प्रिय लूसीलियस
दर्शनशास्त्र को विभाजित करके उसके विशाल स्वरूप को विभिन्न अंगों में समझने का जो अनुरोध तुम कर रहे हो, वह उपयोगी ही नहीं बल्कि उस व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है जो शीघ्रता से प्रज्ञा प्राप्त करना चाहता है। किसी संपूर्ण वस्तु को उसके विभिन्न भागों के माध्यम से समझना हमारे लिए अधिक सरल होता है। यदि हम दर्शनशास्त्र को उसके पूर्ण रूप में वैसे ही देख पाते, जैसे एक ही दृष्टि में पूरे आकाश का अवलोकन करते हैं तो वह दृश्य भी आकाश के समान ही विस्मयकारी होता। तब प्रत्येक मनुष्य उसे देखकर आश्चर्य से भर जाता और उन वस्तुओं का मोह छोड़ देता जिन्हें आज हम केवल इसलिए महान समझते हैं क्योंकि हमें वास्तविक महानता का ज्ञान नहीं है। किन्तु चूँकि ऐसा संभव नहीं है। इसलिए हमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन उसी प्रकार करना चाहिए जैसे कोई व्यक्ति आकाश के विभिन्न भागों का अलग-अलग निरीक्षण करके अंततः पूरे आकाश को समझने का प्रयास करता है।
निस्संदेह, बुद्धिमान व्यक्ति की बुद्धि दर्शनशास्त्र के सम्पूर्ण विस्तार को अपने भीतर समेट लेती है और उस पर उतनी ही शीघ्रता से दृष्टि डालती है, जितनी शीघ्रता से हमारी आँख पूरे आकाश का अवलोकन कर लेती है। परन्तु हम, जिनकी दृष्टि उन धुंधों से सीमित है जिनके बीच से हमें देखना पड़ता है, उनके लिए अलग-अलग बातों को समझना अधिक सरल है क्योंकि अभी हम सम्पूर्णता को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा और दर्शनशास्त्र को विभाजित करूँगा, किन्तु उसे अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ों में नहीं बल्कि उसके मुख्य भागों में। इस प्रकार का विभाजन उपयोगी है परन्तु उसे अत्यधिक छोटे-छोटे अंशों में बाँट देना उचित नहीं। जो वस्तु अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है, उसे समझना उतना ही कठिन होता है जितना किसी अत्यन्त विशाल वस्तु को समझना। जैसे किसी जनसमुदाय को विभिन्न जनजातियों में विभाजित किया जाता है और किसी सेना को सौ-सौ सैनिकों की टुकड़ियों में बाँटा जाता है, उसी प्रकार जो भी वस्तु पर्याप्त विशाल हो, उसे उसके उपयुक्त भागों में विभाजित करके समझना अधिक सरल होता है। किन्तु, जैसा मैंने कहा, ये भाग इतने अधिक और इतने छोटे नहीं होने चाहिए कि उनका कोई स्वतंत्र स्वरूप ही न रह जाए। अत्यधिक विभाजन उतना ही दोषपूर्ण है जितना बिल्कुल भी विभाजन न करना; क्योंकि जब किसी वस्तु को पीसकर चूर्ण बना दिया जाता है, तब उसकी संरचना ही समाप्त हो जाती है।
यदि तुम्हें उचित लगे तो मैं सबसे पहले विज़डम और दर्शनशास्त्र के बीच का अंतर बताकर आरम्भ करूँगा।प्रज्ञा मानव-मन का सर्वोच्च कल्याण है जबकि दर्शनशास्त्र प्रज्ञा के प्रति प्रेम और उसकी प्राप्ति की आकांक्षा है। दर्शनशास्त्र उस लक्ष्य की ओर बढ़ना है, जहाँ प्रज्ञा पहले ही पहुँच चुकी होती है। 