कुछ लोगों ने यह माना है कि दर्शनशास्त्र का केवल एक ही भाग वास्तविक और मान्य है। वह भाग जो सामान्य रूप से मनुष्य को शिक्षा देने के बजाय प्रत्येक सामाजिक भूमिका के लिए विशिष्ट उपदेश देता है जैसे, पति को यह बताना कि उसे अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, पिता को यह सिखाना कि अपने बच्चों का पालन-पोषण किस प्रकार करना चाहिए या स्वामी को यह समझाना कि उसे अपने दासों का प्रबंधन कैसे करना चाहिए। उन्होंने दर्शन के अन्य सभी भागों को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वे हमारी वास्तविक आवश्यकताओं से भटक जाते हैं। मानो कोई व्यक्ति जीवन की संपूर्ण प्रकृति को समझे बिना उसके किसी एक पक्ष के विषय में उचित सलाह दे सकता हो! इसके विपरीत, स्टोइक दार्शनिक कियोस के अरिस्टो (Aristo of Chios) का मत है कि दर्शन का यह भाग बहुत कम महत्त्व रखता है और मन में गहराई तक प्रवेश करने में असमर्थ है। यह तो केवल बूढ़ी स्त्रियों की नसीहतों के समान है। उनके अनुसार मनुष्य के लिए सबसे बड़ी सहायता दर्शन के मूल सिद्धांतों और परम शुभ (Ultimate Good) की संरचना अथवा स्वरूप को समझने से प्राप्त होती है।
जब कोई व्यक्ति परम शुभ (सर्वोच्च कल्याण) के स्वरूप को भली-भाँति समझ लेता है और उसे पूरी तरह आत्मसात कर लेता है, तब वह स्वयं ही प्रत्येक परिस्थिति में यह निर्धारित कर सकता है कि उसे क्या करना चाहिए। जो व्यक्ति भाला फेंकना सीख रहा होता है, वह एक निश्चित लक्ष्य पर निशाना साधता है और अपने हाथ को इस प्रकार प्रशिक्षित करता है कि वह भाले को ठीक दिशा में भेज सके। जब अभ्यास और प्रशिक्षण से वह यह क्षमता प्राप्त कर लेता है, तब वह उसे अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी लक्ष्य पर लागू कर सकता है। उसने यह नहीं सीखा कि केवल इसी या उस विशेष लक्ष्य को कैसे भेदा जाए बल्कि यह सीखा कि जिस भी लक्ष्य को चाहे, उसे कैसे भेदा जाए। उसी प्रकार, जिसने अपने आपको संपूर्ण जीवन जीने की कला में प्रशिक्षित कर लिया है, उसे प्रत्येक विशेष परिस्थिति के लिए अलग-अलग उपदेशों की आवश्यकता नहीं रहती। उसे समग्र रूप से यह शिक्षा दी गई है कि अच्छा जीवन कैसे जिया जाए, न कि केवल यह कि पत्नी के साथ या पुत्र के साथ कैसे व्यवहार किया जाए। अच्छे ढंग से जीना सीख लेने में अपने परिवार के सदस्यों के साथ उचित व्यवहार करना भी स्वतः सम्मिलित है।
क्लेन्थीस का मत है कि दर्शन का यह भाग उपयोगी तो है। परंतु जब तक यह संपूर्ण दार्शनिक व्यवस्था का परिणाम न हो और दर्शन के वास्तविक सिद्धांतों तथा उसके मुख्य तत्त्वों के ज्ञान पर आधारित न हो, तब तक यह प्रभावी नहीं हो सकता। इसलिए इस विषय को दो प्रश्नों में विभाजित किया जाता है। पहला, क्या यह उपयोगी है या निरर्थक? दूसरा, क्या यह अपने बल पर किसी मनुष्य को सद्गुणी बना सकता है? दूसरे शब्दों में, क्या यह अनावश्यक है या फिर यह अन्य सभी भागों को अनावश्यक बना देता है?
जो लोग यह सिद्ध करना चाहते हैं कि दर्शन का यह भाग अनावश्यक है, वे इस प्रकार तर्क देते हैं: “यदि आँखों में कोई ऐसी बाधा हो जो देखने में रुकावट उत्पन्न कर रही हो तो पहले उसे दूर करना चाहिए। जब तक वह बनी रहती है, तब तक किसी व्यक्ति से यह कहना व्यर्थ है—‘इस तरह चलो!’ या ‘अपना हाथ उधर बढ़ाओ!’ ठीक इसी प्रकार, जब कोई ऐसी चीज़ मन को अंधा बना रही हो और उसे यह देखने से रोक रही हो कि उसकी प्राथमिकताएँ और कर्तव्य क्या हैं, तब किसी का यह उपदेश देना कि ‘अपने पिता के साथ इस प्रकार रहो, अपनी पत्नी के साथ उस प्रकार रहो’, बिल्कुल निरर्थक है। जब तक मन भ्रम से आच्छादित है, तब तक उपदेशों का कोई लाभ नहीं होगा। जैसे ही यह भ्रम का बादल हट जाएगा, प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य का कर्तव्य स्वयं स्पष्ट हो जाएगा। अन्यथा तुम रोगी का उपचार नहीं कर रहे बल्कि केवल उसे यह बता रहे हो कि एक स्वस्थ व्यक्ति को कैसा व्यवहार करना चाहिए। तुम किसी निर्धन व्यक्ति को यह सिखा रहे हो कि धनी व्यक्ति की तरह कैसे व्यवहार किया जाए। पर जब तक उसकी निर्धनता बनी हुई है, वह ऐसा कैसे कर सकता है? तुम किसी भूखे व्यक्ति को यह बता रहे हो कि यदि उसका पेट भरा होता तो वह क्या करता। जबकि तुम्हें पहले उस भूख को दूर करना चाहिए जो उसके भीतर को कचोट रही है।
मेरा यही कहना सभी दोषों के संबंध में भी है। तुम्हें पहले उन दोषों को दूर करना चाहिए, केवल उपदेश नहीं देने चाहिए क्योंकि जब तक दोष स्वयं बने रहते हैं, तब तक उपदेश प्रभावी नहीं हो सकते। यदि तुम उन मिथ्या धारणाओं को दूर नहीं करते जो हमें पीड़ित करती हैं तो लोभी व्यक्ति धन के उचित उपयोग के विषय में तुम्हारी सलाह नहीं मानेगा और न ही कायर व्यक्ति उन बातों पर ध्यान देगा जो तुम उसे भय से ऊपर उठने के बारे में बताओगे। तुम्हें लोभी व्यक्ति को यह समझाना होगा कि धन न तो अपने आप में अच्छा है और न बुरा। तुम्हें उसे ऐसे धनवान लोगों के उदाहरण दिखाने होंगे जो अत्यंत दुखी हैं। तुम्हें कायर व्यक्ति को यह समझाना होगा कि जिन बातों से सामान्य लोग भयभीत होते हैं, वे वास्तव में उतनी भयावह नहीं होतीं जितनी उनकी चर्चा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति सदा पीड़ा नहीं सहता और न ही कोई एक से अधिक बार मरता है, कि मृत्यु के विषय में सबसे बड़ा सांत्वना देने वाला सत्य यह है कि प्रकृति के नियम के अनुसार हमें इसे एक बार अवश्य सहना पड़ता है। पर किसी को भी इसे दो बार नहीं सहना पड़ता, कि पीड़ा का उपचार मन की दृढ़ता है, जो साहसपूर्वक कठिनाइयों का सामना करती है और इस प्रकार उन्हें सहना सरल बना देती है, कि पीड़ा की एक बड़ी विशेषता यह है कि यदि वह लंबे समय तक बनी रहती है तो वह अत्यधिक तीव्र नहीं हो सकती, और यदि वह अत्यधिक तीव्र है तो वह लंबे समय तक नहीं रह सकती और अंत में, हमें आवश्यकता (नियति) द्वारा निर्धारित हर बात को साहसपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
“जब इन सिद्धांतों के माध्यम से किसी व्यक्ति को अपनी वास्तविक स्थिति का स्पष्ट बोध हो जाता है। वह समझ लेता है कि सुखी जीवन वह है जो सुख-भोग के अनुसार नहीं बल्कि प्रकृति के अनुरूप जिया जाता है। जब वह सद्गुण को मनुष्य का एकमात्र शुभ मानकर उससे प्रेम करने लगता है। लज्जाजनक आचरण को ही एकमात्र बुराई समझता है और यह जान लेता है कि धन, प्रतिष्ठा, अच्छा स्वास्थ्य, शारीरिक बल तथा उच्च पद जैसी अन्य सभी वस्तुएँ केवल मध्यवर्ती (न अच्छी, न बुरी) हैं और उन्हें न तो शुभ माना जाना चाहिए, न अशुभ तब उसे प्रत्येक विशेष परिस्थिति के लिए किसी उपदेशक की आवश्यकता नहीं रहती, जो उससे कहे, ‘इस प्रकार चलो, इस प्रकार भोजन करो,’ या ‘यह पुरुष के लिए उचित है, यह स्त्री के लिए, यह पति के लिए उचित है और यह अविवाहित व्यक्ति के लिए।’
