प्रिय लूसीलियस
दिसम्बर का महीना है और नगर पहले से भी अधिक पसीना बहा रहा है। लोगों को खुलेआम भोग-विलास की छूट मिल गई है और हर ओर तैयारियों का बड़ा कोलाहल है, मानो सैटर्नेलिया के दिन और सामान्य कार्यदिवस में वास्तव में कोई अंतर हो। परन्तु सच में उनमें तनिक भी अंतर नहीं है। इसलिए मैं उस व्यक्ति से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने कहा था कि जो कभी केवल दिसम्बर का महीना हुआ करता था, वह अब पूरा वर्ष बन गया है।
यदि तुम यहाँ होते तो मैं तुमसे यह पूछना चाहता कि ऐसी स्थिति में हमारा आचरण कैसा होना चाहिए। क्या हमें अपनी दैनिक दिनचर्या में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए? या फिर, सामान्य प्रथा के विपरीत दिखाई न देने के लिए हमें भी अपने भोजों को सामान्य से अधिक उत्सवपूर्ण बना लेना चाहिए और टोगा को एक ओर रख देना चाहिए? क्योंकि जो काम पहले केवल किसी उथल-पुथल या राज्य के किसी संकट के समय ही किया जाता था, वही अब हम केवल त्योहार के आनंद के लिए करते हैं। हम अपने पहनावे का ढंग बदल लेते हैं।
यदि मैं तुम्हें ठीक से जानता हूँ तो तुम मध्यस्थ का मार्ग अपनाते। तुम न तो यह चाहते कि हम उत्सव में टोपी पहनकर भीड़ जैसे ही बन जाएँ, और न ही यह कि हम उनसे पूरी तरह अलग दिखाई दें। फिर भी, सम्भव है कि इन्हीं दिनों में मनुष्य को अपने मन पर पहले से अधिक नियंत्रण रखना चाहिए और उसे यह आदेश देना चाहिए कि वह सुख-भोगों से दूर रहे, ठीक उसी समय जब बाकी सब लोग उनमें डूबे हुए हों। क्योंकि यदि मन आगे बढ़कर उन विलासिताओं की ओर आकर्षित नहीं होता जो अंततः पतन और उच्छृंखलता की ओर ले जाती हैं, तो वह अपनी शक्ति का अत्यन्त विश्वसनीय प्रमाण देता है। निस्सन्देह, अधिक साहसिक मार्ग तो यही है कि जब सब लोग मदिरापान करके मतवाले हो रहे हों और उल्टियाँ कर रहे हों, तब भी व्यक्ति पूर्णतः संयमित और सचेत बना रहे। किन्तु दूसरा मार्ग अधिक संतुलित है। न स्वयं को सबसे अलग करके खड़ा करना न अपने ऊपर अनावश्यक ध्यान आकर्षित करना और फिर भी हर बात में भीड़ के साथ न बह जाना अर्थात् जो अन्य लोग करते हैं, वही करना, पर उसी ढंग से नहीं करना। क्योंकि उत्सव मनाया जा सकता है बिना उच्छृंखलता और आत्म-विस्मृति में डूबे हुए।
लेकिन मैं यह परखना चाहता हूँ कि तुम्हारा मन वास्तव में कितना दृढ़ है। इसलिए मैं तुम्हें वही अभ्यास बताऊँगा जिसकी शिक्षा महान व्यक्तियों ने दी है। अपने लिए कुछ दिनों की ऐसी अवधि निर्धारित करो जिसमें तुम बहुत थोड़े भोजन से, वह भी सबसे सस्ते प्रकार के भोजन से, संतुष्ट रहो और खुरदरे तथा असुविधाजनक वस्त्र पहनो। फिर अपने आप से पूछो,“क्या यही वह चीज़ थी जिससे मैं डरता था?” जब मन चिंताओं से मुक्त हो, वही समय है जब उसे विपत्तियों के लिए तैयार करना चाहिए। भाग्य की कृपा के बीच रहते हुए ही मनुष्य को भाग्य के आघातों का सामना करने के लिए स्वयं को सुदृढ़ बनाना चाहिए। सैनिक शांति के समय भी दौड़ का अभ्यास करता है। वह तब भी किलेबंदी खड़ी करता है जब सामने कोई शत्रु नहीं होता। वह स्वयं को अतिरिक्त परिश्रम से थकाता है ताकि जब वास्तव में परिश्रम की आवश्यकता पड़े, तब वह उसके योग्य शक्ति रखता हो। यदि तुम चाहते हो कि कोई व्यक्ति संकट के समय भयभीत न हो तो उसे पहले से ही उसका अभ्यास कराओ।