'फिलॉसफी' शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह तो स्पष्ट है। इसका नाम ही घोषित करता है कि यह किससे प्रेम करता है। कुछ लोगों ने प्रज्ञा को मानव और दैवीय विषयों का विज्ञान कहा है। अन्य लोगों ने इसे मानव और दैवीय विषयों तथा उनके कारणों का ज्ञान बताया है। मेरे विचार से यह अंतिम जोड़ अनावश्यक है क्योंकि मानव और दैवीय विषयों के कारण स्वयं दैवीय क्षेत्र का ही एक भाग हैं। दर्शनशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ भी दी गई हैं। कुछ ने इसे सद्गुण के प्रति समर्पण कहा है। कुछ ने मन को सुधारने का संकल्प और कुछ विचारकों के अनुसार यह सही ढंग से तर्क करने का प्रयास है। सामान्यतः सभी इस बात से सहमत हैं कि दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा में अंतर है क्योंकि जिस वस्तु की आकांक्षा की जाती है, वह स्वयं आकांक्षा नहीं हो सकती। जिस प्रकार लोभ और धन में बहुत अंतर है। एक चाहने की प्रवृत्ति है और दूसरा चाही जाने वाली वस्तु। उसी प्रकार दर्शनशास्त्र और प्रज्ञा भी भिन्न हैं। दर्शनशास्त्र एक यात्रा है और प्रज्ञा उस यात्रा का फल तथा पुरस्कार। दर्शनशास्त्र आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। जबकि प्रज्ञा उसका अंतिम गंतव्य है। 'सोफिया' (Sophia) वास्तव में यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रज्ञा' या 'बुद्धिमत्ता' है। रोमन लोग भी कभी 'सोफिया' शब्द का प्रयोग करते थे, ठीक वैसे ही जैसे आज भी हम यूनानी शब्द 'फिलॉसोफिया' (Philosophia) का प्रयोग करते हैं। इसका प्रमाण हमारी प्राचीन हास्य-रचनाओं में मिलता है और डोसेनस की समाधि पर अंकित इस लेख में भी, "हे पथिक, ठहरो और डोसेनस की प्रज्ञा (सोफिया) को पढ़ो।"
यद्यपि दर्शनशास्त्र को सद्गुण के प्रति समर्पण कहा जाता है, जहाँ एक साधक है और दूसरा साध्य, फिर भी हमारे मत (स्टोइक परंपरा) के कुछ विचारकों का मानना है कि इन दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं किया जा सकता क्योंकि न तो सद्गुण के बिना दर्शनशास्त्र संभव है और न ही दर्शनशास्त्र के बिना सद्गुण। वास्तव में दर्शनशास्त्र सद्गुण के प्रति समर्पण है। परन्तु वह स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही संभव होता है। न तो सद्गुण उसके प्रति समर्पण के बिना अस्तित्व में रह सकता है और न ही सद्गुण के बिना उसके प्रति समर्पण हो सकता है। यह उस धनुर्धर के समान नहीं है, जो दूर स्थित किसी लक्ष्य पर निशाना साधता है। यहाँ लक्ष्य साधक से अलग किसी अन्य स्थान पर नहीं है। उसी प्रकार सद्गुण तक पहुँचने के मार्ग भी सद्गुण से बाहर नहीं होते, जैसे किसी नगर तक पहुँचने के लिए सड़कें नगर से बाहर होती हैं। मनुष्य सद्गुण तक स्वयं सद्गुण के माध्यम से ही पहुँचता है। इसलिए दर्शनशास्त्र और सद्गुण एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।
अधिकांश और सबसे प्रतिष्ठित दार्शनिकों के अनुसार दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। नीतिशास्त्र (एथिक्स), प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) और तर्कशास्त्र (लॉजिक)। इनमें से पहला भाग मन को संयमित और निर्देशित करता है। दूसरा वस्तुओं के स्वभाव और प्रकृति का अध्ययन करता है और तीसरा शब्दों के अर्थ, वाक्यों की संरचना तथा तर्कों के रूपों की परीक्षा करता है ताकि असत्य सत्य का रूप धारण करके लोगों को धोखा न दे सके।