प्रिय लूसीलियस
मैं जानता हूँ कि तुममें साहस और आत्मबल की कोई कमी नहीं है। उन शिक्षाओं से स्वयं को सुसज्जित करने से पहले भी जो मन को स्वस्थ बनाती हैं और विपत्तियों पर विजय पाना सिखाती हैं। तुम यह अनुभव करते थे कि भाग्य के प्रहारों का सामना तुम अच्छी तरह कर रहे हो। और जब तुमने वास्तव में भाग्य से टक्कर ली तथा अपनी शक्ति को परखा, तब यह आत्मविश्वास और भी बढ़ गया। किसी व्यक्ति को अपनी शक्ति का वास्तविक ज्ञान तब तक नहीं हो सकता जब तक चारों ओर से अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित न हों या कम-से-कम तब तक नहीं जब तक वे उसके बिल्कुल निकट न आ जाएँ। यही वह अवसर होता है जब सच्चा मन अपने को सिद्ध करता है। वह मन जो अपने निर्णय के अतिरिक्त किसी अन्य निर्णय के सामने नहीं झुकता।
भाग्य मनुष्य के साहस और चरित्र की परीक्षा लेता है। जिस मुक्केबाज़ ने कभी मार नहीं खाई, वह मुकाबले में सच्चा आत्मविश्वास लेकर नहीं उतर सकता। वह व्यक्ति, जिसने अपना रक्त बहते देखा हो, जिसने अपनी मुट्ठियों और प्रतिद्वन्द्वी के प्रहारों के बीच अपने दाँतों की चरमराहट सुनी हो, जो अपना संतुलन खोकर प्रतिद्वन्द्वी के पैरों तले गिर पड़ा हो और फिर भी, यद्यपि उसे हार माननी पड़ी हो, उसने अपने मनोबल को कभी पराजित न होने दिया हो, जो हर बार गिरने के बाद और अधिक उग्र तथा दृढ़ होकर उठ खड़ा हुआ हो, वही व्यक्ति अगली प्रतियोगिता में प्रबल आशा और आत्मविश्वास के साथ प्रवेश करता है। इसी उपमा को आगे बढ़ाएँ तो भाग्य ने भी अनेक बार तुम पर विजय प्राप्त की है। फिर भी तुमने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। तुम हर बार उठ खड़े हुए हो और पहले से भी अधिक साहस के साथ अपने पैरों पर डटे हो।
लूसीलियस, बहुत-सी बातें हमें वास्तव में जितना प्रभावित करती हैं उससे कहीं अधिक भयभीत करती हैं। हम वास्तविकता से कम, अपनी कल्पनाओं और विचारों से अधिक पीड़ित होते हैं। मैं यह बात स्टोइक दर्शन के उच्च अर्थ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि एक अधिक सामान्य अर्थ में कह रहा हूँ। निस्संदेह, हमारा सिद्धान्त यह है कि जिन बातों पर लोग आहें भरते हैं और विलाप करते हैं, वे तुच्छ हैं और उन पर ध्यान देने योग्य भी नहीं हैं। पर उन ऊँची बातों को अभी रहने दें, हालांकि, देवताओं की शपथ, वे सत्य हैं। फिलहाल मैं तुम्हें यह सलाह देता हूँ, समय आने से पहले दुखी मत हो। जिन बातों से तुम इस प्रकार भयभीत हो जैसे वे अभी-अभी घटित होने वाली हों, वे शायद कभी घटें ही नहीं और निश्चित रूप से अभी तक तो वे घटी नहीं हैं। इस प्रकार कुछ बातें हमें जितना कष्ट देना चाहिए, उससे अधिक कष्ट देती हैं। कुछ हमें समय से पहले ही कष्ट देने लगती हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो हमें बिल्कुल कष्ट नहीं देनी चाहिए। हम या तो अपने दुख को बढ़ा लेते हैं, उसे स्वयं गढ़ लेते हैं अथवा उसके आने से पहले ही उसे जीने लगते हैं क्योंकि चुनौती का सामना करने पर साहस बढ़ता है। फिर भी, यदि तुम चाहो तो अपनी रक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए मेरी ओर से कुछ शब्द स्वीकार करो।