यही उन लोगों की साधना थी जो प्रत्येक महीने कुछ समय के लिए स्वयं पर ऐसी गरीबी का अनुशासन लागू करते थे जो लगभग दीनता की सीमा तक पहुँच जाती थी। इसका उद्देश्य यह था कि यदि वे अभाव का अभ्यास कर चुके होंगे तो उससे कभी भयभीत नहीं होंगे। यह मत समझना कि मैं तुम्हें टिमोन के भोजों, भिखारियों की कोठरियों या उन अन्य दिखावटी उपायों की सलाह दे रहा हूँ जिन्हें ऐश्वर्य से ऊब चुकी विलासिता केवल खेल के रूप में अपनाती है। तुम्हारा बिछौना सचमुच साधारण हो, तुम्हारा कंबल वास्तव में टाट का हो और तुम्हारी रोटी सचमुच कठोर और मोटी हो। इसे तीन-चार दिनों तक सहो और कभी-कभी उससे भी अधिक समय तक ताकि यह कोई खेल न रह जाए बल्कि एक वास्तविक परीक्षा बन जाए। मुझ पर विश्वास करो लूसीलियस, कुछ ही सिक्कों में पेट भरकर भोजन करना तुम्हें रोमांचक लगेगा। तब तुम समझोगे कि निश्चिंत रहने के लिए भाग्य की सहायता आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रतिकूल भाग्य भी तुम्हारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन प्रदान कर देता है। फिर भी इस कारण यह मत समझना कि तुम कोई महान कार्य कर रहे हो। तुम केवल वही करोगे जो हज़ारों दास और गरीब लोग प्रतिदिन करते हैं। अपने बारे में अच्छा केवल इस बात पर सोचो कि तुम यह सब किसी मजबूरी में नहीं बल्कि अपनी इच्छा से कर रहे हो। यह कि तुम्हें इसे सदा सहना उतना ही सरल लगेगा जितना कभी-कभार इसका अभ्यास करना। आओ, कुछ अभ्यास-युद्ध लड़ें, आओ, गरीबी को अपना साथी बना लें ताकि भाग्य हमें कभी अचानक असहाय न पकड़ सके। यदि हम जान लें कि गरीब होना वास्तव में कितनी तुच्छ बात है तो समृद्धि के समय भी हम कम चिंतित रहेंगे।
यहाँ तक कि सुख के महान ज्ञाता एपिक्यूरस भी कुछ ऐसे दिन निर्धारित करते थे जिनमें वे अपनी भूख को केवल मुश्किल से शांत करते थे। वे यह देखने के लिए ऐसा करते थे कि क्या इससे उनके पूर्ण और सर्वोच्च सुख में कोई कमी आती है। यदि आती भी है तो कितनी और क्या वह अंतर इतना बड़ा है कि उसके लिए कोई व्यक्ति भारी परिश्रम करने को उचित समझे। निस्संदेह, यही बात वह उस पत्र में कह रहा है जो उसने पॉलीएनस को, कैरिनस के मजिस्ट्रेट रहने के समय लिखा था। वहाँ वह गर्व से कहता है कि उसका भोजन एक काँस्य-मुद्रा से भी कम खर्च में हो जाता है जबकि मेट्रोडोरस जो अभी उतनी प्रगति नहीं कर पाया है। उसे एक पूरी मुद्रा की आवश्यकता पड़ती है। क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे भोजन से कोई तृप्त हो सकता है? वास्तव में उसमें भी आनंद है। वह कोई तुच्छ या क्षणिक आनंद नहीं है। ऐसा