प्रिय लूसीलियस
तुमने दार्शनिक मेट्रोनैक्स की मृत्यु पर मुझे जो पत्र लिखा, उसमें व्यक्त शोक से ऐसा प्रतीत हुआ कि तुम्हारा मानना था कि वह कुछ और समय तक जीवित रह सकता था बल्कि उसे जीवित रहना ही चाहिए था। मुझे उसमें वह निष्पक्षता दिखाई नहीं दी जो तुम सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक व्यावहारिक मामले में प्रचुर मात्रा में दिखाते हो, पर इस एक विषय में जैसा कि लगभग सभी लोग करते हैं, तुम उससे वंचित रह गए। मेरे अनुभव में बहुत-से लोग मनुष्यों के प्रति तो न्यायपूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं, पर देवताओं के प्रति कोई भी निष्पक्ष नहीं होता। हम प्रतिदिन भाग्य को कोसते हुए कहते हैं, “इस व्यक्ति को उसके जीवन-कार्य के बीच में ही क्यों उठा लिया गया? उस दूसरे को क्यों नहीं? वह उस व्यक्ति की वृद्धावस्था को क्यों लंबा खींच रहा है, जो स्वयं अपने लिए भी बोझ बन चुका है और दूसरों के लिए भी?”
देखो, तुम्हें क्या अधिक न्यायसंगत प्रतीत होता है, प्रकृति तुम्हारी आज्ञा माने या तुम प्रकृति की? इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम उस स्थान को कितनी जल्दी छोड़ते हो, जिसे एक दिन तुम्हें छोड़ना ही है? हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम कितने लंबे समय तक जीते हैं बल्कि इस बात की कि क्या हमने पर्याप्त रूप से जीवन जिया है। लंबे जीवन के लिए भाग्य की सहायता चाहिए। पर पर्याप्त जीवन जीने के लिए सबसे आवश्यक चीज़ मनुष्य का चरित्र है। जीवन तभी लंबा होता है जब वह पूर्ण हो और वह तभी पूर्ण होता है जब मन स्वयं को वही नैतिक उत्कृष्टता प्रदान करता है जो उसके स्वभाव के अनुरूप है। अपने ऊपर स्वयं का अधिकार स्थापित करता है। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन कुछ भी सार्थक किए बिना बिताया हो, उसके लिए अस्सी वर्ष किस काम के? ऐसे व्यक्ति ने वास्तव में जीवन नहीं जिया। वह केवल जीवन से चिपका रहा। उसने वृद्धावस्था में मरना नहीं सीखा बल्कि लंबे समय तक मरते रहने का अनुभव किया। तुम कहते हो, “वह अस्सी वर्ष जिया।” पर वास्तविक प्रश्न यह है कि उसकी मृत्यु की गणना तुम किस दिन से करते हो।
“लेकिन वह व्यक्ति तो अपनी युवावस्था के उत्कर्ष में ही मर गया।” फिर भी उसने एक अच्छे नागरिक, एक अच्छे मित्र और एक अच्छे पुत्र के सभी कर्तव्यों का पालन किया। वह किसी भी भूमिका में अधूरा नहीं रहा। यद्यपि उसकी आयु पूरी नहीं हुई, उसका जीवन वास्तव में पूर्ण था। “वह दूसरा व्यक्ति अस्सी वर्ष तक जीवित रहा।” सच तो यह है कि वह केवल उतने वर्षों तक अस्तित्व में रहा, जब तक कि तुम 'जीवित रहने' का वही अर्थ न लो, जो हम पेड़ों के लिए लेते हैं। सुनो, लूसीलियस, हमें प्रयास करना चाहिए कि हमारे जीवन का मूल्य उसी प्रकार आँका जाए, जैसे बहुमूल्य वस्तुओं का होता है। उनके आकार से नहीं बल्कि उनके भार (मूल्य और सार) से। उसी प्रकार हमारे जीवन का मूल्य उसकी अवधि से नहीं बल्कि उसके कर्मों और उपलब्धियों से मापा जाना चाहिए।