“जो लोग इस प्रकार के उपदेश देने में सबसे अधिक परिश्रम करते हैं, वे स्वयं भी उनके अनुसार आचरण नहीं कर पाते। ऐसे उपदेश तो वही हैं जो कोई शिक्षक अपने शिष्य को या कोई दादी अपने पोते को देती है। जो शिक्षक यह तर्क देता है कि किसी को कभी क्रोध नहीं करना चाहिए, वही स्वयं अत्यंत क्रोधी होता है। यदि तुम किसी प्राथमिक विद्यालय में जाओ तो पाओगे कि जिन बातों को दार्शनिक अत्यंत गंभीरता के साथ प्रस्तुत करते हैं, वही बातें बच्चों की अभ्यास-पुस्तिका में भी लिखी होती हैं।
“इसके अतिरिक्त, तुम्हारे उपदेश स्पष्ट होंगे या विवादास्पद? यदि वे स्पष्ट हैं तो उनके लिए किसी उपदेशक की आवश्यकता ही नहीं है। यदि वे विवादास्पद हैं तो लोग उन पर विश्वास नहीं करेंगे। इसलिए उपदेश देना व्यर्थ है। इसे इस प्रकार समझो: यदि तुम्हारी सलाह अस्पष्ट या संदिग्ध है तो तुम्हें उसके समर्थन में तर्क और प्रमाण देने पड़ेंगे। यदि तुम्हें प्रमाण देने ही पड़ेंगे तो उन प्रमाणों का आधार स्वयं अधिक प्रभावी है और वही अपने आप में पर्याप्त है। “उदाहरण के लिए, यह विचार करो, ‘मित्र के साथ तुम्हें इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, सह-नागरिक के साथ इस प्रकार और सहयोगी के साथ इस प्रकार।’ क्यों? ‘क्योंकि यही न्यायसंगत है।’ यह सब मैं न्याय पर चर्चा करने वाले दर्शन के भाग से सीख सकता हूँ। वहीं मुझे यह ज्ञात होता है कि न्याय अपने आप में वांछनीय है। हम उसे न तो भयवश अपनाते हैं और न किसी आर्थिक लाभ के लोभ में और जो व्यक्ति न्याय में स्वयं न्याय-रूपी सद्गुण के अतिरिक्त किसी और कारण से प्रसन्न होता है, वह वास्तव में न्यायप्रिय नहीं है। जब मैं इन बातों पर विश्वास कर लेता हूँ और उन्हें पूरी तरह आत्मसात कर लेता हूँ, तब उन उपदेशों का क्या लाभ जो ऐसे व्यक्ति को शिक्षा देते हैं जो पहले से ही शिक्षित और प्रशिक्षित है?”
जो जानता है, उसे उपदेश देना अनावश्यक है। जो नहीं जानता, उसके लिए केवल उपदेश पर्याप्त नहीं है क्योंकि उसे केवल यह नहीं सुनना चाहिए कि क्या करना चाहिए बल्कि यह भी समझना चाहिए कि ऐसा क्यों करना चाहिए। फिर, क्या उपदेश उस व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं जिसे शुभ और अशुभ के विषय में सही समझ है या उसके लिए जिसे ऐसी समझ नहीं है? जिसके पास सही समझ नहीं है, उसे तुम्हारे उपदेशों से कोई लाभ नहीं होगा। उसके कान पहले से ही जनसामान्य की उन धारणाओं से भरे हुए हैं जो तुम्हारी शिक्षाओं का विरोध करती हैं। जिसके पास यह स्पष्ट विवेक है कि किन वस्तुओं का अनुसरण करना चाहिए और किनसे बचना चाहिए, वह तुम्हारे बताए बिना ही जानता है कि उसे क्या करना है। इसलिए दर्शन के इस पूरे उपदेशात्मक भाग को त्यागा जा सकता है।
हमारी कमियों के दो कारण हैं। या तो गलत धारणाओं ने मन को दूषित करके उसमें बुरी प्रवृत्तियाँ भर दी हैं अथवा यदि मन अभी तक भूलों के अधीन नहीं हुआ है, तब भी वह उनकी ओर झुकाव रखता है। किसी भी भ्रामक प्रभाव के पड़ते ही शीघ्र ही पथभ्रष्ट हो जाता है। इसलिए या तो हमें रोगग्रस्त मन का पूर्ण उपचार करके उसे उसके दोषों से मुक्त करना चाहिए अथवा उस मन को, जो अभी भूलों से मुक्त है किंतु गलत दिशा में बढ़ रहा है, पहले ही रोक देना चाहिए। दर्शन के मूल सिद्धांत ये दोनों कार्य करते हैं। इसलिए केवल उपदेश देने का समूचा कार्य निरर्थक है।
इसके अतिरिक्त, यदि हम प्रत्येक विशेष परिस्थिति के लिए अलग-अलग उपदेश देने लगें तो यह कार्य कभी समाप्त नहीं होगा। साहूकार, किसान, व्यापारी, राजाओं की कृपा प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति, अपने से उच्च स्थिति वाले से प्रेम करने वाला और अपने से निम्न स्थिति वाले से प्रेम करने वाला, इन सबके लिए अलग-अलग उपदेश देने पड़ेंगे। विवाह के संबंध में भी तुम्हें यह बताना होगा कि पुरुष को उस स्त्री के साथ कैसे रहना चाहिए जो पहले अविवाहित रही हो, उस स्त्री के साथ कैसे रहना चाहिए जिसका पहले विवाह हो चुका हो, धनी स्त्री के साथ कैसे रहना चाहिए या उस स्त्री के साथ जिसके पास दहेज न हो। क्या तुम्हें नहीं लगता कि बाँझ और संतानवती स्त्री में, वृद्धा और युवती में तथा जन्मदात्री माता और सौतेली माता में भी कुछ अंतर होता है? हम प्रत्येक प्रकार की परिस्थिति को अपने विचार में नहीं ला सकते। विशिष्ट परिस्थितियाँ विशिष्ट व्यवहार की अपेक्षा करती हैं। जबकि दर्शन के सिद्धांत संक्षिप्त होने के साथ-साथ सर्वव्यापक होते हैं।
इसके अतिरिक्त, ज्ञान के उपदेश निश्चित और स्पष्ट सीमाओं वाले होने चाहिए। जिसकी कोई सीमा ही न हो, वह ज्ञान के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है क्योंकि ज्ञान वस्तुओं की सीमाओं को जानता है। इसलिए दर्शन के इस उपदेशात्मक भाग को त्याग देना चाहिए क्योंकि जो बात वह कुछ लोगों के लिए करने का दावा करता है, उसे वह सभी के लिए पूरा नहीं कर सकता। जबकि ज्ञान सबको अपने भीतर समाहित करता है। सामान्य लोगों के पागलपन और चिकित्सकों द्वारा उपचार किए जाने वाले पागलपन में केवल इतना ही अंतर है कि एक रोग के कारण उत्पन्न होता है। जबकि दूसरा मिथ्या धारणाओं के कारण। एक प्रकार का पागलपन शारीरिक बीमारी से पैदा होता है और दूसरा मन के अस्वस्थ होने से। यदि कोई व्यक्ति किसी पागल को यह उपदेश दे कि उसे कैसे बोलना चाहिए, कैसे चलना चाहिए या सार्वजनिक और निजी जीवन में कैसे व्यवहार करना चाहिए तो वह स्वयं उस पागल से भी अधिक पागल होगा जिसे वह सलाह दे रहा है। आवश्यकता उस व्यक्ति की विक्षिप्त मानसिक अवस्था का उपचार करने और उसके पागलपन के वास्तविक कारण को दूर करने की है। इसी प्रकार दूसरे मामले में भी पहले उस मानसिक उन्माद को दूर करना होगा। अन्यथा तुम्हारे सभी उपदेश हवा में विलीन हो जाएँगे।
यह अरिस्टो का तर्क है। अब मैं उसके प्रत्येक बिंदु का क्रमशः उत्तर दूँगा। सबसे पहले, उसके इस कथन के उत्तर में कि यदि दृष्टि में कोई बाधा हो तो उसे दूर कर देना चाहिए। मैं स्वीकार करता हूँ कि आँख को देखने के लिए उपदेशों की नहीं बल्कि उस उपचार की आवश्यकता होती है जो बाधा को हटाकर उसकी दृष्टि को स्पष्ट कर दे। देखना तो प्रकृति की स्वाभाविक क्रिया है। इसलिए जब बाधाएँ दूर कर दी जाती हैं, तब प्रकृति स्वयं अपना कार्य करने लगती है। परंतु जीवन की विशिष्ट परिस्थितियों में हमारा कर्तव्य क्या है, यह प्रकृति हमें नहीं सिखाती। फिर, मोतियाबिंद से मुक्त हुआ व्यक्ति अपनी दृष्टि लौट आने पर भी तुरंत किसी दूसरे की दृष्टि वापस नहीं ला सकता। किंतु जो व्यक्ति स्वयं दुर्गुणों से मुक्त हो जाता है, वह दूसरों को भी उनसे मुक्त करने में सहायता कर सकता है। रंगों के भेद को समझने के लिए आँख को न तो प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है और न ही उपदेश की। वह बिना किसी के बताए काले और सफेद में अंतर कर लेती है। परंतु मन को जीवन में अपने कर्तव्यों का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनेक उपदेशों की आवश्यकता होती है। फिर भी, आँखों का उपचार करने वाले वैद्य केवल औषधि ही नहीं देते बल्कि आवश्यक निर्देश भी देते हैं। चिकित्सक कहेगा, “अपनी दुर्बल दृष्टि को तुरंत तीव्र प्रकाश के सामने मत ले जाओ। पहले अँधेरे से निकलकर हल्की छाया वाले स्थानों में जाओ, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ो और क्रमशः अपनी आँखों को पूर्ण दिन के प्रकाश का अभ्यस्त बनाओ। भोजन करते ही पढ़ने मत बैठो और जब तक आँखों की सूजन और जलन पूरी तरह शांत न हो जाए, उन पर ज़ोर मत डालो। ठंडी हवा को सीधे अपने चेहरे पर मत लगने दो।” इस प्रकार की अन्य सलाह भी औषधियों जितनी ही उपयोगी होती हैं। चिकित्सा केवल उपचार ही नहीं करती बल्कि उचित परामर्श भी देती है।
