सुझाव देता हूँ कि तुम इसे अपने मन में दृढ़ता से बसा लो। हमें किसी श्रेष्ठ और सद्गुणी व्यक्ति के प्रति गहरा सम्मान और अनुराग विकसित करना चाहिए तथा उसे सदैव अपनी आँखों के सामने उपस्थित मानना चाहिए ताकि हम इस प्रकार जीवन जिएँ मानो वह हमें देख रहा हो और प्रत्येक कार्य इस प्रकार करें मानो उसकी दृष्टि हम पर बनी हुई हो।
प्रिय ल्यूसीलियस, यह शिक्षा एपिक्यूरस ने दी थी। उन्होंने हमें एक संरक्षक और एक शिक्षक प्रदान किया और यह बिल्कुल उचित भी था। क्योंकि जब लोग कोई गलत कार्य करने वाले होते हैं और उन्हें लगता है कि कोई साक्षी उपस्थित है तो वे प्रायः उस कार्य से रुक जाते हैं। मन के पास भी ऐसा कोई व्यक्ति होना चाहिए जिसके प्रति वह सम्मान अनुभव करे और जिसकी नैतिक प्रतिष्ठा तथा अधिकार के कारण वह अपने एकांत को भी अधिक पवित्र और मर्यादित बना सके।
धन्य है वह व्यक्ति जो हमें केवल अपनी उपस्थिति में ही नहीं बल्कि मात्र उसकी कल्पना करने से भी बेहतर बना देता है! और धन्य है वह व्यक्ति जो किसी के प्रति इतना गहरा सम्मान रखता है कि केवल उसका स्मरण भर उसके जीवन में व्यवस्था, संयम और शांति ले आता है। जो व्यक्ति इस प्रकार श्रद्धा करना जानता है, वह शीघ्र ही स्वयं भी श्रद्धा के योग्य बन जाता है। इसलिए कैटो (Cato) को चुनो या, यदि तुम्हें लगता है कि कैटो कुछ अधिक कठोर हैं तो गैअस लैलिअस (Gaius Laelius) को चुनो जिनका स्वभाव अधिक सौम्य था। किसी ऐसे व्यक्ति को चुनो जिसकी कर्मशीलता, वाणी और यहाँ तक कि जिसका मुखमंडल भी तुम्हें प्रिय हो क्योंकि चेहरा अक्सर भीतर के मन का परिचय देता है। उस व्यक्ति को सदैव अपनी दृष्टि के सामने रखो। अपने संरक्षक या अपने आदर्श के रूप में। मैं फिर कहता हूँ, हमें ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो हमारे आचरण का मानदंड निर्धारित कर सके।तुम कभी भी टेढ़ी वस्तु को सीधा नहीं कर सकते, जब तक तुम्हारे पास उसे नापने के लिए कोई सीधा पैमाना न हो।
अभी के लिए विदा

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