क्या तुम जानना चाहते हो कि उस दृढ़ और साहसी व्यक्ति में, जो भाग्य को तुच्छ समझता है, जिसने जीवन के हर संघर्ष में एक अनुभवी योद्धा की तरह लड़ते हुए जीवन के परम कल्याण को प्राप्त कर लिया है और उस व्यक्ति में क्या अंतर है जिसके ऊपर केवल बहुत-से वर्ष बीत गए हैं? पहला व्यक्ति मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है। जबकि दूसरा अपनी मृत्यु आने से पहले ही मर चुका होता है। इसलिए हमें उस व्यक्ति की प्रशंसा करनी चाहिए और उसे बधाई देनी चाहिए जिसने अपने समय का सर्वोत्तम उपयोग किया हो, चाहे उसका जीवन कितना ही संक्षिप्त क्यों न रहा हो। उसने जीवन के वास्तविक प्रकाश का दर्शन किया है। वह भीड़ का मात्र एक सदस्य बनकर नहीं रहा। उसने सचमुच जीवन जिया और उसका पूर्ण विकास किया। कभी उसके जीवन में निर्मल और उज्ज्वल दिन आए। उससे भी अधिक बार उसे केवल सूर्य के क्षणिक प्रकाश की झलकियाँ ही मिलीं। फिर भी तुम यह क्यों पूछते हो कि वह कितने समय तक जीवित रहा? वह आज भी जीवित है। वह समय की सीमाओं को लाँघकर आने वाली पीढ़ियों में प्रवेश कर चुका है और स्वयं को हमारी स्मृति के सुपुर्द कर गया है।
लेकिन यह मत समझना कि मैं अपने जीवन में और अधिक वर्षों की वृद्धि को अस्वीकार करूँगा। यदि मेरे जीवन की अवधि छोटी भी रह जाए तो भी मैं यह नहीं कहूँगा कि मैंने सुख के लिए आवश्यक किसी वस्तु का अभाव अनुभव किया। मैंने अपने आपको इस आशा में तैयार नहीं किया कि किसी लालची व्यक्ति की तरह अंतिम दिन तक जीता रहूँ बल्कि मैंने प्रत्येक दिन को ऐसे देखा है मानो वही मेरा अंतिम दिन हो। तुम यह क्यों पूछते हो कि मेरा जन्म कब हुआ था या क्या मेरा नाम अभी भी युवकों की सूची में दर्ज है? जो वास्तव में मेरा है, वह मेरे पास है। जैसे छोटा कद होने पर भी कोई मनुष्य पूर्ण मनुष्य हो सकता है, उसी प्रकार कम अवधि का जीवन भी पूर्ण हो सकता है। आयु तो बाहरी वस्तु है। मैं कितने समय तक अस्तित्व में रहूँगा, यह मेरे अधिकार में नहीं है। परंतु मैं वास्तव में कैसे जीता हूँ, यह मेरा अपना है। तुम मुझसे केवल यही अपेक्षा कर सकते हो कि मैं अपना जीवन साधारण, निष्क्रिय और गुमनामी में बिताकर वर्षों की गणना न करूँ बल्कि सचमुच जीवन जीऊँ, केवल समय बिताता न रहूँ।
तुम पूछते हो कि सबसे समृद्ध जीवन की अवधि कितनी होती है। उसका उत्तर यह है, वह जीवन जो तब तक जिया जाए, जब तक मनुष्य प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) को प्राप्त न कर ले। जो उस अवस्था तक पहुँच जाता है, वह जीवन की सबसे बड़ी अवधि नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। ऐसा व्यक्ति निडर होकर अपनी उपलब्धि पर गर्व करेगा। वह देवताओं का और स्वयं को भी उनमें सम्मिलित मानते हुए आभार व्यक्त करेगा तथा अपने अस्तित्व का श्रेय प्रकृति को देगा। ऐसा करने में वह पूर्णतः उचित होगा क्योंकि उसने प्रकृति को उससे बेहतर जीवन लौटाया है, जितना उसे प्रकृति से प्राप्त हुआ था। उसने एक आदर्श मनुष्य का प्रतिमान स्थापित किया है। उसने यह दिखा दिया है कि सच्चा कल्याण (श्रेष्ठ जीवन) कैसा होता है और उसका महत्व कितना महान है। यदि उसे इससे भी अधिक लंबा जीवन मिला होता तो वह उसके पहले के जीवन के समान ही होता अर्थात उसी उत्कृष्टता, प्रज्ञा और सद्गुण का विस्तार मात्र होता।