वह कहता है, “गलत आचरण का कारण भ्रम है। उपदेश उस भ्रम को दूर नहीं करते और न ही शुभ और अशुभ के विषय में हमारी मिथ्या धारणाओं का नाश करते हैं।” मैं स्वीकार करता हूँ कि केवल उपदेश अपने आप मन की गलत धारणाओं को नहीं मिटा सकते। किंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि अन्य साधनों के साथ मिलकर भी वे निष्प्रभावी हो जाते हैं। सबसे पहले, वे स्मृति को ताज़ा करते हैं। दूसरे, जिन बातों पर एक साथ विचार करने पर वे अत्यंत जटिल प्रतीत होती हैं, उन्हें अलग-अलग भागों में विभाजित करके अधिक सावधानी से समझा जा सकता है। यदि उसके तर्क को मान लिया जाए तो यह भी कहना पड़ेगा कि सांत्वना और प्रोत्साहन भी निरर्थक हैं। जबकि वे निरर्थक नहीं हैं। इसलिए उपदेश भी निरर्थक नहीं हैं।
वह आगे कहता है, “रोगी को इस प्रकार बताना कि उसे क्या करना चाहिए, मानो वह स्वस्थ हो, मूर्खता है। आवश्यकता उसके स्वास्थ्य को पुनः स्थापित करने की है। जब तक वह नहीं होता, तब तक उपदेश व्यर्थ हैं।” परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि स्वस्थ और रोगी, दोनों को ही कुछ बातों का स्मरण कराना आवश्यक होता है? जैसे कि लालच से भोजन न करना या स्वयं को अत्यधिक थका न देना। कुछ ऐसे उपदेश हैं जो धनी और निर्धन, दोनों पर समान रूप से लागू होते हैं।
वह कहेगा, “उनके लोभ का उपचार कर दो। फिर धनी और निर्धन, किसी को भी अलग से कोई उपदेश देने की आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि दोनों की धन-लालसा शांत हो जाएगी।” किंतु धन की लालसा न होना और धन का उचित उपयोग करना, ये दोनों अलग बातें हैं। जो लोग धन के लोभी हैं, उन्हें उसकी सीमाएँ समझनी चाहिए और जिनमें यह दोष नहीं है, उन्हें भी यह सीखना आवश्यक है कि धन का सही उपयोग कैसे किया जाए।
“उनकी भ्रांतियों को दूर कर दो। फिर उपदेश अनावश्यक हो जाएँगे।” यह बात सही नहीं है। मान लो कि किसी व्यक्ति का लोभ कम हो गया है, अपव्यय पर नियंत्रण आ गया है, उतावलापन संयमित हो गया है और आलस्य दूर हो गया है, फिर भी उसे यह सीखने की आवश्यकता रहती है कि उसे क्या करना चाहिए और किस प्रकार करना चाहिए।
वह कहता है, “गंभीर दोषों पर उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।” किंतु औषधि भी असाध्य रोगों को हमेशा ठीक नहीं कर पाती, फिर भी हम उसका प्रयोग करते हैं। कहीं उपचार के रूप में तो कहीं केवल पीड़ा कम करने के लिए। उसी प्रकार दर्शन का व्यापक और शक्तिशाली तर्क भी उस मानसिक विकार को पूरी तरह दूर नहीं कर सकता जो लंबे समय से मन में गहराई तक जड़ें जमा चुका हो। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दर्शन किसी भी रोग का उपचार नहीं कर सकता, केवल इसलिए कि वह हर रोग का उपचार नहीं कर पाता।
“स्पष्ट बातों की ओर ध्यान दिलाने से क्या लाभ?” बहुत लाभ है क्योंकि कई बार हम जो जानते हैं, उसी का व्यवहार में उपयोग नहीं करते। स्मरण कराना कोई नई शिक्षा नहीं देता। परंतु वह हमारा ध्यान आकर्षित करता है। वह हमें सचेत करता है, स्मृति को जागृत रखता है और उसे धुंधला पड़ने से बचाता है। अनेक बातें हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हमारी दृष्टि से ओझल रह जाती हैं। इसलिए स्मरण कराना भी उपदेश का एक रूप है। मन प्रायः स्पष्ट बातों की भी अनदेखी करने का बहाना बनाता है। इसलिए उसे बार-बार सबसे परिचित बातों की ओर भी ध्यान दिलाना आवश्यक होता है। इस संदर्भ में कैल्वस का वेटिनियस के विषय में कहा गया यह कथन उपयुक्त है, “तुम सब जानते हो कि रिश्वतखोरी हो रही है और हर कोई यह भी जानता है कि तुम जानते हो।” तुम जानते हो कि मित्रता अपने साथ गहरे दायित्व लेकर आती है, फिर भी तुम उन्हें निभाते नहीं। तुम जानते हो कि जो व्यक्ति अपनी पत्नी से पवित्रता की अपेक्षा रखता है। जबकि स्वयं दूसरों की पत्नियों को भ्रष्ट करता है, वह दुष्ट है। तुम यह भी जानते हो कि जैसे तुम्हारी पत्नी का किसी व्यभिचारी से कोई संबंध नहीं होना चाहिए, वैसे ही तुम्हारा भी किसी परस्त्री से संबंध नहीं होना चाहिए। किंतु तुम अपने आचरण को इस ज्ञान के अनुरूप नहीं बनाते। इसलिए आवश्यक है कि तुम्हारा ध्यान इन बातों की ओर बार-बार आकर्षित किया जाए। इन सिद्धांतों को केवल स्मृति के किसी कोने में संचित करके नहीं रखना चाहिए बल्कि उन्हें सदैव हाथ के पास, तत्पर और जागृत रखना चाहिए। हमें इन हितकारी स्मरणों पर बार-बार विचार करना और उन्हें मन में दोहराना चाहिए ताकि हम केवल उन्हें जानते ही न रहें बल्कि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत उन्हें अपने आचरण में भी ला सकें। इसके अतिरिक्त, जो बातें हमें पहले से स्पष्ट प्रतीत होती हैं, वे भी और अधिक स्पष्ट तथा सजीव बनाई जा सकती हैं।
वह कहता है, “यदि तुम्हारे उपदेश स्वयं स्पष्ट नहीं हैं तो तुम्हें उनके साथ प्रमाण भी देने पड़ेंगे। उस स्थिति में सहायता उपदेश नहीं बल्कि वे प्रमाण करेंगे।” क्या तुम यह भूल रहे हो कि गुरु या उपदेशक का अधिकार और प्रतिष्ठा स्वयं भी लाभ पहुँचाते हैं, चाहे वह हर बात का तर्क न भी दे? जैसे विधि-विशेषज्ञों की राय केवल इसलिए मूल्यवान नहीं होती कि वे उसका कारण बताते हैं बल्कि इसलिए भी कि वे उस विषय के प्रामाणिक ज्ञाता होते हैं। इसके अतिरिक्त, स्वयं उपदेशों में भी बहुत प्रभाव होता है, विशेषकर जब वे पद्य के रूप में हों या गद्य में किसी स्मरणीय सूक्ति के रूप में व्यक्त किए गए हों, जैसे कैटो के ये वचन, “जो वस्तु तुम्हें वास्तव में चाहिए, वही खरीदो, केवल इसलिए नहीं कि उसका उपयोग किया जा सकता है। जिस वस्तु की तुम्हें आवश्यकता ही नहीं, उसके लिए एक पैसा भी बहुत अधिक कीमत है।” ऐसी ही भविष्यवाणियों जैसी सूक्तियाँ और इस प्रकार के वचन अत्यंत प्रभावशाली होते हैं, “समय का मितव्ययी उपयोग करो।” “स्वयं को जानो।” क्या कोई तुम्हें ये वचन सुनाए तो क्या तुम प्रत्येक के लिए उसका तर्क या प्रमाण माँगोगे?
