प्रिय लूसीलियस
तुम चाहते हो कि मैं इन पत्रों का समापन भी पहले के पत्रों की तरह उद्धरणों के साथ करूँ। वे उद्धरण हमारे अपने दर्शन-मत के आचार्यों से लूँ। लेकिन उन्होंने वाक्चातुर्य के आकर्षक टुकड़ों में स्वयं को व्यस्त नहीं रखा। उनकी समस्त रचना गंभीर, सशक्त और पुरुषार्थपूर्ण है। जहाँ कोई विशेष बात शेष भागों से अलग उभरकर दिखाई देती है, वहाँ तुम निश्चय ही समझ सकते हो कि पूरी रचना का स्तर एक-सा नहीं है। एक अकेला वृक्ष किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता, जब पूरा वन ही समान ऊँचाई तक उठा हुआ हो।
कविताएँ ऐसे कथनों से भरी पड़ी हैं और इतिहास-ग्रंथ भी। इसलिए तुम यह मत समझो कि ऐसे विचार केवल एपिक्यूरस के हैं। वे तो सबकी साझी संपत्ति हैं और विशेष रूप से हमारी भी। लेकिन उसके यहाँ वे अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि वे बहुत कम दिखाई देते हैं। वे अप्रत्याशित होते हैं और क्योंकि यह आश्चर्यजनक लगता है कि ऐसा व्यक्ति, जो कोमलता और विलासिता का उपदेशक माना जाता है, इतनी साहसपूर्ण बातें कह सकता है। कम-से-कम अधिकांश लोग उसके बारे में यही सोचते हैं। किन्तु मेरी दृष्टि में एपिक्यूरस वास्तव में साहसी था, भले ही वह लंबी बाँहों वाले वस्त्र पहनता रहा हो। साहस, परिश्रम और युद्ध के योग्य मन केवल कठोर जीवन जीने वालों में ही नहीं पाए जाते। वे उतनी ही अच्छी तरह फ़ारसियों में भी मिल सकते हैं जितनी उन लोगों में जो कमर पर तलवार की पेटी बाँधते हैं।
इसलिए तुम्हारे पास उद्धरणों और चुने हुए अंशों की माँग करने का कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार की बातें दूसरे लेखकों के यहाँ चुनकर उद्धृत की जाती हैं, वे हमारे दर्शन-मत के ग्रंथों में निरंतर मिलती रहती हैं। इस कारण हमारे यहाँ वैसे आकर्षक वाक्य नहीं हैं जिनकी तुम्हें अपेक्षा है। हमारे यहाँ खरीदार दुकान में प्रवेश करके निराश नहीं होते कि बाहर जो दिखाया गया था, भीतर उससे अधिक कुछ नहीं है। हम उन्हें यह स्वतंत्रता देते हैं कि वे ग्रंथ के जिस भाग को चाहें, उसी को प्रदर्शनीय नमूना मान लें। मान लो कि हम कुछ कथनों को भीड़ से अलग निकालना चाहें तो उन्हें किसके नाम से जोड़ेंगे? क्या ज़ीनो (Zeno) के? क्या क्लीन्थीस (Cleanthes) के? क्या क्रिसिपस (Chrysippus) के? क्या पोसिडोनियस (Posidonius) के? या पैनैटियस (Panaetius) के? हम किसी एक सम्राट के अधीन नहीं हैं। हममें से प्रत्येक अपनी स्वतंत्रता का दावा करता है। एपिक्यूरस के अनुयायियों में हर्मार्खुस (Hermarchus) या मेट्रोडोरस (Metrodorus) जो कुछ भी कहते हैं, उसका श्रेय अंततः एक ही व्यक्ति को दिया जाता है। उस परंपरा में हर व्यक्ति मानो एक ही गुरु के निर्देशन और संरक्षण में बोलता है। किन्तु हमारे पास तो इतनी अधिक और समान रूप से उत्कृष्ट संपदा है कि हम चाहकर भी किसी एक को अलग नहीं कर सकते। मैं फिर कहता हूँ, हम ऐसा नहीं कर सकते कि केवल निर्धन व्यक्ति ही अपने पशुधन की गिनती करता रहता है।
तुम अपनी दृष्टि जहाँ भी डालोगे, वहाँ तुम्हें कुछ-न-कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा जो अपने आप में उत्कृष्ट माना जाता, यदि शेष रचना भी उतनी ही उत्कृष्ट न हो तो भी। इसी कारण तुम्हें यह आशा छोड़ देनी चाहिए कि तुम कभी महान विचारकों की रचनाओं का केवल थोड़ा-सा नमूना लेकर उन्हें समझ सकोगे। तुम्हें उन्हें संपूर्णता में पढ़ना होगा और संपूर्णता में ही समझना होगा। विषय का विवेचन उसके अनुरूप क्रम में किया जाता है, और एक ऐसी बौद्धिक रचना निर्मित की जाती है जिसमें से यदि कोई भाग हटा दिया जाए, तो पूरी संरचना ही ढह जाए। फिर भी, मुझे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि तुम उसके अलग-अलग अंगों का अध्ययन करो, बशर्ते कि तुम्हारी दृष्टि संपूर्ण व्यक्तित्व पर बनी रहे। सुंदर स्त्री वह नहीं होती जिसकी केवल एड़ी या कंधे की प्रशंसा की जाए बल्कि वह होती है जिसकी समग्र छवि हमारे मन को इस प्रकार आकर्षित कर ले कि हम उसके अलग-अलग अंगों पर ध्यान ही न दें।