आनंद नहीं जिसे बार-बार भरना पड़े बल्कि स्थिर और निश्चित आनंद। क्योंकि यद्यपि पानी, जौ का पतला दलिया या सूखी रोटी का टुकड़ा अपने आप में कोई विशेष स्वादिष्ट वस्तु नहीं हैं, फिर भी यह एक बहुत बड़ा सुख है कि मनुष्य इन साधारण वस्तुओं से भी आनंद प्राप्त कर सके और स्वयं को ऐसी अवस्था में पहुँचा दे जिसे कोई भी प्रतिकूल भाग्य नष्ट न कर सके। कारागार में मिलने वाला भोजन इससे अधिक उदार होता है। मृत्यु-दण्ड पाए हुए अपराधियों के प्रति भी जल्लाद इतना कंजूस नहीं होता। इसलिए कितना महान है वह मन जो अपनी इच्छा से ऐसी कठोरता को स्वीकार करता है जो सबसे बुरे अपराधियों को दी जाने वाली सज़ा से भी अधिक कठोर है! भाग्य के बाणों को निष्प्रभावी करने का यही उपाय है।
इसलिए प्रिय लूसीलियस, अब आरम्भ करो। उन लोगों की परम्परा का अनुसरण करो और कुछ ऐसे दिन निर्धारित करो जिनमें तुम अपनी संपत्ति और सुविधाओं से अलग रहो तथा अभाव को अपना साथी बना लो। गरीबी के साथ जीना सीखना शुरू करो।
कोई भी व्यक्ति ईश्वर के योग्य नहीं हो सकता जब तक वह धन-संपत्ति से ऊपर न उठ जाए। मैं तुम्हें धन रखने से नहीं रोकता। मैं केवल यह चाहता हूँ कि धन के स्वामी होते हुए भी तुम उससे निर्भय रहो। इसे प्राप्त करने का एकमात्र उपाय यह है कि तुम स्वयं को यह विश्वास दिलाओ कि उसके बिना भी तुम सुखी रह सकते हो। धन को ऐसी वस्तु समझो जो किसी भी क्षण तुमसे छिन सकती है।
अब इस पत्र को समेटना आरम्भ करें। “पहले अपना ऋण चुकाओ!” तुम कहते हो। मैं तुम्हें एपिक्यूरस के पास भेजता हूँ। यह भुगतान उसी के द्वारा किया जाएगा। अत्यधिक और सीमा से परे बढ़ा हुआ क्रोध पागलपन को जन्म देता है।
हो नहीं सकता पर फिर भी तुम इसकी सत्यता को न जानो। क्योंकि तुम्हारे पास दास भी रहे हैं और शत्रु भी। यह भाव हर प्रकार के लोगों के विरुद्ध भड़क उठता है। यह उतना ही प्रेम से उत्पन्न होता है जितना घृणा से और उतना ही हमारे व्यापारिक व्यवहारों में प्रकट होता है जितना कि हँसी-मज़ाक और खेल-कूद के अवसरों पर। उत्तेजना का कारण बड़ा है या छोटा इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। जो बात वास्तव में महत्त्व रखती है वह है उस मन की अवस्था जो उत्तेजित हुआ है। क्रोध अग्नि के समान है। इसमें यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि ज्वाला कितनी बड़ी है बल्कि यह कि उसके मार्ग में क्या पड़ा है। यदि पदार्थ ठोस और दृढ़ हो तो बहुत बड़ी आग भी उसे नहीं जला पाती। लेकिन सूखी और शीघ्र सुलगने वाली वस्तु एक छोटी-सी चिनगारी से भी आग पकड़ लेती है और उसे भयंकर दावानल में बदल देती है। प्रिय लूसीलियस, क्रोध के साथ भी यही होता है। तीव्र क्रोध का परिणाम पागलपन होता है। इसलिए हमें क्रोध से केवल इसलिए नहीं बचना चाहिए कि हम संयम बनाए रखें बल्कि इसलिए कि हम अपनी मानसिक स्वस्थता और विवेक को सुरक्षित रख सकें।
अभी के लिए विदा

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