जब गलत होता है तो उसे भूल जाना ही सबसे अच्छा उपचार है।
भाग्य साहसी का साथ देता है। कायर स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु होता है।
ऐसी सूक्तियों को किसी पक्षसमर्थक या तर्क की आवश्यकता नहीं होती। वे सीधे हमारे हृदय पर प्रभाव डालती हैं और इसलिए उपयोगी होती हैं क्योंकि उनमें हमारी अपनी प्रकृति की शक्ति काम करती है। हमारे मन में प्रत्येक श्रेष्ठ गुण के बीज पहले से ही विद्यमान रहते हैं। उपदेश उन्हें जागृत कर देते हैं जैसे, हल्की-सी हवा से फूँकी गई चिंगारी प्रज्वलित होकर अग्नि बन जाती है। सद्गुण को केवल एक स्पर्श, एक हल्के-से प्रेरणा-संकेत की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, कुछ बातें ऐसी होती हैं जो वास्तव में हमारे मन में तो उपस्थित रहती हैं। परंतु सहज रूप से उपलब्ध नहीं होतीं। जब उन्हें शब्दों में व्यक्त किया जाता है, तभी वे हमारे उपयोग में आने लगती हैं। कुछ विचार मन के विभिन्न कोनों में बिखरे पड़े रहते हैं और अप्रशिक्षित बुद्धि उन्हें एकत्र करके आपस में जोड़ नहीं पाती। इसलिए उन्हें संगठित और परस्पर संबद्ध करना आवश्यक है ताकि वे अधिक प्रभावशाली बनें और मन को ऊँचा उठाने में अधिक सहायक हों। यदि, इसके विपरीत, उपदेश किसी प्रकार से भी उपयोगी नहीं हैं तो फिर हमें समस्त शिक्षा को ही त्याग देना चाहिए और केवल प्रकृति के भरोसे संतुष्ट हो जाना चाहिए। किंतु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे यह नहीं देखते कि मनुष्य एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। किसी की बुद्धि तीव्र और चंचल होती है तो किसी की मंद और भारी और सामान्यतः लोगों की बुद्धि में बहुत विविधता पाई जाती है। उपदेश हमारी बुद्धि का पोषण करते हैं, उसे विकसित और परिष्कृत बनाते हैं, जिससे वह हमारी जन्मजात प्रवृत्तियों को पूर्णता प्रदान कर सके और हमारी भूलों का सुधार कर सके।
“यदि किसी व्यक्ति के पास सही सिद्धांत ही नहीं हैं तो उपदेश उसका क्या भला करेंगे? वह तो अब भी अपने दोषों का दास बना हुआ है।” बहुत सरल है उसे मुक्त करने के लिए। क्योंकि उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति नष्ट नहीं हुई है बल्कि केवल दब गई है और दोषों के बोझ तले छिप गई है। फिर भी वह समय-समय पर उभरने और भ्रष्ट करने वाले प्रभावों का विरोध करने का प्रयास करती रहती है। यदि उसे सहायता मिले और उपदेशों का सहारा प्राप्त हो तो वह फिर से अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकती है। बशर्ते कि लंबे समय से चले आ रहे विकार ने उसे पूरी तरह असाध्य न बना दिया हो। यदि ऐसा हो चुका है तो दर्शन की सबसे व्यापक और कठोर साधना भी प्रभावी नहीं होगी।
दर्शन के सिद्धांतों और उपदेशों में केवल इतना ही अंतर है कि सिद्धांत सामान्य और सार्वभौमिक होते हैं। जबकि उपदेश विशेष परिस्थितियों से संबंधित होते हैं। दोनों ही मार्गदर्शन करते हैं। अंतर केवल इतना है कि एक सामान्य रूप से निर्देश देता है और दूसरा विशिष्ट परिस्थितियों के स्तर पर।
“लेकिन यदि किसी व्यक्ति के पास पहले से ही सही और श्रेष्ठ सिद्धांत हैं तो फिर उपदेश अनावश्यक हो जाएँगे।” ऐसा बिल्कुल नहीं है। ऐसा व्यक्ति यह तो सीख चुका होता है कि उसे क्या करना चाहिए। परंतु वह हर परिस्थिति में यह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाता कि वही कर्तव्य वहाँ किस रूप में लागू होता है। केवल हमारी भावनाएँ ही हमें अपने सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने से नहीं रोकतीं। अनेक बार हमारी अनुभवहीनता भी हमें यह समझने नहीं देती कि किसी विशेष परिस्थिति में हमारा कर्तव्य क्या है। हमारा मन प्रायः शांत तो होता है। परंतु यह पहचानने में अपरिपक्व और अप्रशिक्षित होता है कि किसी स्थिति में हमारा दायित्व क्या है। ऐसे समय में उपदेश हमें वही बात स्पष्ट करके दिखाते हैं।
“शुभ और अशुभ के विषय में जो मिथ्या धारणाएँ हैं, उन्हें दूर कर दो और उनके स्थान पर सत्य धारणाएँ स्थापित कर दो। तब उपदेशों के लिए कुछ भी करने को नहीं बचेगा।” निस्संदेह, यह मन को व्यवस्थित करने का एक उपाय है। परंतु यही एकमात्र उपाय नहीं है। तर्क के द्वारा शुभ और अशुभ का वास्तविक स्वरूप स्थापित किया जा सकता है। किंतु इसके बाद भी उपदेशों का अपना विशिष्ट कार्य बना रहता है। न्याय और विवेक हमारे कर्तव्यों के उचित पालन में निहित हैं और कर्तव्यों का विन्यास तथा उनका व्यवहारिक रूप उपदेशों द्वारा निर्धारित होता है। इसके अतिरिक्त, शुभ और अशुभ के विषय में हमारे निर्णयों की सत्यता इस बात से प्रमाणित होती है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन किस प्रकार करते हैं और हमारे कर्तव्यों के पालन का मार्गदर्शन उपदेश करते हैं। इस प्रकार दोनों में पूर्ण सामंजस्य है। सिद्धांत पहले आते हैं और उनके पीछे उपदेश चलते हैं और यह तथ्य कि उपदेश सिद्धांतों के बाद आते हैं, स्वयं इस बात का प्रमाण है कि नेतृत्व सिद्धांतों का ही है।
“उपदेशों की संख्या तो असीमित है।” यह बात भी सही नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत विषयों के संबंध में उपदेश असीमित नहीं होते। समय, स्थान और व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार उनमें कुछ भिन्नता अवश्य आ जाती है। किंतु इन सभी विशेष परिस्थितियों पर भी सामान्य सिद्धांतों पर आधारित उपदेश ही लागू किए जाते हैं।
“जिस प्रकार पागलपन केवल उपदेशों से दूर नहीं होता, उसी प्रकार दुर्गुण भी उनसे दूर नहीं होते।” किन्तु ये दोनों स्थितियाँ समान नहीं हैं। जब पागलपन दूर हो जाता है तो मानसिक स्वस्थता अपने आप लौट आती है। परंतु मिथ्या धारणाओं के नष्ट हो जाने के बाद भी उचित आचरण का स्पष्ट ज्ञान तुरंत प्राप्त नहीं हो जाता। यदि हो भी जाए, तब भी उपदेश शुभ और अशुभ के विषय में सही समझ को और अधिक दृढ़ एवं सुदृढ़ बनाते हैं।यह कहना भी गलत है कि पागलों के लिए उपदेश किसी प्रकार से उपयोगी नहीं होते। यह सत्य है कि वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। किंतु उपचार में वे सहायक अवश्य होते हैं। फटकार और ताड़ना भी पागल व्यक्ति को संयमित रखने में सहायता कर सकती हैं। (यहाँ 'पागल' से मेरा आशय उन लोगों से है जिनका मानसिक संतुलन विचलित हो गया है, न कि उन लोगों से जिनकी बुद्धि पूरी तरह नष्ट हो चुकी है।)