किन्तु कुछ दार्शनिक परंपराओं ने दर्शनशास्त्र के इन विभागों को या तो कम कर दिया या बढ़ा दिया। कुछ पेरिपैटेटिक (अरस्तू के अनुयायी) दार्शनिकों ने राजनीति को दर्शनशास्त्र का चौथा भाग माना क्योंकि उनके विचार में उसके लिए एक विशिष्ट प्रकार के अध्ययन और अलग विषय-वस्तु की आवश्यकता होती है। कुछ ने इसके अतिरिक्त 'अर्थशास्त्र' (ओइकोनोमिक्स) को भी जोड़ा, जिसका अर्थ है गृह-प्रबंधन का विज्ञान। कुछ ने 'जीवन की विभिन्न शैलियों' को भी एक स्वतंत्र विषय माना। परन्तु इन सभी विषयों को वास्तव में नीतिशास्त्र के अंतर्गत ही समाहित किया जा सकता है। एपिक्यूरियन दार्शनिकों का मत था कि दर्शनशास्त्र के केवल दो ही भाग हैं। प्रकृतिशास्त्र और नीतिशास्त्र। उन्होंने तर्कशास्त्र को अलग विभाग के रूप में स्वीकार नहीं किया। लेकिन जब उन्हें शब्दों की अस्पष्टताओं को दूर करने और उन असत्यों का पर्दाफाश करने की आवश्यकता पड़ी जो सत्य का रूप धारण कर लेते हैं, तब उन्होंने भी 'निर्णय और मानदंड' नामक एक विषय को स्वीकार किया। वस्तुतः यही तर्कशास्त्र था, यद्यपि वे इसे प्रकृतिशास्त्र का केवल एक पूरक मानते थे।
साइरेनाइक दार्शनिकों ने तो प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र, दोनों को ही हटाकर केवल नीतिशास्त्र को स्वीकार किया। फिर भी उन्होंने दूसरे ढंग से उन्हीं विषयों को पुनः शामिल कर लिया। उन्होंने नीतिशास्त्र को पाँच भागों में विभाजित किया—
किन वस्तुओं का अनुसरण करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए।
भावनाएँ।
कर्म।
कारण।
तर्क।
वास्तव में 'कारणों' का अध्ययन प्रकृतिशास्त्र के अंतर्गत आता है और 'तर्कों' का अध्ययन तर्कशास्त्र के अंतर्गत।किओस के अरिस्टो का मत था कि प्रकृतिशास्त्र और तर्कशास्त्र न केवल अनावश्यक हैं बल्कि हानिकारक भी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने नीतिशास्त्र का भी संकुचन कर दिया जबकि वही एकमात्र भाग था जिसे उन्होंने स्वीकार किया था। उन्होंने उपदेश और नैतिक परामर्श से संबंधित विषय को भी हटाते हुए कहा कि यह कार्य किसी विद्यालय के शिक्षक का है। दार्शनिक का नहीं, मानो दार्शनिक मानवता का शिक्षक ही न हो!
चूँकि दर्शनशास्त्र के तीन भाग हैं। इसलिए हम उसके नीतिशास्त्र (एथिक्स) से आरम्भ करें। परंपरागत रूप से नीतिशास्त्र को तीन शाखाओं में विभाजित किया जाता है। पहली शाखा प्रत्येक वस्तु का उचित मूल्य निर्धारित करती है और यह निर्णय करती है कि उसका वास्तविक महत्व कितना है। यह अत्यंत उपयोगी अध्ययन है क्योंकि वस्तुओं का सही मूल्यांकन करने से अधिक आवश्यक और क्या हो सकता है? दूसरी शाखा मनुष्य की प्रवृत्तियों और इच्छाओं (आवेगों) का अध्ययन करती है। तीसरी शाखा कर्मों का अध्ययन करती है। अर्थात नीतिशास्त्र का उद्देश्य यह है कि—
सबसे पहले, तुम यह सही ढंग से निर्णय कर सको कि प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य क्या है।
दूसरे, उन वस्तुओं के प्रति तुम्हारी इच्छाएँ और प्रवृत्तियाँ संतुलित, संयमित और विवेकपूर्ण हों।
तीसरे, तुम्हारी इच्छाओं तथा तुम्हारे कर्मों में पूर्ण सामंजस्य हो ताकि तुम्हारे समस्त आचरण में एकरूपता, स्थिरता और संगति बनी रहे।