उस पहले प्रश्न पर अभी हमारा मतभेद बना हुआ है और वह विषय अभी विवादास्पद है। इसलिए फिलहाल उसे स्थगित रहने देते हैं। जिसे मैं तुच्छ कहता हूँ, वह तुम्हें बहुत गंभीर प्रतीत हो सकता है। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कुछ लोग कोड़ों की मार खाते हुए भी हँसते रहते हैं जबकि कुछ दूसरे केवल एक थप्पड़ लगने पर ही कराह उठते हैं। बाद में हम यह जाँच करेंगे कि ऐसी बातों की शक्ति स्वयं उनमें निहित होती है या हमारी दुर्बलता से उत्पन्न होती है। फिलहाल मैं तुमसे केवल इतना चाहता हूँ कि जब भी तुम्हारे आस-पास के लोग तुम्हें यह विश्वास दिलाने लगें कि तुम दुखी हो तब इस पर ध्यान दो कि तुम वास्तव में क्या अनुभव कर रहे हो न कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कह रहे हैं। अपनी सहनशक्ति से परामर्श करो। और चूँकि अपने मामलों के सबसे अच्छे निर्णायक तुम स्वयं हो, अपने आप से पूछो, “ये लोग मुझ पर दया क्यों कर रहे हैं? किस आधार पर वे मुझसे कतराते हैं, यहाँ तक कि मेरे संपर्क में आने से भी डरते हैं मानो दुर्भाग्य कोई संक्रामक रोग हो?” क्या वास्तव में तुम्हारी स्थिति में कोई बुराई है? या फिर उसकी ख्याति और चर्चा वास्तविकता से अधिक भयावह है? अपने आप से पूछो, “क्या ऐसा तो नहीं कि मैं बिना किसी उचित कारण के कष्ट भोग रहा हूँ और विलाप कर रहा हूँ? क्या मैं स्वयं ही किसी ऐसी चीज़ को बुरा बना रहा हूँ जो वास्तव में बुरी नहीं है?”
“मैं कैसे जानूँ,” तुम कहते हो, “मेरी चिंता के कारण वास्तविक हैं या केवल कल्पना मात्र?” इसके लिए एक कसौटी है। हम या तो बीती हुई बातों से पीड़ित होते हैं या आने वाली बातों से अथवा दोनों से। जहाँ तक वर्तमान की बात है, उसके बारे में निर्णय करना आसान है। यदि तुम्हारा शरीर स्वतंत्र है, स्वस्थ है और किसी चोट या बीमारी के कारण तुम्हें कोई पीड़ा नहीं हो रही तो फिर जो कुछ भविष्य में आने वाला है, उसे आने दो और तब देखा जाएगा। आज का दिन तो किसी समस्या का विषय नहीं है।
“फिर भी, वह तो आने वाला है।” सबसे पहले यह पता करो कि क्या सचमुच कोई ठोस प्रमाण है कि विपत्ति आने वाली है। क्योंकि अक्सर हम उन बातों को लेकर चिंतित हो जाते हैं जिनके बारे में हमारे पास केवल अनुमान होता है। अफवाहें हमारे साथ छल करती हैं। वही अफवाहें जो सेनाओं को युद्धभूमि से भगा देती हैं और व्यक्तियों को तो उससे भी अधिक विचलित कर देती हैं। हाँ, प्रिय लूसीलियस, हम बहुत जल्दी जनमत और सुनी-सुनाई बातों के आगे झुक जाते हैं। जो बातें हमें भयभीत करती हैं, उनके लिए हम प्रमाण नहीं माँगते न ही उनकी सावधानीपूर्वक जाँच करते हैं। हम घबरा जाते हैं और भाग खड़े होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई सेना पशुओं के झुंड से उठी धूल देखकर अपना शिविर छोड़ देती है या जैसे लोग किसी अनाम अफवाह से आतंकित हो उठते हैं। एक अर्थ में, निराधार कारण और भी अधिक भय उत्पन्न करते हैं। वास्तविक खतरों की एक निश्चित सीमा होती है। परन्तु जो भय अनिश्चितता से जन्म लेता है, वह कल्पनाओं और बेलगाम चिंताओं के हवाले हो जाता है। इसी कारण हमारे सबसे विनाशकारी और सबसे कठिन नियंत्रित होने वाले भय वे होते हैं जो तर्कहीन और काल्पनिक होते हैं। हमारे अन्य भय भले ही अविवेकपूर्ण हों परन्तु ये भय तो पूरी तरह विवेकहीन होते हैं। इसलिए आइए, हम तथ्यों को ध्यानपूर्वक और निष्पक्ष दृष्टि से परखें।