“कानून लोगों को वैसा आचरण करने के लिए प्रेरित नहीं करते जैसा उन्हें करना चाहिए। कानून तो केवल धमकी के साथ जुड़े हुए उपदेश मात्र हैं।” सबसे पहले, कानून इसलिए लोगों को समझाकर नहीं बदल पाते क्योंकि उनमें दंड का भय निहित होता है। जबकि उपदेश प्रेरित करते हैं, बाध्य नहीं करते। दूसरे, कानून लोगों को अपराध करने से रोकने के लिए भय का सहारा लेते हैं। जबकि उपदेश उन्हें अपने कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं, यदि कानून केवल आदेश देने के बजाय शिक्षा भी दें तो वे भी उत्तम चरित्र के निर्माण में सहायक हो सकते हैं। इस विषय में मैं पोसिडोनियस से सहमत नहीं हूँ। वह कहता है—
“मैं प्लेटो की इस बात की आलोचना करता हूँ कि उसने अपने कानूनों के साथ प्रस्तावनाएँ जोड़ दीं। कानून संक्षिप्त होने चाहिए ताकि अल्पबुद्धि लोग भी उन्हें आसानी से समझ सकें। कानून की वाणी देववाणी के समान होनी चाहिए। वह आदेश दे, तर्क-वितर्क न करे। मुझे किसी प्रस्तावना से युक्त कानून से अधिक पांडित्यपूर्ण और हास्यास्पद कोई चीज़ नहीं लगती। यदि मुझे समझाना ही है तो अलग से समझाओ। मुझे बताओ कि तुम मुझसे क्या करवाना चाहते हो। मैं यहाँ सीखने के लिए नहीं बल्कि आज्ञा का पालन करने के लिए आया हूँ।”
किन्तु वास्तव में ऐसे कानून, जिनमें प्रस्तावना या शिक्षाप्रद भूमिका हो, लाभदायक होते हैं। इसी कारण तुम देखोगे कि जिन राज्यों के कानून बुरे होते हैं, वहाँ लोगों का चरित्र भी बुरा होता है।
“वे हर स्थिति में लाभदायक नहीं होते।” दर्शन भी तो हर स्थिति में लाभदायक नहीं होता। पर इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह निरर्थक है या मनुष्य के चरित्र का निर्माण करने में असमर्थ है। बताओ, क्या दर्शन स्वयं जीवन का विधान नहीं है? यदि हम यह भी मान लें कि कानून लाभदायक नहीं हैं, तब भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उपदेश भी लाभदायक नहीं हैं। यदि ऐसा हो तो तुम्हें यह भी कहना पड़ेगा कि सांत्वना देना, चेतावनी देना, उत्साह बढ़ाना, प्रशंसा करना और निंदा करना, इन सबका भी कोई उपयोग नहीं है। जबकि ये सभी उपदेश के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं और मन को पूर्णता की ओर ले जाने वाले साधन हैं।
मन में श्रेष्ठ विचारों का संस्कार करने और जो लोग डगमगा रहे हों तथा बुरे मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति रखते हों, उन्हें फिर से सद्मार्ग पर लाने के लिए सज्जनों का संग जितना प्रभावी है, उतना और कुछ नहीं। उन्हें बार-बार देखना और सुनना उनके प्रभाव को धीरे-धीरे हमारे भीतर उतार देता है और वह प्रभाव अंततः उपदेश के समान शक्ति प्राप्त कर लेता है। निस्संदेह, किसी बुद्धिमान व्यक्ति का प्रत्यक्ष सान्निध्य अत्यंत लाभकारी होता है। यहाँ तक कि कोई महान पुरुष मौन रहे, तब भी उसके पास रहकर कुछ न कुछ लाभ अवश्य प्राप्त होता है। यह कैसे होता है, इसे मैं ठीक-ठीक समझा नहीं सकता पर इतना अवश्य जानता हूँ कि ऐसा होता है। जैसा कि फेडो कहता है—
“कुछ अत्यंत सूक्ष्म जीव ऐसे होते हैं जिनका आक्रमण इतना क्षीण और इतना गुप्त होता है कि उनके काटने का हमें आभास तक नहीं होता। बाद में सूजन अवश्य दिखाई देती है। किंतु उस सूजन पर भी काटे जाने का कोई निशान नहीं मिलता।”
ठीक यही बात बुद्धिमानों की संगति के साथ भी होती है। तुम्हें यह अनुभव नहीं होगा कि उनका प्रभाव कब और कैसे तुम्हारे भीतर काम करने लगा। परंतु अंततः तुम्हें यह अवश्य अनुभव होगा कि उससे तुम्हें लाभ पहुँचा है।
“तुम पूछते हो, ‘इससे क्या लाभ है?’ मैं उत्तर देता हूँ कि यदि श्रेष्ठ उपदेश निरंतर तुम्हारे साथ रहें तो वे उतने ही लाभदायक सिद्ध होंगे जितने श्रेष्ठ आदर्श व्यक्तियों के उदाहरण। पाइथागोरस का कहना है कि जब लोग किसी मंदिर में प्रवेश करके देवताओं की मूर्तियों को निकट से देखते हैं और वहाँ किसी दैवी वाणी का अनुभव करते हैं तो उनकी मानसिक अवस्था बदल जाती है। कोई भी इस बात से इनकार नहीं करेगा कि अत्यंत अल्पबुद्धि लोग भी कुछ उपदेशों से सचमुच प्रभावित हो जाते हैं जैसे, ये अत्यंत संक्षिप्त किंतु गंभीर सूक्तियाँ, ‘किसी भी बात की अति मत करो’, ‘लोभी मन कभी तृप्त नहीं होता’, ‘दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें।’ ये वचन हमें भीतर तक झकझोर देते हैं। इन्हें सुनकर न तो किसी को इनमें संदेह होता है और न ही वह पूछता है कि ऐसा क्यों है। सत्य स्वयं इतना तेजस्वी होता है कि बिना किसी तर्क के भी अपना प्रभाव छोड़ देता है। यदि धार्मिक श्रद्धा लोगों को संयमित कर सकती है और उनके दोषों पर नियंत्रण रख सकती है तो उपदेश ऐसा क्यों नहीं कर सकते? यदि फटकार किसी के मन में लज्जा उत्पन्न कर सकती है तो साधारण और अलंकाररहित उपदेश भी वही प्रभाव क्यों नहीं उत्पन्न कर सकते? निस्संदेह, जब किसी उपदेश के साथ यह तर्क भी दिया जाता है कि किसी विशेष आचरण का पालन क्यों किया जाना चाहिए और उसका पालन करने से कर्ता को क्या लाभ होगा, तब वह उपदेश अधिक प्रभावशाली बन जाता है और मन के भीतर कहीं अधिक गहराई तक उतर जाता है।
यदि आदेश देना लाभदायक है तो उपदेश देना भी लाभदायक है और चूँकि आदेश लाभदायक हैं इसलिए उपदेश भी लाभदायक हैं। सद्गुण के दो पक्ष हैं। एक है सत्य का ज्ञान, और दूसरा है उसके अनुसार आचरण। सत्य का ज्ञान शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है। जबकि आचरण का मार्गदर्शन उपदेश द्वारा होता है। उचित आचरण न केवल हमें सद्गुण का अभ्यास कराता है बल्कि सद्गुण को हमारे जीवन में प्रकट भी करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य को करने से पहले प्रेरणा और समझाने से लाभान्वित हो सकता है तो वह उपदेश से भी लाभान्वित होगा। इसलिए, यदि उचित आचरण सद्गुण के लिए अनिवार्य है और उपदेश उचित आचरण का मार्ग दिखाते हैं तो उपदेश भी सद्गुण के लिए अनिवार्य हैं। मुख्यतः दो बातें मन की दृढ़ता उत्पन्न करती हैं।पहली, सत्य के प्रति निश्चित विश्वास और दूसरी, उस सत्य पर अटल भरोसा। उपदेश इन दोनों को उत्पन्न करते हैं। वे मनुष्य को सत्य को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करते हैं और सत्य में यह विश्वास मन में महान आकांक्षाएँ जगाता है तथा उसे आत्मविश्वास से भर देता है। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि उपदेश अनावश्यक हैं।
