प्रिय लूसीलियस
हमारे पूर्वजों में यह प्रथा थी और मेरे जीवनकाल तक भी प्रचलित रही कि पत्र के आरम्भ में लिखा जाता था, “यदि तुम कुशलपूर्वक हो तो अच्छा है। मैं भी कुशलपूर्वक हूँ।” लेकिन हमारे लिए यह कहना अधिक उचित है, “यदि तुम दर्शन का अभ्यास कर रहे हो तो अच्छा है।” क्योंकि वास्तव में मनुष्य केवल उसी स्थिति में कुशल हो सकता है। इसके बिना मन रोगग्रस्त रहता है और शरीर भी, चाहे उसमें कितनी ही शक्ति क्यों न हो, उतना ही स्वस्थ कहा जा सकता है जितना किसी पागल या विक्षिप्त व्यक्ति का शरीर स्वस्थ होता है। अतः सबसे पहले और सबसे बढ़कर मन के स्वास्थ्य का ध्यान रखो और शरीर के स्वास्थ्य का उसके बाद। यदि तुमने सचमुच स्वस्थ और श्रेष्ठ बनने का निश्चय कर लिया है तो यह तुम्हें अधिक मूल्य नहीं चुकवाएगा।
प्रिय लूसीलियस, मांसपेशियों का व्यायाम करने, कंधों को चौड़ा करने और धड़ को सुदृढ़ बनाने में लगे रहना मूर्खता है और एक शिक्षित व्यक्ति के लिए शोभा नहीं देता। तुम अपने विशेष आहार और शरीर-निर्माण में चाहे कितनी ही सफलता प्राप्त कर लो फिर भी तुम कभी किसी श्रेष्ठ बैल की शक्ति और भार की बराबरी नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, तुम्हारा मन एक अधिक बोझिल शरीर के भार से दब जाता है और परिणामस्वरूप उसकी फुर्ती कम हो जाती है। इसलिए अपने शरीर को जितना संभव हो संयमित रखो और अपने मन को अधिक स्वतंत्रता दो।
जो लोग ऐसे नियमों और अभ्यासों के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं उन्हें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। पहला, ये व्यायाम आत्मा को परिश्रम से थका देते हैं और उसमें एकाग्रता तथा गहन अध्ययन के लिए कम शक्ति छोड़ते हैं। दूसरा, अत्यधिक और विस्तृत आहार उसकी सूक्ष्म प्रकृति में बाधा उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य को सबसे निकृष्ट प्रकार के दासों को अपना स्वामी बनाना पड़ता है। ऐसे लोगों को जो अपना समय तेल-मालिश और मदिरा के बीच बाँटते हैं और जिनके लिए दिन तभी सफल माना जाता है जब वे भरपूर पसीना बहाएँ और फिर शरीर से निकले द्रव की पूर्ति ऐसे पेय से करें जिसका प्रभाव थके और क्षीण शरीर पर और भी अधिक पड़ता है। पसीना बहाना और मदिरापान करना, यह तो अम्लता और जलन से भरा जीवन है!
व्यायाम के ऐसे तरीके भी हैं जो सरल और शीघ्र हैं जो शरीर को पर्याप्त अभ्यास दे देते हैं और बहुत अधिक समय भी नहीं लेते क्योंकि समय ही वह वस्तु है जिसका हमें सबसे अधिक हिसाब रखना चाहिए। दौड़ना, विभिन्न भारों के साथ भुजाओं का अभ्यास करना और कूदना, चाहे ऊँची कूद हो या लंबी कूद या नृत्य में की जाने वाली छलाँगें अथवा (यदि वर्ग-भेद की चिंता न की जाए) धोबी की तरह पैरों से ठोकर मारने वाला अभ्यास। इनमें से जो तुम्हें पसंद हो, उसे चुन लो और अभ्यास द्वारा उसे सहज बना लो। लेकिन तुम जो भी करो, शरीर से शीघ्र ही मन की ओर लौट आओ और उसे दिन-रात अभ्यास में लगाओ। मन को पोषित करने के लिए मध्यम प्रयास ही पर्याप्त है और उसका ऐसा अभ्यास है जिसे न तो सर्दी बाधित कर सकती है, न गर्मी और न ही बुढ़ापा। उस अच्छाई की देखभाल करो जो समय के साथ और अधिक उत्तम होती जाती है।
मैं यह नहीं कह रहा कि तुम हमेशा किसी पुस्तक या लेखन-पट्टिका पर झुके रहो। मन को भी कुछ विश्राम मिलना चाहिए किंतु ऐसा विश्राम जो उसे तरोताज़ा करे, न कि शिथिल बना दे। पालकी में बाहर निकलना शरीर को चुस्त रखता है और अध्ययन में भी बाधा नहीं डालता। तुम पढ़ सकते हो, बोलकर लिखवा सकते हो, बातचीत कर सकते हो या किसी की बात सुन सकते हो। वास्तव में, टहलना भी इन कार्यों में से किसी को करने से नहीं रोकता।
तुम्हें अपनी वाणी के अभ्यास की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। लेकिन मैं तुम्हें ऊँचे और नीच सुरों, स्वरों के उतार-चढ़ाव तथा लयों का अभ्यास करने से मना करता हूँ क्योंकि फिर तुम्हें चलने का प्रशिक्षण लेने की भी इच्छा हो सकती है! एक बार यदि तुम उन लोगों को प्रवेश दे दोगे जो नए-नए उपाय गढ़कर अपनी जीविका चलाते हैं तो तुम पाओगे कि कोई तुम्हारे कदमों की लंबाई नाप रहा है, कोई तुम्हारे चबाने के ढंग पर नज़र रख रहा है और वे उतनी ही निर्भीकता से आगे बढ़ते जाएँगे जितना तुम्हारा धैर्य और विश्वास उन्हें बढ़ावा देता रहेगा। तो क्या तुम अपनी वाणी का अभ्यास तुरंत पूरे ज़ोर से चिल्लाकर आरम्भ करोगे? स्वाभाविक तरीका यह है कि आवाज़ को धीरे-धीरे ऊँचा किया जाए। वास्तव में, न्यायालयों में बोलने वाले वक्ता भी बातचीत के स्वर से आरम्भ करते हैं और फिर क्रमशः अपनी पूरी आवाज़ तक पहुँचते हैं। कोई भी शुरुआत ही में यह नहीं पुकारता—“हे क्विराइटेस, निष्ठा!”
