प्रिय लूसीलियस
जब-जब मैं तुम्हारे पत्रों और तुम्हारे कार्यों से यह जानता हूँ कि तुमने स्वयं को भी कितना पीछे छोड़ दिया है, तब-तब मेरा हृदय गर्व से भर उठता है। मैं आनंद से पुलकित हो जाता हूँ। अपने वर्षों का बोझ झाड़ देता हूँ और फिर से युवावस्था की ऊष्मा का अनुभव करने लगता हूँ। क्योंकि तुमने बहुत पहले ही भीड़ का साथ छोड़ दिया था। यदि कोई किसान अपने वृक्ष को फलते देखकर प्रसन्न होता है, यदि कोई पशुपालक अपने पशुओं को संतान उत्पन्न करते देखकर आनंदित होता है, यदि कोई व्यक्ति अपने संरक्षण में पले युवक को वयस्क होते देखकर ऐसा अनुभव करता है मानो वह स्वयं ही परिपक्व हुआ हो तो तुम क्या सोचते हो कि उस व्यक्ति को कितना आनंद होता होगा जिसने किसी के बौद्धिक विकास का मार्गदर्शन किया हो और उस अपरिपक्व मन को अचानक पूर्ण विकसित होते देखा हो? मैं तुम्हें अपना कहता हूँ। तुम मेरी कृति हो। तुम्हारी क्षमता को पहचानकर सबसे पहले मैंने ही तुम्हें अपने संरक्षण में लिया था। मैंने ही तुम्हें प्रोत्साहित किया, आगे बढ़ाया, तुम्हें रुकने नहीं दिया बल्कि निरंतर प्रेरित करता रहा। मैं अब भी यही कर रहा हूँ। अंतर केवल इतना है कि अब मैं दौड़ में तुम्हारा उत्साह बढ़ा रहा हूँ और बदले में तुम मेरा उत्साह बढ़ा रहे हो।
“और क्या कहूँ?” तुम पूछते हो। “मैं तो हर समय तत्पर हूँ।” यही तो मुख्य बात है। केवल आधी नहीं, जैसा कि उस कहावत में कहा जाता है कि ‘अच्छी शुरुआत आधा काम पूरा कर देती है।’ यह ऐसा विषय है जो मन पर निर्भर करता है। इसलिए जब कोई व्यक्ति अच्छा बनने की इच्छा कर लेता है तो अच्छाई का एक बड़ा भाग पहले ही प्राप्त हो जाता है।
क्या तुम जानते हो कि मैं अच्छे मनुष्य से क्या अभिप्राय रखता हूँ? वह जो पूर्ण है। वह जो सिद्ध और परिपक्व हो चुका है। वह जिसे कोई भी शक्ति, कोई भी बाध्यता, किसी भी प्रकार से गलत कार्य करने के लिए विवश नहीं कर सकती। मुझे विश्वास है कि यदि तुम दृढ़ता से लगे रहोगे, निरंतर आगे बढ़ते रहोगे और अपने सभी कर्मों तथा वचनों को एक-दूसरे के अनुरूप और सामंजस्यपूर्ण बनाओगे, मानो वे सब एक ही साँचे में ढले हों। तुम ऐसे ही अच्छे मनुष्य बनोगे। यदि किसी व्यक्ति के कर्म परस्पर असंगत हों तो इसका अर्थ है कि उसका मन अभी तक सही रूप से व्यवस्थित और संतुलित नहीं हुआ है।
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