वास्तव में महान पुरुष मार्कस एग्रीपा, जो गृहयुद्धों के कारण प्रसिद्धि और शक्ति प्राप्त करने वालों में ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिनकी सफलता से राज्य का भी कल्याण हुआ, अक्सर कहा करते थे कि वे इस सूक्ति के बहुत ऋणी हैं, “एकता छोटी-से-छोटी शक्तियों को भी महान बना देती है और फूट सबसे शक्तिशाली की शक्ति को भी क्षीण कर देती है।” वे कहते थे कि इसी सूक्ति ने उन्हें एक उत्तम भाई और सच्चा मित्र बनाया। यदि इस प्रकार का एक वचन, मन में गहराई से स्थापित होकर, मनुष्य के चरित्र को रूपांतरित कर सकता है तो फिर दर्शन का वह भाग, जो ऐसी ही सूक्तियों और उपदेशों से बना है, वही कार्य क्यों नहीं कर सकता? सद्गुण का निर्माण आंशिक रूप से ज्ञान से और आंशिक रूप से अभ्यास से होता है। पहले तुम्हें सीखना पड़ता है और फिर अपने सीखे हुए को आचरण के द्वारा दृढ़ करना पड़ता है। यदि ऐसा है तो केवल दर्शन के सिद्धांत ही उपयोगी नहीं हैं बल्कि उसके उपदेश भी उतने ही उपयोगी हैं। वे मानो किसी कानून की शक्ति के समान हमारी भावनाओं को संयमित रखते हैं, उन्हें नियंत्रण में लाते हैं और उन्हें अनुशासन से भटकने नहीं देते।
विरोधी कहता है, “दर्शन के निम्नलिखित भाग हैं, ज्ञान और मन की अवस्था। कोई व्यक्ति यह सीख ले और समझ भी ले कि उसे क्या करना चाहिए तो भी वह तब तक बुद्धिमान नहीं होता जब तक उसका मन सीखी हुई बातों के अनुरूप रूपांतरित न हो जाए। तुम्हारा तीसरा भाग, जो उपदेशों से बना है तो केवल पहले दो भागों—ज्ञान-संबंधी सिद्धांतों और मन की अवस्था, से ही उत्पन्न होता है। इसलिए वह अनावश्यक है क्योंकि सद्गुण उत्पन्न करने के लिए वे दोनों ही पर्याप्त हैं।” यदि इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए तो सांत्वना भी अनावश्यक सिद्ध होगी क्योंकि वह भी उन्हीं दोनों से उत्पन्न होती है। इसी प्रकार चेतावनी, प्रोत्साहन, यहाँ तक कि तर्क-प्रमाण भी अनावश्यक हो जाएँगे क्योंकि ये सभी एक दृढ़ और सुस्थापित मानसिक अवस्था की ही उपज हैं। फिर भी, यद्यपि उत्कृष्ट मानसिक अवस्था इन सबकी जननी है, वही मानसिक अवस्था इन्हीं के माध्यम से विकसित भी होती है। वह इन सबकी उत्पत्ति का कारण भी है और स्वयं इनका परिणाम भी।
इसके अतिरिक्त, तुम जिस अवस्था का वर्णन कर रहे हो, वह उस व्यक्ति की है जो पहले ही पूर्णता प्राप्त कर चुका है और मानवीय सुख की सर्वोच्च सीमा तक पहुँच चुका है। किंतु वहाँ तक पहुँचने की प्रक्रिया धीमी और क्रमिक होती है। इस बीच जो लोग अभी अपूर्ण हैं, किंतु प्रगति के मार्ग पर हैं, उन्हें यह दिखाया जाना आवश्यक है कि उन्हें अपना जीवन किस प्रकार चलाना चाहिए। संभव है कि जब वास्तविक प्रज्ञा मन को उस अवस्था तक पहुँचा दे जहाँ वह केवल सही दिशा में ही आगे बढ़ सकता हो, तब उसे उपदेशों की आवश्यकता न रहे। किंतु जिनका चरित्र अभी दुर्बल है, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो उनसे आगे चलकर कहे, “इससे बचो, यह करो।” फिर, यदि कोई व्यक्ति उस समय की प्रतीक्षा करे जब वह स्वयं ही यह जानने लगे कि सबसे अच्छा क्या है तो तब तक वह अनेक भूलें कर चुका होगा। वे भूलें ही उसे उस अवस्था तक पहुँचने से रोक सकती हैं जहाँ वह स्वयं अपना मार्गदर्शन करने में सक्षम हो सके। इसलिए जब तक वह स्वयं अपना मार्गदर्शक बनने योग्य न हो जाए, तब तक उसका मार्गदर्शन किया जाना आवश्यक है। बच्चे अनुकरण करके सीखते हैं। कोई उनका हाथ पकड़कर उनकी उँगलियों को अक्षरों की रूपरेखा पर चलाता है। फिर उन्हें लिखने के लिए नमूना दिया जाता है और उसी का अनुसरण करते हुए वे अपनी लिखावट विकसित करते हैं। ठीक इसी प्रकार, हमारा मन भी तब सहायता प्राप्त करता है जब उसे किसी आदर्श का अनुसरण करना सिखाया जाता है।
ये वे तर्क हैं जो सिद्ध करते हैं कि दर्शन का यह भाग अनावश्यक नहीं है। इसके बाद एक और प्रश्न उठता है। क्या केवल यही भाग अपने आप में किसी व्यक्ति को बुद्धिमान बनाने के लिए पर्याप्त है? इस प्रश्न पर हम उचित समय आने पर विचार करेंगे। फिलहाल, तर्कों को एक ओर रखकर भी यह तो स्पष्ट है कि हमें ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता है जो हमें ऐसे उपदेश दे सके जो जनसाधारण के उपदेशों का प्रतिकार कर सकें। हमारे कानों तक पहुँचने वाला कोई भी शब्द ऐसा नहीं होता जो किसी-न-किसी प्रकार हमें प्रभावित न करे। हमें हानि केवल अपशब्दों से ही नहीं बल्कि शुभकामनाओं से भी पहुँचती है। शाप हमारे भीतर निराधार भय उत्पन्न करते हैं और मित्रों का स्नेह भी, हमारी भलाई चाहते हुए, हमें गलत शिक्षा देता है। वे हमें उन वस्तुओं के पीछे दौड़ाते हैं जो दूर हैं, अनिश्चित हैं और अस्थिर हैं। जबकि हमारा सुख तो हमारे अपने भीतर ही उत्पन्न हो सकता है। मैं तुमसे कहता हूँ, हमें सीधा मार्ग अपनाने ही नहीं दिया जाता। हमारे माता-पिता और यहाँ तक कि हमारे दास भी हमें भटका देते हैं। कोई व्यक्ति केवल अपने ही नुकसान के लिए गलती नहीं करता। हमारी मूर्खता हमारे पड़ोसियों तक फैलती है और उनकी मूर्खता बदले में हम पर प्रभाव डालती है। यही कारण है कि समाज के दोष व्यक्तियों में दिखाई देते हैं। जनसमूह ही उन दोषों को जन्म देता है। प्रत्येक व्यक्ति दूसरों को भ्रष्ट करते-करते स्वयं भी भ्रष्ट हो जाता है। वह बुरी आदतें सीखता है, फिर उन्हें दूसरों को सिखाता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की बुरी धारणाएँ एक-दूसरे के संपर्क में आकर मिलती जाती हैं और अंततः नैतिक पतन का एक विशाल ढेर खड़ा हो जाता है। इसीलिए हमें ऐसे संरक्षक की आवश्यकता है जो बार-बार हमारा कान खींचे, लोगों की कही हुई बातों को अस्वीकार करना सिखाए। बहुसंख्यक लोगों की प्रशंसा का विरोध करे। यदि तुम यह सोचते हो कि हमारे दोष केवल हमारे अपने भीतर से उत्पन्न होते हैं तो तुम भूल कर रहे हो। वे तो दूसरों से हमें विरासत में मिलते हैं और एक-दूसरे से फैलते रहते हैं। इसलिए हमारे चारों ओर गूँजती हुई इन जनमत की धारणाओं को बार-बार दिए जाने वाले उपदेशों के माध्यम से दूर करना आवश्यक है।