लेकिन यदि तुम फिर भी आग्रह करोगे तो मैं तुम्हारे प्रति कंजूसी नहीं करूँगा बल्कि उन्हें मुट्ठी भर-भरकर बाँटूँगा। ऐसे कथनों के ढेर लगे हुए हैं। उन्हें केवल उठा लेने की आवश्यकता है, उन्हें इकट्ठा करने का कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। वे बूँद-बूँद करके नहीं आते बल्कि एक सतत प्रवाह के रूप में आते हैं। वे सब एक-दूसरे से जुड़े हुए होते हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे कथन आरंभिक विद्यार्थियों और दर्शन-मत के बाहर के श्रोताओं के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। अलग-अलग कथन अधिक आसानी से मन पर प्रभाव डालते हैं क्योंकि वे पद्य की पंक्तियों की तरह स्वतंत्र और पूर्ण होते हैं। इसी कारण हम बच्चों को कहावतें कंठस्थ कराते हैं। वे बातें भी जिन्हें यूनानी लोग ‘ख्रेयाइ’ कहते हैं क्योंकि बालक का मन अभी उतनी ही बातों को ग्रहण कर सकता है। उसमें इससे बड़ी चीज़ों के लिए अभी पर्याप्त स्थान नहीं होता। किन्तु यह लज्जाजनक है कि जो व्यक्ति वास्तव में प्रगति कर रहा हो, वह केवल सुन्दर वाक्यांशों को पकड़कर बैठे या याद किए हुए कुछ सामान्य कथनों के सहारे स्वयं को टिकाए रखे। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए! उसे ये बातें स्वयं कहनी चाहिए, केवल याद की हुई बातें दोहरानी नहीं चाहिए। यह शर्म की बात है कि कोई वृद्ध व्यक्ति या लगभग वृद्ध हो चुका व्यक्ति, अपनी बुद्धि किसी पाठ्य-पुस्तक से प्राप्त करे। “यह ज़ीनो ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? “यह क्लीन्थीस ने कहा था।” लेकिन तुम क्या कहते हो? तुम कब तक किसी दूसरे के आदेश के अधीन चलते रहोगे? स्वयं नेतृत्व संभालो। अपने बल पर कुछ ऐसा कहो जो स्मरणीय हो। अपनी ही निधि से कुछ बाहर लाओ।
इसलिए मुझे लगता है कि वे सभी लोग जो कभी स्वयं रचनाकार नहीं बनते बल्कि हमेशा केवल व्याख्याकार बने रहते हैं और जो किसी दूसरे की छाया में स्वयं को छिपाए रखते हैं, उनमें कुछ भी महान नहीं होता। क्योंकि उन्होंने कभी उस ज्ञान को व्यवहार में लाने का साहस नहीं किया जिसे सीखने में उन्होंने इतना लंबा समय बिताया है। उन्होंने अपनी स्मृति को दूसरों के शब्दों से भर लिया है। लेकिन स्मरण रखना एक बात है और जानना दूसरी। स्मरण रखने का अर्थ है किसी बात को याद करके सुरक्षित रखना जबकि जानने का अर्थ है उन बातों को वास्तव में अपना बना लेना। इस प्रकार कि किसी आदर्श का सहारा न लेना पड़े और हर समय अपने गुरु की ओर निर्देशों के लिए न देखना पड़े। “ज़ीनो ने यह कहा था और क्लीन्थीस ने वह कहा था।” तुम और पुस्तक के बीच कुछ दूरी तो होनी चाहिए! तुम कब तक विद्यार्थी बने रहोगे? अब स्वयं शिक्षक भी बनो। मैं ऐसी बातें क्यों सुनूँ जिन्हें मैं स्वयं पढ़ सकता हूँ? “जब बातें बोलकर कही जाती हैं तो बहुत अंतर पड़ता है,” कोई कह सकता है। हाँ, लेकिन तब नहीं, जब बोलने वाला केवल किसी दूसरे के शब्द उधार लेकर दोहरा रहा हो, जैसे कोई नकलनवीस करता है।
उन लोगों के संबंध में जो कभी अपने जीवन का नेतृत्व स्वयं नहीं संभालते, एक और समस्या भी है। वे पहले तो उन विषयों में अपने आचार्यों का अनुसरण करते हैं जिनमें बाकी सभी लोग अपनी स्वतंत्र राय बना चुके हैं। फिर वे उन विषयों में भी उनका अनुसरण करते हैं जो अभी भी अनुसंधान और विचार-विमर्श के अधीन हैं। यदि हम केवल अब तक खोजी गई बातों से ही संतुष्ट हो जाएँ तो कभी कोई नई खोज नहीं हो सकेगी। और फिर, जो लोग केवल अनुयायी बने रहते हैं, वे कभी कुछ नया नहीं खोजते बल्कि वे तो खोजने का प्रयास भी नहीं करते।
तो फिर क्या मैं अपने पूर्वजों के पदचिह्नों पर नहीं चलूँगा? निश्चय ही चलूँगा। मैं प्राचीन मार्ग का उपयोग करूँगा।लेकिन यदि मुझे कोई दूसरा मार्ग मिल जाए जो अधिक सीधा हो और जिसमें उतार-चढ़ाव कम हों तो मैं उसी मार्ग को अपनाऊँगा। जिन लोगों ने हमसे पहले इन सिद्धांतों को विकसित किया, वे हमारे स्वामी नहीं हैं बल्कि हमारे मार्गदर्शक हैं। सत्य सबके लिए खुला हुआ है। उस पर अभी किसी का एकाधिकार नहीं हुआ है। उसमें से बहुत कुछ अभी भी उन लोगों के लिए शेष है जो भविष्य में आएँगे।
अभी के लिए विदा
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