प्रिय लूसीलियस
जब मैं तुम्हें अध्ययन करने के लिए इतनी दृढ़ता से प्रेरित करता हूँ तो मैं अपने ही हित की सेवा कर रहा होता हूँ। मैं एक मित्र पाना चाहता हूँ। यह मेरे लिए तब तक संभव नहीं है जब तक तुम आत्म-सुधार के अपने प्रयास में दृढ़तापूर्वक लगे नहीं रहते। क्योंकि अभी तुम मुझसे प्रेम तो करते हो, परंतु मेरे मित्र नहीं हो।
“तुम्हारा क्या मतलब है? क्या इन दोनों में कोई अंतर है?” वास्तव में, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। मित्र प्रेम करता है लेकिन जो प्रेम करता है वह अनिवार्य रूप से मित्र नहीं होता। इसी कारण मित्रता सदैव लाभकारी होती है। जबकि प्रेम कभी-कभी हानिकारक भी सिद्ध हो सकता है। यदि और किसी कारण से नहीं तो कम से कम इसी कारण प्रगति करो कि तुम प्रेम करना सीख सको।
इसलिए मेरी खातिर अपनी उन्नति में शीघ्रता करो, अन्यथा तुम्हारा अध्ययन किसी और के ही काम आएगा। यह सच है कि मैं अभी भी उसका लाभ पा रहा हूँ क्योंकि मैं कल्पना करता हूँ कि हम दोनों एक ही विचार के हो जाएँगे। तुम्हारी आयु का जो उत्साह और शक्ति अभी तुम्हारे पास है, वह मुझे वह सब लौटा देगी जो मैंने खो दिया है। हमारी आयु का अंतर बहुत बड़ा नहीं है। फिर भी, मैं वास्तविक रूप से प्रसन्न होना चाहता हूँ। जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनसे उनकी अनुपस्थिति में भी हमें आनंद मिलता है पर वह हल्का और क्षणिक होता है। उनका दर्शन, उनकी उपस्थिति और उनसे वार्तालाप अपने भीतर एक प्रकार का सजीव सुख रखते हैं, विशेषकर तब जब तुम न केवल उस व्यक्ति को देखते हो जिसे देखना चाहते हो बल्कि उसे वैसा भी देखते हो जैसा तुम उसे देखना चाहते थे। अतः स्वयं को मुझे समर्पित कर दो। यह एक महान उपहार होगा। ताकि तुम और भी अधिक परिश्रम करो, यह स्मरण रखो कि तुम नश्वर हो और मैं वृद्ध हूँ।
तो शीघ्र मेरे पास आओ। लेकिन उससे भी पहले, स्वयं अपने पास पहुँचने की शीघ्रता करो। जैसे-जैसे तुम प्रगति करो, सबसे बढ़कर यह प्रयास करो कि तुम अपने प्रति सुसंगत बने रहो। यदि कभी तुम जानना चाहो कि कोई उपलब्धि हुई है या नहीं तो यह देखो कि आज तुम्हारे संकल्प और उद्देश्य वही हैं या नहीं जो कल थे। संकल्पों का बदलना यह दिखाता है कि मन समुद्र में भटकते जहाज़ की तरह है, जो हवा के झोंकों से इधर-उधर बहता रहता है। जो वस्तु दृढ़ता से स्थापित होती है, वह इधर-उधर नहीं डोलती। पूर्णतः बुद्धिमान व्यक्ति का स्वभाव ऐसा ही होता है। कुछ सीमा तक उस व्यक्ति का भी जो बुद्धिमत्ता की ओर अग्रसर है। तो फिर दोनों में अंतर क्या है? जो प्रगति कर रहा है, वह गति तो करता है पर अपनी स्थिति नहीं बदलता। वह केवल उसी स्थान पर हल्का-सा डोलता रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति बिल्कुल नहीं डोलता।
अभी के लिए विदा
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