प्रकृति ने हमें किसी भी दोष की ओर प्रवृत्त नहीं किया है। उसने हमें पूर्ण और स्वतंत्र जन्म दिया है। उसने ऐसी कोई वस्तु हमारी आँखों के सामने नहीं रखी जिससे हमारे भीतर लोभ उत्पन्न हो। उसने सोना और चाँदी हमारे पैरों के नीचे दबाकर रखे और हमें यह सामर्थ्य दिया कि हम उन सब वस्तुओं को पैरों तले रौंद सकें, जिनके कारण आज हम स्वयं रौंदे और कुचले जाते हैं। प्रकृति ने हमारा मुख आकाश की ओर उठाया और चाहा कि हम उन सभी भव्य और अद्भुत वस्तुओं की ओर दृष्टि करें जिन्हें उसने रचा है। आकाशीय पिंडों का उदय और अस्त, आकाशमंडल का तीव्र परिभ्रमण, जो दिन में हमें पृथ्वी और रात में स्वर्ग का दर्शन कराता है, ग्रहों की गतियाँ, जो आकाशमंडल की गति की तुलना में धीमी प्रतीत होती हैं, किंतु जिन विशाल कक्षाओं में वे बिना रुके चलते हैं, उन्हें देखते हुए अत्यंत तीव्र हैं, सूर्य और चंद्रमा के ग्रहण, जब वे एक-दूसरे को आच्छादित कर लेते हैं और वे अन्य सभी अद्भुत घटनाएँ जो विस्मय उत्पन्न करती हैं। चाहे वे नियमित क्रम से घटित हों या अचानक उत्पन्न होने वाले कारणों से प्रकट हों, जैसे रात के अंधकार में अग्नि की लपटों जैसी रेखाएँ या बिना बिजली और गर्जन के निर्मल आकाश में चमकने वाली ज्योतियाँ अथवा अग्निमय स्तंभ, प्रकाश-पुंज और अन्य अनेक अग्नि-सदृश दृश्य। इन सभी अद्भुत वस्तुओं को प्रकृति ने हमारे ऊपर, आकाश में स्थापित किया है। परंतु सोना, चाँदी और लोहा, जो इन्हीं के कारण हमें कभी चैन से नहीं रहने देते, उन्हें उसने धरती के भीतर छिपाकर रखा, मानो यह समझते हुए कि उनका हमारे हाथों में आ जाना हमारे लिए हानिकारक होगा। किन्तु हमने ही उन्हें प्रकाश में निकाला ताकि उनके लिए आपस में लड़ सकें। हमने ही धरती की कठोर परतों को खोदकर अपने संकटों के कारण और उनके साधन दोनों को बाहर निकाला। हमने ही अपने अपराधों का दोष भाग्य पर डाल दिया। हमें इस बात में भी लज्जा नहीं आती कि जिन वस्तुओं को कभी पृथ्वी की गहराइयों में दबाकर रखा गया था, आज उन्हीं को हम सबसे अधिक मूल्यवान मानते हैं। क्या तुम जानना चाहते हो कि वह चमक, जिसने तुम्हारी आँखों को धोखा दिया है, वास्तव में कितनी भ्रामक है? जब ये धातुएँ धरती के भीतर पड़ी रहती हैं और मैल तथा खनिज-मिश्रण से ढकी होती हैं, तब उनसे अधिक गंदी और अंधकारमय कोई वस्तु नहीं होती। जब उन्हें लंबी, अंधेरी और संकरी सुरंगों से बाहर निकाला जाता है, तब शोधन और अशुद्धियों से अलग किए जाने की प्रक्रिया के दौरान उनसे अधिक कुरूप कुछ भी नहीं दिखाई देता। फिर उन श्रमिकों को देखो जिनके हाथ इस बंजर भूमिगत मिट्टी को साफ़ करते हैं। देखो, कालिख ने उनके शरीर को कितना मलिन कर दिया है। किन्तु ये धातुएँ शरीर से अधिक मन को मलिन करती हैं। उन्हें निकालने वाले कारीगरों की अपेक्षा उन्हें अपना बनाने वालों के मन में कहीं अधिक मैल जमा होता है।
इसलिए आवश्यक है कि हमें उपदेश मिलें, हमारे पास निष्कलंक चरित्र वाला कोई मार्गदर्शक हो। इतने अधिक भ्रम तथा छलपूर्ण कोलाहल के बीच अंततः हम केवल एक ही स्वर सुनें। वह स्वर कौन-सा होगा? यह तो स्वयं स्पष्ट है। वही स्वर जो आत्म-प्रशंसा के इस भारी शोर से बहरे हो चुके तुम्हारे कानों में उपचारकारी वचन फुसफुसाए। वही स्वर जो तुमसे कहे—
“तुम्हें उन लोगों से ईर्ष्या करने का कोई कारण नहीं जिन्हें संसार महान और भाग्यशाली कहता है। लोगों की प्रशंसा से तुम्हारे मन की शांति और विवेक विचलित होने का भी कोई कारण नहीं है। यदि कोई व्यक्ति बैंगनी राजकीय वस्त्र पहने हो, उसके साथ शस्त्रधारी सेवक चल रहे हों और उसके लिए मार्ग खाली कराया जा रहा हो तो केवल इस कारण तुम्हें अपने शांत और सरल जीवन से घृणा नहीं करनी चाहिए। केवल इसलिए कि उसके अधिकारी तुम्हें रास्ते से हटाकर उसके लिए मार्ग बनाते हैं, यह मत समझो कि वह तुमसे अधिक भाग्यशाली है।यदि तुम ऐसा पद प्राप्त करना चाहते हो जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो और किसी दूसरे पर बोझ न बने तो सबसे पहले अपने ही दोषों को दूर करो। ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो नगरों में आग लगा दें, युगों से अभेद्य और सुरक्षित दुर्गों को ध्वस्त कर दें, प्राचीरों की ऊँचाई तक मिट्टी के टीले खड़े कर दें और मेंढ़कों तथा घेराबंदी के विशाल यंत्रों से अत्यंत ऊँची दीवारों को तोड़ डालें। ऐसे भी बहुत हैं जो अपनी सेनाओं को आगे बढ़ाते हैं, शत्रु के पिछले भाग पर आक्रमण करते हैं और राष्ट्रों के रक्त से रँगे हुए समुद्र तक पहुँच जाते हैं। किंतु विडंबना यह है कि दूसरों को जीतने वाले ये लोग स्वयं अपनी वासनाओं के हाथों पराजित हो चुके होते हैं। उनकी विजय-यात्रा को बाहर से किसी ने नहीं रोका। पर वे अपनी महत्वाकांक्षा और अपनी क्रूरता का प्रतिरोध भी नहीं कर सके। जब वे दूसरों को सताते और रौंदते हुए दिखाई देते थे, उसी समय वे स्वयं अपनी ही इच्छाओं और लालसाओं के द्वारा सताए और रौंदे जा रहे होते थे।”
“विदेशी देशों को उजाड़ने की धुन ने दुर्भाग्यशाली सिकंदर को अपने वश में कर लिया और उसे अज्ञात प्रदेशों तक भटका दिया। क्या तुम उस व्यक्ति को बुद्धिमान समझते हो जिसने सबसे पहले उसी यूनान का विनाश आरंभ किया जहाँ उसका पालन-पोषण हुआ था? जिसने प्रत्येक नगर-राज्य से उसकी सबसे बड़ी विशेषता छीन ली। स्पार्टावासियों को दास बनने और एथेनावासियों को मौन रहने के लिए विवश कर दिया? फिलिप ने जिन-जिन राज्यों को या तो विजय से प्राप्त किया था या धन देकर अपने अधीन कर लिया था, केवल उन्हीं के विनाश से भी वह संतुष्ट नहीं हुआ। वह कहीं एक राज्य को नष्ट करता, कहीं दूसरे को और अपनी सेनाओं से पूरे संसार को अशांत कर देता। वह उन हिंस्र पशुओं के समान था जो अपनी भूख मिट जाने के बाद भी शिकार को काटते और फाड़ते रहते हैं। उसी प्रकार उसकी क्रूरता कभी तृप्त नहीं हुई। एक समय वह अनेक राज्यों को मिलाकर एक ही साम्राज्य बना रहा था। दूसरे समय यूनानी और फ़ारसी, दोनों एक ही व्यक्ति से भयभीत थे। फिर ऐसी स्थिति भी आई कि वे जातियाँ, जिन्हें डैरियस भी स्वतंत्र छोड़ गया था, उसके जुए को स्वीकार करने लगीं। लेकिन वह इससे भी संतुष्ट नहीं हुआ। वह समुद्रों और सूर्य की सीमाओं से भी आगे बढ़ना चाहता था। उसे यह लज्जाजनक लगता था कि उसकी विजयी यात्रा वहीं रुक जाए जहाँ हरक्यूलिस और बाक्कस के पदचिह्न समाप्त हो जाते हैं। वह तो प्रकृति को ही चुनौती देने की तैयारी कर रहा था। वह वास्तव में आगे बढ़ना नहीं चाहता था बल्कि वह रुक ही नहीं सकता था। ठीक वैसे ही जैसे पहाड़ी से नीचे फेंकी गई कोई भारी वस्तु तब तक लुढ़कती रहती है जब तक सबसे नीचे पहुँच न जाए।