भविष्य में कोई विपत्ति आने की संभावना हो सकती है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह निश्चित रूप से आने ही वाली है। कितनी ही ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती और कितनी ही हमारी आशंकाएँ तथा अपेक्षाएँ कभी सच नहीं होतीं। और यदि वह विपत्ति वास्तव में आने वाली भी हो तो उसके आने से पहले ही शोक मनाने से क्या लाभ? जब वह आएगी तब दुःख करने के लिए पर्याप्त समय होगा। अभी तो अपने लिए कुछ बेहतर बचाकर रखो। इससे तुम्हें क्या प्राप्त होगा? समय।
बहुत-सी ऐसी घटनाएँ घट सकती हैं जो आने वाले संकट को टाल दें। चाहे वह कितना ही निकट क्यों न प्रतीत हो या उसे समाप्त कर दें अथवा उसका रुख किसी और दिशा में मोड़ दें। आग भी कभी-कभी बच निकलने का मार्ग छोड़ देती है। गिरती हुई इमारत कुछ लोगों को बिना गंभीर क्षति पहुँचाए नीचे उतार देती है। तलवार गले तक पहुँचकर भी वापस खिंच जाती है। मृत्यु-दंड पाया हुआ व्यक्ति भी कभी-कभी अपने जल्लाद से अधिक समय तक जीवित रह जाता है। दुर्भाग्य भी स्थिर नहीं होता; उसका स्वभाव चंचल है। हो सकता है कि वह विपत्ति आए, और यह भी हो सकता है कि न आए। लेकिन एक बात निश्चित है, वह इस समय घटित नहीं हो रही है। इसलिए अपनी दृष्टि उन बातों पर रखो जो अच्छी हैं न कि उन आशंकाओं पर जो अभी केवल संभावना मात्र हैं।
अक्सर ऐसा होता है कि किसी भी प्रकार का संकेत नहीं होता कि कोई बुरी घटना आने वाली है फिर भी मन स्वयं ही झूठी कल्पनाएँ गढ़ लेता है। या तो वह किसी अस्पष्ट कथन का अर्थ सबसे बुरे रूप में निकाल लेता है अथवा यह मान बैठता है कि कोई व्यक्ति वास्तव में जितना क्रोधित है उससे कहीं अधिक क्रोधित है। वह यह नहीं सोचता कि सामने वाला कितना नाराज़ है बल्कि यह सोचकर भयभीत होता है कि क्रोध में वह क्या-क्या कर सकता है। लेकिन यदि भय को उसकी चरम सीमा तक पहुँचने दिया जाए तो जीवन जीने योग्य नहीं रह जाता और हमारे दुखों का कोई अंत नहीं होता। इसलिए कभी विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का उपयोग करो और कभी मानसिक दृढ़ता के बल पर प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले खतरे को भी तुच्छ समझो। यदि यह संभव न हो तो एक दोष को दूसरे दोष से संतुलित करो, भय का संतुलन आशा से करो। जिस बात से तुम डर रहे हो, चाहे वह कितनी ही निश्चित क्यों न प्रतीत होती हो, यह भी उतना ही निश्चित है कि घबराहट शांत हो जाती है और उम्मीद, डर का मजाक बनाती है।