इसलिए तुम्हारा विश्वास तुम्हें चाहे जितनी प्रबलता से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, दोषों पर तुम्हारा आक्रमण कभी अधिक तीव्र हो और कभी अधिक मृदु, जैसा तुम्हारी आवाज़ और श्वास-शक्ति उचित समझे। और जब तुम अपनी आवाज़ को फिर नीचे लाओ तो उसे एकदम गिरा मत दो बल्कि मध्यम स्वरों से होते हुए धीरे-धीरे नीचे उतारो, उसे किसी अनगढ़ देहाती की तरह तीखी चीख के साथ अचानक समाप्त मत कर दो। उद्देश्य यह नहीं है कि आवाज़ को व्यायाम कराया जाए बल्कि यह है कि आवाज़ सुनने वाले पर प्रभाव डाले और उसे सक्रिय करे।
मैंने तुम्हें काफ़ी परिश्रम से मुक्त कर दिया है। अब इस उपकार के साथ एक छोटा-सा भुगतान भी जोड़ देता हूँ, यूनान से आया हुआ एक उपहार! लो, यह एक उत्तम उपदेश है, “मूर्ख का जीवन कृतघ्न और भय से भरा होता है। उसकी दृष्टि पूरी तरह भविष्य पर टिकी रहती है।”
“यह किसने कहा?” तुम पूछते हो। उसी व्यक्ति ने जिसने पिछली बात कही थी। तुम्हारे विचार में यहाँ किस जीवन को मूर्ख कहा गया है? क्या बाबा और इसियोन के जीवन को? नहीं, बात उनकी नहीं है। यहाँ तो हमारे ही जीवन की चर्चा हो रही है। अंधी लोभ-लालसा हमें उन वस्तुओं की ओर धकेलती है जो हमें हानि पहुँचा सकती हैं और जो निश्चित रूप से हमें कभी संतुष्ट नहीं कर सकतीं। यदि कोई वस्तु हमें सचमुच संतुष्ट कर सकती तो अब तक कर चुकी होती। हम इस बात पर विचार ही नहीं करते कि कुछ भी न माँगना कितना सुखद है और यह कितनी महान बात है कि अपनी पूर्णता और संतोष के लिए भाग्य पर निर्भर न रहना पड़े।
इसलिए, लूसीलियस, बार-बार स्वयं को याद दिलाओ कि तुमने कितना कुछ प्राप्त कर लिया है। जब तुम देखो कि कितने लोग तुमसे आगे हैं तो यह भी सोचो कि कितने लोग तुम्हारे पीछे हैं। यदि तुम देवताओं और अपने जीवन के प्रति कृतज्ञ होना चाहते हो तो यह विचार करो कि तुमने कितने लोगों को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन दूसरों की बात से क्या लेना-देना? तुमने स्वयं को ही पीछे छोड़ दिया है।
अपने लिए ऐसा लक्ष्य निर्धारित करो जिसे तुम चाहो तब भी पार न कर सको। अन्ततः उन भ्रामक वस्तुओं को त्याग दो जो प्राप्त होने की अपेक्षा में अधिक मूल्यवान प्रतीत होती हैं जबकि वास्तव में उन्हें पा लेने पर उनका मूल्य उतना नहीं होता। यदि उनमें कोई वास्तविक और स्थायी तत्त्व होता तो कभी न कभी वे हमें तृप्त कर देतीं। परन्तु होता यह है कि वे हमें पीते समय भी और अधिक प्यासा बना देती हैं। इस बोझ को उतार फेंको। यह केवल दिखावे के लिए है। जहाँ तक भविष्य का प्रश्न है, वह अनिश्चित है और भाग्य की इच्छा पर निर्भर है। मैं भाग्य से वस्तुएँ माँगूँ ही क्यों बजाय इसके कि उन्हें स्वयं से प्राप्त करने की अपेक्षा करूँ? और फिर मुझे किसी वस्तु की माँग करनी ही क्यों चाहिए? क्या केवल इसलिए कि मैं उनका एक बड़ा ढेर इकट्ठा कर लूँ, यह भूलकर कि मनुष्य का जीवन कितना नाज़ुक है? इतना परिश्रम किसलिए? देखो, यह दिन मेरा अंतिम दिन हो सकता है और यदि वास्तव में अंतिम नहीं भी है तो भी अंतिम के बहुत निकट अवश्य है।
अभी के लिए विदा

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