“ग्नेयस पोम्पेय को विदेशी और गृहयुद्धों में उतरने के लिए न तो सद्गुण ने प्रेरित किया था और न ही विवेकपूर्ण विचार ने बल्कि एक झूठी महानता के उन्मत्त मोह ने। कभी उसने स्पेन में जाकर सर्टोरियस के विरुद्ध युद्ध किया तो कभी समुद्री डाकुओं को जंजीरों में बाँधने और समुद्रों में शांति स्थापित करने के बहाने अभियान चलाया। पर ये सब उसके साम्राज्य-विस्तार को छिपाने के केवल बहाने थे। उसे अफ्रीका, उत्तर के प्रदेशों, मिथ्रिडेटीस के विरुद्ध, आर्मेनिया और एशिया के दूर-दूर तक फैले क्षेत्रों में किसने पहुँचाया? केवल और अधिक महान बनने की उसकी असीम लालसा ने। क्योंकि वह अकेला ऐसा व्यक्ति था जिसे स्वयं अपनी महानता भी पर्याप्त नहीं लगती थी।
सीज़र को अपने साथ-साथ पूरे राज्य के विनाश का कारण किसने बनाया? उसका अहंकार, उसकी महत्त्वाकांक्षा और दूसरों से ऊपर उठने की असीम आकांक्षा। वह यह सहन नहीं कर सकता था कि कोई एक भी व्यक्ति उससे आगे हो। जबकि स्वयं गणराज्य तो दो व्यक्तियों के संयुक्त नेतृत्व को भी स्वीकार कर लेता था।क्या तुम समझते हो कि गायुस मारियुस को इतने बड़े-बड़े संकटों का सामना करने के लिए सद्गुण ने प्रेरित किया था? वह विधिसम्मत रूप से केवल एक बार ही कौंसल बना था क्योंकि वैध रूप से उसने केवल एक ही कौंसलशिप स्वीकार की। शेष सब उसने बलपूर्वक हथिया लीं। उसने ट्यूटोनों और किम्ब्रियों को पराजित किया, अफ्रीका के रेगिस्तानों में युगुर्था का पीछा किया। पर यह सद्गुण नहीं था जिसने उसे ऐसा कराया। सेनाओं का नेतृत्व मारियुस करता था, पर मारियुस का नेतृत्व उसकी महत्त्वाकांक्षा करती थी। जब ये लोग पूरे संसार को अपने साथ उथल-पुथल में डाल रहे थे, तब वे स्वयं भी उसी उथल-पुथल में फँसे हुए थे। वे उन बवंडरों के समान थे जो इसलिए हर वस्तु को अपने साथ घुमा देते हैं क्योंकि वे स्वयं पहले से ही चक्कर खा रहे होते हैं और इसलिए और भी अधिक वेग से आगे बढ़ते हैं क्योंकि उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं होता। इसी कारण, दूसरों पर असंख्य विपत्तियाँ लाने के बाद, अंततः वे स्वयं भी उसी विनाशकारी शक्ति का प्रहार सहते हैं जिसके द्वारा उन्होंने इतने लोगों को पीड़ा पहुँचाई थी। कभी यह मत समझो कि कोई व्यक्ति दूसरे के दुर्भाग्य की कीमत पर वास्तव में भाग्यशाली बन सकता है।
हमें इन सभी उदाहरणों का प्रतिकार करना चाहिए, जो निरंतर हमारी आँखों और कानों पर आक्रमण करते रहते हैं। उन हानिकारक बातों का बोझ, जो हमारे हृदय में भर गया है, उसे बाहर निकाल देना चाहिए। उनके स्थान पर सद्गुण को स्थापित करना आवश्यक है ताकि वह झूठ और मिथ्या धारणाओं को उखाड़ फेंके, हमें उस भीड़ से अलग कर दे जिस पर हम बहुत आसानी से विश्वास कर बैठते हैं। हमें फिर से स्वस्थ तथा सही विचारों की ओर लौटा लाए। वास्तव में यही प्रज्ञा है। प्रकृति की ओर लौटना और उस मूल अवस्था को पुनः प्राप्त करना, जिससे सामान्य लोगों की भ्रांतियों ने हमें दूर कर दिया है। मानसिक स्वस्थता का बड़ा भाग इसी में है कि हम पागलपन के समर्थकों का साथ छोड़ दें और ऐसे संग से बहुत दूर चले जाएँ जो एक-दूसरे के लिए समान रूप से हानिकारक है।
यदि तुम यह जानना चाहते हो कि यह बात सत्य है तो केवल इतना देख लो कि प्रत्येक व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में और अकेले होने पर कितना भिन्न व्यवहार करता है। ऐसा नहीं कि एकांत अपने आप मनुष्य को निर्दोष बना देता है, जैसे गाँव का जीवन अपने आप सादगी नहीं सिखा देता। किंतु जब देखने वाले और गवाह उपस्थित नहीं होते, तब वे दोष स्वतः कम हो जाते हैं जो केवल दिखाने और दूसरों को प्रभावित करने से ही पनपते हैं।बताओ, ऐसा कौन है जो बैंगनी राजकीय वस्त्र केवल अपने लिए पहनता हो, जब उसे देखने वाला कोई न हो? कौन है जो अकेले में स्वर्ण-पात्रों में भोज करता हो? कौन किसी ग्रामीण वृक्ष की छाया में अकेला बैठकर अपने वैभव का प्रदर्शन करता है? कोई भी व्यक्ति केवल अपनी ही आँखों के लिए श्रृंगार नहीं करता। न ही केवल कुछ निकट मित्रों के लिए। जितनी बड़ी दर्शकों की भीड़ होती है, उतना ही वह अपने दोषों का प्रदर्शन बढ़ाता जाता है। यही मनुष्य का स्वभाव है। प्रत्येक उन्मत्त इच्छा उन लोगों के कारण और भी प्रबल हो जाती है जो उसकी प्रशंसा करते हैं और उसमें सहभागी बनते हैं। यदि तुम प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर अंकुश लगा दो तो इच्छाओं पर भी अंकुश लग जाएगा। महत्त्वाकांक्षा, विलासिता और सनक, इन सबको एक मंच चाहिए; यदि तुम उन्हें दर्शकों से वंचित कर दो तो उनका उपचार कर दोगे।
इसलिए यदि हम ऐसे कोलाहलपूर्ण नगर में रह रहे हों तो हमारे पास ऐसा गुरु या मार्गदर्शक होना चाहिए जो उन लोगों का प्रतिवाद करे जो अपार धन-संपत्ति की प्रशंसा करते हैं। इसके स्थान पर उस व्यक्ति की सराहना करे जो थोड़े में भी समृद्ध है और जो धन का मूल्य उसके परिमाण से नहीं बल्कि उसके उचित उपयोग से आँकता है। जो लोग प्रभाव और सत्ता का गुणगान करते हैं, उनके विपरीत हमारा मार्गदर्शक ऐसे अवकाश की प्रशंसा करे जो अध्ययन को समर्पित हो और ऐसे मन की जो बाहरी वस्तुओं से हटकर अपने ही आंतरिक जीवन पर केंद्रित रहता हो। उसे उन लोगों की ओर भी संकेत करना चाहिए जिन्हें संसार की दृष्टि में सुखी माना जाता है, किंतु जो वास्तव में अपनी ईर्ष्या योग्य ऊँचाइयों पर काँपते और व्याकुल रहते हैं। जो अपने विषय में स्वयं वैसा नहीं सोचते जैसा दूसरे उनके बारे में सोचते हैं। जो स्थान दूसरों को अत्यंत ऊँचा और गौरवपूर्ण दिखाई देता है, वही उन्हें अत्यंत असुरक्षित प्रतीत होता है। जब वे अपनी ऊँचाई से नीचे झाँकते हैं तो उस गहरी गिरावट को देखकर उनका साहस टूट जाता है और वे भयभीत हो उठते हैं। उन्हें लगता है कि किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है क्योंकि सबसे ऊँचे स्थान ही सबसे अधिक फिसलन भरे होते हैं। तब वे अपनी ही उपलब्धियों से डरने लगते हैं और वही सौभाग्य, जिसके बल पर उन्होंने दूसरों पर प्रभुत्व जमाया था, अब स्वयं उन्हीं पर बोझ बन जाता है। तब वे शांत और निश्चिंत अवकाश की प्रशंसा करते हैं, स्वतंत्रता को सराहते हैं, यश से घृणा करने लगते हैं। अपनी संपत्ति तथा प्रतिष्ठा के नष्ट होने से पहले ही उससे छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं। तभी तुम उन्हें भय से प्रेरित होकर दर्शन का अभ्यास करते हुए देखोगे। तब वे अपने दुर्भाग्यग्रस्त सौभाग्य के लिए स्वस्थ और विवेकपूर्ण परामर्श खोजने लगते हैं। वास्तव में ऐसा प्रतीत होता है मानो सौभाग्य और सद्गुण एक-दूसरे के विपरीत हों। हम विपत्ति में अधिक बुद्धिमान बनते हैं, क्योंकि समृद्धि प्रायः हमसे हमारा नैतिक विवेक छीन लेती है।
अभी के लिए विराम
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