इसलिए उम्मीद और डर, दोनों पर सावधानीपूर्वक विचार करो। जब परिस्थिति अनिश्चित हो तो अपने ऊपर एक उपकार करो। जिस परिणाम को तुम अधिक पसंद करते हो, उसी पर विश्वास करो। यदि परिस्थितियाँ भय के पक्ष में अधिक झुकी हुई दिखाई दें, तब भी अपने मन को दूसरी दिशा में मोड़ो। स्वयं को व्यर्थ परेशान करना बंद करो। बार-बार इस बात पर विचार करो कि अधिकांश लोग तब भी व्याकुल और परेशान हो जाते हैं, जब न तो कोई वास्तविक विपत्ति उपस्थित होती है और न ही भविष्य के लिए कोई निश्चित संकट दिखाई देता है। क्योंकि एक बार जब मन भय की दिशा में चल पड़ता है तो शायद ही कोई उसे रोक पाता है। कोई भी अपने भय को वास्तविकता के अनुरूप सीमित नहीं करता। कोई यह नहीं कहता, “जिस व्यक्ति ने मुझे यह सूचना दी है, वह भरोसे के योग्य नहीं। वह या तो मनगढ़ंत बातें कर रहा है या स्वयं किसी और की अफवाह पर विश्वास कर बैठा है।” हम अपने आपको हवा के झोंकों की तरह इधर-उधर उड़ने देते हैं। अस्पष्ट और अनिश्चित बातों से ऐसे भयभीत हो जाते हैं मानो वे पूरी तरह सिद्ध तथ्य हों। हम अपना संतुलन खो बैठते हैं और बेचैनी का सबसे छोटा कारण भी तुरंत भय का रूप ले लेता है।
मुझे यह सब इस प्रकार कहते हुए लज्जा आती है मानो मैं तुम्हें बहुत कोमल उपचारों से दुलार रहा हूँ। कोई दूसरा व्यक्ति कह सकता है, “शायद वह विपत्ति आए ही नहीं।” लेकिन तुम्हें अपने आप से कहना चाहिए, “यदि वह आ भी गई तो क्या हुआ? तब देखा जाएगा कि विजय किसकी होती है। संभव है कि उसका आना ही मेरे हित में हो और ऐसी मृत्यु मेरे जीवन को गौरव प्रदान करे।” सुकरात को महान बनाने वाला विष का वह प्याला था। यदि तुम कैटो से उसकी तलवार छीन लो, वह तलवार जो उसकी स्वतंत्रता की संरक्षक थी... तो तुम उसकी महिमा का बड़ा भाग भी छीन लोगे। लेकिन मैं तुम्हें आवश्यकता से अधिक प्रेरित कर रहा हूँ जबकि तुम्हें प्रेरणा से अधिक स्मरण की आवश्यकता है। हम तुम्हें तुम्हारे स्वभाव से भिन्न किसी दिशा में नहीं ले जा रहे हैं। तुम तो इन सिद्धांतों के लिए ही जन्मे हो। इसलिए तुम्हारे भीतर जो अच्छाई और शक्ति पहले से मौजूद है, उसे और बढ़ाओ। उसे और अधिक सुंदर तथा परिष्कृत बनाओ।
अब मेरा पत्र समाप्त होने वाला है। केवल उस पर मुहर लगाना शेष है अर्थात् उसे तुम्हारे पास पहुँचाने के लिए एक उत्कृष्ट सूक्ति सौंपनी है। “मूर्खता की बुराइयों में से एक यह भी है कि वह हमेशा जीवन की शुरुआत ही करती रहती है।”
परम उत्कृष्ट लूसीलियस, इस कथन के अर्थ पर गहराई से विचार करो। तब तुम समझोगे कि यह कितना खेदजनक है कि लोग इतने चंचल होते हैं कि हर दिन जीवन की नई नींव रखने लगते हैं और मृत्यु के द्वार पर खड़े होकर भी नए-नए कार्यों की योजनाएँ बनाते रहते हैं। अपने आस-पास के लोगों के बारे में सोचो। तुम्हें ऐसे वृद्ध दिखाई देंगे जो जीवन के अंतिम चरण में पहुँचकर भी किसी नए व्यवसाय, नई यात्रा या नए पद-प्रतिष्ठा की तैयारी में पहले से अधिक व्यस्त हैं। उस वृद्ध व्यक्ति से अधिक लज्जाजनक और क्या हो सकता है जो जीवन के अंत में भी जीवन की शुरुआत करने में लगा हुआ हो?
मैं इस कथन के लेखक का नाम न बताता, यदि यह एपिक्यूरस की कम प्रसिद्ध और कम प्रचलित उक्तियों में से एक न होती, ऐसी उक्ति जिसकी मैंने न केवल प्रशंसा की है बल्कि उसे अपनाया भी है।
अभी के लिए विदा
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