यही वह अवस्था है जिसमें मनुष्य जैसा उचित समझता है, वैसा ही चाहता है और जैसा चाहता है, वैसा ही करता भी है। यही नैतिक जीवन की पूर्णता है।
इन तीनों क्षेत्रों में से किसी एक में भी दोष आ जाए तो उसका प्रभाव शेष दोनों पर भी पड़ता है। यदि तुमने सभी वस्तुओं का सही मूल्यांकन कर लिया हो, लेकिन तुम्हारी इच्छाएँ और आवेग असंयमित हों तो उस ज्ञान का क्या लाभ? यदि तुमने अपनी इच्छाओं को वश में कर लिया हो तथा अपनी कामनाओं पर नियंत्रण पा लिया हो, लेकिन कर्म करते समय परिस्थितियों की समझ न हो, और यह न जानते हो कि किस समय, किस स्थान पर और किस प्रकार कार्य करना उचित है तो उससे भी क्या लाभ? वस्तुओं का मूल्य और महत्व समझना एक बात है। समय की माँग को समझना दूसरी बात है और अपनी इच्छाओं को संयमित रखते हुए बिना उतावलेपन के उचित कर्म करना उससे भी भिन्न बात है। जीवन तभी अपने भीतर पूर्ण सामंजस्य प्राप्त करता है, जब कर्म, इच्छा से पीछे न रह जाए और इच्छा भी प्रत्येक वस्तु के वास्तविक मूल्य के आधार पर उत्पन्न हो तथा उसकी तीव्रता भी उसी वस्तु के महत्व के अनुरूप हो।
दर्शनशास्त्र का प्रकृतिशास्त्र (फिज़िक्स) दो उपभागों में विभाजित किया जाता है— साकार (शारीरिक) वस्तुएँ और निराकार (अशारीरिक) वस्तुएँ। इन दोनों के भी अपने-अपने स्तर या विभाग हैं। साकार वस्तुओं का अध्ययन मुख्यतः दो वर्गों में किया जाता है—
वे वस्तुएँ जो कारण (कारक) हैं।
वे वस्तुएँ जो कारणों से उत्पन्न होती हैं अर्थात तत्त्व (एलिमेंट्स)।
जहाँ तक तत्त्वों का प्रश्न है, कुछ दार्शनिकों के अनुसार उनका कोई और विभाजन नहीं है। किन्तु अन्य विचारक उन्हें तीन भागों में बाँटते हैं—
पदार्थ (मैटर),
वह सक्रिय कारण (क्रियाशील सिद्धांत) जो समस्त वस्तुओं को गति और कार्यशीलता प्रदान करता है,
तत्त्व (एलिमेंट्स) स्वयं।
पहले प्रकार को तकनीकी भाषा में वाक्पटुता (रेटोरिक) कहा जाता है, और दूसरे को द्वंद्वात्मक तर्क (डायलेक्टिक)।
वाक्पटुता का संबंध भाषा की अभिव्यक्ति, विचारों और उनकी सुव्यवस्थित प्रस्तुति से है। द्वंद्वात्मक तर्क दो भागों में विभाजित होता है, शब्दों का अध्ययन और अर्थों का अध्ययन अर्थात एक ओर वे बातें जो कही जाती हैं। दूसरी ओर वे शब्द या कथन जिनके माध्यम से वे बातें व्यक्त की जाती हैं।
इसके बाद इन दोनों विषयों के भी अत्यंत विस्तृत उपविभाग हैं। किन्तु इस समय मैं अपनी सूची को यहीं संक्षेप में समाप्त करता हूँ और केवल 'मुख्य बिंदुओं का स्पर्श' भर करूँगा। अन्यथा यदि मैं इन विभाजनों को इसी प्रकार विस्तार से बताने लगूँ तो यह पत्र एक साधारण संवाद न रहकर एक तकनीकी ग्रंथ बन जाएगा। अब मेरे लिए दर्शनशास्त्र के तर्कशास्त्र (लॉजिक) का विभाजन करना शेष रह जाता है। समस्त वाक्-विनिमय (विमर्श) दो प्रकार का होता है या तो वह निरंतर प्रवाह के रूप में होता है अथवा प्रश्न और उत्तर के रूप में विभाजित होता है। इन विषयों का अध्ययन तुम स्वयं भी कर सकते हो, प्रिय ल्यूसीलियस। मेरा उद्देश्य तुम्हें उनसे विमुख करना नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि जो कुछ भी तुम पढ़ो, उसे तुरंत अपने आचरण से जोड़ो।
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