वास्तव में हमें कितना जीना चाहिए? उतना कि हम इस ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त कर लें। हम जान लें कि प्रकृति की सृष्टि का आरंभ कैसे हुआ, वह इस विश्व को किस प्रकार व्यवस्थित रखती है, किन-किन परिवर्तनों के माध्यम से वह प्रत्येक वर्ष का पुनर्निर्माण करती है और किस प्रकार वह उन सभी वस्तुओं को अपने भीतर समेटे रहती है जो कभी अस्तित्व में आएँगी तथा स्वयं ही अपना अंतिम लक्ष्य भी है। हम यह जान लें कि तारागण अपनी ही शक्ति से गतिमान हैं। पृथ्वी के अतिरिक्त कुछ भी स्थिर नहीं है और शेष सभी खगोलीय पिंड निरंतर वेग से गतिशील हैं। हम समझ लें कि चंद्रमा सूर्य को कैसे और क्यों पीछे छोड़ देता है। जबकि उसकी गति धीमी है। वह अपना प्रकाश कैसे प्राप्त करता है और कैसे खो देता है तथा वे कौन-से कारण हैं जो रात्रि को लाते हैं और फिर दिन को वापस ले आते हैं। इन सबका अधिक निकट से दर्शन करने के लिए तुम्हें वहाँ जाना होगा जहाँ से इन्हें और स्पष्ट देखा जा सके।
फिर भी, ज्ञानी व्यक्ति कहता है, “मैं इसलिए अधिक निर्भीक होकर मृत्यु का सामना नहीं करता कि मुझे विश्वास है कि मैं सीधे अपने देवताओं के पास जा रहा हूँ। मैंने उनके बीच स्थान पाने की योग्यता अर्जित कर ली है। मैं पहले ही उनके साथ रह चुका हूँ। मैंने अपने विचार उनके पास भेजे हैं और उन्होंने अपने विचार मेरे पास भेजे हैं। किन्तु यदि ऐसा हो कि मृत्यु के बाद मेरा संपूर्ण अस्तित्व ही मिट जाए और मेरे मानवीय स्वरूप का कुछ भी शेष न बचे, तब भी मेरा आत्मविश्वास उतना ही अडिग रहेगा। यदि मैं ऐसी यात्रा पर निकलूँ जहाँ पहुँचकर कहीं भी ठहरना न हो, तब भी मैं निर्भय होकर प्रस्थान करूँगा।”
“वह तो बहुत अधिक समय तक जीवित रह सकता था।” हाँ, परंतु कोई पुस्तक केवल कुछ ही श्लोकों की होकर भी उत्कृष्ट और उपयोगी हो सकती है। तुम जानते हो कि टैनूसियस के इतिहास-वृत्तांत (Annals) कितने विशाल हैं और लोग उनके बारे में कैसी राय रखते हैं। कुछ लोगों का लंबा जीवन भी ठीक वैसा ही होता है, बहुत लंबा, पर सारहीन। क्या तुम उस व्यक्ति को अधिक भाग्यशाली मानते हो जो खेलों के अंतिम दिन मारा जाता है, उस व्यक्ति की अपेक्षा जो बीच ही में मर जाता है? क्या कोई इतना मूर्खतापूर्वक जीवन से चिपका हो सकता है कि वह अखाड़े में लड़ते हुए मरने के बजाय कपड़े उतारने वाले घेरे (stripping circle) में मारा जाना अधिक पसंद करे? हममें से कोई केवल थोड़ा पहले जाता है और कोई थोड़ा बाद में। मृत्यु तो सबके पास आती है। जो मारा गया है, उसके पीछे मारने वाला भी शीघ्र ही चल पड़ता है। जिस बात को लोग इतना बड़ा दुख समझते हैं, वह वास्तव में बहुत छोटी-सी बात है। इससे क्या अंतर पड़ता है कि तुम उस चीज़ को कितने समय तक टालते रहते हो, जिससे अंततः बचा ही नहीं जा सकता?
अभी के लिए विदा
No comments:
Post a Comment